महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
न्यायाद् विद्याफलानीच्छेदधर्मं तत्र वर्जयेत् ।। देवि! ऐसा करनेसे मनुष्य विद्याका फल पा सकता है, अन्यथा नहीं। न्यायसे ही विद्याजनित फलोंको पानेकी इच्छा करे। वहाँ अधर्मको सर्वथा त्याग दे ।।
यदिच्छेद् वार्तया वृत्तिं काङ्क्षेत विधिपूर्वकम् । क्षेत्रे जलोपपन्ने च तद्योग्यं कृषिमाचरेत् ।। यदि वार्त्तावृत्तिके द्वारा जीविका चलानेकी इच्छा हो तो जहाँ सींचनेके लिये जलकी व्यवस्था हो, ऐसे खेतमें तदनुरूप कार्य विधिपूर्वक करे ।।
वाणिज्यं वा यथाकालं कुर्यात् तद्देशयोगतः । मूल्यमर्थं प्रयासं च विचार्यैव व्ययोदयौ । अथवा यथासमय उस देशकी आवश्यकताके अनुसार वस्तु, उसके मूल्य, व्यय, लाभ और परिश्रम आदिका भलीभाँति विचार करके व्यापार करे ।।
पशुसंजीवनं चैव देशगः पोषयेद् ध्रुवम् ।। बहुप्रकारा बहवः पशवस्तस्य साधकाः ।। देशवासी पुरुषको पशुओंका पालन-पोषण भी अवश्य करना चाहिये। अनेक प्रकारके बहुसंख्यक पशु भी उसके लिये अर्थप्राप्तिके साधक हो सकते हैं ।।
यः कश्चित् सेवया वृत्तिं कांक्षेत मतिमान् नरः । यतात्मा श्रवणीयानां भवेद् वै सम्प्रयोजकः ।। जो कोई बुद्धिमान् मनुष्य सेवाद्वारा जीवननिर्वाह करना चाहे तो वह मनको संयममें रखकर श्रवण करनेयोग्य मीठे वचनोंका प्रयोग करे ।।
यथा यथा स तुष्येत तथा संतोषयेत् तु तम् । अनुजीविगुणोपेतः कुर्यादात्मानमाश्रितम् ।। जैसे-जैसे सेव्य स्वामी संतुष्ट रहे, वैसे ही वैसे उसे संतोष दिलावे। सेवकके गुणोंसे सम्पन्न हो अपने आपको स्वामीके आश्रित रखे ।।
विप्रियं नाचरेत् तस्य एषा सेवा समासतः ।। विप्रयोगात् पुरा तेन गतिमन्यां न लक्षयेत् ।। स्वामीका कभी अप्रिय न करे, यही संक्षेपसे सेवाका स्वरूप है। उसके साथ वियोग होनेसे पहले अपने लिये दूसरी कोई गति न देखे ।।
कारुकर्म च नाट्यं च प्रायशो नीचयोनिषु । तयोरपि यथायोगं न्यायातः कर्मवेतनम् ।। शिल्पकर्म अथवा कारीगरी और नाट्यकर्म प्रायः निम्न जातिके लोगोंमें चलते हैं। शिल्प और नाट्यमें भी यथायोग्य न्यायानुसार कार्यका वेतन लेना चाहिये ।।
आर्जवेभ्योऽपि सर्वेभ्यः स्वार्जवाद् वेतनं हरेत् । अनार्जवादाहरतस्तत् तु पापाय कल्पते ।।
सरल व्यवहारवाले सभी मनुष्योंसे सरलतासे ही वेतन लेना चाहिये। कुटिलतासे वेतन लेनेवालेके लिये वह पापका कारण बनता है॥ सर्वेषां पूर्वमारम्भांश्चिन्तयेन्न्यायपूर्वकम्। आत्मशक्तिमुपायांश्च देशकालौ च युक्तितः॥ कारणानि प्रवासं च प्रक्षेपं च फलोदयम्। एवमादीनि संचिन्त्य दृष्ट्वा दैवानुकूलताम्। अतः परं समारम्भेद् यत्रात्महितमाहितम्॥ जीविका-साधनके जितने उपाय हैं, उन सबके आरम्भोंपर पहले न्यायपूर्वक विचार करे। अपनी शक्ति, उपाय, देश, काल, कारण, प्रवास, प्रक्षेप और फलोदय आदिके विषयमें युक्तिपूर्वक विचार एवं चिन्तन करके दैवकी अनुकूलता देखकर जिसमें अपना हित निहित दिखायी दे, उसी उपायका आलम्बन करे॥ वृत्तिमेवं समासाद्य तां सदा परिपालयेत्। दैवमानुषविघ्नेभ्यो न पुनर्भ्रश्यते यथा॥ इस प्रकार अपने लिये जीविकावृत्ति चुनकर उसका सदा ही पालन करे और ऐसा प्रयत्न करे, जिससे वह दैव और मानुष विघ्नोंसे पुनः उसे छोड़ न बैठे॥ पालयन् वर्धयन् भुञ्जांस्तां प्राप्य न विनाशयेत्। क्षीयते गिरिसंकाशमश्रतो ह्यनपेक्षया॥ रक्षा, वृद्धि और उपभोग करते हुए उस वृत्तिको पाकर नष्ट न करे। यदि रक्षा आदिकी चिन्ता छोड़कर केवल उपभोग ही किया जाय तो पर्वत-जैसी धनराशि भी नष्ट हो जाती है॥ आजीवेभ्यो धनं प्राप्य चतुर्था विभजेद् बुधः। धर्मायार्थाय कामाय आपत्प्रशमनाय च॥ आजीविकाके उपायोंसे धनका उपार्जन करके विद्वान् पुरुष धर्म, अर्थ, काम तथा संकट-निवारण—इन चारोंके उद्देश्यसे उस धनके चार भाग करे॥ चतुर्ष्वपि विभागेषु विधानं शृणु भामिनि॥ यज्ञार्थं चान्नदानार्थं दीनानुग्रहकारणात्॥ देवब्राह्मणपूजार्थं पितृपूजार्थमेव च॥ मूलार्थं संनिवासार्थं क्रियानित्यैश्च धार्मिकैः। एवमादिषु चान्येषु धर्मार्थं संत्यजेद् धनम्॥ भामिनि! इन चारों विभागोंमें भी जैसा विधान है, उसे सुनो। यज्ञ करने, दीन-दुःखियोंपर अनुग्रह करके अन्न देने, देवताओं, ब्राह्मणों तथा पितरोंकी पूजा करने, मूलधनकी रक्षा करने, सत्पुरुषोंके रहने तथा क्रियापरायण धर्मात्मा पुरुषोंके सहयोगके लिये तथा इसी प्रकार अन्यान्य सत्कर्मोंके उद्देश्यसे धर्मार्थ धनका दान करे॥
धर्मकार्ये धनं दद्यादनवेक्ष्य फलोदयम् । ऐश्वर्यस्थानलाभार्थं राजवाल्लभ्यकारणात् ।। वार्तायां च समारम्भेऽमात्यमित्रपरिग्रहे । आवाहे च विवाहे च पूर्णानां वृत्तिकारणात् ।। अर्थोदयसमावाप्तावनर्थस्य विघातने । एवमादिषु चान्येषु अर्थार्थं विसृजेद् धनम् ।। फलकी प्राप्तिका विचार न करके धर्मके कार्यमें धन देना चाहिये। ऐश्वर्यपूर्ण स्थानकी प्राप्तिके लिये, राजाका प्रिय होनेके लिये, कृषि, गोरक्षा अथवा वाणिज्यके आरम्भके लिये, मन्त्रियों और मित्रोंके संग्रहके लिये, आमन्त्रण और विवाहके लिये, पूर्ण पुरुषोंकी वृत्तिके लिये, धनकी उत्पत्ति एवं प्राप्तिके लिये तथा अनर्थके निवारण और ऐसे ही अन्य कार्योंके लिये अर्थार्थ धनका त्याग करना चाहिये ।।
