भारतकोश
संग्रह पर लौटें

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

अ० २४] * चतुर्थ अंश * ३०७

ततश्चानुदिनमल्पालपह््रासव्यprefixतावच्छेदद्धर्मार्थयो-<br>र्जगतस्संङ्क्षयो भविष्यति॥ ७३॥<br>ततश्चार्थ एवाभिजनहेतुः॥ ७४॥<br>बलमेवाशेषधर्महेतुः॥ ७५॥ अभिरुचिरेव<br>दाम्पत्यसम्बन्धहेतुः॥ ७६॥ स्त्रीत्वमेवोपभोग-<br>हेतुः॥ ७७॥ अनृतमेव व्यवहारजयहेतुः॥ ७८॥<br>उन्नताम्बुतैव पृथिवीहेतुः॥ ७९॥ ब्रह्मसूत्रमेव<br>विप्रत्वहेतुः॥ ८०॥ रत्नधातुतैव श्लाघ्यता-<br>हेतुः॥ ८१॥ लिङ्गधारणमेवाश्रमहेतुः॥ ८२॥<br>अन्याय एव वृत्तिहेतुः॥ ८३॥ दौर्बल्यमेवावृत्ति-<br>हेतुः॥ ८४॥ अभयप्रगल्भोच्चारणमेव<br>पाण्डित्यहेतुः॥ ८५॥ अनाढ्यतैव साधुत्व-<br>हेतुः॥ ८६॥ स्नानमेव प्रसाधनहेतुः॥ ८७॥<br>दानमेव धर्महेतुः॥ ८८॥ स्वीकरणमेव<br>विवाहहेतुः॥ ८९॥ सद्द्वेषधार्यैव पात्रम्॥ ९०॥<br>दूरायतनोदकमेव तीर्थहेतुः॥ ९१॥<br>कपटवेषधारणमेव महत्त्वहेतुः ॥९२॥<br>इत्येवमनेकदोषोत्तरे तु भूमण्डले सर्ववर्णेष्वेव<br>यो यो बलवान्स स भूपतिर्भविष्यति॥ ९३॥<br>एवं चातिलुब्धकराजासहाश्शैलानामान्तर-<br>द्रोणीः प्रजास्संश्रयिष्यन्ति॥ ९४॥ मधुशाक-<br>मूलफलपत्रपुष्पाद्याहाराश्च भविष्यन्ति॥ ९५॥<br>तरुवल्कलपर्णचीरप्रावरणाश्चातिबहुप्रजाश्शी-<br>तवातातपवर्षसहाश्च भविष्यन्ति॥ ९६॥ न च<br>कश्चित्रयोविंशतिवर्षाणि जीविष्यति<br>अनवरतं चात्र कलियुगे क्षयमाया-<br>त्यखिल एवैष जनः॥ ९७॥ श्रौते स्मार्ते च धर्मे<br>विप्लवमत्यन्तमुपगते क्षीणप्राये च कलावशेष-<br>जगत्स्रष्टुश्चराचरगुरोरादिमध्यान्तरहितस्य ब्रह्म-<br>मयस्यात्मरूपिणो भगवतो वासुदेवस्यांश-<br>श्शाम्बलग्रामप्रधानब्राह्मणस्य विष्णुयशसो<br>गृहेऽष्टगुणर्द्धिसमन्वितः कल्किरूपी जगत्यत्रावतीर्य-<br>सकलम्लेच्छदस्युदुष्टाचरणचेतसामशेषाणा-<br>मपरिच्छिन्नशक्तिमाहात्म्यः क्षयं करिष्यतितब दिन-दिन धर्म और अर्थका थोड़ा-थोड़ा ह्रास तथा क्षय होनेके कारण संसारका क्षय हो जायगा॥ ७३॥ उस समय अर्थ ही कुलीनताका हेतु होगा; बल ही सम्पूर्ण धर्मका हेतु होगा; पारस्परिक रुचि ही दाम्पत्य-सम्बन्धकी हेतु होगी, स्त्रीत्व ही उपभोगका हेतु होगा [अर्थात् स्त्रीकी जाति-कुल आदिका विचार न होगा]; मिथ्या भाषण ही व्यवहारमें सफलता प्राप्त करनेका हेतु होगा; जलकी सुलभता और सुगमता ही पृथिवीकी स्वीकृतिका हेतु होगा [अर्थात् पुण्यक्षेत्रादिका कोई विचार न होगा। जहाँकी जलवायु उत्तम होगी वही भूमि उत्तम मानी जायगी]; यज्ञोपवीत ही ब्राह्मणत्वका हेतु होगा; रत्नादि धारण करना ही प्रशंसाका हेतु होगा; बाह्य चिह्न ही आश्रमोंके हेतु होंगे; अन्याय ही आजीविकाका हेतु होगा; दुर्बलता ही बेकारीका हेतु होगा; निर्भयतापूर्वक धृष्टताके साथ बोलना ही पाण्डित्यका हेतु होगा, निर्धनता ही साधुत्वका हेतु होगी; स्नान ही साधनका हेतु होगा; दान ही धर्मका हेतु होगा; स्वीकार कर लेना ही विवाहका हेतु होगा [अर्थात् संस्कार आदिकी अपेक्षा न कर पारस्परिक स्नेहबन्धनसे ही दाम्पत्य-सम्बन्ध स्थापित हो जायगा]; भली प्रकार बन-ठनकर रहनेवाला ही सुपात्र समझा जायगा; दूरदेशका जल ही तीर्थोदकत्वका हेतु होगा तथा छद्मवेश धारण ही गौरवका कारण होगा॥ ७४—९२॥ इस प्रकार पृथिवीमण्डलमें विविध दोषोंके फैल जानेसे सभी वर्णोंमें जो-जो बलवान् होगा वही-वही राजा बन बैठेगा॥ ९३॥<br>इस प्रकार अतिलोलुप राजाओंके कर-भारको सहन न कर सकनेके कारण प्रजा पर्वत-कन्दराओंका आश्रय लेगी तथा मधु, शाक, मूल, फल, पत्र और पुष्प आदि खाकर दिन काटेगी॥ ९४-९५॥ वृक्षोंके पत्र और वल्कल ही उनके पहनने तथा ओढ़नेके कपड़े होंगे। अधिक सन्तानें होंगी। सब लोग शीत, वायु, घाम और वर्षा आदिके कष्ट सहेंगे॥ ९६॥ कोई भी तेईस वर्षतक जीवित न रह सकेगा। इस प्रकार कलियुगमें यह सम्पूर्ण जनसमुदाय निरन्तर क्षीण होता रहेगा॥ ९७॥ इस प्रकार श्रौत और स्मार्तधर्मका अत्यन्त ह्रास हो जाने तथा कलियुगके प्रायः बीत जानेपर शम्बल (सम्भल) ग्रामनिवासी ब्राह्मणश्रेष्ठ विष्णुयशके घर सम्पूर्ण संसारके रचयिता, चराचर गुरु, आदिमध्यान्तशून्य, ब्रह्ममय, आत्मस्वरूप भगवान् वासुदेव अपने अंशसे अष्टैश्वर्ययुक्त कल्किरूपसे संसारमें अवतार लेकर असीम शक्ति और माहात्म्यसे

३०८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २४


संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
स्वधर्मेषु चाखिलमेव संस्थापयिष्यति॥ ९८॥सम्पन्न हो सकल म्लेच्छ, दस्यु, दुष्टाचारी तथा दुष्ट चित्तोंका क्षय करेंगे और समस्त प्रजाको अपने-अपने धर्ममें नियुक्त करेंगे॥ ९८॥
अनन्तरं चाशेषकलेरवसाने निशावसाने विबुद्धानामिव तेषामेव जनपदानाम् अमलस्फटिकविशुद्धा मतयो भविष्यन्ति॥ ९९॥इसके पश्चात् समस्त कलियुगके समाप्त हो जानेपर रात्रिके अन्तमें जागे हुओंके समान तत्कालीन लोगोंकी बुद्धि स्वच्छ, स्फटिकमणिके समान निर्मल हो जायगी॥ ९९॥
तेषां च बीजभूतानामशेषमनुष्याणां परिणतानामपि तत्कालकृतापत्यप्रसूतिर्भविष्यति॥ १००॥उन बीजभूत समस्त मनुष्योंसे उनकी अधिक अवस्था होनेपर भी उस समय सन्तान उत्पन्न हो सकेगी॥ १००॥
तानि च तदपत्यानि कृतयुगानुसारिण्येव भविष्यन्ति॥ १०१॥उनकी वे सन्तानें सत्ययुगके ही धर्मोंका अनुसरण करनेवाली होंगी॥ १०१॥
अत्रोच्यतेइस विषयमें ऐसा कहा जाता है कि—
यदा चन्द्रश्च सूर्यश्च तथा तिष्यो बृहस्पतिः।<br>एकराशौ समेष्यन्ति तदा भवति वै कृतम्॥ १०२जिस समय चन्द्रमा, सूर्य और बृहस्पति पुष्यनक्षत्रमें स्थित होकर एक राशिपर एक साथ आवेंगे उसी समय सत्ययुगका आरम्भ हो जायगा*॥ १०२॥
अतीता वर्त्तमानाश्च तथैवानागताश्च ये।<br>एते वंशेषु भूपालाः कथिता मुनिसत्तम॥ १०३हे मुनिश्रेष्ठ! तुमसे मैंने यह समस्त वंशोंके भूत, भविष्यत् और वर्तमान सम्पूर्ण राजाओंका वर्णन कर दिया॥ १०३॥
यावत्परीक्षितो जन्म यावन्नन्दाभिषेचनम्।<br>एतद्वर्षसहस्रं तु ज्ञेयं पाञ्चशदुत्तरम्॥ १०४परीक्षित्के जन्मसे नन्दके अभिषेकतक एक हजार पचास वर्षका समय जानना चाहिये॥ १०४॥
सप्तर्षीणां तु यौ पूर्वौ दृश्येते ह्युदितौ दिवि।<br>तयोस्तु मध्ये नक्षत्रं दृश्यते यत्समं निशि॥ १०५<br><br>तेन सप्तर्षयो युक्तास्तिष्ठन्त्यब्दशतं नृणाम्।<br>ते तु पारिक्षिते काले मघास्वासन्द्विजोत्तम॥ १०६<br><br>तदा प्रवृत्तश्च कलिर्द्वादशाब्दशतात्मकः॥ १०७सप्तर्षियोंमेंसे जो [पुलस्त्य और क्रतु] दो नक्षत्र आकाशमें पहले दिखायी देते हैं, उनके बीचमें रात्रिके समय जो [दक्षिणोत्तर रेखापर] समदेशमें स्थित [अश्विनी आदि] नक्षत्र हैं, उनमेंसे प्रत्येक नक्षत्रपर सप्तर्षिगण एक-एक सौ वर्ष रहते हैं। हे द्विजोत्तम! परीक्षित्के समयमें वे सप्तर्षिगण मघानक्षत्रपर थे। उसी समय बारह सौ वर्ष प्रमाणवाला कलियुग आरम्भ हुआ था॥ १०५—१०७॥
यदैव भगवाग्विष्णोरंशो यातो दिवं द्विज।<br>वसुदेवकुलोद्भूतस्तदैवात्रागतः कलिः॥ १०८हे द्विज! जिस समय भगवान् विष्णुके अंशावतार भगवान् वासुदेव निजधामको पधारे थे उसी समय पृथिवीपर कलियुगका आगमन हुआ था॥ १०८॥
यावत्स पादपद्माभ्यां पस्पर्शैमां वसुन्धराम्।<br>तावत्पृथ्वीपरिश्वङ्गे समर्थो नाभवत्कलिः॥ १०९जबतक भगवान् अपने चरण-कमलोंसे इस पृथिवीका स्पर्श करते रहे, तबतक पृथिवीसे संसर्ग करनेकी कलियुगकी हिम्मत न पड़ी॥ १०९॥
गते सनातनस्यांशे विष्णोस्तत्र भुवो दिवम्।<br>तत्याज सानुजो राज्यं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः॥ ११०सनातन पुरुष भगवान् विष्णुके अंशावतार श्रीकृष्णचन्द्रके स्वर्गलोक पधारनेपर भाइयोंके सहित धर्मपुत्र महाराज युधिष्ठिरने अपने राज्यको छोड़ दिया॥ ११०॥
विपरीतानि दृष्ट्वा च निमित्तानि हि पाण्डवः।<br>याते कृष्णे चकाराथ सोऽभिषेकं परीक्षितः॥ १११कृष्णचन्द्रके अन्तर्धान हो जानेपर विपरीत लक्षणोंको देखकर पाण्डवोंने परीक्षित्को राज्यपदपर अभिषिक्त कर दिया॥ १११॥
प्रयास्यन्ति यदा चैते पूर्वाषाढां महर्षयः।<br>तदा नन्दात्प्रभृत्येष गतिवृद्धिं गमिष्यति॥ ११२जिस समय ये सप्तर्षिगण पूर्वाषाढानक्षत्रपर जायँगे उसी समय राजा नन्दके समयसे कलियुगका प्रभाव बढ़ेगा॥ ११२॥

* यद्यपि प्रति बारहवें वर्ष जब बृहस्पति कर्कराशिपर जाते हैं तो अमावास्यातिथिको पुष्यनक्षत्रपर इन तीनों ग्रहोंका योग होता है, तथापि 'समेष्यन्ति' पदसे एक साथ आनेपर सत्ययुगका आरम्भ कहा है; इसलिये उक्त समयपर अतिव्याप्तिदोष नहीं है।

