वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
१३४ | वेदान्तपरिभाषा | [ व्यधिकरणधर्मावच्छिन्नाभावः
मूलाविद्या का बाध न होने पर भी मुसलप्रहार से उपादानभूत मूलाज्ञान के रहते ही मृत्तिका में होनेवाली घट की निवृत्ति के समान शुक्तिज्ञान से शुक्तिरूप्य की निवृत्ति ही होती है। बाध नहीं।
इस विषय में पद्मपादाचार्य ने अपने पंचपादिका ग्रन्थ में "शुक्तित्वज्ञान ही बाधक है, और 'यह रजत नहीं'--यह अनुवाद है" कहा है। इस कारण 'यह रजत नहीं' यह ज्ञान अनुवाद है। क्योंकि शुक्तित्वप्रकारक ज्ञान, रजतादि भेद के अज्ञान का निवर्तक होता है। (शुक्तिरूप्य तो शुक्त्यवच्छिन्नचैतन्यनिष्ठ तूलाविद्या का कार्य है) इस पक्ष में 'यह शुक्ति है' इस ज्ञान से तूलाविद्या-रूप शुक्तित्व के अज्ञान के साथ प्रातिभासिक रजत का बाध होता है। मूलाविद्या की ही एक अवस्थाविशेष तूलाविद्या है। (मूलाविद्या की ही वह एक विशिष्ठावस्था है)। 'विवरण' ग्रन्थ में इस विषय में 'रजतादिकों के उपादानभूत अज्ञान, मूलाविद्या के ही अवस्थाभेद हैं। वे अज्ञान, शुक्तिकादिकों के ज्ञानों से अध्यास के साथ निवृत्त होते हैं' ऐसा स्पष्ट कहा।
परन्तु शुक्तिरूप्यादि, मूलाविद्या का ही कार्य है—इस पक्ष में स्वप्नगजादिकों के समान शुक्तिरूप्य की निवृत्ति होती है, बाध नहीं, क्योंकि मूलाविद्या, केवल ब्रह्मस्वरूप-साक्षात्कार से ही निवृत्त होती है। वह शुक्तित्वज्ञान से निवृत्त नहीं होती। अतः ऐसे स्थल पर शुक्तिज्ञान से, उस शुक्ति में प्रातिभासिक रजत की केवल निवृत्ति होती है।
शंका—शुक्तिज्ञान से शुक्तिरूप्य का बाध न होकर केवल निवृत्ति ही यदि होती है तो शुक्तिरूप्य ज्ञान को प्रमात्व प्राप्त होगा। 'यह रजत है' इत्याकारक शुक्ति में होने वाला रजतज्ञान वस्तुतः अप्रमा (मिथ्या) ज्ञान है। परन्तु शुक्तिरूप्य का बाध न होकर निवृत्ति होती है, यदि स्वीकार करें वह रजतज्ञान प्रमा (यथार्थ) ज्ञान है—कहना पड़ेगा। क्योंकि आपने 'संसार दशा में अबाधितत्व' ऐसा प्रमालक्षण के 'अबाधित' पद का स्पष्टीकरण पीछे किया है। और यहाँ शुक्तिरूप्य संसारदशा में बाधित नहीं होता, इससे शुक्तिरजतज्ञान में प्रमा का लक्षण घटित होता है' यह शंका करना ठीक नहीं। क्योंकि 'अबाधित' पद से 'आगन्तुक-दोषाजन्यत्व = आगन्तुक दोष से अजन्य' अर्थ विवक्षित है। शुक्तिरूप्य-ज्ञान आगन्तुक दोषजन्य है। इस कारण वहाँ प्रमात्व का प्रसंग नहीं आने पाता।
इस पर शंका और उसका समाधान—
ननु$^१$ शुक्तौ रजतस्य$^२$ प्रतिभाससमये प्रातिभासिकत्त्वाभ्युपगमे
१. शुक्तिरजतस्य अविद्याकार्यत्वात् प्रतिभाससमये सत्त्वस्वीकारे 'नेदं रजतम'ति त्रैकालिकनिषेधानुपपत्तिः इत्याशयः शंकाग्रन्थस्य। विषयभेदादविरोधः इति समाधानग्रन्थस्याशयः।
२. 'स्य प्राति...सत्ताम्यु०' इति पाठान्तरम्।
व्यधिकरणधर्मावच्छिन्नाभावः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १३५
नेदं रजतमिति त्रैकालिकनिषेधज्ञानं न स्यात्, किन्त्विदानीम् इदं न रजतमिति, इदानीं घटः श्यामो नेतिवदिति चेत् । न । न हि तत्र रजतत्वावच्छिन्न-प्रतियोगिताकाभावो निषेधधीविषयः, १ किन्तु लौकिकपारमार्थिकत्वावच्छिन्न-प्रातिभासिक-रजत-प्रतियोगिताकः, २व्यधिकरणधर्मावच्छिन्नप्रतियोगिताकाभावाभ्युपगमात् ।
अर्थ—प्रतिभास के समय में शुक्ति में भासित होनेवाले रजत का प्रातिभासिक सत्त्व
१. निषेधधीविषयः—न हीत्यनेनान्वयः । नात्यन्ताभावज्ञानविषय इत्यर्थः । एव बोद्धव्यम्—यस्य अत्यन्ताभावः स तस्याभावस्य प्रतियोगी । तस्मिन् प्रतियोगिनि या प्रतियोगिता विद्यते, सा केनचिद्धर्मेण केनचित् सम्बन्धेन च अवच्छिद्यते । येन धर्मेण निषेधः क्रियते, स प्रतियोगितावच्छेदको धर्मः । येन च सम्बन्धेन निषेधः क्रियते, स प्रतियोगितावच्छेदकः सम्बन्धः इति व्यपदिश्यते । तथा चात्र 'रजतं नास्ति' इत्यत्र यदि प्रातिभासिकरजतत्वेन रजतस्य निषेधः स्यात्, तदा तादृशाभावप्रतियोगिनि रजते या प्रतियोगिता सा रजतत्वावच्छिन्ना भवेत्, रजतत्वेन रजतस्य निषेधात् । अभावश्च रजतत्वावच्छिन्नप्रतियोगिताको भवेत् । न चात्र तादृशनिषेधः संभवति, रजतत्वेन रजतस्य प्रतियोगिनस्तत्र सत्त्वात्, तस्य च अत्यन्ताभावविरोधित्वात् । किन्तु अन्यरूपेण निषेधः, तेन रजतत्वावच्छिन्नप्रतियोगिकाभावो न निषेधधीविषयो भवति । तर्हि कीदृशोऽभावस्तद्विषयः इति पृच्छायां सत्यां व्यावहारिकत्वावच्छिन्नप्रतिभासिकरजतप्रतियोगिताकोऽभावो निषेधबुद्धिविषयो भवति । अयमाशयः ब्रह्मभिन्नस्य पारमार्थिकत्वाऽभावेऽपि 'अयं पारमार्थिक' इति यस्य लोके पारमार्थिकत्वेन व्यवहारः, तस्यैव धर्मः लौकिकपारमार्थिकत्वं, तेन धर्मेण अवच्छिन्ना प्रतियोगिता यस्य प्रातिभासिकरजताभावस्य सः अभावः लौकिकपारमार्थिकत्वावच्छिन्नप्रातिभासिक-रजतप्रतियोगिताकः । स एव निषेधधीविषयः ।
२. ननु प्रतियोग्यवृत्तिधर्मस्य प्रतियोगितावच्छेदकत्वे व्यधिकरणधर्मस्यापि प्रतियोगितावच्छेदकत्वापत्तिः इत्यत आह व्यधिकरणेति । विभिन्नं प्रतियोगिभिन्नं सत् रजतादिकमधिकरणं यस्य स व्यधिकरणः, स चासौ धर्मश्चेति व्यधिकरणधर्मः, तेन अवच्छिन्ना प्रतियोगिता यस्याभावस्य स व्यधिकरणधर्मावच्छिन्न प्रतियोगिताकाभावः, तस्य स्वीकारात् पूर्वोक्तस्याभावस्य निषेधधीविषयत्वेऽयमेव हेतुः । तथा च—यत्र घटत्वेन पटो निषिध्यते, तत्र पटः पटाभावस्य प्रतियोगी, किन्तु पटत्वम् अभावीयप्रतियोगिताया अवच्छेदकं न भवति, पटत्वेन पटस्य निषेधाऽकरणात् किन्तु घटत्वं तत्र प्रतियोगितावच्छेदकं, तेनैव धर्मेण तस्य निषेधात् । एवं प्रकृतेऽपि लौकिकपारमार्थिकत्वेन प्रातिभासिकरजतस्य निषेधात् लौकिकपारमार्थिकत्वं व्यधिकरणमपि प्रातिभासिकरजताभावस्य प्रतियोगिताया अवच्छेदकं, न प्रातिभासिकरजतत्वं तेन रूपेण तस्य अनिषेधात् ।
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यदि स्वीकार किया जाय तो 'यह रजत नहीं है' ऐसा त्रैकालिक निषेधज्ञान होगा नहीं। किन्तु 'इस समय यह रजत नहीं है' यह ज्ञान होगा। अब 'यह घट काला नहीं है' इस ज्ञान के समान ही वह भी वर्तमान निषेध ज्ञान होगा। यह कहना भी ठीक नहीं होगा, क्योंकि 'यह रजत नहीं है' इस त्रैकालिक निषेधज्ञान में रजतत्व से अवच्छिन्न जो रजत उसमें जिसकी प्रतियोगिता है ऐसा अभाव, उस निषेधज्ञान का विषय रहता है, क्योंकि व्यधिकरण-धर्म से अवच्छिन्न प्रातिभासिक-रजत में जिसकी प्रतियोगिता है, ऐसे अभाव को हमने स्वीकृत किया है।
विवरण—शुक्तिरजत, अविद्या का कार्य है। इस कारण प्रतिभास के समय में शुक्ति में भासित होनेवाले रजत का प्रातिभासिक सत्त्व माननेपर 'यह रजत नहीं है इत्याकारक त्रैकालिक निषेध-ज्ञान उत्पन्न नहीं होगा। किंबहुना वैसा त्रैकालिक निषेध-ज्ञान हो ही नहीं सकेगा। उसका ज्ञान इस तरह हो सकेगा कि 'अब (वर्तमान काल में) यह घट श्याम नहीं' इस वाक्य से वर्तमानकालीन श्यामत्व के निषेध की ज्ञान जैसे होता है, वैसे ही 'अब यह रजत नहीं' वर्तमानकालीन निषेधज्ञान होगा। परन्तु 'यह शुक्ति है, रजत नहीं' त्रैकालिक निषेधज्ञान है। इस कारण 'यह शुक्ति पहले कभी रजत नहीं थी, इस समय भी नहीं है और भविष्य में भी वह रजत नहीं होगी' इत्याकारक जो ज्ञान होगा, वह त्रैकालिक निषेधज्ञान कहा जा सकता है। इसलिये शुक्तिरूप्य के प्रतिभास के समय उसकी प्रातिभासिक सत्ता मानने पर 'अब (वर्तमान में) यह रजत नहीं है' इतना ही ज्ञान होगा। पूर्वोक्त त्रैकालिक ज्ञान होगा नहीं। क्योंकि प्रतिभास के निवृत्त होते ही प्रातिभासिक सत्ता भी निवृत्त होती है। उस कारण व्यवहारदशा में 'यह शुक्ति, रजत नहीं' इतना ही ज्ञान उससे होगा। यह पूर्वोक्त शंका का आशय है।
