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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

१८ कथासरित्सागर

१८ कथासरित्सागर स दयालुः समाश्वास्य तां स्वमाश्रममानयत्। यमुने तव पाल्येयमिति च न्यस्तवान् मयि ॥८२॥ वलात्तटादियं प्राप्ता मयेति स महामुनिः। नाम्ना तामकरोद्वेलां बालां मुनिजनप्रियाम् ॥८३॥ तत्स्नेहेन च चित्तं मेऽप्यस्तस्नेहकृपामयम्। ब्रह्मचर्यनिरस्तोऽपि हा संसारोऽथ बाधते ॥८४॥ आपाणिग्रहणां तां च नवयौवनशोभिनीम्। ब्रूयत चन्द्रसारैतां वर्द्ध दर्शं मनो मम ॥८५॥ सा च प्राग्जन्मभार्या ते बुद्ध्वा च त्वामिहागतम्। प्रणिधानादहं पुत्र सम्प्राप्तैषा तवान्तिकम् ॥८६॥ तदागच्छापयच्छस्व वेलां तामस्मदर्पिताम्। क्लेशोऽनुभूतः साफल्यं भजतां युवयोरयम् ॥८७॥ इत्यानन्द्य गिराऽभ्रवृष्ट्येव नयति स्म सा। यमुना मां भगवती मातङ्गस्याश्रमं पितुः ॥८८॥ विज्ञप्तश्च तया तत्र तां मातङ्गमुनिः स मे। ददौ वत्सां मनोगम्यसम्पत्तिमिव रूपिणीम् ॥८९॥ ततस्तया समं तत्र वेत्याहं सुखस्थितः। एकदा वधुतोऽकार्षं जलकेलिं सरोऽम्भसि ॥९०॥ अपश्यता सच्छलनाप्यवेक्षं क्षिपता जलम्। सिक्तः स्नानप्रवृत्तोऽत्र स मातङ्गमुनिर्मया ॥९१॥ स तेन कुपितः शापं सभार्यं मामपातयत्। वियोगो भविता पापो दम्पत्योर्युवयोरिति ॥९२॥ ततस्तया दीनगिरा वध्व्या पादलग्नया। प्रार्थितः स मुनिर्ध्यात्वा शापान्तं नो समादिशत् ॥९३॥ जेता करेणुवेगेन योऽश्वरत्नयुगं बली। नरवाहनदत्तं स भाविविद्याधरेश्वरम् ॥९४॥ चन्द्रसार यदा द्रक्ष्यस्याराद्वत्सेश्वरात्मजम्। सङ्गत्स्यसे तदा शापप्रशमाद्भार्ययानया ॥९५॥ इत्युक्त्वा स मातङ्गोऽपि कृत्वा स्नानादिकां क्रियाम्। दर्शनाय हरेर्व्योम्ना श्वेतद्वीप गतोऽभवत् ॥९६॥