अ० २४ ] * चतुर्थ अंश * ३०९

यस्मिन् कृष्णो दिवं यातस्तस्मिन्नेव तदाहनि।
प्रतिपन्नं कलियुगं तस्य संख्यां निबोध मे॥ ११३

त्रीणि लक्षाणि वर्षाणां द्विज मानुष्यसंख्यया।
षष्टिश्चैव सहस्राणि भविष्यत्येष वै कलिः ॥ ११४

शतानि तानि दिव्यानां सप्त पञ्च च संख्यया।
निश्शेषेण गते तस्मिन् भविष्यति पुनः कृतम्॥ ११५

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याश्शूद्राश्च द्विजसत्तम।
युगे युगे महात्मानः समतीतास्सहस्रशः ॥ ११६

बहुत्वान्नामधेयानां परिसंख्या कुले कुले।
पौनरुक्त्याद्धि साम्याच्च न मया परिकीर्त्तिता ॥ ११७

देवापिः पौरवो राजा पुरुश्चेक्ष्वाकुवंशजः।
महायोगबलोपेतौ कलापग्रामसंश्रितौ ॥ ११८

कृते युगे त्विहागम्य क्षत्रप्रवर्त्तकौ हि तौ।
भविष्यतो मनोर्वंशबीजभूतौ व्यवस्थितौ ॥ ११९

एतेन क्रमयोगेन मनुपुत्रैर्वसुन्धरा।
कृतत्रेताद्वापराणि युगानि त्रीणि भुज्यते ॥ १२०

कलौ ते बीजभूता वै केचित्तिष्ठन्ति वै मुने।
यथैव देवापिपुरू साम्प्रतं समधिष्ठितौ ॥ १२१

एष तूद्देशतो वंशस्तवोक्तो भूभुजां मया।
निखिलो गदितुं शक्यो नैष वर्षशतैरपि ॥ १२२

एते चान्ये च भूपाला यैरत्र क्षितिमण्डले।
कृतं ममत्वं मोहान्धैर्नित्यं हेयकलेवरे ॥ १२३

कथं ममेयमचला मत्पुत्रस्य कथं मही।
मद्वंशस्येति चिन्तार्त्ता जगमुरन्तमिमे नृपाः ॥ १२४

तेभ्यः पूर्वतराश्चान्ये तेभ्यस्तेभ्यस्तथा परे।
भविष्याश्चैव यास्यन्ति तेषामन्ये च येऽप्यनु ॥ १२५

विलोक्यात्मजयोद्योगं यात्राव्यग्रान्नराधिपान्।
पुष्पप्रहासैश्शरदि हसन्तीव वसुन्धरा ॥ १२६

मैत्रेय पृथिवीगीताञ्छ्लोकांश्चात्र निबोध मे।
यानाह धर्मध्वजिने जनकायासितो मुनिः ॥ १२७


जिस दिन भगवान् कृष्णचन्द्र परमधामको गये थे उसी दिन कलियुग उपस्थित हो गया था। अब तुम कलियुगकी वर्ष-संख्या सुनो— ॥ ११३॥

हे द्विज! मानवी वर्षगणनाके अनुसार कलियुग तीन लाख साठ हजार वर्ष रहेगा ॥ ११४ ॥ इसके पश्चात् बारह सौ दिव्य वर्षपर्यन्त कृतयुग रहेगा ॥ ११५ ॥

हे द्विजश्रेष्ठ ! प्रत्येक युगमें हजारों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र महात्मागण हो गये हैं ॥ ११६ ॥ उनके बहुत अधिक संख्यामें होनेसे तथा समानता होनेके कारण कुलोंमें पुनरुक्ति हो जानेके भयसे मैंने उन सबके नाम नहीं बतलाये हैं ॥ ११७ ॥

पुरुवंशीय राजा देवापि तथा इक्ष्वाकुकुलोत्पन्न राजा पुरु—ये दोनों अत्यन्त योगबलसम्पन्न हैं और कलापग्राममें रहते हैं ॥ ११८ ॥ सत्ययुगका आरम्भ होनेपर ये पुनः मर्त्यलोकमें आकर क्षत्रिय-कुलके प्रवर्त्तक होंगे। वे आगामी मनुवंशके बीजरूप हैं ॥ ११९ ॥ सत्ययुग, त्रेता और द्वापर इन तीनों युगोंमें इसी क्रमसे मनुपुत्र पृथिवीका भोग करते हैं ॥ १२० ॥ फिर कलियुगमें उन्हींमेंसे कोई-कोई आगामी मनुसन्तानके बीजरूपसे स्थित रहते हैं जिस प्रकार कि आजकल देवापि और पुरु हैं ॥ १२१ ॥

इस प्रकार मैंने तुमसे सम्पूर्ण राजवंशोंका यह संक्षिप्त वर्णन कर दिया है, इनका पूर्णतया वर्णन तो सौ वर्षमें भी नहीं किया जा सकता ॥ १२२ ॥ इस हेय शरीरके मोहसे अन्धे हुए ये तथा और भी ऐसे अनेक भूपतिगण हो गये हैं जिन्होंने इस पृथिवीमण्डलको अपना-अपना माना है ॥ १२३ ॥ 'यह पृथिवी किस प्रकार अचलभावसे मेरी, मेरे पुत्रकी अथवा मेरे वंशकी होगी ?' इसी चिन्तामें व्याकुल हुए इन सभी राजाओंका अन्त हो गया ॥ १२४ ॥ इसी चिन्तामें डूबे रहकर इन सम्पूर्ण राजाओंके पूर्व-पूर्वतरवर्ती राजालोग चले गये और इसीमें मग्न रहकर आगामी भूपतिगण भी मृत्यु-मुखमें चले जायँगे ॥ १२५ ॥ इस प्रकार अपनेको जीतनेके लिये राजाओंको अथक उद्योग करते देखकर वसुन्धरा शरत्कालीन पुष्पोंके रूपमें मानो हँस रही है ॥ १२६ ॥

हे मैत्रेय! अब तुम पृथिवीके कहे हुए कुछ श्लोकोंको सुनो। पूर्वकालमें इन्हें असित मुनिने धर्मध्वजी राजा जनकको सुनाया था ॥ १२७॥

३१० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २४


पृथिव्युवाच

कथमेष नरेन्द्राणां मोहो बुद्धिमतामपि।
येन फेनसधर्माणोऽप्यतिविश्वस्तचेतसः ॥ १२८

पूर्वमात्मजयं कृत्वा जेतुमिच्छन्ति मन्त्रिणः।
ततो भृत्यांश्च पौरांश्च जिगीषन्ते तथा रिपून् ॥ १२९

क्रमेणानेन जेष्यामो वयं पृथ्वीं ससागराम्।
इत्यासक्तधियो मृत्युं न पश्यन्त्यविदूरगम् ॥ १३०

समुद्रावरणं याति भूमण्डलमथो वशम्।
कियदात्मजयस्यैतन्मुक्तिरात्मजये फलम् ॥ १३१

उत्सृज्य पूर्वजा याता यां नादाय गतः पिता।
तां मामतीवमूढत्वाज्जेतुमिच्छन्ति पार्थिवाः ॥ १३२

मत्कृते पितृपुत्राणां भ्रातॄणां चापि विग्रहः।
जायतेऽत्यन्तमोहेन ममत्वादृतचेतसाम् ॥ १३३

पृथ्वी ममेयं सकला ममैषा
मदन्वयस्यापि च शाश्वतीयम्।
यो यो मृतो ह्यत्र बभूव राजा
कुबुद्धिरासीदिति तस्य तस्य ॥ १३४

दृष्ट्वा ममत्वादृतचित्तमेकं
विहाय मां मृत्युवशं व्रजन्तम्।
तस्यानु यस्तस्य कथं ममत्वं
हृद्यास्पदं मत्प्रभवं करोति ॥ १३५

पृथ्वी ममैषाशु परित्यजैनां
वदन्ति ये दूतमूखैःस्वशत्रून्।
नराधिपास्तेषु ममातिहासः
पुनश्च मूढेषु दयाभ्युपैति ॥ १३६

श्रीपराशर उवाच

इत्येते धरणीगीताश्श्लोका मैत्रेय यैश्श्रुताः।
ममत्वं विलयं याति तपत्यर्के यथा हिमम् ॥ १३७

इत्येष कथितः सम्यङ्मन्वंशो मया तव।
यत्र स्थितिप्रवृत्तस्य विष्णोरंशांशका नृपाः ॥ १३८

शृणोति य इमं भक्त्या मनोर्वंशमनुक्रमात्।
तस्य पापमशेषं वै प्रणश्यत्यमलात्मनः ॥ १३९


पृथिवी कहती है— अहो! बुद्धिमान् होते हुए भी इन राजाओंको यह कैसा मोह हो रहा है जिसके कारण ये बुलबुलेके समान क्षणस्थायी होते हुए भी अपनी स्थिरतामें इतना विश्वास रखते हैं॥ १२८॥ ये लोग प्रथम अपनेको जीतते हैं और फिर अपने मन्त्रियोंको तथा इसके अनन्तर ये क्रमशः अपने भृत्य, पुरवासी एवं शत्रुओंको जीतना चाहते हैं॥ १२९॥ 'इसी क्रमसे हम समुद्रपर्यन्त इस सम्पूर्ण पृथिवीको जीत लेंगे' ऐसी बुद्धिसे मोहित हुए ये लोग अपनी निकटवर्तिनी मृत्युको नहीं देखते ॥ १३०॥ यदि समुद्रसे घिरा हुआ यह सम्पूर्ण भूमण्डल अपने वशमें हो ही जाय तो भी मनोजयकी अपेक्षा इसका मूल्य ही क्या है? क्योंकि मोक्ष तो मनोजयसे ही प्राप्त होता है॥ १३१॥ जिसे छोड़कर इनके पूर्वज चले गये तथा जिसे अपने साथ लेकर इनके पिता भी नहीं गये उसी मुझको अत्यन्त मूर्खताके कारण ये राजालोग जीतना चाहते हैं॥ १३२॥ जिनका चित्त ममतामय है उन पिता-पुत्र और भाइयोंमें अत्यन्त मोहके कारण मेरे ही लिये परस्पर कलह होता है॥ १३३॥ जो-जो राजालोग यहाँ हो चुके हैं उन सभीकी ऐसी कुबुद्धि रही है कि यह सम्पूर्ण पृथिवी मेरी ही है और मेरे पीछे यह सदा मेरी सन्तानकी ही रहेगी॥ १३४॥ इस प्रकार मेरेमें ममता करनेवाले एक राजाको, मुझे छोड़कर मृत्युके मुखमें जाते हुए देखकर भी न जाने कैसे उसका उत्तराधिकारी अपने हृदयमें मेरे लिये ममताको स्थान देता है? ॥ १३५॥ जो राजालोग दूतोंके द्वारा अपने शत्रुओंसे इस प्रकार कहलाते हैं कि 'यह पृथिवी मेरी है, तुमलोग इसे तुरन्त छोड़कर चले जाओ' उनपर मुझे बड़ी हँसी आती है और फिर उन मूढ़ोंपर मुझे दया भी आ जाती है॥ १३६॥

श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! पृथिवीके कहे हुए इन श्लोकोंको जो पुरुष सुनेगा उसकी ममता इसी प्रकार लीन हो जायगी जैसे सूर्यके तपते समय बर्फ पिघल जाता है॥ १३७॥ इस प्रकार मैंने तुमसे भली प्रकार मनुके वंशका वर्णन कर दिया। जिस वंशके राजागण स्थितिकारक भगवान् विष्णुके अंशके अंश थे॥ १३८॥ जो पुरुष इस मनुवंशका क्रमशः श्रवण करता है उस शुद्धात्माके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं॥ १३९॥

अ० २४ ] * चतुर्थ अंश * ३१९


धनधान्यर्द्धिमपुलां प्राप्नोत्यव्याहतेन्द्रियः ।
श्रुत्वैवमखिलं वंशं प्रशस्तं शशिसूर्ययोः ॥ १४०

इक्ष्वाकुजह्नुमान्धातृसगराविक्षितान्रघून् ।
ययातिनहुषाद्यांश्च ज्ञात्वा निष्ठामुपागतान् ॥ १४१

महाबलान्महावीर्याननन्तधनसञ्चयान् ।
कृतान्कालेन बलिना कथाशेषान्नराधिपान् ॥ १४२

श्रुत्वा न पुत्रदारादौ गृहक्षेत्रादिके तथा ।
द्रव्यादौ वा कृतप्रज्ञो ममत्वं कुरुते नरः ॥ १४३

तप्तं तपो यैः पुरुषप्रवीरै-
रुद्बाहुभिर्वर्षगणाननेकान् ।
इष्ट्वा सुयज्ञैर्बलिनोऽतिवीर्याः
कृता नु कालेन कथावशेषाः ॥ १४४

पृथुस्समस्तान्विचचारलोका-
नव्याहतो यो विजितारिचक्रः ।
स कालवाताभिहतः प्रणष्टः
क्षिप्तं यथा शाल्मलितूलमग्नौ ॥ १४५

यः कार्त्तवीर्यो बुभुजे समस्ता-
न्द्वीपान्समाक्रम्य हतारिचक्रः ।
कथाप्रसङ्गेष्वभिधीयमान-
स्स एव सङ्कल्पविकल्पहेतुः ॥ १४६

दशाननाविक्षितराघवाणा-
मैश्वर्यमुद्भासितदिङ्मुखानाम् ।
भस्मापि शिष्टं न कथं क्षणेन
भ्रूभङ्गपातेन धिगन्तकस्य ॥ १४७

