साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
त्रयोदशोऽध्यायः ६९
त्रयोदशोऽध्यायः ६९
विवस्वते ज्ञानभृदन्तरात्मने जगत्प्रतिष्ठाय जगद्धितैषिणे।
स्वयम्भुवे लोकसमस्तचक्षुषे सुरोत्तमायामिततेजसे नमः ॥६॥
जो ज्ञानियों की अन्तरात्मा, जगत् के प्रतिष्ठारूप, जगत् के हितकामी, स्वयम्भू, समस्त लोकों के चक्षुरूप, देवश्रेष्ठ, असीम तेजोरूप सूर्यदेव हैं, उनको नमस्कार है॥६॥
क्षणमुदयाचलमौलिमणिः सुरगणवन्द्योऽपि हितो जगतः।
त्वमुरुमयूखसहस्रवपुर्जगति विभाति तमोसि नुदन् ॥७॥
तव तिमिरासवपानमदाद् भवति विलोहितविग्रहता।
तिमिरविभासि यतः सुतरां त्रिभुवनभावनतीक्ष्णकरैः ॥८॥
क्षण काल के लिये उदय पर्वत शिखर के मणिरूप, सुरगण से पूजित होने पर भी जगत् का हित करने वाले हे सूर्य! आप सहस्रों किरणयुक्त शरीर से अन्धकार दूर करते हैं और जगत् प्रकाशित होता है। तिमिररूप मद्यपान से मत्ततावशात् आपकी देह रक्तवर्ण हो गयी है, अतएव हे तिमिर! आप अपनी त्रिभुवन-प्रकाशक तीव्र किरणों से अधिक रूप से प्रकाशित हो रहे हैं॥७-८॥
रथमधिरुह्य समावयवैः परिविधिकल्पितभूरुचिरम्।
सततमखिन्नहयैर्भगवंश्चरसि जगत् स्थितयेऽविरतम् ॥९॥
अमृतसुधादिरसेन समं सुरगणभूतगणेन समम्।
प्रणिपतितैकपदं त्रितयं शुकसमवर्णहयप्रथितम् ॥१०॥
तव पदपांसुपवित्रतमं ह्यभिरतवत्सल मां प्रणतम्।
त्रिभुवनपावनपाहि रवे विविधगदार्त्तियुतं सततम् ॥११॥
इति श्रीसाम्बपुराणे विश्वकर्मणः सूर्यस्तुतिर्नाम त्रयोदशोऽध्यायः
हे भगवन्! समान अवयवयुक्त अक्लान्त अश्वगण द्वारा पृथ्वी पर सुन्दर परिधि की रचना करते हुये रथ पर सवार होकर निरन्तर जगत् की स्थिति के लिये आप विचरण करते हैं। अमृत तथा सुधारस के तुल्य, सुरगण तथा भूतगण के समान, एक पद में प्रणिपतित त्रितयरूप, शुक के समान जिनके अश्व हैं, ऐसे आप प्रसिद्ध हैं। हे भक्तवत्सल! त्रिभुवनपावन रवि! आप अपनी चरणधूलि से पवित्रतम, प्रणत नानारोग से ग्रस्त मेरा सतत पालन करिये॥९-११॥
श्री साम्बपुराण में विश्वकर्मकृत सूर्यस्तुतिनामक त्रयोदश अध्याय समाप्त
चतुर्दशोऽध्यायः
(ब्रह्मभाषितः स्तवः)
श्रीसाम्ब उवाच
भूयोऽपि कथय त्वं मां कथां सूर्यसमागताम्।
न तृप्तिमधिगच्छामि कथां शृण्वन्त्रिमां शुभाम् ॥१॥
श्री साम्ब कहते हैं—आप सूर्य से सम्बन्धित और प्रसङ्ग कहिये। इस शुभकर बात को सुनने से मुझे तृप्ति नहीं मिलती॥१॥
नारद उवाच
आदित्यस्य कथां दिव्यां सर्वपापप्रणाशिनीम्।
वक्ष्यामि कथिता पूर्वं ब्रह्मणा लोकभाविना ॥२॥
ऋषयः परिपृच्छन्ति ब्रह्मलोके पितामहम्।
तापिताः सूर्यकिरणैः ऋषयोऽज्ञानमोहिताः ॥३॥
नारद कहते हैं—लोकस्रष्टा ब्रह्मा के सर्वपापनाशक आदित्य की दिव्य कथा को कहता हूँ। इसे पूर्व में ऋषिगणों ने ब्रह्मलोक में पितामह से पूछा था। वे ऋषिगण सूर्यकिरणों से तप्त तथा अज्ञानमोहित थे॥२-३॥
ऋषय ऊचुः
कोऽयं दीप्तो महातेजा वह्निरश्मिसमप्रभः।
एतद्वेदितुमिच्छामः प्रभवोऽस्य कुतः प्रभो ॥४॥
ऋषिगण कहते हैं—अग्निशिखा-तुल्य यह दीप्त महातेज-युक्त कौन है? यह हम जानना चाहते हैं। हे प्रभु! इनकी उत्पत्ति कहाँ से है?॥४॥
ब्रह्मोवाच
ततो भूतेषु सर्वेषु नष्टे स्थावरजङ्गमे।
प्रवृत्ते गुणहेतुत्वे पूर्वं बुद्धिरजायत ॥५॥
ब्रह्मा कहते हैं—स्थावर-जंगम समस्त प्राणी के लय प्राप्त होने पर गुणों (सत्व-रजः-तमोगुण) के कारण सबसे पहले बुद्धि उत्पन्न होती है॥५॥
अहङ्कारस्ततो जातो महाभूतप्रवर्त्तकः।
वाय्वग्निजलखंभूमिस्ततस्त्वण्डमजायत ॥६॥
चतुर्दशोऽध्यायः ७१
चतुर्दशोऽध्यायः ७१
तदनन्तर महाभूत द्वारा प्रवर्त्तित होकर अहंकार उत्पन्न होता है। तत्पश्चात् वायु, अग्नि, जल, आकाश तथा भूमि उत्पन्न होता है, तदनन्तर अण्ड उत्पन्न होता है॥६॥
तस्मिंस्त्वण्डे इमे लोकाः सप्त वै सम्प्रतिष्ठिताः।
पृथिवी सप्तभिर्द्वीपैर समुद्रैश्चैव सप्तभिः॥७॥
वह अण्ड इस सप्तलोक में प्रतिष्ठित हुआ। तत्पश्चात् सप्तद्वीप तथा सप्त समुद्र के साथ पृथिवी प्रतिष्ठित हो गई॥७॥
तत्र चावस्थितो ह्यासन्नहं विष्णुर्महेश्वरः।
विमूढास्तमसः सर्वे प्रध्यायन्तीश्वरं परम्॥८॥
वहाँ (मैं (ब्रह्मा), विष्णु तथा महेश्वर अवस्थित थे। हम सब अन्धकार में विमूढ़ होकर परमेश्वर का ध्यान कर रहे थे॥८॥
ततोऽचिन्त्यं महत्तेजः प्रादुर्भूतं तमोनुदम्।
ध्यानयोगेन चास्माभिर्विज्ञातः सविता तदा॥९॥
तदनन्तर अन्धकार-विदारक अचिन्त्य महत् तेज प्रादुर्भूत हो गया। तब ध्यानयोग से हमने जाना कि वे सविता हैं॥९॥
ज्ञात्वा च परमात्मानं सर्व एव पृथक्-पृथक्।
दिव्याभिस्तुतिभिर्देवास्तं स्तोतुमुपचक्रमुः॥१०॥
उन परमात्मा को जानकर हम देवगण ने पृथक्-पृथक् रूप से दिव्य स्तुति से उनकी स्तुति आरम्भ कर दिया॥१०॥
आदिदेवोऽसि देवानामैश्वर्याच्च त्वमीश्वरः।
आदिकर्त्तासि भूतानां देवदेवो दिवाकरः॥११॥
देवों में तुम आदिदेव हो, ऐश्वर्य में तुम ईश्वर हो, तुम प्राणीगण के आदिकर्त्ता एवं देवताओं के देवता दिवाकर हो॥११॥
