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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

८- प्रह्लाद और नारायणका तुमुल युद्ध, भक्तिसे विजय

अध्याय ६ ] नर-नारायणकी उत्पत्ति, बदरिकाश्रमकी वसन्तकी शोभा, कामकी अङ्गताका वर्णन ३३ तं कूजमानं विलपन्तमारात् समीक्ष्य कामो वृषकेतनं हि। विव्याध चापं तरसा विनाम्य संतापनाम्ना तु शरेण भूयः ॥ ४३ संतापनास्त्रेण तदा स विद्धो भूयः स संतप्ततरो बभूव। संतापयँश्चापि जगत्समग्रं फूत्कृत्य फूत्कृत्य विवासते स्म॥ ४४ तं चापि भूयो मदनो जघान विजृम्भणास्त्रेण ततो विजृम्भे। ततो भृशं कामशरैर्विदुन्नो विजृम्भमाणः परितो भ्रमंश्च ॥ ४५ ददर्श यक्षाधिपतेस्तनूजं पाञ्चालिकं नाम जगत्प्रधानम्। दृष्ट्वा त्रिनेत्रो धनदस्य पुत्रं पार्श्वं समभ्येत्य वचो बभाषे। भ्रातृव्य वक्ष्यामि वचो यदद्य तत् त्वं कुरुष्वामितविक्रमोऽसि ॥ ४६ पाञ्चालिक उवाच यन्नाथ मां वक्ष्यसि तत्करिष्ये सुदुष्करं यद्यपि देवसंघैः । आज्ञापयस्वांतुलवीर्य शंभो दासोऽस्मि ते भक्तियुतस्तथेश ॥ ४७ ईश्वर उवाच नाशं गतायां वरदाम्बिकायां कामाग्निना प्लुष्टसुविग्रहोऽस्मि । विजृम्भणोन्मादशरैर्विभिन्नो धृतिं न विन्दामि रतिं सुखं वा ॥ ४८ विजृम्भणं पुत्र तथैव ताप- मुन्मादमुग्रं मदनप्रणुन्नम् । नान्यः पुमान् धारयितुं हि शक्तो मुक्त्वा भवन्तं हि ततः प्रतीच्छ ॥ ४९ पुलस्त्य उवाच इत्येवमुक्तो वृषभध्वजेन यक्षः प्रतीच्छत् स विजृम्भणादीन् । तोषं जगामाशु ततस्त्रिशूली तुष्टस्तदैवं वचनं बभाषे ॥ ५० हर उवाच यस्मात्त्वया पुत्र सुदुर्धराणि विजृम्भणादीनि प्रतीच्छितानि । विलाप करते हुए भगवान् शंकरको दूरसे देखकर कामने अपना धनुष झुका (चढ़ा)-कर पुनः वेगसे उन्हें संतापक अस्त्रसे वेध डाला। अब वे इससे विद्ध होकर और भी अधिक संतप्त हो गये एवं मुखसे बारंबार (विलख) फूत्कार कर सम्पूर्ण विश्वको दुःखी करते हुए जैसे-तैसे समय बिताने लगे। फिर कामने उनपर विजृम्भण नामक अस्त्रसे प्रहार किया। इससे उन्हें जँभाई आने लगी। अब कामके बाणोंसे विशेष पीड़ित होकर जँभाई लेते हुए वे चारों ओर घूमने लगे। इसी समय उन्होंने कुबेरके पुत्र पाञ्चालिकको देखा और उसको देखकर उसके पास जाकर त्रिनेत्र शंकरने यह बात कही - भ्रातृव्य ! तुम अमित विक्रमशाली हो, मैं जो आज बात कहता हूँ तुम उसे करो ॥ ४२-४६ ॥ पाञ्चालिकने कहा - स्वामिन् ! आप जो कहेंगे, देवताओंद्वारा सुदुष्कर होनेपर भी उसे मैं करूँगा। हे अतुल बलशाली शिव ! आप आज्ञा करें। ईश ! मैं आपका श्रद्धालु भक्त एवं दास हूँ ॥ ४७ ॥ भगवान् शिव बोले - वरदायिनी अम्बिका (सती)-के नष्ट होनेसे मेरा सुन्दर शरीर कामाग्निसे अत्यन्त दग्ध हो रहा है। कामके विजृम्भण और उन्माद शरोंसे विद्ध होनेसे मुझे धैर्य, रति या सुख नहीं प्राप्त हो रहा है। पुत्र ! तुम्हारे अतिरिक्त अन्य कोई पुरुष, कामदेवसे प्रेरित विजृम्भण, संतापन और उन्माद नामक उग्र अस्त्र सहन करनेमें समर्थ नहीं है। अतः तुम इन्हें ग्रहण कर लो ॥ ४८-४९॥ पुलस्त्यजी बोले - भगवान् शिवके ऐसा कहनेपर उस यक्ष (कुबेर-पुत्र पाञ्चालिक)-ने विजृम्भण आदि सभी अस्त्रोंको उनसे ले लिया। इससे त्रिशूलीको तत्काल संतोष प्राप्त हो गया और प्रसन्न होकर उन्होंने उससे ये वचन कहे - ॥ ५० ॥ भगवान् महादेवजी बोले- पुत्र ! तुमने अति भयंकर विजृम्भण आदि अस्त्रोंको ग्रहण कर लिया,

३४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६ तस्माद्वरं त्वां प्रतिपूजनाय दास्यामि लोकस्य च हास्यकारि ॥ ५१ यस्त्वां यदा पश्यति चैत्रमासे स्पृशेनरो वार्चयते च भक्त्या। वृद्धोऽथ बालोऽथ युवाथ योषित् सर्वे तदोन्मादधरा भवन्ति ॥ ५२ गायन्ति नृत्यन्ति रमन्ति यक्ष वाद्यानि यत्नादपि वादयन्ति। तवाग्रतो हास्यवचोऽभिरक्ता भवन्ति ते योग्ययुतास्तु ते स्युः ॥ ५३ ममैव नाम्ना भविताऽसि पूज्यः पाञ्चालिकेशः प्रथितः पृथिव्याम्। मम प्रसादाद् वरदो नराणां भविष्यसे पूज्यतमोऽभिगच्छ ॥ ५४ इत्येवमुक्तो विभुना स यक्षो जगाम देशान् सहसैव सर्वान्। कालञ्जरस्योत्तरतः सुपुण्यो देशो हिमाद्रेरपि दक्षिणस्थः ॥ ५५ तस्मिन् सुपुण्ये विषये निविष्टो रुद्रप्रसादादभिपूज्यतेऽसौ । तस्मिन् प्रयाते भगवांस्त्रिनेत्रो देवोऽपि विन्ध्यं गिरिमभ्यगच्छत् ॥ ५६ तत्रापि मदनो गत्वा ददर्श वृषकेतनम्। दृष्ट्वा प्रहर्तुकामं च ततः प्रादुद्रवद्धरः ॥ ५७ ततो दारुवनं घोरं मदनाभिसुतो हरः। विवेश ऋषयो यत्र सपत्नीका व्यवस्थिताः ॥ ५८ ते चापि ऋषयः सर्वे दृष्ट्वा मूर्ध्ना नताभवन्। ततस्तान् प्राह भगवान् भिक्षा मे प्रतिदीयताम् ॥ ५९ ततस्ते मौनिनस्तस्थुः सर्व एव महर्षयः। तदाश्रमाणि सर्वाणि परिचक्राम नारद ॥ ६० तं प्रविष्टं तदा दृष्ट्वा भार्गवात्रेययोषितः। प्रक्षोभमगमन् सर्वा हीनसत्त्वाः समन्ततः ॥ ६१ ऋते त्वरुन्धतीमेकामनसूयां च भामिनीम्। एताभ्यां भर्तृपूजासु तच्चिन्तासु स्थितं मनः ॥ ६२ ततः संक्षुभिताः सर्वा यत्र याति महेश्वरः। तत्र प्रयान्ति कामार्त्ता मदविह्वलितेन्द्रियाः ॥ ६३ त्यक्त्वाश्रमाणि शून्यानि स्वानि ता मुनियोषितः। अनुजग्मुर्यथा मत्तं करिण्य इव कुञ्जरम् ॥ ६४ अतः प्रत्युपकारमें तुम्हें सब लोगोंके लिये आनन्ददायक वर दूँगा। चैत्रमासमें जो वृद्ध, बालक, युवा या स्त्री तुम्हारा स्पर्श करेंगे या भक्तिपूर्वक तुम्हारी पूजा करेंगे वे सभी उन्मत्त हो जायेंगे। यक्ष! फिर वे गायेंगे, नाचेंगे, आनन्दित होंगे और निपुणताके साथ बाजे बजायेंगे। किंतु तुम्हारे सम्मुख हँसीकी बात करते हुए भी वे योगयुक्त रहेंगे। मेरे ही नामसे तुम पूज्य होगे। विश्वमें तुम्हारा पाञ्चालिकेश नाम प्रसिद्ध होगा। मेरे आशीर्वादसे तुमलोगोंके वरदाता और पूज्यतम होगे; जाओ ॥ ५१-५४॥ भगवान् शिवके ऐसा कहनेपर वह यक्ष तुरंत सब देशोंमें घूमने लगा। फिर वह कालञ्जरके उत्तर और हिमालयके दक्षिण परम पवित्र स्थानमें स्थिर हो गया। वह शिवजीकी कृपासे पूजित हुआ। उसके चले जानेपर भगवान् त्रिनेत्र भी विन्ध्यपर्वतपर आ गये। वहाँ भी कामने उन्हें देखा। उसे पुनः प्रहारकी चेष्टा करते देख शिवजी भागने लगे। उसके बाद कामदेवके द्वारा पीछा किये जानेपर महादेवजी घोर दारुवनमें चले गये, जहाँ ऋषिगण अपनी पत्नियोंके साथ निवास करते थे ॥ ५५-५८ ॥ उन ऋषियोंने भी उन्हें देखकर सिर झुकाकर प्रणाम किया। फिर भगवान्ने उनसे कहा-आपलोग मुझे भिक्षा दीजिये। इसपर सभी महर्षि मौन रह गये। नारदजी! इसपर महादेवजी सभी आश्रमोंमें घूमने लगे। उस समय उन्हें आश्रममें आया हुआ देख पतिव्रता अरुन्धती और अनसूयाको छोड़कर ऋषियोंकी समस्त पत्नयाँ प्रक्षुब्ध एवं सत्यहीन हो गयीं। पर अरुन्धती और अनसूया पतिसेवामें ही लगी रहीं ॥ ५९-६२ ॥ अब शिवजी जहाँ-जहाँ जाते थे, वहाँ-वहाँ संक्षुभित, कामार्त एवं मदसे विकल इन्द्रियोंवाली स्त्रियाँ भी जाने लगीं। मुनियोंकी वे स्त्रियाँ अपने आश्रमोंको सूना छोड़ उनका इस प्रकार अनुसरण करने लगीं, जैसे करेणु