विषय का भेद होने से त्रैकालिक निषेध से कोई विरोध नहीं हो पाता। क्योंकि 'यह रजत नहीं' इस प्रकार त्रैकालिक निषेधज्ञान जब होता है, तब उस निषेधज्ञान का, 'रजतत्व' विशेषण से विशिष्ट हुए रजत में जिसकी प्रतियोगिता है ऐसा अभाव, विषय नहीं होता है। किन्तु 'व्यावहारिकत्व'—इस विशेषण से विशिष्ट—प्रातिभासिक रजत में जिसकी प्रतियोगिता है—ऐसा अभाव ही 'यह रजत नहीं है' इत्याकारक निषेधज्ञान का विषय है। यहाँ के 'लौकिक पारमार्थिक' पद से 'व्यावहारिक' अर्थ समझना चाहिये। 'यह रजत नहीं' इस उदाहरण में प्रातिभासिक रजत, लौकिक-पारमार्थिक (व्यावहारिक) नहीं, इस प्रकार प्रातिभासिक रजत में जिसकी प्रतियोगिता है ऐसा जो व्यावहारिकत्वावच्छिन्नप्रतियोगिता का अभाव है। वही उस निषेध-ज्ञान का विषय है।
जिस प्रकार नैयायिकों ने कपाल पर भी पटत्वेन (पटत्वरूप से) घट का अभाव स्वीकार किया है उसी प्रकार हमने भी व्यधिकरणाभाव स्वीकार किया है।
व्यधिकरणधर्मावच्छिन्नाभावः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १३७
व्यधिकरण धर्म का अर्थ है विरुद्ध व्यावहारिक रजतादि, जिसका अधिकरण है। वह धर्म लौकिक पारमार्थिकत्व (व्यावहारिकत्व) है। उस व्यावहारिकत्व धर्म से अवच्छिन्न प्रातिभासिक रजत में जिसकी प्रतियोगिता है, वह अभाव लौकिकपारमार्थिकत्वावच्छिन्न-प्रातिभासिक रजत-प्रतियोगिताक है। यही अभाव 'यह रजत नहीं' इस निषेधज्ञान का विषय है।
तथापि आपका कथन अनुपपन्न ही प्रतीत होता है। क्योंकि व्यधिकरण-धर्म का बोध होने पर या न होने पर भी उसकी अनुपपत्ति ही है। इस आशय से शंका—
ननु¹ प्रातिभासिके रजते पारमार्थिकत्वमवगतम् न वा ? अनवगते² प्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्न³-रजतत्वज्ञानाभावादभावप्रत्यक्षानुपपत्तिः, अवगतेऽपरोक्षावभासस्य⁴ तत्कालीन-विषयसत्ता-नियतत्वाद्, रजते पारमार्थिकमप्यनिर्वचनीयं रजतवदेवोत्पन्नमिति तदवच्छिन्नरजतसत्त्वे तदवच्छिन्नाभावस्तस्मिन्⁵ कथं वर्तते ? इति चेत् ।
अर्थ— प्रातिभासिक रजत में पारमार्थिकत्व का ज्ञान हुआ है या नहीं ? ज्ञात नहीं है कहें, तो प्रतियोगितावच्छेदक (रजतत्व) से अवच्छिन्न रजत के ज्ञान में तत्त्वज्ञान का अभाव होने से, अभाव के प्रत्यक्ष की अनुपपत्ति होती है। रजतत्व ज्ञात है कहें, तो उसके अपरोक्षावभास की तत्कालीन विषयसत्ता के नियत होने से रजत में, (उसी की तरह) पारमार्थिकत्व भी अनिर्वचनीय उत्पन्न होने से तदवच्छिन्न रजत-सत्त्व होने पर वहीं तदवच्छिन्न-रजताभाव कैसे होगा ? यह आक्षेप यदि करें तो ठीक नहीं।
विवरण— जिन शुक्ति आदिकों में 'यह रजत' इत्याकारक बुद्धि उत्पन्न होती है उस रजत में, लौकिक पारमार्थिकत्व (व्यावहारिकत्व) ज्ञात होता है या नहीं ? उस रजत में व्यावहारिकत्व ज्ञात नहीं होता—यह मानने पर 'यह रजत नहीं है' इत्याकारक अभाव का प्रत्यक्ष सम्भव नहीं होगा। तथाहि—उस अभाव की प्रतियोगिता रजत में होने से उसका अवच्छेदक 'रजतत्व' है, परन्तु उस ज्ञान में तत्त्वज्ञानता (यथार्थता) नहीं होने से अभाव का प्रत्यक्ष अनुपपन्न होता है।
१. व्यधिकरणधर्मस्य अवगमे अनवगमेऽपि अनुपत्तिरिति शङ्कते 'नन्वि'त्यादिग्रन्थेन। अयमाशयः—यद्यपि व्यधिकरणधर्मावच्छिन्नप्रतियोगिताकाभावो विद्यते, तथापि तस्य ज्ञानं नैव भवेत्, व्यधिकरणधर्मावच्छिन्नस्य प्रतियोगिनो ज्ञानाभावात्। अभावज्ञानं प्रति प्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्नस्य प्रतियोगिनो ज्ञानस्य हेतुत्वात्।
२. 'मे'—इति पाठान्तरम्।
३. 'अज्ञाना०'—इति पाठान्तरम्।
४. 'मे'—इति पाठान्तरम्।
५. 'स्तत्र'—इति पाठान्तरम्।
१३८ वेदान्तपरिभाषा [ व्यधिकरणधर्मावच्छिन्नाभावः
शंका—प्रतियोगी रजत में स्थित जो प्रातिभासिक रजतत्व है, वही प्रतियोगितावच्छेदक है—यह ज्ञान होता है। अतः उसे छोड़कर व्यावहारिक रजतत्व-तक क्यों दौड़ा जाय? परन्तु यह ठीक नहीं, क्योंकि अभावज्ञान जिस रूप से प्रतियोगी को विषय करता है, उसका प्रतियोगितावच्छेदक नियमेन तद्रूप ही रहता है। 'यह रजत नहीं है' यहाँ रजत का अभावज्ञान, 'यह रजत व्यावहारिक नहीं है' इस प्रकार से प्रतियोगी को व्यावहारिकत्वरूप से विषय करता है। इसलिये उसमें व्यावहारिकत्व ही प्रतियोगितावच्छेदक है। परन्तु उसी का यदि बोध न होता हो तो उस अभाव के प्रत्यक्ष का असम्भव हो जाता है। क्योंकि अभाव के प्रत्यक्ष-ज्ञान करने में उसके प्रतियोगी का और प्रतियोगी के अवच्छेदक का ज्ञान होना आवश्यक है। बिना उसके अभाव का प्रत्यक्षज्ञान हो नहीं सकता।
दूसरा पक्ष (प्रातिभासिक रजत में स्थित पारमार्थिकत्व अवगत था) मानें तो वह भी ठीक नहीं। क्योंकि किसी भी इन्द्रियसन्निकृष्ट (सम्बद्ध) वस्तु का ही प्रत्यक्ष अवभास होता है—यह नियम है। इस कारण जैसे आप कहते हैं कि प्रातिभासिक-रजत, उसी समय (प्रतिभासकाल में ही) उत्पन्न हुआ। वैसे ही उस प्रातिभासिक-रजत पर रहनेवाला व्यावहारिकत्व भी उसी समय (प्रतिभास के समय ही) उत्पन्न हुआ—मानना उचित है, और ऐसा मानने पर 'यह रजत नहीं' इत्याकारक निषेध नहीं हो सकेगा। क्योंकि इस स्थिति में निषेध का अर्थ होगा कि 'व्यावहारिकत्व से अवच्छिन्न रजत में व्यावहारिकत्वावच्छिन्न-रजत नहीं है।' परन्तु ऐसा कहने में व्याघात दोष होगा। इस कारण लौकिक पारमार्थिकत्व से (व्यावहारिकत्व से) अवच्छिन्न—प्रातिभासिक रजत है प्रतियोगी जिसका, ऐसा अभाव, 'यह रजत नहीं' इत्याकारक निषेधज्ञान का विषय नहीं बन सकता।
वादी के द्वारा ऐसी शंका उपस्थित होने पर ग्रन्थकार उसका परिहार करते हैं—
न¹। पारमार्थिकत्वस्याधिष्ठाननिष्ठस्य रजते प्रतिभाससम्भवेन रजतनिष्ठ-पारमार्थिकत्वोत्पत्त्यनभ्युपगमात्। ²यत्रारोप्यमसन्निकृष्टं, तत्रैव प्रातिभासिक-वस्तूत्पत्तेरङ्गीकारात्। अत³ एवेन्द्रिय⁴सन्निकृष्टतया
१. अवगमपक्षमालम्ब्य परिहारः नेतिग्रन्थेन।
२. लौकिकपारमार्थिकत्वोत्पत्तिः कुतो नाभ्युपगम्यत इत्याशङ्कायाः परिहारः 'यत्रेति' ग्रन्थेन।
३. अतो यत्रारोप्यं सन्निकृष्टं न तत्र प्रातिभासिकवस्तूत्पत्तिः स्वीक्रियत इत्याह 'अत एवे'तिग्रन्थेन।
४. यत्र सन्निकृष्टमपि जपाकुसुमं हस्तादिद्रव्यान्तरव्यवधानात् असन्निकृष्टं तत्र स्फटिके अनिर्वचनीय-लौहित्योत्पत्तिः कुतो नांगीक्रियत इत्याशङ्कते 'नन्वित्यादिना'।
व्यधिकरणधर्मावच्छिन्नाभावः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १३९
जपा$^१$कुसुमगत-लौहित्यस्य स्फटिके भानसम्भवान् न स्फटिकेऽनिर्वचनीयलौहित्योत्पत्तिः ।