अनुबन्धं हेतुयुक्तं दृष्ट्वा वित्तं परित्यजेत् । अनर्थं बाधते ह्यर्थो अर्थं चैव फलान्युत ।। हेतुयुक्त अनुबन्ध (सकारण सम्बन्ध) देखकर उसके लिये धनका त्याग करना चाहिये। अर्थ अनर्थका निवारण करता है तथा धन एवं अभीष्ट फलकी प्राप्ति कराता है ।।
नाधनाः प्राप्नुवन्त्यर्थं नरा यत्नशतैरपि । तस्माद् धनं रक्षितव्यं दातव्यं च विधानतः ।। निर्धन मनुष्य सैकड़ों यत्न करके भी धन नहीं पा सकते। अतः धनकी रक्षा करनी चाहिये तथा विधिपूर्वक उसका दान करना चाहिये ।।
शरीरपोषणार्थाय आहारस्य विशेषणे । एवमादिषु चान्येषु कामार्थं विसृजेद् धनम् ।। शरीरके पोषणके लिये विशेष प्रकारके आहारकी व्यवस्था तथा ऐसे ही अन्य कार्योंके निमित्त कामार्थ धनका व्यय करना उचित है ।।
विचार्य गुणदोषौ तु त्रयाणां तत्र संत्यजेत् । चतुर्थं संनिदध्याच्च आपदर्थं शुचिस्मिते ।। गुण-दोषका विचार करके धर्म, अर्थ और काम-सम्बन्धी धनोंका तत्तत् कार्योंमें व्यय करना चाहिये। शुचिस्मिते! धनका जो चौथा भाग है, उसे आपत्तिकालके लिये सदा सुरक्षित रखे ।।
राज्यभ्रंशविनाशार्थं दुर्भिक्षार्थं च शोभने । महाव्याधिविमोक्षार्थं वार्धक्यस्यैव कारणात् ।। शत्रूणां प्रतिकाराय साहसैश्चाप्यमर्षणात् ।। प्रस्थाने चान्य देशार्थमापदां विप्रमोक्षणे । एवमादि समुद्दिश्य संनिदध्यात् स्वकं धनम् ।।
शोभने! राज्य-विध्वंसका निवारण करने, दुर्भिक्षके समय काम आने, बड़े-बड़े रोगोंसे छुटकारा पाने, बुढ़ापेमें जीवन-निर्वाह करने, साहस और अमर्षपूर्वक शत्रुओंसे बदला लेने, विदेश-यात्रा करने तथा सब प्रकारकी आपत्तियोंसे छुटकारा पाने आदिके उद्देश्यसे अपने धनको अपने निकट बचाये रखना चाहिये ।। सुखमर्थवतां लोके कृच्छ्राणां विप्रमोक्षणम् । धन संकटोंसे छुड़ानेवाला है, इसलिये इस जगत्में धनवानोंको सुख होता है ।। धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं च परमं यशः । त्रिवर्गो हि वशे युक्तः सर्वेषां शं विधीयते ।। तथा संवर्तमानास्तु लोकयोर्हितमाप्नुयुः ।। वह धन यश, आयु तथा स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला है। इतना ही नहीं, वह परम यशस्वरूप है। धर्म, अर्थ और काम यह त्रिवर्ग कहलाता है। वह जिनके वशमें होता है, उन सबके लिये कल्याणकारी होता है। ऐसा बर्ताव करनेवाले लोग उभय लोकमें अपना हित साधन करते हैं ।। काल्योत्थानं च शौचं च देवब्राह्मणभक्तितः । गुरूणामेव शुश्रूषा ब्राह्मणेष्वाभिवादनम् ।। प्रत्युत्थानं च वृद्धानां देवस्थानप्रणामनम् । आभिमुख्यं पुरस्कृत्य अतिथीनां च पूजनम् ।। वृद्धोपदेशकरणं श्रवणं हितपथ्ययोः । पोषणं भृत्यवर्गस्य सान्त्वदानपरिग्रहैः ।। न्यायतः कर्मकरणमन्यायाहितवर्जितम् । सम्यग्वृत्तं स्वदारेषु दोषाणां प्रतिषेधनम् ।। पुत्राणां विनयं कुर्यात् तत्तत्कार्यनियोजनम् । वर्जनं चाशुभार्थानां शुभानां जोषणं तथा ।। कुलोचितानां धर्माणां यथावत् परिपालनम् । कुलसंधारणं चैव पौरुषेणैव सर्वशः । एवमादि शुभं सर्वं तस्य वृत्तमिति स्थितम् ।। प्रातःकाल उठना, शौच-स्नान करके शुद्ध होना, देवताओं और ब्राह्मणोंमें भक्ति रखते हुए गुरुजनोंकी सेवा तथा ब्राह्मण-वर्गको प्रणाम करना, बड़े-बूढ़ोंके आनेपर उठकर उनका स्वागत करना, देवस्थानमें मस्तक झुकाना, अतिथियोंके सम्मुख होकर उनका उचित आदर-सत्कार करना, बड़े-बूढ़ोंके उपदेशको मानना और आचरणमें लाना, उनके हितकर और लाभदायक वचनोंको सुनना, भृत्यवर्गको सान्त्वना और अभीष्ट वस्तुका दान देकर अपनाते हुए उसका पालन-पोषण करना, न्याययुक्त कर्म करना, अन्याय और अहितकर कार्यको त्याग देना, अपनी स्त्रीके साथ अच्छा बर्ताव करना, दोषोंका निवारण करना,
पुत्रोंको विनय सिखाना, उन्हें भिन्न-भिन्न आवश्यक कार्योंमें लगाना, अशुभ पदार्थोंको त्याग देना, शुभ पदार्थोंका सेवन करना, कुलोचित धर्मोंका यथावत् रूपसे पालन करना और अपने ही पुरुषार्थसे सर्वथा अपने कुलकी रक्षा करना इत्यादि सारे शुभ व्यवहार वृत्त कहे गये हैं ।।
वृद्धसेवी भवेन्नित्यं हितार्थं ज्ञानकाङ्क्षया ।
परार्थं नाहरेद् द्रव्यमनामन्त्र्य तु सर्वदा ॥
प्रतिदिन अपने हितके लिये और ज्ञान-प्राप्तिकी इच्छासे वृद्ध पुरुषोंका सेवन करे। दूसरेके द्रव्यको उससे पूछे बिना कदापि न ले ।।
न याचेत परान् धीरः स्वबाहुबलमाश्रयेत् ।।
स्वशरीरं सदा रक्षेदाहाराचारयोरपि ।
हितं पथ्यं सदाहारं जीर्णं भुञ्जीत मात्रया ॥
धीर पुरुष दूसरेसे याचना न करे। अपने बाहुबलका भरोसा रखे। आहार और आचार-व्यवहारमें भी सदा अपने शरीरकी रक्षा करे। जो भोजन हितकर एवं लाभदायक हो तथा अच्छी तरह पक गया हो, उसीको नियत मात्रामें ग्रहण करे ।।
देवतातिथिसत्कारं कृत्वा सर्वं यथाविधि ।
