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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

उपशम प्रकरण । ७३१

कुछ नहीं फुरते और आत्मानन्द से पूर्ण होता है और जैसे पूर्णमासी का चन्द्रमा शोभता है तैसे ही वह शोभता है । जो सुषुप्तिबोध में स्थित है वह महातेजवान् होता है और आत्मानन्द से पूर्ण चन्द्रमा की नाईं हो जाता है । हे रामजी ! जो सुषुप्तिबोध में स्थित है वह संसार के किसी क्षोभ से चलायमान नहीं होता—जैसे पर्वत सर्वदा काल में क्षोभायमान नहीं होता और भूकम्प में सब वृक्षादिक चलायमान होते हैं पर अस्ताचल पर्वत कम्पायमान नहीं होता, तैसे ही ज्ञानवान् चलायमान नहीं होता । जैसे पर्वत सब काल में सम रहता है और तरु उगके गिर पड़ता है पर्वत ज्यों का त्यों रहता है तैसे ही ज्ञानवान् अनेक प्रकार की क्रिया में सम रहता है । हे रामजी ! ऐसी सुषुप्तिदशा अभ्यासयोग से प्राप्त होती है । जब यह दशा प्राप्त होती है तब उसको तत्त्ववेत्ता तुरीयापद कहते हैं सो परमानन्दस्वरूप है सो उसमें सब दुःख नष्ट हो जाते हैं और असंसक्त हो जाता है । जब मन का मननभाव निवृत्त हो जाता है तब ज्ञानवान् को परम सुख उदय होता है और उससे वह परमानन्द हो जाता है । जो इस संसार को लीलारूप देखता है और सर्वशोक से रहित निर्भय होता है उससे संसारभ्रम दूर हो जाता है । जब तुरीयापद में प्राप्त होता है तब संसार में फिर नहीं गिरता । जो धनवान् पुरुष परमपावनपद में स्थित हुए हैं वे संसार की अवस्था को देखकर हँसते हैं । जैसे पहाड़ पर बैठा पुरुष नगर को जलता देखकर हँसता है तैसे ही ज्ञानवान् आत्मानन्द को पाकर संसार के कार्यों में दुःख जानकर हँसता है । हे रामजी ! तुरीया अवस्था में स्थित होने से अविनाशी होता है और आत्मरूप आत्मबोध से आनन्दित है । जब ऐसे तुरीयापद को प्राप्त होता है तब जन्ममरण के बन्धन से मुक्त होता है और अभिमान आदिक कलना से रहित परमज्योति में लीन होता है । जैसे नमक की गोली समुद्र में जलरूप हो जाती है तैसे ही वह आत्मरूप हो जाता है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे संसक्तिचिकित्सा- नाम पञ्चषष्टितमसर्गः ॥ ६५ ॥

७३२ | योगवाशिष्ठ ।

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब तक तुरीयापद में स्थित रहता है तब तक केवल जीवन्मुक्त होता है और इससे उपरान्त विदेहमुक्त तुरीयातीत हैसो वाणी का विषय नहीं। जैसे आकाश को भुजा से कोई नहीं पकड़ सकता तैसे ही तुरीयातीत वाणी का विषय नहीं। तुरीया विगत से विश्रान्त दूर है विदेह मुक्त से पाता है। अब तुम कुछ काल ऐसी अवस्था में स्थित हो रहो, फिर परमानन्दपद में स्थित होना । हे रामजी ! तुरीयावस्था में जो स्थित हुआ है वह निर्द्वन्द्वभाव को प्राप्त हुआ है। जब तुम अद्वैत दृष्टिरूप सुषुप्ति अवस्था में स्थित होगे तब जगत् के कार्य भी करते रहोगे और सदा पूर्ण रहोगे और तुमको उदय-अस्त का भाव कदाचित् न प्राप्त होगा। जैसे मूर्ति का लिखा चन्द्रमा उदय-अस्त को नहीं प्राप्त होता है तैसे ही तू उदय अस्तभाव को न प्राप्त होवेगा। हे रामजी ! इस शरीर को अपना जानकर जीव रागद्वेष से जलता है और जिस पदार्थ का सन्निवेश होता है उसके नष्ट हुए नष्ट हो जाता है। जैसे मृत्तिका का अन्वय घट में होता है पर घट के नाश हुए मृत्तिका का नाश नहीं होता तैसे ही तुम भ्रम को मत अङ्गीकार करो। तुम सदा ज्यों के त्यों हो तुम्हारा सन्निवेश इसमें कुछ नहीं। इससे ज्ञानवान् देह के नाश हुए शोकवान् नहीं होता और देह के स्थित हुए सुखी भी नहीं होता, क्योंकि उसका देह के साथ कुछ सम्बन्ध नहीं। जो तत्त्वदर्शी पुरुष है वह यथाप्राप्ति में निर्दोष होकर विचरता है और अभिमानादिक विकारों से रहित निर्मल आकाशवत् हैं। जैसे शरत्काल की रात्रि में चन्द्रमा से आकाश निर्मल होता है तैसे ही मन की वृत्ति विकारों से रहित होकर आत्मपद में स्थित होती है—संसार की ओर नहीं गिरती। जैसे योग, मन्त्र, तप और सिद्ध से सम्पन्न पुरुष आकाश में उड़ता जाता है वह फिर पृथ्वी पर नहीं गिरता। हे रामजी ! तुम भी अपने प्रकृतभाव में स्थित होकर यथाप्राप्त क्रिया को करते निर्द्वन्द्व रहो। तुम भी अब स्वरूप के ज्ञाता हुए हो और परमपद में जागकर अपने स्वरूप को प्राप्त हुए हो इससे पृथ्वी में विशोकवान् होकर विचरो तब अनिच्छा से इच्छा को त्यागकर शीतल, प्रकाश, अन्धकार तप्त और मेघ से रहित शरत्काल के आकाशवत् निर्मल शोभोगे। हे रामजी ! यह जगत्

उपशम प्रकरण । ७३३

चिदानन्दस्वरूप है और आदि अन्त से रहित है। जो अहं त्वं आदिक भ्रम से रहित है उसमें स्थित हो। आत्मा केवल अव्यक्त और चिन्ता से रहित है उसका शरीर के साथ सम्बन्ध कैसे हो ? आत्मा आदिक नाम भी उपदेश व्यवहार के लिए कल्पे हैं, वह तो नामरूप भेद और भय से रहित अशब्दपद है और वही जगत्रूप होकर स्थित हुआ है—जगत् कुछ भिन्न वस्तु नहीं। जैसे जल तरङ्गरूप भासता है सो जल से भिन्न नहीं, तैसे ही आत्मा से भिन्न जगत् नहीं और जैसे समुद्र सब जलरूप है जल से कुछ भिन्न नहीं; तैसे ही सब जगत् आत्मरूप है भिन्न नहीं। जैसे जल और तरङ्ग में भेद नहीं और पट और तन्तु में भेद नहीं तैसे ही ब्रह्म और जगत् में भेद नहीं। हे रामजी ! द्वैत कुछ वस्तु नहीं, परन्तु मैं तेरे उपदेश के निमित्त द्वैत अङ्गीकार करके कहता हूँ । यह जो शरीर है उसके साथ तेरा कुछ सम्बन्ध नहीं। जैसे धूप और छाया का सम्बन्ध नहीं होता और प्रकाश और तम इकट्ठे नहीं होते, तैसे ही आत्मा और देह का सम्बन्ध नहीं। देह जड़ और मलीन है और दृश्य असत्य है, आत्मा निर्मल, चेतन और सत्य है तो उसका देह से सम्बन्ध कैसे हो ? जैसे शीत और उष्ण का परस्पर विरोध है तैसे ही आत्मा और देह का सम्बन्ध नहीं। जैसे वन में अग्नि लगने से जन्तु जलते हैं तैसे ही भ्रम दृश्यरूप देह में अहंभाव करके जीव जलते हैं । हे रामजी ! जैसे दावाग्नि में कुबुद्धि नर जलबुद्धि करे तैसे ही अज्ञानी देह में आत्मबुद्धि करते हैं। जैसे मरुस्थल में सूर्य की किरणों में जल भासता है तैसे ही आत्मा में देहभाव रखते हैं। हे रामजी ! चिदात्मा निर्मल, नित्य और स्वयंप्रकाश है और देह मलीन और अस्थि, मांस और रक्तमय है इसके साथ आत्मा का सम्बन्ध कैसे हो आत्मा में देह का अभाव है—केवल एक अद्वैततत्त्व अपने आपमें स्थित है उसमें द्वैतभ्रम कैसे हो ? हे रामजी ! स्वरूप से न कोई बन्ध है और न कोई मुक्त है, सर्वसत्ता एक आत्मतत्त्व स्थित है और भीतर बाहर सब वही है। मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ, मैं मूढ़ हूँ इस मिथ्यादृष्टि को दूर से त्यागो और आपको केवल आत्मरूप जानकर स्थित हो। यह दृश्य परम दुःख देनेवाला है और इसमें दुःख प्राप्त होवेगा। जैसे तृण और

