भारतकोश
संग्रह पर लौटें

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

तृतीय सर्ग

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सुदक्षिणा के साथ रथ से अपनी राजधानी को प्रस्थान किया। अयोध्या पहुँचने पर प्रजाओं ने बड़ी उत्कण्ठा से उनका स्वागत किया। बाद मन्त्रियों से राज्य-भार लेकर वे धर्मपूर्वक प्रजापालन करने लगे। अनन्तर जिस प्रकार आकाश-स्थली अत्रि मुनि के नेत्र से निर्गत चन्द्रमा को धारण करती है और देवनदी गङ्गा ने अग्नि से प्रक्षिप्त स्कन्द को उत्पन्न करनेवाले शिवजी के तेज को धारण किया था उसी प्रकार सुदक्षिणा ने दिलीप के वंशवर्द्धक गर्भ को धारण किया, जिसमें लोकपालों का अंश भी सम्मिलित था।

तृतीय सर्ग

गर्भधारण के बाद राजा दिलीप की पत्नी सुदक्षिणा ने पति को, प्रिय सखियों को आनन्दप्रद और इक्ष्वाकुवंश की वृद्धि के लिए कारणभूत गर्भ के चिह्नों को धारण करना आरम्भ किया। उनका शरीर दुबला होने लगा, मुख पीला पड़ गया, उन्होंने अधिक आभूषणों को उतार दिया तथा मिट्टी खाना शुरू कर दिया। यह देखकर परम प्रसन्न राजा ने उनकी सखियों से गर्भिणीमनोरथ को पूछ-पूछकर तदनुकूल सारी व्यवस्थाएँ कर दीं। धीरे-धीरे उनके गर्भ का कष्ट कम होने लगा और उनका शरीर पुष्ट होने लगा, उनका कुचाग्र भाग काला हो गया। राजा दिलीप ने उन्हें गर्भवती समझकर पत्नीप्रेम और अपनी सम्पत्ति के अनुरूप पुंसवन आदि वैदिक संस्कारों को सम्पन्न किया और प्रवीण वैद्यों द्वारा गर्भ के भरण पोषण की व्यवस्था कर दी। दसवें महीने में सुदक्षिणा को पुत्ररत्न उत्पन्न हुआ। राजा ने उदारतापूर्वक दान दिया और कुलगुरु वसिष्ठजी को तपोवन से बुलाकर विधिवत् जातकर्म संस्कार कराया तथा उस बालक का नाम रघु रख दिया।

धाई के वचनों को तोतली बोली में दुहराता हुआ वह बालक धीरे-धीरे बढ़ने लगा, बाद उपयोगी विद्याओं का अध्ययन कर सुशिक्षित हो गया। राजा दिलीप ने उसका यज्ञोपवीत संस्कार तथा विवाह करके उसे युवराज बना दिया। रघु के युवराज होते ही राजा दिलीप शत्रुओं के लिए असह्य हो गये। बाद युवराज रघु को घोड़े की रक्षा के निमित्त नियुक्त कर ९९ अश्वमेध यज्ञ पूर्ण कर लिये। सौवाँ अश्वमेध करने के हेतु राजा ने जब घोड़ा छोड़ा, तब देवराज इन्द्र को सहन नहीं हुआ। वे घोड़े को चुराकर अदृश्य हो गये। घोड़े को न

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देख सेनासहित रघु किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो गये। इतने में ही वशिष्ठजी को कामधेनु गौ नन्दिनी दिखाई पड़ी, जिसका प्रभाव उन्होंने पहले ही सुन रखा था। तत्काल उसके मूत्र को अपनी आंखों में लगाकर देखा कि इन्द्र घोड़े को चुराकर ले जा रहे हैं। यह दृश्य देखते ही रघु ने इन्द्र को ललकारते हुए कहा—देवराज ! आप यज्ञों के रक्षक होकर स्वयं ऐसा करेंगे, तो यज्ञ कैसे हो सकेगा ? तब इन्द्र ने कहा—राजकुमार ! तेरा कहना सत्य है, फिर भी तुम्हारे पिता दिलीप सौवां अश्वमेध यज्ञ पूरा कर मेरा यश मिटा देना चाहते हैं, क्योंकि मैं ही एकमात्र शतक्रतु ( सौ यज्ञ पूरा करने वाला ) हूँ दूसरा कोई नहीं, इसलिए मैंने इस घोड़े का अपहरण कर लिया है, तुम लौट जाओ, नहीं तो राजा सगर की सन्तानों की तरह तुम्हारी भी दशा होगी।

इस पर रघु ने कहा—यदि आपका यही निश्चय है, तो अस्त्र उठाइए, मुझे बिना जीते आप घोड़े को नहीं ले जा सकते हैं। यह कहते हुए रघु ने इन्द्र की छाती पर एक बाण मारा। इन्द्र ने भी अत्यन्त क्रुद्ध होकर एक बाण रघु की छाती में ऐसा मारा कि रुधिर की धारा बहने लगी। इस प्रकार दोनों में भयङ्कर युद्ध होने लगा। अन्त में रघु ने इन्द्र के रथ की ध्वजा को काट गिराया, जिससे अपना अत्यन्त अपमान समझकर इन्द्र ने अति क्रोध में आकर रघु को मार डालने के निमित्त अपने अमोघ अस्त्र वज्र का प्रहार किया, किन्तु जरा-सी मूर्च्छा का अनुभव कर रघु उठकर पुनः खड़े हो गये। इस प्रकार रघु को घोर महायुद्ध में अचल देखकर उनकी वीरता पर इन्द्र प्रसन्न हो गये और बोले—युवराज ! पर्वतों की पांख काटनेवाले मेरे. इस अमोघ वज्र के प्रहार को तुम्हारे अतिरिक्त आज तक किसी ने नहीं सहा है। तुम्हारे इस साहस एवं वीरता को देखकर मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। इस घोड़े को छोड़कर जो चाहो मांग लो।

यह सुनकर रघु ने कहा—देवराज ! यदि आप घोड़े को नहीं देना चाहते हैं, तो निरन्तर यज्ञ करनेवाले मेरे पूज्य पिताजी, इस आरब्ध सौवें अश्वमेध यज्ञ के पूर्ण फल को प्राप्त करें और शिवजी के अंश होने के कारण अत्यन्त दुरासद, सम्प्रति यज्ञशाला में विराजमान मेरे पिताजी इस हम लोगों के समाचार को आपके दूत के द्वारा ही जिस प्रकार सुन सकें आप कृपया वैसा ही प्रबन्ध कर दें। इन्द्र ने रघु की इस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और अपने सारथी मातलि के साथ जिस मार्ग से आये थे उसी मार्ग से अपनी नगरी

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इन्द्रपुरी की ओर प्रस्थान किया। इधर युवराज रघु भी विजयी होने पर भी घोड़े के न प्राप्त होने के कारण विशेष प्रसन्न न होते हुए राजा दिलीप के यज्ञ-मण्डप की ओर लौट पड़े।

रघु और इन्द्र के वृत्तान्त को राजा दिलीप इन्द्रदूत के मुख से पहले ही सुनकर परम प्रसन्न हो चुके थे। अतः रघु के आने पर इन्द्र के वज्र के आर्द्र घाव से चिह्नित शरीर पर हर्ष से शिथिल हाथ को धीरे-धीरे फेरते हुए उन्होंने उसका अभिनन्दन किया। इस प्रकार दिलीप ने ९९ अश्वमेध यज्ञ कर जीवन-लीला के बाद स्वर्ग जाने के लिए ९९ सीढ़ियों की पंक्ति बनाकर अपने युवक पुत्र रघु को राज्य देकर वानप्रस्थाश्रम में रहकर तपस्या करने के लिए तपोवन में प्रस्थान कर दिया, क्योंकि इक्ष्वाकु कुल के राजाओं का यही कुल-नियम था।

चतुर्थ सर्ग

महाराज रघु अपने पिता राजा दिलीप द्वारा दिये गये अयोध्या के राज्य सिंहासन को प्राप्त कर उस प्रकार अधिक सुशोभित हुए जिस प्रकार सन्ध्या के समय भगवान् भास्कर के द्वारा निहित तेज को पाकर पावक अधिक तेजस्वी हो जाता है। प्रजाओं ने रघु के अभ्युदय से प्रसन्नतापूर्वक उनका अभिनन्दन किया। उस समय नीतिविशारद मन्त्रियों ने रघु के समक्ष धर्मपक्ष एवं अधर्म-पक्ष दोनों ही रखे, किन्तु रघु ने सद्धर्म को ही स्वीकार किया। अतः रघु ने न्याय से प्रजापालन करते हुए पराक्रम से शत्रुओं को भी अपने वश में कर लिया।

