बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
( १४४ ) २३. यदि स्वास्थ्य रेखा की कोई प्रशाखा शनि पर्वत की ओर जा रही हो तो वह व्यक्ति स्वास्थ्य से गंभीर मननशील तथा दीर्घायु होता है । २४. यदि स्वास्थ्य रेखा में चन्द्र रेखा आकर मिल रही हो तो वह व्यक्ति सफल कवि होता है तथा कई बार विदेश यात्राएं करता है । २५. यदि स्वास्थ्य रेखा से कोई प्रशाखा अर्द्धवृत्त सा बनाती हुई मंगल पर्वत की ओर जा रही हो तो वह व्यक्ति सफल भविष्यवक्ता होता है । २६. यदि मनुष्य की हथेली में स्वास्थ्य रेखा चलकर हृदय रेखा को काट रही हो तो उस व्यक्ति को मिर्गी का रोग होता है । २७. यदि लहरदार स्वास्थ्य रेखा भाग्य रेखा को स्पर्श कर लेती है तो उस व्यक्ति का भाग्य जीवन भर कमजोर बना रहता है । २८. यदि ऐसी रेखा मस्तिष्क रेखा को छूती हो तो उस व्यक्ति का दिमाग अत्यन्त कमजोर रहता है । २६. यदि लहरदार स्वास्थ्य रेखा सूर्य पर्वत को स्पर्श करती हो तो वह जीवन में कई बार बदनामी उठाता है । ३०. यदि स्वास्थ्य रेखा लहरदार हो तथा बुध पर्वत को पार करती हो तो उसे व्यापार में जबरदस्त हानि सहन करनी पड़ती है । ३१. यदि उंगलियां नोकीली हों और हथेली में स्वास्थ्य रेखा का अभाव हो तो वह व्यक्ति क्रियाशील होता है । ३२. यदि बुध पर्वत अत्यन्त विक्षिप्त हो और स्वास्थ्य रेखा का अभाव हो तो वह व्यक्ति खुश मिजाज होता है । ३३. यदि लहरदार बुध रेखा मुडकर शुक्र पर्वत की ओर जा रही हो तो उसे प्रेम के क्षेत्र में जबरदस्त धक्का लगता है । ३४. यदि स्वास्थ्य रेखा पर द्वीप का चिह्न हो तो उसे रक्त संबंधी बीमारियां होती हैं तथा उसके फेफड़े कमजोर होते हैं । ३५. यदि स्वास्थ्य रेखा के आस-पास कई छोटी छोटी रेखाएं हों तो उस व्यक्ति का स्वास्थ्य हमेशा कमजोर रहता है । ३६. यदि स्वास्थ्य रेखा जीवन रेखा से बढ़कर मस्तिष्क रेखा तथा हृदय रेखा को स्पर्श करती हुई आगे बढ़ती है तो उसे जीवन में कमजोरी रहती है । ३७. यदि जीवन रेखा के साथ यह रेखा जुड़ी हुई हो परन्तु इस रेखा पर नीले धब्बे हों तो उसे हृदय रोग की शिकायत बनी रहती है । ३८. यदि मस्तिष्क रेखा के अन्त में तथा स्वास्थ्य रेखा के अन्त में क्रॉस हो तो वह व्यक्ति सफल होता है ।
( १४५ ) ३६. यदि स्वास्थ्य रेखा कहीं पर चमकदार तथा कहीं पर फीकी हो अथवा टुकड़ों में बंटी हो तो उसका स्वास्थ्य जीवन भर कमजोर रहता है। ४०. यदि स्वास्थ्य रेखा कमजोर और अत्यन्त पतली हो तो उसके चेहरे पर सुस्ती बनी रहती है। ४१. यदि स्वास्थ्य रेखा और सूर्य रेखा का परस्पर सम्बन्ध बन गया हो तो उस व्यक्ति का मस्तिष्क अत्यन्त उर्वर होता है। ४२. यदि इस रेखा के अन्त में क्रॉस हो तथा मस्तिष्क रेखा पर भी क्रॉस का चिह्न हो तो व्यक्ति जीवन में अन्धा होता है। ४३. यदि स्वास्थ्य रेखा के मार्ग में कहीं पर तिरछी रेखा कटती हो तो आयु के उस भाग में जबरदस्त एक्सीडेंट (दुर्घटना) होता है। ४४. यदि रेखा पर तारे का चिह्न हो तो उसे जीवन में परिवार का सहयोग नहीं मिलता। ४५. यदि स्वास्थ्य रेखा के आस-पास क्रॉस का चिह्न हो तो उसके जीवन में कई बार दुर्घटनाएं घटित होती हैं। ४६. यदि राहू क्षेत्र पर गुजरते समय स्वास्थ्य रेखा पर द्वीप का चिह्न हो तो ऐसा व्यक्ति टी० बी० के रोग से पीड़ित रहता है। ४७. यदि मस्तिष्क रेखा पर द्वीप का चिह्न हो और उस द्वीप के ऊपर से होकर स्वास्थ्य रेखा गुजर रही हो तो व्यक्ति का स्वास्थ्य जीवन में अत्यन्त कमजोर रहेगा। ४८ यदि भाग्य रेखा कटी हुई हो तथा स्वास्थ्य रेखा पर द्वीप का चिह्न हो तो व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से पीड़ित रहता है। ४६. यदि स्वास्थ्य रेखा हथेली के अन्दर धंसी हुई सी हो तो उसे गुप्त रोग रहते हैं। ५०. स्वास्थ्य रेखा पर क्रॉस स्वास्थ्य की हानि की ओर ही संकेत करते हैं। ५१. यदि स्वास्थ्य रेखा पर नक्षत्र हों तो व्यक्ति को पारिवारिक सुख नहीं मिलता। ५२. यदि बुध रेखा तथा प्रणय रेखा आपस में मिली हुई हों तो उस व्यक्ति की पत्नी का स्वास्थ्य जीवन भर कमजोर रहता है । ५३. यदि दोनों हाथों में स्वास्थ्य रेखा स्पष्ट हो तो वह व्यक्ति कामुक और भोगी होता है। ५४. यदि स्वास्थ्य रेखा दुहरी हो तो व्यक्ति श्रेष्ठ भाग्य का स्वामी होता है। ५५. यदि दुहरी स्वास्थ्य रेखा सूर्य पर्वत को भी स्पर्श करती हो तो वह व्यक्ति राजनीति में अत्यन्त श्रेष्ठ पद प्राप्त करता है।
