गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१८३- छन्द-विधान (समवृत्तलक्षण)
| ३६४ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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त्रिवृत्—ये सभी शब्द एक औषधिके वाचक हैं। सप्तला, यवतिक्ता, चर्मा और चर्मकसा—ये सभी नाम समान औषधिके माने गये हैं। अक्षिपीलुको शंखिनी, सुकुमारी और तिक्ताक्षी कहा जाता है। अपराजिता नामक औषधिके पर्यायवाची शब्द हैं गवाक्षी, अमृता, श्वेता, गिरिकर्णी तथा गवादिनी। काम्पिल्लको रक्ताङ्ग, गुण्डा और रोचनिका कहा जाता है। हेमक्षीरी या स्वर्णक्षीरी नामकी औषधिको पीता, गौरी तथा कालदुग्धिका नामसे स्वीकार किया गया है। गाङ्गेरुकी, नागबला, विशाला और इन्द्रवारुणी अर्थात् इन्द्रायण एक ही औषधिके वाचक हैं। रसांजन नामक औषधिके पर्याय हैं तार्क्ष्य, शैल, नीलवर्ण तथा अंजन। शाल्मली या सेमरवृक्षके निर्यासको मोचरसके* नामसे अभिहित किया जाता है। प्रत्यक्पुष्पीको खरी और अपामार्गको मयूरक कहा गया है। जंगली अडूसाका नाम है सिंहास्य वृषवासाक तथा आटरूष। जीवशाक नामक औषधिको जीवक और कर्बुरको शटी नामसे भी कहा गया है। कट्फलका नाम सोमवृक्ष तथा अग्निगन्धाका नाम सुगन्धिका भी है। सौंफको शताङ्ग और शतपुष्पा कहा जाता है। मिसिको मधुरिका माना गया है। पुष्करमूलको पुष्कर तथा पुष्कराह्वय नामसे भी स्वीकार करना चाहिये। यास नामक औषधिके पर्यायवाची शब्द हैं धन्वयास, दुष्पर्श और दुरालभा। वाकुची अर्थात् वकुची, सोमराजी और सोमवल्ली एक ही औषधिके नाम हैं। भँगरइयाको मार्कव, केशराज तथा भृंगराज कहा जाता है।
एडगज नामक औषधिको आयुर्वेद एवं वनस्पतियोंके विद्वान् चक्रमर्दक या चकवड़ कहते हैं। काकतुण्डी नामक औषधिके वाचक हैं सुरंगी, तगर, स्नायु, कलनाशा और वायसी। महाकालको बेल तथा तण्डुलीयको घनस्तन कहा जाता है। इक्ष्वाकुको तिक्ततुम्बी और तिक्तालापु कहा जाता है। धामार्गवको कोषातकी तथा यामिनी कहा जाता है। कृतभेद नामक इस कोषातकी औषधिका एक अन्य भेद है। देवताडक नामक वृक्षके पर्याय हैं जीमूतक तथा खुड्डक। गृध्रादना, गृध्रनखी, हिङ्गु और काकादनी शब्द हींगके वाचक माने जाते हैं। करवीर (कनेर)-का पर्यायवाची शब्द है अश्वारि तथा अश्ममारक।
सेंधानमकको सिन्धु, सैन्धव, सिन्धूथ तथा मणिमन्थ कहा जाता है। यवक्षार लवणका नाम है क्षार और यवाग्रज। सज्जी या छज्जी मिट्टीका नाम है सर्जिका एवं सर्जिकाक्षार। काशीशके नाम हैं पुष्पकाशीश, नेत्रभेषज, धातुकाशीश और काशी। यह पुष्प एवं धातुभेदसे दो प्रकारका है। पङ्कपर्पटी (गुजराती मिट्टी)-को सौराष्ट्री, मृत्तिकाक्षार तथा काक्षी कहा जाता है। स्वर्णमाक्षिका नामक मिट्टीके पर्याय हैं माक्षिक, ताप्य, ताप्युत्थ और ताप्यसम्भवा। मनःशिला या मैनसिलका नाम है शिला। नेपाली मनःशिलाको कुलटी कहा जाता है। हरितालके लिये आल अथवा मनस्ताल नाम प्रयुक्त होता है। गन्धक, गन्धपाषाण तथा रस पारद या पारा कहलाता है। ताँबेके वाचक हैं ताम्र, औदुम्बर, शुल्ब और म्लेच्छमुख। लोहेको अद्रिसार, अयस्, लोहक तथा तीक्ष्ण भी कहा जाता है।
मधु शब्दके पर्यायवाची हैं माक्षिक, मधु, क्षौद्र और पुष्परस। इसके दो उपभेद हैं—ज्येष्ठी मधु तथा उदकी मधु। काँजीको सुवीरक नामसे अभिहित किया गया है। शर्कराको सिता, सितोपला और मत्स्याण्डीके नामसे कहा जाता है।
* सेमलके गोंदको मोचरस कहते हैं।
काण्ड ] * औषधियोंके पर्यायवाची नाम * ३६५
त्रिसुगन्धि नामक औषधिका निर्माण दारुचीनी नामक वृक्षकी छाल, इलायची तथा तेजपत्ताको समान मात्रामें मिलानेपर होता है, इसे त्रिजातक कहा जाता है, उसमें नागकेशरका मिश्रण कर देनेपर वह चतुर्जातक कहलाता है। पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक और नागरके मिश्रित स्वरूपको पञ्चकोल और कोल कहा जाता है।
प्रियंगुको कंगुका (काकुन) तथा कोद्रव या कोदोको कोरदूषके नामसे जानना चाहिये। त्रिपुट्का नाम पुट है और कलापका लङ्कक नाम स्वीकार किया गया है। वेणु अर्थात् बाँसको सतीन तथा वर्तुल भी कहा जाता है।
पिचुक, पित्तल, अक्ष और विडालपदक शब्द तौल-परिमाणमें एक कर्ष (सोलह मासा)-के वाचक हैं। सुवर्ण तथा कवलग्रहका बराबर मान है। पलार्ध अर्थात् आधा पल, एक शुक्ति तथा आठ माषक भारमें समान है। पल,बिल्व और मुष्टिका परिमाण समान होता है। दो पलकी मात्राको प्रसुति अर्थात् एक पसर कहा गया है। अंजलि और कुडवका मान चार पलके बराबर होता है। आठ पलको अष्टमान कहा जाता है, उसे मान भी कहा गया है। चार कुडवका एक प्रस्थ (एक सेर) और चार प्रस्थका एक आढक अर्थात् एक अढैया होता है। इसीको एक काशपात्र कहा गया है। चार आढकका एक द्रोण होता है। एक सौ पलका एक तुला और बीस पलका एक भाग माना गया है। विद्वानोंने प्रस्थ आदिकी मात्रामें प्राप्त होनेवाले द्रव्योंका मान तो इस प्रकारसे कहा है, किंतु द्रव-पदार्थोंकी मात्राको उसका दुगुना स्वीकार किया गया है।
भद्रदारु, देवकाष्ठ तथा दारु देवदारुके वाचक हैं। कुष्ठको आमय और मांसीको नलदंश कहा गया है। शंख नामक औषधिका नाम शुक्तिनख है तथा व्याघ्र नामकी औषधि व्याघ्रनखी या व्याघ्रनख शब्दसे कही गयी है। गुग्गुल नामकी औषधिके वाचक पुर, पलङ्कष तथा महिषाक्ष शब्द हैं। रस गन्ध-रसका पर्यायवाची है, इसीको बोल भी कहा जाता है। सर्ज अर्थात् राल सर्जरसका बोधक है। प्रियङ्गु फलिनी, श्यामा, गौरी और कान्ता—इन नामोंसे अभिहित किया जाता है। करंज या कंजेका नाम नक्तमाल, पूतिक तथा चिरबिल्वक है। शिग्रु शोभाञ्जन तथा रोनमान नामसे प्रसिद्ध है। इसे सहिजन भी कहा जाता है। सिन्धुवार नामक औषधिके वाचक हैं—जया, जयन्ती, शरणी और निर्गुण्डी। मोरटा नामक औषधि पीलुपर्णी (मूर्वा) है तथा तुण्डीका नाम तुण्डिकेरी है।
मदन-वृक्षको गालव बोधा, घोटा और घोटी कहा जाता है। चतुरङ्गुल नामक औषधि सम्पाक तथा व्याधिघातक नामसे भी प्रसिद्ध है। आरग्वधका नाम राजवृक्ष और रैवत है। दन्तीको लोग काकेन्दु, तिक्ता, कण्टकी और विकङ्कत कहते हैं। निम्बको अरिष्ट कहा गया है तथा पटोलका एक नाम कोलका (परवल) है। वयस्थाका नाम विशल्या, छिन्ना और छिन्नरुहा है। गुडूचीके पर्यायवाची हैं—वशा, दन्ती तथा अमृता। किराततिक्तका नाम भूनिम्ब और काण्डतिक्त है।
सूतजीने कहा— हे शौनक ! ये सभी नाम वनमें उत्पन्न होनेवाली औषधियोंके हैं। इन्हीं वनस्पतियोंका वर्णन भगवान् श्रीहरिने शिवजीसे किया था। अब मैं कुमार अर्थात् भगवान् स्कन्दके द्वारा कहे गये व्याकरणशास्त्रको बतलाऊँगा, उसे आप ध्यानपूर्वक सुनें।
(अध्याय २०४)
३६६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार-
व्याकरण-निरूपण
कुमारने कहा— हे कात्यायन! अब मैं संक्षेपमें व्याकरणके विषयमें बतला रहा हूँ। यह व्याकरणसे सिद्ध शब्दोंके ज्ञानके लिये तथा बालकोंकी व्युत्पत्ति-प्रक्रिया बढ़ानेके लिये है।
सुबन्त और तिङन्त—ये दो प्रकारके पद होते हैं। सुप् प्रत्यय सात विभक्तियोंमें बँटे हैं। सु, औ, जस्—यह प्रथमा विभक्ति है। प्रथमा विभक्ति प्रातिपदिकार्थमें, सम्बोधन-अर्थमें, लिङ्गादि-बोधक-अर्थमें तथा कर्मके उक्त होनेपर कर्मवाचक-पदसे और कर्ताके उक्त होनेपर कर्तृवाचक-पदसे होती है। धातु और प्रत्ययसे भिन्न अर्थवान् शब्दस्वरूपकी प्रातिपदिक संज्ञा होती है। अम्, औट्, शस्—यह द्वितीया विभक्ति है। द्वितीया विभक्ति कर्म-अर्थमें होती है। अन्तरा, अन्तरेण पदोंके योगमें भी द्वितीया विभक्ति होती है। टा, भ्याम्, भिस्—यह तृतीया विभक्ति है। तृतीया विभक्ति करण और कर्ता-अर्थमें होती है। क्रिया (फल)-की सिद्धिमें अत्यन्त उपकारक कारककी करण संज्ञा होती है। क्रियाके प्रधान आश्रयको कर्ता कहते हैं। ङे, भ्याम्, भ्यस्—यह चतुर्थी विभक्ति है। चतुर्थी विभक्ति सम्प्रदान कारकके अर्थमें होती है। रुच्यर्थक धातुके योगमें तृप्त होनेवालेकी, ण्यन्त धृ धातुके प्रयोगमें उत्तमर्णकी एवं दानके उद्देश्यकी सम्प्रदान संज्ञा होती है। ङसि, भ्याम्, भ्यस्—यह पञ्चमी विभक्ति है। पञ्चमी विभक्ति अपादान कारकके अर्थमें होती है। जिससे पृथक् हुआ जाता है, जिससे लिया जाता है, जिसके समीपसे लिया जाता है या जो भयका हेतु होता है, उसकी अपादान संज्ञा होती है। ङस्, ओस् और आम्—यह षष्ठी विभक्ति है। यह विभक्ति मुख्यरूपसे स्व-स्वामिभाव-सम्बन्धमें होती है। वस्तुतः सम्बन्ध सामान्य षष्ठीका अर्थ है। [ इस सम्बन्धमें 'एकशतं षष्ठ्यर्थाः' (षष्ठी विभक्तिके सौ अर्थ होते हैं) यह भाष्य अनुसंधेय है।] ङि, ओस्, सुप्—यह सप्तमी विभक्ति है। सप्तमी विभक्ति अधिकरण-अर्थमें हुआ करती है। आधारकी अधिकरण संज्ञा होती है। आधार औपश्लेषिक, वैषयिक और अभिव्यापक-भेदसे तीन प्रकारका होता है। वारणार्थक धातुके योगमें ईप्सित और अनीप्सितकी भी अपादान संज्ञा होती है। वारणार्थक धातुके प्रयोगमें जो ईप्सित अभीष्ट हो उसकी अपादान संज्ञा होती है तथा अनीप्सित (अनीच्छित)-की कर्म संज्ञा होती है। कर्मप्रवचनीयसंज्ञक परि, अप्, आङ् के योगमें तथा इतर, ऋते (बिना) अन्य-दिक् (दिशा)-वाचक शब्दका योग होनेपर पञ्चमी विभक्ति होती है। प्रत्ययान्तके एन योगमें द्वितीया विभक्ति होती है। कर्मप्रवचनीय-संज्ञक पदोंके योगमें भी द्वितीया विभक्ति होती है। लक्षण-अर्थमें, इत्थम्भूत तथा आख्यान-अर्थमें और वीप्सा-अर्थमें प्रति, परि, अनुकी कर्मप्रवचनीय संज्ञा होती है। हीन-अर्थमें अनुकी अधिक अर्थमें उप उपसर्गकी कर्मप्रवचनीय संज्ञा होती है। अध्ववाचक-शब्दके कर्ममें और गत्यर्थक धातुके कर्ममें द्वितीया तथा चेष्टा-अर्थमें चतुर्थी विभक्ति होती है। दिवादिगणमें पठित मन् धातुके कर्ममें अनादरके तात्पर्यसे अप्राणिवाचक पदमें द्वितीया और चतुर्थी विभक्ति होती है।
नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा, अलम् और वषट्का योग होनेपर तथा तादर्थ्यके योगमें चतुर्थी विभक्ति होती है। भाववाची तदर्थसे विहित तुमुन् प्रत्ययान्तसे चतुर्थी होती है।
सह शब्दसे युक्त और विकृत-अङ्गवाचक शब्दमें तृतीया विभक्ति होती है। कालार्थक तथा
काण्ड ] | व्याकरणसार | ३६७
भावार्थक शब्दोंमें सप्तमी विभक्तिके प्रयोगका विधान है, किंतु षष्ठी विभक्तिका भी प्रयोग इन अर्थोंमें किया जाता है। स्वामी, ईश्वर, अधिपति, साक्षी, दायाद, प्रतिभू और प्रसूत—इन शब्दोंके योगमें षष्ठी एवं सप्तमी विभक्ति होती है। निर्धारण-अर्थमें षष्ठी तथा सप्तमी दोनों विभक्ति होती है। हेतुवाचक शब्दके प्रयोगमें हेतुद्योत्य होनेपर मात्र षष्ठी विभक्ति होती है।
स्मरणार्थक धातुके कर्ममें और प्रतियत्नार्थक कृ धातुके कर्ममें तथा शेषत्वकी विवक्षामें षष्ठी विभक्ति ही होती है। हिंसार्थक जास्, नि पूर्वक और प्र पूर्वक हन् आदि और नाट्, क्राथ् एवं पिष् धातुओंके कर्ममें शेषत्वकी विवक्षामें षष्ठी होती है तथा कृदन्त पदादिके योगमें कर्तृकर्मवाचक-पदसे षष्ठी होती है। निष्ठाप्रत्ययान्तके योगमें कर्तृकर्मवाचक-पदसे षष्ठी विभक्ति नहीं होती।
प्रातिपदिक नाम और नामधातु—इन दो भागोंमें विभक्त हो जाता है। भू आदि धातुओंसे लट् आदि दस लकार होते हैं, जिनके स्थानपर तिङ् प्रत्यय हुआ करते हैं। तिप्, तस्, झि प्रथमपुरुष है। सिप्, थस्, थ मध्यमपुरुष-संज्ञक प्रत्यय हैं और मिप्, वस्, मस् उत्तमपुरुष-संज्ञक प्रत्यय हैं। इन प्रत्ययोंकी परस्मैपद संज्ञा होती है। आत्मनेपदसंज्ञक प्रत्यय त, आताम्, झ की प्रथमपुरुष संज्ञा तथा थास्, आथाम्, ध्वम् की मध्यमपुरुष संज्ञा और इट्, वहिङ्, महिङ् की उत्तमपुरुष संज्ञा होती है। ये परस्मैपद एवं आत्मनेपद प्रत्यय णिच् आदि प्रत्ययोंकी भाँति धातुसे विहित होते हैं।
युष्मद् और अस्मद्से अतिरिक्त क्रियाका कर्ता होनेपर धातुसे प्रथमपुरुष-संज्ञक प्रत्यय होते हैं। कर्ताके रूपमें युष्मद् शब्दका प्रयोग होनेपर मध्यमपुरुष और कर्ताके रूपमें अस्मद् शब्दका प्रयोग होनेपर उत्तमपुरुष होता है। भू आदिकी धातु संज्ञा होती है। सन्, क्यच्, काम्यच् आदि प्रत्यय जिसके अन्तमें हों उनकी भी धातु संज्ञा होती है। लट् लकारका प्रयोग वर्तमान कालके लिये होता है तथा 'स्म'का योग हो जानेपर वही क्रिया भूतकालिक हो जाती है। लिट् भूतकाल (परोक्ष)-के लिये प्रयोज्य है। अनद्यतन भूतके अर्थमें लङ् लकार होता है। आज्ञा तथा आशीर्वादकी क्रियाके निमित्त लोट् आदि लकारोंका प्रयोग होता है। विधि आदि अर्थमें भी लोट्का प्रयोग हो सकता है। विधि, निमन्त्रण, आमन्त्रण, अधीष्ट, सम्प्रश्न तथा प्रार्थनाके अर्थमें जो लिङ् होता है, उसे विधिलिङ् तथा आशीर्वादके अर्थमें जो लिङ् होता है उसे आशीर्लिङ् कहते हैं। भविष्य (सामान्य)-में लृट् लकार होता है और अनद्यतन भविष्यमें लुट् लकार होता है। हेतुहेतुमद्भावके विषयमें क्रियाकी अनिष्पत्ति गम्यमान हो तो भविष्य और भूत-अर्थोंमें लृङ् लकार होता है। लिङ् के अर्थमें लेट् लकार होता है, किंतु इसका प्रयोग केवल वेदमें होता है।
लकार सकर्मक धातुसे कर्ता या कर्म-अर्थमें तथा अकर्मक धातुसे भाव या कर्ता-अर्थमें होते हैं। कृत्संज्ञक प्रत्यय कर्ता अथवा कर्म अथवा भाव-अर्थमें होते हैं। इसी प्रकार तव्यत् आदि कृत्-संज्ञक प्रत्यय तथा अनीयर्, तृच् आदि प्रत्यय होते हैं।
(अध्याय २०५)
व्याकरणसार
**सूतजीने कहा—**हे विप्रो! अब मैं संहिता आदिसे युक्त सिद्ध शब्दोंको बतलाने जा रहा हूँ। आप उसे सुनें—सागता, वीदं, सूत्तमम्, पितृर्षभ, लृकार—इन पदोंमें दीर्घ सन्धि है। लांगलीषा, मनीषा—यहाँ पररूप सन्धि है। इसी प्रकार गंगोदकम् (यहाँ गुण हुआ है।) तवल्कारः (यहाँ गुण),
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ऋर्णार्णम्, प्रार्णम्में (वृद्धि), शीतार्तः में (दीर्घ), सैन्द्री-सौकरमें (वृद्धि), बध्वासन, पित्रर्थ, लनुबन्धमें (यण्), नायकः, लवणम्, गावःमें (अयादि), एते (गुण) त ईश्वराःमें (अय् और यलोप्) (ये शब्द स्वरसन्धिके उदाहरण हैं।) देवी गृहमथो अत्र अ अवेहि पटू इमौ (इनमें प्रकृति भाव है।), अश्वाः षडस्य (जश्त्वा), तन्न (अनुनासिक), वाक् (चर्त्व), षड्दलानि (जश्त्वा), तच्चरेत् (श्रुत्व-चर्त्व), तल्लुनाति (परसवर्ण), तज्जलम् (श्रुत्व), तच्छमशानकम् (छत्व-श्रुत्व), सुगण्णण्त्र, पचन्नन्न्र (नुट् आगम), भवांश्छादयति (अनुस्वार सुट्-श्रुत्व), भवाञ्झनकरः (परसवर्ण), भवांस्तरति, (अनुस्वार-सुट्), भवाँल्लिखति (परसवर्ण), ताञ्छक्रे (श्रुत्व), भवाञ्शेते (श्रुत्व) भवाण्डीनं त्वन्तरसि त्वङ्करोषि (परसवर्ण) (ये व्यञ्जनसन्धिके उदाहरण हैं), सदार्चनम् (दीर्घ), कश्चरेत् (श्रुत्व) कृष्टकारेण (ष्टुत्व), कःकुर्यात् कःफले (जिह्वामूलीय विसर्ग) कश्शेते (श्रुत्व), कष्षण्डः (ष्टुत्व), कस्कः (सत्त्व), क इहात्र क एवाहु—र्देवा आहुः, भो व्रज (रुत्व, यत्व, यलोप्), स्वयम्भूविष्णुर्व्रजति (रुत्व) गीष्पतिः (षत्व), धूर्पतिः (रुत्व), कुटीच्छाया (तुक्-श्रुत्व), तथाच्छाया (तुक्-विकल्प)—ये विसर्ग-सन्धिके उदाहरण हैं।
समास छः प्रकारके होते हैं (द्वन्द्व, द्विगु, तत्पुरुष, कर्मधारय, बहुव्रीहि, अव्ययीभाव)। स द्विजः=सद्विज (कर्मधारय), त्रिवेद (त्रयाणां वेदानां समाहारः द्विगु) तत्कृतः तदर्थः वृकभीतिः, यद्धनम् ज्ञानदक्षः (इनमें क्रमशः तेन कृतः, तस्मै अर्थः, वृकाद् भीतिः, यस्य धनम्, ज्ञानेदक्षः इस व्युत्पत्तिसे तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी तथा सप्तमी तत्पुरुष समास है।) तत्त्वज्ञमें बहुव्रीहि तथा अधिमानमें अव्ययीभाव समास है। देवर्षिमानवाःमें देवश्च ऋषिश्च मानवश्च इस व्युत्पत्तिसे द्वन्द्व समास है।
'पाण्डव (पाण्डोः अपत्यमिति पाण्डवः इत्यर्थे अण्)<sup>१</sup>', शैव (शिवो देवताऽस्य इत्यर्थे अण्)<sup>१</sup>, ब्राह्म्यम् (ब्राह्मणः भावः कर्म इत्यर्थे ष्यञ्)<sup>२</sup>, तथा ब्रह्मता (ब्राह्मणःभावः इत्यर्थे तल्)<sup>३</sup>, आदि तद्धित प्रत्ययान्त शब्द हैं।
देव, अग्नि, सखि, पति, अंश, क्रोष्टा (सियार), स्वायम्भुव, पितृ, नृ, प्रशस्ता (प्रशंसक), रै (धन), गौ और ग्लौ (चन्द्रमा)—ये अत्यन्त पुँल्लिङ्गके सिद्ध शब्द हैं। अश्वयुक् (घोड़ेसे युक्त), क्ष्माभुक् (पृथ्वीका उपभोग करनेवाला राजा), मरुत् (पवन), क्रव्याद, मृगव्यध (मृगका पीछा करनेवाला शिकारी), आत्मन्, राजन् (राजा), यव, पन्था (मार्ग), पूषन् (सूर्य), ब्रह्महन् (ब्राह्मणको मारनेवाला ब्रह्मघाती), हलिन् (हल धारण करनेवाला मनुष्य), विट् (जार पुरुष), वेधस् (विधाता), उशनस् (उशना-शुक्राचार्य), अनड्वान् (गाड़ी खींचनेवाला बैल), मधुलिट् (शहद चाटनेवाला भौंरा) तथा काष्ठतृट् (कठफोर पक्षी या बढ़ई)—ये हलन्त् पुँल्लिङ्गके अन्तर्गत आनेवाले सिद्ध शब्द हैं।
वन (जंगल), वारि (जल), अस्थि (हड्डी), वस्तु (सामग्री), जगत् (संसार), साम्, अहः, कर्म, सर्पिष् (घी), वपुष् (शरीर), तेजस् (ऊर्जा)—ये आदिके चार शब्द अजन्त और शेष हल् प्रत्ययान्त नपुंसकलिंगके सिद्ध रूप हैं।