रघु को सिंहासनासीन देखकर लक्ष्मी अदृश्य रूप से तथा सरस्वती समय-समय पर बन्दियों के स्तुतिगान से उनकी सेवा करने लगी। यद्यपि मनु आदि राजाओं ने पहले पृथ्वी का उपभोग कर लिया था, फिर भी रघु को पाकर पृथ्वी अनुप भुक्ता सुन्दरी के समान उनमें अनुरक्त हो गयी। जिस प्रकार मनुष्य आम का फल पाकर उसकी बौर की प्रतीक्षा नहीं रखता है उसी प्रकार प्रजाएँ रघु के गुणों से सन्तुष्ट होकर राजा दिलीप को भूलने लग गयीं। समस्त राज्य अभिनव आनन्द का अनुभव करने लगा। प्रजावर्ग में अनुराग उत्पन्न करने के कारण रघु वास्तविक रूप से राजा कहे जाने लगे। रघु के नये राजा होने पर सारी वस्तुएँ नवीन सी दिखाई देने लगीं।

राज्यासन प्राप्त करने के बाद रघु ने अपने राज्य में शान्ति स्थापित की, शरद्ऋतु का आगमन इस प्रकार हुआ मानो कमलधारिणी साक्षात् लक्ष्मी आ

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गयी हों। मेघरहित सूर्य के तेज के समान रघु का प्रताप चारों दिशाओं में फैल गया। इन्द्र ने वर्षा सम्बन्धी धनुष उठाकर रख दिया और रघु ने दिग्विजयर्थ अपना धनुष उठा लिया।' क्योंकि ये दोनों वारी-बारी से प्रजा का कार्य सिद्ध करने के लिए धनुर्धारण में तत्पर रहते थे। वर्षाकाल की समाप्ति तथा शरद् के आगमन से सर्वत्र प्रसन्नता छा गयी। ईख की छाया में बैठकर क्षेत्ररक्षक कृषकों की कन्याएँ प्रजावर्ग की रक्षा करने वाले रघु का गुणगान करने लगीं। अगस्त्य के उदय होने से जल में निर्मलता आ गयी। हृष्ट-पुष्ट मतवाले वृषभ रघु का अनुकरण करते हुए नदी के तटों को तोड़ने लगे। शरद् ऋतु आ जाने पर कीचड़ सूख गये तथा मार्ग प्रशस्त हो गये। इस प्रकार वर्षऋतु समाप्त हो जाने के बाद शरद्ऋतु ने रघु को विजययात्रा के लिए प्रोत्साहित किया, उन्होंने विधिपूर्वक नीराजनाविधि नामक शान्ति कर्म और राजधानी की रक्षा का प्रबन्ध करके षड्विध सेना के साथ शुभ मुहूर्त में दिग्विजय के लिए प्रस्थान कर दिया।

इन्द्र के समान पराक्रमी राजा रघु पहले पूर्व दिशा की ओर बढ़े। रघु के सेना के रथ एवं घोड़ों की टापों से उड़ी धूलि से तथा मेघों के तुल्य हाथियों से पृथ्वी एवं आकाश एक सा होता जा रहा था। आगे-आगे रघु का प्रताप, बाद सेना का कोलाहल, उसके पीछे धूलि, अन्त में सेना चल रही थी। रघु अपने प्रभाव से निर्जल प्रदेश को जलमय बनाते हुए, नदियों पर पुल बंधाते हुए, घने जङ्गलों को काटकर प्रकाशमय मार्ग बनाते हुए आगे बढ़ते जाते थे। रघु दिग्विजय के निमित्त अपनी सेना को पूर्व सागर की ओर ले जाते हुए इस प्रकार लग रहे थे मानों राजा भगीरथ शिवजी के जटाजूट से निकली हुई गङ्गाजी को गङ्गासागर की ओर ले जाते हों।

रघु जिन-जिन राजाओं को जीत लेते थे, उन्हें पुनः वहीं का राजा बना देते थे। जिस प्रकार धान का बीज उखाड़कर पुनः रोप देने पर अधिक फल देते हैं वैसे उन राजाओं ने उन्हें अधिक उपायन दिया। इस प्रकार रघु का मार्ग भलीभाँति निष्कण्टक होता गया।

पूर्वी राजाओं को जीतते हुए जब रघु ताल के वनों से सुशोभित समुद्री तट पर पहुँचे तब सुह्म देश के राजा ने युद्ध के बिना ही वैतसी वृत्ति का आश्रय कर उनकी अधीनता स्वीकार कर ली। वहाँ से आगे बढ़कर रघु ने नौका-साधनवाले बंगाली राजाओं को जीतने के बाद गङ्गासागर के द्वीपों में अपना जयस्तम्भ गाड़ दिया। पुनः हाथियों का पुल बनाकर कपिशा नदी को पार कर

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उत्कल प्रदेश में गये, जहाँ के लोगों ने आगे बढ़ने के लिए कलिंग देश का मार्ग बता दिया। तदनुसार वहाँ पहुँचकर युद्ध करनेवाले कलिङ्ग राजा को पराजित कर महेन्द्र पर्वत के ऊपर अपना दुःसह प्रताप स्थापित कर दिया। वहाँ उनके सैनिकों ने नारियल के पत्तों में शत्रुओं के यश के समान नारियल का रस पीकर अपना परिश्रम दूर करते हुए विश्राम किया।

बाद वहाँ से समुद्र के किनारे-किनारे दक्षिण की ओर बढ़े। कावेरी नदी को पार कर मलयागिरि की तराई से आगे बढ़ते हुए ताम्रपर्णी नदी एवं समुद्र के सङ्गम पर वर्तमान पाण्ड्य वंश के राजा को युद्ध में हराया। जिस दक्षिण दिशा में सूर्य का तेज भी मन्द पड़ जाता है वहीं के राजे रघु का प्रताप नहीं सह पाये। पाण्ड्यनरेश ने नम्र होकर भेंट के रूप में रघु को मोतियों का हार दिया। वहाँ से चलकर सह्यपर्वत को लाँघता हुआ केरल को जीतने के बाद केरल की मुरला नदी के वायु से उड़ाये हुए केतकी के पराग रघु के सैनिकों पर पड़े और रघु के घोड़ों पर कवचों की ध्वनि ने तालवृक्ष ध्वनि को फीका कर दिया। जिस समुद्र से प्रार्थना करने के बाद परशुरामजी को स्थान प्राप्त हुआ था उसी से प्रार्थना के बिना वहाँ के राजाओं के व्याज से पर्याप्त धन प्राप्त हुआ। रघु ने केरल में उस त्रिकूट पर्वत को ही अपना विजय-स्तम्भ बना दिया जिसपर उनके हाथियों के दाँतों के प्रहार का चिह्न पड़ा था।

बाद स्थलमार्ग से पारस में जाकर रघु ने उन यवनों से युद्ध किया जिनकी स्त्रियों के मुख से मदिरा की गन्ध निकलती थी। धूलि से आच्छन्न रणाङ्गण में केवल धनुष टङ्कार से ही योद्धाओं का ज्ञान हो पाता था। रघु ने भल्ला से पारसी राजाओं के दाढ़ीवाले मस्तकों को काट-काटकर पृथ्वी को इस प्रकार ढक दिया जैसे वह मधुमक्खियों के छाते से ढकी हों। मरने से बचे पारसी यवनों ने अपने-अपने टोपों को उतार रघु की शरण ले ली।

