याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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[बायाँ स्तम्भ]
प्रत्यर्पणीयनिर्णय ३२५ बीजा आदि खरीदने में परीक्षावधि ,, सोना, चाँदी, पीतल, शीशा, ताँबा, लोहा की परीक्षा ३२६ कम्बल और सूती कपड़े के वजन ,, कसीदाकारी आदि से वस्त्र के भार में कमी ३२७ द्रव्य के नाश होने पर निर्णय ,, (१४) अभ्युपेत्याशुश्रूषाप्रकरण अभ्युपेत्या शुश्रूषा का स्वरूप ३२७ पाँच प्रकार के शुश्रूषक ३२८ चार प्रकार के कर्मकर ,, दो प्रकार के कर्म ,, तीन प्रकार के भृतक ,, दासों के भेद ,, दासता से मुक्ति का समय ३२९ संन्यास से च्युत व्यक्ति राजा का दास ३३० दास अपने से निम्नवर्ण का होता है ,, अन्तेवासी का धर्म ,, (१५) संविद्व्यतिक्रमप्रकरण संविद्व्यतिक्रम का लक्षण ३३१ धर्म की रक्षा के लिए ब्राह्मण की स्थापना ,, सामयिक और राजा द्वारा निर्दिष्ट धर्म का पालन ३३२ गण के व्यक्तियों के अनुसरण का नियम ,, समूह के कार्य के लिए आये हुए व्यक्तियों का राजा द्वारा सत्कार ३३३ समूह के कार्य से प्रेषित व्यक्ति को प्राप्त धन ,, कार्यचिन्तकों के लक्षण ,, श्रेणी, नैगम, पाखण्डी, गण के विषय में नियम ३३४
[दायाँ स्तम्भ]
(१६) वेतनादानप्रकरण वेतनादान का स्वरूप ३३४ वेतन लेकर काम छोड़ने पर दण्ड ,, बिना वेतन लिए कार्य करना स्वीकार करके कार्य न करने पर दण्ड ३३४ भृत्यों को लाभांश (वोनस) का विधान ३३५ भृत्य के कार्य से हानि और लाभ तथा उसका वेतन ,, दो भृत्यों के एक कार्य करने पर वेतन ३३६ भार ढोने वाले भृत्य के विषय में निर्णय ,, मार्ग में कार्य छोड़ने वाले की मजदूरी ,, (१७) द्यूतसमाह्वयप्रकरण जुए की बाजी का स्वरूप ३३७ द्यूतसभा के अधिकारी का अंश ३३८ द्यूताधिकारी का कर्त्तव्य ,, राजा का सभिकों के प्रति कर्तव्य ,, जुए में हारजीत का निर्णय ३३९ कपटपूर्वक जुआ खेलने वाले का दण्ड ,, जुए के निषेध के लिए दण्ड ,, द्यूताध्यक्ष की नियुक्ति ,, प्राणिद्यूत का नियम ३४० (१८) वाक्पारुष्यप्रकरण वाक्पारुष्य का लक्षण ३४० वाक्पारुष्य के तीन प्रकार ,, निष्ठुर आक्रोश का दण्ड ,, गाली देने का दण्ड ३४१ गाली देने के दण्ड में वर्ग का विचार ,, वर्णों की प्रतिलोमता के आधार पर दोष लगाने का दण्ड ३४२
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बायाँ स्तम्भ (Left Column):
अंग तोड़ने की धमकी का दण्ड ३४३ धमकी के सम्बन्ध में शक्ति का विचार ,, तीव्र आक्रोश का दण्ड ,, दोष लगाने पर दण्ड का विधान ३४४ (१९) दण्डपारुष्यप्रकरण दण्डपारुष्य का स्वरूप ३४४ दण्डपारुष्य के तीन भेद और पाँच विधियाँ ,, दण्डपारुष्य के सन्दिग्ध स्वरूप का निर्णय ३४५ साधन के अनुसार दण्ड ,, वर्ण की प्रतिलोमता के अनुसार दण्ड ३४६ समान जाति वाले को मारने पर दण्ड ३४७ पैर, केश, वस्त्र, हाथ पकड़ कर खींचने का दण्ड ,, लकड़ी आदि से मारने का दंड ३४८ मारकर खून निकालने पर दंड ,, अंग तोड़ने पर दण्ड ,, कई व्यक्तियों द्वारा एक व्यक्ति के पीटे जाने पर दण्ड ३४९ दूसरे की दीवाल तोड़ने पर दण्ड ,, दूसरे के घर में काँटा, विष, सर्प छोड़ने पर दण्ड ३५० पशुओं को मारने पर दण्ड ,, वृक्षों को हानि पहुँचाने पर दंड ३५१ लताओं को हानि पहुँचाने पर दण्ड ,, (२०) साहसप्रकरण साहस का लक्षण ३५२ साहस के तीन प्रकार ,, प्रथम, मध्यम और उत्तम साहस ,, दूसरे का धन लेने पर दण्ड ३५३ अपराध कराने वाले का दण्ड ,, विशेष प्रकार के साहसिक ,,
दायाँ स्तम्भ (Right Column):
बिना नियोग के विधवा संभोग, भयात्तुर की रक्षा के लिए न दौड़ने, उच्च वर्णों के स्पर्शवर्ण के अयोग्य कर्म करने वाले, झूठी शपथ लेने, पशुओं को बधिया करने, दासी का गर्भपात, निर्दोष सम्बन्धी का त्याग करने का दण्ड ३५४ धोबी के विषय में दण्डव्यवस्था ३५५ पिता और पुत्र के कलह में साक्षी के लिए दण्ड ,, तौलने आदि में धूर्तता का दण्ड ३५६ खोटा सिक्का चलाने वाले का दण्ड ,, अल्पज्ञानी वैद्य का दण्ड ,, बन्धन के अयोग्य व्यक्ति का दण्ड ३५७ नापने, तौलने में बेईमानी करने का दण्ड ,, मिलावट करने पर दण्ड ,, घटिया वस्तु अधिक मूल्य पर विक्रय का दण्ड ३५८ ठगी और बनावटी कस्तूरी बेचने का दण्ड ,, शिल्पियों को पीड़ित करने वाले व्यापारियों को दण्ड ३५९ आयातित वस्तु को अनिश्चित मूल्य पर बेचने का दण्ड ,, राजा द्वारा मूल्य का निर्धारण ,, विक्रय में लाभ का अंश ३६० मूल्य के निर्धारण का आधार ,, (२१) विक्रीयासंप्रदानप्रकरण विक्रीयासंप्रदान का स्वरूप ३६० विक्रीयासंप्रदान के दो भेद ,, मूल्य लेकर सौदा न देने वाले का दण्ड ३६१ क्रेता के सौदा न लेने पर दूसरे के हाथ विक्रय ,,