जीवनं सर्वसत्त्वानां देव-गन्धर्वरक्षसाम्।
मुनिकिन्नरसिद्धानां तथैवोरगपक्षिणाम्॥१२॥
तुम समस्त प्राणीगण, देवता-गन्धर्व तथा किन्नर, राक्षस, सिंह, मुनि, नाग, पक्षीगण के जीवन हो॥१२॥
त्वं ब्रह्मा त्वं महादेवस्त्वं विष्णुस्त्वं जगत्पतिः।
वायुरिन्द्रश्च सोमश्च विवस्वान् अरुणस्तथा॥१३॥
तुम ही ब्रह्मा, महादेव एवं जगत् के पति हो। तुम ही वायु, इन्द्र, सोम, विवस्वान् तथा अरुण हो॥१३॥
७२ श्रीसाम्बपुराणम्
त्वं कालः सृष्टिकर्त्ता च हन्ता भर्त्ता प्रभुस्तथा।
सरितः सागराः शैला विद्युदिन्द्रधनूंषि च॥१४॥
तुम ही काल तथा सृष्टिकर्त्ता हो। तुम विनाशक, पोषणकारी तथा प्रभु हो। नदी-सागर-पर्वत-विद्युत् तथा इन्द्रधनुष भी तुम्हीं हो॥१४॥
प्रलयः प्रभवश्चैव व्यक्ताव्यक्तः सनातनः।
ईश्वरात् परतो विद्या विद्यायाः परतः शिवः॥१५॥
शिवात् परतरो देवस्त्वमेव परमेश्वरः॥१६॥
प्रलय तथा उत्पत्ति, व्यक्त एवं अव्यक्त, सनातन तुम हो। ईश्वर से विद्या श्रेष्ठ है, विद्या से शिव श्रेष्ठ है एवं शिव से तुम श्रेष्ठ हो। तुम ही परमेश्वर हो॥१५-१६॥
सर्वतः पाणिपादस्त्वं सर्वतोऽक्षिशिरोमुखः।
सर्वतः श्रुतिमांल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥१७॥
तुम सर्वभावेन हस्त-पादयुक्त, सर्वतः चक्षु-मस्तक तथा मुख-विशिष्ट (तुम ही सबके हस्तपाद, चक्षु-मस्तक-मुख) हो। सर्वतः कर्म-विशिष्ट हो तथा तुम ही लोक में सबको व्याप्त करके स्थित हो॥१७॥
सहस्त्रांशुः सहस्राक्षः सहस्रचरणेक्षणः।
भूतादिर्भूर्भुवःस्वश्च महः सत्यं तपो जनः॥१८॥
तुम्हारी किरणें हजारों हैं। हजारों मुख, चरण तथा नयन हैं। तुम ही प्राणियों के आदि, भूः (पृथिवी), भुवः (अन्तरिक्ष), स्वः (स्वर्गलोक), महः, सत्य, तप एवं जनलोक भी तुम ही हो॥१८॥
प्रदीप्तं दीपनं दिव्यं सर्वलोकप्रकाशनम्।
दुर्निरीक्ष्यं सुरेन्द्राणां यद्रूपं तस्य ते नमः॥१९॥
प्रदीप्त, उज्ज्वल, दिव्य, सर्वलोक-प्रकाशक, दुर्निरीक्ष्य, देवश्रेष्ठों का जो रूप है, वही तुम्हारा रूप है; तुमको नमस्कार है॥१९॥
सुरसिद्धगणैर्जुष्टं भृग्वत्रिप्लहादिभिः।
स्तुतं परममव्यक्तं यद्रूपं तस्य ते नमः॥२०॥
देवताओं तथा सिद्धों द्वारा प्रीति से सेवित एवं भृगु-अत्रि-पुलह आदि द्वारा स्तुत जो परम अव्यक्त रूप है, वह तुम्हारा ही है; अतः तुमको नमस्कार है॥२०॥
वेद्यं वेदविदां नित्यं सर्वज्ञानसमन्वितम्।
सर्वदेवातिदेवस्य यद्रूपं तस्य ते नमः॥२१॥
चतुर्दशोऽध्यायः ७३
चतुर्दशोऽध्यायः ७३
वेदविद्गणों के तुम ही वेद्य हो, नित्य सर्वज्ञानयुक्त सकल देवगण के भी श्रेष्ठ देवता का जो रूप है, वही तुम्हारा रूप है। तुमको नमस्कार है॥२१॥
विश्वकृद्विश्वभूतिश्च वैश्वानरसुरार्चितम्।
विश्वस्थितमचिन्त्यञ्च यद्रूपं तस्य ते नमः॥२२॥
तुम विश्वकृत् (विश्व के सृष्टिकर्त्ता), विश्व के पालक, वैश्वानर (जठराग्नि) तथा देवताओं से अर्चित हो। विश्व में स्थित तथा अचिन्त्य जो रूप है, वह तुम्हारा है। ऐसे तुमको मैं नमस्कार करता हूँ॥२२॥
परं वेदात्परं यज्ञात् परं लोकात् परं दिवः।
परमात्मेति विख्यातं तद्रूपं यस्य ते नमः॥२३॥
जो वेद के परतत्त्व, यज्ञ के परतत्त्व हैं, भूलोक-द्युलोक से भी जो श्रेष्ठ हैं, वे परमात्मा नाम से विख्यात हैं। वह जिनका रूप है, ऐसे तुमको नमस्कार है॥२३॥
अविज्ञेयमनालक्ष्यमध्यात्मगति चाव्ययम्।
अनादिनिधनं चैव यद्रूपं तस्य ते नमः॥२४॥
सहज में जाना नहीं जाता, दुर्निरीक्ष्य, आत्मा के प्रापक एवं आदि-अन्तहीन जो रूप है, वह तुम्हारा है। तुमको नमस्कार है॥२४॥
नमो नमः कारणकारणाय नमो नमः पापविमोचनाय।
नमो नमो वन्दितवन्दिताय नमो नमस्तापविनाशनाय॥२५॥
जो कारण के भी कारण हैं, उन तुमको नमस्कार है, नमस्कार है। तुम पापविमोचक को नमस्कार है, नमस्कार है। तुम पूज्य से भी पूजनीय को नमस्कार है, नमस्कार है। तुम ताप-पाप-विनाशक को नमस्कार है, नमस्कार है (अर्थात् तुम्हें मैं पुनः पुनः नमस्कार करता हूँ)॥२५॥
नमो नमः सर्ववरप्रदाय नमो नमः सर्वधनप्रदाय।
नमो नमः सर्वसुखप्रदाय नमो नमः सर्वमतिप्रदाय॥२६॥
सबको सभी वर देने वाले तुमको नमस्कार-नमस्कार। समस्त धनप्रदाता तुमको नमस्कार-नमस्कार। सकल सुखप्रदायक तुमको नमस्कार-नमस्कार। सबके मतिप्रदाता तुमको नमस्कार-नमस्कार॥२६॥
श्रुत्वा भगवान् देवस्तैजसं रूपमास्थितः।
उवाच वाचं कल्याणीं को वरो वः प्रदीयताम्॥२७॥
यह सब सुनकर भगवान् लीलाशील सूर्यदेव ने तैजस रूप में विराजित होकर कल्याणकर वाक्य कहा—तुम सबको क्या वर दूँ?॥२७॥
७४ श्रीसाम्बपुराणम्
ब्रह्मोवाच
तवातितेजसं रूपं न कश्चित् सोढुमुत्सहेत्।
सहनीयं भवत्वेतद्धिताय जगतः प्रभो ॥२८॥
ब्रह्मा कहते हैं—आपके इस तेजस्कर रूप को कोई सहन नहीं कर पाता। हे प्रभु! जगत् के हित के लिये आपका यह रूप सहनीय हो जाय॥२८॥
एवमस्त्विति सोऽप्युक्त्वा भगवान् दिनकृद् विभुः।
