श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ३ ] सारकाण्डम् ९५
सर्गः ३ ] सारकाण्डम् ९५
दशास्यपत्नी तानाह कार्या भूमिगता त्वियम् । स्थापनीया बहिर्नेयं दर्शनाद्वंशकारिणी ॥ २४०॥ गृहस्थाश्रमयुक्तो यस्तथा च विजितेंद्रियः । वृद्धिमेष्यति तद्गेहे कुमारीयं शुभानना ॥ २४१॥ चराचरेषु सर्वत्र आत्मरूपेण यः स्थितः । तस्य गेहे चिरं कालं स्थास्यतीयं न संशयः ॥ २४२॥ इति मंदोदरीवाक्यं श्रुत्वा दूताः सविस्तराम् यात्रार्थे गंतुमुद्युक्तास्तावत्कन्या वचोऽब्रवीत् ॥ २४३॥ यास्याम्यहं पुनर्लङ्कां राक्षसानां वधाय च निधनाय दशास्यस्य सपुत्रस्य समंत्रिणः ॥ २४४॥ अथ तृतीयवेलायामागमिष्याहं पुनस्त्विह निकुम्भजं पौंड्रकं तं शतशीर्षं च रावणम् ॥ २४५ हनिष्यामि पुनर्गत्वा पुनर्यास्याम्यहं त्वत्पुर्याम् अह चतुर्थवेलायामद्भुतं मूलकासुरम् । २४६ । कुम्भकर्णसुतं शूरं संहनिष्याम्यहं पुनः सत्यस्या वचनं श्रुत्वा हृदि विद्धो दशाननः ॥ २४७॥ जातास्ते राक्षसाः सर्वे भयभीताः शवोपमाः। रावणश्चिन्तयामास हन्तव्याऽयं बालिका ॥ २४८॥ तीक्ष्णं खड्गं करे धृत्वा पपां दुद्राव रावणः। हन्तुकामं पतिं दृष्ट्वा मयकन्या न्यवारयत् ॥ २४९॥ साहसं कुरु माऽद्यैव सत्यायुषि दशानन । भविष्यति वधस्त्वद्य तत्र नास्या वचो मृषा ॥ २५०॥ यद्भविव्यति भवतु तदग्रे त्यज कानने । कालान्तरेण यो मृत्युस्तन्मद्य त्वं किमिच्छसि ॥ २५१॥ इति भार्यावचः श्रुत्वा तूष्णीमास दशाननः। ततः सा पेटिका दूतैर्नीता यानेन वै जवात् ॥ २५२॥ पश्यन्द्भर्वानि सर्वाणि परिपार्थे मैथिलस्य च कृता भूमिगता दूतैस्तदा सर्वैः करण्डिका ॥ २५३॥ तता ययुः पुनर्लङ्कां दूतास्ते रावणस्य च । न्यवेदयन् रावणाय सर्वं वृत्तं यथाश्रुतम् ॥ २५४॥ सा भूमिः सूर्यग्रहणे विदेहेन समर्पिता। ब्राह्मणाय द्विजश्चापि तां कर्षयितुमुद्यतः ॥ २५५ । पश्यन्मुहूर्त्तं प्रियः स प्रत्यब्दं वै पुनः पुनः। चिरकालेन दृष्टाऽथ बृहतीं परमोदयम् ॥ २५६ ।
मन्दोदरी ने उनसे कहा कि दर्शनमात्रसे वंश करनेवाली इस यतिनीको बाहर खुली न रखना, बल्कि अण्डामे गाड आना ॥ २४० ॥ गृहस्थाश्रममे होते हुए भी जो जितेन्द्रिय होगा, उसके घरमे यह शुभानना कुमारी वृद्धिको प्राप्त होगी ॥ २४१ ॥ सब चराचरके साथ अपनी आत्माके समान बर्ताव करनेवाला जो होगा, उसके घरमे यह चिरकाल स्थित रहेगी। इसमे सन्देह नहीं है (अर्थात् समदर्शी तथा जितेन्द्रियके घरमे ही लक्ष्मी स्थिरकारक रहती है-दूसरेके यहाँ नही) ॥ २४२ ॥ इस प्रकार मन्दोदरीकी बात सुनकर ज्यों ही दूत लोग चलनेको उद्यत हुए, त्यों ही कन्या कहने लगी- ॥ २४३ ॥ मै फिर राक्षसों तथा मन्त्री और पुत्रसहित रावणका वध करनेके लिए लंकामे आऊँगी ॥ २४४ । पुनः तीसरी बार यहाँ आकर निकुम्भपुत्र पौण्ड्रकको तथा सौ सिरवाले रावणको मारूँगी; फिर बादमे पुनः चौथी बार आकर शूरवीर कुम्भकर्ण सुत मूलकासुरको मारूँगी इसके बचनको सुनकर दशाननका हृदय बिद्ध हो गया ॥ २४५-२४७॥ वे सब राक्षस भी भयभीत होकर मृतक सदृश हो गये। रावणने सोचा कि इस बालिकाको अभी मार डालना चाहिये यह विचार तथा तीक्ष्ण तलवार हाथमे लेकर वह पपाकी तरफ दौड़ा। पतिको इस प्रकार कन्याको मारनेके लिये उद्यत देखकर मयदानवकी कन्या मन्दोदरीने कहा- ॥ २४८ ॥ २४९ ॥ हे दशानन ! आयु शेष रहनेपर भी आज ही तुम यह साहस मत करो। इससे तुम्हारी मृत्यु हो जायगी। इनका वचन झूठा न होगा ॥ २५० ॥ आगे जो होनेवाला होगा सो होगा। अभी तो तुम इसे वनमे छुटवा दो । कालान्तरमे होनेवाली मृत्युको आज ही क्यो बुलाते हो ? ॥ २५१ ॥ भार्याके इस वचनको सुनकर दशानन चुप हो गया। पश्चात् दूत उस सन्दूकचीको शीघ्र विमानमे रखकर ले गये ॥ २५२ ॥ सीताके प्रिय मिथिला नगरके वनोंको देखते हुए उसीपर सब दूतोंने उस करण्डिकाको भूमिमे गाड दिया ॥ २५३ ॥ तदनन्तर वे लङ्का लौट गये और जो किया था, सो सब वृत्तान्त रावणसे निवेदन कर दिया ॥ २५४ ॥ राजा विदेहने वह जमीन सूर्यग्रहणके अवसरपर एक ब्राह्मणको दान दे दी थी। ब्राह्मणने उस जमीनका जुतवानेका विचार किया ॥ २५५ ॥ प्रतिवर्ष शुभ मुहूर्त देखते-देखते बहुत वर्षों बाद
| २६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ३ |
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शूद्रेण कर्षयामास भूमिं कृष्यर्थमादरात् । तदा हलमुखाग्रेण निर्गता सा करंडिका ॥२५७॥ तां गृहीत्वा स शूद्रोऽपि ययौ भूमिपतिं द्विजम् । स मत्वा तन्निधानं तु ह्युत्प्रेक्षाप्राप्तद्विजोत्तमम् ॥२५८॥ श्रेष्ठस्त्वं मुहूर्तोऽय महाभाग्यं तव द्विज । इमं हलाग्रसंभूतां गृहाण त्वं करंडिकाम् । २५९॥ निधानपूरितां गुर्वी मया यत्नेन बाहिताम् । ततः स द्विजवर्यस्तु तां जगाद करंडिकाम् । २६० । तामानीय विदेहाय सभामध्ये ददौ मुदा नृशंसं प्राह वृतं तद्विप्रः श्रुत्वा नृपोऽपि सः ॥२६१। उवाच ब्राह्मण भक्त्या मया भूमिः समर्पिता तस्यां लब्धा त्वया चेयं त्वमेवास्तु करंडिका ।२६२। विदेहवृपतेर्वाक्यं श्रुत्वोवाच द्विजः पुनः । मद्यं समर्पिता पूर्वं भूमिरंव मया नृप । २६३॥ नैषा करंडिका रम्या वसुपूर्णा समर्पिता । यद्भूभौ वर्तते वित्तं तन्नृपस्य न संशयः ॥२६४ मा मामधर्मः युङ्क्त गृहाणेषां करंडिकाम् एवं नृपस्य विप्रेण कलहोऽभूत्सुदारुणः ॥२६५ । तदा सभासदाः सर्वे नृपतिं वाक्यमब्रुवन् । मा काशः करंडो राजन् पश्यास्यां किं नु वर्तते । २६६॥ ता तदोद्घाटयामास दूतैर्नृपतिसत्तमः । तस्यां दृष्ट्वा बालिकां तु विस्मयं प्राप पार्थिवः । २६७॥ द्विजस्त्यक्त्वा ययौ गेह पालयामास तां नृपः । तदा खेचव्यचांगानि नेदुः कुसुमवृष्टिभि ॥२६८ ववृषुः सुरसंघाश्च तां कन्या जनकं नृपम् । गंधर्वा गायनं चक्रुर्ननृतुश्चाप्सरोगणाः । २६९ । तदा मेने निजा कन्यां जनकोऽतोषमाप सः । जातकं कारयामास विप्रैस्तस्याः सविस्तरम् ॥ २७० । ददौ दानानि विप्रेभ्यो ननृतुर्वारयोषितः । मातुलुङ्गाभिर्गता या मातुलुङ्गीति सा स्मृता ॥२७१ । अग्निशालाद्विनिर्गतां तथा रत्नावलीति च । स्वर्नान्तर्गतत्वाच्च प्रोच्यते जगतीतले ॥२७२॥ धरण्या निर्गता यस्मान्नाम्नाद्धरणितीति च । जनकेनापिता यस्माज्जानकीति प्रकीर्त्यते । २७३॥
उसका सब काम सदयको बतलाया प्रसन्न होकर ॥ २५६ ॥ उस ब्राह्मण आदरपूर्वक शूद्रस उस उपायमय मकार लिए हल चलवाया । उसी समय इसके फलसे यह सबब विचित्र आयो । २५७ ।। उसको देखकर वह शूद्र जमीनके मालिकके पास गया और उसको दृढ खजाना समझकर महर्षि ब्राह्मणके कहने लगा हे द्विज ! आप बड़े भाग्यशाली है आपने अच्छा मुहूर्तमें काम आरम्भ करवाया। यह हलके अग्रभागसे (अर्थात् फारका जिसका मन्त्रतन्त्र खींचा करते है) बहुत (प्रान्त) सन्तुष्टको लिये । मै लगनसे भरी हुई बड़ा भारी इस पिटारीको बड़ी कठिनता उठाके लाया हूँ। उस द्विजने उसको ले लिया । २५८-२६० । उसक ले जाकर ब्राह्मणने सभाके सामने राजा विदेहको दिया और सब समाचार कह सुनाया। राजा भी यह सुनकर ब्राह्मण कहने लगे कि मैने तो भक्तिस भूमि आपकी समर्पण कर दी है। तवं उसमन मिली हुई यह पिटारी भी आप ही की है ॥ २६१ ॥ २६२ ॥ राजा विदेहके वचनको सुनकर ब्राह्मण उनसे कहने लगा- हे नृप आपने मुझे भूमि ही दी है॥ २६३ यह धनपूर्ण सुन्दर संदूक नही दी थी। इसलिए जो भूमिमें धन है वह निर्विवाद राजाका ही होता है। २६४ ! मुझे अधर्ममें न डाल और इस पिटारीको आप ही बहण कर। इस प्रकार राज' तथा ब्राह्मणमे बडा झगड़ा होने लगा। तब सब सभासदोन राजासे कहा-हे राजन् ! बक्सूको छोड़ें और देख कि इसमे क्या है ? ॥ २६५ । २६६ । तव नृपतिश्रेष्ठ श्रेष्ठ नृपति विदेहने दूतोंप संदूक खुलवायी । उसमें बालिकाको देखकर राजा बडे विस्मित हुए। ब्राह्मण उसे देवी छोड़कर घर चला गया। तब राजाने हो उस कन्याको पाल लिया। तब देवताओंक बाजे बजे और उन्होने उस कन्या तथा राजाके ऊपर पुष्पवृष्टि की । गन्धर्व गाने लगे । अप्सराये नृत्य करन लगीं ॥ २६७-२६९ ॥ तब राजा जनकने प्रसन्न होकर उसको अपनी पुत्री माना। ब्राह्मणोके द्वारा विस्तारपूर्वक उसका जातकर्मसंस्कार ( सन्तानके उत्पन्न होनेपर करनेका संस्कार ) करवाया ॥ २७० ॥ विप्रोको बहुतसे दान दिये और वेश्याओंका गायन करवाया गया । बगीचेमें वह कन्या मातुलुङ्कफलसे निकलनेके कारण मातुलुङ्गी, अग्निमे वास करनेसे अग्निगर्भा तथा रत्नोंमें निवास करनेसे रत्नावली कही जाने लगी ॥ २७१ ॥ २७२, धरणीसे निकलने-
सर्गः ३ ]
सर्गः ३ ] सारकाण्डम् २७
संसर्गात्सितेता यस्यासीत्तेनैषा प्रगीयते । पद्माभूत्स्वैः कन्या तस्मान्पद्मेति सा स्मृता ॥२७३॥ एवं नामान्यनेकानि सीतायाः संति भो नृप । आकाशनीलवर्णाभवपुषाऽनेन जानकी ॥२७४॥ लब्धा रामेण पद्माक्षप्रतिज्ञा सफलीकृता । एवं मया यथा दृष्टं तथा स्वां विनिवेदितम् ॥२७५। अतस्त्वं स्नुषास्त्वत्र कर्तुमर्हसि भो नृप । श्रीशिव उवाच एतस्मिन्नंतरे तत्र पूर्वं दशरथेन च ॥ २७७ ॥ महासुहृद् ययुः पैत्र्यैः स्त्रीपुत्रैः ससुताश्च ते । कोशलो मगधेशश्च कैकयश्च युधाजितः ॥२७८॥ मानयामास तान् राजा जनकोऽपि मुदान्वितः । ततो दशरथं पूज्य श्रीरामं लक्ष्मणं तथा ॥२७९॥ भरतं चापि शत्रुघ्नं संपूज्याभरणादिभिः । निनाय जनकस्तुष्टः स्वपुरीं परमोत्सवः ।२८०॥ तदा रामो नृपं नत्वा राज्ञा चालिङ्गितो मुहुः । वसिष्ठं गाधिनं नत्वा कौसल्यादि प्रणम्य च ।२८१॥ राज्ञो दशरथस्याग्रे संस्त्रीभिर्बन्धुभिः सह । गजारूढौ ययावग्रे तेऽप्यभूवन् गजस्थिताः ।२८२॥ नदत्सु वाद्यसंघेषु नृत्यत्सु मागधादिषु स्तौत्सु नागरस्त्रीषु विवेश नगरीं प्रभुः ॥२८३॥ तदाऽऽत्तासंभ्रमः पौरस्त्रीणां श्रीरामदर्शने । विसृज्य स्वायकृत्यानि ददृशुर्द्वारादिषु ॥२८४॥ कट्यां निधाय बालांश्च ददृशु रघुनंदनम् । राजमार्गतं रामं ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः ।२८५॥ एवं महोत्सवं गत्वाऽस्थात् दशरथः सुतः । यथा वस्त्रान्नतोयाद्यैः परिपूर्ण मनोरमम् ॥२८६। कृत्वा ज्योतिर्विदां लग्नाद्दिनमस्य विनिश्चयम् । मंडपैश्च तोरणानि पताकाश्च ध्वजांस्तथा ।२८७। रोपयमासु सर्वत्र मातृगो मिथिलां पुरीम् । भागाश्चंदनलिप्ताश्च पुष्पैरच्छादिता आप ॥२८८। गलाभिभारणः भूपैर्घोषाद्यस्त चकारयत् । ततो मुहूर्त्तसमये शुभांऽछां निर्गता शुभास् ॥२८९।