कथाशरीरत्वमवाप यद्वै
मान्धातृनामा भुवि चक्रवर्ती ।
श्रुत्वापि तत्को हि करोति साधु-
र्ममत्वमात्मन्यपि मन्दचेताः ॥ १४८

भगीरथाद्यास्सगरः ककुत्स्थो
दशाननो राघवलक्ष्मणौ च ।
युधिष्ठिराद्याश्च बभूवुरेते
सत्यं न मिथ्या क्वनु ते न विद्मः ॥ १४९


[ हिन्दी-अनुवाद ]

जो मनुष्य जितेन्द्रिय होकर सूर्य और चन्द्रमाके इन प्रशंसनीय वंशोंका सम्पूर्ण वर्णन सुनता है, वह अतुलित धन-धान्य और सम्पत्ति प्राप्त करता है ॥ १४० ॥ महाबलवान्, महावीर्यशाली, अनन्त धन संचय करनेवाले तथा परम निष्ठावान् इक्ष्वाकु, जह्नु, मान्धाता, सगर, अविक्षित, रघुवंशीय राजागण तथा नहुष और ययाति आदिके चरित्रोंको सुनकर, जिन्हें कि कालने आज कथामात्र ही शेष रखा है, प्रज्ञावान् मनुष्य पुत्र, स्त्री, गृह, क्षेत्र और धन आदिमें ममता न करेगा ॥ १४१—१४३ ॥

जिन पुरुषश्रेष्ठोंने ऊर्ध्वबाहु होकर अनेक वर्षपर्यन्त कठिन तपस्या की थी तथा विविध प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान किया था, आज उन अति बलवान् और वीर्यशाली राजाओंकी कालने केवल कथामात्र ही छोड़ दी है ॥ १४४ ॥ जो पृथु अपने शत्रुसमूहको जीतकर स्वच्छन्द-गतिसे समस्त लोकोंमें विचरता था आज वही काल-वायुकी प्रेरणासे अग्निमें फेंके हुए सेमरकी रूईके ढेरके समान नष्ट-भ्रष्ट हो गया है ॥ १४५ ॥ जो कार्त्तवीर्य अपने शत्रु-मण्डलका संहारकर समस्त द्वीपोंको वशीभूतकर उन्हें भोगता था वही आज कथा-प्रसंगसे वर्णन करते समय उलटा संकल्प-विकल्पका हेतु होता है [अर्थात् उसका वर्णन करते समय यह सन्देह होता है कि वास्तवमें वह हुआ था या नहीं।] ॥ १४६ ॥ समस्त दिशाओंको देदीप्यमान करनेवाले रावण, अविक्षित और रामचन्द्र आदिके [क्षणभंगुर] ऐश्वर्यको धिक्कार है। अन्यथा कालके क्षणिक कटाक्षपातके कारण आज उसका भस्ममात्र भी क्यों नहीं बच सका ? ॥ १४७ ॥ जो मान्धाता सम्पूर्ण भूमण्डलका चक्रवर्ती सम्राट् था आज उसका केवल कथामें ही पता चलता है। ऐसा कौन मन्दबुद्धि होगा जो यह सुनकर अपने शरीरमें भी ममता करेगा? [फिर पृथिवी आदिमें ममता करनेकी तो बात ही क्या है?] ॥ १४८ ॥ भगीरथ, सगर, ककुत्स्थ, रावण, रामचन्द्र, लक्ष्मण और युधिष्ठिर आदि पहले हो गये हैं यह बात सर्वथा सत्य है, किसी प्रकार भी मिथ्या नहीं है; किन्तु अब वे कहाँ हैं इसका हमें पता नहीं ॥ १४९ ॥

३१२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २४


ये साम्प्रतं ये च नृपा भविष्याः<br>प्रोक्ता मया विप्रवरोग्रवीर्याः।<br>एते तथान्ये च तथाभिधेयाः<br>सर्वे भविष्यन्ति यथैव पूर्वे ॥ १५०हे विप्रवर! वर्तमान और भविष्यत्कालीन जिन-जिन महावीर्यशाली राजाओंका मैंने वर्णन किया है ये तथा अन्य लोग भी पूर्वोक्त राजाओंकी भाँति कथामात्र शेष रहेंगे ॥ १५० ॥
एतद्विदित्वा न नरेण कार्यं<br>ममत्वमात्मन्यपि पण्डितेन।<br>तिष्ठन्तु तावत्तनयात्मजाद्याः<br>क्षेत्रादयो ये च शरीरिणोऽन्ये ॥ १५१ऐसा जानकर पुत्र, पुत्री और क्षेत्र आदि तथा अन्य प्राणी तो अलग रहें, बुद्धिमान् मनुष्यको अपने शरीरमें भी ममता नहीं करनी चाहिये ॥ १५१ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
इति श्रीपराशरमुनिविरचिते श्रीविष्णुपरत्वनिर्णायके श्रीमति
विष्णुमहापुराणे चतुर्थोऽंशः समाप्तः।


$$ॐ$$ श्रीमन्नारायणाय नमः

श्रीविष्णुपुराण

पञ्चम अंश

पहला अध्याय

वसुदेव-देवकीका विवाह, भारपीडिता पृथिवीका देवताओंके सहित क्षीरसमुद्रपर जाना और भगवान्‌का प्रकट होकर उसे धैर्य बँधाना, कृष्णावतारका उपक्रम


मूल श्लोकहिन्दी अनुवाद
श्रीमैत्रेय उवाच<br>नृपाणां कथितस्सर्वो भवता वंशविस्तरः।<br>वंशानुचरितं चैव यथावदनुवर्णितम्॥ १**श्रीमैत्रेयजी बोले—**भगवन्! आपने राजाओंके सम्पूर्ण वंशोंका विस्तार तथा उनके चरित्रोंका क्रमशः यथावत् वर्णन किया॥ १॥
अंशावतारो ब्रह्मर्षे योऽयं यदुकुलोद्भवः।<br>विष्णोस्तं विस्तरेणाहं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः॥ २अब, हे ब्रह्मर्षे! यदुकुलमें जो भगवान् विष्णुका अंशावतार हुआ था, उसे मैं तत्त्वतः और विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ॥ २॥
चकार यानि कर्माणि भगवान्पुरुषोत्तमः।<br>अंशांशेनावतीर्योर्व्यां तत्र तानि मुने वद॥ ३हे मुने! भगवान् पुरुषोत्तमने अपने अंशांशसे पृथ्वीपर अवतीर्ण होकर जो-जो कर्म किये थे, उन सबका आप मुझसे वर्णन कीजिये॥ ३॥
श्रीपराशर उवाच<br>मैत्रेय श्रूयतामेतद्यत्पृष्टोऽहमिह त्वया।<br>विष्णोरंशांशसम्भूतिचरितं जगतो हितम्॥ ४**श्रीपराशरजी बोले—**हे मैत्रेय! तुमने मुझसे जो पूछा है वह संसारमें परम मंगलकारी भगवान् विष्णुके अंशावतारका चरित्र सुनो॥ ४॥
देवकस्य सुतां पूर्वं वसुदेवो महामुने।<br>उपयेमे महाभागां देवकीं देवतोपमाम्॥ ५हे महामुने! पूर्वकालमें देवककी महाभाग्यशालिनी पुत्री देवीस्वरूपा देवकीके साथ वसुदेवजीने विवाह किया॥ ५॥
कंसस्तयोर्वररथं चोदयामास सारथिः।<br>वसुदेवस्य देवक्याः संयोगे भोजनन्दनः॥ ६वसुदेव और देवकीके वैवाहिक सम्बन्ध होनेके अनन्तर [विदा होते समय] भोजनन्दन कंस सारथि बनकर उन दोनोंका माङ्गलिक रथ हाँकने लगा॥ ६॥
अथान्तरिक्षे वागुच्चैः कंसमाभाष्य सादरम्।<br>मेघगम्भीरनिर्घोषं समाभाष्येदमब्रवीत्॥ ७उसी समय मेघके समान गम्भीर घोष करती हुई आकाशवाणी कंसको ऊँचे स्वरसे सम्बोधन करके यों बोली—॥ ७॥
यामेतां वहसे मूढ सह भर्त्रा रथे स्थिताम्।<br>अस्यास्तवाष्टमो गर्भः प्राणानपहरिष्यति॥ ८“अरे मूढ़! पतिके साथ रथपर बैठी हुई जिस देवकीको तू लिये जा रहा है इसका आठवाँ गर्भ तेरे प्राण हर लेगा”॥ ८॥
श्रीपराशर उवाच<br>इत्याकर्ण्य समुत्पाट्य खड्गं कंसो महाबलः।<br>देवकीं हन्तुमारब्धो वसुदेवोऽब्रवीदिदम्॥ ९**श्रीपराशरजी बोले—**यह सुनते ही महाबली कंस [म्यानसे] खड्ग निकालकर देवकीको मारनेके लिये उद्यत हुआ। तब वसुदेवजी यों कहने लगे—॥ ९॥

३१४

  • श्रीविष्णुपुराण *

[ अ० १ ]

न हन्तव्या महाभाग देवकी भवतानघ। समर्पयिष्ये सकलानाभिनस्योदरोद्भवान् ॥ १०

श्रीपराशर उवाच

तथेत्याह ततः कंसो वसुदेवं द्विजोत्तम। न घातयामास च तां देवकीं सत्यगौरवात् ॥ ११ एतस्मिन्नेव काले तु भूरिभारावपीडिता। जगाम धरणी मेरी समाजं त्रिदिवौकसाम् ॥ १२ सब्रह्मकान्सुरान्सर्वान्प्रणिपत्त्याथ मेदिनी। कथयामास तत्सर्वं खेदात्करुणभाषिणी ॥ १३

भूमिरुवाच

अग्निस्सुवर्णस्य गुरुर्गवां सूर्यः परो गुरुः। ममाप्यखिललोकानां गुरुनारायणो गुरुः ॥ १४ प्रजापतिपतिर्ब्रह्मा पूर्वेषामपि पूर्वजः। कलाक्रांठानिमेधात्मा कलशचाव्यक्तमूर्तिमान् ॥ १५ तदंशभूतस्सर्वेषां समूहो वसुरोत्तमाः ॥ १६ आदित्या मरुतस्साध्या रुद्रा वस्वशिववहनयः। पितरो ये च लोकानां स्वष्टारोऽत्रिपुरोगमाः ॥ १७ एते तस्याप्रमेयस्य विष्णो रूपं महात्मनः ॥ १८ यक्षराक्षसदैत्यपिशाचोरगदानवाः । गन्धर्वाप्सरसश्चैव रूपं विष्णोर्महात्मनः ॥ १९ ग्रहर्क्ष्तिरकाचित्रगगनानिजलानिलाः। अहं च विषयाश्चैव सर्वं विष्णुमयं जगत् ॥ २० तथाप्यनेकरूपस्य तस्य रूपाण्यहर्निशम्। बाध्यबाधकतां यान्ति कल्लोला इव सागरे ॥ २१ तत्साम्प्रतममी दैत्याः कालनेमिपुरोगमाः। मर्त्यलोकं समाक्रम्य बाधन्तेऽहर्निशं प्रजाः ॥ २२ कालनेमिर्हतो योऽसौ विष्णुना प्रभविष्णुना। उग्रसेनसुतः कंससम्भूतस्स महासुरः ॥ २३ अरिष्टो धेनुकः केशी प्रलम्बो नरकस्तथा। सुन्दोऽसुरस्तथात्युगो बाणश्चापि बलैस्सुतः ॥ २४ तथान्ये च महावीर्या नृपाणां भवनेषु ये। समुत्पन्ना दुरात्मानस्तान् संख्यातुमुत्सहे ॥ २५

“हे महाभाग! हे अनघ! आप देवकीका वध न करें; मैं इसके गर्भसे उत्पन्न हुए सभी बालक आपको सौंप दूँगा” ॥ १० ॥

श्रीपराशरजी बोले—हे द्विजोत्तम! तब सत्यके गौरवसे कंसने वसुदेवजीसे ‘बहुत अच्छा’ कह देवकीका वध नहीं किया ॥ ११ ॥ इसी समय अत्यन्त भारसे पीडित होकर पृथिवी [गौका रूप धारणकर] सुमेरुपर्वतपर देवताओंके दलमें गयी ॥ १२ ॥ वहाँ उसने ब्रह्माजीके सहित समस्त देवताओंको प्रणामकर खेदपूर्वक करुणस्वरसे बोलती हुई अपना सारा वृत्तान्त कहा ॥ १३ ॥

पृथिवी बोली—जिस प्रकार अग्नि सुवर्णका तथा सूर्य गो (किरण)-समूहका परमगुरु है, उसी प्रकार सम्पूर्ण लोकोंके गुरु श्रीनारायण मेरे गुरु हैं ॥ १४ ॥ वे प्रजापतियोंके पति और पूर्वजोंके पूर्वज ब्रह्माजी हैं तथा वे ही कला-काष्ठा-निमेष-स्वरूप अत्यन्त मूर्तिमान् काल हैं। हे देवश्रेष्ठगण! आप सब लोगोंका समूह भी उन्हींका अंशस्वरूप हैं ॥ १५-१६ ॥ आदित्य, मरुद्गण, साध्यगण, रुद्र, वसु, अग्नि, पितृगण और अत्रि आदि प्रजापतिगण—ये सब अप्रमेय महात्मा विष्णुके ही रूप हैं ॥ १७-१८ ॥ यक्ष, राक्षस, दैत्य, पिशाच, सर्प, दानव, गन्धर्व और अप्सरा आदि भी महात्मा विष्णुके ही रूप हैं ॥ १९ ॥ ग्रह, नक्षत्र तथा तारागणोंसे चित्रित आकाश, अग्नि, जल, वायु, मैं और इन्द्रियोंके सम्पूर्ण विषय—यह सारा जगत् विष्णुमय ही है ॥ २० ॥ तथापि उन अनेक रूपधारी विष्णुके ये रूप समुद्रकी तरंगोंके समान रात-दिन एक-दूसरेके बाध्य-बाधक होते रहते हैं ॥ २१ ॥