शेषं भुञ्जेच्छुचिर्भूत्वा न च भाषेत विप्रियम् ।।
देवताओं और अतिथियोंको पूर्णरूपसे विधिपूर्वक सत्कार करके शेष अन्नका पवित्र होकर भोजन करे और कभी किसीसे अप्रिय वचन न बोले ।।
प्रतिश्रयं च पानीयं बलिं भिक्षां च सर्वतः ।
गृहस्थवासी व्रतवान् दद्याद् गाश्चैव पोषयेत् ।।
गृहस्थ पुरुष धर्मपालनका व्रत लेकर अतिथिके लिये ठहरनेका स्थान, जल, उपहार और भिक्षा दे तथा गौओंका पालन-पोषण करे ।।
बहिर्निष्क्रमणं चैव कुर्यात् कारणतोऽपि वा ।
मध्याह्ने वार्धरात्रे वा गमनं नैव रोचयेत् ।।
वह किसी विशेष कारणसे बाहरकी यात्रा भी कर सकता है, परंतु दोपहर या आधी रातके समय उसे प्रस्थान करनेका विचार नहीं करना चाहिये ।।
विषयान् नावगाहेत स्वशक्त्या तु समाचरेत् ।
यथाऽऽयव्ययता लोके गृहस्थानां प्रपूजिता ।।
विषयोंमें डूबा न रहे। अपनी शक्तिके अनुसार धर्माचरण करे। गृहस्थ पुरुषकी जैसी आय हो, उसके अनुसार ही यदि उसका व्यय हो तो लोकमें उसकी प्रशंसा की जाती है ।।
अयशस्करमर्थघ्नं कर्म यत् परपीडनम् ।
भयाद् वा यदि वा लोभान्न कुर्वीत कदाचन ।।
भय अथवा लोभवश कभी ऐसा कर्म न करे जो यश और अर्थका नाशक तथा दूसरोंको पीड़ा देनेवाला हो ।।
बुद्धिपूर्वं समालोक्य दूरतो गुणदोषतः ।
आरभेत तदा कर्म शुभं वा यदि वेतरत् ।।
किसी कर्मके गुण और दोषको दूरसे ही बुद्धिपूर्वक देखकर तदनन्तर उस शुभ कर्मको लाभदायक समझे तो आरम्भ करे या अशुभका त्याग करे ।।
आत्मसाक्षी भवेन्नित्यमात्मनस्तु शुभाशुभे ।
मनसा कर्मणा वाचा न च कांक्षेत पातकम् ।।
अपने शुभ और अशुभ कर्ममें सदा अपने-आपको ही साक्षी माने और मन, वाणी तथा क्रियाद्वारा कभी पाप करनेकी इच्छा न करे ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[विविध प्रकारके कर्मफलोंका वर्णन]
[विविध प्रकारके कर्मफलोंका वर्णन]
उमोवाच
सुरासुरपते देव वरद प्रीतिवर्धन ।
मानुषेष्वेव ये केचिदाढ्याः क्लेशविवर्जिताः ॥
भुञ्जाना विविधान् भोगान् दृश्यन्ते निरुपद्रवाः ॥
अपरे क्लेशसंयुक्ता दरिद्रा भोगवर्जिताः ॥
किमर्थं मानुषे लोके न समत्वेन कल्पिताः ।
एतच्छ्रोतुं महादेव कौतूहलमतीव मे ॥
उमाने पूछा— सुरासुरपते! सबकी प्रीति बढ़ानेवाले वरदायक देव! मनुष्योंमें ही कितने ही लोग क्लेशशून्य, उपद्रवरहित एवं धन-धान्यसे सम्पन्न होकर भाँति-भाँतिके भोग भोगते देखे जाते हैं और दूसरे बहुत-से मनुष्य क्लेशयुक्त, दरिद्र एवं भोगोंसे वंचित पाये जाते हैं। महादेव! मनुष्यलोकमें सब लोग समान क्यों नहीं बनाये गये (वहाँ इतनी विषमता क्यों है)? यह सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल हो रहा है ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
यादृशं कुरुते कर्म तादृशं फलमश्रुते ।
स्वकृतस्य फलं भुङ्क्ते नान्यस्तद् भोक्तुमर्हति ॥
श्रीमहेश्वर कहते हैं— देवि! जीव जैसा कर्म करता है, वैसा फल पाता है। वह अपने किये हुएका फल स्वयं ही भोगता है, दूसरा कोई उसे भोगनेका अधिकारी नहीं है ॥
अपरे धर्मकामेभ्यो निवृत्ताश्च शुभेक्षणे ।
कदर्या निरनुक्रोशाः प्रायेणात्मपरायणाः ॥
तादृशा मरणं प्राप्ताः पुनर्जन्मनि शोभने ।
दरिद्राः क्लेशभूयिष्ठा भवन्त्येव न संशयः ॥
शुभेक्षणे! जो लोग धर्म और कामसे निवृत्त हो लोभी, निर्दयी और प्रायः अपने ही शरीरके पोषक हो जाते हैं, शोभने! ऐसे लोग मृत्युके पश्चात् जब पुनः जन्म लेते हैं, तब दरिद्र और अधिक क्लेशके भागी होते हैं। इसमें संशय नहीं है ॥
उमोवाच
मानुषेष्वथ ये केचिद् धनधान्यसमन्विताः ।
भोगहीनाः प्रदृश्यन्ते सर्वभोगेषु सत्स्वपि ॥
न भुञ्जते किमर्थं ते तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा— भगवन्! मनुष्योंमें जो लोग धन-धान्यसे सम्पन्न हैं, उनमेंसे भी कितने ही ऐसे हैं, जो सम्पूर्ण भोगोंके होनेपर भी भोगहीन देखे जाते हैं। वे उन भोगोंको क्यों नहीं
भोगते? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
परैः संचोदिता धर्मं कुर्वते न स्वकामतः ।
धर्मश्रद्धां बहिष्कृत्य कुर्वन्ति च रुदन्ति च ॥
तादृशा मरणं प्राप्ताः पुनर्जन्मनि शोभने ।
फलानि तानि सम्प्राप्य भुञ्जते न कदाचन ॥
रक्षन्तो वर्धयन्तश्च आसते निधिपालवत् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! जो दूसरोंसे प्रेरित होकर धर्म करते हैं, स्वेच्छासे नहीं तथा धर्मविषयक श्रद्धाको दूर करके अश्रद्धासे दान या धर्म करते हैं और उसके लिये रोते या पछताते हैं; शोभने! ऐसे लोग जब मृत्युको प्राप्त होकर फिर जन्म लेते हैं तो धर्मके उन फलोंको पाकर कभी भोगते नहीं हैं। केवल खजानेकी रक्षा करनेवाले सिपाहीकी भाँति उस धनकी रखवाली करते हुए उसे बढ़ाते रहते हैं ।।
उमोवाच
केचिद् धनवियुक्ताश्च भोगयुक्ता महेश्वर ।
मानुषाः सम्प्रदृश्यन्ते तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा— महेश्वर! कितने ही मनुष्य धनहीन होनेपर भी भोगयुक्त दिखायी देते हैं। इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