के कारण ... जानक कहा। पालित होनेसे जानकी सीता (फाल) के अग्रभागसे प्रकट होनेके कारण सीता और राजा पद्माक्षकी कन्या होनेसे वह पद्मा कहलायी ॥ २७३ ॥ २७४ । हे महाराज दशरथ इस प्रकार सीताके अनेक नाम हैं। आकाशके समान नीलवर्णरूपवाले रामने सीताको प्राप्त करके राजा पद्माक्षकी प्रतिज्ञा पूर्ण कर दी। इस प्रकार जो आपने पूछा सो मैंने निवेदन कर दिया। अब आपका उस सीताको स्नुषावधूं स्वीकार करना चाहिये। शिवजी बोले—इतनेमें पहिलेसे राजा दशरथके द्वारा बुलाये गये उनके बन्धुवर कोशलराज तथा मगधराज युधाजित् नामक कैकयराज अपनी स्त्री और प्रजाके साथ लश्कर वहाँ आ पहुँचे । राजा जनकने भी उनका प्रेमपूर्वक स्वागत किया । पश्चात् राजा दशरथका वस्त्र भूषण आदिसे और राम लक्ष्मण भरत तथा शत्रुघ्नकी पूजा करके राजा जनक महान् उत्सवके साथ अपने नगरमें ले गये ॥ २७५-२८० ॥ तदनन्तर रामने राजा दशरथको प्रणाम किया । राजाने उन्हें हृदयसे लगाया । फिर रामने गुरु वसिष्ठजी तथा गाधिसुत आदि माताओंको प्रणाम करके राजा दशरथके आगे उन स्त्रियोंका तथा बन्धुओंसहित हाथियोंपर चढ़कर आगे-आगे चले। उनके पीछे और सब लोग गजारूढ़ होकर चल पड़े। इस प्रकार वाद्यसमूहके शब्दका सुनते, चारणोंकी स्तुतियोंका श्रवण करते तथा वेश्याओंके नाचको देखते हुए प्रभु रामने नगरमें प्रवेश किया । उस समय रामके दर्शनके लिये नगरकी स्त्रियें व्याकुल हो उठीं। अपन-अपन गृहकार्योंको छोड़ सबके सब बालकोंको गोदमें लिये नगरके दरवाजे आदिपर आकर रघुनन्दन रामका दर्शन करने लगीं। राम जब सड़कपर आ गये, तब उन्होंने उनपर पुष्पवृष्टि की ॥ २८१-२८५ ॥ इस तरह महोत्सवके साथ राजा दशरथ राम आदिको लेकर अन्न (भोजनका सामान), वस्त्र (ओढ़ने-बिछानेका सामान) तथा जल (नहाने-धोने तथा पीने का पानी) आदिसे परिपूर्ण मनोहर वासस्थानपर (बरके ठहरनेके स्थानपर) गये ॥ २८६ ॥ मन्त्रियोंने ज्योतिषीके द्वारा लग्नका दिन निश्चय कराकर समस्त मिथिलापुरीको मण्डपोंसे, तोरणोंसे, पताकाओंसे तथा रंग-बिरङ्गी ध्वजाओंसे सजवा दिया। बड़े-बड़े रास्तोंको चन्दनसे सिपवाया गया। उनपर भाँति-
९८ आनन्दरामायणे [सर्गः ३
सुमङ्गल्याः स्त्रियः सर्वाः कौसल्याद्यास्तु मातरः । रामादीन् पांगुलम्पादी नीराजनपुरःसरम् ॥२९०॥ कम्भुंभांस्तोयपूर्णान्वितुदिक्षु महीपरन् । सम्वत्स्य स्नापयामासुर्महावाद्यपुरःसरम् ॥२९१॥ तटाभ्यंगं स्वयं वापि कृत्वा मन्तुश्च मातरः । रामादीन् पूज्तः कृत्वा वस्त्रालंकारभूषिताः ॥२९२॥ अभ्यङ्गपूर्वकं पत्नी राजा दशरथोऽपि सः । समाहूय नृपस्त्रीश्च समाज्ञा म्वालिके गुरुः ॥२९३॥ मुक्ताविनिर्मिते राज्ञः पार्श्वे वामे न्यवेशयत् । अग्रे गर्भादिकांश्च ताः स्त्रियोऽवन्सननाः ॥२९४॥ हरिद्राकुंकुमालिप्तचरणा रेजिरेऽद्रुते । वसिष्ठो ब्राह्मणैर्युक्तो राजा गर्भादिभिर्मुदा ॥२९५॥ कृत्वा गणपतेः पूजां पुण्याह्यादितयं क्रमात् । कारयामास विधिवत्प्रतिष्ठां देवतस्य च ॥२९६॥ ग्रामाचारं कुलाचारं वृद्धाचारं तथा पुनः । देशाचारं च प्रमदाचारादीनकरोन्नृपः ॥२९७॥ तोयकुम्भं मंडपादिकानां पूजनमाचरत् । कौसल्याद्याः स्त्रियः सर्वा हरिपीतारुणैर्वरैः ॥२९८॥ हेमन्तन्तुर्वितैर्वस्त्रैर्दिशेजर्मंडपांगण । जनकश्च नृपैर्युक्तो महावाद्यपुरःसरम् ॥२९९॥ रामादीन् निजं गेहं नेतुकामः समाययौ । मंडपे पूजयामास रामादीन् जनकस्तदा ॥३००॥ हेम्नतन्तुद्रवैर्र्दव्यैर्वस्त्रैराभरणादिभिः । तदा विरेजुस्ते बालः सर्वे प्रमुदिताननाः ॥३०१॥ तानग्रे वारणेंद्रस्था दिव्यचामरवीजिताः । शृण्वन्तो वाद्यघोषांश्च दंपतः पुष्पवृष्टिभिः ॥३०२॥ हरिद्रांकितधान्यैश्च माङ्गल्यैर्मौक्तिकादिभिः । मातृभिश्चारुणेक्षांषु वर्षिताभिश्चहुर्मुहुः । ३०३॥ एव ते राघवाश्चाश्च पुरस्त्रीभिनिरीक्षिताः । प्रासादोपरि संस्थाभिलाजाभिर्वर्षिता मुहुः ॥३०४॥ ददृशुर्नर्तनान्यग्रे वारस्त्रीणां स्मिताननाः । वाटिकाः पुष्पवृक्षाणां वरमुक्ताप्रनिर्मिताः ॥३०५॥
भांति के पुष्प विखर दिये और साफ खास स्थानोंमें गलत्था तथा तारा बनवा दिये, पुष्पलताओ और मार्जारिक पाषा द्वारा उस समय वह नगरी गोद की दिव्य मा ३स गहन लगो । तदनन्तर शुभ मुहूर्तमे जिस रामका माताके शरीरम स्त्रियाके द्वारा तेल हुल्दा आदि मन, गया । उस समय कौमल्या आदि माताओने आंगन लेप तथा रामका पानी छिड़ककर जम्पूर्ण हंसक सहित चार सुन्दर घड़ोको चारो दिशाअम स्थापित करके राम लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्नको वाद्यत्कृतिक मध्य मङ्गलमय स्नान कराया ॥२९०-२९१॥ फिर तेल आदि मलकर अपन आप भी सब माताओन स्नान किया। पहिल नया आदिको वस्त्र तथा भूषणोसे भूषित करके तदनन्तर आरिका शरीरम अभ्यङ्ग करक मन्दकर) राजा दशरथने भी स्नान किया। पश्चात् गुरु वशिष्ठत नजाक सब नियोको समाद्रूपरम बुलाकर राजाके बामभागम मुक्तानिर्मित स्तम्भिक महित ( वरी या आसन, पर बैठाया। उस समय मबके आसनमे स्थिति राम आदि बालकोक समान बैठाकर भिन्न चुन किया तथा रूपी और तेल चरणाम लगाये अत्यन्त सुशो- भित होत हथी । बाह्मणके महित धषिष्ठजीन राग दशरथ साथ गभादिके द्वारा गणपतिपूजन तथा पुण्याहवाचन ये दोनों कर्म प्रमुख करवाये और तीसरा कर्म विधिनत् दस्ताकी प्रतिष्ठा करवायी । राजा दशरयन भा बादमे प्रसन्नतापूर्व ग्रामाचार कुलाचार, वृद्धाचार देशाचार तथा प्रमदाचार आदि किया ॥२९२-२९६ ॥ तदनन्तर अहपूर्ण कुम्भ तथा मण्डप आदिकी पूजा का। मण्डपके आँगनम हरी लाल, पीली तथा जरादार साड़ियोको पहनकर कौसल्या आदि स्त्रिय बड़ी सुन्दर दीसन लगा। बड़े बड़े बाजोनको बजवान हुए अन्य राजाओक सहित राजा जनक श्री राम आदिको अपने भवनमें लिवा ले जानके लिये वहाँ आये। मण्डपम जाकर राजा जनकन राम आदिका पूजन किया ॥ ३०० ॥ उस समय प्रसन्न मुखवाले वे सब बालक जर्रोदार दिव्य वस्त्रो तथा आभरणोका पहने हुए बड़े मुन्दर लगते लगे । ३०१॥ बादम वे सब जं कि उत्तम हाथियोपर बैठे हुए थे, जिनपर सुन्दर चैवर दुल रहे थे । हाथियोपर बैठा हुई माताएं चारो तरफम बारम्बार जिनपर मोतियो, माङ्गलक हरदामिश्रित चानलो तथा पुष्पोकी बौछार कर रही थीं । जिनके आ नगरकी स्त्रिय बड़े चावसे देख रही थी तथा भवनोंपरसे बालका लावा बरसा रहा थी । अनिन्तर मुझासे वहाँके रास्तेमे वेश्याओके नृत्य
मर्गः ३ ] बालकाण्डम् २९
तथा कृत्रिमवृक्षांश्च पताकाश्च प्रजांस्तथा । वह्निप्रद्योतदीर्घाणां पुष्पवृक्षविनिर्मिताम् ॥३०६॥ तडिन्प्रभोषमांश्चापि गगनान्तर्विगर्जिनन् । वह्निप्रद्योतधाम्न्याः प्राकारान् विविधान् वरान् ॥३०७॥ चंद्रज्योत्स्नाकृत्रिमांश्च दीपवृक्षांन् सहस्रशः । हारमालाश्च व्याघ्रादीन्कृत्रिमान् रशमींस्तथान् ॥३०८॥ औषधीभिः पूरितांश्च केकोचकोपमादिकान् । ददृशुस्तंगणेंद्रव्या एवं ते राघवादयः ॥३०९॥ तदा देवा विमानस्था ददृशुः कौतुकं मुदा । एव नानोत्सवैरैतान् पपुर्जनकमंदिरम् ॥३१०॥ अवरुह्य गजेन्द्रेभ्यस्तस्थुस्ते मंडपांगणे । मधुपर्कविधानानि विष्टरादीन् च क्रमात् ॥३११॥ तयोर्गुरू चक्रतुस्तां वसिष्ठगौतमत्मजौ । वाल्मीक्यादिमुनिगणैर्वेष्टितौ तुष्टमानसौ ॥३१२॥ ततः पूजां वधूनां च पुत्रा दशरथो नृपः । चकार गुरुणा युक्तस्तदा स मंडपाङ्गणे ॥३१३॥ ततो लग्नमुहूर्ते तान् वशंमिश्र पुरस्कृतन् । वेदिकासु स्थितान् कृत्वा दम्पत्योरंतरे पटान् ॥३१४॥ कृत्वा मंगलघोषांश्च मुनिभिश्चकृतुर्गुरुः । तदा तूष्णीं सभायां ते शुश्रुवुःसकला जनाः ॥ दूर्वाद्यैः क्षीरधान्यैश्च वधूपुत्रन्वतीन् स्त्रियः ॥ ३१५ ॥ ओंडैवातपयो शिवः सुखकरो मित्रः शशा रूपनः सर्वं ते मुनयश्चना दद्यु दिशः सर्वा मृगेंद्राः खगाः । नद्यःपुण्यसरोवरोर्गण दितिजास्तीर्थानि कंजामनश्चेंद्रा वह्नमरा नटी जलधयः कुर्वंतु वो मंगलम् ३१६॥ तदेव लग्नं सुदिनं तदेव ताराबलं चंद्रबलं तदेव । विद्याबलं दैवबलं तदेव कार्यः पतैर्यत्स्मरणं विधेयम् ३१७ एवं मंगलाशब्दैश्च महावाद्यपुरःसरम् । तेषांमतःपटान्मुक्त्वा ॐपुण्योऽस्त्वन्वतूर्गुरू ॥३१८॥ तासां ते पाणिग्रहणविधानं विधिपूर्वकम् । लाजाहोमादिकं सर्वं चक्रुर्मंगलपूर्वकम् ॥३१९॥ तदा महावाद्यघोषा निनेदुर्मंडपांगजे । ननृतुर्वारनार्यश्च जगुर्मागधवन्दिनः ॥३२०॥
मनोहर गिट्टी आदिके बने हुए गमलों, वृक्षों तथा फूल पत्तियोंसे बनी हुई वाटिकाओंको, कृत्रिम वृक्षोंको, पताकाओंको, ध्वजाओंको, बधिक समान जलवान, तडितके समान शभानबल और आकाशमें गरजनेवाले नाना प्रकारके आतिशवाजात सब पुष्पवृक्षतया वाटिका, हजारों चन्द्रमाओकी चान्दनीके कृत्रिम दीपवृक्षोंका, रश्मीमात्राओंका, रशामेरख हुए बनावटी व्याघ्रादिमृग वाटिका, ओषधिसं भरे हुए मोर तथा पक्षी आदिको देखने लगे ॥३०६-३०९॥ सब देवता भी आनन्दसे उस कौतुकको देख रहे थे। इस प्रकार विविध उत्सवों सहित वे राम आदि बालक राजा जनकके भवनको गये । ३१०॥ वहाँ जा तथा हाथियोंस उतरकर वे मण्डपके आँगनम खड हा गय। वाल्मीकि आदि मुनियांस घिर हुए दोनो वधक गुरु वशिष्ठ तथा श्रीमद्गुरु शतानन्दने प्रसन्नतास मधुपर्क (मधुमिश्रित दधि) का विधान और आसन आदिका विधान सम्पन्न करवाया । ३११॥३१२॥ पश्चात् राजा दशरथने गुरु वशिष्ठका साथ लेकर महर्षि बांधी पुत्रवधुओंकी पूजा की। फिर शुभ मुहूर्त तथा शुभलग्न मुनियो तथा गुरुतन उन-उन वधुओं ओर उन उन चार बालकोंको पृथक् पृथक् वेदियोपर बैठाकर उन दम्पत्याक बाचम बन्धक बहकर गङ्गलमय श्लोकोंका उच्चारण किया। सभाके सभ मनुष्य चुप होकर उसे सुनत लगे। दुवाय कलशम् गङ्गोपान चावल तथा फूल वरवधूके ऊपर बरसने लगे ॥ ३१३-३१५॥ तरुदाता दयालय गणपति, सुखकारक शिव, सूर्य, ग्रह राहु, सब मुनि, चल-अचल जीव, दशा दिशाय, सर्प, मृगन्द्र, खग, नदी, पवित्र सरोवर, दत्य, तीथ, ब्रह्मा, इन्द्र, अग्निसहिता तथा नदी-समुद्र आदि तुम लोगांका कल्याण करें ॥ ३१६॥ कोटिपाति आदिनाथका सत्यतल्या स्मरण ही तुम्हार लिए सुन्दर लग्न, शुभ दिन, ग्रहबल, विद्यावल तथा दैवबल बन जाय ॥ ३१७॥ इस मांगलिक शब्दो और मांगलिक बाजाके ध्यान हान लगा। उसके बाद बीचमें धरे हुए बस्त्रोंको हटा दिया गया और दानों बारके गुरुओने "ॐपुण्योऽस्तु" ऐसा कहा ॥ ३१८ ॥ इस प्रकार उन लोगोंने मिलकर विधिपूर्वक उनका विवाहकार्य तथा लाजाका हवन आदि सभी कृत्य मङ्गलपूर्वक संपादित कर दिया ॥ ३१९॥ तब मण्डपकी डंगराडम बडे-बडे बाजोका विनाद होने लगा, वेश्यायें नाचने लगी, भांट और बन्दीजन यशगान करने लगे ॥ ३२० ॥
