१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पैसा दिया और जब बड़ी-बड़ी लड़ाइयों में अंग्रेजों के पास खाने को कुछ नहीं था तब उन्हें अनाज भिजवाया। नागपुर की तरह वहां क, ऐसी शिकायत नहीं थी। क्योंकि राजमहल औरस संतति से भरा हुआ था। वहां झांसी की तरह दत्तक का कोई भी बखेड़ा नहीं था; क्योंकि वर्तमान राजा दिवंगत राजा का औरस पुत्र था और राज्य पर शासनरूढ़ था। इस तरह लखनऊ के इस नवाब ने उपर्युक्त अपराधों में से एक भी अपराध नहीं किया था। यद्यपि ये सारे अपराध नवाब ने नहीं किए थे, फिर भी उस मूर्ख के हाथें एक बड़ा प्रमाद हो ही गया। वह प्रमाद यह कि नवाब के राज्य का प्रदेश बहुत ही उपजाऊ, सुंदर और धनी था। यह उसका अपराध अंग्रेजों के बहुत पहले से ही ध्यान में आया हुआ था। अवध के सुंदर प्रदेश का वर्णन करते हुए अंग्रेजी ब्लू बुक की सुकोमल भाषा में भी कविता फूट पड़ी है-"इस सुंदर प्रदेश में कहीं-कहीं बीस तो कहीं-कहीं दस फीट पर ही भरपूर जल भंडार हैं। सारा प्रदेश हरे-भरे खेतों से भरा हुआ है। अमराई की छाया से शीतल, बांस के ऊंचे-ऊंचे वन अपने सिर ठाट और शान से उठाए हुए, इमली की घनी छाया, नारंगी की गंध, अंजीर के वृक्षों की विचित्रता और पुष्पराग का परिमल आदि सारी प्रकृति की अवर्णनीय सुंदरता फैली हुई है।" ऐसा यह प्रदेश अपने कब्जे में रखने का प्रचंड अपराध अवध के नवाब ने किया था, इसलिए सन् 1849 में डलहौजी ने उसे गद्दी पर से उठाकर फेंक देने का आदेश दे दिया और उस आदेश को समस्त अंग्रेजों की अनुमति और सहयोग मिलने से अवध एक झटके में अधिग्रहीत कर ली गई। कारण यह बताया गया कि नवाब अपने राज्य में सुधार नहीं कर रहा था। ओहो! ईसा मसीह भी इस उदारता के आगे नतमस्तक हो जाएं। नवाब के राज्य में जो एक गुनी दरिद्रता थी उसे चौगुनी करने, जो कुछ चैतन्य था उसे समाप्त करने और अवध के तन पर फटा-पुराना ही सही, पर स्वतंत्रता का जो कपड़ा था उसे फाड़कर नंगा करने तथा उसके सिंहासन पर बलात्कार करनेवाले इंग्लैंड की यह अव्यवस्था की बात यदि एकबार मान ली तो हिंदुस्थान पर तेरा राज क्या एक दिन भी रह पाएगा? आज चीन में अफीम की लत है, अफगानिस्तान में अत्याचार है, बहुत क्या तेरे पैर के नीचे स्थित रशिया को अपने देश से जोड़ सकते हो? तेरे पड़ोसी के घर का सामान अव्यवस्थित है, इसलिए उसके घर में घुसकर उसे बांधकर वह घर अपने कब्जे में लेने का अधिकार तुम्हें कैसे मिला? पर डलहौजी के प्रशासन के संबंध में लिखनेवाला आर्नोल्ड कहता-"नवाब ने इसके सिवाय भी कितने ही अपराध किए थे। जैसे वह अपनी दासियों को जरी की साड़ियां भेंट देता था। देसरा अपराध यह कि उसने 11 मई को आतिशबाजी का जलसा किया। और यह भी कि एक दिन सुबह ही उसने दवाई पी और शाही बेगम और ताज बेगम से भोजन का आग्रह किया। अब इससे भयंकर 1857 का स्वातंत्र्य समर – 66
अपराध और क्या हो सकता है? फिर भी धन्य हैं अंग्रेज कि नवाब सुबह दवाई पीता था, फिर भी उस (अपराध) की ओर ध्यान न देकर उसे राज्यच्युत नहीं किया। पर अंत में सारे उपाय व्यर्थ गए। कारण, एक दिन नवाब के सामने कुछ घोड़ियों पर घोड़े-छोड़े गए-अर्थात् अंग्रेज सरकार को उन घोड़ियों की पवित्रता भंग होने पर बहुत दया आई और उन्होंने उस भयंकर अवसर पर वहां खड़े नवाब के अपराध पर उसे राज्यच्युत कर दिया।“ ऐसी घिनौनी बातें कहकर नवाब की राज्य व्यवस्था संबंधी अक्षमता का ढोल पीटना चाहनेवाले मूर्ख और ईर्ष्यालु अंग्रेज इतिहास-लेखकों को यह सब देखने हिंदुस्थान आने का कष्ट करने की आवश्यकता ही क्या थी? उन्हें इंग्लैंड में कहीं भी रोनाल्ड के ग्रंथ मिल सकते थे या लज्जावश किसी ने नन दिए हों तो इंग्लैंड के राजमहलों से भी उन्हें बहुत सारी जानकारी मिल गई होती और घोड़ियों का पातिब्रत्य भंग करने से भी बड़े व्रतों को भंग करनेवालों की जिंदगी और राज्य अधिग्रहण कर लेने तथा स्वयं के घर के छेद भरने में वे अपने समय का अधिक उपयोग कर सकते थे। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 67
प्रकरण-5 धकेलो उसमें ˙ ˙ ˙ ˙ अब इच्छित राष्ट्रकार्य की तिथि पास आती जा रही है, अतः ऐसे समय इष्ट सिद्धि के लिए कुल देवताओं की कृपा प्राप्त करनी ही चाहिए। इस प्रचंड राष्ट्र-विक्षोभ के कुलदेव की प्रसन्नता ही प्रतिशोध है। इसे प्रसन्न किए बिना और अपनी सहायता के लिए आने को बाध्य करने के सिवाए सन् 1857 में लिये गए संकल्प की सिद्धि नहीं होगी। इसलिए हवनकुंड को प्रदीप्त करो और उसमें इतनी दिव्य हवन सामग्री डालो कि मुख्य कुलदेव चैतन्य होकर प्रकट हो ही जाएं। इंद्रजित् के प्रचंड यज्ञ से अजेय रथा बाहर निकलने तक जैसे हवनों का धूम-धड़ाका उड़ाया गया वैसे ही इस यज्ञ से जब तक मूर्तिमंत प्रतिशोध अपनी सहस्र जिह्वाएं सहस्र दांतों से युक्त होकर आविर्भूत न हो तब तक हवनकुंड में हवन करते ही जाना है। इंद्रजित् के समय वानर उस यज्ञ को भंग करने के लिए प्रयासरत थे। परंतु सौभाग्य से इस राष्ट्र-यज्ञ में सहायता करने के लिए अंग्रेज स्वयं ही उतावले हो रहे हैं। फिर विलंब क्यों? कोप की अग्नि भभक रही है और उसकी सातों जीभें लपलपाती हुई उछल रही हैं। फिर विलंब क्यों? चलो, आहुति डालना प्रारंभ करो! पंजाब के इतिहास-प्रसिद्ध राजा, कोहिनूर के तेज से दीप्तिमान उस शूरवीर से पहले आहूति दान का सम्मान पाने योग्य दूसरा कौन होगा! इसलिए चल, आ जा रे डलहौजी! उस कोहिनूर को उसके वास्तविक मालिक के छीनकर ले आ। पंजाब की स्वतंत्रता का खून हुआ है-यह उस राष्ट्र-क्षोभ के कुलदेव को सूचित करने के लिए 1857 का स्वातंत्र्य समर -68
