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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

पञ्चम लम्बक ४८९

पञ्चम लम्बक ४८९ और लौटकर उसने राजकर्मचारियों को आदेश दिया कि वे नगर में सुनने के लिए आश्चर्यजनक इस घोषणा को डिंडिम-घोष के साथ कर दें ॥५२॥ 'कोई भी ब्राह्मण या क्षत्रिययुवक जिसने कनकपुरी नाम की नगरी देखी हो, वह राज- दरबार में उपस्थित हो जाय, राजा उसे अपनी कन्या और युवराज-पद दोनों ही देंगे' ॥५३॥ सारे नगर में व्यापक रूप से आश्चर्यजनक यह घोषणा होने लगी ॥५४॥ 'आज कनकपुरी की यह क्या घोषणा की जा रही है, जो हम बूढ़ों ने भी कभी न देखी और सुनी' ॥५५॥ नगर-निवासी वृद्धजन इस घोषणा को सुनकर परस्पर इस प्रकार वार्तालाप करने लगे। नगर में एक भी व्यक्ति यह नहीं कह सका कि मैंने वह कनकपुरी देखी है ॥५६॥ इतने में ही उस नगर-निवासी वसुदेव के पुत्र शक्तिदेव ने भी यह घोषणा सुनी ॥५७॥ वह व्यसनी युवक उस समय जुए म दरिद्र हो चुका था। वह राजकुमारी की प्राप्ति के समाचार से उत्साहित होकर सोचने लगा ॥५८॥ 'मैं जुए में सब कुछ हार चुका हूँ, अतः अब मैं पिता के घर में प्रवेश नहीं पा सकता और न वेश्या के घर में ही जाकर रह सकता हूँ ॥५९॥ इसलिए जब मैं कहीं का भी न रहा, अतः अब अवसर है कि मैं झूठ बोलूँ कि मैंने यह नगरी देखी है ॥६०॥ मुझे झूठा कौन समझेगा। वह नगरी किसने देखी है। अतः सम्भव है राजकुमारी से मेरा समागम हो जाय ॥६१॥ ऐसा सोचकर उसने राजपुरुषों के समीप जाकर झूठ कह दिया कि मैंने कनकपुरी नगरी देखी है ॥६२॥ तब उन्होंने कहा—'आओ द्वारपाल उसके पास चलें'। उनके ऐसा कहने पर उनके साथ वह द्वारपाल के पास गया ॥६३॥ घोषणा करनेवालों ने कहा कि 'इसने कनकपुरी देखी है'। यह सुनकर द्वारपाल उसे स्वागत-सत्कार के साथ राजा के पास ले गया ॥६४॥ राजा के सम्मुख उपस्थित होकर भी उस धूर्त जुआरी ने ऐसे ही मिथ्या भाषण किया। सच है, जुए में हारे हुए धूर्त जुआरी के लिए कौन-सा कार्य दुष्कर है ॥६५॥ १२

४९ कथासरित्सागर

४९ कथासरित्सागर

राजापि निश्चय ज्ञात्वा ब्राह्मणं स विसृष्टवान्। तस्याः कनकरेखाया दुहितुर्निकटं तदा॥६६॥ तया च स प्रतीहारमुखाज्ज्ञात्वाऽन्तिकागतः। कञ्चित्त्वया सा कनकपुरी दृष्टेत्यपृच्छ्यत॥६७॥ बाढं मया सा नगरी दृष्टा विद्याथिना सता। भ्रमता भुवमित्येवं सोऽपि तां प्रत्यभाषत॥६८॥ केन मार्गेण तत्र त्वं गतवान् कीदृशी च सा। इति भूयस्तया पृष्टः स विप्रोऽप्येवमब्रवीत्॥६९॥ इतो हस्तिपुरं नाम नगरं गतवानहम्। ततोऽपि प्राप्तवानस्मि पुरीं वाराणसीं क्रमात्॥७०॥ वाराणस्याश्च विवर्द्धनगरं पौण्ड्रवर्धनम्। तस्मात् कनकपुर्याख्यां नगरीं तां गतोऽभवम्॥७१॥ दृष्टा मया च साभोगभूमिः सुकृतकर्मणाम्। अनिमेषैक्षणस्वाद्यशोभा शक्रपुरी यथा॥७२॥ तत्राधिगतविद्यश्च कालनाहमिहागमम्। इति तनास्मि गतवान् यथा सापि पुरीदृशी॥७३॥ एवं विरचितोक्तौ च धूर्ते तस्मिन्द्द्विजन्मनि। शक्तिदेवे महासं सा व्याजहार नृपात्मजा॥७४॥ अहो सत्यं महाब्राह्मण् दृष्टा सा नगरी त्वया। ब्रूहि ब्रूहि पुनस्तावत्केनासि गतवान् पथा॥७५॥ तच्छ्रुत्वा स यथा चाद्यं शक्तिदेवोऽकरोत् पुनः। तदा तं राजपुत्री सा चटीभिर्निरवासयत्॥७६॥ निर्वासिते ययौ चास्मिन्पितुः पार्श्वं तदब सा। किं सत्यमाह विप्रोऽसाविति पित्राप्यपृच्छ्यत॥७७॥ ततश्च सा राजसुता जगाद निजगाद तम्। तात राजापि भूत्वा त्वमविचार्येव चेष्टसे॥७८॥ किं न जानासि धूर्ता यद् वञ्चयन्त जनान्बहून्। स हि मिथ्यैव विप्रो मां प्रतारयितुमीहते॥७९॥ न पुनर्नगरी तेन दृष्टा सालोकवादिना। धूर्तेरनाकाशादद्य म्रियन्ते भुवि वञ्चनाः॥८०॥

पंचम लम्बक ४९१

पंचम लम्बक ४९१ राजा ने भी उसकी सत्यता जाँचने के लिए उसे राजकुमारी के पास भेज दिया ॥६६॥ राजकन्या ने द्वारपाल से समाचार सुनकर पास आये हुए उस ब्राह्मण से पूछा 'क्या तुमने कनकपुरी देखी है ? ॥६७॥ उसने स्वीकार करते हुए कहा कि विद्यार्थी-अवस्था में घूमते हुए उस नगरी को मैंने देखा था॥६८॥ 'किस प्रकार तुम वहाँ गये थे और वह कैसी नगरी है? राजकुमारी के पुनः इस प्रकार पूछने पर उस ब्राह्मण ने इस प्रकार कहा॥६९॥ यहाँ से मैं हरपुर नामक नगर में गया और वहाँ से चलकर क्रमशः वाराणसी पहुँचा ॥७०॥ वाराणसी से चलकर मैं पौण्ड्रवर्धन नामक नगर में पहुँचा और उसके पश्चात् मैं उस कनकपुरी नगरी में पहुँचा ॥७१॥ पुण्यात्माओं के लिए इन्द्रपुरी के समान वह भोगभूमि है। उसकी शोभा अपलक नेत्रों से देखने योग्य है॥७२॥ वहाँ विद्या प्राप्त कर कुछ समय पश्चात् मैं यहाँ आ गया ! इस प्रकार इस मार्ग से मैं गया और वह ऐसी नगरी है' ॥७३॥ उस धूर्त ब्राह्मण शक्तिदेव की इस प्रकार की बनावटी बातों को सुनकर राजकन्या मुस्कराती हुई बोली—'हे ब्राह्मण ! यह सत्य है कि तुमने वह नगरी देखी। किन्तु यह तो बताओ कि तुम उस नगरी में किस मार्ग से गये थे फिर से एक बार बताओ' ॥७४-७५॥ राजकुमारी के इस प्रकार पूछने पर जब शक्तिदेव पुनः धृष्टता करने पर उतारू हुआ तब राजकुमारी ने दासियों से कहकर उसे बाहर निकलवा दिया ॥७६॥ उसके निकल जाने पर राजपुत्री पिता के पास गई। पिता ने उससे पूछा कि 'वह ब्राह्मण सत्य कहता था अथवा नहीं ॥७७॥ तब वह राजपुत्री कहने लगी—'पिताजी आप राजा होकर भी ऐसी अविवेकपूर्ण बातें क्यों करते हैं? क्या आप नहीं जानते कि धूर्त जन सरल व्यक्तियों को ठग लेते हैं। यह ब्राह्मण झूठ बोलकर मुझे ठग लिया चाहता था। इस धूर्त ने कनकपुरी नहीं देखी है। धूर्त लोग अनेक प्रकार की ठगियाँ किया करते हैं॥७८-८०॥

