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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

७९२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७

७९२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७


| स्वतोऽन्यं महिमानमाश्रितो भूमा चैत्रवदिति ब्रवीम्यत्र हेतुत्वेनान्यो ह्यन्यस्मिन्प्रतिष्ठित इति व्यवहितेन सम्बन्धः। किं त्वेवं ब्रवीमीति होवाच स एवेत्यादि ॥ २ ॥ | आश्रित और उनमें प्रतिष्ठित होता है उसी प्रकार चैत्रके समान ही भूमा भी अपनेसे भिन्न महिमामें आश्रित है--ऐसा मैं नहीं कहता। यहाँ 'क्योंकि अन्य पदार्थ अन्यमें प्रतिष्ठित होता है' इस व्यवधानयुक्त वाक्यसे इसका हेतुरूपसे सम्बन्ध है। किंतु मैं तो यह कहता हूँ, ऐसा कहकर सनत्कुमारजीने 'स एव अधस्तात्' इत्यादि कहा ॥ २ ॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये चतुर्विंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २४ ॥

पञ्चविंश खण्ड

—: ० :—

सर्वत्र भूमा ही है

कस्मात्पुनःक्वचिन्न प्रतिष्ठितः ? <br><br> इत्युच्यते—यस्मात्—तो फिर ऐसा क्यों कहा जाता है वह कहीं प्रतिष्ठित नहीं है ? <br><br> सो बतलाते हैं; क्योंकि—

स एवाधस्तात्स उपरिष्टात्स पश्चात्स पुरस्तात्स दक्षिणतः स उत्तरतः स एवेद१ँसर्वमित्यथातोऽहङ्कारादेश एवाहमेवाधस्तादहमुपरिष्टादहं पश्चादहं पुरस्तादहं दक्षिणतोऽहमुत्तरतोऽहमेवेद१ँसर्वमिति ॥ १ ॥

वही नीचे है, वही ऊपर है, वही पीछे है, वही आगे है, वही दायीं ओर है, वही बायीं ओर है और वही यह सब है। अब उसीमें अहंकारादेश किया जाता है—मैं ही नीचे हूँ, मैं ही ऊपर हूँ, मैं ही पीछे हूँ, मैं ही आगे हूँ, मैं ही दायीं ओर हूँ, मैं ही बायीं ओर हूँ और मैं ही यह सब हूँ ॥ १ ॥

स एव भूमाधस्तान्न तद्व्यतिरेकेणान्यद्विद्यते यस्मिन्प्रतिष्ठितः स्यात् तथोपरिष्टादित्यादि समानम् । सति भूम्नोऽन्यस्मिन्भूमा हि प्रतिष्ठितः स्यान्न तु तदस्ति । स एव तु सर्वम् । अतस्तस्मादसौ न क्वचित्प्रतिष्ठितः ।क्योंकि वह भूमा ही नीचे है, उससे भिन्न कोई और ऐसी वस्तु नहीं है जिसपर वह प्रतिष्ठित हो । इसी प्रकार 'उपरिष्टात्' इत्यादिका अर्थ भी समझना चाहिये । भूमासे भिन्न कोई और पदार्थ हो तो भूमा उसपर प्रतिष्ठित हो; किंतु ऐसा है नहीं । सब कुछ वही है । अतः इसीसे वह कहीं अन्यत्र प्रतिष्ठित नहीं है ।

७९४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७

७९४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ७

| यत्र नान्यत्पश्यतीत्यधिकर- <br> णाधिकर्तव्यतानिर्देशात्स एवा- <br> धस्तादिति च परोक्षनिर्देशाद्- <br> द्रष्टुर्जीवादन्यो भूमा स्यादि- <br> त्याशङ्का कस्यचिन्मा भूदित्यथा- <br> तोऽनन्तरमहङ्कारादेशोऽहङ्कारे- <br> णादिश्यत इत्यहङ्कारादेशः । <br> द्रष्टुरनन्यत्वदर्शनार्थं भूमैव <br> निर्दिश्यतेऽहङ्कारेणाहमेवाध- <br> स्तादित्यादिना ॥१॥ | 'जहाँ कुछ और नहीं देखता, इस वाक्यसे आधार-आधेयताका निर्देश होनेसे तथा 'वही नीचे है' इत्यादि वाक्यसे परोक्ष निर्देश होनेसे किसीको ऐसी शङ्का न हो जाय कि भूमा द्रष्टा जीवसे भिन्न है 'इसलिये अब—इसके पश्चात् अहंकारादेश किया जाता है । अहंकाररूपसे आदेश (उपदेश) किया जाता है इसलिये इसे अहंकारादेश कहा है । द्रष्टासे अभिन्नत्व दिखलानेके लिये भूमाका ही 'मैं ही नीचे हूँ' इत्यादि वाक्यद्वारा अहंकाररूपसे निर्देश किया जाता है ॥ १ ॥ |

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| अहङ्कारेण देहादिसङ्घातो- <br> ऽप्यादिश्यतेऽविवेकिभिरित्यतस्त- <br> दाशङ्का मा भूदिति— | अविवेकी लोग अहंकारसे देहादि संघातका भी आदेश करते हैं; अतः ऐसी आशङ्का न हो इसलिये— |

अथात आत्मादेश एव आत्मैवाधस्तादात्मोपरिष्टा-
दात्मा पश्चादात्मा पुरस्तादात्मा दक्षिणत आत्मोत्तरत
आत्मैवेदꣳसर्वमिति। स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं
विजानन्नात्मरतिरात्मक्रीड आत्ममिथुन आत्मानन्दः स
स्वराड्भवति तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति अथ

खण्ड २५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७९५


येऽन्यथातो विदुरन्यराजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति तेषाꣳ सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवति ॥ २ ॥