( १४६ ) ५६. यदि स्वास्थ्य रेखा तथा हृदय रेखा का मिलन बुध पर्वत के नीचे हो तो उस व्यक्ति की मृत्यु हार्ट-अटैक से होती है । ५७. यदि स्वास्थ्य रेखा के साथ में कोई सहायक रेखा भी चल रही हो तो उस व्यक्ति का स्वास्थ्य अत्यन्त श्रेष्ठ समझना चाहिए । ५८. यदि स्वास्थ्य रेखा ठीक हो परन्तु नाखूनों पर पीली धारियां हों तो उस व्यक्ति की असमयिक मृत्यु होती है। ५९. यदि स्वास्थ्य रेखा नीचे से पुष्ट परन्तु ऊपर चलते-चलते क्षीण होती जाती हो तो व्यक्ति की यौवनकाल में ही मृत्यु हो जाती है । ६०. यदि स्वास्थ्य रेखा मणिबन्ध से निकल रही हो पर टूटी हुई हो तो उस व्यक्ति की मृत्यु शीघ्र ही समझनी चाहिए । ६१. यदि स्वास्थ्य रेखा पर जाली का चिह्न हो तो व्यक्ति पूर्ण आयु नहीं भोगता । ६२. यदि जीवन रेखा तथा स्वास्थ्य रेखा का आपस में संबंध हो जाय और ऊपर तारे का चिह्न हो तो व्यक्ति की मृत्यु यात्रा में होती है । ६३. यदि जरूरत से ज्यादा लम्बे नाखून हों तो व्यक्ति को स्नायु संबंधी बीमारी होती है । ६४. यदि नाखूनों का रंग नीला हो तो व्यक्ति पक्षाघात से पीड़ित रहता है। यदि नाखून छोटे-छोटे हों और स्वास्थ्य रेखा कटी हुई हो तो व्यक्ति को मिर्गी का रोग होता है । ६५. यदि जीवन रेखा कमजोर हो तथा बुध रेखा लहरदार हो तो उसे गठिया की बीमारी होती है। ६६. उत्तम स्वास्थ्य रेखा ही व्यक्ति के लिये सभी दृष्टियों से सुखदायक कही जाती है। हस्तरेखा विशेषज्ञ को स्वास्थ्य रेखा का सावधानी के साथ अध्ययन करना चाहिए । इस रेखा से भविष्य में हम होने वाली बीमारियों तथा दुर्घटनाओं की जानकारी पहले से ही कर सकते हैं और इस प्रकार की चेतावनी देकर उसे सावधान कर सकते हैं। वस्तुतः स्वास्थ्य रेखा का महत्त्व हथेली में अन्यतम है इसमें कोई दो राय नहीं।
विवाह-रेखा हमारे शरीर में सबसे कोमल और विचित्र-सा जो अवयव है उसका नाम 'दिल' है। एक प्रकार से इसका शरीर में सबसे अधिक महत्व है । एक तरफ यह पूरे शरीर में खून पहुंचाने का कार्य करता है तो दूसरी तरफ यह अपने आप में इतना अधिक कोमल होता है कि कई भावनाओं को मन में संजोकर रखता है। कोमल विचार, विपरीत योनि के प्रति भावनाएं आदि कार्य इसी के माध्यम से सम्पन्न होते हैं। यह इतना अधिक कोमल होता है कि जरा-सी विपरीत बात से इसको ठेस पहुंच जाती है और टूट जाता है। मानवीय कल्पनाओं का यह एक सुन्दर प्रतीक है। करुणा, दया, ममता, स्नेह, और प्रेम आदि भावनाएं इसी के द्वारा संचालित होती हैं। एक हृदय चाहता है कि वह दूसरे हृदय से सम्पर्क स्थापित करे, आपस में दोनों का प्यार हो। दोनों हृदय एक मधुर कल्पना से ओत-प्रोत हों और जब दोनों हृदय एक सूत्र में बंध जाते हैं तब उसे समाज विवाह का नाम देता है। वस्तुतः मानव जीवन की पूर्णता तभी कही जाती है कि जब उसका अर्द्धाङ्ग भी सुन्दर हो, समझदार हो, प्रेम की भावना से भरा हुआ हो तथा दोनों के हृदय एक दूसरे से मिल जाने की क्षमता रखते हों। जिस व्यक्ति के घर में सुशील, सुन्दर, स्वस्थ और शिक्षित पत्नी होती है वह घर निश्चय ही इन्द्र भवन से ज्यादा सुखकर माना जाता है। इसलिए हस्तरेखा विशेषज्ञ को चाहिए कि वह जीवन रेखा को जितना महत्व दे लगभग उतना ही महत्व विवाह रेखा को भी दे, क्योंकि इस रेखा के अध्ययन से ही मानव जीवन की पूर्णता का ज्ञान हो सकता है। मानव जीवन की यात्रा अत्यन्त कंटकमय होती है। इस पथ को भली प्रकार से पार करने के लिये एक ऐसे सहयोगी की जरूरत होती है जो दुख में सहायक हो परेशानियों में हिम्मत बंधाने वाला हो तथा जीवन में कंधे से कंधा मिलाकर चलने की क्षमता रखता हो। हथेली में विवाह रेखा या वासना रेखा अथवा प्रणय रेखा दिखने में छोटी होती है पर इसका महत्व सबसे अधिक होता है। यह रेखा कनिष्ठिका उंगली के नीचे, हृदय रेखा के ऊपर, बुध पर्वत के बगल में हथेली के बाहर निकलते समय जो आड़ी रेखाएं दिखाई देती हैं वे रेखाएं ही विवाह रेखाएं कहलाती हैं। हथेली में ऐसी रेखाएं दो-तीन या चार हो सकती हैं पर उन सभी रेखाओं में एक रेखा मुख्य होती है। यदि ये रेखाएं हृदय रेखा से ऊपर हों तो वे विवाह रेखाएं
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कहलाती हैं और ऐसे व्यक्ति का विवाह निश्चय ही होता है। परन्तु ये रेखाएं हृदय रेखा से नीचे हों तो ऐसे व्यक्ति का विवाह जीवन में नहीं होता । यदि हथेली में दो या तीन विवाह रेखाएं हों तो जो रेखा सबसे अधिक लम्बी पुष्ट और स्वस्थ हो उसे विवाह रेखा मानना चाहिए। बाकी की रेखाएं इस बात की सूचक होती हैं कि या तो विवाह से पूर्व उतने संबंध होकर छूट जायेंगे अथवा विवाह के बाद उतने अन्य स्त्रियों से सम्पर्क रहेंगे। पर इसके साथ ही साथ जो छोटी-छोटी रेखाएं होती हैं वे रेखाएं प्रणय रेखाएं कहलाती हैं। ये जितनी रेखाएं होंगी व्यक्ति के जीवन में उतनी ही पर स्त्रियों का सम्पर्क रहेगा । यही बात स्त्रियों के हाथ में भी लागू होती है । पर केवल ये रेखाएं देखकर ही अपना मत स्थिर नहीं कर लेना चाहिए, पर्वतों का अध्ययन भी इसके साथ-साथ आवश्यक है । यदि इस प्रकार की रेखाएं हों और गुरु पर्वत ज्यादा पुष्ट हो तो निश्चय ही ऐसा व्यक्ति प्रेम संबंध स्थापित करता है पर उसका प्रेम सात्विक और निर्दोष होता है। यदि शनि पर्वत विशेष उभरा हुआ हो और ऐसी रेखाएं हों तो व्यक्ति अपनी आयु से बड़ी आयु की स्त्रियों से प्रेम संबंध स्थापित करता है। यदि हथेली में सूर्य पर्वत पुष्ट हो और ऐसी रेखाएं हों तो व्यक्ति बहुत अधिक सोच विचार कर अन्य स्त्रियों से प्रेम सम्पर्क स्थापित करता है । यदि बुध पर्वत विकसित हो तथा प्रणय रेखाएं हाथ में दिखाई दें तो ऐसे व्यक्ति को भी प्रेमिकाओं से धन लाभ होता है। यदि हथेली में प्रणय रेखाएं हों और चन्द्र पर्वत विकसित हो तो व्यक्ति काम लोलुप तथा सुन्दर स्त्रियों के पीछे फिरने वाला