४९२ कथासरित्सागर

४९२ कथासरित्सागर शिवमाधवधूर्तयो कथा शिवमाधववृत्तान्तं तथापि शृणु वच्मि ते। इत्युक्त्वा राजकन्या सा व्याजहार कथामिमाम् ॥८१॥ अस्ति रत्नपुरं नाम यथार्थं नगरोत्तमम्। शिवमाधवसंज्ञौ च धूर्तौ तत्र बभूवतुः ॥८२॥ परिवारीकृतानेकधूर्तौ तौ चक्रतुश्चिरम्। माया'प्रयोगनिःशेषमुषिताढ्यजनं पुरम् ॥८३॥ एकदा द्वौ च तावेव मन्त्रं विवक्षतुर्मिथः। इह नगरमावाभ्यां कृत्स्नं तावद् विलुञ्चितम् ॥८४॥ अत सम्प्रति गच्छावो वस्तुमुज्जयिनीं पुरीम्। तत्र सु श्रूयते राज्ञः पुरोधाः सुमहाधनः ॥८५॥ शङ्कुरस्वामिनामा च तस्माद्युक्त्या हृतैर्धनैः। मालवस्त्रीविलासानां यास्यामोऽत्र रसज्ञताम् ॥८६॥ आस्कन्दी दक्षिणार्थस्य स राज्ञः भृकुटीमुखः। सप्तकुम्भीनिधानो हि कीदृशो गीयते द्विजैः ॥८७॥ कन्यारत्नं च तस्यास्ति विप्रस्यैकमिति श्रुतम्। तदप्यतत्नसङ्गेन ध्रुवं तस्मादवाप्स्यते ॥८८॥ इति निश्चित्य कृत्वा च मिथः कर्तव्यसंविदम्। शिवमाधवधूर्तौ तु पुरात् प्रथमतुस्ततः ॥८९॥ शनद्दबोज्जयिनीं प्राप्य माधवः सपरिच्छदः। राजपुत्रस्य वषेण तस्थौ ग्रामे क्वचिद् बहिः ॥९०॥ शिवस्त्वनिकलं कृत्वा वणिक्वेषां विवेश ताम्। नगरीमेक एवाद्य बहुमायाविचक्षणः ॥९१॥ तत्राध्युवास क्षिप्राया मटिकां तीरसीमनि। दृश्यस्थापितमृद्गम्भिदाभाण्डमृगाजिनाम् ॥९२॥ १ मायाप्रयोगेण पूर्णतया, निःशेषं सम्पूर्णतया मुषितः बञ्चितः, आडूव्यः धनिजनः यस्य पुरस्य ईदृशं पुरमशेषयेत्यर्थः। २ बहुव्यचारिवस्त्रम्

पंचम लम्बक ४१६

पंचम लम्बक ४१६ 'सुनो मैं इस प्रसंग में तुम्हें शिव और माधव दो धूर्तों की कथा सुनाती हूँ। ऐसा कहकर उसने यह कथा सुनानी प्रारम्भ की ॥८१॥ शिव और माधव नामक धूर्तों की कथा सब नगरों में श्रेष्ठ रत्नपुर नाम का यथार्थ नामवाला एक नगर है। उसमें शिव और माधव नाम के दो धूर्त रहते थे ॥८२॥ उन्होंने अनेक ठगों का एक दल बनाकर अपनी ठगी के हथकंडों से नगर के सभी धनी व्यक्तियों को ठग लिया था ॥८३॥ एक बार उन दोनों ने आपस में यह विचार किया कि 'हमलोगों द्वारा यह सारा नगर ठग लिया गया है। अब इसे छोड़ कर चलें और उज्जैन में डेरा डालें। सुनते हैं कि वहाँ के राजा का पुरोहित बहुत बड़ा धनी है। उसका नाम शंकरस्वामी है। उससे धन लेकर मालवा देश की रमणियों के विलास का आनन्द लेंगे। वह आधी दक्षिणा का हिस्सेदार अर्थात् आधी फूस पर काम करनेवाला बढ़ी हुई भौंहोंवाला है। उसके पास सात घड़े स्वर्ण का खजाना है। किन्तु वह स्वयं बड़ा ही कृपण या अर्थपिशाच है—ऐसा ब्राह्मण लोग कहा करते हैं। उस ब्राह्मण की एक रूपलावण्या कन्या भी है। इसी प्रसंग में हमलोग उसे भी अवश्य प्राप्त कर सकेंगे' ॥८४-८८॥ ऐसा सोचकर और उसे ठगने की योजना बनाकर शिव और माधव दोनों धूर्त उस रत्नपुर नगर से उज्जैन को चले ॥८९॥ धीरे-धीरे उज्जैन पहुँचकर माधव तो नगर के बाहर किसी ग्राम में अपने को राजकुमार घोषित कर अपने साथियों के साथ ठहर गया ॥९० ॥ और अत्यन्त मायावी शिव भली-भाँति ब्रह्मचारी का वेष बनाकर उस उज्जयिनी नगरी में जा पहुँचा ॥ ९१॥ वह वहाँ जाकर क्षिप्रा नदी के तट के समीप किसी मठ में ठहर गया और अपने आसपास पूर्ण आडम्बर के लिए मिट्टी कुश भिक्षापात्र मृगचर्म आदि रख लिये ॥९२॥