वह अग्नि चेत गई है। इस कोहिनूर को फेंक दो उसमें! इस ब्रह्मदेश को दूसरा सम्मान मिलना उचित है, इसलिए चल आ, रे डलहौजी! उस ब्रह्मदेश को उसके वास्तविक मालिक से छीनकर ले आ। अग्नि चेत गई है तो इष्ट सिद्धि के लिए इस ब्रह्मदेश को धकेलो उसमें! सतारा के शिवाजी की गद्दी कहां है? उसका मान तीसरे हवन का है। इसलिए उस पर बैठे राजाओं को श्मशान में बैठने को कहकर वह गद्दी, अंग्रेजी जाओ और जल्दी ले आओ! यह अग्नि भभक रही है, इसलिए मराठों की ओर से सतारा की इस राजगद्दी को धकेलो उसमें! इस चौथे हवन को केवल नागपुर की गद्दी कैसे पूरी पड़ेगी! तदर्थ उस गद्दी के साथ ही नागपुर के सारे भवन, हाथी-घोड़े, राजा-रानियां, रानियां के अलंकार, आक्रोश, चिल्लाहट-जो भी मिले वह सब जल्दी जाओ! यह अग्नि भभक रही है, इसलिए पूरा नागपुर धकेल दो उसमें! अब हवनकुंड सच में जाज्वल्य दिखने लगा है। ऐसे समय उतनी ही जाज्वल्य हवि चाहिए। पर ऐसी आग से भी तेजस्विनी हवि ब्रह्मावर्त के मुकुट को उसमें धकेलो! राष्ट्र-क्षोभ के न्याय देव! 'प्रतिशोध' को प्रसन्न करने के लिए नई हवि ऐसी चुनो कि बस! यह मान उसी का। इस नीति होत्र की ज्वाला आकाश छूने लगे, इसलिए यह झांसी की बिजली धकेलो उसमें! देखो, देखो, इस दिव्य हवनकुंड से सारे पापी दुर्योधनों के शरीर कांपने लगे हैं, इसलिए प्रतिशोध का सिर ऊपर दिखने लगा है। ऐसे समय आविर्भूत होने को तत्पर उस देवता को पूर्ण संतुष्ट करने के लिए हवनों का आक्रमण होना चाहिए। इसलिए चलो, ये हैं अर्काट के नवाब, धकेलो इन्हें! तंजावुर की गद्दी, धकेलो उसमें! अंगूल के राजा, धकेलो उसमें! सिक्कत के भाग, धकेलो उसमें! संबलपुर के राज्य, धकेलो उसमें! खैरपुर के अमीर, धकेलो उसमें! ऐसे रूपए और चिल्लर कितने गल गए, इसकी कोई गिनती नहीं! इसलिए ऐसे हविर्दान कौन गिने! अत्यंत पुष्ट और पूरी तरह निरपराध बलि लखनऊ के नवाब के अतिरिक्त मिलना कठिन है, इसलिए लखनऊ के नवाब को धकेलो उसमें! अहा-हा! इस अग्नि-कल्लोल से ऊपर निकलते देवता की यह कैसी उग्रता! इस प्रतिशोध के भयानक जबड़े में सारा जगत् ही पिस जाएगा। परंतु उस जबड़े की धार जब तक अधिक तेज न हो जाए तब तक ठहरना उपयोगी नहीं। इसलिए दिल्ली के 1857 का स्वातंत्र्य समर – 69
राजमहलों को ताले लगा और वहां के मयुरासन पर बैठनेवाले अकबर के वंशज को खींचकर धकेलो उसमें! अवध प्रांत के बड़े-बड़े तालुकेदार²⁶ क्या कर रहे हैं? उनकी सारी जमीनें और उनके सारे हक छीनकर उन्हें जंगली पशुओं जैसा घेरकर लाओ इधर! वैसे ही बंबई प्रात के (इनाम कमीशन आदि के द्वारा) हजारों हकदारों के हक फेंक-फांककर उन्हें भी लाओ इधर! हवनकुंड प्रज्वलित हैं। इसलिए जमींदार, जागीरदार, तालुकेदार, वतनदार आदि सारे दारों को कंगाल कर धकेलो उसमें! राजा, महाराजा, बादशाह, प्रधान, नवाब, वजीर जैसी उत्तम हवियां इस हवन कुंड में पड़ें और हमारे राष्ट्र-क्षोभ 'कुलदेव' को प्रसन्न करें! हमारी यह वर्तमान दुर्दशा और गुलामी देखकर हमारे पूर्वजों की आंखों से बहनेवाले आंसु उस देवता को अच्छी तरह स्नान करावें। सतारा की गद्दी के टुकड़े देखकर गुस्से में भरे शिवाजी उस देवता को चैतन्य करें। अवध के राजमहल की बेगमों के कष्ट और नागपुर के महलों में अपमान के कारण मरी हुई अन्नपूर्णाबाई की आत्मा हमारे उस राष्ट्रीय प्रतिशोध को चेताए। हे प्रतिशोध! जग के न्याय! तलवार की धार पर तू चढ़ता है तो तू देवों को भी वंदनीय और ऋषियों को भी स्तुत्य हो जाता है। सज्जन रक्षक प्रतिशोध! तेरा डर न हो तो अन्याय का कलि इस दुनिया पर निरकुंश होकर नाचने लगे। हे प्रतिशोध! तेरी उग्रता से ही कंपित होकर पापियों को पुण्यवान् होकर नाचने लगे। हे प्रतिशोध ! तेरी उग्रता से ही कंपित होकर पापियों को पुण्यवान् होना पड़ता है। तू ही रावण का राम था, तू ही दुर्योधन का भीम था, तू ही हिरण्यकशिपु का नृसिंह था। उनके समय में तुम्हें प्रसन्न करने के लिए जितना हविर्दान नहीं हुआ थ उतना इस प्रचंड हवनकुंड में लगा हुआ है। एतदर्थ, जग से अन्याय और अंधेर समाप्त हो, परवशता और परदासता मिट जाए, 1857 का स्वातंत्र्य समर – 70 ²⁶ अवध के राज्य को अधिगृहीत करने के बाद वहां के अत्यंत कुलीन, प्रभावशाली और प्रमुख लोगों की जो दुर्दशा हुई वर्णन बहुत भयंकर है। वंश परंपरा से प्राप्त जमीनें और वतन एक क्षण में नष्ट हो गए। इन अभागे तालुकेदारों के लिए 'के' लिखता है–"The charges against him were many and great for he had diverse ordeals to pass through and he seldom survived them all....When the claims of a great talukdar could not be altogether ignored, it was declared that he was a rougue or a fool.... They gave him a bad name and straightway they went out to ruin him!....It was at once a cruel wrong and a grave error to sweep it away as though it were an encumbrance and an usurpation." जो व्यवस्था नवाब नहीं कर सहते थे उस राज्य की ऐसी व्यवस्था करने पर सारे जमींदारों को कंपनी ने जल्दी ही बेरहम मार लगाई, यह आगे वर्णित है। इनाम कमीशन जो नियुक्त किया उसने तो विकट कहर ढाया। अंग्रेजों को जैसे बड़े-बड़े राजा नहीं चाहिए थे वैसे ही रिसजोर जमींदार भी नहीं चाहिए थे। जो जमीनें और जागीरें तलवार के जोर पर प्राप्त की थीं उनके कागज नहीं थे, इसलिए उन्हें एक सिरे से अधिगृहीत किया गया। कम-से-कम पैंतीस हजार 'वतन' और बड़ी जागीरें छानबीन के लिए निकाली और उनमें से केवल पांच वर्ष में तीन पंचमाश समाप्त कर दीं।