एकादश लम्बक ९ ९

एकादश लम्बक ९ ९ दयालु मुनि उसे धीरज बँधाकर अपने आश्रम में ले आये और—'यमुने, तुम्हें इसे पालना है'—कहकर मुझे सौंप दिया ॥८२॥ समुद्र के तट से यह लड़की प्राप्त हुई, इसलिए मतंग मुनि ने मुनियों की प्यारी इस कन्या का नाम बेला रख दिया ॥८३॥ इस कन्या के स्नेह से मेरा चित्त सन्तान-स्नेह से भर गया है। ब्रह्मचर्य से त्याग किया हुआ संसार भी आज मुझे कष्टप्रद प्रतीत हो रहा है ॥८४॥ हे चन्द्रसार, अविवाहित और नवयौवन से सुसज्जित इस कन्या का वेश-देखकर मेरा चित्त दुःखी हो रहा है ॥८५॥ बेटा, योगबल से मैने जान लिया कि यह तेरी पूर्वजन्म की भार्या है और दैवयोग से तू भी यहाँ आ गया है ॥८६॥ इसलिए, आओ और हमारे द्वारा दान की गई इस कन्या का पाणिग्रहण करो। तुम दोनों ने जो कष्ट का अनुभव किया है, वह सफल हो' ॥८७॥ बिना मेघ की वृष्टि के समान मुझे शान्त करती हुई यमुना अपने पिता मतंग मुनि के आश्रम में ले गई ॥८८॥ वहाँ जाकर सूचित किये गये मतंग ने मनोरथ की मूर्त्तिमती सम्पत्ति के समान उस कन्या का मुझे प्रदान किया ॥८९॥ तब मैं वहाँ आश्रम में बेला के साथ सुखपूर्वक रहने लगा। एक बार मैं उसके साथ तालाब के जल में केलि कर रहा था। उस समय बेला के साथ निरत मैंने अनजाने में मतंग के प्रतिकूल पानी फेंकते हुए वहाँ स्नान के लिए आये हुए मतंग ऋषि को भिगो दिया ॥ ९०॥ इस कारण क्रुद्ध मुनि ने पत्नी-सहित मुझे शाप दिया कि 'हे पापियो, तुम्हारा छह मास का भविष्य में वियोग होगा' ॥९२॥ तब चरणों पर पड़ी हुई बेला द्वारा दीनतापूर्वक प्रार्थना किए जाने पर मुनि ने इस शाप का सान्त्वन इस प्रकार बतलाया ॥९३॥ जो हस्तिनी रूप में उत्तम घोड़ों की चोरी करेगी, उस विद्याधर चक्रवर्ती कनकप्रभ के पुत्र नरवाहनदत्त को जब देखोगे, तब तुम्हारे शाप की शान्ति होगी और इस भार्या से तुम्हारा पुनः समागम होगा ॥९४ ५॥ ऐसा कहकर वह मतंग मुनि स्नान सन्ध्या आदि निष्क्रिया करके हरि के दर्शन के लिए आकाश मार्ग से हंसाद्वीप को चले गए ॥ ९५॥ १३

२१० कथासरित्सागर

[Page Header] २१० कथासरित्सागर

[Body Text] विद्याधरेण पादाग्राच्च प्राप्तो धूर्जटे पुरा। तस्मान्मया च बालत्वादत्तो यक्ष्णूतपादपः ॥९७॥ सोऽयं सद्रत्ननिचितो दत्तो वामधुना मया। इत्युक्त्वा मां सभार्यं सा तत्रैव यमुनाव्यगात् ॥९८॥ अथाहं प्राप्तदयितो निर्विण्णो वनवासतः। वियोगभीरुस्त्वरमथ स्वं देशं प्रति सोत्सुकः ॥९९॥ ततः प्रवृत्तश्चागन्तुमहं प्राप्याम्बुधेस्तटम्। सख्ये वणिक्प्रवहणे भार्यामारोपयं पुरः ॥१००॥ स्वयं चारोढुमिच्छामि यावत्तावत्समीरणः। मुनिघातात्समुत्पोतं तं दूरमहरन्मम ॥१०१॥ पोतेन हृतभार्यस्य मोहोऽपि विनिपत्य मे। स्तम्भश्छिद्र इवाहार्षीच्चेतनां विह्वलात्मनः ॥१०२॥ ततोऽत्र तापसः कश्चिदागतो वीक्ष्य मूर्च्छितम्। कृपया मां समाश्वास्य नीतवानाश्रमं शनैः ॥१०३॥ पृष्ट्वा चामं यथावृत्तं श्रुत्वा चापविजृम्भितम्। बुद्ध्वा च सावधिं शापं धृतिबन्धं व्यधात् स मे ॥१०४॥ ततोऽम्भो भग्नवहनोत्तीर्णं प्राप्य वणिग्वरम्। सहायं मिलितोऽभूवमन्विष्यंस्तां प्रियां पुनः ॥१०५॥ शापक्षयाद्यथा दत्तहस्तामम्ब्वध दुर्गमान्। तांस्तानुलङ्घयन् देशान् दिवसांश्च बहूनहम् ॥१०६॥ क्रमान्न चाद्याक्षपुरं सम्प्राप्येदं धृतो मया। खं वत्सश्वरसद्मयुक्तमाणिक्यिहागतः ॥१०७॥ दृष्टे च दूराद्धस्तिन्यां विजितादबयुगे त्वयि। उज्झितः स मया शापभारो सध्वन्दरात्मना ॥१०८॥ क्षणाच्च सम्मुखायातामद्राक्षमिह तां प्रियाम्। यन्मां वणिग्भिरानीतां तेन पोतेन साधुभिः ॥१०९॥ ततस्तयाहं यमुनाप्रत्तसद्रत्नहस्तया। मिलितस्त्वत्प्रसादेन तीर्णशापमहाप्लवः ॥११०॥ अतः प्रणन्तुं त्वामस्मि वत्सराजमुपागतः। निवृतो यामि चदानीं स्वदेशं दयितायुतः ॥१११॥