नित्यं ये दातुमनसो नरा वित्तेष्वसत्स्वपि ॥
कालधर्मवशं प्राप्ताः पुनर्जन्मनि ते नराः ।
एते धनविहीनाश्च भोगयुक्ता भवन्त्युत ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! जो धन न होनेपर भी सदा दान देनेकी इच्छा रखते हैं, वे मनुष्य मृत्युके पश्चात् जब फिर जन्म लेते हैं, तब निर्धन होनेके साथ ही भोगयुक्त होते हैं (धर्मके प्रभावसे उनके योगक्षेमकी व्यवस्था होती रहती है) ।।
धर्मदानोपदेशं वा कर्तव्यमिति निश्चयः ।
इति ते कथितं देवि किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
अतः धर्म और दानका उपदेश करना चाहिये—यह विद्वानोंका निश्चय है। देवि! तुम्हारे इस प्रश्नका उत्तर तो दे दिया, अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।
उमोवाच
भगवन् देवदेवेश त्र्यक्ष वृषभध्वज ।
मानुषास्त्रिविधा देव दृश्यन्ते सततं विभो ॥
**उमाने कहा—**भगवन्! देवदेवेश्वर! त्रिलोचन! वृषभध्वज! देव! विभो! मनुष्य तीन प्रकारके दिखायी देते हैं ।।
आसीना एव भुञ्जन्ते स्थानैश्वर्यपरिग्रहैः ।
अपरे यत्नपूर्वं तु लभन्ते भोगसंग्रहम् ।।
अपरे यतमानाश्च न लभन्ते तु किंचन ।
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।।
कुछ लोग बैठे-बैठे ही उत्तम स्थान, ऐश्वर्य और विविध भोगोंका संग्रह पाकर उनका उपभोग करते हैं। दूसरे लोग यत्नपूर्वक भोगोंका संग्रह कर पाते हैं, और तीसरे ऐसे हैं, जो यत्न करनेपर भी कुछ नहीं पाते। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
न्यायतस्त्वं महाभागे श्रोतुकामासि भामिनि ।।
ये लोके मानुषा देवि दानधर्मपरायणाः ।
पात्राणि विधिवज्ज्ञात्वा दूरतोऽप्यनुमानतः ।।
अभिगम्य स्वयं तत्र ग्राहयन्ति प्रसाद्य च ।
दानादि चेङ्गितैरेव तैरविज्ञातमेव वा ।।
पुनर्जन्मनि ते देवि तादृशाः शोभना नराः ।
अयत्नतस्तु तान्येव फलानि प्राप्नुवन्त्युत ।।
आसीना एव भुञ्जन्ते भोगान् सुकृतभागिनः ।
**श्रीमहेश्वरने कहा—**महाभागे! भामिनि! तुम न्यायतः मेरा उपदेश सुनना चाहती हो, अतः सुनो। देवि! दानधर्ममें तत्पर रहनेवाले जो मनुष्य संसारमें दानके सुयोग्य पात्रोंका विधिवत् ज्ञान प्राप्त करके अथवा अनुमानसे भी उन्हें जानकर दूरसे भी स्वयं उनके पास चले जाते और उन्हें प्रसन्न करके अपनी दी हुई वस्तुएँ उन्हें स्वीकार करवाते हैं, उनके दान आदि कर्म संकेतसे ही होते हैं; अतः दान-पात्रोंको जनाये बिना ही जो उनके लिये दानकी वस्तुएँ दे देते हैं; देवि! वे ही पुनर्जन्ममें वैसे श्रेष्ठ पुरुष होते हैं तथा वे बिना यत्नके ही उन कर्मोंके फलोंको प्राप्त कर लेते हैं और पुण्यके भागी होनेके कारण बैठे-बैठाये ही सब तरहके भोग भोगते हैं ।।
अपरे ये च दानानि ददत्येव प्रयाचिताः ।।
यदा यदार्थिने दत्त्वा पुनर्दानं च याचिताः ।
तावत्कालं ततो देवि पुनर्जन्मनि ते नराः ।
यत्नतः श्रमसंयुक्ताः पुनस्तान् प्राप्नुवन्ति च ।।
दूसरे जो लोग याचकोंके माँगनेपर दान देते ही हैं और जब-जब याचकने माँगा, तब-तब उसे दान देकर उसके पुनः याचना करनेपर फिर दान दे देते हैं; देवि! वे मनुष्य पुनर्जन्म
पानेपर यत्न और परिश्रमसे बारंबार उन दान-कर्मोंके फल पाते रहते हैं ।।
याचिता अपि केचित् तु न ददत्येव किंचन ।
अभ्यसूयापरा मर्त्या लोभोपहतचेतसः ।।
कुछ लोग ऐसे हैं, जो याचना करनेपर भी याचकको कुछ नहीं देते। उनका चित्त लोभसे दूषित होता है और वे सदा दूसरोंके दोष ही देखा करते हैं ।।
ते पुनर्जन्मनि शुभे यतन्तो बहुधा नराः ।
न प्राप्नुवन्ति मनुजा मार्गन्तस्तेऽपि किंचन ।।
शुभे! ऐसे लोग फिर जन्म लेनेपर बहुत यत्न करते रहते हैं तो भी कुछ नहीं पाते। बहुत ढूँढनेपर भी उन्हें कोई भोग सुलभ नहीं होता ।।
नानुप्तं रोहते सस्यं तद्वद् दानफलं विदुः ।
यद् यद् ददाति पुरुषस्तत् तत् प्राप्नोति केवलम् ।।
इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ।।
जैसे बीज बोये बिना खेती नहीं उपजती, यही बात दानके फलके विषयमें समझनी चाहिये—दिये बिना किसीको कुछ नहीं मिलता। मनुष्य जो-जो देता है, केवल उसीको पाता है। देवि! यह विषय तुम्हें बताया गया। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।
उमोवाच
भगवन् भगनेत्रघ्न केचिद् वार्धक्य संयुताः ।
अभोगयोग्यकाले तु भोगांश्चैव धनानि च ।।
लभन्ते स्थविरा भूता भोगैश्वर्यं यतस्ततः ।।
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसिगर्हसि ।।
**उमाने पूछा—**भगवन्! भगदेवताका नेत्र नष्ट करनेवाले महादेव! कुछ लोग बूढ़े हो जानेपर, जब कि उनके लिये भोग भोगने योग्य समय नहीं रह जाता, बहुत-से भोग और धन पा जाते हैं। वे वृद्ध होनेपर भी जहाँ-तहाँसे भोग और ऐश्वर्य प्राप्त कर लेते हैं; ऐसा किस कर्म-विपाकसे सम्भव होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि शृणु तत्त्वं समाहिता ।।
धर्मकार्यं चिरं कालं विस्मृत्य धनसंयुताः ।