३० आनन्दरामायणे [ सर्गः ३
नटा मङ्गलगीतानि तुष्टुवुस्ते महारथैः। तदा दानान्यनेकानि चक्रतुस्तौ नृपोत्तमौ ॥३२१॥ अथ ते बालकाः सर्वे वधूः स्थाप्य करीन्द्रषु । राघवेण दिवानिद्राभिषेकेऽभून्मे भोजनमुत्सवात् ॥३२२॥ भद्रास्त्रांसिंचनं चक्रुः संपूज्य शर्व स स्मर । ते रामादिकाः सर्वे स्वस्वपत्न्या पृथक्सुखाः ॥३२३॥ चक्रुस्ते भोजनं हृष्टाः स्त्रीभिः सर्वत्र वांञ्छिता । गजा दत्त्वाभ्रश्वांश्च सुहृद्भिश्च नृपोत्तमैः ॥३२४॥ पौरैर्जानपदैस्तृष्टैर्मुनिभिः परिवेष्टितैः। जनकस्य गृहं गत्वा चकार भोजनं मुदा ॥३२५॥ कौसल्य द्य, स्त्रियः प्रीतिश्चक्रुर्भोजनमुत्तमम् सुमेधया प्रार्थितास्ता वदित्यथ मुहुर्मुहुः ॥३२६॥ एव मुत्सवेऽभून्मासत्रयं जनको मुदा। अथ ते बालकाः सर्वं स्वैर्वाक्यान्यामन्त्रयद्विधौ ॥३२७॥ स्वस्वपत्न्याः पादयोः स्वारोग्यभिनन्दन मुहुः। चक्रुःप्रष्ट्वेदमस्ते तस्मा नेमुः पृथक् पृथक् । कुङ्कुमालिम्पदाथ तैरुमकेषु ता ददुः । ३२८॥ श्रीरामः समवाप्य भूमिसन तन्मात्रा जगज्जानकी महाभागा वराङ्गेन्दुवदनः कारुण्यपूर्णेक्षणः ॥ विद्युद्वर्णरजोमनोहरतरश्चामीकराङ्गोत्तरो जामाताऽभवदावेड्यतनुपेमा मुक्ताविराजद्रलः ॥३२९॥ चतुर्थे दिवसे रात्री वस्त्रपात्रादिराजितेः । दीपैर्नैर्गजिनाः सर्वे विरेजू राघवादयः ॥३३०॥ रामादीनां परिवर्हान् ददौ स जनकस्तदा । नियुतान् वारणेंद्रांश्च शिविकाश्चापि तन्मिताः । ३३१। तुरगान् दशलक्षांश्च नियुतान् स्यन्दनान ददौ नानालंकारवासांसि गोदासीसेवकदिकान् ॥३३२। ददौ स राघवादिभ्यो येषां संख्या न विद्यते । एवं सम्मानितास्तेन ते बाला जनकेन हि ॥३३३। पूर्वेवद्रुमथ श्रेष्ठ स्वस्वपत्न्या समन्विताः । गजारूढ़ा सुसङ्गीतैर्नात्वायैः स्वमंडप ययुः । ३३४ ततो राजा मासमेकं निनाय नृपनायकतः । ततः सैन्येन स्वपुरीं गन्तुं पुराद्वहिर्ययौ ॥३३५॥ साताद्या निर्ययुर्मुग्धाः साश्रुनेत्राः सुविह्वलाः । सुमेधाभ्या समाश्लिप्य सांत्वयित्वा न्यसर्जयत् ॥३३६।
नट आदि ने अनेक मङ्गलगीतोंका गान किया और दोनों भूपने अनेक दान दिये । ३२१ ॥ तदनन्तर वे सब बालक अपनी अपनी बहुओं को हाथीपर चढ़ाकर चले । वे दिनमें जाके साथ भोजनालयमें गये । ३२२ ॥ हे पार्वती ! वहाँ आचमन करके सुहृद्गण तथा गौरीशंकर (शिव-पार्वतीकी) पूजा करनेके बाद सब अपने अपने परिजनोंके साथ आदरपूर्वक भोजन किया और सब स्त्रियाँ उन्हें देखकर संतुष्ट हो गयीं। राजा दशरथ भी अपने राजाओंके, बन्धुओंके, नगर तथा देशके लोगोंकी और मुनियोंकी साथ में तथा जनकके घरपर जाकर महोत्सव में भोजन किया ॥ ३२३-३२५॥ सुमेधासे बार-बार प्रार्थित तथा वन्दित कौशल्या आदि स्त्रियोंने भी जाकर प्रेमपूर्वक भोजन किया तथा राजा जनकको बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ । फिर उन बालकोने प्रसन्न होके स्त्रियोंके कहनेसे माताओंके सम्मुख अपने अपनी स्त्रियोंके पैरोंपर अपना अपना सिर रखकर नमस्कार किया। पश्चात् उन स्त्रियोंने भी उनको अलग-अलग नमस्कार करके उनका गालोंपर कुङ्कुमसे तिलक किया ॥ ३२६॥ ३२७॥ ३२८॥ समस्त संसारके जनक सुन्दर चन्द्रके समान मुखवाले तथा करुणापूर्ण नेत्रोंवाले, विद्युत्के समान वर्णवाले, पीत वस्त्रोंको धारण किये हुए, विलक्षण वेशवाले, अनुपमेय कान्तिवाले, अनुपम शोभाको प्राप्त हुए जानकी आदि आदि स्त्रियॉं, और भूमिसतया शोभाको प्राप्त कर लिया ऐसा जान पड़ता था ॥ ३२९॥ चौथे दिन रात्रिमें वस्त्रोंसे सुसज्जित होकर दीपकोंसे शोभित तथा पूजित राम आदि चारों भाई बड़े ही शोभायमान होने लगे ॥ ३३० ॥ राजा जनकने राम आदिको जो दहेज़ दिया दस लाख हाथी, दस लाख पालकियाँ दस लाख घोड़े तथा दस लाख रथ अगणित अलंकार, पोशाक, गौएँ तथा दास-दासिएँ दीं। इस प्रकार राजा जनकके द्वारा सम्मानित वे बालक ॥ ३३१-३३३॥ अपनी अपनी स्त्रियोंको साथ लेके तथा हाथियोंपर सवार होकर नृत्यगान तथा बाजेके साथ अपने मण्डपको लौट आये । ३३४॥ पश्चात् राजा दशरथ राजा जनकके साथ एक महीना वहाँ व्यतीत करके अपने पुरको जानेके लिये सेनाके साथ उस पुरोस बाहर आये । ३३५ । सीता आदि अश्रुपूर्ण नेत्रोंमें बहुत विह्वल होकर चलीं। सुमेधाने उनको
[सर्गः ३] सारकाण्डम् ३१
अथ राजा दशरथो जनकं विन्यवर्तयत् । तदा दशरथं प्राह जनकः साश्रुलोचनः ॥३२७॥
समालिङ्ग्याथ ताः कन्या विरहाद्गद्गदाक्षरः । एतावत्कालपर्यन्तं सीताद्याः पालिता मया ॥३२८॥
अधुना त्वन्मयाप्यग्रे लाल्याश्च कृतेक्षणैः । इत्युक्त्वा नृपतिं नत्वा मिथिलां जनको ययौ ॥३२९॥
ततो दशरथोऽपि स्नुषासंनयनादिभिः । भूपैः सैन्येन स्वपुरीं ययौ मार्गे शनैः शनैः ॥३३०॥
अथ गच्छति श्रीरामे मैथिलाद्योजनत्रयम् । निमित्तान्यतिघोराणि ददर्श नृपसत्तमः ॥३३१॥
नत्वा वसिष्ठं पप्रच्छ किमिदं मुनिपुङ्गव । निमित्तानीह दृश्यन्ते विषमाणि समन्ततः ॥३३२॥
वानप्रस्थमथो प्राह भयमात्राणि सूच्यते । पुनरेषां प्रभावेऽद्य शीघ्रमेव भविष्यति ॥३३३॥
मृगाः प्रदक्षिणीयान्ति त्वां पश्य शुभसूचकाः । एवं वै वदतस्तस्य ववौ घोरतरोऽनिलः ॥३३४॥
मुष्णंश्चक्षूंषि सर्वेषां पांसुवृष्टिभिरर्हयन् । ततो ददर्श परमं जामदग्न्यं महाप्रभम् ॥३३५॥
नीलमेघनिभं प्रांशुं जटामण्डलखण्डितम् । धनुः शृङ्गरस्तं च साक्षात्कालमिव स्थितम् ॥३३६॥
कार्त्तवीर्यान्तकं रामं दृप्तक्षत्रियमर्द्दनम् । प्राप्तं दशरथस्याग्रे रक्तास्यं रक्तलोचनम् ॥३३७॥
तं दृष्ट्वा भयसंत्रस्तो राजा दशरथस्तदा । पर्णादिपूजां विस्मृत्य त्राहि त्राहीति चाब्रवीत् ॥३३८॥
दण्डवत्प्रणिपत्याह पुत्रप्राणान्प्रयच्छ मे । इति ब्रुवन्तं राजानमनादृत्य रघूत्तमम् ॥३३९॥
उवाच निष्ठुरं वाक्यं क्रोधात्प्रज्वलितेन्द्रियः । त्वं राम इति नाम्नाऽत्र चरसि क्षत्रियाधम ॥३४०॥
द्वन्द्वयुद्धं प्रयच्छाशु यदि त्वं क्षत्रियोऽसि मे । पुराणं जर्जरं चापं भङ्क्त्वा त्वं कत्थसे मुधा ॥३४१॥
इदं तु वैष्णवं चापमारोपयसि चेद्गुणम् । तर्हि युद्धं त्वया सार्द्धं न करोमि नृपात्मज ॥३४२॥
नो चेत्सर्वान्हनिष्यामि क्षत्रियान्तकरस्त्वहम् । इति तद्वचनं श्रुत्वा राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥३४३॥
छातीसे लगाया तथा आश्वासन देकर विदा किया ॥ ३२६ ॥ तब राजा दशरथने राजा जनकको लौटनेके लिये कहा । राजा जनक आँखोंमें आँसू भरकर कन्याओंको छातीसे लगाये हुए पुत्रियोंके वियोगसे गद्गदस्वर होकर राजा दशरथसे कहने लगे कि आज तक मैंने सीता आदिका लालन-पालन किया और अब आजसे आप अपनी कृपादृष्टिसे इनका पालन-पोषण करें। ऐसा कह और राजाको नमस्कार करके राजा जनक मिथिलाको लौट गये ॥ ३२७-३२९ ॥ राजा दशरथ भी पुत्रों, स्नुषाओं (बहू), राजाओं तथा सेनाके साथ लेकर धीरे-धीरे अपनी नगरीको चले ॥ ३३० ॥ जब श्रीरघुवीर मिथिला देशसे केवल चार कोस आगे बढ़े। तब राजा दशरथको अतिघोर अशकुन दिखाई दिये ॥ ३३१ । तब वे नमस्कार करके वसिष्ठजीसे कहने लगे—हे मुनिपुंगव ! यह क्या कारण है कि चारो तरफ ये अशकुन दिखाई दे रहे हैं ? ॥ ३३२ । वसिष्ठजीने कहा कि ये भयके मात्र सूचक हैं। परन्तु शीघ्र ही आपका भय निवृत्त हो जायगा ॥ ३३३ ॥ देखिये, शुभसूचक हिरण दाहिनी ओर जा रहे हैं। इतना कहना ही था कि घोरतर वायु बहने लगी ॥ ३३४ ॥ पवनसे सबकी आँख भर गई। दारुण बड़े तेजस्वी, नीले मेघके समान लंबे-तगड़े ऊंची जटाओंके मंडलवाले, कंधेपर धनुष बाण धारण किये, साक्षात् कालके समान लाल मुँह किये हुए कार्त्तवीर्यार्जुनके महाशत्रु तथा उद्धत मदोन्मत्त घमण्डी क्षत्रियोंका नाश करनेवाले परशुरामजी दशरथके आगे खड़े हो गये ॥ ३३५-३३७ । राजा दशरथ उनको देखकर भयसे विह्वल हो सत्कार पूजा भूलकर त्राहि-त्राहि करने लगे ॥ ३३८ ॥ उन्होंने दण्डवत् प्रणाम करके कहा कि आप मेरे पुत्र रामके प्राण बचायें । परन्तु परशुरामजीने क्रोधातुर होकर राजाका अनादर करके रघूत्तम रामसे इस प्रकार निष्ठुर वचन कहा—अरे क्षत्रियाधम राम ! तू मेरे नामके समान इस मण्डलमें प्रसिद्ध हुआ फिरता है ? ॥ ३३९ ॥ ३४० ॥ यदि तू सच्चा क्षत्रिय हो तो मेरे साथ युद्ध कर । पुराना सड़ा हुआ धनुष तोड़कर क्या अपनी बड़ाईकी झूठी डींग हाँक रहा है ? ॥ ३४१ ॥ ओ नृपपुंगवज ! यदि तू इस विष्णुके धनुषपर डोरी चढ़ा दे तो मैं तेरे साथ युद्ध न करूँगा ॥ ३४२ ॥ नहीं तो मैं तुम सबको मार डालूँगा । क्योंकि क्षत्रियोंका नाश करना ही मेरा काम है । परशुरामका यह वचन सुनकर रामने कहा—॥ ३४३ ॥
| ३२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ३ |