( ४४ ) सौदा देते समय क्रेता के दोष से वस्तु वस्त्र चुराने वाले और में हानि ३६१ गिरहकट का दण्ड ३७२ राजकृत या दैवकृत उत्पात से उचक्के के दुवारा अपराध का दण्ड ,, हानि ३६२ दण्डनिर्धारण का आधार ,, दोषयुक्त वस्तु के विक्रय का दण्ड ,, क्षुद्र द्रव्य के विषय में दण्ड का सौदे की फेराफेरी करने पर दण्ड ३६३ नियम ३७३ ( २२ ) संभूयसमुत्थानप्रकरण धान्य चुराने पर दण्ड ,, सामूहिक व्यापार में लाभ-हानि का सोना चुराने का दण्ड ,, विचार ३६३ विशेष द्रव्य का दण्ड ३७४ हानि करने वाले हिस्सेदार को चोर की सहायता करने वाले के दण्ड ३६४ लिए दण्ड ,, सुरक्षित रखने वाले को दशांश की दुष्टा स्त्री को डुबाने का आदेश ३७५ प्राप्ति ,, हत्यारिणी स्त्री के अङ्ग विक्रयकर और निषिद्धवस्तु विक्रय ,, भङ्ग का दण्ड ,, विक्रयकर में बेईमानी करने का हत्यारे का पता लगाने की विधि ,, दण्ड ३६५ दूसरे की फसल, घर, वाटिका, नौका की फेरी ,, गाँव आदि जलाने वाले के योग्य ब्राह्मणों को श्राद्ध में न बुलाने लिए दण्ड ३७६ पर दण्ड ,, राजपत्नी के साथ व्यभिचार विदेशगत या मृत हिस्सेदार का का दण्ड ,, धन ३६६ ( २४ ) स्त्रीसंग्रहप्रकरण बेईमान हिस्सेदार के प्रति व्यवहार ३६७ स्त्रीसंग्रहण के तीन प्रकार ३७६ ( २३ ) स्तेयप्रकरण पराई स्त्री के साथ व्यभिचार के स्तेय का लक्षण ३६७ चिह्न ३७७ चोर पकड़ने के उपाय ३६८ छेड़खानी करने का अपराध ,, सन्देह में दूसरों को भी पकड़ने निषिद्ध भाषण की दशा में का नियम ,, बोलने पर दण्ड ३७८ सन्देह में पकड़े गये लोगों में चारणस्त्री से व्यभिचार में चोर की पहचान ,, दण्ड का अभाव ,, निर्दोषता न प्रमाणित करने माता आदि से संभोग का दण्ड ,, वाले को दण्ड ३६९ सजातीय परस्त्री से व्यभिचार चोर को शारीरिक दण्ड ,, का दण्ड ,, ब्राह्मण चोर के लिए दण्ड ३७० हीन वर्ण की परस्त्री से व्यभि- गाँव में चोरी का दोषी ,, चार का दण्ड ३७९ चोरी का दण्ड कौन दे ? ३७१ नीच वर्ण के पुरुष से व्यभिचार विशेष अपराध के लिए का स्त्री को दण्ड ,, विशेष दण्ड ,, वाग्दत्ता सवर्णा कन्या का अपहरण ,,
( ४५ ) उच्च जाति की कन्या का अपहरण ३७९ राजा का कोश चुराने वाले का दण्ड ३८८ कन्या की सहमति, असहमति का शव के ऊपर की वस्तु बेचने वाले विचार ३८० का दण्ड ३८९ कन्यादूषण का दण्ड ,, पिता या आचार्य को पीटने वाले कन्या का वास्तविक दोष का दण्ड ,, कहने का दण्ड ३८१ राजसिंहासन पर बैठने का दण्ड ,, पशुमैथुन, हीनस्त्रीसंभोग, गो- आँख फोड़ने, राजा के अनिष्ट का मैथुन का दण्ड ,, प्रचार करने, ब्राह्मण का वेश साधारण स्त्रीगमन का दण्ड ,, बनाने पर दण्ड ,, वेश्या जाति की प्राचीनता ६८२ राग, लोभ से व्यवहार में पक्षपात पञ्चचूडा नाम की अप्सराएं ,, करने पर दण्ड ,, दासी-संभोग का दण्ड ,, साक्षियों का दोष होने पर दण्ड ३९० स्वैरिणी दासियों के बलात् सभासदों द्वारा देखे गये अधर्मपूर्ण संभोग का दण्ड ३८३ व्यवहार पर विचार ,, वेतन लेने वाली वेश्या के मुकरने निर्णीत व्यवहार के प्रत्यावर्तन का पर दण्ड ,, दण्ड ,, असामान्य स्त्रीमैथुन का दण्ड ३८४ पराजय न स्वीकारने वाले का दण्ड ,, चाण्डाली-संभोग का दण्ड ,, राजा द्वारा अन्याय से लिये गये धन की उपयोगविधि ३९१ ( २५ ) प्रकीर्णकप्रकरण ३. प्रायश्चित्ताध्यायः स्त्रीपुंयोग नाम का व्यवहार ३८४ (१) आशौचप्रकरण । उसका लक्षण ३८५ आशौच शब्द का अर्थ ३९२ स्त्री पुरुष को अपने मार्ग में शव के गाड़ने और जलाने का विचार ,, स्थापित करना ,, शवानुगमन ,, प्रकीर्ण व्यवहार का लक्षण ,, चाण्डाल आदि अग्नि का निषेध ३९३ अपराध विशेष का दण्ड ,, उदकदान के विचार ३९४ द्विज को अभक्ष्य से दूषित आहिताग्नि की मृत्यु पर विशेष करने का दण्ड ,, नियम ,, खोटा सोना और निषिद्ध मांस शूद्र द्वारा लाये गये अग्नि आदि ३९५ बेचने का दण्ड ३८६ ब्रह्मचारी और पतित द्वारा उदक- सावधान करने पर चोट लगने दान का निषेध ३९६ में दोषाभाव ३८७ सपिण्डों में उदकदान के लिए दुर्घटना से हिंसा होने में प्रतिषिद्ध व्यक्ति ,, दोषाभाव ,, पाखण्डी आदि के मरनेपर आशौच ,, उपेक्षा करने पर पशु के स्वामी विशेष प्रकार की मृत्यु से आशौच का दण्ड ,, का निषेध ३९७ जार को छोड़ देने पर दण्ड ३८८ राजा की निन्दा करनेवाले का दण्ड ,,
( ४६ ) पतितों के विषय में रोने का निषेध ३९७ | मृत्युविशेष की स्थिति में अशौच आत्महत्या करने वाले का अशौच ३९८ | का अपवाद ४१५ नारायण बलि ,, | युद्ध में, विदेश में, मरने पर अशौच ,, नागबलि ३९९ | विमाता की मृत्यु पर अशौच ,, शोक को दूर करने के लिए इतिहास ४०० | वर्णानुसार अशौच के दिन ४१६ मनुष्य की निःसारता ,, | आयु के अनुसार अशौच ४१७ रोने का निषेध ४०१ | आयु के अनुसार स्त्रियों का प्रेतदाह के बाद वापस आना ,, | अशौच ४१८ घर में प्रवेश की विधि ,, | गुरु, मामा की मृत्यु पर अशौच ४२० तत्काल शुद्धि का उपाय ४०२ | पिता की मृत्यु पर विवाहित ब्रह्मचारी के व्रत की अखण्डता ४०३ | कन्या का अशौच ,, अशौचियों के नियम ,, | श्वशुर आदि की मृत्यु पर अशौच ४२१ प्रेतपिण्डदान ४०४ | अनौरस पुत्र की मृत्यु का अशौच ,, पिण्डदान देने वाला ४०५ | पराश्रित पत्नी की मृत्यु का पिण्ड की संख्या और काल ,, | अशौच ,, शिक्या आदि में जलदान ४०६ | शव के साथ जाने पर अशौच ४२२ अस्थिसंचयन का समय ,, | राजा आदि की मृत्यु पर अशौच वपन ,, | का अभाव ,, अग्निहोत्र के विषय में विचार ,, | दास आदि की मृत्यु पर अशौच ४२३ सूतक में सन्ध्योपासना ४०७ | ऋत्विज् आदि की मृत्यु पर अशौच का समय ,, | अपवाद ,, सपिण्ड आदि का अशौच ,, | ब्रह्मचारी और संन्यासी के बालकों आदि का अशौच ४०८ | विषय में ४२४ जन्मसंबंधी अशौच ,, | अशौच के अन्त में स्नान ,, प्रसूतिका का अशौच ४०९ | रजस्वला कुत्ता, चाण्डाल, पक्षियों के पुत्रजनन के समय दान का अधिकार ,, | स्पर्श पर अशुद्धि ४२६ षष्ठीपूजन ,, | शुद्धि के हेतु और साधन ४२९ अशौच के बीच दूसरे अशौच का | ( ७५ ) आपद्धर्मप्रकरण संपात ,, | आपत्ति के समय दूसरी वृत्ति मातापिता की मृत्यु के अशौच का | धारण करने का नियम ४३१ संपात ४१० | वैश्यवृत्ति वाले ब्राह्मण द्वारा गर्भस्राव में अशौच का निर्णय ,, | अविक्रेय वस्तुएँ ४३२ रजस्वला की शुद्धि के विषय में | निषिद्ध वस्तुओं में अपवाद ४३३ विचार ४१२ | निषिद्ध कर्म करने का दोष ४३४ रजस्वला और सूतिका की मृत्यु का | आपत्ति काल में दान लेने पर अशौच ४१३ | दोषाभाव ,, आहिताग्नि की मृत्यु पर विशेष | आपत्ति काल में जीविका के साधन ,, नियम ४१४ |