स्वतंत्रता और स्वराज्य की जय-जयकार हो, ऐसी परमेश्वर की इच्छा हो तो तू इस यज्ञ से मर्तिमंत हो प्रकट होना। धन्य-धन्य!! ‘मृत्यु सर्वहरश्चाहम्’—ऐसी गर्जना करते यह मर्तिमंत राष्ट्र-क्षोभ ऊपर आ रहा है। इस भयंकर गर्ति को शतशः प्रणाम है। जिसके भयंकर जबड़ों में उन्मत्त राज; पिस जाते हैं, जिसके हाथ के घन से निरपराध देशों के पैरों में पड़ी दासता की बेड़ियां तड़ाक से टूट जाती हैं, जिसके नेत्रों से निकलनेवाली ज्वालाएं अत्याचारों की काली कोठरियों को जलाकर भस्म करती हैं और जिसकी लपलपाती तप्त जिह्वा हजारों दुःशासनों का रक्त गटागट पीती है उस भयंकर, उग्र एवं भयानक राष्ट्रीय प्रतिशोध को शतशः प्रणाम— वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि। केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ् गैः हे हिंदभूमि! अंततः इस महायज्ञ से तेरा ‘प्रतिशोध’ सभी में मर्तिमंत रीति से प्रादुर्भूत हो गया। पर वह क्या-क्या करने से शांत होकर संपूर्ण रूप से अंतर्धान होगा, क्या यह भी तुझे ज्ञात है? 1857 का स्वातंत्र्य समर – 71
प्रकरण-6 अग्नि में घी विश्व में ऐसा कौन सा सद्धर्म है कि जिसमें परतंत्रता और दासता को धिक्कारा नहीं गया हो। इसी कारण जहां परमेश्वर होगा वहां परतंत्रता कभी नहीं रह सकती और जहां परतंत्रता है वहां परमेश्वर का अधिष्ठान नहीं, वहां धर्म नहीं। एतदर्थ किसी भी प्रकार की परतंत्रता का अर्थ धर्म का उच्छेद एवं ईश्वरीय इच्छा का भंग होना है। क्या मनुष्य जाति की उन्नति के लिए उत्पन्न हुए सारे धर्म मनुष्य जाति की अवनति के लिए उत्पन्न हुई परतंत्रता को एक क्षण भी जीवित रखने की आज्ञा देगें? उसमें भी राजनीतिक परतंत्रता सभी परतंत्रताओं से मनुष्य जाति की अत्यंत भयानक अवनति करनेवाली है, इसलिए इस अधम राक्षस का कंठच्छेदन करने की आज्ञा प्रमुखता से ही दी गई होगी। जो अन्यों को गुलाम बनाते हैं और जो गुलामी में रहते हैं, वे दोनों ही मनुष्य जाति को नरक की ओर धकेलते हैं। इसलिए मनुष्य जाति को स्वर्ग की ओर ले जानेवाले सद्धर्म इस राजनीतिक गुलामी को नष्ट करने के लिए अपने अनुयायियों को बार-बार उपदेश देते हैं। उनका यह उपदेश अस्वीकार करनेवाले सारे लोग धर्मद्रोही हैं। दूसरों को गुलामी में ढकेलनेवाले अंग्रेज भले ही रोज चर्च में जाएं, वे धर्मद्रोही ही हैं और परतंत्रता के नरक में सड़नेवाले भारतीय रोज शरीर पर भभूत मलते रहें तब भी वे धर्मद्रोही ही हैं। जो किसी भी तरह की दासता में रहते हैं वे सारे हिंदू धर्मभ्रष्ट हैं और वे सारे मुसलमान भी धर्मभ्रष्ट हैं, फिर वे चाहे रोज हजार बार संध्या-वंदन कर रहे हों या हजार बार नमाज 1857 का स्वातंत्र्य समर - 72
पढ़ रहे हों। यह ध्यान में रखकर ही श्री समर्थ रामदास ने स्वराज्य-प्राप्ति को धर्म का मुख्य कर्तव्य कहा है। जो राज्य अपनी इच्छा के विरूद्ध बलपूर्वक अपने पर थोपा गया है- ऐसे पर-राज्य को उखाड़ फेंकना, गुलामी की बेड़ियां तोड़ देना और मनुष्य जाति की उन्नति का जो प्रथम साधन होता है, वह स्वराज्य प्राप्त करना, स्वतंत्रता प्राप्त करना धर्म का प्रधान कर्तव्य है, ऐसा प्राणनाथ प्रभु का छत्रसाल को दिया गया या समर्थ का शिवाजी को दिया गया उपदेश दो शताब्दियों बाद हिंदुस्थान की पुण्यभूमि के पुरूषों के कान में ज्ञात या अज्ञात रूप से सन् 1857 में फिर से गूंजने लगा। हिंदुस्थान की पुण्यभूमि की स्वतंत्रता का हरण कर अंग्रेजों ने सभी धर्मों को तो अपने पैरों तले कुचला ही था, परंतु धर्म का सैद्धांतिक अपमान पूरा नहीं है, ऐसा लगने पर ही शायद, इस हिंदुस्थान के पवित्र धर्म का स व्यावहारिक अपमान करने के लिए वे बहुत आतुर थे। अफ्रीका और अमेरिका में वहां के निवासियों को ईसाई धर्म की दीक्षा देने के काम में मिली सफलता से बहके हुए पश्चिमवासियों को अफ्रीका की भांति ही हिंदुस्थान में भी सारे लोगों को ईसाई बना डालने की भारी आशा थी। वेद और प्राचीन हिंदू धर्म तथा ईसाइयत की पीठ पर नृत्य करते इस्लाम के जड़-मूल कितने गहरे हैं, इसका उन्हें जरा भी ज्ञान नहीं था। दर्शनशास्त्र, भक्ति-प्रेम एवं नीति-निपुणता में सारे जग का आदिगुरू आर्य धर्म आज तक कितनों के ही नामकरण और नामशेष देखता आया है, यह इन अल्प बुद्धिवालों को कैसे ज्ञात हो! उन्हें आज पूरे हिंदुस्थान को ईसाई बनाने की रत्ती भर भी आशा नहीं हैं-फिर भी सन् 1857 तक उन्हें इस सफलता के संबंध में पूरा विश्वास था। औरंगजेब जैसे खुले द्वेष से भी भयानक गला काटनेवाला द्वेष करने और हिंदुस्थान को अनजाने ईसामय बना डालने का उनका दृढ़ उद्देश्य था। इतना ही नहीं अपितु इस हेतु उनके खुले प्रयास भी चल रहे थे। हिंदुस्थान में पाश्चात्य शिक्षा-पद्धति प्रारंभ करनेवाला मैकाले अपने एक निजी पत्र में लिखता है-अपनी यह शिक्षा प्रणाली ऐसी ही बनी रही तो तीस वर्ष में पूरा बंगाल ईसाई हो जाएगा।