**अर्थ—**ऐसी शंका उठाना ठीक नहीं । क्योंकि अधिष्ठाननिष्ठ पारमार्थिकत्व का रजत में प्रतिभास होना शक्य है (प्रातिभासिक रजत में शुक्ति के 'इदम्' अंश के साथ पारमार्थिकत्व का भी प्रतिभास संभव होने से) हमें रजतनिष्ठ पारमार्थिकत्व की तत्काल उत्पत्ति नहीं माननी पड़ती, क्योंकि जहाँ पर आरोप्य सन्निकृष्ट न होकर इन्द्रिय से असन्निकृष्ट (असम्बद्ध) रहता है वहीं पर प्रातिभासिक वस्तु की उत्पत्ति को हम मानते हैं । इसी कारण (इन्द्रियसन्निकृष्टत्व के कारण) गुड़हर (जपापुष्प) की लालिमा स्फटिक में भासित होती है । अत एव स्फटिक में उसकी अनिर्वचनीय उत्पत्ति की कल्पना नहीं करनी पड़ती ।
इस पर एक सूक्ष्म शंका और समाधान—
नन्वेवं यत्र जपा$^२$कुसुमं द्रव्यान्तर-व्यवधानादसन्निकृष्टं, तत्र लौहित्य-प्रतीत्या प्रातिभासिकं लौहित्यं स्वीक्रियतामिति चेत् । न । इष्टत्वात् । एवं प्रत्यक्षभ्रमान्तरेष्वपि प्रत्यक्षसामान्यलक्षणाऽनुगमो यथार्थप्रत्यक्षलक्षणासद्भावश्च दर्शनीयः ।
अर्थ—(शंका) इन्द्रियसन्निकृष्ट जपाकुसुम भी जब दूसरे (हस्तादि) द्रव्य से व्यवहित हो जाता है तब वह पुष्प, इन्द्रिय से असन्निकृष्ट हो जाता है, तथापि स्फटिक में लालिमा प्रतीत होती ही है। इस कारण ऐसे स्थलों पर प्रातिभासिक लौहित्य का स्वीकार करना ही पड़ेगा (ऐसे समय पर स्फटिक में अनिर्वचनीय लौहित्य उत्पन्न होता है—यह कहना पड़ेगा)।
यह शंका करना ठीक नहीं, क्योंकि वह तो हमें इष्ट ही है (ऐसे स्थलों में आरोप्य की अनिर्वचनीय उत्पत्ति होना तो हमें स्वीकार ही है) और इसी तरह अन्य प्रत्यक्ष
इष्टापत्या परिहारः कृतः ।
ननु इन्द्रियसन्निकृष्ट-प्रभायाः स्फटिके भानसंभवात् अनिर्वचनीयलौहित्योत्पत्तिः अनुपपन्नेति चेन्न । अस्वच्छद्रव्यस्य जपाकुसुमस्य प्रभाया एव असिद्धेः । तथा चोक्तं पञ्चपादिकायाम्—"यथा पद्मरागादिप्रभा निराश्रयापि उन्मुखा उपलक्ष्यते न तथा जपाकुसुमादेः" । तथा च 'असन्निहितस्य परत्र अवभासः अध्यासः' इत्यध्यासलक्षणं न क्वापि व्यभिचरति ।
१. '-वा-' इति पाठान्तरम् ।
२. '-वा-' इति पाठान्तरम् ।
१४० वेदान्तपरिभाषा [ व्यधिकरणधर्मावच्छिन्नाभावः
के 'चित्त्व' रूप सामान्य लक्षण की अनुवृत्ति और यथार्थ-प्रत्यक्ष-लक्षण का असद्भाव ( नास्तित्व ) समझना चाहिये ।
विवरण--आरोप्य पदार्थ के इन्द्रियसन्निकृष्टत्व और इन्द्रियासन्निकृष्टत्व रूप से दो भेदों की कल्पना कर जहाँ जपाकुसुम की तरह आरोप्य, इन्द्रियसन्निकृष्ट हो वहाँ स्फटिक में लालिमा अनिर्वचनीय पैदा होती है, यह मानना नहीं पड़ता, परन्तु जहाँ आरोप्य रजतादि, इन्द्रियसन्निकृष्ट नहीं रहता, वहाँ शुक्ति आदि में अनिर्वचनीय रजतादि की उत्पत्ति होना तो हम भी मानते हैं। जहाँ आरोप्य असन्निकृष्ट हुआ कि वहाँ आरोप्य की अनिर्वचनीय उत्पत्ति को हम मानते हैं, इस नियम को ध्यान में रखने से उपर्युक्त शंका नहीं उठेगी ।
शंका--इन्द्रिय से सन्निकृष्ट हुई प्रभा का स्फटिक में भास हो सकेगा, तब अनिर्वचनीय लौहित्य की उत्पत्ति मानना तो अनुपपन्न भी होगा। परन्तु यह शंका ठीक नहीं । क्योंकि जपाकुसुम अस्वच्छ द्रव्य है इस कारण उसकी प्रभा का ही संभव नहीं । पंचपादिका में भी 'जैसी पद्मरागादि मणियों की प्रभा, बिना आश्रय के भी ऊपर की ओर फैली दीखती है, वैसी जपाकुसुमादिकों की प्रभा, ऊपर या चारों ओर फैली नहीं दीखती' कहा है । इसलिये 'असन्निहित' = असमीप के पदार्थ का 'परत्र' अन्य पदार्थ में अवभास होना, यह अध्यास का लक्षण कहीं पर भी व्यभिचरित नहीं होने पाता ।
शंका--शुक्ति में रजत के अध्यास का संभव होने पर भी अहंकारादिकों का आत्मा में अध्यास नहीं हो सकता। क्योंकि आत्मा, अध्यास का अधिष्ठान हो नहीं सकता। कारण यह है कि अधिष्ठान का अध्यस्यमान के सदृश होना, ( जिसका उस पर अध्यास करना है उसके समान होना ) दो अंशों से युक्त होना, परिच्छिन्न और अध्यस्यमान के साथ ही एक ज्ञान का विषय बनने योग्य होना आवश्यक होता है । जैसे--शुक्ति रूप अधिष्ठान, अध्यस्यमान रजत के समान, 'इदं' और त्रिकोणत्वादि दो अंशों से युक्त, परिच्छिन्न = मर्यादित और रजत के साथ एक ही ज्ञान का विषय बनने योग्य होता है, परन्तु आत्मा में यह अधिष्ठान की सामग्री नहीं होती । इसलिये आत्मा, अहंकारादिकों के अध्यास का अधिष्ठान नहीं बन पाता ।
समाधान--यह शंका ठीक नहीं है । क्योंकि अहंकारादि कार्य अविद्या में प्रतिबिम्बित हुए चैतन्य पर आरोपित किया जाता है । इसका कारण यह है कि कार्य का अध्यास कारणावच्छिन्न में होना ही उचित है । अहंकार का कारण अज्ञान है । उस अज्ञान से अवच्छिन्न = युक्त, विशिष्ट चैतन्य पर कार्यरूप अहंकार का अध्यास होना योग्य ही है ।
शंका--ऐसा कहने पर समानाश्रयत्व का भंग होता है ।
सिद्धान्ती--समानाश्रयत्व का भंग नहीं होता । क्योंकि बिम्ब और प्रतिबिम्ब की एकता होने से समानाश्रयत्व का भंग नहीं होता । इसी कारण अहंकारादिकों के अधिष्ठानभूत चैतन्य का अभिधेयत्वादि ( विषयत्वादि ) भी ठीक बन जाता है । अहंकार
व्यधिकरणधर्मावच्छिन्नाभावः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १४१
जैसे घटादिकों से पृथक्तया प्रतीत होता है, वैसे ही आत्मा भी, घटादिकों से विलक्षण प्रत्यय का विषय बनता है। घटादि 'इदम्' ( यह ) प्रत्यय का विषय होता है। आत्मा, अहंकारादि पदार्थ 'अहम्' आकार से प्रतीत होते हैं, इस कारण अहंकारादि अध्यस्यमान पदार्थ के साथ आत्मा का सादृश्य भी बन जाता है। और अविद्या के कारण उसके सांशत्व, विषयत्व, परिच्छिन्नत्व भी संभव होते हैं। इसलिये आत्मा, अहंकारादि आरोप्यों का अधिष्ठान हो सकता है। परन्तु अध्यास में प्रमाणदोष की आवश्यकता होती है। इस अध्यास में अविद्या को ही दोषत्व है। आत्मा और अहंकार के अध्यास में, अविद्या ही महादोष है। आत्मा के विषयत्व, परिच्छिन्नत्व आदि मानने में अपसिद्धान्त की शंका भी नहीं करनी चाहिये। क्योंकि आत्मा सदैव अविषय ही होता है—यह नियम नहीं। उसे 'अस्मत्प्रत्ययविषयत्व' = 'मैं' प्रत्यय का विषयत्व है' इस प्रकार अध्यासभाष्य में भाष्यकार ने ही मुख्य आत्मा को विषयत्वादि न होने पर भी अमुख्य आत्मा का विषयत्व स्वीकृत किया है।
इसके अतिरिक्त, 'साक्षात् प्रकाशमानत्व ही अधिष्ठानत्व का प्रयोजक है' 'उस अधिष्ठान का विषयत्व भी अधिष्ठानत्व का प्रयोजक है—यह गौरवदोष के कारण नहीं कहा जा सकता। परन्तु अधिष्ठान को विषयत्व के बिना ही साक्षात् प्रकाशमानत्व होता है—यह कहीं भी अनुभव में नहीं आता। ऐसी शंका करना ठीक नहीं, क्योंकि न्याय के मत में अधिष्ठान को क्वचित् मन के द्वारा अपरोक्षत्व रहता है और कहीं दो नेत्रों से अपरोक्षत्व होता है। वैसे ही हमारे मत में कोई बाधक न होने से अधिष्ठान में स्वयं भी अपरोक्षता रहती है।
शंका—स्वयं अपरोक्ष होनेवाले आत्मा में अध्यास का कोई उदाहरण क्या आप दिखा सकते हैं ?
समाधान—स्वयं अपरोक्ष होनेवाले ( स्वयं प्रकाश ) आत्मा में अज्ञान, शोक, मोह, स्वप्नादिकों का अध्यास हुआ प्रतिदिन अनुभव में आने से न्याय के मत में नेत्रों का विषय होनेवाली शुक्ति में ( अधिष्ठान में ) जैसा रजतादि भ्रम स्वीकार किया गया है वैसे ही स्वयं अपरोक्ष होनेवाले आत्मा में अहंकारादिकों का भ्रम होता है। इसमें कोई बाधक नहीं है।
शंका—स्वयंप्रकाश आत्मा का ज्ञात अंश और अज्ञात अंश का असम्भव होने से अधिष्ठानत्व कैसे ?