प्राणान्तकाले सम्प्राप्ते व्याधिभिश्च निपीडिताः ।।
आरभन्ते पुनर्धर्मान् दातुं दानानि वा नराः ।।
ते पुनर्जन्मनि शुभे भूत्वा दुःखपरिप्लुताः ।
अतीतयौवने काले स्थविरत्वमुपागताः ।।
लभन्ते पूर्वदत्तानां फलानि शुभलक्षणे ।।
एतत् कर्मफलं देवि कालयोगाद् भवत्युत ।।
श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुमसे इसका उत्तर देता हूँ, तुम
एकाग्रचित्त होकर इसका तात्त्विक विषय सुनो। जो लोग धनसे सम्पन्न होनेपर भी
दीर्घकालतक धर्मकार्यको भूले रहते हैं और जब रोगोंसे पीड़ित होते हैं, तब प्राणान्त-काल
निकट आनेपर धर्म करना या दान देना आरम्भ करते हैं, शुभे! वे पुनर्जन्म लेनेपर दुःखमें
मग्न हो यौवनका समय बीत जानेपर जब बूढ़े होते हैं, तब पहलेके दिये हुए दानोंके फल
पाते हैं। शुभलक्षणे! देवि! यह कर्म-फल काल-योगसे प्राप्त होता है ।।
उमोवाच
भोगयुक्ता महादेव केचिद् व्याधिपरिप्लुताः ।
असमर्थाश्च तान् भोक्तुं भवन्ति किल कारणम् ।।
उमाने पूछा—महादेव! कुछ लोग युवावस्थामें ही भोगसे सम्पन्न होनेपर भी रोगोंसे
पीड़ित होनेके कारण उन्हें भोगनेमें असमर्थ हो जाते हैं, इसका क्या कारण है? ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
व्याधियोगपरिक्लिष्टा ये निराशाः स्वजीविते ।
आरभन्ते तदा कर्तुं दानानि शभलक्षणे ।।
ते पुनर्जन्मनि शुभे प्राप्य तानि फलान्युत ।
असमर्थाश्च तान् भोक्तुं व्याधितास्ते भवन्त्युत ।।
श्रीमहेश्वरने कहा—शुभलक्षणे! जो रोगोंसे कष्टमें पड़ जानेपर जब जीवनसे निराश
हो जाते हैं, तब दान करना आसम्भ करते हैं। शुभे! वे ही पुनर्जन्म लेनेपर उन फलोंको
पाकर रोगोंसे आक्रान्त हो उन्हें भोगनेमें असमर्थ हो जाते हैं ।।
उमोवाच
भगवन् देवदेवेश मानुषेष्वेव केचन ।
रूपयुक्ताः प्रदृश्यन्ते शुभाङ्का प्रियदर्शनाः ।।
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।।
उमाने पूछा—भगवन्! देवदेवेश्वर! मनुष्योंमें कुछ ही लोग रूपवान्, शुभ लक्षणसम्पन्न
और प्रिय-दर्शन (परम मनोहर) देखे जाते हैं, किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे
बताइये ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि शृणु तत्त्वं समाहिता ।।
ये पुरा मानुषा देवि लज्जायुक्ताः प्रियंवदाः ।
शक्ताः सुमधुरा नित्यं भूत्वा चैव स्वभावतः ।।
अमांसभोजिनश्चैव सदा प्राणिदयायुताः । प्रतिकर्मप्रदा वापि वस्त्रदा धर्मकारणात् ।। भूमिशुद्धिकरा वापि कारणादग्निपूजकाः ।। एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि ते नराः । रूपेण स्पृहणीयास्तु भवन्त्येव न संशयः ।। श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! मैं प्रसन्नतापूर्वक इसका रहस्य बताता हूँ। तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। जो मनुष्य पूर्वजन्ममें लज्जायुक्त, प्रिय वचन बोलनेवाले, शक्तिशाली और सदा स्वभावतः मधुर स्वभाववाले होकर सर्वदा समस्त प्राणियोंपर दया करते हैं, कभी मांस नहीं खाते हैं, धर्मके उद्देश्यसे वस्त्र और आभूषणोंका दान करते हैं, भूमिकी शुद्धि करते हैं, कारणवश अग्निकी पूजा करते हैं; ऐसे सदाचारसम्पन्न मनुष्य पुनर्जन्म लेनेपर रूप-सौन्दर्यकी दृष्टिसे स्पृहणीय होते ही हैं, इसमें संशय नहीं है ।।
उमोवाच
विरूपाश्च प्रदृश्यन्ते मानुषेष्वेव केचन । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।। उमाने पूछा— भगवन्! मनुष्योंमें ही कुछ लोग बड़े कुरूप दिखायी देते हैं, इसमें कौन-सा कर्मविपाक कारण है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु कल्याणि कारणम् ।। रूपयोगात् पुरा मर्त्या दर्पाहंकारसंयुताः । विरूपहासकाश्चैव स्तुतिनिन्दादिभिर्भृशम् ।। परोपतापिनश्चैव मांसादाश्च तथैव च । अभ्यसूयापराश्चैव अशुद्धाश्च तथा नराः ।। एवंयुक्तसमाचारा यमलोके सुदण्डिताः । कथंचित् प्राप्य मानुष्यं तत्र ते रूपवर्जिताः ।। विरूपाः सम्भवन्त्येव नास्ति तत्र विचारणा । श्रीमहेश्वरने कहा— कल्याणि! सुनो, मैं तुमको इसका कारण बताता हूँ। पूर्वजन्ममें सुन्दर रूप पाकर जो मनुष्य दर्प और अहंकारसे युक्त हो स्तुति और निन्दा आदिके द्वारा कुरूप मनुष्योंकी बहुत हँसी उड़ाया करते हैं, दूसरोंको सताते, मांस खाते, पराया दोष देखते और सदा अशुद्ध रहते हैं, ऐसे अनाचारी मनुष्य यमलोकमें भलीभाँति दण्ड पाकर जब फिर किसी प्रकार मनुष्य-योनिमें जन्म लेते हैं, तब रूपहीन और कुरूप होते ही हैं। इसमें विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं ।।
उमोवाच
भगवन् देवदेवेश केचित् सौभाग्यसंयुताः । रूपभोगविहीनाश्च दृश्यन्ते प्रमदाप्रियाः ॥ केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ उमाने पूछा— भगवन्! देवदेवेश्वर! कुछ मनुष्य सौभाग्यशाली होते हैं, जो रूप और भोगसे हीन होनेपर भी नारीको प्रिय लगते हैं। किस कर्म-विपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