होता है। यदि शुक्र पर्वत बहुत अधिक विकसित हो तथा प्रणय रेखाएं हों तो वह अपने जीवन में कई स्त्रियों से सम्बन्ध स्थापित करता है तथा उसमें पूर्ण सफलता प्राप्त करता है । प्रणय रेखा का हृदय रेखा से गहरा सम्बन्ध होता है । ये प्रणय रेखाएं हृदय रेखा से जितनी अधिक नजदीक होंगी व्यक्ति उतनी ही कम उम्र में प्रेम सम्बन्ध स्थापित करेगा । और ये प्रणय रेखाएं हृदय रेखा से जितनी अधिक दूर होंगी जीवन में प्रेम सम्बन्ध उतना ही अधिक विलम्ब से होगा । यदि हथेली में प्रणय रेखा न हो तो व्यक्ति अपने जीवन में संयमित रहते हैं तथा वे काम लोलुप नहीं होते । यदि प्रणय रेखा गहरी तथा स्पष्ट हो तो उस व्यक्ति के प्रणय संबंध भी गहरे बनेंगे । परन्तु यदि ये प्रणय रेखाएं छोटी तथा कमजोर हों तो उस व्यक्ति के प्रणय संबंध भी बहुत कम समय तक चल सकेंगे । यदि दो प्रणय रेखाएं साथ-साथ आगे बढ़ रही हों तो उसके जीवन में एक साथ दो स्त्रियों से प्रेम सम्बन्ध चलेंगे ऐसा समझना चाहिए । यदि प्रणय रेखा पर क्रॉस
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का चिह्न हो तो व्यक्ति का प्रेम बीच में ही टूट जाता है। यदि प्रणय रेखा पर द्वीप का चिह्न दिखाई दे तो उसे प्रेम के क्षेत्र में बदनामी सहन करनी पड़ती है। यदि प्रणय रेखा सूर्य पर्वत की ओर जा रही हो तो उस व्यक्ति का प्रेम संबंध ऊंचे घरानों से रहेगा। यदि प्रणय रेखा आगे जाकर दो भागों में बंट जाती हो तो उस व्यक्ति के प्रेम संबंध जल्दी ही समाप्त हो जाते हैं। यदि प्रणय रेखा से कोई सहायक रेखा हथेली में नीचे की ओर जा रही हो तो वह इस क्षेत्र में बदनामी सहन करता है। यदि प्रणय रेखा से कोई सहायक रेखा हथेली में ऊपर की ओर बढ़ रही हो तो उसका प्रणय संबंध टिकाऊ रहता है तथा जीवन भर आनन्द उपभोग करता है। यदि प्रणय रेखा बीच में ही टूटी हुई हो तो उससे प्रेम संबंध बीच में ही टूट जायेंगे। अब मैं विवाह रेखा से संबंधित कुछ तथ्य पाठकों के सामने स्पष्ट कर रहा हूं। १. यदि विवाह रेखा स्पष्ट, निर्दोष तथा लालिमा लिये हुए हो तो उस व्यक्ति का वैवाहिक जीवन अत्यन्त सुखमय होता है। २. यदि दोनों हाथों में विवाह रेखाएं पुष्ट हों तो व्यक्ति दाम्पत्य जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त करता है। ३. यदि विवाह रेखा कनिष्ठिका उंगली के दूसरे पोर तक चढ़ जाय तो वह व्यक्ति आजीवन अविवाहित रहता है। ४. यदि विवाह रेखा नीचे की ओर झुककर हृदय रेखा को स्पर्श करने लगे तो उसकी पत्नी की मृत्यु समझनी चाहिए। ५. यदि विवाह रेखा टूटी हुई हो तो जीवन के मध्यकाल में या तो पत्नी की मृत्यु हो जायगी अथवा तलाक हो जायगा ऐसा समझना चाहिए। ६. यदि शुक्र पर्वत से कोई रेखा निकलकर विवाह रेखा से सम्पर्क स्थापित करती है तो उसका वैवाहिक जीवन अत्यन्त दुखमय होता है। ७. यदि विवाह रेखा आगे चलकर दो मुंह वाली बन जाती है तो इस प्रकार के व्यक्ति का दाम्पत्य जीवन सुखमय नहीं कहा जा सकता तथा उसका वैवाहिक जीवन कलहपूर्ण बना रहता है। ८. यदि विवाह रेखा से कोई पतली रेखा निकल कर हृदय रेखा की ओर जा रही हो तो उसकी पत्नी से जीवन भर बनी रहती है। ६. यदि विवाह रेखा चौड़ी हो तो विवाह के प्रति उसके मन में कोई उत्साह नहीं रहता। १०. यदि विवाह रेखा आगे जाकर दो भागो में बंट जाती हो और उसकी एक शाखा हृदय रेखा को छू रही हो तो वह व्यक्ति पत्नी के अलावा अपनी साली से भी वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करेगा।
( १५० ) ११. यदि विवाह रेखा आगे जाकर कई भागों में बंट जाय तो उसका वैवाहिक जीवन अत्यन्त दुखमय होता है । १२. यदि विवाह रेखा मस्तिष्क रेखा को छू ले तो वह व्यक्ति अपनी पत्नी की हत्या करता है । यदि बुध पर्वत पर विवाह रेखा कई भागों में बंट जाय तो बार बार सगाई टूटने का योग बनता है । १३. यदि विवाह रेखा सूर्य रेखा को स्पर्श कर नीचे की ओर बढ़ती हो तो ऐसा विवाह अनमेल विवाह कहलाता है । १४. यदि विवाह रेखा की एक शाखा नीचे झुककर शुक्र पर्वत तक पहुंच जाय तो उसकी पत्नी व्यभिचारिणी होती है । १५. यदि विवाह रेखा पर काला धब्बा हो तो उसे अपनी पत्नी का सुख नहीं मिलता । १६. यदि विवाह रेखा आगे चलकर आयु रेखा को काटती हो तो उसका वैवाहिक जीवन कला पूर्ण रहता है । १७. यदि विवाह रेखा, भाग्य रेखा तथा मस्तिष्क रेखा परस्पर मिलती हो तो उसका वैवाहिक जीवन अत्यन्त दुखदायी समझना चाहिए । १८. यदि विवाह रेखा को कोई आड़ी रेखा काटती हो तो व्यक्ति का वैवाहिक जीवन बाधाकारक होता है । १६. यदि कोई अन्य रेखा विवाह रेखा में आकर या विवाह रेखा स्थल पर आकर मिल रही हो तो प्रेमिका के कारण उसका गृहस्थ जीवन नष्ट हो जाता है । २०. यदि विवाह रेखा के प्रारंभ में द्वीप का चिह्न हो तो काफी बाधाओं के बाद उसका विवाह होता है । २१. यदि विवाह रेखा जहां से झुक रही हो उस जगह क्रॉस का चिह्न हो तो उसकी पत्नी की मृत्यु अकस्मात होती है । २२. यदि विवाह रेखा को सन्तान रेखा काटती हो तो उसका विवाह अत्यन्त कठिनाई के बाद होता है । २३. यदि विवाह रेखा पर एक से अधिक द्वीप हों तो व्यक्ति जीवन भर कुआंरा रहता है । २४. यदि बुध क्षेत्र के आस-पास विवाह रेखा के साथ-साथ दो तीन रेखाएं चल रही हों तो जीवन में पत्नी के अलावा उसके संबंध दो-तीन स्त्रियों से रहते हैं । २५. यदि विवाह रेखा बढ़कर कनिष्ठिका की ओर झुक जाय तो उसके जीवन साथी की मृत्यु उसके पूर्व होती है । २६. विवाह रेखा का अचानक टूट जाना गृहस्थ जीवन में बाधा स्वरूप समझना चाहिए ।