समाधान—कुछ दूरी पर स्थित दो वृक्ष वृक्षत्वेन प्रतीत होने पर भी उनका यथार्थ भेद-ज्ञान नहीं होता—यह माना जाता है। ऐसा न माना जाय तो उनके अभेद-भ्रान्ति का उदय ही नहीं होगा। इसी उदाहरण के ज्ञात हुए आत्मा में भी अज्ञातत्व का सम्भव होने से उसमें अधिष्ठानत्व की सम्भावना हो सकती है। क्योंकि भेद ही वस्तु का स्वरूप है। वस्तु का स्वरूप धर्म नहीं है। क्योंकि धर्म को वस्तु का स्वरूप मानने पर
| १४२ | वेदान्तपरिभाषा | [ उक्त-प्रत्यक्षस्य पुनर्द्वैविध्यम् |
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अन्योन्याश्रय दोष होगा। यह संक्षेपशारीरक के प्रथम अध्याय में बताया गया है। इसी न्याय से शंख पीतवर्ण है, शर्करा कटु है आदि-आदि अन्य प्रत्यक्ष भ्रमों में भी, प्रत्यक्ष-प्रमा के ‘चित्त्व’ रूप सामान्यलक्षण की अनुवृत्ति होती है। ‘चित्त्व’ लक्षण भ्रम तथा प्रमा (यथार्थ ज्ञान) दोनों के लिये साधारण प्रत्यक्ष-लक्षण है। इसलिये ‘चित्त्व’ की भ्रम में अतिव्याप्ति की शंका नहीं करनी चाहिये, क्योंकि सामान्य-लक्षण होने से भ्रम भी उसका लक्ष्य है। ‘प्रमाणचैतन्य का अबाधित, योग्य, वर्तमान, विषयावच्छिन्न चैतन्य के साथ अभिन्नत्व’ ही यथार्थ-प्रत्यक्ष का लक्षण है। इस कारण इस लक्षण की भी भ्रम में अतिव्याप्ति नहीं है, क्योंकि भ्रम का विषय बाधित होता है, और प्रमा का विषय अबाधित होता है।
यहाँ तक ‘ज्ञानगत प्रत्यक्ष’ और ‘विषयगत प्रत्यक्ष’ दोनों प्रकार के प्रत्यक्ष, जीव-साक्षि और ईश्वरसाक्षि भेद से दो प्रकार का है—बताया गया। अब अन्य प्रकार से उसका विभाग बताते हैं—
उक्तं प्रत्यक्षं प्रकारान्तरेण द्विविधम्, इन्द्रियजन्यं¹ तदजन्यं
१. इन्द्रस्य इमानि इन्द्रियाणि इति व्युत्पत्त्या आत्मनः सुखादिभोक्तृत्वे साधनानि इन्द्रियपदेन व्यवह्रियन्ते इति श्रीवाचस्पतिमिश्रपादाः। इन्द्रियलक्षणन्तु शास्त्रदीपिकायां "यत् सम्प्रयुक्तेऽर्थे विशदावभासं ज्ञानं जनयति तत् इन्द्रियम्।"
इन्द्रियसद्भावे प्रमाणानि तु ‘रूपाद्युपलब्धयः करणसाध्याः कार्यत्वात् घटादिवत्’ इत्यनुमानम् “इन्द्रियाणि हयानाहुरि”ति काठकश्रुतिः, “मनः षष्ठानीन्द्रियाणी”ति स्मृतिश्च भवन्ति। तथा च इन्द्रियजन्यमित्यत्र इन्द्रियशब्देन ज्ञानेन्द्रियाणि पञ्च गृह्यन्ते; न तु नैयायिकवत् षट्, नापि दश, मनसः इन्द्रियत्वनिराकरणात्, कर्मेन्द्रियाणां ज्ञानाऽजनकत्वाच्च। तत्र ‘इन्द्रियाणि अप्राप्यकारीणि’ इति सौगता मन्यन्ते, तन्निराकर्तुं “सर्वाणि चेन्द्रियाणि स्व-स्वविषयसंयुक्तान्येव प्रत्यक्षज्ञानं जनयन्ति” इत्युक्तम्। तत्र विषयसंयोगो हि इन्द्रियाणां विषयदेशगमनात्, विषयाणामिन्द्रियदेशम्प्रत्यागमनाच्च भवितुमर्हति। तत्र किं सर्वेषामिन्द्रियाणां विषयदेशगमनम्, उत विषयाणां सर्वेषामिन्द्रिय-सम्बन्धो विवक्षितः, आहो केषाञ्चनेन्द्रियाणां विषयदेशगमनं, केषाञ्चन विषयाणामिन्द्रिय-देशगमनमिति विषयविवेको विवक्षितः इत्याशङ्कायामाह—‘तत्रेति’। ‘स्व-स्थानस्थिता-न्येव’ इत्यत्र ‘एव’कारेण चक्षुरादिवत् स्वस्थानस्थितानामेषां विषयदेशगमनं व्यव-च्छिद्यते। अर्थात् घ्राण-रसन-त्वगिन्द्रियाणि स्व-स्वदेशम्प्रति आगतैर्विषयैः संयुक्तानि भवन्ति। इन्द्रियाणां भौतिकानां द्रव्यरूपत्वात् गमनसंभवः। विषयदेशं गत्वा विषय-पर्यन्तं विकासेन सम्बद्धेत्यर्थः। चक्षुरादेरतिस्वच्छद्रव्यतया पूर्वदेशाऽपरित्यागेन द्रुतगत्या विषयव्याप्त्या न विषयसम्बन्धवेलायां देहस्य निरिन्द्रियत्वापत्तिः, न वा ध्रुवमण्डलादि-दर्शने विलम्बापत्तिः।
उक्त-प्रत्यक्षस्य पुनर्द्वैविध्यम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १४३
चेति । तत्रेन्द्रियाजन्यं सुखादि-प्रत्यक्षम्, मनस इन्द्रियत्व-निराकरणात् । इन्द्रियाणि पञ्च—घ्राण-रसन-चक्षुःश्रोत्र-त्वगात्मकानि । सर्वाणि चेन्द्रियाणि स्व-स्व-विषयसंयुक्तान्येव प्रत्यक्षज्ञानं जनयन्ति ।
ननु तैजसस्य चक्षुषः गतिमत्त्वात् परिच्छिन्नत्वाच्च विषयदेशगमनं भवतु, परं श्रोत्रस्य आकाशरूपस्य अपरिच्छिन्नत्वेन ( विभुत्वेन ) निष्क्रियत्वात् न विषयदेशगमनसंभवः । अस्याः शंकायाः परिहारः ‘श्रोत्रस्यापि’ इति ग्रन्थेन कृतः यथा गोलकाधिष्ठानं चक्षुः तैजसाद् भूतादुत्पन्नं परिच्छिन्नं वस्त्वन्तरम्, तथा श्रोत्रमपि कर्णशष्कुल्यधिष्ठानमाकाशादुत्पन्नं परिच्छिन्नं वस्त्वन्तरम् । तथा चोक्तं श्लोकवार्तिके—"तेनाकाशैकदेशो वा यद्वा वस्त्वन्तरं भवेत्’ इति । यथा अपरिच्छिन्नस्य तेजसो निष्क्रियत्वेऽपि परिच्छिन्नस्य तस्य क्रियावत्त्वात् विषयदेशगमनं, तथैवाकाशादुत्पन्नस्य परिच्छिन्नस्य श्रोत्रस्य क्रियावत्त्वाद् विषयदेशगमनम् । तदुक्तं विवरणे चतुर्थवर्णके—"चक्षुः श्रोत्रयोरपि प्राप्यकारित्वमनुमीयते, तस्माद्भौतिकानि परिच्छिन्नानि प्राप्यकारीणीन्द्रियाणि" । बिन्दुसन्दीपनेऽपि—"चक्षुर्वच्छ्रोत्रस्यापि पञ्चभूतकार्यत्वेन क्रियाशक्तिमत्वात् दूरदेशगमनसामर्थ्यमतो गत्वैव गृह्णाति" इति ।
आकाशः श्रोत्रमिति पक्षे यद्यपि श्रोत्रं विभुः, तथापि तत्पक्षे सर्वेषामेकश्रोत्रत्वादि प्रसङ्गात् न स पक्षः समीचीनः । तदुक्तं श्लोकवार्तिके—"आकाशश्रोत्रपक्षे च विभुत्वात् प्राप्तितुल्यता । दूरभावेऽपि शब्दानामिति ज्ञानं प्रसज्यते ॥ श्रोत्रस्य चैवमेकत्वं सर्वप्राणभृतां भवेत् । तेनैकश्रुतिवेलायां शृणुयुः सर्व एव ते ॥' इति । [ श्लो० वा० अ० ६ श्लो० ५६-५७½ पृ० ७४५ ]
कर्णशष्कुल्यवच्छिन्नो नभो भागः श्रोत्रमिति पक्षोऽपि एतेन पराकृतः । निरवयवस्य आकाशस्य भागकल्पनाऽसंभवात् । तदुक्तं श्लोकवार्तिके—"तस्यानवयवत्वाच्च न धर्मा-धर्मसंस्कृतः नभोदेशो भवेच्छ्रोत्रं व्यवस्थाद्वयसिद्धये । वैशेषिकादिसिद्धान्तेष्वेवं तावत् प्रसज्यते ।" [ श्लो० वा० अ० ६ श्लो० ५८-५९ पृ० ७४५ ]
अस्तु वा कर्णशष्कुल्यवच्छिन्नाकाशः श्रोत्रमिति, एवमपि तस्य परिच्छिन्नस्यापि विषयदेशगमनं विरुद्धम् । उक्तं हि शाबरभाष्ये—"यदि श्रोत्रं संयोग-विभागदेशमागत्य शब्दं गृह्णीयात्, तथापि तावदनेकदेशता कदाचिदवगम्येत, न च तत् संयोगदेशमागच्छति । प्रत्यक्षा हि कर्णशष्कुली तद्देशस्था गृह्यते" इति । श्लोकवार्तिकेऽप्युक्तम्—"वक्तृवक्त्रप्रदेशानां भिन्नत्वाद् भिन्नदेशता । श्रोत्रागमनपक्षे स्यात् तद्देशे त्वेकदेशता ॥" "वक्त्र्येकत्र भिन्नेषु श्रोत्रेषु स्याद्विपर्ययः । तत्र हि श्रोत्रो देशानां भिन्नत्वात् भिन्नदेशता । तदागमे तु वक्त्रैक्यादेकदेशत्वसंभवः ॥" [ श्लो० वा० अ० ६ श्लो० १९१½, १९५½ पृ० ७७८-७७९ ]
एवं दिशः श्रोत्रमिति पक्षाङ्गीकारेऽपि श्रोत्रस्य विषयदेशगमनं विरुद्धमेव । अत एव—"अभिघातेन हि प्रेरिता वायवः स्तिमितानि वाय्वन्तराणि प्रतिबाधमानाः
१४४ प्रत्यक्षपरिच्छेदः [ उक्त-प्रत्यक्षस्य पुनर्द्वैविध्यम्
तत्र घ्राण-रसन-¹त्वगिन्द्रियाणि स्वस्थानस्थितान्येव गन्ध-रस-स्पर्शा- पलम्भान्जनयन्ति। चक्षुःश्रोत्रे तु स्वत एव विषयदेशं गत्वा स्वस्व- विषयं गृह्णीतः। श्रोत्रस्यापि चक्षु²रादिवत् परिच्छिन्नतया भेर्यादि- देशगमन-सम्भवात्। अत एवानुभवो भेरीशब्दो मया श्रुत इति। ³वीचीतरङ्गादि-न्यायेन कर्णशष्कुली-प्रदेशेऽनन्तशब्दोत्पत्ति-कल्पना-