( ३ ) वानप्रस्थप्रकरण प्राणों के स्थान ”
( ४७ ) कृषि आदि से जीविका न होने पर शरीर के अंगों, अस्थियों की संख्या ४५५ अन्य साधन ४३५ इन्द्रियों के विषय-गन्धादि ४५८ राजा द्वारा वृत्ति निर्धारण ” कर्मेन्द्रियाँ ” ( ३ ) वानप्रस्थप्रकरण प्राणों के स्थान ” वानप्रस्थ के धर्म ४३६ प्राणस्थानों के विस्तार ४५९ स्वयं प्राप्त फल द्वारा पंचमहायज्ञ ४३७ स्नायु, धमनी, पेशियों द्रव्यसंचय का नियम ४३८ की संख्या ४६० स्नान, स्वाध्याय और दान ४३९ बालों और रोओं की संख्या ४६१ वानप्रस्थ के भोजन का नियम ” शरीर में रसों का अनुपात ४६२ चान्द्रायणादि व्रत का नियम ” शरीर में आत्मा की स्थिति ४६३ पञ्चाग्निसेवन आदि ४४० ‘बृहदारण्यक’ तथा योगशास्त्र समदृष्टि होने का नियम ४४१ का निर्देश ” भैक्षाचरण ” आत्मा के ध्यान की विधि ४६४ शरीर त्याग का नियम ४४२ शब्द ब्रह्म की उपासना ” मुक्ति के मार्ग सामगान, वीणा ” ( ४ ) यतिधर्मप्रकरण वादन आदि ४६५ यतिधर्म का निरूपण ४४२ गीतज्ञ की योनि ” यति के धर्म ४४४ आत्मा से सम्पूर्ण जगत् भिक्षाटन ४४५ की उत्पत्ति ४६६ यति के पात्र और उनकी शुद्धि ४४६ मुनियों का प्रश्न ” इन्द्रियसंयम और अनिष्टमय यज्ञ से प्रजासृष्टि ” संसार ४४७ आत्मा द्वारा सुख-दुःख का भोग ध्यान और ब्रह्मदर्शन ४४८ क्यों ? ४६७ धर्म के लिए आश्रमविशेष आदिदेव से चार वर्णों की आवश्यक नहीं ” उत्पत्ति ४६८ सत्य, अस्तेय आदि धर्म ” मुनियों की शंका ४६९ ब्रह्म से अनेक जीवात्मा की उत्पत्ति ४४९ कर्मानुसार योनि की प्राप्ति ४७० आत्मा द्वारा किया गया कर्म ” कर्मों के फल की प्राप्ति का समय ” आत्मा का शरीरधारण ४५० कैसा व्यक्ति किसी योनि में जन्म शरीरधारण की प्रक्रिया और लेता है ४७१ अवस्थाएँ ४५१ सत्त्वादि गुण का परिणक ४७२ गर्भ में शरीर का विकास और आत्मा को पिछले जन्म का बोध शारीरिक गुणों के उद्भव का क्यों नहीं होता ४७३ क्रम ४५३ आत्मा का समष्टि, व्यष्टि भेद ४७४ दोहद का महत्त्व ” धातुएं और आत्मा से जगत् गर्भ के महीनों में विकास की की उत्पत्ति ” दशाएँ ४५४ जगत् के सृजन की प्रक्रिया ४७५ प्रसव का समय ४५५ आत्मा के विषय में प्रमाण ४७६
( ४८ ) आत्मा का अज्ञान और क्लेश ४७६ | उपपातक ५०८ मुक्ति कौन पाता है ? ४७८ | जाति अंश के कारणभूत पाप " मोक्षप्राप्ति का हेतु ४७९ | ब्राह्मणहत्या के प्रायश्चित्त की विधि ५१३ कर्मफलभोग के लिए शरीरधारण आत्मा को नट से उपमा " | ब्रह्मवध के विषय में विशेष नियम ५१४ मोक्ष का मार्ग, स्वर्गमार्ग संसरण-मार्ग ४८१ | प्रोत्साहक आदि के लिए दण्ड-प्रायश्चित्त ५१६ आत्मा के अस्तित्व का प्रमाण ४८३ | बालक और वृद्ध के लिए आधा प्रायश्चित्त ५१७ क्षेत्रज्ञ का स्वरूप ४८४ | ब्रह्महत्या के प्रायश्चित्त की अवधि ५१८ बुद्धि आदि की उत्पत्ति " | ब्रह्महत्या का दूसरा प्रायश्चित्त ५२१ गुणस्वरूप ४८५ | ब्रह्महत्या के प्रायश्चित्त का अतिदेश ५२५ स्वर्गमार्ग, पितृयान ४८६ | आत्रेयी की हत्या का प्रायश्चित्त ५२६ पितृयान के मुनियों का वर्णन ४८७ | आत्रेयी का लक्षण " ज्ञान के हेतु " | सुरापान प्रायश्चित्त ५२७ आत्मज्ञानी और देवयान ४८८ | सुरा के विषय में विचार ५२८ उपासना की विधि ४८९ | एकादश मद्य ५२९ धारणात्मक योगाभ्यास का प्रयोजन ४९० | सुरापान का दूसरा प्रायश्चित्त ५३० योग की सिद्धि के लक्षण ४९१ | सुरायुक्त शुष्कान्न के भक्षण का प्रायश्चित्त " कर्मों के त्याग से मुक्ति " | सुरापात्र में जल पीने का प्रायश्चित्त ५३१ गृहस्थ के लिए भी मुक्ति संभव " | मद्यपान का प्रायश्चित्त ५३२ ( ५ ) प्रायश्चित्तप्रकरण | द्विजाति की पत्नी के विषय में सुरापान प्रायश्चित्त ५३४ कर्मविपाक का निरूपण ४९२ | सुवर्णस्तेय का प्रायश्चित्त " महापातकी का पुनः पुनः जन्म " | शङ्ख के विचार ५३५ कर्म के अनुसार शरीरधारण ४९६ | सुवर्ण शब्द का अर्थ ५३६ पतित होने का कारण और आवश्यकता ४९७ | सुवर्णस्तेय का दूसरा प्रायश्चित्त ५३७ प्रायश्चित्त का अधिकारी " | गुरुतल्पगमन का प्रायश्चित्त ५३९ प्रायश्चित्त न करने पर दोष ४९९ | गुरु शब्द का अर्थ " इक्कीस नरक ५०० | गुरुतल्पगमन का दूसरा प्रायश्चित्त ५४२ प्रायश्चित्त का फल ५०१ | महापातकियों के साथ संसर्ग का प्रायश्चित्त ५४६ महापातकी ५०२ | इस विषय में नियम का अपवाद ५४९ ब्रह्महत्या के समान पाप ५०५ | शूद्रादि के विषय में प्रायश्चित्त ५५० सुरापान के समान पाप " | गोवध का प्रायश्चित्त ५५१ सुवर्णस्तेय के समान पाप ५०६ गुरुतल्प के समान पाप " गुरुतल्पातिदेश ५०७
( ४६ ) अवस्था के अनुसार प्रायश्चित्त का नियम ५५३ गोपालक की उपेक्षा से गोहत्या का प्रायश्चित्त ५५५ स्त्रियों के प्रायश्चित्त के विषय में विशेष नियम ५५६ पुरुषों के विषय में प्रायश्चित्त के विशेष नियम ५५७ उपपातकों के प्रायश्चित्त ५५८ स्त्री, शूद्र, विट्, क्षत्र के वध का प्रायश्चित्त ५६२ स्त्रीवध का प्रायश्चित्त ५६३ अनुपपातक प्राणिवध के विषय में प्रायश्चित्त ५७० बिल्ली मारने पर प्रायश्चित्त ५७१ वृक्षादि काटने पर प्रायश्चित्त ५७३ पुंश्चली, वानर के वध का प्रायश्चित्त और उनके स्पर्श से शुद्धि का उपाय ५७५ वीर्यस्खलन का प्रायश्चित्त ५७६ ब्रह्मचारी द्वारा स्त्रीभोग का प्रायश्चित्त ५७८ स्वप्न में वीर्यपातहुने के प्रायश्चित्त का मन्त्र ५८० संन्यास से भ्रष्ट होने पर प्रायश्चित्त ,, अन्य अनुपपातक का प्रायश्चित्त ५८१ गुरु के लिए प्रायश्चित्त का विधान ५८२ सब प्रकार की हिंसा का प्रायश्चित्त ५८३ झूठा दोष लगाने पर प्रायश्चित्त ,, भ्रातृजायागमन का प्रायश्चित्त ५८५ रजस्वला पत्नी के संभोग का प्रायश्चित्त ,, अयाज्य व्यक्ति का यज्ञ कराने का प्रायश्चित्त ५८७ वेदविप्लावन का प्रायश्चित्त ५८८