अब आत्मरूपसे ही भूमाका आदेश किया जाता है । आत्मा ही नीचे है, आत्मा ही ऊपर है, आत्मा ही पीछे है, आत्मा ही आगे है, आत्मा ही दायीं ओर है, आत्मा ही बायीं ओर है और आत्मा ही यह सब है । वह यह इस प्रकार देखनेवाला, इस प्रकार मनन करनेवाला तथा विशेषरूपसे इस प्रकार जाननेवाला आत्मरति, आत्मक्रीड, आत्ममिथुन और आत्मानन्द होता है; वह स्वराट् है; सम्पूर्ण लोकोंमें उसकी यथेच्छ गति होती है । किंतु जो इससे विपरीत जानते हैं वे अन्यराट् (जिनका राजा अपनेसे भिन्न कोई और है, ऐसे) और क्षय्यलोक (क्षयशील लोकोंको प्राप्त होनेवाले) होते हैं । उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें स्वेच्छागति नहीं होती ॥ २ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
अथानन्तरमात्मादेश आत्मनैव केवलेन सत्स्वरूपेण शुद्धेनादिश्यते । आत्मैव सर्वतः सर्वमित्येवमेकमजं सर्वतो व्योमवत्पूर्णमनन्यशून्यं पश्यन्स वा एष विद्वान्मननविज्ञानाभ्यामात्मरतिरात्मन्येव रती रमणं यस्य सोऽयमात्मरतिः। तथात्मक्रीडः। देहमात्रसाधना रतिर्बाह्यसाधना क्रीडा । लोके स्त्रीभिः सखिभिश्चअब आगे आत्मादेश है अर्थात् केवल सत्स्वरूप शुद्ध आत्माके द्वारा ही आदेश किया जाता है । सब ओर सब कुछ आत्मा ही है । इस प्रकार आकाशके समान सर्वत्र पूर्ण एक अज और अनन्य आत्माको देखनेवाला वह यह विद्वान् मनन और विज्ञानके कारण आत्मरति—आत्मामें ही जिसकी रति अर्थात् रमण है ऐसा आत्मरति और आत्मक्रीड होता है । रतिका साधन केवल देह है और क्रीडा बाह्य साधनवाली होती है, क्योंकि लोकमें 'स्त्रियों और मित्रोंके साथ क्रीडा

७९६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७

७९६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७


| क्रीडतीति दर्शनात् । न तथा विदुष । किं तर्ह्यात्मविज्ञाननिमित्तमेवोभयं भवतीत्यर्थः । | करता है' ऐसा प्रयोग देखा जाता है; किंतु विद्वान्‌की क्रीडा ऐसी नहीं होती। तो कैसी होती है ? उसकी तो ये [ रति और क्रीडा ] दोनों ही आत्मविज्ञानके ही कारण होती हैं। | | मिथुनं द्वन्द्वजनितं सुखं तदपि द्वन्द्वनिरपेक्षं यस्य विदुषः । तथात्मानन्दः शब्दादिनिमित्त आनन्दोऽविदुषां न तथास्य विदुषः किं तर्ह्यात्मनिमित्तमेव सर्वं सर्वदा सर्वप्रकारेण च । देहजीवितभोगादिनिमित्तबाह्यवस्तुनिरपेक्ष इत्यर्थः । | मिथुन यह दोसे होनेवाला सुख है, वह भी जिस विद्वान्‌का दोकी अपेक्षासे रहित है [ उसे आत्ममिथुन कहते हैं ]; तथा आत्मानन्द—अविद्वानोंका आनन्द शब्दादि विषयजनित होता है, विद्वान्‌का आनन्द वैसा नहीं होता । तो कैसा होता है ?—वह सारा-का-सारा सर्वदा सब प्रकार आत्माके ही कारण होता है। तात्पर्य यह है कि वह देह, जीवन और भोगादिकी निमित्तभूत बाह्य वस्तुओंकी अपेक्षासे रहित होता है। | | स एवंलक्षणो विद्वाञ्जीवन्नेव स्वाराज्येऽभिषिक्तः पतितेऽपि देहे स्वराडेव भवति । यत एवं भवति तत एव तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति । प्राणादिषु पूर्वभूमिषु तत्रास्येति | इस प्रकारके लक्षणोंवाला वह विद्वान् जीवित रहता हुआ ही स्वाराज्यपर अभिषिक्त हो जाता है तथा देहपात होनेपर भी स्वराट् ही होता है। क्योंकि ऐसा है इसीसे उसकी सम्पूर्ण लोकोंमें यथेच्छगति होती है। प्राणादि पूर्व भूमिकाओंमें इस उपासककी उनसे परिच्छिन्न ही |

खण्ड २५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
तावन्मात्रपरिच्छिन्नकामचारत्वमुक्तमन्यराजत्वं चार्थप्राप्तं सातिशयत्वाद्यथाप्राप्तस्वाराज्यकामचारत्वानुवादेन तन्निवृत्तिरिहोच्यते स स्वराडित्यादिना ।<br><br>अथ पुनर्येऽन्यथात उक्तदर्शनादन्यथा वैपरीत्येन यथोक्तमेव वा सम्यङ् न विदुस्तेऽन्यराजानो भवन्ति । अन्यः परो राजा स्वामी येषां तेऽन्यराजनस्ते किञ्च क्षय्यलोकाः क्षय्यो लोको येषां ते क्षय्यलोकाः । भेददर्शनस्याल्पविषयत्वात् । अल्पं च तन्मर्त्यमित्यवोचाम । तस्माद्येद्वैतदर्शिनस्ते क्षय्यलोकाः स्वदर्शनानुरूपेणैव भवन्त्यत एव तेषां सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवति ॥ २ ॥स्वेच्छागति बतलायी गयी थी । अतः सातिशय होनेके कारण वहाँ उसका अन्यराजत्व स्वतः सिद्ध है। अब यथाप्राप्त स्वाराज्य और काम-चारत्वका अनुवाद करते हुए यहाँ 'स स्वराड् भवति' इत्यादि वाक्यसे उसकी निवृत्तिका निरूपण किया जाता है ।<br><br>किंतु जो इससे अन्यथा—उपर्युक्त दृष्टिसे अन्य प्रकार अर्थात् इसके विपरीत जानते हैं अथवा इसीको सम्यक् प्रकारसे नहीं जानते वे अन्यराट् होते हैं । अन्य अर्थात् पर है राजा—स्वामी जिनका उन्हें 'अन्यराट्' कहते हैं । इसके सिवा वे क्षय्यलोक—जिनका लोक क्षय्य है ऐसे वे क्षय्यलोक होते हैं, क्योंकि भेददृष्टि अल्पविषयक है । ओर जो अल्प है वह मर्त्य है—ऐसा हम पहले कह चुके हैं । अतः जो द्वैतदर्शी हैं वे अपनी दृष्टिके अनुरूप ही क्षय्यलोक होते हैं। अतः उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें स्वेच्छागति नहीं होती ॥ २ ॥