जाया (पत्नी), जरा (वृद्धावस्था), नदी, लक्ष्मी, श्री, स्त्री, भूमि, वधू, भ्रू (भौंह), पुनर्भू (पुनर्जन्म), धेनु (गौ), स्वसा (बहन), मातृ (माता) तथा नौ
१. शिवादिभ्योऽण् (पा०सू० ४।१।११२)
२. गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च (पा०सू० ५।१।१२४)
३. तस्य भावस्त्वतलौ (पा०सू० ५।१।११९)
काण्ड ] छन्द-विधान [ ३६९
(नौका)—ये अजन्त स्त्रीलिङ्गमें सिद्ध रूप हैं।
वाक् (वाणी), स्रक् (माला), दिक् (दिशा), मुद् (मुदा-प्रसन्नता), क्रुध् (क्रोध), युवति, ककुभ्, द्यौ (आकाश), दिव् (स्वर्ग), प्रावृट् (वर्षा), सुमना और उष्णिक्—ये हलन्त स्त्रीलिङ्गके सिद्ध रूप हैं।
अब मैं आपको गुण, द्रव्य और क्रियाके योगसे बननेवाले स्त्रीलिङ्गके शब्दोंको भी बता रहा हूँ।
शुक्ल (श्वेत), कीलालक (अमृतके समान पेय पदार्थ), शुचि (पवित्रता), ग्रामणी (गाँवका अधिकारी), सुधी (विद्वान्), पटु (चतुर), कमलभू (कमलसे उत्पन्न ब्रह्मा या पराग), कर्तृ (कर्ता), सुमत (सुन्दर विचारोंवाला पुरुष), सूनु (पुत्र), सत्या, अभक्ष (न खाने योग्य), दीर्घपा, सर्वविश्वा, उभय (दो), उभौ, एक, अन्या (दूसरी) और अन्यतरा (दूसरेमें प्रमुख)—ये सब गुणप्रधान शब्द हैं, जो स्त्रीलिङ्गमें बनते हैं।
इसके बाद डतर (उच्चतर), डतम (उच्चतम), नेम, तु (तो), सम (समान), अथ (तदनन्तर), सिम (प्रत्येक), इतर (अतिरिक्त), पूर्व (प्राचीन), अधः (नीचे), च (और), दक्षिण (दक्षिण दिशा), उत्तर (उत्तर दिशा), अवर (अधम), पर (दूसरे), अन्तर, एतद् (यह), यद्यत् (जो-जो), किं (क्या), अदस् (यह), इदम् (यह), युष्मत् (तुम), अस्मत् (मैं-हम), तत् (वह), प्रथम (पहला), चरम (अन्तिम), अल्पतया (संक्षेप), अर्ध (आधा), तथा (और), कतिपय (कुछ), द्वौ (दो), चेति (और ऐसा), एवं (इस प्रकार)—ये सभी शब्द सर्वनाम हैं। इनको सर्वादिगणमें परिगृहीत किया गया है।
शृणोति (सुनता है), जुहोति (हवन करता है), जहाति (परित्याग करता है), दधाति (धारण करता है), दीप्यति (तेजस्वी बन रहा है), स्तयति (स्तुति करता है), पुत्रीयति (पुत्रके समान व्यवहार करता है), धनीयति (धनवान् बन रहा है), त्र्युट्यति, म्रियते (मर रहा है), चिचीर्षति (संग्रहकी इच्छा कर रहा है) तथा निनीषति (ले जानेकी इच्छा कर रहा है)—ये कतिपय तिङन्तके सिद्ध रूप शब्द हैं।
‘सर्व’ शब्दके प्रथमा विभक्तिके बहुवचनमें ‘सर्वे’, चतुर्थी विभक्तिके एकवचनमें ‘सर्वस्मै’, पञ्चमी विभक्तिके एकवचनमें ‘सर्वस्मात्’, षष्ठी विभक्तिके बहुवचनमें ‘सर्वेषाम्’ रूप बनता है। इसी प्रकार विश्व आदि शब्दोंके रूपोंको भी आप जानें। पहले कहे गये ‘पूर्व’ शब्दके प्रथमा विभक्तिके बहुवचनमें ‘पूर्वे, पूर्वाः’ पञ्चमी विभक्तिके एकवचनमें ‘पूर्वस्मात्’ और सप्तमी विभक्तिके एकवचनमें ‘पूर्वस्मिन्’ रूप बनता है।
सूतजीने कहा— हे ऋषियो! सुबन्त और तिङन्त पदोंके सिद्धरूपका वर्णन नाममात्र ही किया गया है। कुमारसे इस व्याकरणको सुनकर कात्यायनने इसको विस्तारपूर्वक कहा था।
(अध्याय २०६)
छन्द-विधान
सूतजीने कहा— अब मैं वासुदेव, गुरु, गणपति, शम्भु और सरस्वतीको नमस्कार करके अल्प बुद्धिवालोंके लिये विशिष्ट बुद्धिकी प्राप्ति-हेतु मात्रा और वर्णके भेदके अनुसार छन्द-विधानको कहता हूँ।
सभी गणोंमें आदि, मध्य और अन्त होता है। इसके अतिरिक्त इनमें गुरु तथा लघु होते हैं। (इन्हीं गुरु तथा लघु वर्णोंसे आठ गणोंकी रचना हुई है,
१८४- छन्द-विधान (अर्धसमवृत्त लक्षण)
३७० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार-
जो यगण, मगण, तगण, रगण, जगण, भगण, नगण और सगण हैं ।) लघु (ह्रस्व)-वर्णको ल एवं दीर्घ वर्णको ग कहा गया है। तीन गुरुवर्ण (ऽऽऽ)-को 'मगण', तीन लघुवर्ण ( ।।।)-को 'नगण', प्रथम गुरु और दो लघु (ऽ।।) होनेपर 'भगण', आदि लघु और इसके बाद दो गुरु (।ऽऽ) होनेपर 'यगण', दो आगे-पीछे लघु और मध्यवर्ण गुरु (।ऽ।) होनेपर 'जगण', मध्यवर्ण लघु और दोनों ओर दो वर्ण गुरु (ऽ।ऽ) होनेपर 'रगण', अन्तवर्ण गुरु और उसके पूर्वके दो वर्ण लघु (।।ऽ) होनेपर 'सगण' तथा अन्तवर्ण लघु और उसके पूर्व दो वर्ण गुरु (ऽऽ।) होनेपर 'तगण'—इस प्रकार तीन-तीन वर्णका एक-एक गण होता है। आर्या छन्द चतुष्कला है, इसके आदि, अन्त तथा मध्य सभी जगह चार-चार गण रहते हैं। व्यञ्जनान्त, विसर्गान्त, अनुस्वारयुक्त, दीर्घ एवं संयुक्त वर्णका पहला वर्ण गुरु होता है। पदके अन्तमें स्थित वर्ण विकल्पसे गुरु होता है। गुरुवर्ण दीर्घ मात्रावाला होता है। श्लोककी श्रवणकी मधुरता आदिके लिये कभी-कभी गुरुवर्ण भी लघुके रूपमें व्यवहृत होता है। छन्दोंको श्लोक तथा आर्यादिके नामोंसे अभिहित किया जाता है। विच्छेद स्थानको यति (विराम) कहा जाता है। इसका नाम विच्छेदन भी है। निर्दिष्ट स्थानमें यति न होनेपर यतिच्छेद या यतिभङ्ग होता है। श्लोकके चतुर्थांशको पाद कहा जाता है। समान अर्थात् द्वितीय और चतुर्थ पादको युक् कहा जाता है। विषम अर्थात् प्रथम और तृतीय पादको अयुक् कहा जाता है, वृत्त अर्थात् जिसकी अक्षर-संख्या निर्दिष्ट होती है, वे छन्द तीन प्रकारके हैं—समवृत्त, अर्धसमवृत्त और विषमवृत्त। (अध्याय २०७)
छन्द-विधान (आर्या आदि वृत्तोंके लक्षण)
सूतजीने कहा—आर्या छन्दका लक्षण इस प्रकार है—आर्या छन्दमें आठ गण होते हैं। इसका विषम गण अर्थात् प्रथम, तृतीय, पञ्चम तथा सप्तम सर्वदा जगण (।ऽ।)-रहित होता है। यदि छठे गणमें जगण (।ऽ।) अथवा नगण (।।।) और एक लघु (।) हो तो उस गणके द्वितीय अक्षरमें लघु होनेके कारण सुबन्त या तिङन्त लक्षणवाली 'पद' संज्ञाकी प्रवृत्ति हो सकती है। यदि सातवें गणमें सभी वर्ण ह्रस्व (।।।) हों तो उसके प्रथम अक्षरसे 'पद' संज्ञाकी प्रवृत्ति होती है। यदि आर्याके उत्तरार्द्ध भागमें पाँचवें गणमें सभी वर्ण लघु (।।।) हों तो उसके प्रथम अक्षरसे ही पदका आरम्भ होता है। जिस आर्याके पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्धमें तीन-तीन गणोंके बाद पहले पादका विराम होता है, उसको पथ्या नामकी आर्या कहते हैं। जिस आर्याके पूर्वार्द्ध, उत्तरार्द्ध या दोनोंमें अथवा तीन गणोंपर पादविराम होता है, उसका नाम विपुला है। इन तीन विशेषताओंके कारण इसके तीन भेद हो जाते हैं, जिन्हें—१-आदिविपुला, २-अन्त्यविपुला और ३-उभयविपुला कहा गया है। जिस आर्या छन्दके द्वितीय तथा चतुर्थ गण गुरु अक्षरोंके बीचमें होनेके साथ ही जगण अर्थात् मध्य गुरु (।ऽ।)-से युक्त हों तो उसे मुखपूर्वादिचपला नामकी आर्या कहते हैं। जिस आर्याके दूसरे उत्तरार्द्धमें चपलाका ही लक्षण हो तो उसे सजघना आर्या कहा जाता है। जहाँ आर्याका 'उत्तरार्द्ध' पूर्वार्द्धके समान ही होता है अर्थात् पूर्वार्द्धकी भाँति ही उसके उत्तरार्द्धमें भी छठा गण मध्य गुरु (।ऽ।) अथवा सर्व लघु (।।।) होता है तो उसे गीति की संज्ञासे अभिहित करते हैं।
काण्ड ] छन्द-विधान ( आर्या आदि वृत्तोंके लक्षण ) ३७१
यदि आर्यामें उत्तरार्द्धकी भाँति पूर्वार्द्ध भी हो तो उसको उपगीति आर्या कहा जाता है। आर्यामें जब यही क्रम विपरीत हो जाता है तो वह गीति न होकर उद्गीति छन्द बन जाता है। यदि गीति-जातिवाले छन्दका अन्तिम वर्ण गुरु हो तो वही आर्या गीति नामक छन्द हो जाता है।
यदि विषम (प्रथम और तृतीय) पादमें ६-६, सम (द्वितीय तथा चतुर्थ) पादमें ८-८ मात्राएँ हों और उन सभीका प्रत्येक पाद एक रगण, एक लघु तथा एक गुरुसे संयुक्त हो तो वहाँपर वैतालीय छन्द होता है। किंतु इसीके प्रत्येक चरणमें एक-एक गुरु और बढ़ जाय तो उसको औपच्छन्दसिक छन्द माना गया है।
उपर्युक्त वैतालीय छन्दके प्रत्येक चरणके अन्तमें जो रगण, लघु तथा गुरुकी व्यवस्था मानी गयी है, यदि उनके स्थानपर भगण (ऽ।।) एवं दो गुरुओं (ऽऽ)-को रख दिया जाय तो उसे आपातलिका छन्दके नामसे जानना चाहिये। यदि इसी छन्दके प्रत्येक पादमें द्वितीय मात्रा पराश्रित हो तो वह दक्षिणान्तिका छन्द होता है।
