वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
८०-त्रिशक्ति-माहात्म्यमें 'सृष्टि', 'सरस्वती' तथा 'वैष्णवी'<br>देवियोंका वर्णन
अध्याय ८२ ] नदियोंका अवतरण १४३
किन्नरोंके नगर हैं। वहाँ देवदत्त, चन्द्रदत्त आदि पंद्रह गर्वपूर्ण राजा शासन करते हैं ये। पुरियाँ सुवर्णमयी हैं। 'चन्द्रोदय' पर्वतपर बहुत-सी बिलें और नगर हैं और वहाँ सर्पोंका निवास है। गरुडके राज्यशासनसे वे सर्प बिलोंमें छिपे रहते हैं। 'अनुराग' नामक पर्वतपर दानवेश्वरोंके रहनेकी व्यवस्था है। 'वेणुमान्' पर्वतपर विद्याधरोंके तीन नगर हैं। उनमें प्रत्येक नगरकी लम्बाई तीन सौ योजन और चौड़ाई सौ योजनकी है। उनमें विद्याधरोंके शासक उलूक, गरुड, रोमश और महावेत्र नियुक्त हैं। कुञ्जर तथा वसुधारपर्वतोंपर भगवान् पशुपतिका निवास है। करोड़ों भूतगण यहाँ शंकरकी सेवा करते हैं।
वसुधार और रत्नधार—इन दोनों पर्वतोंके ऊपर वसुओं एवं सप्तर्षियोंकी पुरियाँ हैं, जिनकी संख्या पंद्रह है। पर्वतोत्तम एकशृङ्ग पर्वतपर प्रजाओंकी रक्षा करनेवाले चतुर्मुख ब्रह्माजीका निवासस्थान है। 'गज' नामक पर्वतपर महान् भूतसमुदायसे घिरी स्वयं भगवती पार्वती विराजती हैं। पर्वतप्रवर वसुधारपर चौरासी योजनके विस्तारसे मुनियों, सिद्धों और विद्याधरोंका एक श्रेष्ठ नगर है। उसके चारों ओर चहारदीवारी तथा बीचमें तोरण है। युद्ध करनेमें निपुण, पर्वतनामवाले अनेक गन्धर्व वहाँ निवास करते हैं। उनके राजाका नाम पिंगल है। वे राजाओंके भी राजा हैं। देवता और राक्षस पञ्चकूटपर तथा दानव 'शतशृङ्ग' पर्वतपर रहते हैं। दानवों और यक्षोंकी पुरियाँ सौकी संख्यामें हैं। 'प्रभेदक' पर्वतके पश्चिम भागमें देवताओं, दानवों और सिद्धोंकी पुरियाँ हैं। उस प्रभेदक गिरिके शिखरपर एक बहुत बड़ी शिला है। वहाँ प्रत्येक पर्वतपर चन्द्रमा स्वयं ही आते हैं। उसके पास ही उत्तर दिशामें 'त्रिकूट' नामका एक पर्वत है। कभी-कभी ब्रह्माजीका वहाँ निवास होता है। ऐसे ही अग्निदेवका भी वहाँ निवास-स्थान है। वहाँ अग्निदेवता मूर्तिमान् होकर रहते हैं और अन्य देवता उनकी उपासना करते हैं। उसके उत्तर 'शृङ्ग' पर्वतपर देवताओंके भवन हैं। इसके पूर्वमें भगवान् नारायणका, बीचमें ब्रह्माका तथा पश्चिममें भगवान् शंकरका निवास-स्थान है। वहीं यक्ष आदिकोंके बहुत-से नगर हैं। वहाँ तीस योजन विस्तारवाली एक नदी है, जिसका नाम 'नन्दजल' है। उसके उत्तर तटपर 'जातुच्छ' नामक एक ऊँचा पर्वत है। वहाँ सर्पोंका राजा, जो नन्द नामसे प्रसिद्ध है, निवास करता है। उसके सौ भयंकर फन हैं। इस प्रकार इन आठ दिव्य पर्वतोंको जानना चाहिये। सोना-चाँदी, रत्न, वैदूर्य और मैनशिल आदि रंगसे क्रमशः वे पर्वत वर्ण धारण करते हैं। यह पृथ्वी लाख कोटि अर्थात् अगणित पर्वतोंसे पूर्ण है। उनपर सिद्ध और विद्याधरोंके अनेक आलय हैं। इसी प्रकार मेरुपर्वतके पार्श्व-भागमें केसर, वलय, आलवाल और सिद्धलोक आदि हैं। यह पृथ्वी कमलकी आकृतिमें सुव्यवस्थित हुई है। सामान्यरूपसे सभी पुराणोंमें इसी क्रमका प्रतिपादन होता है।
[ अध्याय ८१]
नदियोंका अवतरण
भगवान् रुद्र कहते हैं—अब आपलोग नदियोंका अवतरण सुनें—जिसे आकाश-समुद्र कहते हैं, उसीसे आकाशगङ्गाका प्रादुर्भाव हुआ है। यह आकाश-समुद्र प्रायः निरन्तर इन्द्रके ऐरावत हाथीद्वारा (स्नानादि करनेसे) क्षुभित एवं बाधित होता रहता है। फिर वह आकाशगङ्गा चौरासी हजार योजन ऊपरसे मेरुपर्वतपर गिरती है। वहाँसे मेरुकूटकी उपत्यकाओंसे नीचे बहती हुई वह
| १४४ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय ८३-८४ |
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चार भागोंमें विभक्त हो जाती है। आश्रयहीन होनेके कारण चौंसठ हजार योजन दूरसे गिरती हुई वह नीचे उतरती है। यही नदी भूभागपर पहुँचकर सीता, अलकनन्दा, चक्षु एवं भद्रा आदि नामोंसे विख्यात होती है। इन नदियोंके बीचमें इक्यासी हजार पर्वतोंको लाँघती हुई 'गो' अर्थात् पृथ्वीपर गमन करनेके कारण इसे ही जनता 'गां गता'—'गङ्गा' कहती है।
अब 'गन्धमादन' के पार्श्वभागमें स्थित अमर-गण्डिकाका वर्णन करता हूँ। वह चार सौ योजन चौड़ी और तीस योजन लम्बी है। उसके तटपर केतुमाल नामसे प्रसिद्ध अनेक जनपद हैं। वहाँके निवासी पुरुष काले वर्णवाले एवं अत्यन्त पराक्रमी हैं। यहाँकी स्त्रियाँ कमलके समान नेत्रोंवाली परम सुन्दर होती हैं। वहाँ कटहलके वृक्ष विशेषतया बड़े-बड़े होते हैं। ब्रह्माजीके पुत्र ईशान—शिव ही वहाँके शासक हैं। उसका जल पीनेसे प्राणियोंके पास बुढ़ापा और रोग नहीं आ सकते तथा वे मनुष्य हजार वर्षकी आयुसे सम्पन्न और हृष्ट-पुष्ट रहते हैं। माल्यवान्पर्वतके पूर्वी शिखरसे 'पूर्वगण्डिका'का प्रादुर्भाव हुआ है। इसकी लम्बाई-चौड़ाई हजार योजन है। वहाँपर भद्राश्व नामसे प्रसिद्ध अनेक जनपद हैं। वहीं भद्ररसाल नामका एक वन है। कालाग्र नामक वृक्षोंकी संख्या तो अनगिनत है। वहाँके पुरुष श्वेतवर्णके और स्त्रियाँ कमल अथवा कुन्द-वर्णकी होती हैं। उन सबकी आयु दस हजार वर्षकी है। वहाँ पाँच 'कुल'-पर्वत हैं। वे पर्वत शैल वर्ण, मालाख्य, 'कोरजस्क' त्रिपर्ण और नील नामसे विख्यात हैं। वहाँसे झील-झरनों एवं सरोवरोंके तटवर्ती जनपदोंके नाम भी प्रायः वैसे ही हैं। वहाँके देशवासी उन्हीं नदियोंके जल पीते हैं। उन नदियोंके नाम इस प्रकार हैं—सीता, सुवाहिनी, हंसवती, कासा, महावक्रा, चन्द्रवती, कावेरी, सुरसा, आख्यावती, इन्द्रवती, अङ्गारवाहिनी, हरित्तोया, सोमावर्ता, शतह्रदा, वनमाला, वसुमती, हंसा, सुपर्णा, पञ्चगङ्गा, धनुष्मती, मणिवप्रा, सुब्रह्मभोगा, विलासिनी, कृष्णतोया, पुण्योदा, नागवती, शिवा, शैवालिनी, मणितटा, क्षीरोदा, वरुणताली और विष्णुपदी। जो इन पुण्यमयी नदियोंका जल पीते हैं, उनकी आयु दस हजार वर्षकी हो जाती है। यहाँके निवासी सभी स्त्री-पुरुष भगवान् रुद्र और उमाके भक्त हैं।
[अध्याय ८२]
नैषध एवं रम्यकवर्षोंके कुलपर्वत, जनपद और नदियाँ
भगवान् रुद्र कहते हैं— मैंने आपलोगोंसे भद्राश्ववर्षका संक्षेपमें और केतुमालवर्षका कुछ विस्तारपूर्वक वर्णन किया। अब (निषधवर्षके) पर्वतराज नैषधके पश्चिममें रहनेवाले कुलपर्वतों, जनपदों और नदियोंका वर्णन करता हूँ। विशाख, कम्बल, जयन्त, कृष्ण, हरित, अशोक और वर्धमान—ये तो वहाँके सात कुल-पर्वत हैं। इन पर्वतोंके बीच छोटे-छोटे पर्वतों एवं शिखरोंकी संख्या अनन्त है। वहाँके नगर-जनपद आदि भी इन पर्वतोंके नामोंसे ही प्रसिद्ध हैं। ये पर्वत हैं— सौर, ग्रामान्तसातप, कृतसुराश्रवण, कम्बल, माहेय, कूटवास, मूलतप, क्रौञ्च, कृष्णाङ्ग, मणिपङ्कज, चूडमल, सोमीय, समुद्रान्तक, कुरकुञ्ज, सुवर्णतट, कुह, श्वेताङ्ग, कृष्णपाद, विद, कपिल, कर्णिक, महिष, कुब्ज, करनाट, महोत्कट, शुकनाक, सगज, भूम, ककुरञ्जन, महानाह, किकिसपर्ण, भौमक, चोरक, धूमजन्मा, अङ्गारज, जीवलोकित, वाचांसहांग, मधुरेय, शुकेय, चकेय, श्रवण, मत्तकाशिक, गोदावाय, कुलपंजाब, वर्जह और मोदशालक। इन पर्वतीय जनपदोंमें निवास करनेवाली
८१-महिषासुरकी मन्त्रणा और देवासुर-संग्राम
अध्याय ८३-८४ ] नैषध एवं रम्यकवर्षोंके कुलपर्वत, जनपद और नदियाँ १४५
प्रजा जिन पर्वतीय नदियोंका ही जल पीती है, वे नदियाँ हैं—रत्नाक्षा, महाकदम्बा, मानसी, श्यामा, सुमेधा, बहुला, विवर्णा, पुङ्खा, माला, दर्भवर्ती, भद्रनदी, शुकनदी, पल्लवा, भीमा, प्रभञ्जना, काम्बा, कुशावती, दक्षा, काशवती, तुङ्गा, पुण्योदा, चन्द्रावती, सुमूलावती, ककुपद्मिनी, विशाला, करंटका, पीवरी, महामाया, महिषी, मानषी और चण्डा। ये तो प्रधान नदियाँ हैं, छोटी-छोटी दूसरी नदियाँ भी हजारोंकी संख्यामें हैं।