अनन्तर हूणों को जीतकर वहाँ से उत्तर दिया की ओर कम्बोजों को जीतते हुए हिमालय पर पहुँचकर पहाड़ी राजाओं से घमासान युद्ध किया। हिमालय पर्वत पर राजा रघु का उत्सव-संकेत नामक गणों के साथ घोर युद्ध हुआ जिसमें प्रयोग किये गये बाणों, भिन्दिपालों एवं पत्थरों के पारस्परिक संघर्ष से आग उत्पन्न हो जाती थी। रघु ने उनको जीतकर हर्षोत्सव में अपने पराक्रम का गुणगान गन्धर्वों से कराया। हारे हुए उत्सव-संकेतों ने रघु को इतना पर्याप्त ऐश्वर्य दिया, जिससे रघु ने हिमालय के ऐश्वर्य का पता लगा लिया और हिमालयवासियों ने राजा रघु के पराक्रम को जान लिया।

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बाद रघु हिमालय पर अपना स्थिर यश स्थापित करके कैलास पर्वत पर इस संकोच से नहीं गये कि इसे तो रावण ने ही उठा लिया था। पश्चात् लौहित्य नदी को पार कर रघु ने कामरूपेश्वर के हृदय में कम्प पैदा कर दिया। क्योंकि वह तो सूर्य को भी ढक देनेवाली रघु की सेना की धूलि को ही नहीं सह सका तो सेना को कैसे सह सकता था। कामरूप के राजा ने इन्द्र से भी अधिक पराक्रमी रघु को उन हाथियों को भी भेंट के रूप उपस्थित कर दिया, जिनसे वह शत्रुओं को जीता करता था। उस कामरूप के राजा ने रघु को पर्याप्त रत्नों का उपहार देकर उनका सम्मान किया।

इस प्रकार चारों दिशाओं को जीतकर रघु पराजित राजाओं के छत्र-रहित शिरों को अपनी चतुरङ्गिणी अजेय सेना की धूलि से धूसरित करते हुए दिग्विजययात्रा से अपनी राजधानी अयोध्या में सकुशल लौट आये।

दिग्विजय के अनन्तर राजा रघु ने उस विश्वजित् नामक यज्ञ का आरम्भ किया जिसमें सम्पूर्ण धन ही दक्षिणा के रूप में दे दिया जाता है। ठीक है, जिस प्रकार मेघ समुद्र से जलग्रहण कर वृष्टि के द्वारा जनता का हित करते हैं वैसे ही सज्जनों का द्रव्यसंचय भी परोपकार के लिए होता है। रघु ने यज्ञ सम्पन्न करने के बाद मन्त्रियों की अनुमति से सत्कार करके उन राजाओं को अपने-अपने स्थानों को लौटने के लिए विदा कर दिया, जिनकी रानियां अधिक दिन हो जाने से उत्कण्ठित थीं। अपने-अपने नगरों को जाने की अनुमति प्राप्त कर राजा लोग प्रस्थानकालिक नमस्कारों के द्वारा रघु के चरणकमलों को अपने मस्तकों से स्पर्श करने लगे, जिससे उनके मुकुटों की मालाओं से गिरने वाले पुष्परस तथा पराग से रघु के पैर की अंगुलियां लाल हो उठीं।

पञ्चम सर्ग

जब राजा ने विश्वजित् नामक यज्ञ में दक्षिणा के रूप में अपना सर्वस्व दे डाला तब वरतन्तु महर्षि के शिष्य कौत्समुनि सम्पूर्ण विद्याओं को पढ़कर गुरुदक्षिणा देने के लिए धनप्राप्ति की इच्छा से रघु के पास आये। अतिथिसेवा में निपुण राजा रघु ने सोने के पात्रों के न रहने से मिट्टी के पात्र में पूजा-सामग्री लेकर उपस्थित हो शास्त्रोक्त विधि से कौत्स की पूजा की ओर हाथ जोड़कर पूछा—भगवन्, सूर्य के समान तेजस्वी आपके गुरुजी प्रसन्न तो हैं न?
२ २० भू०

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उनकी तपस्या निर्विघ्न तो चल रही है न ? पुत्र के समान पालित तपोवन के छायादार वृक्षों को वायु एवं वनाग्नि से कोई बाधा तो नहीं है ? जिनके जल से आप लोगों के स्नान, तर्पण, देवपूजन आदि नित्यकृत्य होते हैं—उन नदी आदि के जल में कोई उपद्रव तो नहीं है न ? गाँवों के गाय, भैंस आदि आप लोगों के नीवार आदि धान को तो नहीं खा जाते हैं न ? आपके केवल दर्शनमात्र से ही मेरी तृप्ति नहीं हो रही है, क्योंकि आपकी आज्ञा का पालन करने की मुझे उत्कट उत्कण्ठा हो रही है। क्या गुरुजी की आज्ञा से, या स्वयं ही मेरे ऊपर कृपा करने के निमित्त आप आश्रम से पधारे हैं ?

मिट्टी के पात्र में पूजा-सामग्री को देखकर ही अपने गनोरथ की पूर्ति में हताश होकर कौत्स राजा से बोले—राजन् ! हमारे आश्रम में सब कुशल है, आपके रहते भला दुःख कैसा ? सूर्य के रहते क्या अन्धकार हो सकता है ? पूज्य वर्ग में भक्ति तो आपके कुल की परम्परा ही है, पर मैं ही कुछ देर से आया हूँ, यही मुझे खेद है। राजन् ! जैसे नीवार की फली तोड़लेने पर केवल डण्ठल रह जाता है वैसे ही याचकों को सर्वस्व देकर आप शोभित हो रहे हैं दान में खजाने को खर्च कर आप देव एवं पितरों के द्वारा अमृत पान कर लेने के बाद क्षीण चन्द्रमा के समान शोभित हैं। राजन् ! आप चिन्ता न करें, मैं और किसी दूसरे से गुरुदक्षिणार्थ धन लेने का प्रयास करूँगा। यह कहकर जाने के लिए उद्यत कौत्स से राजा ने पूछा—ब्रह्मन् ! आप गुरुदक्षिणा में क्या और कितना देना चाहते हैं ? यह सुनकर मुनि ने सदाचारी एव विनयी राजा से कहा—मैंने जब विद्या समाप्त कर गुरुजी से गुरुदक्षिणा स्वीकार करने की प्रार्थना की तो उन्होंने मेरी दृढ़ गुरु-भक्ति को ही दक्षिणा से बड़ा समझकर कुछ माँगना अस्वीकार किया, बार-बार प्रार्थना करने से नाराज होकर वे बोले—१४ विद्याओं की दक्षिणा १४ करोड़ लाओ। पर, पूजा-सामग्री से आपकी दशा जानकर मैं आपको कष्ट नहीं देना चाहता। ऐसा सुन राजा ने उनसे कहा—भगवन् ! मेरी यज्ञशाला में दो-तीन दिन ठहरिए तब तक मैं आपकी इच्छा पूर्ण करने का प्रयास करता हूँ। आपके चले जाने से मेरा बहुत बड़ा अपयश होगा।

वसिष्ठजी के प्रभाव से रघु का रथ सर्वत्र जा सकता था, उन्होंने कुबेर को जीतकर धन लाने की इच्छा से रथ सजाकर प्रातःकाल यात्रा करने के निमित्त शयन किया। सबेरे खजाने के अधिकारियों ने खजाने में हुई स्वर्ण-वृष्टि की सूचना राजा को दी, राजा ने सब सोना कौत्स को देना चाहा, पर उन्होंने

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गुरुदक्षिणा से अधिक लेना अस्वीकार कर दिया। राजा सब धन देना चाहते थे और वे अधिक लेना नहीं चाहते थे, यह दृश्य देखकर अयोध्यावासी दोनों को धन्य धन्य कहने लगे।

कौत्स ने प्रसन्न होकर राजा से कहा—धर्मरक्षक राजा को यदि पृथ्वी धन्य-धान्य दे तो क्या आश्चर्य है, आप तो स्वर्ग से भी अभीष्ट धन ले लेते हैं यही आश्चर्य है। आपके यहाँ पुत्र के अतिरिक्त किसी वस्तु की कमी नहीं है। अतः आप योग्य पुत्र को प्राप्त करें, यही मैं आशीर्वाद देता हूँ। यह आशीर्वाद देकर कौत्स चले गये और राजा ने ऊँट, घोड़ों से गुरुदक्षिणा आश्रम पर भेज दी।