वैतालीय विषमपादमें उदीच्य और समपादमें प्राच्य वृत्तिका प्रयोग होता है। जब समपाद (द्वितीय तथा चतुर्थ चरण)-में पञ्चम मात्राके साथ चतुर्थ मात्रा संयुक्त होती है तो उसे प्राच्यवृत्ति एवं पादसंयोगके कारण जब प्रथम और तृतीय चरणमें दूसरी मात्रा तीसरी मात्राके साथ सम्मिलित हो तो उसे उदीच्यवृत्ति नामक वैतालीय छन्द कहते हैं। जब दोनों छन्दोंके लक्षण एक ही छन्दमें प्रयुक्त हों अर्थात् उस छन्दके प्रथम तथा तृतीय चरणमें तृतीय मात्राके साथ द्वितीय मात्रा संयुक्त हो जाय और द्वितीय तथा चतुर्थ चरणमें पञ्चम मात्राके साथ चतुर्थ मात्रा संयुक्त हो जाय तो वह प्रवृत्तक नामक वैतालीय छन्द हो जाता है। जब वैतालीय छन्दमें प्रथम और तृतीय, द्वितीय तथा चतुर्थ चरण विषम-पादोंके ही अनुसार हों अर्थात् प्रत्येक पाद चौदह लकारों (मात्राओं)-से युक्त हो और उनमें द्वितीय मात्रा तृतीयसे संलग्न होती हो तो उसे चारुहासिनी वैतालीय छन्द कहते हैं।
वक्त्र जातिके छन्दमें पादके प्रथम वर्णके पश्चात् सगण (।।ऽ) और नगण (।।।)-का प्रयोग नहीं करना चाहिये। इनके अतिरिक्त उनमें अन्य किसी भी गणका प्रयोग हो सकता है, किंतु पादके चतुर्थ अक्षरके बाद भगण (ऽ।।) का प्रयोग उचित है।
जिस वक्त्र जातिके छन्दमें सम (द्वितीय एवं चतुर्थ)-पादके चौथे अक्षरके बाद जगण (।ऽ।)-का प्रयोग हो तो वह पथ्यावक्त्र छन्द है, किंतु कुछ लोग इसके विपरीत प्रथम और तृतीय पादमें चौथे अक्षरके बाद जगण (।ऽ।)-का प्रयोग करते हैं। जब विषमपादोंमें चतुर्थ वर्णके बाद नगण (।।।) हो और समपादोंमें चतुर्थ वर्णके बाद यगण (।ऽऽ)-का प्रयोग किया जाय तो वह विपुला नामक वक्त्र छन्द है। जब समपादोंमें सातवाँ अक्षर लघु (।) होता है अर्थात् चौथे वर्णके बाद जगण (।ऽ।) हो तो उसको विपुलावक्त्र छन्द कहते हैं। आचार्य सैतवका मत है कि विपुलावक्त्रके सम और विषम सभी पादोंमें लघु (।) होना चाहिये। जब प्रथम और तृतीय पादमें चतुर्थ अक्षरके बाद यगण (।ऽऽ)-को बाधित करके विकल्परूपसे भगण (ऽ।।), रगण (ऽ।ऽ), नगण (।।।) एवं तगण (ऽऽ।) आदि हों तो वहाँ विपुलावक्त्र छन्द होता है।
जिस छन्दके प्रत्येक पादमें सोलह लकार हों तथा पादके अन्तिम अक्षर गुरु हों, उसे मात्रासमक छन्द कहा गया है। इस छन्दमें नवम लकार किसीसे मिला नहीं रहता। जिस मात्रासमकके
१८६- छन्द-विधान (प्रस्तार-निरूपण)
| ३७२ | संक्षिप्त गरुड़पुराण | [ आचार- |
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चारों चरणोंमें पाँचवीं तथा आठवीं मात्रा (लकार) लघु होती है, उसका नाम विश्लोक है। जिस मात्रासमकके चरणमें बारहवाँ लकार अपने स्वरूपमें ही स्थित रहता है, किसीसे मिलता नहीं, उसका नाम वानवासिका है। जिसके चारों चरणोंमें पाँचवीं, आठवीं तथा नवीं मात्रा (लकार) लघु होती है तो उसे चित्रा कहा जाता है।
उपर्युक्त सममात्रिक, विश्लोक, वानवासिका, चित्रा तथा उपचित्रा* नामके छन्दोंमें जिस किसी भी छन्दके एक-एक चरणको लेकर उससे चार चरणोंवाले अन्य छन्दकी रचना की जाय, उसे पादाकुलक छन्द कहते हैं।
यदि इसी सोलह मात्राओंवाले छन्दके प्रत्येक पादमें लघु मात्राओंका प्रयोग हो और वे किसीसे मिलकर दीर्घ न हो गयी हों तो उसे वृत्तमात्रा छन्द कहते हैं। जब इन्हीं छन्दोंके अनुसार पूर्वार्द्ध भागमें लघु-ही-लघु और उत्तरार्द्ध भागमें गुरु-ही-गुरु वर्ण या मात्राएँ होती हैं तो उसे ज्योति छन्द कहते हैं। जब इस छन्दके विपरीत पूर्वार्द्ध भागमें सब वर्ण या मात्राएँ गुरु हों और उसके उत्तरार्द्ध भागमें सब लघु हों तो उसे सौम्या छन्द कहा जाता है।
जिस छन्दके पूर्वार्द्धमें अट्ठाईस लघु तथा एक गुरु और उत्तरार्द्धमें तीस लघु एवं एक गुरु मात्रा हो, उसे शिखा कहते हैं। यदि छन्दमें यही क्रम विपरीत होता है, अर्थात् पूर्वार्द्धमें तीस लघु, एक गुरु और उत्तरार्द्धमें अट्ठाईस लघु, एक गुरुकी मात्रा होती है तो उसे खञ्जा कहा जाता है। जिस मात्रासमक छन्दके पूर्वार्द्ध एवं उत्तरार्द्धमें क्रमशः सत्ताईस-सत्ताईस लघु मात्राएँ और एक-एक गुरु मात्रा होती है, उसे रुचिरा कहते हैं। (अध्याय २०८)
छन्द-विधान (समवृत्तलक्षण)
श्रीसूतजीने कहा—हे विप्रो! एक गुरु (S) तथा दो गुरु (SS)-से पृथक्-पृथक् बने हुए छन्दोंको क्रमशः श्री या उक्था स्त्री या अत्युक्था के नामसे अभिहित किया गया है। एक मात्र मगण (SSS)-से बने हुए छन्दको 'नारी', एक रगण (SIS)-से बने हुए छन्दको मध्या और एक मगण (SSS) तथा एक गुरु (S)-से बने हुए छन्दको कन्या कहते हैं। ये प्रतिष्ठा छन्दके भेद हैं। भगण (SII) और दो गुरु (SS)-से युक्त छन्दका नाम पङ्क्ति है। यह सुप्रतिष्ठाका भेद है। तगण (SSI) एवं यगण (ISS)-से संयुक्त छन्दका नाम तनुमध्या है। नगण (III) और यगण (ISS)-से बने हुए छन्दको बालललिता कहा जाता है। ये छः वर्णवाले गायत्री छन्दके भेद हैं।
मगण (SSS), सगण (IIS) और एक गुरु (S)-से बने हुए छन्दको मदलेखा कहते हैं। विद्वानोंने इसे उष्णिक् का भेद स्वीकार किया है। जिस छन्दके चारों पादमें दो भगण (SII, SII) और दो गुरु (SS) हों, वह चित्रपदा के नामसे प्रसिद्ध है। जिस छन्दके चारों चरण दो मगण (SSS, SSS) एवं दो गुरु (SS)-से संयुक्त होते हैं, वह विद्युन्माला नामक छन्द है। जिस छन्दके प्रत्येक पादमें भगण (SII), तगण (SSI), एक लघु (I) और एक गुरु (S) हो, उसे माणवक कहते हैं। जिसके चारों चरणोंमें समान रूपसे मगण (SSS), नगण (III) तथा दो गुरु (SS) होते हैं, उसे हंसरुत नामक छन्द माना गया है। जिसके चारों चरण एक रगण (SIS), एक जगण
* जहाँ नवां लकार दसवेंके साथ मिलकर गुरु हो जाता है, वहाँ उपचित्रा नामक छन्द होता है।
काण्ड ] छन्द-विधान ( समवृत्तलक्षण ) ३७३
( । ऽ ।), एक गुरु ( ऽ) तथा एक लघु (।)-से संयुक्त होते हैं, वह समानिका नामका छन्द है और जिसके प्रत्येक चरणमें एक जगण ( । ऽ ।), एक रगण ( ऽ । ऽ), एक लघु ( । ) तथा एक गुरु ( ऽ ) होता है, उसका नाम प्रमाणिका है। इन दोनोंसे भिन्न जो छन्द होता है, उसको वितान के नामसे जानना चाहिये। ये सब आठ वर्णोंके चरणवाले अनुष्टुप् छन्दके भेद हैं।
रगण ( ऽ । ऽ), नगण ( । । ।) और सगण ( । । ऽ)-से जिस छन्दका प्रत्येक चरण समन्वित होता है, उसका नाम हलमुखी है। जो छन्द प्रत्येक पादमें दो नगण ( । । ।, । । ।) और एक मगण ( ऽ ऽ ऽ)-से संयुक्त रहता है, उसे शिशुभृता कहते हैं। ये नौ वर्णोंके चरणवाले बृहती छन्दके भेद हैं। जो अपने चारों चरणोंमें समान रूपसे सगण ( । । ऽ), मगण ( ऽ ऽ ऽ), जगण ( । ऽ ।) और एक गुरु ( ऽ)-से युक्त है, उस छन्दको विराजिता कहते हैं। प्रत्येक पादमें मगण ( ऽ ऽ ऽ), नगण ( । । ।), यगण ( । ऽ ऽ) और एक गुरु ( ऽ)-से पूर्ण छन्दका नाम पणव है। मयूरसारिणी नामक छन्दके चारों चरणोंमें समान रूपसे एक रगण ( ऽ । ऽ), एक जगण ( । ऽ ।), एक रगण ( ऽ । ऽ) एवं एक गुरु ( ऽ) होता है। रुक्मवती छन्दके प्रत्येक पादमें एक भगण ( ऽ । ।), एक मगण ( ऽ ऽ ऽ) , एक सगण ( । । ऽ) और एक गुरु ( ऽ)-का विधान है। जिस छन्दके सभी चरणोंमें मगण ( ऽ ऽ ऽ), भगण ( ऽ । ।), सगण ( । । ऽ) और एक गुरु ( ऽ) होता है, उसका नाम मत्ता है। जिसके प्रत्येक चरणमें नगण ( । । ।), रगण ( ऽ । ऽ), जगण ( । ऽ ।) तथा एक गुरु ( ऽ) है, उसे मनोरमा कहा गया है। ये सभी दस वर्णोंवाले पङ्क्ति छन्दके भेद हैं।
जिस छन्दके प्रत्येक चरणमें दो तगण ( ऽ ऽ ।, ऽ ऽ ।), एक जगण ( । ऽ ।), दो गुरु ( ऽ ऽ) होते हैं, उसे इन्द्रवज्रा कहते हैं और जिस छन्दमें क्रमशः एक जगण ( । ऽ । ), एक तगण ( ऽ ऽ ।), एक जगण ( । ऽ ।) एवं दो गुरु ( ऽ ऽ) हों, उसका नाम उपेन्द्रवज्रा है। जब एक ही छन्दमें ये दोनों इन्द्रवज्रा तथा उपेन्द्रवज्रा छन्द सम्मिलित रहते हैं, तो उसे उपजाति कहा जाता है। इनके अनेक भेद हैं। यथा—
सुमुखी नामक छन्दके प्रत्येक चरणमें एक नगण ( । । ।), दो जगण ( । ऽ ।, । ऽ ।), एक लघु ( । ) और एक गुरु ( ऽ) होता है। दोधक में तीन भगण ( ऽ । ।, ऽ । ।, ऽ । ।) और दो गुरु ( ऽ ऽ) होते हैं। शालिनी नामक जो छन्द है उसके सभी चरणोंमें एक मगण ( ऽ ऽ ऽ), दो तगण ( ऽ ऽ ।, ऽ ऽ ।) एवं दो गुरुओं ( ऽ ऽ) की युति होती है। इसके प्रत्येक चरणमें चौथे तथा सातवें अक्षरपर विराम होता है। वातोर्मी छन्दके प्रत्येक चरणमें दो मगण ( ऽ ऽ ऽ, ऽ ऽ ऽ), एक तगण ( ऽ ऽ ।) होता है और उसके बाद दो गुरु ( ऽ ऽ) होते हैं। इसमें भी चार, सातपर विराम होता है।