इस समय कालनेमि आदि दैत्यगण मर्त्यलोकपर अधिकार जमाकर अहर्निश जनताको क्लेशित कर रहे हैं ॥ २२ ॥ जिस कालनेमिको सामर्थ्यवान् भगवान् विष्णुने मारा था, इस समय वही उग्रसेनके पुत्र महान् असुर कंसके रूपमें उत्पन्न हुआ है ॥ २३ ॥ अरिष्ट, धेनुक, केशी, प्रलम्ब, नरक, सुन्द, बलिका पुत्र अति भयंकर बाणासुर तथा और भी जो महाबलवान् दुरात्मा राक्षस राजाओंके घरमें उत्पन्न हो गये हैं उनकी मैं गणना नहीं कर सकती ॥ २४-२५ ॥

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अ० १ ] * पञ्चम अंश * ३१५


अक्षौहिण्योऽत्र बहुला दिव्यमूर्त्तिधरासुराः।<br>महाबलानां दृप्तानां दैत्येन्द्राणां ममोपरि॥ २६हे दिव्यमूर्त्तिधारी देवगण! इस समय मेरे ऊपर महाबलवान् और गर्वीले दैत्यराजोंकी अनेक अक्षौहिणी सेनाएँ हैं॥ २६॥
तद्भूरिभारपीडार्त्ता न शक्नोम्यमरेश्वराः।<br>विभर्त्तुमात्मानमह्मिति विज्ञापयामि वः॥ २७हे अमरेश्वरो! मैं आपलोगोंको यह बतलाये देती हूँ कि अब मैं उनके अत्यन्त भारसे पीडित होकर अपनेको धारण करनेमें सर्वथा असमर्थ हूँ॥ २७॥
क्रियतां तन्महाभागा मम भारावतारणम्।<br>यथा रसातलं नाहं गच्छेयमतिविह्वला॥ २८अतः हे महाभागगण! आपलोग मेरे भार उतारनेका अब कोई ऐसा उपाय कीजिये जिससे मैं अत्यन्त व्याकुल होकर रसातलको न चली जाऊँ॥ २८॥
इत्याकर्ण्य धरावाक्यमशेषैस्त्रिदशेश्वरैः।<br>भुवो भारावतारार्थं ब्रह्मा प्राह प्रचोदितः॥ २९पृथिवीके इन वाक्योंको सुनकर उसके भार उतारनेके विषयमें समस्त देवताओंकी प्रेरणासे भगवान् ब्रह्माजीने कहना आरम्भ किया॥ २९॥
ब्रह्मोवाचब्रह्माजी बोले—
यथाह वसुधा सर्वं सत्यमेव दिवौकसः।<br>अहं भवो भवन्तश्च सर्वे नारायणत्मकाः॥ ३०हे देवगण! पृथिवीने जो कुछ कहा है वह सर्वथा सत्य ही है, वास्तवमें मैं, शंकर और आप सब लोग नारायणस्वरूप ही हैं॥ ३०॥
विभूतयश्च यास्तस्य तासामेव परस्परम्।<br>आधिक्यं न्यूनता बाध्यबाधकत्वेन वर्तते॥ ३१उनकी जो-जो विभूतियाँ हैं, उनकी परस्पर न्यूनता और अधिकता ही बाध्य तथा बाधकरूपसे रहा करती है॥ ३१॥
तदागच्छत गच्छाम क्षीराब्धेस्तटमुत्तमम्।<br>तत्राराध्य हरिं तस्मै सर्वं विज्ञापयाम वै॥ ३२इसलिये आओ, अब हमलोग क्षीरसागरके पवित्र तटपर चलें, वहाँ श्रीहरिकी आराधना कर यह सम्पूर्ण वृत्तान्त उनसे निवेदन कर दें॥ ३२॥
सर्वथैव जगत्यर्थे स सर्वात्मा जगन्मयः।<br>सत्त्वांशेनावतीर्योर्व्यां धर्मस्य कुरुते स्थितिम्॥ ३३वे विश्वरूप सर्वात्मा सर्वथा संसारके हितके लिये ही अपने शुद्ध सत्त्वांशसे अवतीर्ण होकर पृथिवीमें धर्मकी स्थापना करते हैं॥ ३३॥
श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
इत्युक्त्वा प्रययौ तत्र सह देवैः पितामहः।<br>समाहितमनाश्चैवं तुष्टाव गरुडध्वजम्॥ ३४ऐसा कहकर देवताओंके सहित पितामह ब्रह्माजी वहाँ गये और एकाग्रचित्तसे श्रीगरुडध्वज भगवान्‌की इस प्रकार स्तुति करने लगे॥ ३४॥
ब्रह्मोवाचब्रह्माजी बोले—
द्वे विद्ये त्वमनाम्नाय परा चैवापरा तथा।<br>त एव भवतो रूपे मूर्त्तामूर्त्तात्मिके प्रभो॥ ३५हे वेदवाणीके अगोचर प्रभो! परा और अपरा—ये दोनों विद्याएँ आप ही हैं। हे नाथ! वे दोनों आपहीके मूर्त्त और अमूर्त्त रूप हैं॥ ३५॥
द्वे ब्रह्मणी त्वणीयोऽतिस्थूलात्मन्सर्व सर्ववित्।<br>शब्दब्रह्म परं चैव ब्रह्म ब्रह्ममयस्य यत्॥ ३६हे अत्यन्त सूक्ष्म! हे विराट्स्वरूप! हे सर्व! हे सर्वज्ञ! शब्दब्रह्म और परब्रह्म—ये दोनों आप ब्रह्ममयके ही रूप हैं॥ ३६॥
ऋग्वेदस्त्वं यजुर्वेदस्सामवेदस्त्वथर्वणः।<br>शिक्षा कल्पो निरुक्तं च च्छन्दो ज्योतिषमेव च॥ ३७आप ही ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद हैं तथा आप ही शिक्षा, कल्प, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष-शास्त्र हैं॥ ३७॥
इतिहासपुराणे च तथा व्याकरणं प्रभो।<br>मीमांसा न्यायशास्त्रं च धर्मशास्त्राण्यधोक्षज॥ ३८हे प्रभो! हे अधोक्षज! इतिहास, पुराण, व्याकरण, मीमांसा, न्याय और धर्मशास्त्र—ये सब भी आप ही हैं॥ ३८॥
आत्मात्मदेहगुणवद्विचाराचारि यद्वचः।<br>तदप्याद्यपते नान्यदध्यात्मात्मस्वरूपवत्॥ ३९हे आद्यपते! जीवात्मा, परमात्मा, स्थूल-सूक्ष्म-देह तथा उनका कारण अव्यक्त—इन सबके विचारसे युक्त जो अन्तर्रात्मा और परमात्माके स्वरूपका बोधक [तत्त्वमसि] वाक्य है, वह भी आपसे भिन्न नहीं है॥ ३९॥

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३१६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १


त्वमव्यक्तमनिर्देश्यमचिन्त्यानामवर्णवत् ।
अपाणिपादरूपं च शुद्धं नित्यं परात्परम् ॥ ४०
शृणोष्यकर्णः परिपश्यसि त्व-
  मचक्षुरेको बहुरूपरूपः ।
अपादहस्तो जवनो ग्रहीता
  त्वं वेत्सि सर्वं न च सर्ववेद्यः ॥ ४१
अणोरणीयांसमसत्स्वरूपं
  त्वां पश्यतोऽज्ञाननिवृत्तिरग्र्या ।
धीरस्य धीरस्य बिभर्त्ति नान्य-
  द्वरेण्यरूपात्परतः परात्मन् ॥ ४२
त्वं विश्वनाभिर्भुवनस्य गोप्ता
  सर्वाणि भूतानि तवान्तराणि ।
यद्भूतभव्यं यदणोरणीयः
  पुमांस्त्वमेकः प्रकृतेः परस्तात् ॥ ४३
एकश्चतुर्द्धा भगवान्हुताशो
  वर्चोविभूतिं जगतो ददासि ।
त्वं विश्वतश्चक्षुरनन्तमूर्त्ते
  त्रेधा पदं त्वं निदधासि धातः ॥ ४४
यथाग्निरेको बहुधा समिध्यते
  विकारभेदैरविकाररूपः ।
तथा भवान्सर्वगतैकरूपी
  रूपाण्यशेषाण्यनुपुष्यतीश ॥ ४५
एकं त्वमग्र्यं परमं पदं य-
  त्पश्यन्ति त्वां सूरयो ज्ञानदृश्यम् ।
त्वत्तो नान्यत्किञ्चिदस्ति स्वरूपं
  यद्वा भूतं यच्च भव्यं परात्मन् ॥ ४६
व्यक्ताव्यक्तस्वरूपस्त्वं समष्टिव्यष्टिरूपवान् ।
सर्वज्ञस्सर्ववित्सर्वशक्तिज्ञानबलर्द्धिमन् ॥ ४७
अन्यूनश्चाप्यवृद्धिश्च स्वाधीनो नादिमान्वशी ।
क्लमतन्द्राभयक्रोधकामादिभिरसंयुतः ॥ ४८
निरवद्यः परः प्राप्तेर्निरधिष्ठोऽक्षरः क्रमः ।
सर्वेश्वरः पराधारो धाम्नां धामात्मकोऽक्षयः ॥ ४९


[हिन्दी अनुवाद]

आप अव्यक्त, अनिर्वाच्य, अचिन्त्य, नाम-वर्णसे रहित, हाथ-पाँव तथा रूपसे हीन, शुद्ध, सनातन और परसे भी पर हैं ॥ ४० ॥ आप कर्णहीन होकर भी सुनते हैं, नेत्रहीन होकर भी देखते हैं, एक होकर भी अनेक रूपोंमें प्रकट होते हैं, हस्त-पादादिसे रहित होकर भी बड़े वेगशाली और ग्रहण करनेवाले हैं तथा सबके अवेद्य होकर भी सबको जाननेवाले हैं ॥ ४१ ॥ हे परात्मन् ! जिस धीर पुरुषकी बुद्धि आपके श्रेष्ठतम रूपसे पृथक् और कुछ भी नहीं देखती, आपके अणुसे भी अणु और दृश्य-स्वरूपको देखनेवाले उस पुरुषकी आत्यन्तिक अज्ञाननिवृत्ति हो जाती है ॥ ४२ ॥ आप विश्वके केन्द्र और त्रिभुवनके रक्षक हैं; सम्पूर्ण भूत आपहीमें स्थित हैं तथा जो कुछ भूत, भविष्यत् और अणुसे भी अणु है वह सब आप प्रकृतिसे परे एकमात्र परमपुरुष ही हैं ॥ ४३ ॥ आप ही चार प्रकारका अग्नि होकर संसारको तेज और विभूति दान करते हैं। हे अनन्तमूर्ते ! आपके नेत्र सब ओर हैं। हे धातः ! आप ही [त्रिविक्रमावतारमें] तीनों लोकमें अपने तीन पग रखते हैं ॥ ४४ ॥ हे ईश! जिस प्रकार एक ही अविकारी अग्नि विकृत होकर नाना प्रकारसे प्रज्वलित होता है, उसी प्रकार सर्वगतरूप एक आप ही अनन्त रूप धारण कर लेते हैं ॥ ४५ ॥ एकमात्र जो श्रेष्ठ परमपद है; वह आप ही हैं, ज्ञानी पुरुष ज्ञानदृष्टिसे देखे जाने-योग्य आपको ही देखा करते हैं। हे परात्मन्! भूत और भविष्यत् जो कुछ स्वरूप है वह आपसे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है ॥ ४६ ॥ आप व्यक्त और अव्यक्तस्वरूप हैं, समष्टि और व्यष्टिरूप हैं तथा आप ही सर्वज्ञ, सर्वसाक्षी, सर्वशक्तिमान् एवं सम्पूर्ण ज्ञान, बल और ऐश्वर्यसे युक्त हैं ॥ ४७ ॥ आप ह्रास और वृद्धिसे रहित, स्वाधीन, अनादि और जितेन्द्रिय हैं तथा आपके अन्दर श्रम, तन्द्रा, भय, क्रोध और काम आदि नहीं हैं ॥ ४८ ॥ आप अनिन्द्य, अप्राप्य, निराधार और अव्याहत गति हैं, आप सबके स्वामी, अन्य ब्रह्मादिके आश्रय तथा सूर्यादि तेजोंके तेज एवं अविनाशी हैं ॥ ४९ ॥


