भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

५५० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण

५५० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण

(१) मित्रव्यसनतो वाऽरिरुत्तिष्ठेद्योऽनवग्रहः ।
मित्रेणैव भवेत्साध्यश्छादितव्यसनेन सः ॥
(२) अमित्रव्यसनान्मित्रमुत्थितं यद्विरज्यति ।
अरिव्यसनसिद्ध्या तच्छत्रुणैव प्रसिद्ध्यति ॥
(३) वृद्धिं क्षयं च स्थानं च कर्शनोच्छेदनं तथा ।
सर्वोपायान्समादध्यादेतान् यश्चार्थशास्त्रवित् ॥
(४) एवमन्योन्यसंचारं षाड्गुण्यं योऽनुपश्यति ।
स बुद्धिनिगलैर्बद्धैरिष्टं क्रीडति पार्थिवैः ॥

इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे मध्यमचरितोदासीनचरितमण्डलचरितानि नाम अष्टादशोऽध्यायः, आदितः पञ्चदशोत्तरशततमः ॥
समाप्तमिदं षाड्गुण्यं नाम सप्तममधिकरणम् ।

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(१) यदि विजिगीषु का शत्रु विजिगीषु के मित्र को आपद्ग्रस्त जानकर बिना किसी अवरोध-आक्रमण के उन्नति कर जाय तो अपने मित्र की आपत्ति दूर हो जाने पर उस मित्र के द्वारा ही विजिगीषु शत्रु को वश में करने का यत्न करे ।

(२) जो मित्र अपने शत्रु पर आपत्ति आ जाने से उन्नत होकर विजिगीषु के अनुकूल नहीं रहता, उसे उसके शत्रु की आपत्ति दूर हो जाने पर, उसी के द्वारा वश में किया जाय ।

(३) अर्थशास्त्रज्ञ राजा को उचित है कि वह वृद्धि, क्षय, स्थान, कर्शन, और उच्छेदन तथा साम, दाम आदि सभी उपायों का प्रयोग खूब सोच-विचार कर करे ।

(४) जो राजा इन छह गुणों का विचारपूर्वक प्रयोग करता है, वह निश्चित ही अपनी बुद्धिरूपी श्रृंखला से बाँधे हुए अन्य राजाओं के साथ इच्छानुसार क्रीड़ा कर सकता है ।

षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में मध्यमोदासीनमण्डलचरित नामक अठारहवाँ अध्याय समाप्त ।

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तीसरा खण्ड

तृतीय प्रकाश

आठवाँ अधिकरण

आठवाँ अधिकरण

व्यसनाधिकारिक

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प्रकरण १२७
अध्याय १

प्रकृतिव्यसनवर्गः


(१) व्यसनयौगपद्ये सौकर्यतो यातव्यं रक्षितव्यं वेति व्यसनचिन्ता । (२) दैवं मानुषं वा प्रकृतिव्यसनमनयापनयाभ्यां सम्भवति । (३) गुणप्रातिलोम्यमभावः प्रदोषः प्रसङ्गः पीडा वा व्यसनम् । व्यस्यत्येनं श्रेयस इति व्यसनम् । (४) स्वाम्यमात्यजनपददुर्गकोशदण्डमित्रव्यसनानां पूर्वं पूर्वं गरीय इत्याचार्याः । (५) नेति भारद्वाजः । स्वाम्यमात्यव्यसनयोरमात्यव्यसनं गरीय इति । मन्त्रो मन्त्रफलावाप्तिः कार्यानुष्ठानमायव्ययकर्म दण्डप्रणयनममित्राटवी-


प्रकृतियों के व्यसन और उनका प्रतीकार

( १ ) जब शत्रु और विजिगीषु, दोनों पर एक जैसी विपत्ति आ पड़ी हो और शत्रु पर आक्रमण करने तथा अपनी रक्षा करने, दोनों में समानता दीखती हो, ऐसी दशा में चढ़ाई करनी चाहिए या आत्मरक्षा करनी चाहिए ? यह विचार सामने आता है । इस हेतु इस अध्याय में पहिले व्यसनों का चिंतन किया जाता है ।

( २ ) व्यसन दो प्रकार का है : एक दैव और दूसरा मानुष । अमात्य आदि प्रकृति वर्ग के ये दोनों व्यसन अनय और अपनय के कारण पैदा होते हैं । सन्धि आदि की उचित व्यवस्था न करना अनय और शत्रुओं से पीड़ित होते रहना अपनय कहलाता है ।

( ३ ) गुणों की प्रतिकूलता या अभाव, उनका अनुचित उपयोग, प्रकृतिवर्ग में दोषों की अधिकता, विषयों में अति आसक्ति और शत्रुओं द्वारा पीड़ित होना, ये पाँच प्रकार के व्यसन हैं । 'व्यसन' का शब्दार्थ ही यह है जो कल्याण मार्ग से भ्रष्ट कर दे । अर्थात् जो कार्य राजा को नीचे गिरा दे वही उसके लिए व्यसन है ।

( ४ ) कुछ आचार्यों का मत है कि 'स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, सेना और मित्र, इनमें पूर्व-पूर्वं की विपत्ति अत्यन्त कष्टकर है ।'

( ५ ) परन्तु आचार्य भारद्वाज का कहना है कि 'यदि स्वामी और अमात्य पर एक साथ व्यसन आ पड़े तो अमात्य का व्यसन ही अधिक भयावह है; क्योंकि प्रत्येक कार्य का विचार, उसके फलाफल की प्राप्ति का चिंतन, आवश्यक कार्यों को करना,

५५६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ आठवां अधिकरण

प्रतिषेधो राज्यरक्षणं व्यसनप्रतीकारः कुमाररक्षणमभिषेकश्च कुमाराणा- मायत्तमामात्येषु । तेषामभावे तदभावः । छिन्नपक्षस्येव राज्ञश्चेष्टानाशः । व्यसनेषु चासन्नाः परोपजापाः । वैगुण्ये च प्राणबाधः प्राणान्तिकचरत्वा- द्राज्ञ इति ।

(१) नेति कौटिल्यः । मन्त्रिपुरोहितादिभृत्यवर्गमध्यक्षप्रचारं पुरुष- द्रव्यप्रकृतिव्यसनप्रतीकारमेधनं च राजैव करोति । व्यसनिषु वामात्येषु अन्यानाव्यसनिनः करोति । पूज्यपूजने दूष्यावग्रहे च नित्ययुक्तस्तिष्ठति । स्वामी च सम्पन्नः स्वसम्पद्भिः प्रकृतीः सम्पादयति । स्वयं यच्छीलस्त- च्छीलाः प्रकृतयो भवन्ति । उत्थाने प्रमादे च तदायत्तत्वात् । तत्कूटस्था- नीयो हि स्वामीति ।

