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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पूर्वार्ध सोलहवां अध्याय

पूर्वार्ध सोलहवां अध्याय यह सर्वप्रथम तांबे जैसे रंग का होता है. फिर अरुण ( लाल ) रंग का और उस के बाद भूरे रंग का हो जाता है. ये जो रुद्र देव हैं इन की शक्तियां विभिन्न दिशाओं में फैली हुई हैं. सूर्य की हजारों किरणों की तरह इन की हजारों शक्तियां हैं. हम इन रुद्र देव को नमस्कार करते हैं और अपने प्रति उन की प्रशंसा चाहते हैं. ( ६ ) असौ यो ऽ वसर्पति नीलग्रीवो विलोहितः. उतैनं गोपा ऽ अदृश्रन्नदृश्रन्नुदहार्यः स दृष्टो मृडयाति नः.. ( ७ ) रुद्र देव निरंतर गतिशील रहते हैं वे नीली गरदन वाले हैं और खास प्रकार के लाल रंग वाले हैं. सुबह ही सुबह ग्वाले और पनिहारिनें इन के दर्शन करती हैं. उन के दर्शन हमारे लिए भी सुखकारी हों. ( ७ ) नमो ऽ स्तु नीलग्रीवाय सहस्राक्षाय मीढुषे. अथो ये अस्य सत्वानो ऽ हं तेभ्यो ऽ करं नमः.. ( ८ ) नीली गरदन वाले रुद्र देव के लिए नमन. हजारों आंखों वाले रुद्र देव के लिए नमन. वर्षा करने वाले रुद्र देव के लिए नमन. सत्यवान रुद्र देव के लिए नमन. ( ८ ) प्रमुञ्च धन्वनस्त्वमुभयोरात्र्योर्ज्याम्. याश्च ते हस्त ऽ इषवः परा ता भगवो वप.. ( ९ ) रुद्र देव धनुष की प्रत्यंचा को उतार लें. वे धारण किया हुआ अपना धनुष उतारने की कृपा करें. हाथ में जो बाण हैं वे अपनी तीक्ष्णता छोड़ने की कृपा करें. ( ९ ) विज्यं धनुः कपर्दिनो विशल्यो बाणवाँ २ उत. अनेशन्नस्य या ऽ इषव ऽ आभुरस्य निषङ्गाधिः.. ( १० ) रुद्र देव का धनुष विजयी हो. उन का धनुष प्रत्यंचा हीन हो जाए. उन का धनुष बाण और तरकसहीन हो जाए. इन का तलवार रखने का स्थान रिक्त हो जाए. कहीं भी उन के बाण न दिखाई पड़ें. ( १० ) या ते हेतिर्मीढुष्टम हस्ते बभूव ते धनुः. तयास्मान्विश्वतस्त्वमयक्ष्मया परि भुज.. ( ११ ) हे रुद्र देव! आप के हाथ में धनुष है. आप हमें रोग व हिंसा से बचाइए. आप सुखदाता हैं. ( ११ ) परि ते धन्वनो हेतिरस्मान्वृणक्तु विश्वतः. अथो य ऽ इषुधिस्तवारे अस्मान्निधेहि तम्.. ( १२ ) हे रुद्र देव! आप अपने धनुष से सब ओर से, सब प्रकार से हमारी रक्षा कीजिए. अपने बाण हमारे लिए मत धारिए. ( १२ ) १९६ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध सोलहवां अध्याय अवतत्य धनुष्ट्व ँ सहस्राक्ष शतेषुधे. निशीर्य शल्यानां मुखा शिवो नः सुमना भव.. (१३) हे रुद्र देव! आप हजारों आंखों वाले व सैकड़ों तरकस वाले हैं. आप बाणों के मुंह निकाल दीजिए. बाणों के मुंह हमारे लिए कल्याणकारी हों. हम अच्छे मन वाले हों. ( १३ ) नमस्त ऽ आयुधायानातताय धृष्णवे. उभाभ्यामुत ते नमो बाहुभ्यां तव धन्वने.. (१४) आततायियों के लिए आयुध धारण करने वाले रुद्र देव के लिए नमन. आप की दोनों बाहुओं व आप के धनुष और तरकस दोनों के लिए नमन. ( १४ ) मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकं मा न ऽ उक्षन्तमुत मा न ऽ उक्षितम्. मा नो वधीः पितरं मोत मातरं मा नः प्रियास्तन्वो रुद्र रीरिषः.. (१५) हे रुद्र देव! जो हमारे प्रिय हैं व जो हमारे इष्ट हैं, आप उन की रक्षा करने की कृपा कीजिए. आप हमारे महान् लोगों का वध मत कीजिए. आप हमारे छोटे बच्चों का वध मत कीजिए. आप हमारे मातापिता आदि का वध मत कीजिए. ( १५ ) मा नस्तोके तनये मा न ऽ आयुषि मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः. मा नो वीरान् रुद्र भामिनो वधीर्हविष्मन्तः सदमित् त्वा हवामहे.. (१६) हे रुद्र देव! आप हमारे पुत्रों को नष्ट न करें. आप हमारे पौत्रों को नष्ट न करें. आप हमारी आयु को नष्ट न करें. आप हमारी गायों को नष्ट न करें. आप हमारे घोड़ों को नष्ट न करें. आप हमारे वीरों को नष्ट न करें. आप हमारी स्त्रियों को नष्ट न करें. हम सब हविमान हो कर आप का आह्वान कर रहे हैं. ( १६ ) नमो हिरण्यबाहवे सेनान्ये दिशां च पतये नमो नमो वृक्षेभ्यो हरिकेशेभ्यः पशूनां पतये नमो नमः शष्पिञ्जराय त्विषीमते पथीनां पतये नमो नमो हरिकेशायोपवीतिने पुष्टानां पतये नमः.. (१७) सोने से सज्जित बाहु वाले को नमन. दिशापति को नमन. सेनानी को नमन. वृक्षों को नमन. हरे बालों वाले को नमन. पशुपति को नमन. कोंपल जैसे रंग वाले को नमन. पथपति को नमन. हरे केश वाले को नमन. यज्ञोपवीतधारी को नमन. पुष्टता के स्वामी को नमन. ( १७ ) नमो बभ्लुशाय व्याधिने ऽ न्नानां पतये नमो नमो भवस्य हेत्यै जगतां पतये नमो नमो रुद्रायातातयिने क्षेत्राणां पतये नमो नमः सूतायाहन्त्यै वनानां पतये नमः.. (१८) भूरे रंग वाले को नमन. रोगपति को नमन. अन्नपति को नमन. जगहित हेतु आयुधधारी को नमन. संसारपति को नमन. आततायियों से बचाने वाले को नमन. यजुर्वेद - १९७