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये पञ्चविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २५ ॥

षड्विंश खण्ड

इस प्रकार जाननेवालेके लिये फलका उपदेश

तस्य ह वा एतस्यैवं पश्यत एवं मन्वानस्यैवं विजानत आत्मतः प्राण आत्मत आशात्मतः स्मर आत्मत आकाश आत्मतस्तेज आत्मत आप आत्मत आविर्भावतिरोभावावात्मतोऽन्नमात्मतो बलमात्मतो विज्ञानमात्मतो ध्यानमात्मतश्चित्तमात्मतः संकल्प आत्मतो मन आत्मतो वागात्मतो नामात्मतो मन्त्रा आत्मतः कर्माण्यात्मत एवेदꣳसर्वमिति ॥ १ ॥

उस इस प्रकार देखनेवाले, इस प्रकार मनन करनेवाले और इस प्रकार जाननेवाले इस विद्वान्‌के लिये आत्मासे प्राण, आत्मासे आशा, आत्मासे स्मृति, आत्मासे आकाश, आत्मासे तेज, आत्मासे जल, आत्मासे आविर्भाव और तिरोभाव, आत्मासे अन्न, आत्मासे बल, आत्मासे विज्ञान, आत्मासे ध्यान, आत्मासे चित्त, आत्मासे संकल्प, आत्मासे मन, आत्मासे वाक्, आत्मासे नाम, आत्मासे मन्त्र, आत्मासे कर्म और आत्मासे ही यह सब हो जाता है ॥ १ ॥

तस्य ह वा एतस्येत्यादि स्वाराज्यं प्राप्तस्य प्रकृतस्य विदुष इत्यर्थः । प्राक्सदात्मविज्ञानात्स्वात्मनोऽन्यस्मात्सतः प्राणादे-'तस्य ह वा एतस्य' इत्यादिका यह तात्पर्य है कि स्वाराज्यको प्राप्त हुए इस प्रकृत विद्वान्‌के लिये सबका आत्मस्वरूपसे ज्ञान होनेके पूर्व प्राणसे लेकर नामपर्यन्त पदार्थोंके उत्पत्ति और प्रलय स्वात्मासे भिन्न

खण्ड २६] शाङ्करभाष्यार्थ ७९९

नर्नामान्तस्योत्पत्तिप्रलयावभूताम्। सदात्मविज्ञाने तु सतीदानीं स्वात्मत एव संवृत्तौ तथा सर्वोऽप्यन्यं व्यवहार आत्मत एव विदुषः ॥ १ ॥सतसे होते थे। किन्तु अब सत्‌का आत्मत्व ज्ञात होनेपर वे अपने आत्मासे ही हो गये। इसी प्रकार विद्वान्‌का और भी सब व्यवहार आत्मासे ही होने लगता है ॥१॥

किञ्च-- | तथा—

तदेष श्लोको न पश्यो मृत्युं पश्यति न रोगं नोत दुःखताᳵसर्वᳵ ह पश्यः पश्यति सर्वमाप्नोति सर्वश इति। स एकधा भवति त्रिधा भवति पञ्चधा सप्तधा नवधा चैव पुनश्चैकादशः स्मृतः शतं च दश चैकश्च सहस्राणि च विँशतिराहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षस्तस्मै मृदितकषायाय तमसस्पारं दर्शयति भगवान्सनत्कुमारस्तँस्कन्द इत्याचक्षते तँस्कन्द इत्याचक्षते ॥ २ ॥

इस विषयमें यह मन्त्र है—विद्वान् न तो मृत्युको देखता है, न रोगको और न दुःखत्वको ही। वह विद्वान् सबको [ आत्मरूप ही ] देखता है; अतः सबको प्राप्त हो जाता है। वह एक होता है; फिर वही तीन, पाँच, सात और नौ रूप हो जाता है। फिर वही ग्यारह कहा गया है तथा वही सौ, दश, एक सहस्र और बीस भी होता है। आहारशुद्धि (विषयोपलब्धिरूप विज्ञानकी शुद्धि) होनेपर अन्तःकरणकी शुद्धि होती है, अन्तःकरणकी शुद्धि होनेपर निश्चल स्मृति होती है तथा स्मृतिकी प्राप्ति होनेपर सम्पूर्ण ग्रन्थियोंकी निवृत्ति हो जाती है। [इस प्रकार] जिनकी वासनाएँ क्षीण हो गयी थीं उन (नारदजी) को भगवान् सनत्कुमारने अज्ञानान्धकारका पार दिखलाया।