४२४ कथासरित्सागर

४२४ कथासरित्सागर सा च प्रभातकार्याद्युनयन् मुखालिपत्। अवीचि¹कर्ममालपसूत्रपातमिवाचरन् ॥९३॥ सरित्तोये च स चिरं निमज्ज्यासीदवाङ्मुखः। कुकर्मजामिवाभ्यस्यन् भविष्यन्तीमधोगतिम् ॥९४॥ स्नानोत्थितोऽर्काभिमुखस्तस्थावूर्ध्वं चिरं च सः। शूलाधिरोपणौचित्यमात्मनो दर्शयन्निव ॥९५॥ ततो देवाग्रतो गत्वा बद्धकूर्चकरो जपन्। आस्त पद्मासनासीनः सदम्भश्चतुराननः² ॥९६॥ अन्तरा हृदयानीव साधूनां कतवेन सः। स्वच्छान्याहृत्य पुष्पाणि पुरारिं पर्यपूजयत् ॥९७॥ कृतपूजश्च भूयोऽपि मिथ्याजपपरोऽभवत्। दत्तावधानः कुसृतिष्विव³ ध्यानं सतान सः ॥९८॥ अपराह्णे च भिक्षार्थी कृष्णसाराजिनाम्बरः। पुरि तद्वञ्चनामायाकटाक्ष इव सोऽभ्रमत् ॥९९॥ आदाय द्विजगेहेभ्यो मौनी भिक्षात्रयं ततः। सदण्डाजिनकञ्चक्रे त्रिसत्यमिव सञ्चरन् ॥१००॥ भागं ददौ च काकेभ्यो भागमभ्यागताय च। भागेन दम्भबीजेन कुक्षिमस्रामपूरयत् ॥१०१॥ पुमः स सर्वपापानि निजानि गणयन्निव। जपन्नावर्त्तयामास चिरं मिथ्याक्षमालिकाम् ॥१०२॥ रजयामद्वितीयेन च स तस्यो मठान्तरे। अपि मूढ्मानि शेक्य तस्वस्थानानि पित्तयन् ॥१०३॥ एवं प्रतिदिनं कुर्वन् पट्टं व्याजमयं शत। स तत्रावर्जयामास नगरीस्वामिनां मनः ॥१०४॥ अहो तपस्वी शान्तोऽयमिति ख्यातिञ्च सर्वतः। उत्पादत तत्राम्य भक्तिगम्भीरिए जनः ॥१०५॥ १ अवीचिर्नाम नरकः, तद्भेदोस्तरमवीचिमहारौरवरौरवाः—इत्यमरः। २ धूर्तरूपम् चतुरं आननं यस्य सः। यस्य मुखं एव चातुर्यं प्रतिभामने रक्तः। ३ कुसृतिः—शाठ्यम्।

पंचम लम्बक ४१५

पंचम लम्बक ४१५ वह प्रातःकाल ही घनी और चिकनी मिट्टी से शरीर पर लेप करता था मानों बिना तरंगों के कीचड़ के लेप का मुखपाठ कर रहा हो ॥१९३॥ वह नदी के तट पर स्नान करके बहुत देर तक नीचे की ओर मुंह किये खड़ा रहता था मानों अपने कुकर्मों से होनेवाली अधोगति का अभ्यास कर रहा हो ॥१९४॥ स्नान करके उठा हुआ वह चिरकाल तक सूर्य की ओर मुंह करके खड़ा रहता था मानों अपने को शूली पर चढ़ाने के योग्य बना रहा हो ॥१९५॥ स्नान करके हाथ में कुशा की मुट्ठी लेकर जप करता हुआ वह पद्मासन लगाकर बैठा हुआ दम्भी ब्राह्मण के समान मालूम होता था ॥१९६॥ बीच-बीच में वह साधु पुरुषों के हृदयों के समान सुन्दर पुष्पों का हरण करके शिवजी की पूजा किया करता था ॥१९७॥ पूजन करने के पश्चात् भी वह जप करने की बनावटी मुद्रा बनाये रहता था मानों अपने कुकर्मों के फलस्वरूप प्राप्त होनेवाले नरकों का ध्यान करता हो ॥१९८॥ अपराह्न के समय वह मौन धारण करके द्विजो (ब्राह्मणो) के घरों से भिक्षा प्राप्त करने के लिए दण्ड लेकर और कृष्णाजिन¹ पहनकर जाता था और तीन भिक्षायें लेता था ॥१९९॥ और तीन गल्प के समान वह भिक्षा के तीन भाग करता था ॥२००॥ एक भाग कौवा का एक भाग अतिथि का और दम्भ के बीज के समान एक भाग से वह अपना पेट भरता था ॥२०१॥ भोजन के बाद मानों अपने पापों को गिनता हुआ वह फिर जप-माला लेकर जप करने का झूठा ढोंग रचा करता था ॥२०२॥ वह रात में उस मठ के अन्दर नगरनिवासियो के गूढ़म हरंख्याना को सोचता हुआ अकेला ही रहता था ॥२०३॥ इस प्रकार प्रतिदिन वंचनापूर्ण कपट रूप करते हुए उसने नागरिका के मन को अपनी ओर आकृष्ट कर लिया ॥२०४॥ ओह यह तो बड़ा ही शान्त तपस्वी है—इस प्रकार चारों ओर उसकी प्रसिद्धि हो गई और सभी नागरिक उनके सामन भक्ति से प्रणाम करने लगे ॥२०५॥ १ कृष्णाजिन = काले मृग का चर्म ।

४९६ कथासरित्सागर

४९६ कथासरित्सागर तावच्च स द्वितीयोऽस्य १ सक्ता चारमुखम् तम् । विज्ञाय माधवोऽप्येतन्नगरीं प्रविवेश ताम् ॥१०६॥ गृहीत्वा वसतिं चात्र दूरे देवकुलात्सरे । स राजपुत्रच्छन्ना सन् स्नातुं क्षिप्रातटं ययौ ॥१०७॥ स्नात्वा सानुचरो दृष्ट्वा ददर्श तपस्तत्परम् । तं शिवं परमश्रद्धो निपपातास्य पादयोः ॥१०८॥ जगाद च जनस्याग्रे नास्तीदृक्तपसोऽपरः । असकृद्धि मया दृष्टस्तीर्थान्येष भ्रमन्निति ॥१०९॥ शिवस्तु तं विलोक्यापि दृप्तस्तम्भितकन्धरः । तूष्णीमासीत्ततः सोऽपि माधवो वसतिं ययौ ॥११०॥ रात्रौ मिलित्वा चक्रतुर्भुक्त्वा पीत्वा च तावुभौ । मन्त्रयामासतुः शेषं कर्तव्यं यवतः परम् ॥१११॥ यामे च पश्चिमे स्वरमागात् स्वमठिकां शिवः । माधवोऽपि प्रभाते स्वं धूर्तमेकं समादिशत् ॥११२॥ एतद् गृहीत्वा गच्छ त्वं वस्त्रयुग्म मुपायनम् । शङ्करस्वामिनः पार्श्वमिह राजपुरोधसः ॥११३॥ राजपुत्रः परामूतो माधवो नाम गोत्रजः । पित्र्यं बहुगृहीत्वार्थमागतो दक्षिणापथात् ॥११४॥ समं कतिपयैरस्य राजपुत्रैरनुव्रतः । स चह युष्मदीयस्य राज्ञः सर्वां करिष्यति ॥११५॥ येन त्वद्दर्शनायाहं प्रेषितो यशसां निधे । इति त्वया सविनयं स च वाच्यः पुरोहितः ॥११६॥ एव स माधवेनोक्तो धूर्तः सम्प्रेषितस्तथा । जगामोपायनकरो गृहं तस्य पुरोधसः ॥११७॥ उपेत्यावसरे दत्त्वा प्राभृतं बिजने च तत् । तस्मै माधवसन्देशं शशंसि स्म यथोचितम् ॥११८॥ सो ऽप्युपायनलोभात्तन्मूढचे कल्पितायतिः । उपप्रदान लििप्सूनामङ्क ३ ग्याश्चर्यजोपभम् ॥११९॥ १ वणिग्वेशमभिनिर्मितं चीतं प्राचारकं चेति बुद्धम् । २ प्राभृतम् = उपायनम् । 'भेंट' इति भाषायाम् । ३ 'भेंट' 'घूस' इति प्रसिद्धम् ।