पूर्वार्ध सोलहवां अध्याय क्षेत्रपति को नमन. अवह्य सारथी को नमन. वनों के स्वामी को नमन. रुद्र देव को नमन. रुद्र देव को नमन. रुद्र देव को नमन. ( १८ ) नमो रोहिताय स्थपतये वृक्षाणां पतये नमो नमो भुवन्तये वारिवस्कृतायौषधीनां पतये नमो नमो मन्त्रिणे वाणिजाय कक्षाणां पतये नमो नम ऽ उच्चैर्घोषायाक्रन्दयते पत्तीनां पतये नमः... (१९) लाल रंग वाले स्थापक देव को नमन. वृक्षपति को नमन. भुवनपति को नमन. धनपति को नमन. ओषधिपति को नमन. मंत्रणादाता को नमन. व्यापारपति को नमन. कक्षापति को नमन. उच्चघोष करने वाले को नमन. भयंकर क्रंदन करने वाले को नमन. ( १९ ) नमः कृत्स्नायतया धावते सत्वनां पतये नमो नमः सहमानाय निव्याधिन ऽ - आव्याधिनीनां पतये नमो नमो निषङ्गिणे ककुभाय स्तेनानां पतये नमो नमो निचेरवे परिचरायारण्यानां पतये नमः... (२०) सत्यपति को नमन. चोर नियंत्रक को नमन. रोग नियंत्रक को नमन. उपद्रव नियंत्रक को नमन. अपहरण नियंत्रक को नमन. वनपालक को नमन. रुद्र देव को नमन. ( २० ) नमो वञ्चते परिवञ्चते स्तायूनां पतये नमो नमो निषङ्गिण ऽ इषुधिमते तस्कराणां पतये नमो नमः सृकायिभ्यो जिघासद्भ्यो मुष्णतां पतये नमो नमोसिमद्भ्यो नक्तञ्चरद्भ्यो विकृन्तानां पतये नमः... (२१) ठगने और लूटने वालों के नियंत्रक को नमन. गुप्तचरों के नियंत्रक को नमन. उपद्रव नियंत्रक को नमन. चोरपति को नमन. शस्त्रयुक्त शत्रुनाशक को नमन. मूठ पति को नमन. रात्रिपति को नमन. परधन हारक को नमन. ( २१ ) नम ऽ उष्णीषिणे गिरिचराय कुलुञ्चानां पतये नमो नम ऽ इषुमद्भ्यो धन्वायिभ्यश्च वो नमो नम ऽ आतन्वानेभ्यः प्रतिदधानेभ्यश्च वो नमो नम ऽ आयच्छद्भ्यो ऽ स्यद्भ्यश्च वो नमः... (२२) पगड़ीधारी को नमन. पर्वत पर विचरने वाले को नमन. धन हरने वालों के नियंत्रक को नमन. दुष्टों को डराने वाले रुद्र देव को नमन. धनुष बाणधारी को नमन. बाण प्रहरी रुद्र को नमन. धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने वाले रुद्र को नमन. ( २२ ) नमो विसृजद्भ्यो विध्यद्भ्यश्च वो नमो नमः स्वपद्भ्यो जाग्रद्भ्यश्च वो नमो नमः शयानेभ्य ऽ आसीनेभ्यश्च वो नमो नमस्तिष्ठद्भ्यो धावद्भ्यश्च वो नमः... (२३) बाण छोड़ने वाले को नमन. शत्रुवध करने वाले को नमन. सोने वाले को नमन. १९८ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध सोलहवां अध्याय जागने वाले को नमन. बैठने वाले को नमन. ठहरने वाले को नमन. दौड़ने वाले को नमन. चित्त में विराजमान रुद्र देव को नमन. ( २३ ) नमः सभाभ्यः सभापतिभ्यश्च वो नमो नमो ऽ श्वेभ्यो ऽ श्वपतिभ्यश्च वो नमो नम ऽ- आव्याधिनीभ्यो विविध्यन्तीभ्यश्च वो नमो नम ऽ उगणाभ्यस्तृ ँ हतीभ्यश्च वो नमः.. ( २४) सभा स्वरूप रुद्र देव को नमन. सभापति रुद्र देव को नमन. अश्वपति रुद्र देव को नमन. निरोगपति रुद्र देव को नमन. युद्ध में सहायक रुद्र देव को नमन. शत्रु प्रहरी रुद्र देव को नमन. ( २४ ) नमो गणेभ्यो गणपतिभ्यश्च वो नमो नमो ब्रातेभ्यो ब्रातपतिभ्यश्च वो नमो नमो गृत्सेभ्यो गृत्सपतिभ्यश्च वो नमो नमो विरूपेभ्यो विश्वरूपेभ्यश्च वो नमः.. ( २५) गणों को नमन. गणपति को नमन. व्रतपति को नमन. व्रत के अधिपति को नमन. बुद्धिमान को नमन. बुद्धिमानों को नमन, विविध रूपवान को नमन. बहुत रूपवान को नमन. ( २५ ) नमः सेनाभ्यः सेनानिभ्यश्च वो नमो नमो रथिभ्यो अरथेभ्यश्च वो नमो नमः क्षत्तृभ्यः संगृहीतृभ्यश्च वो नमो नमो महद्द्भ्यो अर्भकेभ्यश्च वो नमः.. ( २६) सेना स्वरूप को नमन. सेनापति को नमन. रथवान को नमन. रथहीन को नमन. क्षत्रिय को नमन. संग्रहकर्ता को नमन. महान् स्वरूप को नमन. कनिष्ठ को नमन. ( २६ ) नमस्तक्षभ्यो रथकारेभ्यश्च वो नमो नमः कुलालेभ्यः कमारिभ्यश्च वो नमो नमो निषादेभ्यः पुञ्जिष्ठेभ्यश्च वो नमो नमः श्वनिभ्यो मृगयुभ्यश्च वो नमः.. ( २७) तरकसकार और रथकार को नमन. कुम्हार और लोहार को नमन. भील और जंगलवासी को नमन. कुत्ता पालक और शिकारियों को नमन. ( २७ ) नमः श्वभ्यः श्वपतिभ्यश्च वो नमो नमो भवाय च रुद्राय च नमः शर्वाय च पशुपतये च नमो नीलग्रीवाय च शितिकण्ठाय च.. ( २८) कुत्तों को नमन. कुत्तों के स्वामी के लिए नमन. संसार के स्वामी को नमन. रुद्र देव के लिए नमन. विश्व स्वामी को नमन. पशुपति के लिए नमन. पशुपति को नमन. नीली गरदन वाले व नीले कंठ वाले के लिए नमन. ( २८ ) नमः कपर्दिने च व्युप्तकेशाय च नमः सहस्राक्षाय च शतधन्वने च नमो गिरिशयाय च शिपिविष्टाय च नमो मीढुष्टमाय चेषुमते च.. (२९) जटामय रुद्र को नमन. मुंडित के लिए नमन. हजारों आंखों वाले के लिए यजुर्वेद - १९९

पूर्वार्ध सोलहवां अध्याय नमन. सैकड़ों धनुष वाले के लिए नमन. गिरि में सोने वाले के लिए नमन. सभी में व्याप्त के लिए नमन. सुखदाता के लिए नमन. इषुमान ( बाणधारी ) के लिए नमन. ( २९ ) नमो ह्रस्वाय च वामनाय च नमो बृहते च वर्षीयसे च नमो वृद्धाय च सवृधे च नमो ऽग्र्याय च प्रथमाय च.. ( ३०) ह्रस्व के लिए नमन. वामन के लिए नमन. विशाल के लिए नमन. वर्ष वालों के लिए नमन. वृद्ध के लिए नमन. आकर्षक युवारूप के लिए नमन. अग्रणी के लिए नमन. प्रथम के लिए नमन. ( ३० ) नम ऽ आशवे चाजिराय च नमः शीघ्र्याय च शीभ्याय च नम ऽ ऊर्म्याय चा वस्वन्‍याय च नमो नादेयाय च द्वीप्याय च.. (३१) तीव्र गति वाले के लिए नमन. शीघ्र कर्म करने वाले के लिए नमन. वेगवान के लिए नमन. लहर वाले के लिए नमन. जल में स्थित के लिए नमन. नदी में व द्वीप पर रहने वाले के लिए नमन. ( ३१ ) नमो ज्येष्ठाय च कनिष्ठाय च नमः पूर्वजाय चापरजाय च नमो मध्यमाय चापगल्भाय च नमो जघन्याय च बुध्याय च.. (३२) ज्येष्ठ के लिए नमन. कनिष्ठ के लिए नमन. पूर्वज के लिए नमन. वर्तमान के लिए नमन. मध्यम के लिए नमन. अप्रौढ़ के लिए नमन. जघन्य और जाग्रत के लिए नमन. ( ३२ ) नमः सोभ्याय च प्रतिसर्याय च नमो याम्याय च क्षेम्याय च नमः श्लोक्याय चावसान्याय च नम ऽ उर्वर्याय च खल्याय च.. (३३) सौम्य के लिए नमन. प्रत्याक्रमण करने वाले के लिए नमन. न्यायकर्ता के लिए नमन. कुशलक्षेम वाले के लिए नमन. श्लोक वाले के लिए नमन. समापन वाले के लिए नमन. लहरों वाले व संग्रह करने वाले के लिए नमन. ( ३३ ) नमो वन्याय च कक्ष्याय च नमः श्रवाय च प्रतिश्रवाय च नम ऽ आशुषेणाय चाशुरथाय च नमः शूराय चावभेदिने च.. (३४) वन देव के लिए नमन. कक्ष में स्थित के लिए नमन. काम में स्थित लिए नमन. प्रतिश्रवण में स्थित के लिए नमन. शीघ्रगामी रथ वाले के लिए नमन. शूरवीर व शत्रुओं के हृदय भेदक के लिए नमन. ( ३४ ) नमो बिल्मिने च कवचिने च नमो वर्मिणे च वरूथिने च नमः श्रुताय च श्रुतसेनाय च नमो दुन्दुभ्याय चाहनन्याय च.. (३५) २०० - यजुर्वेद