अध्याय ६ ] नर-नारायणकी उत्पत्ति, बदरिकाश्रमकी वसन्तकी शोभा, कामकी अङ्गताका वर्णन ३५ ततस्तु ऋषयो दृष्ट्वा भार्गवाङ्गिरसो मुने। क्रोधान्विताब्रुवन्सर्वे लिङ्गोऽस्य पततां भुवि ॥ ६५ ततः पपात देवस्य लिङ्गं पृथ्वीं विदारयन्। अन्तर्द्धानं जगामाथ त्रिशूली नीललोहितः ॥ ६६ ततः स पतितो लिङ्गो विभिद्य वसुधातलम्। रसातलं विवेशाशु ब्रह्माण्डं चोर्ध्वतोऽभिनत् ॥ ६७ ततश्चचाल पृथिवी गिरयः सरितो नगाः। पातालभुवनाः सर्वे जङ्गमाजङ्गमैर्वृताः ॥ ६८ संक्षुब्धान् भुवनान् दृष्ट्वा भूर्लोकादीन् पितामहः। जगाम माधवं द्रष्टुं क्षीरोदं नाम सागरम्॥ ६९ तत्र दृष्ट्वा हृषीकेशं प्रणिपत्य च भक्तितः। उवाच देव भुवनाः किमर्थं क्षुभिता विभो ॥ ७० अथोवाच हरिर्ब्रह्मन् शार्वो लिङ्गो महर्षिभिः। पातितस्तस्य भारार्ता संचचाल वसुंधरा ॥ ७१ ततस्तदद्भुततमं श्रुत्वा देवः पितामहः। तत्र गच्छाम देवेश एवमाह पुनः पुनः ॥ ७२ ततः पितामहो देवः केशवश्च जगत्पतिः। आजग्मतुस्तमुद्देशं यत्र लिङ्गं भवस्य तत् ॥ ७३ ततोऽनन्तं हरिलिङ्गं दृष्ट्वारुह्य खगेश्वरम्। पातालं प्रविवेशाथ विस्मयान्तरितो विभुः ॥ ७४ ब्रह्मा पद्मविमानेन ऊर्ध्वमाक्रम्य सर्वतः। नैवान्तमलभद् ब्रह्मन् विस्मितः पुनरागतः ॥ ७५ विष्णुर्गत्वाऽथ पातालान् सप्त लोकपरायणः। चक्रपाणिर्विनिष्क्रान्तो लेभेऽन्तं न महामुने ॥ ७६ विष्णुः पितामहश्चोभौ हरलिङ्गं समेत्य हि। कृताञ्जलिपुटौ भूत्वा स्तोतुं देवं प्रचक्रतुः ॥ ७७ हरिब्रह्माणावूचतुः नमोऽस्तु ते शूलपाणे नमोऽस्तु वृषभध्वज। जीमूतवाहन कवे शर्व त्र्यम्बक शंकर ॥ ७८ महेश्वर महेशान सुवर्णाक्ष वृषाकपे। दक्षयज्ञक्षयकर कालरूप नमोऽस्तु ते ॥ ७९ त्वमादिरस्य जगतस्त्वं मध्यं परमेश्वर। भवानन्तश्च भगवान् सर्वगस्त्वं नमोऽस्तु ते ॥ ८० मदमत्त गजका अनुसरण करे। मुने! यह देखकर ऋषिगण क्रुद्ध हो गये एवं कहा कि इनका लिङ्ग भूमिपर गिर जाय। फिर तो महादेवका लिङ्ग पृथ्वीको विदीर्ण करता हुआ गिर गया एवं तब नीललोहित त्रिशूली अन्तर्धान हो गये ॥ ६३-६६ ॥ वह पृथ्वीपर गिरा लिंग उसका भेदन कर तुरंत रसातलमें प्रविष्ट हो गया एवं ऊपरकी ओर भी उसने विश्वब्रह्माण्डका भेदन कर दिया। इसके बाद पृथ्वी, पर्वत, नदियाँ, पादप तथा चराचरसे पूर्ण समस्त पाताललोक काँप उठे। पितामह ब्रह्मा भूर्लोक आदि भुवनोंको संक्षुब्ध देखकर श्रीविष्णुसे मिलने क्षीरसागर पहुँचे। वहाँ उन्हें देख भक्तिपूर्वक प्रणाम कर ब्रह्माने कहा- देव ! समस्त भुवन विक्षुब्ध कैसे हो गये हैं ? ॥ ६७-७० ॥ इसपर श्रीहरिने कहा- ब्रह्मन् ! महर्षियोंने शिवके लिङ्गको गिरा दिया है। उसके भारसे कष्टमें पड़ी आर्त पृथ्वी विचलित हो रही है। इसके बाद ब्रह्माजी उस अद्भुत बातको सुनकर देवेश ! हमलोग वहाँ चलें- ऐसा बार-बार कहने लगे। फिर ब्रह्मा और जगत्पति विष्णु वहाँ पहुँचे, जहाँ शंकरका लिङ्ग गिरा था। वहाँ उस अनन्त लिङ्गको देखकर आश्चर्यचकित होकर हरि गरुड़पर सवार हो उसका पता लगानेके लिये पातालमें प्रविष्ट हुए ॥ ७१-७४ ॥ नारदजी ! ब्रह्माजी अपने पद्मायानके द्वारा सम्पूर्ण ऊर्ध्वाकाशको लाँघ गये, पर उस लिङ्गका अन्त नहीं पा सके और आश्चर्यचकित होकर वे लौट आये। मुने ! इसी प्रकार जब चक्रपाणि भगवान् विष्णु भी सातों पातालोंमें प्रवेश कर उस लिङ्गका बिना अन्त पाये ही वहाँसे बाहर आये, तब ब्रह्मा, विष्णु दोनों शिवलिङ्गके पास जाकर हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे ॥ ७५-७७ ॥ ब्रह्मा-विष्णु बोले - शूलपाणिजी ! आपको प्रणाम है। वृषभध्वज ! जीमूतवाहन ! कवि ! शर्व ! त्र्यम्बक ! शंकर ! आपको प्रणाम है। महेश्वर ! महेशान ! सुवर्णाक्ष ! वृषाकपे ! दक्ष-यज्ञ-विध्वंसक ! कालरूप शिव ! आपको प्रणाम है। परमेश्वर ! आप इस जगत्के आदि, मध्य एवं अन्त हैं। आप षडैश्वर्यपूर्ण भगवान् सर्वत्रगामी या सर्वत्र व्याप्त हैं। आपको प्रणाम है ॥ ७८-८० ॥

३६श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६
SanskritHindi
पुलस्त्य उवाच<br>एवं संस्तूयमानस्तु तस्मिन् दारुवने हरः।<br>स्वरूपी ताविदं वाक्यमुवाच वदतां वरः॥ ८१॥पुलस्त्यजी बोले— उस दारुवनमें इस प्रकार स्तुति किये जानेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ हरने अपने स्वरूपमें प्रकट होकर (अर्थात् मूर्तिमान् होकर) उन दोनोंसे इस प्रकार कहा— ॥ ८१ ॥
हर उवाच<br>किमर्थं देवतानाथौ परिभूतक्रमं त्विह।<br>मां स्तुवाते भृशास्वस्थं कामतापितविग्रहम्॥ ८२भगवान् शंकर बोले— आप दोनों सभी देवताओंके स्वामी हैं। आपलोग चलते-चलते थके हुए तथा कामाग्निसे दग्ध और मुझ सब प्रकारसे अस्वस्थ व्यक्तिकी क्यों स्तुति कर रहे हैं?॥ ८२॥
देवावूचतुः<br>भवतः पातितं लिङ्गं यदेतद् भुवि शंकर।<br>एतत् प्रगृह्यतां भूय अतो देव स्तुवावहे॥ ८३(इसपर) ब्रह्मा-विष्णु (दोनों) बोले— शिवजी! पृथ्वीपर आपका जो यह लिङ्ग गिराया गया है, उसे पुनः आप ग्रहण करें। इसीलिये हम आपकी स्तुति कर रहे हैं॥ ८३॥
हर उवाच<br>यद्यर्चयन्ति त्रिदशा मम लिङ्गं सुरोत्तमौ।<br>तदेतत्प्रतिगृह्णीयां नान्यथेति कथंचन॥ ८४<br><br>ततः प्रोवाच भगवानैवमस्त्विति केशवः।<br>ब्रह्मा स्वयं च जग्राह लिङ्गं कनकपिङ्गलम्॥ ८५<br><br>ततश्चकार भगवांश्चातुर्वर्ण्यं हरार्चने।<br>शास्त्राणि चैषां मुख्यानि नानोक्ति विदितानि च॥ ८६<br><br>आद्यं शैवं परिख्यातमन्त्यत्पाशुपतं मुने।<br>तृतीयं कालवदनं चतुर्थं च कपालिनम्॥ ८७शिवजीने कहा— श्रेष्ठ देवो! यदि सभी देवता मेरे लिङ्गकी पूजा करना स्वीकार करें, तभी मैं इसे पुनः ग्रहण करूँगा, अन्यथा किसी प्रकार भी इसे नहीं धारण करूँगा। तब भगवान् विष्णु बोले—ऐसा ही होगा। फिर ब्रह्माजीने स्वयं उस स्वर्णके सदृश पिंगल लिङ्गको ग्रहण किया। तब भगवान्ने चारों वर्णोंको हर-लिङ्गकी अर्चनाका अधिकारी बनाया। इनके मुख्य शास्त्र नाना प्रकारके वचनोंसे प्रख्यात हैं। मुने! उन शिव-भक्तोंका प्रथम सम्प्रदाय शैव, द्वितीय पाशुपत, तृतीय कालमुख¹ और चतुर्थ सम्प्रदाय कापालिक या भैरव नामसे विख्यात है²॥ ८४–८७॥
शैवश्चासीत्स्वयं शक्तिर्वसिष्ठस्य प्रियः सुतः।<br>तस्य शिष्यो बभूवाथ गोपायन इति श्रुतः॥ ८८महर्षि वसिष्ठके प्रियपुत्र शक्ति ऋषि स्वयं शैव थे। उनके एक शिष्य गोपायन नामसे प्रसिद्ध हुए। उन्होंने शैव सम्प्रदायको दूरतक फैलाया।
महापाशुपतश्चासीद्भरद्वाजस्तपोधनः ।<br>तस्य शिष्योऽप्यभूद्राजा ऋषभः सोमकेश्वरः॥ ८९तपोधन भरद्वाज महापाशुपत थे और सोमकेश्वर राजा ऋषभ उनके शिष्य हुए, जिनसे पाशुपत-सम्प्रदाय विशेषरूपसे परिवर्तित हुआ।
कालास्यो भगवानासीदापस्तम्बस्तपोधनः।<br>तस्य शिष्यो भवद्वैश्यो नाम्ना क्राथेश्वरो मुने॥ ९०मुने! ऐश्वर्य एवं तपस्याके धनी महर्षि आपस्तम्ब, कालमुख सम्प्रदायके आचार्य थे। क्राथेश्वर नामके उनके वैश्य शिष्यने इस सम्प्रदायका विशेष रूपसे प्रचार

१-गणेशसहस्रनामके 'खम्भात' भाष्यमें कालमुखमतका विशेष परिचय है।
२-शैवं पाशुपतं कालमुखं भैरवशासनम्। (गणेशसहस्रनाम १२९)

अध्याय ६ ] नर-नारायणकी उत्पत्ति, बदरिकाश्रमकी वसन्तकी शोभा, कामकी अनङ्गताका वर्णन ३७ महाव्रती च धनदस्तस्य शिष्यश्च वीर्यवान्। कर्णोदर इति ख्यातो जात्या शूद्रो महातपाः ॥ ९१ एवं स भगवान् ब्रह्मा पूजनाय शिवस्य तु। कृत्वा तु चातुराश्रम्यं स्वमेव भवनं गतः ॥ ९२ गते ब्रह्मणि शर्वोऽपि उपसंहृत्य तं तदा। लिङ्गं चित्रवने सूक्ष्मं प्रतिष्ठाप्य चचार ह॥ ९३ विचरन्तं तदा भूयो महेशं कुसुमायुधः। आरात्स्थित्वाऽग्रतो धन्वी संतापयितुमुद्यतः ॥ ९४ ततस्तमग्रतो दृष्ट्वा क्रोधाध्मातदृशा हरः। स्मरमालोकयामास शिखाग्राच्चरणान्तिकम् ॥ ९५ आलोकितस्त्रिनेत्रेण मदनो द्युतिमानपि। प्रादह्यत तदा ब्रह्मन् पादादारभ्य कक्षवत् ॥ ९६ प्रदह्यमानौ चरणौ दृष्ट्वाऽसौ कुसुमायुधः। उत्ससर्ज धनुः श्रेष्ठं तज्जगामाथ पञ्चधा ॥ ९७ यदासीन्मुष्टिबन्धं तु रुक्मपृष्ठं महाप्रभम्। स चम्पकतरुर्जातः सुगन्धाढ्यो गुणाकृतिः ॥ ९८ नाहस्थानं शुभाकारं यदासीद्वज्रभूषितम्। तज्जातं केसरारण्यं बकुलं नामतो मुने ॥ ९९ या च कोटी शुभा ह्यासीदिन्द्रनीलविभूषिता। जाता सा पाटला रम्या भृङ्गराजिविभूषिता ॥ १०० नाहोपरि तथा मुष्टौ स्थानं शशिमणिप्रभम्। पञ्चगुल्माऽभवज्जाती शशाङ्ककिरणोज्ज्वला ॥ १०१ ऊर्ध्वं मुष्ट्या अधः कोट्योः स्थानं विद्रुमभूषितम्। तस्माद्बहुपुटा मल्ली संजाता विविधा मुने ॥ १०२ पुष्पोत्तमानि रम्याणि सुरभीणि च नारद। जातियुक्तानि देवेन स्वयमाचरितानि च॥ १०३ मुमोच मार्गणान् भूम्यां शरीरे दह्यति स्मरः। फलोपगानि वृक्षाणि संभूतानि सहस्त्रशः ॥ १०४ किया। महाव्रती साक्षात् कुबेर प्रथम कापालिक या भैरव-सम्प्रदायके आचार्य हुए थे। शूद्रजातिके महातपस्वी कर्णोदर नामक उनके एक प्रसिद्ध शिष्य हुए। इन्होंने इस मतका विशेष प्रचार किया * ॥ ८८-९१॥ इस प्रकार ब्रह्माजी शिवकी उपासनाके लिये चार सम्प्रदायोंका विधान कर ब्रह्मलोकको चले गये। ब्रह्माजीके जानेपर महादेवने उस लिङ्गको उपसंहृत कर लिया - समेट लिया एवं वे चित्रवनमें सूक्ष्म लिङ्ग प्रतिष्ठापित कर विचरण करने लगे। यहाँ भी शिवजीको घूमते देख पुष्पधनुष कामदेव पुनः उनके सामने सहसा बहुत निकट आकर उन्हें संतापन बाणसे बेधनेको उद्यत हुआ। तब उसे इस प्रकार सामने खड़ा देखकर शिवजीने उस कामदेवको सिरसे चरणतक क्रोधभरी दृष्टिसे देखा ॥ ९२-९५ ॥ ब्रह्मन् ! वह कामदेव अत्यन्त तेजस्वी था। फिर भी भगवान्द्वारा इस प्रकार दृष्ट होनेपर वह पैरसे लेकर कटिपर्यन्त दग्ध हो गया। अपने चरणोंको जलते हुए देखकर पुष्पायुध कामने अपने श्रेष्ठ धनुषको दूर फेंक दिया। इससे उसके पाँच टुकड़े हो गये। उस धनुषका जो चमचमाता हुआ सुवर्णयुक्त मुठबंध था, वह सुगन्धपूर्ण सुन्दर चम्पक वृक्ष हो गया। मुने ! उस धनुषका जो हीरा जड़ा हुआ सुन्दर कृतिवाला नाहस्थान था, वह केसरवनमें बकुल (मौलेसरी) नामका वृक्ष बना। इन्द्रनीलसे सुशोभित उसकी सुन्दर कोटि भृंगोंसे विभूषित सुन्दर पाटला (गुलाब)-के रूपमें परिणत हो गयी ॥ ९६-१०० ॥ धनुषनाहके ऊपर मुष्टिमें स्थित चन्द्रकान्तमणिकी प्रभासे युक्त स्थान चन्द्रकिरणके समान उज्ज्वल पाँच गुल्मवाली जाती (चमेली-पुष्प) बन गया। मुने ! मुष्टिके ऊपर और दोनों कोटियोंके नीचेवाले विद्रुममणि- विभूषित स्थानसे अनेक पुटोंवाली मल्लिका (मालती) हो गयी। नारदजी ! देवके द्वारा जातीके साथ अन्य सुन्दर तथा सुगन्धित पुष्पोंकी सृष्टि हुई। ऊर्ध्व शरीरके दग्ध होनेके समय कामदेवने अपने बाणोंको भी पृथ्वीपर फेंका था, इससे हजारों प्रकारके फलयुक्त वृक्ष

