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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

अज्ञान निरूपण १५५

होता है। अथवा-जिसप्रकार जलों की समष्टि की विवक्षा से 'जलाशय' ऐसा (व्यवहार करते हैं)। ठीक उसीप्रकार अनेकसंख्या में प्रतीत होने वाले जीवों में स्थित अज्ञानों की समष्टि का कथन करने की आकाङ्क्षा से उनमें एकत्व का व्यवहार किया जाता है। 'अजन्मा एक' इत्यादि श्रुति के (कथन का आधार समष्टि ही है)। 'चन्द्रिका'-वेद एवं उपनिषद्ग्रन्थों में अज्ञान के लिए 'अजामेकां' इत्यादि वचनों में एकवचन का तथा 'इन्द्रो मायाभिः' इत्यादि श्रुतिवाक्यों में बहुवचन का प्रयोग किया है। अतः वास्तविकता से परिचित होने के लिए जिज्ञासा स्वाभाविक है। इसी की शान्ति के लिए ग्रन्थकार ने यहाँ समष्टि-व्यष्टि अभिप्राय से अज्ञान के दो रूपों का उल्लेख किया है। 'समष्टि' शब्द का प्रयोग यहाँ समुदाय, समूह या संघात अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए हुआ है तथा 'व्यष्टि' यहाँ एक का सूचक है। इसप्रकार दूसरे शब्दों में समष्टि-व्यष्टि क्रमशः सामान्य और विशेष व्यवहार के वाचक हैं। वस्तुतः दोनों में अभेद है। ठीक उसीप्रकार जैसे-एक आम के वृक्ष का कथन करने के लिए हम कहेंगे-'यह आम का पेड़ है'। जबकि आम के बहुत से पेड़ों के समुदाय के लिए कहा जाएगा-'यह आम का 'वन' है'। अतः यहाँ इसे व्यष्टि अभिप्राय से 'वृक्ष' तथा समष्टि अभिप्राय से 'वन' कहना होगा। इसीप्रकार एक जीव में स्थित अज्ञान का कथन उसके व्यष्टिरूप को तथा अनेक जीवों में स्थित अज्ञान को कहने के लिए उसके समष्टिस्वरूप को अभिव्यक्त करेगा, किन्तु ये दोनों तत्त्व की दृष्टि से अभिन्न ही होंगे। वेदान्तदर्शन में समष्टि एवं व्यष्टि इन दोनों शब्दों का अनेकशः प्रयोग किया गया है। वेदान्त में प्रतिपादित सृष्टिप्रक्रिया को समझने के लिए भी इन दोनों शब्दों को अथवा समष्टि-व्यष्टि विषयक इस सिद्धान्त को समझना आवश्यक है। हमने भूमिका में (पृष्ठ 82) पर इस विषय में विस्तारपूर्वक चर्चा की है। अतः इसके विस्तृत अध्ययन के लिए उसका अवलोकन आवश्यक है। इस प्रसङ्ग में ग्रन्थकार के अभिप्राय को स्पष्ट करते हुए हम केवल इतना ही कहना चाहेंगे कि जिसप्रकार वृक्षों के समूह का कथन करने की दृष्टि से 'वन' कहकर एक संख्यासूचक शब्द का व्यवहार किया जाता है।

१५६ वेदान्तसार अथवा जिसप्रकार जल के कणों के समूह के कथन की इच्छा से 'जलाशय' कहते हैं। ठीक उसीप्रकार अनेक संख्या में प्रतीत होने वाले जीवों में स्थित अज्ञान के समूह को 'समष्टि' कहते हैं। वस्तुतः यह इन सभी में ऐक्य का सूचक भी है। अपने कथन की पुष्टि में ग्रन्थकार ने 'अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां' इत्यादि श्रुतिवचन को उद्धृत किया है। इसका अभिप्राय है कि वह अज्ञान अथवा माया वस्तुतः एक ही है। जो प्रजाओं में अनेकरूपों को धारण करता है। विशेष-(1) समष्टि- सम्+√अश् (व्याप्तौ संघाते च)+क्तिन्-सभी को व्याप्त करने वाला। (2) व्यष्टि- वि+अश् (व्याप्तौ संघाते च)+क्तिन्-सीमितस्थान में रहने वाला। (3) स्वामी रामतीर्थ ने समष्टि एवं व्यष्टि को क्रमशः सामान्य एवं विशेष अर्थ में प्रयुक्त माना है। (4) वेदान्तदर्शन में समष्टि अर्थ में 'माया' तथा व्यष्टि के लिए 'अविद्या' शब्द का प्रयोग किया गया है। "सत्त्वशुद्ध्यविशुद्धिभ्यां मायाविद्ये च ते मते" (पञ्चदशी1/16)। (5) यहाँ प्रयुक्त 'नानात्वेन' से अभिप्राय यह है कि जीव अनेक हैं तथा प्रत्येक जीव में अज्ञान की सत्ता पृथक्-पृथक् विद्यमान रहती है। अतः इस दृष्टि से ही यहाँ अज्ञान के अनेकत्व की परिकल्पना की गयी है। (6) प्रस्तुत खण्ड के अभिप्राय को इसप्रकार सरलतापूर्वक समझा जा सकता है- चित्र-२९ अज्ञान समष्टि ➔ समूह व्यष्टि समूह का सूचक - वन वृक्ष - एकत्व का सूचक जलाशय जल जीव समुदाय समूह जीव अवतरणिका-समष्टि-व्यष्टि एवं इस आधार पर अज्ञान के भेदों का कथन करने के पश्चात् समष्टिगत अज्ञान द्वारा की गई सृष्टिप्रक्रिया का उल्लेख करते हैं-

अज्ञान निरूपण १५७ इयं समष्टिरुत्कृष्टोपाधितया विशुद्धसत्त्वप्रधाना। एतदुपहितं चैतन्यं सर्वज्ञत्वसर्वेश्वरत्वसर्वनियन्तृत्वादिगुणकमव्यक्तमन्तर्यामी जगत्कारण- मीश्वर इति च व्यपदिश्यते सकलाज्ञानावभासकत्वात्। “यः सर्वज्ञः सर्ववित्” इति श्रुतेः ईश्वरस्येयं समष्टिरखिलकारणत्वात्कारणशरीर- मानन्दप्रचुरत्वात्कोशवदाच्छादकत्वाच्चानन्दमयकोशः, सर्वोपरमत्वात्सु- षुप्तिरत एव स्थूलसूक्ष्मप्रपञ्चलयस्थानमिति चोच्यते। पदच्छेद-इयम् समष्टिः उत्कृष्ट-उपाधितया विशुद्धसत्त्वप्रधाना। एतत् उपहितम् चैतन्यम् सर्वज्ञत्व-सर्वेश्वरत्व-सर्वनियन्तृत्व-आदि गुणकम् अव्यक्तम् अन्तर्यामी जगत्कारणम् ईश्वरः इति च व्यपदिश्यते, सकल-अज्ञान- अवभासकत्वात्। यः सर्वज्ञः सर्ववित् इति श्रुतेः। ईश्वरस्य , इयम् समष्टिः अखिलकारणत्वात्-कारणशरीरम्। आनन्दप्रचुरत्वात्-कोशवत् आच्छादकत्वात् च-आनन्दमयकोशः। सर्वोपरमत्वात् सुषुप्तिः। अतः एव स्थूलसूक्ष्मप्रपञ्च-लयस्थानम्, इति च उच्यते। अनुवाद-उत्कृष्ट उपाधियुक्त होने से यह समष्टि विशुद्धसत्त्वप्रधान गुणयुक्त है। इस उपाधि से युक्त चैतन्य सम्पूर्ण अज्ञान का प्रकाशक होने से सब कुछ जानने वाला, सबका ईश्वर, सबको नियन्त्रित करने वाला आदि गुणों से युक्त अव्यक्त, अन्तर्यामी, संसार का कारणरूप ईश्वर इत्यादि (नामों से कहा जाता है। 'जो सर्वज्ञाता सर्ववित् है' इत्यादि श्रुति (इसमें प्रमाण है)। ईश्वर की यह समष्टि सम्पूर्ण (विश्वप्रपञ्च) का कारण होने से 'कारण शरीर।' आनन्द की प्रचुरता एवं कोश के समान आच्छादक होने से-'आनन्दमय कोश' तथा सभी कुछ विलीन होने से 'सुषुप्ति'। इसीकारण स्थूल एवं सूक्ष्मशरीरप्रपञ्च का 'लयस्थान' भी कहा जाता है। ‘चन्द्रिका’-सामान्यतः अज्ञान त्रिगुणात्मक है। अर्थात् इसमें सत्त्व, रजस् और तमोगुण विद्यमान हैं, किन्तु अज्ञान की यह समष्टि उत्कृष्ट उपाधि युक्त होने के कारण विशुद्धसत्त्वगुण की प्रधानता वाली है, अर्थात् रजोगुण एवं तमोगुण विद्यमान होते हुए भी यहाँ सत्त्वगुण अपने विशुद्धरूप में प्रधानता लिये रहता है। इसी विशुद्धसत्त्वगुण की प्रधानता से उसमें उत्कृष्टता का आधान होता है और इससे आवृत्त हुआ परमब्रह्मरूप चैतन्य सभी कुछ जानने वाला होने से सर्वज्ञ, चराचर सम्पूर्णसृष्टि का स्वामी होने से सर्वेश्वर