(२) अमात्यजनपदव्यसनयोर्जनपदव्यसनं गरीय इति विशालाक्षः ।


आय-व्यय की व्यवस्था, सैन्यसंग्रह, शत्रु तथा आटविकों का प्रतीकार, राज्य की सुरक्षा, विपत्तियों का दमन, राजकुमारों की रक्षा और उनका अभिषेक आदि कार्यों को सम्पन्न करना अमात्यों पर ही निर्भर है । इसलिए राजा की अपेक्षा अमात्य का व्यसन अधिक भयप्रद है । अमात्यों के अभाव में सारे राजकार्य नष्ट हो जाते हैं और परकटे पक्षी के समान राजा के सारे कार्यक्रम ही चौपट हो जाते हैं तथा व्यसनों का लाभ उठा कर शत्रु षड्यन्त्रों का जाल बिछा देते हैं । अमात्यों के व्यसनी या विपरीत हो जाने पर राजाओं के प्राण खतरे में पड़ जाते हैं; क्योंकि अमात्य, राजाओं के प्राण के समान होते हैं ।'

(१) इस मत के विरुद्ध आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'मन्त्री, पुरोहित आदि भृत्यवर्ग को, सम्पूर्ण विभागीय अध्यक्षों के कार्य को, अमात्य तथा सेना आदि प्रकृतिवर्ग की विपत्ति को और जनपद, दुर्ग, कोष आदि द्रव्य प्रकृति की विपत्ति को दूर कर उनकी उन्नति के कार्यों को राजा स्वयं सम्पन्न कर सकता है । अमात्य यदि व्यसनी हो गये हों तो उनके स्थान पर राजा अव्यसनी अमात्यों को नियुक्त कर सकता है । राजा ही पूज्य व्यक्तियों का सम्मान और दुष्ट व्यक्तियों का निग्रह कर सकता है । वही अपने राज्योग्य गुणों से अपनी अमात्य प्रकृति को गुणसम्पन्न बना सकता है; क्योंकि राजा स्वयं जिस स्वभाव का होता है उसकी प्रकृतियाँ भी वैसे ही स्वभाव की हो जाती हैं । राजा पर ही उसकी प्रकृतियों का अभ्युदय एवं पतन निर्भर होता है । क्योंकि सातों प्रकार की प्रकृतियों में राजा ही प्रधान होता है, इसलिए मूल प्रकृति राजा का जैसा स्वभाव हो उसकी विकृतियों का भी वैसा ही स्वभाव होता है ।'

(२) आचार्य विशालाक्ष का अभिमत है कि 'अमात्य के व्यसन की अपेक्षा

प्र० १२७ : अ० १ ] प्रकृतियों के व्यसन ५५७

कोशो दण्डः कुप्यं विष्टिर्वाहनं निचयाश्च जनपदादुत्तिष्ठन्ते । तेषामभावो जनपदाभावे । स्वाम्यमात्ययोश्चानन्तर इति ।

(१) नेति कौटिल्यः । अमात्यमूलाः सर्वारम्भाः । जनपदस्य कर्मसिद्धयः स्वतः परतश्च योगक्षेमसाधनं व्यसनप्रतीकारः शून्यानिवेशोपचयौ दण्डकरानुग्रहश्चेति ।

(२) जनपददुर्गव्यसनयोर्दुर्गव्यसनमिति पाराशराः । दुर्गे हि कोशदण्डोत्पत्तिरापदि स्थानं च जनपदस्य । शक्तिमत्तराश्च पौरा जानपदेभ्यो नित्याश्चापदि सहाया राज्ञः । जानपदास्त्वमित्रसाधारणा इति ।

(३) नेति कौटिल्यः । जनपदमूला दुर्गकोशदण्डसेतुवार्तारम्भाः । शौर्यं स्थैर्यं दाक्ष्यं बाहुल्यं च जनपदेषु । पर्वतान्तर्द्वीपाश्च दुर्गा नाध्युष्यन्ते जनपदा-


जनपद पर आया हुआ व्यसन अधिक भयावह होता है; क्योंकि कोष, सेना, वस्त्र, लोहा, ताँबा, भृत्यवर्ग, घोड़े, ऊँट, अन्न, घृत आदि जितना भी सामान है, सभी कुछ जनपद से प्राप्त होता है। जनपद विपत्तिग्रस्त होने के कारण उक्त सभी वस्तुएँ नष्ट हो जाती हैं और उसके बाद अमात्य एवं राजा आदि का भी विनाश हो जाता है।'

( १ ) परन्तु कौटिल्य, विशालाक्ष के उक्त मत को नहीं मानता है । वह कहता है कि 'सभी कार्य अमात्यों पर निर्भर होते हैं। दुर्ग तथा कृषि आदि कार्यों की सफलता, राजवंश, अन्तपाल और आटविकों की ओर से योग-क्षेम का साधन, आपत्तियों का प्रतिकार, उपनिवेशों की स्थापना एवं उनकी उन्नति, अपराधियों को दण्ड और राजकर का निग्रह आदि जनपद के सभी कार्य अमात्यों द्वारा ही सम्पन्न होते हैं। इसलिए जनपद की विपत्ति की अपेक्षा अमात्यों की विपत्ति चिंतनीय है' ।

( २ ) आचार्य पराशर के मातावलम्बी विद्वानों का कथन है कि 'जनपद और दुर्ग, इन दोनों के एक साथ विपत्तिग्रस्त हो जाने पर जनपद की अपेक्षा दुर्ग की विपत्ति अधिक भयावह है; क्योंकि कोष और सेना को दुर्ग में ही रखा जाता है। यदि जनपद पर कोई विपत्ति आ जाय तो दुर्ग ही उस समय आश्रय का एकमात्र स्थान होता है। नगर तथा नागरिकों की अपेक्षा दुर्ग अधिक अजेय तथा स्थायी होते हैं और किसी भी विपत्ति में वह सहायक होते हैं। दुर्गों की तुलना में जनपदवासियों को तो शत्रु के समान समझना चाहिए; क्योंकि शत्रु को भी कर आदि देकर वे उसकी सहायता करते हैं। इसलिए जनपद की विपत्ति की अपेक्षा दुर्गों की विपत्ति अधिक चिन्तनीय समझनी चाहिए।'

( ३ ) इस मत के विरुद्ध आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'दुर्ग, कोष, सेना, सेतुबन्ध और कृषि आदि कार्य जनपद पर ही निर्भर हैं और शूरता, स्थिरता, चतुरता एवं अधिकता आदि बातें जानपदों ( जनपद के पुरुषों ) में ही हो सकती हैं । यदि