( १५१ ) २७. यदि बुध क्षेत्र पर दो समानान्तर रेखाएं हों तो उसके दो विवाह होते हैं ऐसा समझना चाहिए । २८. यदि विवाह रेखा आगे चलकर सूर्य रेखा से मिलती हो तो उसकी पत्नी उच्च पद पर नौकरी करने वाली होती है । २९. दो हृदय रेखाएं हों तो व्यक्ति का विवाह अत्यन्त कठिनाई से होता है । ३०. यदि चन्द्र पर्वत से रेखा आकर विवाह रेखा से मिले तो ऐसा व्यक्ति भोगी कामुक तथा गुप्त प्रेम रखने वाला होता है । ३१. यदि मंगल रेखा से कोई रेखा आकर विवाह रेखा से मिले तो उसके विवाह में बराबर बाधाएं बनी रहती हैं । ३२. विवाह रेखा पर जो खड़ी लकीरें होती हैं वे सन्तान रेखाएं कहलाती हैं । ३३. सन्तान रेखाएं अत्यन्त महीन होती हैं जिन्हें नंगी आंखों से देखा जाना सम्भव नहीं होता । ३४. इन सन्तान रेखाओं में जो लम्बी और पुष्ट होती हैं वे पुत्र रेखाएं होती हैं तथा जो महीन और कमजोर होती हैं उन्हें कन्या रेखा समझना चाहिए । ३५. यदि इनमें से कोई रेखा टूटी हुई हो तो उस बालक की मृत्यु समझनी चाहिए । ३६. यदि मणिबन्ध कमजोर हो तथा शुक्र पर्वत अविकसित हो तो ऐसे व्यक्ति को जीवन में सन्तान सुख नहीं रहता । ३७. यदि स्पष्ट और सीधी रेखाएं होती हैं तो सन्तान स्वस्थ होती है परन्तु यदि कमजोर रेखाएं होती हैं तो सन्तान भी कमजोर समझनी चाहिए । ३८. विवाह रेखा को ६० वर्ष का समझ कर इस रेखा पर जहां पर भी गहरा पन दिखाई दे आयु के उस भाग में विवाह समझना चाहिए । वस्तुतः विवाह रेखा का अपने आप में महत्व है । और इस रेखा का अध्ययन पूर्णतः सावधानी के साथ किया जाना चाहिए ।
गौण रेखाएं हथेली में कई रेखाएं ऐसी होती हैं जिन्हें हम मुख्य रेखाएं तो नहीं कहते, परन्तु उनका महत्व किसी भी प्रकार से कम नहीं कहा जा सकता । इन रेखाओं का अध्ययन भी अपने आप में अत्यन्त जरूरी है । ये रेखाएं स्वतंत्र रूप से या किसी रेखा की सहायक बनकर अपना निश्चित प्रभाव मानव जीवन पर डालती हैं। आगे के पृष्ठों में मैं इन रेखाओं का संक्षेप में परिचय स्पष्ट कर रहा हूं : १. मंगल रेखा :—ये रेखाएं हथेली में निम्न मंगल क्षेत्र से या जीवन रेखा के प्रारंभिक भाग से निकलती हैं और शुक्रपर्वत की ओर बढ़ती हैं । ऐसी रेखाएं एक या एक से अधिक हो सकती हैं । ये सभी रेखाएं पतली, मोटी, गहरी या कमजोर हो सकती हैं। परन्तु यह स्पष्ट है कि इन रेखाओं का उद्गम मंगल पर्वत ही होता है । इसीलिये इन्हें मंगल रेखाएं कहा जाता है । इनमें दो भेद हैं। एक तो ऐसी रेखाएं जीवन रेखा के साथ-साथ आगे बढ़ती हैं अतः उन्हें जीवन रेखा की सहायक रेखा भी कह सकते हैं। कई बार ऐसी रेखा जीवन रेखा की समाप्ति तक उसके साथ-साथ चलती है । जिनके हाथ में ऐसी रेखा होती है वे व्यक्ति अत्यन्त [चित्र: मंगल रेखा] प्रतिभाशाली एवं तीव्र बुद्धि के होते हैं । सोचने और समझने की शक्ति इनमें विशेष रूप से होती है । जीवन में ये जो निर्णय एक बार कर लेते हैं उसे अन्त तक निभाने की सामर्थ्य रखते हैं । ऐसे व्यक्ति पूर्णतः विश्वासपात्र कहे जाते हैं । इस प्रकार के व्यक्ति जीवन में कोई एक उद्देश्य लेकर आगे बढ़ते हैं और जब तक उस उद्देश्य या लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो जाती तब तक ये विश्राम नहीं लेते । शारीरिक दृष्टि से ये हृष्टपुष्ट होते हैं तथा इनका व्यक्तित्व अपने आप में अत्यन्त प्रभावशाली होता है । क्रोध इनके जीवन में बहुत ही कम रहता है । दूसरे प्रकार की मंगल रेखाएं वे होती हैं जो जीवन रेखा का साथ छोड़कर सीधे ही शुक्र पर्वत पर पहुंच जाती हैं। ऐसे व्यक्ति जीवन में लापरवाह होते हैं। उनका स्वभाव चिड़चिड़ा होता है। आवेश में ये व्यक्ति सब कुछ करने के लिये तैयार होते हैं। इनका साथ अत्यन्त निम्न स्तर के व्यक्तियों से होता है ।
( १५५ ) यदि मंगल रेखा से कुछ रेखाएं निकल कर ऊपर की ओर बढ़ रही हों तो उनके जीवन में बहुत अधिक इच्छाएं होती हैं और इन इच्छाओं को पूरा करने का वे भगीरथ प्रयत्न करते हैं। यदि ऐसी रेखाएं भाग्य रेखा से मिल जाती हैं तो व्यक्ति का शीघ्र ही भाग्योदय होता है। हृदय रेखा से मिलने पर व्यक्ति जरूरत से ज्यादा भावुक तथा सहृदय बन जाता है। यदि इस प्रकार की मंगल रेखाएं आगे चलकर भाग्य रेखा अथवा सूर्य रेखा को काटती हैं तो उसके जीवन में जरूरत से ज्यादा बाधाएं एवं परेशानियां रहती हैं यदि इन रेखाओं का सम्पर्क भाग्य रेखा से हो जाता है तो वह भाग्यहीन व्यक्ति कहलाता है। तथा यदि ये मंगल रेखाएं विवाह रेखा को छू लेती हैं तो उनका गृहस्थ जीवन बर्बाद हो जाता है। यदि मंगल रेखा प्रबल पुष्ट हथेली में धंसी हुई तथा दोहरी हो तो ऐसा व्यक्ति निश्चय ही हत्यारा अथवा डाकू होता है। परन्तु यदि यह रेखा दोहरी नहीं होती तो ऐसा व्यक्ति मिलिट्री में