१५८ वेदान्तसार तथा सभी पर नियन्त्रण करने वाला होने के कारण सर्वनियन्ता आदि गुणों से युक्त होता है। उपर्युक्त गुणों के अतिरिक्त इसमें अव्यक्त, अन्तर्यामी एवं सम्पूर्ण सृष्टि का एकमात्र कारण होना आदि विशेषताएँ भी विद्यमान रहती हैं। वेदान्तदर्शन विशुद्धसत्त्वप्रधान अज्ञान की इस उत्कृष्ट उपाधियुक्त चैतन्य को 'ईश्वर' इस नाम से सम्बोधित करता है। अतः स्पष्ट ही यहाँ शुद्धचैतन्य एवं ईश्वर में भिन्नता विद्यमान है, क्योंकि यही ईश्वर सम्पूर्ण अज्ञान का प्रकाशक है। इसी प्रसङ्ग में ग्रन्थकार 'यः सर्वज्ञः सर्ववित्' इत्यादि श्रुतिवचन को प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हैं। तत्पश्चात् वेदान्त की दृष्टि से उत्कृष्ट उपाधियुक्त अज्ञान की सृष्टि का कथन करते हैं। जैसाकि पूर्व में बताया गया कि विशुद्धसत्त्वप्रधान अज्ञान की उत्कृष्ट उपाधि से आवृत्त शुद्धचैतन्य ही 'ईश्वर' संज्ञा प्राप्त करता है। इसी क्रम में सत्त्व की विशुद्धता के कारण तथा उपाधि की उत्कृष्टता से इसमें अनेक उत्कृष्टगुणों का आधान रहता है। ईश्वर की यही समष्टि वेदान्त के अनुसार सम्पूर्णप्रपञ्च का मुख्यकारण है, क्योंकि सम्पूर्णसृष्टि का क्रम इससे प्रारम्भ होता है। इसीलिए इसी ईश्वर को कारणशरीर भी कहते हैं। इसके अतिरिक्त विशुद्धसत्त्वगुण की प्रधानता होने से इस कारणशरीर अथवा ईश्वर में आनन्द का प्राचुर्य विद्यमान रहता है तथा उत्कृष्ट उपाधि सम्पन्न यह अज्ञान, क्योंकि शुद्धचैतन्यरूप परमब्रह्म को कोश के समान ढके रखता है। अतः इन दोनों विशेषताओं के कारण इसी ईश्वर अथवा कारणशरीर को ही आनन्दमयकोश भी कहते हैं। साथ ही ज्ञान होने की स्थिति में इसी कारणशरीर में ही विपरीत क्रम में सूक्ष्मशरीर आदि विलीन हो जाते हैं। अतः इसी अवस्था को 'सुषुप्ति' भी कहा गया है। इसके अलावा जितनी भी दृश्यमान स्थूल एवं सूक्ष्मसृष्टि है। जिसका विस्तृतवर्णन हम भूमिका में कर चुके हैं। प्रलयकालीन अवस्था में इसी ईश्वर में उसका भी लय हो जाता है। इसलिए वेदान्त इसे 'लयस्थान' भी कहता है। इस दृष्टि से उत्कृष्ट उपाधियुक्त अज्ञान की यह समष्टि विभिन्न- कार्यों एवं अवस्थाओं अथवा विशेषताओं के कारण एक होते हुए भी अनेक नामों से जानी जाती है।

अज्ञान निरूपण १५९ विशेष-(1) वेदान्त के सृष्टिक्रम में ब्रह्म के पश्चात् ईश्वर का ही स्थान है। (2) ईश्वर की अनेक विशेषताओं का प्रस्तुत गद्यखण्ड में उल्लेख किया गया है। (3) प्रस्तुत गद्यखण्ड में ईश्वर को जगत् का कारण होने से कारणशरीर, आनन्द की प्रचुरता के कारण आनन्दमयकोष, सभी कुछ विलीन होने के कारण सुषुप्ति एवं लयस्थान कहा गया है। (4) प्रस्तुत गद्यखण्ड के अभिप्राय को इसप्रकार भी समझा जा सकता है- चित्र-३० अज्ञान की समष्टि सर्वज्ञ $\leftarrow$ ईश्वर $\leftarrow$ शुद्ध चैतन्य $\rightarrow$ ईश्वर सर्वेश्वर $\leftarrow$ विशुद्ध सत्त्व प्रधान अज्ञान की उत्कृष्ट उपाधि सर्वनियन्ता $\leftarrow$ अन्तर्यामी $\leftarrow$ अखिल कारणत्वात् अव्यक्त $\leftarrow$ आनन्द प्रचुरत्वात् कारण शरीरम् $\leftarrow$ स्थूल सूक्ष्मप्रपञ्च का लयस्थान जगत् का $\leftarrow$ कोशवद् आच्छादकत्वात् सर्वोपरमत्वात् कारण आनन्दमय कोश सुषुप्ति लयस्थानम् अवतरणिका-अज्ञान के समष्टिस्वरूप की व्याख्या एवं सृष्टिक्रम में इसकी भूमिका का कथन करने के उपरान्त इसके व्यष्टिस्वरूप को स्पष्ट करते हुए सृष्टिक्रम में इसके सहयोग का उल्लेख करते हैं- यथा वनस्य व्यष्ट्यभिप्रायेण वृक्षा इत्यनेकत्वव्यपदेशो यथा वा जलाशयस्य व्यष्ट्यभिप्रायेण जलानीति तथाज्ञानस्य व्यष्ट्यभिप्रायेण तदनेकत्वव्यपदेश “इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयत” इत्यादिश्रुतेः। अत्र व्यस्तसमस्तव्यापित्वेन व्यष्टिसमष्टिताव्यपदेशः। इयं व्यष्टिर्निकृष्टोपाधितया मलिनसत्त्वप्रधाना। एतदुपहितं चैतन्य- मल्पज्ञत्वानीश्वरत्वादिगुणकं प्राज्ञ इत्युच्यत एकाज्ञानावभासकत्वात्। अस्य प्राज्ञत्वमस्पष्टोपाधितयानतिप्रकाशकत्वात् अस्यापीयमहङ्कारादिकारणत्वात्