एकादश लम्बक १ ११

एकादश लम्बक १ ११ विद्याधर ने प्राचीन समय में शिवजी के चरण के प्रप्रनाग से जो जाम का पौधा पाया था उस बालक पौधे को मैंने उससे ले लिया था। अच्छे-अच्छे रत्नों से भरे हुए इस पौधे का अब मैं तुम दम्पती को देती हूँ। इस प्रकार सपत्नीक मुझे कहकर यमुना भी चली गई ॥१७-१८॥ तदनन्तर, अपनी प्रेयसी पत्नी को पाकर और बनवास से ग्रस्त में वियोग के भय से अपने देश को जाने के लिए उत्सुक हुआ ॥१९॥ यात्रा के लिए उद्यत मैंने समुद्र-तट पर आकर किसी व्यापारी की नाव मिल जाने पर पहले अपनी पत्नी को उस पर चढ़ा दिया ॥२०॥ जब मैं उस पर चढ़ने के लिए उद्यत हुआ तब मुनि के शाप के प्रभाव से वायु ने मेरी नाव को किनारे से दूर कर दिया ॥२१॥ उस नाव द्वारा पत्नी का हरण हो जाने पर, मूर्च्छा ने भी अवसर देखकर मेरी चेतना का हरण कर लिया। अर्थात् मैं मूर्च्छित होकर गिर पड़ा ॥२२॥ तब वहाँ आया हुआ एक तपस्वी मूर्छित देखकर मुझे हाथ में उठाकर धीरज देकर अपने आश्रम में ले गया ॥२३॥ वहाँ ले जाकर उसने मेरा सारा समाचार सुनकर, इस शाप का प्रभाव समझकर और शाप की अवधि को जानकर भी उसने मुझे धैर्य बँधाया ॥२४॥ तब अपनी पत्नी को ढूँढ़ता हुआ मैं टूटी हुई नाव से बचकर निकले हुए अपने मित्र बेन्ध से मिला ॥२५॥ शाप से रूप की आशा में उसके जादुबल से उन उन बहुत-से दुर्गम देशों को लाँघता हुआ तुमसे मिलने के लिए विशालापुर आया तो ज्ञात हुआ कि वत्सराज के रूप के यात्री-स्वरूप गुप्त यहाँ आये हुए ॥२६-२७॥ जब दूर से मैंने हथिनी द्वारा ढोया पाहा का तुम्हारे द्वारा जीतते हुए देखा तब मैं जीवन पाकर ध्यान से मूर्च्छा हट गया और क्षण भर में ही मैंने उसी नाव से मक्षिका द्वारा लाई गई अपनी प्राणप्यारी को भी पाया ॥२८-२९॥ तब मैं यमुना के कल्याणमय शापा से राज्य को व उस बचा से मिला और तुम्हारी कृपा से शाप का कष्ट पार किया ॥३०॥ इसलिए हे वत्सराज के सचिव मुझे प्रणाम करने के लिए मैं यहाँ आया हूँ और अब बन्धों से मुक्त होकर अपनी विद्याधरों के साथ जा रहा हूँ ॥३१॥

१ १२ कथासरित्सागर

१ १२ कथासरित्सागर इति स वणिजि तस्मिन्नात्मवृत्तान्तमुक्त्वा गतवति चरितार्थे चन्द्रसारे प्रणम्य। अभवदतिविनम्रो वत्सराजात्मजेऽस्मिन् स किल रुचिरदेवो दृष्टमाहात्म्यदृष्टः ॥११२॥ प्रादाच्च तां स्वभगिनीमुपचारवृत्ति- मारुम्ब्य युक्तिमनुरागहताय तस्मै। प्राम्बिसितां सुसदृशीं स जयेन्द्रसेनां सद्यः करण्डुसुरगोत्तमयुग्मयुक्ताम् ॥११३॥ स च तामादाय बधूं साश्ववरां रुचिरदेवमामन्त्र्य। नरवाहनदत्तः स्वां कौशाम्बीमाययौ नगरीम् ॥११४॥ तस्यामास्त च विहरन्नन्दितवत्सेश्वरस्तया सहितः। अन्याभिश्च स सुखितो देवीभिर्मदनमञ्जुकाद्याभिः ॥११५॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे वेताललम्बके प्रथमस्तरङ्गः। समाप्तश्चायं वेताललम्बक एकादशः।