बाद में राजा रघु को पुत्रलाभ हुआ उन्होंने उसका नाम अज रखा। रघु के समान ही अज का भी रङ्ग-रूप, शरीर आदि सुन्दर और आकर्षक था। गुरुओं से विद्या प्राप्त करते हुए अज युवराज के योग्य हो गये। विदर्भ देश के राजा भोज ने अपनी बहन इन्दुमती के स्वयंवर में अज को बुलाने के लिए रघु के पास निमन्त्रण भेजा। राजा रघु ने अज को विवाह के योग्य और भोज के सम्बन्ध का औचित्य समझकर सेना सहित अज को विदर्भ भेज दिया। रास्ते में नर्मदा नदी के किनारे अज की सेना का पड़ाव पड़ा। नर्मदा से एक मत्त हाथी पानी उछालता हुआ निकला। सेना के हाथी उस जंगली हाथी के मद की उत्कट गन्ध को सूँघकर भागने लगे, घोड़े दौड़ने लगे, रथ टूटकर गिर गये एवं स्त्रियों की रक्षा के लिए सैनिक दौड़ पड़े, इस तरह उस हाथी ने सबको व्याकुल कर दिया।

तब अज ने बाण से गज के मस्तक पर मारा, बाण लगते ही वह हाथी से एक दिव्य पुरुष बन गया और अज के ऊपर नन्दन वन के पुष्पों की वर्षा करते हुए बोला—कुमार ! मैं गन्धर्वराज प्रियदर्शन का पुत्र प्रियंवद हूँ, मतङ्ग मुनि के शाप से हाथी हो गया था। महात्माओं का स्वभाव जल की तरह शीतल.होता है, प्रार्थना करने पर उन्होंने कहा—अज के बाण की चोट लगते ही मेरे शाप का अन्त हो जायेगा। आपने शाप से मुझे मुक्त कर दिया। यदि मैं आपका कोई उपकार न करूँ तो मेरी दैवी सम्पत्ति व्यर्थ है। मित्र ! मैं संमोहन नामक अस्त्र देता हूँ, इससे शत्रु मूर्च्छित हो जाते हैं और बिना हिंसा के विजय मिल जाती है। आप मेरी प्रार्थना स्वीकार करें। तदनुसार अज ने नर्मदा के जल से आचमन करके शुद्ध हो उस गन्धर्व से संमोहन अस्त्र सीख लिया। इस प्रकार मार्ग में दैवात् दिव्य अस्त्र पाकर अज विदर्भ को गये और

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गन्धर्व अपने लोक को चला गया। विदर्भ नगरी के निकट पहुँचने पर विदर्भराज ने अज की अगवानी कर आदर के साथ नगर में लाकर बड़ा सत्कार किया।

भोज के कर्मचारियों द्वारा निश्चित नये राजभवन में अज ठहराये गये। इन्दुमती के विषय में अनेक प्रकार की चिन्ता करते हुए अज को रात में नींद देर से आयी। रात्रि के अन्त प्रभातकाल में बन्दीगण मधुर वाणी से अज की स्तुति करने लगे—विद्वन् ! रात बीत गयी, चन्द्रमा की कान्ति मन्द हो चली, आपके चञ्चल नेत्र तथा खिलते हुए कमल की ठीक समानता हो सकेगी यदि दोनों साथ खिलें। अतः उठिए, प्रभातवायु आपके मुख की सुगन्धि पाने की इच्छा से बार-बार बहता फिरता है। कोमल लाल पत्तों पर पड़ी ओस की बूँदें आपके अधरोष्ठ से मिले मृदुहास्य की तरह मालूम पड़ती हैं। आपके हाथी सोकर उठे हैं, सूर्य की किरणों मे उनके दांत श्रृंग की तरह रङ्गीन मालूम पड़ते हैं। तम्बूओं में बँधे हुए आपके अरबी घोड़े जगकर सैन्धव लवण का स्वाद ले रहे हैं। देखिए, रात की पुष्पमालाएँ मुरझा गयी हैं। दीपक की कान्ति मलीन हो गयी और आपका सुग्गा भी हमारी तरह बोलता हुआ आपको जगा रहा है। अतः आप भी उठ जाइए।

इस प्रकार मधुभाषी वन्दियों के द्वारा स्तुतिपूर्वक जगाये गये कुमार अज पलंग से वैसे ही उठ बैठे जैसे मधुर शब्द करनेवाले हंसों के निनाद से जगा ईशानकोण का दिग्गज सुप्रतीक गंगा के रेतीले तट से उठ जाता है। शय्या छोड़ने के बाद अज ने प्रातःकालीन नित्य-कृत्य, सन्ध्यावन्दनादि समाप्त कर प्रसाधनकुशल परिचारक के द्वारा विरचित स्वयंवर के योग्य वेश-भूषा से सज-धज कर स्वयम्बर में विराजमान राजाओं के समाज में सम्मिलित हुए।

षष्ठ सर्ग

षष्ठ सर्ग में इन्दुमती के स्वयंवर का आकर्षक वर्णन है। राजा रघु के पुत्र युवराज अज ने स्वयंवर स्थान में उपस्थित होकर मंचों पर सजाये हुए सिंहासनों पर आसीन सुन्दर वेशवाले उन राजाओं को देखा, जो विमानों पर बैठे हुए देवताओं के समान सुशोभित हो रहे थे। अज राजा भोज द्वारा बताये गये योग्य मंच पर सुन्दर बनी सीढ़ियों के मार्ग से उस प्रकार चढ़ गये जैसे शेर का बच्चा पर्वत की चट्टानों पर पैर रखता हुआ ऊँचे शिखर पर चढ़ जाता है। वे

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राजा कामदेव के समान सुन्दर अज को देखकर इन्दुमती के प्रति निराश हो गये। सुन्दर रंग-बिरंगे वस्त्रों से आच्छन्न रत्नजटित सिंहासन पर बैठे हुए अज अनेक रंगवाली मोर की पीठ पर बैठे हुए कार्तिकेय जैसे लग रहे थे।

जिस प्रकार प्रफुल्लित वृक्षों को छोड़कर भंवरें मद बहाने वाले जंगली हाथी के ऊपर झुक जाते हैं उसी प्रकार नागरिक दर्शकों की दृष्टि सब राजाओं को छोड़कर अज पर ही आ डटी। अनन्तर राजाओं के वंशों के जानकार बन्दीजन चन्द्रवंशी एवं सूर्यवंशी राजाओं का गुण-गान करने लगे, सुगन्धी धूपबत्ती का धुंआँ आकाश में फैल गया तथा माङ्गलिक बाजे बजने लगे। इसी समय भोजराज की छोटी बहन इन्दुमती पालकी में बैठकर अपनी सखी सुनन्दा के साथ मञ्चों के बीच बने राजमार्ग से स्वयंवर स्थल पर आ पहुँची। विधाता की अद्वितीय सृष्टि सर्वाङ्गसुन्दरी उस इन्दुमती को देखकर सभी राजा अपने मन के भावों को विविध प्रकार की चेष्टाओं से व्यक्त करने लगे। सात पद्यों में कवि ने विभिन्न राजाओं की श्रृङ्गार चेष्टाओं का चमत्कारपूर्ण वर्णन किया है, जिनका अभिप्राय राजाओं ने अपने मन के अनुकूल समझा तथा इन्दुमती ने इसके विपरीत सबको कुलक्षणी समझा। स्वयम्बर में विराजमान राजाओं का नैसर्गिक वर्णन अतिरोचक ढंग से उपस्थित किया गया है। सबसे पहले मगध देश के राजा का वर्णन है।

राजाओं के चरित्र एवं वंशावली को जानने वाली पुरुषों के समान धृष्ट रनिवास की द्वारपालिका सुनन्दा, इन्दुमती को मगधनरेश परन्तप के समक्ष उपस्थित कर कहने लगी राजकुमारी! इस भूमण्डल में अनेक राजाओं के रहते हुए भी पृथ्वी इन्हीं से राजन्वती है। इन्होंने निरन्तर अपने यज्ञानुष्ठान में इन्द्र को बुलाकर इन्द्राणी को चिरवियोगिनी बना दिया है। यदि इन्हें वरण कर लोगी, तो अपने-अपने महलों में बैठी पुष्पपुर की महिलाओं को आनन्दित करोगी। परन्तप इन्दुमती को नहीं जचे। उसने सुनन्दा को आगे बढ़ने का इशारा किया। बाद सुनन्दा ने अङ्ग देश के राजा को दिखाकर कहा—ये भूलोक में भी स्वर्गीय सुख भोगते हैं। इनके पास एक साथ लक्ष्मी एवं सरस्वती दोनों रहती हैं। अतः कान्तिमती एवं मधुरभाषिणी तुम तीसरी हो जाओ, किन्तु इन्दुमती की रुचि न होने से सुनन्दा उसे उज्जयिनी के राजा के पास ले जाकर कहने लगी—ये महाप्रतापी राजा महाकाल के समीप रहते हैं। अतः कृष्ण पक्ष में भी ये चांदनी रातों का उपभोग करते हैं। यदि तुम सिपरा नदी की