५५८ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ आठवां अधिकरण

भावात् । कर्षकप्राये तु दुर्गव्यसनमायुधीयप्राये तु जनपदे जनपदव्यसनमिति ।

(१) दुर्गकोशव्यसनयोः कोशव्यसनमिति पिशुनः । कोशमूलो हि दुर्गसंस्कारो दुर्गरक्षणं च । दुर्गः कोशादुपजाप्यः परेषां । जनपदमित्रामित्रनिग्रहो देशान्तरितानामुत्साहनं दण्डबलव्यवहारः । कोशमादाय च व्यसने शक्यमपयातुं न दुर्गमिति ।

(२) नेति कौटिल्यः । दुर्गापर्णः कोशो दण्डस्तूष्णींयुद्धं स्वपक्षनिग्रहो दण्डबलव्यवहारः आसारप्रतिग्रहः परचक्राटवीप्रतिषेधश्च । दुर्गाभावे च कोशः परेषां । दृश्यते हि दुर्गवतामनुच्छित्तिरिति ।


जनपद पर ही आपत्ति आ जाय तो नदी और पर्वतों में बने बड़े-बड़े अजेय दुर्ग भी सूने पड़ जाते हैं । इसलिए दुर्ग-व्यसन की अपेक्षा जनपद-व्यसन ही अधिक चिन्ताकर समझना चाहिए । किन्तु इतनी विशेषता जरूर है कि जैसे-जनपदरहित दुर्ग सूने हो जाते हैं वैसे ही दुर्गरहित जनपदों में रहना भी दुष्कर हो जाता है । इसलिए इतना समझ लेना चाहिए कि कृषिप्रधान जनपदों के दुर्गों पर विपत्ति का आना अधिक खतरनाक है । इसी प्रकार आयुधप्रधान देशों पर विपत्ति का आना अधिक भयावह है ।'

( १ ) आचार्य पिशुन ( नारद ) का मत है कि 'दुर्ग और कोष, इन दोनों पर एक साथ ही आई विपत्ति अधिक भयावह है; क्योंकि दुर्ग की मरम्मत एवं उसकी रक्षा कोष पर ही निर्भर है । कोष के बल पर दुर्ग का भी उच्छेद किया जा सकता है । कोष के ही द्वारा जनपद; शत्रु और मित्र आदि सब का निग्रह किया जा सकता है । दूरदेशस्थ राजाओं को भी कोष के ही बल पर सहायता के लिए प्रेरित किया जा सकता है । सैनिक-शक्ति का उपयोग भी कोष पर ही निर्भर है । यदि आकस्मिक आपत्ति टूट पड़े तो भागते समय कोष को भी साथ ले जाया जा सकता है; किन्तु ऐसी दशा में दुर्ग को साथ नहीं ले जाया जा सकता है ।'

( २ ) पिशुन के मत का विरोध करते हुए कौटिल्य का कहना है कि 'कोष और सेना दोनों की रक्षा दुर्ग के द्वारा की जा सकती है । तूष्णींयुद्ध, अपने पक्ष के राजद्रोहियों का निग्रह, सैनिक शक्ति का आश्रय और शत्रु-सेना तथा आटविकों का प्रतीकार सभी कार्य दुर्ग के द्वारा किए जा सकते हैं । दुर्ग के नष्ट हो जाने पर बहुत संभव है कि कोष को भी शत्रु छीन ले; क्योंकि तब उसकी रक्षा का कोई साधन नहीं रह जाता है । ऐसा भी देखा गया है कि जिनके पास पर्याप्त कोष नहीं; किन्तु दुर्जेय दुर्ग है, उनका उच्छेद सहसा नहीं किया जा सकता है । इसलिए कोष की अपेक्षा दुर्ग-व्यसन ही अधिक कष्टकर समझना चाहिए ।'

प्र० १२७ : अ० १ ] प्रकृतियों के व्यसन ५५९


(१) कोशदण्डव्यसनयोर्दण्डव्यसनम् इति कौणपदन्तः । दण्डमूलो हि मित्रामित्रनिग्रहः परदण्डोत्साहनं स्वदण्डप्रतिग्रहश्च । दण्डाभावे च ध्रुवः कोशविनाशः । कोशाभावे च शक्यः कुप्येन भूम्या परभूमिस्वयंग्रहणेन वा दण्डः पिण्डयितुम् । दण्डवता च कोशः । स्वामिनश्चासन्नवृत्तित्वादमात्य-सधर्मा दण्ड इति ।

(२) नेति कौटिल्यः । कोशमूलो हि दण्डः । कोशाभावे दण्डः परं गच्छति, स्वामिनं वा हन्ति । सर्वाभियोगकरश्च कोशो धर्महेतुः । देशकाल-कार्यवशेन तु कोशदण्डयोरन्यतरः । प्रमाणीभवति । लम्भपालनो हि दण्डः कोशस्य । कोशः कोशस्य दण्डस्य च भवति । सर्वद्रव्यप्रयोजकत्वात्कोश-व्यसनं गरीय इति ।


( १ ) आचार्य कौणपदन्त ( भीष्म ) का कहना है कि कोष और सेना, दोनों के व्यसनों में सेना-व्यसन ही अधिक कष्टकर है; क्योंकि शत्रु तथा मित्र का निग्रह सेना द्वारा ही होता है; दूसरे की सेना को अपनी सेना द्वारा ही कार्य पर नियुक्त किया जा सकता है । अपनी सेना का अधिक संग्रह भी सेना के ही द्वारा किया जा सकता है । अपनी सैनिक शक्ति क्षीण हो जाने पर ही विजिगीषु, शत्रु की अपेक्षा में अपनी सेना को आगे नहीं बढ़ा पाता है । यदि सेना पर विपत्ति पड़ जाय तो निश्चित ही कोष भी नष्ट हो जाता है; क्योंकि उसकी रक्षा करने वाला कोई नहीं रह जाता है । कोष के अभाव में भी वस्त्राभरण के द्वारा, भूमि के द्वारा, बलात् अपहृत शत्रुद्रव्य के द्वारा सेना का संगठन किया जा सकता है; और तब कोष को भी जमा किया जा सकता है । सदा राजा के समीप रहने के कारण सेना को भी अमात्यों के ही समान उपकारक समझना चाहिए । इसलिए कोष की अपेक्षा सेना-व्यसन अधिक भययुक्त है ।'