ये पुरा मानुषा देवि सौम्यशीलाः प्रियंवदाः । स्वदारैरेव संतुष्टा दारेषु समवृत्तयः ॥ दाक्षिण्येनैव वर्तन्ते प्रमदास्वप्रियास्वपि । न तु प्रत्यादिशन्त्येव स्त्रीदोषान् गुणसंश्रितान् ॥ अन्नपानीयदाः काले नृणां स्वादुप्रदाश्च ये । स्वदारव्रतिनश्चैव धृतिमन्तो निरत्ययाः ॥ एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने । मानुषास्ते भवन्त्येव सततं सुभगा भृशम् ॥ अर्थादृतेऽपि ते देवि भवन्ति प्रमदाप्रियाः ॥ श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! जो मनुष्य पहले सौम्य-स्वभावके तथा प्रिय वचन बोलनेवाले होते हैं, अपनी ही पत्नीमें संतुष्ट रहते हैं, यदि कई पत्नियाँ हों तो उन सबपर समान भाव रखते हैं, अपने स्वभावके कारण अप्रिय लगनेवाली स्त्रियोंके प्रति भी उदारतापूर्ण बर्ताव करते हैं, स्त्रियोंके दोषोंकी चर्चा नहीं करते, उनके गुणोंका ही बखान करते हैं, समयपर अन्न और जलका दान करते हैं, अतिथियोंको स्वादिष्ट अन्न भोजन कराते हैं, अपनी पत्नीके प्रति ही अनुरक्त रहनेका नियम लेते हैं, धैर्यवान् और दुःखरहित होते हैं, शोभने! ऐसे आचारवाले मनुष्य पुनर्जन्म लेनेपर सदा सौभाग्यशाली होते ही हैं। देवि! वे धनहीन होनेपर भी अपनी पत्नीके प्रीतिपात्र होते हैं ॥
उमोवाच
दुर्भागाः सम्प्रदृश्यन्ते आर्या भोगयुता अपि । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ उमाने पूछा— भगवन्! बहुत-से श्रेष्ठ पुरुष भोगोंसे सम्पन्न होनेपर भी दुर्भाग्यके मारे दिखायी देते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा सम्भव होता है? यह मुझे बताइये ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु सर्वं समाहिता ॥
ये पुरा मेनुजा देवि स्वदारेष्वनपेक्षया ।
यथेष्टवृत्तयश्चैव निर्लज्जा वीतसम्भ्रमाः ॥
परेषां विप्रियकरा वाङ्मनःकायकर्मभिः ।
निराश्रया निरन्नाद्याः स्त्रीणां हृदयकोपनाः ॥
एवं युक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि ते नराः ।
दुर्भागास्तु भवन्त्येव स्त्रीणां हृदयविप्रियाः ॥
नास्ति तेषां रतिसुखं स्वदारेष्वपि किंचन ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! इस बातको मैं तुम्हें बताता हूँ, तुम एकाग्रचित होकर सारी बातें सुनो। जो मनुष्य पहले अपनी पत्नीकी उपेक्षा करके स्वेच्छाचारी हो जाते हैं, लज्जा और भयको छोड़ देते हैं, मन, वाणी और शरीर तथा क्रियाद्वारा दूसरोंकी बुराई करते हैं और आश्रयहीन एवं निराहार रहकर पत्नीके हृदयमें क्रोध उत्पन्न करते हैं; ऐसे दूषित आचारवाले मनुष्य पुनर्जन्म लेनेपर दुर्भाग्ययुक्त और नारी जातिके लिये अप्रिय ही होते हैं। ऐसे भाग्यहीनोंको अपनी पत्नीसे भी अनुरागजनित सुख नहीं सुलभ होता ॥
उमोवाच
भगवन् देवदेवेश मानुषेष्वपि केचन ।
ज्ञानविज्ञानसम्पन्ना बुद्धिमन्तो विचक्षणाः ॥
दुर्गतास्तु प्रदृश्यन्ते यतमाना यथाविधि ।
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा— भगवन्! देवदेवेश्वर! मनुष्योंमेंसे कुछ लोग ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न, बुद्धिमान् और विद्वान् होनेपर भी दुर्गतिमें पड़े दिखायी देते हैं। वे विधिपूर्वक यत्न करके भी उस दुर्गतिसे नहीं छूट पाते। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु कल्याणि कारणम् ॥
ये पुरा मनुजा देवि श्रुतवन्तोऽपि केवलम् ।
निराश्रया निरन्नाद्या भृशमात्मपरायणाः ॥
ते पुनर्जन्मनि शुभे ज्ञानबुद्धियुता अपि ।
निष्किंचना भवन्त्येव अनुप्तं हि न रोहति ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— कल्याणि! सुनो, मैं इसका कारण तुम्हें बताता हूँ। देवि! जो मनुष्य पहले केवल विद्वान् होनेपर भी आश्रयहीन और भोजन-सामग्रीसे वंचित होकर केवल अपने ही उदर-पोषणके प्रयत्नमें लगे रहते हैं, शुभे! वे पुनर्जन्म लेनेपर ज्ञान और बुद्धिसे युक्त होनेपर भी अकिंचन ही रह जाते हैं, क्योंकि बिना बोया हुआ बीज नहीं जमता है ॥
उमोवाच
मूर्खा लोके प्रदृश्यन्ते दृढमूला विचेतसः ।
ज्ञानविज्ञानरहिताः समृद्धाश्च समन्ततः ॥
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
**उमाने पूछा—**भगवन्! इस जगत्में मूर्ख, अचेत तथा ज्ञान-विज्ञानसे रहित मनुष्य भी सब ओरसे समृद्धिशाली और दृढ़मूल दिखायी देते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
ये पुरा मनुजा देवि बालिशा अपि सर्वतः ।
समाचरन्ति दानानि दीनानुग्रहकारणात् ॥
अबुद्धिपूर्वं वा दानं ददत्येव ततस्ततः ।
ते पुनर्जन्मनि शुभे प्राप्नुवन्त्येव तत् तथा ॥
पण्डितोऽपण्डितो वापि भुङ्क्ते दानफलं नरः ।
बुद्ध्याऽनपेक्षितं दानं सर्वथा तत् फलत्युत ॥