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वयमेकगुणाः स्वामिंस्त्वं चैव गुणाधिकः। गोविप्रदेवतादींषु शस्त्रा नामन्त्रयास्ततः ॥३५५॥ मयैतच्च जीवितानि तव पादार्पितानि हि। यथेच्छं यात्तथास्माकं विधेर्युद्धं करोमि न ॥३५६॥ इति ब्रुवति रामे वै चचाल वसुधा भृशम् । क्रुद्धं दृष्ट्वा जामदग्न्यं क्षत्रियौघसमुद्यतम् ॥३५७॥ अन्धकारो बभूवाथ क्षुभितः सप्त सागराः । रामो दाशरथिर्वीरो वीक्ष्य तं भार्गवं रुषा ॥३५८॥ धनुर्गच्छंस्तद्धस्ताद्रोप्य शुनमजयत्। तूणीगद्वाणमादाय संधायाकृष्य वीर्यवान् ॥३५८॥ उवाच भार्गवं रामः शृणु ब्रह्मन् वचो मम। लक्ष्यं दर्शय बाणस्य ह्यमोघो गमनायकः ॥३५९॥ लोकान् पादयुगं वापि वद शीघ्रं समाज्ञया। एतन्वदति श्रीरामे भार्गवो विगताननः ॥३६०॥ संस्मरन् पूर्ववृत्तान्तमिदं वचनमब्रवीत्। राम राम महाबाहो जाने त्वां परमेश्वरम् ॥३६१॥ पुराणपुरुषं विष्णुं जगन्मङ्गलमोद्धवम् । बाल्येऽहं तपसा विष्णुमाराधयितुमंजसा ॥३६२॥ गत्वा हि तीर्थे गोमन्दारूपस्य सोप्य शार्ङ्गिणः। अहर्निशं महात्मानं नारायणमकल्पयीः ॥३६३॥ यस्यांशेन मया भूम्यामवतारो गृहीतोऽस्ति हि भूभारहरणार्थाय कार्त्तवीर्यवधैप्सया ॥३६४॥ ततः प्रसन्नो देवेशः शंखचक्रगदाधरः उवाच मां नृगुश्रेष्ठं प्रसन्नमुखपंकजः ॥३६५॥
श्रीभगवानुवाच
उत्तिष्ठ तपसो ब्रह्मन् विदितं ते तपो महत् मद्विचद्रेन युक्तस्त्व जहि हैहयपुंगवम् ॥३६६॥ कार्त्तवीर्यं पितृऋणं एदर्थं तपसा श्रमः। ततस्त्रिःसप्तकृत्वस्त्वं हन्ता क्षत्रियमण्डलम् ॥३६७॥ कृत्स्नां भूमिं कश्यपाय दत्त्वाऽशान्तिमवाप्स्यह। त्रेतायुगे दाशरथिर्भूत्वा रामोऽहमव्ययः ॥३६८॥ वन्दत्स्ये परया भक्त्या तदा द्रक्ष्यसि मां पुनः। मनेजः पुनरादास्ये मयि दत्तं मया कृतम् ॥३६९॥ तदा तपश्चरँल्लोके तिष्ठ त्वं ब्रह्मणो दिनम्। इत्युक्त्वाऽन्तर्दधे देवस्तथा सर्वं मया कृतम् ॥३७०॥ स एव विष्णुरूपस्त्वं राम जातोऽसि ब्रह्मणाऽर्थितः। मयि स्थितं तु त्वत्तेजस्त्वयैव पुनर्गृह्यताम् ॥३७१॥
हे स्वामिन् ! हम एक गुणवाले तथा आप अनेक गुणवाले हैं रघुवंशियों, ब्राह्मण, देवता तथा स्त्रीपर बास्त्र नहीं उठता ॥ ३५४॥ मैंने और इन सबने आपके चरणोंमें आत्म अर्पण कर दिया है। आप जैसा चाहें वैसा करें। यदि चाहें तो मार डालें परन्तु मैं ब्राह्मणके साथ युद्ध कदापि नहीं करूंगा ॥ ३५५॥ रामके ऐसा कहनेपर क्षत्रियोंके नाशका उद्योग जामदग्न्य (परशुराम) को देख डरकर पृथ्वी कांपने लगी। चारों ओर अन्धकार छा गया तथा सातों समुद्र क्षुभित हो उठे। तब दशरथपुत्र वीर रामने श्री परशुरामको प्रत्यक्ष देखकर उनके हाथसे धनुष लाग लिया और दोनों चढ़ा तथा भाथेमेंसे बाण निकाल और उसपर चढ़ा तथा बलपूर्वक खींचकर भार्गव परशुरामसे कहने लगे हे ब्रह्मन् ! मेरी बात सुनिए और मुझे लक्ष्य बताइए। मेरा बाण खाली नहीं जा सकता ॥ ३५६-३५६ ॥ शीघ्र ही मुझ वा सो लोकोंको बिद्ध करनेकी आज्ञा दीजिए अथवा अपने दी चरणोंको। रामके इस वचनको सुनकर विकृतमुख होते हुए परशुरामन पूर्व वृत्तान्तको स्मरण करते हुए कहा-हे राम हे राम ! हे महाबाहो! मैं आपको जगत्की उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलयके कारणस्वरूप पुराणपुरुष साक्षात् परमेश्वर विष्णु समझता हूँ। बचपनमें मैन गोमतीतीर्थमें जाकर शार्ङ्गधनुर्धारी विष्णुभगवान्को जिनके एक अंशसे मैन संसारका भूभार हरण करने तथा कार्तवीर्यको मारनेके लिए अवतार लिया है, उन्हें अपने रूपसे प्रसन्न किया। तब प्रसन्नमुख होकर शंखचक्रगदापद्मधारी उन देवाने मुझसे कहा ॥ ३६०-३६५ ॥ श्री भगवान् बोले- हे ब्रह्मन् ! तप करना छोड़कर तू उठ खड़ा हो। मैंने तेरे तपोबलको जान लिया है। मेरे चिदंशस युक्त होकर तू हैहयश्रेष्ठ तथा अपने पिताको मारनेवाले कार्तवीर्यको मार। जिसके लिए तूने तपका परिश्रम किया है। बादमें इक्कीस बार क्षत्रियसमुदायका नाश करके समस्त पृथिवी कश्यपको दान देकर शान्त हो। पश्चात् त्रेतायुगमें मैं अविनाशी दाशरथी राम होकर उत्पन्न होऊँगा। तब तू परम भक्तिसे मुझे देखेगा। उस समय मैं तुझे दिया हुआ अपना तेज लौटा लूँगा ॥ ३६६-३६६ ॥ तदनन्तर ब्रह्माने एक दिन तक तू तप करता हुआ संसारमें
सर्गः १ ] सारकाण्डम् १३
सर्गः १ ] सारकाण्डम् १३
अद्य मे सफलं जन्म प्रतीतोऽसि मम प्रभो । नमोऽस्तु जगतां नाथ नमस्ते भक्तिभावन ॥३७२॥ नमः कारुणिकान्त रामचन्द्र नमोऽस्तु ते । देव यद्यत्कृतं पुण्यं मया लोकजिगीषया ॥३७३॥ तन्मत्रं तव बाणाय भूयाद्राम नमोऽस्तु ते । ततो मुक्त्वा शरं रामस्तत्कर्म भस्मसात्करोत् ॥३७४॥ ततः प्रसन्नो भगवान् श्रीरामः करुणामयः । जामदग्न्यं तदा प्राह वरं वरय चेति सः ॥३७५॥ ततः प्रीतेन मनसा भार्गवो राममब्रवीत् । यदि मेऽनुग्रहो राम तवास्ति मधुसूदन ॥३७६॥ त्वद्भक्तसङ्गस्त्वत्पादे मम भक्तिः सदाऽस्तु वै । तथेति राघवेणोक्तः परिक्रम्य प्रणम्य तम् ॥३७७॥ पूजितस्तदनुज्ञातो महेंद्रं चलमन्वगात् । रावणेन जिता देवाः सगणो रावणो महान् । ३७८॥ सहस्रबाहुना बद्धः सोऽर्जुनो भार्गवेण हि । हतः क्षणेन समरे सोऽद्य श्रीभार्गवोऽपि च । ३७९॥ जिताऽनेनूप बाणमोचनाद्राघवेण हि । एवं श्रीरामचन्द्रस्य पौरुषं किं वदाम्यहम् ॥३८०॥ अथ राजा दशरथो रामं मृतमिवागतम् । दृढमालिङ्ग्य हर्षेण नेत्राभ्यां जलमुत्सृजन् ॥३८१॥ ततः प्रीतेन मनसा स्वस्थचित्तः पुरीं ययौ । अयोध्यायां सुमन्त्रोऽपि नृपं श्रुत्वा समागतम् । ३८२॥ नगरीं शोभयामास पताकाध्वजतोरणैः । वारणेंद्रं पुरस्कृत्य रामं प्रयुद्ययौ जरात् ॥३८३ अथो नदत्सु वाद्येषु राजा पुत्रैः सुहृज्जनैः । विवेश नगरं पौरैः पश्यन्नृत्यादिकं पथि ॥३८४॥ रामादयः स्वपत्न्यो ते राजभक्त्या ययुः पुरीम् । ननृतुर्वारनार्यश्च तुष्टुवुर्मागधादयः ॥३८५ एवं राजा गृहं गत्वा बालकैः स्वीयमश्मनि । रमापूजाः कारयित्वा ददौ दानान्यनेकशः ॥३८६॥ सदाऽलङ्कारवस्त्रार्थैः सुहृदः पार्थिवाद्यः । रामादीन्पूजयामासुस्तथा दशरथं नृपम् ॥३८७॥
रह, ऐसा कहकर प्रभु अन्तर्द्धान हो गये। मैंने भी सब वैसा ही किया ॥ ३७० ॥ हे राम ! वहां आप ब्रह्मासे प्रार्थित होकर पृथिवीपर अवतीर्ण हुए हैं, मेरे तनमें स्थित अपना तेज आपने ही फिर आज आहरण कर लिया है ॥ ३७१ ॥ आपके दर्शनसे मेरा जन्म सफल हो गया। हे भक्तिभावन ! हे जगन्नाथ ! हे करुणामय हे रामचन्द्र ! आपको नमस्कार है। हे देव ! लोकोंको जीतनेकी इच्छासे मैने जो जो कर्म किए हैं, वे सब आपके बाणको समर्पित हैं (अर्थात् उन्हें आप अपने बाणका लक्ष्य बनाकर नष्ट कर दें) । तब रामने बाण छोड़कर उनके कर्मोंको भस्म कर दिया ॥ ३७२-३७४ ॥ तत्पश्चात् प्रसन्न होकर करुणामय भगवान् श्रीरामने परशुरामसे कहा कि तुम वर मांगो, मैं तुमपर प्रसन्न हूँ ॥ ३७५ ॥ यह सुनकर प्रसन्न मनसे भार्गवने रामसे कहा—हे मधुसूदन राम ! यदि आप मेरेपर अनुग्रह रखते हों तो मुझे सदा आप अपार भक्तोंका संग तथा अपने विषयमें निर्मल भक्ति प्रदान करें। तब रामचन्द्रजीने 'तथास्तु' कहा। तदनन्तर परशुराम उन्हें नमस्कार तथा परिक्रमा करके और आज्ञा लेकर महेन्द्राचलकी ओर चल दिये। जिस रावणने देवताओंको जीता था, उस भारी सङ्ग्रामी रावणको सहस्रबाहु अर्जुनने बाँध लिया था। उसी अर्जुनको परशुरामने युद्ध करके क्षणभरमें मार डाला था। उन परशुरामजीको भी रामने उन्हींके दिये हुए धनुषपर बाण चढ़ाकर जीत लिया है पार्वती ! इस प्रकार रामके पुरुषार्थका वर्णन मैं कहाँ तक करूं । उनके बलका कोई अन्त नहीं है ॥ ३७६-३८० ॥ पश्चात् राजा दशरथ रामको मरकर लौटे हुए की तरह आलिङ्गन करके हर्षके आंसू बहाने लगे ॥ ३८१ ॥ बादमें प्रसन्न मन होकर वे स्वस्थ चित्तसे अयोध्यापुरी को चल पड़े। उधर अयोध्यामें सुमन्त्रने जब राजा दशरथके आगमनकी बात सुनी तो उन्होंने नगरीको पताका, ध्वजा तथा तोरणोंसे खूब सजाया और हाथी लेकर रामको लेनेके लिए आगे आये ॥ ३८२-३८३ ॥ राजा दशरथने पुत्र-मित्र तथा नगरनिवासियोके साथ रास्तेमें नृत्य आदि देखते हुए बाजे-गाजेके साथ नगरमें प्रवेश किया ॥ ३८४ ॥ राम आदिने भी अपनी स्त्रियोंके साथ हाथियोंपर बैठकर पुरमें प्रवेश किया। वेश्याएँ नृत्य करने लगीं तथा भाट आदि स्तुति करने लगे ॥ ३८५ ॥ राजाने घर आकर बालकोंसे लक्ष्मीका पूजन करवाया और अनेक प्रकारके दान दिये ॥ ३८६ ॥ पश्चात् सुहृदों तथा राजाओंने वस्त्र-अलङ्कारसे राम आदिकी और राजा दशरथकी पूजा की ॥ ३८७ ॥
३७ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
दशरथोऽपि तान्सर्वान् पूजयामास वैभवैः । ततस्ते सुहृदः सर्वे नृपाश्च स्वस्थलं ययुः ॥३८८॥ प्रीत्या युधाजितं राजा स्थापयामास स्वांतिकम् । रामाद्या रमयामासुः स्वस्वदारैः स्वसद्मसु । ३८९॥
पार्वत्युवाच श्रीविष्णोस्तु चिदंशेन जामदग्न्यस्त्वया स्मृतः ॥३९०॥ तद्वदयं राघवः किं नुद मे संशयं प्रभो ।
श्रीशिव उवाच अष्टावंशेन विवृता अवताराश्च विष्णुना ॥३९१॥ रामकृष्णावतारी च पूर्णरूपेण तौ धृतौ । वरिष्ठौ सकलेष्वेवावतारेषु हि तावुभौ ॥३९२॥ तयोरपि वरः पूर्वः सत्यसंधो जितेंद्रियः । ज्ञेयो रामावतारो हि नानेन सदृशः परः ॥३९३॥ कृष्णः कृष्णरुचिर्ज्ञेयः श्रीरामो रुक्मसंरुचिः । एवं गिरींद्रजे प्रोक्तं सीतायाश्च स्वयंवरम् ॥ अस्य सर्गस्य श्रवणान्मंगलं लभ्यते नरैः ॥३९४॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे सीतास्वयंवरोनाम तृतीयः सर्गः ॥३॥
चतुर्थः सर्गः
(रामका शत्रु राजाओंके साथ युद्ध तथा विष्णुको वृन्दाका शाप)
श्रीशिव उवाच अथ सीतायुतः श्रीमान् रामः साकेतसंस्थितः । बुभुजे विविधान् भोगान् राजसेवापरोऽभवत् ॥ १ ॥ शरत्कालाश्विने मासि जनकेन स्वमंत्रिणः । आहूनाय च राजानं प्रेषितास्त्वरितं ययुः ॥ २ ॥ तानागतान्दशरथः शीघ्रं सत्कृत्य सादरम् । पप्रच्छागमने हेतुं तेऽपि नत्वा तमूचिरे ॥ ३ ॥ दीपावत्युत्सवार्थं त्वां स कुटुंबं समंत्रिणम् । पौरजानपदैः सार्द्धमाह्वयामास ते सुहृत् ॥ ४ । तत्तेषां वचनं श्रुत्वा दूतानाज्ञापयन्नृपः । कथ्यतां नगरे राष्ट्रे गमनं मिथिलां प्रति ॥ ५॥