लोकानां कार्यसिद्ध्यर्थं घर्मवर्षहिमप्रदः ॥२९॥
सूर्यदेव ने कहा—ऐसा ही हो और भगवान् विभु दिनकर लोक की कार्यसिद्धि के लिये उष्ण, वृष्टि तथा शीतल हिमप्रद हो गये (वर्षा, ग्रीष्म तथा शीत—तीन रूप वाले हो गये)॥२९॥
अतः सांख्याश्च योगाश्च ये चान्ये मोक्षकाङ्क्षिणः ।
ध्यायन्ति ध्यानिनो नित्यं हृदयस्थं दिवाकरम् ॥३०॥
सर्वलक्षणहीनोऽपि युक्तो वा सर्वपातकैः ।
सर्वमन्तवते पापं देवमर्कसमाश्रितः ॥३१॥
इसीलिये सांख्य गण, योगीगण एवं अन्य मोक्षार्थी तथा ध्यानीगण हृदयस्थ दिवाकर का नित्य ध्यान करते हैं। समस्त लक्षणहीन होने पर भी अथवा सर्वपातकी व्यक्ति भी सूर्यदेव का आश्रय लेकर समस्त पापों को दूर कर लेता है॥३०-३१॥
अग्निहोत्रञ्च वेदाश्च यज्ञाश्च बहुदक्षिणाः।
भानोर्भक्तेर्नमस्कारात् कलां नार्हति षोडशीम् ॥३२॥
अग्निहोत्र, समस्त वेद, यज्ञ तथा बहुत दक्षिणा आदि भी सूर्यभक्त को नमस्कार करने की तुलना में सोलहवाँ भाग भी नहीं है॥३२॥
तीर्थानां परमं तीर्थं मङ्गलानाञ्च मङ्गलम्।
पवित्राणां पवित्रं च प्रपद्येऽहं दिवाकरम् ॥३३॥
ब्रह्माद्यैः संस्तुतं देवैर्यै नमस्यन्ति भास्करम् ।
सर्वकिल्विषनिर्मुक्ताः सूर्यलोकं व्रजन्ति ते ॥३४॥
इति श्रीसाम्बपुराणे ब्रह्मभाषितः स्तवो नाम चतुर्दशोऽध्यायः
जो तीर्थों में परमतीर्थ, मंगल में परम मंगल, पवित्रों में परम पवित्र हैं, उन दिवाकर का मैं शरणापन्न होता हूँ। जो ब्रह्मादि देवगण द्वारा संस्तुत दिवाकर को नमस्कार करता है, वह सभी पापों से निर्मुक्त होकर सूर्यलोक में जाता है॥३३-३४॥
श्रीसाम्बपुराण में ब्रह्मा द्वारा कथित सूर्यस्तव नामक चतुर्दश अध्याय समाप्त
पञ्चदशोऽध्यायः
(ब्रह्मकृतस्तोत्रम्)
साम्ब उवाच
शरीरलिखनं भानोः कथं वै कति वादितः।
देवैर्वा ऋषिभिर्वापि तन्ममाख्यातुमर्हसि ॥१॥
साम्ब कहते हैं कि सूर्य का यह शरीर-लेखन (शरीर का अङ्कन, प्रचण्ड उग्र तापमय शरीर का संक्षेपीकरण) किसलिये, कितने प्रकार से, किंवा देवता अथवा ऋषि द्वारा कहा गया है, वह कहिये॥१॥
नारद उवाच
ब्रह्मलोके सुखासीनं ब्रह्माणं ससुरासुरम्।
ऋषयश्चोपसङ्गम्य इदमूचुः समाहिताः ॥२॥
नारद कहते हैं—ब्रह्मलोक में देवता तथा असुरों के साथ सुखपूर्वक बैठे ब्रह्मा के निकट उपस्थित होकर ऋषियों ने समाहित चित्त से इस प्रकार कहा॥२॥
भगवन्नदितेः पुत्रो य एष दिवि राजते।
मार्तण्ड इति विख्यातस्तिग्मतेजो महातपाः ॥३॥
अस्य तेजोभिरखिलं जगत् स्थावरजङ्गमम्।
क्लिश्यमानमनाक्रन्दमुपेक्षसि कथं प्रभो ॥४॥
हे भगवन्! अदिति के पुत्र जो द्युलोक में विराजित हैं, जो मार्तण्ड कहलाते हैं, जो प्रचण्ड किरणों वाले तथा महातपस्वी हैं, उनके तेज से अखिल स्थावर-जंगम विश्व क्लिष्ट होकर चित्कार कर रहा है। हे प्रभु! आप क्यों उपेक्षा कर रहे हैं॥३-४॥
वयमप्याहिताशङ्कास्तेजसा सम्प्रमोहिताः।
दिवि भुव्यन्तरिक्षे च शर्म नोपलभामहे ॥५॥
हम भी भीत-त्रस्त हैं, तेज से सम्यक् रूपेण विमोहित होकर द्युलोक, भूलोक तथा अन्तरिक्ष लोक में कहीं भी कल्याण नहीं पा रहे हैं॥५॥
एवमुक्तस्तु भगवानुवाच कमलासनः।
तमेव शरणं देवं गच्छामः सहितं वयम् ॥६॥
७६ श्रीसाम्बपुराणम्
ततस्तमुदयोदग्रं शैलराजावतंसकम्।
सप्रजापतयः सर्वे संस्तौतुमुपचक्रमुः ॥७॥
ऐसा कहने से (उनके इस प्रकार कहने से) भगवान् कमलासन (ब्रह्मा) कहते हैं—
तुम्हारे साथ मैं इन देव की शरण लेता हूँ। तदनन्तर श्रेष्ठ पर्वत के वंशधर उदयाचल के शिखर पर अवस्थित सूर्यदेव के लिये प्रजापति गण के साथ वे सब स्तुति करने लगे।।६-७।।
ब्रह्मोवाच
नमो नमः सुरवरतिग्मतेजसे नमो नमः प्रणतहितानुकम्पिने ।
नमो नमस्त्रिभुवनभूतभाविने क्रतुक्रियाशुभफलसम्प्रदायिने ॥८॥
शुभाशुभप्रविचयकर्मसाक्षिणे सहस्रसंदीधितये नमो नमः ।
प्रशस्तसप्ताश्वयुतान्तपक्षिणे ध्रुवैकरश्मिग्रथितायते नमः ॥९॥
सबालखिल्याप्सरकिन्नरोरगैः ससिद्धगन्धर्वपिशाचगुह्यकैः ।
सयक्षरक्षोगणचारणोत्तमैर्नमो नमः सत्कृतवन्दिताय ते ॥१०॥
ब्रह्मा कहते हैं—हे देवश्रेष्ठ! तीक्ष्ण किरणमालिन्! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप प्रणतजनों के लिये हितानुकम्पी हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। त्रिभुवन के प्राणियों के रक्षक, यज्ञक्रिया का शुभ फल देने वाले आपको बार-बार नमस्कार है। बालखिल्य, अप्सरा, किन्नर, सर्पगण, सिंह, गन्धर्व, पिशाच, गुह्यक, यक्ष, राक्षस और चारणश्रेष्ठ द्वारा पूजित तथा स्तुत आपको नमस्कार है।।८-१०।।
यदा रसान् संसृजते शरीरिणां गभस्तिभिर्घर्महिमाम्बुसर्जनैः ।
जगच्च संशोषयसे ससागरं नमः सदाम्नायनुताय भास्वते ॥११॥
जब तेज, हिम तथा जल सृष्टि के द्वारा देहधारी गण में रस की सृष्टि करते हैं, तब आपकी किरणों द्वारा सागर के साथ-साथ समस्त जगत् का भी शोषण किया जाता है, सर्वदा वेदस्तुत तेजप्रकाशक आपको नमस्कार है।।११।।