७३४ | योगवाशिष्ठ ।

पहाड़ की और पट और पत्थर की एकता नहीं होती तैसे ही आत्मा और शरीर की एकता नहीं होती । जैसे तम और प्रकाश का संयोग नहीं होता तैसे ही देह और आत्मा का संयोग नहीं होता और दोनों तुल्य भी नहीं होते । जैसे शीत और उष्णता और जड़ और चेतन की एकता नहीं होती तैसे ही शरीर और आत्मा की एकता नहीं होती । हे रामजी ! शरीर जो चलता, बोलता है सो वायु के बल से चलता-बोलता है । आठ स्थानों में वायु के बल से, अक्षरों का उच्चार होता है-उर कण्ठ, शिर, जिह्वामूल, दन्त, नासिका, ओष्ठ, तालु यही आठ स्थान हैं । क, ख, ग, और घ-इन चारों का उच्चार कण्ठ में होता है। च, छ, ज और झ-इन चारों का तालु स्थान में उच्चार होता है । ट, ठ, ड और ढ-इन वर्गों का मूर्धा में उच्चार होता है, त, थ, द और ध-इनका दाँतों में उच्चार होता है । प, फ, ब, भ और म-इन पाँचों का ओष्ठों में उच्चार होता है और ङ, ञ, न और ण-इनका नासिका में उच्चार होता है । जिह्वामूल का जिह्वा में उच्चार होता है और जिस पद के आदि हकार हो वह हृदय से बोला जाता है । आठों स्थानों में इन वर्गों का वायु से उच्चार होता है और सूक्ष्म नवस्वर का उच्चार होता है पर आत्मा इनसे निर्लेप होता है । जैसे बाँसुरी वायु से शब्द करती है तैसे ही इन पाँचतत्त्वों से शब्द होता है, इनमें आत्माभिमान करना महामूर्खता है । नेत्रादिक इन्द्रियाँ भी वायु से चेष्टा करती हैं, इससे इस भ्रम को त्यागकर आत्म-पद में स्थित हो-आत्मा आकाशवत् सबमें पूर्ण है । जैसे आकाश सब ठौर में पूर्ण है परन्तु जहाँ आदर्श होता है वहाँ प्रतिबिम्ब होकर भासता है तैसे ही आत्मा सब ठौर में पूर्ण है परन्तु जहाँ हृदय होता है वहाँ भासता है । हे रामजी ! जहाँ वासना से चित्तरूपी पक्षी जाता है वहाँ आत्मा को ऐसा अनुभव होता भासता है कि मैं यहाँ हूँ । जैसे जहाँ पुष्प होता है वहाँ सुगन्ध भी होती है, तैसे ही, जहाँ चित्त होता है वहाँ अहंभाव भी होता है । जैसे आकाश सब ठौर में है परन्तु जहाँ प्रतिबिम्ब होता है वहाँ भासता है और जैसे जल सब पृथ्वी में है परन्तु भासता वहीं है जहाँ खोदा जाता है तैसे ही आत्मा सब ठौर पूर्ण

उपशम प्रकरण । ७३५

है परन्तु भासता वही है जहाँ चित्त है। जैसे सूर्य का प्रतिबिम्ब सब ठौर है परन्तु जहाँ आदर्श अथवा जल है वहाँ भासता है तैसे ही आत्मा जहाँ तहाँ पूर्ण है परन्तु शुद्ध हृदय में भासता है। आत्मा का प्रतिबिम्ब चित्त ही में भासता है और वह चित्त आत्मा की सत्ता से जगत् रचना फैलाता है व जैसे सूर्य की किरणें धूप को फैलाती हैं। हे रामजी! भूतों का कारण अन्तःकरण ही है, आत्मतत्त्व तो अतीत है, आदिकारण नहीं है वास्तव में कारण है। जगत् जो सत् भासता है सो अविचार से भासता है। उसी के निवृत्ति का उपाय आत्मज्ञान है। हे रामजी! संसार का कारण अन्तःकरण है और असम्यक्ज्ञान से सत्यरूप भासता है जैसे मरुस्थल में असम्यक्ज्ञान से जल भासता है। जब यथार्थ ज्ञान होता है तब जगत् का कारण चित्त से नष्ट हो जाता है। जैसे दीपक के प्रकाश से अन्धकार नष्ट हो जाता है तैसे ही आत्मज्ञान से चित्त नष्ट हो जाता है। संसार का कारण अपना चित्त ही है इसी का नाम जीव, अन्तःकरण, चित्त और मन है। रामजी ने पूछा, हे महाआनन्द के देनेवाले! इतनी संज्ञा चित्त की कैसे हुई हैं? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! सर्वभावरूप एक परमात्मतत्त्व है। जैसे समुद्र, नदियाँ, तरङ्गादि संज्ञा एक जल ही धरता है तैसे ही चित्तादिक अनेक संज्ञा को आत्मा धारता है पर सदा एकरूप है, संवेदन फुरने से अनेक रूप धरता है। जैसे एक जल कहीं तरङ्ग कहीं बुद्बुदे, कहीं जल, कहीं चक्र और कहीं स्थिर—इतनी संज्ञा को धरता है परन्तु सब ही जल रूप है तैसे ही सर्वशक्ति आत्मा सब शरीरों में सर्वरूप होता है। जब स्पन्दकल्पना दूर होती है तब शुद्धस्वरूप हो भासता है और जहाँ अज्ञान-रूप संसरने को अङ्गीकार करता है वहाँ वही अनन्त आत्मा जीव कहाता है। जैसे केसरी सिंह पिंजड़े में फँसता है तैसे ही यह जीवरूप होता है। हे रामजी! जहाँ अहंभाव फुरता है वहाँ जीव कहाता है जहाँ निश्चय वृत्ति से फुरता है उसको बुद्धि कहते हैं, संकल्प-विकल्प से मन, चिन्ता करने से चित्त, और प्राकृतभाव से प्रकृति कहाता है। हे रामजी! प्रकृतिरूप जो पदार्थ है वह जड़ कहाता है और चेतन है सो जीव कहाता है। जड़ जो दृश्यभाव में संवित्भाग है और अजड़ जो जीव