**श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! जो मनुष्य पहले मूर्ख होनेपर भी सब ओर दीन-दुःखियोंपर अनुग्रह करके उन्हें दान देते रहे हैं, जो पहलेसे दानके महत्त्वको न समझकर भी जहाँ-तहाँ दान देते ही रहे हैं, शुभे! वे मनुष्य पुनर्जन्म प्राप्त होनेपर वैसी अवस्थाको प्राप्त होते ही हैं। कोई मूर्ख हो या पण्डित, प्रत्येक मनुष्य दानका फल भोगता है। बुद्धिसे अनपेक्षित दान भी सर्वथा फल देता ही है ।।
उमोवाच
भगवन् देवदेवेश मानुषेषु च केचन ।
मेधाविनः श्रुतिधरा भवन्ति विशदाक्षराः ॥
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
**उमाने पूछा—**भगवन्! देवदेवेश्वर! मनुष्योंमें ही कुछ लोग बड़े मेधावी, किसी बातको एक बार सुनकर ही उसे याद कर लेनेवाले और विशद अक्षर-ज्ञानसे सम्पन्न होते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
ये पुरा मनुजा देवि गुरुशुश्रूषका भृशम् ।
ज्ञानार्थं ते तु संगृह्य तीर्थं ते विधिपूर्वकम् ॥
विधिनेव परांश्चैव ग्राहयन्ति च नान्यथा ।
अश्लाघमाना ज्ञानेन प्रशान्ता यतवाचकाः ॥
विद्यास्थानानि ये लोके स्थापयन्ति च यत्नतः । तादृशा मरणं प्राप्ताः पुनर्जन्मनि शोभने ॥ मेधाविनः श्रुतिधरा भवन्ति विशदाक्षराः । श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! जो मनुष्य पहले गुरुकी अत्यन्त सेवा करनेवाले रहे हैं और ज्ञानके लिये विधिपूर्वक गुरुका आश्रय लेकर स्वयं भी दूसरोंको विधिसे ही अपनी विद्या ग्रहण कराते रहे हैं, अविधिसे नहीं। अपने ज्ञानके द्वारा जो कभी अपनी झूठी बड़ाई नहीं करते रहे हैं, अपितु शान्त और मौन रहे हैं तथा जो जगत्में यत्नपूर्वक विद्यालयोंकी स्थापना करते रहे हैं, शोभने! ऐसे पुरुष जब मृत्युको प्राप्त होकर पुनर्जन्म लेते हैं, तब मेधावी, किसी बातको एक बार ही सुनकर उसे याद कर लेनेवाले और विशद अक्षर-ज्ञानसे सम्पन्न होते हैं ।।
उमोवाच
अपरे मानुषा देव यतन्तोऽपि यतस्ततः । बहिष्कृताः प्रदृश्यन्ते श्रुतविज्ञानबुद्धितः ॥ केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ उमाने पूछा— देव! दूसरे मनुष्य यत्न करनेपर भी जहाँ-तहाँ शास्त्रज्ञान और बुद्धिसे बहिष्कृत दिखायी देते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
ये पुरा मनुजा देवि ज्ञानदर्पसमन्विताः । श्लाघमानाश्च तत् प्राप्य ज्ञानाहङ्कारमोहिताः ॥ वदन्ति ये परान् नित्यं ज्ञानाधिक्येन दर्पिताः । ज्ञानादसूयां कुर्वन्ति न सहन्ते हि चापरान् ॥ तादृशा मरणं प्राप्ताः पुनर्जन्मनि शोभने । मानुष्यं सुचिरात् प्राप्य तत्र बोधविवर्जिताः ॥ भवन्ति सततं देवि यतन्तो हीनमेधसः ॥ श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! जो मनुष्य ज्ञानके घमंडमें आकर अपनी झूठी प्रशंसा करते हैं और ज्ञान पाकर उसके अहंकारसे मोहित हो दूसरोंपर आक्षेप करते हैं, जिन्हें सदा अपने अधिक ज्ञानका गर्व रहता है, जो ज्ञानसे दूसरोंके दोष प्रकट किया करते हैं और दूसरे ज्ञानियोंको नहीं सहन कर पाते हैं, शोभने! ऐसे मनुष्य मृत्युके पश्चात् पुनर्जन्म लेनेपर चिरकालके बाद मनुष्य-योनि पाते हैं। देवि! उस जन्ममें वे सदा यत्न करनेपर भी बोधहीन और बुद्धिरहित होते हैं ।।
उमोवाच
भगवन् मानुषाः केचित् सर्वकल्याणसंयुताः ।
पुत्रैर्दारैर्गुणयुतैर्दासीदासपरिच्छदैः ॥
परस्परर्द्धिसंयुक्ताः स्थानैश्वर्यमनोहरैः ।
व्याधिहीना निराबाधा रूपारोग्यबलैर्युताः ॥
धनधान्येन सम्पन्नाः प्रासादैर्यानवाहनैः ।
सर्वोपभोगसंयुक्ता नानाचित्रैर्मनोहरैः ॥
ज्ञातिभिः सह मोदन्ते अविघ्नं तु दिने दिने ।
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा— भगवन्! कितने ही मनुष्य समस्त कल्याणमय गुणोंसे युक्त होते हैं। वे गुणवान् स्त्री-पुत्र, दास-दासी तथा अन्य उपकरणोंसे सम्पन्न होते हैं। स्थान, ऐश्वर्य तथा मनोहर भोगों और पारस्परिक समृद्धिसे संयुक्त होते हैं। रोगहीन, बाधाओंसे रहित, रूप-आरोग्य और बलसे सम्पन्न, धन-धान्यसे परिपूर्ण, भाँति-भाँतिके विचित्र एवं मनोहर महल, यान और वाहनोंसे युक्त एवं सब प्रकारके भोगोंसे संयुक्त हो वे प्रतिदिन जाति-भाइयोंके साथ निर्विघ्न आनन्द भोगते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु सर्वं समाहिता ॥
ये पुरा मनुजा देवि आढ्या वा इतरेऽपि वा ।
श्रुतवृत्तसमायुक्ता दानकामाः श्रुतप्रियाः ॥
परेङ्गितपरा नित्यं दातव्यमिति निश्चिताः ।
सत्यसंधाः क्षमाशीला लोभमोहविवर्जिताः ॥
दातारः पात्रतो दानं व्रतैर्नियमसंयुताः ।
स्वदुःखमिव संस्मृत्य परदुःखविवर्जिताः ॥
सौम्यशीलाः शुभाचारा देवब्राह्मणपूजकाः ॥
एवंशींलसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ।
दिवि वा भुवि वा देवि जायन्ते कर्मभोगिनः ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! यह मैं तुम्हें बताता हूँ, तुम एकाग्रचित होकर सब बातें सुनो। जो धनाढ्य या निर्धन मनुष्य पहले शास्त्रज्ञान और सदाचारसे युक्त, दान करनेके इच्छुक, शास्त्रप्रेमी, दूसरोंके इशारेको समझकर सदा दान देनेके लिये दृढ़ विचार रखनेवाले, सत्यप्रतिज्ञ, क्षमाशील, लोभ-मोहसे रहित, सुपात्रको दान देनेवाले, व्रत और नियमोंसे युक्त तथा अपने दुःखके समान ही दूसरोंके भी दुःखको समझकर किसीको दुःख न देनेवाले होते हैं, जिनका शील-स्वभाव सौम्य होता है, आचार-व्यवहार शुभ होते हैं, जो देवताओं तथा