भगवान् रुद्र कहते हैं—विप्रो! अब उत्तर और दक्षिणके वर्षोंमें जो-जो पर्वतवासी कहे जाते हैं, उनका मैं क्रमसे वर्णन करता हूँ, आपलोग सावधान होकर सुनें। मेरुके दक्षिण और श्वेतगिरिसे उत्तर सोमरसकी लताओंसे परिपूर्ण ‘रम्यकवर्ष’ है। (इस सोमके प्रभावसे) वहाँके उत्पन्न हुए मनुष्य प्रधान बुद्धिवाले, निर्मल और बुढ़ापा एवं दुर्गंतिके वशीभूत नहीं होते। वहाँ एक बहुत बड़ा वटका भी वृक्ष है, जिसका रंग प्रायः लाल कहा गया है। इसके फलका रस पीनेवाले मनुष्योंकी आयु प्रायः दस हजार वर्षोंकी होती है और वे देवताओंके समान सुन्दर होते हैं। श्वेतगिरिके उत्तर और त्रिशृङ्गपर्वतके दक्षिणमें हिरण्मय नामक वर्ष है। वहाँ एक नदी है, जिसे हैरण्यवती कहते हैं। वहाँ इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले कामरूपी पराक्रमी यक्षोंका निवास है। वहाँके लोगोंकी आयु प्रायः ग्यारह हजार वर्षोंकी होती है, पर कुछ लोग पन्द्रह सौ वर्षोंतक ही जीवित रहते हैं। उस देशमें बड़हर और कटहलके वृक्षोंकी बहुतायत है। उनके फलोंका भक्षण करनेसे ही वहाँके निवासी इतने दिनोंतक जीवित रहते हैं। त्रिशृङ्गपर्वतपर मणि, सुवर्ण एवं सम्पूर्ण रत्नोंसे युक्त शिखर क्रमशः उसके उत्तरसे दक्षिण समुद्रतक फैले हुए हैं। वहाँके निवासी उत्तरकौरव कहलाते हैं। वहाँ बहुत-से ऐसे वृक्ष हैं जिनसे दूध एवं रस निकलते हैं। उन वृक्षोंसे वस्त्र और आभूषण भी पाये जाते हैं। वहाँकी भूमि मणियोंकी बनी है तथा रेतोंमें सुवर्णखण्ड मिले रहते हैं। स्वर्गसुख भोगनेवाले पुरुष पुण्यकी अवधि समाप्त हो जानेपर यहाँ आकर निवास करते हैं। इनकी आयु तेरह हजार वर्षोंकी होती है। उसी द्वीपके पश्चिम चन्द्रद्वीप है। देवलोकसे चार हजार योजनकी दूरी पार करनेपर यह द्वीप मिलता है। हजार योजनकी लम्बाई-चौड़ाईमें इसकी सीमा है। उसके बीचमें ‘चन्द्रकान्त’ और ‘सूर्यकान्त’ नामसे प्रसिद्ध दो प्रस्रवणपर्वत हैं। उनके बीचमें ‘चन्द्रावर्त्ता’ नामकी एक महान् नदी है, जिसके किनारे बहुसंख्यक वृक्ष हैं और जिसमें अनेक छोटी-छोटी नदियाँ आकर मिलती हैं। ‘कुरुवर्ष’की उत्तरी अन्तिम सीमापर यह नदी है। समुद्रकी लहरें प्रायः यहाँ आती रहती हैं। यहाँसे पाँच हजार योजन आगे जानेपर ‘सूर्यद्वीप’ मिलता है। वह वृत्ताकारमें हजार योजनके क्षेत्रफलमें फैला हुआ है। उसके मध्यभागमें सौ योजन विस्तारवाला तथा उतना ही ऊँचा श्रेष्ठ पर्वत है। उस पर्वतसे ‘सूर्यावर्त’ नामकी एक नदी प्रवाहित होती है। वहाँ भगवान् सूर्यका निवासस्थान है। वहाँकी प्रजा सूर्योपासक एवं दस हजार वर्ष आयुवाली तथा सूर्यके ही समान वर्णकी होती है। ‘सूर्यद्वीप’से चार हजार योजनकी दूरीपर पश्चिममें भद्राकारनामक द्वीप है। यह द्वीप समुद्री देशमें है। इसका क्षेत्रफल एक सहस्र योजन है। वहाँ पवनदेवका रत्नजटिल दिव्य मन्दिर है। जिसे लोग ‘भद्रासन’ कहते हैं। पवनदेव अनेक प्रकारका रूप धारणकर यहाँ निवास करते हैं। यहाँकी प्रजा तपे हुए सुवर्णके समान वर्णवाली होती है और इनकी आयु प्रायः पाँच हजार वर्षोंकी होती है। [अध्याय ८३-८४]
१४६ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय ८५
भारतवर्षके नौ खण्डोंका वर्णन
भगवान् रुद्र कहते हैं—विप्रवरो! यह भूमण्डल कमलकी भाँति गोलाकारमें व्यवस्थित है—ऐसा कहा गया है। अब इसके अन्तर्वर्ती नौ उपवर्षों या खण्डोंका वर्णन करता हूँ—सुनो। उनके नाम इस प्रकार हैं—इन्द्रद्वीप, कसेरु, ताम्रवर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, सौम्य, गन्धर्व, वारुण और भारत। ये सभी उपवर्ष समुद्रोंसे घिरे हुए हैं। इनमेंसे एक-एकका प्रमाण हजार योजन है। भारतवर्षमें सात 'कुल'संज्ञक पर्वत हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं—महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान्, ऋक्षगिरि, विन्ध्याचल और परियात्र। इनके अतिरिक्त बहुत-से छोटे-छोटे पर्वत हैं, जिनके नाम यों बताये जाते हैं—मन्दर, शारद, दर्दुर, कैलास, मैनाक, वैद्युत, वारन्थम्, पाण्डुर, तुङ्गप्रस्थ, कृष्णगिरि, जयन्त, ऐरावत, ऋष्यमूक, गोमन्त, चित्रकूट, श्रीपर्वत, चकोरकुट, श्रीशैल और कृतस्थल। इनसे भी कुछ छोटे बहुत-से दूसरे पर्वत हैं, जिनमें आर्य तथा म्लेच्छ लोगोंके जनपद हैं। भारतवासी जिन नदियोंका जल पीते हैं वे हैं—गङ्गा, सिन्धु, सरस्वती, शतद्रु, वितस्ता, विपाशा, चन्द्रभागा, सरयू, यमुना, इरावती, देविका, कुहू, गोमती, धूतपापा, बाहुदा, दृषद्वती, कौशिकी, निश्चीरा, गण्डकी, इक्षुमती और लोहिता आदि। ये सभी नदियाँ हिमालयसे प्रादुर्भूत हुई हैं। 'परियात्र'१ पर्वतसे निकली हुई नदियोंके नाम इस प्रकार हैं—वेदस्मृति, वेदवती, सिन्धु, पर्णाशा, चन्द्रनाभा, नर्मदा, सदानीरा, रोहिणीपारा, चर्मण्वती, विदिशा, वेत्रवती, शिप्रा, अवन्ती और कुन्ती। शोण, ज्योतीरथा, नर्मदा, सुरसा, मन्दाकिनी, दशार्णा, चित्रकूटा, तमसा, पिप्पला, करतोया, पिशाचिका, चित्रोत्पला, विमला, विशाला, वञ्जका, वालुवाहिनी, शुक्तिमती, विरजा, पङ्गिनी और रात्री—ये नदियाँ ऋक्षमान्२ नामक पर्वतसे प्रकट हुई हैं। विन्ध्यपर्वतकी उपत्यकासे निकली हुई नदियोंके नाम ये हैं—मणिजाला, शुभा, तापी, पयोष्णी, निर्विन्ध्या, वेणा, पाशा, वैतरणी, वैदिपाला, कुमुद्वती, तोया, दुर्गा और अन्तःशिला। सह्य-पर्वतसे प्रकट हुई नदियाँ इन नामोंसे विख्यात हैं—गोदावरी, भीमरथी, कृष्णावेणी, वञ्जुला, तुङ्गभद्रा, सुप्रयोगा और बाह्यकावेरी। मलय-गिरिसे निकली हुई नदियाँ कृतमाला, ताम्रपर्णी, पुष्पावती और उत्पलावती नामोंसे विख्यात हैं। महेन्द्रपर्वतसे निकली हुई नदियाँ हैं—त्रिसामा, ऋषिकुल्या, इक्षुला, त्रिदिवा, लाङ्गूलिनी और वंशधरा। ऋषिका, सुकुमारी, मन्दगामिनी, कृपा और पलाशिनी—ये चार नदियाँ शुक्तिमान्३ पर्वतसे प्रवाहित हुई हैं। ये ही सब भारतके 'कुल'पर्वत और प्रधान नदियाँ मानी गयी हैं। इनके अतिरिक्त छोटी-छोटी बहुत-सी नदियाँ हैं। एक लाख योजनवाला यह समग्र भाग 'जम्बूद्वीप' कहलाता है।
[ अध्याय ८५ ]
१-प्रायः अन्य पुराणोंमें इसका नाम 'पारिपात्र' है। यह विन्ध्यका पश्चिमी भाग है, जिसमें अरावलीसहित पठार पर्वतमाला भी सम्मिलित है।
२-यह गोण्डवानासे उड़ीसातक फैला हुआ, विन्ध्यपर्वतमालाका पूर्वी भाग है।
३-यह विन्ध्यपर्वतमालाका मध्यवर्ती भाग है (पार्जीटर, नन्दलाल दे आदि)। शुक्तिमती नदी भी इसीसे निकलती है।
८२-महिषासुरका वध
अध्याय ८६-८७ ] शाक एवं कुश-द्वीपोंका वर्णन १४७
शाक एवं कुश-द्वीपोंका वर्णन
भगवान् रुद्र कहते हैं—अब आपलोग शाकद्वीपका वर्णन सुनें। जम्बूद्वीप अपने दूने परिमाणके लवण-समुद्रद्वारा आवृत है। गोलाईमें भी यही जम्बूद्वीपके दूने परिमाणमें है। यहाँके निवासी बड़े पवित्र और दीर्घजीवी होते हैं। दरिद्रता, बुढ़ापा और व्याधिका उन्हें पता नहीं रहता। इस शाकद्वीपमें भी सात ही कुलपर्वत हैं। इस द्वीपके दोनों ओर समुद्र हैं—एक ओर लवणसमुद्र और दूसरी ओर क्षीरसमुद्र। वहाँ पूर्वमें फैला हुआ महान् पर्वत उदयाचलके नामसे प्रसिद्ध है। उसके ऊपर (पश्चिम) भागमें जो पर्वत है, उसका नाम 'जलधार' है। उसीको लोग 'चन्द्रगिरि' भी कहते हैं। इन्द्र वहींसे जल लेकर (संसारमें) वर्षा करते हैं। उसके बाद 'श्वेतक'-नामक पर्वत है। उसके अन्तर्गत छः छोटे-छोटे दूसरे पर्वत हैं। वहाँकी प्रजा इन पर्वतोंपर अनेक प्रकारसे मनोरञ्जन करती है। उसके बाद रजतगिरि है। उसीको जनता शाकगिरि भी कहती है। उसके बाद 'आम्बिकेय'पर्वत है, जिसे लोग 'विभ्राजक' तथा केसरी भी कहते हैं। वहींसे वायुका प्रवाह आरम्भ होता है। जो कुलपर्वतोंके नाम हैं, उन्हीं नामोंसे वहाँके वर्षों या खण्डोंकी भी प्रसिद्धि है। वे कुलपर्वत इस प्रकार हैं—उदय, सुकुमार, जलधार, क्षेमक और महाद्रुम। पर्वतोंके दूसरे-दूसरे नाम भी हैं। उसके मध्यमें शाक नामका एक वृक्ष है। वहाँ सात बड़ी-बड़ी नदियाँ हैं। एक-एक नदीके दो-दो नाम हैं। ये हैं—सुकुमारी, कुमारी, नन्दा, वेणिका, धेनु, इक्षुमती और गभस्ति।
भगवान् रुद्र कहते हैं—अब आपलोग कुश नामक तीसरे द्वीपका वर्णन सुनें। यह द्वीप विस्तारमें शाकद्वीपसे दूने परिमाणवाला है। क्षीरसमुद्रके चारों ओर कुशद्वीप है। यहाँ भी सात कुलपर्वत हैं। उन सभी पर्वतोंके एक-एकके दो-दो नाम हैं। जैसे—कुमुदपर्वत, इसीका दूसरा नाम 'विद्रुम' भी है। इसी प्रकार दूसरा पर्वत उन्नत भी हेम नामसे विख्यात है, तीसरा पर्वत द्रोण या पुष्पवान् नामसे विख्यात है, चौथा कङ्क या कुश है, पाँचवाँ पर्वत ईश या अग्निमान् है, छठा पर्वत महिष या हरि है। इसपर अग्निका निवास है और सातवाँ ककुध्र या मन्दर है। ये पर्वत कुशद्वीपमें व्यवस्थित हैं।
इन पर्वतोंसे विभाजित भूभाग ही विभिन्न वर्ष या खण्ड हैं। उनमें एक-एक वर्षके दो-दो नाम हैं। जैसे—कुमुदपर्वतसे सम्बन्धित वर्ष श्वेत या उद्भिद् कहा जाता है। उन्नतगिरिका वर्ष लोहित या वेणुमण्डल नामसे विख्यात है। वलाहक-पर्वतका वर्ष जीमूत या रथाकर नामसे भी प्रसिद्ध है। द्रोणगिरिके पासके वर्षको कुछ लोग हरिवर्ष कहते हैं और दूसरे बलाधन। यहाँ भी सात नदियाँ हैं। उनमें प्रत्येक नदीके भी दो-दो नाम हैं। जैसे—पहली नदी 'प्रतोया' है। उसीका दूसरा नाम 'प्रवेशा' है। दूसरी नदी 'शिवा' नामसे विख्यात है, जिसका एक नाम 'यशोदा' भी है। तीसरी नदीको 'चित्रा' कहते हैं। उसीकी एक संज्ञा 'कृष्णा' है। चौथी 'ह्रादिनी'को लोग 'चन्द्रा' भी कहते हैं। पाँचवीं नदी 'विद्युल्लता' नामसे प्रसिद्ध है। इसका दूसरा नाम 'शुक्ला' है। छठी नदी 'वर्णा' कहलाती है। उसका एक नाम 'विभावरी' भी है। सातवीं नदीकी संज्ञा 'महती' है। इसीको लोग 'धृति' भी कहते हैं। ये सभी नदियाँ अपना प्रधान स्थान रखती हैं। यहाँ अन्य