जड़ान्धमूकान् बधिरान् सकुब्जकान्
सदद्रुकुष्ठान् कृमिभिः स्रवद्व्रणान् ।
करोषि तानेव पुनर्नवान् यदा
तदा महाकारुणिकाय ते नमः ॥१२॥
जड़, अन्ध, मूक, वधिर, कुब्ज, दद्रु, कुष्ठ, कृमि-क्षारित, व्रणयुक्त तथा काश-रोगीगण को आप पुनः नवीन शरीर-सा कर देते हैं। अतः आप महा कारुणिक को नमस्कार है।।१२।।
पञ्चदशोऽध्यायः ७७
पञ्चदशोऽध्यायः ७७
यदोदरं ज्योतिरतिग्मकं स्थितं यदप्सु तेजो यदपीह चक्षुषि।
अग्नौ यदुष्णं भगणे यदाहितं तथैव तद्रूपमनेकधा स्थितम् ॥१३॥
जठर का जो तेज है, जल का जो तेज है, चक्षु का जो तेज है, अग्नि की जो उष्णता है और नक्षत्रों में जो तेज आहित है, वह आपका ही रूप है और आप ही अनेक रूप में अवस्थान करते हैं॥१३॥
सुरद्विषः सागरतोयवासिनः प्रचण्डपाशासिपरश्वधायुधाः।
समुत्थिता ये भुवि पापचेतसः प्रयान्ति नाशं तव देवदर्शनात् ॥१४॥
हे देव! सागर जलनिवासी, प्रचण्ड पाश, परशु तथा विविध अस्त्रधारी असुरगण एवं पृथ्वी में पापचेता जो असुर उत्थित होते हैं, वे तुम्हारे दर्शनमात्र से ही नाश प्राप्त हो जाते हैं॥१४॥
स्तुतः स भगवानेवं प्रजापतिमुखैः सुरैः।
मत्वा तेषामभिप्रायमुवाच भगवानिदम् ॥१५॥
इस प्रकार से प्रजापति-प्रमुख देवगण द्वारा स्तुत होकर सूर्यदेव उनके अभिप्राय को जानकर इस प्रकार बोले॥१५॥
हितं चोपहितं नित्यं गायत्र्यं यद्वचः परम्।
तद्वै ब्रूत सुरा क्षिप्रं किं मया क्रियतां स्वयम् ॥१६॥
आपके गायत्री-मूलक जो वाक्य हैं, वे सदा हितकारी हैं। हे देवगण! शीघ्र कहिये, मुझे क्या करना है?॥१६॥
लब्धानुज्ञास्ततस्ते तु सुराः संहृष्टमानसाः।
त्वष्टारं पूजयामासुर्मनोवाक्कायकर्मभिः ॥१७॥
आदेश पाकर देवगण हृष्टचित्त से मानसिक-वाचिक तथा कायिक कर्म से त्वष्टा (सूर्य) की पूजा करने लगे॥१७॥
ततस्तं तेजसो राशिं सर्वलोकविधानवित्।
भ्रमिमारोपयामास विश्वकर्मा विभावसुम् ॥१८॥
तदनन्तर सकल लोकों के विधानकारी विश्वकर्मा ने तेजोराशि विभावसु (सूर्य) को भ्रमि (घूर्णिचक्र) पर स्थापित किया॥१८॥
अमृतेनाभिषिक्तस्य स्तूयमानस्य चारणैः।
तेजसः शातनं चक्रे विश्वकर्मा शनैः शनैः ॥१९॥
विश्वकर्मा धीरे-धीरे अमृत से अभिषिक्त एवं चारणों द्वारा स्तूयमान सूर्यदेव के तेज का छेदन करने लगे (उनकी काट-छाँट करके मसृणता सम्पादन करने लगे)॥१९॥
७८ श्रीसाम्बपुराणम्
आजानुलिखितश्चासौ सुरासुरमनोरगैः।
नाभ्यनन्दत् सलिखनं ततस्तेनावतारितः॥२०॥
देवता, असुर तथा सर्पगण द्वारा सूर्य को जानु-पर्यन्त लिखा गया (छेदन किया गया), उसे उन्होंने अभिनन्दित नहीं किया। तब विश्वकर्मा ने उन्हें घूर्णिचक्र से उतारा॥२०॥
ततः प्रभृति देवस्य चरणौ नित्यसंवृतौ।
तापय हृदयं चैव युक्ततेजोऽभवत्ततः॥२१॥
तब से सूर्य के चरणद्वय नित्य संवृत हैं तथा वे हृदय को तप्त करने वाले तेज से युक्त हैं॥२१॥
शातितञ्चास्य यत्तेजस्तेन चक्रं विनिर्मितम्।
येन विष्णुर्जघानोग्रान् दानवानमितौजसः॥२२॥
इन सूर्य का जो तेज खण्डित किया गया था, उससे चक्र निर्मित हुआ और उस चक्र से विष्णु भगवान् ने अति तेजस्वी असुरों का विनाश किया॥२२॥
शूलशक्तिगदाचक्रं शरासनपरश्वधान्।
दैवतेभ्यो ददौ कृत्वा विश्वकर्मा महामतिः॥२३॥
महामति विश्वकर्मा ने उस तेज से शूल, शक्ति, गदा, चक्र, धनुष, बाण तथा परशु का निर्माण करके देवताओं को प्रदान किया॥२३॥
ब्रह्मवक्त्रोद्भवं स्तोत्रं संध्ययोरुभयोर्जपन्।
कुलं पुनाति पुरुषो व्याधिभिर्न च पीड्यते॥२४॥
प्रजावान् सिद्धकर्मा च जीवेत् साग्रं शरच्छतम्।
पुत्रवान् धनवांश्चैव सर्वत्रैवापराजितः॥२५॥
विभिन्नप्राणसंघाते सावित्र्यं लोकमाप्नुयात्॥२६॥
इति श्रीसाम्बपुराणे ब्रह्मस्तोत्रं नाम पञ्चदशोऽध्यायः
ब्रह्मा के मुख से निर्गत इस स्तोत्र को प्रातः तथा सायं सन्ध्याकाल में जो जपता है, वह पुरुष अपने कुल को पवित्र करता है और उसे व्याधिजनित पीड़ा नहीं होती। वह पुरुष प्रजायुक्त तथा सिद्धकर्मा होकर शताधिक वर्ष तक जीवित रहता है एवं पुत्रवान्, धनवान् होकर सर्वत्र विजयी होता है। विभिन्न जन्मों में क्रमशः उन्नत योनि में जन्म पाता है और पवित्र लोकों में गमन करता है॥२४-२६॥
श्री साम्बपुराण का ब्रह्मास्तव नामक पञ्चदश अध्याय समाप्त
षोडशोऽध्यायः
(सूर्यस्य परिवारवर्णनम्)
नारद उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि दण्डनायकपिङ्गलौ।
राज्ञस्तोषौ तथा चान्यान् पार्श्वस्थान् दिण्डिना सह ॥१॥
नारद कहते हैं—इसके अनन्तर दण्डनायक पिङ्गल, राज्ञ, स्तोष एवं दण्डि के साथ अन्य पार्श्वचरों की कथा कहता हूँ॥१॥
ब्रह्मणा सह संगम्य पुरा देवैर्विचारितम्।
एष कारुणिकः सूर्यो दैत्येभ्यो दास्यते वरान् ॥२॥
ते तु लब्धवरा भूत्वा बाधन्ते दिवौकसः।
तस्मात्तेषां विघातार्थमेधामः प्रणता वयम् ॥३॥