( २ ) किन्तु आचार्य कौटिल्य, कौणपदंत की उक्त दलील को स्वीकार नहीं करते हैं । उनका कहना है कि 'सेना का सारा दारोमदार कोष पर ही निर्भर है । उसके अभाव में या तो सेना शत्रु के अधीन हो जाती है या अपने ही स्वामी का वध कर डालती है । सब सामंतों के साथ सेना ही राजा का विरोध करा सकती है; क्योंकि धन देने पर सभी को वश में किया जा सकता है । लोक में धर्म, अर्थ और काम, इस त्रिवर्ग के साधन का मूल कारण कोष ही है; किन्तु इस संबंध में विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि देश, काल तथा कार्य को दृष्टि में रखकर कोष और सेना, दोनों को प्रधान माना जा सकता है, जिनके द्वारा कि विजिगीषु का कार्य सध सके । सेना केवल कोष की रक्षा कर सकती है; किन्तु कोष से दुर्ग और सेना, दोनों की रक्षा हो जाती है । इसलिए सभी दुर्ग आदि द्रव्य प्रकृतियों की

५६०कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ आठवां अधिकरण

(१) दण्डमित्रव्यसनयोर्मित्रव्यसनमिति वातव्याधिः। मित्रमभृतं व्यवहितं च कर्म करोति, पार्ष्णिग्राहमासारममित्रमाटविकं च प्रतिकरोति, कोशदण्डभूमिभिश्चोपकरोति व्यसनावस्थायोगमिति ।

(२) नेति कौटिल्यः। दण्डवतो मित्रं मित्रभावे तिष्ठत्यमित्रो वामित्रभावे। दण्डमित्रयोस्तु साधारणे कार्ये सारतः स्वयुद्धदेशकाललाभाद्विशेषः। शीघ्राभियाने त्वमित्र्राटविकाभ्यन्तरकोपे च न मित्रं विद्यते। व्यसनयौगपद्ये परवृद्धौ च मित्रमर्थयुक्तौ तिष्ठति ।

(३) प्रकृतिव्यसनसम्प्रधारणमुक्तमिति ।

(४) प्रकृत्यवयवानां तु व्यसनस्य विशेषतः।
बहुभावोऽनुरागो वा सारो वा कार्यसाधकः॥
(५) द्वयोस्तु व्यसने तुल्ये विशेषो गुणतः क्षयात्।
शेषप्रकृतिसाद्गुण्यं यदि स्यान्नाभिधेयकम् ॥


प्रयोजनसिद्धि होने के कारण कोष के ऊपर आई हुई विपत्ति को ही गरीयसी समझना चाहिए ।'

( १ ) आचार्य वातव्याधि ( उद्धव ) का मत है कि 'अपनी सेना और अपने मित्र पर एक साथ पड़ी विपत्ति में मित्र पर पड़ी विपत्ति अधिक कष्टकर है; क्योंकि दूर रहता हुआ भी मित्र बिना कुछ लिए विजिगीषु का कार्य करता है और पार्ष्णिग्राह का, पार्ष्णिग्राह के मित्रवल का, शत्रु का तथा आटविक का सदैव प्रतीकार करने के लिए तैयार रहता है। कोष, सेना और भूमि के द्वारा वह बराबर विजिगीषु की मदद करता रहता है। विपत्ति में साथ नहीं छोड़ता है ।'

( २ ) किन्तु कौटिल्य, वातव्याधि के उक्त सिद्धान्त से सहमत नहीं है । उसका कहना है कि 'जिसके पास अच्छा सैन्यबल होता है, उसके मित्र तो मित्र ही बने रहते हैं, किन्तु शत्रु तक भी मित्र बन जाते हैं । सेना और मित्र, इनके साधारण कार्य में लाभ के अनुसार अपने युद्ध, देश और काल की अपेक्षा विशेषता समझनी चाहिए । तत्कालिक आक्रमण पर अथवा शत्रु और आटविकों के द्वारा आभ्यन्तर कोप उत्पन्न करा देने पर मित्र लोग उसका कोई प्रतीकार नहीं करा सकते हैं; बल्कि सेना ही ऐसे अवसरों पर काम आती है । एक साथ विपत्ति आने पर अथवा शत्रु के बढ़ जाने के कारण मित्र ही अर्थ-सिद्धि में सहायक होता है ।'

( ३ ) यहाँ तक प्रकृति-व्यसन का निरूपण किया गया ।

( ४ ) यदि प्रकृति के कुछ अंगों पर विपत्ति आ पड़ी हो तो जिस प्रकृति पर व्यसन पड़ा है उसकी अधिक संख्या, स्वामिभक्ति और विशेष गुणों के अनुसार ही उस विपत्ति को दूर करना चाहिए ।

( ५ ) यदि शत्रु और विजिगीषु दोनों पर एक साथ ही व्यसन आ पड़ा हो तो

प्र० १२७ : अ० १ ] प्रकृति-व्यसन-वर्ग ५६१

(१) शेषप्रकृतिनाशस्तु यत्रैकव्यसनाद्‌भवेत् । व्यसनं तद्गरीयः स्यात्प्रधानस्येतरस्य वा ॥

इति व्यसनाधिकारिकेऽष्टमेऽधिकरणे प्रकृतिव्यसनवर्गो नाम प्रथमोऽध्यायः,
आदितः षोडशशततमः ।


एक के गुणशाली और दूसरे के गुणहीन होने पर ही विशेषता समझनी चाहिए, किन्तु जिस प्रकृति पर व्यसन है उसके अतिरिक्त शेष सभी प्रकृति यदि अपनी-अपनी अवस्था में शक्तिशाली बनी रहें तो पूर्वोक्त विशेषता नहीं समझनी चाहिए ।

( १ ) यदि एक प्रकृति-व्यसन के कारण शेष प्रकृतियों का भी नाश होता हो, तो वह व्यसन भले ही प्रधान-अप्रधान किसी भी प्रकृति से संबद्ध क्यों न हो, पहिले उसी व्यसन का प्रतीकार करना चाहिए ।

व्यसनाधिकारिक नामक अष्टम अधिकरण में प्रकृतिव्यसनवर्ग नामक पहला अध्याय समाप्त ।


३६ कौ०

प्रकरण १२८# राजराज्ययोर्व्यसनचिन्ता
अध्याय २

(१) राजा राज्यमिति प्रकृतिसंक्षेपः । (२) राज्ञ आभ्यन्तरो बाह्यो वा कोप इति । अहिभयादाभ्यन्तरः कोपो बाह्यकोपात्पापीयान् । अन्तरमात्यकोपश्चान्तःकोपात् । तस्मात्कोशदण्ड-शक्तिमात्मसंस्थां कुर्वीत । (३) द्वैराज्यवैराज्ययोर्द्वैराज्यमन्योन्यपक्षद्वेषानुरागाभ्यां परस्परसंघर्षेण वा विनश्यति । वैराज्यं तु प्रकृतिचित्तग्रहणापेक्षि यथास्थितमन्यैर्भुज्यत इत्याचार्याः । (४) नेति कौटिल्यः । पितापुत्रयोर्भ्रात्रोर्वा द्वैराज्यं तुल्ययोगक्षेमम-मात्यावग्रहं वर्तयेतेति । वैराज्ये तु जीवतः परस्याच्छिद्य 'नैतन्मम' इति