स्वाध्यायत्याग का प्रायश्चित्त ५८९ अग्नित्याग का प्रायश्चित्त ,, आश्रम में न रहने का प्रायश्चित्त ५९० समुद्रयात्रा का प्रायश्चित्त ५९१ वेश्यागमन का प्रायश्चित्त ,, प्याज आदि खाने पर प्रायश्चित्त ५९३ संधिनी गाय का दूध पीने पर प्रायश्चित्त ५९५ गर्हित मांस खाने का प्रायश्चित्त ,, अपवित्र द्रव्य से स्पृष्ट वस्तु खाने का प्रायश्चित्त ५९५ बुरे विचार से प्रदत्त अन्न खाने का प्रायश्चित्त ५९९ बासी भोजन करने का प्रायश्चित्त ,, गुणदुष्टशुक्त आदि के भक्षण का प्रायश्चित्त ६०० क्रियादुष्ट अन्न के भक्षण का प्रायश्चित्त ,, एकाह्यादि श्राद्धभोजन का प्रायश्चित्त ६०३ अपुत्रादि के अन्नभक्षण का प्रायश्चित्त ६०४ जातिभ्रंश करने वाले पाप का प्रायश्चित्त ६०४ (६) प्रकीर्णकप्रायश्चित्तानि निषिद्ध दान लेने का प्रायश्चित्त ६०४ गुरु की भर्त्सना का प्रायश्चित्त ६०५ विप्र को मारने के लिए उद्यत होने पर दण्ड ६०६ पादप्रहार का प्रायश्चित्त ,, मनु द्वारा बताये गये प्रकीर्णक-प्रायश्चित्त ,, नित्य, श्रौतादि कर्म न करने पर प्रायश्चित्त ,, इन्द्रधनुष देखने का प्रायश्चित्त ६०७ यज्ञोपवीत चढ़ाये विना मलमूत्र-त्याग का प्रायश्चित्त ,,
५ या० भू०
( ५० )
चोर और पतित के साथ भोजन करने का प्रायश्चित्त ६०७ नीलरंगे वस्त्र धारण करने का प्रायश्चित्त " देशविशेषगमन का प्रायश्चित्त ६०८ प्रायश्चित्त के विषय में देश और काल का विचार ६०९ पतित के घड़ा फोड़ने की विधि ६१० पतित को समाज में मिलाने की विधि " पतितत्याग की विधि का अतिदेश ६११ स्त्रियों का विशेष रूप से पतित होना ६१२ चरितव्रत के विषय में विशेष ६१३ जाति में सम्मिलित करने की दूसरी विधि ६१४ रहस्यप्रायश्चित्त ६१५ दूसरा प्रायश्चित्त ६१७ सुरापान का रहस्यप्रायश्चित्त " सुवर्णस्तेय का प्रायश्चित्त ६१८ गुरुतल्प का प्रायश्चित्त " उपपातक का रहस्य प्रायश्चित्त ६२० सौ बार प्राणायाम का नियम " अपवित्र वस्तु मुख में डालने का प्रायश्चित ६२१ अज्ञानवश किये गये पाप का प्रायश्चित्त " साधारण पवित्र मन्त्र ६२२ यम और नियम ६२४
सान्तपन नाम का व्रत ६२५ महासान्तपन व्रत ६२६ पर्णकृच्छ्रव्रत ६२७ पादकृच्छ्रव्रत ६२८ प्राजापत्यकृच्छ्र ६२९ अतिकृच्छ्र ६३० कृच्छ्रातिकृच्छ्र " पराककृच्छ्र ६३१ सौम्यकृच्छ्र " तुलापुरुषकृच्छ्र " चान्द्रायणव्रत ६३२ दूसरे प्रकार का चान्द्रायण ६३३ कृच्छ्र और चान्द्रायण का साधारणतः आचरण ६३४ प्रायश्चित्त में वपन का विचार ६३६ अनादिए पाप का प्रायश्चित्त " व्रत न कर सकने पर गोदान आदि ६३७ महापातक आदि में गायों की संख्या " चान्द्रायण आदि में गायों की संख्या " पुनः पाप करने पर पुनः प्रायश्चित्त ६३८ व्रत न कर सकने पर ब्राह्मण भोजन ६३९ कृच्छ्र और चान्द्रायण का फल ६४० इस शास्त्र के अध्ययन और श्रवण का फल " टिप्पणी (नोट्स) ६४३ पद्यार्धानुक्रमणिका ६९७
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उपोद्घातप्रकरणम्
॥ श्रीः ॥
याज्ञवल्क्यस्मृतिः
‘मिताक्षरा’ सहितहिन्दीव्याख्योपेता
आचाराध्यायः ॥ १ ॥
उपोद्घातप्रकरणम्
धर्माधर्मौ तद्विपाकाश्चयोऽपि क्लेशाः पञ्च प्राणिनामायतन्ते । यस्मिन्नेतैर्नो परामृष्ट ईशो यस्तं वन्दे विष्णुमोङ्कारवाच्यम् ॥ १ ॥ याज्ञवल्क्यमुनिभाषितं मुहुर्विश्वरूपविकटोक्तिविस्तृतम् । धर्मशास्त्रमृजुभिर्मिताक्षरा बालशोधविधये विविच्यते ॥ २ ॥ याज्ञवल्क्यशिष्यः कश्चित्प्रश्नोत्तररूपं याज्ञवल्क्यमुनिप्रणीतं धर्मशास्त्रं संक्षिप्य कथयामास-यथा मनुप्रणीतं भृगुः । तस्य चायमाद्यश्लोकः— योगीश्वरं याज्ञवल्क्यं संपूज्य मुनयोऽब्रुवन् । वर्णाश्रमेतराणां नो ब्रूहि धर्मानशेषतः ॥ १ ॥ योगिनां सनकादीनामीश्वरः । ^२ श्रेष्ठस्तं याज्ञवल्क्यं संपूज्य मनोवाक्काय- कर्मभिः पूजयित्वा मुनयः सामश्रवःप्रभृतयः श्रवणधारणयोग्या अब्रुवन् उक्तवन्तः धर्मान्नोऽस्मभ्यं ^४ब्रूहीति । कथम् ? अशेषतः कार्त्स्न्येन । केषाम् ? वर्णाश्रमेत- राणाम्, वर्णा ब्राह्मणादयः; आश्रमा ब्रह्मचारिप्रभृतयः, इतरेऽनुलोमप्रतिलोम- जाता मूर्धावसिक्तादयः । ‘इतर’शब्दस्य ‘द्वन्द्वे च’ (पा. १।१।३१) इति सर्वनामसंज्ञाप्रतिषेधः । अत्र च ‘धर्म’शब्दः षड्विधस्मार्तधर्मविषयः । तद्यथा— वर्णधर्मः, आश्रमधर्मः, वर्णाश्रमधर्मः, गुणधर्मः निमित्तधर्मः, साधारणधर्मश्चेति । तत्र वर्णधर्मो ब्राह्मणो नित्यं मद्यं वर्जयेदित्यादि । आश्रमधर्मोऽग्नीन्धनभैक्ष- १. पाठान्तरम्—मनुक्तं । २. प्रभुस्तं । ३. सोमश्रवाद्यः । ४. ब्रूहि कथयेति । ५. स्मार्तकर्मविषयः । ६. वर्जयेद्विति ।