पंचम लम्बक ४९७

पंचम लम्बक ४९७ शिव के इस प्रकार अपना प्रभाव जमा लेने पर उसके दूसरे साथी माधव ने अपने गुप्तचरों से जानकर नगरी में प्रवेश किया ॥१०६॥ और शिव के स्थान से दूर एक मन्दिर में अपना निवास स्थिर किया। एक बार माधव राजपुत्र के नकली वेष में स्नान करने के लिए क्षिप्रा नदी के तट पर गया ॥१०७॥ स्नान करने के पश्चात् वह देव-मन्दिर में जप करते हुए शिव को देखकर अत्यन्त भक्ति- भाव से नम्र होकर उसके चरणों में गिर पड़ा ॥१०८॥ और जनता के सामने कहने लगा कि ऐसा दूसरा तपस्वी इस समय नहीं है। मैंने तीर्थों में भ्रमण करते हुए इस बात का बार-बार अनुभव किया है ॥१०९॥ शिव भी दम्भ से गर्दन टेढ़ी करके उसे देखता हुआ मौन ही रहा और माधव प्रणाम करके घर चला गया ॥११०॥ फिर रात में मिलकर और खा-पीकर उन दोनों ने अपने आगे के कर्त्तव्य की योजना बनाई। कुछ रात्रि शेष रहते ही शिव अपने मठ में लौट आया और माधव ने भी प्रातःकाल अपने साथियों में से एक धूर्त को आदेश दिया ॥१११-११२॥ कि ये दो वस्त्र (पागी और दुपट्टा) लेकर राजपुरोहित शंकरस्वामी के घर जाओ और उससे कहो कि अपने बन्धु-बान्धवों के द्वारा सताया गया माधव नामक राजकुमार दक्षिण देश से कुछ राजपुत्रों के साथ बहुत-सा धन लेकर यहाँ आया है। वह आपके राजा की सेवा करेगा ॥११३-११५॥ 'उसने आपके दर्शन के लिए (समय माँगने के लिए) मुझे आपके पास भेजा है' इस प्रकार नम्रता के साथ राजपुरोहितजी से कहना ॥११६॥ माधव द्वारा इस प्रकार कहा गया वह धूर्त हाथ में भेंट लिये उसने माधव का सन्देश उसे सुनाया ॥११७-११८॥ राजपुरोहित ने भी भविष्य में लाभ की कल्पना और वर्तमान में भेंट के लोभ में फँसकर उसकी बात मान ली। सच है लोभियों के लिए भेंट, उपहार आदि एकमात्र आकर्षणकारी औषधि हैं ॥११९॥ ६३

४१८ कथासरित्सागर

४१८ कथासरित्सागर तत प्रयागते तस्मिन्धूर्तेऽन्येषु स माधव । लब्धावकाशस्तमगात्स्वय द्रष्टु पुरोहितम् ॥१२०॥ धृतकार्पटिकाकारे राजपुत्रापदेशिभि । वृत पार्श्वचरैरातत्काव्यसण्डकलाञ्छन ॥१२१॥ पुरोगावेदितदनन्यभ्यगात्स पुरोहितम् । तेनाप्यभ्युद्गमानन्दस्वागतैरभ्यनन्दत ॥१२२॥ सततस्तेन सह स्थित्वा कथालापै क्षण च स । आययौ तदनुज्ञातो माधवो वसति निजाम् ॥१२३॥ द्वितीयेऽह्नि पुन प्रद्य प्रभूत वस्त्रयोर्युगम् । भूयोऽपि तमुपागच्छ पुरोहितमुवाच च ॥१२४॥ परिवारानुरोधेन किल सवाशिनो वयम् । तेन त्वमाधितोऽस्माभिरर्थमात्रास्ति न पुन ॥१२५॥ तच्छ्रुत्वा प्राप्तिमाशङ्क्य तस्मात्सोऽथ पुरोहित । प्रतिशुश्राव¹ तत्सस्मै माधवाय समीहितम् ॥१२६॥ क्षणाच्च गत्वा राजानमेतदर्थ व्यजिज्ञपत् । तद्गौरवेण राजापि तत्तथा प्रत्यपद्यत ॥१२७॥ अपरेऽह्नि च नीत्वा त माधव सपरिच्छदम् । नृपायादर्शयत्तस्मै स पुरोधा सगौरवम् ॥१२८॥ नृपोऽपि माधव दृष्ट्वा राजपुत्रोपमाकृतिम् । आदरेणानुजग्राह वृत्ति चास्य प्रदिष्टवान् ॥१२९॥ ततोऽत्र सवमानस्त नृप तस्मै स माधव । रात्रौ रात्रौ च मन्त्राय शिवेम समगच्छत ॥१३०॥ इहैव वस मद्गेह इति तेन पुरोधसा । सोऽभितश्चामवत्स्तोमादुपचारोपजीविना ॥१३१॥ तत सहचरी साक तस्यवाशिश्रियद् गृहम् । विनाशहेतुर्वासाय मद्गु स्कन्ध तरोरिव ॥१३२॥ कृत्वा कृत्रिममाणिक्यमयाभरणभृंतम् । भाण्ड च स्थापयामास तदीये कोषवेश्मनि ॥१३३॥ १ स्वीकार । २ 'विनाशहेतुर्वासोऽयमासीत् स्कन्धे तरोरिव' इति पुस्तकान्तरे पाठः। 'मद्गुः पानीयकाकिका' जलकुक्कुट इति प्रसिद्धः। मद्गुर्यस्मिन्व्रक्षे निवसति तमेवाश्वत्थं विनाशयति तथैव माधवोऽपि पुरोहितविनाशाय तद्गृहेऽवस्थितः।