पुराकाल में एक समय देवगण ब्रह्मा के साथ बैठकर सोच रहे थे कि एकमात्र कारुणिक सूर्य दैत्यों को वर देते हैं और उनसे वर प्राप्त करके स्वर्ग में रहने वाले देवताओं को वे दैत्यगण पीड़ित करते हैं। अतएव उनको प्रतिहत करने के लिये हमको सूर्यदेव के समक्ष प्रणत होना चाहिये॥२-३॥
अस्माभिः प्रतिरुद्धास्ते न द्रक्ष्यन्ति दिवाकरम्।
सम्मन्त्र्यैवं ततस्त्विन्द्रो वामपार्श्वे रवेः स्थितः ॥४॥
दण्डनायकसंज्ञस्तु सर्वलोकस्य स प्रभुः।
उक्तश्च स तदार्केण त्वं प्रजा दण्डनायकः ॥५॥
दण्डनीतिकरो यस्मात्तस्मात्त्वं दण्डनायकः।
लिखते यः प्रजानां तु सुकृतं यच्च दुष्कृतम् ॥६॥
हमारे द्वारा प्रतिरुद्ध होकर वे (असुर) दिवाकर सूर्य को नहीं देख पायेंगे। इस प्रकार मन्त्रणा करके इन्द्र ने रवि के वाम पार्श्व में अवस्थान किया। दण्डनायक नाम से प्रसिद्ध वे सभी लोकों के प्रभु हैं। उनसे सूर्यदेव ने कहा—तुम प्रजागण के दण्ड का विधान करो। दण्डनीति का विधान करने के लिये तुम दण्डनायक कहलाओगे तथा तुम प्रजा के सुकृत या दुष्कृत को लिखोगे॥४-६॥
अग्निर्दक्षिणपार्श्वे तु पिङ्गलत्वात् स पिङ्गलः।
अश्विनौ चापि सूर्यस्य पार्श्वयोरुभयोः स्थितौ।
अश्वरूपात् समुत्पन्नौ तेन तावश्विनौ स्मृतौ ॥७॥
८० श्रीसाम्बपुराणम्
अग्नि ने सूर्य के दाहिने पार्श्व में अवस्थान किया। पिङ्गल वर्ण के कारण उनको पिङ्गल कहा गया। दोनों अश्विनीकुमार सूर्य के दोनों पार्श्व में स्थित हुये। अश्वरूप में उत्पन्न होने के कारण इनको अश्विनद्वय कहा जाता है।।७।।
पूर्वद्वारे स्थितौ तस्य राज्ञस्तोषौ महाबलौ।
कार्त्तिकेयः स्मृतो राज्ञस्तोषश्चापि हरः स्मृतः ॥८॥
राजूदीप्तौ स्मृतो धातुर्नकारः प्रत्ययोऽस्य तु।
सुरसेनापतित्वेन स यस्माद्दीप्यते सदा।
तस्माच्च कार्त्तिकेयस्तु नाम्ना राज्ञ इति स्मृतः ॥९॥
सूर्य के पूर्व द्वार पर महाबलशाली राज्ञ तथा स्तोष ने अवस्थान किया। कार्त्तिकेय राज्ञ नाम से तथा हर स्तोष नाम से अभिहित हैं। राज (राजू) धातु का अर्थ दीप्ति है और प्रत्ययार्थ 'न' इससे युक्त होता है। देवगण के सेनापतिरूप से वे सर्वदा दीप्तिमान रहते हैं।।८-९।।
तुस गतौ स्मृतो धातुस्तस्य सप्रत्ययः स्मृतः।
गच्छत्यतीव यस्माद्वा राज्ञस्तोषो विधीयते ॥१०॥
खरं हि दुरतिक्रान्तं कृत्वा द्वारमवस्थितौ।
पक्षिप्रेताधिपौ नाम्ना स्मृतौ कल्माषपक्षिणौ ॥११॥
तुस धातु का अर्थ है—गति, यह प्रत्ययार्थ 'स' से युक्त है। जो अत्यन्त गमन करते हैं, इस अर्थ में हर को स्तोष नाम से अभिहित किया गया है। यह राज्ञ तथा स्तोष का वर्णन किया गया। खर (मुखविवर) दुरतिक्रमणीय दो जन द्वार पर स्थित हैं। वे पक्षी तथा प्रेतों के अधिपति हैं। इनको कल्माष तथा पक्षी भी कहते हैं।।१०-११।।
वर्णस्य शबलत्वात्तु यतः कल्माष उच्यते।
पक्षोऽस्यास्तीत्यतः पक्षी गरुड़ः परिकीर्त्तितः ॥१२॥
उनमें जिसका वर्ण धवल है, उसे कल्माष कहते हैं। जिसे पंख (पक्ष) हैं, वह पक्षी है। यहाँ गरुड़ को ही पक्षी कहा गया है।।१२।।
स्थितो दक्षिणतस्तस्य जान्दकारः समाठरः।
जान्दकारश्चित्रगुप्तो माठरः काल उच्यते ॥१३॥
यमस्यार्थकरो नित्यं चित्रगुप्तो महामतिः।
कालो जान्द इति प्रोक्तो जान्दकारस्ततस्तु सः ॥१४॥
सूर्य के दक्षिण में जान्दकार तथा माठर रहते हैं। चित्रगुप्त को जान्दकार एवं काल तथा यम को माठर कहा गया है। यम का अर्थ-साधन करते हैं—महामति चित्रगुप्त।
षोडशोऽध्यायः ८१
षोडशोऽध्यायः ८१
जान्द शब्द का अर्थ है—प्रयोजन। इसलिये यम का सब समय सर्वप्रयोजन-साधक होने के कारण चित्रगुप्त जान्दकार कहे जाते हैं॥१३-१४॥
दक्षिणस्यां निवासोऽस्य दिशि यस्मात्तु नित्यशः । धातुर्मठ निवासेति कालस्तेन तु माठरः ॥१५॥
क्योंकि नित्य दक्षिण दिशा में ये निवास करते हैं और मठ धातु का अर्थ है—निवास; इसीलिये काल को माठर कहते हैं॥१५॥
प्राप्नुयानक्षुतापौ तु रवेः पश्चिमतः स्थितौ । क्षुतापो वरुणो ज्ञेयः प्राप्नुयानस्तु सागरः ॥१६॥
प्राप्नुयान तथा क्षुताप रवि के पश्चिम में स्थित हैं। वरुण को क्षुताप तथा सागर को प्राप्नुयान कहा जाता है॥१६॥
उत्तरेण स्थितोऽर्कस्य कुबेरः सविनायकः । कुबेरो धनदो ज्ञेयो हस्तिरूपो विनायकः ॥१७॥
सूर्य के उत्तर में विनायक के साथ कुबेर स्थित हैं। कुबेर धनद हैं तथा हस्तिरूप विनायक हैं॥१७॥
रेवन्तश्चैव दिण्डिश्च द्वावेव पूर्वतः स्थितौ । दिण्डिर्ज्ञेयस्तयो रुद्रो रेवन्तस्तनयो रवेः ॥१८॥
रेवन्त तथा दिण्ड दोनों सूर्य के पूर्व में स्थित हैं। उनमें दिण्ड को रुद्र जानना चाहिये तथा रेवन्त रविपुत्र हैं॥१८॥
इत्येतेऽनुचराः प्रोक्ता संख्या चैषां निबोध मे । माठरो जान्दकारश्च धनदोऽथ विनायकः ॥१९॥ प्राप्नुयानक्षुतापौ तु द्वौ च कल्माषपक्षिणौ । अश्विनौ तु ततो ज्ञेयो दण्डनायकपिङ्गलौ ॥२०॥ सखरद्वारिकौ ज्ञेयौ राज्ञस्तोषौ ततः स्मृतौ । रेवन्तश्चैव दिण्डिश्च इत्येतेऽनुचराः स्मृता ॥२१॥