७३६ योगवाशिष्ठ ।

अहं सो द्रष्टाभाव से सिद्ध होता है, इनके जो मध्य है सो परमात्मतत्व है सो नानारूप हो भासता है। बृहदारण्यकोपनिषद और वेदान्तशास्त्रों में बहुत प्रकार से जीव का रूप कहा है। इससे भिन्न संज्ञा शास्त्रकारों ने कल्पना कर कही है सो वृथा कल्पना है। जब तक अहंभाव से चित्त संसरता है तब तक जगद्भ्रम होता है—जैसे जब तक सूर्य है तब तक प्रकाश होता है और जब सूर्य अस्त होता है तब प्रकाश जाता रहता है तैसे ही जब चित्त का अभाव हुआ तब जगद्भ्रम जाता रहता है। देह में आत्मा-बुद्धि करनी महामूर्खता है, क्योंकि यह अधःऊर्ध्वसंयोग है जो आत्मा का ऐसा संयोग न हो तो देह के नाश हुए आत्मा भी नष्ट हो जावे, पर देह के नाश हुए आत्मा का तो नाश नहीं होता। जैसे वृक्ष के पत्तों के नाश हुए वृक्ष का नाश नहीं होता और घट के नाश हुए आकाश का नाश नहीं होता तैसे ही शरीर के नाश हुए आत्मा का नाश नहीं होता। जैसे पुरातन वस्त्र को त्यागकर पुरुष नूतन वस्त्र पहिरता है तैसे ही आत्मा पुरातन शरीर को त्यागकर नूतन शरीर अङ्गीकार करता है इसी का नाम मूर्ख मृत्यु कहते हैं, पर शरीर के नाश हुए आत्मा का नाश तो नहीं होता। हे रामजी ! जिसका चित्त निर्वासनिक हुआ है उसका शरीर जब छूटता है तब उसका चित्त चिदाकाश में लीन हो जाता है और जिसका चित्त वासना सहित है वह एक शरीर को त्यागकर और शरीर पाता है। जो देह नाश हुए अपना नाश मानता है वह मूर्ख है—जैसे स्थाणु में अज्ञान से वैताल भासता है और जैसे माता के स्तनों में मूर्ख बालक को वैताल भासता है तैसे ही अज्ञान से आत्मा मृत्यु भासती है जो इसको अनात्मतत्व नाश हो अर्थात् चित्त नाश हो जावे और फिर न फुरे तो आनन्द हो। जो शरीर के नाश हुए आत्मा का नाश कहते हैं वे मूढ़ हैं और मिथ्या कहते हैं। जैसे कोई देश से देशान्तर जाता है तो उसका अभाव नहीं होता तैसे ही एक शरीर को त्यागकर और शरीर को प्राप्त होता है तो आत्मा का नाश नहीं होता। तैसे जल में तरङ्ग फुरके फिर लीन होकर और ठौर में जा फुरते हैं तैसे ही आत्मा एक शरीर को त्यागकर और को धारता है। जैसे पक्षी उड़ता-उड़ता दूर जाता

उपशम प्रकरण ।

७३७

है तब दृष्टि नहीं आता परन्तु नाश नहीं होता तैसे ही शरीर के नाश हुए आत्मा और ठौर प्रकट होता है नाश नहीं होता । हे रामजी ! वासना के वश से वह जीव एक शरीर को त्यागकर और शरीर को प्राप्त होता है । इसी प्रकार वासना के अनुसार जीव फिरता है । वासना-रूपी रस्सी से बँधा जीवरूपी वानर शरीररूपी स्थानों में भटकता है और कभी ऊर्ध्वलोक और कभी मनुष्यलोक में घटीयन्त्र की नाईं भ्रमता है । हे रामजी ! जीव के हृदय के जो वासना होती है उसी से जरा मृत्यु, जन्म आदि का दुःख पाता है और कर्मरूपी भार उठाकर कभी स्वर्ग, कभी पाताल और कभी मध्यस्थान में जाता है, शान्ति कदाचित नहीं पाता । इससे हे रामजी ! अविद्यारूपी जो संसार है इसको भ्रमरूप जानकर इसकी वासना को त्याग करो और अपने स्वरूप में स्थित हो । इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार जब वशिष्ठजी ने कहा तब सूर्य अस्त हुआ तो सभा स्नान के निमित्त उठी और परस्पर नमस्कार करके अपने-अपने स्थान को गये फिर रात्रि बिताके सूर्य की किरणों के निकलते ही आ बैठे ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे संसारयोगोपदेशो नाम षट्षष्टितमस्सर्गः ॥६६॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! आत्मा देह के उपजे से नहीं उपजता और नाश हुए से नष्ट नहीं होता इसलिये तुम निष्कलङ्क आत्मा हो तुमको देह के साथ सम्बन्ध कदाचित् नहीं । जैसे कुञ्ज में फूल और फल और घट में घटाकाश होता है सो परस्पर भिन्नरूप होते हैं, एक के नाश हुए दूसरे का नाश नहीं होता, तैसे ही देह के नाश हुए आत्मा का नाश नहीं होता । जो देह के नाश में अपना नाश मानता है वह मूर्ख जड़ है, उस अर्धचेतना को धिक्कार है । हे रामजी ! जैसे रथ, रस्सी और घोड़े का स्नेह से रहित संयोग होता है तैसे ही शरीर और इन्द्रियों का संयोग है । हे रामजी ! रथ टूटे से जैसे रथवाहक की हानि नहीं होती तैसे ही देह और इन्द्रियों का नाश हुए आत्मा का नाश नहीं होता । जैसे पृथ्वी और पहाड़ पर जल के प्रवाह का संयोग होता है और वियोग भी होता है

७३८योगवाशिष्ठ ।

सो एक के नाश हुए से दूसरे का नाश नहीं होता तैसे ही देह और इन्द्रियों का संयोग है पर इनके नाश हुए आत्मा का नाश नहीं होता जैसे स्थाणु में वेताल भासता है और भयवान् होता है तैसे ही देह में अहंभाव से राग, द्वेष, सुख, दुःख पाता है । जैसे एक काष्ठ की अनेक पुतली होती हैं सो काष्ठ से इतर कुछ नहीं है तैसे ही जो कुछ शरीर है वह पञ्चभूतों का है, पञ्चभूतों से भिन्न कुछ वस्तु नहीं । जब यह पञ्चभूतौं का शरीर पञ्चभूतों में लीन होता है तब उसको मृतक हुआ कहते हैं । यह आश्चर्य है, जो प्रत्यक्ष पञ्चभूतों का शरीर है उसमें आत्मभावना श्वान करते हैं और फिर हर्ष और शोक को प्राप्त होता है इसी से मूर्ख है । हे रामजी ! न कोई पुरुष है और न कोई स्त्री है पर इनके निमित्त मूढ़ रुदन करते हैं । जैसे मृत्तिका के हाथी घोड़ा आदिक खिलौने विचित्र रचना होती है और उसकी प्राप्ति में अज्ञानी बालक तुष्टवान् और खेदवान् होता है तैसे ही अज्ञानी पाञ्चभौतिक रचना देखकर उसकी प्राप्ति में राग द्वेष करता है ज्ञानवान् को सब भूत पदार्थ भ्रान्तिमात्र भासते हैं । जैसे माटी के खिलौनों को आपस में मिलने से राग द्वेष कुछ नहीं होता तैसे ही बुद्धि, इन्द्रियाँ, मन से आत्मा की जो असंगता है इससे राग द्वेष नहीं रहता । जैसे पाषाण की पुतलियाँ मिलती हैं तो उनको स्नेह बन्धन कुछ नहीं होता तैसे ही देह, इन्द्रियाँ, प्राण और आत्मा का आपस में सङ्ग बुद्धि से रहित है । इससे तुम स्नेह से रहित हो रहो, शोक काहे को करते हो । जैसे तृण और जल के तरङ्ग का संयोग होता है तो तृण इधर उधर जाता है और जल को कुछ हर्ष शोक नहीं होता तैसे ही देह और आत्मा का योग है इनके मिलाप और बिछुरे का वास्तव में दुःख सुख कुछ नहीं होता । आत्मा और अनात्मा, देह इन्द्रियाँ, प्राण, मन, बुद्धि आदिक विलक्षण हैं और परस्पर इनके क्षय और उदय में हर्ष शोक कुछ नहीं परन्तु चित्त के उदय से अनात्मधर्म आत्मा में प्रतिबिम्बित भासता है । तुम तत्त्वबोध करके चित्त को त्याग करके अपने स्वरूप में स्थित हो—जैसे जल तरङ्गभाव को त्यागकर अपने स्थिर स्वभाव को प्राप्त होता है । जब तुम अपने अक्षोभभाव को प्राप्त