जो छन्द प्रत्येक चरणमें मगण ( ऽ ऽ ऽ), भगण ( ऽ । ।), नगण ( । । ।), नगण ( । । ।), एक लघु ( । ) और एक गुरु ( ऽ)-से युक्त हो, उसे भ्रमरविलासिता नामक छन्द कहा गया है। रथोद्धता छन्द अपने सभी चरणोंमें एक रगण ( ऽ । ऽ), नगण ( । । ।), रगण ( ऽ । ऽ), एक लघु ( । ) एवं एक गुरु ( ऽ)-से संयुक्त होता है। स्वागता के प्रत्येक पादमें एक रगण ( ऽ । ऽ), एक नगण ( । । ।), एक भगण ( ऽ । ।) और दो गुरु ( ऽ ऽ) होते हैं। वृत्ता नामक छन्दके प्रत्येक पादमें दो नगण ( । । ।, । । ।), एक सगण ( । । ऽ) और दो गुरु ( ऽ ऽ) सन्निहित होते हैं। समद्रिका छन्दमें दो नगण ( । । ।, । । ।), एक रगण ( ऽ । ऽ), एक
३७४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
लघु (। ) तथा एक गुरु (ऽ) होता है। जिस छन्दके प्रत्येक चरण रगण (ऽ।ऽ), जगण (।ऽ।), एक लघु (। ) तथा एक गुरु (ऽ)-से युक्त हों, वह श्येनिका नामक छन्द है। जहाँ सभी चारों चरणोंमें एक जगण (।ऽ।), एक सगण (।।ऽ), एक तगण (ऽऽ।), दो गुरु (ऽऽ) हों तो वहाँ शिखण्डित छन्द होता है। महात्मा पिङ्गलने इन्हें त्रिष्टुप्-छन्दका भेद बताया है।
जिस छन्दके प्रत्येक चरणमें एक रगण (ऽ।ऽ), एक नगण (।।।), एक भगण (ऽ।।), एक सगण (।।ऽ) हो, उसका नाम चन्द्रवर्त्म और जिसमें एक जगण (।ऽ।), एक तगण (ऽऽ।), एक जगण (।ऽ।), एक रगण (ऽ।ऽ) हो, उसका नाम वंशस्थ छन्द है। जिस छन्दके प्रत्येक चरणमें दो तगण (ऽऽ।, ऽऽ।), एक जगण (।ऽ।) हो, उसे इन्द्रवंशा और जिसमें चार सगण-ही-सगण (।।ऽ, ।।ऽ, ।।ऽ, ।।ऽ) होते हैं, उसे तोटक छन्द माना गया है। जिसके प्रत्येक पादमें नगण (।।।), दो भगण (ऽ।।, ऽ।।) और रगण (ऽ।ऽ) हो, उसका नाम द्रुतविलम्बित है।
जो छन्द अपने सभी चारों चरणोंमें दो नगण (।।।, ।।।), एक मगण (ऽऽऽ), एक यगण (।ऽऽ)-से संयुक्त रहता है, उसका नाम पुट है। इस छन्दमें आठ और चार वर्णोंपर यति होती है। दो नगण (।।।, ।।।) और दो रगण (ऽ।ऽ, ऽ।ऽ)-से समन्वित प्रत्येक चरणवाला जो छन्द है, उसका नाम मुदितवदना है। इसमें सात और पाँच वर्णोंपर यति होती है। जिस छन्दके प्रत्येक चरणमें नगण (।।।), यगण (।ऽऽ), नगण (।।।), यगण (।ऽऽ) हो, उस छन्दको कुसुमविचित्रा कहते हैं। जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ)-से युक्त प्रत्येक पादवाले छन्दका नाम जलोद्धतगति है। प्रत्येक पादमें चार रगण (ऽ।ऽ, ऽ।ऽ, ऽ।ऽ, ऽ।ऽ)-से युक्त छन्द स्रग्विणी माना गया है। चार-चार यगणों (।ऽऽ, ।ऽऽ, ।ऽऽ, ।ऽऽ)-से जिसके सभी चरण संयुक्त हैं, उसको भुजङ्गप्रयात छन्दकी संज्ञा दी गयी है। प्रियंवदा छन्द नगण (।।।), भगण (ऽ।।), जगण (।ऽ।) और रगण (ऽ।ऽ)—इन चार गणोंसे युक्त होता है।
मणिमाला नामक जो छन्द है, उसके प्रत्येक पादमें तगण (ऽऽ।), यगण (।ऽऽ), तगण (ऽऽ।) तथा यगण (।ऽऽ) होता है। जिस छन्दके प्रत्येक पादमें तगण (ऽऽ।), भगण (ऽ।।), जगण (।ऽ।) और रगण (ऽ।ऽ) हो तो उसका नाम ललिता है। इस छन्दमें छठे वर्णपर यति होती है। प्रमिताक्षरा वृत्त सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ), सगण (।।ऽ)-से युक्त होता है। उज्ज्वला छन्दमें नगण (।।।), नगण (।।।), भगण (ऽ।।) तथा रगण (ऽ।ऽ) होते हैं। जो छन्द मगण (ऽऽऽ), मगण (ऽऽऽ), यगण (।ऽऽ), यगण (।ऽऽ)-से संयुक्त है, उसका नाम वैश्वदेवी है। इसमें पाँच और सात वर्णोंपर यति होती है। जब छन्दके प्रत्येक चरणमें मगण (ऽऽऽ), भगण (ऽ।।), सगण (।।ऽ) और मगण (ऽऽऽ) हो तो उसे जलधरमाला कहते हैं। चन्द्रवर्त्म छन्दसे यहाँतक बारह वर्णवाले जगती छन्दके भेद हैं।
जिस छन्दके प्रत्येक चरणमें नगण (।।।), नगण (।।।), तगण (ऽऽ।), तगण (ऽऽ।) और एक गुरु (ऽ) हो, तो उसका नाम क्षमावृत्त है। इसमें सात और छः वर्णोंपर यति होती है। प्रहर्षिणी नामक छन्द मगण (ऽऽऽ), नगण (।।।), जगण (।ऽ।), रगण (ऽ।ऽ) एवं एक गुरु (ऽ)-से युक्त होता है। इसके प्रत्येक चरणमें तीन और दस वर्णपर यतिका विधान है। जो छन्द जगण (।ऽ।), भगण (ऽ।।), सगण (।।ऽ),
काण्ड ] \hfill छन्द-विधान ( समवृत्तलक्षण ) \hfill ३७५
जगण (।ऽ।) और एक गुरु (ऽ)-से सन्निहित होता है, उसको रुचिरा कहा गया है। इसमें यति चार तथा नौ वर्णोंपर होती है। मत्तमयूर नामक छन्दको मगण (ऽऽऽ), तगण (ऽऽ।), यगण (।ऽऽ), सगण (।।ऽ) और एक गुरु (ऽ)-से युक्त माना गया है। इसके प्रत्येक पादमें चार तथा नौ वर्णोंपर यति होती है।
मञ्जुभाषिणी छन्दके प्रत्येक चरणमें सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।) और एक गुरु (ऽ) होता है। सुनन्दिनी नामक छन्दके प्रत्येक चरणमें सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ) होते ही हैं, किंतु अन्तिम जगणके स्थानपर इसमें मगण (ऽऽऽ) होता है। अन्तमें एक गुरु (ऽ) रहता है और जो छन्द नगण (।।।), नगण (।।।), तगण (ऽऽ।), तगण (ऽऽ।) तथा एक गुरु (ऽ)-से युक्त है, उसका नाम चन्द्रिका है। इसमें सात और छः वर्णोंपर यति होती है। ये तेरह वर्णवाले अतिजगती छन्दके अवान्तर भेद हैं।
मगण (ऽऽऽ), तगण (ऽऽ।), नगण (।।।), सगण (।।ऽ) और दो गुरु (ऽ ऽ)-से युक्त छन्दको असम्बाधा कहते हैं, इसमें पाँच और नौ वर्णोंपर यति होती है। जिस छन्दमें नगण (।।।), नगण (।।।), रगण (ऽ।ऽ), सगण (।।ऽ), एक लघु (।) और एक गुरु (ऽ) हो, उसे अपराजिता छन्द कहा गया है। इसमें सात-सात वर्णोंपर यति होती है। यदि प्रत्येक चरणमें नगण (।।।), नगण (।।।), भगण (ऽ।।), नगण (।।।), एक लघु (।) तथा एक गुरु (ऽ) हो, तो उसे प्रहरणकलिका के नामसे जाना जाता है। इसमें भी सात-सात वर्णपर ही यति होती है। वसन्ततिलका छन्दमें सभी चरण क्रमशः तगण (ऽऽ।), भगण (ऽ।।), दो जगण (।ऽ।, ।ऽ।), दो गुरु (ऽऽ)-से युक्त होते हैं। इसीको सिंहोन्नता और उद्धर्षिणी भी कहते हैं। जिस छन्दके प्रत्येक पादमें भगण (ऽ।।), जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ), नगण (।।।) तथा दो गुरु (ऽऽ) हों उसका नाम इन्दुवदना होता है। जिसका प्रत्येक चरण नगण (।।।), रगण (ऽ।ऽ), नगण (।।।), रगण (ऽ।ऽ), एक लघु (।) और एक गुरु (ऽ)-से संयुक्त होता है, उसीको सुकेशी छन्द कहते हैं। यहाँतक चौदह वर्णोंके चरणवाले शर्करी छन्दके अवान्तर भेदोंका वर्णन प्रतिपादित किया गया।
जिस छन्दके प्रत्येक चरणमें चौदह लघु (चार नगण फिर दो लघु वर्ण) और अन्तमें एक गुरु हो, वह शशिकला छन्द है। इसी छन्दमें जब यति छः और नौ वर्णोंपर हो तो वह स्रक् अर्थात् माला नामक छन्द हो जाता है। जब वह यति आठ एवं सात वर्णोंपर हो तो वह मणिगुणनिकर नामक छन्द बन जाता है। मालिनी छन्द अपने प्रत्येक चरणमें नगण (।।।), नगण (।।।), मगण (ऽऽऽ), यगण (।ऽऽ), यगण (।ऽऽ)-से सन्निहित होता है। इसमें आठ और सात वर्णोंपर यति होती है। प्रभद्रक नामक छन्दके प्रत्येक चरणमें नगण (।।।), जगण (।ऽ।), भगण (ऽ।।), जगण (।ऽ।) और रगण (ऽ।ऽ) होता है। इसमें सात और आठ वर्णोंपर यति होती है। एला नामका छन्द सगण (।।ऽ), यगण (।ऽऽ), नगण (।।।), नगण (।।।) और यगण (।ऽऽ)-से संयुक्त होता है। चित्रलेखा छन्दके प्रत्येक चरणमें मगण (ऽऽऽ), रगण (ऽ।ऽ), मगण (ऽऽऽ), यगण (।ऽऽ) तथा यगण (।ऽऽ) होता है, यति सात और आठ वर्णोंपर होती है। यहाँतक पंद्रह वर्णोंके चरणवाले अतिशर्करी छन्दके अवान्तर भेदोंका वर्णन बताया गया है।
जिस छन्दके प्रत्येक चरणमें भगण (ऽ।।),
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रगण (ऽ।ऽ), नगण (।।।), नगण (।।।), नगण (।।।) तथा एक गुरु (ऽ) होता है और जिसमें सात तथा नौ वर्णोंपर यति हो तो उसे वृषभगजजृम्भित छन्द कहते हैं। जिसके सभी चरणोंमें नगण (।।।), जगण (।ऽ।), भगण (ऽ।।), जगण (।ऽ।), रगण (ऽ।ऽ) और एक गुरु (ऽ) हो, उसका नाम वाणिनी छन्द है। यति चरणकी समाप्तिपर होती है। पिङ्गलद्वारा इन दोनों छन्दोंको अष्टि श्रेणीके छन्दके अन्तर्गत स्वीकार किया गया है।
यगण (।ऽऽ), मगण (ऽऽऽ), नगण (।।।), सगण (।।ऽ), भगण (ऽ।।), एक लघु (।) और एक गुरु (ऽ)-से संयुक्त चरणवाले छन्दका नाम शिखरिणी है। इसमें यति छः तथा ग्यारह वर्णोंपर होती है। पृथ्वी छन्दके प्रत्येक चरणमें जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ), यगण (।ऽऽ), एक लघु (।) तथा एक गुरु (ऽ) होता है। इसकी यति आठ और नौ वर्णोंपर होती है। जिस छन्दके चरण भगण (ऽ।।), रगण (ऽ।ऽ), नगण (।।।), नगण (।।।), भगण (ऽ।।), एक लघु (।) तथा एक गुरु (ऽ)-से संयुक्त होते हैं और जिनमें दस एवं सात वर्णोंपर यति होती है, उसे वंशपत्रपतित कहा गया है।