१६० वेदान्तसार कारणशरीरमानन्दप्रचुरत्वात्कोशवदाच्छादकत्वाच्चानन्दमयकोशः, सर्वो- परमत्वात्सुषुप्तिरत एव स्थूलसूक्ष्मशरीरप्रपञ्चलयस्थानमिति चोच्यते॥७॥ पदच्छेद-यथा वनस्य व्यष्टि-अभिप्रायेण वृक्षाः, इति अनेकत्व व्यपदेशः। यथा वा जलाशयस्य व्यष्टि-अभिप्रायेण जलानि, इति। तथा अज्ञानस्य व्यष्टि-अभिप्रायेण तद्-अनेकत्व व्यपदेशः “इन्द्रः मायाभिः पुरुरूप ईयते" इत्यादि श्रुतेः। अत्र व्यस्तसमस्तव्यापित्वेन व्यष्टिसमष्टिता व्यपदेशः। इयम् व्यष्टिः निकृष्ट-उपाधितया मलिनसत्त्वप्रधाना। एतद् उपहितम् चैतन्यम्-अल्पज्ञत्व, अनीश्वरत्व आदिगुणकम् प्राज्ञः इति उच्यते, एक-अज्ञान अवभासकत्वात् अस्य प्राज्ञत्वम् अस्पष्ट-उपाधितया अनतिप्रकाशत्वात्। अस्य अपि इयम् अहंकार-आदिकारणत्वात्-कारणशरीरम्। आनन्दप्रचुरत्वात् कोशवद् आच्छादकत्वात् च आनन्दमयकोशः। सर्वोपरमत्वात् सुषुप्तिः, अतः एव स्थूल-सूक्ष्मशरीरप्रपञ्च-लयस्थानम् इति च उच्यते।।7।। अनुवाद-जिसप्रकार वन के (वृक्षों में) व्यष्टि के अभिप्राय से 'वृक्ष' यह अनेकतासूचक व्यवहार होता है। अथवा जिसप्रकार जलाशय के (जल के लिए) व्यष्टि की दृष्टि से अनेकजल इसप्रकार (कहते हैं।) उसीप्रकार अज्ञान के व्यष्टिगतभेद को प्रदर्शित करने के अभिप्राय से उस (अज्ञान) की अनेकता का व्यवहार होता है। 'अज्ञानों के कारण आत्मा (इन्द्र) बहुत रूपों में प्रतीत होता है' इत्यादि श्रुति का वचन भी (इसमें प्रमाण है)। यहाँ व्यष्टिगत एवं समष्टिगत व्यापकता के कारण ही अनेकता (व्यष्टि) एवं एकतारूप (समष्टि) व्यवहार होता है। (अज्ञान की) यह व्यष्टि निकृष्ट उपाधि से युक्त होने के कारण मलिन सत्त्वप्रधान होती है। इस (उपाधि) से युक्त चैतन्य अल्पज्ञता एवं अशक्तता आदि गुणों वाला होने से, व्यष्टिगत एक ही अज्ञान का प्रकाशक होने के कारण 'प्राज्ञ' इसप्रकार कहा जाता है। अस्पष्ट उपाधि से युक्त होने के कारण तथा एक से अधिक का प्रकाशक न होने से इसका प्राज्ञत्व (सिद्ध है।) इस (जीव) की भी (व्यष्टिरूप) यह उपाधि, अहंकार आदि का कारणरूप होने से कारणशरीर तथा आनन्द की प्रचुरता एवं चैतन्य को कोश के समान ढक लेने के कारण आनन्दमयकोश। सबका उपरम (विलयन) होने से सुषुप्ति एवं स्थूल तथा सूक्ष्मशरीर आदि प्रपञ्च के विलय का अधिष्ठान होने के कारण 'लयस्थान' भी कहलाती है।

अज्ञान निरूपण १६१ ‘चन्द्रिका’- अज्ञान के समष्टिस्वरूप की व्याख्या के पश्चात् प्रस्तुत गद्यखण्ड में उसके व्यष्टिस्वरूप की विस्तृत व्याख्या करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं-‘जिसप्रकार किसी वन में स्थित वृक्षों को अलग-अलग कहने की भावना से अनेकता को सूचित करने वाला ‘वृक्ष’ यह शब्द व्यवहार में लाया जाता है। ठीक इसीप्रकार जलाशय में स्थित जल को उसके अवयवों को अलग-अलग कहने की दृष्टि से ‘अनेकजल’ इसप्रकार प्रयोग करते हैं। उसीप्रकार अज्ञान के व्यष्टिरूप को भी ‘अनेकअज्ञान’ इसप्रकार कहकर उसमें बहुत्व का व्यवहार किया जाता है, क्योंकि अज्ञानों के व्यष्टिगतभेद को प्रदर्शित करना ही अज्ञान के अनेकत्व के व्यवहार का मुख्य आधार है। अपनी बात की पुष्टि में ग्रन्थकार श्रुतिवचन को प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि ‘अज्ञान के कारण ही यह इन्द्र अर्थात् आत्मा अनेकरूपों वाला प्रतीत होता है।’ यहाँ प्रयुक्त इन्द्र शब्द ईश्वर या आत्मतत्त्व का वाचक माना गया है। माया यहाँ अज्ञान के लिए आया है। यों भी माया, ईश्वर की शक्ति कही गई है। इस दृष्टि से उक्त श्रुतिवचन का अभिप्राय हुआ-‘यद्यपि सृष्टि का कारणरूप वह ईश्वर एक ही है, किन्तु अज्ञान के कारण वह संसार के बहुत से जीवों में स्थित होकर ठीक उसीप्रकार अनेकरूपों में भासित होता है, जैसे-एक ही चन्द्रमा जल की लहरों में हमें अनेकरूपों वाला होकर प्रतिभासित होता है।’ इसप्रकार स्पष्ट है कि व्यष्टि अर्थात् अनेकता एवं समष्टि अर्थात् एकता इन दोनों के व्यवहार का एकमात्र आधार इनका व्यष्टिगत एवं समष्टिगत व्यापकभाव ही है, अन्य कुछ नहीं। संसार के सभी जीवों के अज्ञान को एक ज्ञान का विषय मानकर समष्टिरूप में देखा जाता है। जबकि व्यष्टिगत अज्ञान में समस्तजीवों के भिन्न-भिन्नरूप को भिन्न-भिन्न अज्ञानों का विषय मानकर अलग-अलग देखा जाता है। इस बात को एक उदाहरण द्वारा इसप्रकार समझा सकते हैं-मिट्टी द्वारा निर्मित कुल्हड़, घड़ा, सकोरा, दीपक इत्यादि अनेकरूपों में एकमात्र मिट्टी ही अपने व्यापकरूप में समानरूप से विद्यमान है। अतः जब हम इसे समष्टिरूप में कहना चाहेंगे तो ‘सर्वत्र मिट्टी ही है’ ऐसा व्यवहार करेंगे, किन्तु व्यष्टिरूप की विवक्षा में ‘इन्हें घड़ा आदि अलग-अलग नामों’ से ही कहा जाएगा। ठीक इसीप्रकार अज्ञान की एकरूपता (समष्टि) तथा अनेकरूपता (व्यष्टि) को भी समझना चाहिए।

१६२ वेदान्तसार तत्पश्चात् अज्ञान की इस व्यष्टि की अन्य विशेषताओं का कथन करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं कि - व्यष्टिरूप अज्ञान में भी यद्यपि सत्त्व, रजस् और तमोगुण की स्थिति विद्यमान रहती है, किन्तु यहाँ स्थित सत्त्वगुण, रजोगुण एवं तमोगुण द्वारा पराभूत अथवा अभिभूत होने से मलिन होता है। इसीलिए इसे जीव की 'निकृष्ट उपाधि' कहा गया है। उपर्युक्त कथन को हम उदाहरण द्वारा इसप्रकार समझा सकते हैं-जिसप्रकार धूलि आदि के कण पड़ने से स्वच्छदर्पण की प्रतिबिम्ब को ग्रहण करने की शक्ति घट जाती है, ठीक उसीप्रकार रजोगुण एवं तमोगुण से अभिभूत होने के कारण सत्त्वगुण चित्स्वरूप के प्रतिबिम्ब को स्पष्टतया प्रकाशित करने में समर्थ नहीं होता है और यही जीव के अल्पज्ञत्व का हेतु भी माना जाता है। दूसरे शब्दों में व्यष्टिगत अज्ञान में उपाधि की इस निकृष्टता के कारण ही अज्ञान की उत्कृष्ट उपाधि से युक्त ईश्वर की अपेक्षा जीव अधिक निकृष्ट होता है। साथ ही वह उत्कृष्ट उपाधियुक्त अज्ञान का स्वामी होने के कारण सर्वज्ञ, सर्वनियन्ता आदि गुणों से युक्त कहा गया है, जबकि निकृष्ट उपाधिभूत अज्ञान अथवा माया के अधीन होने के कारण यह जीव अल्पज्ञ एवं अल्पसामर्थ्य वाला कहा जाता है। इस जीव के ज्ञान पर अज्ञान का आवरण पड़ा रहने के कारण ही यह निकृष्ट होता है। इसीकारण इसमें अहङ्कार विद्यमान रहता है तथा आत्मा के अतिरिक्त वस्तुओं का आभास भी इसी अज्ञानरूप आवरण की निकृष्ट उपाधि के कारण होता है। पुनः ग्रन्थकार कहते हैं कि इस निकृष्ट उपाधि से आवृत्त चैतन्य को उसके अल्पज्ञ, अनीश्वरत्व आदि गुणों से युक्त होने से तथा एक ही व्यष्टिरूप अज्ञान का प्रकाशक होने के कारण विद्वान् आचार्य इसे 'प्राज्ञ' इस नाम से सम्बोधित करते हैं। इस प्रसङ्ग में यह बात स्मरणीय है कि-यहाँ प्राज्ञ की प्रकर्षेण जानाति, इति प्रज्ञः, प्रज्ञः एवं प्राज्ञः, प्रकृष्टज्ञान युक्त इसप्रकार व्युत्पत्ति न करके प्रकर्षेण अज्ञः, इति इसप्रकार व्युत्पत्ति करके, इसका अत्यधिक अज्ञानी अर्थ करना चाहिए, क्योंकि इसके अल्पज्ञ आदि विशेषणों के साथ यही व्युत्पत्ति एवं अर्थ संगत प्रतीत होता है। प्राज्ञ के प्रकृष्ट अज्ञानी होने में ग्रन्थकार दो हेतु प्रस्तुत करते हैं-(1) अस्पष्ट उपाधि से युक्त होने से तथा (2) एक से अधिक अर्थात् अनेक का प्रकाशक न होने के कारण, इसे प्राज्ञ कहते हैं। यहाँ रजोगुण एवं