उपशम प्रकरण । ७३६

होगे तब भौतिक देह से आपको भिन्न जानोगे। जैसे वायुमण्डल को प्राप्त हुआ पक्षी पृथ्वीमण्डल को भी देखता है तैसे ही तुम आत्मपद में स्थित होकर देहादिक को देखोगे। हे रामजी ! तुम देहादिकभूतों को देखके त्याग करो और तुरीयातीत अजन्मा पुरुष हो रहो तब तुम परम प्रकाश को पावोगे। जैसे सूर्यकान्त मणि सूर्य के उदय हुए परम प्रकाश को प्राप्त होता है तैसे ही जब बोध करके द्रष्टा, दर्शन, दृश्यभाव तुम्हारा जाता रहेगा तब तुम अपने भाव को ज्यों का त्यों जानोगे। जैसे मनुष्य मद्य से मत्त हो जाता है और मद्य के उतरे से आपको ज्यों का त्यों जानता है और मद्य को स्मरण करता है तैसे ही स्मरण करोगे। आत्मतत्त्व का जो स्पन्द फुरना हुआ है उसी का नाम चित्त है सो अवस्तुरूप है। जैसे समुद्र में तरङ्ग उदय होते हैं सो कुछ वस्तु नहीं वैसे ही चित्तादिक कुछ वस्तु नहीं, भ्रांतरूप हैं। इस प्रकार जानकर महाबुद्धिमान् वीतराग निष्पापरूपी जीवन्मुक्त हुए हैं और महाशान्तपद की प्राप्ति में बिचरते हैं। जैसे रत्नमणि की किञ्चन नाना प्रकार की लहर होती है सो मननकलना के सहित यह चमत्कार है तैसे ही मनुष्यों में जो ज्ञानवान् उत्तम पुरुष हैं उनका व्यवहार कलना से रहित होता है जैसे कूप में प्रतिबिम्ब पड़ता है और आकाश में धूलि उड़ती भासती है पर आकाश मलिन नहीं होता तैसे ही ज्ञानवान् पुरुष अपने व्यवहार में कर्तृत्व के अभिमान को नहीं प्राप्त होता। जैसे मेघ के आने जाने से समुद्र को रागद्वेष नहीं होता तैसे ही आत्मा ज्ञेय पुरुष को भोगों के आने जाने में राग द्वेष नहीं होता। हे रामजी ! जिस मन में जगत् के किसी पदार्थ की मननवासना नहीं फुरती उस चित्त में जो कुछ फुरना भासता है सो विलासस्वरूप जानो वह उसको बन्धन का कारण नहीं होता और जिस चित्त में अहं त्वं आदिक जगत् की भावना है परन्तु हृदय से उसकी सत्य बुद्धि है उससे वह दृश्य द्रष्टा और दर्शन सम्बन्धी तीनों कालों संयुक्त जगत् को फैलावेगा। जो कुछ दृश्य है वह असतरूप है और जो सत्य है सो एक अव्यक्तरूप है। उसका आश्रय करके अलेप हो तब हर्ष शोक की दशा कहाँ है ? जो कुछ दृश्यजगत्

७४०योगवाशिष्ठ ।

भासता है वह सब असतरूप है और जो सत्य है वह सदा ज्यों का त्यों है। असतरूप दृश्य के निमित्त तुम क्यों वृथा मोह को प्राप्त होते हो असम्यक् दर्शन को त्यागकर सम्यकदर्शी हो । हे सुलोचन, रामजी ! जो सम्यकदर्शी हैं वे मोह को नहीं प्राप्त होते दृश्य और दर्शन इन्द्रियों के साहचर्यसम्बन्ध में अर्थात् विषयेन्द्रिय के साक्षिरूप आनन्द का जिसे सुख है वह परब्रह्म कहलाता है और अनुत्तम सुख से जो उस संवित् में स्थित है वह ज्ञानवान् है उसको मोक्ष प्राप्त है। जो दृश्य-दर्शन के मिलने में स्थित होता है उस अज्ञानी को वह संवित् संसारभ्रम दिखाती है। दृश्य दर्शन में जो अनुभवसत्ता है वह सुख आत्मरूप है, जो दृश्य के साथ लगा है वह बन्ध है और जो दृश्य से मुक्त हो चैतन्य संवित् में स्थित है वह मुक्त कहलाता है । हे रामजी ! दृश्य दर्शन के मध्य जो संवित् है वह अनुभवरूप है, उस संवित् का आश्रय करके जो दृश्य-दर्शन से मुक्त है वह संसारसमुद्र से तरेगा । वह सुषुप्तिवत् अवस्था है इसको प्राप्त हुआ परम प्रकाश को प्राप्त होता है और इसी को मुक्त कहते हैं। जो दृश्य-दर्शन से मुक्त है वह मुक्त कहलाता है और जो दृश्य-दर्शन के साथ बाँधा है वह बन्ध है। अन्य सबों का अनुभव करनेवाला आत्मा है, वह न स्थूल है, न अणु है, न प्रत्यक्ष है, न अप्रत्यक्ष है, न चेतन है, न जड़ है, न सत्य है, न असत्य है, न अहं है, न त्वं है, न एक है, न अनेक है, न निकट है, न दूर है, न अस्ति है, न नास्ति है, न प्राप्ति है, न अप्राप्ति है, न सर्व है, न असर्व है, न पदार्थ है, न अपदार्थ है, न पाञ्च-भौतिक है, न अपाञ्चभौतिक है, जो कुछ दृश्य जाति हैं, सो मन सहित षट् इन्द्रियों से सिद्ध होती है । जो इनसे अतीत है वह इनका विषय नहीं क्योंकि निष्किञ्चनरूप है। यह भी सब वही रूप है और ज्यों का त्यों जाने से सब आत्मरूप है । जगत् अनात्मरूप कुछ नहीं असम्यक्ज्ञान से ऐसे भासता है। यह जो कठिनरूप पृथ्वी, द्रवतारूप जल, स्पन्दरूप वायु उष्णतारूप अग्नि और अवकाशरूप आकाश भासते हैं वे सब आत्म-रूप हैं । जो कुछ वस्तु-अवस्तुरूप जगत् भासता है सो आत्मसत्ता से भिन्न नहीं आत्मा से भिन्न जगत् को मानना उन्मत्त चेष्टा है और मूर्ख