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अ० १ ] * पञ्चम अंश * ३१७

सकलावरणातीत निरालम्बनभावन ।<br>महाभूतिसंस्थान नमस्ते पुरुषोत्तम ॥ ५०<br>नाकारणात्कारणाद्वा कारणाकारणान्न च ।<br>शरीरग्रहणं वापि धर्मत्राणाय केवलम् ॥ ५१आप समस्त आवरणशून्य, असहायोंके पालक और सम्पूर्ण महाविभूतियोंके आधार हैं, हे पुरुषोत्तम ! आपको नमस्कार है ॥ ५० ॥ आप किसी कारण, अकारण अथवा कारणाकारणसे शरीर-ग्रहण नहीं करते, बल्कि केवल धर्म-रक्षाके लिये ही करते हैं ॥ ५१ ॥
श्रीपराशर उवाच<br>इत्येवं संस्तवं श्रुत्वा मनसा भगवानजः ।<br>ब्रह्माणमाह प्रीतेन विश्वरूपं प्रकाशयन् ॥ ५२श्रीपराशरजी बोले—इस प्रकार स्तुति सुनकर भगवान् अज अपना विश्वरूप प्रकट करते हुए ब्रह्माजीसे प्रसन्नचित्तसे कहने लगे ॥ ५२ ॥
श्रीभगवानुवाच<br>भो भो ब्रह्मंस्त्वया मत्तस्सह देवैर्यदिष्यते ।<br>तदुच्यतामशेषं च सिद्धमेवावधार्यताम् ॥ ५३श्रीभगवान् बोले—हे ब्रह्मन् ! देवताओंके सहित तुमको मुझसे जिस वस्तुकी इच्छा हो वह सब कहो और उसे सिद्ध हुआ ही समझो ॥ ५३ ॥
श्रीपराशर उवाच<br>ततो ब्रह्मा हरेर्दिव्यं विश्वरूपमवेक्ष्य तत् ।<br>तुष्टाव भूयो देवेषु साध्वसावनतात्मसु ॥ ५४श्रीपराशरजी बोले—तब श्रीहरिके उस दिव्य विश्वरूपको देखकर समस्त देवताओंके भयसे विनीत हो जानेपर ब्रह्माजी पुनः स्तुति करने लगे ॥ ५४ ॥
ब्रह्मोवाच<br>नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः<br>सहस्रबाहो बहुवक्त्रपाद ।<br>नमो नमस्ते जगतः प्रवृत्ति-<br>विनाशसंस्थानकराप्रमेय ॥ ५५ब्रह्माजी बोले—हे सहस्रबाहो ! हे अनन्तमुख एवं चरणवाले ! आपको हजारों बार नमस्कार हो । हे जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश करनेवाले ! हे अप्रमेय ! आपको बारम्बार नमस्कार हो ॥ ५५ ॥
सूक्ष्मातिसूक्ष्मातिबृहत्प्रमाण<br>गरीयसामप्यतिगौरवात्मन् ।<br>प्रधानबुद्धीन्द्रियवत्प्रधान-<br>मूलात्परात्मन्भगवन्प्रसीद ॥ ५६हे भगवन् ! आप सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, गुरुसे भी गुरु और अति बृहत् प्रमाण हैं, तथा प्रधान (प्रकृति) महत्तत्त्व और अहंकारादिमें प्रधानभूत मूल पुरुषसे भी परे हैं; हे भगवन् ! आप हमपर प्रसन्न होइये ॥ ५६ ॥
एषा मही देव महीप्रसूतै-<br>र्महासुरैः पीडितशैलकन्धा ।<br>परायणां त्वां जगतामुपैति<br>भारावतारार्थमपारसार ॥ ५७हे देव ! इस पृथिवीके पर्वतरूपी मूलबन्ध इसपर उत्पन्न हुए महान् असुरोंके उत्पातसे शिथिल हो गये हैं। अतः हे अपरिमितवीर्य ! यह संसारका भार उतारनेके लिये आपकी शरणमें आयी है ॥ ५७ ॥
एते वयं वृत्ररिपुस्तथायं<br>नासत्यदस्रौ वरुणस्तथैव ।<br>इमे च रुद्रा वसवस्ससूर्या-<br>स्समीरणाग्निप्रमुखास्तथान्ये ॥ ५८<br>सुरास्समस्तास्सुरनाथ कार्य-<br>मेभिर्मया यच्च तदीश सर्वम् ।<br>आज्ञापयाज्ञां परिपालयन्त-<br>स्तथैव तिष्ठाम सदास्तदोषाः ॥ ५९हे सुरनाथ ! हम और यह इन्द्र, अश्विनीकुमार तथा वरुण, ये रुद्रगण, वसुगण, सूर्य, वायु और अग्नि आदि अन्य समस्त देवगण यहाँ उपस्थित हैं, इन्हें अथवा मुझे जो कुछ करना उचित हो उन सब बातोंके लिये आज्ञा कीजिये । हे ईश ! आपकी आज्ञाका पालन करते हुए हम सम्पूर्ण दोषोंसे मुक्त हो सकेंगे ॥ ५८-५९ ॥

३१८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १

श्रीपराशर उवाच<br>एवं संस्तूयमानस्तु भगवान्परमेश्वरः।<br>उज्जहारात्मनः केशौ सितकृष्णौ महामुने ॥ ६०<br>उवाच च सुरानेतौ मत्केशौ वसुधातले।<br>अवतीर्य भुवो भारक्लेशहानिं करिष्यतः ॥ ६१<br>सुराश्च सकलास्स्वांशैरवतीर्य महीतले।<br>कुर्वन्तु युद्धमुन्मत्तः पूर्वोत्पन्नैर्महासुरैः ॥ ६२<br>ततः क्षयमशेषास्ते दैतेया धरणीतले।<br>प्रयास्यन्ति न सन्देहो मद्द्दक्पातविचूर्णिताः ॥ ६३<br>वसुदेवस्य या पत्नी देवकी देवतोपमा।<br>तत्रायमष्टमो गर्भो मत्केशो भविता सुराः ॥ ६४<br>अवतीर्य च तत्रायं कंसं घातयिता भुवि।<br>कालनेमिं समुद्भूतमित्युक्त्वान्तर्दधे हरिः ॥ ६५<br>अदृश्याय ततस्तस्मै प्रणिपत्य महामुने।<br>मेरुपृष्ठं सुरा जग्मुरवतेरुश्च भूतले ॥ ६६<br>कंसाय चाष्टमो गर्भो देवक्या धरणीधरः।<br>भविष्यतीत्याचचक्षे भगवान्नारदो मुनिः ॥ ६७<br>कंसोऽपि तदुपश्रुत्य नारदात्कुपितस्ततः।<br>देवकीं वसुदेवं च गृहे गुप्तावधारयत् ॥ ६८<br>वसुदेवेन कंसाय तेनैवोक्तं यथा पुरा।<br>तथैव वसुदेवोऽपि पुत्रमर्पितवान्द्विज ॥ ६९<br>हिरण्यकशिपोः पुत्राष्षड्गर्भा इति विश्रुताः।<br>विष्णुप्रयुक्ता तान्निद्रा क्रमाद्गर्भानयोजयत् ॥ ७०<br>योगनिद्रा महामाया वैष्णवी मोहितं यया।<br>अविद्यया जगत्सर्वं तामाह भगवान्हरिः ॥ ७१<br>श्रीभगवानुवाच<br>निद्रे गच्छ ममादेशात्पातालतलसंश्रयान्।<br>एकैकत्वेन षड्गर्भान्देवकीजठरं नय ॥ ७२<br>हतेषु तेषु कंसेन शेषाख्योऽशस्सतो मम।<br>अंशांशेनोदरे तस्यास्सप्तमः सम्भविष्यति ॥ ७३**श्रीपराशरजी बोले—**हे महामुने! इस प्रकार स्तुति किये जानेपर भगवान् परमेश्वरने अपने श्याम और श्वेत दो केश उखाड़े॥६०॥ और देवताओंसे बोले—'मेरे ये दोनों केश पृथ्वीपर अवतार लेकर पृथिवीके भाररूप कष्टको दूर करेंगे॥६१॥ सब देवगण अपने-अपने अंशोंसे पृथिवीपर अवतार लेकर अपनेसे पूर्व उत्पन्न हुए उन्मत्त दैत्योंके साथ युद्ध करें॥६२॥ तब निःसन्देह पृथिवीतलपर सम्पूर्ण दैत्यगण मेरे दृष्टिपातसे दलित होकर क्षीण हो जायेंगे॥६३॥ वसुदेवजीकी जो देवीके समान देवकी नामकी भार्या है उसके आठवें गर्भसे मेरा यह (श्याम) केश अवतार लेगा॥६४॥ और इस प्रकार यहाँ अवतार लेकर यह कालनेमिके अवतार कंसका वध करेगा।' ऐसा कहकर श्रीहरि अन्तर्धान हो गये॥६५॥ हे महामुने! भगवान्के अदृश्य हो जानेपर उन्हें प्रणाम करके देवगण सुमेरुपर्वतपर चले गये और फिर पृथिवीपर अवतीर्ण हुए॥६६॥<br>इसी समय भगवान् नारदजीने कंससे आकर कहा कि देवकीके आठवें गर्भमें भगवान् धरणीधर जन्म लेंगे॥६७॥ नारदजीसे यह समाचार पाकर कंसने कुपित होकर वसुदेव और देवकीको कारागृहमें बन्द कर दिया॥६८॥ हे द्विज! वसुदेवजी भी, जैसा कि उन्होंने पहले कह दिया था, अपने प्रत्येक पुत्रको कंसको सौंपते रहे॥६९॥ ऐसा सुना जाता है कि पहले छः गर्भ हिरण्यकशिपुके पुत्र थे। भगवान् विष्णुकी प्रेरणासे योगनिद्रा उन्हें क्रमशः गर्भमें स्थित करती रही *॥७०॥ जिस अविद्या-रूपिणीसे सम्पूर्ण जगत् मोहित हो रहा है, वह योगनिद्रा भगवान् विष्णुकी महामाया है उससे भगवान् श्रीहरिने कहा—॥७१॥<br>**श्रीभगवान् बोले—**हे निद्रे! जा, मेरी आज्ञासे तू पातालमें स्थित छः गर्भोको एक-एक करके देवकीकी कुक्षिमें स्थापित कर दे॥७२॥ कंसद्वारा उन सबके मारे जानेपर शेष नामक मेरा अंश अपने अंशांशसे देवकीके सातवें गर्भमें स्थित होगा॥७३॥

* ये बालक पूर्वजन्ममें हिरण्यकशिपुके भाई कालनेमिके पुत्र थे; इसीसे इन्हें उसका पुत्र कहा गया है। इन राक्षसकुमारोंने हिरण्यकशिपुका अनादर कर भगवान्‌की भक्ति की थी; अतः उसने कुपित होकर इन्हें शाप दिया कि तुमलोग अपने पिताके हाथसे ही मारे जाओगे। यह प्रसंग हरिवंशमें आया है।

अ० १ ] * पञ्चम अंश * ३१९


गोकुले वसुदेवस्य भार्यान्या रोहिणी स्थिता।
तस्यास्स सम्भूतिसमं देवि नेयस्त्वयोदरम् ॥ ७४
हे देवि! गोकुलमें वसुदेवजीकी जो रोहिणी नामकी दूसरी भार्या रहती है उसके उदरमें उस सातवें गर्भको ले जाकर तू इस प्रकार स्थापित कर देना जिससे वह उसीके जठरसे उत्पन्न हुएके समान जान पड़े॥ ७४॥

सप्तमो भोजराजस्य भयाद्रोधोपरोधतः।
देवक्याः पतितो गर्भ इति लोको वदिष्यति ॥ ७५
उसके विषयमें संसार यही कहेगा कि कारागारमें बन्द होनेके कारण भोजराज कंसके भयसे देवकीका सातवाँ गर्भ गिर गया॥ ७५॥

गर्भसङ्कर्षणात्सोऽथ लोके सङ्कर्षणेति वै।
संज्ञामवाप्स्यते वीरश्वेताद्रिशिखरोपमः ॥ ७६
वह श्वेत शैलशिखरके समान वीर पुरुष गर्भसे आकर्षण किये जानेके कारण संसारमें 'संकर्षण' नामसे प्रसिद्ध होगा॥ ७६॥

ततोऽहं सम्भविष्यामि देवकीजठरे शुभे।
गर्भे त्वया यशोदाया गन्तव्यमविलम्बितम् ॥ ७७
तदनन्तर, हे शुभे! देवकीके आठवें गर्भमें मैं स्थित होऊँगा। उस समय तू भी तुरंत ही यशोदाके गर्भमें चली जाना॥ ७७॥

प्रावृट्काले च नभसि कृष्णाष्टम्यामहं निशि।
उत्पत्स्यामि नवम्यां तु प्रसूतिं त्वमवाप्स्यसि ॥ ७८
वर्षा ऋतुमें भाद्रपद कृष्ण अष्टमीको रात्रिके समय मैं जन्म लूँगा और तू नवमीको उत्पन्न होगी॥ ७८॥

यशोदाशयने मां तु देवक्यास्त्वामनिन्दिते।
मच्छक्तिप्रेरितमतिर्वसुदेवो नयिष्यति ॥ ७९
हे अनिन्दिते! उस समय मेरी शक्तिसे अपनी मति फिर जानेके कारण वसुदेवजी मुझे तो यशोदाके और तुझे देवकीके शयनगृहमें ले जायँगे॥ ७९॥

कंसश्च त्वामुपादाय देवि शैलशिलातले।
प्रक्षेप्स्यत्यन्तरिक्षे च संस्थानं त्वमवाप्स्यसि ॥ ८०
तब हे देवि! कंस तुझे पकड़कर पर्वत-शिलापर पटक देगा; उसके पटकते ही तू आकाशमें स्थित हो जायगी॥ ८०॥

ततस्त्वां शतदृक्छक्रः प्रणम्य मम गौरवात्।
प्रणिपातानतशिरा भगिनीत्वे ग्रहीष्यति ॥ ८१
उस समय मेरे गौरवसे सहस्रनयन इन्द्र सिर झुकाकर प्रणाम करनेके अनन्तर तुझे भगिनीरूपसे स्वीकार करेगा॥ ८१॥