27 इस टिटहरी को ऐसी आशा और विश्वास था कि अपनी चोंच से मैं यह अगाध समुद्र देखते-देखते पी पाऊंगी। सारे हिंदुस्थान को ईसाई बना डालने के लिए हर अंग्रेज की कुछ-न-कुछ योजनाएं अवश्य होती थी। इस धर्म-प्रवर्तन को प्रकटतः मदद करनेवाला हजारों मिशनरियों द्वारा किया जानेवाला निवेदन मानकर उसके अनुसार हिंदू और इस्लाम धर्म की गरदन पर तलवार चलाने का कार्य भी अंग्रेजी सरकार द्वारा किया जाता था; परंतु उस राष्ट्र को धर्म-प्रवर्तन की अपेक्षा व्यापार-प्रवर्तन और यीशू की तुलना में द्रव्य भक्ति अधिक होने के कारण ऐसे खुले कार्य करके 1857 का स्वातंत्र्य समर - 73 27 "हमारी अंग्रेजी पाठशालाएं दिन-प्रतिदिन आश्चर्यजनक ढंग से प्रगति करती जा रही हैं। अकेले हुगली नगर में ही 1,400 बालक अंग्रेजी सीख रहे हैं। इस शिक्षा का प्रभाव का नितांत चमत्कारपूर्ण हो रहा है। मेरा यह सुदृढ़ विश्वास है कि यदि यह शिक्षा योजना सुचारू रूप से जारी रही तो तीस वर्ष पश्चात् बंगाल में एक भी मर्तिपूजक र रह जाएगा।" -मैकलेज लेटर टू हिज मदर, 12 अक्तूबर, 1836
धर्म के लिए हिंदुस्थान का राज्य होने से निकलने देने की गलती उसने नहीं की। इच्छा नहीं थी, ऐसा नहीं, पर हिम्मत नहीं थी। फिर भी, बड़े-बड़े नाम देकर और अपना मूल हेतु छिपाते हुए सती प्रथा प्रतिबंध, विधवा विवाह को समर्थन, दत्तक पुत्राधिकार की समाप्ति आदि अवसरों पर हिंदुस्थान की धर्म-आस्थाओं में परिवर्तन करने क प्रयास उन्होंने प्रारंभ कर ही दिया था। मिशनरियों के तहत चलनेवाले स्कूलों को सरकारी धन की सहायता बिना रुके मिल रही थी। बड़े-बड़े आर्कबिशपों के वेतन बड़े-बड़े सरकारी अधिकारियों द्वारा हिंदुस्थान की जनता को निचोड़कर जमा किए गए धन से दिए जाते थे। ये अधिकारी अपने अधीनस्थ लोगों को अपने पवित्र धर्म को त्यागकर ईसाई होने का उपदेश करते । सरकारी कागजों में हिंदुस्थान के लोगों का उल्लेख 'Heathen' षब्द से किया जाता। अंग्रेजी कर्मचारियों का अधिकतर समय आसमानी बाप का शुभ चरित सुनाने में ही जाता था। सेना में जो अंग्रेज घुसते थे उनमें से कितने ही केवल अधिकार के बल पर भारतीय धर्म की खिल्ली उड़ाने के लिए ही घुसते थे। शांति काल में सेना के लोगों को कोई काम न होता था, अतः उस समय हिंदू और मुसलमान सिपाहियों को यीशू का चरित सुनाने को विपुल समय मिलने से लश्करी विभाग में यत्र-तत्र इन मिशनरी कर्नलों और सेनापतियों की आवाजाही बढ़ गई थी। जिस 'रामचन्द्र' के पवित्र नामोच्चार से हर हिंदू के हृदय में भक्तिभाव उमड़ पड़ता है और जिस 'मोहम्मद- के नाम से सारे मुसलमानों की रग-रग से प्रेम झलक पडऋता है उस रामचंद्र के और उस मोहम्मद के नाम को वे पादरी कर्नल गालियां बकते। उठते-बैठते भारतीय सिपाहियों को अधिकार के जोर से चुप बैठाकर वे उनके सामने उनके प्राणप्रिय वेदों और कुरान की डटकर निंदा करते थे। इन मानवी राक्षसों का यह उद्योग किस तरह निरंतर चल रहा था और इस कार्य का उन्हें कितना अभिमान था, इसका स्वरूप स्पश्ट करने के लिए एक व्यक्ति से संबंधित उदाहरण देना आवश्यक है। सारे धर्मों का जनक आर्य धर्म तथा ईसाइयत की गरदन पर छुरी रखकर आगे बढ़ा हुआ मोहम्मदी धर्म, इन दोनों धर्मों को और उनके अनुयायियों को अपने टुटपुंजिया शुभ चरति से ठगना चाहनेवाले इन पादरी सेनापतियों में से बंगाल पैदल रेजीमेंट का एक कमांडर बड़े घमंड से कहता है-'मैं गत बीस वर्षों से यह शुभ चरित का कार्य निरंतर कर रहा हूं। इन काफिर लोगों की आत्मा को शैतान से बचाना एक फौजी कर्तव्य ही है।' हिंदुस्थान कके धन पर मोटे हुए ये पादरी वीर एक हाथ में लश्करी आदेशों की पुस्तक और दूसरे हाथ में बाइबिल लेकर इस देश के सिपाहियों को धर्मच्युत करने का प्रयास दिन-रात करते रहते थे। इतना ही नहीं अपितु उस प्रयास में जल्दी सफलता मिले, इसके लिए धर्मांतरण करनेवाले सिपाही को पदोन्नति का खुला वचन देते थे। सिपाही अपना धर्म छोड़े तो हवलदार हो जाता था और हवलदार-सूबेदार, मेजर। इस प्रकार सेना विभाग एक तरह से बलात् ईसाई बनाने का मिशन हो जाता था। हिंदुस्थान के धन से मुटाए हाथ और हिंदुस्थानी पैसे से खरीदी गई तलवार से हिंदुस्तानी धर्म को ही चोट पहुंचाने के अंग्रेजों के इस हेतु के विरूद्ध संशय उत्पन्न हुआ और उसमें हर रोज जुड़ती 1857 का स्वातंत्र्य समर - 74
नई-नई घटनाओं के कारण सारे हिंदुस्थान को ईसाई बनाने की अंग्रेजी नीति सबको स्पष्ट दिखने लगी। अपने सनातन आर्य धम्र का और अपने प्राणप्रिय इस्लाम धर्म का मीठी छुरी से गला काटा जा रहा है, यह देखते ही हिंदू और मुसलमान क्रोधित हो उठे। फिरंगियों के असह्य अत्याचारों से उनके शरीर जलने लगे और धर्म-रक्षा के लिए प्राण भी देने के लिए वे शपथ लेने लगे। और इसी भड़कती आग में घी डालने को हिंदुस्थानी लश्कर में नए कारतूस उपयोग करने का आदेश आ गया। नए प्रकार की बंदूकों के लिए नए कारतूस काम में लाने की आवश्यकता पड़ जोने से इन कारतूसों का कारखाना हिंदुस्थान में लगाने का प्रस्ताव सरकार ने किया। यह प्रस्ताव यद्यपि सन् 1857 के आरंभ में अमल में आया, फिर भी इन कारतूसों का प्रवेश पहले ही हो गया था। हिंदुस्थान के हिंदू और मुसलमान की धर्म-निष्ठाओं को तुच्छ माननेवाली फिरंगी सरकार ने इंग्लैंड में तैयार गाय की चरबी लगे ये कारतूस सन् 1853 में ही हिंदुस्थान में भेजे थे, ऐसा अब सिद्ध हो गया है। अंग्रेजों ने यह बात गुप्त रखकर कि उन कारतूसों में किसकी चरबी लगी है-कानपुर, रंगून एवं फोर्ट विलियम की हिंदुस्थानी फौज के हिंदू-मुसलमानों को सन् 1853 में ही धर्मच्युत कर दिया थां यह विश्वासघात सन् 1857 में खुलने तक कारतूसों को चाहे जो भी चरबी लगाने की अंग्रेजों ने जान-बूझकर व्यवस्था की थी। यह बात अनुमान से नहीं कही गई है, क्योंकि सन् 1857 के दिसंबर में कर्नल टक्कर द्वारा भेजी गई सरकारी रिपोर्ट में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है। 