उपशम प्रकरण । ७४१

मानते हैं। महात्मा पुरुषों को कालकलनारूप जगत् सब आत्मरूप है। कल्प से आदि लेकर अन्तपर्यन्त सब आत्मा का चमत्कार है, ऐसे जानकर तुम अपने स्वरूप में स्थित हो और संसारसमुद्र से तर जाओ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे मोक्षस्वरूपोपदेशो नाम सप्तषष्टितमसर्गः ॥ ६७ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह जो मैंने तुमको द्वैत के त्याग की विचारदृष्टि कही है इस विचार से अपना जो आत्मस्वभाव है सो प्राप्त होता है, जैसे बुद्धिमान् को खोजने के अभ्यास से चिन्तामणि प्राप्त होती है। इसके उपरान्त एक और भी परम दृष्टि सुनो जिससे मनुष्य अचल आत्मस्वरूप को देखता है वह यह है कि मैं ही आकाश, दिशा, सूर्य, अधः, ऊर्ध्व, देवता, दैत्य, प्रकाश, तम, मेघ, पर्वत, पृथ्वी, समुद्र, पवन, धूलि, अग्नि आदिक स्थावर जङ्गम जगत् हूँ। हे रामजी ! सर्वजगत् आत्मा ही है तो अहं और त्वं से भिन्न और अनेक और एक कैसे हो। जिसके हृदय में ऐसा निश्चय होता है उसको सब जगत् आत्मरूप भासता है और वह पुरुष हर्षशोक नहीं पाता। सब जगत् मनोमात्र है तो अपना और पराया क्या कहिये ? ज्ञानवान् को आत्मा से भिन्न कुछ नहीं भासता इससे वह हर्ष विषाद को नहीं प्राप्त होता। हे रामजी ! अहंकार भी तीन प्रकार के हैं। दो प्रकार का तो सात्त्विक निर्मल है, तत्त्वज्ञान से प्रवर्त्तता और मोक्षदायक परमार्थरूप है, और तीसरा संसार दिखाता है। एक तो अहं जो तुमको कहा है कि सर्व मैं ही हूँ-मुझसे अन्य कुछ नहीं और दूसरा यह है कि परम अणु जो सूक्ष्म से भी अतिसूक्ष्म है सो साक्षीभूत अव्यक्तरूप मैं हूँ-ये दोनों मोक्षदायक हैं और तीसरा यह कि आपको नख-शीशपर्यन्त देहरूप जानना सो दुःखदायक और संसार का कारण है शान्तिसुख का कारण नहीं। अथवा इन तीनों को त्यागकर स्थित हो यह सर्वसिद्धान्त का कारण है। जैसी तुम्हारी इच्छा हो तैसे करो पर आत्मा सबसे अतीत और सबसे परे है तो भी अपनी सत्ता से जगत् को पूर्ण कर रहा है और सबका प्रकाशक वही है। वह अपने अनुभव से सदावस्तु उदयरूप है और

७४२ योगवाशिष्ठ ।

किसी प्रणाम का विषय नहीं, अनुमान आदि प्रमाणों से रहित है और सर्वकाल सबको अपने प्रकाश से प्रकाशता है। यह जो दृश्यजगत् है वह सब आत्मा भगवान् है और दृश्य, दर्शन, सत्, असत्, सूक्ष्म, स्थूल सबसे आत्मा रहित है। वही सर्वरूप, सबकी वाणी कहने में भी वही आता है और किसी से कहा भी नहीं जाता। जो नानात्व भासता है वह भी उससे अन्य नहीं। आत्मा आदिक संज्ञा भी शास्त्रों ने उपदेश के निमित्त कल्पी हैं। वह सर्वत्र, तीनों कालों में स्थित और प्रकाशरूप है। सूक्ष्मभाव और स्थूलभाव से वही है और सब ठौर व्यापक अपने फुरने से जीवरूप हो भासता है। जब चित्तसंवित् स्फूर्तिरुप होती है तब जीवरूप हो भासता है और फुरने से रहित द्वैतकल्पना मिट जाती है—जैसे आकाश में पवन फुरता है तब उष्ण शीत हो भासता है तैसे ही फुरने से जीवादिक भासते हैं। आत्मा चेतन सर्वत्र व्यापकरूप है और कभी किसी भाव को प्राप्त नहीं होता। जैसे पदार्थ अपने भाव में स्थित है तैसे ही परमेश्वर आत्मा अपने स्वभाव में स्थित है परन्तु उसका भासना पुर्यष्टका में होता है। जैसे वायु बिना धूलि नहीं उड़ती और अन्धकार में प्रकाश बिना पदार्थ नहीं भासता तैसे ही पुर्यष्टका बिना आत्मा नहीं भासता पुर्यष्टका में प्रतिबिम्बित भासता है। जैसे सूर्य के उदय हुए सर्वजीवों का व्यवहार होता है सूर्य के अस्त हुए से लीन हो जाता है पर सूर्य दोनों से अलेप है, तैसे ही आत्मा सबका प्रकाशक और निर्लेप है। शरीरों के व्यवहार होने और इष्टता में वह ज्यों का त्यों है, न उपजता है न विनाशता है, न वाञ्छा करता है, न त्यागता है, न मुक्त है, न बन्ध है, सर्वदा सर्वप्रकार ज्यों का त्यों एकरूप है। उस के अज्ञान से जीव अनात्माभाव को प्राप्त होता है—जैसे रस्सी में सर्प भासता है—और केवल दुःखों का कारण होता है। आत्मा आदि अन्त से रहित और अज-अविनाशी है और अपने आपसे भिन्न नहीं हुआ इससे देश, काल, वस्तु के परिच्छेद से रहित है बन्ध नहीं और जो बन्ध नहीं तो मुक्त कैसे हो ? सर्वकल्पना से रहित आत्मा सबको अपना आप है पर अविचार से मूढ़ रुदन करते हैं, इससे मैंने जो तुमको उपदेश किया है

उपशम प्रकरण । ७५३

उसको आदि से लेकर अन्तपर्यन्त भली प्रकार विचार देखो और इस युक्ति से शोक का त्याग करो-मूर्खों के समान लोगों में शोक मत करो । हे सुमते ! बन्धमोक्ष की कल्पना का त्याग करो । न बन्ध के त्याग की इच्छा करो और न मोक्ष के प्राप्ति की इच्छा करो, यन्त्री का पुतलावत् अभिमान से रहित चेष्टा करो-इसका नाम आत्ममौन है । हे रामजी ! मोक्ष आकाश में नहीं और न पाताल में है, न भूमिलोक में है-चित्त का निर्मल होना ही मोक्ष है । अनात्मा के साथ आपको मिलाना और उसमें आत्माभिमान करना यह मल है और इसका त्याग करना और शुद्ध आत्मा में चित्त का लगाना इसका नाम मोक्ष है । जब चित्त से गुणों में वृत्ति का त्याग हो और सम्यक् आत्मज्ञान हो उसी को तत्त्वदर्शी मोक्ष कहते हैं । हे रामजी ! जब तक आत्मबोध नहीं होता तब तक यह दीन दुःखी होता है और जब आत्मा का निर्मल बोध होता है तब दुःखों से मुक्त होता है इससे और उपायों को त्याग भक्ति करके मोक्ष की वाञ्छा करो और चिरकाल से जब इस बोध को साध चित्त विस्तृत पद को प्राप्त हुआ तब दश मोक्ष की भी इच्छा नहीं रहती एक मोक्ष तो क्या है । हे रामजी ! जीव को और कोई उपाय मोक्ष का नहीं, आत्मबोध को ही पाकर सुखी होगे । जब चित्त अचित्त होता है तब सब जगत्भ्रम मिट जाता है और जगत् भी कुछ दूसरी वस्तु नहीं, अद्वैत आत्मतत्त्व ही है और जो वही है तो बन्ध किसको कहिये और मोक्ष किसको कहिये ? बन्ध मोक्ष की कल्पना तुच्छ है उसका त्याग कर चक्रवर्ती हो पृथ्वी की पालना करो तो तुमको कर्तृत्व का स्पर्श कुछ न होगा ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे आत्मविचारो नामाष्टषष्टितमसर्गः ॥ ६८ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! संकल्प से ही जगत् उपजा है । अज्ञान से आपको शरीर जानता है और अपने संकल्प को उपजा के अपना स्वरूप जानता है । जैसे कोई सुन्दर पुरुष हो और उसको देखे बिना कुरूप जाने तैसे ही आत्मा के साक्षात्कार बिना देहरूप आत्मा को जानता है कि मैं देह हूँ । ज्यों-ज्यों आत्मा का प्रमाद होता है त्यों-त्यों देह में