पूर्वार्ध सोलहवां अध्याय सिर की रक्षा हेतु धारण करने वाले ( उपकरण ) के लिए नमन. कवचधारी के लिए नमन. रथ के भीतर या हाथी के हौदे में बैठने वाले के लिए नमन. प्रख्यात के लिए नमन. प्रख्यात सेना के लिए नमन. दुंदुभि व वाद्य वाले के लिए नमन. ( ३५ ) नमो धृष्णवे च प्रमृशाय च नमो निष्षङ्गिणे चेषुधिमते च नमस्तीक्ष्णेषवे चायुधिने च नमः स्वायुधाय च सुधन्वने च.. (३६) धैर्यधारी के लिए नमन. परामर्श ( करने में दक्ष ) के लिए नमन. बाणधारी के लिए नमन. तरकस धारण करने वाले के लिए नमन. तीक्ष्ण बाणों वाले के लिए नमन. आयुधधारी के लिए नमन. स्वयं के आयुध वाले व सुंदर धनुष वाले के लिए नमन. ( ३६ ) नमः स्रुत्याय च पथ्याय च नमः काट्याय च नीप्याय च नमः कुल्याय च सरस्याय च नमो नादेयाय च वैशन्ताय च.. (३७) छोटे मार्ग में स्थित रहने के लिए नमन. बड़े मार्ग में स्थित रहने के लिए नमन. कठोर मार्ग में स्थित रहने के लिए नमन. पहाड़ के निचले भाग में स्थित रहने के लिए नमन. पतली नदी वाले के लिए नमन. सरोवर वाले के लिए नमन. नदी में रहने वाले व छोटे तालाब में रहने वाले के लिए नमन. ( ३७ ) नमः कूप्याय चावट्याय च नमो वीध्र्याय चातप्याय च नमो मेघ्याय च विद्युत्याय च नमो वर्ष्याय चावर्ष्याय च.. (३८) कुएं में स्थित रहने वाले के लिए नमन. गड्ढे में रहने वाले के लिए नमन. प्रकाश और धूप में रहने वाले के लिए नमन. बादलों में रहने वाले के लिए नमन. विद्युत में रहने वाले के लिए नमन. वर्षा में रहने वाले व अवर्षा में रहने वाले के लिए नमन. ( ३८ ) नमो वात्याय च रेष्म्याय च नमो वास्तव्याय च वास्तुपाय च नमः सोमाय च रुद्राय च नमस्ताम्राय चारुणाय च.. (३९) हवा में स्थित के लिए नमन. प्रलय में स्थित के लिए नमन. वास्तुकला में स्थित के लिए नमन. वास्तुकला का पालन करने वाले के लिए नमन. सोम देव के लिए नमन. रुद्र देव के लिए नमन. तांबे जैसे रंग वाले व गुलाबी रंग वाले के लिए नमन. ( ३९ ) नमः शङ्गवे च पशुपतये च नम ऽ उग्राय च भीमाय च नमो ऽ ग्रेवधाय च दूरेवधाय च नमो हन्त्रे च हनीयसे च नमो वृक्षेभ्यो हरिकेशेभ्यो नमस्ताराय.. (४०) सींग वाले के लिए नमन. पशुपति के लिए नमन. उग्र के लिए नमन. भीम के लिए नमन. अग्र के लिए नमन. विचारवान के लिए नमन. दूर का विचार करने वाले यजुर्वेद - २०१

पूर्वार्ध सोलहवां अध्याय के लिए नमन. शत्रुहंता के लिए नमन. शत्रुओं के हनन में लगे हुए के लिए नमन. वृक्ष में स्थित के लिए नमन. हरे केश वाले व तारने वाले के लिए नमन. ( ४० ) नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शङ्कराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च.. (४१) शंभु के लिए नमन. दोनों देवों के लिए नमन. शंकर के लिए नमन. मय के लिए नमन. शिव व उन से इतर देव के लिए नमन. ( ४१ ) नमः पार्याय चावार्याय च नमः प्रतरणाय चोत्तरणाय च नमस्तीर्थ्याय च कूल्याय च नमः शष्प्याय च फेन्याय च.. (४२) समुद्र के इस पार वाले के लिए नमन. समुद्र के उस पार वाले के लिए नमन. पार लगाने वाले के लिए नमन. तीर्थवासी के लिए नमन. तट पर स्थित के लिए नमन. घास में स्थित के लिए नमन. समुद्र में फेन के लिए नमन. ( ४२ ) नमः सिकत्याय च प्रवाह्याय च नमः कि ᳪ शिलाय च क्षयणाय च नमः कपर्दिने च पुलस्तये च नम ऽ इरिण्याय च प्रपथ्याय च.. (४३) रेत में स्थित के लिए नमन. प्रवाह में स्थित के लिए नमन. पत्थर में स्थित के लिए नमन. जल में स्थित के लिए नमन. कौड़ी, सीप आदि में स्थित के लिए नमन. पुल में स्थित के लिए नमन. तिनकों और श्रेष्ठ पथ में स्थित के लिए नमन. ( ४३ ) नमो व्रज्याय च गोष्ठ्याय च नमस्तल्प्याय च गेह्याय च नमो हृदय्याय च निवेष्प्याय च नमः काट्याय च गह्वरेष्ठाय च.. (४४) चरागाह में स्थित के लिए नमन. बाड़े में स्थित के लिए नमन. शय्या में स्थित के लिए नमन. घर में स्थित के लिए नमन. हृदय में स्थित के लिए नमन. कठिन राह में स्थित के लिए नमन. काट कर बनाई गई गुफा व गह्वर ( गहरा ) में स्थित के लिए नमन. ( ४४ ) नमः शुष्क्याय च हरित्याय च नमः पा ᳪ सव्याय च रजस्याय च नमो लोप्याय चोलप्याय च नम ऽ ऊर्व्याय च सूर्याय च.. (४५) सूखी लकड़ी में स्थित के लिए नमन. हरियाली में स्थित के लिए नमन. पुष्प में स्थित के लिए नमन. धूल में स्थित के लिए नमन. अदृश्य में स्थित के लिए नमन. दृश्य में स्थित के लिए नमन. उर्वर व अधिकाधिक में स्थित के लिए नमन. ( ४५ ) नमः पर्णाय च पर्णशदाय च नम ऽ उदुरमाणाय चाभिघ्नते च नम ऽ आखिदते च प्रखिदते च नम ऽ इषुकृद्भ्यो धनुष्कृद्भ्यश्च वो नमो नमो वः किरिकेभ्यो देवाना ᳪ हृदयेभ्यो नमो विचिन्वत्केभ्यो नमो विक्षिणत्केभ्यो नम ऽ आनिर्हतेभ्यः.. (४६) २०२ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध सोलहवां अध्याय पत्तों में विराजने वाले के लिए नमस्कार. नीचे गिरे हुए पत्तों में विराजने वाले के लिए नमस्कार. उत्पन्न होने के लिए निरंतर प्रयास में रहने वाले के लिए नमस्कार. शत्रुओं के संहारक के लिए नमस्कार. कर्महीन को दुःख देने वाले के लिए नमन. बाण पैदा करने वाले के लिए नमन. धनुष पैदा करने वाले के लिए नमन. देवताओं के हृदय में वास करने वाले के लिए नमन. सृष्टि का चिंतन करने वाले के लिए नमन. पापपुण्य में रहने वालों को विभक्त करने वाले के लिए नमन. (४६) द्रापे अन्धसस्पते दरिद्र नीललोहित. आसां प्रजानामेषां पशूनां मा भेर्मा रोङ्मो च नः किंचनाममत्.. (४७) हे रुद्र देव! आप पापियों को अधोगति देने वाले हैं. आप अन्न बल के स्वामी हैं. आप नीले और लाल रंग के हैं. आप प्रजा को कष्ट न देने वाले हैं. आप पशुओं को भयभीत नहीं होने देते हैं. आप हमें थोड़ा सा भी रोग ग्रस्त मत होने दीजिए. (४७) इमा रुद्राय तवसे कपर्दिने क्षयद्वीराय प्र भरामहे मतीः. यथा शमसद् द्विपदे चतुष्पदे विश्वं पुष्टं ग्रामे ऽ अस्मिन्नानातुरम्.. (४८) हम यजमान अपनी बुद्धि रुद्र देव को अर्पित करते हैं. वे वीरों के प्रेरक व अति बलवान हैं. जैसे दोपायों और चौपायों के शांत रहने से गांव शांत रहते हैं, वैसे ही हम सब के शांत और चिंता मुक्त रहने से हमारे गांव भी शांतिमय रहें. (४८) या ते रुद्र शिवा तनूः शिवा विश्वाहा भेषजी. शिवा रुतस्य भेषजी तया नो मृड जीवसे.. (४९) हे रुद्र देव! आप कल्याण स्वरूप हैं. ओषधि की तरह बीमारी से मुक्त करने वाले हैं. शरीर को ताजगी देने वाले हैं. आप का वह स्वरूप हमारे लिए सुखदायी हो. (४९) परि नो रुद्रस्य हेतिर्वृणक्तु परि त्वेषस्य दुर्मतिरघायोः. अव स्थिरा मघवद्भ्यस्तनुष्व मीढ्वस्तोकाय तनयाय मृड.. (५०) हे रुद्र देव! आप हमें अस्त्रशस्त्रों से दूर रखिए. हम दुर्मति होने से बचें. हम क्रोधित होने से बचें. हे मघवन्! आप अपना धनुष और प्रत्यंचा उतार दीजिए. ताकि यजमान निर्भय हो सकें. आप हमारी पीढ़ियों को सुखी बनाने की कृपा कीजिए. (५०) मीढुष्टम शिवतम शिवो नः सुमना भव. परमे वृक्ष ऽ आयुधं निधाय कृत्तिं वसान ऽ आ चर पिनाकं बिभ्रदा गहि.. (५१) हे रुद्र देव! आप अभीष्ट फलदाता व अतीव कल्याण करने वाले हैं. आप यजुर्वेद - २०३