ये सभी सूर्य के अनुचर हैं। इनकी संख्या मुझसे सुनो—माठर, जान्दकार, धनद, विनायक, प्राप्नुयान, क्षुताप, कल्माष, पक्षी, अश्विनीकुमार, दण्डनायक, पिङ्गल, खर, द्वारिक, राज्ञ, स्तोष, रेवत तथा दिण्ड—ये सभी उनके अनुचर कहे गये हैं॥१९-२१॥
दशाष्टौ च समाख्याताः संक्षेपात् संख्यया पुनः । इति ते नामभिस्तुत्यैर्दानवार्थे विनायकाः । परिवार्य स्थिता सूर्य नानाप्रहरणायुधाः ॥२२॥
८२ | श्रीसाम्बपुराणम्
संक्षेप में इन १८ अनुचरों का वर्णन किया गया। ये सभी दानवों को बाधा देने के लिये नाना प्रकार के अस्त्र तथा आयुध धारण करके सूर्य को घेर कर सदा अवस्थित रहते हैं॥२२॥
स्वरूपाश्चान्यरूपाश्च विरूपाः कामरूपिणः।
परिवार्य स्थिताः सूर्यं भानुरूपाश्च देवताः॥२३॥
ऋचो यजूंषि सामानि वाङ्मयोक्तानि यानि तु।
नानारूपैः स्थितान्येव रवेस्तानि समन्ततः॥२४॥
स्वरूप, अन्यरूप, विरूप, कामरूप एवं भानुरूप देवतागण सूर्य को घेर कर अवस्थान करते हैं। वाङ्मयरूपेण प्रसिद्ध ऋक्, यजुः तथा साम नानारूपेण सूर्य के चारो ओर स्थित रहते हैं॥२३-२४॥
नारद उवाच
वक्ष्याम्यथातः पुनरेव दिण्डिं सूर्यस्य सर्वप्रवरं प्रधानम्।
व्योम्यावसं तिष्ठति यस्तु नग्नः सोऽप्युच्यते रुद्र इहापि दिण्डी ॥२५॥
नारद कहते हैं—मैं पुनः दिण्डि की बात कहता हूँ। वे सूर्य के अनुचरों में श्रेष्ठ हैं। वे नग्नावस्था में आकाश में विराजमान रहते हैं और वे ही रुद्र भी हैं, जो यहाँ दिण्डि नाम से कथित हैं॥२५॥
छित्वा पुरा ब्रह्मशिरः किलासौ प्रगृह्य तच्चास्य शिरःकपालम्।
बहूदकं पुष्पफलैरुपेतं नग्नो ययौ दारुवनं ऋषीणाम्॥२६॥
दृष्ट्वा तु तं भैक्ष्यकरं सुरेशं क्षुब्धास्त्रियो मुक्तवस्त्राः प्रयाताः।
योषित्सु तासु क्षुभितासु सर्वे जघ्नुर्हरन्तं मुनयः सुरुष्टा ॥२७॥
स हन्यमानो मुनिमुख्यसर्वै गृहीतलोष्टैर्ऋषिदण्डकाष्ठैः।
विहाय तं देशमजःस्वरूपी ततो रवेर्लोकमथाजगाम॥२८॥
पूर्व काल में उन्होंने ब्रह्मा के शिर का छेदन किया और उस मस्तक, कपाल तथा फल-फूल के साथ बहुत जल पीकर नग्नावस्था में ऋषिगण के दारुवन में आये। ऐसे भिक्षुकरूपी सुरेश (रुद्र) को देखकर वहाँ की स्त्रियाँ क्षुब्ध होकर विवस्त्र हो गईं। स्त्रियों की विक्षुब्धता को देखकर सभी मुनिगण रुष्ट होकर रुद्र (हर) को मारने लगे॥२७-२८॥
आगच्छमानं प्रकरास्तमूचुर्देवेश नित्यं भ्रमसे किमर्थम्।
स त्वाह तान् पापविमोचनार्थं भ्रमामि तीर्थानि सुरालयांश्च॥२९॥
सूर्यदेव के प्रधान परिचारक ने आकर इनसे पूछा—हे देवेश! किसलिये नित्य भ्रमण करते हैं? इसपर उन्होंने कहा कि तीर्थों एवं देवालयों में पापों को दूर करने के लिये मैं भ्रमण करता हूँ॥२९॥
षोडशोऽध्यायः ८३
ते भूय ऊचुः प्रवरास्तमेवमत्रैव तिष्ठस्व रवेः पुरस्तात्।
शुद्धिं तवैवैष करिष्यतीह शुद्धस्ततो यास्यसि रुद्रलोकम् ॥३०॥
वे श्रेष्ठ परिकरगण पुनः उनसे बोले—यहाँ रवि भगवान् के सम्मुख आप रहिये। ये ही आपका शुद्धि-विधान करेंगे। तदनन्तर हे रुद्र! शुद्ध होकर अपने लोक जाइयेगा॥३०॥
इत्येवमुक्तः प्रवरैः स रुद्रस्तत्रैव तस्थौ रवितोषणार्थम्।
नग्नो जटी यष्टिकपालपाणी रूपेण चैवाप्रतिमस्त्रिलोके ॥३१॥
तुष्टाव देवं सविता तदाह प्रीतोऽस्मि तं वागमृतातवाहम्।
मद्दर्शनादेव भवान् विशुद्धो दिण्डी च नाम्ना भवितासि लोके ॥३२॥
स्थानं व्रजस्व त्वमतीव पुण्यं पापापहं लौकिकनामधेयम्।
त्यक्त्वा कपालं प्रविशुद्धमूर्तिर्मया सह स्थास्यसि तत्र नित्यम् ॥३३॥
उन श्रेष्ठ परिकरों के उनसे यह कहने पर रुद्र ने वहीं पर अवस्थान किया। वे नग्न, जटाधारी, हस्तद्वय में कपाल तथा लाठीधारी—इस रूप में त्रिभुवन में अतुलनीय थे। उन्होंने सूर्य का स्तवन किया तब सूर्यदेव ने उनसे कहा—तुम्हारे वाक्यामृत से मैं तुमसे प्रसन्न हो गया। मेरे दर्शन मात्र से तुम विशुद्ध हो गये हो तथा दिण्डी नाम से लोक में प्रसिद्धि प्राप्त करोगे। तुम पापविनाशक लौकिक नामयुक्त हो अति पुण्यस्थानों पर विचरण और कपाल त्याग करके मेरे साथ नित्य सौम्य मूर्ति में रहोगे॥३१-३३॥
अष्टादशैते प्रवरास्तु भानोश्चतुर्दशान्ये च रवेरधस्तात्।
देवौ च तौ द्वौ तु ऋषिप्रधानौ गन्धर्वसर्पावमितप्रभावौ ॥३४॥
यक्षौ च यौ द्वौ च निशाचरौ तु नृत्ये च ये द्वेऽप्सरसां वरिष्ठे।
वसन्ति येहर्तिषु खेऽप्सु सूर्ये तेषां समीतिश्चतुरुत्तराणाम् ॥३५॥
इति श्रीसाम्बपुराणे सूर्यपरिकरवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः
ये १८ लोग भानु के श्रेष्ठ परिकर हैं। रवि के निम्न भाग में अपर १४ लोग एवं दो लोग ऋषिप्रधान देवता तथा अतुल शक्तियुक्त गन्धर्व तथा सर्प हैं। ये दोनों यक्ष हैं। ये निशाचर हैं तथा नृत्य में भी श्रेष्ठ हैं। जो इस ऋषिलोक में, आकाश, जल तथा सूर्यलोक में निवास करते हैं, उनका समाज उत्तरादि चतुर्दिकू है॥३४-३५॥
श्री साम्बपुराण का सूर्यपरिवार-वर्णन नामक षोडश अध्याय समाप्त
सप्तदशोऽध्यायः
(माहेश्वरस्तोत्रम्)
नारद उवाच
दिण्डिप्रोक्तमिदञ्चापि शृणु साम्ब महास्तवम्।
