१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
की। सारे शहर में डोंडी पीटी गई कि सरदार बख्त खान को सरसेनापति के पद पर नियुक्त किया गया है। तलवार, एक पदक और सेनापति का पद उन्हें अर्पण कर उनका सम्मान किया गया। राजपुत्र मिर्जामुगल को सेनापति पद दिया गया। उसने बादशाह को सूचित किया कि-'शहर में लूटपाट या रक्तपात करते हुए प्रत्यक्ष राजपुत्र भी दिखाई दिया तो तत्काल उसके कान-नाक काटने में मैं आगे-पीछे नहीं देखूंगा। बादशाह ने उत्तर दिया, 'आपको सारे अधिकार दे दिए गए हैं, जरा भी ढील न देते हुए आपको जो उचित लगे वह करो।' शहर कोतवाल को डांटा गया कि उसकी ढिलाई के कारण यदि गांव में लूटपाट या दंगा हुआ तो उसे भी फांसी दे दी जाएगी। बख्त खाने ने कहा कि वह अपने साथ चार पैदल टुकड़ियां, सात सौ घुड़सवार, घोड़ों पर चढ़ी छह तोपें, तीन जमीनी तोपें आदि लश्करी सामग्री लाया है। उसके साथ के सिपाहियों को छह माह का वेतन पहले ही दे दिया गया है और अभी उसके पास चार लाख रूपयों की नगदी होने से सिपाहियों के वेतन या पैसों की आवश्यकता के लिए बादशाह चिंता न करें-ऐसा भी बख्त खान ने कहा। इतना ही नहीं, जो कुछ पैसा लड़ाई में उसके हाथ आएगा वह भी बादशाह के खजाने में तुरंत भरा जाएगा। उसके बाद बादशाह ने चार हजार रूपए मूल्य की मेवा-मिठाई सारी सेना में बांटी। आगरा के सिपाही, नसीराबाद और जालंधर की पलटनें-इन सबपर सरसेनापति बख्त खान का अधिकार था। शहर के हर आदमी को शस्त्र धारण करना पड़ेगा, ऐसा पहला आदेश उसने सरसेनापति के नाते से जारी किया। हर गृहस्थ और दुकानदार भी शस्त्र रखे। जिसके पास शस्त्र न होगा वह वरिष्ठ थाने में जाकर पूछताछ करे तो उसे तत्काल शस्त्र रखे। जिसके पास शस्त्र न होगा वह वरिष्ठ थाने में जाकर पूछताछ करे तो उसे तत्काल शस्त्र दिया जाएगा। पर कोई भी बिना हथियार न रहे। कोई सिपाही लूटपाट करता दिखे तो तुरंत उसका हाथ काट दिया जाएगा। बख्त खान शस्त्रागार में गया और उसने निरीक्षण कर शस्त्रों और गोला-बारूद निर्माण को गति दी। रात आठ बजे और अहमद कुली खान के साथ राज्य के हालचाल पर चर्चा की। 3 जुलाई के दिन सामान्य परेड के संचलन के समय लगभग बीस हजार सिपाही उपस्थित थे।''¹¹² बख्त खान के आगमन के कारण दिल्ली के क्रांतिकारी पक्ष को जब उसने कुछ संगठनात्मक रूप देना प्रारंभ किया-उसी समय दूसरी ओर अंग्रेजी पक्ष को भी पंजाब और अन्य हिस्सों से भी उत्साही और साहसी नई कुमुक मिल रही थी। पंजाब से हाल ही में पहुंचे ब्रिगेडियर जनरल चेंबरलेन की शूरता, उत्साह और कल्पनाशील में बराबरी कर सकें, ऐसे बहुत ही कम आदमी अंग्रेज सरकार के पास थे। प्रख्यात लश्करी इंजीनियर बेअर्ड स्मिथ भी उनसे आ मिला। सिखों से कुछ ही समय पूर्व हुई लड़ाई में जिन्होंने 1857 का स्वातंत्र्य समर - 246 ¹¹² मेटकॉफ कृत-'नेटिव नैरेटिव्स', पृष्ठ 60 ।
नाम कमाया था ऐसे सारे जॉन लॉरेंस ने दिल्ली में अंग्रेजों की सहायता के लिए भेज दिए थे। सेनापति बर्नार्ड ने पहले कई बार दिल्ली पर हमला करने की बात सोची थी, पर उसे पूरा नहीं किया गया था। अब नई कुमुक मिल जाने से उसने दिल्ली पर सीधे और साहसी आक्रमण करने का निश्चय किया। पहले जैसी ही इस हमले की सारी योजना बनाई गई और 3 जुलाई को हमले की तैयारी के साथ अंग्रेजी सेना कूच कर गई। पर यह क्या? किसी ने यह समाचार दिया कि सरसेनापति बख्त खान ने अंग्रेजों के दिल्ली पर चढ़ाई करने का श्रम बचा दिया! क्योंकि वह स्वयं ही उनपर हमला करने आ रहा है। तारीख 4 जुलाई को बख्त खान फिर चढ़ आया और उसने अंग्रेजों को अलीपुर तक पीछे ढकेला। दिल्ली गए, दिल्ली शहर पर केवल नजर फेंकी, दृष्टि पड़ी कि उसे सहज ही हमने जीता, ऐसी गर्वोक्तियां दिल्ली को घेरने के पहले जो अंग्रेज करते थे वे पंजाब से नई प्रबल पलटनें आने के बाद भी-पूरे एक माह में एक कदम भी-आगे नहीं बढ़ा पाए। यह देखकर भावना प्रधान सेनापति बर्नार्ड को अति दुःख और शर्म लगती। अंग्रेज दिल्ली जीतने को जितने आतुर थे उससे भी अधिक उनका आत्मविश्वास उसे सहज ही जीतने का था। वह ऐसा आत्मविश्वास था कि मुंबई, कलकत्ता और मद्रास तक दिल्ली जीत लेने का समाचार फैल गयां और जब अंग्रेजों को बार-बार यह दिखाई दिया कि ये समाचार निराधार हैं तब सारे हिंदुस्थान के लोग एक-दूसरे से पूछने लगे- "दिल्ली में अंग्रेजी सेना कर क्या रही है?" यही चिंता और शर्म बर्नार्ड के मन में बस गई थी और पहले की इस अंधकारमय परिस्थिति से कुछ भिन्ना हो सकेगा, उस समय ऐसा उसे नहीं लगता था। उलटे भावी समय का विचार करते हुए उसे वह अधिक अंधियारा ही लगता। सिपाहियों के लगातार होनेवाले हमलों के कारण उसे रत्ती भर विश्राम नहीं मिलता था। इतना ही नहीं, क्रांतिकारियों की उस राजधानी पर सीधा और साहसी हमला करने की उसकी महत्त्वाकांक्षा उगते हर नए दिन धुलती जा रही है, उसे ऐसा दिखता था। अंत में शरीर से थका, मानसिक चिंता से ग्रस्त और निराशा में डूबा हुआ अंग्रेज सेनापति बर्नार्ड 5 जुलाई को हैजे की महामारी की बलि चढ़ गया। इस समाचार से अंग्रेजी छावनी की सेना पर जैसे दुःख का पहाड़ ही टूट पड़ा। दिल्ली में प्रवेश करने का प्रयास करनेवाला यह दूसरा अंग्रेज सेनापति दिल्ली में तो नहीं, कब्र में प्रवेश करने में सफल हुआ। उसके बाद सेनापति रीड ने सेना के अधिकार सूत्र अपने हाथ लिये और वह अंग्रेजी सेना का तीसरा सेनापति हो गया। अंग्रेजी छावनी में हमला करने की जब योजनाएं बन रही थीं, दिल्ली के नागरिकों तब प्रत्यक्ष कृति कर रहे थे। स्थानाभाव के कारण उन सबका वर्णन यहां नहीं कर सकते। ऐसा होते हुए भी 9 जुलाई और फिर से 14 जुलाई के दिन जिस दृढ़ता से 1857 का स्वातंत्र्य समर - 247
क्रांतिकारी लड़े और अंग्रेजों की तरह ही क्रांतिकारियों ने शूरता का कमाल दिखाया–वे अवसर महत्त्वपूर्ण और स्फूर्तिदायक होने से उन्हें छोड़ा नहीं जा सकता। पहले दिन अंग्रेजी घुड़सवार को हराकर उन्हें भगा दिया गया। अंग्रेजी तोपखाना बंद कर दिया गया। एक शूर सिपाही ने हिल और उसके घोड़े दोनों को ही मार गिराया। हिल ने मरते–मरते अपनी तलवार निकाली, तभी तीन सिपाही उसपर झपट पड़े। हिल ने दो बार गोली दागने का असफल प्रयास किया। एक सिपाही अपनी तलवार निकालने में सफल हुआ। दोनों की लड़ाई हुई, दोनों नीचे गिरे। हिल भूमि पर सीधी गिरा और उसके सीने पर एक पैर रखकर हाथ में तलवार लिये एक सिपाही खड़ा था। मेजर टॉब्स ने तीस फीट दूर से यह दृश्य देखा और उसने निशाना साधकर सिपाही पर गोली चलाई और उसे मार डाला। मेजर टॉब्स ने हिल को भूमि पर से उठाया और वह उसे हिलाने लगा था। उसी समय दूसरा सिपाही हिल की पिस्तौल हाथ में लेकर उसपर हमला करने चला आ रहा है, यह देखकर वह आश्चर्यचकित हो गया। उस सिपाही ने दो–तीन अंग्रेजों से अकेले ही लड़ते हुए एक को तलवार से घायल कर दिया, दूसरे को मार डाला और तीसरे की तलवार से वह स्वयं ही बलि हो गया। टॉब्स और हिल को उनके द्वारा दिखाई गई शूरता के लिए 'विक्टोरिया क्रॉस' दिए गए और सर जॉन के कहता है कि उस बहादुर सिपाही को भी 'बहादुर शाह क्रॉस' मिलना चाहिए था। उस स्वतंत्रता संग्राम में शहीद हुए, हुतात्मा हुए कितने ही वीर 'बहादुर शाह चक्र प्रत्यक्ष मृत्यु देवता की ओर से मिलने का सौभाग्य उन्हें मिलता है, यह बात सत्य थी! उस दिन अंग्रेजी सिपाहियों का अपमान भरा पराभाव हुआ, पर इसका प्रतिशोध क्रांतिकारियों से ले न सकने के कारण वे शूर अंग्रेज अपनी छावनी में लौट गए और वह प्रतिशोध अपनी सेवा कर रहे निरपराध भिश्तियों और अन्य भारतीय लोगों को मार उनके टुकड़े–टुकड़े करके रक्त कुंड में डाल लिया। 