पूर्वार्ध सोलहवां अध्याय

पूर्वार्ध सोलहवां अध्याय हमारे प्रति कल्याणकारी व अच्छे मन वाले होइए. आप वृक्ष की ठेठ ऊंचाई पर अपने आयुध रख दीजिए. पशुओं की खाल के वस्त्र धारण कर के पधारिए. आप केवल अपना धनुष धारण कर के आइए. ( ५१ ) विकिरिद्र विलोहित नमस्ते अस्तु भगवः. यास्ते सहस्त्र १४ हेतयो ऽ न्यमस्मन्नि वपन्तु ताः... (५२) हे रुद्र देव! आप उपद्रवनाशी हैं. आप शुद्ध स्वरूप हैं. आप हमें भाग्यवान बनाइए. आप को नमस्कार. आप के हजारों अस्त्र हमारे हित साधक हों. वे अस्त्र अन्यों (दुश्मनों) पर पड़ें. ( ५२ ) सहस्राणि सहस्रशो बाह्वोस्तव हेतयः. तासामीशानो भगवः पराचीना मुखा कृधि.. (५३) हे रुद्र देव! आप की बाहुओं में हजारों प्रकार के हजारों अस्त्रशस्त्र हैं. आप उन आयुधों का मुंह हमारी ओर से फेरने की कृपा कीजिए. ( ५३ ) असंख्याता सहस्राणि ये रुद्रा ऽ अधि भूम्याम्. तेषा १४ सहस्रयोजने ऽ व धन्वानि तन्मसि.. (५४) हे रुद्र देव! आप असंख्य लोगों के नियंत्रक हैं. आप के हजारों गण भूमि पर अधिष्ठित हैं. आप अपने धनुषों को हम से हजारों योजन ( दूरी सूचक एक इकाई ) दूर रखने की कृपा कीजिए. ( ५४ ) अस्मिन् महत्यर्णवे ऽ न्तरिक्षे भवा ऽ अधि. तेषा १४ सहस्रयोजने ऽ व धन्वानि तन्मसि.. (५५) अनेक लोगों को अपने वश में करने वाले रुद्र देव के हजारों गण इस पृथ्वी पर हैं. वे अपने गणों के धनुषों को हम से दूर रखें. ( ५५ ) नीलग्रीवाः शितिकण्ठा दिव १४ रुद्रा ऽ उपश्रिताः. तेषा १४ सहस्रयोजने ऽ व धन्वानि तन्मसि.. (५६) हे रुद्र देव! आप नीली गरदन व सफेद कंठ वाले हैं. आप स्वर्गलोक में निवास करते हैं. आप अपने धनुषों को हम से हजारों योजन दूर रखिए. ( ५६ ) नीलग्रीवाः शितिकण्ठाः शर्वा ऽ अधः क्षमाचराः. तेषा १४ सहस्रयोजने ऽ व धन्वानि तन्मसि.. (५७) हे रुद्र देव! आप नीली गरदन वाले और सफेद कंठ वाले हैं. आप नीचे भूमंडल में विचरण करते हैं. आप अपने धनुषों को हम से हजारों योजन दूर रखने की कृपा कीजिए. ( ५७ ) २०४ – यजुर्वेद

पूर्वार्ध सोलहवां अध्याय ये वृक्षेषु शष्पिञ्जरा नीलग्रीवा विलोहिताः. तेषा ष् सहस्रयोजने ऽ व धन्वानि तन्मसि.. (५८) हे रुद्र देव! आप नीली गरदन वाले हैं. आप का रंग हरा है. आप अत्यंत तेजस्वी हैं. आप वृक्षादि में अधिष्ठित हैं. आप अपने धनुष को प्रत्यंचा हीन बना कर हम से हजारों योजन दूर रखिए. ( ५८ ) ये भूतानामधिपतयो विशिखासः कपर्दिनः. तेषा ष् सहस्रयोजने ऽ व धन्वानि तन्मसि.. (५९) रुद्र देव! आप भूतों के अधिपति व विशेष शिखा ( चोटी ) सहित हैं. जो जटाधारी हैं, आप उन के धनुषों को प्रत्यंचा रहित बनाइए. आप उन्हें हम से हजारों योजन दूर कीजिए. ( ५९ ) ये पथां पथिरक्ष्य ऽ ऐलबृदा ऽ आयुर्युधः. तेषा ष् सहस्रयोजने ऽ व धन्वानि तन्मसि.. (६०) हे रुद्र देव! आप कई राहों के राहगीरों के रक्षक हैं. अन्न से प्राणियों को पोषण देने वाले व आयुधधारी हैं. जो जीवन के युद्ध में जूझ रहे हैं, आप उन के धनुषों को हम से हजारों योजन दूर कीजिए. आप उन के धनुषों को प्रत्यंचा रहित बनाइए. ( ६० ) ये तीर्थानि प्रचरन्ति सृकाहस्ता निषङ्गिणः. तेषा ष् सहस्रयोजने ऽ व धन्वानि तन्मसि.. (६१) हे रुद्र देव! जो तीर्थों में हाथ में भाले, बाण आदि ले कर विचरते हैं, आप उन के धनुषों को प्रत्यंचा रहित बना दीजिए. आप उन्हें हम से हजारों योजन दूर कर दीजिए. ( ६१ ) ये ऽ नेषु विविध्यन्ति पात्रेषु पिबतो जनान्. तेषा ष् सहस्रयोजने ऽ व धन्वानि तन्मसि.. (६२) हे रुद्र देव! जो पात्रों में अन्न पीने वाले लोगों को परेशान करते हैं, आप उन के धनुषों को प्रत्यंचा रहित बना दीजिए. आप उन के धनुषों को हम से हजारों योजन दूर कर दीजिए. ( ६२ ) य एतावन्तश्च भूया ष् सश्च दिशो रुद्रा वितस्थिरे. तेषा ष् सहस्रयोजने ऽ व धन्वानि तन्मसि.. (६३) हे रुद्र देव! जो दिशाओं और बहुत दिशाओं में स्थित रहते हैं, आप उन के धनुषों को प्रत्यंचा रहित बनाइए. आप उन के धनुषों को हम से हजारों योजन दूर रखने की कृपा कीजिए. ( ६३ ) यजुर्वेद - २०५