  • इसपर डॉ० भण्डारकरके 'वैष्णविज्म'-'शैविज्म'में विस्तृत विचार हैं।
३८श्रीवामनपुराण[ अध्याय ७
चूतादीनि सुगन्धीनि स्वादूनि विविधानि च।<br>हरप्रसादाज्जातानि भोज्यान्यपि सुरोत्तमैः ॥ १०५<br><br>एवं दग्ध्वा स्मरं रुद्रः संयम्य स्वतनूं विभुः।<br>पुण्यार्थी शिशिराद्रिं स जगाम तपसेऽव्ययः॥ १०६<br><br>एवं पुरा देववरेण शम्भुना<br>कामस्तु दग्धः सशरः सचापः।<br>ततस्त्वनङ्गेति महाधनुर्द्धरो<br>देवैस्तु गीतः सुरपूर्वपूजितः॥ १०७उत्पन्न हो गये। शिवजीकी कृपासे श्रेष्ठ देवताओंद्वारा भी अनेक प्रकारके सुगन्धित एवं स्वादिष्ट आम्र आदि फल उत्पन्न हुए, जो खानेमें स्वादुयुक्त हैं। इस प्रकार कामदेवको भस्म कर एवं अपने शरीरको संयतकर समर्थ, अविनाशी शिव पुण्यकी कामनासे हिमालयपर तपस्या करने चले गये। इस प्रकार प्राचीन समयमें देवश्रेष्ठ शिवजीद्वारा धनुषबाणसहित काम दग्ध किया गया था। तबसे देवताओंमें प्रथम पूजित वह महाधनुर्धर देवोंद्वारा 'अनङ्ग' कहा गया॥ १०१-१०७॥
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॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें छठा अध्याय समाप्त हुआ॥ ६ ॥


सातवाँ अध्याय

उर्वशीकी उत्पत्ति-कथा, प्रह्लाद-प्रसंग—नर-नारायणसे संवाद एवं युद्धोपक्रम

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पुलस्त्य उवाच<br>ततोऽनङ्गं विभुर्दृष्ट्वा ब्रह्मन् नारायणो मुनिः।<br>प्रहस्यैवं वचः प्राह कन्दर्प इह आस्यताम्॥ १<br><br>तदक्षुब्धत्वमीक्ष्यास्य कामो विस्मयमागतः।<br>वसन्तोऽपि महाचिन्तां जगामाशु महामुने॥ २<br><br>ततश्चाप्सरसो दृष्ट्वा स्वागतेनाभिपूज्य च।<br>वसन्तमाह भगवानेह्येहि स्थीयतामिति॥ ३<br><br>ततो विहस्य भगवान् मञ्जरीं कुसुमावृताम्।<br>आदाय प्राक्सुवर्णाङ्गीमूर्वोर्बालां विनिर्ममे॥ ४<br><br>ऊरूद्भवां स कन्दर्पो दृष्ट्वा सर्वाङ्गसुन्दरीम्।<br>अमन्यत तदाऽनङ्गः किमियं सा प्रिया रतिः॥ ५<br><br>तदेव वदनं चारु स्वाक्षिभ्रुकुटिलालकम्।<br>सुनासावंशाधरोष्ठमालोकनपरायणम् ॥ ६<br><br>तावेवाहार्यविरलौ पीवरौ मग्नचूचुकौ।<br>राजतेऽस्याः कुचौ पीनौ सज्जनाविव संहतौ॥ ७पुलस्त्यजी बोले— नारदजी! उसके बाद समर्थ नारायण ऋषि कामदेवको हँसते हुए देखकर यों बोले—काम! तुम यहाँ बैठो। काम उनकी उस अक्षुब्धता (स्थिरता)-को देखकर चकित हो गया। महामुने! वसन्तको भी उस समय बड़ी चिन्ता हुई। फिर अप्सराओंकी ओर देखकर स्वागतके द्वारा उनकी पूजा कर भगवान् नारायणने वसन्तसे कहा—आओ बैठो। उसके पश्चात् भगवान् नारायण मुनिने हँसकर एक फूलसे भरी मञ्जरी ली और अपने ऊरुपर एक सुवर्ण अङ्गवाली तरुणीका चित्र लिखकर उसकी सजीव रचना कर दी। नारायणकी जाँघसे उत्पन्न उस सर्वाङ्ग सुन्दरीको देखकर कामदेव मनमें सोचने लगा—क्या यह सुन्दरी मेरी पत्नी रति है!॥ १—५॥<br><br>इसकी वैसी ही सुन्दर आँखें, भौंह एवं कुटिल अलकें हैं। इसका वैसा ही मुखमण्डल, वैसी सुन्दर नासिका, वैसा वंश और वैसा ही इसका अधरोष्ठ भी सुन्दर है। इसे देखनेसे तृप्ति नहीं होती है। रतिके समान ही मनोहर तथा अत्यन्त मग्न चूचुकवाले स्थूल (मांसल) स्तन दो सज्जन पुरुषोंके सदृश परस्पर मिले हैं। इस

९- अन्धकासुरकी विजिगीषा, देवों और असुरोंके वाहनों एवं युद्धका वर्णन

अध्याय ७ ] उर्वशीकी उत्पत्ति-कथा, प्रह्लाद-प्रसंग-नर-नारायणसे संवाद एवं युद्धोपक्रम ३९ तदेव तनु चार्वङ्ग्या वलित्रयविभूषितम्। उदरं राजते श्लक्ष्णं रोमावलिविभूषितम् ॥ ८ सुन्दरीका वैसा ही कृश, त्रिवलीयुक्त, कोमल तथा रोमावलिवाला उदर भी शोभित हो रहा है। उदरपर नीचेसे ऊपरकी ओर स्तनतटतक जाती हुई इसकी रोमराजि रोमावली च जघनाद् यान्ती स्तनतटं त्वियम्। राजते भृङ्गमालेव पुलिनात् कमलाकरम् ॥ ९ सरोवर आदिके तटसे कमलवृन्दकी ओर जाती हुई भ्रमर-मण्डलीके समान सुशोभित हो रही है॥ ६-९॥ जघनं त्वतिविस्तीर्णं भात्यस्या रशनावृतम्। क्षीरोदमथने नद्धं भुजङ्गेनेव मन्दरम् ॥ १० इसका करधनीसे मण्डित स्थूल जघन-प्रदेश क्षीरसागरके मन्थनके समयमें वासुकि नागसे वेष्टित मन्दरपर्वतके समान सुशोभित हो रहा है। कदली- कदलीस्तम्भसदृशैरूर्ध्वमूलैरथोरुभिः । विभाति सा सुचार्वङ्गी पद्मकिञ्जल्कसंनिभा ॥ ११ स्तम्भके समान ऊर्ध्वमूल ऊरुओंवाली कमलके केसरके समान गौरवर्णकी यह सुन्दरी है। इसके दोनों घुटने, गूढ़गुल्फ, रोमरहित सुन्दर जंघा तथा अलक्तकके समान जानुनी गूढगुल्फे च शुभे जङ्घे त्वरोमशे। विभातोऽस्यास्तथा पादावलक्तकसमत्विषौ ॥ १२ कान्तिवाले दोनों पैर अत्यन्त सुशोभित हो रहे हैं। मुने! इस प्रकार उस सुन्दरीके विषयमें सोचते हुए जब यह इति संचिन्तयन् कामस्तामनिन्दितलोचनाम्। कामातुरोऽसौ संजातः किमुतान्यो जनो मुने ॥ १३ कामदेव स्वयमेव कामातुर हो गया तो फिर अन्य पुरुषोंकी तो बात ही क्या थी॥ १०-१३॥ माधवोऽप्युर्वशीं दृष्ट्वा संचिन्तयत नारद। किंस्वित् कामनरेन्द्रस्य राजधानी स्वयं स्थिता ॥ १४ नारदजी! अब वसन्त भी उस उर्वशीको देखकर सोचने लगा कि क्या यह राजा कामकी राजधानी ही स्वयं आयाता शशिनो नूनमियं कान्तिर्निशाक्षये। रविरश्मिप्रतापार्तिभीता शरणमागता ॥ १५ आकर उपस्थित हो गयी है? अथवा रात्रिका अन्त होनेपर सूर्यकी किरणोंके तापके भयसे स्वयं चन्द्रिका ही शरणमें आ गयी है। इस प्रकार सोचते हुए अप्सराओंको रोककर इत्थं संचिन्तयन्नेव अवष्टभ्याप्सरोगणम्। तस्थौ मुनिरिव ध्यानमास्थितः स तु माधवः ॥ १६ वसन्त मुनिके सदृश ध्यानस्थ हो गया। महामुने ! उसके बाद शुभव्रत नारायण मुनिने कामादि सभीको चकित ततः स विस्मितान् सर्वान् कन्दर्पादीन् महामुने। दृष्ट्वा प्रोवाच वचनं स्मितं कृत्वा शुभव्रतः ॥ १७ देखकर हँसते हुए कहा- हे काम, हे अप्सराओ, हे वसन्त ! यह अप्सरा मेरी जाँघसे उत्पन्न हुई है। इसे तुमलोग इयं ममोरुसम्भूता कामाप्सरस माधव। नीयतां सुरलोकाय दीयतां वासवाय च ॥ १८ देवलोकमें ले जाओ और इन्द्रको दे दो। उनके ऐसा कहनेपर वे सभी भयसे काँपते हुए उर्वशीको लेकर स्वर्गमें इत्युक्ताः कम्पमानास्ते जग्मुर्गृह्योर्वशीं दिवम्। सहस्राक्षाय तां प्रादाद् रूपयौवनशालिनीम् ॥ १९ चले गये और उस रूप-यौवनशालिनी अप्सराको इन्द्रको दे दिया। महामुने! उन कामादिने इन्द्रसे उन दोनों धर्मके आचक्षुश्चरितं ताभ्यां धर्मजाभ्यां महामुने। देवराजाय कामाद्यास्ततोऽभूद् विस्मयः परः ॥ २० पुत्रों (नर-नारायण)-के चरित्रको कहा, जिससे इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ। नर और नारायणके इस चरित्रकी एतादृशं हि चरितं ख्यातिमग्र्यां जगाम ह। पातालेषु तथा मर्त्ये दिक्ष्वष्टासु जगाम च ॥ २१ चर्चा आगे सर्वत्र बढ़ती गयी तथा वह पाताल, मर्त्यलोक एवं सभी दिशाओंमें व्याप्त हो गयी ॥ १४-२१॥ एकदा निहते रौद्रे हिरण्यकशिपौ मुने। अभिषिक्तस्तदा राज्ये प्रह्लादो नाम दानवः ॥ २२ मुने! एक बारकी बात है। जब भयंकर हिरण्यकशिपु मारा गया तब प्रह्लाद नामक दानव राजगद्दीपर बैठा।

| ४० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तस्मिन्शासति दैत्येन्द्रे देवब्राह्मणपूजके।<br>मखानि भुवि राजानो यजन्ते विधिवत्तदा॥ २३<br><br>ब्राह्मणाश्च तपो धर्मं तीर्थयात्रांश्च कुर्वते।<br>वैश्याश्च पशुवृत्तिस्थाः शूद्राः शुश्रूषणे रताः॥ २४वह देवता और ब्राह्मणोंका पूजक था। उसके शासनकालमें पृथ्वीपर राजा लोग विधिपूर्वक यज्ञानुष्ठान करते थे। ब्राह्मण लोग तपस्या, धर्म-कार्य और तीर्थयात्रा, वैश्य लोग पशुपालन तथा शूद्र लोग सबकी सेवा प्रेमसे करते थे॥ २२—२४॥
चातुर्वर्ण्यं ततः स्वे स्वे आश्रमे धर्मकर्मणि।<br>आवर्तत ततो देवा वृत्त्या युक्ताभवन् मुने॥ २५<br><br>ततस्तु च्यवनो नाम भार्गवेन्द्रो महातपाः।<br>जगाम नर्मदां स्नातुं तीर्थं च नकुलीश्वरम्॥ २६<br><br>तत्र दृष्ट्वा महादेवं नदीं स्नातुमवातरत्।<br>अवतीर्णं प्रजग्राह नागः केकरलोहितः॥ २७<br><br>गृहीतस्तेन नागेन सस्मार मनसा हरिम्।<br>संस्मृते पुण्डरीकाक्षे निर्विषोऽभून्महोरगः॥ २८मुने! इस प्रकार चारों वर्ण अपने आश्रममें स्थित रहकर धर्म-कार्योंमें लगे रहते थे। इससे देवता भी अपने कर्ममें संलग्न हो गये।* उसी समय ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ भार्गववंशी महातपस्वी च्यवन नामक ऋषि नर्मदाके नकुलीश्वरतीर्थमें स्नान करने गये। वहाँ वे महादेवका दर्शनकर नदीमें स्नान करनेके लिये उतरे। जलमें उतरते ही ऋषिको एक भूरे वर्णके साँपने पकड़ लिया। उस साँपद्वारा पकड़े जानेपर ऋषिने अपने मनमें विष्णुभगवान्‌का स्मरण किया। कमलनयन भगवान् श्रीहरिको स्मरण करनेपर वह महान् सर्प विषहीन हो गया॥ २५—२८॥
नीतस्तेनातिरौद्रेण पन्नगेन रसातलम्।<br>निर्विषश्चापि तत्याज च्यवनं भुजगोत्तमः॥ २९<br><br>संत्यक्तमात्रो नागेन च्यवनो भार्गवोत्तमः।<br>चचार नागकन्याभिः पूज्यमानः समन्ततः॥ ३०<br><br>विचरन् प्रविवेशाथ दानवानां महत् पुरम्।<br>संपूज्यमानो दैत्येन्द्रैः प्रह्लादोऽथ ददर्श तम्॥ ३१<br><br>भृगुपुत्रे महातेजाः पूजां चक्रे यथार्हतः।<br>संपूजितोपविष्टश्च पृष्टश्चागमनं प्रति॥ ३२फिर उस भयंकर विषरहित सर्पने च्यवन मुनिको रसातलमें ले जाकर छोड़ दिया। सर्पने भार्गवश्रेष्ठ च्यवनको मुक्त कर दिया। फिर वे नागकन्याओंसे पूजित होते हुए चारों ओर विचरण करने लगे। वहाँ घूमते हुए वे दानवोंके विशाल नगरमें प्रविष्ट हुए। इसके बाद श्रेष्ठ दैत्योंद्वारा पूजित प्रह्लादने उन्हें देखा। महातेजस्वी प्रह्लादने भृगुपुत्रकी यथायोग्य पूजा की। पूजाके बाद उनके बैठनेपर प्रह्लादने उनसे उनके आगमनका कारण पूछा॥ २९—३२॥
स चोवाच महाराज महातीर्थं महाफलम्।<br>स्नातुमेवागतोऽस्म्यद्य द्रष्टुं च नकुलीश्वरम्॥ ३३<br><br>नद्यामेवावतीर्णोऽस्मि गृहीतश्चाहिना बलात्।<br>समानीतोऽस्मि पाताले दृष्टश्चात्र भवानपि॥ ३४<br><br>एतच्छ्रुत्वा तु वचनं च्यवनस्य दितीश्वरः।<br>प्रोवाच धर्मसंयुक्तं स वाक्यं वाक्यकोविदः॥ ३५उन्होंने कहा—महाराज! आज मैं महाफलदायक महातीर्थमें स्नान एवं नकुलीश्वरका दर्शन करने आया था। वहाँ नदीमें उतरते ही एक नागने मुझे बलात् पकड़ लिया। वही मुझे पातालमें लाया और मैंने यहाँ आपको भी देखा। च्यवनकी इस बातको सुनकर सुन्दर वचन बोलनेवाले दैत्योंके ईश्वर (प्रह्लाद)-ने धर्मसंयुक्त यह वाक्य कहा॥ ३३—३५॥
प्रह्लाद उवाच<br>भगवन् कानि तीर्थानि पृथिव्यां कानि चाम्बरे।<br>रसातले च कानि स्युरेतद् वक्तुं त्वमर्हसि॥ ३६प्रह्लादने पूछा—भगवन्! कृपा करके मुझे बतलाइये कि पृथ्वी, आकाश और पातालमें कौन-कौनसे (महान्) तीर्थ हैं?॥ ३६॥