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वायु से कपाई गयी बाग-बगीचों की परम्पराओं में विहार करना चाहती हो तो इनका वरण कर लो । फिर भी वे इन्दुमती को न जँचे ।

बाद सुनन्दा अनूप देश के राजा के पास ले जाकर कहने लगी—ये सहस्रार्जुन के वंश में उत्पन्न हुए हैं और बड़े गुणी हैं। इस राजा की माहिष्मती राजधानी की करधनी बनी नर्मदा नदी को महल में बैठकर देखने की यदि तुम्हारी इच्छा हो तो, इनकी अङ्क लक्ष्मी बन जाओ। अत्यन्त मनोरम होते हुए भी ये इन्दुमती को न जचे । तब सुनन्दा मथुरा के राजा सुषेण के पास ले जाकर इन्दुमती से उनका परिचय देने लगी—ये नीप वंश में उत्पन्न हुए हैं और इनकी कीर्ति दूसरे देशों में भी पायी जाती है। इनकी रनिवास की स्त्रियों के स्तनों के चन्दन से स्नान करते समय यमुना गङ्गा की तरङ्गों से मिली हुई सी जान पड़ती हैं। अतः कुबेर के बगीचे के समान वृन्दावन में विहार करने की इच्छा हो तो, इनसे विवाह कर वर्षा ऋतु में गोवर्द्धन की कन्दराओं में शिलाजीत से सुगन्धित चट्टानों पर बैठकर मोरों का नाच देखो । इनको छोड़कर इन्दुमती आगे बढ़ती है और सुनन्दा कलिङ्ग देश के राजा हेमाङ्गद के वर्णन के बाद नागपुर के राजा के वर्णन में कहने लगी कि ये पाण्डु प्रान्त के राजा देवताओं के तुल्य हैं। महर्षि अगस्त्य भी इनके अश्वमेध यज्ञ के अन्त में अवभृथस्नान की निर्विघ्न सम्पन्नता पूछते हैं। इनके बल से डरकर रावण भी इनसे मित्रता रखता है ! ये नील कमल के समान श्यामल हैं, तुम गोरोचना के समान गोरी हो । अतः मेघ एवं बिजली के समान तुम्हारा सम्बन्ध हो जाय । ये भी इन्दुमती को न जचे । जिस प्रकार रात में बत्ती जिन-जिन मकान को छोड़कर आगे बढ़ती जाती है वे वे मकान प्रकाश के अभाव में अन्धकार से विवर्ण हो जाते हैं, उसी प्रकार इन्दुमती जिन-जिन राजाओं को छोड़कर आगे बढ़ती गयी, वे-वे राजा भी उदास होते गये ।

इसके बाद इन्दुमती जब अज के पास पहुँची, तो उनका दक्षिण बाहु फड़कने लगा, उससे उनको विश्वास हो गया कि यह मेरा ही वरण करेगी। इधर इन्दुमती सर्वाङ्गसुन्दर एवं दोषरहित अज को प्राप्त कर आगे जाने से उसी प्रकार रुक गयी जैसे वसन्त ऋतु में बौर आये हुए आम के वृक्ष को छोड़कर भ्रमरपंक्ति दूसरे वृक्षों पर नहीं जातीं। सुनन्दा अज का वर्णन करती हुई कहने लगी—ये इक्ष्वाकुवंश में उत्पन्न महाराज दिलीप के पुत्र उस राजा रघु के सुपुत्र हैं जिन्होंने चारों दिशाओं से सम्पत्ति बटोरकर विश्वजित नामक यज्ञ में सर्वस्व समर्पण कर

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दिया था, केवल उनके पास मिट्टी का बर्तन मात्र शेष रह गया था। ये कुमार राजा रघु के वैसे ही पुत्र हैं जैसे इन्द्र का जयन्त। अतः कुल से, कान्ति से, नयी अवस्था से, विनय आदि गुणों से सम्पन्न तुम्हारे अनुरूप हैं। अतः तुम इनका वरण कर लो, जैसे रत्न की शोभा सुवर्ण के साथ अधिक होती है वैसे ही तुम्हारा और अज का मेल अत्यन्त अनुरूप होगा। तब राजकुमारी इन्दुमती ने बड़ी प्रसन्नता से अज को स्वीकार कर लिया लज्जा के कारण वाणी से तो कुछ न कह सकी, किन्तु रोमाञ्च के बहाने सात्त्विक भाव के उदय हो जाने से उसका अनुराग प्रकट हो गया। इन्दुमती के अजविषयक अनुराग को देखकर सखी सुनन्दा ने परिहासपूर्वक कहा—आये ! दूसरे राजा के पास चलो, यह सुन इन्दुमती ने सुनन्दा को रोषपूर्वक तिरछी नजर से देखा, क्योंकि अब अन्यत्र जाना इन्दुमती को इष्ट नहीं था।

अनन्तर राजकुमारी इन्दुमती ने सुनन्दा के हाथों से कुंकुम के चूर्ण से लाल धागा वाली स्वयंवर माला को रघु पुत्र अज के गले में पहनवा दिया। एक समान शील, स्वभाव एव सौन्दर्य गुणवाले अज और इन्दुमती के सम्बन्ध से प्रसन्न हुए नगर निवासी कहने लगे कि यह इन्दुमती आज अज से वैसे ही मिल गयी जैसे निर्मल चन्द्र से चाँदनी तथा सागर से गङ्गा मिलती हैं। उस स्वयंवर मण्डप में एक तरफ प्रसन्न हुए वर पक्ष वाले थे और दूसरी ओर इन्दुमती को न प्राप्त कर सकने वाले राजाओं का झुण्ड था। उस समय वह मण्डप उस सरोवर के समान लग रहा था, जिसमें प्रातःकाल एक तरफ खिले हुए कमल हो, तो दूसरी ओर बिना खिले कुमुदों का समूह हो।

सप्तम सर्ग

स्वयंवर मण्डप में इन्दुमती द्वारा अज को माला पहनाकर वरण कर लेने के बाद भोजराज ने समान योग्य वर अज के साथ अपनी बहन इन्दुमती को लेकर अपने नगर की ओर चले और मुरझाये चेहरे वाले दूसरे राजा लोग इन्दुमती के प्रति निराश होकर अपने रूप एवं वेशभूषा की निन्दा करते हुए अपने-अपने शिविर की ओर चल दिये।

पुष्प, माला, ध्वजा, पताका आदि से अच्छी तरह सजाये गये राजमार्ग से जाते हुए वर-वधू को देखने वाली स्त्रियों की अनेकविध चेष्टाएँ हुईं—कोई स्त्री अपने केशपाश में माला बांधना भूलकर जूड़े को अपने हाथ में थामे ही

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खिड़की पर आ पहुँचीं। दूसरी सुन्दरी जो दासी से अपने पैरों में महावर लगवा रही थी; शीघ्रता में उसे छुड़ाकर वह झरोखे तक गीली महावर से पैर का निशान बनाती गयी, तीसरी एक आंख में काजल लगाकर दूसरे में बिना लगाये ही हाथ में सलाई लिये दौड़ पड़ी, चौथी साड़ी की नीवी बिना बांधे ही हाथ से पकड़कर खिड़की में दृष्टि लगाकर खड़ी रही, पांचवी बैठकर मोतियों की करधनी गूँथ रही थी। जिसका एक किनारा अपने पैर के अंगूठे में बांध रखा था, अभी आधी ही गूँथ पायी थी कि अज को देखने की जल्दी में उसे छोड़कर ऐसी दौड़ी कि खिड़की तक एक-एक दाने बिखर गये, उसके अँगूठे में केवल धागा ही धागा लिपटा रह गया।