प्रणम्य शिरसा देवमुदयस्थं दिवाकरम् ॥१॥
भक्त्या भानुं प्रपद्येऽहं सर्वपापप्रणाशनम्।
देवदानवयक्षाणां ग्रहाणां ज्योतिषामपि ॥२॥
तेजस्याभ्यधिकं देवं व्रजामि शरणं प्रभुम्।
एवमुक्त्वा विरूपाक्षो ध्यानासक्तो बभूव ह ॥३॥
नारद कहते हैं—हे साम्ब! दिण्डि द्वारा कथित महास्तव का भी स्मरण करो। उदीयमान देव दिवाकर को मस्तक से प्रणाम करके वे स्तुति करने लगे। भक्तिपूर्वक सर्वपाप-प्रणाशक भानु की शरण लेता हूँ। जो देव, दानव, यक्ष, ग्रह तथा ताराओं के मध्य में अतिशय तेजयुक्त हैं; मैं उनकी शरण लेता हूँ। इस प्रकार कहकर दिण्डीरूप रुद्र विरूपाक्ष ने सूर्यदेव की स्तुति हेतु ध्यान किया॥१-३॥
ध्यानात् संस्मृत्य मनसा पौराणीमात्मनस्तनूम्।
वाग्भिस्तुष्टाव तं देवं तमोघ्नं रश्मिमालिनम् ॥४॥
ध्यान-प्रभाव से मन द्वारा अपने पूर्वतन शरीर का स्मरण करके वाक्य से तमोविनाशक उन देव की स्तुति करने लगे॥४॥
दिविस्थितं मयूखाग्रैर्द्योतयन्तं दिशो दश।
वसुधामन्तरिक्षं च व्याप्तवन्तं मरीचिभिः ॥५॥
आदित्यं भास्करं सूर्यं सवितारं दिवाकरम्।
पूषणमर्यमानं च स्वर्भानुं दीप्ततेजसम् ॥६॥
जो द्युलोक में विराजमान हैं, अपनी किरणों के अग्रभाग से दशो दिशाओं को आलोकित करते हैं, अपनी किरणों द्वारा भूलोक तथा द्युलोक को व्याप्त करते हैं, जो आदित्य, भास्कर, सूर्य, सविता, दिवाकर, पूषा, अर्यमा, स्वर्भानु तथा दीप्ततेजा हैं॥५-६॥
चतुर्युगान्तं कालाग्निं दुष्प्रेक्ष्यं प्रलयान्तकम्।
योगेश्वरमनन्तं च रक्तं पीतं सितासितम् ॥७॥
सप्तदशोऽध्यायः ८५
सप्तदशोऽध्यायः ८५
ऋषीणामग्निहोत्रेषु यज्ञे वेदेषु संस्थितम्।
अक्षरं परमं गुह्यं मोक्षद्वारं सुरोत्तमम् ॥८॥
छन्दोभिरश्वरूपैश्च सकृद्युक्तैर्विहङ्गमैः।
उदयास्तमनोयुक्तं सदा मेरोः प्रदक्षिणम् ॥९॥
अमृतीभूतसत्यं च पुण्यतीर्थं पृथग्विधम्।
विश्वस्थितिमचिन्त्यञ्च प्रपन्नोऽस्मि प्रभाकरम् ॥१०॥
जो चतुर्युग का अन्त करते हैं अर्थात् उदयास्त रूप कालक्रम से क्रमशः एक-एक युग का अन्त करते-करते चारो युगों का क्रम समाप्त कर देते हैं; जो कालाग्नि के समान दुष्प्रेक्ष्य, महाप्रलय के अन्तक के समान हैं; जो योगेश्वर, अनन्त एवं रक्त-पीत-शुक्ल तथा कृष्ण वर्ण वाले हैं; जो ऋषियों के अग्निहोत्र, यज्ञ तथा वेद में स्थित हैं; जो विनाशरहित, परमगृह, मोक्षद्वार के समान, देवताओं में उत्तम हैं, उन देव की स्तुति करता हूँ। जो अश्वरूप छन्दों से तथा पक्षिगण द्वारा युक्त तथा उदयास्त काल में सदैव मेरु पर्वत की प्रदक्षिणा करते हैं; जो अविनश्वर तथा सत्यरूप, पुण्य तीर्थरूप, नानारूप युक्त, विश्व के स्थितिकारक, अचिन्त्य, प्रभाकर हैं, उनकी मैं शरण लेता हूँ॥७-१०॥
त्वं ब्रह्मा त्वं महादेवस्त्वं विष्णुस्त्वं प्रजापतिः।
वायुराकाशमापश्च पृथिवीगिरिसागराः ॥११॥
ग्रहनक्षत्रचन्द्रार्काविनयस्त्वं महौषधम्।
व्यक्ताव्यक्तेषु भूतेषु धर्माधर्मप्रवर्त्तकः ॥१२॥
दर्शनादेव ते देव मुक्तोऽहं ब्रह्महत्यया।
दिव्यं पश्यामि ते रूपं प्रकाशं ज्ञानचक्षुषा ॥१३॥
आप ही ब्रह्मा, महादेव, विष्णु, प्रजापति, वायु, आकाश तथा जल हैं; आप ही पृथिवी, पर्वत तथा सागर भी हैं। आप ही ग्रह, नक्षत्र, चन्द्र, सूर्य, पृथिवी, महौषधी, व्यक्त-अव्यक्त हैं। आप ही प्राणीगण के धर्म तथा अधर्म के प्रवर्तक भी हैं। हे देव! आपके दर्शनमात्र से ही मैं ब्रह्महत्या-जैसे पाप से मुक्त हो सका हूँ। मैं ज्ञान-चक्षु से आपका प्रकाशक दिव्य रूप देखता हूँ॥११-१३॥
स्रवद्भिरिव दीप्ताभिर्गोभिर्लोकान् प्रकाशयन्।
धारयन् दृश्यसे वापि विभूतिं पारमेश्वरीम् ॥१४॥
आप क्षरणशील दीप्त किरणों से सभी भुवनों को प्रकाशित करते-करते पारमेश्वरी विभूति धारण करके स्वयं प्रकाशित हो रहे हैं॥१४॥
एवं स्तुतः स देवेशस्तुष्टः प्रोवाच तं हरम्।
ज्ञानमैश्वर्यमोक्षौ च क्षराक्षरविकल्पना ॥१५॥
८६ श्रीसाम्बपुराणम्
महत्त्वं सूक्ष्मता चैव सर्वभूतेष्ववस्थितिः।
सर्वं तत्तुल्यमस्माकमहं यत् स भवानपि ॥१६॥
इस प्रकार स्तुत होकर परितुष्ट देवेश सूर्य ने दिण्डीरूपी हर से कहा—ज्ञान, ऐश्वर्य, मोक्ष, क्षर-अक्षर विकल्पना, महत्त्व, सूक्ष्मता, सर्व प्राणियों में अवस्थिति, जो कुछ मेरा है, वह तुम्हारा हो जाय। मैं जैसा हूँ, वैसे ही तुम भी हो जाओ॥१५-१६॥
ब्राह्मी माहेश्वरी चैव वैष्णवी चैव या तनुः।
एकः स पुरुषो भूत्वा कारणादुद्बहा स्थितिः ॥१७॥
एतज्ज्ञात्वा महाज्ञानं ज्ञात्वा मामात्मनस्तनुम्।
अत्रैव देव! तिष्ठ त्वं विमुक्तो ब्रह्महत्यया ॥१८॥
अविमुक्त इहागत्य मुक्तस्त्वं पाप्मना यथा।
अविमुक्तं तथा नाम्ना क्षेत्रमेतद् भविष्यति ॥१९॥
ये क्रोशपरिमाणे तु ह्यस्मिन् क्षेत्रे नराः स्थिताः।
आवयोः प्रणमस्यन्ति ते भविष्यन्त्यकल्मषाः ॥२०॥