सर्व रोदिक्कान् संयोगविभागान् उत्पादद्यन्ति, यावद्वेगमभिप्रतिष्ठन्ते। ते च वायोर- प्रत्यक्षत्वात् संयोगविभागा नोपलभ्यन्ते, अनुपरतेष्वेव तेषु शब्दः उपलभ्यते, नोपरतेषु। अतो न दोषः। अत एव चानुवातं दूरादुपलभ्यते शब्दः" इति शब्दस्यैव ध्वन्यपर- पर्यायवायवीयसंयोगविभागैः श्रोत्रदेशं प्रत्यागमनमिति शाबरभाष्योक्तिरुपपद्यते। एवं च 'चक्षुरिव श्रोत्रमपि विषयदेशं गत्वा विषयं गृह्णाति इत्युपन्यासो न मीमांसक- मतेन, नापि वैशेषिकादिमतेन कापिलसांख्यादिमतेन वा कापिल-पातञ्जल्योर्हि मते अनित्यः शब्दः, स च आकाशे एव उत्पद्यते चेति सिद्धान्तः। एवं च आकाशभागस्यैव तन्मते श्रोत्रत्वेऽपि न शब्ददेशं प्रति आकाशगमनं संभवति। अतः केन मतेन श्रोत्रस्य विषयदेशम्प्रति गमनमिति पक्ष उपन्यस्त इति विचारणीयम्।
तत्र श्लोकवार्तिककाराः—"नावश्यं श्रोत्रमाकाशमस्माभिश्चाभ्युपेयते। न चानवयवं व्योम जैनसांख्यनिषेधतः॥ तेनाकाशैकदेशो वा यद्वा वस्त्वन्तरं भवेत्॥ कार्यार्थापत्ति- गम्यं नः श्रोत्रं प्रतिनरं स्थितम्। यद्यपि व्यापि चैकञ्च तथापि ध्वनिसंस्कृतिः॥ अधिष्ठा- नेषु सा यस्य तच्छब्दम्प्रतिपत्स्यते॥ [ श्लो० वा० अ० ६ श्लो० ६६-६८३ पृ० ७४७-७४८ ] इत्यादिना श्रोत्ररूपं बहुधा वर्णयन्ति। तत्र वस्त्वन्तरमेव श्रोत्रमिति पक्षे एकदेशिसम्मते तस्य परिच्छिन्नस्य विषय-देशगमनं भाष्याद्यविरुद्धम्, इति तदनुसारी एवायं ग्रन्थः। एवञ्च श्रोत्रस्य शब्ददेशं प्राप्तत्वात् नैयायिकप्रक्रिया गौरवग्रस्ता, अत एव उपेक्षणीया।
श्रोत्रं स्वसंयुक्तावच्छिन्नत्वसम्बन्धेन शब्दस्य ग्राहकम्, तत्पुरुषीयश्रोत्रावच्छेदेन अनुत्पद्यमानस्यापि दूरस्थस्य शब्दस्य तत्पुरुषीयश्रोत्रेण ग्रहणात्, दूरे शब्द इति प्रत्य- यात्। स्वं श्रोत्रं तत्संयुक्तः शब्दस्य अवच्छेदको देशः, यस्मिन् श्रोत्रसंयुक्ते देशे आकाशे शब्दः उत्पद्यते, स एव शब्दस्य अवच्छेदको देशः, तेनावच्छिन्नः शब्दः इति शब्दे स्वसंयुक्तावच्छिन्नत्वं विद्यते इति 'स्वसंयुक्तावच्छिन्नत्वसंबंधेन' श्रोत्रं शब्दस्य ग्राहकं भवति।
१. 'त्वगात्मकानीन्द्रि०' इति पाठान्तरम्। २. 'क्षुर्वत्परि०'—इति पाठान्तरम्। ३. वीचीतरङ्गादिन्यायेन—आदिपदेन 'कदम्बमुकुलन्यायोऽवगन्तव्यः। तत्र- वीचीतरङ्गन्यायः-वीचेस्तरङ्गः ततोऽपि वीच्यन्तरः ततोऽपि तरङ्गान्तरमिति न्यायः।
उक्तप्रत्यक्षस्य पुनर्द्वैविध्यम् प्रत्यक्षपरिच्छेदः १४५
गौरवम्, भेरीशब्दो मया श्रुत इति प्रत्यक्षस्य भ्रमत्वकल्पना-गौरवं च स्यात् । तदेवं व्याख्यातं प्रत्यक्षम् ॥ श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्र-विरचितायां वेदान्त-परिभाषायां प्रत्यक्ष-परिच्छेदः समाप्तः । --:--
'अर्थ--यहाँतक बताया हुआ प्रत्यक्ष प्रकारान्तर से दो प्रकार का है । १. इन्द्रियजन्य प्रत्यक्ष और २. इन्द्रियाजन्य प्रत्यक्ष । उनमें सुखादिप्रत्यक्ष इन्द्रियाजन्य प्रत्यक्ष है, क्योंकि हमने मन के इन्द्रियत्व का निराकरण किया है । घ्राण, रसन, चक्षु, श्रोत्र और त्वक्--ये पाँच इन्द्रियाँ हैं । सब इन्द्रियां अपने-अपने विषय से संयुक्त होने पर ही प्रत्यक्ष ज्ञान को पैदा करती हैं । परन्तु उनमें से घ्राण, रसन और त्वक् तीन इन्द्रियाँ अपने स्थान में स्थित रहती हुई ही गंध, रस और स्पर्श विषयों का क्रमशः प्रत्यक्ष ( अनुभव ) उत्पन्न करती हैं । परन्तु चक्षु और श्रोत्र दो इन्द्रियाँ स्वयं ही जहाँ विषय हो वहाँ जाकर अपने-अपने विषयों का ग्रहण करती हैं । चक्षु के समान परि- च्छिन्न होने से श्रोत्र का भी भेरी, मृदंगादि स्थानों में गमन संभव है । इसी कारण 'भेरी शब्द को मैंने सुना' 'मृदंगध्वनि को मैंने सुना' अनुभव होता है । नैयायिक वीचीतरंग न्याय से कर्णशष्कुली के प्रदेश में अनन्त शब्दों की उत्पत्ति मानते हैं । परन्तु इस प्रकार मानने में गौरव है और 'मैंने भेरी का शब्द सुना' इस प्रत्यक्षज्ञान में भ्रम की कल्पना करना भी दूसरा गौरव है । इस प्रकार हमने प्रत्यक्ष का व्याख्यान किया ।
विवरण—इन्द्रियजन्य ( इन्द्रिय से उत्पन्न हुआ ) और इन्द्रियाजन्य ( इन्द्रिय से उत्पन्न न हुआ ) इस भेद से प्रत्यक्ष दो प्रकार का है । यहाँ इन्द्रियजन्य पद के इन्द्रिय शब्द से पाँच ज्ञानेन्द्रियों का ग्रहण किया जाता है । नैयायिकों की तरह छह इन्द्रियाँ या ओरों की तरह पाँच कर्मेन्द्रिय और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ मिलकर दस इन्द्रियाँ नहीं मानी जाती । क्योंकि कर्मेन्द्रियों को ज्ञान-जनकत्व नहीं तथा मन को इन्द्रियत्व नहीं--इस बात को हमने पहले बताया है ।
सन्तानस्य सर्वतः प्रसरो नास्ति इति सर्वतः प्रसरः शब्दसन्तानस्य कदम्बमुकुलन्यायेनैव संभवतीत्यभिप्रेत्य केचिदस्य ग्रन्थस्य कदम्बमुकुलन्यायोपलक्षणत्वं वर्णयन्ति । इत्थं च शब्दस्य अनित्यतावादो न युक्तः ।
कदम्बमुकुलन्यायः--कदम्बो वृक्षविशेषः, तस्य मुकुलः ईषद् विकसितपुष्पं कलिकेति यावत् । गोलाकार-कदम्बपुष्पस्य गोलके सर्वावयवेषु युगपत् पुष्पाणामुत्पत्तिः । अर्थात् कदम्बवृक्षस्य कुड्मलं प्रथमवृष्टिपाते सर्वतः दशसु दिक्षु अपि सहसा विक- सति । तद्वत् एकस्मात् प्रथमोत्पन्नात् शब्दात् सर्वदिक्कानि दीर्घदीर्घाणि शब्दवृं- लानि उत्पद्यन्ते ।
१४६ | वेदान्तपरिभाषा | [ उक्तप्रत्यक्षस्य पुनर्द्वैविध्यम्
इन्द्रियों के अस्तित्व में यदि प्रमाण पूछो तो दो प्रमाण हैं—एक अनुमान¹ और दूसरी श्रुति । १--रूपादि ज्ञान सकरणक हैं, २--क्योंकि उन्हें क्रियात्व है, ३--छेदन क्रिया की तरह । इस अनुमान से इन्द्रियों का अस्तित्व सिद्ध होता है । काष्ठादिकों का छेदन ( काटना ) क्रिया है । कोई भी क्रिया बिना करण ( साधन ) के संभव नहीं होती । रूपादिकों का ज्ञान भी क्रिया है । क्रिया कहते ही वह सकरणक होनी चाहिये । अर्थात् जिसके व्यापार से रूप का ज्ञान होता है वह रूप-ज्ञान में करण है । जिससे शब्द का ज्ञान होता है वह श्रोत्र, इत्यादि अनुमान से घ्राणादि ज्ञानेन्द्रियों की सिद्धि होती है । उसी तरह 'जीवात्मा शरीर त्यागकर जब जाने लगता है तब उसके पीछे-पीछे सब प्राण ( इन्द्रियाँ ) शरीर छोड़कर जाते हैं' ( बृ. उ. ४।३।३८ ) यह श्रुति भी इस विषय में प्रमाण है ।
बौद्धों का कहना है कि 'इन्द्रियाँ, विषयों को बिना प्राप्त हुए ही विषयज्ञान कराती हैं' अतः इनका निराकरण करने के लिये ग्रन्थकार कहते हैं कि 'ये सब ज्ञानेन्द्रियां अपने-अपने विषयों से संयुक्त होकर ही स्व-स्व विषय का ज्ञान उत्पन्न करते हैं ।
परन्तु उसमें भी फलबलकल्प्य विशिष्ट स्वभाव का आश्रय करके अवान्तर भेद बताते हैं । घ्राण, रसन और त्वक् तीन इन्द्रियाँ नासिकाग्र, जिह्वाग्र और समस्त शरीर आदि अपने-अपने स्थान में स्थित होकर ही गन्ध, रस और स्पर्श आदि स्व-स्व विषय का अनुभव उत्पन्न करते हैं । ( वे अपने स्थानों से निकलकर विषय के समीप नहीं पहुँचते किन्तु उनके समीप आये हुए गन्धादि विषयों का ग्रहण करते हैं ) परन्तु चक्षु और श्रोत्र दो इन्द्रियाँ अपने गोलकादि स्थान से बाहर निकलकर विषय-प्रदेश में पहुँचती हैं और क्रमशः रूप और शब्द का ग्रहण करती हैं ।