113 सच में देखा जाए तो इन्हीं भिश्तियों और अन्य भारतीय लोगों ने अंग्रेजी सेना को उसकी उत्तम सेवा–चाकरी कर लड़ने की स्थिति में बनाए रखा था। पर 14 जुलाई के आक्रमण में इससे बुरी स्थिति हुई। क्योंकि इसी दिन शूर चेंबरलेन को एक सिपाही 1857 का स्वातंत्र्य समर – 248 113 “बताया जाता है कि सामने शत्रुओं के न होने पर कतिपय गोरे सिपाहियों ने उन निरीह, निरपराध कर्मचारियों और नौकरों तथा अन्य लोगों की ही हत्याएं कर डालीं, जो ईसाई श्मशान के समीप भयभीत होकर एकत्रित हो रहे थे। कितनी भी निष्ठा कोई प्रदर्शित करे, उसका जी भरकर ढिंढोरा पीटे, कष्ट उठाए, पूरब की मैली वरदी पहने प्रत्येक व्यक्ति से गोरे जो द्वेष रखते हैं, वह तो कदापि कम नहीं होगा।” –के एवं मैलसन कृत–‘इंडियन म्यूटिनी’, खंड 2, पृष्ठ 438
ने गोली चलाकर मार डाला। चेंबरलेन की मृत्यु के कारण हुई राष्ट्रीय हानि एवं दुःख का वर्णन अंग्रेज इतिहासकार इन शब्दों में करते हैं-"हमारे पक्ष का श्रेष्ठ योद्धा, कीर्ति से पहला और सम्मान में प्रथम! चेंबरलेन का शव जिस हमारे शिविर में फिर से लाया गया वह हमारे इतिहास का एक अति दुःखदायी दिन था।" इस तरह 15 जुलाई बीत गई, फिर भी दिल्ली के प्रासाद-शिखर अपने मस्तकों पर सूर्य किरण-से चमचमाते ध्वज, पताका, झंडियां खड़े कर विश्व को चिल्लाकर कह रहे थे कि दिल्ली शहर दे रही थी, इसलिए स्वयं रीड ने इस्तीफा दिया, अधिकार-त्याग किया और हिमालय की टेकरियों में जाकर वहां रहने लगा। अंग्रेजी सेना का यह तीसरा सेनापति था। दो को भूमि में गाड़ा गया और तीसरे ने अपना अधिकार छोड़कर अपने प्राण बचाए। इतना हुआ तब भी दिल्ली अजित ही बनी रही। क्वार्टर मास्टर जनरल बेचर एवं अॅडज्यूटंट जनरल चेंबरलेन अपने शिविर में ही पड़े मृत्यु के पल गिन रहे थे तब भी दिल्ली जीत न सके। इतना ही नहीं, क्रांतिकारियों की ओर से होनेवाले निरंतर और त्रासदायक हमलों से कैसे बचा जाए, यह प्रश्न अंग्रेजों को सता रहा था; क्योंकि क्रांतिकारियों की संख्या इस समय 20 हजार तक हो गई थी। क्रांतिकारियों द्वारा किए जानेवाले हर हमले में उनका काफी मनुष्य-बल खर्च हो जाता था, फिर भी उसका अंग्रेजों को कोई लाभ नहीं था। पर उनके मुट्ठी भर सैनिक मर जाने से अंग्रेजों का संख्या-बल घटता जा रहा था। इसलिए अंग्रेजों ने अब सुरक्षात्मक नीति अपनाई। आक्रमण में होनेवाली मृत्यु से क्रांतिकारियों की शक्ति विशेष दुर्बल नहीं होती थी और उनके आक्रमणों में भी बाधा नहीं आती थी, उलटे वे अधिक निश्चयी और निर्भय होकर अभिमानपूर्वक कहने लगे कि "अंग्रेजों की विजय का मूल्य पराभव जितना ही है।" सारे हिंदुस्थान में फैले हुए अंग्रेज भी टीका करने लगे, शिकायतें करने लगे और स्पष्टता से लिखने लगे- "घेरा डालनेवाले ही घेरे में फंस गए हैं।" और ऐसी स्थिति में जब तीसरा सेनापति निवृत्त हुआ तब ग्रेट हेड, चेंबरलेन और रॉटन जैसे रणवीरों को दिल्ली पर हमला करने की आशा छोड़ देनी पड़ी। प्रत्यक्ष मुख्यालय में, मुख्य छावनी में ही त्यागपत्र दिया और उसके स्थान पर चौथा सेनापति ब्रिगेडियर जनरल विल्सन आया, तब दिल्ली में अंग्रेजों की ऐसी करूणास्पद स्थिति हो गई थी। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 249
प्रकरण-2 हैवलॉक जब सिख सिपाहियों ने इलाहाबाद का किला क्रांतिकारियों को न सौंपकर अंग्रेजों को दे दिया, तभी से अंग्रेजों ने उसे अपनी कार्यवाही का मुख्य शिविर बनाया। उत्तर हिंदुस्थान की मुलुकी और लश्करी कार्यवाहियां कलकत्ता जैसे दूरस्थ केंद्र से करनी पड़ती थीं और उसमें धोखा था, जो इस नए केंद्र के कारण नहीं रहा। विद्रोह का शमन होने तक राजधानी इलाहाबाद में ही रखने का निर्णय लॉर्ड केनिंग ने किया और कुछ ही दिनों में वह स्वयं इलाहाबाद रहने के लिए चला आया। परंतु तभी कानपुर के अंग्रेजों की भागम-भाग के समाचार और उनके द्वारा सहायता के लिए मचाई गई चिल्लपों सुनाई देने लगी, इसलिए जनरल नील ने इलाहाबाद की सुरक्षा के लिए थोड़ी सी सेना रखकर शेष सारी सेना को मेजर रेनॉल्ड के नेतृत्व में कानपुर का घेरा तोड़ने के लिए भेज दिया। यह सेना रास्ते के गांवों में मन मरजी आग लगाते बढ़ी। उस समय कानपुर की अंग्रेजी सेना के सेनापति पद पर नील के स्थान पर हैवलॉक की नियुक्ति हुई। वह जून के अंत में इलाहाबाद आया। वह सैनिक कार्यवाहियों में पारंगत और अनुभवी अधिकारी था। अंग्रेजों के सौभाग्य से इधर विद्रोह के प्रत्यक्ष फूट पडत्रने के समय अंग्रेजों का ईरान से चल रहा युद्ध समाप्त हो गया और उस अभियान में लगी सारी यूरोपियन सेना हैवलॉक जैसे सेनानी सहित हिंदुस्थान में ऐन आपात स्थिति में आ पहुंची। हैवलॉक के इलाहाबाद में मुख्य अधिकारी होकर आ जाने से उसके अधीन काम करना पड़ेगा, यह देखकर नील के मन में यद्यपि बड़ा मत्सर जागा, फिर भी उसने सार्वजनिक कर्तव्य में 1857 का स्वातंत्र्य समर — 250
मत्सर या खेद के कारण कोई ढिलाई नहीं आने दी। हैवलॉक के साथ जानेवाली सेना की उसने स्वयं की सेना जैसी ही उत्तम व्यवस्था की। उसे दाने-चारे की सहायता की और हैवलॉक के आते ही अपना चार्ज उसको बिना किसी विवाद के सौंप दिया। इस सेना के कानपुर के अंग्रेजों की सहायता के लिए जाने की तैयारी होने पर हैवलॉक बड़े उत्साह से उधर जाने को था कि उसे समाचार मिला कि कानपुर में सर हो व्हीलर ने पराजित होकर विद्रोहियों के सामने समर्पण कर दिया और उसके सहित अंग्रेज पुरूषों का गंगा किनारे भयानक कत्ल हो गया। जीवित अवस्था में जिसे सुरक्षा प्रदान करना असंभव हुआ अब उसकी मृत्यु का निष्ठुर प्रतिशोध लेना ही होगा, ऐसी प्रबल इच्छा से हैवलॉक इलाहाबाद से कानपुर की ओर तेजी से निकला। उसके चुने हुए एक हजार यूरोपियन पैदल, सौ-डेढ़ सौ सिख, यूरोपियन घुड़सवारों की छोटी सी एक टुकड़ी और छह तोपें-इतनी सेना क्रोधित हो जान की बाजी लगाने निकली थी-नए अधिकारियों और सिपाहियों को उस प्रदेश की जानकारी देने के लिए, लड़ाई में स्वयं लड़ने के