अज्ञान निरूपण १६३ तमोगुण द्वारा सत्त्वगुण के अभिभूत होने के कारण व्यष्टिरूप उपाधि को ‘अस्पष्ट’ कहा गया है। ठीक उसीप्रकार जैसे दर्पण धूलकणों से आच्छादित होकर अस्पष्ट प्रतिबिम्ब वाला हो जाता है, क्योंकि निकृष्ट उपाधिभूत अज्ञान के मलिन होने के कारण उसमें चिद्स्वरूप ब्रह्म का प्रतिबिम्ब स्पष्ट प्रतीत नहीं होता है। यही इसका अज्ञत्व है। इसीको वेदान्त ने चिदाभास भी कहा है। तत्पश्चात् ग्रन्थकार व्यष्टिगत अज्ञान अर्थात् जीव की दृष्टि से भी सृष्टि के विकास की प्रथम दशा का कथन करते हुए कहते हैं कि-निकृष्ट उपाधियुक्त यह व्यष्टि वेदान्त की दृष्टि से अहंकार आदि का कारण होने से ‘कारणशरीर’ कहलाती है। यहाँ प्रयुक्त अहंकार से अभिप्राय अन्तःकरण से ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि सुषुप्ति अवस्था में अन्तःकरण ही अज्ञान में विलीन होता है। आनन्द की अधिकता एवं शुद्धचैतन्य को गोलक अर्थात् कोश के समान ढक लेने से यही आनन्दमयकोश भी कहलाता है, क्योंकि सुषुप्तिकाल में जीव, स्वप्न एवं जाग्रत दोनों के विलीन होने पर एकमात्र सुख का ही अनुभव करता है। कैवल्योपनिषद् का भी इस विषय में कथन है- ‘सुषुप्तिकाले सकले विलीने तमोऽभिभूतः सुखरूपमेति’ इसीप्रकार सभी का उपरमण होने के कारण इसे सुषुप्ति एवं समस्त दृश्यमान स्थूलप्रपञ्च का एवं न दिखायी देने वाले सूक्ष्मप्रपञ्च का लयस्थान होने के कारण इसीको ‘लयस्थान’ संज्ञा द्वारा भी अभिहित किया जाता है। विशेष-(1) प्रस्तुत गद्यखण्ड में व्यष्टि की दृष्टि से अज्ञान एवं उसकी सृष्टि पर विस्तारपूर्वक विचार किया गया है। (2) जिसप्रकार अज्ञान की समष्टिरूप ईश्वर कारणशरीर, आनन्दमय कोश, सुषुप्ति एवं लयस्थान आदि कहलाता है। ठीक उसीप्रकार व्यष्टिरूप अज्ञान में भी निकृष्ट उपाधि होने पर भी वही स्थितियां आती हैं, क्योंकि इन दोनों में चैतन्यरूपतत्त्व एक ही रहता है। उपाधि की उत्कृष्टता एवं निकृष्टता के कारण ही अन्तर दिखायी देता है। (3) जाग्रत एवं स्वप्नावस्था में व्यक्ति को सुख के साथ-साथ दुःख की अनुभूति भी होती है, किन्तु सुषुप्ति में केवल सुख का अनुभव होता है।

प्राज्ञ-ईश्वर निरूपण

१६४ वेदान्तसार (४) पूर्ववत् प्रस्तुत गद्यखण्ड के अभिप्राय को भी इसप्रकार प्रदर्शित कर सकते हैं। चित्र-३१ अज्ञान की व्यष्टि जीव $\leftarrow$ शुद्ध चैतन्य $\rightarrow$ जीव $\rightarrow$ प्राज्ञ अल्पज्ञत्व $\leftarrow$ $\uparrow$ मलिन सत्त्वप्रधान अज्ञान की निकृष्ट उपाधि अनीश्वरत्व $\leftarrow$ प्राज्ञः $\leftarrow$ अस्पष्ट उपाधितया ( अत्यधिक $\rightarrow$ प्रकर्षेण अज्ञः स्थूल सूक्ष्म शरीर प्रपञ्च लयात् अज्ञानी) अनतिप्रकाशकत्वात् सर्वोपरमत्वात् लयस्थानम् एक अज्ञान अहंकारादिकारणत्वात् आनन्दप्रचुरत्वात् कोषवदाच्छादकत्वात् का अवभासक $\leftarrow$ आदि से अभिप्राय व्यक्त $\leftarrow$ कारण शरीरम् व्यष्टि $\leftarrow$ सुषुप्ति आनन्दमयकोशः अवतरणिका-समष्टि, व्यष्टिविषयक अज्ञान का निरूपण करने के पश्चात् इन दोनों में उदाहरणपूर्वक अभेद का प्रतिपादन करते हैं- तदानीमेतावीश्वरप्राज्ञौ चैतन्यप्रदीप्ताभिरतिसूक्ष्माभिरज्ञान- वृत्तिभिरानन्दमनुभवत “आनन्दभुक् चेतोमुखः प्राज्ञ” इति श्रुतेः सुखमहमस्वाप्सं न किञ्चिदवेदिषमित्युत्थितस्य परामर्शोपपत्तेश्च। अनयोः समष्टिव्यष्ट्योर्वनवृक्षयोरिव जलाशयजलयोरिव वाभेदः। एतदुपहित- योरीश्वरप्राज्ञयोरपि वनवृक्षावच्छिन्नाकाशयोरिव जलाशयजलगत्प्रति- बिम्बाकाशयोरिव वाभेद “एष सर्वेश्वर” इत्यादि श्रुतेः॥८॥ पदच्छेद- तदानीम् एतौ ईश्वरप्राज्ञौ चैतन्यप्रदीप्ताभिः अतिसूक्ष्माभिः अज्ञानवृत्तिभिः आनन्दम् अनुभवतः ‘आनन्दभुक् चेतोमुखः प्राज्ञः” इति श्रुतेः। सुखम् अहम् अस्वाप्सम्, न किञ्चिद् अवेदिषम् इति, उत्थितस्य परामर्श-उपपत्तेः अनयोः समष्टिव्यष्ट्योः वन-वृक्षयोः इव जलाशयजलयोः इव वा अभेदः। एतत् उपहितयोः ईश्वरप्राज्ञयोः अपि वनवृक्ष- अवच्छिन्न-आकाशयोः इव, जलाशयजलगत्प्रतिबिम्बित-आकाशयोः इव वा अभेदः।” एषः सर्वेश्वरः इत्यादि श्रुतेः॥८॥