ऊंचे पद पर पहुंचने में सक्षम होता है। २. गुरुवलय : तर्जनी उंगली को घेरने वाली अर्थात् जो रेखा अर्द्धवृत्ताकार बनती हुई गुरु पर्वत को घेरती है जिसका एक सिरा हथेली के बाहर की ओर तथा दूसरा सिरा तर्जनी और मध्यमा के बीच में जाता है तो ऐसे वलय को गुरु वलय कहते हैं। ऐसी रेखा बहुत ही कम हाथों में देखने को मिलती है। जिस व्यक्ति के हाथ में ऐसी रेखा होती है वे व्यक्ति जीवन में गम्भीर तथा सहृदय होते हैं। उनकी इच्छाएं जरूरत से ज्यादा बढ़ी-चढ़ी होती हैं विद्या के क्षेत्र में अत्यन्त सफलता प्राप्त करते हैं। परन्तु इन लोगों में यह कमी होती है कि ये अपने चारों ओर धन पूर्ण वातावरण बनाये रखते हैं तथा व्यर्थ गुरुवलय की शान-शौकत का प्रदर्शन करते रहते हैं। ये जीवन में कम मेहनत से ज्यादा लाभ उठाने की कोशिश में रहते हैं। परन्तु उनके प्रयत्न ज्यादा सफल नहीं होते जिसकी वजह से आगे चलकर इनके जीवन में निराशा आ जाती है।
( १५४ ) ३. शनिवलय : जब कोई अंगूठी के समान रेखा शनि के पर्वत को घेरती है और जिसका एक सिरा तर्जनी और मध्यमा के बीच में तथा दूसरा सिरा मध्यमा और अनामिका के बीच में जाता हो तो उसे शनि वलय या शनि मुद्रा कहते हैं। सामाजिक दृष्टि से ऐसा वलय शुभ नहीं कहा जा सकता, क्योकि जिस व्यक्ति के हाथ में ऐसी मुद्रा होती है, वह व्यक्ति बीतरागी सन्यासी या एकान्त प्रिय होता है। ऐसा व्यक्ति इस संसार का मोह तथा सुख को छोड़कर परलोक को सुधारने की कोशिश में रहता है। ऐसे व्यक्ति तंत्र साधना तथा मंत्र साधना के क्षेत्र में विशेष सफलता प्राप्त करते देखे गये हैं। यदि शनि वलय की कोई रेखा भाग्य रेखा को स्पर्श नहीं करती तो वह व्यक्ति अपने उद्देश्यों में सफलता प्राप्त कर लेता है। परन्तु यदि शनि वलय की कोई रेखा भाग्य रेखा को स्पर्श करती हो तो वह व्यक्ति जीवन में कई बार गृहस्थ बनता है, और कई बार पुनः घर बार छोड़कर सन्यासी बन जाता है। ऐसा व्यक्ति अपने किसी भी उद्देश्य में सफलता प्राप्त नहीं करता। ऐसे व्यक्ति के सभी कार्य अधूरे तथा अव्यवस्थित होते हैं। तथा एक प्रकार से इन्द्रियों के दास होते हैं। कई बार ऐसे व्यक्ति अपनी ही कुण्ठाओं के कारण आत्म-हत्या कर डालते हैं। जिनके हाथों में इस प्रकार का वलय होता है वे निराशा प्रधान व्यक्ति होते हैं। उनको जीवन में किसी प्रकार का कोई आनन्द नही मिलता । वे व्यक्ति चिन्तनशील एकान्तप्रिय तथा वीतरागी होते हैं। ४. रविवलय : यदि कोई रेखा मध्यमा और अनामिका के बीच में से निकलकर सूर्य पर्वत को घेरती हुई अनामिका और कनिष्ठिका के बीच में जाकर समाप्त होती हो तो ऐसी रेखा को रविवलय या रवि मुद्रा कहते हैं। जिस व्यक्ति के हाथ में रवि मुद्रा होती है वह जीवन में बहुत ही सामान्य स्तर का व्यक्ति होता है उसे अपने जीवन में बार-बार असफलता का सामना करना पड़ता है। जरूरत से ज्यादा परिश्रम करने पर भी उसे किसी प्रकार का कोई यश नहीं मिलता अपितु यह देखा गया है कि जिनकी भी वह भलाई करता है या जिनको भी वह सहयोग देता है उसी की तरफ से उसको अपयश मिलता है। ऐसा वलय होने पर रवि पर्वत से संबंधित सभी फल विपरीतता में बदल जाते हैं।
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ऐसा व्यक्ति समझदार तथा सच्चरित्र होने पर भी उसको अपयश का सामना करना पड़ता है, और सामाजिक जीवन में उसे कलंकित होना पड़ता है। ऐसे व्यक्ति अपने जीवन से निराश ही रहते हैं। ५. शुक्रवलय : यदि कोई रेखा तर्जनी और मध्यमा से निकलकर शनि और सूर्य के पर्वतों को घेरती हुई अनामिका और कनिष्ठिका अंगुली के बीच में समाप्त होती हो तो ऐसी मुद्रा शुक्र मुद्रा या शुक्र वलय कहलाती है। जिनके हाथों में यह वलय होता है उन्हें जीवन में कमजोर और परेशान ही देखा है। जिनके हाथों में ऐसी मुद्रा होती है, वे स्नायु संबंधी रोगों से पीड़ित तथा अधिक से अधिक भौतिकवादी होते हैं। इनको जीवन में बराबर मानसिक चिन्ताएं बनी रहती हैं, और इनको जीवन में सुख या शान्ति नहीं मिल पाती। यदि यह मुद्रा जरूरत से ज्यादा चौड़ी हो तो ऐसा व्यक्ति अपने पूर्वजों का संचित धन समाप्त कर डालता है। ऐसा व्यक्ति प्रेम में उतावली करने वाला तथा पर-स्त्री-गामी होता है। जीवन में इसको कई बार बदनामियों का सामना करना पड़ता है। यदि शुक्र वलय की रेखा पतली और स्पष्ट हो तो ऐसा व्यक्ति समझदार एवं परिस्थितियों के अनुसार अपने आपको ढालने वाला होता है। ये व्यक्ति बातचीत में माहिर होते हैं और बातचीत के माध्यम से सामने वाले व्यक्ति को प्रभावित कर लेते हैं। यदि किसी के हाथ में एक से अधिक शुक्र वलय हों तो वह कई स्त्रियों से शारीरिक संबंध रखने वाला होता है। इसी प्रकार यदि किसी स्त्री के हाथ में ऐसा वलय हो तो वह कई पुरुषों से सम्पर्क रखती है। यदि शुक्र मुद्रा मार्ग में टूटी हुई हो तो वह अपने जीवन में निम्न जाति की स्त्रियों से यौवन संबंध रखता है। परन्तु साथ ही साथ ऐसा व्यक्ति जीवन में अपने दुष्कर्मों के कारण पछताता भी है। यदि शुक्र मुद्रा से कोई रेखा निकलकर विवाह रेखा को काटती हो तो उसे जीवन में वैवाहिक सुख नहीं के बराबर मिलता है। कई बार ऐसे व्यक्तियों का विवाह होता ही नहीं। यदि शुक्र मुद्रा की रेखा आगे बढ़कर भाग्य रेखा को काटती हो तो वह व्यक्ति दुर्भाग्यशाली होता है, तथा उसे जीवन में किसी प्रकार का कोई सुख प्राप्त नहीं होता।