लिए और लड़ाई के बाद क्रूर प्रतिशोध लेने के लिए। विद्रोही सिपाहियों की रेजिमेंट में से या विद्रोही नागरिकों द्वारा दया भाव से जान-बूझकर जीवित छोड़े या लापरवाही से जीवित छूटे हुए कितने ही लश्करी और मुलुकी अधिकारी उस सेना के साथ चल रहे थे। जो अकेले-अकेले हाथ पड़ते तो एक शब्द के साथ ही विद्रोहियों द्वारा जला दिए जाते, वे ही अंग्रेज लोग आज फिर से इकट्ठे होते ही, उनके कारण गांव-के-गांव राख होने लगे। रीड के अधीन एक टुकड़ी फतेहपुर की ओर आ रही है, यह समाचार करनपुर पहुंचते ही नाना साहब ने विद्रोहियों में से बहुत सी सेना उधर भेज दी। ज्वाला प्रसाद, टीका सिंह और इलाहाबाद के मौलवी के नेतृत्व में रीड में मुट्ठी भर अंग्रेजों का पहले ही प्रहार में चित करके विजयश्री के साथ तुरंत ही कानपुर लौट आएंगे, इस उत्साह से निकली विद्रोहियों की सेना फतेहपुर के पास आ पहुंची। उसी समय अचानक रीड की टुकड़ी से हैवलॉक की सेना आ मिली। और इस सम्मिलित अंग्रेजी सेना ने विद्रोहियों की सेना आ गई-यह सुनते ही अपनी तोपों को बत्ती दी। यह लड़ाई 12 जुलाई को हुई। रीड की टुकड़ी को बात-की-बात में नष्ट कर देंगे, इस विश्वास से विद्रोहियों द्वारा अंग्रेजी सेना पर हमला करते ही मुट्ठी भर लोगों के स्थान पर तोपखाने के साथ सर्वांगपूर्ण हैवलॉक की गोरी सेना रणांगण में कूद आई। यह धोखा एकाएक सामने आ जाने से विद्रोहियों में दहशत बैठ गई और वे अपनी तोपें रणांगण में छोड़कर भागने लगे। उनका पीछा करना संभव न होने से उन्हें छोड़ अंग्रेजी सेना फतेहपुर शहर में घुस गई। इस फतेहपुर शहर ने जब विद्रोह किया था तब वहां की अगुवाई अंग्रेज सरकार के नौकर, डिप्टी मजिस्ट्रेट के पद पर आसीन हिकमतुल्ला नामक एक मुसलमान ने की थी। और इस शहर में यूरोपियन अधिकारियों का रक्त भी विद्रोही नागरिकों की तलवारों ने पिया था। उस रक्तप्रिय शहर पर अब प्रतिशोध की तलवार आ पड़ी। विद्रोह होने पर लोगों 1857 का स्वातंत्र्य समर - 251
को न मारते हुए छोड़ दिया गया। उस शहर कापूर्व मजिस्ट्रेट शेररे उस विजयी सेना के साथ आया था और बहुत दिन से रुकी हुई अपनी मजिस्ट्रेटरी चलाने को वह अब उत्सुक था। इसलिए पहले लश्कर को शहर लूटने का आदेश दिया गया और जब उस शहर में लूटने के लिए कुछ भी शेष न रहा तब उस शहर को आग लगा देने का दूसरा आदेश हुआ। परंतु इस आदेश के पालन का सम्मान कवेल सिख सिपाहियों को ही दिए जाने के कारण गोरी सेना के फतेहपुर से निकलते ही सिखों ने उन्हें सौंपी गई खास कार्यवाही सपंन्न करते हुए उस शहर को आग लगा दी और फिर वे मुख्य सेना से जाकर मिल गए। फतेहपुर शहर को जब अंग्रेजी सेना जीवित जला रही थी तब उसकी ज्वालाओं की पलटें फैलते-फैलते जल्दी ही कानपुर को गरमी देने लगीं। मेजर रीड की टुकड़ी को मारने के लिए अपनी सेना टूटी तभी मेजर हैवलॉक की सेना ने अकस्मात् हमला कर उन्हें भगा दिया। फतेहपुर शहर में अंग्रेजी सेना ने प्रवेश किया और वहां की संपत्ति लूटकर आदमियों को आग में भस्म कर डाला-ये समाचार नाना के दरबार खौलने लगा। कानपुर पर आक्रमण करने आ रहे अंग्रेजों को पांडु नदी पर ही रोक लेने के लिए नाना साहब के अधीन एक सेना भेजने को नाना का दरबार उठा तो अंग्रेजों की ओर गए हुए कुछ दगाबाज जासूस पकड़े जाने का समाचार आया। इन दगाबाज जासूसों की जांच में यह सिद्ध हो गया कि उनमें से कुछ को नाना की कैद में रह रह गोरी महिलाओं ने इलाहाबाद के अंग्रेजों को विश्वासघाती पत्र लिखे हैं।114 सिपाहियों के कत्लेआम से जिनका अबला कहकर नाना ने बचाव किया उनकी इन गुप्त कार्यवाहियों का डंका पिट जाने पर इन कुटिल गोरी स्त्रियों का क्या किया जाए, यह महत्त्वपूर्ण प्रश्न उपस्थित हुआ। फतेहगढ़ अंग्रेजों ने जलाया वैसे ही यह बीबीगढ़ भी हम क्यों न जलाएं? उस दिन की खास बैठक में टीका सिंह ने कहा-“ये महिलाएं कानपुर के बीबीगढ़ में ऐसे ही रहीं तो अपनी पराजय होने पर कानपुर शहर को अंग्रेज राख तो करेंगे ही, पर उनके कथन के आधार पर हजारों लोग अंग्रेजों के द्वेष की बलि चढ़ेंगे, इसलिए मेरे विचार से कानपुर से अंग्रेज भिड़ें, इसके पूर्व ही यहां की आंतरिक जानकारी देने को एक भी गोरी चमड़ी शेष न रहे।115 बीबीगढ़ में जो महिलाएं थीं उनमें से कितनी ही कानपुर में दस-दस वर्ष से रह रही थी। अंग्रेजों के विरुद्ध जो लड़े उनमें से बहुतेरे नागरिकों को वे नाम-पते सहित 1857 का स्वातंत्र्य समर - 252 114 1 ''फतेहपुर में क्रांतिकारी सेना की पराजय के उपरांत कतिपय प्रसिद्ध गुप्तचरों को नाना साहब के समक्ष उपस्थित किया गया। बंदीगृह में पड़ी कुछ असहाय महिलाओं द्वारा सुदूर स्थानों को लिखें पत्रों के कतिपय इन गुप्तचरों के पास होने का आरोप लगाया था। उन पत्रों में कतिपय महाराजाओं तथा नगर के 'बाबू' लोगों का हाथ होने की आशंका व्यक्त की गई थी। तभी यह निश्चय किया गया कि उन गुप्तचरों तथा उन अंग्रेज पुरूषों तथा महिलाओं का भी वध कर दिया जाए, जिन्हें प्राणदान दे दिया गया था।'' 115 2 Forrest's Introduction में फॉरेस्ट कहता है-''आगे साक्ष्य न मिले, इसलिए कत्लेआम का आग्रह-पहला प्रस्ताव टीका सिंह ने किया। ''
जानती थीं। अतः उनके अस्तित्व का विष भरा पात्र भंग न किया तो वह कानपुर को जीवन को हानि किए बिना चुकेगा नहीं, ऐसा इस सभा में सबका विचार बना। उस कैदखाने को बीबीगढ़ कहा जाता था, पर उसमें नाना के आदेश से बचे हुए कुछ पुरुष भी थे। उन सबको उनके विश्वासघाती पत्र ले जानेवाले जासूसों सहित मार डाला जाए, ऐसा सर्वसम्मत निश्चय कर उसे घोर रात क यह घोरतम सभा विसर्जित हुई। दूसरे दिन उन जासूसों और कैद में पड़े गोरे पुरुषों को बाहर खींचा गया। एक कतार में वे खड़े रहे और स्वयं नाना साहब के सामने पहले उन जासूसों के सिर सटासट उड़ाए गए और बाद में कैद के गोरे पुरुषों को आगे लाकर गोली से मार डाला गया। नाना साहब के वहां से उठते ही उन गोरे लोगों के शवों के पास आकर लोग मजाक करने लगे, "देखो, यह मद्रास का गवर्नर, यह बंबई का, यह बंगाल का ˙' ऐसा मजाक इधर चल रहा था और उधर बीबीगढ़ के पहरेदार सिपाहियों को अंदर घुसकर कत्ल करने का आदेश हुआ। पहरेदार ऐसा कत्लेआम करने का साहस न जुटा सके। तब ऐसे सिपाहियों से अधिक योग्यता का आदमी चाहिए, यह देखकर उस बीबीगढ़ की मुख्य अधिकारी बेगम साहब ने कानपुर शहर की खटीक बस्ती में वह आदेश भिजवाया। थोड़ी देर में हाथों में नंगी तलवारें और तेज छुरियां लेकर खटीक लोग उस बीबीगढ़ में शाम के समय अंदर घुसे और काफी रात गए बाहर आए। उनके उस घुसने और निकलने के बीच गोरे रक्त का लाल-लाल समुद्र फैल गया। बीबीगढ़ में घुसते ही उन्होंने हाथ की तलवार और छुरियों से कोई डेढ़ सौ गोरी महिलाएं और गोरे बच्चे काट डाले। उस जह पर रक्त की तलैया भर गई और उस रक्त में नरमांस के टुकड़े तैरने लगे। अंदर जाते समय वे खटीक जमीन पर से चलते गए और बाहर निलते समय उन्हें रक्त जल का प्रवास करना पड़ा। रात को बीबीगढ़ में अधमरों की चिल्लाहट, मरणोन्मुखी के आर्तनाद सुनाई दे रहे थे। भोर होते ही एक-दो बच्चे ऊपर आ गए और कुएं के किनारे भागने लगे। लेकिन धक्का लगकर वे भी मरे हुओं पर गिर गए। उन मरों पर मरे हुए और उनपर फिर मरे हुए। आज तक आदमी कुएं का पानी पीता था, परंतु आज कुएं ने आदमी का रक्त पीना चालू किया। फतेहगढ़ में जलते हुओं का आर्तनाद अंग्रेज आकाश में फेंक रहे थे, तभी बीबीगढ़ में रक्त से सनी गोरी चीखें पांडे पाताल में फेंक रहे थे। मनुष्य प्राणी की इन दो भिन्न जातियों में सौ वर्ष से जमा रकम का हिसाब इस तरह चुकता होने लगा।