हरिणी छन्द नगण (।।।), सगण (।।ऽ), मगण (ऽऽऽ), रगण (ऽ।ऽ), सगण (।।ऽ), एक लघु (।) और एक गुरु (ऽ)-से संसृष्ट होता है। इसमें यति क्रमशः छः, चार तथा सात वर्णोंपर होती है। मगण (ऽऽऽ), भगण (ऽ।।), नगण (।।।), तगण (ऽऽ।), तगण (ऽऽ।), दो गुरु (ऽऽ)-से युक्त चरणोंवाले छन्दको मन्दाक्रान्ता कहते हैं। इसमें चार, छः और सात वर्णोंपर यति होती है। नर्द्दटक छन्द नगण (।।।), जगण (।ऽ।), भगण (ऽ।।), जगण (।ऽ।), जगण (।ऽ।), एक लघु (।) और एक गुरु (ऽ)-से संयुक्त होता है। इसमें यति सात और दस वर्णोंपर होती है। यदि यही यति सात, छः और चार वर्णोंपर हो तो छन्दका नाम कोकिलक हो जाता है। शिखरिणीसे कोकिलकतक इन छन्दोंको सत्रह वर्णोंवाले अत्यष्टि छन्द-वर्गमें समझना चाहिये।
जिस छन्दमें मगण (ऽऽऽ), तगण (ऽऽ।), नगण (।।।), यगण (।ऽऽ), यगण (।ऽऽ), यगण (।ऽऽ) होता है और पाँच, छः तथा सात वर्णोंपर यति होती है, उसको कुसुमितलता छन्द कहते हैं। इसे अठारह अक्षरोंके चरणवाले धृति छन्दका अवान्तर भेद कहा गया है।
यगण (।ऽऽ), मगण (ऽऽऽ), नगण (।।।), सगण (।।ऽ), रगण (ऽ।ऽ), रगण (ऽ।ऽ) और एक गुरु (ऽ)-से युक्त छन्दका नाम मेघविस्फूर्जिता है। इसमें छः, छः और सात वर्णोंपर यति होती है। शार्दूलविक्रीडित नामक जो छन्द है, उसके प्रत्येक चरणमें मगण (ऽऽऽ), सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ), दो तगण (ऽऽ।, ऽऽ।) तथा एक गुरु (ऽ) होता है। इसमें बारह और सात वर्णोंपर यतिका विधान है। ये दोनों उन्नीस वर्णोंके चरणवाले अतिधृति छन्द-वर्गके भेद कहे गये हैं।
इसके बाद बीस वर्णोंके चरणवाले कृति नामवाले छन्दोंका निरूपण किया जा रहा है—
जिसके प्रत्येक चरणमें भगण (ऽ।।), रगण (ऽ।ऽ), मगण (ऽऽऽ), नगण (।।।), यगण (।ऽऽ), भगण (ऽ।।), एक लघु (।), एक गुरु (ऽ) होता है और क्रमशः सात, सात तथा छः वर्णोंपर यति होती है, उसे सुवदना छन्द कहते हैं। जिसके प्रत्येक पादमें रगण (ऽ।ऽ), जगण (।ऽ।), रगण (ऽ।ऽ), जगण (।ऽ।), रगण (ऽ।ऽ), जगण (।ऽ।), एक लघु (।), एक गुरु (ऽ) हो और
काण्ड ] छन्द-विधान (समवृत्तलक्षण) ३७७
पादान्तमें यति होती हो, उसे वृत्त छन्द कहते हैं।
जिस छन्दमें मगण (SSS), रगण (S।S), भगण (SII), नगण ( । । ।), यगण ( । SS), यगण ( । SS), यगण ( । SS) हो और प्रत्येक चरणमें सात-सात वर्णोंपर यति होती हो, वह स्रग्धरा छन्द है। प्रत्येक चरणमें इक्कीस वर्णोंवाले इस छन्दको प्रकृति वर्गका छन्द माना गया है।
जिसके सभी पाद क्रमशः भगण (SII), रगण (S।S), नगण ( । । ।), रगण (S।S), नगण ( । । ।), रगण (S।S), नगण ( । । ।) तथा एक गुरु (S)-से संयुक्त हों और उनमें दस तथा बारह वर्णोंपर यति हो, उसे सुभद्रक छन्द कहते हैं। यह बाईस वर्णोंवाले आकृति छन्दके अन्तर्गत है।
जो नगण ( । । ।), जगण ( । S ।), भगण (SII), जगण ( । S ।), भगण (SII), जगण ( । S ।), भगण (SII), एक लघु ( । ) तथा एक गुरु (S)-से युक्त छन्द हो और उसमें ग्यारह तथा बारह वर्णोंपर यति हो, उसका नाम अश्वललित है। इसे अन्य ग्रन्थोंमें अद्रितनया भी कहा गया है। जिस छन्दमें मगण (SSS), मगण (SSS), तगण (SSI), नगण ( । । ।), नगण ( । । ।), नगण ( । । ।), नगण ( । । ।), एक लघु ( । ) तथा एक गुरु (S) होता है और जिसमें आठ, पाँच तथा दस वर्णोंपर यति होती है, उसको मत्ताक्रीड कहा जाता है। ये दोनों छन्द तेईस वर्णोंवाले विकृति छन्द-वर्गके अन्तर्गत हैं।
जिस छन्दका प्रत्येक पाद भगण (SII), तगण (SSI), नगण ( । । ।), सगण ( । । S), भगण (SII), भगण (SII), नगण ( । । ।), यगण ( । SS)-से संयुक्त होता है और उसमें पाँच, सात तथा बारह वर्णोंपर यति होती है, उसको तन्वी छन्द कहते हैं। यह तन्वी छन्द चौबीस वर्णोंके चरणवाले संकृति छन्द-वर्गका अवान्तर भेद है।
क्रौञ्चपदा नामका जो छन्द है, उस छन्दमें भगण (SII), मगण (SSS), सगण ( । । S), भगण (SII) एवं नगण ( । । ।), नगण ( । । ।), नगण ( । । ।), नगण ( । । ।), एक गुरु (S) होता है और पाँच-पाँच, आठ तथा सात वर्णोंपर यति होती है। यह पच्चीस वर्णोंवाले अतिकृति छन्दके अन्तर्गत है।
अब छब्बीस वर्णोंवाले उत्कृति वर्गके छन्दको कहा जा रहा है, आप उसे सुनें—
जिस छन्दके प्रत्येक चरणमें मगण (SSS), मगण (SSS), तगण (SSI), नगण ( । । ।), नगण ( । । ।), नगण ( । । ।), रगण (S।S) तथा सगण ( । । S) हों और आठ, ग्यारह एवं सात वर्णोंपर यति होती है, उसे भुजङ्गविजृम्भित कहते हैं। यह छब्बीस वर्णवाले उत्कृति छन्द-वर्गका एक भेद है।
जिस छन्दके प्रत्येक चरणमें एक मगण (SSS), छह नगण ( । । ।, । । ।, । । ।, । । ।, । । ।, । । ।), एक सगण ( । । S) और दो गुरु (SS) हों, साथ ही नौ, छः-छः तथा पाँच वर्णोंपर यति हो तो उसको अपहाव कहते हैं। यह उत्कृति वर्गका ही दूसरा भेद है।
जिसके प्रत्येक चरणमें दो नगण ( । । ।, । । ।) और सात रगण (S।S, S।S, S।S, S।S, S।S, S।S, S।S) हों तो उसका नाम चण्डवृत्तप्रपात छन्द है। उसे दण्डक* भी कहा जाता है। यदि इस छन्दमें दो नगणको छोड़कर शेष रगण वर्णोंके साथ क्रमशः एक और दो अन्य रगण पदोंकी वृद्धि हो तो उसीसे व्याल और जीमूत आदि नामवाले दण्डक छन्द बनते हैं।
(अध्याय २०९)
* जिन वृत्तोंके प्रत्येक चरणमें सत्ताईस या इससे अधिक वर्ण होते हैं, उनका सामान्य नाम दण्डक है। चण्डवृत्तप्रपात आदि इसीके भेद हैं।
| ३७८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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छन्द-विधान (अर्द्धसमवृत्त लक्षण)
श्रीसूतजीने कहा—यदि छन्दके विषमपादमें तीन सगण (।।ऽ), एक लघु (।) और एक गुरु (ऽ) वर्ण—इस प्रकार ग्यारह अक्षर हों एवं समपादमें तीन भगण (ऽ।।) और दो गुरु (ऽऽ) हों तो उसे उपचित्रक कहते हैं। जिस छन्दके विषमपादमें तीन भगण (ऽ।।), दो गुरु (ऽऽ) हों और उसके समपादमें एक नगण (।।।), दो जगण (।ऽ।) और एक यगण (।ऽऽ) हो, उसे द्रुतमध्या नामक छन्द माना गया है। जिस छन्दके विषम-पादमें तीन सगण (।।ऽ), एक गुरु और समपादमें तीन भगण (ऽ।।) एवं दो गुरु (ऽऽ) होते हैं, उसका नाम वेगवती है। जिस छन्दके विषमपादमें एक तगण (ऽऽ।), एक जगण (।ऽ।), एक रगण (ऽ।ऽ), एक गुरु (ऽ) हो और समपादमें एक मगण (ऽऽऽ), एक सगण (।।ऽ), एक जगण (।ऽ।) तथा दो गुरु (ऽऽ) हों, वह भद्रविराट् नामक छन्द होता है।
यदि विषमपादमें सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ), एक गुरु (ऽ) तथा समपादमें भगण (ऽ।।), रगण (ऽ।ऽ), नगण (।।।) और दो गुरु (ऽऽ) हों तो उस छन्दको केतुमती कहा जाता है। जिस छन्दके विषमपादमें दो तगण (ऽऽ।, ऽऽ।), एक जगण (।ऽ।) और दो गुरु (ऽऽ) तथा समपादमें जगण (।ऽ।), तगण (ऽऽ।), जगण (।ऽ।) एवं दो गुरु (ऽऽ) होते हैं, उसको आख्यानिकी कहते हैं। यदि विषमपादमें जगण (।ऽ।), तगण (ऽऽ।), जगण (।ऽ।) और दो गुरु (ऽऽ) तथा समपादमें दो तगण (ऽऽ।, ऽऽ।), एक जगण (।ऽ।) एवं दो गुरु (ऽऽ) हों तो उसे विपरीताख्यानक छन्द कहा जाता है। ऐसा पिङ्गल मुनिका अभिमत है।
जब छन्दके विषमपादमें दो नगण (।।।, ।।।), एक रगण (ऽ।ऽ), एक यगण (।ऽऽ) और समपादमें एक नगण (।।।) दो जगण (।ऽ।, ।ऽ।), एक रगण (ऽ।ऽ) तथा एक गुरु (ऽ) होता है तो उसे पुष्पिताग्रा कहते हैं। यदि विषमपादमें रगण (ऽ।ऽ), जगण (।ऽ।), रगण (ऽ।ऽ), यगण (।ऽऽ) हो और समपादमें जगण (।ऽ।), रगण (ऽ।ऽ), जगण (।ऽ।), रगण (ऽ।ऽ) तथा एक गुरु (ऽ) हो तो उस छन्दका नाम वाङ्मती है।
(अध्याय २१०)
छन्द-विधान (विषमवृत्तलक्षण)
सूतजीने कहा—जिस छन्दके प्रथम पादमें आठ अक्षर, द्वितीय पादमें बारह अक्षर, तृतीय पादमें सोलह अक्षर तथा चतुर्थ पादमें बीस अक्षर होते हैं, वह पदचतुरूर्ध्व नामक छन्द है, यह इस छन्दका सामान्य लक्षण है। तात्पर्य यह है कि इस छन्दमें अनुष्टुप् छन्दके प्रथम पादके बाद प्रत्येक पादमें क्रमशः चार-चार अक्षर बढ़ते जाते हैं। इसी छन्दके चारों चरणोंमें जब दो अक्षर गुरु (ऽऽ) हों तो उसे आपीड छन्द कहते हैं। अन्तिम अक्षरोंको छोड़कर शेष अक्षर लघु (।) ही होते हैं। पदचतुरूर्ध्व नामक छन्दके प्रथम पादका द्वितीय आदि पादोंके साथ परिवर्तन होनेपर अनेक छन्द बनते हैं, यथा—प्रथम पादमें बारह और द्वितीय पादमें अठारह अक्षर होनेसे जो छन्द बनता है, वह कलिका (मञ्जरी) कहलाता है। इसमें प्रथम पादके स्थानमें द्वितीय पाद और द्वितीय पादके स्थानमें प्रथम पाद हो जाता है। जब प्रथम पाद (आठ अक्षर)-के स्थानमें तृतीय पाद (सोलह अक्षर)
काण्ड ] * छन्द-विधान (विषमवृत्तलक्षण) * ३७९
और तृतीय पादके स्थानमें प्रथम पाद हो तो लवली नामक छन्द होता है। इसी प्रकार जब प्रथम पाद (आठ अक्षर)-के स्थानपर चतुर्थपाद (बीस अक्षर) और चतुर्थपादके स्थानपर प्रथम पाद हो तो उसे अमृतधारा नामक छन्द कहते हैं। यहाँतक पदचतुरूर्ध्व छन्दके अवान्तर भेदोंको बतलाया गया है।