पूर्वार्ध सोलहवां अध्याय नमो ऽ स्तु रुद्रेभ्यो ये दिवि येषां वर्षमिषवः. तेभ्यो दश प्राचीर्दश दक्षिणा दश प्रतीचीर्दशोदीचीर्दशोर्ध्वाः. तेभ्यो नमो अस्तु ते नो ऽ वन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः.. (६४) हे रुद्र देव! जो स्वर्गलोक में रहते हैं, जो बरसात की तरह बाण बरसाते हैं, हम उन्हें पूर्व दिशा में नमस्कार करते हैं. हम उन्हें पश्चिम दिशा में नमस्कार करते हैं. हम उन्हें उत्तर दिशा में नमस्कार करते हैं. हम उन्हें दक्षिण दिशा में नमस्कार करते हैं. उन रुद्रगण को नमस्कार हो. रुद्रगण द्वारा हमें सुख और रक्षा प्राप्त हो. जो हम से द्वेष भाव रखते हैं, जिन से हम द्वेषभाव रखते हैं. रुद्रगण अपनी दाढ़ में ऐसे लोगों को रख लें ( दबा लें ). ( ६४ ) नमो ऽ स्तु रुद्रेभ्यो ये ऽ न्तरिक्षे येषां वात ऽ इषवः. तेभ्यो दश प्राचीर्दश दक्षिणा दश प्रतीचीर्दशोदीचीर्दशोर्ध्वाः. तेभ्यो नमो अस्तु ते नो ऽ वन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः.. (६५) हे रुद्रगण! अंतरिक्ष में स्थित आप को नमन. आप के बाण हवा की तरह हैं. हम पूर्व दिशा में उन्हें प्रणाम करते हैं. हम पश्चिम दिशा में उन्हें प्रणाम करते हैं. हम दक्षिण दिशा में उन्हें प्रणाम करते हैं. उन्हें नमस्कार. वे हमारी रक्षा करें और हमें सुख प्रदान करें. जो हम से द्वेष करते हैं, जिन से हम द्वेष करते हैं, रुद्रगण उन्हें अपनी दाढ़ में रख लें ( दबा लें ). ( ६५ ) नमो ऽ स्तु रुद्रेभ्यो ये पृथिव्यां येषामन्नमिषवः. तेभ्यो दश प्राचीर्दश दक्षिणा दश प्रतीचीर्दशोदीचीर्दशोर्ध्वाः. तेभ्यो नमो अस्तु ते नो ऽ वन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः.. (६६) हे रुद्रगण! पृथ्वी पर स्थित आप को नमन. आप के बाण अन्न बरसाते हैं. हम पूर्व दिशा में आप को नमस्कार करते हैं. हम पश्चिम दिशा में आप को नमस्कार करते हैं. हम उत्तर दिशा में आप को नमस्कार करते हैं. हम दक्षिण दिशा में आप को नमस्कार करते हैं. आप हमारी रक्षा करें. आप हमें सुख दें. आप उन्हें दाढ़ में रख लें ( दबा लें ), जो हम से द्वेष रखते हैं जिन से हम द्वेष रखते हैं. ( ६६ ) २०६ – यजुर्वेद

सत्रहवां अध्याय

सत्रहवां अध्याय अश्मन्नूर्जं पर्वते शिश्रियाणामद्भ्य ऽ ओषधीभ्यो वनस्पतिभ्यो अधि सम्भृतं पयः. तां न ऽ इषमूर्जं धत्त मरुतः स ष्ठ रराणा अश्मँस्ते क्षुन्मयि त ऽ ऊर्ग्यं द्विष्मस्तं ते शुगृच्छतु.. (१) हे मरुद्गण! आप हमें अन्न से ऊर्जस्वी बनाने की कृपा करें. आप पत्थरों, ओषधियों, जलों व वनस्पतियों का बल धारिए. उन्हें और अधिक रसपूर्ण बनाइए. आप अन्न धारिए. आप की क्षुधा शांत हो. आप का क्रोध उन लोगों पर हो, जो हम से द्वेष रखते हैं. ( १ ) इमा मे अग्न ऽ इष्टका धेनवः सन्त्वेका च दश च दश च शतं च शतं च सहस्रं च सहस्रं चायुतं चायुतं च नियुतं च नियुतं च प्रयुतं चार्बुदं च न्यर्बुदं च समुद्रश्च मध्यं चान्तश्च परार्धश्चैता मे अग्न ऽ इष्टका धेनवः सन्त्वमुत्रामुष्मिँल्लोके.. (२) हे अग्नि! ये इष्टकाएं ( हवि का सूक्ष्म भाग ) हमारे लिए मनोरथपूरक कामधेनु की तरह हो जाएं. ये इष्टकाएं दस गुनी हो जाएं. दस से दस गुनी हो जाएं. सौ की दस गुनी हजार हो जाएं. हजार की दस गुनी हो कर दस हजार हो जाएं. अयुत ( दस हजार ) की गुनी हो कर नियुत ( लाख ) हो जाएं. नियुत की दस गुनी हो कर प्रयुत ( दस लाख ) हो जाएं. प्रयुत की दस गुनी हो कर करोड़ हो जाएं. करोड़ की दस गुनी हो कर दस करोड़ हो जाएं. दस करोड़ की दस गुनी हो कर अरब हो जाएं. समुद्रसमुद्र की दस गुनी मध्य ( शंख पद्म ), मध्य की दस गुनी अंत. अंत की दस गुनी हो कर परार्द्ध संख्या तक बढ़ती जाएं. हे अग्नि! इष्टकाएं इस लोक और परलोक में हमारा कल्याण करें. ये इष्टकाएं हमारे लिए कामधेनु की तरह हो जाएं. ( २ ) ऋतवः स्थ ऽ ऋतावृध ऽ ऋतुष्ठाः स्थ ऽ ऋतावृधः. घृतश्च्युतो मधुश्च्युतो विराजो नाम कामदुघा ऽ अक्षीयमाणाः.. ( ३) इष्टकाएं सत्य को स्थिर रखती हैं, सत्य की बढ़ोतरी करती हैं, इष्टका सत्य में स्थित रहती हैं. इष्टकाएं सत्य में बढ़ोतरी करती हैं. ये घी व मधु चुआएं. ये शोभित और कामनापूरक हों. कभी क्षीण न हों. ( ३ ) यजुर्वेद - २०७

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय समुद्रस्य त्वावकयाग्ने परि व्ययामसि. पावको अस्मभ्य १४ शिवो भव.. (४) हे अग्नि! हम आप को समुद्र के कवक से चारों ओर से घेर कर रखते हैं. आप हमें पवित्र बनाने वाले हैं. आप हमारे प्रति कल्याणकारी होइए. (४) हिमस्य त्वा जरायुणाग्ने परि व्ययामसि. पावको अस्मभ्य १४ शिवो भव.. (५) हे अग्नि! हम भ्रूण को लपेटने की तरह आप को हिम के आवरण से चारों ओर से घेर लेते हैं. आप हमें पवित्र बनाने वाले हैं. आप हमारे प्रति कल्याणकारी होइए. (५) उप ज्मन्नुप वेतसे ऽ वतर नदीष्वा. अग्ने पित्तमपामसि मण्डूकि ताभिरागहि सेमं नो यज्ञं पावकवर्ण १४ शिवं कृधि.. (६) हे अग्नि! आप हमारे समीप पधारिए. हे अग्नि! आप बड़वाग्नि के साथ नदी में बहते हैं. हे अग्नि! आप जल के पित्त हैं. मंडूकि को अग्नि का अनुसरण करना चाहिए. आप पृथ्वी से बाहर निकलिए. जल में प्रवेश कीजिए. आप हमारे इस यज्ञ को पवित्र व कल्याणकारी बनाइए. (६) अपामिदं न्ययन १४ समुद्रस्य निवेशनम्. अन्याँस्ते अस्मत्तपन्तु हेतयः पावको अस्मभ्य १४ शिवो भव.. (७) यह अग्नि जल के आश्रय समुद्र के घर में रहते हैं. आप हमारे शत्रुओं को तपाइए. आप हमारे इस यज्ञ को पवित्र व कल्याणकारी बनाइए. (७) अग्ने पावक रोचिषा मन्द्रया देव जिह्वया. आ देवान् वक्षि यक्षि च.. (८) हे अग्नि! आप पवित्र करने वाले और चमकने वाले हैं. आप देवों को जिह्वा से बुलाइए. आप यज्ञ कराइए. (८) स नः पावक दीदिवो ऽ ग्ने देवाँ २ इहा वह. उप यज्ञ १४ हविश्च नः.. (९) हे अग्नि! आप पवित्र बनाने वाले हैं. स्वर्गलोक को दीप्तिमय बनाते हैं. आप यहां देवों का आह्वान कीजिए. यज्ञ के समीप विराजने व उन के पास इस हवि को पहुंचाने की कृपा कीजिए. (९) पावकया यश्चितयन्त्या कृपा क्षामन् रुरुच ऽ उषसो न भानुना. तूर्वन् न यामन्नेतशस्य नू रण ऽ आ यो घृणे न ततृषाणो अजरः.. (१०) हे अग्नि! आप पवित्र करने वाली ज्वालाओं से प्रदीप्त होते हैं. जैसे उषा काल में किरणों से घिरा हुआ सूर्य शोभता है, वैसे ही आप ज्वालाओं से शोभते हैं. जैसे वेगवान घोड़े पर बैठा हुआ सैनिक शोभा देता है, उसी प्रकार आप अपने वेग (तेज) से शोभा पाते हैं. (१०) २०८ - यजुर्वेद 632/13