१४८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय ८८-८९
छोटी-छोटी बहुत-सी नदियाँ हैं। यह कुशद्वीपके अवान्तर भागका वर्णन है। शाकद्वीप शास्त्रोंमें इसके दूने उपकरणोंसे युक्त है, प्रायः ऐसी बात कही जाती है। कुशद्वीपके मध्यमें एक बहुत बड़ी कुशकी झाड़ी है। इसलिये इसका नाम 'कुशद्वीप' पड़ा। अमृतकी तुलना करनेवाले दधिमण्डोद-समुद्रसे, जो मानमें 'क्षीरसमुद्र' का दुगुना है, घिरा हुआ है। [अध्याय ८६-८७]
क्रौञ्च और शाल्मलिद्वीपका वर्णन
भगवान् रुद्र बोले— अब आपलोग क्रौञ्चद्वीपका वर्णन सुनें। द्वीपोंके क्रममें यह चौथा द्वीप है। इसका परिमाण कुशद्वीपसे दुगुना है। वहाँ एक समुद्र है, जिसे दुगुने परिमाण-वाले इस क्रौञ्चद्वीपने घेर रखा है। उस द्वीपमें सात प्रधान पर्वत हैं। पहला जो क्रौञ्च है, उसे लोग 'विद्युल्लता', 'रैवत' और 'मानस' भी कहते हैं। अन्य पर्वतोंके दो-दो नाम हैं। जैसे—पावन-अन्धकार, अच्छोदक-देवावृत, सुराप-देविष्ठ, काञ्चनशृङ्ग-देवनन्द, गोविन्द-द्विविन्द और पुण्डरीक-तोयासह। ये सातों रत्नमय पर्वत क्रौञ्चद्वीपमें स्थित हैं, जो एक-से-एक अधिक ऊँचे हैं।
अब वहाँके वर्षोंका वर्णन करता हूँ, उसे सुनो। इस क्रौञ्चद्वीपके वर्ष भी दो-दो नामोंसे पुकारे जाते हैं। जैसे—कुशल-माधव, वामक-संवर्तक, उष्णवान्-सप्रकाश, पावनक-सुदर्शन, अन्धकार-संमोह, मुनिदेश-प्रकाश और दुन्दुभि-अनर्थ आदि। वहाँ नदियाँ भी सात ही हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं—गौरी, कुमुद्वती, संध्या, रात्रि, मनोजवा, ख्याति और पुण्डरीका। ये सातों नदियाँ विभिन्न स्थानोंपर भिन्न नामोंसे पुकारी जाती हैं। गौरीको कहीं पुष्पवहा, कुमुद्वतीको आर्द्रवती, रौद्राको संध्या, सुखावहाको भोगजवा, क्षिप्रोदाको ख्याति और बहुलाको पुण्डरीका कहते हैं। देशके वर्ण-वैचित्र्यसे प्रभावित अनेकों छोटी-छोटी नदियाँ हैं। इस क्रौञ्चद्वीपके चारों तरफ घृत-समुद्र है, जो शाल्मलिद्वीपसे घिरा है।
भगवान् रुद्र कहते हैं— इस प्रकार चार द्वीपोंका वर्णन हो चुका, अब आपलोग पाँचवें द्वीप तथा वहाँके निवासियोंका वर्णन सुनें। यह पाँचवाँ 'शाल्मलिद्वीप' परिमाणमें 'क्रौञ्चद्वीप' से दुगुना बड़ा है। यह द्वीप घृत-समुद्रके चारों ओर फैला हुआ है। घृत-समुद्रसे विस्तारमें यह दूना है। वहाँ सात प्रधान पर्वत और उतनी ही नदियाँ हैं। सभी पर्वत पीले सुवर्णमय हैं तथा उनके नाम हैं—सर्वगुण, सौवर्णरोहित, सुमनस्, कुशल, जाम्बूनद और वैद्युत। ये कुलपर्वत कहलाते हैं। इन्हींके नामसे यहाँके सात वर्ष या खण्ड प्रसिद्ध हैं। अब छठे गोमेदद्वीपका वर्णन किया जाता है। जिस प्रकार शाल्मलिद्वीप 'सुरोद' से घिरा हुआ है, वैसे ही 'सुरोद' भी अपने दुगुने परिमाणवाले 'गोमेद' से घिरा है। वहाँ दो ही प्रधान पर्वत हैं, जिनमें एकका नाम अवसर और दूसरेका नाम कुमुद है। यहाँ ईखके रसका समुद्र है। उस समुद्रसे दूने विस्तारमें पुष्करद्वीप है, जिससे वह घिर-सा गया है। वहाँ उस पुष्करपर ही मानस नामका एक पर्वत है। उसके भी दो भाग हो गये हैं। वे दोनों भाग बराबर-बराबर प्रमाणमें एक-एक वर्ष बन गये हैं। उसके सभी भागोंमें मीठा जल मिलता है। इसके बाद अब कटाहका वर्णन किया जाता है। यह पृथ्वीका प्रमाण हुआ। ब्रह्माण्डकी लम्बाई-चौड़ाई कटाह (कड़ाहे)-की
अध्याय ९० ] त्रिशक्ति-माहात्म्य और सृष्टिदेवीका आख्यान १४९
भाँति है। इस प्रकारके विधान किये हुए ब्रह्माण्ड-मण्डलोंकी संख्या सम्भव नहीं है। यह पृथ्वी महाप्रलयमें रसातलमें चली जाती है। प्रत्येक कल्पमें भगवान् नारायण वराहका रूप धारणकर इसे अपने दाढ़की सहायतासे वहाँसे ऊपर ले आते हैं और उन्हींकी कृपासे यह पृथ्वी समुचित स्थानपर स्थित हो पाती है। द्विजवरो! पृथ्वीकी लम्बाई-चौड़ाईका मान मैंने तुमलोगोंके सामने वर्णन कर दिया। तुम्हारा कल्याण हो। अब मैं अपने निवासस्थान कैलासको जा रहा हूँ।
भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! इस प्रकार कहकर महात्मा रुद्र उसी क्षण कैलासके लिये चल पड़े और सम्पूर्ण देवता और ऋषि भी जहाँसे आये थे, वहाँ जानेके लिये प्रस्थित हो गये।
[अध्याय ८८-८९]
त्रिशक्ति-माहात्म्य * और सृष्टिदेवीका आख्यान
भगवती पृथ्वीने पूछा—भगवन्! कुछ लोग रुद्रको परमात्मा एवं पुण्यमय शिव कहते हैं, इधर दूसरे लोग विष्णुको ही परमात्मा कहते हैं। कुछ अन्य लोग ब्रह्माको सर्वेश्वर बताते हैं। वस्तुतः इनमेंसे कौन-से देवता श्रेष्ठ तथा कौन कनिष्ठ हैं? देव! मेरे मनमें इसे जाननेका कौतूहल हो रहा है। अतः आप इसे बतानेकी कृपा कीजिये।
भगवान् वराह कहते हैं—वरानने! भगवान् नारायण ही सबसे श्रेष्ठ हैं। उनके बाद ब्रह्माका स्थान है। देवि! ब्रह्मासे ही रुद्रकी उत्पत्ति है और वे रुद्र (तपःसाधनाके प्रभावसे) सर्वज्ञ बन गये। उन भगवान् रुद्रके अनेक प्रकारके आश्चर्यमय कर्म हैं। सुन्दरि! मैं उनके चरित्रोंका वर्णन करता हूँ, तुम उन्हें सुनो—
महान् रमणीय एवं नाना प्रकारके विचित्र धातुओंसे सुशोभित कैलास नामका एक पर्वत है, जो भगवान् शूलपाणि त्रिलोचन शिवका नित्य-निवास-स्थल है। एक दिनकी बात है—सम्पूर्ण प्राणिवर्गद्वारा नमस्कृत भगवान् पिनाकपाणि अपने सभी गणोंसे घिरे हुए उस कैलासपर्वतपर विराजमान थे और उनके पासमें ही भगवती पार्वती भी बैठी थीं। इनमेंसे किन्हीं गणोंका मुँह सिंहके समान था और वे सिंहकी ही भाँति गर्जना कर रहे थे। कुछ गण हाथीके समान मुखवाले थे तो कुछ गण घोड़ेकी मुखाकृतिके और कुछके मुख सूँस-जैसे भी थे। उनमेंसे कितने तो गाते, नाचते, दौड़ते और ताली ठोंकते, हँसते-किलकिलाते, गरजते और मिट्टीके ढेलोंको उठाकर परस्पर लड़ रहे थे। कुछ बलके अभिमान रखनेवाले गण मल्लयुद्धके नियमसे लड़ रहे थे। भगवान् रुद्रका देवी पार्वतीके साथ हास-विलास भी चल रहा था, इतनेमें ही अविनाशी ब्रह्माजी भी देवताओंके साथ वहाँ पहुँच आये। उन्हें आया देखकर भगवान् शिवने उनकी विधिपूर्वक पूजा की और उनसे पूछा—'ब्रह्मन्! आप इस समय यहाँ कैसे पधारे? और आपके मनमें यह घबड़ाहट कैसी है?'
ब्रह्माजीने कहा—'अन्धक' नामके एक महान्
* 'वराहपुराण' का यह आख्यान बहुत प्रसिद्ध है। भास्कररायने 'ललितासहस्रनाम'—'सौभाग्य भास्करभाष्य'के पृ० ११७, १३३, १३६, १४५—५०, १५४ (३ बार), १६१ आदिपर तथा 'सेतुबन्ध'में भी पग-पगपर इस ('त्रिशक्तिमाहात्म्य')-के श्लोकोंको उद्धृत किया है।
८३-'त्रिशक्तिमाहात्म्य'में रौद्रीव्रत
१५० संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय ९०
दैत्यने सभी देवताओंको अत्यन्त पीड़ित कर रखा है। उससे त्राण पानेकी इच्छासे शरण खोजते हुए सभी देवता मेरे पास पहुँचे। तब मैंने इन लोगोंसे कहा कि 'हम सब लोग भगवान् शंकरके पास चलें।' देवेश! इसी कारण हम सभी यहाँ आये हुए हैं।
इस प्रकार कहकर ब्रह्माजी पिनाकपाणि भगवान् रुद्रकी ओर देखने लगे। साथ ही उन्होंने उसी क्षण परम प्रभु भगवान् नारायणको भी अपने मनमें स्मरण किया। बस, तत्क्षण भगवान् नारायण—ब्रह्मा एवं रुद्र—इन दोनों देवताओंके बीचमें विराजमान हो गये। अब ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्र—ये तीनों ही परस्पर प्रेमपूर्वक दृष्टिसे देखने लगे। उस समय उन तीनोंकी जो तीन प्रकारकी दृष्टियाँ थीं, अब एकरूपमें परिणत हो गयीं और इससे तत्काल एक कन्याका प्रादुर्भाव हुआ, जिसका स्वरूप परम दिव्य था। उसके अङ्ग नीले कमलके समान श्यामल थे तथा उसके सिरके बाल भी नीले घुँघुराले एवं मुड़े थे। उसकी नासिका, ललाट और मुखकी सुन्दरता असीम थी। विश्वकर्माने शास्त्रोंमें जो अग्निजिह्वके अङ्ग-लक्षण बतलाये हैं, वे सभी लक्षण सुन्दर प्रतिष्ठा पानेवाली उस कुमारी कन्यामें एकत्र दिखायी देते थे। अब ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर—इन तीनों देवताओंने उस दिव्य कन्याको देखकर पूछा—'शुभे! तुम कौन हो? और विज्ञानमयि! देवि! तुम क्या करना चाहती हो?' इसपर शुक्ल, कृष्ण एवं रक्त—इन तीन वर्णोंसे सुशोभित उस कन्याने कहा—'देवश्रेष्ठो! मैं तो आपलोगोंकी दृष्टिसे ही उत्पन्न हुई हूँ। क्या आपलोग अपनेसे ही उत्पन्न अपनी पारमेश्वरी शक्ति मुझ कन्याको नहीं जानते?'