राजा और राज्य के व्यसनों पर विचार

(१) प्रकृति का संक्षिप्त स्वरूप राजा और राज्य है ।

(२) राजा के प्रति राज्य का दो प्रकार से कोप होता है : आभ्यन्तर और बाह्य । घर में रहने वाले साँप की तरह आभ्यन्तर कोप बाह्य कोप की अपेक्षा बहुत ही अनर्थकारी होता है । यह आभ्यन्तर कोप भी दो प्रकार का है : एक अन्तर अमात्य-कोप और दूसरा बाह्य अमात्य-कोप । इन दोनों में अन्तर अमात्य-कोप बहुत ही खतरनाक होता है । इसलिए विजिगीषु राजा को चाहिए कि वह कोष और सेना की सम्पूर्ण शक्ति को अपने ही हाथ में रखे ।

(३) पूर्वाचार्यों का मत है कि 'द्वैराज्य (जिस राज्य के दो राजा हों) और वैराज्य (जिस राज्य में किसी विजित राजा का शासन हो), इन दोनों में दो राजाओं के पारस्परिक ईर्ष्या, द्वेष, वैमनस्य एवं स्पर्धा के कारण द्वैराज्य शीघ्र ही नष्ट हो जाता है; किन्तु प्रजा के विचारों के अनुसार चलाये जाने वाला वैराज्य हमेशा अपनी स्थिति को बनाये रखता है ।'

(४) किन्तु कौटिल्य का कहना है 'क्योंकि पिता, पुत्र तथा दो भाइयों में दायभाग सम्बन्धी विरोध के कारण ही द्वैराज्य की स्थापना होती है, जिसमें दोनों शासकों का योग-क्षेम समान होता है; उनके अमात्यों द्वारा दोनों राजाओं का पारस्परिक वैमनस्य शान्त हो सकता है । इस दृष्टि से द्वैराज्य में कोई बड़ा दोष

प्र० १२८ : अ० २ ] राजा और राज्य के व्यसन ५६३

मन्यमानः कर्शयत्यपवाहयति, पण्यं वा करोति, विरक्तं वा परित्यज्यापगच्छतीति । (१) अन्धश्चलितशास्त्रो वा राजेति। अशास्त्रचक्षुरन्धो यत्किंचनकारी दृढाभिनिवेशी परप्रणेयो वा राज्यमन्यायेनोपहन्ति। चलितशास्त्रस्तु यत्र शास्त्राच्चलितमतिर्भवति, शक्यानुनयो भवतीत्याचार्याः। (२) नेति कौटिल्यः—अन्धो राजा शक्यते सहायसम्पदा यत्र तत्र वा पर्यवस्थापयितुमिति। चलितशास्त्रस्तु शास्त्रादन्यथाभिनिविष्टबुद्धिरन्यायेन राज्यमात्मानं चोपहन्तीति। (३) व्याधितो नवो वा राजेति ? व्याधितो राजा राज्योपघातममात्यमूलं प्राणाबाधं वा राज्यमूलमवाप्नोति। नवस्तु राजा स्वधर्मानुग्रहपरिहारदानमानकर्मभिः प्रकृतिरञ्जनोपकारैश्चरतीत्याचार्याः ।

नहीं है। परन्तु वैराज्य में जीवित शत्रु को उच्छिन्न कर, बलपूर्वक उससे राज्य छीन कर, विजिगीषु उसको 'यह मेरा नहीं है' ऐसा मानता हुआ जुर्माना, टैक्स आदि के द्वारा कष्ट पहुँचाता है; अथवा अच्छी रकम लेकर उसे दूसरे के हाथ बेच देता है; या वहाँ की प्रजा को विमुख जानकर सर्वस्व अपहरण कर के वहाँ से चला जाता है।'

(१) अन्धशास्त्र (जिस राजा ने शास्त्रों का अध्ययन नहीं किया है) और चलित शास्त्र (शास्त्रों का अध्ययन कर के भी तदनुसार आचरण न करने वाला), इन दोनों राजाओं में से कौन सा राजा प्रजा के लिए अधिक कल्याण-प्रद है ? इस सम्बन्ध में पूर्वाचार्यों का कहना है कि 'शास्त्ररूपी चक्षुओं से हीन अन्धा राजा बिना विचारे ही कार्य करने वाला, हठबुद्धि, दुष्कर्मरत, या परबुद्धि होकर अन्याय से राज्य को नष्ट कर डालता है। उसकी अपेक्षा चलितशास्त्र राजा को, शास्त्रविरुद्ध आचरण करने पर अनुनय, विनय के द्वारा रोका जा सकता है। इसलिए अन्धशास्त्र से चलितशास्त्र राजा उत्तम है।'

(२) किन्तु आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'अन्धे राजा को अमात्य आदि की हितकर बुद्धि से स्वेच्छया अच्छे मार्ग पर लाया जा सकता है; किन्तु चलितशास्त्र राजा तो शास्त्र-विरुद्ध कार्य करने में अपनी हठ-वादिता के कारण अन्याय से स्वयं को और अपने राज्य को नष्ट कर डालता है।'

(३) बीमार राजा और नये राजा, दोनों में कौन श्रेष्ठ है, इसका निर्णय करते हुए प्राचीन आचार्यों का मत है कि 'व्याधिग्रस्त राजा अपने अमात्यों के षड्यन्त्र से राज्य को गँवा बैठता है या राज्य के सहित प्राण भी दे बैठता है; किन्तु नया राजा अपने धर्म, अनुग्रह, परिहार और मान आदि कार्यों से लोकप्रियता प्राप्त कर राज्य का संचालन कर सकता है।'

५६४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ आठवां अधिकरण

(१) नेति कौटिल्यः । व्याधितो राजा यथाप्रवृत्तं राजप्रणिधिमनुवर्तयति । नवस्तु राजा 'बलावर्जितं ममेदं राज्यम्' इति यथेष्टमनवग्रहश्चरति । सामुत्थायिकैरवगृहीतो वा राज्योपघातं मर्षयति । प्रकृतिष्वरूढः सुखः समुच्छेत्तुं भवति । व्यधिते विशेषः—पापरोग्यपापरोगी च । (२) नवेऽप्यभिजातोऽनभिजात इति । दुर्बलोऽभिजातो बलवाननभिजातो राजेति । दुर्बलस्याभिजातस्योपजापं दौर्बल्यापेक्षाः प्रकृतयः कृच्छ्रेणोपगच्छन्ति । बलवतश्चानभिजातस्य बलापेक्षाः सुखेन इत्याचार्याः । (३) नेति कौटिल्यः । दुर्बलमभिजातं प्रकृतयः स्वयमुपनमन्ति, जात्यमैश्वर्यप्रकृतिरनुवर्तत इति । बलवतश्चानभिजातस्योपजापं विसंवादयन्ति—अनुरागे सार्वगुण्यमिति ।