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय नमस्ते हरसे शोचिषे नमस्ते अस्त्वर्चिषे. अन्याँस्ते अस्मत्तपन्तु हेतयः पावको अस्मभ्य १७ँ शिवो भव.. (११) हे अग्नि! आप को नमस्कार. आप की ज्वालाएं चमकीली हैं. आप को नमस्कार. हम आप की अर्चना करते हैं. आप पवित्र करने वाले हैं. जो हमारे द्वेषी हैं, आप उन्हें संतप्त कीजिए. आप हमारे प्रति कल्याणकारी होइए. (११) नृषदे वेड्प्सुषदे वेड् बर्हिषदे वेड् वनसदे वेट् स्वर्विदे वेट्.. (१२) मनुष्यों में स्थित अग्नि ( जठराग्नि ) हेतु आहुति अर्पित है. जलों में स्थित अग्नि ( बड़वाग्नि ) हेतु आहुति अर्पित है. कुश में स्थित अग्नि हेतु आहुति अर्पित है. (१२) ये देवा देवानां यज्ञिया यज्ञियाना १७ँ संवत्सरीणमुप भागमासते. अहुतादो हविषो यज्ञे अस्मिन्त्स्वयं पिबन्तु मधुनो घृतस्य.. (१३) जो देव देवताओं के यज्ञ में यज्ञीय आहुति ग्रहण करते हैं, वे इस यज्ञ में यज्ञ के भाग हवि को ग्रहण करें. देवगण यज्ञ में बिना बुलाए ही मधु और घी की आहुति को स्वयं ही पीने की कृपा करें. (१३) ये देवा देवेष्वधि देवत्वमायन् ये ब्रह्मणः पुर ऽ एतारो अस्य. येभ्यो न ऽ ऋते पवते धाम किञ्चन न ते दिवो न पृथिव्या ऽ अधि स्नुषु.. (१४) जिन देवताओं ने देवाधिदेव की तरह देवत्व का अधिकार पाया, जो ब्राह्मण के सामने विचरते हैं, जिन के बिना शरीर किंचित् ( जरा ) भी पवित्र नहीं होता वे न स्वर्गलोक में हैं, न पृथ्वी में हैं, बल्कि हर एक में विद्यमान हैं. (१४) प्राणदा ऽ अपानदा व्यानदा वर्चोदा वरिवोदाः. अन्यांस्ते अस्मत्तपन्तु हेतयः पावको अस्मभ्य १७ँ शिवो भव.. (१५) हे अग्नि! आप प्राणदाता, अपानदाता, व्यानदाता व वर्चस्वदाता हैं. हे अग्नि! आप वायुदाता व शक्तिदाता हैं. आप के आयुध हमारे शत्रुओं पर पड़ें. आप पवित्र करने वाले हैं. आप हमारे प्रति कल्याणकारी होइए. (१५) अग्निस्तिग्मेन शोचिषा यासद्विश्वं न्यतृत्रिणम्. अग्निर्नो वनते रयिम्.. (१६) हे अग्नि! आप की ज्वालाएं शुचिपूर्ण ( पवित्र ) हैं. हे अग्नि! आप की ज्वालाएं सारे विश्व का कल्याण करने वाली हैं. अग्नि हमें धन प्रदान करने की कृपा करें. (१६) य इमा विश्वा भुवनानि जुह्वदृषिर्होता न्यसीदत् पिता नः. स ऽ आशिषा द्रविणमिच्छमानः प्रथमच्छद्वराँ २ आ विवेश.. (१७) यजुर्वेद - २०९

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय जो परम शक्ति इस पूरे विश्व का पालनपोषण और संहार करती है, हम उन से धन की इच्छा करते हुए पहले ही उन्हें भी अपने वश में रखते हैं और हम भी उन के वश में रहते हैं. ( १७ ) कि ँᳵ स्विदासीदधिष्ठानमारम्भणं कतमत्स्वित्कथासीत्. यतो भूमिं जनयन् विश्वकर्मा वि द्यामौर्णोन्महिना विश्वचक्षाः.. ( १८ ) परमात्मा किस अधिष्ठान पर आरंभ में अधिष्ठित थे ? इन की उत्पत्ति की क्या कथा है ? वह उत्पादक द्रव्य कैसा था ? वह भूमि पर उत्पन्न हुआ. विश्वकर्मा सारे विश्व का द्रष्टा है. स्वर्गलोक तक व्याप्त है. ( १८ ) विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्. सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन् देव ऽ एकः.. (१९) वह परम शक्ति संपूर्ण विश्व पर आंख रखने वाली है. वह परम शक्ति सब ओर मुंह वाली है. वह परम शक्ति सब ओर बाहु वाली है. वह परम शक्ति सब ओर सामर्थ्य वाली है. उस परम शक्ति ने अपने बाहुबल की क्षमता से स्वर्ग को बिना आधार के उत्पन्न किया. परमात्मा एक है. ( १९ ) कि ँᳵ स्विद्वनं क ऽ उ स वृक्ष ऽ आस यतो द्यावापृथिवी निष्टतक्षुः. मनीषिणो मनसा पृच्छतेदु तद्यदध्यतिष्ठद्भुवनानि धारयन्.. (२०) वह वन कौन सा है, वह वृक्ष कौन सा है, जिस से ईश्वर ने स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक को रचा. आप मनीषियों के मन से पूछिए कि सभी भुवनों को धारते हुए वे स्वयं किस स्थान पर अधिष्ठित हैं. ( २० ) या ते धामानि परमाणि यावमा या मध्यमा विश्वकर्मन्नुतेमा. शिक्षा सखिभ्यो हविषि स्वधावः स्वयं यजस्व तन्वं वृधानः.. (२१) जिस ने ये परमधाम रचे; जो उन्नत, निम्न और मध्य धाम का रचयिता है; उस सर्जक के प्रति हम अपना सखा भाव प्रकट करते हैं. हम आप के लिए हवि धारते हैं. हम आप के लिए स्वयं यज्ञ करते हैं और आप के तन की बढ़ोतरी करते हैं. ( २१ ) विश्वकर्मन् हविषा वावृधानः स्वयं यजस्व पृथिवीमुत द्याम्. मुह्यन्त्वन्ये अभितः सपत्ना ऽ इहास्माकं मघवा सूरिरस्तु.. (२२) हे विश्वकर्मा! हम हवि से आप की बढ़ोतरी करते हैं. आप स्वयं यज्ञ कीजिए. आप पृथ्वी के हित के लिए यज्ञ कीजिए. आप हमारे शत्रुओं को मोहित कीजिए. आप यहां ज्ञानवान सूर्य स्वरूप हैं. ( २२ ) वाचस्पतिं विश्वकर्माणमूतये मनोजुवं वाजे अद्या हुवेम. स नो विश्वानि हवनानि जोषद्विश्वशम्भूरवसे साधुकर्मा.. (२३) २१० - यजुर्वेद