उन नागरिक स्त्रियों के मुखों से परिपूर्ण झरोखे ऐसे प्रतीत होते थे, मानों चञ्चल नेत्र रूपी भौरों से व्याप्त कमलों से भरे हैं। अज को भली-भांति देखकर वे प्रसन्नता व्यक्त करती हुई कहने लगीं कि स्वयंवर करना अच्छा हुआ, नहीं तो इन्दुमती समान योग्य पति को कैसे पाती ! यदि ब्रह्मा इन दोनों की जोड़ी नहीं लगाता तो, इन दोनों का सौन्दर्य विधान ही व्यर्थ हो जाता। ये दोनों पूर्व जन्म में रति एवं कामदेव होंगे, नहीं तो इन्दुमती ने हजारों राजाओं में इन्हीं अज को क्यों वर लिया ? इस प्रकार नगर की नारियों का वर्णन सुनते हुए अज भोज के घर पहुँच कर कामरूप के राजा का बाहु पकड़कर हथिनी से उतरकर अन्दर चोक में चले गये।

वहाँ राजा भोज ने वैदिक विधि-विधान से मधुपर्क-वस्त्र आदि देकर विवाह कृत्य आरम्भ किया, पुरोहित ने हवन के बाद अग्नि को साक्षी बनाकर वर-वधू को मिला दिया। यहाँ वैवाहिक कार्यों को अत्यन्त स्वाभाविक एवं सामाजिक नियमोपनिगमों का मनोरम वर्णन है। इस प्रकार विवाह के बाद भोज ने दूसरे राजाओं को यथावत् सत्कार कर विदा किया।

ये ईर्ष्यालु राजा लोग इन्दुमती को अज से बलात् छीन लेने की इच्छा से आगे बढ़कर मार्ग में बैठ गये। इधर भोज ने अपनी श्रद्धा एवं सामर्थ्य के अनुसार दहेज देकर बहन को विदा किया। तीन रात तक इनके साथ में रहकर भोज पुनः अपनी राजधानी को लौट गये। बाद मार्ग रोकनेवाले राजा लोग इन्दुमती को ले जाते हुए अज को रोककर युद्ध के लिए तैयार हो गये। अज ने इन्दुमती की रक्षा के निमित्त विश्वासी मंत्री को नियत कर युद्ध करने के लिए रणाङ्गण में उतर गये। दोनों पक्षों के सैनिकों के साथ घमासान युद्ध होने लगा।

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अन्त में अज ने प्रियम्वद नामक गन्धर्व से प्राप्त गन्धर्वदेवतात्मक निद्राकारक अस्त्र का प्रक्षेप किया, जिसके प्रभाव से सबके सब राजा एवं सैनिक ज्यों के त्यों चेष्ट-शून्य होकर सो गये। अज ने विजय-शंख बजाया, शंखध्वनि सुनकर अज के सैनिक उनके पास लौट आये। इस प्रकार विजय लक्ष्मी प्राप्त कर अज घबड़ाई हुई इन्दुमती के पास आकर बोले—प्रिये ! देखो, इन राजाओं को, वे इसी बल पर मुझसे युद्ध कर तुमको छीनना चाहते थे। इस समय ये ऐसे निश्चेष्ट हो गये हैं कि छोटे-छोटे बच्चे भी इनके अस्त्र छीन सकते हैं।

पति की वीरता एवं विजय से इन्दुमती को बड़ी प्रसन्नता हुई किन्तु लज्जावश स्वयं कुछ न कहकर अपनी दासी के द्वारा उनका अभिनन्दन किया। इस प्रकार उन पूर्व विरोधी राजाओं को परास्त कर मूर्तिमती विजय लक्ष्मी के समान इन्दुमती को लेकर अज अपनी राजधानी अयोध्या लौट आये। राजा रघु ने यह सारा वृत्तान्त पहले ही सुन लिया था। अतः विजयी और प्रशंसनीय भार्या के साथ लौटे हुए अपने पुत्र अज का स्वागत करने के बाद कुटुम्बपालन करने का कार्य एवं राज्य भार सौंप दिया और स्वयं शान्ति मार्ग का आश्रय लिया। ठीक ही है, सूर्यवंशी राजे, कुल का भार सँभालने योग्य पुत्र के हो जाने पर गृहस्थाश्रम में नहीं रहते, किन्तु चतुर्थाश्रमी हो जाते हैं।

अष्टम सर्ग

अभी अज ने विवाह का मंगल सूत्र उतारा भी नहीं था कि राजा रघु ने अपने हाथों सारी पृथ्वी उन्हें समर्पित कर दी और अज ने भी उस राज को अपने पिता की आज्ञा मानकर स्वीकार कर लिया। जिस समय अज का राज्याभिषेक हुआ उस समय गुरु वसिष्ठजी ने उनके ऊपर पवित्र जल छिड़का जिससे सभी को भी बड़ा सन्तोष हुआ। राज्याभिषेक के बाद अज इतने तेजस्वी हो उठे कि उनके सभी शत्रु काँप उठे क्योंकि ब्रह्मतेज के साथ क्षात्र तेज मिल जाता है तब राजा इतना बलशाली हो जाता है कि जैसे वायु का सहारा पाकर अग्नि भभक उठता है। प्रजा ने रघु को राजा पाकर यही समझा मानो रघु ही पुनः युवा हो गये क्योंकि उन्होंने केवल अपने पिता का राज्यमात्र नहीं पाया, किन्तु रघु के सभी गुण उसमें आ गये।

अज ने नई पायी पृथ्वी का पालन बड़ी दयालुता के साथ करना आरम्भ कर

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दिया। वे अपनी प्रजा को बड़ा प्यार करते थे। वे न तो कठोर थे न अत्यन्त कोमल ही। उन्होंने अपने शत्रुओं को वायु के झोकों के समान प्रभाव दिखाकर दबा दिया। जब रघु ने देखा कि मेरे पुत्र अज का प्रजा में बड़ा आदर है तो उन्होंने स्वर्ग के सुख की चाह कर अपने गुणवान् पुत्र अज को राज्य का भार सौंप कर राज्य के बाहर कुटिया बनाकर सस्त्रीक रहने लगे। उस समय सूर्यवंश उस आकाश के समान लग रहा था जिसमें एक ओर चन्द्रमा छिप रहे हों और दूसरी ओर सूर्य का उदय हो रहा हो। इधर राजा अज प्रजाजनों की देखभाल करने के लिए राज्यासन पर विराजमान थे तो दूसरी ओर राजा रघु कुशासन पर बैठकर मनको साधने का अभ्यास कर रहे थे। अज ने तो अपने प्रभुत्व से राजाओं को वश में कर लिया और रघु ने ज्ञान की अग्नि से अपने शरीर को योगबल से परमात्मा में विलीन कर दिया। अपने पिता का देहत्याग सुनकर अज बहुत रोए; अन्त में रोगियों के समान उनको समाधि देकर बड़ी भक्ति से पिता का बड़े धूमधाम से और्ध्वदेहिक संस्कार कर दिया। ज्ञानी विद्वानों के समझाने-बुझाने से अब धीरज बाँध कर धर्मपूर्वक प्रजा पालन करने लगे।

कुछ दिनों के बाद इन्दुमती ने एक वीर पुत्र को जन्म दिया। ये अज के पुत्र सूर्य के समान तेजस्वी थे, जिनका यश दसों दिशाओं में फैल गया जिसे पण्डित लोग दशरथ कहते थे। वेदों का अध्ययन कर ऋषि ऋण से, यज्ञ करके देव ऋण से और पुत्र उत्पन्न कर पितृ ऋण से मुक्त होकर अज सूर्य के समान शोभा पा रहे थे। एक दिन अज अपनी रानी इन्दुमती के साथ नन्दन वन में बिहार कर रहे थे। उसी समय शंकर जी को वीणा के साथ गान सुनाने के लिए देवर्षि नारद आकाश मार्ग से चले जा रहे थे जिनकी वीणा के सिर पर स्वर्गीय फूलों से गुथी हुई माला लटकी हुई थी। वायु के वेग से वह माला खिसककर अचानक इन्दुमती के स्तनों के बीच आकर गिर पड़ी। इन्दुमती ने देखते ही व्याकुल होकर आँखें मूद लीं और प्राणविहीन होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी। प्राण निकलने पर इन्दुमती का शरीर पीला पड़ गया। उनका धीरज छूट गया गला भर गया और उसे वीणा के समान गोद में लेकर राजा विलाप करने लगे, राजा कहने लगे जब फूल भी शरीर छूकर प्राण ले सकता है तब तो दैव किसी वस्तु से भी किसी को मार सकता है। यदि माला में प्राण हरने की शक्ति है तो मैं भी इसे छाती पर रख लेता हूँ।