* देवताओंके धर्मका वर्णन सुकेशी-उपाख्यानमें आगे आया है।

अध्याय ७ ] उर्वशीकी उत्पत्ति-कथा, प्रह्लाद-प्रसंग-नर-नारायणसे संवाद एवं युद्धोपक्रम ४१ च्यवन उवाच (प्रह्लादके वचनको सुनकर) च्यवनजीने कहा - पृथिव्यां नैमिषं तीर्थमन्तरिक्षे च पुष्करम्। महाबाहो ! पृथ्वीमें नैमिषारण्यतीर्थ, अन्तरिक्षमें पुष्कर, चक्रतीर्थं महाबाहो रसातले विदुः ॥ ३७ और पातालमें चक्रतीर्थ प्रसिद्ध हैं ॥ ३७ ॥ पुलस्त्य उवाच पुलस्त्यजीने कहा - महामुने ! भार्गवकी इसी श्रुत्वा तद्भार्गववचो दैत्यराजो महामुने। बातको सुनकर दैत्यराज प्रह्लादने नैमिषतीर्थमें जानेके नैमिषं गन्तुकामस्तु दानवानिदमब्रवीत् ॥ ३८ लिये इच्छा प्रकट की और दानवोंसे यह बात कही ॥ ३८ ॥ प्रह्लाद उवाच प्रह्लाद बोले-उठो, हम सभी नैमिष- उत्तिष्ठध्वं गमिष्यामः स्नातुं तीर्थं हि नैमिषम् । तीर्थमें स्नान करने जायँगे तथा वहाँ पीताम्बरधारी एवं कमलके समान नेत्रोंवाले भगवान् अच्युत (विष्णु)-के द्रक्ष्यामः पुण्डरीकाक्षं पीतवाससमच्युतम् ॥ ३९ दर्शन करेंगे ॥ ३९ ॥ पुलस्त्य उवाच पुलस्त्यजीने कहा - दैत्यराज प्रह्लादके ऐसा कहनेपर इत्युक्ता दानवेन्द्रेण सर्वे ते दैत्यदानवाः। वे सभी दैत्य और दानव रसातलसे बाहर निकले एवं चक्रुरुद्योगमतुलं निर्जग्मुश्च रसातलात् ॥ ४० अतुलनीय उद्योगमें लग गये। उन महाबलवान् ते समभ्येत्य दैतेया दानवाश्च महाबलाः। दितिपुत्रों एवं दानवोंने नैमिषारण्यमें आकर आनन्दपूर्वक स्नान किया। इसके बाद श्रीमान् दैत्यश्रेष्ठ प्रह्लाद मृगया नैमिषारण्यमागत्य स्नानं चक्रुर्मुदान्विताः ॥ ४१ (आखेट या शिकार)-के लिये वनमें घूमने लगे। ततो दितीश्वरः श्रीमान् मृगव्यां स चचार ह। वहाँ घूमते हुए उन्होंने पवित्र एवं निर्मल जलवाली सरस्वती नदीको देखा। वहीं समीप ही बाणोंसे चरन् सरस्वतीं पुण्यां ददर्श विमलोदकाम् ॥ ४२ खचाखच बिंधे बड़ी-बड़ी शाखाओंवाले एक शाल तस्यादूरे महाशाखं शालवृक्षं शरैश्चितम् । वृक्षको देखा। वे सभी बाण एक-दूसरेके मुखसे लगे ददर्श बाणानपरान् मुखे लग्नान् परस्परम् ॥ ४३ हुए थे ॥ ४०-४३ ॥ ततस्तानद्भुताकारान् बाणान् नागोपवीतकान् । तब उन अद्भुत आकारवाले नागोपवीत (साँपोंसे दृष्ट्वाऽतुलं तदा चक्रे क्रोधं दैत्येश्वरः किल ॥ ४४ लिपटे) बाणोंको देखकर दैत्येश्वरको बड़ा क्रोध हुआ। स ददर्श ततो दूरात्कृष्णाजिनधरौ मुनी। फिर उन्होंने दूरसे ही काले मृगचर्मको धारण किये हुए बड़ी-बड़ी जटाओंवाले तथा तपस्यामें लगे दो मुनियोंको समुन्नतजटाभारौ तपस्यासक्तमानसौ ॥ ४५ देखा। उन दोनोंके बगलमें सुलक्षण शार्ङ्ग और आजगव तयोश्च पार्श्वयोर्दिव्ये धनुषी लक्षणान्विते । नामक दो दिव्य धनुष एवं दो अक्षय तथा बड़े-बड़े शार्ङ्गमाजगवं चैव अक्षय्यौ च महेषुधी ॥ ४६ तरकस वर्तमान थे। उन दोनोंको इस प्रकार देखकर तौ दृष्ट्वाऽमन्यत तदा दाम्भिकाविति दानवः। दानवराज प्रह्लादने उन्हें दम्भसे युक्त समझा। फिर ततः प्रोवाच वचनं तावुभौ पुरुषोत्तमौ ॥ ४७ उन्होंने उन दोनों श्रेष्ठ पुरुषोंसे कहा - ॥ ४४-४७ ॥ किं भवद्भ्यां समारब्धं दम्भं धर्मविनाशनम् । आप दोनों यह धर्मविनाशक दम्भपूर्ण कार्य क्यों क्व तपः क्व जटाभारः क्व चेमौ प्रवरायुधौ ॥ ४८ कर रहे हैं ? कहाँ तो आपकी यह तपस्या और जटाभार, कहाँ ये दोनों श्रेष्ठ अस्त्र ? इसपर नरने उनसे कहा - अथोवाच नरो दैत्यं का ते चिन्ता दितीश्वर । दैत्येश्वर ! तुम उसकी चिन्ता क्यों कर रहे हो ? सामर्थ्य सामर्थ्ये सति यः कुर्यात् तत्संपद्येत तस्य हि ॥ ४९ रहनेपर कोई भी व्यक्ति जो कर्म करता है, उसे वही

४२श्रीवामनपुराण[ अध्याय ७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अथोवाच दितीशस्तौ का शक्तिर्युवयोरिह।<br>मयि तिष्ठति दैत्येन्द्रे धर्मसेतुप्रवर्तके॥ ५०<br><br>नरस्तं प्रत्युवाचाथ आवाभ्यां शक्तिरूर्जिता।<br>न कश्चिच्छक्नुयाद् योद्धुं नरनारायणौ युधि॥ ५१शोभा देता है। तब दितीश्वर प्रह्लादने उन दोनोंसे कहा—धर्मसेतुके स्थापित करनेवाले मुझ दैत्येन्द्रके रहते यहाँ आपलोग (सामर्थ्य-बलसे) क्या कर सकते हैं? इसपर नरने उन्हें उत्तर दिया—हमने पर्याप्त शक्ति प्राप्त कर ली है। हम नर और नारायण—दोनोंसे कोई भी युद्ध नहीं कर सकता॥ ४८–५१॥
दैत्येश्वरस्ततः क्रुद्धः प्रतिज्ञामारुरोह च।<br>यथा कथंचिज्जेष्यामि नरनारायणौ रणे॥ ५२<br><br>इत्येवमुक्त्वा वचनं महात्मा<br>दितीश्वरः स्थाप्य बलं वनान्ते।<br>वितत्य चापं गुणमाविकृष्य<br>तलध्वनिं घोरतरं चकार॥ ५३<br><br>ततो नरस्त्वाजगवं हि चाप-<br>मानम्य बाणान् सुबहूञ्शिताग्रान्।<br>मुमोच तानप्रतिमैः पृषत्कै-<br>श्छिच्छेद दैत्यस्तपनीयपुङ्खैः॥ ५४<br><br>छिन्नान् समीक्ष्याथ नरः पृषत्कान्<br>दैत्येश्वरेणाप्रतिमेन संख्ये।<br>क्रुद्धः समानम्य महाधनुस्ततो<br>मुमोच चान्यान् विविधान् पृषत्कान्॥ ५५इसपर दैत्येश्वरने क्रुद्ध होकर प्रतिज्ञा कर दी कि मैं युद्धमें जिस किसी भी प्रकार आप नर और नारायण दोनोंको जीतूँगा। ऐसी प्रतिज्ञाकर दैत्येश्वर प्रह्लादने वनकी सीमापर अपनी सेना खड़ी कर दी और धनुषको फैलाकर उसपर डोरी चढ़ायी तथा घोरतर करतलध्वनि की—ताल ठोंकी। इसपर नरने भी आजगव धनुषको चढ़ाकर बहुत-से तेज बाण छोड़े। परंतु प्रह्लादने अनेक स्वर्ण-पुंखवाले अप्रतिम बाणोंसे उन बाणोंको काट डाला। फिर नरने युद्धमें अप्रतिम दैत्येश्वरके द्वारा बाणोंको नष्ट हुआ देख क्रुद्ध होकर अपने महान् धनुषको चढ़ाकर पुनः अन्य अनेक तीक्ष्ण बाण छोड़े॥ ५२–५५॥
एकं नरो द्वौ दितिजेश्वरश्च<br>त्रीन् धर्मसूनुश्चतुरो दितीशः।<br>नरस्तु बाणान् प्रमुमोच पञ्च<br>षड् दैत्यनाथो निशितान् पृषत्कान्॥ ५६<br><br>सप्तर्षिमुख्यो द्विचतुश्च दैत्यो<br>नरस्तु षट् त्रीणि च दैत्यमुख्ये।<br>षट्त्रीणि चैकं च दितीश्वरेण<br>मुक्तानि बाणानि नराय विप्र॥ ५७<br><br>एकं च षट् पञ्च नरेण मुक्ता-<br>स्त्वष्टौ शराः सप्त च दानवेन।<br>षट् सप्त चाष्टौ नव षण्नरेण<br>द्विसप्ततिं दैत्यपतिः ससर्ज॥ ५८<br><br>शतं नरस्त्रीणि शतानि दैत्यः<br>षड् धर्मपुत्रो दश दैत्यराजः।<br>ततोऽप्यसंख्येयतरान् हि बाणान्<br>मुमोचतुस्तौ सुभृशं हि कोपात्॥ ५९नरके एक बाण छोड़नेपर प्रह्लादने दो बाण छोड़े; नरके तीन बाण छोड़नेपर प्रह्लादने चार बाण छोड़े। इसके बाद पुनः नरने पाँच बाण और फिर दैत्यश्रेष्ठ प्रह्लादने छः तेज बाण छोड़े। विप्र! नरके सात बाण छोड़नेपर दैत्यने आठ बाण छोड़े। नरके नव बाण छोड़नेपर प्रह्लादने उनपर दस बाण छोड़े। नरके बारह बाण छोड़नेपर दानवने पंद्रह बाण छोड़े। नरके छत्तीस बाण छोड़नेपर दैत्यपतिने बहत्तर बाण चलाये। नरके सौ बाणोंपर दैत्यने तीन सौ बाण चलाये। धर्मपुत्रके छः सौ बाणोंपर दैत्यराजने एक हजार बाण छोड़े। फिर तो उन दोनोंने अत्यन्त क्रोधसे (एक-दूसरेपर) असंख्य बाण छोड़े॥ ५६–५९॥
ततो नरो बाणगणैरसंख्यै-<br>र्वास्तरद्भूमिमथो दिशः खम्।<br>स चापि दैत्यप्रवरः पृषत्कै-<br>श्छिच्छेद वेगात् तपनीयपुङ्खैः॥ ६०उसके बाद नरने असंख्य बाणोंसे पृथ्वी, आकाश और दिशाओंको ढक दिया। फिर दैत्यप्रवर प्रह्लादने स्वर्णपुंखवाले बाणोंको बड़े वेगसे छोड़कर उनके