प्राज्ञ-ईश्वर निरूपण १६५ अनुवाद-उससमय ईश्वर और जीव ये दोनों चैतन्य से प्रदीप्त अत्यन्त सूक्ष्म अज्ञानरूप वृत्तियों द्वारा आनन्द का अनुभव करते हैं। “चेतोमुखी प्राज्ञ आनन्द को भोगता है।” इत्यादि श्रुति का (वचन यहाँ प्रमाण है)। मैं सुखपूर्वक सोया, मुझे (इस बीच) कुछ भी पता नहीं लगा' इत्यादि वाक्यों से सोकर उठने के बाद अपने पूर्वानुभूत सुख को अभिव्यक्त करता है। वन एवं वृक्ष अथवा जलाशय और जल इन दोनों समष्टिव्यष्टि के समान इन दोनों (समष्टिव्यष्टिरूप अज्ञानोपाधियों) में भी अभेद विद्यमान है। वन एवं वृक्ष से अवच्छिन्न (ढका हुआ) आकाश के समान अथवा जलाशय एवं जल में प्रतिबिम्बित आकाश के समान ही इन (समष्टि व्यष्टिगत अज्ञान की उपाधियों से) उपहित ईश्वर एवं प्राज्ञ में भी अभेद विद्यमान है। “यह (आत्मा) सबका स्वामी है” इत्यादि श्रुति का (कथन भी यहाँ प्रमाण है)। ‘चन्द्रिका'–इससे पूर्व के खण्ड में ग्रन्थकार ने कहा कि प्रलयकाल एवं सुषुप्ति अवस्था में ईश्वर एवं प्राज्ञ दोनों ही आत्मानन्द का अनुभव करते हैं तथा आनन्द का प्राचुर्य होने के कारण इसे 'आनन्दमयकोश' भी कहा जाता है, किन्तु इस प्रसङ्ग में एक शङ्का होती है कि जब प्रलय एवं सुषुप्ति अवस्था में न तो अन्तःकरण का अस्तित्व रहता है और न ही उसकी कोई वृत्ति विद्यमान रहती है, जिसके द्वारा ईश्वर अथवा प्राज्ञ आत्मानन्द का अनुभव कर सकें तो फिर भला ये दोनों इस अवस्था में आनन्द का अनुभव किसप्रकार करते हैं? इसी शङ्का के समाधान के लिए ग्रन्थकार ने प्रस्तुत खण्ड के प्रारम्भ में कहा कि ये दोनों शुद्धचैतन्य द्वारा प्रकाशित अज्ञान की अत्यधिक सूक्ष्म वृत्तियों द्वारा, प्रलयकाल एवं सुषुप्ति अवस्था में भी स्वरूपानन्द का अनुभव करते हैं। अतः इस विषय में शङ्का किया जाना उचित नहीं है। अपने कथ्य की पुष्टि में ग्रन्थकार ने माण्डूक्योपनिषद् के आनन्दभुक् इत्यादि श्रुतिवचन एवं 'सुखमहम स्वाप्सं' इत्यादि अनुभववाक्य उद्धृत किए हैं। वस्तुतः सुषुप्तिदशा में अथवा प्रलयकाल में बाह्यसाधनों अन्तःकरण आदि का अभाव होने के कारण, यद्यपि आत्मा को बाह्यविषयों का ज्ञान नहीं होता है, किन्तु ज्ञान, जीवात्मा का स्वाभाविकगुण होने के कारण उसे आनन्द का अनुभवरूप आन्तरिकज्ञान इस अवस्था में भी रहता है, क्योंकि आत्मा से ज्ञान को कभी भी, किसी भी अवस्था में उसीप्रकार अलग नहीं किया जा सकता है, जिसप्रकार अग्नि से उसकी उष्णता को किसी भी प्रकार पृथक् नहीं किया जा सकता है, आत्मा तो वस्तुतः चित्स्वरूप है।

१६६ वेदान्तसार वेदान्त के अनुसार- अज्ञान से उत्पन्न अन्तःकरण की वृत्तियों द्वारा ही जीव स्वप्न एवं जाग्रत अवस्था में अनुभूति एवं भोग आदि क्रियाओं को सम्पादित करता है। यद्यपि सुषुप्ति अवस्था में यह अन्तःकरण विपरीत क्रम में अपने कारणरूप अज्ञान में ही विलीन हो जाता है तथापि इस अवस्था में भी चैतन्य द्वारा प्रकाशित अज्ञान की सूक्ष्मातिसूक्ष्म वृत्तियाँ विद्यमान रहती हैं, जिनके द्वारा ईश्वर एवं प्राज्ञ अर्थात् जीव स्वरूपानन्द का अनुभव करते हैं। अतः यहाँ किसीप्रकार की विसंगति की परिकल्पना नहीं करनी चाहिए। तत्पश्चात् श्रुतिवचन एवं अनुभववाक्य को स्पष्ट करते हैं। 'चेतोमुखप्राज्ञ आनन्द का भोग करता है' यह श्रुतिवचन माण्डूक्योपनिषद् में आया है। यहाँ प्रयुक्त 'चेतोमुख' का विद्वन्मनोरञ्जनीकार ने-'चैतन्य प्रदीप्त अज्ञान वृत्तियों को ही मुख्यरूप से अपनाने वाला' अर्थ किया है। अर्थात् शुद्धचैतन्यब्रह्म के प्रकाश से प्रकाशित अज्ञानवृत्तिप्रधान समष्टि एवं व्यष्टिरूप ईश्वर एवं जीव सुषुप्ति-अवस्था एवं प्रलयकाल में भी आनन्द का अनुभव करते हैं। यहाँ प्रयुक्त आनन्दभुक् से अभिप्राय है-आनन्द का अनुभव करने वाला। 'प्राज्ञ' शब्द यहाँ ईश्वर एवं जीव दोनों अर्थों में प्रयुक्त माना जा सकता है। 'प्रकृष्टेन जानाति इति प्राज्ञः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार इसका सर्वज्ञरूप ईश्वर अर्थ कर सकते हैं तथा 'प्रकर्षेण अज्ञः' इति प्राज्ञः इत्यादि व्युत्पत्ति के अनुसार प्रकृष्ट अज्ञानी अर्थात् जीव अर्थ भी ग्रहण किया जा सकता है। अतः दोनों अर्थों की संगति उचित है। यों भी ईश्वर और जीव दोनों ही सुषुप्ति अवस्था में आनन्द का अनुभव करते ही हैं। 'मैं सुखपूर्वक सोया, इस बीच मैं कुछ भी नहीं जान सका' इत्यादि अनुभववाक्य सर्वसाधारण द्वारा प्रतिदिन अनुभव में आता ही है। उस गहन निद्रा में जीव को यद्यपि अन्य बातों का ज्ञान नहीं था, किन्तु उस स्थिति में भी उसे इस बात का भान अवश्य था कि मैं आनन्द में हूँ, जिसे उसने सोकर उठने के बाद अभिव्यक्त किया। इससे सिद्ध होता है कि आत्मा अन्तःकरण के अभाव में भी आनन्द का अनुभव कर सकता है। प्रस्तुत खण्ड के द्वितीय अंश में ग्रन्थकार ने समष्टिव्यष्टिरूप अज्ञान एवं ईश्वर तथा प्राज्ञ की एकता का सोदाहरण प्रतिपादन किया है। तदनुसार समष्टिरूप अज्ञान से उपहित चैतन्य की 'ईश्वर' तथा व्यष्टिरूप अज्ञानों से उपहित चैतन्य की जीव अथवा 'प्राज्ञ' संज्ञा है। यद्यपि स्थूलदृष्टि से देखने पर ईश्वरगत समष्टिरूप अज्ञान तथा जीवगत व्यष्टिमूलक अज्ञान में भेद प्रतीत होता है, किन्तु यह वास्तविकभेद नहीं है, क्योंकि समष्टि-व्यष्टिरूप