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ईश्वर की इच्छा से कहीं विष भी अमृत हो जाता है और कहीं अमृत भी विष हो जाता है । प्रिये ! मैंने बहुत अपराध किये पर तुमने कभी मेरा तिरस्कार नहीं किया । मैंने मन से भी तुम्हारी बुराई नहीं की फिर तुम क्यों छोड़ जा रही हो । देखो चन्द्रमा को रात्रि पुनः मिल जाती है, चकवे को चकवी प्रातः मिल जाती है पर तुम तो सदा के लिए चल बसी ! अब मैं क्या करूँ ? तुम्हारे चरणों की कृपा का स्मरण कर यह अशोक वृक्ष फूलों की आँसू बरसाकर तुम्हारे लिए रो रहा है । तुम्हारे सुख-दुःख की साथी सखियाँ रो रही हैं, चन्द्रमा के समान प्रसन्न मुख वाला तुम्हारा पुत्र विलख रहा है और तुम्हारा अनन्य प्रेमी मैं अत्यन्त दुःखी हूँ । आज मेरा धीरज छूट गया है । आनन्द जाता रहा, तुम्हीं बताओ मुझसे तुम्हें छीनकर निर्दयी विधाताने मेरा क्या नहीं छीन लिया ।

जब कोशलनरेश अपनी प्रिया के लिए इस प्रकार शोक कर रहे थे उस समय उन्हें देखकर वृक्ष भी मानों अपना शाखाओं से रस बहाकर आँसू बहाने लगे । कुटुम्बियों ने अज के गोद से इन्दुमती को हटाया और पुष्प माला से सजाकर ज्योंही चन्दन की लकड़ियों से उसका दाह संस्कार किया त्योंही अज पत्नी के वियोग में व्याकुल हो उठे । शास्त्रविधिके अनुसार दश दिन कृत्य सम्पन्न कर जब वे नगर में घुसे तब उन्हें देखकर नगर भर के लोग फूट-फूट कर रोने लगे ।

उन दिनों महर्षि वशिष्ठ अपने आश्रम पर ही एक यज्ञ में संलग्न थे, योग बल से राजाके शोक का कारण जानकर एक शिष्यसे सन्देश भेजा । एक बार तृणविन्दु नामक ऋषि तप कर रहे थे । उनकी तपस्या से डरकर इन्द्र ने उनका तप भंग करने के लिए हिरणी नामकी अप्सरा भेजी । जैसे गंगा की लहर तट को गिरा देती है वैसे ही ऋषि को तप से डिगाने के लिए वह अप्सरा वहाँ आ पहुँची । उसे देखते ही मुनि ने क्रुद्ध होकर शाप दिया कि जा तू संसार में मनुष्य की स्त्री हो जा । वह शाप सुनते ही घबड़ाकर मुनि से हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाती हुई बोली—भगवन् ! मैंने दूसरों के कहने से यह काम किया है । इसमें मेरा दोष नहीं हैं, मुझे क्षमा कीजिए । यह सुन ऋषि ने कहा जब तक तुम्हें स्वर्गीय पुष्प नहीं दिखाई पड़ेगा तब तक तुम्हें भूतल पर रहना पड़ेगा । वही अप्सरा विदर्भ वंश में जन्म लेकर तुम्हारी रानी बनी थी अब स्वर्गीय पुष्प देखकर वह शाप से मुक्त होकर स्वर्ग चली गई । अतः आप उसकी मृत्यु का शोक न करें। अब शोक छोड़कर पृथ्वी का पालन कीजिए ।

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राजाओं की सच्ची पत्नी तो पृथ्वी ही है । तुम्हारे मरने पर भी वह अब न मिलेगी, क्योंकि मरने पर प्राणी अपने अपने कर्म के अनुसार अलग-अलग मार्ग से जाते हैं । शास्त्र कहते हैं कि जब कुटुम्बी अधिक रोते हैं तब प्रेतात्मा को बड़ा कष्ट होता है । जब शरीर और आत्मा का बिछोह हो जाता है तब पुत्र स्त्री आदि की क्या बात है । आप जितेन्द्रियों में श्रेष्ठ हैं अतः शोक मत कीजिए । इस प्रकार राजा ने आठ वर्ष किसी तरह बिताकर अपने सुशिक्षित कुमार दशरथ को शास्त्र के अनुसार प्रजापालन का उपदेश देकर भगवद्भजन करते हुए गंगा-सरयू संगम पर अपना शरीर त्यागकर स्वर्ग के नन्दन वन में चले गये । ( रघुवंश के आठवें सर्ग का इन्दुमती के मरने पर राजा अज का विलाप तथा कुमार संभव के चतुर्थ सर्ग में शङ्कर जी के क्रोधाग्नि से भस्म हुए कामदेव को देखकर रति का विलाप संस्कृत काव्यों में करुण रस का हृदयविदारक दृश्य है । )

नवम सर्ग

संयम से अपनी इन्द्रियों को जीत लेनेवाले योगियों में तथा प्रजापालक राजाओं में सर्वश्रेष्ठ राजा दशरथ ने अपने पिता के पश्चात् उत्तर कोशल का राज्य बड़ी योग्यता से संभाला । वे कार्तिकेय के समान बलवान् और समुद्र के समान गम्भीर थे । विद्वानों का कहना है कि इस विश्व में दो ही व्यक्ति ऐसे थे जिन्होंने कर्तव्यपालन करने वाले लोगों को समुचित फल दिया—एक मनुवंशी राजा दशरथ और दूसरा देवराज इन्द्र । दशरथ देवताओं के समान तेजस्वी और सागर के समान शान्त एवं धैर्यवान् थे । वे सबको समान समझते थे और सबसे एक-सा व्यवहार करते थे । वे कुबेर के समान प्रजाओं में धन बरसाते थे । हँसी में भी उन्होंने झूठ नहीं बोला । वे धनुष लेकर और अकेले रथ पर बैठकर समुद्र तक फैली हुई पृथ्वी का शासन करते थे । बादल के समान गरजता हुआ समुद्र उनका जय-जयकार करता था ।

जैसे इन्द्र ने अपने वज्र से पर्वतों के पंख काट दिये थे वैसे ही दशरथ ने अपने बाणों से शत्रुओं का सफाया कर दिया था । उनकी अयोध्या नगरी कुबेर की अलका से कम न थी । चक्रवर्ती राजा होने पर भी उनमें आलस्य नहीं था । जैसे पर्वतों से निकलनेवाली नदियां समुद्र को पा लेती हैं वैसे ही कोशल;

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मगध तथा कैकय देश की राजाओं की कौशल्या, सुमित्रा तथा कैकेयी नामक कन्याओं ने राजा दशरथ को पति के रूप में प्राप्त किया । दशरथ अपनी तीनों रानियों के साथ ऐसा जान पड़ते थे मानों पृथ्वी पर राज्य करने के निमित्त स्वयं इन्द्र ही प्रभाव, उत्साह एवं मन्त्र नामकी अपनी तीन शक्तियों के साथ अवतार लेकर चले आये हैं ।