इसपर ब्रह्मा आदि तीनों देवताओंने अत्यन्त प्रसन्न होकर उस दिव्य कुमारीको वर दिया—'देवि! तुम्हारा नाम 'त्रिकला' होगा। तुम विश्वकी सर्वदा रक्षा करोगी। महाभागे! गुणोंके अनुसार तुम्हारे अन्य भी बहुत-से नाम होंगे और उन नामोंमें सम्पूर्ण कार्योंको सिद्ध करनेकी शक्ति होगी। सुन्दर मुख एवं अङ्गोंसे शोभा पानेवाली देवि! तुममें जो ये तीन वर्ण दिखायी पड़ते हैं, तुम इनसे अपनी तीन मूर्तियाँ बना लो।'
देवताओंके इस प्रकार कहनेपर उस कुमारीने अपने श्वेत, रक्त और श्यामल रंगसे युक्त तीन शरीर बना लिये। ब्रह्माके अंशसे 'ब्राह्मी' (सरस्वती) नामक मङ्गलमयी सौम्यरूपिणी शक्ति उत्पन्न हुई, जो प्रजाओंकी सृष्टि करती है। सूक्ष्म कटिभाग, सुन्दररूप तथा लाल वर्णवाली जो दूसरी कन्या थी, वह 'वैष्णवी' कहलायी। उसके हाथमें शङ्ख एवं चक्र सुशोभित हो रहे थे। वह विष्णुकी कला कही जाती है तथा अखिल विश्वका पालन करती है, जिसे विष्णुमाया भी कहते हैं। जो काले रंगसे शोभा पानेवाली रुद्रकी शक्ति थी और जिसने हाथमें त्रिशूल ले रखा था तथा जिसके दाँत बड़े विकराल थे, वह जगत्का संहार-कार्य करनेवाली 'रुद्राणी' है। ब्रह्मासे प्रकट हुई श्वेत वर्णवाली कन्या 'विभावरी' कहलाती है। उस कुमारीके नेत्र खिले हुए कमलके समान सुन्दर थे। वह ब्रह्माजीके परामर्शसे अन्तर्धान होकर सर्वज्ञता प्राप्त करनेकी अभिलाषासे श्वेतगिरिपर तपस्या करनेके लिये चली गयी और वहाँ पहुँचकर उसने तीव्र तप आरम्भ कर दिया। इधर जो कुमारी भगवान् विष्णुके अंशसे अवतरित हुई थी, वह भी अत्यन्त कठोर तपस्या करनेका संकल्प लेकर मन्दराचल पर्वतपर चली गयी। तीसरी जो श्यामलवर्णकी कन्या थी तथा जिसके नेत्र बड़े विशाल और दाढ़ भयंकर थे तथा जो रुद्रके
अध्याय ९१-९२] त्रिशक्ति-माहात्म्यमें 'सृष्टि', 'सरस्वती' तथा 'वैष्णवी' देवियोंका वर्णन १५१
अंशसे उत्पन्न हुई थी, वह कल्याणमयी कुमारी तपस्या करनेके उद्देश्यसे 'नीलगिरि' पर चली गयी।
कुछ समयके पश्चात् प्रजापति ब्रह्माजी प्रजाओंकी सृष्टिमें तत्पर हुए, पर बहुत समयतक प्रयास करनेपर भी प्रजाकी वृद्धि नहीं हुई। अब वे मन-ही-मन सोचने लगे कि क्या कारण है कि मेरी प्रजा बढ़ नहीं रही है। (भगवान् वराह पृथ्वीसे कहते हैं) सुव्रते! अब ब्रह्माजीने योगाभ्यासके सहारे अपने हृदयमें ध्यान लगाया तो श्वेतपर्वतपर स्थित 'सृष्टि' कुमारीकी तपस्याकी बात उनकी समझमें आ गयी। उस समय तपस्याके प्रभावसे उस कन्याके सम्पूर्ण पाप दग्ध हो चुके थे। फिर तो ब्रह्माजी कमलके समान नेत्रवाली वह दिव्य कुमारी जहाँ विराजमान थी, वहाँ पहुँचकर उस तपस्विनी दिव्य कुमारीको देखा और साथ ही वे ये वचन बोले—'कमनीय कान्तिवाली कल्याणि! तुम प्रधान कार्यकी अवहेलना करके अब तपस्या क्यों कर रही हो? विशाल नेत्रोंवाली कन्यके! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। तुम वर माँग लो।'
'सृष्टि' देवीने कहा—'भगवन्! मैं एक स्थानपर नहीं रहना चाहती, इसलिये मैं आपसे यह वर माँगती हूँ कि मैं सर्वत्रगामिनी बन जाऊँ।' जब सृष्टिदेवीने प्रजापति ब्रह्मासे ऐसी बात कही, तब उन्होंने उससे कहा—'देवि! तुम सभी जगह जा सकोगी और सर्वव्यापिनी होगी। ब्रह्माजीके ऐसा कहते ही कमलके समान नेत्रोंवाली वह 'सृष्टि' देवी उन्हींके अङ्गमें लीन हो गयी। अब ब्रह्माजीकी सृष्टि बड़ी तेजीसे बढ़ने लगी और फिर शीघ्र ही उनके सात मानसपुत्र हुए। उन पुत्रोंसे भी अन्य संतानोंकी उत्पत्ति हुई। फिर उनसे बहुत-सी प्रजाएँ उत्पन्न हुईं। इसके बाद स्वेदज, उद्भिज्ज, जरायुज और अण्डज—इन चार प्रकारके प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई। फिर तो चर-अचर प्राणियोंकी सृष्टिसे यह सारा विश्व ही भर गया। यह सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गमात्मक जगत् तथा सारा वाङ्मय विश्व—इन सबकी रचनामें उस 'सृष्टि'देवीका ही हाथ है। उसीने भूत, भविष्य और वर्तमान—इन तीनों कालोंकी भी व्यवस्था की।'
[अध्याय ९०]
त्रिशक्ति-माहात्म्यमें 'सृष्टि', 'सरस्वती' तथा 'वैष्णवी' देवियोंका वर्णन
भगवान् वराह कहते हैं—सुन्दर अङ्गोंसे शोभा पानेवाली वसुंधरे! उस 'सृष्टिदेवी'का दूसरा विधान भी बहुत विस्तृत है, उसे बताता हूँ, सुनो—परमेष्ठी रुद्रके द्वारा जो वह तीन शक्तिवाली देवी बतायी गयी है, उसके प्रकरणमें सर्वप्रथम श्वेत वर्णवाली सृष्टिदेवीका प्रसङ्ग आया है। वह सम्पूर्ण अक्षरोंसे युक्त होनेपर भी 'एकाक्षरा' कहलाती है। यह देवी कहीं तो 'वागीशा' और कहीं 'सरस्वती' कही जाती है और कहीं वह 'विश्वेश्वरी' और 'अमिताक्षरा' नामसे भी प्रसिद्ध है। कुछ स्थलोंमें उसीको 'ज्ञाननिधि' अथवा 'विभावरी' देवी भी कहते हैं। अथवा वरानने! जितने भी स्त्रीवाची नाम हैं, वे सभी उसके नाम हैं, ऐसा समझना चाहिये।
विष्णुके अंशवाली 'वैष्णवी' देवीका वर्ण लाल है। उनकी आँखें बड़ी-बड़ी हैं तथा उनका रूप अत्यन्त मनोहर है। ये दोनों शक्तियाँ तथा तीसरी जो रुद्रके अंशसे अभिव्यक्त रौद्रीशक्ति है, भगवान् रुद्रको जाननेवालेके लिये एक साथ सिद्ध हो जाती है। देवी वसुंधरे! यह सर्वरूपमयी देवी एक ही है, परंतु (वह एक ही यहाँ इस प्रकार) तीन भेदोंसे निर्दिष्ट है। सुन्दरि! मैंने तुम्हारे सामने
| १५२ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय ९१-९२ |
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इसी सनातनी सृष्टि देवीका वर्णन किया है। स्थावर-जङ्गममय यह अखिल जगत् उस सृष्टि देवीसे ओतप्रोत है। जो यह सृष्टि देवी है, जिससे आदिकालमें अव्यक्तजन्मा ब्रह्माकी सृष्टिका सम्बन्ध हुआ था, उसकी (महिमाको जानकर) पितामह ब्रह्माने उचित शब्दोंमें (इस प्रकार) स्तुति की थी।
**ब्रह्माजी बोले—**देवि! तुम सत्यस्वरूपा, सदा अचल रहनेवाली, सबको आश्रय देनेमें कुशल, अविनाशी, सर्वव्यापी, सबको जन्म देनेवाली, अखिल प्राणियोंपर शासन करनेमें परम समर्थ, सर्वज्ञ, सिद्धि-बुद्धिरूपा तथा सम्पूर्ण सिद्धियोंको प्रदान करनेवाली हो। सुन्दरि! तुम्हारी जय हो! देवि! ओंकार तुम्हारा स्वरूप है, तुम उसमें सदा विराजती हो, वेदोंकी उत्पत्ति भी तुमसे ही हुई है। मनोहर मुखवाली देवि! देवता, दानव, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, पशु और वीरुध (वृक्ष-लता आदि)—इन सबका जन्म तुम्हारी ही कृपासे होता है। तुम्हीं विद्या, विद्येश्वरी, सिद्धा और सुरेश्वरी हो।'
**भगवान् वराह कहते हैं—**वसुंधरे! जो वैष्णवी देवी तपस्या करनेके लिये मन्दराचल पर्वतपर गयी थी, अब उसका वर्णन सुनो—उस देवीने कौमारव्रत धारणकर विशाल-क्षेत्रमें एकाकी रहकर कठोर तप आरम्भ किया। बहुत दिनोंतक तपस्या करनेके पश्चात् उस देवीके मनमें विक्षोभ उत्पन्न हुआ, जिससे अन्य बहुत-सी कुमारियाँ उत्पन्न हो गयीं; उनके नेत्र बड़े सुन्दर एवं बाल काले और घुँघराले थे। उनके होठ बिम्बाफलके समान लाल थे और आँखें बड़ी-बड़ी थीं और उन कन्याओंके शरीरसे दिव्य प्रकाश फैल रहा था। ऐसी करोड़ों कुमारियाँ उस वैष्णवी देवीके शरीरसे प्रकट हुई थीं, फिर उस देवीने उन कुमारियोंके लिये सैकड़ों नगर और ऊँचे महलोंका निर्माण किया। उन भवनोंके भीतर मणियोंकी सीढ़ियाँ, अनेक जलाशय एवं छोटे-छोटे सुन्दर उपवन थे। उस मन्दराचलपर स्थित उन असंख्य भवनोंमें अब वे कन्याएँ निवास करने लगीं। शोभने! उनमेंसे प्रधान-प्रधान कुछ कन्याओंके नाम इस प्रकार हैं—विद्युत्प्रभा, चन्द्रकान्ति, सूर्यकान्ति, गम्भीरा, चारुकेशी, सुजाता, मुञ्जकेशिनी, उर्वशी, शशिनी, शीलमण्डिता, चारुकन्या, विशालाक्षी, धन्या, चन्द्रप्रभा, स्वयम्प्रभा, चारुमुखी, शिवदूती, विभावरी, जया, विजया, जयन्ती और अपराजिता। इन देवियोंने भगवती वैष्णवीके अनुचरियोंका स्थान ग्रहण कर लिया। इतनेमें ब्रह्माके पुत्र तपोधन नारदजी एक दिन वहाँ अचानक आ गये। उन्हें देखकर वैष्णवीदेवीने विद्युत्प्रभासे कहा—तुम इन्हें यह आसन दो तथा पैर धोने और आचमन करनेके लिये जल भी बहुत शीघ्र इनके पास उपस्थित कर दो।
इस प्रकार वैष्णवी देवीके कहनेपर विद्युत्प्रभाने मुनिवर नारदको आसन, पाद्य और अर्घ्य निवेदन किया और वे भी देवीको नमस्कारकर आसनपर बैठ गये। अब वैष्णवीने उनसे कहा—'मुनिवर! इस समय आप किस लोकसे यहाँ पधारे हैं और आपका क्या कार्य है? नारदमुनिने कहा—'कल्याणि! मैं पहले ब्रह्मलोकमें गया था, फिर वहाँसे इन्द्रलोकमें और फिर कैलासपर्वतपर पहुँचा। देवेश्वरि! पुनः मेरे मनमें आपके दर्शनकी इच्छा हुई, अतः यहाँ आ गया। इस प्रकार कहकर श्रीमान् नारद मुनि वैष्णवी देवीकी ओर देखने लगे। नारद आश्चर्यसे चकित हो गये! उन्होंने मनमें सोचा। 'अहो! इनका रूप तो बड़ा विचित्र है। इनकी सुन्दरता, धीरता एवं कान्ति कैसी आश्चर्यकारिणी है। फिर इतनेपर भी इनकी उपरति—निष्कामता तो और ही आश्चर्यदायिनी है। यह सब देख नारदजी फिर कुछ खिन्न-से हो गये तथा सोचने लगे—'देवता,