116 कानपुर का कुआं, इसे भरने का जो-जो 1857 का स्वातंत्र्य समर - 253 116 "क्रूरता की पराकाष्ठा, अवर्णनीय लज्जा आदि विशेषणों से इस पाश्व हत्याकांड का वर्णन किया गया है, किंतु ये सब तो विभ्रांत कल्पना शक्ति की मनगढ़ंत बातें ही हैं, जिनपर बिना किसी
प्रयास हुआ वह विफल हुआ। बंगाल की खाड़ी भी कालप्रवाह में भर जाएगी, पर यह कानपुर का कुआं कभी नहीं भरेगा। इसी समय पांडु नदी पर पहुंची नाना की सेना का पराभाव करते हैवलॉक आगे घुसता गया। नाना की सेना के सेनापति बाला साहब पेशवा के कंधे में गोली लगने से उनके वापस कानपुर आते ही नाना ने तुरंत एक युद्ध सभा बुलाई। लड़ाई न करके कानपुर छोड़ें या कानपुर छोड़ने के पूर्व मैदान में एक जोरदार टक्कर देकर देखें-इन दो मुद्दों पर युद्ध सभा में बहुत चर्चा होकर अंत में दूसरे रास्ते का अनुसरण करना तय हुआ। 16 जुलाई को अंग्रेजी सेना कानपुर के पास आने लगी। कानपुर के कुएं की कथा उन्हें अभी तक ज्ञात न होने से यद्यपि व्हीलर ला का किला हाथ से निकल गया, तब भी बीबीगढ़ को विद्रोहियों के कब्जे से छुड़ा लेने की जिद उन्हें धूप, श्रम और लड़ाई में भी एक क्षण विश्राम नहीं लेने रे रही थी। कानपुर शहर के शिखर दिखते ही हैवलॉक को इष्ट समय आने का उत्साह चढ़ने लगा। उसने पांडे की सेना क बारीक जांच शुरू की। कानपुर के रण पर इतनी उत्तम रीति से व्यूह रचकर खड़ी सेना को देखकर रण क्षेत्र में पूरा जीवन गुजार देनेवाले उस योद्धा को ऐसा उगने लगा कि विद्रोहियों में अपेक्षा से अधिक लश्करी चतुराई भरी हुई है। उसने अपने अधिकारी इकट्ठा किए और उन्हें हाथ की तलवार के छोर से धूल पर लश्करी आक्रमण का अपना नक्शा खींचकर बताया। विद्रोहियों पर सामने से आक्रमण करने के स्थान पर बाईं ओर पहले हमला करना चाहिए, यह हैवलॉक अपनी सेना को समझा रहा था, तभी विद्रोहियों की व्यूहबद्ध सेना में एक सफेद घोड़े पर सवार होकर श्रीमंत नाना साहब आ मिले। सिपाहियों को उत्साहित करते इस छोर से उस छोर तक नाना साहब घोड़ा दौड़ते अंग्रेजों की छावनी से स्पष्ट दिख रहे थे। दोपहर के समय अंग्रेजों का नाना के बाएं बाजू पर हमला हुआ। इस अकस्मात् और अनपेक्षित स्थान पर हुए अंग्रेजों के जोरदार हमले को रोकने के लिए विद्रोहियों की तोपें गरजने लगीं। अंग्रेजी तोपखाना आने में विलंब हो जाने के कारण विद्रोहियों का जोर बढ़ गया। परंतु विद्रोहियों की बढ़त देखकर क्रोधित हैवलॉक जब फिर से एक बार चढ़ाने करने लगा-अंग्रेजी हायलैंडर्स मुंह घुमाकर सीधे तोपों पर दौड़ गए और जब एक कदम भी पीछे न रहते मृत्यु या विजय, ऐसा पक्का निश्चय कर अंग्रेजी सेना बिजली-सी टूट पड़ी तब उस एकीकृत, अनुशासित और अनपेक्षित मार को सहन करने 117 1857 का स्वातंत्र्य समर - 254 117 - प्रकार का ध्यान दिए ही विश्वास कर लिया गया। (परिणामों की तनिक भी चिंता न की गई) बिना विचारे ही उनका प्रसार और प्रचार किया गया। किसी का अंगच्छेद न हुआ, किसी का अपमान नहीं हुआ। यह साक्षी दी है, क्योंकि उन्होंने जून और जुलाई मास में हुई हत्याओं से संबद्ध प्रत्येक बात का खोजपूर्ण अवलोकन किया था।‘' -के एवं मैलसन कृत-'इंडियन म्यूटिनी', खंड 2, पृष्ठ 281
में पूर्णतः असमर्थ हुई विद्रोहियों की सेना बाएं बाजू की तोपें छोड़ भाग खड़ी हुई। बायां बाजू इस तरह पिटते ही अंग्रेजों के पैदलों ने विद्रोहियों के दाएं बाजू को भी पराभूत कर दिया। अंग्रेजी सेना विजयी हुई, यह देखते ही विद्रोही कानपुर के रास्ते पीछे हटने लगे। परंतु अब निराशा का अवसाद भरा होने के कारण फिर से एक बार नाना ने उन्हें इकट्ठा किया और आरक्षित रखी तोपों की सहायता से फिर से युद्ध करने का प्रयास किया। इस समय नाना ने उत्साहित करने और स्वयं अगुवाई कर साहस लाने की कोशिश की, फिर भी हताश हुए सिपाही और विजय से उन्मत्त अंग्रेजी सोल्जर इन दोनों के मध्य का अंतर पाटना बहुत कठिन था। अंग्रेजों ने एक हमला और किया और निराशा से भरी टक्कर विफल हो गई और कानपुर के रण क्षेत्र में विजयश्री फेंककर विद्रोही ब्रह्मवर्त की ओर भाग खड़े हुए।118 17 जुलाई को प्रातः हैवलॉक की विजयी सेना कानपुर शहर में प्रवेश करने लगी। अस्तत होती अंग्रेजी आबरू को फिर से जीवन देनेवाली यह सफलता की पहली लहर कानपुर में लानेवाले हैवलॉक और उसकी सेना का हिंदुस्थान और इंग्लैंड में जहां-जहां भी गोरे रहते थे वहां-वहां धन्यवाद की दीवारों पर इधर-उधर हैवलॉक का नाम खुदा हुआ था। कानपुर शहर को लूटने का आदेश मिलते ही हजारों अंग्रेजी सोल्जर, अधिकारी और सिख सिपाही उस शहर पर गिद्धों जैसे टूट पड़े। बीबीगढ़ में अंग्रेजी महिलाओं का रक्त जमा देखकर उसे धोने के लिए हैवलॉक ने शहर के उन ब्राह्मणों को पकड़कर बुलाया जिनपर विद्रोह में सम्मिलित होने का शक था। उन्हें फांसी का दंड देकर फांसी पर लटकाने के पहले वह जमा हुआ रक्त जीभ से चाटने और फिर वह हिस्सा हाथ से झाडू लेकर धोने का बाध्य किया गया। जिन्हें एक क्षण के बाद मार डालना हे उनको यह अप्रतिम दंड देने का कारण देते हुए अंग्रेज अधिकारी कहते हैं, “फिरंगी रक्त का स्पर्श करना और वह भंगी के झाडू से धोना, यह बात उच्च जाति के हिंदुओं को धर्मभ्रष्ट करनेवाली है, यह मुझे मालूम है। इतना ही नहीं, यह ज्ञात है, इसीलिए मैं उनसे यह करा रहा हूं। अपने स्वधर्म में मरने का अल्प संतोष भी उन्हें न रहे, इसलिए उनकी धर्मभावनाओं को जान-बुझकर पैरों तले रौंद फिर उन्हें फांसी पर चढ़ाने के अतिरिक्त वास्तविक प्रतिशोध नहीं लिया जा सकता।” अंग्रेज लोगों की हुई आमहत्या में विद्रोहियों ने उनके धर्म संबंधी अत्याचार नहीं किए। इतना ही नहीं, जब-जब मरने के पहले अंग्रेजों ने 1857 का स्वातंत्र्य समर – 255 118 रेड पैंफलेट का प्रसिद्ध लेखक कहता है-‘‘ऐसी कानपुर की लड़ाई हुई-विद्रोहियों ने अच्छी टक्कर दी। तलवार ने तलवार भिड़ गई, फिर भी उनमें से बहुत हटे नहीं, तोपें ढंग से संभाली और उनकी गोलंदाजी भी निशाने पर थी।‘‘