पंचम लम्बक ४९९

पंचम लम्बक ४९९ उस धूर्त के लौट आने पर दूसरे दिन वह माधव मौका देखकर स्वयं पुरोहित से मिलने के लिए गया ॥१२० ॥ नकली राजपुत्र बना हुआ पथिक का वेष धारण किये हुए और अपने सभी धूर्त्तों के साथ लाठी आदि लिये हुए सेवकों से युक्त वह माधव पहले से ही अपने आगमन की सूचना देकर, राजपुरोहित से मिला ॥१२१॥ पुरोहित ने भी अगवानी के लिए आगे जाकर प्रसन्नता प्रकट करते हुए उसका स्वागत और अभिनन्दन किया ॥१२२॥ माधव कुछ समय तक उसके साथ बैठकर और इधर-उधर की बातें करके तत्पश्चात् राजपुरोहित से आज्ञा लेकर अपने घर लौट आया ॥१२३॥ दूसरे दिन फिर से एक भेंट (उपहार) भेजकर माधव पुरोहित के पास गया और बोला कि हम अपने कुटुम्ब के भरण-पोषण के लिए सेवावृत्ति (नौकरी) करना चाहते हैं इसीलिए आपकी सेवा में उपस्थित हुए हैं। वैसे तो हमारे पास धन की कुछ मात्रा है ॥१२४-१२५॥ यह सुनकर उस पुरोहित ने उससे कुछ (घूस) प्राप्ति की आशा से माधव की इच्छा पूर्ति करना अर्थात् नौकरी दिलाना स्वीकार किया ॥१२६॥ और तुरन्त राजा के पास माधव को ले जाकर, उसके प्रशंसनीय परिचय का बयान करते हुए गौरव के साथ उसे राजा से मिला दिया ॥१२७-१२८॥ राजा ने भी राजकुमार के समान आकृतिवाले माधव को देखकर आदर के साथ उस पर कृपा की और उसे नौकरी पर नियुक्त करा दिया ॥१२९॥ इस प्रकार माधव दिन में राजसेवा में लगा रहता था और रात में मित्र से मिलकर ठगी की योजना बनाया करता था ॥१३० ॥ कुछ दिनों के उपरान्त लोभी पुरोहित ने माधव से कहा कि 'तुम यहीं मेरे घर पर ही रहा करो' ॥१३१॥ पुरोहित के आग्रह करने पर उसके ही माल का अपहरण माधव अपने धूर्त मित्रों के साथ उसके घर पर उसी प्रकार रहने लगा जैसे 'मद्गु' नामक जन्तु (पक्षी) वृक्ष पर रहा करता है। माधव ने नकली माणिक के कुछ गहने बनवाकर एक पेटी में बन्द किये और उस पेटी को उसने पुरोहित के खजाने में रखवा दिया ॥१३२ १३३॥

५ कथासरित्सागर

५ कथासरित्सागर अन्तरा च तदुद्घाट्य तस्तैव्याभार्धदर्शिते । जहाराभरणैस्तस्य धर्म्मैरिव पक्ष्मोर्त्तनम् ॥ १३४ ॥ विश्वस्तं च ततस्तस्मिन्पुरोधसि चकार सः । मान्द्यमल्पतराहारकृशीकृततनूर्मुषा ॥ १३५ ॥ याते कतिपयाह्वं च तं शय्योपान्तवर्त्तिनम् । पुरोहितं स वक्ति स्म धूर्त्तराजोऽल्पया गिरा¹ ॥ १३६ ॥ मम तावच्छरीरेऽस्मिन्वर्तते विषमा दशा । तद्विप्रवर ! कञ्चित्त्वं ब्राह्मणोत्तममानय ॥ १३७ ॥ यस्मै दास्यामि सर्वस्वमिहामुत्र च शर्मणे । अस्थिरे जीवित ह्यास्था का धनेषु मनस्विनः ॥ १३८ ॥ इत्युक्तः स पुरोधाश्च तेन दानोपजीवकः । एवं करोमीत्याह स्म सोऽपतच्चास्य पादयोः ॥ १३९ ॥ ततः स ब्राह्मणं यं यमानिनाय पुरोहितः । विक्षेपच्छात्रिमात्तं तं श्रद्दधे न स माधवः ॥ १४० ॥ तद्बुद्ध्वा तस्य पार्श्वस्थो धूर्त्त एकोऽब्रवीदिदम् । न तावदस्मै सामान्यो विप्रः प्रायेण रोचते ॥ १४१ ॥ तद्य एष शिवो नाम शिप्रातीरे महातपाः । स्थितः सम्प्रति मात्यस्य न वेत्यसन्निरूप्यताम् ॥ १४२ ॥ सच्छ्रुत्वा माधवोऽवादीत् कृतार्थस्तं पुरोहितम् । हन्त ! प्रसीदानय तं विप्रो मान्यो हि तापसः ॥ १४३ ॥ इत्युक्तस्तेन च ययौ स शिवस्यान्तिकं ततः । पुरोधास्तमपश्यच्च रचितध्याननिश्चलम् ॥ १४४ ॥ उपाविशच्च तस्याग्रे ततः कृत्वा प्रदक्षिणम् । तत्क्षणं सोऽपि धूर्त्तोऽभूच्छनैरून्मीलितेक्षणः ॥ १४५ ॥ ततः प्रणम्य तं प्राज्ञः स उवाच पुरोहितः । न चत्कुप्यसि तत्किञ्चित्प्रभो विज्ञापयाम्यहम् ॥ १४६ ॥ तन्निशम्य च तेनोष्ठपुटोन्नमनसञ्ज्ञया । अनुज्ञातं शिवेनैव तमवादीत्पुरोहितः ॥ १४७॥ १ दुर्बलत्वात् मन्दस्वरेण संक्षेपेण वा।

पंचम लम्बक ५०१

पंचम लम्बक ५०१

बीच-बीच में उस पेटी का खोलकर माधव पुरोहित के मन को इस प्रकार ललचाता रहा जैसे घास दिखा-दिखाकर पशु को ललचाया जाता है ॥१३४॥

कुछ दिनों पश्चात् पुरोहित के विश्वस्त होजाने पर माधव ने भोजन कम करके अपने को जान-बूझकर अत्यन्त दुर्बल बना लिया ॥१३५॥

कुछ दिन व्यतीत होने पर एक बार उसकी शय्या के पास बैठे हुए पुरोहित को धूर्तराज माधव ने क्षीण स्वर में कहा—॥१३६॥

हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, मेरे शरीर की दशा दिनानुदिन बिगड़ती जा रही है। इसलिए तुम किसी अच्छे सत्पात्र ब्राह्मण को लाओ ॥१३७॥

जिस मैं इहलोक और परलोक के कल्याणार्थ अपना सब कुछ दान कर दूँ। महान् व्यक्ति इस अस्थिर जीवन में धन के प्रति श्रद्धा या प्रेम नहीं रखते ॥१३८॥

दान से जीविन रहनेवाला लालची पुरोहित माधव के इस प्रकार कहने पर उससे बोला कि 'ऐसा ही करूँगा'।—पुरोहित के ऐसा कहने पर वह धूर्त माधव उसके पैरों पर गिर पड़ा ॥१३९॥

तदनन्तर पुरोहित जिस-जिस ब्राह्मण को उसके पास लाता उसे माधव किसी विशेष कारण से अयोग्य बता देता ॥१४०॥

यह देखकर माधव के पास बैठा हुआ उसका साथी एक धूर्त उस पुरोहित से बोला— 'इनको साधारण ब्राह्मण पसन्द नहीं आते। इसलिए शिप्रा नदी के किनारे शिव नाम का एक ब्राह्मण आजकल रहता है। वह इन्हें भाता है या नहीं देखो। यह सुनकर दुःखी मुँह बनाकर माधव पुरोहित से बोला— 'हाँ हाँ कृपा करके उसी ब्राह्मण को ले आओ। उसके समान ब्राह्मण दूसरा नहीं है' ॥१४१—१४३॥