त्वं च शुम्भनिशुम्भादीन्हत्वा दैत्यान्सहस्रशः।
स्थानैरनेकैः पृथिवीमशेषां मण्डयिष्यसि ॥ ८२
तू भी शुम्भ, निशुम्भ आदि सहस्रों दैत्योंको मारकर अपने अनेक स्थानोंसे समस्त पृथिवीको सुशोभित करेगी॥ ८२॥

त्वं भूतिः सन्नतिः क्षान्तिः कान्तिद्यौः पृथिवी धृतिः।
लज्जा पुष्टिरुषा या तु काचिदन्या त्वमेव सा ॥ ८३
तू ही भूति, सन्नति, क्षान्ति और कान्ति है; तू ही आकाश, पृथिवी, धृति, लज्जा, पुष्टि और उषा है; इनके अतिरिक्त संसारमें और भी जो कोई शक्ति है वह सब तू ही है॥ ८३॥

ये त्वामार्येति दुर्गेति वेदगर्भाम्बिकेति च।
भद्रेति भद्रकालीति क्षेमदा भाग्यदेति च ॥ ८४
प्रातश्चैवापराह्णे च स्तोष्यन्त्यानम्रमूर्त्तयः।
तेषां हि प्रार्थितं सर्वं मत्प्रसादाद्भविष्यति ॥ ८५
जो लोग प्रातःकाल और सायंकालमें अत्यन्त नम्रतापूर्वक तुझे आर्या, दुर्गा, वेदगर्भा, अम्बिका, भद्रा, भद्रकाली, क्षेमदा और भाग्यदा आदि कहकर तेरी स्तुति करेंगे, उनकी समस्त कामनाएँ मेरी कृपासे पूर्ण हो जायँगी॥ ८४-८५॥

सुरामांसोपहारैश्च भक्ष्यभोज्यैश्च पूजिता।
नृणामशेषांस्कामांस्त्वं प्रसन्ना सम्प्रदास्यसि ॥ ८६
मदिरा और मांसकी भेंट चढ़ानेसे तथा भक्ष्य और भोज्य पदार्थोंद्वारा पूजा करनेसे प्रसन्न होकर तू मनुष्योंकी सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण कर देगी॥ ८६॥

ते सर्वे सर्वदा भद्रे मत्प्रसादादसंशयम्।
असन्दिग्धा भविष्यन्ति गच्छ देवि यथोदितम् ॥ ८७
तेरे द्वारा दी हुई वे समस्त कामनाएँ मेरी कृपासे निस्सन्देह पूर्ण होंगी। हे देवि! अब तू मेरे बतलाये हुए स्थानको जा॥ ८७॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

३२०

  • श्रीविष्णुपुराण *

[ अ० २


दूसरा अध्याय

भगवान्‌का गर्भ-प्रवेश तथा देवगणद्वारा देवकीकी स्तुति

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
यथोक्तं सा जगद्धात्री देवदेवेन वै तथा।<br>षड्गर्भगर्भविन्यासं चक्रे चान्यस्य कर्षणम्॥ १हे मैत्रेय! देवदेव श्रीविष्णुभगवान्‌ने जैसा कहा था उसके अनुसार जगद्धात्री योगमायाने छः गर्भोँको देवकीके उदरमें स्थित किया और सातवेंको उसमेंसे निकाल लिया॥ १॥
सप्तमे रोहिणीं गर्भे प्राप्ते गर्भं ततो हरिः।<br>लोकत्रयोपकाराय देवक्याः प्रविवेश ह॥ २इस प्रकार सातवें गर्भके रोहिणीके उदरमें पहुँच जानेपर श्रीहरिने तीनों लोकोंका उद्धार करनेकी इच्छासे देवकीके गर्भमें प्रवेश किया॥ २॥
योगनिद्रा यशोदायास्तस्मिन्नेव तथा दिने।<br>सम्भृता जठरे तद्वद्यथोक्तं परमेष्ठिना॥ ३भगवान् परमेश्वरके आज्ञानुसार योगमाया भी उसी दिन यशोदाके गर्भमें स्थित हुई॥ ३॥
ततो ग्रहगणस्सम्यक्प्रचचार दिवि द्विज।<br>विष्णोरंशे भुवं याते ऋतवश्चाबभुश्शुभाः॥ ४हे द्विज! विष्णु-अंशके पृथिवीमें पधारनेपर आकाशमें ग्रहगण ठीक-ठीक गतिसे चलने लगे और ऋतुगण भी मंगलमय होकर शोभा पाने लगे॥ ४॥
न सेहे देवकीं द्रष्टुं कश्चिदप्यतितेजसा।<br>जाज्वल्यमानां तां दृष्ट्वा मनांसि क्षोभमाययुः॥ ५उस समय अत्यन्त तेजसे देदीप्यमाना देवकीजीको कोई भी देख न सकता था। उन्हें देखकर [दर्शकोंके] चित्त थकित हो जाते थे॥ ५॥
अदृष्टाः पुरुषैःस्त्रीभिर्देवकीं देवतागणाः।<br>बिभ्राणां वपुषा विष्णुं तुष्टुवुस्तामहर्निशम्॥ ६तब देवतागण अन्य पुरुष तथा स्त्रियोंको दिखायी न देते हुए, अपने शरीरमें [गर्भरूपसे] भगवान् विष्णुको धारण करनेवाली देवकीजीकी अहर्निश स्तुति करने लगे॥ ६॥
देवता ऊचुःदेवता बोले—
प्रकृतिस्त्वं परा सूक्ष्मा ब्रह्मगर्भंभवः पुरा।<br>ततो वाणी जगद्धातुर्वेदगर्भासि शोभने॥ ७हे शोभने! तू पहले ब्रह्म-प्रतिबिम्बधारिणी मूलप्रकृति हुई थी और फिर जगद्विधाताकी वेदगर्भा वाणी हुई॥ ७॥
सृज्यस्वरूपगर्भासि सृष्टिभूता सनातने।<br>बीजभूता तु सर्वस्य यज्ञभूताभवस्त्रयी॥ ८हे सनातने! तू ही सृज्य पदार्थोंको उत्पन्न करनेवाली और तू ही सृष्टिरूपा है; तू ही सबकी बीज-स्वरूपा यज्ञमयी वेदत्रयी हुई है॥ ८॥
फलगर्भा त्वमेवेज्या वह्निगर्भा तथारणिः।<br>अदितिर्देवगर्भा त्वं दैत्यगर्भा तथा दितिः॥ ९तू ही फलमयी यज्ञक्रिया और अग्नि-मयी अरणि है तथा तू ही देवमाता अदिति और दैत्यप्रसू दिति है॥ ९॥
ज्योत्स्ना वासरगर्भा त्वं ज्ञानगर्भासि सन्नतिः।<br>नयगर्भा परा नीतिर्लज्जा त्वं प्रश्रयोद्बहा॥ १०तू ही दिनकरी प्रभा और ज्ञानगर्भा गुरुशुश्रूषा है तथा तू ही न्यायमयी परमनीति और विनयसम्पन्ना लज्जा है॥ १०॥
कामगर्भा तथेच्छा त्वं तुष्टिः सन्तोषगर्भिणी।<br>मेधा च बोधगर्भासि धैर्यगर्भोद्बहा धृतिः॥ ११तू ही काममयी इच्छा, सन्तोषमयी तुष्टि, बोधगर्भा प्रज्ञा और धैर्यधारिणी धृति है॥ ११॥
ग्रहर्क्षतारकागर्भा द्यौरस्याखिलहेतुकी।<br>एता विभूतयो देवि तथान्याश्च सहस्त्रशः।<br>तथासंख्या जगद्धात्रि साम्प्रतं जठरे तव॥ १२ग्रह, नक्षत्र और तारागणको धारण करनेवाला तथा [वृष्टि आदिके द्वारा इस अखिल विश्वका] कारणस्वरूप आकाश तू ही है। हे जगद्धात्रि! हे देवि! ये सब तथा और भी सहस्रों और असंख्य विभूतियाँ इस समय तेरे उदरमें स्थित हैं॥ १२॥

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अ० ३ ] * पञ्चम अंश * ३२१


(मूल संस्कृत श्लोक)(हिन्दी अनुवाद)
समुद्राद्रिनदीद्वीपवनपत्तनभूषणा ।<br>ग्रामखर्वटखेटाढ्या समस्ता पृथिवी शुभे ॥ १३<br>समस्तवह्नयोऽम्भांसि सकलाश्च समीराणाः ।<br>ग्रहर्क्षतारकाचित्रं विमानशतसंकुलम् ॥ १४<br>अवकाशमशेषस्य यद्ददाति नभःस्थलम् ।<br>भूर्लोकश्च भुवर्लोकस्स्वर्लोकोऽथ महर्जनः ॥ १५<br>तपश्च ब्रह्मलोकश्च ब्रह्माण्डमखिलं शुभे ।<br>तदन्तरे स्थिता देवा दैत्यगन्धर्वचारणाः ॥ १६<br>महोरगास्तथा यक्षा राक्षसाः प्रेतगुह्यकाः ।<br>मनुष्याः पशवश्चान्ये ये च जीवा यशस्विनि ॥ १७<br>तैरन्तःस्थैरनन्तोऽसौ सर्वगः सर्वभावनः ॥ १८<br>रूपकर्मस्वरूपाणि न परिच्छेदगोचरे ।<br>यस्याखिलप्रमाणानि स विष्णुर्गर्भगतस्तव ॥ १९<br>त्वं स्वाहा त्वं स्वधा विद्या सुधा त्वं ज्योतिरम्बरे ।<br>त्वं सर्वलोकरक्षार्थमवतीर्णा महीतले ॥ २०<br>प्रसीद देवि सर्वस्य जगतश्शं शुभे कुरु ।<br>प्रीत्या तं धारयेशानं धृतं येनाखिलं जगत् ॥ २१हे शुभे! समुद्र, पर्वत, नदी, द्वीप, वन और नगरोंसे सुशोभित तथा ग्राम, खर्वट और खेटादिसे सम्पन्न समस्त पृथिवी, सम्पूर्ण अग्नि और जल तथा समस्त वायु, ग्रह, नक्षत्र एवं तारागणोंसे चित्रित तथा सैकड़ों विमानोंसे पूर्ण सबको अवकाश देनेवाला आकाश, भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक तथा मह, जन, तप और ब्रह्मलोकपर्यन्त सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तथा उसके अन्तर्वर्ती देव, असुर, गन्धर्व, चारण, नाग, यक्ष, राक्षस, प्रेत, गुह्यक, मनुष्य, पशु और जो अन्यान्य जीव हैं, हे यशस्विनि! वे सभी अपने अन्तर्गत होनेके कारण जो श्रीअनन्त सर्वगामी और सर्वभावन हैं तथा जिनके रूप, कर्म, स्वभाव तथा [बालत्व महत्त्व आदि] समस्त परिमाण परिच्छेद (विचार)-के विषय नहीं हो सकते वे ही श्रीविष्णुभगवान् तेरे गर्भमें स्थित हैं॥ १३—१९॥ तू ही स्वाहा, स्वधा, विद्या, सुधा और आकाशस्थिता ज्योति है। सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षाके लिये ही तूने पृथिवीमें अवतार लिया है॥ २०॥ हे देवि! तू प्रसन्न हो। हे शुभे! तू सम्पूर्ण जगत्‌का कल्याण कर। जिसने इस सम्पूर्ण जगत्‌को धारण किया है उस प्रभुको तू प्रीतिपूर्वक अपने गर्भमें धारण कर॥ २१॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥


तीसरा अध्याय

भगवान्‌का आविर्भाव तथा योगमायाद्वारा कंसकी वंचना

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
एवं संस्तूयमाना सा देवैर्देवमधारयत् ।<br>गर्भेण पुण्डरीकाक्षं जगतस्त्राणकारणम् ॥ १हे मैत्रेय! देवताओंसे इस प्रकार स्तुति की जाती हुई देवकीजीने संसारकी रक्षाके कारण भगवान् पुण्डरीकाक्षको गर्भमें धारण किया॥ १॥
ततोऽखिलजगत्पद्मबोधायाच्युतभानुना ।<br>देवकीपूर्वसन्ध्यायामाविर्भूतं महात्मना ॥ २तदनन्तर सम्पूर्ण संसाररूप कमलको विकसित करनेके लिये देवकीरूप पूर्व सन्ध्यामें महात्मा अच्युतरूप सूर्यदेवका आविर्भाव हुआ॥ २॥
तज्जन्मदिनमत्यर्थमाह्लाद्यमलदिङ्मुखम् ।<br>बभूव सर्वलोकस्य कौमुदी शशिनो यथा ॥ ३चन्द्रमाकी चाँदनीके समान भगवान्‌का जन्म-दिन सम्पूर्ण जगत्‌को आह्लादित करनेवाला हुआ और उस दिन सभी दिशाएँ अत्यन्त निर्मल हो गयीं॥ ३॥
सन्तस्सन्तोषमधिकं प्रशमं चण्डमारुताः ।<br>प्रसादं निम्नगा याता जायमाने जनार्दने ॥ ४श्रीजनार्दनके जन्म लेनेपर सन्तजनोंको परम सन्तोष हुआ, प्रचण्ड वायु शान्त हो गया तथा नदियाँ अत्यन्त स्वच्छ हो गयीं॥ ४॥

३२२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ३


सिन्धवो निजशब्देन वाद्यं चक्रुर्मनोहरम्।
जगुर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ ५