८४-रुद्रके माहात्म्यका वर्णन
अध्याय ९३-९४] महिषासुरकी मन्त्रणा और देवासुर-संग्राम १५३
गन्धर्व, सिद्ध, यक्ष, किंनर और राक्षसोंकी स्त्रियोंमें भी कोई इतना सुन्दर नहीं है। विश्वकी अन्य स्त्रियोंमें भी कहीं ऐसा रूप नहीं दीखता।
फिर नारदजी सहसा उठे और वैष्णवीदेवीको प्रणामकर आकाश मार्गद्वारा समुद्रमें स्थित महिषासुरकी राजधानीमें पहुँच गये। उसने ब्रह्माजीके वरप्रसादसे सारी देव-सेनाको पराजित कर दिया था। महिषासुरने सभी लोकोंमें विचरण करनेवाले नारदमुनिको आये देखकर बड़ी श्रद्धा-भक्तिसे पूजा की।
नारदमुनिने उस असुरसे कहा—असुरेन्द्र ! सावधान होकर सुनो। विश्वमें रत्नके समान एक कन्या प्रकट हुई है। तुमने तो वरदानके प्रभावसे चर-अचर तीनों लोकोंको अपने वशमें कर लिया है। दैत्य! मैं ब्रह्मलोकसे मन्दराचलपर गया, वहाँ मैंने देवीकी वह पुरी देखी, जो सैकड़ों कन्याओंसे व्याप्त है। उनमें जो सबसे प्रधान है वैसी देवताओं, दैत्यों और यक्षोंके यहाँ भी कोई सुन्दरी कन्या नहीं दिखायी देती। कहाँतक कहूँ, मैंने उसकी जैसी सुन्दरता देखी है तथा उसमें जितना सतीत्वका प्रभाव है, ऐसी कन्या समस्त ब्रह्माण्डमें भी कभी कहीं नहीं देखी। देवता, गन्धर्व, ऋषि, सिद्ध, चारण तथा सब अन्य दैत्योंके अधिपति भी उसी कन्याकी उपासना करते हैं। पर देवताओं और गन्धर्वोंपर जो विजय प्राप्त करनेमें समर्थ न हो, ऐसा कोई भी व्यक्ति उस कन्याको जीतनेमें समर्थ नहीं है।
वसुंधरे ! इस प्रकार कहकर नारद मुनि क्षणभर वहाँ ठहरकर फिर महिषासुरसे आज्ञा लेकर तुरंत वहाँसे प्रस्थित हो गये और वे जिधरसे आये थे, उधर ही आकाशकी ओर चले गये।
[अध्याय ९१-९२]
महिषासुरकी मन्त्रणा और देवासुर-संग्राम
भगवान् वराह बोले— नारदजीके चले जानेपर महिषासुर सदा चकितचित्तसे उसी कन्याका ध्यान करने लगा। अतः उसे तनिक भी कहीं चैन न था। अब उसने अपने मन्त्रिमण्डलको बुलाया। उसके आठ मन्त्री थे, जो सभी शूरवीर, नीतिमान् एवं बहुश्रुत थे। वे थे—प्रघस, विघस, शङ्कुकर्ण, विभावसु, विद्युन्माली, सुमाली, पर्जन्य और क्रूर। वे महिषासुरके पास आकर बोले कि 'हमलोगोंके लिये जो सेवाकार्य हो, आप उसकी तुरंत आज्ञा कीजिये।' उनकी बात सुनकर दैत्योंका शासक पराक्रमी महिषासुर बोला—'नारदजीके कथनानुसार मैंने एक कन्याको पानेके लिये तुमलोगोंको यहाँ बुलाया है। मन्त्रियो! देवर्षि नारदने मुझे एक लड़कीकी बात बतायी है; किंतु देवताओंके स्वामी इन्द्रको जीते बिना उसकी प्राप्ति सम्भव नहीं है। अब आप सब लोग विचारकर शीघ्र बतायें कि वह कन्या किस प्रकार सुलभ होगी और देवता कैसे पराजित होंगे?'
महिषासुरके ऐसा कहनेपर सभी मन्त्री अपना-अपना मत बतलाने लगे। प्रघस बोला—'दैत्यवर! आपसे नारदमुनिने जिस कन्याकी बात कही है, वह महान् सती है। उसका नाम 'वैष्णवी' देवी है। उस सुन्दर रूप धारण करनेवाली देवीको पराशक्ति कहा जाता है। जो गुरुकी पत्नी, राजाकी रानी तथा सामन्त, मन्त्री या सेनापतिकी स्त्रियोंके अपहरणकी इच्छा करता है, वह राजा शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। प्रघसके इस प्रकार कहनेपर विघसने कहा—'राजन्! उस देवीके विषयमें प्रघसने सत्य बात ही बतलायी है। यदि सब लोगोंका एक मत हो जाय और बुद्धि इस बातका समर्थन करे तो सर्वप्रथम
८५-सत्यतपाका शेष वृत्तान्त
१५४ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय ९३-९४
हमें उस कन्याका वरण ही करना चाहिये। परंतु स्वच्छन्दतापूर्वक उसका बलात् अपहरण या अपकर्षण कदापि ठीक नहीं है। मन्त्रिवरो! यदि मेरी बात आपलोगोंको रुचे तो हम सभी मन्त्री उस देवीके पास चलकर प्रार्थना करें। पहले साम-नीतिसे ही काम लेना चाहिये। यदि इससे काम न बने तो हमलोगोंको दानका आश्रय लेना चाहिये। इतनेपर भी काम न बने तो भेद-नीतिका सहारा लिया जाय और यदि इतनेपर भी काम न बने, तो अन्तमें दण्डका प्रयोग करना चाहिये। इस क्रमसे नीतियोंका प्रयोग करनेपर भी यदि वह कन्या न मिल सके तो हम सभी लोग अपने अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित होकर चलें और फिर बलपूर्वक उसे देवताओंसे छीन लें।
विघसके इस प्रकार कहनेपर अन्य मन्त्री बोले, उस सुन्दरी कन्याके विषयमें विघसने जो बात कही है, वह बहुत ही युक्त है। हमलोग यथाशीघ्र वही करें। अब शास्त्रोंके जानकार, नीतिज्ञ, पवित्र और शक्तिसम्पन्न एक दूतको वहाँ भेज दिया जाय। दूतके द्वारा उसके रूप, पराक्रम, शौर्य-गर्व, बल, बन्धुओंके सहयोग, सामग्री, रहनेके साधन आदिकी जानकारी प्राप्तकर उस देवीको प्राप्त करनेके लिये प्रयत्न करना चाहिये।
जब विघसने सभामें यह बात कही तो सब लोग उसे ‘साधु-साधु’ (बहुत ठीक) कहने लगे। सुन्दरि! तदनन्तर सभी मन्त्रियोंने मन्त्रिश्रेष्ठ विघसकी प्रशंसा की और साथ ही उस देवीको देखनेके लिये सभी लक्षणोंसे युक्त ‘विद्युत्प्रभनामक’ दूतको भेजा। इधर महिषासुरके मन्त्रियोंने मन्त्रिमण्डलकी पुनः बैठक बुलायी और परस्पर परामर्शकर उसे उस कन्याको शीघ्र प्राप्त करनेके लिये देवताओंपर आक्रमणकर विजय प्राप्त करनेकी सलाह दी। महिषकी सेनामें उस समय नौ पद्मकी संख्यामें असुर योद्धा थे। उसने अपने सेनापति विरूपाक्षको ससैन्य युद्धके लिये प्रस्थान करनेकी आज्ञा दी।
भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! इस सारी सेनाके साथ इच्छानुसार रूप धारण करनेवाला महान् पराक्रमी महिषासुर हाथीपर सवार होकर मन्दराचल पर्वतपर पहुँचा। उसके वहाँ पहुँचते ही देवसमुदायमें भगदड़ मच गयी। सभी असुरसैनिकोंने अपने-अपने शस्त्रों और वाहनोंके साथ गम्भीर गर्जना करते हुए देवताओंपर आक्रमण कर दिया। उनका तुमुल युद्ध देखकर रोंगटे खड़े हो जाते थे। अञ्जनके समान काले नीलकुक्षि, मेघवर्ण, बलाहक, उदाराक्ष, ललाटाक्ष, सुभीम, भीमविक्रम और स्वर्भानु—इन आठ दैत्योंने मोर्चेपर वसुओंको मारना आरम्भ किया। इधर ध्वाङ्क्ष, ध्वस्तकर्ण, शङ्कुकर्ण, वज्रके समान कठोर अङ्गों-वाला ज्योतिर्वीर्य, विद्युन्माली, रक्ताक्ष, भीमदंष्ट्र, विद्युज्जिह्व, अतिकाय, महाकाय, दीर्घबाहु और कृतकान्त—ये प्रधान गिने जानेवाले बारह दैत्य युद्ध-भूमिमें आदित्योंकी ओर दौड़े। काल, कृतान्त, रक्ताक्ष, हरण, मृगहा, नल, यज्ञहा, ब्रह्महा, गोघ्न, स्त्रीघ्न और संवर्तक—इन ग्यारह दैत्योंने रुद्रोंपर चढ़ाई कर दी। महिषासुर भी उन देवताओंकी ओर बड़े वेगसे दौड़ा। इस प्रकार आदित्यों, वसुओं और रुद्रोंके साथ अगणित संख्यामें असुर और राक्षस लड़ने लगे। उस युद्धभूमिमें असुरोंके द्वारा देवताओंके सैनिक बड़े परिमाणमें नष्ट हो गये। अन्तमें देवताओंकी सेना भग्न हो गयी और इन्द्र तथा सम्पूर्ण देवता उस युद्ध-भूमिमें ठहर न सके। दानवोंने उन्हें अनेक प्रकारके शस्त्रों, शूलों, पट्टिशों और मुद्गरोंसे अर्दित कर दिया था। अन्तमें दानवोंसे पीड़ित होकर ये सभी देवता ब्रह्माजीके लोकमें गये। [अध्याय ९३-९४]
अध्याय ९५ ] महिषासुरका वध १५५
महिषासुरका वध
भगवान् वराह बोले—वसुधे! अब इधर विद्युत्प्रभ नामक दैत्य भी महिषासुरको प्रणामकर चला और उसके दूतके रूपमें भगवती वैष्णवीके पास पहुँचा, जहाँ वे सैकड़ों अन्य कुमारियोंके साथ बैठी थीं। फिर बिना किसी शिष्टाचारके ही उसने उनसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया।
विद्युत्प्रभ बोला—‘‘देवि! पूर्व समयकी बात है—सृष्टिके प्रारम्भमें सुपार्श्व नामक एक अत्यन्त ज्ञानी ऋषि थे। उनका जन्म सरस्वती-नदीके तटवर्ती देशमें हुआ था। सिन्धुद्वीप नामसे प्रसिद्ध उनके मित्र भी उन्हींके समान तेजस्वी एवं प्रतापी थे। माहिष्मती नामकी उत्तम पुरीमें उन्होंने निराहारका नियम लेकर कठिन तपस्या प्रारम्भ कर दी। विप्रचित्ति नामक दैत्यकी माहिष्मती नामकी कन्या बड़ी ही सुन्दरी थी। एक बार वह सखियोंके साथ घूमती हुई पर्वतकी उपत्यकामें गयी; जहाँ उसे एक तपोवन दिखायी पड़ा। उस तपोवनके स्वामी एक ऋषि थे। जो मौनव्रत धारणकर तपस्या कर रहे थे। उन महात्माका वह पवित्र आश्रम रम्य वनखण्डोंके कारण अत्यन्त मनोहर जान पड़ता था। जब विप्रचित्तिकुमारी माहिष्मतीने उसे देखा तो वह सोचने लगी—‘मैं इस तपस्वीको भयभीत कर क्यों न स्वयं इस आश्रममें रहूँ और सखियोंके साथ आनन्दसे विहार करूँ।’