| ८०० | छान्दोग्योपनिषद् | अध्याय ७ |

८००छान्दोग्योपनिषद्अध्याय ७

उन (सनत्कुमारजी) को 'स्कन्द' ऐसा कहते हैं, 'स्कन्द' ऐसा कहते हैं॥ २ ॥

| तदेतस्मिन्नर्थ एष श्लोको मन्त्रोऽपि भवति—न पश्यः पश्यतीति। पश्यो यथोक्तदर्शी विद्वानित्यर्थः, मृत्युं मरणं रोगं ज्वरादि दुःखतां दुःखभावं चापि न पश्यति। सर्वं ह सर्वमेव स पश्यः पश्यत्यात्मानमेव सर्वम्। ततः सर्वमाप्नोति सर्वशः सर्वप्रकारैरिति। <br><br> किञ्च स विद्वान्प्राक्सृष्टिप्रभेदादेकधैव च संस्त्रिधादिभेदैरनन्तभेदप्रकारो भवति सृष्टिकाले। पुनः संहारकाले मूलमेव स्वं पारमार्थिकमेकधाभावं प्रतिपद्यते स्वतन्त्र एवेति विद्याफलेन प्ररोचयन्स्तौति। <br><br> अथेदानीं यथोक्ताया विद्यायाः सम्यगवभासकारणं मुखावभासकारणस्तेवादर्शस्य विशुद्धिकारणं | इस विषयमें यह श्लोक—मन्त्र भी है। पश्य नहीं देखता। पश्य अर्थात् उपर्युक्त प्रकारसे देखनेवाला विद्वान् मृत्यु—मरण, ज्वरादि रोग और दुःखत्व यानी दुःखभावको नहीं देखता। वह पश्य—विद्वान् सभीको देखता है अर्थात् सबको आत्मरूप ही देखता है। इसीसे वह सबको सब प्रकार प्राप्त होता है। <br><br> तथा वह विद्वान् सृष्टिभेदके पूर्व एकरूप होता हुआ ही सृष्टिकालमें त्रिधा आदि अनन्तभेद प्रकारोंवाला हो जाता है। और फिर संहारकालमें अपने मूल पारमार्थिक एकधाभावको ही प्राप्त हो जाता है, क्योंकि वह स्वतन्त्र ही है—इस प्रकार विद्याके फलद्वारा रुचि उत्पन्न करते हुए सनत्कुमारजी उसकी स्तुति करते हैं। <br><br> इसके पश्चात् अब मुखावभासकी हेतुभूत दर्पणकी विशुद्धि करनेके समान उपर्युक्त विद्याके सम्यक् प्रकारसे प्रतिफलित होनेके हेतुभूत साधनका उपदेश किया |

खण्ड २६ ]शाङ्करभाष्यार्थ८०१
संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
साधनमुपदिश्यते । आहारशुद्धौ । आहियत इत्याहारः शब्दादिविषयविज्ञानं भोक्तुर्भोगायाहियते तस्य विषयोपलब्धिलक्षणस्य विज्ञानस्य शुद्धिराहारशुद्धी रागद्वेषमोहदोषैरसंसृष्टं विषयविज्ञानमित्यर्थः ।जाता है—'आहारशुद्धौ' इत्यादि । जिनका आहरण किया जाय उन्हें 'आहार' कहते हैं; भोक्ताके भोगके लिये शब्दादि विषयविज्ञानका आहरण किया जाता है; उस विषयोपलब्धिरूप विज्ञानकी शुद्धि ही 'आहारशुद्धि' है, अर्थात् राग-द्वेष, मोह आदि दोषोंसे असंसृष्ट विषयविज्ञान ।
तस्यामाहारशुद्धौ सत्यां तद्वतोऽन्तःकरणस्य सत्त्वस्य शुद्धिनैर्मल्यं भवति, सत्त्वशुद्धौ च सत्यां यथावगते भूमात्मनि ध्रुवाविच्छिन्ना स्मृतिरविस्मरणं भवति । तस्यां च लब्धायां स्मृतिलम्भे सति सर्वेषामविद्याकृतानर्थपाशरूपाणामनेकजन्मान्तरानुभवभावनाकाठिनीकृतानां हृदयाश्रयाणां ग्रन्थीनां विप्रमोक्षो विशेषेण प्रमोक्षणं विनाशो भवतीति । यत एतदुत्तरोत्तरं यथोक्तमाहारशुद्धिमूलं तस्मात्सा कार्येत्यर्थः ।उस आहारशुद्धिके होनेपर उससे युक्त अन्तःकरण यानी सत्त्वकी शुद्धि-निर्मलता होती है; और अन्तःकरणकी शुद्धि होनेपर उपर्युक्त प्रकारसे जाने गये भूमात्मामें ध्रुव—अविच्छिन्न स्मृति यानी अविस्मरण हो जाता है तथा उसकी प्राप्ति होनेपर—स्मृति लब्ध होनेपर अनेक जन्मोंमें अनुभव की हुई भावनाओंसे कठिन की हुई अविद्याकृत अनर्थपाशरूप हृदयस्थित ग्रन्थियोंका विप्रमोक्ष—विशेषरूपसे प्रमोक्षण—विनाश हो जाता है । इस प्रकार क्योंकि यह ऊपर कहा हुआ सब कुछ उत्तरोत्तर आहारशुद्धिमूलक है, इसलिये वह अवश्य करनी चाहिये—ऐसा इसका तात्पर्य है ।