( १५६ ) जिनके हाथों में चन्द्र पर्वत स्पष्ट हो और शुक्र वलय स्पष्ट गहरा तथा निर्दोष हो तो वह व्यक्ति यौवन संबंधी साहित्य का लेखक होता है। यदि शुक्र वलय पर द्वीप के चिह्न हों तो वह व्यक्ति प्रेमिका के षड्यन्त्र के फलस्वरूप मारा जाता है । यदि लम्बा अंगूठा हो तथा शुक्र वलय हो तो ऐसे व्यक्ति कवि होते हैं । परन्तु वे अपने जीवन में बहुत अधिक ऊंचे नहीं उठ पाते । शुक्र वलय रखने वाले व्यक्ति रहस्यपूर्ण होते हैं। ऐसे व्यक्ति साहित्य के प्रति प्रेम रखने वाले तथा रचनात्मक कार्य करने वाले होते हैं। यदि सूर्य रेखा बढ़कर शुक्र वलय को काटती हो तो वह व्यक्ति लम्पट होता है। यदि शुक्र वलय का एक सिरा बुध पर्वत पर जाता हो तो वह व्यापार के माध्यम से सफलता प्राप्त करता है। यदि शुक्र वलय कई छोटी-छोटी रेखाओं से कटता हो तो ऐसा व्यक्ति कामुक होता है । शुक्र वलय का सावधानी पूर्वक अध्ययन करना हस्तरेखा विशेषज्ञ के लिए बहुत अधिक जरूरी है। ६. चन्द्र रेखा : व्यक्ति के हाथ में इस रेखा को सबसे अधिक महत्त्व दिया जाता है। इसे अन्तः प्रेरणा रेखा भी कहते हैं। यह रेखा मणि- बन्ध या चन्द्र पर्वत से प्रारंभ होकर धनुष का आकार धारण करती हुई बुध क्षेत्र तक पहुंचती है । जिनके हाथों में यह रेखा होती है वे व्यक्ति साधारण घराने में जन्म लेकर भी बहुत अधिक ऊंचे पद पर पहुंचते हैं । कई बार ऐसे व्यक्ति राष्ट्रपति या सेनाध्यक्ष बनते हैं। ऐसे व्यक्ति राष्ट्र से संबंधित महत्त्वपूर्ण पद को सुशोभित करते हैं । ऐसे व्यक्तियों के लिए जल-यात्रा घातक होती है । कई बार तैरते समय इनको मृत्यु सम कष्ट उठाना पड़ता है। इनका स्वभाव सरल मधुर तथा गम्भीर होता है। इनका व्यक्तित्व अत्यन्त सम्मोहक होता है तथा शत्रुओं को भी अपने वश में करने की क्षमता इनमें होती है। ये व्यक्ति दूसरों की सहायता करने वाले होते हैं, और यदि जीवन में कोई इनके साथ भलाई का व्यवहार करता है, तो ये उसका उपकार जीवन-भर नहीं भूलते । ऐसे व्यक्ति समय पड़ने पर समाज को तथा देश को सही निर्देश देने में सक्षम होते हैं ।
( १५७ ) ७. प्रभावक रेखाएं : जिनके हाथ में प्रभावक रेखाएं होती हैं वे व्यक्ति को ऊंचा उठाने में बहुत अधिक सहायक होती हैं। ये रेखाएं कहीं से भी निकल कर शुक्र, सूर्य, गुरु, बुध या शनि पर्वतों को स्पर्श करती हैं। जो रेखाएं बलवान होती हैं वे आगे की ओर बढ़कर बुध, सूर्य, शनि तथा गुरु पर्वत को स्पर्श कर लेती हैं। परन्तु कमजोर रेखाएं बीच में ही रह जाती हैं। ऐसी रेखाएं यद्यपि व्यक्ति को आगे बढ़ाने में सहायक होती हैं। परन्तु यदि ये रेखाएं भाग्य रेखा को काटें तो वह व्यक्ति भाग्यहीन होता है। इसी प्रकार कोई प्रभावक रेखा स्वास्थ्य रेखा को काटती है तो उस व्यक्ति का स्वास्थ्य अत्यन्त प्रभावक रेखाए कमजोर होता है। यदि कोई प्रभावक रेखा मस्तिष्क रेखा को काटे तो वह व्यक्ति अपने जीवन में अवश्य ही पागल होता है। परन्तु यदि कोई प्रभावक रेखा भाग्य रेखा से जाकर मिल जाती हो तो उस व्यक्ति का प्रबल भाग्योदय होता है। ऐसे व्यक्ति को आकस्मिक रूप से धन-लाभ होता है तथा अपने व्यक्तित्व के माध्यम से भी वे जीवन में सफलता प्राप्त करते हैं। यदि कुछ प्रभावक रेखाएं चन्द्र क्षेत्र से उठती हों तो ऐसा व्यक्ति कवि, भावुक, चित्रकार, या सौंदर्य प्रेमी होता है। ऐसे व्यक्ति का व्यक्तित्व अत्यन्त सम्मोहक होता है तथा जीवन में प्रसिद्धि प्राप्त करता है। यदि शुक्र पर्वत से कुछ प्रभावक रेखाएं उठ रही हों तो ऐसा व्यक्ति धूर्त, चालाक तथा पर-स्त्री-गामी होता है। मंगल रेखा से उठने वाली प्रभावक रेखा व्यक्ति को साहसी बना देती है। ८. विद्या रेखा : यह रेखा मध्यमा और अनामिका के बीच में से निकलती है और रवि क्षेत्र की ओर झुकती हुई आगे बढ़ती है। जिन व्यक्तियों के हाथ में यह रेखा होती है वे व्यक्ति शिक्षा के क्षेत्र में पूर्ण सफलता प्राप्त करते हैं। कई बार ऐसा भी अनुभव हुआ है कि जिन व्यक्तियों के हाथों में यह रेखा पाई जाती है वे उच्च शिक्षा प्राप्त न करने पर भी अत्यन्त बुद्धिमान एवं ज्ञानवान होते हैं। सभ्य समाज में उनका आदर होता है तथा अपनी बुद्धि के बल से ये पूर्ण सफलता प्राप्त करने में सक्षम होते हैं। विद्या रेखा