बाइबिल पढ़ने की अनुमति मांगी तब-तब वह उन्हें दी गई। परंतु दिल्ली और कानपुर में मरनेवालों को स्वधर्म में मरने का संतोष भी अंग्रेजों ने नहीं दिया। फिर भी, ऐसी दुर्दशा में भी जिन्होंने मृत्यु को सिद्धांतनिष्ठा के साथ धैर्य से मुस्कुराते हुए स्वीकारा, ऐसे धीर जनों ने कानपुर की फांसी को कुछ कम अलंकृत किया था, ऐसा नहीं। चार्ल्स बॉल लिखता है-"जनरल हैवलॉक ने सर हो व्हीलर की मृत्यु का भयानक प्रतिशोध लेना प्रारंभ किया। नेटिव की टोलियों-परे-टोलियां फांसी पर चढ़ने लगी। इन विद्रोहियों में से कुछ ने मृत्यु के समय जो मानसिक अचलता और धैर्य का प्रदर्शन किया वह किसी सिद्धांतप्रियता के लिए आत्मयज्ञ करनेवालों के लिए भूषणभूत होने वाला था। कानपुर के स्वदेशी मजिस्ट्रेटों में से जिन्होंने विद्रोह में नाना की विपुल सहायता की थी और जो फिरंगियों का कट्टर द्वेषी था, ऐसे एक मजिस्ट्रेट की जांच चलने और उसे अधम, नीच जनोचित मृत्यु का दंड दिए जाने पर वह इतना निश्चित दिख रहा था मानो वह मृत्युदंड उसे न दिया जाकर दूसरे ही किसी को दिया जा रहा है। प्रशांत स्थिरता से उठ उसने जज की ओर पीठ फेरी और अपने लिए खड़ी की गई फांसी की ओर वह दृढ़ पदन्यास से चलकर गया। जल्लाद लोग फांसी की अंतिम तैयारी कर रहे थे। रत्तीभर भी कंपित हुए बिना निश्चल मुद्रा से वह जल्लादों के काम को सहज देख रहा था और जरा भी विचलित हुए बिना जैसे योगी समाधि में जाते हैं वैसे ह ीवह संतोष के साथ फांसी में घुसा। उसकी धर्मनिष्ठता से उसे मृत्यु का डर नहीं रह गया था। फिरंगियों के दुष्टापूर्ण संसर्ग से छूटकर परलोक का ध्रुव सुख देनेवाला रास्ता ही मृत्यु है-यह जिसके धर्म की निष्ठा थी उसे मृत्यु का डर कैसे स्पर्श करे।'"119 कानपुर शहर में अंग्रेजी सेना ऐसा स्वच्छंद प्रतिशोध ले रही थी-मुट्ठी भर अंग्रेज सेना और राजनिष्ठ सिख सिपाहियों ने इलाहाबाद से चलने के बाद व्यवस्था, अनुशासन, संगठन और संकल्प से भरी लश्करी शूरता प्रदर्शित की थी, उसकी यथार्थ स्तुति कर अपनी सेना को उत्साहित करने के लिए हैवलॉक ने यह लश्करी आदेश जारी किया-"सोल्जर्स, तुम्हारे सेनापति को तुम्हारे व्यवहार से संतोष हुआ है। निष्ठा और संकल्प में कुशल ऐसी दूसरी सेना उसने नहीं देखी है। 7 और 16 तारीखों के बीच जुलाई के तीखे सूरज की परवाह किए बिना तुमने एक सौ बीस मील आ क्रमण किया और चार लड़ाइयां जीती।' पर हाथ में लिया काम पूरा किए बिना झूठा संतोष मानकर चुप बैठनेवाला जनरल हैवलॉक नहीं था। समाप्ति के सिवाय समापन नहीं, यह उसकी टेक थी। उसने उपर्युक्त प्रोत्साहन देकर आगे कहा, "तुम्हारे लोग लखनऊ में संकटग्रस्त हैं। आगरे में घेरा लगा है। विद्रोही क्रांति के हाथों में दिल्ली अभी भी फंसी है। तुम्हें सफलता पानी है तो तुम्हें स्वार्थ-त्याग ही करना पड़ेगा। तीन नगर संभालने हैं, दो बंधन 1857 का स्वातंत्र्य समर - 256 119 चार्ल्स बाल कृत-'इंडियन म्यूटिनी', खंड 1, पृष्ठ 388 ।
मुक्त करने हैं। यह सब कार्य निश्चित ही पूरे करोगे, इसका तुम्हारे सेनापति को पूर्ण विश्वास है। केवल तुम उतने ही उत्साह से उसकी सहायता करो और तुम्हारी बहादुरी जितना ही तुम्हारा अनुशासन भी दृढ़ बना रहे।" हैवलॉक के पीछे-पीछे जनरल नील भी इलाहाबाद की सुरक्षा के लिए आवश्यक अंग्रेजी सेना रखकर शेष सेना के साथ कानपुर पहुंच गया। समान अधिकारवाले ये दो अधिकारी एक स्थान पर आते ही दोनों को ही सारी सेना अपने अधिकार में हो, ऐसी महत्त्वाकांक्षा उत्पन्न होने के कारण पहले ही बहुत अधिक अनुशासनहीन हुई अंग्रेजी सेना में और अधिक अनुशासनहीनता होने की आशंका है, यह देखकर हैवलॉक ने नील को साफ-साफ कहा, “जनरल नील, अब हम दोनों एक-दूसरे का साफ पहचान लें तो ठीक होगा। जब तक मैं यहां हूं, पूरा शासन मेरे अधीन रहेगा, तुम कोई भी आदेश जारी नहीं करोगे।" इस सार्वजनिक कार्य में व्यक्ति विषयक मत्सर न हो, इसलिए कानपुर को नील ने संभाला और लखनऊ को मुक्त करने के लिए सेना लेकर हैवलॉक अवध की ओर कूच कर गया । नील ने कानपुर की सुरक्षा के लिए एक नई युक्ति अपनाई, वह यह कि वहां के महारों की एक सेना तैयार कर उसके अधीन सारा शहर कर दिया। नगर की उच्च जातियों के विरूद्ध अतिशुद्रों को प्रोत्साहित करने की यह युक्ति उत्तम सिद्ध हुई। मुसलमान और हिंदुओं में फूट नहीं डाली जा सकी जब जातिभेद का नया भूत खड़ा किया गया और वह सफल भी रहा। हिंदू धर्म और हिंदू राज्य के लिए फिर एक बार जूझना होगा कानपुर में पराजित हो जाने के बाद नाना साहब पेशवा ब्रह्मवर्त से खजाना, शस्त्रास्त्र और सेना लेकर गंगा पार हो गए। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में वे क्रांतिवीर केवल स्वधर्म और स्वराज्य के लिए ही कैसे लड़ रहे थे, यह सिद्ध करने के लिए उसी समय उस प्रदेश में उस काल के युद्ध जिन्होंने अपनी आंखों से देखें, वसई महाराष्ट्र के उन्हीं वेदशास्त्र-संपन्न विष्णुभट गोडसे ने अपने यात्रावृत्त की एक पुस्तक 'माझा प्रवास' अथवा 'सन् 1857 के विद्रोह की कथा' उसी समय लिखी। वह यात्रा वर्णन चि.वि. वैद्य ने प्रकाशित की। उस पुस्तक में श्री गोडसे भटजी ने कानपुर छोड़ते समय का वर्णन बड़ी ही मार्मिक भाषा में किया है-“अंधियारा हो जाने के बाद नौकाएं सज्जित कर उनमें उपर्युक्त सामान भरने के बाद बाला साहब आदि को विदाई देने के लिए जो हजारों नागरिक गंगा तीर पर जमा थे उन सबको नौका चलने के पहले नम्रता से नमस्कार कर किंचित् भावविह्वल होकर श्रीमंत बाला साहब ने कहा कि कानपुर में जब हम हारे उस समय तात्या तोपें, जलका रामभाऊ और लालपुरी गोसानी आदि हमारे सरदार कहां गए, 1857 का स्वातंत्र्य समर - 257
हमें यह ज्ञात नहीं। पर वे शूर हैं, अतः उनकी हमें चिंता नहीं है। आपको छोड़कर जाना अवश्य हमारे लिए कठिन हो रहा है, पर उपाय नहीं। हिंदू धर्म के लिए और हिंदू राज्य के लिए फिर से एक बार प्रयास करने होंगे। इस हेतु यह संकट जो ईश्वर ने हमारे कारण आप पर लादा है, उसके लिए कृपा कर हमें क्षमा करें।''