७४४ योगवाशिष्ठ ।

अधिक अभिमान होता है-जैसे ज्यों ज्यों मद्यपान करता है त्यों-त्यों उन्मत्त होता है । हे रामजी ! यह नाना प्रकार का दृश्य अज्ञान से भासता है । जैसे सूर्य की किरणों से मरुस्थल में जल भासता है तैसे ही असम्यक् ज्ञान से आत्मा में जगत् भासता है । एक कल्पना के फुरने से मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, इन्द्रियाँ और देह भासती हैं, एक फुरने की ही इतनी संज्ञा है । जैसे एक जल की अनेक संज्ञा होती हैं तैसे ही एक फुरने की अनेक संज्ञा हुई हैं । जो चित्त है सो अहंकार है, जो अहंकार है वही मन है और जो मन है वही बुद्धि है । इसमें कुछ भेद नहीं । जैसे वरफ और शुक्लता और शीतलता में कुछ भेद नहीं तैसे ही मन, बुद्धि आदिक में कुछ भेद नहीं, एक के नाश हुए दोनों का नाश हो जाता है । इससे मन में जो कुछ कल्पना है उसका त्याग कर मोक्ष की इच्छा का भी त्याग करो और बन्धनवृत्ति का भी त्याग करो। हे रामजी! वैराग्य और विवेक का अभ्यास करके मन को निर्मल करो । जब मन निर्मल होगा तब मन का मनभाव नष्ट हो जावेगा । जब यह फुरना फुरता है कि 'मैं मुक्त होऊँ' तब भी मन जग आता है और मन के जागे से मनन भी हो आता है । जब मनन हुआ तब अपने साथ शरीर भी भासि आता है अनेक दुःख भी भासि आते हैं । हे रामजी ! आत्मतत्त्व सबसे अतीत है और सर्वरूप भी वही है तब कौन बन्ध है और कौन मोक्ष है ? जब मन का मनन निवृत्त हुआ तब न कोई बन्ध है और न कोई मुक्त है-आत्मा सर्वक्रिया से अतीत है । क्रिया भी इस प्रकार होती है जैसे कि वायु के हिलने से वृक्ष के पत्र और फूल हिलते हैं तैसे ही प्राणों के फुरने से हाथ पाँव आदिक इन्द्रियाँ चेष्टा करती हैं । हे रामजी ! चैतन्यशक्ति सर्वव्यापी, सूक्ष्म और अचल है, वह न आपही चलती है, न और किसी की प्रेरी हुई चलती है, सदा स्थितरूप है । जैसे मेरु पर्वत न आपही चलता है और न वायु से चलाया चलता है । हे रामजी ! जितने पदार्थ भासते हैं सो आत्मरूपी दर्पण में प्रतिबिम्बित भासते हैं । जैसे सर्वपदार्थों को दीपक प्रकाशता है तैसे ही सब पदार्थों को आत्मा प्रकाश करता है। सब पदार्थों में एक आत्मा अनुस्यूत प्रकाशता है और अहं त्वं आदिक कल्पना से रहित है जहाँ अहं त्वं आदिक

उपशम प्रकरण। ७४५

कलना नहीं फुरती वहाँ सुख दुःख भी नहीं फुरता। जैसे वृक्षों और पहाड़ों से अहं त्वं शब्द नहीं फुरता तैसे ही आत्मा में भी नहीं फुरते इससे ज्ञानवान् में कर्तृत्व भोक्तृत्व नहीं फुरते। हे रामजी! आत्मा निरहं-कार और निराकार उसमें कर्तृत्व भोक्तृत्व कैसे होवे? आत्मा में कर्तृत्व भोक्तृत्व अज्ञान से भासता है—जैसे मरुस्थल में जल भासता है। हे रामजी! अज्ञानरूप मदिरा-पान करके मनरूप मृग मत्त हुआ है उससे वह सत् असत् का विचार नहीं कर सकता—जैसे मृगतृष्णा की नदी असत् ही सत् भासती है और मृग उसको सत् जानकर पान करने के निमित्त दौड़ता है, तैसे ही यह जीव अरूप संसार को रूप जानकर दौड़ता है। जब आत्म-सत्ता का सम्यक्बोध होता है तब यह अविद्या नष्ट हो जाती है। जैसे ब्राह्मणों के मध्य चाण्डाली आन बैठे और जब ब्राह्मण उसको पहिचाने कि यह चाण्डाली है तो वह छिप जाती है तैसे ही जब अविद्या को जाना तब वह नष्ट हो जाती है। हे रामजी! जब अविद्या को ज्यों की त्यों जाना तब अविद्यारूपी जगत् मन को नहीं खेंच सकता जैसे मृगतृष्णा की नदी को जब जाना तब तृषा हो तो भी मन को वह जल नहीं खेंच सकता। हे रामजी! जब परमार्थसत्ता का बोध होता है तब मूल से वासना नष्ट हो जाती है, जैसे सूर्य के उदय से अन्धकार नष्ट हो जाता है तैसे ही आत्मज्ञान से अविद्या वासनासहित नष्ट हो जाती है। हे रामजी! अविद्या अविचार से सिद्ध है जब सत्शास्त्रों की युक्ति से विचार प्राप्त होता है तब अविद्या नष्ट हो जाती है। जैसे वरफ का कणका धूप से गलकर जलमय हो जाता है तैसे ही विचार से अज्ञान नष्ट हो जाता है। हे रामजी! देह जड़ है और आत्मा सदा चेतनरूप है, फिर जड़ देह के निमित्त भोगों की वाञ्छा करनी बड़ी मूर्खता है। जो ज्ञानवान् पुरुष हैं वे इस बन्धन को तोड़ डालते हैं। हे रामजी! आशारूपी फाँसी को हृदय से काटो जब आशारूपी आवरण दूर होगा तब पूर्णमासी के चन्द्रमावत् हृदय शीतल हो जावेगा। तैसे ही यह पुरुष भी तीन तापों से मुक्त शीतल हो जाता है—जैसे पर्वत में अग्नि लगे और उसके ऊपर जल की बहुत वर्षा हो वह तप्तता से मुक्त हो शान्तिमान् होता है।