ब्राह्मी, माहेश्वरी तथा वैष्णवी जो तनु है, वह एक ही कारण से उद्भूत होकर स्थिति-विधान करती है। हे देव! यह महाज्ञान-लाभ करके मेरे तथा अपने तनु को एक जानकर ब्रह्महत्या से मुक्त होकर तुम यहाँ अवस्थान करो। अविमुक्त अवस्था में यहाँ आकर तुम पाप से मुक्त हो गये हो, अतएव यह क्षेत्र अविमुक्त कहा जायेगा। इस क्षेत्र के क्रोशपरिणाम में जो लोग हम दोनों को प्रणाम करेंगे, वे अकल्मष तथा पापरहित हो जायेंगे॥१७-२०॥
पठन् शृण्वंस्तथा चेमं पुण्यं संवादमावयोः।
किल्विषाच्च विमुच्येते मुच्यते च महाभयात् ॥२१॥
चक्षुपीडा मनःपीडा ग्रहपीडा तथैव च।
शमयेदेकजप्येन दुःस्वप्नं शमयेत्तथा ॥२२॥
इति श्रीशाम्बपुराणे माहेश्वरस्तोत्रं नाम सप्तदशोऽध्यायः
हमारे इस पुण्यमय संवाद को जो पढ़ेंगे अथवा सुनेंगे, वे पाप से मुक्त होंगे तथा महान् भय से भी मुक्त होंगे। नेत्रपीडा, मनःपीडा तथा ग्रहपीडा का इस स्तुति के एक बार जप से ही शमन हो जायेगा तथा दुःस्वप्न नष्ट होंगे॥२१-२२॥
श्री साम्बपुराण का माहेश्वर स्तुति नामक सप्तदश अध्याय समाप्त
अष्टादशोऽध्यायः
(देवताख्यापनम्)
नारद उवाच
अतो व्योमं प्रवक्ष्यामि यत्रोत्पन्नं यथा च यत्।
अण्डैः हिरण्यगर्भस्य यदल्पं गर्भसंज्ञितम् ॥१॥
तत्रोत्पन्नमिदं व्योम कपाले द्योमहीमये।
अथोल्बणः काञ्चनमयश्चतुरस्रोऽङ्घ्रितो महान् ॥२॥
उत्पन्नः स चतुःशृङ्गो मेरुर्देवतसंश्रयः।
दिक्पद्मपत्रा पृथिवी मेरुस्तस्याश्च कर्णिका ॥३॥
नारद कहते हैं—अब व्योम (आकाश) की कथा कहूँगा। इसकी उत्पत्ति जहाँ से जिस प्रकार से होती है, अब उसे कहूँगा। हिरण्यगर्भ के अण्डसमूह द्वारा अथवा अल्प गर्भ नामक स्थान से यह व्योम उत्पन्न हुआ है। स्वर्ग तथा पृथ्वी इसके दो हिस्से हैं (जैसे घड़े के दो हिस्से (कपाल) होते हैं, उसी प्रकार)। तदनन्तर अति उज्ज्वल स्वर्णमय महान् चतुरस्र चरणों से उत्पन्न हुआ। यह है—चार शृङ्गयुक्त मेरु अथवा देवगण का आश्रयस्थल। इसकी सभी दिशायें पद्मपत्रतुल्य हैं, पृथिवी तथा मेरु उसकी कर्णिका हैं॥१-३॥
युगाक्षकोटिविन्यस्तं तत्र कृत्वा रथं रविः।
सर्वैर्देवैः परिवृतस्तस्य याति प्रदक्षिणम् ॥४॥
वहाँ रवि युगाक्षकोटि विन्यस्त रथ का निर्माण करके देवगण के साथ परिवृत होकर उस पर्वत की प्रदक्षिणा करते हैं॥४॥
तस्मिन् मेरौ त्रयस्त्रिंशद् वसन्ते याज्ञिकाः सुराः।
रुद्रा एकादश ज्ञेया आदित्या द्वादशैव तु ॥५॥
तथैव वसवो ह्यष्टावश्विनौ चैव याज्ञिकौ।
वसून् वदन्ति हि पितॄन् रुद्रस्त्वेव पितामहान् ॥६॥
प्रपितामहाश्च आदित्यानाश्विनावात्मनस्तनुम्।
पितॄन् भूयः प्रवक्ष्यामि ऋतुसंवत्सरार्तवान् ॥७॥
उस मेरु पर ३३ याज्ञिक देवता वास करते हैं। ११ रुद्र, १२ आदित्य, आठ वसु एवं अश्विनीकुमारद्वय वहाँ यज्ञिक हैं। सब मिलाकर ३३ होते हैं पितृपुरुष। रुद्रगण के पितामह हैं, आदित्य गण के प्रपितामह हैं तथा अश्विनीकुमारद्वय को निज-तनु कहा गया है। अब पितृगण, ऋतु, संवत्सर तथा ऋतुजात द्रव्यादि का प्रसङ्ग कहा जायेगा॥५-७॥
८८
श्रीसाम्बपुराणम्
अतो यज्ञभुजामेषां पृथङ्नामानि मे शृणु।
अजैकपादहिर्बुध्न्यस्त्वष्टा रुद्रश्च वीर्यवान् ॥८॥
हरश्चैवाथ शर्वश्च त्र्यम्बकश्चापराजितः।
वृषाकपिश्च शम्भुश्च कपर्दी रैवतस्तथा ॥९॥
ईश्वरो भुवनस्येति रुद्रा एकादश स्मृताः।
अब यज्ञभुक् (जो यज्ञ का भाग लेते हैं) देवता का नाम मुझसे सुनो—अज, एकपात्, अहिर्बुध्न्य (स्रष्टा तथा वीर्यवान्), रुद्र, हर, शर्व (अपराजित), त्र्यम्बक, वृषाकपि, शम्भु, कपर्दी, रैवत। ये ११ रुद्र भुवन के ईश्वर कहे गये हैं॥८-९॥
आदित्यानां तु नामानि विष्णुः शक्रश्च वीर्यवान् ॥१०॥
अर्यमा चैव धाता च मित्रोऽथ वरुणस्तथा।
विवस्वान् सविता चैव पूषा त्वष्टा तथैव च ॥११॥
अंशुर्भर्गश्चातितेजा आदित्या द्वादश स्मृताः।
धरो ध्रुवश्च सोमश्च आपश्चैवानिलोऽनलः ॥१२॥
प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्त्तिताः।
नासत्यश्चैव दस्रश्च स्मृतौ द्वावश्विनावपि।
आदित्यगण के नाम हैं—विष्णु, वीर्यवान्, शक्र, अर्यमा, धाता, मित्र, वरुण, विवस्वान्, सविता, पूषा, त्वष्टा, अंशु तथा भग। ये सभी अति तेजस्वी द्वादश आदित्य कहे गये हैं। अब अष्टवसु का नाम सुनो—धर, ध्रुव, सोम, आप, अनिल, अनल, प्रत्यूष एवं प्रभात। नासत्य तथा दस्र—ये दो अश्विनीकुमार हैं॥१०-१२॥
विश्वेदेवान् प्रवक्ष्यामि नामभिस्तान्निबोध मे ॥१३॥
क्रतुर्दक्षो वसुः सत्यः कालः कामो धुरिस्तथा।
लोचनश्चार्दवश्चैव पुरुरव इमे दश ॥१४॥
अब विश्वेदेव का नाम कहता हूँ, मुझसे सुनो। ऋतु, दक्ष, वसु, सत्य, काल, काम, धुरि, लोचन, आर्द्रव तथा पुरुरव—ये दस विश्वेदेव कहे गये हैं॥१३-१४॥
वर्त्तमाना इमे देवाः शृणु मन्वन्तरे भवान्।
याम्यश्च तुषिताश्चैव तथैव वशवर्तिनः ॥१५॥
सत्याश्च भूतरजसः साध्याश्च तदनन्तरम्।
उक्तमन्वन्तरेष्वेव देवा द्वादश द्वादश ॥१६॥
पारावतास्तथा त्वन्ये साध्याश्च तुषितैः सह।
साध्यान् देवान् प्रवक्ष्यामि नामभिस्तान् निबोध मे ॥१७॥