120 गंगा पार जाने के बाद पहला मुकाम फतेहगढ़ में था। अंग्रेजी सेना ने ब्रह्मवर्त का राजमहल धूल में मिलाया और वह अवध की ओर चल दी। नाना के आगे की हलचल की कोई सूचना न मिलने से हैवलॉक लखनऊ की ओर बढ़ा। जून माह के अंत में सारा अवध प्रदेश विद्रोह का एक जीवित छत्ता बन गया था, इसलिए उस प्रदेश से रास्ता निकालते हुए लखनऊ पहुंचना और वहां का घेरा उठाकर सर हेनरी लॉरेंस को मुक्त करना और यह कार्य बहुत दुष्कर होते हुए भी विजय के पहले आवेश में कानपुर से गंगा नदी उतरकर लखनऊ जीतना-हैवलॉक और उसकी सेना को बहुत सुलभ लग रहा था। दिल्ली गए-माने दिल्ली जीती, यह धारणा जैसे पंजाब से दिल्ली पहुंची अंग्रेजी सेना के सेनानियों को भ्रमित किए थी वैसी ही गंगा उतरना-माने लखनऊ जीतना, यह धारणा इलाहाबाद से आ रहे हैवलॉक को उत्साहित करने लगी। कानपुर से लखनऊ शहर कोई बहुत दूर नहीं था, यह बात सच थी; परंतु यह भी सच था कि इलाहाबाद से कानपुर आते समय हैवलॉक ने जो लगन और उत्साह प्रदर्शित किया वह यों तो दुष्कर कार्य कर डालने की स्फूर्ति देनेवाला था, परंतु अवध में जहां विद्रोह की ज्वाला न सुलगी हुई हो, ऐसा एक कदम भर स्थान इस समय शेष नहीं था। हिंदुस्थान में जहां पुरबिया सिपाहियों ने विद्रोह प्रारंभ किया, उन पुरबियों का अवध पालना होने से वहां के गावं-गावं में, झोंपड़े-झोंपड़े में उन पुरबियों के मां-बाप, बच्चे-बच्चों, नाते-संबंधी, दोस्त-यार सारे राज्य क्रांति की अनिवार्य चेतना से सुलगे हुए थे। फिर भी विजय से अभिभूत आंग्ल सेनानी को यह स्थिति डरा नहीं सकी। उलटे उसका उत्साह इतना बढ़ गया कि मैं देखते ही लखनऊ जीत लूंगा और फिर दिल्ली जाऊंगा और दिल्ली भी जीतकर फिर आगरा मुक्त करूंगा-ऐसी हिम्मत से हैवलॉक लगभग दो हजार अंग्रेजी सैनिक एवं दस तोपों सहित 25 जुलाई को गंगा पार हो गया। कानपुर में जनरल नील है और हैवलॉक लखनऊ जा रहा है-इस तरह की स्थिति जुलाई के अंतिम दिनों अंग्रेजी सेना की थी। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 258 120 'माझा प्रवास', विष्णुभट गोडसे, पृष्ठ 37 ।
प्रकरण-3 बिहार वायव्य प्रांत, इलाहाबाद, आगरा की भूमि पर जो स्वतंत्रता की हवा भरी थी उसके संचार से बिहार और उसकी राजधानी पटना शहर अछूता नहीं रहा था। पटना के साथ ही बिहार के गया, आरा, छपरा, मोतिहारी और मुजफ्फरपुर मुख्य शहर थे और इनकी सुरक्षा के लिए रख गया लश्कर पटना के पास दानापुर छावनी में रहता था। 7वीं, 8वीं और 40वीं नेटिव पैदल रेजिमेंट और नेटिव सेना को नियंत्रण में रखने के लिए मेजर जनरल लॉइड के अधीन नेटिव घुड़सवारों की 12वीं रेजिमेंट भी पास के शहर में ही थी। पटना शहर मुसलमान धर्म की वहाबी नामक कट्टर जाति का इतिहास-प्रसिद्ध केंद्र था। उस शहर को सन् 1857 की हवा लगे बिना नहीं रहेगी, ऐसा वहां के अंग्रेज कमिश्नर टेलर को पूरा विश्वास होने से वह उस जाति के नेताओं पर निरंतर आंख गड़ाए हुए था। अंग्रेजी शासन बहुत बुरा लगने से पटना शहर ने अंग्रेजी राज पलट देने के लिए गुप्त समिति बनाई हुई थी। इस गुप्त समिति में बड़े-बड़े श्रीमान, व्यापारी, कोठीवाले, जमींदार आदि लोग सम्मिलित थे जिसके फलस्वरूप राज्य क्रांति का कार्य सिद्ध करने के लिए उस समिति के प्रमुख थे और उनके प्रयासों को धर्म की पवित्रता और गंभीरता प्राप्त हो गई थी। लखनऊ की क्रांति समिति और दानापुर आदि शहर में रह रहे सिपाहियों की 1857 का स्वातंत्र्य समर - 259
आवाजाही और पत्राचार भी शुरू थे। पटना शहर की पुलिस से पुस्तक विक्रेता तक पूरा शहर इसकी उत्सुकता से राह देख रहा था कि स्वराज्य-प्राप्ति के लिए अंग्रेजी सत्ता पर पहला वार कब पड़ता है। उपर्युक्त गुप्त समिति का मुख्यालय पटना में था और वहां के दूरस्थ कोने-कोने तक क्रांतिकारी समिति का जाल बिछा हुआ था। शहर के प्रख्यात मौलवी उस समिति के नेता थे और उनके राज्य क्रांतिकारी उपदेशों और प्रयासों को धार्मिक ओज, पवित्रता और गंभीरता प्राप्त होने के कारण लोक पद स्वीकार करनेवाले लोगों को फिरंगी नाम हलाहल विष की तरह जलाने लगा। सरहद जैसे दूर के प्रदेशों में भी अंग्रेजी राज्य के विरूद्ध विद्रोह करने के लिए धन भेजा जा सके, इतना जबरदस्त धननिधि संग्रह हो गया था।121 इस क्रांति षड़यंत्र में पुलिस के लोग भी सम्मिलित थे, जिससे रात्रि की गुप्त बैठकें। इस क्रांति षड़यंत्र में पुलिस के लोग भी सम्मिलित थे, जिससे रात्रि की गुप्त बैठकें सुरक्षित हो जाती थी। ठीक समय पर अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ने को तैयार सैकड़ों लोगों को अपने सदस्यों के अलग-अलग नाम पर नौकर रखकर उस गुप्त लश्कर का वेतन क्रांति समिति से दिया जाता। पुलिस से लेकर पुस्तक विक्रेता तक पटना शहर में अंग्रेजों के प्रति द्वेष और स्वराज्य की चेतना से अंदर-ही-अंदर सुलगती ज्वालाएं उस विस्तृत प्रदेश में दसों दिशाओं को गुप्त चेतना देते दौड़ने गली। बड़े-बड़े जमींदारों से और उस भाग के जिले के प्रमुख शहरों से पटना की क्रांति समिति यातायात शुरू कर उस भाग में संरक्षण के लिए रखे नेटिव लश्कर की छावनियां अपने षड़यंत्र में पूरी तरह सम्मिलित कर लीं। उस प्रदेश के दानापुर के सिपाहियों की छावनी रात के अंधियारे में पेड़ों के नीचे अपनी गुप्त सभाएं करने लगी। अंग्रेजी टोली अपनी निगरानी के लिए आई तो उसे अंधियारे में ही नष्ट कर डालने का कार्य भी प्रांरभ हो गया। पटना प्रांत की अलग-अलग लोक-शक्तियों के इस रीति से क्रांति के लिए उत्सुक होते ही लखनऊ, दिल्ली और अन्य शहरों की क्रांति समितियों से गुप्त मंत्रणा होने लगी। ऐसी यह राज्य क्रांति, आंग्लद्रोह और असंतोष की भयानक सुरंग अपने उदर में संगृहीत विस्फोटकों के सुलग जाने से कब फूटेगी, इसकी मंत्रणा होते-करते पटना शहर के अंग्रेज कमिश्नर टेलर के कानों में मेरठ का समाचार आया। इस समाचार के साथ ही दानापुर के सिपाहियों में मच रही खलबली का समाचार भी उसे मिला। वह कमिश्नर धूर्त था। सारा हिंदुस्थान राजद्रोही हो गया था तब भी सिख लोग अभी तक असल राजनिष्ठ थे, इसलिए रैटरे के अधीनस्थ दो सौ सिख सिपाही पटना शहर की सुरक्षा के
1857 का स्वातंत्र्य समर - 260
121 "सर विलियम हंटर ने यह सिद्ध किया है कि सन् 1857 की क्रांति से भी पांच वर्ष पूर्व ही पटना में एक महान् विध्वंसक संगठन विद्यमान था, जो सीमा प्रांत के कट्टर शिविर को धन और जन दोनों की ही उपलब्धि करा रहा था। यह संगठन वहाबियों का था। इस संगठन के एक प्रमुख वहाबी नेता को टेलर ने बंदी भी बनाया था। तदुपरांत इसपर राजद्रोह का अभियोग चलाया गया था और इसे राजद्रोह के अपराध में आजन्म कारावास का दंड देकर कालापानी भेज दिया गया था।"