७४६ | योगवासिष्ठ ।

हे रामजी ! जैसे केशरी सिंह पिंजड़े को तोड़कर निकलता है तैसे ही ज्ञानवान् पुरुष भोगवासना के बन्धन को तोड़ डालता है । हे रामजी ! जैसे रङ्क को त्रिलोकी का राज्य मिलने से वह आनन्द को प्राप्त हो तैसे ही ज्ञानवान् को आत्मा के साक्षात्कार हुए आनन्द प्राप्त होता है और वह परम निर्मल लक्ष्मी से शोभता है जब हृदय से आशारूपी मैल जाता है तब जैसे शरत्काल का आकाश निर्मल शोभता है तैसे ही वह शोभता है । हे रामजी ! ज्ञानवान् पुरुष अपने आपमें नहीं समाता-जैसे महाकल्प का समुद्र नहीं समाता और जैसे मेघ जल को त्यागकर मौन हो जाता है तैसे ही ज्ञानवान् आशा को त्यागकर आत्ममौन हो जाता है । जैसे अग्नि लकड़ी को जलाकर धुएँ से रहित अपने आपमें स्थित हो जाती है तैसे ही चित्त की वृत्ति से रहित हुआ आत्मपद में निर्वाण हो जाता है जैसे दीपक निर्वाण हो जाता है तैसे ही निर्वाण हुआ परमानन्द को प्राप्त होता है । जैसे अमृत को पानकर पुरुष आनन्दवान् होता है तैसे ही वह परमानन्द से पूर्ण अपने आपमें प्रकाशता है जैसे वायु से रहित दीपक प्रकाशता है और शुद्ध मणि अपने प्रकाश से प्रकाशती है तैसे ही ज्ञानवान् अपने आप-से प्रकाशता है । मैं सर्वात्मा, सर्वगत, ईश्वर, सर्वाकार, निराकार, केवल चिदानन्द आत्मा हूँ और सदा अपने आपमें स्थित हूँ । हे रामजी ! ज्ञानी अपने आपको ऐसे जानते हैं और पूर्व के व्यतीत हुए दिन को हँसते हैं । मैं तो अनन्त आत्मा हूँ माया के भ्रम से आपको कर्त्ता भोक्ता मानता था । ऐसे जानकर जो रागद्वेष से रहित परम शान्ति को होता है उसके सब ताप निवृत्त हो जाते हैं, उसकी सदा आत्मा में प्रीति रहती है, उसका चित्त सब ओर से पूर्ण हो जाता है, वह सबको पवित्र करनेवाला होता है, वह कामरूपी चक्र से मुक्त होकर जन्मों के बन्धन काट डालता है, राग द्वेष आदिक द्वन्द्व और सर्वभय से मुक्त होता है, अविद्यारूपी संसारसमुद्र से तर जाता है, उत्तम लक्ष्मी को प्राप्त होता है अर्थात् परमपद पाता है और फिर संसार के जन्म-मरण को नहीं प्राप्त होता और उसके कर्मों का अन्त हो जाता है । हे रामजी ! ज्ञानवान् की क्रिया को देखकर और सब वाञ्छा करते हैं परन्तु औरों की क्रिया को देखकर ज्ञानवान् किसी की

उपशम प्रकरण । ७४७

वाञ्छा नहीं करता। वह सबको आनन्दवान् करता है और आप किसी से आनन्दवान् नहीं होता। वह न किसी को देता है, न लेता है, न किसी की स्तुति करता, न निन्दा करता है, न किसी उत्तम पदार्थ को पाकर उदय होता है और न अनिष्ट को पाकर नष्ट होता है और हर्ष-शोक से रहित है। उसने सब फल का त्याग किया है और उपाधि से रहित है और कर्तृत्व भोक्तृत्व से आपको न्यारा मानता है। ऐसा जो पुरुष है वह जीवन्मुक्त है। हे रामजी ! जब तुम सब इच्छा त्यागकर मौन हो तब निर्विशेषभाव को प्राप्त होगे। जैसे मेघ जल का त्यागकर मौनभाव को प्राप्त होता है तैसे ही तू मौनभाव को प्राप्त होगा। हे रामजी ! जैसे कामी पुरुष स्त्री को कण्ठ में लगाकर आनन्दवान् होता है पर उसको ऐसा आनन्द नहीं होता जैसा आनन्द निर्वासनिक पुरुष को होता है, फूल के गुच्छे से वसन्तऋतु ऐसी नहीं शोभती जैसे उदारबुद्धि आत्म मौनवान् शोभता है, हिमालय पर्वत में प्राप्त हुआ भी ऐसा शीतल नहीं होता जैसा निर्वासनिक पुरुष का मन शीतल होता है, मोतियों की माला से और केले के बन को प्राप्त हुआ भी ऐसा सुख नहीं पाता और चन्दनों के पान करनेवाला भी ऐसा शीतल नहीं होता जैसा शीतल निर्वासनिक मन होता है और चन्द्रमा के स्पर्श से भी ऐसा शीतल नहीं होता जैसे निर्वासनिक पुरुष शीतल होता है। चन्द्रमा बाहर की तप्तता मिटाता है परन्तु भीतर की तप्तता निवृत्त नहीं करता पर निराशता से हृदय की तप्तता मिट जाती है और परम शान्ति को प्राप्त होता है। जैसी शीतलता निर्वासनिक पुरुष के संग से होती है तैसी और किसी उपाय से नहीं प्राप्त होती। हे रामजी ! ऐसा सुख स्वर्ग में नहीं प्राप्त होता और न सुन्दर स्त्रियों के स्पर्श मे होता है जैसा सुख निर्वासनिक को प्राप्त होता है। निर्वासनिक पुरुष उस सुख को प्राप्त होता है जिस सुख में त्रिलोकी के सुख तृणवत् भासते हैं। हे रामजी ! आशारूपी कुञ्ज के वृक्ष के काटने को उपशमरूपी कुल्हाड़ा है जो पुरुष निर्वासनिक हुआ है उसको सब पृथ्वी गोपद के समान तुच्छ भासती है, मेरु पर्वत एक टूटे वृक्ष के समान भासता है और दिशा डिब्बी के समान भासती है, क्योंकि वह उत्तम पद को प्राप्त हुआ है और