१०- अन्धकके साथ देवताओंका युद्ध और अन्धककी विजय

अध्याय ८ ]प्रह्लाद और नारायणका तुमुल युद्ध, भक्तिसे विजय४३

| ततः पतत्त्रिभिर्वीरौ सुभृशं नरदानवौ।<br>युद्धे वरास्त्रैर्युध्येतां घोररूपैः परस्परम्॥ ६१<br>ततस्तु दैत्येन वरास्त्रपाणिना<br>चापे नियुक्तं तु पितामहास्त्रम्।<br>माहेश्वरास्त्रं पुरुषोत्तमेन<br>समं समाहत्य निपेततुस्तौ॥ ६२<br>ब्रह्मास्त्रे तु प्रशमिते प्रह्रादः क्रोधमूर्च्छितः।<br>गदां प्रगृह्य तरसा प्रचस्कन्द रथोत्तमात्॥ ६३<br>गदापाणिं समायान्तं दैत्यं नारायणस्तदा।<br>दृष्ट्वाऽथ पृष्ठतश्चक्रे नरं योद्धुमनाः स्वयम्॥ ६४<br>ततो दितीशः सगदः समाद्रवत्<br>सशार्ङ्गपाणिं तपसां निधानम्।<br>ख्यातं पुराणर्षिमुदारविक्रमं<br>नारायणं नारद लोकपालम्॥ ६५ | बाणोंको काट दिया। तब नर और दानव दोनों वीर बाणों तथा भयंकर श्रेष्ठ अस्त्रोंसे परस्पर युद्ध करने लगे। इसके बाद दैत्यने हाथमें ब्रह्मास्त्र लेकर उस धनुषपर नियोजित कर चला दिया एवं उन पुरुषोत्तमने भी माहेश्वरास्त्रका प्रयोग कर दिया। वे दोनों अस्त्र परस्पर एक-दूसरेसे टक्कर खाकर गिर गये। ब्रह्मास्त्रके व्यर्थ होनेपर क्रोधसे मूर्च्छित हुए प्रह्लाद वेगसे गदा लेकर उत्तम रथसे कूद पड़े॥ ६०—६३॥<br>ऋषि नारायणने उस समय दैत्यको हाथमें गदा लिये अपनी ओर आते देखकर स्वयं युद्ध करनेकी इच्छासे नरको पीछे हटा दिया। नारदजी! तब प्रह्लादजी गदा लेकर तपोनिधान, शार्ङ्गधनुषको धारण करनेवाले, प्रसिद्ध पुरातन ऋषि, महापराक्रमशाली, लोकपति नारायणकी ओर दौड़ पड़े॥ ६४-६५॥ |

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सातवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ७॥


आठवाँ अध्याय

प्रह्लाद और नारायणका तुमुल युद्ध, भक्तिसे विजय

पुलस्त्य उवाचपुलस्त्यजी बोले— प्रह्लादने जब हाथमें शार्ङ्गधनुष
शार्ङ्गपाणिनमायान्तं दृष्ट्वाऽग्रे दानवेश्वरः।<br>परिभ्राम्य गदां वेगान्मूर्ध्नि साध्यमताडयत्॥ १<br>ताडितस्याथ गदया धर्मपुत्रस्य नारद।<br>नेत्राभ्यामपतद् वारि वह्निवर्सनिभं भुवि॥ २<br>मूर्ध्नि नारायणस्यापि सा गदा दानवार्पिता।<br>जगाम शतधा ब्रह्मञ्शैलशृङ्गे यथाऽशनिः॥ ३<br>ततो निवृत्य दैत्येन्द्रः समास्थाय रथं द्रुतम्।<br>आदाय कार्मुकं वीरस्तूणाद् बाणं समाददे॥ ४<br>आनम्य चापं वेगेन गार्द्धपत्राञ्शिलीमुखान्।<br>मुमोच साध्याय तदा क्रोधान्धकारिताननः॥ ५<br><br>तानापतत एवाशु बाणांश्चन्द्रार्द्धसन्निभान्।<br>चिच्छेद बाणैरपरैर्निर्बिभेद च दानवम्॥ ६लिये भगवान् नारायणको सामनेसे आते देखा तो अपनी गदा घुमाकर वेगसे उनके सिरपर प्रहार कर दिया। नारदजी! गदासे प्रताडित होनेपर नारायणके नेत्रोंसे आगके स्फुलिंगके समान आँसू पृथ्वीपर गिरने लगे। ब्रह्मन्! पर्वतकी चोटीपर गिरकर जैसे वज्र टूट जाता है, उसी प्रकार दानवद्वारा नारायणके सिरपर चलायी गयी वह गदा भी सैकड़ों टुकड़े हो गयी। उसके बाद शीघ्रतापूर्वक लौटकर वीर दैत्येन्द्रने रथपर आरूढ हो धनुष लेकर अपनी तरकससे बाण निकाल लिया॥ १—४॥<br>फिर क्रोधान्ध प्रह्लादने शीघ्रतासे धनुषको चढ़ाकर गृध्रके पंखवाले अनेक बाणोंको नारायणकी ओर चलाया। नारायणने भी बड़ी शीघ्रतासे अपनी ओर आ रहे उन अर्धचन्द्र-तुल्य बाणोंको अपने बाणोंसे काट डाला और कुछ दूसरे बाणोंसे प्रह्लादको विद्ध कर दिया।
४४श्रीवामनपुराण[ अध्याय ८
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततो नारायणं दैत्यो दैत्यं नारायणः शरैः।<br>आविध्येतां तदाऽन्योन्यं मर्मभिद्भिरजिह्मगैः॥ ७<br><br>ततोऽम्बरे संनिपातो देवानांमभवन्मुने।<br>दिदृक्षूणां तदा युद्धं लघु चित्रं च सुष्ठु च॥ ८तब दैत्यने नारायणको और नारायणने दैत्यको—एक-दूसरेको—मर्मभेदी एवं सीधे चलनेवाले बाणोंसे वेध दिया। मुने! उस समय शीघ्रतापूर्वक हो रहे इस कौशलयुक्त विचित्र एवं सुन्दर युद्धको देखनेकी इच्छावाले देवताओंका समूह आकाशमें एकत्र हो गया॥ ५-८॥
ततः सुराणां दुन्दुभ्यस्त्ववाद्यन्त महास्वनाः।<br>पुष्पवर्षमनौपम्यं मुमुचुः साध्यदैत्ययोः॥ ९<br><br>ततः पश्यत्सु देवेषु गगनस्थेषु तावुभौ।<br>अयुध्येतां महेष्वासौ प्रेक्षकप्रीतिवर्द्धनम्॥ १०<br><br>बबन्धतुस्तदाकाशं तावुभौ शरवृष्टिभिः।<br>दिशश्च विदिशश्चैव छादयेतां शरोत्करैः॥ ११<br><br>ततो नारायणश्चापं समाकृष्य महामुने।<br>बिभेद मार्गणैस्तीक्ष्णैः प्रह्लादं सर्वमर्मसु॥ १२<br><br>तथा दैत्येश्वरः क्रुद्धश्चापमानम्य वेगवान्।<br>बिभेद हृदये बाह्वोर्वदने च नरोत्तमम्॥ १३उसके बाद बड़े जोरसे बजनेवाले नगाड़ोंको बजाकर देवताओंने भगवान् नारायणके और दैत्यके ऊपर अनुपमरूपमें पुष्पोंकी वर्षा की। फिर उन दोनों धनुर्धारियोंने आकाशमें स्थित देवताओंके सामने दर्शकोंको आनन्द देनेवाला (दिलचस्प) अनूठा युद्ध किया। उस समय उन दोनोंने बाणोंकी वृष्टिसे आकाशको मानो बाँध दिया और बाणवृष्टिसे दिशाओं एवं विदिशाओंको ढक दिया। महामुनि नारदजी! तब नारायणने धनुषको खींचकर तेज बाणोंसे प्रह्लादके सभी मर्मस्थलोंमें प्रहार किया और फुर्तीवाले दैत्येश्वरने क्रोधपूर्वक धनुषको चढ़ाकर नरोत्तमके हृदय, दोनों भुजाओं और मुँहको भी (बाणोंसे) बेध दिया॥ ९-१३॥
ततोऽस्यतो दैत्यपतेः कार्मुकं मुष्टिबन्धनात्।<br>चिच्छेदैकेन बाणेन चन्द्रार्धाकारवर्चसा॥ १४<br><br>अपास्यत धनुश्छिन्नं चापमादाय चापरम्।<br>अधिज्यं लाघवात् कृत्वा ववर्ष निशिताञ्शरान्॥ १५<br><br>तानप्यस्य शरान् साध्यश्छित्त्वा बाणैरवारयत्।<br>कार्मुकं च क्षुरप्रेण चिच्छेद पुरुषोत्तमः॥ १६<br><br>छिन्नं छिन्नं धनुर्दैत्यस्त्वन्यदन्यत्समाददे।<br>समादत्ते तदा साध्यो मुने चिच्छेद लाघवात्॥ १७उसके बाद नारायणने बाण चला रहे प्रह्लादके धनुषके मुष्टिबन्धको अर्धचन्द्रके आकारवाले एक तेजस्वी बाणसे काट दिया। प्रह्लादने भी कटे धनुषको झट फेंककर दूसरा धनुष हाथमें ले लिया और शीघ्र ही उसकी प्रत्यञ्चा (डोरी) चढ़ाकर तेज बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी। पर उसके उन शरोंको भी नारायणने बाणोंसे काटकर निवारित कर दिया और उन पुरुषोत्तमने तीक्ष्ण बाणसे उसके धनुषको भी काट डाला। नारदजी! एक धनुषके छिन्न होनेपर दैत्यराजने बारम्बार दूसरा धनुष ग्रहण किया, किंतु नारायणने लिये हुए उन-उन धनुषोंको भी तुरंत काटकर गिरा दिया॥ १४-१७॥
संछिन्नेष्वथ चापेषु जग्राह दितिजेश्वरः।<br>परिघं दारुणं दीर्घं सर्वलोहमयं दृढम्॥ १८<br><br>परिगृह्याथ परिघं भ्रामयामास दानवः।<br>भ्राम्यमाणं स चिच्छेद नाराचेन महामुनिः॥ १९<br><br>छिन्ने तु परिघे श्रीमान् प्रह्लादो दानवेश्वरः।<br>मुद्गरं भ्राम्य वेगेन प्रचिक्षेप नराग्रजे॥ २०<br><br>तमापतन्तं बलवान् मार्गणैर्दशभिर्मुने।<br>चिच्छेद दशधा साध्यः स छिन्नो न्यपतद् भुवि॥ २१फिर धनुषोंके कट जानेपर दैत्यपति प्रह्लादने एक भयंकर, मजबूत और लौह (फौलाद)-से बने 'परिघ' नामक अस्त्रको उठा लिया। उसे लेकर वे दानव (प्रह्लाद) चारों ओर घुमाने लगे। उस घुमाये जाते हुए परिघको भी महामुनि नारायणने बाणसे काट दिया। उसके कट जानेपर श्रीमान् दनुजेश्वर प्रह्लादने पुनः एक मुद्गरको वेगसे घुमाकर उसे नारायणके ऊपर फेंका। नारदजी! उस आते हुए मुद्गरको भी बलवान् नारायणने दस बाणोंसे दस भागोंमें काट दिया; वह नष्ट होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ १८-२१॥

अध्याय ८] प्रह्लाद और नारायणका तुमुल युद्ध, भक्तिसे विजय ४५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मुद्गरे वितथे जाते प्रासमाविध्य वेगवान्।<br>प्रचिक्षेप नराग्र्याय तं च चिच्छेद धर्मजः॥ २२<br>प्रासे छिन्ने ततो दैत्यः शक्तिमादाय चिक्षिपे।<br>तां च चिच्छेद बलवान् क्षुरप्रेण महातपाः॥ २३<br>छिन्नेषु तेषु शस्त्रेषु दानवोऽन्यन्महद्धनुः।<br>समादाय ततो बाणैरवतस्तार नारद॥ २४<br>ततो नारायणो देवो दैत्यनाथं जगद्गुरुः।<br>नाराचेन जघानाथ हृदये सुरतापसः॥ २५प्रह्लादने मुद्गरके विफल हो जानेपर 'प्राश' नामक अस्त्र लेकर बड़े जोरसे नरके बड़े भाई नारायणके ऊपर चला दिया; पर उन्होंने उसे भी काट डाला। प्राशके नष्ट हो जानेपर दैत्यने तेज 'शक्ति' फेंकी, पर बलवान् महातपा नारायणने उसे भी अपने क्षुरप्रके द्वारा काट डाला। नारदजी! उन सभी अस्त्रोंके नष्ट हो जानेपर प्रह्लाद दूसरे विशाल धनुषको लेकर बाणोंकी वर्षा करने लगे। तब परम तपस्वी जगद्गुरु नारायणदेवने प्रह्लादके हृदयमें नाराचसे प्रहार किया॥ २२—२५॥
संभिन्नहृदयो ब्रह्मन् देवेनाद्भुतकर्मणा।<br>निपपात रथोपस्थे तमपोवाह सारथिः॥ २६<br><br>स संज्ञां सुचिरेणैव प्रतिलभ्य दितीश्वरः।<br>सुदृढं चापमादाय भूयो योद्धुमुपागतः॥ २७<br><br>तमागतं संनिरीक्ष्य प्रत्युवाच नराग्रजः।<br>गच्छ दैत्येन्द्र योत्स्यामः प्रातस्त्वाहिकमाचर॥ २८<br><br>एवमुक्तो दितीशस्तु साध्येनाद्भुतकर्मणा।<br>जगाम नैमिषारण्यं क्रियां चक्रे तदाह्निकम्॥ २९नारदजी! अद्भुत पराक्रमी नारायणके प्रहारसे प्रह्लादका हृदय बिंध गया, फलतः वे बेहोश होकर रथके पिछले भागमें गिर पड़े। यह देखकर सारथी उन्हें वहाँसे हटाकर दूर ले गया। बहुत देरके बाद जब उन्हें चेतना प्राप्त हुई—होश आया, तब वे पुनः सुदृढ़ धनुष लेकर नर-नारायणसे युद्ध करनेके लिये संग्रामभूमिमें आ गये। उन्हें आया देख नारायणने कहा—दैत्येन्द्र! अब हम कल प्रातः युद्ध करेंगे; तुम भी जाओ, इस समय अपना नित्य कर्म करो। अद्भुत पराक्रमी श्रीमन्नारायणके ऐसा कहनेपर प्रह्लाद नैमिषारण्य चले गये और वहाँ अपने नित्य कर्म सम्पन्न किये॥ २६—२९॥
एवं युध्यति देवे च प्रह्लादो ह्यसुरो मुने।<br>रात्रौ चिन्तयते युद्धे कथं जेष्यामि दाम्भिकम्॥ ३०<br><br>एवं नारायणेनाऽसौ सहायुध्यत नारद।<br>दिव्यं वर्षसहस्रं तु दैत्यो देवं न चायजत्॥ ३१<br><br>ततो वर्षसहस्रान्ते ह्यजिते पुरुषोत्तमे।<br>पीतवाससमभ्येत्य दानवो वाक्यमब्रवीत्॥ ३२<br><br>किमर्थं देवदेवेश साध्यं नारायणं हरिम्।<br>विजेतुं नाद्य शक्नोमि एतन्मे कारणं वद॥ ३३नारदजी! इस प्रकार भगवान् नारायण एवं दानवेन्द्र प्रह्लाद—दोनोंमें युद्ध चलता रहा। रात्रिमें प्रह्लाद यह विचार किया करते थे कि मैं युद्धमें इन दम्भ करनेवाले ऋषिको कैसे जीतूँगा? नारदजी! इस प्रकार प्रह्लादने भगवान् नारायणके साथ एक हजार दिव्य वर्षोंतक युद्ध किया, परंतु वे उन्हें (नारायणको) जीत न पाये। फिर हजार दिव्य वर्षोंके बीत जानेपर भी पुरुषोत्तम नारायणको न जीत सकनेपर प्रह्लादने वैकुण्ठमें जाकर पीतवस्त्रधारी भगवान् विष्णुसे कहा—देवेश! मैं (सरलतासे) साध्य नारायणको आजतक क्यों न जीत पाया, आप मुझे इसका कारण बतलायें॥ ३०—३३॥
पीतवासा उवाच<br><br>दुर्जयोऽसौ महाबाहुस्त्वया प्रह्लाद धर्मजः।<br>साध्यो विप्रवरो धीमान् मृधे देवासुरैरपि॥ ३४इसपर पीतवस्त्रधारी भगवान् विष्णु बोले—<br><br>प्रह्लाद! महाबाहु धर्मपुत्र नारायण तुम्हारे द्वारा दुर्जेय हैं। वे ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ ऋषि परम ज्ञानी हैं। वे सभी देवताओं एवं असुरोंसे भी युद्धमें नहीं जीते जा सकते॥ ३४॥