एकादश लम्बक १ १३

एकादश लम्बक १ १३ इस प्रकार, उस वैश्य चन्द्रसार के अपना वृत्तान्त कहकर और प्रणाम करके चले जाने पर वह रुचिरदेव नरवाहनदत्त की महिमा को जानकर अत्यन्त हर्षित हुआ और उसके प्रति और अधिक नम्र हो गया ॥११२॥ साथ ही रुचिरदेव ने प्रेम से वश मे किये गये नरवाहनदत्त के लिए, हथिनौ और घोड़ा की जोड़ी के साथ अपनी बहन जयन्द्रसेना को प्रदान किया जिसे वह पहले ही देना चाहता था ॥११३॥ तदनन्तर, नरवाहनदत्त रुचिरदेव से मिलकर घोड़े और हथिनौ के साथ उसकी बहन जयन्द्रसेना को लेकर अपनी नगरी कौशाम्बी लौट आया ॥११४॥ और, अपने पिता वत्सराज तथा मदनमंचुका आदि पत्नियों के साथ वह नरवाहनदत्त अपनी नगरी में सुखपूर्वक रहन लगा ॥११५॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के वेला-लम्बक का प्रथम तरंग समाप्त एकादश वेला-लम्बक समाप्त

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परिषद् के गौरव-ग्रन्थ १ हिन्दी-साहित्य का आदिकाल—आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ३ २५ २ यूरोपीय दर्शन—स्व महामहोपाध्याय रामावतार शर्मा ३ २५ ३ हर्षचरितः एक सांस्कृतिक अध्ययन—डॉ वासुदेवशरण अग्रवाल ९.५ ४ विश्वधर्म-दर्शन—श्रीसांवलियाबिहारीलाल वर्मा १३ ५ ५ सार्थवाह—डॉ मोतीचन्द्र ११ ६ वैज्ञानिक विकास की भारतीय परम्परा—डॉ सत्यप्रकाश ८ ७ सन्त कवि दरिया एक अनुशीलन—डॉ धर्मेन्द्र ब्रह्मचारी शास्त्री १४ ८. काव्य-मीमांसा (राजशेखर-कृत)—अनु स्व पं केदारनाथ शर्मा सारस्वत १५ ९. श्रीरामावतार शर्मा-निबन्धावली—स्व महामहोपाध्याय रामावतार शर्मा ८.७५ १ प्राङ्मौर्य बिहार—डॉ देवसहाय त्रिवेद ७ २५ ११ गुप्तकालीन मुद्राएँ—स्व डॉ अनन्त सदाशिव अल्तेकर ९ ५ १२ भोजपुरी भाषा और साहित्य—डॉ उदयनारायण तिवारी १६.५ १३ राजकीय व्यय-प्रबन्ध के सिद्धान्त—श्रीगोरखनाथ सिंह १५ १४ रबर—श्रीफूलदेवसहाय वर्मा एम् एस-सी ७ ५ १५ ग्रह-नक्षत्र—श्रीत्रिवेणीप्रसाद सिंह आइ सी एस् ४ २५ १६. नीहारिकाएँ—डॉ गोरखप्रसाद ४ २५ १७ हिन्दू धार्मिक कथाओं के भौतिक अर्थ—श्रीत्रिवेणीप्रसाद सिंह आइ सी एस् ३ १८. ईख और चीनी—श्रीफूलदेवसहाय वर्मा ११.५ १९ शैवमत—मूल लेखक और अनुवादक डॉ यदुवंशी ८. २ मध्यदेश ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सिंहावलोकन—डॉ धीरेन्द्र वर्मा ७ २१ २४ प्राचीन हस्तलिखित पोथियों का विवरण—(खण्ड १ से ४ तक)—(संपादित) ७ २५ २५ २८. शिवपूजन-रचनावली—(चार भागों में)—आचार्य शिवपूजन सहाय ३६ २५ २९. राजनीति और दर्शन—डॉ विश्वनाथप्रसाद वर्मा १८ ३ बौद्धधर्म-दर्शन—स्व आचार्य नरेन्द्रदेव १७ ३१ ३२ मध्य एशिया का इतिहास—(दो खण्डों में)—महापण्डित राहुल सांकृत्यायन २ ७५ ३३ दोहाकोश—ले सरहपाद छायानुवादक म प राहुल सांकृत्यायन ११ २५ ३४ हिन्दी को मराठी संतों की देन—आचार्य विनयमोहन शर्मा ११ २५ ३५ रामभक्ति-साहित्य में मधुर उपासना—डॉ भुवनेश्वरनाथ मिश्र 'माधव' १ २५ ३६. अप्पारमणीय और चित्त-विकसन—स्व वेंकटेश्वर शर्मा ७५ ३७. प्राचीन भारत की प्रांगामिकता—प रामदीन पाण्डेय ६५