लिए टेलर ने तत्काल बुलाए और वे उस बुलावे के अनुसार पटना की ओर आने के लिए निकले। पर रास्ते पर पूरे प्रदेश भर में रात-दिन उनकी 'छिः-थूः' शुरू हो गई। स्वदेश के प्रति नमकहरामी करने का आरोप उनपर लगने लगा। रास्ते के गांव उन्हें व्यंग्य से पूछते, “तुम असल सिख हो या धर्मच्युत फिरंगी हो?” गुप्त और खुला उपदेश उन्हें दिया जाता कि “समय आने पर स्वदेश की ओर से लड़ना।” इस तरह सारे प्रदेश की गाली-गलौज सिर पर लेते-लेते ये राजनिष्ठ सिख सिपाही जब पटना शहर में घुसने लगे तब लोकद्वेष की ज्वालाएं रास्ते-रास्ते में उन्हें जलाने लगीं। उन्हें देखते ही उस अभिमानी शहर का हर नागरिक उनकी छाया तक अपने शरीर पर न पड़ने देता। और तो और, उस स्वतंत्रता, प्रेमी नगर के मुख्य सिख उपाध्याय ने भी अपने सिख मंदिर में उन स्वधर्मद्रोही अनुयायियों को आने से साफ मना कर दिया। विदेशी सत्ता को प्रणाम करने वाले प्राणी सिर पर बड़े केश रख लें तब भी वे गुरु गोविंद सिंह के सिख धर्म के सच्चे भक्त नहीं होते-ऐसा विश्वास उस सिख गुरु का भी हो गया था। ऐसी ही धारणा मुसलमान मौलवी की और हिंदू धर्माचार्यों की हिंदू समाज के संबंध में हो गई था, इसका पटना शहर उत्कृष्ट उदाहरण है।122 सिख सेना के पटना शहर में आते ही टेलर ने विद्रोह की चिंगारी कुचल डालने को कमर कसी। तिरहुत जिले के पुलिस जमादार वारिस अली के संबंध में वहां के अधिकारियों को आशंका होने से उसके घर पर छापा मार उसे पकड़ लाया गया। यह अंग्रेजी पुलिस का जमादार गया के अली करीम नामक क्रांति के नेता को पत्र लिख रहा था। उसके घर मिले क्रांति के पत्राचार के कारण उसे जल्द ही मृत्युदंड देकर जब फांसी स्थल पर लाया गया त बवह एकाएक लोगों की ओर देखकर चिल्लाया, “स्वराज्य का कोई सच्चा भक्त हो तो मुझे मुक्त करो!” उसका यह निवेदन स्वराज्य-भक्त के कान में जाने से पूर्व ही उसकी निर्जीव देह फांसी पर लटक रही थी। इस वारिस अली के पत्र मे मिले सबूत पर उपर्युक्त नेता अली करीम को भी पकड़ने का आदेश जारी कर उसक काम के लिए एक यूरोपियन टोली भेजी गई। मि. लुई के सामने दिखते-न-दिखते अली करीम अपने हाथी पर चढ़ा। वह आगे और लुई पीछे, ऐसी जंगी दौड़ शुरू हुई। परंतु जल्दी ही दौड़ देखने जमा दर्शकों ने अपने दर्शकीय अधिकारों का उल्लघंन करके पक्षपात करना शुरू किया। आसपास के गांववालों ने यह देखते ही कि अपने स्वदेश बंधु पर यह फिरंगी आदमी टूटा पड़ रहा है, उसे त्रास देना शुरू किया। उसकी राह बदल दी और उसक टट्टू भी कोई भगा ले गया। श्रम और निराशा से ग्रस्त वह अंग्रेज अधिकारी अपने नेटिव सहायकों को चतुर करीम का पीछा करने का काम सौंपकर दूसरे दिन हाथ हिलाता लौट आया। उसका नेटिव सहायक भी फिरंगियों का कट्टर द्वेषी था, अतः उसने 1857 का स्वातंत्र्य समर – 261 122 "ज्यों ही सिख सैनिकों ने गुरुद्वारे में पग धरा त्यों ही एक पागल फकीर सड़क पर दौड़ता हुआ आया और मुट्ठियां बांधकर उन्हें देशद्रोही, विश्वासघाती आदि अपशब्दों से संबोधित करने लगा।" – टेलर कृत 'पटना क्राइसेस'
करीम को छोड़ दिया और अपने गोरे मालिक के पास अपना सा मुंह लिये लौट गया। पटना शहर में जब यह पकड़ा-धकड़ी चल रही थी तब पटना शहर के कितने ही नेताओं के नमा टेलर को अलग-अलग रास्ते से ज्ञात हो गए और उसने उनपर भी आकस्मिक छापा डालने का निश्चय किया। क्रांति पक्ष के प्रमुख नेताओं के घरों में क्रांतिकारियों की बैठकें रात्रि में होने के कारण तथा गोपनीयता के कारण सदस्यों के नामों की सूची या कार्यक्रमों का साधार साक्ष्य यद्यपि टेलर के पास नहीं था, फिर भी शहर के तीन बड़े मौलवियों की कारगुजारियों के संबंध में कोई भी आंशका न होने से उन्हें पहले बंद करना टेलर को आवश्यक लगा; पर यदि उन्हें खुले रूप में पकड़ा जाए तो दंगा वहीं से प्रारंभ हो जाएगा, इस डर से उस अंग्रेज अधिकारी ने दूसरी ही युक्ति निकाली। एक दिन उस शहर के चुने हुए लोगों को राज्य व्यवस्था के संबंध में योग्य सलाह देने के लिए टेलर साहब के घर ससम्मान बुलाया गया। उसके अनुसार सारे लोग टेलर के बंगले पर आते ही सिखों की तलवारों के साथ टेलर वहां आया और कुछ चर्चा के बाद आमंत्रित मेहमानों को विदा भी कर दिया गया; परंतु वे तीने मौलवी जाने लगे तो उन्हें टेलर ने रोक लिया और मुस्कुराते हुए सूचित किया कि ‘वर्तमान नाजुक परिस्थिति में आपको स्वतंत्र रहने देना राज्य के लिए हानिकारक होने से आपको कैद किया जा रहा है।’ इस षड़यंत्र के बारे में ‘के’ नामक इतिहासकार कहता है-‘पर कोई भी सत्यवादी कृत्य यदि कोई मुसलमान अंग्रेजों के विरूद्ध करे तो उसे कुछ और नाम दिया जाता। प्रेम से कुछ सज्जनों को बुलाना, ब्रिटिश सरकार के मेहमान के रूप में उन्हें आमंत्रित करना और उनके विश्वासपूर्वक घर आने के बाद उन्हें कैद करना लगभग विश्वासघात नहीं, होता तो उन्हें मार दिया जाता।‘’ फिर भी राज्य के लिए हितकारी होने के बहाने उस कृत्य की भी सब ओर प्रशंसा ही हुई और टेलर की युक्ति की सारे अंग्रेजों ने प्रशंसा की। राज्य क्रांति के नेताओं को इस तरह रक्त की एक बूंद भी बहाए बिना पकड़ते ही टेलर ने नागरिकों को निःशस्त्र करने और रात के नौ बजे के बाद घर से बाहर न निकलने का आदेश जारी किया, ताकि इस आकस्मिक आघात से चकित पटना शहर को उसकी चोटें असह्य होने और धीरज समाप्त होने के पूर्व ही चुप किया जा सके। इस आदेश से क्रांति पक्ष की रातों की गुप्त बैठकें असंभव हो गई। शस्त्र संचय भी बंद हो गया। इस समय तक पटना की क्रांति समिति विद्रोह के लिए दानापुर के सिपाहियों से संकेत मिलने के लिए रूकी थी। परंतु उसके पूर्व ही ये प्राणघाती हमले शुरू हो जाने के कारण ऐसी योजना उसके नेताओं की बनी कि अब नीचे कुचले जाने की अपेक्षा साहस से विद्रोह ही किया जाए। जुलाई की 3 तारीख को पटना शहर के पीर अली नामक नेता के 1857 का स्वातंत्र्य समर – 262
घर की ओर मुसलमान जाने लगे। थोड़ी ही देर में उस घर से एक के बाद दूसरा हरा झंडा लिये बाहर निकला और 'दीन-दीन' की गर्जना हो उठी। कोई दो सौ जेहादी लोगों ने उन हरे झंडों के साथ जाकर एक चर्च पर हमला किया। इतने में एक लायल नामक गोरा कुछ सिखों के साथ आता दिखा जिसे पीर अली ने गोली से मार गिराया और फिर उस गोरे रक्त की पहली बलि गिरते ही शेष मुसलमानों ने उस गोरे पर इतनेवार किए कि उसका चेहरा पहचानना भी कठिन हो गया। परंतु जब रैटरे ने अपने सिखों के साथ चढ़ाई की, जब उन राजनिष्ठ सिखों ने स्वदेश बंधुओं पर जोरदार हमला किया, अपने हिंदुस्थान के पेट में सिखों ने जब अपनी तलवारें घुसेड़ीं और जब सिखों के शरीर भारत माता के रक्त से लाल होकर शोभित हुए तब उस जोरदार मार के सामने उन मुट्ठी भर क्रांतिकारियों की भीड़ बिखरकर इधर-उधर हो गई। अंग्रेजों ने दंगाकारी लोगों के नेताओं को तुरंत कैद किया। उसमें लायल को मारनेवाला पीर अली भी था। पीर अली लखनऊ का मूल निवासी था और कुद समय से पटना में पुस्तक बेचने का कार्य कर रहा था। बेची जानेवाली पुस्तकों को पढ़ते-पढ़ते उसे देश की स्वतंत्रता की चाह हो गई। उसमें स्वधर्म-प्रतिष्ठापन की महत्त्वकांक्षा जागी। उसके मन को परतंत्रता का घाव और पैरों में पड़ी गुलामी की बेड़ियां असह्य होने लगीं। दिल्ली और लखनऊ शहर की क्रांति समितियों से आवाजाही बढ़ाकर वह अंग्रेजों के राज्य के संबंध में अपने हृदय में चुभते लज्जा के कांटे दूसरों के हृदय में भी रोपने लगा। वह व्यवसाय से पुस्तक विक्रेता था, परंतु पटना की क्रांति समिति में उसका प्रभाव इतना बढ़ा कि समिति के श्रीमान लोगों के द्रव्य सहयोग से उसके धीन अनेक सशस्त्र नौकर रखे गए और उन्हें आदेश मिलते ही अंग्रेजी राज्य के विरुद्ध युद्ध करने की शपथ दिलाई गई। पटना के अंग्रेज अधिकारियों द्वारा अत्याचार प्रारंभ करते ही पीर अली के तेज स्वभाव के लिए चुप रहना कठिन हो गया। वह व्यवहार से बड़ा कर्मठ, स्वाभिमानी और शूर था। उससे स्वदेश की दुर्दशा देखी नहीं गई, इसलिए उसी के बयान के अनुसार-"अपक्व स्थिति में ही विद्रोह किया।" फांसी का दंड दिए जाने पर जिसके हाथों में भारी-भारी हथकड़ियां हैं, शरीर पर हुए घावों से जिसके वस्त्र रक्त से सने हैं और मरण की भयानकता को अपनी मुद्रा के वीर हास्य से जो धिक्कार रहा है, ऐसा पीर अली फांसी के फंदे के सामने खड़ा है। अपने प्रिय पुत्र का नाम लेते ही उसक कंठ भर आया। इतने में अंग्रेज अधिकारियों ने पूछा, "शांत दृष्टि से उन अंग्रेजों की ओर घूमकर वह बड़े धैर्य से बोला, "जीवन में कुछ अवसर ऐसे होते हैं जब अपनी रक्षा करना इष्ट होता है, पर कुछ ऐसे होते हैं जो चिरंजीवी होने का उत्तम साधन है तत्काल मृत्यु।" फिर अंग्रेजों द्वारा किए जानेवाले अन्याय व अत्याचारों की बिना 1857 का स्वातंत्र्य समर - 263