ब्राह्मणोंके पूजक होते हैं, शोभामयी देवि! ऐसे शील-सदाचारवाले मानव पुनर्जन्म पानेपर स्वर्गमें या पृथ्वीपर अपने सत्कर्मोंके फल भोगते हैं ।। मानुषेष्वपि ये जातास्तादृशाः सम्भवन्ति ते । यादृशास्तु त्वया प्रोक्ताः सर्वे कल्याणसंयुताः ॥ रूपं द्रव्यं बलं चायुर्भोगैश्वर्यं कुलं श्रुतम् । इत्येतत् सर्वसाद्गुण्यं दानाद् भवति नान्यथा ॥ तपोदानमयं सर्वमिति विद्धि शुभानने ॥ वैसे पुरुष जब मनुष्योंमें जन्म ग्रहण करते हैं, तब वे सभी तुम्हारे बताये अनुसार कल्याणमय गुणोंसे सम्पन्न होते हैं। उन्हें रूप, द्रव्य, बल, आयु, भोग, ऐश्वर्य, उत्तम कुल और शास्त्रज्ञान प्राप्त होते हैं। इन सभी सद्गुणोंकी प्राप्ति दानसे ही होती है, अन्यथा नहीं। शुभानने! तुम यह जान लो कि सब कुछ तपस्या और दानका ही फल है ।।
उमोवाच अथ केचित् प्रदृश्यन्ते मानुषेष्वेव मानुषाः । दुर्गताः क्लेशभूयिष्ठा दानभोगविवर्जिताः ।। भयैस्त्रिभिः समायुक्ता व्याधिक्षुद्भयसंयुताः । दुष्कलत्राभिभूताश्च सततं विघ्नदर्शकाः ।। केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।। उमाने पूछा—प्रभो! मनुष्योंमें ही कुछ लोग दुर्गतियुक्त अधिक क्लेशसे पीड़ित, दान और भोगसे वंचित, तीन प्रकारके भयोंसे युक्त, रोग और भोगके भयसे पीड़ित, दुष्ट पत्नीसे तिरस्कृत तथा सदा सभी कार्योंमें विघ्नका ही दर्शन करनेवाले होते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वर उवाच ये पुरा मनुजा देवि आसुरं भावमाश्रिताः । क्रोधलोभसमायुक्ता निरन्नाद्याश्च निष्क्रियाः ।। नास्तिकाश्चैव धूर्ताश्च मूर्खाश्चात्मपरायणाः । परोपतापिनो देवि प्रायशः प्राणिनिर्दयाः ।। एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने । कथंचित् प्राप्य मानुष्यं तत्र ते दुःखपीडिताः ।। सर्वतः सम्भवन्त्येव पूर्वमात्मप्रमादतः । यथा ते पूर्वकथितास्तथा ते सम्भवन्त्युत ।। श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! जो मनुष्य पहले आसुरभावके आश्रित, क्रोध और लोभसे युक्त, भोजन-सामग्रीसे वंचित, अकर्मण्य, नास्तिक, धूर्त, मूर्ख, अपना ही पेट पालनेवाले,
दूसरोंको सतानेवाले तथा प्रायः सभी प्राणियोंके प्रति निर्दय होते हैं। शोभने! ऐसे आचार-व्यवहारसे युक्त मनुष्य पुनर्जन्मके समय किसी प्रकार मनुष्ययोनिको पाकर जहाँ-कहीं भी उत्पन्न होते हैं, सर्वत्र अपने ही प्रमादके कारण दुःखसे पीड़ित होते हैं और जैसा तुमने बताया है, वैसे ही अवांछनीय दोषसे युक्त होते हैं।।
शुभाशुभं कृतं कर्म सुखदुःखफलोदयम् ।
इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ।।
देवि! मनुष्यका किया हुआ शुभ या अशुभ कर्म ही उसे सुख या दुःखरूप फलकी प्राप्ति करानेवाला है। यह बात मैंने तुम्हें बता दी। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
वर्णन]
[अन्धत्व और पंगुत्व आदि नाना प्रकारके दोषों और रोगोंके कारणभूत दुष्कर्मोंका
वर्णन]
उमोवाच
भगवन् देवदेवेश मम प्रीतिविवर्धन ।
जात्यन्धाश्चैव दृश्यन्ते जाता वा नष्टचक्षुषः ॥
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।
उमाने कहा—भगवन्! मेरी प्रीति बढ़ानेवाले देवदेवेश्वर! इस संसारमें कुछ लोग
जन्मसे ही अन्धे दिखायी देते हैं और कुछ लोगोंके जन्म लेनेके पश्चात् उनकी आँखें नष्ट हो
जाती हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
ये पुरा कामकारेण परवेश्मसु लोलुपाः ।
परस्त्रियोऽभिवीक्षन्ते दुष्टेनैव स्वचक्षुषा ।।
अन्धीकुर्वन्ति ये मर्त्याः क्रोधलोभसमन्विताः ।
लक्षणज्ञाश्च रूपेषु अयथावत्प्रदर्शकाः ॥
एवंयुक्तसमाचाराः कालधर्मवशास्तु ते ।
दण्डिता यमदण्डेन निरयस्थाश्चिरं प्रिये ॥
श्रीमहेश्वरने कहा—प्रिये! जो पूर्वजन्ममें काम या स्वेच्छाचारवश पराये घरोंमें अपनी
लोलुपताका परिचय देते हैं और परायी स्त्रियोंपर अपनी दूषित दृष्टि डालते हैं तथा जो
मनुष्य क्रोध और लोभके वशीभूत होकर दूसरोंको अन्धा बना देते हैं, अथवा रूपविषयक
लक्षणोंको जानकर उसका मिथ्या प्रदर्शन करते हैं। ऐसे आचारवाले मनुष्य मृत्युको प्राप्त
होनेपर यमदण्डसे दण्डित हो चिरकालतक नरकोंमें पड़े रहते हैं ।।
यदि चेन्मानुषं जन्म लभेरंस्ते तथापि वा ।
स्वभावतो वा जाता वा अन्धा एव भवन्ति ते ॥
अक्षिरोगयुता वापि नास्ति तत्र विचारणा ॥
उसके बाद यदि वे मनुष्ययोनिमें जन्म लेते हैं, तब स्वभावतः अन्धे होते हैं अथवा
जन्म लेनेके बाद अन्धे हो जाते हैं या सदा ही नेत्ररोगसे पीड़ित रहते हैं। इस विषयमें विचार
करनेकी आवश्यकता नहीं है ।।
उमोवाच
मुखरोगयुताः केचिद् दृश्यन्ते सततं नराः ।
दन्तकण्ठकपोलस्थैर्व्याधिभिर्बहुपीडिताः ॥
आदिप्रभृति वै मर्त्या जाता वाप्यथ कारणात् ।