ससृजुः पुष्पवर्षाणि देवा भुव्यन्तरिक्षगाः।
जज्वलुश्चाग्नयश्शान्ता जायमाने जनार्दने ॥ ६

मन्दं जगर्जुलर्दाः पुष्पवृष्टिमुचो द्विज।
अर्द्धरात्रेऽखिलाधारे जायमाने जनार्दने ॥ ७

फुल्लेन्दीवरपत्राभं चतुर्बाहुमुदीक्ष्य तम्।
श्रीवत्सवक्षसं जातं तुष्टावानकदुन्दुभिः ॥ ८

अभिष्टूय च तं वाग्भिः प्रसन्नाभिर्महामतिः।
विज्ञापयामास तदा कंसाद्भीतो द्विजोत्तम ॥ ९

वसुदेव उवाच
जातोऽसि देवदेवेश शङ्खचक्रगदाधरम्।
दिव्यरूपमिदं देव प्रसादेनोपसंहर ॥ १०

अद्यैव देव कंसोऽयं कुरुते मम घातनम्।
अवतीर्णं इति ज्ञात्वा त्वमस्मिन्मम मन्दिरे ॥ ११

देवक्यवाच
योऽनन्तरूपोऽखिलविश्वरूपो
गर्भेऽपि लोकान्वपुषा बिभर्त्ति।
प्रसीदतामेष स देवदेवो
यो माययाविष्कृतबालरूपः ॥ १२

उपसंहर सर्वात्मन् रूपमेतच्चतुर्भुजम्।
जानातु मावतारं ते कंसोऽयं दितिजन्मजः ॥ १३

श्रीभगवानुवाच
स्तुतोऽहं यत्त्वया पूर्वं पुत्रार्थिन्या तदद्य ते।
सफलं देवि सञ्जातं जातोऽहं यत्तवोदरात् ॥ १४

श्रीपराशर उवाच
इत्युक्त्वा भगवांस्तूष्णीं बभूव मुनिसत्तम।
वसुदेवोऽपि तं रात्रावादाय प्रययौ बहिः ॥ १५

मोहिताश्चाभवंस्तत्र रक्षिणो योगनिद्रया।
मथुराद्वारपालाश्च व्रजत्यानकदुन्दुभौ ॥ १६


समुद्रगण अपने घोषसे मनोहर बाजे बजाने लगे, गन्धर्वराज गान करने लगे और अप्सराएँ नाचने लगीं॥ ५॥ श्रीजनार्दनके प्रकट होनेपर आकाशगामी देवगण पृथिवीपर पुष्प बरसाने लगे तथा शान्त हुए यज्ञाग्नि फिर प्रज्वलित हो गये॥ ६॥ हे द्विज! अर्द्धरात्रिके समय सर्वाधार भगवान् जनार्दनके आविर्भूत होनेपर पुष्पवर्षा करते हुए मेघगण मन्द-मन्द गर्जना करने लगे॥ ७॥

उन्हें खिले हुए कमलदलकी-सी आभावाले, चतुर्भुज और वक्षःस्थलमें श्रीवत्स-चिह्नसहित उत्पन्न हुए देख आनकदुन्दुभि वसुदेवजी स्तुति करने लगे॥ ८॥ हे द्विजोत्तम! महामति वसुदेवजीने प्रसादयुक्त वचनोंसे भगवान्‌की स्तुति कर कंससे भयभीत रहनेके कारण इस प्रकार निवेदन किया॥ ९॥

वसुदेवजी बोले— हे देवदेवेश्वर! यद्यपि आप [साक्षात् परमेश्वर] प्रकट हुए हैं, तथापि हे देव! मुझपर कृपा करके अब अपने इस शंख-चक्र-गदाधारी दिव्य रूपका उपसंहार कीजिये॥ १०॥ हे देव! यह पता लगते ही कि आप मेरे इस गृहमें अवतीर्ण हुए हैं, कंस इसी समय मेरा सर्वनाश कर देगा॥ ११॥

देवकीजी बोलीं— जो अनन्तरूप और अखिल-विश्वस्वरूप हैं, जो गर्भमें स्थित होकर भी अपने शरीरसे सम्पूर्ण लोकोंको धारण करते हैं तथा जिन्होंने अपनी मायासे ही बालरूप धारण किया है वे देवदेव हमपर प्रसन्न हों॥ १२॥ हे सर्वात्मन्! आप अपने इस चतुर्भुज रूपका उपसंहार कीजिये। भगवन्! यह राक्षसके अंशसे उत्पन्न* कंस आपके इस अवतारका वृत्तान्त न जानने पावे॥ १३॥

श्रीभगवान् बोले— हे देवि! पूर्वजन्ममें तूने जो पुत्रकी कामनासे मुझसे [पुत्ररूपसे उत्पन्न होनेके लिये] प्रार्थना की थी। आज मैंने तेरे गर्भसे जन्म लिया है—इससे तेरी वह कामना पूर्ण हो गयी॥ १४॥

श्रीपराशरजी बोले— हे मुनिश्रेष्ठ! ऐसा कहकर भगवान् मौन हो गये तथा वसुदेवजी भी उन्हें उस रात्रिमें ही लेकर बाहर निकले॥ १५॥ वसुदेवजीके बाहर जाते समय कारागृहरक्षक और मथुराके द्वारपाल योगनिद्राके प्रभावसे अचेत हो गये॥ १६॥


* द्रुमिल नामक राक्षसने राजा उग्रसेनका रूप धारण कर उनकी पत्नीसे संसर्ग किया था। उसीसे कंसका जन्म हुआ। यह कथा हरिवंशमें आयी है।

अ० ३] * पञ्चम अंश * ३२३


वर्षतां जलदानां च तोयमप्युल्बणं निशि।
संवृत्यानुययौ शेषः फणैरानकदुन्दुभिम्॥ १७

यमुनां चातिगम्भीरां नानावर्त्तशताकुलाम्।
वसुदेवो वहन्विष्णुं जानुमात्रवहां ययौ॥ १८

कंसस्य करदानाय तत्रैवाभ्यागतांस्तटे।
नन्दादीन् गोपवृद्धांश्च यमुनाया ददर्श सः॥ १९

तस्मिन्काले यशोदापि मोहिता योगनिद्रया।
तामेव कन्यां मैत्रेय प्रसूता मोहते जने॥ २०

वसुदेवोऽपि विन्यस्य बालमादाय दारिकाम्।
यशोदाशयनात्तूर्णमाजगामामितद्युतिः॥ २१

ददृशे च प्रबुद्धा सा यशोदा जातमात्मजम्।
नीलोत्पलदलश्यामं ततोऽत्यर्थं मुदं ययौ॥ २२

आदाय वसुदेवोऽपि दारिकां निजमन्दिरे।
देवकीशयने न्यस्य यथापूर्वमतिष्ठत॥ २३

ततो बालध्वनिं श्रुत्वा रक्षिणस्सहसोत्थिताः।
कंसायावेदयामासुर्देवकीप्रसवं द्विज॥ २४

कंसस्तूर्णमुपेत्यैनां ततो जग्राह बालिकाम्।
मुञ्च मुञ्चेति देवक्या सन्नकण्ठ्या निवारितः॥ २५

चिक्षेप च शिलापृष्ठे सा क्षिप्ता वियति स्थिता।
अवाप रूपं सुमहत्सायुधाष्टमहाभुजम्॥ २६

प्रजहास तथैवोच्चैः कंसं च रुषिताब्रवीत्।
किं मया क्षिप्तया कंस जातो यस्त्वां वधिष्यति॥ २७

सर्वस्वभूतो देवानामासीन्मृत्युः पुरा स ते।
तदेतत्सम्प्रधार्याशु क्रियतां हितमात्मनः॥ २८

इत्युक्त्वा प्रययौ देवी दिव्यस्रग्गन्धभूषणा।
पश्यतो भोजराजस्य स्तुता सिद्धैर्विहायसा॥ २९


उस रात्रिके समय वर्षा करते हुए मेघोंकी जलराशिको अपने फणोंसे रोककर श्रीशेषजी आनकदुन्दुभिके पीछे-पीछे चले॥ १७॥ भगवान् विष्णुको ले जाते हुए वसुदेवजी नाना प्रकारके सैकड़ों भँवरोंसे भरी हुई अत्यन्त गम्भीर यमुनाजीको घुटनोंतक रखकर ही पार कर गये॥ १८॥ उन्होंने वहाँ यमुनाजीके तटपर ही कंसको कर देनेके लिये आये हुए नन्द आदि वृद्ध गोपोंको भी देखा॥ १९॥ हे मैत्रेय! इसी समय योगनिद्राके प्रभावसे सब मनुष्योंके मोहित हो जानेपर मोहित हुई यशोदाने भी उसी कन्याको जन्म दिया॥ २०॥

तब अतिशय कान्तिमान् वसुदेवजी भी उस बालकको सुलाकर और कन्याको लेकर तुरन्त यशोदाके शयन-गृहसे चले आये॥ २१॥ जब यशोदाने जागनेपर देखा कि उसके एक नीलकमलदलके समान श्यामवर्ण पुत्र उत्पन्न हुआ है तो उसे अत्यन्त प्रसन्नता हुई॥ २२॥ इधर, वसुदेवजीने कन्याको ले जाकर अपने महलमें देवकीके शयनगृहमें सुला दिया और पूर्ववत् स्थित हो गये॥ २३॥

हे द्विज! तदनन्तर बालकके रोनेका शब्द सुनकर कारागृह-रक्षक सहसा उठ खड़े हुए और देवकीके सन्तान उत्पन्न होनेका वृत्तान्त कंसको सुना दिया॥ २४॥ यह सुनते ही कंसने तुरन्त जाकर देवकीके रुँधे हुए कण्ठसे 'छोड़, छोड़'-ऐसा कहकर रोकनेपर भी उस बालिकाको पकड़ लिया और उसे एक शिलापर पटक दिया। उसके पटकते ही वह आकाशमें स्थित हो गयी और उसने शस्त्रयुक्त एक महान् अष्टभुजरूप धारण कर लिया॥ २५-२६॥

तब उसने ऊँचे स्वरसे अट्टहास किया और कंससे रोषपूर्वक कहा—'अरे कंस! मुझे पटकनेसे तेरा क्या प्रयोजन सिद्ध हुआ? जो तेरा वध करेगा उसने तो [पहले ही] जन्म ले लिया है; देवताओंके सर्वस्व वे हरि ही तुम्हारे [कालनेमिरूप] पूर्वजन्ममें भी काल थे। अतः ऐसा जानकर तू शीघ्र ही अपने हितका उपाय कर'॥ २७-२८॥ ऐसा कह, वह दिव्य माला और चन्दनादिसे विभूषिता तथा सिद्धगणद्वारा स्तुति की जाती हुई देवी भोजराज कंसके देखते-देखते आकाशमार्गसे चली गयी॥ २९॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥


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३२४* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ४

चौथा अध्याय

वसुदेव-देवकीका कारागारसे मोक्ष

श्रीपराशर उवाच
कंसस्तदोद्विग्नमनाः प्राह सर्वान्महासुरान्।
प्रलम्बकेशप्रमुखानाहूयासुरपुंगवान् ॥ १॥
श्रीपराशरजी बोले— तब कंसने खिन्नचित्तसे प्रलम्ब और केशी आदि समस्त मुख्य-मुख्य असुरोंको बुलाकर कहा॥ १॥

कंस उवाच
हे प्रलम्ब महाबाहो केशिन् धेनुक पूतने।
अरिष्टाद्यास्तथैवान्ये श्रूयतां वचनं मम॥ २॥
कंस बोला— हे प्रलम्ब! हे महाबाहो केशिन्! हे धेनुक! हे पूतने! तथा हे अरिष्ट आदि अन्य असुरगण! मेरा वचन सुनो—॥ २॥

मां हन्तुममरैर्यत्नः कृतः किल दुरात्मभिः।
मद्वीर्यतापितान्वीरो न त्वेतानागणयाम्यहम्॥ ३॥
यह बात प्रसिद्ध हो रही है कि दुरात्मा देवताओंने मेरे मारनेके लिये कोई यत्न किया है; किन्तु मैं वीर पुरुष अपने वीर्यसे सताये हुए इन लोगोंको कुछ भी नहीं गिनता हूँ॥ ३॥

किमिन्द्रेणाल्पवीर्येण किं हरेणैकचारिणा।
हरिणा वापि किं साध्यं छिद्रेष्वसुरघातिना॥ ४॥
अल्पवीर्य इन्द्र, अकेले घूमनेवाले महादेव अथवा छिद्र (असावधानीका समय) ढूँढ़कर दैत्योंका वध करनेवाले विष्णुसे उनका क्या कार्य सिद्ध हो सकता है?॥ ४॥

किमादित्यैः किं वसुभिरल्पवीर्यैः किमग्निभिः।
किं वान्यैरमरैः सर्वैर्मद्बाहुबलनिर्जितैः॥ ५॥
मेरे बाहुबलसे दलित आदित्यों, अल्पवीर्य वसुगणों, अग्नियों अथवा अन्य समस्त देवताओंसे भी मेरा क्या अनिष्ट हो सकता है?॥ ५॥

किं न दृष्टोऽमरपतिर्मया संयुगमेत्य सः।
पृष्ठेनैव वहन्बाणानपागच्छन्न वक्षसा॥ ६॥
आपलोगोंने क्या देखा नहीं था कि मेरे साथ युद्धभूमिमें आकर देवराज इन्द्र, वक्षःस्थलमें नहीं, अपनी पीठपर बाणोंकी बौछार सहता हुआ भाग गया था॥ ६॥