‘‘ऐसा सोचकर उस दानवकन्या माहिष्मतीने अपना रूप एक भैंसका बनाया। उसके सिरपर अत्यन्त तीक्ष्ण सींग सुशोभित हो रहे थे। विश्वेश्वरि! वह राक्षसी अपनी सखियोंको साथ लेकर सुपार्श्व ऋषिके पास पहुँची। फिर तो सुन्दर मुखवाली उस दैत्यकन्याने सखियोंसहित वहाँ पहुँचकर ऋषिको डराना आरम्भ कर दिया। एक बार तो वे ऋषि अवश्य डर गये, पर पीछे उन्होंने ज्ञाननेत्रसे देखा तो बात उनकी समझमें आ गयी कि यह सुन्दर नेत्रवाली (भैंस नहीं) कोई राक्षसी है। अतः मुनिने क्रोधमें आकर उसे शाप दे दिया—‘दुष्टे! तू भैंसका वेष बनाकर जो मुझे डरानेका प्रयास कर रही है, इसके फलस्वरूप तुझे सौ वर्षोंतक भैंसके रूपमें ही रहना पड़ेगा।’
‘‘ऋषिके इस प्रकार कहनेपर दानवकन्या माहिष्मती काँप उठी और उनके पैरोंपर गिरकर रोती हुई कहने लगी—‘मुने! आप कृपया अपने इस शापको समाप्त कर दें। माहिष्मतीकी प्रार्थनापर दयालु मुनिने उसके शापके अन्तका समय बता दिया और उससे कहा—‘भद्रे! इस भैंसके रूपसे ही तुम एक पुत्र उत्पन्नकर शापसे मुक्त हो जाओगी, मेरी बात सर्वथा असत्य नहीं हो सकती।’
‘‘ऋषिके यों कहनेपर माहिष्मती नर्मदानदीके तटपर गयी, जहाँ तपस्वी सिन्धुद्वीप तपस्या कर रहे थे। वहीं कुछ समय पूर्व एक दैत्यकन्या इन्दुमती जलमें नंगे स्नान कर रही थी। उसका रूप अत्यन्त मनोहर था। उसपर दृष्टि पड़ते ही मुनिका रेत शिलाखण्डपर स्खलित हो गया, जो एक सोते-से होकर नर्मदामें आया। अब माहिष्मतीकी दृष्टि उसपर पड़ी। उसने अपनी सखियोंसे कहा—‘मैं यह स्वादिष्ट जल पीना चाहती हूँ।’ और ऐसा कहकर वह उस रेतको पी गयी, जिससे उसे गर्भ रह गया। समयानुसार उससे एक पुत्रकी उत्पत्ति हुई, जो बड़ा पराक्रमी, प्रतापी और बुद्धिमान् हुआ और वही ‘महिषासुर’ नामसे प्रसिद्ध हुआ है। देवि! देवताओंके सैनिकोंको रौंदनेवाला वही महिष आपका वरण कर रहा है। अनघे! वह महान् असुर युद्धभूमिमें देवसमुदायको भी परास्त कर चुका है। अब वह सारी त्रिलोकीको जीतकर आपको सौंप देगा।
८६-तिलधेनुका माहात्म्य
| १५६ | संक्षिप्त श्रीवराहपुराण | [ अध्याय ९५ |
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अतः आप भी उसका वरण करें।'
दूतके ऐसा कहनेपर भगवती वैष्णवीदेवी बड़े जोरोंसे हँस पड़ीं। उनके हँसते समय उस दूतको देवीके उदरमें चर और अचरसहित तीनों लोक दीखने लगे। वह उसी क्षण आश्चर्यसे घबराकर मानो चक्कर खाने लगा। अब उस दूतके उत्तरमें देवीकी प्रतिहारिणी (द्वारपालिका)-ने, जिसका नाम जया था, भगवती वैष्णवीके हृदयकी बात कहना प्रारम्भ किया।
जया बोली— 'कन्याको प्राप्त करनेकी इच्छा करनेवाले महिषने तुझसे जैसा कहा है, तुमने वैसी ही बात यहाँ आकर कही है। किंतु समस्या यह है कि इस वैष्णवीदेवीने सदाके लिये 'कौमार-व्रत' धारण कर रखा है। यहाँ इस देवीकी अनुगामिनी अन्य भी बहुत-सी वैसी ही कुमारियाँ हैं। उनमेंसे एक भी कुमारी तुम्हें लभ्य नहीं है। फिर स्वयं भगवती वैष्णवीके पानेकी तो कल्पना ही व्यर्थ है। दूत! तुम बहुत शीघ्र यहाँसे चले जाओ। तुम्हारी दूसरी कोई बात यहाँ नहीं हो सकेगी।'
इस प्रकार प्रतिहारिणीके कहनेपर विद्युत्प्रभ वहाँसे चला गया। इतनेमें ही परम तपस्वी मुनिवर नारदजी उच्च स्वरसे वीणाकी तान छेड़ते हुए आकाशमार्गसे वहाँ पहुँचे। उन मुनिने 'अहोभाग्य! अहोभाग्य!' कहते हुए उन कुमारीको प्रणाम किया और देवीद्वारा पूजित होकर वे सुन्दर आसनपर बैठ गये। फिर सम्पूर्ण देवियोंको प्रणामकर वे कहने लगे—'देवि! देवसमुदायने बड़े आदरसे मुझे आपके पास भेजा है; क्योंकि महिषासुरने संग्राममें उन्हें परास्त कर दिया है। देवि! यही नहीं, वह दैत्यराज आपको पानेके लिये भी प्रयत्नशील है। वरानने! देवताओंकी यह बात आपको बताने आया हूँ। देवेश्वरि! आप डटकर उस दैत्यसे युद्ध करें तथा उसे मार डालें।'
भगवती वैष्णवीसे यों कहकर नारदजी तुरंत अन्तर्धान हो गये। वे इच्छानुसार वहाँसे कहीं अन्यत्र चले गये। अब देवीने सभी कन्याओंसे कहा—'तुम सभी अस्त्र-शस्त्रसे सुसज्जित हो जाओ'। तब वे समस्त परम पराक्रमी कन्याएँ देवीकी आज्ञासे भयंकर आकार धारणकर ढाल, तलवार और धनुष आदि शस्त्रास्त्रोंसे सुसज्ज हो दैत्योंका संहार करने तथा युद्ध करनेके विचारसे डट गयीं। इतनेमें ही महिषासुरकी सेना भी देवसेनाको छोड़कर वहीं आ गयी। फिर क्या था, उन स्वाभिमानिनी कन्याओं तथा दानवोंमें युद्ध छिड़ गया। उन कन्याओंके प्रयाससे असुरोंकी वह चतुरङ्गिणी सेना क्षणभरमें समाप्त हो गयी। कितनोंके सिर कटकर पृथ्वीपर गिर पड़े। अन्य बहुत-से दैत्योंकी छाती चीरकर क्रव्यादगण रक्त पीने लगे। अनेक प्रधान दानवोंके मस्तक कट गये और वे कबन्धरूपमें नृत्य करने लग गये। इस प्रकार एक ही क्षणमें पापबुद्धिवाले वे असुर युद्धभूमिसे भाग चले। कुछ दूसरे दैत्य भागते हुए महिषासुरके पास पहुँचे। निशाचरोंकी उस विशाल सेनामें हाहाकार मच गया, उनकी ऐसी व्याकुलता देखकर महिषासुरने सेनापतिसे कहा—'सेनापते! यह क्या? मेरे सामने ही सेनाका ऐसा संहार?' तब हाथीके समान आकृतिवाले 'यज्ञहनु' (विरूपाक्ष)-ने महिषासुरसे कहा—'स्वामिन्! इन कुमारियोंने ही चारों ओरसे हमारे सैनिकोंको भगा दिया है।'
अब क्या था? महिषासुर हाथमें गदा लेकर उधर दौड़ पड़ा, जहाँ देवताओं एवं गन्धर्वोंसे सुपूजित भगवती वैष्णवी विराजमान थीं। उसे आते देखकर भगवती वैष्णवीने अपनी बीस भुजाएँ बना लीं और उनके बीसों हाथोंमें क्रमशः
अध्याय ९५ ] महिषासुरका वध १५७
धनुष, ढाल, तलवार, शक्ति, वाण, फरसा, वज्र, शङ्ख, त्रिशूल, गदा, मूसल, चक्र, बरछा, दण्ड, पाश, ध्वज, घण्टा, पानपात्र, अक्षमाला एवं कमल—ये आयुध विराजमान हो गये। उन देवीने कवच भी धारण कर लिया और सिंहपर सवार हो गयीं। फिर उन्होंने देवाधिदेव, प्रलयंकर भगवान् रुद्रको स्मरण किया। स्मरण करते ही साक्षात् वृषध्वज वहाँ तत्क्षण पहुँच गये। उन्हें प्रणामकर देवीने सूचित किया—'देवेश्वर! मैं सम्पूर्ण दैत्योंपर विजय प्राप्त करना चाहती हूँ। सनातन प्रभो! बस, आप केवल यहाँ उपस्थित रहकर (रण-क्रीडा) देखते रहें।'
यों कहकर भगवती परमेश्वरी सारी आसुरी सेनाका संहारकर महिषकी ओर दौड़ीं। महिष भी अब उनपर बड़े वेगसे टूट पड़ा। वह दानवराज कभी लड़ता, कभी भागता और कभी पुनः मोर्चेपर डट जाता। शोभने! उस दानवका देवीके साथ देवताओंके वर्षसे दस हजार वर्षोंतक यह संग्राम चलता रहा। अन्तमें वह डरकर सारे ब्रह्माण्डमें भागने लगा। फिर देवीने शतशृङ्गपर्वतपर* उसे पैरोंसे दबाकर शूलद्वारा मार डाला और तलवारद्वारा उसका सिर काटकर धड़से अलग कर दिया। महिषासुरका जीव शरीरसे निकलकर देवीके शस्त्र-निपातके प्रभावसे स्वर्गमें चला गया। उस अजेय असुरको पराजित देखकर ब्रह्माजीसहित सम्पूर्ण देवता देवीकी इस प्रकार स्तुति करने लगे।
देवताओंने स्तुति की— महान् ऐश्वर्योंसे सुसम्पन्न देवि! गम्भीरा, भीमदर्शना, जयस्था, स्थितिसिद्धान्ता, त्रिनेत्रा, विश्वतोमुखी, जया, जाप्य, महिषासुरमर्दिनी, सर्वगा, सर्वा, देवेशी, विश्वरूपिणी, वैष्णवी, वीतशोका, ध्रुवा, पद्मपत्रशुभेक्षणा, शुद्ध-सत्त्व-व्रतस्था, चण्डरूपा, विभावरी, ऋद्धि-सिद्धिप्रदा, विद्या, अविद्या, अमृता, शिवा, शाङ्करी, वैष्णवी, ब्राह्मी, सर्वदेवनमस्कृता, घण्टाहस्ता, त्रिशूलास्त्रा, उग्ररूपा, विरूपाक्षी, महामाया और अमृतस्रवा—इन विशिष्ट नामोंसे युक्त हम आपकी उपासना करते हैं। आप परम पुण्यमयी देवीके लिये हमारा निरन्तर नमस्कार है। ध्रुवस्वरूपा देवि! आप सम्पूर्ण प्राणियोंकी हितचिन्तिका हैं। अखिल प्राणी आपके ही रूप हैं। विद्याओं, पुराणों और शिल्पशास्त्रोंकी आप ही जननी हैं। समस्त संसार आपपर ही अवलम्बित है। अम्बिके! सम्पूर्ण वेदोंके रहस्यों और सभी देहधारियोंके केवल आप ही शरण हैं। शुभे! आपको सामान्य जनता विद्या एवं अविद्या नामसे पुकारती है। आपके लिये हमारा निरन्तर शतशः नमस्कार है। परमेश्वरि ! आप विरूपाक्षी, क्षान्ति, क्षोभितान्तर्जला और अमला नामसे भी विख्यात हैं। महादेवि ! हम आपको बारंबार नमस्कार करते हैं। भगवती परमेश्वरि ! रणसंकटके उपस्थित होनेपर जो आपकी शरण लेते हैं, उन भक्तोंके सामने किसी प्रकारका अशुभ नहीं आता। देवि! सिंह-व्याघ्रके भय, चोर-भय, राज-भय, या अन्य घोर भयके उपस्थित होनेपर जो पुरुष मनको सावधानकर इस स्तोत्रका सदा पाठ करेगा, वह इन सभी संकटोंसे छूट जायगा। देवि! कारागारमें पड़ा हुआ मानव भी यदि आपका स्मरण करेगा तो बन्धनोंसे उसकी मुक्ति हो जायगी और वह आनन्दपूर्वक सुखसे स्वतन्त्र जीवन व्यतीत करेगा।
* यह हिमालयका पुत्र कहा जाता है। पाण्डवोंका जन्म यहीं हुआ था। (महाभा० १।१२२-२३) यहाँ (वैष्णवीदेवी जम्मूसे ४५ मील)-पर सिद्धि शीघ्र मिलती है। 'हरिविलास' तथा 'वैद्य-जीवन' के रचयिता घटिकाशतककर्ता लोलिम्बराज इन्हीं देवीके उपासक थे।