(१) किन्तु आचार्य कौटिल्य का कहना है 'क्योंकि व्याधिग्रस्त राजा पूर्ववत् ही राज्य के व्यापारों को बराबर चलाता रहता है; किन्तु नया राजा तो बल के अभिमान से चूर होकर 'यह मेरा राज्य है' ऐसा समझता हुआ स्वेच्छाचारी बन कर मनमाना शासन करता है। अथवा जब कभी उन्नतिशील साथी राजाओं से घिर जाता है तो राज्य के नाश को चुपचाप देखता रहता है। प्रजा का अनुराग न होने से अनायास ही शत्रुओं के द्वारा उखाड़ दिया जाता है। इसलिए नये राजा की अपेक्षा व्याधिग्रस्त राजा ही श्रेष्ठ है। परन्तु इस सम्बन्ध में एक विशेष बात ध्यान रखने योग्य यह है कि व्याधिग्रस्त राजा भी दो तरह के हो सकते हैं : एक तो पापरोग (कोढ़) आदि से ग्रस्त और दूसरे अपाप रोग (साधारण रोग) से ग्रस्त । इनमें अपापरोगी राजा के सम्बन्ध में ही उक्त कथन को समझना चाहिए।'

(२) नये राजाओं में भी उच्च कुलीन राजा उत्तम होता है या नीच कुलीन ? उनमें भी उच्च कुल का दुर्बल राजा उत्तम होता है या नीच कुल का बलवान् राजा ? इस सम्बन्ध में प्राचीन आचार्यों का कहना है कि 'कुलीन दुर्बल राजा के अमात्य आदि प्रकृतिजन तथा प्रजाजन बड़ी कठिनाई से उसके वश में रहते हैं। किन्तु नीच कुलोत्पन्न, परन्तु बलवान् राजा के रोबदाब के कारण सम्पूर्ण प्रजा तथा अमात्य आदि उसके वश में हो जाते हैं। इसलिए दुर्बल अभिजात राजा ही श्रेष्ठ है।'

(३) किन्तु आचार्य कौटिल्य का उक्त मत के विरुद्ध यह कहना है कि 'जो राजा उच्च कुलोत्पन्न होता है, वह चाहे दुर्बल भी हो, प्रकृतिजन अपने-आप ही उसके सामने झुक जाते हैं; क्योंकि ऐश्वर्य की योग्यता उच्च कुलोत्पन्न राजा का ही अनुगमन करती है। किन्तु बलवान् होने पर भी नीचकुलोत्पन्न राजा के प्रकृतिजन विराग के कारण उसका विरोध करने लगते हैं; क्योंकि अनुराग ही गुणों का आश्रय है।'

प्र० १२८ : अ० २ ] राजा और राज्य के व्यसन ५६५

(१) प्रयासवधातस्सस्यवधो मुष्टिवधात्पापीयान् ।
(२) निराजीवत्वादवृष्टिरतिवृष्टित इति ।
(३) द्वयोर्द्वयोर्व्यसनयोः प्रकृतीनां बलाबलात् ।
पारम्पर्यक्रमेणोक्तं याने स्थाने च कारणम् ॥

इति व्यसनाधिकारिकेऽष्टमेऽधिकरणे राजराज्ययोर्व्यसनचिन्ता नाम द्वितीयोऽध्यायः; आदितोः सप्तदशशततमः ।

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( १ ) खेत में बीज न बोने के कारण अन्नाभाव से जो कष्ट होता है उसकी अपेक्षा बीज बोने के बाद तैयार हुए अनाज का नष्ट हो जाना अधिक पीड़ाकर होता है । क्योंकि सारा परिश्रम ही व्यर्थ चला जाता है ।

( २ ) इसी प्रकार अधिक वृष्टि होने की अपेक्षा वृष्टि का सर्वथा न होना अधिक हानिकर है; क्योंकि जीवन की रक्षा जल पर ही निर्भर होती है ।

( ३ ) इस प्रकार दो भिन्न-भिन्न व्यसनों में प्रकृतियों के वलावल का निरूपण किया जा चुका है । इसका स्पष्टीकरण इस तरह है : विजिगीषु और शत्रु पर व्यसन होने के कारण, यदि शत्रु की अपेक्षा विजिगीषु पर लघु व्यसन हो तो विजिगीषु को चढ़ाई कर देनी चाहिए; और यदि अवस्था इसके विपरीत हो तो विजिगीषु को चुपचाप होकर बैठ जाना चाहिए ।

व्यसनाधिकारिक नामक अष्टम अधिकरण में राजराज्यव्यसनचिन्ता नामक दूसरा अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण १२९पुरुषव्यसनवर्गः
अध्याय ३

(१) अविद्याविनयः पुरुषव्यसनहेतुः। अविनीतो हि व्यसनदोषान्न पश्यति।

(२) तानुपदेक्ष्यामः—कोपजस्त्रिवर्गः, कामजश्चतुर्वर्गः।

(३) तयोः कोपो गरीयान्। सर्वत्र हि कोपश्चरति, प्रायशश्च कोपवशा राजानः प्रकृतिकोपैर्र्हताः श्रूयन्ते, कामवशाः क्षयव्ययनिमित्तमरिव्याधिभिरिति।

(४) नेति भारद्वाजः। सत्पुरुषाचारः कोपः। वैरयातनमवज्ञावधो भीतमनुष्यता च, नित्यश्च कोपसम्बन्धः पापप्रतिषेधार्थः। कामः सिद्धिलाभः। सान्त्वं त्यागशीलता सम्प्रियभावश्च। नित्यश्च कामेन सम्बन्धः कृतकर्मणः फलोपभोगार्थ इति।


सामान्य पुरुषों के व्यसन

(१) अशिक्षित व्यक्ति व्यसनी हो जाते हैं, क्योंकि अशिक्षित व्यक्ति व्यसनों से पैदा होने वाले दोषों को नहीं समझ पाता है।