28 स्वयं कमांडर-इन-चीफ को यह बात ज्ञात थी। ऐसा होते हुए भी हिंदुस्थानी सिपाहियों को वे कारतूस देकर उनके पवित्र धर्म को भ्रष्ट करने का अधम कृत्य निरंतर चालू रखा गया था। अंग्रेजों के मन के इस विश्वासघात की कल्पना सन् 1853 में भारतीय सिपाहियों को बिल्कुल भी न थी, अतः उन्होंने इन कारतूसों का प्रयोग बिना किसी शंका के किया। इस तरह अपनी कपट भरी योजना सफल होते देख उन कारतूसों के निर्माण का कारखाना दमदम में चालू किया गया। इस कारखाने में तैयार किए गए कारतूसों को पहले जैसी ही चरबी लगाई जाती थी;पर ऐसा करने में हिंदुस्थानी लोगों को धर्मच्युत करने का सरकार का हेतु नहीं था-इसे कोई भी भूले नहीं! ऐसा उद्देश्य न होते हुए भी हमारा देश मिट्टी में मिल गया। उेसा कोई उद्देश्य न होते हुए भी हमारा स्वराज्य चर-चर ची दिया गया और ऐसा उद्देश्य न होते भी हमारे धर्म का नाश हो रहा था। कमांडर-इन-चीफ को चरबी की बात मालूम होते हुए भी उसने क्योंकर हिंदुओं के मुंह में गाय का मांस एवं मुसलमानों के मुंह में सूअर का मांस ठूंसा? इस एक व्यवहार में अंग्रेजी सरकार ने कितनी बार सफेद झूठ बोला, यह देखें तो रक्त की हर बूंद खौलने लगती है। कारतूस को गाय और सूअर की चरबी लगाई जाती है, इस अफवाह पर सिपाहियों ने अंधविश्वास किया, ऐसा कहनेवाले निर्लज्ज लोग, दमदम कारखाने में जो ठेकेदार 1857 का स्वातंत्र्य समर – 75 28 के कृत-'इंडियन म्युटिनी', खंड 1, पृष्ठ 380।
चरबी देता था उसका करार पत्र अवश्य देखें, 29 जिससे इसका स्पष्ट उत्तर मिलेगा कि उन कारतूसों में गाये की चरबी का उपयोग किया जाता था या नहीं। हिंदू लोग जिसे मां मानते हैं उस गाय की चरबी की आपूर्ति दो आने की एक पौंड की दर से की जाती थी और उस चरबी में सूअर की चरबी का अंश मिलाया जाता था, यह भी असंभव नहीं है। इन कारतूसों का हल्ला होते ही सन् 1857 की 29 जनवरी को एक सरक्यूलर भेजा गया था। उसमें से सरकारी हुकूमत कहती-“नेटिव सिपाहियों के लिए बननेवाले कारतूसों को केवल बकरी या बकरे की चरबी लगाई जाए, सूअर या गाय की चरबी बिल्कुल काम में न ली जाए।'' जल्दबाजी में निकाले गए सरक्यूलर से यही सिद्धह होता है कि गाय या सूअर की चरबी न लगाने का इसके पहले नियम नहीं था। दमदम और मेरठ में इन कारतूसों के कारखाने थे। दमदम के कारखाने में काम करनेवाले एक महतर ने एक ब्राह्मण के ऐसा कहते ही वह मेहतर बोला, “अब सब ओर भ्रष्टता फैलेगी। जिन कारतूसों को तुम दांत से तोड़ोगे उन कारतूसों पर गाय और सूअर की चरबी मढ़ी जा रही है।'' यह सुनते ही वह ब्राह्मण दूसरे सिपाहियों को वह बात कहने लगा। दमदम में जल्दी ही सारे सिपाही संशयग्रस्त हो गए और उन्होंने पड़ताल की तो यह सत्य स्पष्ट हो गया कि कारतूसों को गाय और सूअर की चबी लगाई जाती है। दमदम का यह समाचार आग की तरह सब ओर फैल गया। हर सिपाही को अपने हाथों में गाय और सूअर की चरबी लगी दिखने लगी। और हर लश्करी शिविर में ईसाई लोगों के इस षड़यंत्र से हर एक को अपने धर्म और अपने अस्तित्व का एक क्षण का भी भरोसा नहीं रहा। यह देखकर अंग्रेजी सरकार घबरा उठी और उसने अपना कुकृत्य छिपाने के लिए ऐसी झूठी और नीच बातें कहनी शुरू कीं जिससे कि मनुष्य जाति को कालिख पुती रहे। कारतूसों को गाय और सूअर की चरबी लगाई हुए थी, यह जब अस्वीकार करना कठिन हो गया, तब हिंदुस्थानी सरकार के लश्करी सचिव बर्च ने सरकारी घोषणा की कि मेरठ और दमदम में तैयार होने वाले नए कारतूस हमने अभी तक बिल्कुल नहीं बांटे हैं। उसका यह कथन बिल्कुल झूठ था। अंबाला, सियालकोट और बंदूकों के प्रशिक्षण के लिए चलाए गए नए लश्करी वर्गों में ये चरबी लगे कारतूस सन् 1856 से ही भेजे जा रहे थे। अंबाला डिपों में 22,500 और सियालकोट को 14,000 कारतूस 23 अक्तूबर, 1856 को भेजे गए, फिर भी कर्नल बर्च जनवरी 1857 में सरकारी घोषणा करता है कि कारखाने से एक भी कारतूस नहीं भेजा गया। जहां लश्करी वर्ग चल रहे थे वहां नई बंदूकों के प्रशिक्षण में इन कारतूसों का उपयोग नहीं किया गया, यह असंभव था। इसके पहले लिखा जा चुका है कि 1857 का स्वातंत्र्य समर – 76 291- के कृत–'इंडियन म्युटिनी', खंड 1, पृष्ठ 381। 2. "चरबी की बनावट में गाय की कुछ होती थी, इस विषय में तनिक भी संदेह नहीं है।'' –के कृत–'इंडियन म्युटिनी', खंड 1, पृष्ठ 381