माधव से इस प्रकार कहा गया राजपुरोहित शिव के पास गया और वहाँ उसने शिव को कपट ध्यान-मुद्रा में निश्चल बैठा देखा ॥१४४॥

यह देखकर पुरोहित उसकी प्रदक्षिणा करके उसके आगे नम्र होकर बैठ गया। उस धूर्त शिव ने भी धीरे-धीरे आँखें खोलकर उसकी ओर देखा ॥१४५॥

तब पुरोहित ने झुककर प्रणाम किया और कहा—'हे प्रभु, यदि आप क्रोध न करें, तो कुछ निवेदन करूँ' ॥१४६॥

पुरोहित से यह सुनकर शिव ने अपने ओठों को उठाकर संकेत करते हुए उसे कहने की आज्ञा दी। तदनन्तर पुरोहित इस प्रकार कहने लगा—॥१४७॥

कथासरित्सागर

५२ कथासरित्सागर

इह स्थितो वणिग्भार्यो गजपुत्रो महाधनः। माधवस्य स चास्वस्थः सर्वस्वं दातुमुद्यतः ॥१४८॥ मन्यसे यदि तत्तुभ्यं स सर्वं तत्प्रयच्छति। नानानर्घमहारत्नमयालंकरणोज्ज्वलम् ॥१४९॥ तच्छ्रुत्वा स शनैर्मुग्धस्मीन किल शिवोऽब्रवीत्। ब्रह्मन् ! भिक्षाशनस्यार्थे कोऽर्थो मे ब्रह्मचारिणः ॥१५० ॥ ततः पुरोहितोऽप्येवं स तं पुनरभाषत। भव वादीन्महाब्रह्मन् ! किं न वेत्स्याधमक्रमम् ॥१५१॥ कृतदारो गृहे कुर्वन्देवपित्रतिथिक्रियाः। धर्मस्त्रिवर्गं प्राप्नोति गृही ह्याश्रमिणां वरः ॥१५२॥ ततः सोऽपि शिवोऽवादीत् कुतो मे दारसङ्ग्रहः। नाह्याहं परिणेष्यामि कुलाद्यावृतावृतास् ॥१५३॥ तच्छ्रुत्वा सुक्षमोम्यं च मत्वा तस्य तथा धनम्। स प्राप्तावसरो लुब्धः पुरोधस्तमभाषत ॥१५४॥ अस्ति सर्हि सुता कन्या जिनस्वामिनीति मे। अतिरूपवती सा च तां च तुभ्यं ददाम्यहम् ॥१५५॥ यच्च प्रतिग्रहधनं तस्मात् प्राप्नोषि माधवात्। तदहं तव रक्षामि त्वम्भाजस्व गृहाश्रमम् ॥१५६॥ इत्याकर्ण्य स सम्प्रन्नयथेष्टार्थः शिवोऽब्रवीत्। ब्रह्मन् प्रहस्तवाय चरात्करोमि वचस्तव ॥१५७॥ हेमरत्नस्वरूपे तु मुग्ध एवास्मि तापसः। त्वद्वचांस्यव प्रवर्त्तेऽहं यथा वेत्सि तथा कुरु ॥१५८॥ एतच्छिववचः श्रुत्वा परितुष्टस्तथेति तम्। मूढो निनाय गेहं स्वं सबैव स पुरोहितः ॥१५९॥ सन्निवेश्य च तत्रैनं शिवाख्यमशिवं ततः। प्रद्यावृतो धादावैनन्माधवायाभिसन्दधे ॥१६० ॥ तदैव च ददौ तस्मै युतां कलशविवर्णिताम्। निजां शिवाय सन्न्यसिमिव मूढत्वहारिताम्१ ॥१६१॥


१ स्वमूर्खतया अपहारितामिति भावः।

पंचम लम्बक ५०१

पंचम लम्बक ५०१ 'दक्षिण देश का एक महाधनी माधव नाम का राजकुमार यहाँ उज्जैन में ठहरा है। वह वदान्य है और अपना सर्वस्व दान करना चाहता है। यदि आप स्वीकार करें, तो वह सब आपको ही देना चाहता है। उसके पास अनेक प्रकार के रत्न-जटित आभूषण हैं' ॥१४८-१४९॥ पुरोहित की यह बात सुनकर वह धूर्त शिव धीरे-धीरे मौन छोड़कर बोला महाराज! भिक्षामान से जीवित रहनेवाले मुझ ब्राह्मण को धन से क्या प्रयोजन ? ॥१५० ॥ तब वह पुरोहित फिर बोला--हे ब्राह्मण देवता ! ऐसा न कहो। क्या तुम आश्रमों का क्रम नहीं जानते ? अर्थात् अब तुम्हें गृहस्थाश्रम में प्रवेश करना है जिसमें धन की ही आवश्यकता पड़ेगी। १५१॥ विवाह के उपरान्त मनुष्य देवता पितर और अतिथियों की सेवा करके धर्म अर्थ और काम इन तीन पुरुषार्थों को प्राप्त करता है क्योंकि गृहस्थी ही चारों आश्रमों में श्रेष्ठ है' ॥१५२॥ तब वह शिव बोला- 'मेरा विवाह कहाँ हो सकता है। मैं ऐसे-वैसे साधारण कुल से विवाह न करूँगा' ॥१५३॥ यह सुनकर और राजकुमार की ओर से दान दिये जानेवाले धन को जीवन-भर सुख भोगने के लिए पर्याप्त समझकर लालची पुरोहित अवसर पाकर शिव से बोला- 'यदि ऐसा आपका निश्चय है तो मेरी विनयस्वामिनी नाम की अत्यन्त सुन्दरी कन्या है। उसे मैं दान करके तुम्हें दे दूँगा और माधव द्वारा दान में जो धन तुम्हे मिलेगा उसे मैं सुरक्षित रखूँगा। इसलिए तुम अब गृहस्थाश्रम में प्रवेश करो' ॥१५४-१५६॥ यह सुनकर और अपनी योजना को पूर्ण रूप से सफल होते देखकर धूर्त शिव ने कहा--'हे ब्राह्मणदेव ! यदि तुम्हारा यही आग्रह है, तो मैं तुम्हारी बात मान लेता हूँ। रत्न और सोना आदि धन के सम्बन्ध में तो मैं तपस्वी मूर्ख ही हूँ किन्तु तुम्हारे आग्रह से मैं तैयार हो जाता हूँ जैसा उचित समझो करो ॥१५७-१५८॥ इस प्रकार शिव की बातें सुनकर प्रसन्न पुरोहित उस अशिव (अकल्याण) शिव को वैसे ही अपने घर ले गया ॥१५९॥ शिव को बैठाकर उसके साथ जो कुछ वार्तालाप हुआ था वह सब पुरोहित ने माधव से कहा। माधव ने भी उसकी पर्याप्त प्रशंसा की॥ १६० ॥ उसी समय बड़े कष्ट से पाली हुई कन्या पुरोहित ने जाकर शिव को समर्पित कर दी मानों जीवन-भर की अपनी कमाई उसने अपनी मूर्खता से गँवा दी ॥ १६१॥