प्राज्ञ-ईश्वर निरूपण १६७ उपर्युक्त दोनों प्रकार के अज्ञान वस्तुतः उसीप्रकार एक हैं, जिसप्रकार वनगत आकाश एवं वृक्षगत आकाश में भिन्नता प्रतीत होते हुए भी दोनों एक हैं। इन दोनों के ऐक्य को समझाने के लिए ग्रन्थकार अन्य उदाहरण देते हुए कहते हैं कि-जलाशय में प्रतिबिम्बित होने वाले आकाश एवं जल की एक बूँद में प्रतिबिम्बित होने वाले आकाश में तात्त्विकदृष्टि से कोई भेद नहीं है। ठीक उसीप्रकार ईश्वर स्थित समष्टिगत अज्ञान एवं जीवस्थित व्यष्टिगत अज्ञान में भी कोई वास्तविकभेद नहीं है। अतः इस दृष्टि से ईश्वर और प्राज्ञ में भी कोई भेद नहीं है। प्रतीत होने वाला भेद वस्तुतः वैसा ही है, जैसाकि स्वर्णपिण्ड एवं उससे बने कटक-कुण्डल आदि में होता है। जिसप्रकार स्वर्णरूप कारण तथा उससे बनाए गए कटककुण्डल आदि कार्य, दोनों में यद्यपि भिन्नता दिखायी देती है, किन्तु कार्यकारणरूप भेद को दूर करने पर यह भिन्नता समाप्त हो जाती है तथा दोनों स्थलों पर स्वर्णरूप ऐक्यभाव की प्रतीति होती है। ठीक उसीप्रकार समष्टिरूप ईश्वर में स्थित शुद्धसत्त्वप्रधान अज्ञान तथा व्यष्टिरूप जीव अथवा प्राज्ञ के मलिनसत्त्वप्रधान अज्ञान में से विशेषणरूप शुद्धसत्त्वप्रधान एवं मलिनसत्त्वप्रधान को हटा देने पर दोनों में शुद्धचैतन्यरूप परमब्रह्म ही विद्यमान रहता है। यही इन दोनों अर्थात् ईश्वर एवं जीव का ऐक्य है। जिसे ग्रन्थकार ने वनगत आकाश, वृक्षगत-आकाश तथा जलाशय में प्रतिबिम्ब आकाश तथा जल में प्रतिबिम्बित आकाश के ऐक्य द्वारा समझाने का प्रयास किया है। अपने इस कथन की पुष्टि में ग्रन्थकार माण्डूक्योपनिषद् के ‘एष सर्वेश्वर' इति वचन को प्रमाणरूप में उद्धृत करते हैं। जहाँ प्राज्ञ को ही सर्वेश्वर, सर्वज्ञ, अन्तर्यामी, सभी जीवों की उत्पत्ति एवं प्रलय का स्थान सभी का कारण बताया गया है- “एष सर्वेश्वरः एषः सर्वज्ञः एषः अन्तर्यामि, एष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम्।” विशेष – (1) यहाँ प्रयुक्त ‘प्राज्ञ' शब्द चैतन्य की प्रधानता से ईश्वर एवं जीव दोनों अर्थों का वाचक है। शङ्कराचार्य ने ‘चेतोमुख' का ‘स्वप्न आदि अवस्था में अज्ञानरूप चेतना के प्रति द्वाररूप' अर्थ किया है। (2) वेदान्त ज्ञान को अन्तःकरण की स्थितिविशेष के रूप में मानता है। इनके अनुसार सांसारिक सुख एवं दुःख की अनुभूति भी एक मानसिक दशा ही है तथा अन्तःकरण की इस वृत्ति का उद्भव अज्ञान से होता है। सुषुप्ति की अवस्था में इन वृत्तियों का अज्ञान में विलय हो जाता है।

तुरीय निरूपण

१६८ वेदान्तसार (३) चैतन्य से प्रकाशित विलीन हुई ये अन्तःकरण की सूक्ष्मातिसूक्ष्म वृत्तियाँ ही कारणशरीर या सुषुप्ति अवस्था में ईश्वर एवं जीव को आनन्द का अनुभव कराने में सहायक होती हैं। (४) चैतन्य से आलोकित अज्ञान की ये वृत्तियाँ स्वप्न एवं जाग्रत अवस्था में अन्तःकरण के रूप में विकसित होती हैं, किन्तु सुषुप्ति अवस्था में इनका निर्माण नहीं होता, अपितु वहाँ ये बीज में वृक्ष के समान सूक्ष्मातिसूक्ष्मरूप में विद्यमान रहती हैं। (५) प्रस्तुत गद्यखण्ड के अभिप्राय को हम इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं- चित्र-३२ सुषुप्तिः अवस्थायाम् ↓ (क) एतौ ईश्वर-प्राज्ञौ चैतन्यदीप्ताभिः अतिसूक्ष्माभिः अज्ञान वृत्तिभिः आनन्दं अनुभवतः चित्र-३३ (ख) माया - समष्टिः व्यष्टिः -अविद्या ↓ ↓ वन वृक्ष ↓ ↓ वन से अवच्छिन्न आकाश अभेदः वृक्ष से अवच्छिन्न आकाश ↓ ↓ जलाशय जल ↓ ↓ जलाशय में प्रतिबिम्बित आकाश जल में प्रतिबिम्बित आकाश ↓ ↓ वत् (समान) वत् (समान) ↓ ↓ ईश्वरः प्राज्ञः विद्यते अवतरणिका- तदनन्तर ईश्वर एवं प्राज्ञ से भिन्न चतुर्थ शुद्धचैतन्य अथवा तुरीय के विषय में कहते हैं- वनवृक्षतदवच्छिन्नाकाशयोर्जलाशयजलतद्ग तप्रतिबिम्बाकाशयोर्वाधारभू तानुपहिताकाशवदनयोरज्ञानतदुपहितचैतन्ययोराधारभूतं यदनुपहितं चैतन्यं

तुरीय-निरूपण १६१ तत्तूरीयमित्युच्यते “शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्त” इत्यादिश्रुतेः। इदमेव तुरीयं शुद्धचैतन्यमज्ञानादितदुपहितचैतन्याभ्यां तप्तायः पिण्डवदविविक्तं सन्महावाक्यस्य वाच्यं विविक्तं सल्लक्ष्यमिति चोच्यते॥९॥ पदच्छेद-वन-वृक्ष-तद्-अवच्छिन्न-आकाशयोः जलाशय-जल- तद्गत- प्रतिबिम्ब- आकाशयोः वा आधारभूत-अनुपहित-आकाशवद् अनयोः अज्ञान तद् उपहित चैतन्ययोः आधारभूतम् यद् अनुपहितम् चैतन्यम्, तत् तुरीयम् इति उच्यते। “शिवम् अद्वैतम् चतुर्थम् मन्यते” इत्यादि श्रुतेः। इदम् एव तुरीयम् शुद्धचैतन्यम् अज्ञान-आदि, तद् उपहित चैतन्याभ्याम् तप्त-अयः पिण्डवद् अविविक्तम् सन् महावाक्यस्य वाच्यम्, विविक्तम् सत् लक्ष्यम् इति च उच्यते॥९॥ अनुवाद–वन में स्थित आकाश एवं वृक्ष में स्थित आकाश अथवा जलाशय एवं जल में प्रतिबिम्बित होने वाले दोनों आकाशों के आधार, उपाधिरहित महा आकाश के समान, समष्टिव्यष्टिगत इन दोनों अज्ञानों एवं इनकी उपाधियों से युक्त ईश्वर और प्राज्ञ दोनों चैतन्यों का आधार उपाधिरहित शुद्धचैतन्य है। वही 'तुरीय' इस नाम से भी कहा जाता है। 'अद्वैतब्रह्म को ही चतुर्थ मानते हैं' इत्यादि श्रुतिवचन (इसमें प्रमाण है)। यही 'तुरीय' उपाधिरहित शुद्धचैतन्य (ब्रह्म), अज्ञान आदि एवं उनकी उपाधि से युक्त दो चैतन्यों (ईश्वर और जीव) के साथ 'तप्त लोहपिण्ड के समान' जो एकत्वसूचक व्यवहार होता है। वही महावाक्य (तत्त्वमसि) का वाच्यार्थ है। जो अनेकत्व की विवक्षा होने पर (महावाक्य) का लक्ष्यार्थ इसीरूप में कहा जाता है। 'चन्द्रिका'–यहाँ तक वर्णित समष्टिगत अज्ञान, व्यष्टिगत अज्ञान एवं इन दोनों की उपाधियों से युक्त ईश्वर एवं प्राज्ञरूप चैतन्य, इन सभी का मुख्य आधार उपाधिरहित शुद्धचैतन्यरूप ब्रह्म को बताते हुए उदाहरण देकर समझाते हैं कि जिसप्रकार समष्टिरूप वन में स्थित अनेकवृक्षों से आच्छादित आकाश तथा व्यष्टिरूप वृक्ष के द्वारा आच्छादित आकाश, इसीप्रकार समष्टिरूप जलाशय में प्रतिबिम्बित आकाश एवं जल की व्यष्टि, एक बूँद में प्रतिबिम्बित आकाश, इन सभी का आधार समस्तप्रकार की उपाधियों से रहित महा आकाश है। ठीक उसीप्रकार समष्टिव्यष्टिगत अज्ञान एवं इन दोनों उपाधियों से विशिष्ट ईश्वर एवं प्राज्ञरूप चैतन्यों का एकमात्र आधार