२ याज्ञवल्क्यस्मृतिः चर्यादिः । वर्णाश्रमधर्मः पालाशो दण्डो ब्राह्मणस्येत्येवमादिः । गुणधर्मः शाखी- याभिषेकादिगुणयुक्तस्य राज्ञः प्रजापरिपालनादिः । निमित्तधर्मो विहिताकरण- प्रतिषिद्धसेवननिमित्तं प्रायश्चित्तम् । साधारणधर्मोऽहिंसादिः । ‘न हिंस्यात्सर्व्वा भूतानि’ इत्याचण्डालं साधारणो धर्मः । ‘शौचाचारांश्च शिक्षयेत्’इत्याचार्यकरण- विधिप्रयुक्तत्वाद्वर्मशास्त्राध्ययनस्य प्रयोजनादिकथनं नातीवोपयुज्यते । तत्र चायं क्रमः-प्रागुपनयनात्कामचारकामवादकामभक्षाः । ऊर्ध्वमुपनयनाद्राग्वेदाध्यय- नोपक्रमाद्धर्मशास्त्राध्ययनं, ततो धर्मशास्त्रविहितयमनियमोपेतस्य वेदाध्ययनं, ततस्तदर्थजिज्ञासा, ततस्तदर्थानुष्ठानमिति । तत्र यद्यपि धर्मार्थकाममोक्षाः शास्त्रेणानेन प्रतिपाद्यन्ते, तथापि धर्मस्य प्राधान्याद्धर्मग्रहणम् । प्राधान्यं च धर्ममूलत्वादितरेषाम् । न च वक्तव्यं धर्ममूलोऽर्थोऽर्थमूलो धर्म इत्यविशेष इति । यतोऽर्थमन्तरेणापि जपतपस्तीर्थयात्रादिना धर्मनिष्पत्तिः, अर्थलेशोऽपि न धर्ममन्तरेणेति । एवं काममोक्षावपीति ॥ १ ॥ भाषा— किसी समय ) योगियों में श्रेष्ठ याज्ञवल्क्य की पूजा करके ( सोमश्रवस आदि ) मुनियों ने कहा कि आप वर्णों, आश्रमों और दूसरे ( अनुलोमज-प्रतिलोमज संकर जातियों ) का धर्म हमें पूर्णरूप से बताइए ॥ १ ॥ एवं पृष्टः किमुवाचेत्याह— मिथिलास्थः स योगीन्द्रः क्षणं ध्यात्वाऽब्रवीन्मुनीन् । यस्मिन्देशे मृगः कृष्णस्तस्मिन्धर्मान्निबोधत ॥ २ ॥ मिथिला नाम नगरी तत्र स्थितः स याज्ञवल्क्यो योगीश्वरः क्षणं ध्यात्वा किञ्चित्कालं मनः समाधाय एते श्रवणाधिकारिणो विनयेन पृच्छन्तीति युक्तमेतेभ्यो वक्तुमित्युक्त्वाऽन्मुनीन् । किम् ? ‘यस्मिन्देशे मृगः कृष्णस्तस्मिन्धर्मान्नि- बोधयत’–इति । कृष्णसारो मृगो यस्मिन्देशे स्वच्छन्दं विहरति तस्मिन्देशे दद्यमाणलक्षणा धर्मा अनुष्ठेया नान्यत्रेत्यभिप्रायः ॥ २ ॥ भाषा—मिथिला नगरी में विराजमान उस योगीश्वर ने थोड़ी देर अपने मन में विचार करके मुनियों से कहा कि जिस देश में काले मृग ( स्वच्छन्द ) विचरण करते हैं उस देश में ( अनुष्ठेय ) धर्मों को समझिए ॥ २ ॥ १. सर्वभूतानि इति । २. श्रुत्युक्तशौचाचारान् । ३. जपतीर्थयात्रा ।
आचाराध्यायः ३ 'शौचाचारांश्च शिक्षयेत्'इत्याचार्यस्य धर्मशास्त्राध्यापनविधिः । शिष्येण तदध्ययनं कर्तव्यमिति कुतोऽवगम्यत इत्यत आह— पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः । वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ॥ ३ ॥ पुराणं ब्रह्मादि, न्यायस्तर्कविद्या, मीमांसा वेदवाक्यविचारः, धर्मशास्त्रं मानवादि, अङ्गानि व्याकरणादीनि षट्, एतैरुपेतश्चत्वारो वेदाः विद्याः पुरुषार्थ- साधनानि, तासां स्थानानि च चतुर्दश, धर्मस्य च चतुर्दश स्थानानि हेतवः । एतानि च त्रैवर्णिकैरध्येतव्यानि । तदन्तर्भूतत्वाद्वर्मशास्त्रमप्यध्येतव्यम् । तत्रैतानि ब्राह्मणेन विद्याप्राप्तये धर्मानुष्ठानाय चाधिगन्तव्यानि ! क्षत्रियवैश्याभ्यां धर्मानुष्ठानाय । तथा च शङ्खेन विद्यास्थानान्युपक्रम्योक्तम्—'एतानि ब्राह्मणोऽ- धिकुरुते स च वृत्तिं दर्शयतीतरेषाम्' इति । मनुरपि द्विजातीनां धर्मशास्त्राध्य- यनेऽधिकारः, ब्राह्मणस्य प्रवचने नान्यस्येति दर्शयति ( २।१६) 'निषेकादि- श्मशानान्तो मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः। तस्य शास्त्रेऽधिकारोऽस्मिन्ज्ञेयो नान्यस्य कँर्हिचित् ॥ विदुषा ब्राह्मणेनेदमध्येतव्यं प्रयत्नतः । शिष्येभ्यश्च प्रवक्तव्यं सम्यङ्- नान्येन केनचित् ॥' इति ॥ ३ ॥ भाषा—पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र और ( व्याकरण आदि ) अङ्गों सहित ( चारों ) वेद चौदह विद्या के और धर्म के स्थान या कारण हैं ॥ ३ ॥ अस्तु धर्मशास्त्रमध्येतव्यं, याज्ञवल्क्यप्रणीतस्यास्य शास्त्रस्य किमायातमित्यत आह— मन्वत्रिविष्णुहारीतयाज्ञवल्क्योशनोऽङ्गिराः⁴ । यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती ॥ ४ ॥ पराशरव्यासशङ्खलिखिता दक्षगौतमौ । शातातपो वसिष्ठश्च धर्मशास्त्रप्रयोजकाः⁶ ॥ ५ ॥ 'उशनः' शब्दपर्यन्तो द्वन्द्वैकवद्भावः । याज्ञवल्क्यप्रणीतमिदं धर्मशास्त्रमध्येत- व्यमित्यभिप्रायः । नेयं परिसंख्या, किंतु प्रदर्शनार्थमेतत् । अतो बौधायनादेरपि धर्मशास्त्रत्वमविरुद्धम् । एतेषां प्रत्येकं प्रामाण्येऽपि साकाङ्क्षाणामाकाङ्क्षापरिपूरण- मन्यतः क्रियते । विरोधे विकल्पः ॥ ४-५ ॥ १. पुरुषार्थज्ञानानि, पुरुषार्थसाधनज्ञानानि । २. तदन्तर्गतत्वात् । ३. तत्र ब्राह्मणेनैतानि । ४. कस्यचित् । ५. ऽङ्गिरः । ६. प्रवर्त्तका ।
४ याज्ञवल्क्यस्मृतिः भाषा—मनु, अत्रि, विष्णु, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशनस्, अङ्गिरस्, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, पराशर, व्यास, शङ्ख, लिखित, दक्ष, गौतम, शातातप और वसिष्ठ-ये धर्मशास्त्रों के प्रणेता हैं ॥ ४-५ ॥ इदानीं धर्मस्य कारकहेतूनाह- देशे काल उपायेन द्रव्यं श्रद्धासमन्वितम् । पात्रे प्रदीयते यत्तत्सकलं धर्मलक्षणम् ॥ ६ ॥ देशो 'यस्मिन्देशे मृगः कृष्णः' ( १।२ ) इत्युक्तलक्षणः, कालः संक्रान्त्यादिः, उपायः शास्त्रोक्तेतिकर्तव्यताकलापः, द्रव्यं प्रतिग्रहादिलब्धं गवादि, श्रद्धा आस्तिक्यबुद्धिः, तदन्वितं यथा भवति तथा । पात्रं 'न विद्यया केवलया' (आचार- १।२०० ) इत्येवमादिवक्ष्यमाणलक्षणम् । प्रदीयते यथा न प्रत्यावर्तते तथा परस्वत्वापत्यवसानं त्यज्यते । एतद्धर्मस्योत्पादकम् । किमेतावदेव नेत्याह- सकलमिति । अन्यदपि शास्त्रोक्तं जातिगुणहोमयागादि तत्सकलं धर्मस्य कारणं जातिगुणद्रव्यक्रियाभावात्मकं चतुर्विधं धर्मस्य कारणमित्युक्तं भवति । तच्च समस्तं व्यस्तं वा यथाशास्त्रं द्रष्टव्यम् । श्रद्धा सर्वत्रानुवर्तत एव ॥ ६ ॥ भाषा—(पवित्र) देश में (उपयुक्त) समय पर विधिपूर्वक जो भी (स्वर्णादि) द्रव्य योग्य व्यक्ति को दान दिया जाता है वह सब धर्म का लक्षण है ॥ ६ ॥ इदानीं धर्मस्य ज्ञापकहेतूनाह- श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः । सम्यक्सङ्कल्पजः कामो धर्ममूलमिदं स्मृतम् ॥ ७ ॥ श्रुतिर्वेदः, स्मृतिर्धर्मशास्त्रम्, तथा च मनुः (२।१०) 'श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः' इति । सदाचारः सतां शिष्टानामाचारोऽनुष्ठानम्, स्वस्य चात्मनः प्रियं, वैकल्पिकेषु विषये यथा-'गर्भाष्टमेऽष्टमे वाब्दे' (आचार. २।१४ ) इत्यादावात्मेच्छैव नियमिका । सम्यक्सङ्कल्पजातः कामः शास्त्रविरुद्धो यथा-'मया भोजनव्यतिरेकेणोदकं न पातव्यम्' इति । एते धर्मस्य मूलं प्रमाणम् । एतेषां विरोधे पूर्वपूर्वस्य बलीयस्त्वम् ॥ ७ ॥ भाषा-वेद-धर्मशास्त्र, सज्जनों के आचरण, अपने आत्मा के अनुकूल (उत्तम) कार्य तथा विवेकपूर्ण संकल्प से उत्पन्न हुई इच्छा-ये सब धर्म का मूल कहे गये हैं ॥ ७ ॥ १. विरोधे तु । २. नुष्ठानं नाशिष्टानाम् । ३. इत्यत्रात्मेच्छैव. इत्याद्विच्छारमेच्छैव । ४. शास्त्राविरुद्धः कामो यथा ।
आचाराध्यायः ५ देशादिकारकहेतूनामपवादमाह— इज्याचारदमाहिंसादानस्वाध्यायकर्मणाम् । अयं तु परमो धर्मो यद्योगेनात्मदर्शनम् ॥ ८ ॥ इज्यादीनां कर्मणामयमेव परमो धर्मः यद्योगेन बाह्यचित्तवृत्तिनिरोधेनात्मनो दर्शनं याथातथ्यज्ञानम् । योगेनात्मज्ञाने देशादिनियमो नास्तीत्यर्थः । तदुक्तं 'यत्रैकाग्रता तत्राविशेषात्' (ब्र. सू. ४।१।६।१०) इति¹ ॥ ८ ॥ भाषा—यज्ञानुष्ठान, आचार, इन्द्रियनिग्रह, अहिंसा, दान, वेदाध्ययन और (पुण्य) कर्मों में यही श्रेष्ठ धर्म है कि योग अर्थात् बाह्य चित्तवृत्ति के निरोध द्वारा आत्मा का याथातथ्य बोध हो ॥ ८ ॥ कारकहेतुषु ज्ञापकहेतुषु वा संदेहे तु निर्णयहेतुमाह— चत्वारो वेदधर्मज्ञाः पर्षत्त्रैविद्यमेव वा । सा ब्रूते यं स धर्मः स्यादेको वाऽध्यात्मवित्तमः ॥ ९ ॥ चत्वारो ब्राह्मणाः वेद²धर्मशास्त्रज्ञाः पर्षत् । तिस्रो विद्या अधीयन्त इति त्रैविद्याः, तेषां समूहस्त्रैविद्यम् । धर्मशास्त्रज्ञत्वमत्राप्यनुवर्तते, तद्वा पर्षत् । सा पूर्वोक्ता पर्षत् यं ब्रूते स धर्मः । अध्यात्मज्ञानेषु निपुणतमो धर्मशास्त्रज्ञश्च³ एकोऽपि वा यं⁴ब्रूते सोऽपि धर्मः ॥ ९ ॥ भाषा—वेद और धर्म को जानने वाले चार पुरुषों की या तीन विद्याओं के ज्ञाता तीन ही पुरुषों की पर्षत होती है । वह (पर्षत) जो भी कहे वह धर्म होता है । अध्यात्मज्ञान में निपुणतम एक ही व्यक्ति जो कुछ कहता है वह धर्म होता है ॥ ९ ॥ इत्युपोद्घातप्रकरणम् । ब्रह्मचारिप्रकरणम् एतैर्नवभिः श्लोकैः सकलशास्त्रोपोद्घातमुक्त्वा इदानीं वर्णादीनां धर्मान्वक्तुं प्रथमं तावद्वर्णानाह— ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्रा वर्णास्त्वाद्यास्त्रयो द्विजाः । निषेकाद्याः श्मशानान्तास्तेषां वै मन्त्रतः क्रियाः ॥ १० ॥ ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्राश्चत्वारो वर्णा वक्ष्यमाणलक्षणास्तेषामाद्यास्त्रयो ब्राह्मण- क्षत्रियवैश्या द्विजाः, —द्विजायन्त इति द्विजाः, तेषां द्विजानां वै एव न⁵ शूद्रस्य, १. पातञ्जले । २. वेदशास्त्रधर्मज्ञाः । ३. वेदधर्मशास्त्रज्ञश्च । ४. सोऽपि धर्म एव । ५. न शूद्राणां ।
६ याज्ञवल्क्यस्मृतिः एतेन शूद्रस्यामन्त्रकाः क्रियाः इत्युक्तं भवति, 'शूद्रोऽप्येवंविधः कार्यो बिना मन्त्रेण संस्कृतः' इति यमोक्तेः । निषेकाद्याः निषेको गर्भाधानमाद्यो यासां तास्तथोक्ताः । श्मशानं पितृवनं तत्संबन्धि कर्म १अन्तो यासां ताः क्रिया मन्त्रैर्भवन्ति ॥ १० ॥ भाषा—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—ये (चार) वर्ण हैं; इनमें आरंभ के तीन द्विज हैं। गर्भाधान से लेकर अन्त्येष्टि तक की इनकी सभी क्रियाएँ मन्त्रों द्वारा सम्पादित होती हैं ॥ १० ॥ इदानीं ताः क्रिया अनुक्रामति— गर्भाधानमृतौ पुंसः सवनं स्पन्दनात्पुरा । षष्ठेऽष्टमे वा सीमन्तो मास्येते जातकर्म च ॥ ११ ॥ अह्न्येकादशे नाम चतुर्थे मासि निष्क्रमः । षष्ठेऽन्नप्राशनं मासि चूडा कार्या यथाकुलम् ॥ १२ ॥ गर्भाधानमित्यनुगतार्थं कर्मनामधेयम् । एवं वक्ष्यमाणान्यपि । तद् गर्भाधान- मृतौ ऋतुकाले वक्ष्यमाणलक्षणे । पुंसवनाख्यं कर्म गर्भचलनात्पूर्वम् । षष्ठेऽष्टमे वा मासि सीमन्तोन्नयनम् । एते च द्वे पुंसवन-सीमन्तोन्नयने क्षेत्रसंस्कारकर्म- त्वात्सकृदेव कार्ये, न प्रतिगर्भम् । तथाह देवलः—'सकृच्च संस्कृता नारी सर्वगर्भेषु संस्कृता । य य गर्भं प्रसूयेत स सर्वः संस्कृतो भवेत्' इति । यद्वा-एते आ इते आगते गर्भकोशाज्जाते २कुमारे जातकर्म एकादशेऽहनि ३नाम । तच्च पितामहमातामहादिसम्बद्धं कुलदेवतासम्बद्धं वा । यथाह शङ्खः (२।१४)— 'कुलदेवतासम्बद्धं पिता नाम कुर्यात्' इति । चतुर्थे मासि निष्क्रमणलक्षणं सूर्यावेक्षणं कर्म । षष्ठे मास्यन्नप्राशनं कर्म । चूडाकरणं तु यथाकुलं कार्यमिति प्रत्येके सम्बध्यते ॥ ११-१२ ॥ भाषा— गर्भाधान संस्कार (गर्भधारण के) समय पर होता हैं और पुंसवन गर्भचलन के पहले होता है; जन्म लेने पर जातकर्म, ग्यारहवें दिन नामकरण, चौथे मास में निष्क्रमण, संस्कार करे । छठें मास में अन्नप्राशन संस्कार करे और चूडाकरण संस्कार कुल की रीति के अनुसार करना चाहिए ॥ ११-१२ ॥ एतेषां नित्यत्वेऽप्यानुषङ्गिकं फलमाह— एवमेनः शमं याति बीजगर्भसमुद्भवम् । १. अन्ते यासां । २. कुमारे जाते । ३. नामकशब्द ।