राजा दशरथने भी उन सबका अनेक विभवोंसे सत्कार किया । बादमें वे सब सुहृद् तथा राजा लोग अपने-अपने स्थानोंको चले गये ॥ ३८८ ॥ किन्तु राजाने प्रीतिपूर्वक युधाजित्को रोक लिया । राम-लक्ष्मण तथा भरत आदि भी अपनी-अपनी स्त्रियोंके साथ जाकर अपने-अपने महलोंमें रमण करने लगे ॥ ३८९ ॥ पार्वतीजी कहने लगीं—हे शिवजी ! श्रीविष्णुके चिदंशसे परशुरामजीका अवतार आपने बताया और उसीसे आपने रघुपति रामचन्द्रजीका भी अवतार बताया है । फिर इन दोनोंमें क्या अन्तर है ? सो कहकर मेरी शङ्का दूर कीजिये । श्री शिवजीने उत्तर दिया कि विष्णुभगवान्ने अपने अंशसे कुल आठ अवतार धारण किये थे । उनमेंसे राम तथा कृष्णका पूर्ण अवतार था । सब अवतारोंमें ये दो अवतार श्रेष्ठ थे ॥ ३९०-३९२ ॥ उन दोनोंमें भी सत्यवादी तथा जितेन्द्रिय रामावतार उत्तम था । रामके समान और कोई नहीं था ॥ ३९३ ॥ कृष्णको कृष्णरुचिवाले तथा रामको रुक्मरुचिवाले जानो इस प्रकार शिवजीने गिरीन्द्रतनया (पार्वती) को सीताका स्वयम्वर कह सुनाया । इस सर्गको सुननेवाले मनुष्योंको मङ्गल लाभ होता है ॥ ३९४ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये 'ज्योत्स्ना-भाषाटीकायां सारकाण्डे सीतास्वयंवरो नाम तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥
श्रीशिवजी बोले हे देवि ! श्रीमान् राम सीताके साथ अयोध्यामें विविध राजभोगोंका सुख भोगने लगे ॥ १ ॥ शरत्कालके आश्विन महीनेमें राजा जनकने अपने मन्त्रियोंको महाराज दशरथको बुलानेके लिये भेजा । वे शीघ्र अयोध्या जा पहुँचे ॥ २ ॥ राजा दशरथने उनका आदर सत्कार करके आनेका कारण पूछा । मन्त्रियोंने नमस्कार करके कहा—॥३॥ आपके मित्र राजा जनकने सकुशल आपको मन्त्रियों, पुरवासियों तथा
सर्गः ४ ] सारकाण्डम् ३५
सुमुहूर्त्ते ततो राजा ह्यश्वस्थरथपत्तिभिः । पौरैर्जानपदैः साकं ययौ करिभिराजनः ॥ ६ ॥ गजः पृष्ठे समाजग्मुर्गजोपरि विराजिताः । रामलक्ष्मणभरतशत्रुघ्नास्ते स्वलंकृताः ॥ ७ ॥ कौसल्याद्या राजदाराः स्नुषाभिस्ताः पृथक् पृथक् । रत्नमाणिक्यमुक्तादिशोभितासु वरासु च ॥ ८ ॥ कारणीषु समारूढा वेष्टिता चेष्टपार्षदैः । धातुकाभिः स्वदासीभिर्ययुर्वस्त्रादिभूषिताः ॥ ९ ॥ आगतं नृपतिं श्रुत्वा जनकः पौरवासिभिः । प्रत्युज्जगाम हर्षेण निनाय नगरीं प्रति ॥ १० ॥ राघवापाणिनादैश्च दुन्दुभीनां महास्वनैः । वरांगनानां नृत्याद्यैर्गायकानां च गायनैः ॥ ११ ॥ मार्ग मार्गं महामोघा रूढस्त्रीणां कदम्बकैः । पुष्पवृष्टिविचित्राभिर्ययौ नृपगृहं नृपः ॥ १२ ॥ ततो गृहाणि रम्याणि पूरितान्यन्नवारिभिः । प्रविवेश नृपश्रेष्ठो जनकेनाभिमानितः ॥ १३ ॥ ततो नानारसुत्सादैर्मिष्टानैर्नृत्यवादवैः । वस्त्रैरभरणैः सर्वान् जामातृं च विशेषतः ॥ १४ ॥ मणिरत्नादिदीपैश्च मुहुर्नीराजनैरपि । जनकः पूजयामास दीपावल्यां महादिने ॥ १५ ॥ दीपोत्सवोर्महापुण्यैर्बलिराज्यं प्रवर्त्तते । आनन्दः मर्त्तलोकानां मंगलानि गृहे गृहे ॥ १६ ॥ अभ्यंगोद्वर्त्तनार्थेय वरपक्वान्नभोजनैः । गोदानदासीदानैश्च हस्त्यश्वरथपत्तिभिः ॥ १७ ॥ चकार तुष्टान् जामातॄन् जनको नृपतिं तथा । नृपपत्नीं स्नुदुहितॄर्योध्यास्यादिकान् क्रमात् ॥ १८ ॥ अतः प्रस्थानमकरोत्पुरिं दशरथो नृपः । ततो राजा दशरथः सैन्येन परिवेष्टितः ॥ १९ ॥ ययौ शनैः शनैर्मार्गं सुहृन्मन्त्रिपुरःसरः । एतस्मिन्नन्तरे मार्गे सीतार्थे धनुषा पुरा ॥ २० ॥ मग्नमाना नृपतयः पूर्ववैरमनुस्मरन् । अमरुयाताः ससैन्यास्ते रुरुधुर्नृपतिं पथि ॥ २१ ॥
देशवासियोंके सहित दीवालीके उत्सवपर बुलाया है ॥ ५ ॥ उनका यह वचन सुनकर राजाने दूतों द्वारा मिथिला चलनेका समाचार सारे गाँवो तथा नगरोंमें कहला दिया ॥ ५ ॥ फिर शुभ मुहूर्त देखकर राजा श्वावारूढ, गजारूढ तथा पैदल सैनिकोको साथ लेकर नगर तथा राष्ट्रके लोगोंके साथ हृष्टपुष्ट सवार होकर चले । ६ । राजाके पीछे सुन्दर अलंकार धारण करके हाथीपर सवार होकर राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न चले । ७ ॥ उनके पीछे कौसल्या आदि राजाकी स्त्रियां भी अपनी-अपनी पुत्रवधुओंके साथ रत्न माणिक्य-मोती आदिसे सुशोभित उत्तम हथिनियोंपर अलग-अलग सवार हो बेतधारी सिपाहियों, धाइयों तथा दासियोंसे घिरी हुई वस्त्र आदिसे भूषित होकर चल रहीं ॥ ८ ॥ ९ ॥ राजा दशरथका आगमन सुनकर राजा जनक पुरवासियोंको साथ लेकर स्वागत करनेके लिए गये और राजा दशरथको नगरमें ले आये ॥ १० ॥ रास्तेमें जगह-जगह वाद्योंका घोषनाद और नगाड़ोंका तुमुल निनाद होने लगा, वारांगनाएं नाचने लगीं, गायकोंके गान हान लगे तथा बड़े-बड़े महलोंकी अटारियोंपर स्थित स्त्रियोंके मण्ड फूलोंकी बौछार करने लगे । इस प्रकार राजा दशरथ राजभवनमें पहुंचे ॥ ११ ॥ १२ ॥ पश्चात् जनकसे सम्मानित होकर अन्न-जल आदिसे परिपूर्ण भवनोंमे पधारे ॥ १३ ॥ बादम विशेषरूपसे राजा जनकने सब जामाताओंक विविध उत्सवोस, मिष्ठान्नसे, नृत्यसे, गीतसे, वस्त्रसे, अलंकारस तथा मणिरत्नमय दीपकोंकी आरतीसे दीपावलीके शुभ दिन बारम्बार पूजन तथा सत्कार किया । १४ । १५ ॥ दीपोत्सवके महापुण्यसे राजा बलिको राज्य आरम्भ हुआ था। इससे सब लोगोंकें आनन्द हुआ तथा घर-घर मंगल होने लगा ॥ १६ ॥ राजा जनकने उन जामाताओक शरीरमें तेल और चन्दन आदि लगा तथा गुलाबजल छिड़ककर इत्र आदि लगाया और उन्हें सुन्दर पकवान जिमा तथा हाथी, घोड़े, रथ, गाड़े, प्यादे, दास तथा दासिएँ देकर जराइयों और राजा दशरथको सन्तुष्ट किया। तदनन्तर क्रमशः राजकी, स्त्रियोंको, अयोध्यानिवासियोको और अपनी लडकियोंको भी राजा जनकने यथायोग्य वस्तुएं देकर सन्तुष्ट किया ॥ १७ ॥ १८ ॥ तदनन्तर अब कि राजा दशरथ राजाओं, मन्त्रियों, सेना तथा मित्रोके साथ धीरे-धीरे अयोध्याको जा रहे थे। उसी समय उन राजाओंने जिनका कि सीतास्वयंम्बरमें मानभंग हुआ था, उस बैरका स्मरण करके असंख्य सेनाओंके साथ आकर राजा दशरथका घेर लिया। उनको देखा
३६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
तान्दृष्ट्वा नृपतींश्चापि किमेतदिति विह्वलः । मन्त्रिभिर्मन्त्रयामास जनकः स्वजनैरपि ॥२२॥ ततश्चान्तः रामः श्रुत्वा चिन्ताऽर्णवे निजम् । निमग्नं पितरं शीघ्रं ययौ लक्ष्मणसंयुतः ॥२३॥ नत्वा दशरथं रामः आश्वासयन्निदं जगौ । तात राजन्न कर्त्तव्या चिन्ता मयि स्थिते त्वया ॥२४॥ क्षणादेव बाधयिष्यामि पश्य त्वं कौतुकं मम । ततो रामवचः श्रुत्वा राजाऽऽलिङ्ग्य रघूत्तमम् । २५। प्राह षड्वार्षिको बालस्त्वं कथं योद्धुमिच्छसि । अरण्ये मद्कुटुम्बोऽहं वेष्टितोऽस्मि नृपाधमैः ॥ २६॥ अहमेव गमिष्यामि योद्धुं त्यक्त्वा वाहिनीम् । तत्तांतवचनं श्रुत्वा रामस्तं पुनरब्रवीत् ॥२७॥ यदा मे कुण्ठितां शक्ति पश्यांमन्त्र रणांगणे । तदा मे कुरु साहाय्यं तावदत्र स्थिरो भव । २८ । स्थां वाहिनीं सकुडुंबां तत-त्वं रक्ष मद्विरा । इत्युक्त्वा पितरं नत्वा सज्जीकृत्य शरासनम् । २९ जगाम रथमारूढो लक्ष्मणोऽपि तमन्वगात् । ता दृष्ट्वा भरतश्चापि शत्रुघ्नोऽपि जगाम सः । ३० । तान्दृष्ट्वा दशसाहस्रीं राजसेना मचोदयत् । ततस्ते पार्थिवाः सर्वे रथस्थं तं रघूत्तमम् । ३१ । निरीक्ष्य दर्शयामासुः स्वसेनायां परस्परम् । समागतोऽयं श्रीरामः स्वपितुःस्यन्दनस्थितः ॥३२॥ एष वै सुमहच्छ्रीमान् विटपी सम्प्रकाशते । विशालजम्बुज्वलस्कन्धः कोविदारध्वजो रथे ॥३३॥ दशश्याङ्या तस्य रथे वस्त्राद्यैरुपशोभिते ध्वजबद्धपताकोच्चकोविदारे स्थितस्त्वयम् । ३४ । एवं वदन्तस्ते सर्व रथेर्योद्धुं समाययुः । ततोऽभवन्महद्युद्धं घोरं तच्च परस्परम् । ३५ । अस्त्रः शस्त्रास्त्रगन्दिपालै शतघ्नीभिः परस्परैः । रामस्य सैनिकांस्त्यक्त्वा राजानो राममन्वयुः ॥३६ । ते ववर्षुर्महाऽस्त्रास्त्राण्याव्य विहायसम् । तान्दृष्ट्वा नृपतीन् सर्वान् राममेवाभिसम्मुखान् ३७॥ लक्ष्मणः प्राद्रवच्छीघ्रं भरतोऽपि च शत्रुहा । स्वामितारकयोरिवासीद्युद्धं सुदारुणम् ।३८॥ ततो नृपतयः सर्वे शस्त्रावर्षमगतं तदा । ते विव्वा मूच्छितं चक्रुः स्यन्दनात्पतितो भुवि ॥३९।
वार्ता सुनकर राजा दशरथ मन्त्रियों तथा स्वजनोंको पास बुलाकर विचार करने लगे कि यह क्या बात है ? ॥ २१-२२ ॥ अपने पिताको चिन्तासमुद्रमें डूबा सुनकर राम लक्ष्मणके साथ उनके पास गये ॥ २३ ॥ पिता दशरथको नमस्कार करके राम सान्त्वनापूर्वक कहने लगे— हे राजन् ! मेरे रहते हुए आपको चिन्ता नहीं करनी चाहिये ॥ २४ ॥ मैं क्षणभरमें इन सबोंको मार डालूँगा। आप मेरा कौतुक देखिये । रामके वचनको सुनकर राजाने उनका आलिंगन करके कहा हे राम, छ वर्षका बालक तू क्या युद्ध करेगा ? इस अरण्यमें सकुटुम्ब मुझको इन नीच राजाओंने घेर लिया है। इसलिये मैं ही इनको मारूँगा और तू सेनाकी रक्षा कर । पिताके इस वचनको सुनकर राम उनसे फिर कहने लगे —॥ २५-२७ ॥ जब आप मेरी शक्तिको रणाङ्गणमें कुण्ठित होते देखें, तब मेरी सहायता कीजियेगा। तबतक आप मेरे कहनेसे यहीं रहकर सकुटुम्ब अपनी सेनाकी रक्षा करें । ऐसा कहकर रामने पिताको नमस्कार किया और धनुषको ठीक करके रथपर सवार होकर चल दिये । उनके पीछे लक्ष्मण भी गये । उन दोनोंको जाता देख भरत और शत्रुघ्न भी उनके साथ चल दिये ॥ २८-३० ॥ उन सबको जाते देखकर राजा दशरथने दस हज़ार सैनिकोंकी सेना उनके साथ भेजी । उधर सब राज रथस्थित रामको आते देख अपनी सेनामें एक दूसरेको दिखाने लगे कि यह राम अपने पिताके रथपर सवार होकर आ रहा है। यह बड़ा तेजस्वी है। विशाल शालावाले पेड़के समान ऊँचे तथा शोभित कन्धोंवाला राम स्वयं कोविदार ( कचनार या रक्तकाञ्चन ) की ध्वजा लगाये हुए अपने पिताकी आज्ञासे उनके ही रथपर सवार होकर आ रहा है। ऐसा कहकर वे सब राज युद्ध करनेके लिए रथ लेकर चले। पश्चात् परस्पर बड़ा भारी युद्ध होने लगा ॥ ३१-३५ ॥ वे सब एक दूसरेपर अस्त्र, शस्त्र, तीर, तोप तथा फरसे चलाने लगे । वे राजे रामके सैनिकोंको छोड़कर रामपर झपटे ॥ ३६ । ये लोग आकाशको व्याप्त करके बड़े-बड़े शस्त्रों तथा बाणोंकी वर्षा करने लगे । उन सब राजाओंको अकेले रामके साथ युद्ध करते देख लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न भी दौड़ पड़े और उनमें तारकासुर तथा कार्तिकेयकी तरह भयानक युद्ध होने लगा। तब उन