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय हम आज अपनी रक्षा के लिए वाचस्पति व विश्वकर्मा को आमंत्रित करते हैं. हम आज अपनी रक्षा के लिए मन जैसे वेगवान को आमंत्रित करते हैं. आप सत्कर्म करने वाले हैं. आप हमारे यज्ञ में हमारे द्वारा भेंट की गई हवि का प्रेम से भोग लगाइए. ( २३ ) विश्वकर्मन् हविषा वर्धनेन त्रातारमिन्द्रमकृणोरवध्यम्. तस्मै विशः समनमन्त पूर्वीरयमग्रो विहव्यो यथासत्.. ( २४ ) आप विश्व के रचयिता हैं. आप ने हवियों से इंद्र देव की बढ़ोत्तरी की. आप ने इंद्र देव को संसार का रक्षक बनाया. आप ने इंद्र देव को अवध्य बनाया. इंद्र देव को मन से नमस्कार करते हैं. हम उन्हें नम कर ( झुक कर ) नमस्कार करते हैं. इंद्र देव अपूर्व, उग्र और सर्वसमर्थ हैं. ( २४ ) चक्षुषः पिता मनसा हि धीरो घृतमेने अजनन्नम्नमाने. यदेदन्ता ऽ अददृहन्त पूर्व ऽ आदिद् द्यावापृथिवी अप्रथेताम्.. ( २५ ) हमारे पिता ( पूर्वजों ) ने सृष्टि के आरंभ में स्वर्गलोक तथा पृथ्वीलोक को सुदृढ़ बनाया. सृष्टि के आरंभ में उन का विस्तार किया. पिता ने चक्षु ( आंख ) आदि सभी इंद्रियों का पालन किया. पिता ने धीर हो कर पृथ्वी को घी से सींचा. ( २५ ) विश्वकर्मा विमना ऽ आद्विहाया धाता विधाता परमोत सन्दृक्. तेषामिष्टानि समिषा मदन्ति यत्रा सप्तऋषीन् पर ऽ एकमाहुः.. ( २६ ) जग की रचना में सृष्टि रचयिता के साथ सात ऋषियों ने अद्वितीय सहयोग किया. वह परम शक्ति एक है. धाता है. विधाता है. पोषक है. सर्वश्रेष्ठ है. उन की कृपा से सभी इष्ट कार्य पूर्ण होते हैं. वे हवि से प्रसन्न होते हैं. ( २६ ) यो नः पिता जनिता यो विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा. यो देवानां नामधा ऽ एक ऽ एव त १७ सम्प्रश्नं भुवना यन्त्यन्या.. ( २७ ) जो परमेश्वर हमारे पिता हैं, जो सब के जनक हैं, जो विधाता हैं, सब वेदों के धाम हैं, सब विश्व के भुवनों के ज्ञाता हैं, जो देवताओं के नाम धारण करते हैं, भले ही वे एक ही हैं, समस्त भुवन ( लोकों ) के प्राणी अंततः उन्हीं के लोक में प्राप्त होते हैं. ( २७ ) त ऽ आयजन्त द्रविण १७ समस्मा ऽ ऋषयः पूर्वे जरितारो न भूना. असूत्ते सूर्त्ते रजसि निषत्ते ये भूतानि समकृण्वन्निमानि.. ( २८ ) उस परमेश्वर ने सब को जना, सभी धनों को उपजाया. समस्त ऋषिगण जिस की उपासना करते हैं. यज्ञ में संपूर्ण वैभव जिसे समर्पित करते हैं, वह परमेश्वर अप्रत्यक्ष रूप से सब में निवास करता है. ( २८ ) यजुर्वेद - २११

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय परो दिवा पर ऽ एना पृथिव्या परो देवेभिरसुरैर्यदस्ति. क १७ स्विद् गर्भं प्रथमं दध्र ऽ आपो यत्र देवाः समपश्यन्त पूर्वे.. (२९) वह परम तत्त्व स्वर्गलोक से परे है. वह परम तत्त्व पृथ्वीलोक व देवताओं से परे है. वह परम तत्त्व असुरों से परे है. जलों ने पहले गर्भ में किसे धारण किया ? जहां देवगण पहले उन्हें देखते हैं. ( २९ ) तमिद्गर्भं प्रथमं दध्र ऽ आपो यत्र देवाः समगच्छन्त विश्वे. अजस्य नाभावध्येकमर्पितं यस्मिन् विश्वानि भुवनानि तस्थुः.. (३०) वह परम तत्त्व सभी देवताओं का आश्रय है. सभी उस परम तत्त्व को प्राप्त होते हैं. उस परम तत्त्व ने सर्वप्रथम जल को अपने गर्भ में धारण किया. परमतत्त्व के नाभि में एक ही परम तत्त्व अधिष्ठित है, जिस में सारे भुवन स्थिर होते हैं. ( ३० ) न तं विदाथ य ऽ इमा जजानान्यद्युष्माकमन्तरं बभूव. नीहारेण प्रावृता जल्प्या चासुतृप ऽ उक्थशासश्चरन्ति.. (३१) उस परम तत्त्व ने सर्वप्रथम ब्रह्मांड को रचा. उसे आप और हम लोग नहीं जानते. वह सब में है भी तथा सब से अलग भी है. कोहरे से ढके बादल की तरह लोग उस परम तत्त्व के बारे में विविध व्यर्थ धारणाओं ( भ्रांतियों ) से ग्रसित रहते हैं. उस की स्तुति नहीं कर पाते. ( ३१ ) विश्वकर्मा ह्याजनिष्ट देव ऽ आदिद्गन्धर्वो अभवद् द्वितीयः. तृतीयः पिता जनितौषधीनामपां गर्भं व्यदधात् पुरुत्रा.. (३२) सर्वप्रथम विश्व का निर्माण करने वाले देवता पृथ्वी पर आए. तत्पश्चात पृथ्वी पर आदि गंधर्व हुए. पृथ्वी पालक ओषधियों में जल उपजाने वाले तीसरे क्रम में हुए. प्रथम रक्षक सभी जलों के गर्भ को विविध रूपों में धारता है. ( ३२ ) आशुः शिशानो वृषभो न भीमो घनाघनः क्षोभणश्चर्षणीनाम्. संक्रन्दनो ऽ निमिषएकवीरः शत १७ सेना ऽ अजयत् साकमिन्द्रः.. (३३) इंद्र देव शीघ्रता से शत्रुओं पर हमला करने वाले हैं. बैल जैसे बलवान हैं. घनघोर गर्जना करने वाले हैं. शत्रुओं के लिए क्षोभकारी हैं. पल भर में शत्रुओं को हराने वाले हैं. इंद्र देव अकेले ही ऐसे वीर हैं, जो सैकड़ों शत्रुओं की सेना को एक साथ जीत लेते हैं. ( ३३ ) संक्रन्दनेनानिमिषेण जिष्णुना युत्कारेण दुश्च्यवनेन धृष्णुना. तदिन्द्रेण जयत तत्सहध्वं युधो नर ऽ इषुहस्तेन वृष्णा.. (३४) गर्जना से पल भर में शत्रुओं को जीतने वाले हैं. आक्रमण के विविध तरीकों से शीघ्र ही युद्ध में तैयार होने वाले हैं. संगठित शत्रुओं को भी जीतने वाले हैं. इंद्र २१२ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय देव से जुड़ कर हम उन के साथ साहसपूर्वक, बलपूर्वक हाथ में बाण ले कर शत्रुओं को जीत जाएं. सुखपूर्वक जीवन गुजारें. ( ३४ ) स ऽ इषुहस्तैः स निष्षङ्गिभिर्वशी स १९ स्रष्टा स युध ऽ इन्द्रो गणेन. स १९ सृष्टजित्सोमपा बाहुशर्ध्युग्रधन्वा प्रतिहिताभिरस्ता.. (३५) इंद्र देव हाथ में बाणधारी हैं. वे वीरों को संगठित करने वाले, संगठित शत्रुओं को भी जीतने वाले व सोमपायी हैं. शत्रु पर बाण प्रहरी, उग्र व धनुषधारी हैं. वे हमारी रक्षा करने की कृपा करें. ( ३५ ) बृहस्पते परि दीया रथेन रक्षोहामित्राँ २ अपबाधमानः. प्रभञ्जन्सेनाः प्रमृणो युधा जयन्नस्माकमेध्यविता रथानाम्.. (३६) हे बृहस्पति देव! आप चारों ओर रथ से भ्रमण करते हैं. आप राक्षसों का विनाश करने वाले और मित्रों की बाधाओं को दूर करने वाले हैं. युद्धों में विनाश करने वालों को युद्ध में जीतते हुए हमारे रथों की रक्षा करने की कृपा करें. ( ३६ ) बलविज्ञाय स्थविरः प्रवीरः सहस्वान् वाजी सहमान ऽ उग्रः. अभिवीरो अभिसत्त्वा सहोजा जैत्रमिन्द्र रथमा तिष्ठ गोवित्.. (३७) इंद्र देव बल के ज्ञाता, युद्ध में स्थिर, प्रकृष्ट ( अत्यंत ) वीर हैं. वे सामर्थ्यवान, बलशाली, साहसी व वीर हैं. वे प्रसिद्ध बलशाली और शत्रुओं की भूमि जीतने वाले हैं. आप सदैव जीतने वाले रथ पर सवार रहते हैं. ( ३७ ) गोत्रभिदं गोविदं वज्रबाहुं जयन्तमज्म प्रमृणन्तमोजसा. इम १९ सजाता ऽ अनु वीरयध्वमिन्द्र १९ सखायो अनु स १९ रभध्वम्.. (३८) हे देवगण! आप गो नाशकों का भेदन करने वाले, गौओं को जानने वाले, वज्र जैसी भुजाओं वाले और जीतने वाले हैं. ओज से शत्रुओं के नाशक हैं. आप इंद्र को वीरों के योग्य कार्यों के लिए उत्साह दिलाएं. आप स्वयं भी उन का अनुकरण करें. हम इंद्र देव के सखा हैं. ( ३८ ) अभि गोत्राणि सहसा गाहमानोदयो वीरः शतमन्युरिन्द्रः. दुश्च्यवनः पृतनाषाड्युध्योस्माक १९ सेना अवतु प्र युत्सु.. (३९) इंद्र देव शत्रुओं को पूरी तरह नष्ट करने वाले, क्रोधी व शत्रुओं को पूरी तरह हराने वाले हैं. वे हमारी सेना की रक्षा करें. वे हमारी सेना को पूरा संरक्षण प्रदान करें. ( ३९ ) इन्द्र ऽ आसां नेता बृहस्पतिर्दक्षिणा यज्ञः पुर ऽ एतु सोमः. देवसेनानामभिभञ्जतीनां जयन्तीनां मरुतो यन्त्वग्रम्.. (४०) यजुर्वेद - २१३