४६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ८ प्रह्लाद उवाच यद्यसौ दुर्जयो देव मया साध्यो रणाजिरे। तत्कथं यत्प्रतिज्ञातं तदसत्यं भविष्यति ॥ ३५ हीनप्रतिज्ञो देवेश कथं जीवेत मादृशः । तस्मात्तवाग्रतो विष्णो करिष्ये कायशोधनम् ॥ ३६ पुलस्त्य उवाच इत्येवमुक्त्वा वचनं देवाग्रे दानवेश्वरः । शिरःस्नातस्तदा तस्थौ गृणन् ब्रह्म सनातनम् ॥ ३७ ततो दैत्यपतिं विष्णुः पीतवासाऽब्रवीद्वचः। गच्छ जेष्यसि भक्त्या तं न युद्धेन कथंचन ॥ ३८ प्रह्लाद उवाच मया जितं देवदेव त्रैलोक्यमपि सुव्रत । जितोऽयं त्वत्प्रसादेन शक्रः किमुत धर्मजः ॥ ३९ असौ यद्यजयो देव त्रैलोक्येनापि सुव्रतः । न स्थातुं त्वत्प्रसादेन शक्यं किमु करोम्यज ॥ ४० पीतवासा उवाच सोऽहं दानवशार्दूल लोकानां हितकाम्यया । धर्मं प्रवर्त्तयितुं तपश्चर्यां समास्थितः ॥ ४१ तस्माद्यदिच्छसि जयं तमाराधय दानव । तं पराजेष्यसे भक्त्या तस्माच्छुश्रूष धर्मजम् ॥ ४२ पुलस्त्य उवाच इत्युक्तः पीतवासेन दानवेन्द्रो महात्मना । अब्रवीद्वचनं हृष्टः समाहूयाऽन्धकं मुने ॥ ४३ प्रह्लाद उवाच दैत्याश्च दानवाश्चैव परिपाल्यास्त्वयान्धक । मयोत्सृष्टमिदं राज्यं प्रतीच्छस्व महाभुज ॥ ४४ इत्येवमुक्तो जग्राह राज्यं हैरण्यलोचनिः । प्रह्लादोऽपि तदाऽगच्छत् पुण्यं बदरिकाश्रमम् ॥ ४५ दृष्ट्वा नारायणं देवं नरं च दितिजेश्वरः । कृताञ्जलिपुटो भूत्वा ववन्दे चरणौ तयोः ॥ ४६ तमुवाच महातेजा वाक्यं नारायणोऽव्ययः । किमर्थं प्रणतोऽसीह मामजित्वा महासुर ॥ ४७ प्रह्लादने कहा - देव ! यदि वे साध्यदेव (नारायण) युद्धभूमिमें मुझसे जीते नहीं जा सकते हैं तो मैंने जो प्रतिज्ञा की है, उसका क्या होगा ? वह तो मिथ्या हो जायगी। देवेश ! मुझ-जैसा व्यक्ति हीनप्रतिज्ञ होकर कैसे जीवित रह सकेगा? इसलिये हे विष्णु ! अब मैं आपके सामने अपने शरीरकी शुद्धि करूँगा ॥ ३५-३६ ॥ पुलस्त्यजी बोले - भगवान्‌से ऐसा कहकर दानवेश्वर प्रह्लाद सिरसे पैरतक स्नानकर वहाँ बैठ गये और 'ब्रह्मगायत्री' का जप करने लगे। उसके बाद पीताम्बरधारी विष्णुने प्रह्लादसे कहा - हाँ, तुम जाओ, तुम उन्हें भक्तिसे जीत सकोगे, युद्धसे कथमपि नहीं ॥ ३७-३८ ॥ प्रह्लादजी बोले- देवाधिदेव ! सुव्रत ! आपकी कृपासे मैंने तीनों लोकों तथा इन्द्रको भी जीत लिया है; इन धर्मपुत्रकी बात ही क्या है? हे अज ! यदि ये सद्व्रती त्रिलोकीसे भी अजेय हैं तथा आपके प्रसादसे भी मैं उनके सामने नहीं ठहर सकता तो फिर मैं क्या करूँ ? ॥ ३९-४० ॥ (इसपर) भगवान् विष्णु बोले - दानवश्रेष्ठ ! वस्तुतः नारायणरूपमें वहाँ मैं ही हूँ। मैं ही जगत्‌की भलाईकी इच्छासे धर्मप्रवर्तनके लिये उस रूपमें तप कर रहा हूँ। इसलिये प्रह्लाद ! यदि तुम विजय चाहते हो तो मेरे उस रूपकी आराधना करो। तुम नारायणको भक्तिद्वारा ही पराजित कर सकोगे। इसलिये धर्मपुत्र नारायणकी आराधना करो-इसी अर्थमें वे सुसाध्य हैं ॥ ४१-४२ ॥ पुलस्त्यजी बोले - मुने ! भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर प्रह्लाद प्रसन्न हो गये। उन्होंने फिर अन्धकको बुलाकर इस प्रकार कहा ॥ ४३ ॥ प्रह्लादजी बोले - अन्धक ! तुम दैत्यों और दानवोंका प्रतिपालन करो। महाबाहो ! मैं यह राज्य छोड़ रहा हूँ। इसे तुम ग्रहण करो। इस प्रकार कहनेपर जब हिरण्याक्षके पुत्रने राज्यको स्वीकार कर लिया, तब प्रह्लाद पवित्र बदरिकाश्रम चले गये। वहाँ उन्होंने भगवान् नारायण तथा नरको देखकर हाथ जोड़कर उनके चरणोंमें प्रणाम किया। महातेजस्वी भगवान् नारायणने उनसे कहा - महासुर ! मुझे बिना जीते ही अब तुम क्यों प्रणाम कर रहे हो ? ॥ ४४-४७ ॥

अध्याय ८ ] प्रह्लाद और नारायणका तुमुल युद्ध, भक्तिसे विजय ४७ प्रह्लाद उवाच कस्त्वां जेतुं प्रभो शक्तः कस्वतः पुरुषोऽधिकः । त्वं हि नारायणोऽनन्तः पीतवासा जनार्दनः ॥ ४८ त्वं देवः पुण्डरीकाक्षस्त्वं विष्णुः शार्ङ्गचापधृक् । त्वमव्ययो महेशानः शाश्वतः पुरुषोत्तमः ॥ ४९ त्वां योगिनश्चिन्तयन्ति चार्चयन्ति मनीषिणः । जपन्ति स्नातकास्त्वां च यजन्ति त्वां च याज्ञिकाः ॥ ५० त्वमच्युतो हृषीकेशश्चक्रपाणिर्धराधरः । महामीनो हयशिरास्त्वमेव वरकच्छपः ॥ ५१ हिरण्याक्षरिपुः श्रीमान् भगवनान्थ सूकरः । मत्पितुर्नाशनकरो भवानपि नृकेसरी ॥ ५२ ब्रह्मा त्रिनेत्रोऽमरराड् हुताशः प्रेताधिपो नीरपतिः समीरः । सूर्यो मृगाङ्कोऽचलजङ्गमाद्यो भगवान् विभो नाथ खगेन्द्रकेतो ॥ ५३ त्वं पृथ्वी ज्योतिराकाशं जलं भूत्वा सहस्रशः । त्वया व्याप्तं जगत्सर्वं कस्त्वां जेष्यति माधव ॥ ५४ भक्त्या यदि हृषीकेश तोषमेषि जगद्गुरो । नान्यथा त्वं प्रशक्योऽसि जेतुं सर्वगताव्यय ॥ ५५ भगवानुवाच परितुष्टोऽस्मि ते दैत्य स्तवेनानेन सुव्रत । भक्त्या त्वनन्यया चाहं त्वया दैत्य पराजितः ॥ ५६ पराजितश्च पुरुषो दैत्य दण्डं प्रयच्छति । दण्डार्थं ते प्रदास्यामि वरं वृणु यमिच्छसि ॥ ५७ प्रह्लाद उवाच नारायणं वरं याचे यं त्वं मे दातुमर्हसि । तन्मे पापं लयं यातु शारीरं मानसं तथा ॥ ५८ वाचिकं च जगन्नाथ यत्त्वया सह युध्यतः । नरेण यद्यप्यभवद् वरमेतत्प्रयच्छ मे ॥ ५९ नारायण उवाच एवं भवतु दैत्येन्द्र पापं ते यातु संक्षयम् । द्वितीयं प्रार्थय वरं तं ददामि तवासुर ॥ ६० प्रह्लाद उवाच या या जायेत मे बुद्धिः सा सा विष्णो त्वदाश्रिता । देवार्चने च निरता त्वच्चित्ता त्वत्परायणा ॥ ६१ प्रह्लाद बोले- प्रभो ! आपको भला कौन जीत सकता है ? आपसे बढ़कर कौन हो सकता है ? आप ही अनन्त नारायण पीताम्बरधारी जनार्दन हैं। आप ही कमलनयन शार्ङ्गधनुषधारी विष्णु हैं। आप अव्यय, महेश्वर तथा शाश्वत परम पुरुषोत्तम हैं। योगिजन आपका ही ध्यान करते हैं। विद्वान् पुरुष आपकी ही पूजा करते हैं। वेदज्ञ आपके नामका जप करते हैं तथा याज्ञिकजन आपका यजन करते हैं। आप ही अच्युत, हृषीकेश, चक्रपाणि, धराधर, महामत्स्य, हयग्रीव तथा श्रेष्ठ कच्छप (कूर्म) अवतारी हैं ॥ ४८-५१ ॥ आप हिरण्याक्ष दैत्यका वध करनेवाले ऐश्वर्य- युक्त और भगवान् आदि वाराह हैं। आप ही मेरे पिताको मारनेवाले भगवान् नृसिंह हैं। आप ब्रह्मा, शिव, इन्द्र, अग्नि, यम, वरुण और वायु हैं। हे स्वामिन् ! हे खगेन्द्रकेतु (गरुड़ध्वज) ! आप सूर्य, चन्द्र तथा स्थावर और जंगमके आदि हैं। पृथ्वी, अग्नि, आकाश और जल आप ही हैं। सहस्रों रूपोंसे आपने समस्त जगत्को व्याप्त किया है। माधव ! आपको कौन जीत सकेगा ? जगद्गुरो ! हृषीकेश ! आप भक्तिसे ही संतुष्ट हो सकते हैं। हे सर्वगत ! हे अविनाशिन् ! आप दूसरे किसी भी अन्य प्रकारसे नहीं जीते जा सकते ॥ ५२-५५ ॥ श्रीभगवान् बोले- सुव्रत ! दैत्य ! तुम्हारी इस स्तुतिसे मैं अत्यन्त संतुष्ट हूँ। दैत्य ! अनन्य भक्तिसे तुमने मुझे जीत लिया है। प्रह्लाद ! पराजित पुरुष विजेताको दण्ड (-के रूपमें कुछ) देता है। परंतु मैं तुम्हारे दण्डके बदले तुम्हें वर दूँगा; तुम इच्छित वर माँगो ॥ ५६-५७ ॥ प्रह्लादजी बोले- हे नारायण ! मैं आपसे वर माँग रहा हूँ; आप उसे देनेकी कृपा करें। हे जगन्नाथ ! आपके तथा नरके साथ युद्ध करनेमें मेरे शरीर, मन और वाणीसे जो भी पाप (अपकर्म) हुआ हो वह सब नष्ट हो जाय। आप मुझे यही वर दें ॥ ५८-५९ ॥ नारायणने कहा- दैत्येन्द्र ! ऐसा ही होगा। तुम्हारा पाप नष्ट हो जाय। अब प्रह्लाद ! तुम दूसरा एक वर और माँग लो, मैं उसे भी तुम्हें दूँगा ॥ ६० ॥ प्रह्लादजी बोले- हे भगवन् ! मेरी जो भी बुद्धि हो, वह आपसे ही सम्बद्ध हो, वह देवपूजामें लगी रहे। मेरी बुद्धि, आपका ही ध्यान करे और आपके चिन्तनमें लगी रहे ॥ ६१ ॥