| १५८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय ९६ |
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भगवान् वराह कहते हैं— सुन्दरी पृथ्वि! इस प्रकार देवताओंद्वारा स्तुति-नमस्कार किये जानेपर भगवती वैष्णवीने उनसे कहा—'देवतागण! आपलोग कोई उत्तम वर माँग लें।'
देवता बोले— पुण्यस्वरूपिणी देवि! आपके इस स्तोत्रका जो पुरुष पाठ करेंगे, उनकी आप सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण करनेकी कृपा करें। यही हमारा अभिलषित वर है। इसपर सर्वदेवमयी देवीने उन देवताओंसे 'एवमस्तु' कहकर वहाँसे उनको विदा कर दिया और स्वयं वहीं विराजमान रहीं। धराधरे! यह देवीके दूसरे स्वरूपका वर्णन हुआ। जो इसे जान लेता है, वह शोक-दुःख एवं दोषोंसे मुक्त होकर भगवतीके अनामयपदको प्राप्त करता है। [अध्याय ९५]
त्रिशक्तिमाहात्म्यमें रौद्रीव्रत
भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! जो रौद्रीशक्ति मनमें तपस्याका निश्चयकर 'नीलगिरि' पर गयी थीं और जिनका प्राकट्य रुद्रकी तमःशक्तिसे हुआ था, अब उनके व्रतकी बात सुनो। अखिल जगत्की रक्षाके निश्चयसे वे दीर्घकालतक तपस्याके साधनमें लगी रहीं और पञ्चाग्नि-सेवनका नियम बना लिया। इस प्रकार उन देवीके तपस्या करते हुए कुछ समय बीत जानेपर 'रुरु' नामक एक असुर उत्पन्न हुआ। जो महान् तेजस्वी था। उसे ब्रह्माजीका वर भी प्राप्त था। समुद्रके मध्यमें वनोंसे घिरी 'रत्नपुरी' उसकी राजधानी थी। सम्पूर्ण देवताओंको आतङ्कितकर वह दानवराज वहीं रहकर राज्य करता था। करोड़ों असुर उसके सहचर थे, जो एक-से-एक बढ़-चढ़कर थे। उस समय ऐश्वर्यसे युक्त वह 'रुरु' ऐसा जान पड़ता था, मानो दूसरा इन्द्र ही हो। बहुत समय व्यतीत हो जानेके पश्चात् उसके मनमें लोकपालोंपर विजय प्राप्त करनेकी इच्छा उत्पन्न हुई। देवताओंके साथ युद्ध करनेमें उसकी स्वाभाविक रुचि थी, अतः एक विशाल सेनाका संग्रहकर जब वह महान् असुर रुरु युद्ध करनेके विचारसे समुद्रसे बाहर निकला, तब उसका जल बहुत जोरोंसे ऊपर उछलने लगा और उसमें रहनेवाले नक्र, घड़ियाल तथा मत्स्य घबड़ा गये। वेलाचलके पार्श्ववर्ती सभी देश उस जलसे आप्लावित हो उठे। समुद्रका अगाध जल चारों ओर फैल गया और सहसा उसके भीतरसे अनेक असुर विचित्र कवच तथा आयुधसे सुसज्जित होकर बाहर निकल पड़े एवं युद्धके लिये आगे बढ़े। ऊँचे हाथियों तथा अश्व-रथ आदिपर सवार होकर वे असुर-सैनिक युद्धके लिये आगे बढ़े। उनके लाखों एवं करोड़ोंकी संख्यामें पदाति सैनिक भी युद्धके लिये निकल पड़े।
शोभने! रुरुकी सेनाके रथ सूर्यके रथके समान थे और उनपर यन्त्रयुक्त शस्त्र सुसज्ज थे। ऐसे असंख्य रथोंपर उसके अनुगामी दैत्य हस्तत्राणसे सुरक्षित होकर चल पड़े। इन असुर-सैनिकोंने देवताओंके सैनिकोंकी शक्ति कुण्ठित कर दी और वह अपनी चतुरङ्गिणी सेना लेकर इन्द्रकी नगरी अमरावतीपुरीके लिये चल पड़ा। वहाँ पहुँचकर दानवराजने देवताओंके साथ युद्ध आरम्भ कर दिया और वह उनपर मुद्गरों, मुसलों, भयंकर वाणों और दण्ड आदि आयुधोंसे प्रहार करने लगा। इस युद्धमें इन्द्रसहित सभी देवता उस समय अधिक देरतक टिक न सके और वे आहत हो मुँह पीछेकर भाग चले। उनका सारा उत्साह समाप्त हो गया तथा हृदय आतङ्कसे भर गया। अब वे भागते हुए उसी नीलगिरि पर्वतपर
अध्याय ९६ ] त्रिशक्तिमाहात्म्यमें रौद्रीव्रत १५९
पहुँचे, जहाँ भगवती रौद्री तपस्यामें संलग्न होकर स्थित थीं। देवीने देवताओंको देखकर उच्च स्वरसे कहा—‘भय मत करो।’
देवी बोलीं—देवतागण! आपलोग इस प्रकार भीत एवं व्याकुल क्यों हैं? यह मुझे तुरंत बतलाएँ।
देवताओंने कहा—‘परमेश्वरि! इधर देखिये! यह ‘रुरु’ नामक महान् पराक्रमी दैत्यराज चला आ रहा है। इससे हम सभी देवता त्रस्त हो गये हैं, आप हमारी रक्षा कीजिये।’ यह देखकर देवी अट्टहासके साथ हँस पड़ीं। देवीके हँसते ही उनके मुखसे बहुत-सी अन्य देवियाँ प्रकट हो गयीं, जिनसे मानो सारा विश्व भर गया। वे विकृत रूप एवं अस्त्र-शस्त्रसे सुसज्जित थीं और अपने हाथोंमें पाश, अङ्कुश, त्रिशूल तथा धनुष धारण किये हुए थीं। वे सभी देवियाँ करोड़ोंकी संख्यामें थीं तथा भगवती तामसीको चारों ओरसे घेरकर खड़ी हो गयीं। वे सब दानवोंके साथ युद्ध करने लगीं और तत्काल असुरोंके सभी सैनिकोंका क्षणभरमें सफाया कर दिया। देवता अब पुनः लड़ने लग गये थे। कालरात्रिकी सेना तथा देवताओंकी सेना अब नयी शक्तिसे सम्पन्न होकर दैत्योंसे लड़ने लगी और उन सभीने समस्त दानवोंके सैनिकोंको यमलोक भेज दिया। बस, अब उस महान् युद्धभूमिमें केवल महादैत्य ‘रुरु’ ही बच रहा था। वह बड़ा मायावी था। अब उसने ‘रौरवी’ नामके भयंकर मायाकी रचना की, जिससे सम्पूर्ण देवता मोहित होकर नींदमें सो गये। अन्तमें देवीने उस युद्ध-स्थलपर त्रिशूलसे दानवको मार डाला। शुभलोचने! देवीके द्वारा आहत हो जानेपर ‘रुरु’-दैत्यके चर्म (धड़) और मुण्ड—अलग-अलग हो गये। दानवराज ‘रुरु’के चर्म और मुण्ड जिस समय पृथक् हुए, उसी क्षण देवीने उन्हें उठा लिया, अतः वे ‘चामुण्डा’ कहलाने लगीं। वे ही भगवती महारौद्री, परमेश्वरी, संहारिणी और ‘कालरात्रि’ कही जाती हैं। उनकी अनुचरी देवियाँ करोड़ोंकी संख्यामें बहुत-सी हैं। युद्धके अन्तमें उन अनुगामिनी देवियोंने इन महान् ऐश्वर्यशालिनी देवीको सब ओरसे घेर लिया और वे भगवती रौद्रीसे कहने लगीं—‘हम भूखसे घबड़ा गयी हैं। कल्याणस्वरूपिणि देवि! आप हमें भोजन देनेकी कृपा कीजिये।’
इस प्रकार उन देवियोंके प्रार्थना करनेपर जब रौद्री देवीके ध्यानमें कोई बात न आयी, तब उन्होंने देवाधिदेव पशुपति भगवान् रुद्रका स्मरण किया। उनके ध्यान करते ही पिनाकपाणि परमात्मा रुद्र वहाँ प्रकट हो गये। वे बोले—‘देवि! कहो! तुम्हारा क्या कार्य है?’
देवीने कहा—देवेश! आप इन उपस्थित देवियोंके लिये भोजनकी कुछ सामग्री देनेकी कृपा करें; अन्यथा ये बलपूर्वक मुझे ही खा जायेंगी।
रुद्रने कहा—देवेश्वरि! महाप्रभे! इनके खानेयोग्य वस्तु वह है—जो गर्भवती स्त्री दूसरी स्त्रीके पहने हुए वस्त्रको पहनकर अथवा विशेष करके दूसरे पुरुषका स्पर्शकर पाकका निर्माण करती है, वह इन देवियोंके लिये भोजनकी सामग्री है। अज्ञानी व्यक्तियोंद्वारा दिया हुआ बलिभाग भी ये देवियाँ ग्रहण करें और उसे पाकर सौ वर्षोंके लिये सर्वथा तृप्त हो जायँ। अन्य कुछ देवियाँ प्रसव-गृहमें छिद्रका अन्वेषण करें। वहाँ लोग उनकी पूजा करेंगे। देवेशि! उस स्थानपर उनका निवास होगा। गृह, क्षेत्र, तड़ागों, वापियों और उद्यानोंमें जाकर निरन्तर रोती हुई जो स्त्रियाँ मनमारे बैठी रहेंगी, उनके शरीरमें प्रवेशकर कुछ देवियाँ तृप्ति लाभ कर सकेंगी।
फिर भगवान् शंकरने इधर जब रुरुको मरा हुआ देखा, तब वे देवीकी इस प्रकार स्तुति करने लगे।
८७-जलधेनु एवं रसधेनु-दानकी विधि
| १६० | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय ९६ |
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भगवान् रुद्र बोले—देवि! आपकी जय हो। चामुण्डे! भगवती भूतापहारिणि एवं सर्वगते परमेश्वरि! आपकी जय हो। देवि! आप त्रिलोचना, भीमरूपा, वेद्या, महामाया, महोदया, मनोजवा, जया, जृम्भा, भीमाक्षी, क्षुभिताशया, महामारी, विचित्राङ्गा, नृत्यप्रिया, विकराला, महाकाली, कालिका, पापहारिणी, पाशहस्ता, दण्डहस्ता, भयानका, चामुण्डा, ज्वलमानास्या, तीक्ष्णदंष्ट्रा, महाबला, शतयानस्थिता, प्रेतासनगता, भीषणा, सर्वभूतभयंकरी, कराला, विकराला, महाकाला, करालिनी, काली, कराली, विक्रान्ता और कालरात्रि—इन नामोंसे प्रसिद्ध हैं; आपके लिये मेरा बारंबार नमस्कार है। परमेष्ठी रुद्रने जब इस प्रकार देवीकी स्तुति की तब वे भगवती परम संतुष्ट हो गयीं। साथ ही उन्होंने कहा—'देवेश! जो आपके मनमें हो, वह वर माँग लें।'
रुद्र बोले—'"वरानने! यदि आप प्रसन्न हैं तो इस स्तुतिके द्वारा जो व्यक्ति आपका स्तवन करें, देवि! आप उन्हें वर देनेकी कृपा करें। इस स्तुतिका नाम' 'त्रिप्रकार' होगा। जो भक्तिके साथ इसका पाठ करेगा, वह पुत्र, पौत्र, पशु और समृद्धसे सम्पन्न हो जायगा। तीन शक्तियोंसे सम्बद्ध इस स्तुतिको जो श्रद्धा भक्तिके साथ सुने, उसके सम्पूर्ण पाप विलीन हो जायँ और वह व्यक्ति अविनाशी पदका अधिकारी हो जाय।"