कृत्तोद्वाहं तृतीयेऽह्नि प्रतिगृह्णन्ते न सम्। निनाय व्याजमन्दस्य¹ माधवस्य ततोऽन्तिकम् ॥१६२॥ अतथ्यैतपसं वन्दे स्वामित्यवितथं वदन्। माधवोऽप्यपतत्तस्य शिवस्योत्थाय पादयोः ॥१६३॥ ददौ च तस्य विधिवत् कोषागारादाहृतम्। भूरिकृत्रिममाणिक्यमयाभरणभाण्डकम् ॥१६४॥ शिवोऽपि प्रतिगृह्यैतत्तस्य हस्ते पुरोधसः। नाहं वेद्मि त्वमेवैतद् वेत्सीत्युक्त्वा समर्पयत् ॥१६५॥ अङ्गीकृतमिदं पूर्वं मया चिन्ता तवात्र का। इत्युक्त्वा सञ्च जग्राह तत्क्षणं स पुरोहितः ॥१६६॥ कृतातिथिं सतो याते स्ववधूवासकं शिवे। नीत्वा स स्थापयामास सन्निजे कोषवेश्मनि ॥१६७॥ माधवोऽपि तदन्यद्युर्मान्याव्याजं शनैस्त्यजन्। रोगोपशान्तिं वक्ति स्म महादानप्रभावतः ॥१६८॥ त्वया धर्मसहायेन समुत्तीर्णोऽस्म्यपापतः। इति शान्तिकमायान्तं प्रशशंस पुरोहितम् ॥१६९॥ एतत्प्रभावादेतन्मे शरीरमिति कीर्तयन्। प्रकाशमद धक्त च शिवेन सह मित्राम् ॥१७०॥ शिवोऽपि यातेषु दिनेष्ववादीत्तं पुरोहितम्। एवमेव भवद्गेहे भोक्ष्यते न स्त्रियामया ॥१७१॥ तर्हि त्वमेव मूल्येन गृह्णास्याभरणं न सत्। महार्हमिति वेन्मूल्यं यथासम्भावि देहि मे ॥१७२॥ तच्छ्रुत्वा तन्नधं च मत्वा तन्निष्क्रयं ददौ। तन्नति तस्म सर्वस्वं शिवाय स पुरोहितः ॥१७३॥ तदद्य च स्वहस्तन जीवं रूप्यमकारयत्। स्वयं बाष्पकरोत् शुद्धवा तच्च स्वधनाधिकम् ॥१७४॥ अन्योऽयल्लिम्पितं हस्ते गृहीत्वा स पुरोहितः। पृष्टगामीत्युपक्रमोऽपि शिवो भेजे गृहस्थितिम् ॥१७५॥


१ मुधा रोप्याभ्यसं कृतवतः।

पंचम स्तम्बक ५५ विवाह होने के तीसरे दिन पुरोहित द्विज को कपट से बीमार बने हुए माधव के पास ले गया ॥१६२॥ 'बहुश्रुत तप करनेवाले आपको प्रणाम करता हूँ'—इन शब्दों से माधव ने द्विज का अभिवादन करके और उठकर उसके चरणों का स्पर्श किया ॥१६३॥ और पुरोहित ने स्वयं खजाने से निकालकर मरकती माणिक आदि रत्नों के आभूषणों और रत्नों से भरी हुई पेटी उसे दे दी ॥१६४॥ द्विज ने भी उसे लेकर पुनः पुरोहित को सौंप दिया और पुरोहित ने भी यह कहकर उसे ले लिया कि 'यह तो मैंने पहले ही स्वीकार कर लिया है तुम्हें इसकी क्या चिन्ता है' इस प्रकार आशीर्वाद देकर द्विज के अपने शयनागार में चले जाने पर पुरोहित ने उस रत्नपेटी को तुरन्त अपने खजाने में रख दिया ॥१६५-१६७॥ दूसरे दिन माधव भी अपनी दुर्बलता को छोड़कर महादान के प्रभाव से स्वस्थ होने का ढोंग रचने लगा ॥१६८॥ 'तुमने मेरे धर्म-कार्य में सहायता देकर मेरा बहुत बड़ा उपकार किया'—इस प्रकार रात में आये हुये पुरोहित की प्रशंसा करने लगा ॥१६९॥ 'द्विज जैसे तपस्वी के प्रभाव से मेरा शरीर स्वस्थ हो गया। मैं बच गया' इस प्रकार कहकर उसने द्विज के साथ प्रकट रूप से मित्रता कर ली ॥१७०॥ कुछ दिनों के पश्चात् द्विज ने भी पुरोहित से कहा—'मैं इस प्रकार कितने दिनों तक तुम्हारे यहाँ भोजन करता रहूँगा इसलिए तुम ही दान में दिये माल का मूल्य चुकाकर उन आभूषणों और रत्नों को क्यों नहीं ले लेते। यदि माल अधिक द्रव्य का हो तो यथासंभव इस समय जो दे सकते हो वही देदो' ॥१७१॥-॥१७२॥ यह सुनकर और उस माल को बहुमूल्य या अमूल्य समझकर पुरोहित ने उस माल का कुछ मूल्य दे दिया ॥१७३॥ और इसकी दृढ़ता के लिए द्विज से हस्ताक्षर कराकर उसका प्रमाण-पत्र भी राज- पुरोहित ने ले लिया। इस प्रकार, पुरोहित ने उसके धन से अपने धन को बढ़ा लिया ॥१७४॥ इसी प्रकार दोनों ने परस्पर लिखित रूप से धन ले-देकर प्रमाणपत्र लिख दिये और अलग-अलग हो गये। द्विज ने भी अपना अलग घर बसा लिया ॥१७५॥ १४