७४८ | योगवाशिष्ठ


त्रिलोकी की विभूति तृण की नांई तुच्छ देखता है । जो पुरुष निर्वा- सनिक हुआ है वह जगत् को देखकर हँसता और कदाचित् उसे जगत् के पदार्थों की कल्पना नहीं फुरती । तृणवत् जानकर उसने जगत् को त्याग दिया है और सदा आत्मतत्त्व में स्थित है उसको किसकी उपमा दीजिये उस पुरुष के उदय, अस्त, अहं, त्वं आदिक कलना नष्ट हो गई है और केवल आत्मस्वभाव को भास हुआ है । उस ईश्वर आत्मा को कौन तौल सकता है, जब दूसरा उसके समान हो तब तोले। हे रामजी ! वह पुरुष सब सङ्कटों के अन्त को प्राप्त हुआ है । यह जगत् मिथ्या भ्रम- रूप है । जैसे आकाश में भ्रम से दूसरा चन्द्रमा, मरुस्थल में नदी और मद्यपान से नगर भ्रमता भासता है, तैसे ही यह मिथ्या जगत् भ्रम से भासता है इसकी आशा मत करो । तुम तो बुद्धिमान् पंडित हो मूर्खों की नांई मोह को क्यों प्राप्त होते हो ? यह मैं और यह मेरा अज्ञान से भासता है, इस कलना को चित्त से दूर करो । यह वास्तव में कुछ नहीं, सब जगत् आत्मरूप है और नानात्व कुछ नहीं है जो सम्यग्दर्शी पुरुष है वह जगत् को एकरूप जानकर धैर्यवान् रहता है कदाचित् खेद नहीं पाता । हे रामजी ! जो पुरुष निर्वासनिक हुआ है आत्मविचार से आत्मपद को प्राप्त हुआ है उसको देखकर मोहनेवाली माया भी भाग जाती है और निकट नहीं आती । जैसे सिंह के निकट मृग नहीं आता तैसे ही ज्ञानवान् के निकट माया नहीं आती । सुन्दर स्त्रियाँ, मणि, कञ्चनादिक धन और पत्थर, काष्ठ सब उसको तुल्य भासता है, भोगों से उसको सुख नहीं होता और आपदा से खेद नहीं होता, वह सदा ज्यों के त्यों रहता है । जैसे पर्वत वायु से चलायमान नहीं होता तैसे ही वह पुरुष सुख दुःख से चलायमान नहीं होता । सुन्दर बाला स्त्री उसके चित्त को खींच नहीं सकती, कामदेव के चलाये बाण उसके ऊपर टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं और रागद्वेष उसको खींच नहीं सकते । वह सदा आपको निराकार, अद्वैत, निष्क्रिय और निर्गुण जानता है और सुन्दर बगीचे, ताल, बेलि, शय्या, इन्द्रियों के विषयभोग और दुःख देनेवाले उसको तुल्य हैं रागद्वेष को नहीं प्राप्त करते । जैसे ऋतु के अनुसार मीठा और कटु फल होता

उपशम प्रकरण । ७४६

है तो उसको किसी में रागद्वेष नहीं होता अकस्मात् जो भोग प्राप्त होता है उसको वह भोगता है परन्तु हर्ष और शोकवान् नहीं होता । हे रामजी ! यथार्थदर्शी इष्ट अनिष्ट से चलायमान नहीं होता-जैसे वसन्तऋतु के आने जाने में पर्वत सुख दुःख को प्राप्त नहीं होता । वह कर्मइन्द्रियों से कर्म करता है परन्तु उसमें आसक्त नहीं होता और बाहर दृष्टि से आसक्त भासता है परन्तु भीतर आसक्त नहीं होता । वह जो बाहर आसक्तदृष्टि नहीं आता परन्तु चित्त आसक्त है वह डूबना है-जैसे शुद्ध मणि कीचड़ में दृष्टि आती है तो भी उसको कुछ कलङ्क नहीं और जो बीच से खोंटी है वह यदि बाहर से उज्ज्वल भी भासती तो भी सकलङ्क है, तैसे ही जो चित्त से आसक्त है वह आसक्त है और जो चित्त से आसक्त नहीं वह आसक्त नहीं । हे रामजी ! आत्मसत्ता सदा प्रकाशरूप, नित्य, शुद्ध और परमानन्द स्वरूप है जिस पुरुष को अपने शुद्ध स्वरूप का ज्ञान है उसको विस्मरण नहीं होता । हे रामजी ! जिसके शरीर से अहं भाव उठ गया है और इन्द्रियों से कर्म करता है तो वह करता भी नहीं करता और जिसके देह में अहंभाव है वह नहीं करता भी करता है । जैसे किसी को चिरकाल के उपरान्त बान्धव मिला विस्मरण नहीं होता तैसे ही जिसने अपना स्वरूप जाना है उसको वह फिर विस्मरण नहीं होता । हे रामजी ! जिनको शुद्धस्वरूप का सम्यक ज्ञान होता है उनको भ्रान्ति-रूप जगत् नहीं भासता-जैसे रस्सी में भ्रम से सर्प भासता है पर जब भ्रम निवृत्त हुआ तब ज्यों की त्यों रस्सी भासती है सर्प नहीं भासता । जैसे मरुस्थल में जलबुद्धि निवृत्त हुए फिर जलबुद्धि नहीं होती, तैसे ही आत्मा के जाने से देहभाव नहीं होता । जैसे पहाड़ से नदी उतरती है सो फिर पहाड़ पर नहीं चढ़ती और सुवर्ण का खोट अग्नि से जला हुआ चाहे कीचड़ में डालिये फिर खोटा नहीं होता तैसे ही जब हृदय की चिद्ग्रन्थि टूटी तब गुणों के व्यवहार में गाँठ नहीं पड़ती अर्थात् बन्धायमान नहीं होता । जैसे वृक्ष से टूटा फल फिर नहीं लगता तैसे ही जिसका देहाभिमान टूटा है उसको फिर अभिमान नहीं होता । जैसे लोहे के हथौड़े से पारे को चूर्ण किया तो फिर वह नहीं फुरता ।

७५० योगवाशिष्ठ।

जिस पुरुष ने अविद्या को जाना है वह फिर उसकी संगति नहीं करता और जिस ब्राह्मण ने चाण्डालों की सभा जानी फिर वह उनकी संगति नहीं करता, तैसे ही आत्मविचार से मन को चूर्ण किया तब फिर वह नहीं स्फुरता। जिस पुरुष ने अविद्यारूप जगत् को जाना है वह फिर जगत् के पदार्थों में आसक्त नहीं होता। हे रामजी! विष जो मधुर जल से मिला हो तो जबतक जाना नहीं तब तक उसको कोई पान करता है और जब उसको जाना तब फिर पान नहीं करता तैसे ही जब तक इस संसार को ज्यों का त्यों नहीं जाना तब तक इसके पदार्थों की इच्छा करता है पर जब जाना कि यह मायामात्र है तब इसकी इच्छा नहीं करता। हे रामजी! सुन्दर स्त्री जो नाना प्रकार के वस्त्र और भूषणों सहित दृष्टि आती है उनको ज्ञानवान् जानता है कि ये अस्थि, मांस, रुधिर आदिक की पुतलियाँ बनी हैं और कुछ नहीं जो उनकी इच्छा त्यागता है तो वह विरक्त हो जाता है। जैसे मूर्ति पर नील, पीत, श्यामरङ्ग लिखे होते हैं तैसे ही उनके वस्त्र और केश हैं। हे रामजी! जिस पुरुष को आत्मा का साक्षात्कार होता है उसको जगत् में वस्तु-बुद्धि नहीं होती। अवस्तु में वस्तुबुद्धि तब होती है जब वस्तु का विस्मरण होता है सो ज्ञानवान् को तो सदा स्वरूप का स्मरण है उसको अवस्तु में वस्तुबुद्धि कैसे हो? जिसको आत्मबुद्धि हुई है उसको विस्मरण नहीं होता। जैसे किसी पुरुष ने किसी के पास गुड़ रखा हो और वह खा जावे तो उसको वह दण्ड आदि दे सकेगा परन्तु उसका रस दूर नहीं कर सकता, तैसे ही जिसको आत्मा का अनुभव हुआ है उसको कोई कुछ नहीं कर सकता। हे रामजी! जैसे कुलटा नारी का किसी पुरुष से चित्त लगता है तो वह गृह का कार्य भी करती है परन्तु चित्त उसका सदा उसमें ही रहता है, तैसे ही ज्ञानवान् क्रिया करता है परन्तु उसका चित्त सदा आत्मपद में रहता है और जैसे परव्यसनी नारी को उसका भर्त्ता दण्ड भी देता है पर तो भी स्पर्श का सुख उसके हृदय से दूर नहीं कर सकता, तैसे ही जिसको आत्मानुभव हुआ है उसको कोई दूर नहीं कर सकता और जो देवता और दैत्य दूर नहीं कर सकते