दशरथ ने युद्ध में इन्द्र की सहायता करके अपने बाणों से उनके शत्रुओं का नाश करके देवताओं की स्त्रियों का डर दूर कर दिया था । उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञ किये थे । अकेले रथ पर चढ़कर युद्ध करने वाले इन्द्र से भी आगे चलने वाले दशरथने सूर्य पर छाई हुई युद्ध की धूल राक्षसों के खून से सींच-सींचकर दबा दी थी । राजा दशरथ की चतुर नीति से उनके पास बहुत सा धन इकट्ठा हो गया था जिससे वे अपनी प्रजाओं का उपकार करते थे । विष्णु के समान पराक्रमी, वसन्त के समान प्रसन्न और कामदेव के समान सुन्दर राजा दशरथ ने भी सुन्दरी स्त्रियों के साथ उस प्रफुल्लित वसन्त ऋतु का आनन्द लिया और फिर भी उनके मन में आखेट खेलने की इच्छा होने लगी । मन्त्रियों से सलाह कर वे आखेट के लिए निकल पड़े । जंगल में हरिण, सूकर, भैंसे, बारहसिंहे, सिंह, हाथियां, चामर मृग आदि का शिकार खेलते हुए एक दिन रुरु मृग का पीछा करते हुए अपने साथियों से दूर भटक गये घोड़े पर चढ़े हुए तमसा नदी के तट पर निकल गये जहां तपस्वियों के आश्रम बने हुए थे । वहां जल में कोई घड़ा भर रहा था । राजा ने समझा कि यह कोई हाथी है । उन्होंने उसका लक्ष्य कर झट शब्दवेधी बाण चला दिया । सहसा कोई चिल्ला उठा हाय पिता ? यह सुनकर राजा का माथा ठनका । पास जाकर देखा कि बाणों से विधा घड़े पर झुका हुआ कोई मुनिकुमार है । जब राजा ने उसके वंश का परिचय पूछा तो उसने बताया कि मेरे पिता वैश्य हैं और माता शूद्रा है । मुझे मेरे अन्धे माता-पिता के पास पहुँचा दो । तब राजा ने उसे उनके पास पहुँचा कर बताया कि भूल से मैंने आपके पुत्र पर बाण चला दिया है । यह सुनते ही वे रोने लगे और उन्होंने कहा पुत्र की छाती से बाण निकाल दो । बाण निकालते ही उसके प्राणपखेरू निकल गये । इस पर उसने शाप दिया कि जाओ तुम भी हमारे समान बुढ़ापे में पुत्र शोक से प्राण छोड़ोगे । राजा ने कहा कि मैं आपके शाप को वरदान समझता हूँ क्योंकि इसी बहाने मुझे पुत्र का मुख तो देखने का सौभाग्य प्राप्त होगा । यह कहकर राजा ने पुनः कहा—मैं तो आपके बध के

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योग्य हूँ मेरे लिए क्या आज्ञा है ? यह सुनकर मुनि ने कहा—हम और हमारी स्त्री अब अपने पुत्र के साथ ही मर जायेंगे । अतः आप हमारे लिए ईंधन और आग जुटा दो । राजा ने तत्काल इंधन और आग जुटा दी । वे चिता में साथ मर कर स्वर्ग सिधार गये और राजा अपने पाप से अधीर होकर मुनि का शाप लेकर अपने घर लौटे ।

दशम सर्ग

इन्द्र के समान तेजस्वी राजा दशरथ को पृथ्वी पर राज्य करते-करते लग-भग दश हजार वर्ष बीत गये । उन्हें कोई सन्तान नहीं हुई । तब ऋष्यशृंग की प्रधानता में ऋषियों ने सन्तान के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ कराना प्रारम्भ किया । उसी समय रावण के अत्याचार से घबड़ाकर देवता लोग ज्यों ही क्षीरसागर में विष्णु की शरण में गये त्यों ही भगवान् विष्णु योग निद्रा से उठ गये । शेष-शायी विष्णु के चरण कमल को लक्ष्मी जी गोद में लेकर पलोट रही हैं, सुनहले वस्त्र पहने हुए विष्णु के वक्षःस्थल पर कौस्तुभ मणि चमक रहा था भृगुलता-श्रीवत्स का चिह्न सुशोभित था । गरुड़ जी बड़ी नम्रता से हाथ जोड़े खड़े थे । देवताओं ने भगवान् विष्णु को प्रणाम कर उनकी स्तुति करने लगे और कहे कि जैसे समुद्र के रत्न, सूर्य की किरणें नहीं गिनी जा सकतीं और पृथ्वी के कण नहीं गिने जा सकते वैसे ही स्तुति करके आपका चरित वर्णन नहीं किया जा सकता है । प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु ने उनसे कुशल प्रश्न पूछा, जिसके उत्तर में देवताओं ने कहा—आज कल ऐसे राक्षस उत्पन्न हो गये हैं जिन्होंने संसार की मर्यादा भंग कर सर्वत्र हाहाकार मचा दिया है । यह सुनकर वे बोले देवताओं ! जैसे संसार के जीवों को सत्त्व, रज तथा तम दबा देता है वैसे ही आपके तेज और बल को रावण दबा बैठा है इसलिए रावण को मिटा देना मेरा और इन्द्र का काम है, आग की सहायता के लिए वायु से कहना नहीं पड़ता है, वह तो स्वयं आग को उभाड़ देता है । शिवजी को प्रसन्न करने के लिए रावण ने अपने नव शिर काटकर चढ़ा दिया है । मालूम पड़ता है कि दशवाँ शिर मेरे चक्र से कटने के लिए रख छोड़ा है । ब्रह्माजी ने जो वरदान दे दिया है उसी से मैं उसका चढ़ाना उसी प्रकार सहता हूँ जैसे अपने ऊपर चढ़ते हुए सांप को चन्दन वृक्ष सह लेता है । जब ब्रह्माजी उसकी तपस्या से प्रसन्न हुए तब उसने यही वर

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मांगा कि मैं देवताओं के हाथ से न मारा जा सकूँ' । अतः मैं राजा दशरथ के यहाँ जन्म लेकर अपने बाणों से उसके शिरों को काटकर पृथ्वी को भेंट कर दूँगा। अब आप लोग निडर होकर अपने-अपने विमानों पर चढ़कर आकाश घूमिए तथा रावण के पुष्पक विमान का डर छोड़ दीजिए। जैसे सूखे खेत पर पानी बरसाकर बादल निकल जाय वैसे ही मधुर वचन से देवताओं को तृप्त कर वे अन्तर्धान हो गये।

इधर ज्यों ही राजा दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ समाप्त हुआ त्यों ही यज्ञाग्नि से एक पुरुष प्रगट हुआ, जिसके हाथ में खीर भरा हुआ सोने का कटोरा था। जैसे इन्द्र ने समुद्र से निकले हुए अमृत कलश को अपने हाथ में ले लिया वैसे ही राजा दशरथ ने भी उस दिव्य पुरुष के हाथ से वह खीर ले ली। खीर के रूप में विष्णु से पाये हुए क्षीर को राजा दशरथ ने कौशल्या और कैकेयी में बराबर बाँट दिया। पुनः उन दोनों ने अपनी-अपनी खीर का आधा-आधा भाग अपनी प्रिय सपत्नी सुमित्रा को दे दिया। परिणामस्वरूप तीनों रानियों ने लोक कल्याण के लिए विष्णु के अंश से भरे गर्भ को धारण किया। यद्यपि विष्णु का एक ही रूप है पर जैसे निर्मल जल में चन्द्रमा के अनेक प्रतिबिम्ब पड़ जाते हैं वैसे ही वे तीनों रानियों के गर्भो में अलग-अलग निवास कर रहे थे। कौशल्या जी के गर्भ से श्री राम, कैकेयी के गर्भ से भरत जी तथा सुमित्रा जी के गर्भ से लक्ष्मण और शत्रुघ्न दो जोड़वा पुत्र उत्पन्न हुए । अयोध्या में बड़ा हर्ष और उत्सव मनाया गया तथा लङ्का में रावण के मुकुटमणि पृथ्वी पर गिर पड़े, मानो राक्षसों की लक्ष्मी की आंसू ढुलक रही हो। जातकर्म आदि संस्कार हो जाने पर चारो राजकुमार बढ़ने लगे, चारो कुमार मानो धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष के रूप माने जाने लगे और गुरु वसिष्ठजी के घर ब्रह्मचर्य पूर्वक विद्याभ्यास करने लगे।

एकादश सर्ग

एक दिन विश्वामित्रजी राजा दशरथ के पास आये और उन्होंने कहा कि मेरे यज्ञ की रक्षा के लिए राम को मेरे साथ भेज दीजिए। यद्यपि दशरथ ने राम-लक्ष्मण को बड़ी तपस्या से वृद्धावस्था में पाया था पर ऋषि के प्रभाव से प्रभावित हो तत्काल उन्होंने राम-लक्ष्मण को उनके साथ भेज दिया। पिता की आज्ञा से दोनों राजकुमार धनुष लेकर विश्वामित्रजी के पीछे चल दिये। राजा