शंका—अपने स्थान से निकलकर विषय के समीप चक्षुरिन्द्रिय के जाने पर भी श्रोत्रेन्द्रिय का विषय प्रदेश में पहुँचना सम्भव नहीं । क्योंकि कर्णशष्कुली से अवच्छिन्न हुए आकाश का विषयप्रदेश में जाना कैसे हो सकता है, कारण, श्रोत्र आकाश रूप है और आकाश सर्वव्यापक है ।
समाधान—श्रोत्रेन्द्रिय, आकाश के सत्त्वगुण से उत्पन्न हुआ है । यद्यपि वह व्यापक आकाश से उत्पन्न हुआ है, तथापि तेज आदि के सत्त्वगुण से उत्पन्न हुए चक्षुरादिकों की तरह परिच्छिन्न है । इस कारण उसका भेरी प्रभृतियों के प्रदेश में जाना संभव है । शब्द प्रदेश में श्रोत्र का गमन होने के कारण ही ( जहाँ शब्द पैदा होता है वहाँ श्रोत्र के पहुँचने से ही ) 'मैंने नगाड़े का शब्द सुना, मैंने गाय का शब्द सुना' इत्यादि अनुभव होता है । नैयायिक श्रोत्र और शब्द के संयोग की व्यवस्था, वीचीतरंग न्याय से लगाते हैं । वीची से तरंग, उससे दूसरा, उससे तीसरा इस तरह क्रम से असंख्य तरंग
१. 'रूपादिज्ञानं सकरणकं क्रियात्वात् छिदिक्रियावत्' ।
उक्तप्रत्यक्षस्य पुनर्द्वैविध्यम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १४७
जैसे उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार नगाड़े और दण्ड के संयोग से वहाँ के आकाश मे प्रथम शब्द उत्पन्न होता है, इसी असमवायिकारण से दूसरा शब्द उत्पन्न होता है, उससे तीसरा शब्द उत्पन्न होता है, इस परम्परा से श्रोत्रेन्द्रिय से संयुक्त होने वाले अन्त्य शब्द की उत्पत्ति होती है, और स्वस्थान पर स्थित श्रोत्रेन्द्रिय से उस अन्त्य शब्द का सम्बन्ध होकर शब्द का प्रत्यक्षज्ञान होता है । यह नैयायिकों की प्रक्रिया है ।
परन्तु इस प्रक्रिया में अनन्त शब्द और उनकी उत्पत्ति इत्यादि गुरुकल्पना (कल्पनागौरव) करनी पड़ती है । 'वीचीतरंगादि' यहाँ आदि शब्द से 'कदम्ब-मुकुल' न्याय भी समझना चाहिए । कदम्ब-पुष्प के चारों ओर पंखुड़ियाँ जैसी एक-दम फैलती हैं, उसी तरह प्रथम पैदा हुए एक शब्द से दस दिशाओं में दस शब्द उत्पन्न होते हैं, उससे और दस, इस क्रम से उत्तरोत्तर शब्दों की उत्पत्ति होकर जहाँ कर्ण-शष्कुली प्रदेश होगा वहाँ उससे उस शब्द का सम्बन्ध होता है । नैयायिकों की प्रक्रिया में कल्पनागौरव के सिवाय एक ओर दोष होता है । नगाड़े का शब्द सुनकर यह नगाड़े का शब्द है—यह प्रत्यक्षज्ञान होता है । नैयायिकों के कथनानुसार प्रथम शब्द से दूसरा आदि क्रम से कर्णशष्कुली प्रदेश में अन्त्य शब्द के उत्पन्न होने पर 'मैंने भेरीशब्द सुना' इस प्रत्यक्ष को भ्रम कहना पड़ेगा । परन्तु प्रत्यक्षज्ञान में भ्रमत्व की कल्पना करने में भी गौरव है ।
श्रीगजाननशास्त्रि-मुसलगांवकर-विरचिते सविवरण-प्रकाशे प्रत्यक्ष-परिच्छेदः समाप्तः ॥
—: ० :—
अथानुमानपरिच्छेदः २
इस प्रकार समस्त वादियों को सम्मत तथा समस्त प्रमाणों में ज्येष्ठ ऐसे प्रत्यक्ष प्रमाण का प्रथमतः निरूपण करके तदनन्तर ग्रन्थकार, बहुत से वादियों को सम्मत, कुछ इने-गिने वादियों को असम्मत ऐसे अनुमान प्रमाण के निरूपण की प्रतिज्ञा कर रहे हैं।
अथानुमानं निरूप्यते¹ । अनुमितिकरणमनुमानम् । अनुमितिश्च व्याप्तिज्ञानत्वेन² व्याप्तिज्ञान-जन्या । व्याप्तिज्ञानानुव्यवसायादेस्तत्त्वेन तज्जन्यत्वाभावान्नानुमितित्वम्³ ।
**अर्थ—**प्रत्यक्षनिरूपण के अनन्तर अनुमान का निरूपण किया जाता है। जो अनुमिति-प्रमा का कारण हो वह अनुमान है। और अनुमिति-प्रमा व्याप्तिज्ञानत्वेन व्याप्तिज्ञानजन्य है। व्याप्तिज्ञान के अनुव्यवसायादिकों को व्याप्तिज्ञानत्वेन व्याप्ति-ज्ञानजन्यत्व नहीं है। इसलिये अनुव्यवसाय, स्मृति, शाब्दज्ञान आदि को अनुमितित्व नहीं है।
**विवरण—**जिस ज्ञान से 'अनुमिति' नामक यथार्थ ज्ञान (प्रमा) होता है वह ज्ञान 'अनुमान' नाम का द्वितीय प्रमाण है। यहाँ पर 'अनुमान' नामक दूसरे प्रमाण का लक्षण किया है। इसलिये 'अनुमितिकरण' यह अनुमान-प्रमाण का लक्षण है और 'अनुमान' यह लक्ष्य है। 'अनुमीयते-अनेन इति अनुमानम्' जिस ज्ञान के कारण अग्न्यादिकों का अनुमान किया जाता है, जिस व्याप्तिज्ञान से अनुमिति-प्रमा पैदा की जाती है वह (व्याप्तिज्ञान) अनुमान है। इस रीति से व्युत्पन्न 'अनुमान' पदार्थ लक्षण है और अव्युत्पन्न (रूढ़) अनुमान शब्दार्थ, लक्ष्य है। 'व्याप्तिज्ञान' रूप अर्थ में जब 'अनुमान' शब्द व्युत्पन्न रहता है तब वह अनुमान नामक द्वितीय प्रमाण का
१. निरूप्यते स्वरूप-लक्षण-फलैर्ज्ञाप्यते ।
२. व्याप्तिज्ञानत्वेन व्याप्तिप्रकारक-ज्ञानत्वेन । तृतीयाविभक्त्यर्थः अवच्छिन्नत्वम् । तस्य व्याप्तिज्ञाननिष्ठजनकतायामन्वयः । व्याप्तिप्रकारकज्ञानस्य जनकत्वञ्च व्याप्तिप्रकारकज्ञानत्वेन, नान्येनरूपेणेति व्याप्तिप्रकारकज्ञानत्वं व्याप्तिज्ञाननिष्ठजनकताया अवच्छेदकम्, व्याप्तिज्ञाननिष्ठं जनकत्वञ्च अवच्छेद्यम् । तथा च 'व्याप्तिप्रकारकज्ञानत्वावच्छिन्नव्याप्तिज्ञाननिष्ठजनकता-निरूपित-जन्यतावज्-ज्ञानत्वमनुमितित्वम्' इति अनुमितेर्लक्षणम् ।
३. व्याप्तिज्ञानानुव्यवसायादेः तत्त्वेन व्याप्तिज्ञानत्वेन तज्जन्यत्वाभावात् अर्थात् व्याप्तिज्ञानत्वावच्छिन्नजनकतानिरूपित-जन्यतावज्ज्ञानत्वाभावात् । व्याप्तिज्ञानानुव्यवसायं प्रति व्याप्तिज्ञानस्य विषयत्वेनैव कारणत्वात् तत्र विषयत्वावच्छिन्न-जनकता-निरूपित-जन्यतावज्ज्ञानत्वसत्त्वात् नानुमितित्वम् ।
. अनुमितिलक्षणम् ] अनुमानपरिच्छेदः १४९
लक्षण होता है और लोकप्रसिद्ध 'अनुमान' उस लक्षण का लक्ष्य रहता है। अर्थात् व्युत्पन्न अनुमान, लक्षण और अव्युत्पन्न (रूढ़) अनुमान, लक्ष्य है।
अब 'अनुमति-करण' यहाँ अनुमिति-प्रमा का लक्षण बताते हैं 'व्याप्तिज्ञानत्वेन व्याप्तिज्ञानजन्या अनुमितिः—व्याप्तिज्ञानत्व से (विषयत्वादिरूप से नहीं) युक्त व्याप्तिज्ञान से जो प्रमा होती है, वह अनुमिति-प्रमा है। 'यह घट है' इस घटज्ञान में 'घटत्व' प्रकार है, इसलिये इस ज्ञान को घटत्वप्रकारक-घटज्ञान कहते हैं। इसी तरह 'यह व्याप्ति' इस ज्ञान में 'व्याप्तित्व' प्रकार है, इसलिए इस व्याप्तिज्ञान को व्याप्तित्वप्रकारकज्ञान कहते हैं। इसी प्रकार 'धूम वह्निव्याप्य है' इत्याकारक व्याप्तिप्रकारक-ज्ञान में 'व्याप्ति' प्रकार है। ऐसे व्याप्तिज्ञानत्वेन रूपेण जो व्याप्ति-ज्ञान-जन्य ज्ञान हो उसे अनुमितिज्ञान कहते हैं। 'धूम वह्निव्याप्य है' जहाँ धूम होता है वहाँ अग्नि रहती है—यह व्याप्ति का सामान्य उदाहरण है। ऐसे व्याप्तिज्ञानत्वेन रूपेण व्याप्तिज्ञान से जो ज्ञान होता है वह अनुमितिज्ञान है। अन्यथा 'यह व्याप्ति है' इस व्याप्ति के (व्याप्तिविषयक) ज्ञान से भी 'पर्वत वह्निमान् है' यह ज्ञान होने लगेगा। परन्तु होता नहीं है। इसलिये 'व्याप्तिज्ञानत्वेन' का अर्थ 'व्याप्तिकारक-ज्ञानत्वेन' विवक्षित है।