जब प्रथम पादमें सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ) और एक लघु (।) — इस प्रकार दस अक्षर होते हैं, द्वितीय पादमें नगण (।।।), सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।) और एक गुरु (ऽ) — इस प्रकार दस अक्षर होते हैं, तृतीय पादमें भगण (ऽ।।), नगण (।।।), जगण (।ऽ।), एक लघु (।) तथा एक गुरु (ऽ) — ये ग्यारह अक्षर होते हैं और चतुर्थ पादमें सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।) तथा एक गुरु (ऽ) — इस प्रकार तेरह अक्षर होते हैं तो वह उद्गता नामक छन्द कहलाता है। इसी उद्गता छन्दके तीसरे चरणमें जब रगण (ऽ।ऽ), नगण (।।।), यगण (।ऽऽ) और एक गुरु (ऽ) — इस प्रकार तेरह अक्षर हों और शेष तीन पाद पूर्ववत् अर्थात् उद्गता छन्दके समान ही हों तो सौरभक नामक छन्द होता है। इसी उद्गता छन्दके तीसरे चरणमें जब दो नगण (।।।, ।।।), दो सगण (।।ऽ, ।।ऽ) हों तथा शेष तीनों चरण उद्गताके ही समान हों तो ललित नामक छन्द होता है। ये सब उद्गता छन्दके अवान्तर भेद हैं।
जिसके प्रथम पादमें मगण (ऽऽऽ), सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।), भगण (ऽ।।) और दो गुरु (ऽऽ) — इस प्रकार चौदह अक्षर होते हैं, द्वितीय चरणमें सगण (।।ऽ), नगण (।।।), जगण (।ऽ।), रगण (ऽ।ऽ) तथा एक गुरु (ऽ) — इस प्रकार तेरह अक्षर होते हैं, तीसरे चरणमें दो नगण (।।।, ।।।) और एक सगण (।।ऽ) — इस प्रकार नौ अक्षर होते हैं तथा चौथे चरणमें तीन नगण (।।।, ।।।, ।।।), एक जगण (।ऽ।) तथा एक यगण (।ऽऽ) — इस प्रकार पन्द्रह अक्षर होते हैं तो ऐसा छन्द उपस्थितप्रचुपित नामवाला छन्द कहलाता है। इसी उपस्थितप्रचुपित छन्दके जब तीन चरण वैसे ही हों, केवल तृतीय चरणमें परिवर्तन हो, अर्थात् उसमें दो नगण (।।।, ।।।), एक सगण (।।ऽ), पुनः दो नगण (।।।, ।।।) तथा एक सगण (।।ऽ) — इस प्रकार अठारह अक्षर हों तो वह वर्धमान नामक छन्द होता है। उसी उपस्थितप्रचुपित नामक छन्दके जब तीन पाद (प्रथम, द्वितीय तथा चतुर्थ) समान हों, किंतु तृतीय पादमें तगण (ऽऽ।), जगण (।ऽ।) और रगण (ऽ।ऽ) — इस प्रकार नौ अक्षर हों तो वह आर्षभ नामक छन्द होता है। इसी प्रकार उपस्थितप्रचुपित नामक छन्दका जब पहला पाद वही हो और शेष तीन पादोंमें तगण (ऽऽ।), जगण (।ऽ।), तथा रगण (ऽ।ऽ) — इस प्रकार नौ अक्षर हों तो ऐसा छन्द शुद्धविराट् कहलाता है। ये छन्द उपस्थितप्रचुपित नामक छन्दके अवान्तर भेदोंमें आते हैं।
(अध्याय २११)
| ३८० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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छन्द-विधान (प्रस्तार-निरूपण)
सूतजीने कहा—अब प्रस्तारके* विषयमें बतला रहा हूँ। ऊपरके पादमें आदि अक्षर गुरु हो तथा उसके नीचेके पादमें लघु अक्षर हो, वह एकाक्षर प्रस्तार है। उसके बाद इसी क्रमसे वर्णोंकी स्थापना करे अर्थात् पहले गुरु और उसके नीचे लघु अक्षरकी स्थापना करे, यह द्वयक्षर-प्रस्तार है। प्रस्तारके अनन्तर नष्टका निरूपण इस प्रकार है—नष्ट संख्याको आधी करनेपर जब वह दो भागोंमें बराबर बँट जाय तब एक लघु लिखना चाहिये, यदि आधा करनेपर विषम संख्या प्राप्त हो तो उसमें एक जोड़कर सम बना ले और इस प्रकार पुनः आधा करे। ऐसी अवस्थामें एक गुरु अक्षरकी प्राप्ति होती है, उसे भी अन्यत्र लिख ले। जितने अक्षरवाले छन्दके भेदको जानना हो, उतने अक्षरोंकी पूर्ति होनेतक पूर्वोक्त प्रणालीसे गुरु-लघुका उल्लेख करता रहे।
अब उद्दिष्टके विषयमें बतलाया जा रहा है—उद्दिष्टकी प्रक्रिया जाननेके लिये छन्दके गुरु-लघु क्रमशः एक पंक्तिमें लिखकर उनके ऊपर क्रमशः एकसे लेकर दूने-दूने अङ्क रखता जाय अर्थात् प्रथम अक्षरपर एक, द्वितीयपर दो, तृतीयपर तीन—इस क्रमसे संख्या होगी। बिना प्रस्तारके ही वृत्त-संख्या जाननेके उपायको संख्या कहते हैं। इसकी प्रक्रिया इस प्रकार है—जितने अक्षरके छन्दकी संख्या जाननी हो, उसका आधा भाग निकालनेसे दोकी उपलब्धि होगी। उसे अलग रख ले। विषम संख्यामें एक घटाकर शून्यकी प्राप्ति होगी, उसे दोके नीचे रखकर शून्यके स्थानमें दुगुना करे, इससे प्राप्त हुए अङ्कको ऊपरके अर्धस्थानमें रखे और उतनेसे ही गुणा करे।
एकद्वयादिलगक्रियाकी सिद्धिके लिये मेरुप्रस्तारको बतलाया जा रहा है। किसी छन्दमें कितने लघु, कितने गुरु तथा एकाक्षरादि छन्दोंके कितने वृत्त होते हैं, इसका ज्ञान मेरुप्रस्तारसे होता है। मेरुप्रस्तारमें नीचेसे ऊपरकी ओर आधा-आधा अंगुल विस्तार कम होता जाता है। छन्दकी संख्याको दूनी करके एक-एक घटा दिया जाय तो उतने ही अंगुलका उसका अध्वा (प्रस्तारदेश) होता है। इस प्रकार छन्दःशास्त्रका सार बतलाया गया।
(अध्याय २१२)
सदाचार एवं शौचाचारका निरूपण
सूतजीने कहा—हे शौनक! श्रीहरिसे सुनकर ब्रह्माजीने व्याससे सब कुछ देनेवाले ब्राह्मणादि वर्णोंके सदाचारको जैसे कहा है, उसी प्रकार मैं कहता हूँ।
श्रुति (वेद) और स्मृति (धर्मशास्त्र)-का भली प्रकारसे अध्ययन करके श्रुतिप्रतिपादित कर्मका पालन करना चाहिये। (क्योंकि श्रुति ही सब कर्मोंका मूल है।) यदि (उपलब्ध) श्रुतियोंमें कोई कर्म ज्ञात नहीं हो रहा है तो उसको स्मृतिशास्त्रके अनुसार जानकर करना चाहिये (क्योंकि स्मृतिशास्त्र भी श्रुतिमूलक होनेके कारण ही कर्मके बोधमें प्रमाण माने जाते हैं) और स्मार्तधर्मके पालनमें असमर्थ होनेपर विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि वह सदाचारका पालन करे। कर्ममार्गका दर्शन करानेके लिये श्रुति तथा स्मृति—ये नेत्रस्वरूप हैं।
* किस छन्दके कितने भेद हो सकते हैं, सामान्यरूपसे इसका ज्ञान करानेवाली प्रणालीको 'प्रस्तार' कहा जाता है। प्रस्तार, नष्ट, उद्दिष्ट, एकद्वयादिलगक्रिया, संख्या तथा अध्वयोग —ये छः प्रणालियाँ हैं।
काण्ड ] सदाचार एवं शौचाचारका निरूपण ३८१
श्रुतिमें कहा गया धर्म परम धर्म है। स्मृति और शास्त्रसे प्रतिपादित धर्म अपर धर्म है। इस प्रकार श्रुति, स्मृति और शिष्टाचारसे प्राप्त धर्म— ये तीन प्रकारके सनातनधर्म हैं।
सत्य, दान, दया, निर्लोभता, विद्या, यज्ञ, पूजा और इन्द्रियदमन—ये शिष्टाचारके आठ पवित्र लक्षण कहे गये हैं। पूर्व कालमें लोगोंके शरीर और इन्द्रिय सत्त्वगुणप्रधान एवं तेजोमय होते थे, अतः जिस प्रकार कमलपत्रपर जल नहीं रुकता उसी प्रकारसे उनके शरीर तथा इन्द्रियोंमें पाप नहीं टिक पाते थे।
सत्त्वगुणके विकासके लिये सनातनधर्म (वर्णाश्रम-धर्म, सदाचार आदि)-के पालनका सर्वाधिक महत्त्व है और इनकी प्रमुखता युगविशेष, स्थानविशेष (भारतवर्ष आदि)-की दृष्टिसे निर्धारित होती है, इसी दृष्टिसे यहाँ इतना निरूपण किया जा रहा है। सत्य, यज्ञ, तप तथा दान—ये धर्मके लक्षण हैं। बिना दिये गये द्रव्यको ग्रहण न करना, दान, अध्ययन, जप, विद्या, धन, तपस्या, पवित्रता, श्रेष्ठ कुलमें जन्म, निरोगता और संसारके बन्धनसे मुक्ति आदिके मूलमें धर्मका आचरण ही प्रधान है। धर्मसे सुख तथा तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति होती है और इस तत्त्वज्ञानसे ही मोक्ष प्राप्त होता है।
शास्त्रोंके अनुसार पालन किये जाने योग्य तथा सनातन कालसे चले आ रहे यज्ञ, अध्ययन और दान—ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यके सामान्य धर्म हैं। यज्ञ कराना, अध्यापन तथा सदाचारवान् विशुद्ध अधिकृत व्यक्तिसे प्रतिग्रह (दान) लेना— ये तीन प्रकारकी वृत्ति (जीविका) मुनियोंने श्रेष्ठ (ब्राह्मण) वर्णके लिये कही है। शस्त्रोपजीवी होना तथा प्राणियोंकी रक्षा करना क्षत्रियवर्णका धर्म है। पशुपालन, कृषिकर्म तथा व्यापार वैश्यवर्णकी वृत्ति कही गयी है। द्विजातिमें भी आनुपूर्वी क्रमसे सेवा करनेका विधान* है। शूद्रका तो एकमात्र कर्तव्य है द्विजातिकी सेवा करना।
गुरुके सान्निध्यमें रहना, अग्निकी शुश्रूषा (अग्निहोत्र) करना तथा स्वाध्याय करना—यह ब्रह्मचारीका धर्म है। वह तीनों संध्याओंमें स्नानकर संध्याकालीन व्रतका पालन करे। स्नानकर्मसे निवृत्त होकर भिक्षाचरण करे। तदनन्तर गुरुके प्रति दत्तचित्त रहकर उनकी ही सेवामें आजीवन लगा रहे। वह नैष्ठिक ब्रह्मचारी कटिप्रदेशमें मूँजकी मेखला, सिरपर जटा, हाथमें दण्ड धारण करे। वह जटाओंको धारण न करके सिरका मुण्डन भी करा सकता है, किंतु उसको गुरुके आश्रयमें तो रहना ही चाहिये।