  • २ - ३८. बांसरी बज रही—श्रीजगदीश त्रिगुणायत ८ ३९. चतुर्वर्णमाला-निबन्धावली- (संकलित) ४.२५ ४०. भारतीय कला को बिहार की देन—डॉ० बिन्ध्येश्वरीप्रसाद सिंह ७.५ ४१. भोजपुरी के कवि और काव्य—श्रीदुर्गाशंकरप्रसाद सिंह ५.७५ ४२. पेट्रोलियम—श्रीसुखदेवसहाय वर्मा ५.५ ४३. नील-पंक्षी- (मूल लेखक मारिस मेटरलिंक) अनु० डॉ० कामिल बुल्के २.५ ४४. लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ़ मानभूम एण्ड सिंहभूम— (सम्पादित) ४.५ ४५. षड्दर्शन रहस्य—पं० रंगनाथ पाठक ५ ४६. जातककालीन भारतीय संस्कृति—श्रीमोहनलाल महतो 'वियोगी' १.५ ४७. प्राकृत भाषाओं का व्याकरण—के० सी० पिशल, अनु० डॉ० हेमचन्द्र जोशी २ ४८. दक्षिणी हिन्दी-काव्यधारा—महापण्डित राहुल सांकृत्यायन ६ ४९. भारतीय प्रतीक-विद्या—डॉ० जनार्दन मिश्र ११ ५०. संतमत का सरभंग-सम्प्रदाय—डॉ० धर्मेन्द्र ब्रह्मचारी शास्त्री ५.५ ५१. सूक्तिकोष (प्रथम खण्ड)—सम्पादक डॉ० विश्वनाथप्रसाद ३ ५२. कुँवरसिंह-अमरसिंह—के० का० कि० दत्त, अनु० पं० छविनाथ पाण्डेय ५ ५३. मुद्रण-कला—पं० छविनाथ पाण्डेय ७.२५ ५४. लोक-साहित्य आकर-साहित्य-सूची—सं० आचार्य नलिनविलोचन शर्मा ५ ५५. लोकगाथा-परिचय—सं० आचार्य नलिनविलोचन शर्मा २.५ ५६. लोककथा-कोश—सं० आचार्य नलिनविलोचन शर्मा १२ ५७. बौद्धधर्म और बिहार—पं० हवलदार त्रिपाठी 'सहृदय' ८ ५८. साहित्य का इतिहास-दर्शन—आचार्य नलिनविलोचन शर्मा ५ ५९. मुहावरा-मीमांसा—डॉ० भानुप्रकाश गुप्त १.५ ६०. वैदिक विज्ञान और भारतीय संस्कृति—पं० गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी ५ ६१. पंचदशलोकगाथा-निबन्धावली— (संकलित) ४.५ ६२. हिन्दी-साहित्य और बिहार (७वीं से १८वीं शती तक)— स० आचार्य शिवपूजन सहाय ५.५ ६३. कथासरित्सागर (प्रथम खण्ड)—सोमदेव, अनु० के० ना० शर्मा सारस्वत १ ६४. अयोध्याप्रसाद खत्री-स्मारक ग्रन्थ—(सम्पादित) ५ ६५. सदल मिश्र-ग्रन्थावली—सं० आचार्य नलिनविलोचन शर्मा ५ ६६. रंगनाथ रामायण (तेलगु से अनूदित)—अनु० बी० ए० सी० कामाक्षि राव १.५ ६७. गोस्वामी तुलसीदास (पुनर्मुद्रण)—स्व० श्रीशिवनन्दन सहाय ५.५ ६८. पुस्तकालय-विज्ञान-कोश—श्रीप्रभुनारायण गौड़ ४.५ ६९. प्राचीन हस्तलिखित पोथियों का विवरण (खण्ड ५)— स० आचार्य नलिनविलोचन शर्मा १ ७०. भारतीय शब्दकोष (प्रकाण्ड १८८६)—सं० श्रीजयमाधवप्रसाद मिश्र तथा श्रीमभावरप्रसाद अम्बष्ठ ८.

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