सर्गः ४ ] सारकाण्डम् ३७
सर्गः ४ ] सारकाण्डम् ३७
भरतं पतितं दृष्ट्वा शत्रुघ्नं विव्यधुः शरैः । तं चापि विरथं कृत्वा दद्रुवुर्लक्ष्मणं नृपाः ॥४०॥ ववर्षुर्निशितैर्बाणैश्चक्रुस्तं व्याकुलं रणे । राघवञ्च गधर्वं चापि शरैराच्छादयन्नृपाः ॥ ४१॥ ततः श्रीरामचन्द्रोऽपि लीलया समरांगण । पश्यन्सु आन्ध्रश्च कौसल्याद्यासु मातृषु ॥४२॥ सीतायां भ्रातृपत्नीषु पित्रा मन्त्रिषुलेष्ष्वपि । टणंकृत्य महच्चापं वायव्यास्त्रञ्च तान्नृपान् ॥४३॥ शुष्कपर्णवदुद्धूय प्राक्षिप्ताब्धेरोधसि । मोहनास्त्रेण शेषान् हि मोहयामास राघवः ॥४४॥ लुलुंठ सकलं सैन्यं हस्त्यश्वरथसंकुलम् । ततो मूर्च्छितमालोक्य भरतं कैकयी रणे ॥४५॥ करिष्याः शीघ्रमुत्प्लुत्य शुशोचांके निधाय तम् । ततो दशरथोऽपि कौसल्याद्या नृपस्त्रियः ॥४६॥ सांत्वयित्वाऽथ तान्रामः सौमित्रिं प्राह भवत । इतो विदूरे सौमित्रे मुद्गलस्य तपोनिधेः । ४७। आश्रामोऽस्ति हितत्र स्वं गत्वा वल्लोः शुभानहाः । सञ्जीवन्यादिकाः सर्वा शीघ्रमानय लक्ष्मण ॥४८॥ मुनेस्तपःप्रभावेण बहवः संति तत्र वै । तथेति लक्ष्मणो गत्वा स्यदनस्थस्त्वरान्वितः ॥४९। अवरुह्य रथाद्वीरः प्रविवेशाश्रमं मुनेः । निवारितः स वटुकैः समाधिविग्मे मुनेः ॥५०। याश्रां कृत्वा शुभा वल्लीः प्राप्स्यसे त्वं न चान्यथा । कालातिक्रमभीत्या स लक्ष्मणेऽपि रघूत्तमम् ॥५१॥ वृत्तं निवेदयामास पुनस्तं राघवोऽब्रवीत् । निवारयित्वा वटुकान् विना शस्त्रैस्त्वरान्वितः ॥५२। आनय त्वं शुभा वल्लीर्मा शङ्कां च मुनेः कुरु । सोऽपि राम ज्ञया गत्वा निवार्य वटुकान् क्षणात् ॥५३ । बलात्कारेण ता वल्लीर्गृहीत्वा राममागतः । भरतं जीवयामास विशल्यं कृत्य सानुजम् ॥५४। ततः समुत्थितं दृष्ट्वा कैकेयी भरतं मुदा । संतोशं परमं चक्रे कैकेयी पितर गदा । ५५॥ राघवं मा समालिंग्य भरतं परिषस्वजे । ततो राजऽतेमदृष्टः समालिंग्य रघुत्तमम् । ५६।
राजाओने बाणोंसे भरतका बांधकर मूर्छित कर दिया और वरथसे गिर पड़े । ३७-३९ ॥ भरत- को पृथ्वीपर गिरा देखकर राजाओने राक्षस शत्रुघ्नको भी विद्ध किया । उनको भी गिराकर वे राज लक्ष्मणकी ओर दौड़े ॥ ४० ॥ उनपर भी बाणोंकी वर्षा करके व्याकुल कर दिया । इसी प्रकार राघव रामको भी राजाओने बाणोंसे आच्छादित कर दिया ॥ ४१ ॥ बादमे श्रीरामचन्द्रने समरके मैदानमे पालकियोंकी खिडकियोंमें लगी हुई चिकामैसे देखती हुई कौसल्या आदि माताओंके, सीताके तथा अपने भाइयोंकी स्त्रियोंके समक्ष राजाओ और मन्त्रियाके सामने अपने बड़े भारी धनुषका टंकोर करके उस- पर वायव्यास्त्र चढ़ाकर उससे उन राजाओंको सूख पत्तांकी तरह उड़ाकर समुद्रके किनार फेंक दिया। बाकी लोगोंका रामने महूनास्त्रसे मूर्छित कर दिया ॥ ४२-४४ ॥ हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदलोकी समस्त सेना- को जमीनपर लिटा दिया । रणमें भरतका मूर्छित देख कैकयी हथिनीसे उतरी और उनका गादमें लेकर विलाप करने लगी । तदनन्तर राजा दशरथ तथा उनकी स्त्रिय कौसल्या आदि भी विलाप करने लगी ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ तब रामने सबको आश्वासन देकर कहा-लक्ष्मण ! यहाँस कुछ दूरपर एक तपोषिधि मुद्गलमुनिका आश्रम है । वहाँ जाकर तुम कल्याणकारिणी वर्जपनी आदि बूटियोंको ले आओ ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ मुनिके तपके प्रभावसे वहाँ अनेक प्रकारका जडिय उगी हुई हैं। बहुत अच्छा' कहकर वाट लक्ष्मण रथपर चढ़कर शीघ्र मुनिके आश्रममे गये । वहाँके ब्रह्मचारियोंने उनका बूटिये लेनेसे रोका और कहा कि तुम मुनिके समाधिसे उठनेपर उनसे पूछकर ही बूटियों ले जा सकते हो; - अन्यथा नहीं । समय बीत जानेके डरसे लक्ष्मणने आकर-रामसे सब हाल कहा । रामने फिर कहा कि उन बटुकोंको अस्त्रके बिना हाथसे हटाकर शीघ्र ही उन शुभ जड़ियोंको ले आओ । मुनिसे मत डरो । रामकी आज्ञा पाकर वे वहाँ गये तथा बलप्रयोगके बिना ही वटुकोंको हटाकर उन जड़ियोंको लेकर रामके पास लौट आये । तब रामने भरतके शरीरसे बाण निकालकर उन्हें अहर्दा जीवित किया । भरतको स्वस्थ देखकर कैकेयी बहुत प्रसन्न हुई । उसने रामका आलिंगन करके भरतको छातीसे लगा लिया । राजाने भी प्रसन्न
३८ आनन्दरामायणे [सर्गः ४
दर्शनान्मोत्सवांस्तत्र चकार गुरुणा द्विजैः । ततस्ते वटवः सर्वे हाहाकृत्य मुनीश्वरम् ॥ ५७॥ इमं निवेदयामासुः समाधिंविगमे मुनेः । स मुद्गलोऽपि तच्छ्रुत्वा विस्मयेनाब्रवीद्वटून ॥ ५८॥ को लक्ष्मणः किमर्थं कम्प्याज्ञया सोऽहरद्द्रुमम् । विदित्वा सकलं वृत्तमागच्छध्वं त्वरान्विताः ॥ ५९॥ तथेति ते दशरथं गत्वा प्रोचुस्त्वरान्विताः । कस्त्वं किमर्थमानीता वल्ल्यो लक्ष्मणहस्ततः ॥ ६०॥ तान्दृष्ट्वा क्रोधसंयुक्तान् राजा चिन्तायुतोऽब्रवीत् । अहं दशरथो वल्ल्यो भरतार्थे ममाज्ञया ॥ ६१॥ आनीता मुनये सर्वे ब्रूध्वं नतिपुरःसराः । अहमप्यागमिष्यामि मुनिं सांत्वयितुं जवात् ॥ ६२॥ ततस्ते मुनये सर्वं वृत्तान्तमथवर्णयन् । श्रुत्वा गमस्य पितरं क्रोधं संहृत्य वेगतः ॥ ६३॥ दर्शनार्थं मतिं चक्रे तावद्ददृशे नृपः पुरः । दृष्ट्वा करपुटं तं प्रणमंतं नृपोत्तमम् ॥ ६४ ॥ प्रार्थयन्तं समुत्थाय पूजयामास सादरम् । रामाद्या नृपपुत्राश्च कौसल्याद्या नृपस्त्रियः ॥ ६५॥ प्रणम्यथ मुनिं स्तुन्वा तस्थुमुद्गलभार्यया । सुमत्य पूजिताः सर्वा राजदारा विशेषतः ॥ ६६॥ ततो दशरथः प्राह मुनिं स्तुत्वा पुनः पुनः । मयाऽपराधितं राज्ञा क्षम्यतां तत्त्वया मुने ॥ ६७॥ मुनिर्दशरथं प्राह ह्युपकारो महान् कृतः । नोचेत्कथं दर्शनं मे ध्यानस्थस्य सुतस्य ते ॥ ६८॥ भार्यास्य समीपस्थ नृवेषस्य हि मायया । इति तस्य वचः श्रुत्वा दृष्ट्वा तुष्टं मुनीश्वरम् ॥ ६९॥ उवाच नृपतिर्नत्वा किंचित्प्रष्टुमना मुनिम् । ज्ञात्वा नृपस्य स मुनिर्हृद्गतं प्रष्टुकामुकम् ॥ ७०॥ एकांते तुलसीखण्डे नीत्वा तं नृपमेव सः । पप्रच्छ किं ते वाञ्छाऽस्ति वदस्व कथ्यते मया ॥ ७१॥ तमब्रवीद्दशरथः श्रीरामस्य हि भावि यत् । हिताहितं सविस्तारं ज्ञातुमिच्छे मुनीश्वर ॥ ७२ नृपस्य वचनं श्रुत्वा राजानं मुनिरब्रवीत् । मुद्गल उवाच साक्षान्नारायणो विष्णुः सर्वव्यापी जनार्दनः ॥ ७३ ॥
हृाकर रामको हृदयसे लगाया। उस समय उन्होंने आनन्दस गुरु तथा ब्राह्मणो द्वारा अनेक उत्सव कराये। उधर समाधिस निवृत्त होनेपर सब वटुकोंने हाहाकार करके मुनिको सब हाल सुनाया। तब मुद्गल मुनि विस्मित होकर वटुकोंसे कहने लगे— ॥ ५४-५८ ॥ जाओ, यह लक्ष्मण कौन है, किस लिये और किसके कहनस बूटियों सं गया है। शीघ्र इस बातका पता लगाकर आओ ॥ ५९ ॥ 'अच्छा' कहकर उन्होंने दशरथके पास जाकर पूछा कि तुम कौन हो और तुमने लक्ष्मणक द्वारा जड़िय क्यों मंगवायी हैं ? ॥ ६० ॥ उन्हें क्रुद्ध देखकर राजा चिन्तापूर्वक कहने लगे कि मैं राजा दशरथ हूँ, लक्ष्मण मेरे कहनेसे भरतके लिये जड़िये ले आया है। मेरा नमस्कार कहकर मुनिसे यह सब वृत्तान्त कह दें। मैं भी मुनिकंपे समझानेके लिये शीघ्र ही आ रहा हूँ ॥ ६१ ॥ ६२ । लौटकर वटुकन मुनिका राजाका नाम आदि कह सुनाया। रामके पिताका नाम सुना ता मुनिने क्रोधको रोक तथा शीघ्र जाकर राजासे मिलनेका विचार किया ही था कि इतनेमें राजा दशरथ स्वयं आकर सामने खड़े हो गये और हाथ जोड़ प्रणाम करके प्रार्थना करने लगे। तब खड़े होकर मुनिन उनका सादर पूजा की । राम आदि राजार्क पुत्र तथा कौमल्या आदि राजाकी स्त्रियं भी मुनिका प्रणाम करके उनका स्तुति करती हुई खड़ी हो गयीं। मुद्गल मुनिको भार्या सुमतिने विशेषरूपसे राजाकी स्त्रियांका सत्कार किया ॥ ६३-६६ । राजाने बारम्बार स्तुति करके मुनिसे कहा-हे मुनि ! मुझसे जो अपराध हुआ है। उसको क्षमा करें ॥ ६७ । मुनिने महाराज दशरथसे कहा कि नहीं, तुमने मेरा बड़ा भारी उपकार किया है। नहीं तो ध्यानयोग्य और मायासे मनुष्यका रूप धारण किये हुए, सीताके सहित आपके पुत्र र मका दर्शन मुझे कैसे मिलता ? मुनिके वचन सुन तथा उन्हें प्रसन्न देखकर राजाने नमस्कार करके उनसे कुछ पूछना चाहा । इतनेमें मुनि राजाके हृदयकी बात जान गये और एक ओर तुलसीकी झाड़ीमे ले जाकर वे स्वयं राजासे कहने लगे—हे राजन् ! कहो, तुम्हारी क्या पूछनेकी इच्छा है, मैं उसका उत्तर दूंगा । ६८-७१ । राजाने कहा—हे मुनीश्वर ! रामका भविष्य कैसा है ? मैं उसका
सर्गः ४ ] सारकाण्डम् १९
भूभारहरणार्थाय तत्रापि वरदानतः । अवतीर्णोऽस्ति न्यक्को हि तव पुण्यमहोदयात् ॥७४॥
अधर्मस्य विनाशं च वृद्धिं धर्मस्य सादरम् । निर्दलनं हि दुष्टानां सज्जनानां च पालनम् ॥७५॥
करिष्यति महानेष तव पुत्रो रघूत्तमः । दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च । ७६
करिष्यति महद्राज्यं गते त्वयि दिवं नृप । सप्तद्वीपपतिर्भार्ये भविष्यति नृपो महान् ॥७७॥
द्वौ तौ भविष्यतः पुत्रौ चतस्रश्च स्नुषास्तथा । चतुर्विंशतिपौत्राश्च पौत्र्यस्तु द्वादशैव हि । ७८।
असंख्याताः प्रपौत्राद्या भविष्यान्त सूनस्य ते । कियदिनेय्यं दंडार्ण भोक्तुं हि दंडके ॥७९॥
गमिष्यति ततः पश्चान्महद्राज्यं करिष्यति । तत्तस्य वचनं श्रुत्वा नृपः प्राह मुनिं पुनः ॥८०॥
दशरथ उवाच
का वृंदा कस्य भार्या सा कथं शप्तो हरिस्तया । तन्यत्रं विस्तरेणैव कथयस्व मुनीश्वर ॥८१॥
मुद्गल उवाच
पुरा जलंधरेणामीद्युद्धं श्रीशंकरस्य च । ईशापातिव्रतबलाद्रक्षितं विष्णुना तदा ॥८२॥
ज्ञात्वा तद्दक्षितपथा पार्वत्या घर्षणादिना । जालंधरपुरं गत्वा तद्द्न्यपुटभेदनम् । ८३.
पातिव्रत्यस्य भंगाय वृंदायाश्चाकरोन्मतिम् अथ वृंदारका देवी स्वप्नमध्ये ददर्श ह ॥८४.