५६ कथासरित्सागर

५६ कथासरित्सागर ततश्च स शिवः सोऽपि माधवः सङ्गतावुभौ। पुरोहितार्थान् भुञ्जानौ यथेच्छं तत्र तस्थतुः ॥१७६॥ गते काले च मूल्यार्थी स पुरोधाः किलापणम्। ततोऽलङ्कारमादाय विक्रेतुं कटकं ययौ ॥१७७॥ तत्रतद्रत्नतत्त्वज्ञाः परीक्ष्य वणिजोऽब्रुवन्। अहो कस्यास्ति विज्ञानं यनैतत्कृत्रिमं कृतम् ॥१७८॥ काचस्फटिकखण्डा हि नाना रागोपरञ्जिताः। रीतिबद्धा१ इमे नैते मणयो न च काञ्चनम् ॥१७९॥ तच्छ्रुत्वा विह्वलो गत्वा स पुरोधास्तथैव सन्। आनीयाभरणं गेहात् कृत्स्नं तेषामदर्शयत् ॥१८०॥ ते दृष्ट्वा तत्तदेवाच्य सर्वं कृत्रिममेव तत्। ऊचिरे च स तच्छ्रुत्वा वज्राहत इवाभवत् ॥१८१॥ ततश्च गत्वा तत्कालं स मूढः शिवमभ्यधात्। गृहाण स्वानलङ्कारांस्त्वं देहि निजं धनम् ॥१८२॥ कुतो ममाद्यापि धनं तदद्ययावद् गृहे मया। कालेन भुक्तमिति तं शिवोऽपि प्रत्यभाषत ॥१८३॥ ततो विवदमानौ तौ पार्श्वावस्थितमाधवम्। पुरोधाश्च शिवश्चोभौ राजानमुपजग्मतुः ॥१८४॥ काचस्फटिकयोः खण्डै रीतिबद्धैः सुरञ्जितैः। रचितं देव तत्रेण व्याजात्तङ्करणं महत् ॥१८५॥ शिवेन मम सर्वस्वमजानतस्य भक्षितम्। इति विज्ञापयामास नृपतिं स पुरोहितः ॥१८६॥ ततः शिवोऽब्रवीद्राजन्ना धाव्यास्रापसोऽभवम्। अनेनैव तदभ्यर्णे प्राहितोऽहं प्रतिग्रहम् ॥१८७॥ तदैव भाषितं चास्य मुग्धेनापि सता मया। रत्नादिविद्यानभिज्ञस्य प्रमाणं मे भवानिति ॥१८८॥ अहं स्थितस्त्वथानेति प्रत्ययश्चात्र नृप त्वयि। प्रतिगृह्य च तत्सर्वं हस्तेऽस्यैव मयार्पितम् ॥१८९॥ १ रीतिः पित्तलम् तस्मिन् बद्धाः - जडिताः।

पंचम लम्बक ५७

पंचम लम्बक ५७ तदुपरान्त वह शिव और माधव परस्पर मिलकर पुरोहित का धन उड़ाते हुए स्वतन्त्र रूप से रहने लगे ॥१७६॥ कुछ समय के पश्चात् पुरोहित रत्न और आभूषण बेचकर रुपये लेने के लिए जौहरी के बाजार में गया और उन आभूषणों में से एक कड़ा या हाथ का कंगन बेचने लगा ॥१७७॥ वहाँ पर रत्नपरीक्षक जौहरियों ने उसको परीक्षा करके पुरोहित से कहा—'यह कौन चतुर कारीगर है जिसने इस नकली माल को बनाया है ॥१७८॥ भिन्न-भिन्न रंगों में रँगे हुए कांच और स्फटिक के टुकड़ों को पीतल में ऐसा जड़ दिया गया है कि वे सच्चे रत्न-से प्रतीत होते हैं। किन्तु ये सब नकली रत्न हैं असली एक भी नहीं ॥१७९॥ यह सुनकर घबराया हुआ पुरोहित घर से सब आभूषणों को लेकर माधव को दिखाने के लिए उसके पास ले गया ॥१८०॥ यह देखकर माधव बोला कि 'यह तो तुम्हारे ही सब असली गहन या आभूषण हैं। तुमने असली आभूषण पहले ही निकाल लिये और नकली बनवाकर रख दिये ॥१८१॥ यह सुनकर पुरोहित पर मानो वज्रपात-सा हुआ और वह तुरन्त शिव के पास जाकर कहने लगा कि अपने आभूषण ले लो और मेरा धन मुझे दे दो ॥१८२॥ उत्तर में शिव ने कहा—अब मेरे पास तुम्हारा धन कहाँ रह गया वह तो मैंने इतने समय तक खा डाला' ॥१८३॥ इस प्रकार झगड़ते हुए वे दोनों शिव और पुरोहित माधव को साथ लेकर राजा के पास गये। राजा से पुरोहित ने प्रार्थना की—महाराज ! पीतल में विशेष प्रकार से जड़े हुए काँच और स्फटिक के रंगीन टुकड़ों से बने हुए नकली आभूषणों से मुझे ठगकर शिव ने मेरा सर्वस्व नष्ट किया' ॥१८४-१८५॥ तब शिव ने राजा से कहा—'राजन् ! मैं बाल्यावस्था से ही तपस्वी ब्रह्मचारी रहा। इसी ने आग्रह करके मुझ पर दान लेने के लिए बाध्य किया। मैंने इस सम्बन्ध में अपनी मूर्खता (अनभिज्ञता) बताते हुए इससे उसी समय कह दिया था कि मैं रत्न और सोने के सम्बन्ध में सर्वथा अनभिज्ञ हूँ और मुझे इनका कुछ पता नहीं। इस सम्बन्ध में मुझ जैसा समझो करो ॥१८६-१८८॥ 'मैं तुम्हारे कथन से तृप्त हो गया हूँ'—इसने इस बात को स्वीकार किया था। इसीलिए मैंने दान लेकर उसे उसी समय इसे सौंप दिया था ॥१८९॥

गताजन पुरीतं गच्छन्तो मुञ्चन य प्रभो। भिदन पादयोरत्र त्यक्तसङ्गिस मिष॥१२०॥ पन्था पदं गणय्य परं प्रानाय्यत प्रभु। तव शिर गतालोकात्तन्नाम स च मापय ॥१२१॥ परमान्ति मान्येऽन्यमरण्यो ममान च। न गृहीतं मदा किञ्चिद् भरता वा विस्रज्य वा॥१२२॥ पश्चात् पश्चादनुव्रज्य मामाहारं विधत्सन्। मनः संशय मानीत महा भाग विनिर्गमन्॥१२३॥ यद्य दो यन्मदत्तं म च स्नानि तानि यद्। शङ्कितानिस्ततोऽनानां प्रवनात्तु स पश्यन्॥१२४॥ निर्व्याजं भजन मानं च प्रत्यया मम। दत्तः पञ्चादिशोऽस्मि दशगणविपुस्तगम् ॥१२५॥ जन्निप्रवणस्त्वामस्याय यद माधवा व्रजन् मागंणां चा गदा तस्य सुधार षा॥१२६॥ परम तत्त्वं विनिश्चयाधस्त्वं नित्यन्तः बार परिहृत्य समार्गात् सनार्थमन्चितः॥१२७॥ पुराण्डि माथ दत्तो जरितार्थो विरञ्चितः। काल वि मानं रघुतिस्यानपङ्किलः॥१२८॥ तो व पृथ्वी मन्वाग मन्दानु विरमादशे। ऽनेकशतसहस्रान्तर्भावितानो विमृष्टः॥१२९॥ एव मन्वान सविद्वान कर्म नयम्। अनाशानैः १ पूर्णां कातश पावन २४॥ ॥ लब्धं लब्धं कस्यैचिद् दर्शितं वपुः। राजोऽथ कस्यचित् तस्मै व्यभाष्ट विलोकिनः ॥२५॥ स महामुनेः रूपं दृष्ट्वा सुदृष्टवान्। किञ्चिदुवाच तत् सर्वं शृणुध्वं सविस्तरम् विदाः ॥ ॥ रतिवर्मसुतो राजा रतिषेणोऽभवत् पुरा। विदेह विषये पूर्वं नगरे पुरसञ्चये ॥ पुरन्दर इवासीत् सौन्दर्येण समो नृणाम्। प्रियंवदस्य नृपतेः प्रियंवदाभवत् सुता ॥