( १५८ ) ६. विज्ञान रेखाएं : जिस प्रकार बुध पर्वत के बगल में सन्तान रेखाएं होती हैं वहीं पर विज्ञान रेखाएं भी होती हैं। यदि बुध पर्वत पर पांच खड़ी रेखाएं हों तो वे विज्ञान रेखाएं कहलाती हैं। जिन व्यक्तियों के हाथों में ये रेखाएं होती हैं वे या तो स्वयं प्रसिद्ध वैज्ञानिक होते हैं अथवा विज्ञान से सम्बन्धित पुस्तकों के लेखन के माध्यम से वे धन, यश तथा सम्मान प्राप्त करते हैं। ऐसे व्यक्ति तुरन्त निर्णय लेने वाले चतुर तथा परिश्रमी होते हैं। [चित्र-शीर्षक: विज्ञान-रेखाएं] १०. यात्रा रेखाएं : यात्रा रेखाएं वे कहलाती हैं जो व्यक्ति को यात्रा करने के लिए बाध्य कर देती हैं तथा यात्रा के माध्यम से सफलता प्राप्त करते हैं। यदि कोई रेखा मंगल क्षेत्र से निकल कर जीवन रेखा पर मिलती हो और मध्यमा उंगली के नाखून पर सफेद अर्द्ध- चन्द्र हो तो वह व्यक्ति जीवन में कई बार यात्राएं करता है। यदि मध्यमा उंगली के नाखून पर अर्द्धचन्द्र हो और वह लगभग तीन महीने तक रहे साथ ही इन्द्र क्षेत्र से निकल कर कोई रेखा सूर्य पर्वत पर पहुंचती है तो वह व्यक्ति निश्चय ही वायुयान से विदेश यात्रा करता है। [चित्र-शीर्षक: यात्रा रेखाएं] यदि शुक्र पर्वत से कोई रेखा धनुष के समान चन्द्र पर्वत पर पहुंचती हो तथा मध्यमा उंगली पर सफेद अर्द्धचन्द्र हो तो पानी के जहाज से वह व्यक्ति विदेश यात्रा करता है। यदि चन्द्र क्षेत्र पर बराबर लम्बी दो रेखाएं ऊपर की ओर उठ रही हों तो वह व्यक्ति निश्चय ही यात्रा करता है। यदि शुक्र क्षेत्र से तथा प्रजापति क्षेत्र से भी दो समानान्तर रेखाएं ऊपर की ओर बढ़ती हों तो निश्चय ही वह व्यक्ति यात्रा करता है ।
( १५६ ) ११. भ्रातृ-भगिनी रेखाएं : ये रेखाएं शुक्र पर्वत से निकलती हैं तथा मंगल क्षेत्र की ओर जाती हुई दिखाई देती हैं। ये संख्या में जितनी रेखाएं होंगी उसके उतने ही भाई बहिन होंगे। ये रेखाएं जितनी ही अधिक गहरी, स्पष्ट और निर्दोष होती हैं उस व्यक्ति के भाई बहिन उतने ही स्वास्थ्य की दृष्टि से अनुकूल होते हैं। यदि ये रेखाएं कमजोर या टूटी हुई हों तो उसके भाई बहिनों का स्वास्थ्य भी कमजोर समझा जाना चाहिए । इन रेखाओं में जो रेखाएं गहरी और चौड़ी होती हैं वे भाई की सूचक होती हैं तथा पतली रेखाएं बहिन की संख्या बताती हैं । इन रेखाओं में से जो रेखा मार्ग में टूटी हुई हों या भ्रातृ-भगिनी रेखाएं छिन्न-भिन्न हो उस भाई या बहन की मृत्यु उसके जीवन काल में समझना चाहिए । यदि किसी के हाथ में ये रेखाएं न हों तो उस व्यक्ति के कोई भाई या बहिन नही होता । १२. मित्र रेखाएं : उंगली के पोरुओं पर कुछ खड़ी रेखाएं दिखाई देती हैं ये रेखाएं मित्रों की सूचक होती हैं। यदि पोरुओं पर खड़ी रेखाएं न हों तो समझना चाहिए कि यह व्यक्ति एकान्त-प्रिय है तथा इसके जीवन में मित्रों का सहयोग नहीं के बराबर है । ये रेखाएं जितनी अधिक गहरी स्पष्ट और निर्दोष होती हैं उसके मित्र उतने ही अधिक विश्वासपात्र तथा समय पड़ने पर काम आने वाले होते हैं । इसके विपरीत यदि ये रेखाएं कमजोर हों तो ऐसे व्यक्ति के जीवन में मित्रों का सहयोग नहीं होता या मित्र उसे जीवन में धोखा देते हैं । उंगलियों के पोरुओं पर आड़ी रेखाएं शत्रुओं की सूचक मित्र रेखाएं होती हैं। यदि ये रेखाएं गहरी और स्पष्ट हों तो उसके शत्रु भी मजबूत होंगे । इसके विपरीत यदि ये रेखाएं दुर्बल हों या टूटी हुई हों तो उस व्यक्ति के शत्रु कमजोर होंगे तथा शत्रुओं पर वह पूरी तरह से हावी हो सकेगा । यदि तर्जनी उंगली पर खड़ी लकीरें हों तो वे नौकरी करने वाले मित्रों की सूचक होती हैं इस प्रकार तर्जनी उंगली पर आड़ी लकीरें नौकरी करने वाले शत्रुओं की संख्या बताती हैं ।
( १६० ) मध्यमा उंगली पर खड़ी लकीरें कलाकार मित्र बताती हैं तथा आड़ी लकीरें विश्वासघात करने वाले शत्रुओं की सूचक होती हैं । अनामिका उंगली पर खड़ी लकीरें उच्च स्तर के मित्र बताती हैं जब कि आड़ी लकीरें उच्चपदस्थ अधिकारी शत्रु का दिग्दर्शन कराती हैं । कनिष्ठिका अंगुली पर खड़ी लकीरें इस बात की सूचक हैं कि उसके मित्र व्यापारी वर्ग से संबंधित होंगे जब कि आड़ी लकीरें व्यापारी वर्ग से संबंधित होकर धोखा देंगे । यदि खड़ी लकीरें पोरुओं को काटकर आगे बढ़ती हों तो ऐसे मित्र जीवन में धोखा देने का प्रयास करते हैं । इन रेखाओं का अध्ययन सावधानी के साथ करना चाहिए । १३. आकस्मिक रेखाएं : हथेली में ये वे रेखाएं कहलाती हैं जो समय-समय पर पैदा होती हैं और अपना प्रभाव दिखाती हैं। जब उससे संबंधित कार्य समाप्त हो जाता है तब ये आकस्मिक रेखाएं भी समाप्त हो जाती हैं ये हथेली के किसी भी भाग में या किसी भी पर्वत पर उग सकती हैं या समाप्त हो सकती हैं। ये रेखाएं जिस रेखा के साथ भी आगे बढ़ती हैं उस रेखा के गुणों में वृद्धि करती हैं इसके विपरीत यदि ये रेखाएं किसी रेखा को काटती हैं तो उस रेखा के गुण में न्यूनता ले आती हैं। हस्तरेखा विशेषज्ञ को इन रेखाओं का अध्ययन भी सावधानी से करना चाहिए । आकस्मिक रेखाएं १४. सुमन रेखा : हथेली में यह रेखा केतु पर्वत से निकल कर बुध क्षेत्र तक जाती हुई दिखाई देती है यदि यह रेखा स्वास्थ्य रेखा को स्पर्श करती है तो उस व्यक्ति को भयंकर बीमारी भोगनी पड़ती है । परन्तु यदि यह रेखा स्वास्थ्य रेखा के समानान्तर चलती हो तो उसका स्वास्थ्य अच्छा रहता है । यदि यह रेखा बिना किसी रेखा को काटे हुए बुध पर्वत तक पहुंच जाती है तो वह व्यक्ति देश का सम्माननीय व्यक्ति होता है तथा कूटनीतिक क्षेत्र में वह अत्यन्त उच्च पद पर पहुंचता है । यदि यह रेखा जंजीरदार हो तो उसे परिवार का सुख नहीं मिलता । इसी प्रकार यदि यह लहरदार हो तो वह पीलिये सुमन रेखा