भर्तारं महिषारूढं तैलाभ्यक्तं दिगंबरम् । दक्षिणाशागतं मुण्ड तमसाऽप्यावृतं तदा ॥८५।
ततः प्रबुद्धासा बाला सं स्वप्नं स्वं विचिन्तती । कुत्रापि नालभच्छर्म गोपुराट्टालभूमिषु । ८६।
वनः सखीद्वययुता नगरेयानमागता । वनाद्वनान्तरं याता ददर्शातीव भीषणौ ॥८७॥
राक्षसौ सिंहवन्नादौ दंष्ट्रानयनभीषणौ । तौ दृष्ट्वा विह्वलाऽतीव पलायनपरा तदा ॥८८।
ददर्श तापसं शांतं मशिष्यं मौनमास्थितम् ततस्तत्कण्ठम सज्य निउबाहुलती मयात् ॥८९।
मुने मां रक्ष शरणभागतामित्यभाषत । तत्तस्या वचनं श्रुत्वा ध्यान मुक्त्वास वै मुनिः ॥९०।
हित-अहित जानना चाहता हूँ ॥ ७२ ॥ राजाकी बात सुनकर मुनि मुद्गल कहने लगे—साक्षात् नारायण तथा शय्याश्रो जनार्दन विष्णुभगवान् पृथ्वीका भार उतारने तथा पूर्वजन्ममें आपको वरदान देनेके कारण आपके पुण्य-प्रतापसे स्वयं अवतरे हैं। ये अधर्मका नाश करके धर्मकी वृद्धि करेंगे। रामचन्द्रजी दुष्टोंका दलन करके सज्जनोंका पालन करेंगे हे नृप ! आपके देवलोक चले जानेपर ये दस हजार दस सौ वर्ष तक राज्य करेंगे। ये सप्तद्वीपके अधिपति और महान् राजा होंगे ॥ ७३-७७ ॥ इनके दो पुत्र और चार पुत्रवधुएं होंगी। चौबीस पौत्र और बारह पौत्रिए होंगी। आपके पुत्र रामके पश्चात् असंख्य होंगें । कुछ दिनोंके लिए ये दण्डकारण्यमें दंड प्राप्त शास्ता पुडात जायंग उसके बाद विशाल राज्य करेंगे । यह सुनकर राजाने फिर मुनिसे कहा ॥ ७८-८० ॥ राजा दशरथ बोले- वृन्दा कौन थी तथा किसकी स्त्री थी ? उसने भगवान्को क्या शाप दिया ? हे मुनीश्वर ! यह सब विस्तारपूर्वक कहें ॥ ८१ । मुद्गल बोले- पूर्वकालमें जलन्धर नामका एक दैत्य था। तृष्णा उसका बड़ी पतिव्रता स्त्री थी। उसके पातिव्रतके बलसे वह शिवजीके साथ युद्ध करके भी नहीं हारा। तब भगवान् विष्णु पार्वतीसे उसका कारण जानकर उनके कथनानुसार जालन्धरपुर गये। वहां धर्मध्वजका भरण करके वृन्दाका पातिव्रत भङ्ग करनेके लिए उन्होंने उसके साथ भोग करनेका विचार किया, तभी वृन्दारवीने स्वप्नमें अपने पति को तेलसे नहाये, नंगे शरीर, भैंसेपर चढ़कर दक्षिण दिशाको जाते, सिर मुड़ाये तथा तमेंसे आच्छादित देखा। जब वह बाला जागी तो स्वप्नपर विचार करने लगी। गोपुर छत तथा अटारी आदिवर उसे कहीं चैन नहीं मिला ॥ ८२-८६ ॥ तब वह अपनी दो सखियोंको साथ लेकर नगरके बाहर बागमें मन बहलाने लगी । वहाँ एकसे दूसरे और दूसरेसे तीसरे वनमें वह जब फिरने लगी, तब उसको भयानक सिंहके समान गर्जन करनेवाले और भयंकर दांत तथा नेत्रवाले दो राक्षस दिखाई दिये । उनका देख तथा विह्वल होकर वह इधर-उधर भागने लगी। उसे वहाँ सहसा शिष्योंसे युक्त एक मौनव्रतधारी शांत तपस्वी दिखायी दिये। तब वह अपनी दोनों भुजारूपिणी
४० आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
उन्मील्य नयने वृन्दां हृदि दृष्ट्वाऽब्रवीद्गुरुः । तिष्ठ त्वं बालिके ह्यत्र मा भयं कुरु सर्वथा ॥९१॥
इत्युक्त्वा पुरतो दृष्ट्वा राक्षसौ मुनिसत्तमः । निर्भर्त्सयन्तौ हुंकारैः क्रोधेन महता वृतः ॥९२॥
तौ तहुंकारस्रस्तौ पलायनपरौ तदा । तत्सामर्थ्यं मुनेर्दृष्ट्वा सा विस्मयावृता ॥९३॥
प्रणम्य दण्डवद्भूतौ मुनिं वचनमब्रवीत् ।
वृन्दोवाच
रक्षिताऽद्य त्वया घोराद्भयादस्मान्कृपानिधे । ९४॥
किंचिद्विज्ञप्तुमिच्छामि कृपया तद्वदस्व यत् । जलंधरो हि मे भर्ता रुद्रं योद्धुं गतः प्रभो ॥९५॥
स तत्रास्ते कथं युद्धे तन्मे कथय सुव्रत । मुनिस्तद्वाक्यमाकर्ण्य कृपयोर्ध्वमवैक्षत ॥९६॥
तावत्कपा समायातौ तं प्रणम्याग्रतः स्थितौ । उत्तमाङ्गाभूलतासंज्ञाप्रयुक्तौ भगनांतरात् ॥९७॥
गत्वा क्षणाद्गोदारस्य वानरावग्रतः स्थितौ । शिरःकरद्वयञ्चैव दृष्ट्वाऽन्विततनयस्य सा ॥९८॥
पपात मूर्च्छिता भूमौ भर्तृव्यसनदुःखिता । कमंडलुजलैः सिक्त्वा मुनिनाऽऽश्वासिता तदा ॥९९॥
रुदित्वा सुचिरं वृन्दा तं मुनिं वाक्यमब्रवीत् ।
वृन्दोवाच
कृपानिधे मुनिश्रेष्ठ जीवयैनं मुने प्रियम् ॥१००॥
त्वमेवास्य पुनः शक्तो जीवनाय मदो दम ।
मुनिरुवाच
नायं जीवयितुं शक्यो रुद्रेण निहतो युधि ॥१०१॥
तथापि स्वकृपाविष्टः पुनः संजीवयाम्यहम् । इत्युक्त्वान्तर्दधे यावत्तावत्सागरनन्दनः ॥१०२॥
हृदाश्लिष्य तद्वक्त्रं चुचुंब प्रीतमानसः । अथ वृन्दाऽपि भर्तारं दृष्ट्वा हर्षितमानसा ॥१०३॥
रेमे तद्वनमध्यस्था तद्युक्ता बहुवासरम् कदाचित्सुरतास्यान्ते दृष्ट्वा विष्णुं समेव हि ॥१०४॥
लगाम् उनके गलम डालकर भयभीतभावसे कहने लगी हे मुने ! आपकी शरणमें आया हुई मुझ अबलाकी रक्षा करिए । उनके इस आर्त बचनको सुना तो ध्यान छोड़कर मुनिने उसे अपने हृदयसे लिपटी हुई पाया । तब वे उससे कहने लगे-बालिके ! तुम यहीं निर्भय होकर रहो । ॥८-९१ ॥ उसे इस प्रकार समझाकर मुनिश्रेष्ठने डराने तथा हुंकार करते हुए उन दोनों राक्षसोंको अपने सामने देखा तब क्रुद्ध होकर वे भी हुंकार करने लगे । उनके हुंकारसे त्रस्त होकर वे दोनों राक्षस भाग गये मुनिके इस अद्भुत सामर्थ्यको देखा तो वृन्दा आश्चर्यचकित होकर भूमिपर दण्डवत् प्रणाम करके कहने लगी, वृन्दा बोली हे कृपानिधे ! मुझ नापन इस घोर संकटसे बचा लिया । अब मै आपसे कुछ पूछना चाहती हूँ । सो कृपा करके कहिये । हे प्रभो ! मेरा पति जलंधर शिवजीसे युद्ध करने गया है । हे सुव्रत ! वह वहाँ किस दशामें है, यह मुझे बताइए । मुनिने उसको बात सुनकर कृपापूर्वक ऊपरकी ओर देखा तो ऊपरसे दो बन्दर आये और मुनिको प्रणाम करके सामने खड़े हो गये । उनके हाथों में वृन्दाने अन्चितनय जलन्धरका कठा सिर, हाथ तथा धड़ देखा । यह देखनेके साथ ही वह पतिवियोगके दुःखसे दुःखित तथा मूर्च्छित होकर धरतीपर गिर पड़ी। तब मुनिने उसने मुँहपर कमण्डलुका जल छिड़का और सचेत करके शांत किया ॥ ९२-९९ ॥ बहुत समय तक रोनेके वाद वृन्दा कहने लगी – हे कृपानिधे ! हे मुनिश्रेष्ठ ! आप मेरे प्रिय पतिको जीवित कर दें ॥ १०० ॥ मेरी समझमें आप ही इसको जिलानेमें समर्थ हैं। मुनि बोले - युद्धमें शिवजीके द्वारा निहत जलन्धरको जीवित करना असम्भव है । फिर भी तुमपर दया करके मै इसे जीवित करता हूँ। ऐसा कहकर वे अन्तर्धान हो गये। इतनेमें सागरनन्दन जलन्धर प्रगट हो गया और आनन्दसे वृन्दाका आलिङ्गन करके मुख चुम्बन करने लगा। वृन्दाने भी अपने पतिको देखा ही प्रसन्न होकर उस वनमें बहुत दिनोंतक उसके साथ रमण करती रही । एक दिन सम्भोगके अनन्तर उसी जलन्धरको विष्णु के रूप में
सर्गः ४ ]
सर्गः ४ ] सारकाण्डम् ४१
निर्मर्त्स्य क्रोधसम्पृक्ता वृन्दा वचनमब्रवीत् ।
वृन्दोवाच
तव ज्ञानं हरे शीलं परदाराभिगामिनः ॥१०५॥ त्वं ज्ञातोऽसि मयाऽप्यद्य मायावी प्रच्छन्नतामसः । यौ त्वया मायया द्वौ तौ स्वकीयौ दर्शितौ मम ॥१०६॥ तावेव राक्षसौ भूत्वा तव भार्यां विनेष्यतः । जयविजयनामानौ ज्ञातौ कृत्रिमरूपिणौ ॥१०७॥ त्वं चापि भार्यादुःखार्तो वने करिष्यह्यवशान् । अत्र सर्वेश्वरोऽपि त्वं यत्ते शिष्यौ ममागता ॥१०८॥ पुण्यशीलसुशीलौ तौ कपिरूपधरावुभौ । अतस्ते वानरैग्मस्तु संगतिर्दण्डके वने ॥१०९॥ तद्रूपधरः शिष्यो यस्तार्योऽत्रेति वोधयन् । इत्युक्त्वा सा तदा वृन्दा प्रविवेश हुताशनम् ॥११०॥ ततो जालंधरो दैत्यो निहतो युधि शंभुना । तस्माद्राजंस्तदानीं तौ कुम्भकर्णदशाननौ ॥१११॥ जातौ सागरमध्ये तौ लङ्कायामधुना स्थितौ । नीत्वा जनकजां बत्लां पंचवर्षांस्तु मातृवत् ॥११२॥ पालयित्वाऽथ षण्मासात् रामबाणान्मरिष्यति । रामोऽपि वालिनं हत्वा सुग्रीवेण समन्वितः ॥११३॥ शिलाभिः सागरं बद्ध्वा सीतामादाय यास्यति । यानापत्यविलासांश्च सप्तद्वीपप्ररक्षणम् ॥११४॥ करिष्यति दयितया बंधुभिश्च यथामुखम् । इदं गोप्यं त्वया राजन् कथनीयं न कुत्रचित् ॥११५॥
श्रीशिव उवाच
इत्युक्त्वा मुद्गलः सर्वं भावि रामस्य कौतुकात् । चरित्रं दर्शयामास यदा यद्यत्कारिष्यति ॥११६॥ तच्छ्रुत्वा नृपतिः श्रुत्वा तुष्टः पप्रच्छ तं पुनः । पूर्वजन्मनि कश्चाहं किं मया सुकृतं कृतम् ॥११७॥ तन्मे वद मां ब्रह्मन् यस्माज्जातो हरिः सुतः । मम साक्षाद्रामचंद्रो लक्ष्मीः सीता म्भूत्स्नुषा ॥११८॥ इति तस्य वचः श्रुत्वा नृपमाह पुनर्मुनिः ।
मुद्गल उवाच
आसीन्मन्थाद्रिविषये करवीरपुरे पुरा ॥११९॥ ब्राह्मणो धर्मवित्कश्चिद्धर्मदत्त इति श्रुतः । विष्णुव्रतकरः सम्यग्विष्णुसूपूजारतः सदा ॥१२०॥
दशा ता क्रुद्ध होकर धिक्कारती हुई वृन्दा बोली-हे हर ! तुम्हारे इस परस्त्रीगमनरूपी व्यवहारको धिक्कार है ॥१०५॥ मैंने अब जाना कि तुम मायावी तथा बनावटी तपस्वी हो। तुमने अपने निजी दो दूतोंको वानर-रूपमें मुझे दिखलाया था, वे ही दोनों राक्षस होकर तुम्हारी स्त्रीका हरण करेंगे। वे दोनों कृत्रिमरूपधारी जय विजय तुम्हारे पाखंड थे ॥१०२-१०७॥ सर्वेश्वर होनेपर भी तुम स्त्रीके वियोगसे दुःखी होकर वानरोंके साथ वनमें चक्कर लगाओगे। तुम्हारे वे दोनों पुण्यशील-सुशील शिष्य जो वानर बनेंगे। उनमेंसे तार्य नामका शिष्य बहुरूप धारण करेगा। और भी बहुतसे वानर दण्डकवनमें तुमको मिलेंगे। इतना कहकर वृन्दा अग्निमें प्रविष्ट हो गयी ॥१०८-११०॥ इस प्रकार वृन्दाका पातिव्रत खण्डित होनेके बाद जलन्धर वास्तविकरूपमें शंभुके द्वारा मारा गया। हे महाराज दशरथ ! इस शापके कारण इस समय रावण कुम्भकर्ण जन्म लेकर समुद्रके बीच लङ्कामें निवास करते हैं। वे जबरदस्तीसे जनककी पुत्री सीताको ले जाकर छः मास तक माताकी तरह रक्षण करनेके पश्चात् रामके बाणोंसे मारे जायेंगे। राम भी वालीको मारकर सुग्रीवके साथ पत्थरोंसे समुद्रको बाँध तथा उस पार जाकर सीताको ले आयेंगे। पश्चात् प्राणप्रिया सीता तथा बन्धुओंके साथ राम सौख्यान्तःकरणका विलास करते हुए सप्तद्वीपोंकी रक्षा करेंगे। हे राजन् ! यह गोप्य बात किसीको न बतलाइएगा ॥१११-११५॥ श्रीशिवजी बोले-हे पार्वती ! इस प्रकार मुद्गलने रामका समस्त भावी चरित्र बता दिया ॥११६॥ इन सब बातोंको सुन तथा प्रसन्न होकर राजा दशरथने फिर पूछा कि मैं कौन था और मैंने कौनसे सुकृत किये थे कि जिससे साक्षात् भगवान् रामचंद्रजी मेरे पुत्र बने तथा साक्षात् लक्ष्मी सीता होकर मेरी पुत्रवधू हुईं। हे ब्रह्मन् ! यह सब हाल मुझे कह सुनाइये ॥११७॥११८॥ यह सुनकर मुद्गल मुनि राजासे फिर कहने लगे। मुनि बोले-हे राजन् ! सह्याद्रिपर करवीरपुरमें परम धर्मज्ञ धर्मदत्त नामसे विख्यात एक ब्राह्मण
| ४२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ४ |
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द्वादशाक्षरविद्यायां जपनिष्ठोऽनिशंक्रियः। कदाचित्कार्तिके मासि हरिजागरणाय सः ॥ १२१॥ रात्र्यां तुर्यावशेषायां जगाम हरिमन्दिरम् । हरिपूजोपकरणान् प्रगृह्य व्रजता तदा ॥ १२२॥ तेन दृष्टा समायाता राक्षसी भीमनिःस्वना। वक्रदंष्ट्रा ललज्जिह्वा विनग्ना रक्तलोचना ॥ १२३॥ दिगंबरा शुष्कमांसा लंबोष्ठी घर्घरस्वना । तां दृष्ट्वा भयसंत्रस्तः कंपितावयवस्तदा ॥ १२४॥ पूजोपकरणं सर्वः पयोमिश्राह्नदलात् । संस्मृत्य यद्धरेर्नाम तुलसीयुक्तवारिणा ॥१२५॥ मोहमद्वाग्णि तस्मात्तत्पापं लयमागतम् । अथ संस्मृत्य सा पूर्वजन्मकर्मविपाकजम् ॥ १२६॥ स्वां दशामब्रवीत्तीव्रं दंडवच्च प्रणम्य सा ।