(२) इस प्रकरण में ऐसे ही व्यसनों तथा व्यसनों से पैदा होने वाले दोषों का निरूपण किया जाता है। कोप से उत्पन्न होने वाले तीन दोष होते हैं, इसीलिए उन्हें त्रिवर्ग कहा गया है। इसी प्रकार काम से उत्पन्न होने वाले चार दोष हैं, इसीलिए उन्हें चतुर्वर्ग कहा गया है।

(३) दोषों को उत्पन्न करने वाले काम और क्रोध दोनों में से क्रोध ही अधिक भयावह होता है, क्योंकि क्रोध का सर्वत्र प्रवेश है। प्रायः ऐसा सुना गया है कि कोप से वशीभूत हुए राजा अपनी प्रकृतियों के कोप से ही मारे गये। इसी प्रकार काम के वशीभूत हुए राजा, सेना तथा कोष के नष्ट हो जाने या शारीरिक शक्ति के नष्ट हो जाने के कारण शत्रुओं तथा व्याधियों के द्वारा मारे गये सुने गये हैं।

(४) इस सिद्धान्त के विपरीत आचार्य भारद्वाज का कथन है 'क्योंकि कोप करना श्रेष्ठ लोगों का आचारधर्म है। कोप से ही शत्रु का प्रतिकार और दूसरे के तिरस्कार का बदला लिया जाता है। क्रोधी पुरुष की बुराई करने से सभी लोग डरते हैं। क्रोध छोड़ा भी नहीं जा सकता है, क्योंकि उसी के द्वारा पापियों का

प्र० १२९ : अ० ३ ] सामान्य पुरुषों के व्यसन ५६७

(१) नेति कौटिल्यः । द्वेष्यता शत्रुवेदनं दुःखासङ्गश्च कोपः । परिभवो द्रव्यनाशः पाटच्चरद्यूतकारलुब्धकगायनवादकैश्चानर्थैः संयोगः कामः । (२) तयोः परिभवाद् द्वेष्यता गरीयसी । परिभूतः स्वैः परैश्चावगृह्यते, द्वेष्यः समुच्छिद्यत इति । द्रव्यनाशाच्छत्रुवेदनं गरीयः, द्रव्यनाशः कोशा-बाधकः, शत्रुवेदनं प्राणाबाधकमिति । अनर्थसंयोगाद् दुःखसंयोगो गरी-यान् । अनर्थसंयोगो मुहूर्त्तप्रीतिकरः, दीर्घक्लेशकरो दुःखानामासङ्ग इति । तस्मात्कोपो गरीयान् । (३) वाक्पारुष्यमर्थदूषणं दण्डपारुष्यमिति । वाक्पारुष्यर्थदूषणयो-


निग्रह होता है। इसी प्रकार काम भी सुख को देनेवाला है और उसी के कारण व्यक्ति में सच्चाई, मधुरता, त्याग और सौम्यता जैसे गुण आ बसते हैं। इसके अतिरिक्त अपने कर्मों का फल भोगने के लिए प्रत्येक पुरुष के लिए काम का अवलंबन आवश्यक भी है।'

( १ ) किन्तु आचार्य कौटिल्य उक्त मत को स्वीकार नहीं करते । उनका कहना है कि 'कोप और काम कदापि गुणों की कोटि में नहीं रखे जा सकते हैं, वे तो अनेक महान् अनर्थों को पैदा करने वाले हैं, कोप के कारण मनुष्य सबका द्वेषी बन जाता है, उसके अनेक शत्रु बन जाते हैं, दुःख उसके शिर पर मँडराया करते हैं, कामी पुरुष का सर्वत्र तिरस्कार होता है, वह धन-नाश करता है, चोर, जुआरी, शराबी आदि अनर्थकारी व्यक्तियों से उसका साथ होता है।'

( २ ) काम और क्रोध से उत्पन्न होने वाले दोषों में से, कामजन्य परिभव ( दोष ) की अपेक्षा क्रोधजन्य द्वेष्यता अधिक हानिकर होती है। तिरस्कृत व्यक्ति अपने या पराये लोगों के द्वारा कभी न कभी अनुगामी बनाया जा सकता है, किन्तु जिससे सभी लोग द्वेष करते हैं वह तो नष्ट ही हो जाता है। इसीलिए तिरस्कृत होने की अपेक्षा द्वेष्य होना अधिक कष्टकर है। द्रव्यनाश हो जाने की अपेक्षा अधिक शत्रुओं का पैदा हो जाना अधिक हानिकर है। द्रव्यनाश होने पर केवल कोष को बाधा पहुँचती है, प्राण सुरक्षित रहते हैं, किन्तु शत्रुओं के बढ़ जाने से प्राण खतरे में पड़ जाते हैं। अनर्थकारी व्यक्तियों से सम्पर्क होने की अपेक्षा दुःखों का संयोग अधिक कष्टकर है। चोर, जुआरी आदि अनर्थकारी व्यक्तियों के सम्बन्ध परिणाम में दुःखदायी होने के बावजूद भी थोड़े समय के लिए प्रसन्न कर देने वाले होते हैं, किन्तु दुःखों का सम्बन्ध लगातार कष्टदायक होता है। इसलिए कामजन्य दोषों की अपेक्षा क्रोधजन्य दोषों को ही अधिक हानिकर समझना चाहिए।

( ३ ) कोपजन्य त्रिवर्ग : वाक्पारुष्य, अर्थदूषण और दण्डपारुष्य, ये कोपज त्रिवर्ग हैं, आचार्य विशालाक्ष के मत से 'वाक्पारुष्य ही अधिक बलवान् है। क्योंकि

५६८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ आठवाँ अधिकरण

वाक्पारुष्यं गरीयः इति विशालाक्षः । परुषमुक्तो हि तेजस्वी तेजसा प्रत्यारो- हति, दुरुक्तशल्यं हृदि निखातं तेजःसन्दीपनमिन्द्रियोपतापि च इति । (१) नेति कौटिल्यः । अर्थपूजा वाक्छल्यमपहन्ति, वृत्तिविलोपेस्त्वर्थ- दूषणम् । अदानमादानं विनाशः परित्यागो वा अर्थस्येत्यर्थदूषणम् । (२) अर्थदूषणदण्डपारुष्ययोरर्थदूषणं गरीयः इति पाराशराः । अर्थ- मूलौ धर्मकामौ, अर्थप्रतिबन्धश्च लोको वर्तते, तस्योपघातो गरीयान् इति । (३) नेति कौटिल्यः । सुमहताऽप्यर्थेन न कश्चन शरीरविनाशमिच्छेत् । दण्डपारुष्याच्च तमेव दोषमन्येभ्यः प्राप्नोति । इति कोपजस्त्रिवर्गः । (४) कामजस्तु—मृगया द्यूतं स्त्रियः पानमिति चतुर्वर्गः । तस्य मृग- याद्यूतयोर्मृगया गरीयसी इति पिशुनः स्तेनामित्रव्यालदावप्रस्खलनभय-