८०२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७

८०२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ७

| सर्वं शास्त्रार्थमशेषत उक्त्वा-ख्यायिकामुपसंहरति श्रुतिः—तस्मै मृदितकषायाय वार्क्षादिरिव कषायो रागद्वेषादिदोषः सत्त्वस्य रञ्जनारूपत्वात्स ज्ञानवैराग्याभ्यासरूपक्षारेण क्षालितो मृदितो विनाशितो यस्य नारदस्य तस्मै योग्याय मृदितकषायाय तमसोऽविद्यालक्षणात्पारं परमार्थतत्त्वं दर्शयति दर्शितवानित्यर्थः। कोऽसौ ? भगवान्—“उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम्। वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति” ( विष्णुपु० ६ । ५ । ७८ ) एवंधर्मा सनत्कुमारः। तमेव सनत्कुमारं देवं स्कन्द इत्याचक्षते कथयन्ति तद्विदः। द्विर्वचनमध्यायपरिसमाप्त्यर्थम् ॥ २ ॥ | शास्त्रके सम्पूर्ण अभिप्रायको सम्यक् प्रकारसे कहकर श्रुति आख्यायिकाका उपसंहार करती है—उस मृदितकषायको वृक्षादिसे सम्बन्ध रखनेवाले कषायके समान रागद्वेषादि दोष अन्तःकरणके रञ्जक होनेके कारण कषाय हैं। ज्ञान, वैराग्य और अभ्यासरूप क्षारसे जिन नारदजीके उस कषायका क्षालन-मर्दन अर्थात् विनाश कर दिया गया है उन मृदितकषाय योग्य शिष्य नारदजीको अविद्यारूप तमसे पार परमार्थतत्त्वको दिखलाया। वह दिखानेवाला कौन था ? भगवान्—“जो भूतोंकी उत्पत्ति, प्रलय, आय-व्यय तथा विद्या-अविद्याको जानता है उसे ‘भगवान्’ कहना चाहिये” ऐसे धर्मोंवाले सनत्कुमारजी। उन सनत्कुमारदेवको ही विद्वान् लोग ‘स्कन्द’ ऐसा कहते हैं। ‘तं स्कन्द इत्याचक्षते’ इसकी द्विरुक्ति अध्यायकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ॥ २ ॥ |


— : ० : —
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये षड्विंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २६ ॥
——
इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीशङ्करभगवतः कृतौ छान्दोग्योपनिषद्विवरणे सप्तमोऽध्यायः समाप्तः ॥ ७ ॥
— : ० : —

अष्टम अध्याय

अष्टम अध्याय

-: ❀ :-

प्रथम खण्ड

दहर-पुण्डरीकमें ब्रह्मकी उपासना

| [अष्टमप्रपाठकारम्भप्रयोजनम्]<br><br>यद्यपि दिग्देशकालादिभेदशून्यं ब्रह्म सत्, एकमेवाद्वितीयमात्मैवेदं सर्वमिति षष्ठसप्तमयोरधिगतं तथापीह मन्दबुद्धीनां दिग्देशादिभेदवद्वस्त्वित्येवं भाविता बुद्धिर्न शक्यते सहसा परमार्थविषया कर्तुमित्यनधिगम्य च ब्रह्म न पुरुषार्थसिद्धिरिति तदधिगमाय हृदयपुण्डरीकदेश उपदेष्टव्यः ।<br><br>यद्यपि सत्सम्यक्प्रत्ययैकविषयं निर्गुणं चात्मतत्त्वं तथापि मन्दबुद्धीनां गुणवत्त्वस्येष्टत्वा- | यद्यपि छठे और सातवें अध्यायमें दिशा, देश और कालादि भेदसे रहित ब्रह्म 'सत् एकमात्र अद्वितीय है,' 'आत्मा ही यह सब है'—ऐसा जाना गया है, तथापि 'यहाँ दिशा और देश आदि भेदयुक्त वस्तु है ही'—इस प्रकारकी भावनासे युक्त मन्दबुद्धि पुरुषोंकी बुद्धि सहसा परमार्थसम्बन्धिनी नहीं की जा सकती और ब्रह्मको जाने बिना पुरुषार्थकी सिद्धि नहीं हो सकती, अतः उसका अनुभव होनेके लिये हृदयकमलरूप देशका उपदेश करना आवश्यक है।<br><br>यद्यपि आत्मतत्त्व सत्, एकमात्र सम्यक् ज्ञानका विषय और निर्गुण है, तो भी मन्दबुद्धि पुरुषोंको उसकी सगुणता ही इष्ट है, इसलिये उसके सत्यसंकल्पादि गुणोंसे युक्त |

छा० उ० २६—

८०४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

८०४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८
संस्कृतहिन्दी
त्सत्यकामादिगुणवत्त्वं च वक्तव्यम् । तथा यद्यपि ब्रह्मविदां स्त्र्यादिविषयेभ्यः स्वयमेवोपरमो भवति तथाप्यनेकजन्मविषयसेवाभ्यासजनिता विषयविषया तृष्णा न सहसा निवर्तयितुं शक्यत इति ब्रह्मचर्यादिसाधनविशेषो विधातव्यः । तथा यद्यप्यात्मैकत्वविदां गन्तृगमनगन्तव्याभावादविद्यादिशेषस्थिति-निमित्तक्षये गगन इव विद्युदुद्भूत इव वायुरुद्धेन्धन इवाग्निः स्वात्मन्येव निवृत्तिस्तथापि गन्तृगमनादिवासितबुद्धीनां हृदयदेशगुणविशिष्टब्रह्मोपासकानां मूर्धन्यया नाड्या गतिर्वक्तव्येत्यष्टमः प्रपाठक आरभ्यते ।होनेका प्रतिपादन करना आवश्यक है । इसी प्रकार यद्यपि ब्रह्मोपासकोंको स्त्री आदि विषयोंसे स्वयं ही उपरति होती है तो भी अनेक जन्मोंके विषयसेवनके अभ्याससे उत्पन्न हुई विषयसम्बन्धिनी तृष्णा सहसा निवृत्त नहीं की जा सकती, इसलिये ब्रह्मचर्यादि साधनविशेषका विधान करना भी आवश्यक है, इसी तरह यद्यपि आत्माका एकत्व जाननेवालोंकी दृष्टिमें गमन करनेवाले, गमनक्रिया और गन्तव्य देशका अभाव हो जानेके कारण शरीरकी स्थितिकी निमित्तभूत अविद्या आदिका क्षय हो जानेपर उनकी विद्युत, बढ़े हुए वायु और जिसका ईंधन जल गया है उस अग्निके आकाशमें लीन हो जानेके समान अपने आत्मामें ही निवृत्ति हो जाती है तो भी जिनकी बुद्धि गन्ता और गमनादिकी वासनासे युक्त है अपने हृदयदेशस्थित गुणविशिष्ट ब्रह्मकी उपासना करनेवाले उन पुरुषोंकी शिरोगत नाडीसे होनेवाली गतिका प्रतिपादन करना आवश्यक है, इसीलिये अष्टम प्रपाठकका आरम्भ किया जाता है ।
दिग्देशगुणगतिफलभेदशून्यं हि परमार्थसदद्वयं ब्रह्म मन्द-दिशा, देश, गुण, गति और फलभेदसे शून्य जो परमार्थ सत्