( १६१ ) के रोग से पीड़ित रहता है । यदि यह रेखा अन्त में दो भागों में बंट जाती है तो वह व्यक्ति नपुंसक होता है। यदि इस रेखा का एक सिरा शुक्र पर्वत पर पहुंचता हो तो वह व्यक्ति जरूरत से ज्यादा कामी तथा भोगी होता है । १५. मणिबन्ध रेखाएं : कलाई पर तीन आड़ी रेखाएं मणिबन्ध रेखाएं कहलाती हैं । कुछ लोगों के हाथों में दो मणिबन्ध रेखाएं होती हैं तो कुछ के हाथों में चार मणिबन्ध रेखाएं भी देखी गई हैं ये रेखाएं स्वास्थ्य धन, प्रतिष्ठा एवं सम्मान की सूचक होती हैं । मणिबन्ध से यदि कोई रेखा निकलकर ऊपर की ओर जाती हो तो उसकी मनोकामनाएं उसके जीवन में ही पूरी हो जाती हैं । यदि मणिबन्ध से कोई रेखा निकलकर चन्द्र पर्वत की ओर जा रही हो तो वह जीवन में कई बार विदेश यात्राएं करता है । मणिबन्ध रेखाएं सामुद्रिक-शास्त्र के अनुसार यदि कलाई पर चार मणिबन्ध रेखाएं हों तो उसकी पूर्ण आयु १०० वर्ष होती है । जिसके हाथ में तीन मणिबन्ध रेखाएं होती हैं उसकी आयु ७५ वर्ष, दो रेखाएं होने पर ५० वर्ष तथा एक मणिबन्ध रेखा होने पर उसकी आयु २५ वर्ष होती है । यदि मणिबन्ध रेखाएं टूटी हुई या छिन्न-भिन्न हों तो उस व्यक्ति के जीवन में बराबर बाधाएं आती रहती हैं। इसके विपरीत यदि ये रेखाएं निर्दोष तथा स्पष्ट हों तो उसका प्रबल भाग्योदय होता है । यदि मणिबन्ध रेखा जंजीरदार हो तो उसके जीवन में बराबर बाधाएं आती रहती हैं। इस पर यव का चिह्न सौभाग्य सूचक है। यदि बिन्दु हो तो उसे जीवन में पेट से संबंधित रोग भोगने पड़ते हैं । यदि मणिबन्ध रेखा पर द्वीप का चिह्न हो तो उसे जीवन में दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ता है । जंजीर के समान मणिबन्ध रेखा दुर्भाग्य की सूचक कहलाती है । यदि दो मणिबन्ध रेखाएं आपस में मिल जाती हों तो दुर्घटना से उसका अंग- भंग होता है । यदि ये रेखाएं नीली हों तो वह जीवन-भर बीमार बना रहता है । पीली मणिबन्ध रेखाएं इस बात की सूचक होती हैं कि विश्वासघात की वजह से उसे जीवन में जरूरत से ज्यादा कष्ट उठाना पड़ेगा । वास्तव में मणिबन्ध रेखाएं जितनी अधिक स्पष्ट गहरी तथा निर्दोष होती हैं उतनी ही ज्यादा श्रेष्ठ कही जाती हैं ।
( १६२ ) १६. शुक्र रेखाएं : शुक्र पर्वत पर जो खड़ी तथा आड़ी रेखाएं होती हैं उन्हें शुक्र रेखाएं कहा जाता है। परन्तु इनके बारे में यह ध्यान रखना चाहिए कि जो रेखाएं अंगूठे से आयु रेखा की ओर जा रही हों मात्र वे ही शुक्र रेखाएं कहला सकती हैं। यदि ये रेखाएं गहरी स्पष्ट तथा निर्दोष हों तो ऐसी रेखाएं शुभ फल देने में सहायक होंगी। इसके विपरीत यदि ये रेखाएं टूटी हुई, कमजोर तथा छिन्न-भिन्न हों तो ऐसे व्यक्ति को जीवन में कई बाधाओं का सामना करना पड़ता है। उसका भाग्योदय बिलम्ब से होता है, तथा समाज से बदनामी का सामना करना पड़ता है। शुक्र रेखाएं १७. बुध वलय : यदि कोई रेखा अनामिका और कनिष्ठिका के बीच में से निकल कर बुध पर्वत को घेरती हुई हथेली के पार पहुंचे तो इस प्रकार से जो वलय बनता है वह बुध वलय कह लाता है। ऐसा बुध वलय बुध के गुणों को कमजोर करता है। बाल्यावस्था में उसे शिक्षा के क्षेत्र में बहुत ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ता है। यौवन में भौतिक सुख नहीं भोग पाता तथा आगे का पूरा जीवन दुखमय ही बना रहता है। बुधवलय १८. रहस्य कॉस : यह हृदय रेखा और मस्तिष्क रेखा के बीच में बनने वाला क्रॉस होता है। जिसको रहस्य क्रॉस कहते हैं। जिस व्यक्ति की हथेली में यह क्रॉस होता है वह वैज्ञानिक दृष्टि सम्पन्न व्यक्ति होता है। यदि यह क्रॉस गुरु पर्वत के नीचे हो तो व्यक्ति अपने लक्ष्य को प्राप्त करके ही रहता है। यदि यह शनि पर्वत के नीचे हो तो वह व्यक्ति साहित्य के क्षेत्र में उच्चस्तरीय प्रसिद्धि प्राप्त करता है। यदि यह क्रॉस चन्द्र पर्वत के समीप हो तो वह व्यक्ति कवि होता है। इस क्रॉस से जो भी पर्वत प्रभावित होता है उस पर्वत के गुणों में विशेष वृद्धि होती है। रहस्य क्रॉस
( १६३ ) १६. दुर्घटना रेखाएं : शनि पर्वत से जो रेखाएं निकल कर मस्तिष्क रेखा को काटती हैं वे दुर्घटना रेखाएं कहलाती हैं । क्रॉस का चिह्न दुर्घटना की ओर संकेत करता है । यदि गुरु पर्वत पर क्रॉस का चिह्न हो तो वह शुभ फल देने वाला तथा भाग्यवर्द्धक होता है। शनि पर्वत पर क्रॉस का चिह्न दुर्घटना में मृत्यु का संकेत करता है। यदि मंगल पर्वत पर क्रॉस हो तो वह व्यक्ति युद्ध में मारा जाता है। यदि सूर्य पर्वत पर क्रॉस का चिह्न हो तो उसकी मृत्यु विश्वासघात से होगी । बुध पर्वत पर क्रॉस का चिह्न इस बात का सूचक है कि उसकी मृत्यु किसी तेज गति वाले वाहन से दुर्घटना के फल- स्वरूप होगी । दुर्घटना रेखाएं चन्द्र पर्वत पर क्रॉस का चिह्न जल में डूबने से मृत्यु का संकेत करता है । यदि मस्तिष्क रेखा पर क्रॉस हो तो वह व्यक्ति पागल होता है । हृदय रेखा पर क्रॉस विधुर जीवन का संकेत करता है । २०. त्रिकोण : हथेली में मस्तिष्क रेखा जीवन रेखा, और बुध रेखा से मिलकर जो त्रिकोण बनता है वह त्रिकोण अतुलनीय धन- प्राप्ति का संकेत है । ऐसे व्यक्ति को जीवन में आकस्मिक रूप से श्रेष्ठ धन लाभ होता है । त्रिकोण