ऐसा कहकर भगवान् रुद्र अन्तर्धान हो गये। देवता भी स्वर्गको पधारे। वसुंधरे! देवीकी तीन प्रकारकी उत्पत्ति युक्त 'त्रिशक्ति-माहात्म्य'का यह प्रसङ्ग बहुत श्रेष्ठ है। अपने राज्यसे च्युत राजा यदि पवित्रतापूर्वक इन्द्रियोंको वशमें करके अष्टमी, नवमी और चतुर्दशीके दिन उपवासकर इसका श्रवण करेगा तो उसे एक वर्षमें अपना निष्कण्टक राज्य पुनः प्राप्त हो जायगा। न्यायसिद्धान्तके द्वारा ज्ञात होनेवाली पृथ्वी देवि! यह मैंने तुमसे 'त्रिशक्ति-सिद्धान्त'की बात बतलायी। इनमें सात्त्विकी एवं श्वेत वर्णवाली 'सृष्टि' देवीका सम्बन्ध ब्रह्मासे है। ऐसे ही वैष्णवी शक्तिका सम्बन्ध भगवान् विष्णुसे है। रौद्रीदेवी कृष्ण-वर्णसे युक्त एवं तमःसम्पन्न शिवकी शक्ति हैं। जो पुरुष स्वस्थचित्त होकर नवमी तिथिके दिन इसका श्रवण करेगा, उसे अतुल राज्यकी प्राप्ति होगी तथा वह सभी भयोंसे छूट जायगा। जिसके घरपर लिखा हुआ यह प्रसङ्ग रहता है, उसके घरमें भयंकर अग्निभय, सर्पभय, चोरभय और राज्य आदिसे उत्पन्न भय नहीं होते। जो विद्वान् पुरुष पुस्तकरूपमें इस प्रसङ्गको लिखकर भक्तिके साथ इसकी पूजा करेगा, उसके द्वारा चर और अचर तीनों लोक सुपूजित हो जायँगे। उसके यहाँ बहुत-से पशु, पुत्र, धन-धान्य एवं उत्तम स्त्रियाँ प्राप्त हो जायँगी। यह स्तुति जिसके घरपर रहती है, उसके यहाँ प्रचुर रत्न, घोड़े, गौएँ, दास और दासियाँ—आदि सम्पत्तियाँ अवश्य प्राप्त हो जाती हैं।
भगवान् वराह कहते हैं—भूतधारिणि! यह रुद्रका माहात्म्य कहा गया है। मैंने पूर्णरूपसे तुम्हारे सामने इसका वर्णन कर दिया। चामुण्डाकी समग्र शक्तियोंकी संख्या नौ करोड़ है। वे पृथक्-पृथक् रूपसे स्थित हैं। इस प्रकार जो रुद्रसे सम्बन्ध रखनेवाली यह 'तामसी शक्ति चामुण्डा' कही गयी उसका तथा वैष्णवी शक्तिके सम्मिलित भेद अठारह करोड़ है। इन सभी शक्तियोंके अध्यक्ष सर्वत्र विचरण करनेवाले भगवान् परमात्मा रुद्र ही हैं। जितनी ये शक्तियाँ हैं, रुद्र भी उतने ही हैं। महाभाग! जो इन शक्तियोंकी आराधना करता है, उसपर भगवान् रुद्र संतुष्ट होते हैं और वे साधककी मनःकल्पित सारी कामनाएँ सिद्ध कर देते हैं। [अध्याय ९६]
८८-गुड़धेनु-दानकी विधि
अध्याय ९७ ] रुद्रके माहात्म्यका वर्णन १६१
रुद्रके माहात्म्यका वर्णन
भगवान् वराह कहते हैं—'सुमुखि पृथिवि! अब तुम रुद्रके व्रतकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग सुनो, जिसे जानकर प्राणी पापोंसे मुक्त हो जाता है। जिस समय ब्रह्माजीने पूर्वकालमें रुद्रका सृजन किया, उस समय उन रुद्रकी विभु, पिङ्गाक्ष और फिर तीसरी बार नीललोहित संज्ञा हुई। अव्यक्तजन्मा परमशक्तिशाली ब्रह्माने कौतूहलवश प्रकट होते ही रुद्रको कन्धेपर उठा लिया। उस अवसरपर ब्रह्माका जो जन्म-सिद्ध पाँचवाँ सिर था, उससे आथर्वणमन्त्रका उच्चारण हो रहा था, जो इस प्रकार था—
कपालिन् रुद्र बभ्रोऽथ भव कैरात सुव्रत।
पाहि विश्वं विशालाक्ष कुमार वरविक्रम॥
(९७।५)
अर्थात् 'हे सुव्रत! कपाली, बभ्रु, भव, कैरात, विशालाक्ष, कुमार और वरविक्रम-नामधारी रुद्र, आप विश्वकी रक्षा कीजिये।' पृथिवि! इस मन्त्रके अनुसार ये रुद्रके भविष्यके कर्मसूचक नाम थे। पर 'कपाली' शब्द सुनकर रुद्रको क्रोध आ गया, अतः ब्रह्माजीके उस पाँचवें सिरको उन्होंने अपने बायें हाथके अंगूठेके नखसे काट डाला, पर कटा हुआ वह सिर उनके हाथमें ही चिपक गया। रुद्रने ब्रह्माजीकी शरण ली और बोले।
रुद्रने कहा—उत्तम व्रतोंका पालन करनेवाले भगवन्! कृपया यह बताइये कि यह कपाल मेरे हाथसे किस प्रकार अलग हो सकेगा तथा इस पापसे मैं कैसे मुक्त होऊँगा?
ब्रह्माजी बोले—रुद्रदेव! तुम नियमपूर्वक कापालिक व्रतका अनुष्ठान करो। इसके आचरण करते रहनेपर जब अनुकूल समय आयेगा, तब स्वयं अपने ही तेजसे तुम इस कपालसे मुक्त हो जाओगे।
अव्यक्त-मूर्ति ब्रह्माजीने जब रुद्रसे इस प्रकार कहा तब महादेव पापनाशक महेन्द्रपर्वतपर चले गये। वहाँ रहकर उन्होंने उस सिरको तीन भागोंमें विभाजित कर दिया। तीन खण्ड हो जानेपर भगवान् रुद्रने उसके बालोंको भी अलग-अलग कर हाथमें लिया और उसका यज्ञोपवीत बना लिया। इस प्रकार सात द्वीपोंवाली इस पृथिवीपर विचरते हुए वे प्रतिदिन तीर्थोंमें स्नान करते और फिर आगे बढ़ जाते थे। सर्वप्रथम उन्होंने समुद्रमें स्नान किया। इसके बाद गङ्गामें गोता लगाया। फिर वे सरस्वती, गङ्गा-यमुनाका सङ्गम, शतद्रु (सतलज), महानदी, देविका, वितस्ता, चन्द्रभागा, गोमती, सिन्धु, तुङ्गभद्रा, गोदावरी, उत्तरगण्डकी, नेपाल, रुद्रमहालय, दारुवन, केदारवन, भद्रेश्वर होते हुए पवित्र क्षेत्र गयामें पहुँचे। वहाँ फल्गु नदीमें स्नान कर उन्होंने पितरोंका तर्पण किया। इस प्रकार भगवान् रुद्र सारे विश्व-ब्रह्माण्डमें चक्कर लगाते रहे। इस प्रकार उन्हें भ्रमण करते छः वर्ष बीत गये, इसी बीच उनके परिधान, कौपीन और मेखला अलग हो गये। देवि! अब रुद्र नग्न और कापालिकरूपमें हाथमें कपाल लिये प्रत्येक तीर्थमें घूमते रहे, किंतु वह अलग न हुआ। इसके बाद वे दो वर्षोंतक भू-मण्डलके सभी पवित्र तीर्थोंमें पुनः भ्रमण करते रहे। इस प्रकार बारह वर्ष बीत गये। फिर हरिहरक्षेत्रमें जाकर उन्होंने दिव्य नदी गङ्गा एवं देवाङ्गद-कुण्डमें स्नानकर भगवान् सोमेश्वरकी विधिवत् पूजा की। फिर वे 'चक्रतीर्थ'में गये और वहाँ स्नानकर 'त्रिजलेश्वर' महादेवकी आराधना की। तत्पश्चात् अयोध्या जाकर वे फिर वाराणसी पहुँचे और गङ्गामें स्नान करने लगे। सुन्दरि! जब वे गङ्गामें स्नान कर रहे थे, उसी क्षण
८९-शर्करा तथा मधुधेनुके दानकी विधि
१६२ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय ९८
उनके हाथसे कपाल गिर गया। वसुंधरे! तभीसे भूमण्डलपर वाराणसीपुरीमें यह उत्तम तीर्थ 'कपालमोचन' नामसे विख्यात हुआ। वहाँ मनुष्य यदि भक्तिपूर्वक स्नान करता है तो उसकी शुद्धि हो जाती है। अब ब्रह्माजी देवताओंके साथ वहाँ आये और इस प्रकार बोले।
ब्रह्माजीने कहा— विशाल नेत्रोंवाले रुद्र! अब तुम लोकमार्गमें सुव्यवस्थित होओ। हाथमें कपाल होनेसे व्यग्र-चित्त होकर तुम जो भ्रमण करते रहे, इससे तुम्हारा यह व्रत भूमण्डलपर जन-समाजमें 'नग्नकापालिक-व्रत' नामसे विख्यात होगा। तुम जो पर्वतराज हिमालयपर भ्रमण करनेमें व्यस्त रहे, इसलिये देव! वह व्रत 'वाभ्रव्य' नामसे भी प्रसिद्ध होगा। अब इस तीर्थमें जो तुम्हारी शुद्धि हुई है, इसके कारण यह व्रत शुद्ध-शैव होगा और इसमें पापप्रशमन करनेकी शक्ति भरी रहेगी। देवसमुदायने आगे करके तुम्हें जो विधानके साथ पूज्य बनाया है, उस शास्त्रविधानकी सबके लिये व्याख्या करूँगा। इसमें कुछ अन्यथा विचार नहीं है। तुम्हारे द्वारा आचरित यह 'वाभ्रव्यव्रत' एवं 'कापालिक' व्रतका जो आचरण करेगा, वह तुम्हारी कृपासे ब्रह्महत्यारा ही क्यों न हो, उस पापसे मुक्त हो जायगा। तुम जो नग्न, कपाली, पिङ्गल-वर्ण और पुनः शुद्ध-शैवव्रत पालन करते रहे, इसके कारण नग्न, कपाल, वाभ्रव्य और शुद्ध-शैवके नामसे यह व्रत प्रसिद्ध होगा। तुमने मुझे आगे करके विधिपूर्वक जिन मन्त्रोंके द्वारा पूजा की है, वे सम्पूर्ण शास्त्र 'पाशुपतशास्त्र' कहलायेंगे।
अव्यक्तमूर्ति ब्रह्माजी जिस समय रुद्रसे इस प्रकार कह रहे थे, उसी समय देवताओंने 'जय-जयकार' की ध्वनि लगायी। अब महाभाग रुद्र परम संतुष्ट होकर अपने स्थान कैलासपर चले गये। ब्रह्माजी भी देवताओंके साथ श्रेष्ठ स्वर्गलोकमें सिधारे। अन्य देवता भी जैसे आये थे, वैसे ही आकाशमार्गद्वारा अपने स्थानपर चले गये। वसुंधरे! रुद्रके इस माहात्म्यका मैंने वर्णन किया। यह जो रुद्रका चरित्र है, इससे भूमण्डलपर स्थित कोई सम्पत्ति तुलना करनेमें समर्थ नहीं है।
[ अध्याय ९७ ]
सत्यतपाका शेष वृत्तान्त
पृथ्वी बोली— भगवन्! सत्यतपा नामक व्याध, जो पीछे ब्राह्मण हो गया था और जिसने अपनी शक्तिद्वारा बाघके भयसे आरुणि मुनिकी रक्षा की थी और जो दुर्वासाजीसे वेद-पुराण सुनकर हिमालय-पर्वतपर चला गया था, आपने उसके भविष्यमें कोई विचित्र घटना घटनेकी बात बतलायी थी। विभो! मुझे उस घटनाको जाननेकी उत्सुकता हो रही है। कृपया आप उसे बतानेकी कृपा कीजिये।
भगवान् वराह बोले— वसुंधरे! वास्तवमें बात यह है कि सत्यतपा भृगुवंशमें उत्पन्न शुद्ध ब्राह्मण ही था। उसी जन्ममें फिर उसका डाकुओंका साथ हो गया, जिसके कारण वह व्याध बन गया। बहुत दिन बीत जानेके पश्चात् 'आरुणिऋषि'का सङ्ग उसे सुलभ हुआ। अतः फिर उसमें ब्राह्मणत्व आ गया। दुर्वासाजीके द्वारा भलीभाँति उपदेश ग्रहणकर फिर वह पूर्ण ब्राह्मण बन गया। (अब आश्चर्यकी कथा आगे सुनो—)
पृथ्विदेवि! हिमालयपर्वतके उत्तरी भागमें 'पुष्पभद्रा' नामकी एक पवित्र नदी है। उस दिव्य नदीके तीरपर 'चित्रशिला' नामसे विख्यात एक शिला है। वहीं एक विशाल वटका वृक्ष है, जो 'भद्र' नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ रहकर सत्यतपा तप