कलहोवाच
पूर्वकर्मविपाकेन दशामेतां गताऽस्म्यहम् ॥१२७॥
मन्कथं तु पुनर्विप्र याम्यहं गतिमुत्तमाम् ।
मुद्गल उवाच
तां दृष्ट्वा प्रणतामार्ता वदमानां स्वकर्म सा ॥१२८॥
अतीव विस्मितो विप्रस्तदा वचनमब्रवीत् ।
धर्मदत्त उवाच
केन कर्मविपाकेन त्वं दशामीदृशीं गता ॥ १२९॥
कुतः प्राप्ता च किंशीला तत्सर्वं विस्तराद्वद ।
कलहोवाच
सौराष्ट्रनगरे ब्रह्मन् भिक्षुनामाऽभवद्द्विजः ॥१३०॥
तस्याहं गृहिणी भद्रात् कलहाख्याऽतिनिष्ठुरा । न कदाचिन्मया भर्तुर्वचसाऽपि शुभं कृतम् ॥ १३१॥
नार्पितं तस्य मिष्टान्नं भर्तुर्वचनभंगया । पाककाले यथा नित्यं यद्यच्चान्नं मनोरमम् ॥ १३२॥
तत्तत्पूर्वं स्वयं भुक्त्वा पश्चाद्भर्त्रे निवेदितम् । एकदा स पतिर्मित्रं मम वृत्तं न्यवेदयत् ॥ १३३॥
नैव शृणोति मे पत्नी मद्वाक्यं किं करोम्यहम् । तेन श्रुत्वा तु सकलं शृण संचित्य वै हृदि ॥१३४॥
उवाच मन्पतिं किंचिद्युक्तिं नां ते रटाम्यहम् । निषेधोक्त्या यद्वस्त्वं गृहिणी सा करिष्यति ॥ १३५॥
रहता था वह विष्णुके व्रतोंको करनेवाला, भली भाँति विष्णुपूजामें रत, सदा बारह अक्षरके मन्त्र ( ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ) के जपमे निष्ठा रखनेवाला तथा अभ्यागतोंका प्रेमी था । एक बार वह कार्तिक-में रात्रिजागरण करके चौथे प्रहर पूजाकी सामग्री लेकर हरिमन्दिरमें जा रहा था कि रास्तेमें सहसा उसने एक भयानक थरथर शब्द करती हुई, टेढे दाँतोवाली, जीभको हिलाती, नितान्त नग्न लाल नेत्रोंवाली, जिसके शरीरका सर्व माँस सूख गया था— ऐसी लम्बे होठों और नग्न शरीरवाली एक राक्षसीको आते देखा । उसको देखकर ब्राह्मण भयसे काँप उठा । तब वह समस्त पूजाकी सामग्री तथा जल आदि फेंक-फेंककर उसको मारने लगा । वह नारायणका नाम लेता हुआ उसके ऊपर तुलसीपत्र तथा जल फेंकता जाता था । बस, इसीसे अनायास उस राक्षसीके सब पाप घुल गये और उसको पूर्वजन्मके कर्मोंका स्मरण हो आया ॥ ११८-१२६ ॥
तब वह ब्राह्मणको दंडवत् प्रणाम करके कहने लगी । कलहा बोली— हे विप्र ! मैं पूर्वजन्मके कर्मोंके फलस्वरूप इस दशाको प्राप्त हुई हूँ । हे ब्रह्मन् ! सौराष्ट्रनगरमें भिक्षुनामका एक ब्राह्मण रहता था । मैं उसकी कलहा नामकी बड़ी निष्ठुर स्त्री थी । मैने कभी वचनसे भी पतिकी भलाई नहीं की ॥ १२७-१३१ ॥ रसोईमें कभी मैं मिष्टान्न बनाती तो पतिसे झूठा बहाना करके तथा उसकी बात टालकर मिठाई नहीं देती थी। भोजनके समय प्रतिदिन जो जो अच्छी चीज बनाती पहिले उसको मैं खा लेती थी तब पतिको देती थी। एक दिन मेरे पतिने जाकर अपने एक मित्रसे कहा कि मेरी स्त्री मेरी बात नहीं मानती । मैं क्या करूँ ? उसके
[ अ० ४ ] उत्तरखण्डम् ४१
तद्वाक्येन कृतार्थोऽहं यन्मुनिश्रेष्ठ दर्शितम् । तथैव मित्रवाक्येन गृहमेत्य पतिर्मम ॥१३६॥
मामाह ह्यटने प्राप्ते भोजनार्थं समाह्वय । मम मित्रं महद् रूपं तच्छ्रुत्वा स्वपतेर्वचः ॥१३७॥
तदा मन्दधियोक्तः स मित्रं ते साधुसम्मतम् । ममाह्वयाम्यद्यभोज्यार्थमथैनं ब्राह्मणोत्तमम् ॥१३८॥
ततो मया समाहूतः स्वयं गत्वा पतेः सखा । उत्सृज्य निषेधोक्त्या कार्यमप्याययन्मतिः ॥१३९॥
एकदा स पितुःश्राद्धा ह्ययाहू. स्वपतिर्मम । मामाह दयिते श्राद्धं न करिष्याम्यहं पितुः ॥१४०॥
तद्वाक्यं स्वपतेः श्रुत्वा मया विप्रा निमन्त्रिनाः श्या धिक् धिक् कृतो मर्ता कथं श्राद्धं करोषि न १४१॥
दोषमं न जानामि का गतिस्ते भविष्यति ततः पुनः स मामाह पक्वान्नश्च मा कुरु ।१४२॥
एवं निमंत्रयस्वैकं मा विस्तारं कुरु प्रिये । तत्तस्य वचनं श्रुत्वा मयाऽष्टादश भूसुराः ॥१४३॥
निमन्त्रितास्तु श्राद्धार्थं पक्वान्नानि कृतानि हि ततः पुनः स मामाह प्रिये शृणु वचो मम ॥१४४॥
अद्य माहार्हता मिष्टं पाक् भुक्त्वा ततः परम् । स्त्रीपोच्छिष्ट स्वयं विप्रान् परिवेषणमाचर ॥१४५॥
तन्मया कथितं श्रुत्वा स पतितिष्कृतः पुनः कथमादौ स्वयं भुक्त्वा पश्चाद्विप्रान्समर्पयेत् ॥१४६॥
एवमेवं निषेधोक्त्या श्राद्धं सांगं चकार सः । पिण्डदानादिकं कृत्वा मामाह स पतिः पुनः ॥१४७॥
अहभोराषण व्यथ करिष्यामि न संशयः । तत्तस्य वचनं श्रुत्वा मिष्टान्नेन स भोजिनः ॥१४८॥
नतो दैववशाद्भूत्वा विस्मृत्य प्राह मां पुनः । नान्दी पिण्डान् क्षिपेदाप प्रशौचे परमादरात् ॥१४९॥
ततो मया शौचकूपे नीत्वा पिण्डा विसर्जिताः । ततः खिन्नमना विप्रो हाहेत्युक्त्वा स्थितोऽभवत् १५०
उत्तोलितेत्य मामाह पिण्डान्मा त्वं बहिः कुरु । उत्तोलार्य शौचकूपे मया पेडा बहिः कृताः ॥१५१॥
मनः पुनः स मामाह पिण्डान्तीर्थे क्षिपस्व मा । तदा तीर्थे मया क्षिप्तास्ते पिण्डाः परमादरात् ॥१५२॥
वचन यह सुनकर उसने विचार किया ॥ १३०--१३४ ॥ तदनन्तर उसके घर पतिरस का कुछ कहा था,
** मैं कहता हूँ । उधर कहा हे मित्र ! तुम अपना स्वास उल्टा बात कहा करो, तब वह तुम्हार मना किये
** कामक अवश्य करेगी और तुम्हारा अभीष्ट सिद्ध होगा । मित्रका बात सुन तथा 'बहुत अच्छा कह कर
मेरा पति घरपर आया ॥ १३५ ॥ १३६ । वह मुझसे कहन लगा-हे प्रिये ! इस मित्रको तुम कभी भोजनके लिये
न बुलाना ॥१३७॥ यह बड़ा दुष्ट है । पतिके इस वचनको सुनकर मैने कहा कि तुम्हारा मित्र ब्राह्मणों श्रेष्ठ
तथा बड़ा सज्जन है। उसको मैं आज हीभोजनके लिये बुलाता हूँ ॥ १३७॥ १३८ ॥ तब मैं स्वयं जाकर पतिके
मित्रको बुला लायी । इसप्रकार मेरा पति विपरीत कहनेपर ही काम बन आया ॥ १३६ ॥ एक दिन मेरा पति अपने
पिताकी श्रद्धतिथि जानकर कहने लगा हे दयित ! मै आज अपने पिताका श्राद्ध नहीं करूँगा ॥ १४० ॥
यह सुनकर मैंने उसके कहनेके प्रतिकूल इष्टपुट ब्राह्मणोंको निमन्त्रण दे दिया और पतिसे कहा कि तुमको धिक्कार
है जो अपने पिताका श्राद्ध भी नहीं करते ॥ १४१॥ तुम पुण्य पापको नही जानते । इसलिय न जाने तुम्हारी
क्या गति होगी । तब उसने कहा कि यदि करना ही है तो केवल एक ब्राह्मणको निमन्त्रण देना अधिक
झगड़ा नही बढ़ाना । पकवान-मिठाई आदिमे व्यर्थ खर्च नहीं करना । यह सुनकर मैने एक साथ अठारह ब्राह्म-
णोंको निमन्त्रण दे दिया । श्राद्धके लिये अनेक प्रकारके पक्वान बनाये । फिर पतिने मुझसे कहा कि आज तुम
अपने कर साथ मिष्टान्न भोजन करके बादमे अपना जूठा भोजन ब्राह्मणोको परोसना ॥ १४२-१४५ ॥ यह सुन-
कर मैने पतिको धिक्कारा और कहा कि तुमको धिक्कार है। पहिले स्वयं खाकर पश्चात् ब्राह्मणोंका भोजन करानेके
योग्य कहते हो ? ॥ १४६ ॥ इस प्रकार विपरीत कथनसे पतिने मेर द्वारा विधिवत् श्राद्ध करवाया, पिण्डदान
आदि करके फिर उन्होंने मुझसे कहा-॥ १४७ ॥ मैं आज कुछ भी न खाकर उपवास करूँगा । यह सुनकर
मैंने उन्हे खूब मिष्ठान्न खिलाया ॥ १४८ ॥ बादमे दैववशात् भूलकर पतिने मुझसे कहा कि इन पिण्डोको
तुम अत्यंत प्रेमसे किसी पवित्र तीर्थके अन्दर फेंक आओ ॥ १४९ ॥ यह सुनकर मैने उन पिण्डोको ले जाकर पाखाने-
में डाल दिया । यह देखा तो वह विप्र हाय-हाय करने लगा ॥ १५० ॥ अनन्तर सोचकर मुझसे कहा कि
हाहा, पाखानेसे पिडोंको बाहर न निकालना । तब शौचकूपमे उतरकर मैने उन पिडांका निकाल लिया
४५ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
एवं मया कदा भर्तुर्वचनं न कृतं तदा । कलहप्रियया नित्यं मय्युद्विग्नमना यदा ॥१५३॥ परिणेतुं ततोऽन्यां वै मनश्चक्रे पतिर्मम । ततो विषं समादाय प्राणस्त्यक्तो मया द्विज ॥१५४॥ अथ बद्ध्वा वध्यमानां मां निन्युर्यमकिंकराः । यमश्च मां तदा दृष्ट्वा चित्रगुप्तमपृच्छत ॥१५५॥
यम उवाच अनया किं कृतं कर्म फलं शुभमथाशुभम् । प्राप्नोत्येषा च तत्कर्म चित्रगुप्तावलोकय ॥१५६॥
कलहोवाच चित्रगुप्तस्तदा वाक्यं मन्दंस्मयंस्तमुवाच ह ।
चित्रगुप्त उवाच अनया तु शुभं कर्म कृतं किंचिन्न विद्यते ॥१५७॥ मिष्टान्नं भुज्यमानेयं न भर्त्रे तदर्पितम् । अथ बगुलीयोन्यां स्वनिष्ठायाञ्च तिष्ठतु ॥१५८॥ पतिं दृष्ट्वा सदा रुष्टा नित्यं कलहकारिणी । विष्ठाश शूकरीयोन्यां तस्मात्तिष्ठत्वियं यम ॥१५९॥ पाकभांडे सदा भुंक्ते गुप्तं चैका यतस्ततः । तस्माद्दोषाद्बिलाडाङ्गेष्ववजातान्यभक्षिणी ॥१६०॥ भर्त्तारमपि चोद्दिश्य ह्यात्मघातः कृतोऽनया । तस्मात्प्रेतशरीरेऽपि तिष्ठत्वेकाऽविनिंदिता ॥१६१॥ अतश्चैषा मरुद्देशे प्रापितव्या ह्यमेश्चरैः । तत्र प्रेतशरीरस्था चिरं तिष्ठत्वियं ततः ॥१६२॥ ऊर्ध्वं योनित्रयं चैषा भुङ्क्त्वशुभकारिणी ।
कलहोवाच ततो दूतैः प्रापिताऽहं मरुद्देशे क्षणाद्द्विज ॥१६३॥ दत्त्वा प्रेतशरीरं मां गतास्ते स्वस्थलं प्रति । साऽहं पंचदशाब्दानि प्रेतदेहे स्थिता किल ॥१६४॥ क्षुत्तृड्भ्यां पीडिताऽत्यर्थं दुःखिता स्वेन कर्मणा । ततः क्षुत्पीडिता नित्यं शरीरं वणिजस्त्वहम् ॥१६५॥ प्रविश्य दक्षिणे प्राप्ता कृष्णावेण्यास्तु संगमे । तत्राऽहं मन्निता यात्रास्वावलस्य शरीरतः ॥१६६॥ उग्रविष्णुगणैर्दूरमपाकृष्टा बलादहम् । ततः क्षुत्क्षामया दृष्टो भ्रमन्त्या त्वं मया द्विज ॥१६७॥
॥ १५३ ॥ फिर पतित कहा—देखा, कहीं इनको किसा ताड़न न डालना । तब प्रेत ने जाकर उस पिंडोका बड़े आदरपूर्वक सायंकाल डाल दिया ॥ १५४ ॥ इस तरह मुझ कलहप्रियाने जब कभी भी पतिका सीधा तौरपर कहा हुआ काम नहीं किया, तब दुःखित होकर उसने अपना दूसरा ब्याह करना निश्चित किया । हे द्विज ! तब मैने जहर खाकर अपने प्राण त्याग दिये ॥ १५३ ॥ १५४ ॥ तब यमदूत मुझे बाँधकर यमराजके पास लेगये । यमराज मुझे देखकर चित्रगुप्तसे कहने लगे ॥ १५५ ॥ यमराजने कहा—चित्रगुप्त देखो, इसने अच्छा कर्म किया है या बुरा, जिससे इसको वैसा ही फल दिया जाय ॥ १५६ ॥ कलहा कहन लगा—यह सुनकर चित्रगुप्त मुसकमुकात हुए कहने लगे कि इसने तो कोई अच्छा कर्म कभी किया नहीं। यह मिष्टान्न बनाकर खाती थी परन्तु अपने पतिको नहीं देती थी। इसलिये यह बगुलीकी योनिम जाकर अपना ही विष्ठा खानकाश्ये वणिंगा बने प्रतिदिन झगड़ा एव पातक द्वेष करनेके कारण यह विष्ठा भक्षण करनेवाली शूकरयोनिम पैदा हो। हे यम इधर-उधर छिपकर भोजन बनानेके पात्रमे अकेला ही खान्वाली यह बिल्ली बन ॥१५७ १६०॥ पातक उद्देश्य इसने आत्मघात किया है। इस कारण यह अविनिन्दित प्रेतयोनिमे अकेली रहे ॥ १६१ ॥ हे यम ! इसम दूतोंके द्वारा मरुद्देशमे भेज देना चाहिये, वहाँ जा नया प्रेत बनकर यह बहुत काल पर्य्यन्त निवास कर ॥ १६२ यह पापिनी उपर्युक्त सभी योनियोंको भोगे। कलहा बोली-हे द्विज ! तब यमदूतोन क्षण ही भरम मुझे मरुद्देश पहुंचा दिया ॥ १६३॥ यहाँ प्रेतयोनिमें डालकर वे अपने स्थानको चले गय। मै पन्द्रह वर्ष तक प्रेतयोनि रही ॥ १६४ ॥ अपने किये हुये कमोके अनुसार मै सदा भूख-प्याससे अत्यन्त दुःखिनी रहने लगी। इस प्रका नित्य भूखस पीडित हो एक बनियके देहम पैठकर मै दाक्षणम कृष्णा-वेणाक संगमपर आयी। वहाँ आत्म प्रिय तथा विष्णके गणान मुझे बरबस उस वणिक्के शरीरसे अलग करके दूर भगा दिया। तदनन्तर हे द्विज