११- सुकेशीकी कथा, मगधारण्यमें ऋषियोंसे प्रश्न करना, ऋषियोंका धर्मोपदेश, देवादिके धर्म, भुवनकोश एवं इक्कीस नरकोंका वर्णन

४८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ८ नारायण उवाच एवं भविष्यत्यसुर वरमन्यं यमिच्छसि। तं वृणीष्व महाबाहो प्रदास्याम्यविचारयन् ॥ ६२ प्रह्लाद उवाच सर्वमेव मया लब्धं त्वत्प्रसादादधोक्षज। त्वत्पादपङ्कजाभ्यां हि ख्यातिरस्तु सदा मम ॥ ६३ नारायण उवाच एवमस्त्वपरं चास्तु नित्यमेवाक्षयोऽव्ययः । अजरश्चामरश्चापि मत्प्रसादाद् भविष्यसि ॥ ६४ गच्छस्व दैत्यशार्दूल स्वमावासं क्रियारतः। न कर्मबन्धो भवतो मच्चित्तस्य भविष्यति ॥ ६५ प्रशासयदसून दैत्यान् राज्यं पालय शाश्वतम् । स्वजातिसदृशं दैत्य कुरु धर्ममनुत्तमम् ॥ ६६ पुलस्त्य उवाच इत्युक्तो लोकनाथेन प्रह्लादो देवमब्रवीत् । कथं राज्यं समादास्ये परित्यक्तं जगद्गुरो ॥ ६७ तमुवाच जगत्स्वामी गच्छ त्वं निजमाश्रयम् । हितोपदेष्टा दैत्यानां दानवानां तथा भव ॥ ६८ नारायणेनैवमुक्तः स तदा दैत्यनायकः । प्रणिपत्य विभुं तुष्टो जगाम नगरं निजम् ॥ ६९ दृष्टः सभाजितश्चापि दानवैरन्धकेन च। निमन्त्रितश्च राज्याय न प्रत्यैच्छत्स नारद ॥ ७० राज्यं परित्यज्य महाऽसुरेन्द्रो नियोजयन् सत्पथि दानवेन्द्रान् । ध्यायन् स्मरन् केशवमप्रमेयं तस्थौ तदा योगविशुद्धदेहः ॥ ७१ एवं पुरा नारद दानवेन्द्रो नारायणेनोत्तमपूरुषेण । पराजितश्चापि विमुच्य राज्यं तस्थौ मनो धातरि सन्निवेश्य ॥ ७२ नारायणने कहा— प्रह्लाद ! ऐसा ही होगा। पर हे महाबाहो ! तुम एक और अन्य वर भी, जो तुम चाहो, माँगो। मैं बिना विचारे ही—बिना देय-अदेयका विचार किये ही—वह भी तुम्हें दूँगा ॥ ६२ ॥ प्रह्लादने कहा— अधोक्षज ! आपके अनुग्रहसे मुझे सब कुछ प्राप्त हो गया। आपके चरणकमलोंसे मैं सदा लगा रहूँ और ऐसी ही मेरी प्रसिद्धि भी हो अर्थात् मैं आपके भक्तके रूपमें ही चर्चित होऊँ ॥ ६३ ॥ नारायणने कहा— ऐसा ही होगा। इसके अतिरिक्त मेरे प्रसादसे तुम अक्षय, अविनाशी, अजर और अमर होगे। दैत्यश्रेष्ठ ! अब तुम अपने घर जाओ और सदा (धर्म) कार्यमें रत रहो। मुझमें मन लगाये रखनेसे तुम्हें कर्मबन्धन नहीं होगा। इन दैत्योंपर शासन करते हुए तुम शाश्वत (सदा बने रहनेवाले) राज्यका पालन करो। दैत्य ! अपनी जातिके अनुकूल श्रेष्ठ धर्मोका अनुष्ठान करो ॥ ६४–६६ ॥ पुलस्त्यजी बोले— लोकनाथके ऐसा कहनेपर प्रह्लादने भगवान्‌से कहा—जगद्गुरो ! अब मैं छोड़े हुए राज्यको कैसे ग्रहण करूँ? इसपर भगवान्ने उनसे कहा—तुम अपने घर जाओ तथा दैत्यों एवं दानवोंको कल्याणकारी बातोंका उपदेश करो। नारायणके ऐसा कहनेपर वे दैत्यनायक (प्रह्लाद) परमेश्वरको प्रणाम कर प्रसन्नतापूर्वक अपने नगर निवास-स्थानको चले गये। नारदजी! अन्धक तथा दानवोंने प्रह्लादको देखा एवं उनका सम्मान किया और उन्हें राज्य स्वीकार करनेके लिये अनुरोधित किया; किंतु उन्होंने राज्य स्वीकार नहीं किया। दैत्येश्वर प्रह्लाद राज्यको छोड़ अपने उपदेशोंसे दानव-श्रेष्ठोंको शुभ मार्गमें नियोजित तथा भगवान् नारायणका ध्यान और स्मरण करते हुए योगके द्वारा शुद्ध शरीर होकर विराजित हुए। नारदजी ! इस प्रकार पहले पुरुषोत्तम नारायणद्वारा पराजित दानवेन्द्र प्रह्लाद राज्य छोड़कर भगवान् नारायणके ध्यानमें लीन होकर शान्त एवं सुस्थिर हुए थे ॥ ६७-७२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें आठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ८ ॥

अध्याय ९ ] अन्धकासुरकी विजिगीषा, देवों और असुरोंके वाहनों एवं युद्धका वर्णन [ ४९

नवाँ अध्याय

अन्धकासुरकी विजिगीषा, देवों और असुरोंके वाहनों एवं युद्धका वर्णन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नारद उवाच<br>नेत्रहीनः कथं राज्ये प्रह्लादेनान्धको मुने।<br>अभिषिक्तो जानताऽपि राजधर्मं सनातनम्॥ १**नारदजीने कहा—**मुने! प्रह्लादजी सनातन राजधर्मको भलीभाँति जानते थे। ऐसी दशामें उन्होंने नेत्रहीन अन्धकको राजगद्दीपर कैसे बैठाया ? ॥ १ ॥
पुलस्त्य उवाच<br>लब्धचक्षुरसौ भूयो हिरण्याक्षेऽपि जीवति।<br>ततोऽभिषिक्तो दैत्येन प्रह्लादेन निजे पदे॥ २**पुलस्त्यजी बोले—**हिरण्याक्षके जीवनकालमें ही अन्धकको पुनः दृष्टि प्राप्त हो गयी थी, अतः दैत्यवर्य प्रह्लादने उसे अपने पदपर अभिषिक्त किया था ॥ २ ॥
नारद उवाच<br>राज्येऽन्धकोऽभिषिक्तस्तु किमाचरत सुव्रत।<br>देवादिभिः सह कथं समास्ते तद् वदस्व मे॥ ३**नारदजीने पूछा—**सुव्रत! मुझे यह बतलाइये कि अन्धकने राज्यपर अभिषिक्त होनेपर क्या-क्या किया तथा वह देवताओं आदिके साथ कैसा व्यवहार करता था ॥ ३ ॥
पुलस्त्य उवाच<br>राज्येऽभिषिक्तो दैत्येन्द्रो हिरण्याक्षसुतोऽन्धकः।<br>तपसाराध्य देवेशं शूलपाणिं त्रिलोचनम्॥ ४<br><br>अजेयत्वमवध्यत्वं सुरसिद्धर्षिपन्नगैः।<br>अदाह्यत्वं हुताशेन अक्लेद्यत्वं जलेन च॥ ५<br><br>एवं स वरलब्धस्तु दैत्यो राज्यमपालयत्।<br>शुक्रं पुरोहितं कृत्वा समध्यास्ते ततोऽन्धकः॥ ६<br><br>ततश्चक्रे समुद्योगं देवानामान्धकोऽसुरः।<br>आक्रम्य वसुधां सर्वां मनुजेन्द्रान् पराजयत्॥ ७**पुलस्त्यजी बोले—**हिरण्याक्षके पुत्र दैत्यराज अन्धकने राज्य प्राप्त करके तपस्याद्वारा शूलपाणि भगवान् शंकरकी आराधना की और उनसे देवता, सिद्ध, ऋषि एवं नागोंद्वारा नहीं जीते जाने और नहीं मारे जानेका वर प्राप्त कर लिया। इसी प्रकार वह अग्निके द्वारा न जलने, जलसे न भीगने आदिका भी वरदान प्राप्त कर राज्यका संचालन कर रहा था। उसने शुक्राचार्यको अपना पुरोहित बना लिया था। फिर अन्धकासुरने देवताओंको जीतनेका उपक्रम (आरम्भ) किया और उन्हें जीतकर सम्पूर्ण पृथ्वीको अपने वशमें कर लिया—सभी श्रेष्ठ राजाओंको परास्त कर दिया॥ ४—७॥
पराजित्य महीपालान् सहायार्थे नियोज्य च।<br>तैः समं मेरुशिखरं जगामाद्भुतदर्शनम्॥ ८<br><br>शक्रोऽपि सुरसैन्यानि समुद्योज्य महागजम्।<br>समारुह्यामरावत्यां गुप्तिं कृत्वा विनिर्ययौ॥ ९<br><br>शक्रस्यानु तथैवान्ये लोकपाला महौजसः।<br>आरुह्य वाहनं स्वं स्वं सायुधा निर्ययुर्बहिः॥ १०<br><br>देवसेनाऽपि च समं शक्रेणाद्भुतकर्मणा।<br>निर्जगामातिवेगेन गजवाजिरथादिभिः॥ ११उसने सभी राजाओंको पराजित कर उन्हें (सामन्त बनाकर) अपनी सहायतामें नियुक्त कर दिया। फिर उनके साथ वह सुमेरुगिरि पर्वतको देखनेके लिये उसके अद्भुत शिखरपर गया। इधर इन्द्र भी देवसेनाको तैयारकर और अमरावतीमें सुरक्षाकी व्यवस्था कर अपने ऐरावत हाथीपर सवार होकर युद्धके लिये बाहर निकले। इसी प्रकार दूसरे तेजस्वी लोकपालगण भी अपने-अपने वाहनोंपर सवार होकर तथा अपने अस्त्र लेकर इन्द्रके पीछे-पीछे चल पड़े। हाथी, घोड़े, रथ आदिसे युक्त देवसेना भी बड़े अद्भुत पराक्रमी इन्द्रके साथ तेजीसे
५०श्रीवामनपुराण[ अध्याय ९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अग्रतो द्वादशादित्याः पृष्ठतश्च त्रिलोचनाः ।<br>मध्येऽष्टौ वसवो विश्वे साध्याश्चिमरुतां गणाः ।<br>यक्षविद्याधराद्याश्च स्वं स्वं वाहनमास्थिताः ॥ १२निकल पड़ी। सेनाके आगे-आगे बारहोंने आदित्य और उनके पृष्ठभागमें ग्यारह रुद्रगण थे। उसके मध्यमें आठों वसु, तेरहों विश्वेदेव, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, यक्ष, विद्याधर आदि अपने-अपने वाहनपर सवार होकर चल रहे थे॥ ८—१२॥
नारद उवाच<br>रुद्रादीनां वदस्वेह वाहनानि च सर्वशः ।<br>एकैकस्यापि धर्मज्ञ परं कौतूहलं मम ॥ १३नारदजीने पूछा— धर्मज्ञ! रुद्र आदिके वाहनोंका एक-एक कर पूरी तरह वर्णन कीजिये। इस विषयमें मुझे बड़ी उत्सुकता हो रही है॥ १३॥
पुलस्त्य उवाच<br>शृणुष्व कथयिष्यामि सर्वेषामपि नारद ।<br>वाहनानि समासेन एकैकस्यानुपूर्वशः ॥ १४<br>रुद्रहस्ततलोत्पन्नो महावीर्यो महाजवः ।<br>श्वेतवर्णो गजपतिर्देवराजस्य वाहनम् ॥ १५<br>रुद्रोरुसंभवो भीमः कृष्णवर्णो मनोजवः ।<br>पौण्ड्रको नाम महिषो धर्मराजस्य नारद ॥ १६<br>रुद्रकर्णमलोद्भूतः श्यामो जलधिसंज्ञकः ।<br>शिशुमारो दिव्यगतिः वाहनं वरुणस्य च ॥ १७<br>रौद्रः शकटचक्राक्षः शैलाकारो नरोत्तमः ।<br>अम्बिकापादसंभूतो वाहनं धनदस्य तु ॥ १८पुलस्त्यजी बोले— नारदजी! सुनिये; मैं एक-एक करके क्रमशः सभी देवताओंके वाहनोंका संक्षेपमें वर्णन करता हूँ। रुद्रके करतलसे उत्पन्न अति पराक्रमवाला, अति तीव्रगतिवाला, श्वेतवर्णका ऐरावत हाथी देवराज (इन्द्र)-का वाहन है। हे नारद! रुद्रके ऊरुसे उत्पन्न भयंकर कृष्णवर्णवाला एवं मनके सदृश गतिमान् पौण्ड्रक नामक महिष धर्मराजका वाहन है। रुद्रके कर्ण-मलसे उत्पन्न श्यामवर्णवाला दिव्यगतिशील जलधि नामक शिशुमार (सूँस) वरुणका वाहन है। अम्बिकाके चरणोंसे उत्पन्न गाड़ीके चक्केके समान भयंकर आँखवाला, पर्वताकार नरोत्तम कुबेरका वाहन है॥ १४-१८॥
एकादशानां रुद्राणां वाहनानि महामुने ।<br>गन्धर्वाश्च महावीर्या भुजगेन्द्राश्च दारुणाः ।<br>श्वेतानि सौरभेयाणि वृषाण्युग्रजवानि च ॥ १९<br>रथं चन्द्रमसश्चार्द्धसहस्रं हंसवाहनम् ।<br>हरयो रथवाहाश्च आदित्या मुनिसत्तम ॥ २०<br>कुञ्जरस्थाश्च वसवो यक्षाश्च नरवाहनाः ।<br>किन्नरा भुजगारूढा हयारूढौ तथाश्विनौ ॥ २१<br>सारङ्गाधिष्ठिता ब्रह्मन् मरुतो घोरदर्शनाः ।<br>शुकारूढाश्च कवयो गन्धर्वाश्च पदातिनः ॥ २२हे महामुने! एकादश रुद्रोंके वाहन महापराक्रमशाली गन्धर्वगण, भयंकर सर्पराजगण तथा सुरभिके अंशसे उत्पन्न तीव्रगतिवाले सफेद बैल हैं। मुनिश्रेष्ठ! चन्द्रमाके रथको खींचनेवाले आधे हजार (पाँच सौ) हंस हैं। आदित्योंके रथके वाहन घोड़े हैं। वसुओंके वाहन हाथी, यक्षोंके वाहन नर, किन्नरोंके वाहन सर्प एवं अश्विनीकुमारोंके वाहन घोड़े हैं। ब्रह्मन्! भयंकर दीखनेवाले मरुद्गणोंके वाहन हरिण हैं, भृगुओंके वाहन शुक हैं और गन्धर्वलोग पैदल ही चलते हैं॥ १९—२२॥
आरुह्य वाहनान्येवं स्वानि स्वान्यमरोत्तमाः ।<br>संनह्य निर्ययुर्हृष्टा युद्धाय सुमहौजसः ॥ २३इस प्रकार बड़े तेजस्वी श्रेष्ठ देवगण अपने-अपने वाहनोंपर आरूढ़ एवं संनद्ध (तैयार) होकर प्रसन्नतापूर्वक युद्धके लिये निकल पड़े॥ २३॥
नारद उवाच<br>गदितानि सुरादीनां वाहनानि त्वया मुने ।<br>दैत्यानां वाहनान्येवं यथावद् वक्तुमर्हसि ॥ २४नारदने कहा— मुने! आपने देवादिकोंके वाहनोंका वर्णन किया; इसी प्रकार अब असुरोंके वाहनोंका भी यथावत् वर्णन करें॥ २४॥
पुलस्त्य उवाच<br>शृणुष्व दानवादीनां वाहनानि द्विजोत्तम ।<br>कथयिष्यामि तत्त्वेन यथावच्छ्रोतुमर्हसि ॥ २५पुलस्त्यजी बोले— द्विजोत्तम! (अब) दानवोंके वाहनको सुनो। मैं तत्त्वतः उनका ठीक-ठीक वर्णन करता हूँ। अन्धकका अलौकिक रथ कृष्णवर्णके श्रेष्ठ