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यथ ८०५

बुद्धीनामसदिव प्रतिभाति । सन्मार्गस्थास्तावद्भवन्तु; ततः शनैः परमार्थसदपि ग्राहयिष्यामीति मन्यते श्रुतिः ।अद्वितीय ब्रह्म है, वह मन्दबुद्धि पुरुषोंको असत्‌के समान प्रतीत होता है; ये सन्मार्गमें स्थित हों, तब धीरे-धीरे मैं इन्हें परमार्थ सत्‌को भी ग्रहण करा दूँगी--ऐसा श्रुति मानती है।

हरिः ॐ अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन्यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति ॥ १ ॥

अब इस ब्रह्मपुरके भीतर जो यह सूक्ष्म कमलाकार स्थान है इसमें जो सूक्ष्म आकाश है उसके भीतर जो वस्तु है उसका अन्वेषण करना चाहिये और उसीकी जिज्ञासा करनी चाहिये ॥ १ ॥

अथानन्तरं यदिदं वक्ष्यमाणं दहरमल्पं पुण्डरीकं पुण्डरीकसदृशं वेश्मेव वेश्म द्वारपालादिमत्त्वात्; अस्मिन्ब्रह्मपुरे ब्रह्मणः परस्य पुरं राज्ञोऽनेकप्रकृतिमद्यथा पुरं तथेदमनेकेन्द्रियमनोबुद्धिभिः स्वाम्यर्थकारिभिर्युक्तमिति ब्रह्मपुरम् । पुरे च वेश्म राज्ञो यथा तथा तस्मिन् ब्रह्मपुरे शरीरे दहरं वेश्म ब्रह्मण उपलब्ध्यधि-अथ-इसके पश्चात् [ यह कहा जाता है कि ] यह जो आगे कहा जानेवाला दहर अर्थात् छोटा-सा कमल सदृश गृह है-द्वारपालादिसे युक्त होनेके कारण जो गृहके समान गृह है वह इस ब्रह्मपुरमें-ब्रह्म यानी परमात्माके पुरमें, जैसा कि राजाका अनेकों प्रजाओंसे युक्त पुर होता है उसी प्रकार यह ( शरीर ) भी [आत्मारूप] अपने स्वामीका अर्थ सिद्ध करनेवाली अनेकों इन्द्रियों तथा मन और बुद्धिसे युक्त पुर है, अतः यह ब्रह्मपुर है। जिस प्रकार पुरमें राजाका भवन होता है उसी प्रकार उस ब्रह्मपुररूप शरीरमें एक सूक्ष्म गृह अर्थात् ब्रह्मकी उपलब्धिका अधिष्ठान है, जिस प्रकार कि शाल-

| ८०६ | छान्दोग्योपनिषद् | अध्याय ८ |

८०६छान्दोग्योपनिषद्अध्याय ८
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
ष्ठानमित्यर्थः, यथा विष्णोः शालग्रामः ।<br><br>अस्मिन् हि स्वविकारशुङ्गे देहे नामरूपव्याकरणाय प्रविष्टं सदाख्यं ब्रह्म जीवेनात्मनेत्युक्तम् । तस्मादस्मिन्हृदयपुण्डरीके वेश्मन्युपसंहृतकरणैर्बाह्यविषयविरक्तैर्विशेषतो ब्रह्मचर्यसत्यसाधनाभ्यां युक्तैर्वक्ष्यमाणगुणवद्ध्यायमानैर्ब्रह्मोपलभ्यत इति प्रकरणार्थः ।<br><br>दहरोऽल्पतरोऽस्मिन्दहरे वेश्मनि वेश्मनोऽल्पत्वात्तदन्तर्वर्तिनोऽल्पतरत्वं वेश्मनोऽन्तराकाश आकाशाख्यं ब्रह्म । आकाशो वै नामेति हि वक्ष्यति ।<br><br>आकाश इवाशरीरत्वात्सूक्ष्मत्वसर्वगतत्वसामान्याच्च । तस्मिन्ना-ग्रामशिला विष्णुकी उपलब्धिकी अधिष्ठान होती है—ऐसा इसका तात्पर्य है।<br><br>इस अपने विकारभूत कार्य--देहमें सत्संज्ञक ब्रह्म नामरूपकी अभिव्यक्ति करनेके लिये जीवात्मभावसे अनुप्रविष्ट है—यह कहा जा चुका है। इसीसे जिन्होंने इस हृदयकमलरूप भवनमें अपने इन्द्रियवर्गका उपसंहार कर दिया है उन बाह्य विषयोंसे विरक्त, विशेषतः ब्रह्मचर्य एवं सत्यरूप साधनोंसे सम्पन्न तथा आगे बतलाये जानेवाले गुणोंसे युक्त पुरुषोंद्वारा चिन्तन किये जानेपर ब्रह्मकी उपलब्धि होती है—ऐसा इस प्रकरणका तात्पर्य है।<br><br>इस सूक्ष्म गृहमें दहर—अत्यन्त सूक्ष्म अन्तराकाश यानी आकाशसंज्ञक ब्रह्म है। गृह सूक्ष्म होनेके कारण उसके अन्तर्वर्ती आकाशका सूक्ष्मतरत्व सिद्ध होता है। 'आकाश ही नाम-रूपका निर्वाह करनेवाला है' ऐसा श्रुति कहेगी भी। आकाशके समान अशरीर होनेके कारण तथा सूक्ष्मत्व और सर्वगतत्वमें उससे समानता होनेके कारण [ उसे आकाश कहा