सन् 1853 में यही कारतूस भारतीय सिपाहियों को कोई जानकारी न देते हुए उपयोग के लिए दिए गए थे। गुरखा पलटन में तो ये कारतूस खुलेआम बांटे गए थे। फिर भी बर्च किसी उस्ताद उचक्के जैसा सीना तानकर कहता है कि चरबी लगा एक भी कारतूस नहीं बांटा गया था।³⁰ भोले सिपाहियों को चाहे जैसी लुका-छिपी कर धोखे में रखना चाहनेवाली सरकार का यह प्रयास विफल हो जाने पर अब सिपाहियों को ऐसी अनुमति दी गई कि वे चाहे कोई भी चिपचिपी वस्तु अपने कारतूसों में स्वयं ही लगा लें। इस अनुमति का परिणाम जो होना था वहीं हुआ। सरकार द्वारा चरबी लगाने की जिद इतनी जल्दी छोड़ देने का अर्थ है कि एक ओर चुप करके दूसरी ओर से छल करने की उसकी योजना होगी-ऐसा उनको पक्की तरह लगने लगा। चरबी की जगह पर चाहे कोई भी चिपचिपापन लाने के लिए ऐसा ही कोई धर्मबाह्य पदार्थ लगाने का प्रयास नहीं करेगी, इसको कैसे माना जाए? अतः ये कारतूस किसी भी मूल्य पर नहीं लेना है, यह दृढ़ निश्चय सब लोगों को करना चाहिए। पर यह निश्चय हो गया तो भी इतने से मुख्य आपदा तो टालनेवाली नहीं है। बहुत हुआ तो ये कारतूस नहीं दिए जाएंगे। परंतु इनके स्थान पर कल कोई देसरी आपदा आएगी। अर्थात् इन कारतूसों को न लेने से भी धर्म पर आई वास्तविक आपदा टलनेवाली नहीं है। गुलामी के नरक में गिरे लोगों का धर्म पवित्र कैसे रह सकता है! गाय की चरबी तो क्या, देशमाता की चरबी काटकर निकाली जा रही है-इस बात को भुला देनेवालों का धर्म जीवित कैसे रह सकता है? सद्धर्म स्वर्ग में रहता है और गुलामी में पड़े लोग नरक में रहते हैं। अतः यदि उन्हें धर्म चाहिए तो उन्हें गुलामी की गंदगी अपने और अपने शत्रुओं के रक्त से धोकर साफ करनी चाहिए। इसलिए अब कारतूस लें या न लें, हे हिंदुस्थान! धर्म रक्षण यदि आवश्यक हो, धर्म के उद्देश्य के लिए मानव का जो प्रगमन आवश्यक है उसे साधने का यदि तेरा हेतु हो और यदि अपमान पर तुझे लज्जा आती है तो इस गुलामी को भंग करने को तैयार हो जा। धर्म के लिए मर, मरते-मरते सबको मार और मारते-मारते स्वराज्य प्राप्त कर। सन् 1857 का वर्ष उदय हो चुका है, इसलिए उठ! और स्वराज्य प्राप्त कर! 1857 का स्वातंत्र्य समर - 77 ³⁰ "ठीक अंतिम समय पर कर्नल बर्च सिपाहियों को यह आश्वासन देने हेतु आगे आया कि उन्हें दिए गए किसी कारतूस में चरबी नहीं लगाई गई है। उसका यह कथन सर्वथा मिथ्या था। सिपाही इससे धोखे में आनेवाले नहीं थे। जैसाकि एक साहसी लेखक ने लिखा है कि 'सरकार तो केवल झूठ का पुलिंदा ही खोल रहा है।' " -बंगाल के एक हिंदू का पत्रक, 1857
प्रकरण-7 गुप्त संगठन जैसाकि पिछले अध्याय में वर्णन किया गया है, जब सारे हिंदुस्तान में क्रांति की सामग्री इधर-उधर तैयार हो रही थी तब उस सामग्री की यथोचित योजना कैसे तैयार की जाए और उसमें क्रांतियुद्ध का भवन किस तरह बनाया जाए, इसका नक्शा ब्रह्मवर्त में तैयार हो रहा था। पूर्व प्रकरण में हमने अजीमुल्ला खान को यूरोप प्रवास पर छोड़ दिया था। उस प्रवास में जाने के पहले लंदन में उसी समय सतारा की गद्दी का झगड़ा सुलझाने हेतु रंगो बापूजी नामक एक चतुर और कर्मठ सज्जन गए हुए थे, उनसे अजीमुल्ला खान ने भेंट की। सतारा की गद्दी का प्रेत दहन करते आए हुए रंगों बापूजी और पेशवा की गद्दी का प्रेत दहन करने आए अजीमुल्ला खान, इनकी उन दोनों इतिहास-प्रसिद्ध गद्दियों के प्रेत संस्कार के समय क्या वार्त्ता हुई, अपने देश का सर्वनाश करनेवाले फिरंगियों की पिटाई करने के लिए उन्होंने कैसी शपथ लीं और हिंदुस्तान में लौटकर सतारा में रंगों बापूजी ने और ब्रह्मवर्त में अजीमुल्ला खान ने प्रचंड युद्ध की रचना करने के लिए क्या-क्या मंत्रणा की, इतिहास कभी भी यह शब्दशः नहीं बता पाएगा। फिर भी सन् 1857 का युद्ध हुआ, यह जितना सत्य है-इस युद्ध की योजना लंदन में अजीमुल्ला खान और रंगो बापूजी ने बनाई थी, यह बात भी उतनी ही सत्य है। लंदन से रंगो बापूजी सीधे सतारा को लौट गए और उत्तर की ओर ब्रह्मवर्त में जिस भवन का निर्माण हो रहा था 1857 का स्वातंत्र्य समर - 78
उस भवन के निर्माण की सामग्री जुटाने लगे। परंतु अजीमुल्ला खान सीधे हिंदुस्थान न आकर यूरोप में प्रवास करने लगे। उस समय क्रिमिया द्वीप में अंग्रेजों का रूस से घमासान शुरू था और रूसी भालुओं के पंजों तले ब्रिटिशा शेर भी गाय बनता जा रहा था। अजीमुल्ला खान को यह समाचार ज्ञात होते ही उसके मन में घुमडते महान् कार्य को बल मिला। स्वदेश के सीने पर नाचते अंग्रेज शेर को रूस ने कहां तक घायल किया है, उसके कितने पंजे काटे हैं तथा शेष को काटने के लिए अपने प्रिय हिंदुस्थान में होनेवाले प्रयासों में रूस की कितनी सहानुभूति या सहयोग प्राप्त करना संभव है, इसकी प्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त करने अजीमुल्ला खान क्रिमिया द्वीप गए। यूरोप के प्रवास से अजीमुल्ला खान के हिंदुस्थान लौटने के बाद ब्रह्मवर्त के राजभवन में निराला ही वातावरण बन गया। सारे हिंदुस्थान पर विजय-आनंद से लहरानेवाला पेशवाओं का वह ध्वज 'जरी पटका' आज तक उस राजभवन में धूल खाता पड़ा हुआ था। जिसके सुर सुनकर लाखों मराठी तलवारें रणांगण में शत्रु पर टूट पड़ती थीं, वह दुंदुभि उस राजभवन में वीर रस को त्याग करुण रस के सुर निकालनें लगी थी। वह देशव्यापी राजमुद्रा भी, जिसके मुद्रण पर दिल्ली की घटनाएं अवलंबित थी, अपने स्वयं के वैधव्य पर सिक्का मारते पड़ी थी। परंतु अजीमुल्ला खान के यूरोप से लौटते ही ऐसा लगने लगा जैसे उन वस्तुओं को एक विलक्षण चैतन्य प्राप्त हुआ हो। धूल खाती हुई जरी पटके में फिर से चमक मारने लगी और श्रीमंत नाना साहेब उस तेजस्वी, चपल और उग्र नेत्रों में असह्य अपमान से उत्पन्न हुए प्रतिशोध से अधिक उग्रता एवं 'तस्मात् युद्धायं युज्यस्व' की चेतना से अधिक तेजस्विता आने लगी। 