मद्राष्ट्रे वारिता वृष्टिर्यदा शक्रेण किं तदा।
मद्बाणभिन्नैर्जलदैर्नापो मुक्ता यथेप्सिताः॥ ७॥
जिस समय इन्द्रने मेरे राज्यमें वर्षाका होना बन्द कर दिया था उस समय क्या मेघोंने मेरे बाणोंसे बिंधकर ही यथेष्ट जल नहीं बरसाया?॥ ७॥

किमुर्व्यामवनीपाला मद्बाहुबलभीरवः।
न सर्वे सन्नतिं याता जरासन्धमृते गुरुम्॥ ८॥
हमारे गुरु (श्वशुर) जरासन्धको छोड़कर क्या पृथिवीके और सभी नृपतिगण मेरे बाहुबलसे भयभीत होकर मेरे सामने सिर नहीं झुकाते?॥ ८॥

अमरेषु ममावज्ञा जायते दैत्यपुंगवाः।
हास्यं मे जायते वीरास्तेषु यत्नपरेष्वपि॥ ९॥
हे दैत्यश्रेष्ठगण! देवताओंके प्रति मेरे चित्तमें अवज्ञा होती है और हे वीरगण! उन्हें अपने (मेरे) वधका यत्न करते देखकर तो मुझे हँसी आती है॥ ९॥

तथापि खलु दुष्टानां तेषामप्यधिकं मया।
अपकाराय दैत्येन्द्रा यतनीयं दुरात्मनाम्॥ १०॥
तथापि हे दैत्येन्द्रो! उन दुष्ट और दुरात्माओंके अपकारके लिये मुझे और भी अधिक प्रयत्न करना चाहिये॥ १०॥

तद्ये यशस्विनः केचित्पृथिव्यां ये च याजकाः।
कार्यो देवापकाराय तेषां सर्वात्मना वधः॥ ११॥
अतः पृथिवीमें जो कोई यशस्वी और यज्ञकर्ता हों उनका देवताओंके अपकारके लिये सर्वथा वध कर देना चाहिये॥ ११॥


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अ० ५ ] * पञ्चम अंश * ३२५


उत्पन्नश्चापि मे मृत्युर्भूतपूर्वस्स वै किल।
इत्येतद्दारिका प्राह देवकीगर्भसम्भवा ॥ १२
तस्माद्बालेषु च परो यत्नः कार्यो महीतले।
यत्रोद्रिक्तं बलं बाले स हन्तव्यः प्रयत्नतः ॥ १३
इत्याज्ञाप्यासुरान्कंसः प्रविश्याशु गृहं ततः।
मुमोच वसुदेवं च देवकीं च निरोधतः ॥ १४
कंस उवाच
युवयोषार्तिता गर्भा वृथैवैते मयाधुना।
कोऽप्यन्य एव नाशाय बालो मम समुद्गतः ॥ १५
तदलं परितापेन नूनं तद्भाविनो हि ते।
अर्भका युवयोर्दोषाच्चायुषो यद्वियोजिताः ॥ १६
श्रीपराशर उवाच
इत्याश्वास्य विमुक्त्वा च कंसस्तौ परिशंकितः।
अन्तर्गृहं द्विजश्रेष्ठ प्रविवेश ततः स्वकम् ॥ १७

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥


देवकीके गर्भसे उत्पन्न हुई बालिकाने यह भी कहा है कि, वह मेरा भूतपूर्व (प्रथम जन्मका) काल निश्चय ही उत्पन्न हो चुका है ॥ १२ ॥ अतः आजकल पृथिवीपर उत्पन्न हुए बालकोंके विषयमें विशेष सावधानी रखनी चाहिये और जिस बालकमें विशेष बलका उद्रेक हो उसे यत्नपूर्वक मार डालना चाहिये ॥ १३ ॥ असुरोंको इस प्रकार आज्ञा दे कंसने कारागृहमें जाकर तुरन्त ही वसुदेव और देवकीको बन्धनसे मुक्त कर दिया ॥ १४ ॥

कंस बोला— मैंने अबतक आप दोनोंके बालकोंकी तो वृथा ही हत्या की, मेरा नाश करनेके लिये तो कोई और ही बालक उत्पन्न हो गया है ॥ १५ ॥ परन्तु आपलोग इसका कुछ दुःख न मानें; क्योंकि उन बालकोंकी होनहार ऐसी ही थी। आपलोगोंके प्रारब्धदोषसे ही उन बालकोंको अपने जीवनसे हाथ धोना पड़ा है ॥ १६ ॥

श्रीपराशरजी बोले— हे द्विजश्रेष्ठ! उन्हें इस प्रकार ढाँढ़स बँधा और बन्धनसे मुक्तकर कंसने शंकित चित्तसे अपने अन्तःपुरमें प्रवेश किया ॥ १७ ॥


पाँचवाँ अध्याय

पूतना-वध

श्रीपराशर उवाच
विमुक्तो वसुदेवोऽपि नन्दस्य शकटं गतः।
प्रहृष्टं दृष्टवान्नन्दं पुत्रो जातो ममेति वै ॥ १
वसुदेवोऽपि तं प्राह दिष्ट्या दिष्ट्येति सादरम्।
वार्द्धकेऽपि समुत्पन्नस्तनयोऽयं तवाधुना ॥ २
दत्तो हि वार्षिकस्सर्वो भवद्भिर्नृपतेः करः।
यदर्थमागतास्तस्मान्नात्र स्थेयं महाधनैः ॥ ३
यदर्थमागताः कार्यं तन्निष्पन्नं किमास्यते।
भवद्भिर्गम्यतां नन्द तच्छीघ्रं निजगोकुलम् ॥ ४
ममापि बालकस्तत्र रोहिणीप्रभवो हि यः।
स रक्षणीयो भवता यथायं तनयो निजः ॥ ५
इत्युक्ताः प्रययुर्गोपा नन्दगोपपुरोगमाः।
शकटारोपितैर्भाण्डैः करं दत्त्वा महाबलाः ॥ ६


श्रीपराशरजी बोले— बन्दीगृहसे छूटते ही वसुदेवजी नन्दजीके छकड़ेके पास गये तो उन्हें इस समाचारसे अत्यन्त प्रसन्न देखा कि 'मेरे पुत्रका जन्म हुआ है' ॥ १ ॥ तब वसुदेवजीने भी उनसे आदरपूर्वक कहा—अब वृद्धावस्थामें भी आपने पुत्रका मुख देख लिया यह बड़े ही सौभाग्यकी बात है ॥ २ ॥ आपलोग जिसलिये यहाँ आये थे वह राजाका सारा वार्षिक कर दे ही चुके हैं। यहाँ धनवान् पुरुषोंको और अधिक न ठहरना चाहिये ॥ ३ ॥ आपलोग जिसलिये यहाँ आये थे वह कार्य पूरा हो चुका, अब और अधिक किसलिये ठहरे हुए हैं? [यहाँ देरतक ठहरना ठीक नहीं है] अतः हे नन्दजी! आपलोग शीघ्र ही अपने गोकुलको जाइये ॥ ४ ॥ वहाँपर रोहिणीसे उत्पन्न हुआ जो मेरा पुत्र है उसकी भी आप उसी तरह रक्षा कीजियेगा जैसे अपने इस बालककी ॥ ५ ॥

वसुदेवजीके ऐसा कहनेपर नन्द आदि महाबलवान् गोपगण छकड़ोंमें रखकर लाये हुए भाण्डोंसे कर चुकाकर चले गये ॥ ६ ॥

३२६* श्रीविष्णुपुराण *[अ० ५

वसतां गोकुले तेषां पूतना बालघातिनी।<br>सुप्तं कृष्णमुपादाय रात्रौ तस्मै स्तनं ददौ ॥ ७<br>यस्मै यस्मै स्तनं रात्रौ पूतना सम्प्रयच्छति।<br>तस्य तस्य क्षणेनाङ्गं बालकस्योपहन्यते ॥ ८<br>कृष्णास्तु तत्स्तनं गाढं कराभ्यामतिपीडितम्।<br>गृहीत्वा प्राणसहितं पपौ क्रोधसमन्वितः ॥ ९<br>सातिमुक्तमहारावा विच्छिन्नस्नायुबन्धना।<br>पपात पूतना भूमौ म्रियमाणातिभीषणा ॥ १०<br>तन्नादश्रुतिसन्त्रस्ताः प्रबुद्धास्ते व्रजौकसः।<br>ददृशुः पूतनोत्सङ्गे कृष्णं तां च निपातिताम् ॥ ११<br>आदाय कृष्णं सन्त्रस्ता यशोदापि द्विजोत्तम।<br>गोपुच्छभ्रामणेनाथ बालदोषमपाकरोत् ॥ १२<br>गोपुरीषमुपादाय नन्दगोपोऽपि मस्तके।<br>कृष्णस्य प्रददौ रक्षां कुर्वंश्चैतदुदीरयन् ॥ १३<br>नन्दगोप उवाच<br>रक्षतु त्वामशेषाणां भूतानां प्रभवो हरिः।<br>यस्य नाभिसमुद्भूतपङ्कजादभवज्जगत् ॥ १४<br>येन दंष्ट्राग्रविधृता धारयत्यवनिर्जगत्।<br>वराहरूपधृग्देवस्स त्वां रक्षतु केशवः ॥ १५<br>नखाङ्कुरविनिर्भिन्नवैरिवक्षस्थलो विभुः।<br>नृसिंहिरूपी सर्वत्र रक्षतु त्वां जनार्दनः ॥ १६<br>वामनो रक्षतु सदा भवन्तं यः क्षणादभूत्।<br>त्रिविक्रमः क्रमाक्रान्तत्रैलोक्यः स्फुरदायुधः ॥ १७<br>शिरस्ते पातु गोविन्दः कण्ठं रक्षतु केशवः।<br>गुह्यं च जठरं विष्णुर्जङ्घे पादौ जनार्दनः ॥ १८<br>मुखं बाहू प्रबाहू च मनः सर्वेन्द्रियाणि च।<br>रक्षत्वव्याहतैश्वर्यस्तव नारायणोऽव्ययः ॥ १९<br>शार्ङ्गचक्रगदापाणेश्शङ्खनादहताः क्षयम्।<br>गच्छन्तु प्रेतकूष्माण्डराक्षसा ये तवाहिताः ॥ २० | उनके गोकुलमें रहते समय बालघातिनी पूतना बालघातिनी पूतना ने रात्रिके समय सोये हुए कृष्णको गोदमें लेकर उनके मुखमें अपना स्तन दे दिया ॥ ७ ॥ रात्रिके समय पूतना जिस-जिस बालकके मुखमें अपना स्तन दे देती थी उसीका शरीर तत्काल नष्ट हो जाता था ॥ ८ ॥ कृष्णचन्द्रने क्रोधपूर्वक उसके स्तनको अपने हाथोंसे खूब दबाकर पकड़ लिया और उसे उसके प्राणोंके सहित पीने लगे ॥ ९ ॥ तब स्नायु-बन्धनोंके शिथिल हो जानेसे पूतना घोर शब्द करती हुई मरते समय महाभयंकर रूप धारणकर पृथिवीपर गिर पड़ी ॥ १० ॥ उसके घोर नादको सुनकर भयभीत हुए व्रजवासीगण जाग उठे और देखा कि कृष्ण पूतनाकी गोदमें हैं और वह मारी गयी है ॥ ११ ॥<br><br>हे द्विजोत्तम ! तब भयभीता यशोदाने कृष्णको गोदमें लेकर उन्हें गौकी पूँछसे झाड़कर बालकका ग्रह-दोष निवारण किया ॥ १२ ॥ नन्दगोपने भी आगेके वाक्य कहकर विधिपूर्वक रक्षा करते हुए कृष्णके मस्तकपर गोबरका चूर्ण लगाया ॥ १३ ॥<br><br>नन्दगोप बोले—जिनकी नाभिसे प्रकट हुए कमलसे सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ है वे सम्पूर्ण भूतोंके आदिस्थान श्रीहरि तेरी रक्षा करें ॥ १४ ॥ जिनकी दाढ़ोंके अग्रभागपर स्थापित होकर भूमि सम्पूर्ण जगत्‌को धारण करती है, वे वराह-रूप-धारी श्रीकेशव तेरी रक्षा करें ॥ १५ ॥ जिन विभुने अपने नखाग्रोंसे शत्रुके वक्षःस्थलको विदीर्ण कर दिया था, वे नृसिंहरूपी जनार्दन तेरी सर्वत्र रक्षा करें ॥ १६ ॥ जिन्होंने क्षणमात्रमें सशस्त्र त्रिविक्रमरूप धारण करके अपने तीन पगोंसे त्रिलोकीको नाप लिया था, वे वामनभगवान् तेरी सर्वदा रक्षा करें ॥ १७ ॥ गोविन्द तेरे सिरकी, केशव कण्ठकी, विष्णु गुह्यस्थान और जठरकी तथा जनार्दन जंघा और चरणोंकी रक्षा करें ॥ १८ ॥ तेरे मुख, बाहु, प्रबाहु,* मन और सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी अखण्ड-ऐश्वर्यसे सम्पन्न अविनाशी श्रीनारायण रक्षा करें ॥ १९ ॥ तेरे अनिष्ट करनेवाले जो प्रेत, कूष्माण्ड और राक्षस हों वे शार्ङ्ग धनुष, चक्र और गदा धारण करनेवाले विष्णुभगवान्‌की शंख-ध्वनिसे नष्ट हो जायें ॥ २० ॥ |

* घुटनेके नीचेका भाग।