१७० वेदान्तसार विशुद्धचैतन्य परंब्रह्म ही है। इसीको वेदान्त ने 'तुरीय' अर्थात् चतुर्थ संज्ञा प्रदान की है। परमविशुद्धचैतन्य को 'तुरीय' कहने पर विभिन्न आचार्यों ने अलग-अलग मत प्रस्तुत किए हैं। जैसे (1) शङ्कराचार्य के अनुसार प्राज्ञ, तेजस् और विश्व की अपेक्षा चतुर्थ होने के कारण इसे 'तुरीय' कहा जाता है। (2) सुषुप्ति, स्वप्न और जाग्रत इन तीन अवस्थाओं से भिन्न अर्थात् चतुर्थ होने के कारण इसे 'तुरीय' कहते हैं। (3) आपदेव ने अविद्या, ईश्वर और प्राज्ञ की अपेक्षा चतुर्थ होने से इसे 'तुरीय' माना है। प्रस्तुत ग्रन्थ में उक्त सभी का प्रतिपादन किया गया है। अतः इन सभी दृष्टियों से शुद्ध चैतन्य का 'तुरीय' नाम उचित ही है। इसी क्रम में अपने कथन की पुष्टि में ग्रन्थकार 'शिवम्' इत्यादि श्रुतिवचन प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हैं। 'शिव' शब्द यहाँ परंब्रह्म शुद्ध चैतन्य के लिए प्रयुक्त हुआ है। सभी वेदान्तशास्त्रों ने प्रायः विशुद्ध ब्रह्म अथवा अद्वैत ब्रह्म को ही चतुर्थ माना है। प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को चित्र के माध्यम से सरलतापूर्वक समझा जा सकता है- चित्र-३४ यथा वन से वृक्ष से अवच्छिन्न आकाश आधारभूत महाकाश जलाशय में प्रतिबिम्बित आकाश जल में तथैव समष्टि विषयक अज्ञान आधारभूत शुद्ध ब्रह्म व्यष्टि विषयक अज्ञान तदुपहित ईश्वर जीव तदुपहित चैतन्य चैतन्य चतुर्थ-तुरीय-चतुर्थ तत्पश्चात् प्रस्तुत खण्ड के द्वितीय अंश को स्पष्ट करते हैं-

तुरीय-निरूपण १७१ जैसाकि अनुबन्धचतुष्टय में विषय नामक अनुबन्ध का प्रतिपादन करते हुए ग्रन्थकार ने कहा कि जीव और ब्रह्म की एकता प्रतिपादित करना ही इस ग्रन्थ का विषय है-'विषयो जीवब्रह्मैक्यं शुद्धचैतन्यं प्रमेयं तत्रैव वेदान्तानां तात्पर्यात्।' किन्तु अज्ञान की समष्टिव्यष्टि के विवेचन में मुख्य प्रतिपाद्यविषय कहीं विस्मृत न हो जाए, इस दृष्टि से ग्रन्थकार प्रस्तुत गद्यखण्ड में विशुद्धसत्त्वप्रधान अज्ञान से आच्छादित समष्टिरूप ईश्वर एवं मलिनसत्त्वप्रधान अज्ञान से आच्छादित व्यष्टिरूप जीव या प्राज्ञरूप चैतन्य तथा तुरीयरूप विशुद्धचैतन्य, परमब्रह्म ये तीनों तात्त्विकदृष्टि से एक हैं, क्योंकि इन तीनों में चैतन्य समानरूप से विद्यमान है। ऐसा कहकर ब्रह्म और जीव की एकता प्रतिपादित करते हैं। इसी अभिप्राय को समझाने के लिए ग्रन्थकार 'तप्तायः पिण्ड' का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। किसी लोहे के टुकड़े को आग में गर्म करके पूरी तरह लाल कर लेते हैं। इस स्थिति में लोहे के भार आदि पार्थिव अंश के विद्यमान रहते हुए भी इसमें अग्नि के गुण दाहकता आदि से युक्त होने के कारण, इसे हम आग का गोला भी कहते हैं, किन्तु उससे जलने पर 'लोहे के टुकड़े से जल गया' इसप्रकार व्यवहार करते हैं। यहाँ अग्नि लोहे में व्याप्यव्यापकभाव से विद्यमान होने से दोनों की अभिन्नता का प्रतिपादन वाच्यार्थ होगा। प्रस्तुत अंश के अभिप्राय एवं ग्रन्थ के अन्त में प्रतिपादित महावाक्यों के आशय को समझने के लिए हमें पहले तीन शब्दशक्तियों को समझना होगा-(1) अभिधा (2) लक्षणा और (3) व्यञ्जना। इनमें अभिधा-शब्द के साक्षात् संकेतित अर्थ को कहती है। जैसे- गङ्गायां घोषः उदाहरण में इसका साक्षात् संकेतित अर्थ है-'जल प्रवाह में बस्ती' (घोष)। यह संकेतित अर्थ मुख्यार्थ या वाच्यार्थ कहलाएगा; जिसका प्रतिपादन अभिधा शब्दशक्ति के माध्यम से किया जाता है। मुख्य अर्थ का बाध होने पर रूढ़ि अथवा प्रयोजन द्वारा लक्षणा शब्द शक्ति अन्य अर्थ की प्रतीति कराती है, जिसे लक्ष्यार्थ कहा जाता है। जैसे-उपर्युक्त उदाहरण 'गङ्गायां घोषः' में बस्ती का जलप्रवाह में रहना असम्भव होने से मुख्यार्थबाध हुआ। अतः प्रयोजनवश लक्षणा शब्दशक्ति द्वारा हमें तत्सम्बद्ध अन्य 'तट' रूप अर्थ की प्रतीति होती है तथा यह तटरूप अर्थ ही लक्ष्यार्थ कहलाता है। तत्पश्चात् व्यञ्जना शब्दशक्ति द्वारा उस बस्ती में शीतत्व पावनत्व की प्रतीति करायी जाती है। यह शीतत्व पावनत्व रूप अर्थ व्यङ्ग्यार्थ कहलाएगा। 'तपे हुए लोहे के टुकड़े' (तप्तायः पिण्ड) रूप प्रस्तुत उदाहरण में दाहकता अग्नि का धर्म है जो लोहे के टुकड़े में समा गया है। इसलिए

१७२ वेदान्तसार लोहपिण्ड और अग्नि इन दोनों की अभिन्नता यहाँ वाच्यार्थ मानी जाएगी, जिसकी प्रतीति में अभिधा शब्दशक्ति सहायक होती है। जबकि यहाँ ‘अयः पिण्ड’ द्वारा अपने से सम्बद्ध अग्नि का लक्षणा शब्दशक्ति द्वारा बोध कराया जाता है। अतः लोहपिण्ड एवं अग्नि में भिन्नता की प्रतीति का लक्षणा शब्दशक्ति द्वारा बोध कराया जाता है। अतः लोहपिण्ड और अग्नि में भिन्नता की प्रतीति लक्षणा शब्दशक्ति द्वारा होगी तथा इन दोनों की यह भिन्नता ही यहाँ लक्ष्यार्थ कहलाएगी। ठीक इसीप्रकार तत्त्वमसि इत्यादि महाकाव्य में अज्ञानोपहित चैतन्य एवं तुरीयरूप चैतन्य में अभिन्नता का प्रतिपादन वाच्यार्थ होगा तथा इन दोनों की भिन्नता की प्रतीति कराना ही यहाँ लक्ष्यार्थ कहलाएगा, जिसकी प्रतीति कराने में लक्षणा शब्दशक्ति सहायक होगी। ग्रन्थ के अन्त में प्रतिपादित महावाक्यों ‘तत्त्वमसि’ इत्यादि में इन तीनों की इस एकता का प्रतिपादन ही वाच्यार्थरूप में किया गया है। इसके अतिरिक्त ईश्वर एवं प्राज्ञरूप चैतन्य की अपेक्षा विशुद्धचैतन्य की भिन्नता का प्रतिपादन ही इस महावाक्य या महावाक्यों का लक्ष्यार्थ माना जाएगा। विशेष-(1) साहित्यदर्पणकार ने लक्षणा का लक्षण इसप्रकार किया है- “मुख्यार्थबाधे तद्युक्तो ययाऽन्योऽर्थः प्रतीयते। रूढेः प्रयोजनाद्वासौ लक्षणाशक्तिरर्पिता।।” (2) तुरीय-चतुर+छ (चतुरश्छयतावाद्याक्षर लोपश्च) वार्तिक से च लोप। (3) प्रस्तुत खण्ड के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा सकता है-