'तस्मात् युद्धाए युज्यस्व'—क्योंकि स्वराज्य की होली हो चुकी है। तस्मात् युद्धाए युज्यस्व—स्वधर्म को पैरों तले कुचला जा रहा है और स्वतंत्रता का हनन हो रहा है। तस्मात् युद्धाए यज्यस्व—स्वदेश की स्वतंत्रता आज तक किसी को भी युद्ध के बिना प्राप्त नहीं हुई। छत्रपति को जिसके लिए ताना की बलि देनी पड़ी थी, वह स्वराज्य का सिंहगढ़ युद्ध के बिना कभी नहीं मिलेगा। धर्मरक्षा के लिए जो स्वराज्य-संपादन नहीं करता वह महाराष्ट्र धर्म का असल मराठा नहीं और जो महाराष्ट्र धर्म का असल मराठा है वह, स्वराज्य-संपादन का जो एकमात्र मार्ग है उस समर-मार्ग में कूदने से कभी भी पीछे हटनेवाला नहीं। एतदर्थ युद्धाएं युज्यस्व—श्री छत्रपति द्वारा प्रारंभ किए गए स्वतंत्रता यज्ञ के होता का कंकण बांधने जो हाथ आगे आता है वह हमेशा ही धन्य है। हतो वा प्राप्ससि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्! तस्मात् युद्धायं युज्यस्व!! ऐसी दैवी चेतना श्रीमंत नाना साहब के नेत्रों को अधिक उग्रता और अधिक तेजस्विता देने लगी। श्री शिवराय को जो कर्तव्य निभाना पड़ा वही महान् कार्य अपने 1857 का स्वातंत्र्य समर – 79
हिस्से में आया है, इसलिए जय या पराजय जो भी मिले, मुझे तो स्वतंत्रता का नूतन 'शिवराज' या प्रथम पेशवा का मान बढ़ानेवाला अंतिम पेशवा बनना है-उनमें मन ने यह दृढ़ निश्चय किया। अपने देश और स्वराज्य का भविष्य निश्चित काने का वीरोचित निर्णय हो जाने के बाद श्रीमंत नाना का एकमात्र लक्ष्य था उस निर्णय को कार्य-रूप देना। स्वराज्य-प्राप्ति के लिए जो क्रांतियुद्ध लड़ना है उसे सफलता मिले, इसके लिए दो बातें अनिवार्य थी। पहली बात हिंदुस्थान के समस्त लोगों में स्वतंत्रता की जंगी और अनिवार्य इच्छा उत्पन्न होना और फिर उस इच्छा की सिद्धि के लिए-एक ही समय में पूरे देश द्वारा विद्रोह करना, हिंदुस्थान के समस्त लोगों में स्वतंत्रता की जंगी और अनिवार्य इच्छा उत्पन्न होना और फिर उस इच्छा की सिद्धि के लिए-एक ही समय में पूरे देश द्वारा विद्रोह करना, हिंदुस्थान के इतिहास को स्वतंत्रतागामी करना-ये दोनों ही काम विदेशियों को चकमा देकर ही किए जा सकते थे। क्योंकि जिस किसी परतंत्र देश के मन में स्वतंत्रता संग्राम छेड़ने की इच्छा हो उस देश में उस संग्राम की तैयारी गुप्त रीति से ही करनी पड़ती है। अन्यथा आरंभ में ही अमोघ शक्ति से हमला कर बलवान शत्रु उस प्रयास को चूर-चूर कर सकता है। यह ऐतिहासिक सत्य जानकर दोनों महान् विभूतियों-श्रीमंत नाना साहब और अजीमुल्ला खान ने सन् 1856 के प्रारंभ में स्वतंत्रता के लिए हिंदुस्थान को तन और मन से जाग्रत करने के लिए युद्ध संगठन बनाया। हिंदुस्थान में जितने राजे-रजवाड़े हैं उन सभी में यदि अंग्रेजों के विरूद्ध उठने की इच्छा उत्पन्न हो गई तो एक क्षण में ही अपना देश अपने हाथ आ जाएगा, यह तथ्य नाना के ध्यान में पहले ही आ गया था। इन हिंदुस्तानी सिर चढ़े राजाओं से आगे-पीछे अंग्रेजी राज को धोखा होगा, यह जानकर ही अंग्रेजी सरकार एक के बाद दूसरी रियासत छीनती चली जा रही है, यह वास्तविक स्थिति सारे राजे-राजवाड़ों के आगे रख उनके मन को स्वतंत्रतागामी करने के लिए नाना ने हर दरबार में अपना दूत भेजना प्रारंभ किया। कोल्हापुर, दक्षिण की सारी पटवर्धनी रियासतों, अवध के जमींदारों और दिल्ली से मैसूर तक की सारी राजधानियों में नाना के दूत और उनके पत्र सारे हिंदुस्थान को स्वतंत्रता युद्ध के लिए उड़ने की चेतना देते हुए घूम रहे थे। अंग्रेजी सत्ता के नीचे स्वराज्य और स्वधर्म की कैसी छीछालेदर होती जा रही है; जो रियासतें आज जीवित हैं, वे भी कल किस तरह नामशेष होनेवाली हैं तथा अंग्रेजों की विश्वासघाती गुलामी में अपने प्राणप्रिय हिंदुस्थान की कैसी बरबादी हो रही है-यह सब स्पष्ट और मार्मिक रीति से जनता के मन में भरते हुए मौलवी, पंडित एवं राजनीतिक संन्यासी सारे हिंदुस्थान भर में गुप्त रीति से विचरने लगे। दासता और गुलामी के प्रति गुस्सा उत्पन्न करते हुए यह दास्य नामशेष करना कितना सुलभ है, हिंदुस्थान के हृदय में हिंदुस्तान की तलवार ही कैसे धंसाई जा रही है और हिंदुस्तानी लोग स्वदेश के लिए मर मिटने के लिए तैयार हो जाएं तो एक क्षण में उन्हें अपना देश फिरंगियों के चुंगल से मुक्त करना कितना सरल है-यह सब राजा से रंक तक हर भारतीय हृदय को वे राजनीतिक संन्यासी भी प्रकार समझाकर कहते थे। हम सब देशबुंध एक ही जाएंगे तो मुट्ठी भर गोरों को धूल चटाकर स्वदेश को क्षण भर में स्वतंत्र 1857 का स्वातंत्र्य समर - 80
कर सकते हैं, यह आत्मविश्वास हर सिपाही और हर नागरिक में मन में इन राजनीतिक संन्यासियों ने किस तरह उत्पन्न किया था, यह उस समय के देशभक्तों के उद्गार में पग-पग पर दिखता है। काली नदी की लड़ाई में हारे हुए अंग्रेजों ने प्रश्न किया कि "हमारे विरुद्ध उठने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?' इस अक्खड़ प्रश्न के उत्तर में सिपाहियों ने कहा, "हिंदुस्थानी सिपाही एक हो गया तो गोरा चटनी के लिए भी नहीं मिलेगा।" अंग्रेज सरकार ने सन् 1857 के आरंभ में ही सिपाहियों की चिट्ठियां खोलनी शुरू कर दी थी। उन पत्रों में से एक पत्र हिंदुस्थान के लोगों की शक्ति के संबंध में कहता है-"विदेशियों को हम ही सिर चढ़ाए हुए हैं! यदि हम उठे तो फिरंगियों के मुट्ठी भर लोगों को तलवार के एक झटके में गारद कर सकते हैं। कलकत्ते से पेशावर तक मैदान साफ है।" श्रीमंत नाना साहब के स्वयं के हस्ताक्षर के पत्रों ने और ब्रह्मवर्त से भेजे गए संन्यासियों ने ऐसी उदात्त आत्मनिष्ठा के बीज भारतीय मन में बो दिए। परंतु आज उपलब्ध जानकारी से ऐसा दिखता है कि अवध का राज्य अधिगृहीत होने तक इन बीजों में जोरदार अंकुर नहीं फूटे थे।