शंका—'धूम, वह्निव्याप्य है' यह व्याप्तिप्रकारक-ज्ञान 'पर्वत वह्निमान् है' इस अनुमति के प्रति जैसे कारण होता है वैसे ही व्याप्तिज्ञान का अनुव्यवसाय, स्मृति, ध्वंस आदि के प्रति भी कारण है (वे भी व्याप्तिज्ञानजन्य हैं) अतः अनुमिति का लक्षण उनमें अतिव्याप्त होता है। क्योंकि 'मैं वह्निव्याप्य धूमवान् पर्वत को जानता हूँ' यह 'अनुव्यवसाय'-ज्ञान है। इन्द्रियों से होनेवाला जो प्रथम ज्ञान है, वह 'व्यवसाय ज्ञान' कहलाता है और पश्चात् होनेवाला तद्विषयक-मानसज्ञान, अनुव्यवसाय-ज्ञान कहलाता है। इस व्याप्तिज्ञान के अनुव्यवसाय में व्यवसाय-ज्ञान कारण है (उसे व्याप्तिज्ञानजन्यत्व है) इसलिए 'व्याप्तिज्ञानत्वेन व्याप्तिज्ञानजन्य-ज्ञान को अनुमिति-ज्ञान कहा जाता है'—यह अनुमति-ज्ञान का लक्षण, व्याप्तिज्ञान के अनुव्यवसाय-ज्ञान में अतिव्याप्त होता है।
**समाधान—**यद्यपि यह सच है कि व्याप्ति का 'अनुव्यवसाय' व्याप्तिज्ञानजन्य होता है। तथापि उस अनुव्यवसाय-ज्ञान में जो जन्यत्व है, उस जन्यत्व से निरूपित (उस जन्यत्व से ज्ञात होने वाला) जो व्याप्तिज्ञान में कारणत्व है, वह व्याप्तिज्ञान के विषयत्व रूप से होता है। व्याप्तिज्ञानत्व के रूप से नहीं होता। उसी प्रकार व्याप्तिज्ञानजन्य स्मृति, शाब्दबोध, उसका ध्वंस आदिकों को भी व्याप्तिज्ञानजन्यत्व होने पर भी उनमें व्याप्तिज्ञान, विषयत्व-रूप से उनका कारण होता है। व्याप्तिज्ञानत्व रूप से नहीं होता। 'यह घट' इस ज्ञान में 'घट' उस ज्ञान का विषय होता है और विषयत्व-रूप से उस ज्ञान का जनक होता है। ज्ञानत्व-रूप से जनक नहीं होता। उसी प्रकार पूर्वोक्त अनुव्यवसायादि ज्ञान, व्याप्तिज्ञानजन्य होने पर भी व्याप्तिज्ञान का
१५० | वेदान्तपरिभाषा | [ अनुमितिकरणम्
उनके साथ विषयत्व, प्रतियोगित्वादि रूप से सम्बन्ध रहता है । ज्ञानत्व-रूप से उसे उनका जनकत्व नहीं होता । इसलिए उक्त अनुमितिलक्षण की अनुव्यवसायादि में अतिव्याप्ति नहीं है । अनुमिति का 'व्याप्तिज्ञानजन्या' इतना ही लक्षण यदि किया होता तो उस लक्षण की अनुव्यवसाय आदि में अतिव्याप्ति हुई होती । परन्तु 'व्याप्तिज्ञानत्वेन व्याप्तिज्ञानजन्या' इतना कहने के कारण ( लक्षण में 'व्याप्तिज्ञानत्वेन' यह पद जोड़ने के कारण ) लक्षण पर अतिव्याप्ति दोष नहीं आने पाता !
'ज्ञानं प्रति विषयस्य कारणत्वम्' किसी भी ज्ञान में उसका विषय कारण होता है—यह नियम है । इस नियम के अनुसार 'व्याप्तिज्ञान' अपने अनुव्यवसाय का 'विषयत्व' धर्म से कारण होता है। वह अपनी स्मृति का भी 'समान-विषयक-अनुभवत्व' धर्म से कारण होता है। वह अपने ध्वंस का भी 'प्रतियोगित्व' धर्म से कारण होता है। 'व्याप्तिज्ञानत्व' धर्म से कारण नहीं होता । वह ( व्याप्तिज्ञान ) तो 'व्याप्तिज्ञानत्व' धर्म से केवल अनुमिति को ही उत्पन्न करता है । इसलिये पूर्वोक्त अनुव्यवसायादिकों में इस लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होती ।
'दण्ड' पदार्थ इन्धनत्व ( काष्ठत्व ) धर्म से ( रूप से ) यद्यपि ज्वलन ( जलना ) क्रिया में कारण होता है, तथापि 'घट' का कारण अपने 'दण्डत्व' धर्म से ही होता है । वहाँ दण्ड की कारणता का अवच्छेदक धर्म दण्डत्व है, इन्धनत्वादि नहीं । इसी प्रकार व्याप्तिज्ञान में जो अनुमिति-कारणत्व है, वह 'व्याप्तिज्ञानत्व' धर्म से ही है । विषयत्वादि धर्मों से ( रूपों से ) नहीं । अर्थात् यहाँ कारणतावच्छेदक व्याप्तिज्ञानत्व है । इससे उक्त लक्षण पर अतिव्याप्ति दोष नहीं है ।
अनुमिति के कारण को अनुमान कहते हैं । परन्तु अनुमिति का करण क्या है ? ऐसी आकांक्षा होने पर अग्रिम ग्रन्थ से उसका समाधान करते हैं—
अनुमितिकरणं च व्याप्तिज्ञानं । तत्संस्कारोऽवान्तरव्यापारः,
१. अनुमितिकरणरूपमनुमानं निरूपयति—'अनुमितिकरणमि'ति । अनुमितिरूपायाः प्रमायाः करणं व्याप्तिज्ञानमेव । अर्थात् 'साध्याभाववदवृत्तिर्हेतु'रित्याकारकं व्याप्तिज्ञानम् । अथवा 'यावत्साधनाश्रयाश्रित-साध्यसमानाधिकरणो हेतु'रित्याकारकं ज्ञानम् । तत्र यदा साध्याभाववदवृत्तिर्हेतुरिति ज्ञानं भवति, तदा हेतौ साध्याभाववद्वृत्तित्वरूपाया व्याप्तेर्ज्ञानं भवति, हेतोः साध्याभाववदवृत्तिरूपतया तत्र साध्याभाववदवृत्तित्व-धर्मस्य सत्त्वात् । यदा तु 'यावत् साधनाश्रयाश्रितसाध्यसमानाधिकरणो हेतु'-रिति ज्ञानं भवति, तदापि हेतौ तादृशसमानाधिकरण्यरूपाय व्याप्तेर्ज्ञानं भवति, हेतोस्तादृशसाध्य-समानाधिकरणरूपतया तत्र तादृशसाध्यसामानाधिकरण्यस्य सत्त्वात् । एतेन ज्ञायमानस्य लिङ्गस्य अनुमितिकरणत्वे अतीतादिलिङ्गकानुमितेरुच्छेदापत्तेः, अतीतादिलिङ्गस्य तदानीमविद्यमानत्वेन ज्ञायमानत्वाभावात् । विद्यमानस्यैव ज्ञानविषयीभूतस्य ज्ञायमानत्वात् ।
२. तत्संस्कारोऽवान्तरव्यापारः व्याप्तिसंस्कारः कार्य-कारणयोर्व्याप्तिज्ञानाऽनुमित्यो-
परामर्शखण्डनम् ] अनुमानपरिच्छेदः १५१
न¹ तु तृतीय-लिङ्गपरामर्शोऽनुमितौ करणम्, तस्यानुमितिहेतुत्वा-ऽसिद्ध्या तत्करणत्वस्य दूरनिरस्तत्वात् ।
अर्थ— व्याप्तिज्ञान, अनुमिति-करण ( साधन ) है, और उसका ( व्याप्ति-ज्ञान का ) संस्कार, अवान्तर व्यापार है । तृतीय ( तीसरा ) लिंगपरामर्श, अनुमिति का करण नहीं है । क्योंकि उसमें अनुमिति का हेतुत्व ( कारणत्व ) ही असिद्ध है । इसलिये असाधारणकारणत्वरूप करणत्व दूरनिरस्त ( अत्यन्त खण्डित ) होता है ।
विवरण— 'धूम वह्निव्याप्य है' इत्याकारक व्याप्तिज्ञान ही अनुमिति का करण है । अर्थात् व्याप्तिज्ञान ही अनुमान है ।
शंका— आपने पहले 'अनुमिति, व्याप्तिज्ञानजन्य है' कहा था, जिससे व्याप्ति-ज्ञान, अनुमिति का कारण है—यह अर्थ निष्पन्न होता है । और अब व्याप्तिज्ञान को अनुमिति का करण बताया जा रहा है । ये दोनों बातें कैसे संगत हो सकती हैं ? ( एक ही को कारणत्व तथा करणत्व कैसे हो सकता है ? ) ।
उत्तर— कारणत्व और करणत्व—ये दोनों यदि परस्पर विरोधी होते तो एक ही व्याप्ति ज्ञानको कारण तथा करण नहीं कहा जा सकता था । परन्तु ये दो धर्म ( कारणत्व-करणत्व ) परस्पर विरोधी नहीं हैं । किन्तु करणत्व, कारणत्व का ही एक विशेष है । क्योंकि असाधारण कारण को ही करण कहते हैं । जैसे एक ही ब्राह्मण पर ब्राह्मणत्व और परिव्राजकत्व रहता है वैसे ही एक ही व्याप्ति-ज्ञान पर कारणत्व तथा
मध्यवर्ती व्यापारः । व्याप्तिसंस्कारस्य व्याप्तिज्ञानजन्यत्वात् व्याप्तिज्ञानजन्याऽनुमिति-जनकत्वाच्च युक्तं तस्य व्यापारत्वम् । 'तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनको व्यापारः' इति तल्लक्षणात् । एवञ्च सति व्याप्तिज्ञानस्य अनुमितिकरणत्वं नानुपपन्नम् । व्याप्तिसंस्कार-रूप-व्यापारद्वारैव तस्यानुमितिजनकत्वात् ।