चित्र-३५

विशुद्ध सत्त्वप्रधान अज्ञान          शुद्ध चैतन्य          मलिन सत्त्वप्रधान अज्ञान
से उपहित समष्टि                                          से उपहित व्यष्टि
|                                                        |
ईश्वर ―――― तत्                 तुरीय                    त्वम् ―――― जीव
(चतुर्थ)
┌─────────────────┐                                      ┌─────────────────┐
│ अभिन्नता की प्रतीति │            तत्त्वमसि                 │ भिन्नता की प्रतीति  │
└────────┬────────┘                ↓                     └────────┬────────┘
(वाच्यार्थ)            व्याप्यव्यापकभाव                 (लक्ष्यार्थ)
┌────────┴────────┐                ↓                     ┌────────┴────────┐
│ अभिन्नता की प्रतीति │            (लोहपिण्ड)                │ भिन्नता की प्रतीति  │
└─────────────────┘                ↓                     └─────────────────┘
(अग्नि)

शक्तिद्वय-निरूपण (आवरण व विक्षेप शक्ति)

शक्तिद्वय-निरूपण १७३ अवतरणिका-तुरीय अर्थात् शुद्धचैतन्य की विशेषताओं का कथन करने के पश्चात् ग्रन्थकार अज्ञान की आवरण एवं विक्षेप नामक दो शक्तियों का सोदाहरण उल्लेख करते हैं- अस्याज्ञानस्यावरणविक्षेपनामकमस्ति शक्तिद्वयम्। आवरण शक्तिस्तावदल्पोऽपि मेघोऽनेकयोजनायतमादित्यमण्डलमवलोकयितृनयन- पथपिधायकतया यथाच्छादयतीव तथाज्ञानं परिच्छिन्नमप्यात्मानम- परिच्छिन्नमसंसारिणमवलोकयितृबुद्धिपिधायकतयाच्छादयतीव तादृशं सामर्थ्यम्। तदुक्तम्- “घनच्छन्नदृष्टिर्घनच्छन्नमर्कं यथा मन्यते निष्प्रभं चातिमूढः। तथा बद्धवद्भाति यो मूढदृष्टेः स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा” इति॥ पदच्छेद- अज्ञानस्य आवरण-विक्षेपनामकम् अस्ति शक्तिद्वयम्। आवरणशक्तिः तावत् अल्पः अपि मेघः अनेकयोजन-आयतम् आदित्यमण्डलम्-अवलोकयितृ-नयनपथ-पिधायकतया यथा आच्छादयति इव, तथा अज्ञानम् परिच्छिन्नाम् अपि आत्मानम् अपरिच्छिन्नम् असंसारिणम् अवलोकयितृ-बुद्धिपिधायकतया आच्छादयति इव, तादृशम् सामर्थ्यम्। तद् उक्तम्- अन्वय-यथा घनच्छन्नदृष्टिः अतिमूढः (जनः) घनच्छन्नम् अर्कम् निष्प्रभम् च मन्यते, तथा मूढदृष्टेः यः (आत्मा) बद्धवत् भाति, नित्योपलब्धिस्वरूपः सः आत्मा अहम् (इति कथ्यते) अनुवाद-आवरण और विक्षेप नामक अज्ञान की दो शक्तियाँ हैं। जिसप्रकार छोटा सा बादल का टुकड़ा भी दर्शन के दृष्टिपथ को ढककर अनेक योजन तक फैले हुए सूर्यमण्डल को आच्छादित-सा कर देता है, उसीप्रकार सीमित अज्ञान भी असीम और असांसारिक आत्मा को देखने वाले की बुद्धि को आच्छादित करके मानो ढक देता है। (यह) आवरण शक्ति तो उसप्रकार की सामर्थ्य से युक्त है। इसलिए कहा गया है- “जिसप्रकार मेघ से आच्छन्न दृष्टिवाला अत्यन्त मूर्ख व्यक्ति, बादल से ढके हुए सूर्य को प्रकाशरहित मानता है। उसीप्रकार मूढ़ सामान्यदृष्टि वालों को जो आत्मा (जन्म मरणादि बन्धनों से) बँधा हुआ-सा प्रतीत होता है, ऐसा नित्य एवं ज्ञानस्वरूप वह आत्मा अहम् (इसप्रकार कहा गया) है।

१७४ वेदान्तसार 'चन्द्रिका'- जिस अज्ञान के स्वरूप एवं समष्टिव्यष्टिविषयक दो भेदों का अभी तक उल्लेख किया गया है। उसकी आवरण एवं विक्षेप नामक दो शक्तियाँ होती हैं। इसमें आवरणशक्ति द्रष्टा की दृष्टि के आगे एक आवरण डाल देती है। इससे देखने वाला सामने स्थित वस्तु के स्वरूप को नहीं देख पाता है। इसे अत्यन्त सुन्दर उदाहरण द्वारा समझाते हैं- जैसे-आकाश में बादल का एक छोटा-सा टुकड़ा अनेक योजन विस्तार वाले सूर्य के सामने आकर उसे आच्छादित कर लेता है। जिसे देखकर सामान्यतया व्यक्ति यही अनुमान लगाता है कि बादल ने सूर्य को ढक लिया है, जबकि वास्तव में यह पूर्णतया असम्भव है, क्योंकि करोड़ों योजन विस्तार वाला सूर्य किसी भी स्थिति में बादल द्वारा आच्छादित नहीं किया जा सकता है। ठीक उसीप्रकार सीमित अज्ञान भी अपनी आवरण नामक शक्तिविशेष द्वारा जिसकी कोई सीमा नहीं है अर्थात् निस्सीम, जिसका कभी जन्म नहीं होता अर्थात् अजन्मा, सांसारिक समस्तवस्तुओं से भिन्न आत्मा को आवृत सा कर लेता है। इसकारण सामान्य बुद्धिवाला व्यक्ति आत्मा को देख नहीं पाता है। वास्तव में आत्मा नित्योपलब्धि स्वरूप वाला, सच्चिदानन्द है, देश, काल आदि की सीमाओं से परे है। अतः किसी भी वस्तु द्वारा उसे ढकना पूर्णरूप से असम्भव है। इसके अतिरिक्त उसे कभी भी संसार का कोई बन्धन बांधने में समर्थ नहीं है, किन्तु अज्ञानी व्यक्ति उसे बंधा हुआ सा मानता है। वस्तुतः आत्मा के वास्तविक स्वरूप को ढकने में अज्ञान की आवरण शक्ति ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करती है। अपने कथन की पुष्टि में ग्रन्थकार 'घनच्छन्नदृष्टि' इत्यादि कारिका को उद्धृत करते हैं। इस कारिका का भी यही अभिप्राय है जो उक्त गद्यखण्ड में प्रतिपादित किया गया है- जिसप्रकार किसी छोटे से बादल के टुकड़े से आच्छन्नदृष्टि वाला मूर्खबुद्धि व्यक्ति यह समझता है कि बादल ने सूर्य को ढक लिया इस कारण सूर्य प्रकाशरहित हो गया। इसलिए सर्वत्र अंधकार का साम्राज्य हो गया। ठीक उसीप्रकार मूढ़बुद्धि अज्ञानीजन नित्य, सच्चिदानन्दस्वरूप आत्मा को जन्म-मरण आदि अनेक बन्धनों में आबद्ध मान लेते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि यह आत्मा नित्य, शुद्धबुद्ध एवं प्रकाशक है। इसकी कोई सीमा नहीं है। यह स्थान एवं समय की सीमाओं से परे है। इसे दैनिक व्यवहार में लोग 'अहम्' इस शब्द द्वारा प्रयोग करते हैं।