अपने तिरस्कार को सहन न करने वाले पुरुष के साथ कठोर वाक्यों का व्यवहार करने पर वह निश्चित ही कठोरभाषी व्यक्ति पर अपने तेज के द्वारा आक्रमण करता है । हृदय में गड़ा हुआ दुर्वचन भीतरी तेज को उभाड़ने वाला और इन्द्रियों को संतप्त करने वाला होता है । इसलिए अर्थदूषण की अपेक्षा वाक्पारुष्य को ही अधिक हानिकर समझना चाहिए ।'

( १ ) किन्तु, विशालाक्ष के मत के विरुद्ध कौटिल्य का कहना है कि 'अर्थ द्वारा की गई पूजा दुर्वचनरूपी शल्य को नष्ट कर देती है, किन्तु वाणी द्वारा की गई पूजा अर्थदूषण को नहीं हटा सकती है, किसी की जीविका मारना ही अर्थदूषण है । प्रिय वचन जीविका के विघात को पूरा नहीं कर सकते हैं । अर्थदूषण चार प्रकार का होता है । १. अदान ( कार्य करने पर भी वेतन न देना ) २. आदान ( दण्ड आदि के द्वारा धन खींच लेना ) ३. विनाश ( देश को पीड़ा पहुँचाना ) और ४. अर्थत्याग ( रक्षा योग्य अर्थ की रक्षा न करना ) ।'

( २ ) आचार्य पराशर के अनुयायियों का कहना है कि 'अर्थदूषण और दण्डपारुष्य में अर्थदूषण ही बलवान् होता है, क्योंकि धर्म, काम और लोकनिर्वाह सभी अर्थ पर निर्भर होते हैं । इसलिए अर्थ का उपघात ( दूषण ) होना अत्यन्त ही आपत्तिजनक है । इसलिए दण्डपारुष्य की अपेक्षा अर्थदूषण को ही बड़ा समझना चाहिए ।'

( ३ ) किन्तु कौटिल्य उक्त मत को युक्तिसंगत नहीं मानता है । उसका कहना है कि 'अत्यधिक धन-प्राप्ति के बदले में कोई भी अपने को नष्ट नहीं करना चाहता है, पुनः दण्डपारुष्य से आत्मरक्षा के लिए वह उतनी ही धन-राशि खर्च करने के लिए तैयार रहता है । इसलिए अर्थदूषण की अपेक्षा दण्डपारुष्य को ही अधिक कष्टकर समझना चाहिए ।' यहाँ तक कोपजन्य त्रिवर्ग का निरूपण किया गया ।

( ४ ) कामजन्य चतुर्वर्ग : मृगया, द्यूत, स्त्री और मदिरापान, ये कामज चार

प्र० १२९ : अ० ३ ] सामान्य पुरुषों के व्यसन ५६९

दिङ्मोहाः क्षुत्पिपासे च प्राणाबाधस्तस्याम् । द्यूते तु जितमेवाक्षविदुषा यथा जयत्सेनदुर्योधनाभ्यामिति ।

(१) नेति कौटिल्यः । तयोरप्यन्यतरपराजयोऽस्तीति नलयुधिष्ठि-राभ्यां व्याख्यातं, तदेव विजितद्रव्यमामिषं, वैरबन्धश्च, सतोऽर्थस्य विप्रति-पत्तिरसच्चार्जनमप्रतिभुक्तनाशो मूत्रपुरीषधारणबुभुक्षादिभिश्च व्याधिलाभ इति द्यूतदोषः । मृगयायां तु व्यायामः श्लेष्मपित्तमेदःस्वेदनाशलश्चले स्थिरे च काये लक्षपरिचयः कोपभयस्थानेहितेषु च मृगाणां चित्तज्ञानमनित्ययानं चेति ।

(२) द्यूतस्त्रीव्यसनयोः कैतवव्यसनम् इति कौणपदन्तः । सातत्येन हि निशि प्रदीपे मातरि च मृतायां दीव्यत्येव कितवः, कृच्छ्रे च प्रतिपृष्टः


दोष है । 'इस कामजन्य चतुर्वर्ग में मृगया और द्यूत, इन दोनों में से मृगया दोष अधिक हानिकर होता है'—ऐसा आचार्य नारद ( पिशुन ) का कहना है । 'क्योंकि मृगया दोष में सर्वथा चोर, शत्रु, सांप, दावाग्नि और गिरने का भय बना रहता है, दिशाओं के भूल जाने से तथा भूख-प्यास से कभी-कभी प्राणान्तक कष्ट भी उपस्थित हो जाता है । परन्तु बढ़िया खिलाड़ी जुए में अवश्य ही विजयी होता है, जैसे जयत्सेन और दुर्योधन ने नल और युधिष्ठिर को जुए में जीत लिया था । इसलिए जुए की अपेक्षा शिकार में अधिक कष्ट है ।'

( १ ) किन्तु उक्त सिद्धान्त के विरुद्ध आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'मृगया की भांति जुए में भी अनेक दोष हैं । जुआ खेलने वालों में एक की अवश्य ही हार होती है, जैसे नल और युधिष्ठिर जुए में हार गए थे । जुए में जीता हुआ धन पराये मांस की तरह है और हारने वाला जुआरी जीते हुए जुआरी से वैर भी ठान लेता है । धर्मपूर्वक कमाये हुए धन का दुरुपयोग होता है और अधर्मपूर्वक जुए से धन का संग्रह होता है । संग्रह किया हुआ धन फिर जुए में ही गँवा दिया जाता है । जुआ खेलते समय पेशाब, पाखाना और भूख रोकने से अनेक बीमारियां हो जाती हैं । जुए की अपेक्षा मृगया में व्यायाम, कफ-पित्त का नाश, मेदा का न बढ़ना, पसीना निकलने से देह का हल्का होना, चलते हुए या बैठे हुए शरीर पर निशाना बाँधने का अभ्यास होना, क्रोध तथा भय से उत्पन्न होने वाले जंगली जानवरों के चित्त की भिन्न-भिन्न चेष्टाओं का ज्ञान होना और किसी खास अवसर पर ही मृगया का समय निश्चित होना—ये सब गुण ऐसे हैं, जो द्यूत में असम्भव है ।'

( २ ) आचार्य कौणपदंत का मत है कि 'द्यूत-व्यसन और स्त्री-व्यसन, दोनों में द्यूत-व्यसन अधिक हानिकर है, क्योंकि जुआरी रात में भी दीपक जला कर जुआ खेलता है, माता के मर जाने पर उसकी दाहक्रिया आदि की कुछ भी परवाह न