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय इंद्र देव इन सब के नेता हैं. बृहस्पति और इंद्र दोनों देव सेना का नियंत्रण करते हैं. सोम यज्ञ के सम्मुख रहते हैं. मरुद्गण सेना के आगेआगे रहते हैं. विष्णु दाहिनी ओर रहते हैं. ( ४० ) इन्द्रस्य वृष्णो वरुणस्य राज ऽ आदित्यानां मरुता १४ शर्ध ऽ उग्रम्. महामनसां भुवनच्यवानां घोषो देवानां जयतामुदस्थात्.. (४१) इंद्र वरुण व राजा आदित्य देव की इच्छा के अनुसार वर्षा करते हैं. वे मरुद्गण की इच्छा के अनुसार वर्षा करते हैं. महान् मन वाले लोकों में देवताओं का जयघोष गूंजता है. ( ४१ ) उद्धर्षय मघवन्नायुधान्युत्सत्त्वनां मामकानां मना १४ सि. उद्द्वृत्रहन् वाजिनां वाजिनान्युद्रथानां जयतां यन्तु घोषा:... (४२) हे इंद्र देव! आप धनवान हैं. आप अपने आयुधों को तीखा कीजिए. वीरों को व घोड़ों को शीघ्र जाने के लिए उत्साहित कीजिए. आप शत्रुनाशक व बलशाली हैं. रथों के जयघोष सब ओर गूंजें. ( ४२ ) अस्माकमिन्द्रः समृतेषु ध्वजेष्वस्माकं या ऽ इषवस्ता जयन्तु. अस्माकं वीरा ऽ उत्तरे भवन्त्वस्माँ २ उ देवा ऽ अवता हवेषु.. (४३) हमारे इंद्र देव ध्वजों को अच्छी तरह फहराते हैं. हमारे शत्रुओं को जीतें. हमारे बाण शत्रुओं को जीतें. हमारे वीर उत्तरोत्तर विजयी हों. देवगण यज्ञों में हमारी रक्षा करें. ( ४३ ) अमीषां चित्तं प्रतिलोभयन्ती गृहाणाङ्गान्वप्वे परेहि. अभि प्रेहि निर्दह हृत्सु शोकैरन्धेनामित्रास्तमसा सचन्ताम्.. (४४) व्याधियां हमारे शत्रुओं के चित्त को लुभाएं. उन के अंगों को ग्रहण करें. निर्दयता से शत्रुओं के चित्र को चबाएं. उन के हृदय में शोक व्यापे. शोक से शत्रु गहन अंधकार में डूब जाएं. ( ४४ ) अवसृष्टा परा पत शरव्ये ब्रह्मसं १४ शिते. गच्छामित्रान् प्र पद्यस्व मामीषां कं चनोच्छिषः... (४५) ब्रह्मज्ञानमय वचनों से बाण तीखे हो कर अमित्रों पर गिरें. शत्रुओं पर प्रहार करें. उन का उच्छेदन ( विनाश ) करें. ( ४५ ) प्रेता जयता नर ऽ इन्द्रो वः शर्म यच्छतु. उग्रा वः सन्तु बाहवो ऽ नाधृष्या यथासथ.. (४६) हे नरो! इंद्र देव विजयी हों और हमें सुख प्रदान करें. उन की बाहुएं उग्र हों, जिस से वह शत्रुओं पर आक्रमण कर सकें. ( ४६ ) २१४ - यजुर्वेद

पूर्वाध सत्रहवां अध्याय

पूर्वाध सत्रहवां अध्याय असौ या सेना मरुतः परेषामभ्यैति न ऽ ओजसा स्पर्धमाना. तां गूह्त तमसापव्रतेन यथामी अन्यो अन्यं न जानन्.. (४७) मरुतों की सेना हमारे वेग के साथ स्पर्द्धा करने वाले शत्रुओं तक पहुंचे, ताकि भ्रम हो जाने के कारण एक दूसरे को जानने में ही असमर्थ हो जाएं तथा अपने ही लोगों का नाश कर दें. ( ४७ ) यत्र बाणाः सम्पतन्ति कुमारा विशिखा ऽ इव. तन्न ऽ इन्द्रो बृहस्पतिरदितिः शर्म यच्छतु विश्वाहा शर्म यच्छतु.. (४८) जहां बाण ऐसे गिरे जैसे बिना चोटी वाले बालक गिरते हैं, वहां इंद्र देव हमें सुख प्रदान करें. बृहस्पति देव हमें सुख प्रदान करें. अदिति देव हमें सुख प्रदान करें. स्वामी देव हमें सुख प्रदान करें. ( ४८ ) मर्माणि ते वर्मणा छादयामि सोमस्त्वा राजामृतेनानुवस्ताम्. उरोर्वरीयो वरुणस्ते कृणोतु जयन्तं त्वानु देवा मदन्तु.. (४९) हम वीर अपने अंगों को कवच से ढकते हैं. वरुण देव इसे दृढ़ बनाए रखें. सोम राजा हैं. वह सब को अमृत से अमर बनाएं. वरुण देव वरीय हैं. वह हमें विजयी करें. देवगण उन्हें आनंदित करें. ( ४९ ) उदेनमुत्तरां नयाग्ने घृतेनाहुत. रायस्पोषेण स ᳪ सृज प्रजया च बहुं कृधि.. (५०) हे अग्नि! हम यजमान आप के लिए घी से आहुति भेंट करते हैं. आप उस से तृप्त होइए. आप हमें धन से पुष्ट कीजिए. हमारे लिए सुख प्रदान कीजिए. आप हमें बहुत प्रजा ( पुत्रपौत्र ) से समृद्ध कीजिए. ( ५० ) इन्द्रेमं प्रतरां नय सजातानामसद्वशी. समेनं वर्चसा सृज देवानां भागदा ऽ असत्.. (५१) हे इंद्र देव! आप हमें उत्कृष्टता की ओर ले जाइए. आप हमारे सजातियों को हमारे वश में कीजिए. आप हमें समान वर्चस्वी और देवताओं को उन का भाग देने में समर्थ बनाइए. ( ५१ ) यस्य कुर्मो गृहे हविस्तमग्ने वर्धया त्वम्. तस्मै देवा ऽ अधि ब्रुवन्नयं च ब्रह्मणस्पतिः.. (५२) हे अग्नि! हम जिस के घर पर यज्ञ कर्म करते हैं, उन को हवि प्रदान करते हैं, आप उस की बढ़ोतरी करने की कृपा कीजिए. सभी देवता उस का वर्चस्व स्वीकारें. सभी ब्रह्मज्ञान के स्वामी हो जाएं. ( ५२ ) उदु त्वा विश्वे देवा ऽ अग्ने भरन्तु चित्तिभिः. स नो भव शिवस्त्व ᳪ सुप्रतीको विभावसुः.. (५३) यजुर्वेद - २१५