अग्निहोत्र-धर्मका पालन तथा कहे गये अपने विहित कर्मोंके अनुसार जीविकाका पालन, पर्वकी रात्रिको छोड़कर अन्य रात्रियोंमें धर्मपत्नीके साथ रति, (यथाशास्त्र) देवता, पितर तथा अतिथिगणोंकी विधिवत् पूजामें अहर्निश संलग्न रहना और श्रुतियों एवं स्मृतियोंमें कहे गये धर्मोंके अनुसार अर्थोपार्जन करना—यह गृहस्थोंका धर्म है।
जटाधारण, अग्निहोत्रका पालन, पृथ्वीपर शयन, मृगचर्मका धारण, वनमें निवास, दूध, मूल, फल तथा नीवारका भक्षण, निषिद्ध कर्मका परित्याग, तीनों संध्याओंमें स्नान, ब्रह्मचर्यका पालन और देवता तथा अतिथिकी पूजा—यह वानप्रस्थीका धर्म है।
सभी प्रकारके आरम्भोंका परित्याग, भिक्षासे प्राप्त अन्नका भोजन, वृक्षकी छायामें निवास, अपरिग्रह, अद्रोह, सभी प्राणियोंमें समानभाव,
*इसका आशय यह है—क्षत्रिय ब्राह्मणकी सेवा करे तथा वैश्य ब्राह्मण और क्षत्रियकी सेवा करे। (वैश्यके द्वारा क्षत्रियकी सेवाकी मर्यादा शास्त्रोंमें निर्धारित है।)
१८८- स्नान तथा संक्षेपमें संध्या-तर्पणकी विधि
३८२ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
प्रिय तथा अप्रियकी प्राप्तिमें एवं सुख और दुःखमें समान स्थिति, शरीरकी बाह्य और आभ्यन्तरिक शुद्धता, वाणीमें संयम, परमात्माका ध्यान, सभी इन्द्रियोंका निग्रह, धारणा तथा ध्यानमें तत्परता और भावशुद्धि—ये सभी परिव्राजक अर्थात् संन्यासीके धर्म कहे गये हैं।
अहिंसा, प्रिय और सत्यवचन, पवित्रता, क्षमा तथा दया सभी आश्रमों और वर्णोंका सामान्य धर्म है।* जैसा पूर्वमें कहा गया है उसीके अनुसार शास्त्रविहित अपने-अपने धर्मोंका पालन करनेवाले सभी लोग परमगति अर्थात् मोक्षको प्राप्त करते हैं।
हे शौनक! अब मैं प्रातःकाल जागनेसे लेकर रात्रिमें सोनेतक पालन करने योग्य गृहस्थके धर्मका वर्णन करता हूँ। गृहस्थको ब्राह्ममुहूर्तमें निद्राका परित्याग करके धर्म और अर्थका भली प्रकार चिन्तन करना चाहिये तथा शारीरिक कष्ट, उसकी उत्पत्तिके कारण और वेदोंमें कहे गये तत्त्वार्थका भी विचार करना चाहिये। ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर शौचादिक क्रियाओंसे निवृत्त होकर, स्नान करना चाहिये और निरलस भावसे समाहितचित्त होकर संध्योपासन करना चाहिये। दन्तधावन एवं स्नानके अनन्तर ही प्रातःकालिक संध्योपासन करना चाहिये। दिनमें मूत्र और मलका परित्याग उत्तराभिमुख होकर करे। रात्रिमें दक्षिणाभिमुख होकर करे। दोनों संध्याकालमें दिनके समान ही उत्तराभिमुख होकर मल-मूत्रका त्याग करना चाहिये। रात्रि और दिनमें छाया अथवा अन्धकारके कारण यदि दिशाविशेषका ज्ञान नहीं हो पा रहा है, अथवा कोई ऐसा भय उपस्थित है, जिसके कारण मरणकी सम्भावना है तो अपनी सुविधाके अनुसार जिस किसी भी दिशामें मुख करके मल-मूत्रका त्याग किया जा सकता है। गोमय, अग्निके दहकते अंगार, दीमककी बाँबी, जुते हुए खेत, जल, पवित्र स्थान, मार्ग और मार्गमें विद्यमान विधानयोग्य वृक्षकी छायामें न तो मूत्रका परित्याग करना चाहिये और न तो मलविसर्जन ही।
शौचके पश्चात् मिट्टीसे हाथ-पैर आदि साफ करनेके लिये जलके अन्दरसे, देवगृह, बाँबी, चूहेके बिल, दूसरेके उपयोगमें आयी हुई मिट्टीसे अवशिष्ट तथा श्मशान भूमिकी मिट्टी ग्रहण न करे। लघुशंका करनेपर लिंगमें एक बार, बायें हाथमें दो बार और दोनों हाथोंमें दो बार मिट्टी लगाकर जलसे प्रक्षालन करनेपर ही शुद्धि होती है। मलका परित्याग करनेपर लिंगमें एक बार, गुदामें तीन बार, बायें हाथमें दस बार तथा दोनों हाथोंमें सात बार, पैरोंमें पाँच बार और दायें हाथमें दस बार मिट्टीका लेप करके उन्हें जलसे स्वच्छ करे। प्रथम बार उपयोगमें लायी जानेवाली मिट्टीकी मात्रा आधा पसर होनी चाहिये। दूसरे और तीसरे बार जो मिट्टी उपयोगमें आती है उसकी मात्रा आधे पसरकी आधी हो जाती है। जो मनुष्य अस्वस्थताके कारण विष्ठा और मूत्रका परित्याग बैठकर नहीं कर सकता है, वह अभी बतायी गयी शास्त्रीय शुद्धिका आधा भागमात्र अपना सकता है। दिनमें विहित शुद्धिका आधा या चौथाई भाग रात्रिमें शुद्धिके लिये धर्मसम्मत है।
यह शुद्धिकी प्रक्रिया स्वस्थ व्यक्तिको लक्ष्य करके कही गयी है। जो व्यक्ति अस्वस्थताके कारण आर्त है, उसको यथासामर्थ्य ही शुद्धिकी प्रक्रिया अपनानी चाहिये। वसा, शुक्र, रक्त, मज्जा, लार, विष्ठा, मूत्र, कानका मैल, कफ, आँसू, आँखका मैल (कीचड़) और पसीना—ये मनुष्यके शरीरके बारह मल हैं। जबतक मनमें शुद्धताकी अवधारणा न हो जाय, तबतक इनके कारण अनुभवमें आनेवाली
* अहिंसा सूनृता वाणी सत्यशौचे क्षमा दया। वर्णिनां लिंगिनां चैव सामान्यो धर्म उच्यते॥ ( २१३। २२)
काण्ड ]
सदाचार एवं शौचाचारका निरूपण
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अशुद्धिके निराकरणमें लगे रहना चाहिये। यहाँपर शुद्धिकी संख्याका जो प्रमाण दिया गया है, वह श्रुतियों और स्मृतियोंके आदेशानुसार है।
शुद्धि दो प्रकारकी है—एक बाह्य और दूसरी आभ्यन्तरिक। मिट्टी तथा जलसे की जानेवाली शुद्धि बाह्य और भावोंकी शुद्धि ही आभ्यन्तरिक शुद्धि मानी गयी है। शुद्धिका प्रमुख अङ्ग आचमन है, यह तीन बार करना चाहिये। इसके बाद दो बार जलसे मुखका मार्जन, तदनन्तर अंगुष्ठके मूलसे मुखको धोकर तीन बार मुखका स्पर्श करना चाहिये। इसके बाद अंगुष्ठ और तर्जनीसे नासिकाका स्पर्शकर अंगुष्ठ तथा अनामिकासे नेत्र और कानका स्पर्श करना चाहिये। तत्पश्चात् कनिष्ठा और अंगुष्ठके द्वारा नाभिका स्पर्शकर हथेलीसे हृदयका स्पर्श करना चाहिये। इसके बाद अपनी सभी अंगुलियोंसे सिर और उनके (अंगुलियोंके) अग्रभागसे दोनों बाहुओंका स्पर्श करना चाहिये।
(अब आचमन तथा अंगोंके स्पर्शका फल बताया जाता है।) तीन बार जलका आचमन करके ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद—इन तीनों वेदोंको प्रसन्न करना चाहिये। पहले दो बार मुखका प्रक्षालन करनेसे अथर्वा (वेदविद् ब्राह्मण) और आङ्गिरस (बृहस्पति)-का मुखमें सन्निधान होता है। मुखभागका स्पर्श करनेपर आकाश, नासिका-भागका स्पर्श करनेपर वायु, नेत्रभागका स्पर्श करनेपर सूर्य, कानोंका स्पर्श करनेपर सभी दिशाओंका स्पर्श समझना चाहिये।* मुख तथा नासिका आदिका यथाविधि स्पर्श करनेसे इन अङ्गोंमें यथाक्रम इतिहास, पुराण एवं वेदाङ्ग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष) प्रतिष्ठित होते हैं। नाभिप्रदेशका स्पर्शकर प्राणग्रन्थिका और हृदयभागका स्पर्शकर ब्रह्माका स्पर्श समझना चाहिये। मूर्धाके स्पर्शसे रुद्र और शिखाके स्पर्शसे ऋषियोंको प्रसन्न किया जाता है। दोनों बाहुओंको स्पर्श करके यम, इन्द्र, वरुण, कुबेर, पृथिवी तथा अग्निदेवके सान्निध्यका लाभ प्राप्त होता है। अपने दोनों चरणोंमें जलका अभ्युक्षण भगवान् विष्णु और इन्द्र तथा दोनों हाथोंका प्रोक्षण करनेसे भगवान् विष्णुदेवका सांनिध्य प्राप्त होता है।
धार्मिक विधिके अनुसार पृथिवीका जलसे प्रोक्षण करनेसे वासुकि आदि नाग प्रसन्न होते हैं। धार्मिक विधिके मध्यमें जलका शास्त्रीय उपयोग करते समय उसके बिन्दुओंके गिरनेसे भूतोंके समूह तृप्ति प्राप्तकर प्रसन्न होते हैं। अंगुलियोंके पर्वोंपर अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्र और पर्वतसमूह निवास करते हैं। द्विजके हाथोंमें जो रेखाएँ होती हैं, उनमें गङ्गा आदि पवित्र नदियाँ स्थित रहती हैं। हाथके तलभागमें सभी तीर्थोंके साथ सोमका निवास है। इसीलिये हाथको पवित्र माना जाता है।
उषाकाल (सूर्योदयसे पूर्व रात्रिशेष) होनेपर यथाविधि शौच-क्रिया करनी चाहिये। तदनन्तर दन्तधावन (दतुअन) करके स्नान करे। मुखके पर्युषित (बासी) रहनेपर मनुष्य निश्चित ही अपवित्र रहता है। अतः मनुष्यको प्रातःकाल अवश्य ही दन्तधावन करना चाहिये। दन्तधावनके लिये कदम्ब, बिल्व, खैर, कनेर, बरगद, अर्जुन, यूथी, वृहती, जाती, करंज, अर्क, अतिमुक्तक, जामुन, महुआ, अपामार्ग (चिचड़ा—लटजीरा), शिरीष, गूलर, बाण तथा दूधवाले और कँटीले अन्य वृक्ष प्रशस्त होते हैं। कडुवे, तीते तथा कसैले काष्ठके जो वृक्ष हैं, उनकी दतुअन धन-धान्य, आरोग्य और सुखसे सम्पन्न करनेवाली होती है। पवित्र स्थानमें मनुष्य ऐसे वृक्षोंकी दतुअनको लेकर सबसे पहले उसको जलसे धो डाले। उसको दाँतोंसे चबा-चबाकर मुख
* मुख और नासिका आदिमें यथाक्रम आकाश तथा वायु आदिके अधिष्ठाता देवता सन्निहित हैं।