आचाराध्यायः ७ एवमुक्तेन प्रकारेण गर्भाधानादिभिः संस्कारकर्मभिः कृतैरेनः पापं शमं याति। किम्भूतम् ? बीजगर्भसमुद्भवं शुक्रशोणितसंबद्धं गात्रव्याधिसंक्रान्तिनिमित्तं वा, न तु पतितोत्पन्नत्त्वादि ॥— स्त्रीणां विशेषमाह— तूष्णीमेताः क्रियाः स्त्रीणां विवाहस्तु समन्त्रकः ॥ १३ ॥ एता जातकमीदिकाः क्रियाः स्त्रीणां तूष्णीं विनैव मन्त्रैर्यथाकालं कार्याः । विवाहः पुनः समन्त्रकः कार्यः ॥ १३ ॥ भाषा— इस प्रकार से ( इन संस्कारों द्वारा ) शुक्र और गर्भ से संबद्ध पाप शान्त होता है । ये जातकमीदि ) स्त्रियों के लिये विना मन्त्र के किये जाते हैं और विवाह संस्कार मंत्रों के साथ होता है ॥ १३ ॥ उपनयनकालमाह— गर्भाष्टमेऽष्टमे वाऽब्दे ब्राह्मणस्योपनायनम् । राज्ञामेकादशे सैके विशाभेके यथाकुलम् ॥ १४ ॥ गर्भाधानमादिं कृत्वा जननं वाऽष्टमे वर्षे ब्राह्मणस्योपनायनं उपनयनमेवोप- नायनम् । स्वार्थे अण् । १वृत्तानुसारत, छन्दोभङ्गात् । आर्षं वा दीर्घत्वम् । अत्रेच्छया विकल्पः । राज्ञामेकादशे । विशां वैश्यानां सैके एकादशे । द्वादशे इत्यर्थः । 'गर्भ'ग्रहणं सर्वत्रानुवर्तते । समासे गुणभूतस्यापि 'गर्भ'शब्दस्य बुद्धया विभज्योभयत्राप्यनुवर्तनं कार्यम् । 'गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भाद्धि द्वादशे विशः' ( शंख. २।७) इति स्मृत्यन्तरदर्शनात् । यथा अथ ४शब्दानुशासनं, केषां शब्दानाम् ? लौकिकानां वैदिकानामिति । अत्रापि कार्यमित्यनुवर्तते । कुलस्थित्या केचिदुपनयनमिच्छन्ति ॥ १४ ॥ भाषा— गर्भकाल से आठवें अथवा जन्म से आठवें वर्ष में ब्राह्मण का उपनयन संस्कार होता है । इसी प्रकार कुल के अनुसार क्षत्रिय के लिए ग्यारहवें वर्ष में और वैश्य के लिये बारहवें वर्ष में यह संस्कार विहित है ॥ १४ ॥ गुरुधर्मनाह— उपनीय गुरुः शिष्यं महाव्याहृतिपूर्वकम् । वेदमध्यापयेदेनं शौचाचारांश्च शिक्षयेत् ॥ १५ ॥ स्वगृह्योक्तविधिनाेपनीय गुरुः ५शिष्यं महाव्याहृतिपूर्वकं वेदमध्यापयेत् । महाव्याहृतयश्च भूर्भुवस्स्वस्त्यान्ताः सप्त । पञ्च वा गौतमाभिप्रायेण । किञ्च १. अवधिं कृत्वा जन्मनो । २. प्रकरणानुसारम् । ३. वचनात् । ४. शब्दानामिति । ५. शिष्यं गुरुः ।
८ याज्ञवल्क्यस्मृतिः शौचाचारांश्च वक्ष्यमाणलक्षणान् शिक्षयेत् । 'उपनीय शौचाचारांश्च शिक्षयेत्' इत्यनेन प्रागुपनयनात्कामचारो दर्शितो वर्णधर्मान्वर्जयित्वा । स्त्रीणामप्येतत्स- मानं विवाहादर्वाक् , उपनयनस्थानीयत्वाद्विवाहस्य ॥ १५ ॥ भाषा- गुरु शिष्य का उपनयन संस्कार करके उसे महाव्याहृतियों के साथ वेद पढ़ावे और शौच के नियमों की शिक्षा दे ॥ १५ ॥ शौचाचारानाह- दिवासंध्यासु कर्णस्थब्रह्मसूत्र उदङ्मुखः । कुर्यान्मूत्रपुरीषे च रात्रौ चेद्दक्षिणामुखः ॥ १६ ॥ कर्णस्थं ब्रह्मसूत्रं यस्य स तथोक्तः । कर्णश्च दक्षिणः, 'पवित्रं दक्षिणे कर्णे कृत्वा विण्मूत्रमुत्सृजेत्' इति लिङ्गात् । असावहनि संध्ययोश्च उदङ्मुखो मूत्र- पुरीषे कुर्यात् । चकाराद्भस्मादिरहिते देशे । रात्रौ तु दक्षिणामुखः ॥ १६ ॥ भाषा- यज्ञोपवीत कान पर चढ़ाकर दिन में एवं सन्ध्या को उत्तर की ओर मुख करके तथा रात्रि में दक्षिण की ओर मुख करके मूत्र और पुरीष का त्याग करे ॥ १६ ॥ गृहीतशिश्नश्चोत्थाय मृद्भिरभ्युद्धृतैर्जलैः । गन्धलेपक्षयकरं शौचं कुर्यादतन्द्रितः ॥ १७ ॥ किंच, अनन्तरं शिश्नं गृहीत्वोत्थायोद्धृताभिरद्भिर्वक्ष्यमाणलक्षणाभिर्मृद्भिश्श्च गन्धलेपयोः क्षयकरं शौचं कुर्यात् । अतन्द्रितोऽनलसः । उद्धृताभिरद्भिरिति जलान्तःशौचनिषेधः । अत्र 'गन्धलेपक्षयकरम्' इति सर्वाश्रमिणां साधारणमिदं १शौचम् । मृत्संख्यानियमस्त्वदृष्टार्थः ॥ १७ ॥ भाषा- शिश्न को पकड़ कर और उठाकर, अलग लिये गये जल और मिट्टी द्वारा (मल के) गन्ध एवं लेप को नष्ट करने वाला शौच आलस्यरहित होकर करे ॥ १७ ॥ अन्तर्जानु शुचौ देश उपविष्ट उदङ्मुखः । प्राग्वा ब्राह्मेण तीर्थेन द्विजो नित्यमुपस्पृशेत् ॥ १८ ॥ शुचौ अशुचिद्रव्यासंसृष्टे । देश इत्यु२पानच्छयनासनादिनिषेधः । उपविष्टो न स्थितः शयानः प्रह्वो गच्छन्वा । उदङ्मुखः प्राङ्मुखो वेति दिगन्तरनिवृत्तिः । 'शुचौ देशे' इत्येतस्मात्पादप्रक्षालनप्राप्तिः । ब्राह्मेण तीर्थेन वक्ष्यमाणलक्षणेन द्विजो न शूद्रादिः । नित्यं सर्वकालमाश्रमान्तरगतोऽपि । उपस्पृशेदाचामेत् । कथम् ? अन्तर्जानु जानुनोर्मध्ये हस्तौ कृत्वा दक्षिणेन हस्तेनेति ॥ १८ ॥ १. शौचमिदं । २. इत्युपादानात् ।
आचाराध्यायः भाषा—ब्राह्मण प्रतिदिन दोनों घुटनों के बीच हाथ रखकर, पवित्र स्थल पर उत्तर या पूर्व की ओर मुख करके बैठे और ब्राह्म तीर्थ से आचमन करे ॥ १८ ॥ प्राजापत्यादितीर्थान्याह— कनिष्ठादेशिन्यङ्गुष्ठमूलान्यग्रं करस्य च । प्रजापतिपितृब्रह्मदेवतीर्थान्यनुक्रमात् ॥ १९ ॥ कनिष्ठायास्तर्जन्या अङ्गुष्ठस्य च मूलानि करस्याग्रं च प्रजापतिपितृब्रह्मदेव- तीर्थानि यथाक्रमं वेदितव्यानि ॥ १९ ॥ भाषा—कनिष्ठा, तर्जनी और अंगुठे के मूलभाग तथा हाथ का अग्रभाग- ये सब क्रमशः प्रजापति तीर्थ, पितृतीर्थ और देवतीर्थ कहे जाते हैं ॥ १९ ॥ आचमनप्रकारः— त्रिः प्राश्यापो द्विरुन्मृज्य खान्यद्भिः समुपस्पृशेत् । अद्भिस्तु प्रकृतिस्थाभिर्हीनाभिः फेनबुद्बुदैः ॥ २० ॥ वारत्रयमपः पीत्वा मुखमङ्गुष्ठमूलेन द्विरुन्मृज्य खानि छिद्राणि ऊर्ध्वकाय- गतानि घ्राणादीनि अद्भीरुपस्पृशेत् । १अद्भिरित्यशान्तरसंसृष्टाभिः । २पुनरद्भि- रित्यवग्रहणं प्रतिच्छिद्रमुदकस्पर्शानार्थम् । स्मृत्यन्तरात्-'अङ्गुष्ठेन प्रदेशिन्या घ्राणं चैव मुखं स्पृशेत् । अङ्गुष्ठानामिकाभ्यां च चक्षुः श्रोत्रं पुनः पुनः ॥ कनिष्ठाङ्गुष्ठ- योर्नाभिं हृदयं तु तलेन वै । सर्वाभिस्तु शिरः पश्चाद्बाहू चाग्रेण संस्पृशेत् ॥' इति । पुनस्ता एव विशिनष्टि-प्रकृतिस्थाभिः गन्धरूपरसस्पर्शान्तरमप्राप्ताभिः । फेनबुद्बुदरहिताभिः । तु शब्दादूर्ध्वधारागतानां शूद्राद्यावर्जितानां च निषेधः ॥ २० ॥ भाषा—तीन बार जल पीकर, (अँगूठे के मूलभाग से) दो बार मुख धोकर, नाक, कान, आँख और मुँह का जल से स्पर्श करे। वह जल स्वच्छ होना चाहिए' उसमें फेन एवं बुलबुले न होंवे ॥ २० ॥ | हृत्कण्ठतालुगाभिस्तु यथासंख्यं द्विजातयः । शुध्येरन्स्त्री च शूद्रश्च सकृत्स्पृष्टाभिरन्ततः ॥ २१ ॥ हृत्कण्ठतालुगाभिरद्भिर्यथाक्रमेण द्विजातयः शुष्यन्ति । स्त्री च शूद्रश्च अन्ततः ३अन्तर्गतेन तालुना स्[पृ]ष्टाभिरपि । 'सकृत्' इति वैश्याद्विशेषः । च शब्दादनुपनीतोऽपि ॥ २१ ॥ १. संस्पृष्टाभिः । २. पुनर्रवग्रहणं । ३. अन्तेन ।
१० याज्ञवल्क्यस्मृतिः
भाषा—द्विजाति अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य क्रमशः हृदय, कण्ठ और तालु तक जल के पहुँचने पर शुद्ध होते हैं। स्त्री और शूद्र तो तालु से एक ही बार जल स्पर्श कराने पर शुद्ध हो जाते हैं ॥ २१ ॥ स्नानमब्दैवतैर्मन्त्रैर्मार्जनं प्राणसंयमः । सूर्यस्य चाप्युपस्थानं गायत्र्याः प्रत्यहं जपः ॥ २२ ॥ प्रातःस्नानं यथाशास्त्रमब्दैवतैर्मन्त्रैः 'आपोहिष्ठा' इत्येवमादिभिर्मार्जनम् । प्राणसंयमः प्राणायामो वक्ष्यमाणलक्षणः । ततः सूर्यस्योपस्थानं सौरमन्त्रेण गायत्र्याः । 'तत्सवितुर्वरेण्यम्' इत्याद्यायाः प्रतिदिनंसं २जपः कार्यः । 'कार्य'- शब्दो यथालिङ्गं प्रत्येकमभिसंबध्यते ॥ २२ ॥ भाषा—स्नान, अब्दैवत मन्त्र द्वारा मार्जन, प्राणायाम, (तदुपरान्त ) सूर्योपस्थान और गायत्री का जप प्रतिदिन करे ॥ २२ ॥ प्राणायामविचारः— गायत्रीं शिरसा सार्धं जपेद् व्याहृतिपूर्विकाम् । प्रतिप्रणवसंयुक्तां त्रिरयं प्राणसंयमः ॥ २३ ॥ गायत्रीं पूर्वोक्ताम् 'आपोज्योतिः' इत्यादिना शिरसा संयुक्तां उक्तव्याहृति- पूर्विकां प्रतिव्याहृति प्रणवेन संयुक्तां ओंभूः ओंभुवः ओस्वरिति त्रीन्वारान्मुख नासिकासंचारिवायुं निरुन्धन् मनसा जपेदित्ययं सर्वत्र प्राणायामः ॥ २३ ॥ भाषा—शिरोमन्त्र और महाव्याहृति (का जप करने) के उपरान्त (प्रत्येक महाव्याहृति में) प्रणव जोड़ते हुए गायत्री का तीन बार (मुख और नासिका की) श्वासवायु रोककर जप करने पर एक प्राणायाम होता है ॥ २३ ॥ सावित्रीजपप्रकारः— प्राणानायम्य संप्रोक्ष्य तृचेनाब्दैवतेन तु । जपन्नासीत सावित्रीं प्रत्यगातारकोदयात् ॥ २४ ॥ संध्यां प्राक्प्रातरेवं हि तिष्ठेदा सूर्यदर्शनात् । प्राणायामं पूर्वोक्तं कृत्वा तृचेनाब्दैवतेन पूर्वोक्तेनात्मानमद्भिः संप्रोक्ष्य सावित्रीं जपन् प्रत्यक्संध्यामा³सीत । अर्थात् 'प्रत्यङ्मुख' इति लभ्यते । आ तारकोदयात् तारकोदयावधि । प्राक्संध्यां प्रातः समये एवं पूर्वोक्तविधिमाचरन् प्राङ्मुखः सूर्योदयावधि तिष्ठेत् । अहोरात्रयोः संधौ या क्रिया विधीयते सा संध्या । तत्र १. मित्यादेः । २. जपः कार्यः । ३. मुपासीत ।
खण्डमण्डलस्योपलब्धिः स संधिः ॥ २४ ॥
अहः संपूर्णादित्यमण्डलदर्शनयोग्यः कालः, तद्विपरीता रात्रिः । यस्मिन्काले खण्डमण्डलस्योपलब्धिः स संधिः ॥ २४ ॥ भाषा—प्राणायाम के उपरान्त मार्जन के मंत्र से सिर पर जल छिड़ककर (सन्ध्या को) पश्चिम की ओर मुख करके तारागण का उदय होने तक सावित्री का जप करे ॥ २४ ॥ अग्निकार्यं ततः कुर्यात्संध्ययोरुभयोरपि ॥ २५ ॥ ततः संध्योपासनानन्तरं द्वयोः संध्ययोरग्निकार्यं अग्नौ कार्यं समित्प्रक्षेपादि यत्तत्कुर्यात् स्वगृह्योक्तेन विधिना ॥ २५ ॥ भाषा—इसी प्रकार प्रातःकाल सूर्य के उदय होने तक पूर्व दिशा को करके मुख जप करे । इसके उपरान्त दोनों सन्ध्याओं में (सायं एवं प्रातः) अग्निहोत्र करे ॥ २५ ॥ ततोऽभिवादयेद्वृद्धानसावहमिति ब्रुवन् । तदनन्तरं वृद्धान् गुरुप्रभृतीन्अभिवादयेत् । कथम् ? असौ देवदत्तशर्माऽहमिति स्वं नाम कीर्तयन् ॥— गुरुं चैवाप्युपासीत स्वाध्यायर्थं समाहितः ॥ २६ ॥ आहूतश्चाप्यधीयीत लब्धं चास्मै निवेदयेत् । हितं तस्याचरेन्नित्यं मनोवाक्कायकर्मभिः ॥ २७ ॥ तथा गुरुं वक्ष्यमाणलक्षणमुपासीत तत्परिचर्यापरस्तदधीनस्तिष्ठेत् । स्वाध्या- यार्थमध्ययनसिद्धये समाहितोऽविक्षिप्तचित्तो भवेत् । आहूतश्चाप्यधीयीत गुर्वाहूत एवाधीयीत, न स्वयं गुरुं प्रेरयेत् । यच्च लब्धं तत्सर्वं गुरवे निवेदयेत् । तथा तस्य गुरोर्हितमाचरेत् । नित्यं सदा । मनोवाक्कायकर्मभिः न प्रतिकूलं कुर्यात् । अपिशब्दाद्गुरुदर्शने गौतमोक्तं कण्ठप्रावृतादि वर्जयेत् ॥ २६-२७ ॥ भाषा—तब 'मैं अमुक हूँ' ऐसा कहते हुए श्रेष्ठ व्यक्तियों को प्रणाम करे । अध्ययन के लिए दत्तचित होकर गुरु की परिचर्या करे । (गुरु द्वारा) बुलाये जाने पर ही अध्ययन करे और जो कुछ प्राप्त हो वह सब गुरु को अर्पित करे । मन, वाणी, शरीर और कार्यों द्वारा उनके अनुकूल कार्य करे ॥ २६-२७ ॥ कृतज्ञाद्रोहिमेधाविशुचिकल्या²नसूयकाः । अध्याप्या धर्मतः साधुशक्ताप्तज्ञानवित्तदाः ॥ २८ ॥ १. लब्धं तस्मै । २. कल्याणसूचकाः । ३. अध्याप्याः साधुशक्ताप्तस्वार्थदा धर्मतस्त्विमे ।