अध्याय ९ ] अन्धकासुरकी विजिगीषा, देवों और असुरोंके वाहनों एवं युद्धका वर्णन ५१ अन्धकस्य रथो दिव्यो युक्तः परमवाजिभिः । कृष्णवर्णैः सहस्रारस्त्रिनल्वपरिमाणवान् ॥ २६ प्रह्लादस्य रथो दिव्यश्चन्द्रवर्णैर्हयोत्तमैः । उह्यमानस्तथाष्टाभिः श्वेतरुक्ममयः शुभः ॥ २७ विरोचनस्य च गजः कुजम्भस्य तुरंगमः । जम्भस्य तु रथो दिव्यो हयैः काञ्चनसंनिभैः ॥ २८ शङ्कुकर्णस्य तुरगो हयग्रीवस्य कुञ्जरः । रथो मयस्य विख्यातो दुन्दुभेश्च महोरगः । शम्बरस्य विमानोऽभूदयःशङ्कोर्मृगाधिपः ॥ २९ बलवृत्रौ च बलिनौ गदामुसलधारिणौ । पद्भ्यां दैवतसैन्यानि अभिद्रवितुमुद्यतौ ॥ ३० ततो रणोऽभूत् तुमुलः संकुलोऽतिभयंकरः । रजसा संवृतो लोको पिङ्गवर्णेन नारद ॥ ३१ नाज्ञासीच्च पिता पुत्रं न पुत्रः पितरं तथा । स्वानेवान्ये निजघ्नुर्वै परानन्ये च सुव्रत ॥ ३२ अभिद्रुतो महावेगो रथोपरि रथस्तदा । गजो मत्तगजेन्द्रं च सादी सादिनमभ्यगात् ॥ ३३ पदातिरपि संक्रुद्धः पदातिनमथोल्बणम् । परस्परं तु प्रत्यघ्ननन्योन्यजयकाङ्क्षिणः ॥ ३४ ततस्तु संकुले तस्मिन् युद्धे दैवासुरे मुने । प्रावर्तत नदी घोरा शमयन्ती रणाद्रजः ॥ ३५ शोणितोदा रथावर्त्ता योधसंघट्टवाहिनी । गजकुम्भमहाकूर्मा शरमीना दुरत्यया ॥ ३६ तीक्ष्णाग्रप्रासमकरा महासिग्राहवाहिनी । अन्त्रशैवालसंकीर्णा पताकाफेनमालिनी ॥ ३७ गृध्रकङ्कमहाहंसा श्येनचक्राह्वमण्डिता । वनवायसकादम्बा गोमायुश्वापदाकुला ॥ ३८ पिशाचमुनिसंकीर्णा दुस्तरा प्राकृतैर्जनैः । रथप्लवैः संतरन्तः शूरास्तां प्रजगाहिरे ॥ ३९ आगुल्फादवमज्जन्तः सूदयन्तः परस्परम् । समुत्तरन्तो वेगेन योधा जयधनेप्सवः ॥ ४० अश्वोंसे परिचालित होता था। वह हजार अरों- पहियेकी नाभि और नेमिके बीचकी लकड़ियोंसे युक्त बारह सौ हाथोंका परिमाणवाला था। प्रह्लादका दिव्य रथ सुन्दर एवं सुवर्ण-रजत-मण्डित था। उसमें चन्द्रवर्णवाले आठ उत्तम घोड़े जुते हुए थे। विरोचनका वाहन हाथी था एवं कुजम्भ घोड़ेपर सवार था। जम्भका दिव्य रथ स्वर्णवर्णके घोड़ोंसे युक्त था ॥ २५-२८॥ इसी प्रकार शंकुकर्णका वाहन घोड़ा, हयग्रीवका हाथी और मय दानवका वाहन दिव्य रथ था। दुन्दुभिका वाहन विशाल नाग था। शम्बर विमानपर चढ़ा हुआ था तथा अयःशंकु सिंहपर सवार था। गदा और मुसलधारी बलवान् बल और वृत्र पैदल थे; पर देवताओंकी सेनापर चढ़ाई करनेके लिये उद्यत थे। फिर अति भयङ्कर घमासान युद्ध प्रारम्भ हो गया। नारदजी! समस्त लोक पीली धूलसे ढक गया, जिससे पिता पुत्रको और पुत्र पिताको भी परस्पर एक-दूसरेको पहचान नहीं पाते थे। सुव्रत ! कुछ लोग अपने ही पक्षके लोगोंको तथा कुछ लोग विरोधी पक्षके लोगोंको मारने लगे ॥ २९-३२॥ उस युद्धमें रथके ऊपर रथ और हाथीके ऊपर हाथी टूट पड़े तथा घुड़सवार घुड़सवारोंकी ओर वेगसे आक्रमण करने लगे। इसी प्रकार पादचारी (पैदल) सैनिक क्रुद्ध होकर अन्य बलशाली पैदलोंपर चढ़ बैठे। इस प्रकार एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे सभी परस्पर प्रहार करने लगे। मुने! उसके बाद देवताओं और असुरोंके उस घोर संग्राममें युद्धसे उत्पन्न धूलिको शान्त करती हुई रक्तरूपी जलधारावाली एवं रथरूपी भँवरवाली और योद्धाओंके समूहको बहा ले जानेवाली एवं गजकुम्भरूपी महान् कूर्म तथा शररूपी मीनसे युक्त बड़ी भारी नदी बह चली ॥ ३३-३६ ॥ उस नदीमें तेज धारवाले प्रास (एक प्रकारका अस्त्र) ही मकर थे, बड़ी-बड़ी तलवारें ही ग्राह थीं, उसमें आँतें ही शैवाल, पताका ही फेन, गृध्र एवं कङ्क पक्षी महाशंख, बाज ही चक्रवाक और जंगली कौवे ही मानो कलहंस थे। वह नदी शृगालरूपी हिंस्र एवं पिशाचरूपी मुनियोंसे संकीर्ण थी और साधारण मनुष्योंसे दुस्तर थी। जयरूप धनकी इच्छावाले शूर योद्धा लोग घुटनोंतक डूबते और एक-दूसरेको मारते हुए रथरूपी नौकाओंद्वारा उस नदीको वेगसे पार कर रहे थे ॥ ३७-४० ॥

१२- सुकेशीका नरक देनेवाले कर्मोंके सम्बन्धमें प्रश्न, ऋषियोंका उत्तर और नरकोंका वर्णन

५२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ९ ततस्तु रौद्रे सुरदैत्यसादने वह युद्ध डरपोकोंके लिये भयावना, देवों एवं महाहवे भीरुभयंकरेऽथ। दैत्योंका संहार करनेवाला तथा वस्तुतः अत्यन्त भयंकर रक्षांसि यक्षाश्च सुसंप्रहृष्टाः था। उसमें यक्ष और राक्षस लोग अत्यन्त आनन्दित पिशाचयूथास्त्वभिरेमिरे च॥४१ हो रहे थे। पिशाचोंका समूह भी प्रसन्न था। वे पिबन्त्यसृग्गाढतरं भटाना- वीरोंके गाढ़े रुधिरका पान करते थे तथा (उनके मालिङ्ग्य मांसानि च भक्षयन्ति। शवोंका) आलिंगन कर मांसका भक्षण करते थे। वसां विल्लुम्पन्ति च विस्फुरन्ति पक्षी चर्बीको नोचते और उछलते थे एवं एक- गर्जन्त्यथान्योन्यमथो वयांसि ॥ ४२ दूसरेके प्रति गर्जन करते थे। सियारिनें 'फेत्कार' मुञ्चन्ति फेत्काररवाञ्शिवाश्च शब्द कर रही थीं, भूमिपर पड़े हुए वेदनासे दुःखी क्रन्दन्ति योधा भुवि वेदनात्र्ताः। योद्धा कराह रहे थे। कुछ लोग शस्त्रसे आहत शस्त्रप्रतप्ता निपतन्ति चान्ये होकर गिर रहे थे। युद्धभूमि मरघटके समान हो युद्धं श्मशानप्रतिमं बभूव ॥ ४३ गयी थी। सियारिनोंके भयंकर शब्दसे युक्त देवासुर- तस्मिञ्शिवाघोररवे प्रवृत्ते संग्राम ऐसा लगता था, मानो युद्धमें निपुण योद्धा सुरासुराणां सुभयंकरे ह। लोग शस्त्ररूपी पाशा लेकर अपने प्राणोंकी बाजी युद्धं बभौ प्राणपणोपविद्धं द्वन्द्वेऽतिशस्त्राक्षगतो दुरोदरः ॥ ४४ लगाते हुए जुआ खेल रहे हैं॥ ४१-४४॥ हिरण्यचक्षुस्तनयो रणेऽन्धको हिरण्याक्षका पुत्र अन्धक हजारों घोड़ोंसे रथे स्थितो वाजसहस्रयोजिते। युक्त रथपर आरूढ़ होकर मतवाले हाथीकी पीठपर मत्तेभपृष्ठस्थितमुग्रतेजसं स्थित महातेजस्वी देवराज इन्द्रके साथ जा भिड़ा। समेयिवान् देवपतिं शतक्रतुम् ॥ ४५ समापतन्तं महिषाधिरूढं इधर आठ घोड़ोंसे युक्त रथपर आरूढ़ अस्त्र यमं प्रतीच्छद् बलवान् दितीशः। उठाये बलवान् दैत्यराज प्रह्लादने महिषपर सवार प्रह्लादनामा तुरगाष्टयुक्तं यमराजका सामना किया। नारदजी! उधर विरोचन रथं समास्थाय समुद्यतास्त्रः ॥ ४६ वरुणदेवसे युद्ध करनेके लिये आगे बढ़ा तथा विरोचनश्चापि जलेश्वरं त्वगा- जम्भ बलशाली कुबेरकी ओर चला। शम्बर ज्जम्भस्त्वथागाद् धनदं बलाढ्यम्। वायुदेवताके सामने जा खड़ा हुआ एवं मय अग्निके वायुं समभ्येत्य च शम्बरोऽथ साथ युद्ध करने लगा। हयग्रीव आदि अन्यान्य मयो हुताशं युयुधे मुनीन्द्र ॥ ४७ अन्ये हयग्रीवमुखा महाबला महाबलवान् दैत्य तथा दानव अग्नि, सूर्य, अष्ट दितेस्तनूजा दनुपुङ्गवाश्च। वसुओं तथा शेषनाग आदि देवताओंके साथ द्वन्द्वयुद्ध सुरान् हुताशार्कवसूरगेश्वरान् करने लगे ॥ ४५-४८ ॥ द्वन्द्वं समासाद्य महाबलान्विताः ॥ ४८ गर्जन्त्यथान्योन्यमुपेत्य युद्धे वे एक-दूसरेके साथ युद्ध करते हुए भीषण चापानि कर्षन्त्यतिवेगिताश्च। गर्जन कर रहे थे। वे वेगपूर्वक धनुष चढ़ा करके मुञ्चन्ति नाराचगणान् सहस्रश हजारों बाणोंकी झड़ी लगाकर कहने लगे-अरे! आगच्छ हे तिष्ठसि किं ब्रुवन्तः ॥ ४९ आओ, आओ, रुक क्यों गये। तेज बाणोंकी वर्षा शरैस्तु तीक्ष्णैरतितापयन्तः शस्त्रैरमोघैरभिताडयन्तः । करते हुए तथा अमोघ शस्त्रोंसे प्रहार करते हुए