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८०७


काशाख्ये यदन्तर्मध्ये तदन्वेष्टव्यम् । तद्भाव तदेव च विशेषेण जिज्ञासितव्यं गुर्वाश्रयश्रवणाद्युपायैरन्विष्य च साक्षात्करणीयमित्यर्थः ॥ १ ॥गया है ] । उस आकाशसंज्ञक तत्त्वके भीतर जो वस्तु है, उसका अन्वेषण करना चाहिये, तथा उसीकी विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये, अर्थात् गुरुके आश्रय तथा श्रवणादि उपायोंसे अन्वेषण करके उसका साक्षात्कार करना चाहिये—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ १ ॥

—:०:—

तं चेद्ब्रूयुर्यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः किं तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्यं यद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति स ब्रूयात् ॥ २ ॥

उस (गुरु) से यदि [ शिष्यगण ] कहें कि इस ब्रह्मपुरमें जो सूक्ष्म कमलाकार गृह है उसमें जो अन्तराकाश है उसके भीतर क्या वस्तु है जिसका अन्वेषण करना चाहिये अथवा जिसकी जिज्ञासा करनी चाहिये?—तो [ इस प्रकार पूछनेवाले शिष्योंके प्रति ] वह आचार्य यों कहे ॥ २ ॥

तं चेदेवमुक्तवन्तमाचार्यं यदि ब्रूयुरन्तेवासिनश्चोदययुः, कथम् ? यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे परिच्छिन्नेऽन्तर्दहरं पुण्डरीकं वेश्म ततोऽप्यन्तरल्पतर एवाकाशः । पुण्डरीक एव वेश्मनि तावत्किंइस प्रकार कहनेवाले उस आचार्यसे यदि शिष्यगण कहें अर्थात् शङ्का करें, किस प्रकार शङ्का करें?—इस परिच्छिन्न ब्रह्मपुरमें जो यह अन्तर्वर्ती कमलाकार सूक्ष्म गृह है उसके भीतर तो उससे भी सूक्ष्मतर आकाश है । प्रथम तो उस कमलाकार गृहमें ही क्या वस्तु रह सकती है ? फिर उससे भी

| १०८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |

१०८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८
स्यात् । किं ततोऽल्पतरे खे यद्द्भवेदित्याहुः । दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः किं तदत्र विद्यते न किञ्चन विद्यत इत्यभिप्रायः । <br><br> यदि नाम बदरमात्रं किमपि विद्यते किं तस्यान्वेषणेन विजिज्ञासनेन वा फलं विजिज्ञासितुः स्यात् ? अतो यत्तत्रान्वेष्टव्यं विजिज्ञासितव्यं वा न तेन प्रयोजनमित्युक्तवतः स आचार्यो ब्रूयादिति श्रुतेर्वचनम् ॥ २ ॥अल्पतर आकाशमें जो हो ऐसी क्या वस्तु हो सकती है ?--इस प्रकार यदि वे पूछें। अभिप्राय यह है कि इस हृदयपुण्डरीकके भीतर जो आकाश है वह सूक्ष्म है, उसमें क्या वस्तु हो सकती है ? अर्थात् कुछ भी नहीं हो सकती। <br><br> यदि बेरके समान कोई वस्तु हो भी तो उसकी खोज अथवा जिज्ञासा करनेसे जिज्ञासुको फल भी क्या होगा ? अतः वहाँ जो खोज करने योग्य अथवा जिज्ञासा करने योग्य वस्तु है उससे हमें कोई प्रयोजन नहीं है तो इस प्रकार कहनेवाले शिष्योंसे आचार्यको इस प्रकार कहना चाहिये—यह श्रुतिका वाक्य है ॥ २ ॥
शृणुत, तत्र यद्ब्रूथ पुण्डरीकान्तःखस्याल्पत्वात्तत्स्थमल्पतरं स्यादिति, तदसत् । न हि खं पुण्डरीकवेश्मगतं पुण्डरीकादल्पतरं मत्वावोचं दहरोऽस्मिन्नन्तराकाश इति । किन्तर्हि ? पुण्डरीकमल्पं तदनुविधायिसुनो, इस विषयमें तुम जो कहते हो कि हृदयपुण्डरीकान्तर्गत आकाश सूक्ष्म होनेके कारण उसका अन्तर्वर्ती ब्रह्म और भी सूक्ष्म होगा, वह ठीक नहीं। मैंने हृदयपुण्डरीकान्तर्गत आकाशको हृदयकमलसे सूक्ष्मतर मानकर यह नहीं कहा कि इसका अन्तर्वर्ती आकाश सूक्ष्म है। तो क्या बात है ?—हृदयकमल सूक्ष्म है उसका अनुवर्तन

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८०९


| तत्स्थमन्तःकरणं पुण्डरीकाकाश- | करनेवाला उसका अन्तर्वर्ती अन्तः- | | परिच्छिन्नं तस्मिन्विशुद्धे संहृत- | करण उस पुण्डरीकाकाशसे परि- | | करणानां योगिनां स्वच्छ इवो- | च्छिन्न है। जिन्होंने अपनी इन्द्रि- | | दके प्रतिबिम्बरूपमादर्श इव च | योंका उपसंहार कर लिया है उन | | शुद्धे स्वच्छं विज्ञानज्योतिः- | योगियोंको उस विशुद्ध अन्तःकरणमें | | स्वरूपावभासं तावन्मात्रं ब्रह्मो- | जलमें प्रतिबिम्बके समान तथा | | पलभ्यत इति दहरोऽस्मिन्नन्तरा- | स्वच्छ दर्पणमें रूपके समान विशुद्ध | | काश इत्यवोचामान्तःकरणोपा- | विज्ञानज्योतिःस्वरूपसे प्रतीत होने- | | धिनिमित्तम्; स्वतस्तु-- | वाला ब्रह्म उसीके बराबर उपलब्ध | | | होता है। इसीसे अन्तःकरणरूप | | | उपाधिके कारण हमने यह कहा | | | था कि इसका अन्तर्वर्ती आकाश | | | अन्तःकरणरूप उपाधिके कारण | | | सूक्ष्म है; स्वयं तो— |