१. तृतीयलिङ्गपरामर्शस्य अनुमितिकरणत्वं प्राचीनैरुक्तम् । तथा चोक्तं न्याय-वार्तिके—"वयन्तु पश्यामः सर्वमनुमानम्, अनुमितेस्तन्नान्तरीयकत्वात् । प्रधानोप-सर्जनताविवक्षायां लिङ्गपरामर्श इति न्याय्यम्" किन्तु मीमांसकानां वेदान्तिनाञ्च तन्न सम्मतम् । महानसादौ दृष्टान्ते हेतौ साध्यव्याप्तिप्रत्यक्षदशायां यल्लिङ्गज्ञानं, तत्प्रथमम् । 'पर्वतो धूमवान् इत्याकारकपक्षधर्मता-ज्ञानदशायां यल्लिङ्गज्ञानं, तद् द्वितीयम् । वह्निव्याप्य-धूमवान् पर्वतः इत्याकारक-परामर्शज्ञानदशायां यल्लिङ्गज्ञानं, तदेव तृतीय-लिङ्गपरामर्श इत्युच्यते । स च अनुमितौ न करणम् । यतः अशेषसाधना-श्रयाश्रितसाध्यसामानाधिकरण्यरूपस्य व्याप्तिवैशिष्टयस्य पर्वतीय धूमे ग्रहणाऽसंभ-वात्, महानसीयधूमे एव धूमत्वेन रूपेण गृहीतव्याप्तिसंस्कारस्यैव हि पक्षधर्मताज्ञान-सहितस्य अनुमितिंप्रति कारणत्वं मीमांसकैर्वेदान्तिभिश्चाङ्गीक्रियते । अतो व्याप्ति-विशिष्टपक्षधर्मताज्ञानं नानुमितिकारणम् । पक्षधर्मताज्ञान-संस्कारयोरेव अनुमितिहेतुत्वम्, न लिङ्गपरामर्शस्येति विज्ञेयम् ।
१५२ वेदान्तपरिभाषा [ परामर्शखण्डनम्
करणत्व इन अविरोधी धर्मों के रहने में कोई दोष नहीं है। इसीलिए हम 'दण्ड घट में कारण है' और 'दण्ड से घट को उत्पन्न करता है' इत्यादि व्यवहार करते हैं। इस कारण एक ही पदार्थ को कारण और करण कह सकते हैं।
प्राचीन नैयायिक अनुमिति के प्रति लिङ्ग (हेतु = धूमादि) को ही कारण मानते हैं। परन्तु यह उचित नहीं है। क्योंकि जहाँ लिंग (हेतु) प्रत्यक्ष योग्य नहीं होता वहाँ परामर्श को व्यापारत्व संभव नहीं होता। अर्थात् व्यापार के न होने से लिग को करणत्व भी नहीं मान सकते। क्योंकि 'व्यापारवत् (व्यापारयुक्त) जो 'असाधारण कारण' उसे ही 'करण' संज्ञा है। सिवाय धूलि में धूम का भ्रम होने से 'पर्वत वह्निमान् है' ऐसी अयथार्थ अनुमिति होती है। यहाँ पर लिंग के न होते हुए भी अनुमिति हुई। इसलिए 'लिंग अनुमिति में करण है' नहीं कहा जा सकता। केवल धूम का ज्ञान हुआ और व्याप्तिज्ञान (व्याप्ति-स्मृति) नहीं हुआ, अर्थात् केवल पर्वत धूमवान् है, पर्वत पर धूम है—एतावन्मात्र ज्ञान होने से 'वह वह्निमान् है' यह अनुमिति नहीं होती। और प्रत्यक्ष के अयोग्यहेतुक स्थल में किसी व्यापार का भी सम्भव नहीं। इसलिए लिंगज्ञान को भी करण नहीं माना जा सकता। परामर्श, अनुमिति में करण क्यों नहीं? इसे ग्रन्थकार आगे बतावेंगे। अतः व्याप्तिज्ञान, अनुमिति-करण (अनुमान) है—कहने से लिंग, लिंगज्ञान, और लिंगपरामर्श को ही अनुमितिकरणत्व है—माननेवाले नैयायिक-वैशेषिकों का खण्डन हो गया।
शंका—आपने 'व्याप्तिज्ञान, अनुमिति के प्रति करण है' बताया। परन्तु यहाँ व्यापार कौन सा है? क्योंकि 'जो असाधारण, व्यापार से युक्त रहता है उसे ही करण कहते हैं।' व्याप्तिज्ञान में व्यापार कौन सा है, समझ में नहीं आता।
समाधान—अन्तःकरण पर रहनेवाला व्याप्तिज्ञान का संस्कार ही मध्यवर्ती व्यापार है। तस्मात् व्याप्तिसंस्कार से युक्त होने के कारण व्याप्तिज्ञान करण है, अर्थात् व्याप्ति-ज्ञान, संस्कार द्वारा अनुमिति में करण होता है।
परन्तु नैयायिक तृतीय लिंगपरामर्श को ही अनुमिति के प्रति 'करण' कहते हैं। महानस में जब धूम और अग्नि की व्याप्ति ज्ञात होती है तब धूम का जो ज्ञान होता है, वह प्रथम लिंगज्ञान (हेतुज्ञान = धूमज्ञान) है। उसके बाद वह व्यक्ति वन में जाता है। वहाँ उसे पर्वत पर धूम दीखता है—यह द्वितीय लिंगज्ञान है। और उसके बाद 'यह पर्वत वह्निव्याप्य धूमवान् है' ज्ञान होता है, इसमें भी 'धूम' विषय है। इसलिये यह तृतीय लिंगज्ञान है। और यही परामर्श कहलाता है। इसके अनन्तर अग्रिम क्षण में ही 'पर्वत वह्निमान् है' अनुमिति होती है। इसलिए यह तृतीय लिंगपरामर्श (वह्निव्याप्यत्व = व्याप्ति रूप धर्म से पर्वतनिष्ठ धूमज्ञान) ही अनुमिति का करण है—यह मानना होगा। इनके मत में 'जो असाधारण कारण हो वही करण है' ऐसा करण का लक्षण में मध्य में (बीच में) व्यापार नहीं मानते।
परामर्शखण्डनम् ] अनुमानपरिच्छेदः १५३
तात्पर्य यह है कि—प्रथमतः 'पर्वत धूमवान् है' यह ज्ञान होता है। अनन्तर 'जहाँ धूम रहता है वहाँ अग्नि भी रहती है' अर्थात् धूम वह्निव्याप्य है—इस प्रकार व्याप्ति का स्मरण होता है।
तदनन्तर 'व्याप्तिविशिष्ट (व्याप्ति से युक्त) धूम पर्वत पर है, इस प्रकार तृतीय ज्ञान होता है—यही लिङ्गपरामर्श है। तदनन्तर उत्तर क्षण में ही अनुमिति होती है। इसलिये यह तृतीय लिङ्गपरामर्श ही अनुमितिकरण (अनुमान) है।
परन्तु नैयायिकों का यह सिद्धान्त ठीक नहीं है। क्योंकि पक्षधर्मताज्ञान ('पर्वत धूमवान् है' इस प्रकार पक्षपर हेतु का ज्ञान) से महानस में गृहीत व्याप्तिज्ञान का संस्कार उद्बुद्ध (जागृत) होता है, तदनन्तर व्याप्ति का स्मरण होते ही वह्नि की अनुमिति होती है। परन्तु लिङ्गज्ञान या पक्षधर्मताज्ञान होकर भी यदि व्याप्ति का स्मरण न हुआ तो अनुमिति नहीं होती। इस अन्वय-व्यतिरेक से (संस्कार उद्बुद्ध होने पर व्याप्तिस्मरण यदि हुआ तो अनुमिति होती है। इस अन्वय और संस्कारोद्बोध के अभाव में अनुमिति नहीं होती, यह व्यतिरेक) अनुमिति में व्याप्तिज्ञान ही कारण है, 'परामर्श' अनुमिति में कारण नहीं है, यह सिद्ध होता है। क्योंकि 'परामर्शसत्त्वे अनुमितिः, परामर्शाभावे अनुमित्यभावः' परामर्श होने पर ही अनुमिति होती है, और उसके न होने पर नहीं होती, इस प्रकार परामर्श के विषय में अन्वयव्यतिरेक नहीं दिखाये जा सकते। क्योंकि जब पक्षधर्मता-ज्ञान और व्याप्तिज्ञान के कारण ही अनुमिति होती है तब बिना परामर्श के भी वह होती है—यह अनुभव है। इस कारण व्यतिरेकव्यभिचार हो जाता है। इसलिये परामर्श को अनुमिति का कारण नहीं कहा जा सकता। ऐसी स्थिति में उसे, करण (असाधारण कारणस्वरूप) कहना कैसे सम्भव है? 'कारण' शब्द सामान्य कारण का वाचक है और उनमें से जो असाधारण हो उसे ही 'करण' संज्ञा है। अर्थात् 'कारणत्व' व्यापक (करणत्व को अपेक्षा अधिक देश में रहनेवाला) धर्म है और 'करणत्व' उसका व्याप्य (कारणत्व को अपेक्षा न्यून देश में रहनेवाला) धर्म है और व्यापक नहीं होता वहाँ व्याप्य भी नहीं होता' अर्थात् परामर्श जब अनुमिति के प्रति कारण ही नहीं, तब वह कारण ही नहीं। तब वह 'करण' नहीं यह पृथक् कहना आवश्यक नहीं है।
जिस प्रकार लिङ्गपरामर्श अनुमिति के प्रति करण नहीं, उसी प्रकार ज्ञायमान (ज्ञात होनेवाला) लिङ्ग (हेतु) भी अनुमिति के प्रति करण नहीं हो सकता अर्थात् मूलस्थ 'तृतीय लिङ्गपरामर्श' शब्द, ज्ञायमान लिङ्ग का उपलक्षक है। ज्ञान में विषय होनेवाला लिङ्ग ही अनुमिति के प्रति करण है, ऐसा मानने पर 'पर्वतो वह्निमान् भविष्यद्धूमात्' (पर्वत वह्निमान् है क्योंकि उस पर अग्रिम क्षण में ही धूम उत्पन्न होगा) आदि स्थलों में सबको जो अनुमिति होती है वह नहीं होगी। क्योंकि उस समय वहाँ लिङ्ग नहीं है। इसलिये वहाँ पर उसके कारणत्व का व्यभिचार होता है। अतः उसमें करणत्व तो है ही नहीं। अतः प्राचीन नैयायिकों का यह मत ठीक नहीं है। इसलिये व्याप्तिज्ञान ही करण है।