डरे निंदा करते हुए वह लोक उपकार के लिए आत्मार्पण करनेवाला शहीद बोला, “मुझे आप फांसी पर चढ़ाएंगे, मेरे जैसे अन्य लोगों को फांसी पर चढ़ाएंगे, पर आप हमारे ध्येय को फांसी पर नहीं चढ़ा सकते। मैं मरा तो मेरे रक्त से हजारों नए कार्यकर्ता उत्पन्न होंगे और आपके शासन का उच्छेद करेंगे।”123 ऐसी भविष्यवाणी कर यह देशवीर अपने अस्तित्व से स्वदेश पर जरा भी लज्जा की छाया न डालते हुए अपनी मृत्यु से स्वदेश के देशवीर मंडल की तेजोमय सूची में प्रतिष्ठा पा गया। 'मेरे रक्त से हजारों नवीन कार्यकर्ता उत्पन्न होंगे', ऐसा उस शहीद का जो अंतिम वर्णोच्चार था वह असत्य होनेवाला नहीं था, वह असत्य हुआ भी नहीं। उसकी मृत्यु का समाचार सुनते ही अति राजनिष्ठ गिनी जानेवाली दानापुर की नेटिव सेना 25 जुलाई को विद्रोह कर उठी। दानापुर का यूरोपियन तोपखाना और गोरी रेजिमेंट होते हुए भी तीन नेटिव रेजिमेंटो ने अपने शस्त्रास्त्र और कंपनी के यूनीफॉर्म तिरस्कार से फेंककर शोण नदी की आरे प्रस्थान किया। उस स्थान का मुख्य अधिकारी मेजर जनरल लॉयड भयग्रस्त और बूढ़ा था, इसलिए उन सिपाहियों का तुरंत पीछा करने की उसकी हिम्मत न हुई। यद्यपि अंग्रेज मेजर जनरल अपने बुढ़ापे के कारण पंगु हो गया था, तब भी जिस दिशा को वे नेटिव रेजिमेंट जा रही थीं उस दिशा में जिसकी तलवार और भुजदंडों में अभी भी तरूणाई का तेज हिलोरें मार रहा है- ऐसा एक अप्रतिम वृद्ध युवा अपने बुढ़ापे की परवाह न करते हुए जगदीशपुर के राजमहल में मूंछों पर ताव देते खड़ा था और उसी के ध्वज की ओर ये सिपाही दौड़े जा रहे थे। अंग्रेजों के शासन का जुआ उतार फेंकने के बाद जिस एक कमी के कारण आज तक स्वतंत्रता के सिपाहियों और लोगों के सारे परिश्रम विफल हो रहे थे, वह धुरंधरत्व की न्यूनता इस शाहाबाद जिले में जगदीशपुर के महल ने शेष नहीं रहने दी थी और इसीलिए उस जगदीशपुर के हिंदू राजा के ध्वज की ओर शोण नदी उतरकर ये सिपाही दौड़ते जा रहे थे; क्योंकि स्वराज्य संग्राम के लिए सुयोग्य एक नेता उन सैनिकों को अंत में जगदीशपुर में ही मिलनेवाला था। राजपूत वंश की खान से ही जिस स्वतंत्रताप्रिय नेता का जन्म हुआ उसका नाम कुंवर सिंह था। शाहाबाद तहसील की विस्तीर्ण भूमि का स्वामित्व इस कुंवर सिंह के उदार चरित्र वंश में सुप्रतिष्ठित हुआ था और उस राजवंश । 1857 का स्वातंत्र्य समर - 264 123 कमिश्नर टेलर्स ने स्वयं कहा है कि “पीर अली स्वयं एक साहसी और दृढ़ संलल्पवाला व्यक्ति था। यद्यपि उसका रूप बेढंगा था और उसके चेहरे से ही क्रूरता और कठोरता झलकती थी, किंतु इसपर भी वह शांत और संयमी था। उसकी बोलचाल और व्यवहार में शालीनता थी। इस प्रकार के लोग अपनी अजेय निष्ठा के कारण खतरनाक शत्रु सिद्ध होते हैं। किंतु अपनी कठोर आन के कारण वे किसी सीमा तक प्रशंसा के पात्र होते हैं। -के, खंड 3, पृष्ठ 86
पर वहां के जन-समूह की निसर्ग स्फुरित प्रीति थी। बड़े-बड़े बादशाहों के तूफान हिंदुस्थान की राजनीति के समुद्र में उठे और इस प्रदेश के ऊपर से भी घन गर्जना करते जा-आ रहे थे तब भी परम कारुणिक राजपूत राजछत्र के नीचे वह प्रदेश स्वराज सुख का और स्वातंत्र्य चैतन्य का अखंडित लाभ लेता रहा था। राजनीति में क्रांति की ऋतु बदलते हुए उसकी गरमी-सर्दी-वर्षा के असह्य आघात अपने सिर पर लिये कुंवर सिंह के उस स्थिर वंशवृक्ष ने अपनी छाया तले के प्रजा रूपी पंछियों को स्वराज्य क`वसंत में पाला-पोसा था और उस प्रजा की उस राज्य और उस राजवंश पर अकृत्रिम श्रद्धा थी। और उस राज्य की अपनी प्रजा पर वत्सलता की कोई सीमा नहीं थी। पर पराधीनता का हलाहल हृदय में नहीं, उसके हृदय भाव को यह स्वराज्य-राजनिष्ठा का योग शूल की तरह चुभने लगा। उसने अपने तरकश की भीषण आंधी से एक प्रबल मत्सर दामिनी बाहर निकाली और इस राजवंश पर उसका निष्ठुर आघात भीषण ध्वनि के साथ आकर गिरा। स्वराज्य छत्र टूटकर वह देश नंगे सिर हो गया-स्वराज्य के विरह से वह राज्य-वृक्ष जलकर राख हो गया, उसकी छाया के नीचे के पंछी अंगारों में फड़फड़ाने लगे। और स्वदेश की यह कठिन अवस्था देखकर मन में उत्पन्न हुई क्रोधाग्नि के कारण वह वृद्ध कुंवर सिंह अपने जगदीशपुर के महल में मूंछों पर ताव देता खड़ा था। वृद्ध युवा-हां, वह वृद्ध युवा था। क्योंकि आज तक अस्सी शरद ऋतुएं देह पर से उतर गई थीं, परंतु उसकी आत्मा का तेज अभी भी जीवित अंगार-सा दहकता है। अब तक लगभग अस्सी ग्रीष्म ऋतु, अपनी प्रखर धूप से चमचमा चुकी थीं तब भी उसकी भुजलता अभी युवा ही बनी हुई है। अस्सी वर्ष का कुंवर सिंह-अस्सी वर्ष का कुमार! और उसमें भी सिंह! उसके देश का अंग्रजों द्वारा किया हुआ अपहरण उसे कैस मान्य हो? अवध का राज्य डलहौजी ने गटका और फिर जब सारा भारत समतल करने के लिए अंग्रेजी तलवार भारतभूमि की टेकरियों को खोदते चली तब ही कुंवर सिंह के देश को अंग्रेजी तलवार ने घायल कर किया था। अपने स्वदेश और अपने स्वराज्य का अघोर एवं अन्यायी अपहार करनेवाली उस अंग्रेजी तलवार के टुकड़े करूंगा, ऐसी गर्जना कुंवर सिंह ने की और वह श्रीमंत नाना साहब से बोलने-चालने लगा था। भयंकर चाल और भयंकर बोल! हर-हर महादेव का बोल! अफजल खां वध के पोवाड़ा की चाल! और उस चाल पर यह भीषण रणगीत चालू था। कुंवर सिंह के मन में राज्य क्रांति के विचार घूम रहे हैं। स्वदेश क स्वतंत्रता के लिए उसने सारे हिंदुस्थान के क्रांति केंद्रों से संपर्क बनाया हुआ है। उस पटना विभाग के हजारों सिपाही गुप्त रूप से उससे मिल गए हैं। ऐसे अलग-अलग समाचार पटना के कमिश्नर टेलर को ज्ञात हुए। यह बात फिर भी टेलर को असंभव लगती थी कि यह अस्सी वर्ष का वृद्ध राजा चिता की ओर जाना छोड़ स्वतंत्रता की चिंता करे। फिर भी टेलर ने कुंवर सिंह को सूचित किया कि 1857 का स्वातंत्र्य समर - 265