यावान्वा अयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाश उभे अस्मिन्द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राणि यच्चास्येहास्ति यच्च नास्ति सर्वं तदस्मिन्समाहितमिति ॥ ३ ॥

जितना यह [ भौतिक ] आकाश है उतना ही हृदयान्तर्गत आकाश है। द्युलोक और पृथिवी—ये दोनों लोक सम्यक् प्रकारसे इसके भीतर ही स्थित हैं। इसी प्रकार अग्नि और वायु—ये दोनों, सूर्य और चन्द्रमा—ये दोनों तथा विद्युत् और नक्षत्र एवं इस आत्माका जो कुछ इस लोकमें है और जो नहीं है वह सब सम्यक् प्रकारसे इसीमें स्थित है ॥ ३ ॥

८१० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

८१०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

| यावान्वै प्रसिद्धः परिमाणतोऽयमाकाशो भौतिकस्तावतानेषोऽन्तर्हृदय आकाशो यस्मिन्नन्वेष्टव्यं विजिज्ञासितव्यं चावोचाम । नाप्याकाशतुल्यपरिमाणत्वमभिप्रेत्य तावानित्युच्यते। किं तर्हि ? ब्रह्मणोऽनुरूपस्य दृष्टान्तान्तरस्याभावात् । कथं पुनराकाशसममेव ब्रह्मेत्यवगम्यते । “येनावृतं खं च दिवं महीं च” ( महानारा० उ० १।३ ) “तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः ।” (तै०उ० २।१।१) “एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाशः ।” (बृ०उ० ३।८।११)<br><br>इत्यादिश्रुतिभ्यः ।<br>किञ्चोभे अस्मिन्द्यावापृथिवी ब्रह्माकाशे बुद्धद्युपाधिविशिष्टे अन्तरेव समाहिते सम्यगाहिते स्थिते। यथा वा अरा नाभावित्युक्तं हि । तथोभावग्निश्च वायुश्चेत्यादि | परिमाणमें जितना यह भौतिक आकाश प्रसिद्ध है उतना ही यह हृदयान्तर्गत आकाश है, जिसके विषयमें कि हमने 'अन्वेषण करना चाहिये तथा जिज्ञासा करनी चाहिये' ऐसा कहा था । [ यही नहीं ] 'ब्रह्मको आकाशके समान परिमाणवाला मानकर भी ऐसा नहीं कहा जाता । तो फिर क्या बात है ? — ब्रह्मके अनुरूप कोई अन्य दृष्टान्त न होनेके कारण ऐसा कहा जाता है । [ प्रश्न] किंतु ब्रह्म आकाशके समान ही नहीं है—यह कैसे जाना जाता है ? [उत्तर] 'जिसने आकाश, द्युलोक और पृथ्वीको आवृत किया हुआ है” “उस इस आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ” “हे गार्गि ! इस अक्षरमें ही आकाश स्थित है” इत्यादि श्रुतियोंसे यह बात सिद्ध होती है ।<br>यही नहीं, इस बुद्धयुपाधिविशिष्ट ब्रह्माकाशके भीतर ही द्युलोक और पृथिवी समाहित—सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं; जिस प्रकारकी नाभिमें अरे—ऐसा पहले कह ही चुके हैं। इसी प्रकार अग्नि और वायु —ये दोनों भी |

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८११


समानम् । यच्चास्यात्मन आत्मीयत्वेन देहवतोऽस्ति विद्यत इह लोके, तथा यच्चात्मीयत्वेन न विद्यते; नष्टं भविष्यच्च नास्तोत्युच्यते । न त्वत्यन्तमेवासत्, तस्य हृद्याकाशे समाधानानुपपत्तेः ॥ ३ ॥स्थित हैं—इत्यादि शेष वाक्यका तात्पर्य भी इसीके समान है । इस देहवान् आत्माका आत्मीयरूपसे जो कुछ पदार्थ इस लोकमें है ओर जो कुछ 'आत्मीयरूपसे [ इस समय ] नहीं है, नष्ट हो गया है अथवा भविष्यमें नहीं होगा'—ऐसा कहा जाता है [ वह सब सम्यक् प्रकारसे इसीमें स्थित है ] । यहाँ अत्यन्त असत् वस्तुसे अभिप्राय नहीं है, क्योंकि उसकी तो हृदयाकाशमें स्थिति होनी ही सम्भव नहीं है ॥ ३ ॥

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तं चेद्ब्रूयुरस्मिँश्चेदिदं ब्रह्मपुरे सर्वँसमाहितँ सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामा यदैतज्जरा वाप्नोति प्रध्वँसते वा किं ततोऽतिशिष्यत इति ॥ ४ ॥

उस आचार्यसे यदि शिष्यगण कहें कि यदि इस ब्रह्मपुरमें यह सब समाहित है तथा सम्पूर्ण भूत और समस्त कामनाएँ भी सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं तो जिस समय यह वृद्धावस्थाको प्राप्त होता अथवा नष्ट हो जाता है उस समय क्या शेष रह जाता है ? ॥ ४ ॥

तं चेदेवमुक्तवन्तं ब्रूयुः पुनरन्तेवासिनोऽस्मिंश्चेद्यथोक्ते चेद्यदि ब्रह्मपुरे ब्रह्मपुरोपलक्षितान्तराकाशकिंतु यदि इस प्रकार कहनेवाले उस आचार्यसे शिष्यगण कहें कि यदि इस ब्रह्मपुरमें अर्थात् ब्रह्मपुरोपलक्षित अन्तराकाशमें यह सब सम्यक् प्रकारसे स्थित है तथा