³¹ सन् 1856 में अवध का राज्य अधिगृहीत होते ही अकस्मात् सब लोगों में परतंत्रता के प्रति घृणा उत्पन्न हुई। स्वतंत्रता का रम्य एवं पुण्य दर्शन श्रीमंत नाना की तीक्ष्ण दृष्टि को इसके पहले ही हो चुका था और गुलामी की गंदगी की दुर्गंध बड़ी दूर से उन्हें आने लगी थी। परंतु जड़बुद्धि सामान्य जनसमूह प्रत्यक्ष साक्ष्य के बिना उसे ग्रहण न कर सका। फिर भी, अवध का राज्य अधिगृहीत होते ही हर कोई अपने अस्तित्व को धिक्कारने लगा और गुलामी में सड़ने की अपेक्षा मरना भला, ऐसी गर्जना कर अपनी तलवारों पर पानी चढ़ाने लगा। इसी समय हिंदुस्थान की इतिहास-प्रसिद्ध राजधानी को भी मानो नई चेतना मिल गई और दिल्ली के राजमहलों में स्वतंत्रता संग्राम की मंत्रणाएं शुरू हो गई। दिल्ली के बादशाह की बादशाही लेकर ही अंग्रेज नहीं रुके अपितु उनकी 1857 का स्वातंत्र्य समर - 81 ³¹ विभिन्न प्रांतों में भेजे गए राजकीय दूतों में से एक दूत मैसूर में पकड़ा गया। उसका कहा निम्न भाग बहुत महत्त्वपूर्ण होने से पूरा-का-पूरा यहां दिया जा रहा है-"श्रीमंत नाना ने अवध अधिगृहीत होने के पूर्व दो-तीन माह से पत्र-प्रेषक शुरू किया था। परंतु पहले उन्हें उत्तर नहीं आए। किसी को भी आशा नहीं थी। अवध का राज्य अधिगृहीत हो जाने पर नाना ने पत्रों की अधिक मार की, तब जाकर केवल लखनऊ के साहूकार नाना के विचार पड़ने लगे। पुरबिया लोगों का राजा मान सिंह भी मिल गया। फिर सिपाही लोगों ने अपनी-अपनी 'तजवीजें' करनी शुरू कीं और लखनऊ के साहूकारों से उन्हें सहायता मिलने लगी।" अवध अधिगृहीत होने तक बिलकुल उत्तर नहीं आया; परंतु वह राज्य अधिगृहीत होते ही सैकड़ों लोगों ने हिम्मत से आगे आकर नाना को वचन-पत्र भेजे। सिपाहियों की तजवीजें पहले से ही शुरू हो गई थी। फिर कारतूसों की घटना हुई और उस असंतोष पर नाना के पत्रों की बरसात होने लगी। जम्मू के गुलाब सिंह ने मैं सेना और खजाना लेकर तैयार हूं-ऐसा पत्र लिखा। और लखनऊ के साहूकारों ने धराशियां भी भेज दीं।
'बादशाह' की शाब्दिक पदवी भी उनके बाद न चले, यह भी तह कर लिया। ऐसी पिन्नावस्था में अपना पूर्व वैभव प्राप्त करने हेतु एक बार अंतिम प्रयास करके देखें और मरना ही है तो बादशाही की शान से मरें-ऐसा विचार राजमहल में होने लगा। इस काम में प्रमुख इस्लामी सत्ताओं की सहायता मिले, इसलिए मैं सुन्नी पंथ छोड़कर अवध के नवाब और ईरान के शाह का शिया पंथ स्वीकार करता हूं, ऐसी घोषणा भी बादशाह ने की। इसी समय अंग्रेजों की ईरान से लड़ाई शुरू हुई। हिंदुस्थान में भी उसी समय विद्रोह होना अपने लिए लाभदायक है, यह देखकर ईरान के शाह ने सन् 1857 के प्रारंभ में दिल्ली की मस्जिदों से इसी प्रकार की सार्वजनिक घोषणाएं होने लगीं-“फिरंगियों के कब्जे से हिंदुस्थान को मुक्त करने ईरानी फौज जल्दी ही आ रही हैं, इसलिए बूढ़े, जवान, छोटे-बड़े, सुशिक्षित-अशिक्षित, रैयत और लश्कर सारे लोग इन काफिर लोगों के शिकंजे से मुक्त होने के लिए रणांगण में कूद पड़ें।”³²
इस घोषणापत्र को सारे भारतीय समाचार-पत्रों ने प्रकाशित किया और दिल्ली के लोगों में क्रांतियुद्ध की लहर दौड़ गई। दिल्ली के बादशाह के सचिव मुकुंदलाल कहते हैं-‘-6राजमंदिर के द्वार पर और महल में मुगल खुले मन से युद्ध की चर्चा करते रहते थें सिपाही जल्दी ही विद्रोह कर राजमहल की ओर आएंगे और फिरंगियों का जुआ उतार फेंककर फिर से अपना राज्य स्थापित करेंगे, ऐसी निश्चयपूर्वक बातें वे करते और अपना राज्य हो जाने पर अपने देश की सारी सत्त एवं सारे अधिकार अपने ही हाथों में रहेंगे। ऐसी आशा से सब लोग उत्साहित हो जाते।” इस लोक-जागृति को उत्तेजना देने के लिए शहजादे और राजवंश के अन्य पुरुषों ने अलग-अलग उपाय किए और दिल्ली में क्रांति की ज्वालाएं सब ओर से सुलगने लगीं।
इस तरह दिल्ली के दीवाने-आम में और ब्रह्मवर्त के राजमंदिर में स्वतंत्रता संग्राम की गुप्त तैयारी हो रही थी। हिंदुस्थान की क्रांतिकारी शक्तियों को इकट्ठा और संगठित करने के लिए इन दो राजमहलों से जो प्रचंड प्रयास चल रहे थे वे इतने गुप्त रीति से किए जा रहे थे कि अंग्रेजों जैसे धूर्त लोगों को भी सन् 1857 में तोपों की गड़गड़ाहट होने तक उसकी रत्ती भर भनक नहीं थी। हजारों रूपयों की तनख्वाह और हाथियों का पुरस्कार देकर इस राजनीतिक जिहाद का उपदेश करने के लिए बड़े-बड़े मौलवी भेजे गए। वे गांवों और शहरों में इस राजनीतिक धर्मयुद्ध का उपदेश गुप्त सभाओं में देते हुए घूमते थे। सिपाहियों के शिविरों में रात को इनके व्याख्यान होते थे। लखनऊ की मस्जिदों में मौलवी जिहाद शुरू करने संबंधी खुले भाषण किया करते । पटना और हैदराबाद में रात में सभाएं होती और विभिन्न मौलवी सब स्तर के लोगों को
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³² के कृत-इंडियन म्यूटिनी', खंड 2 पृष्ठ 30 ।
स्वतंत्रता की रक्षा करने और स्वधर्म के लिए युद्ध करने की शिक्षा देते थे। जिनके पवित्र नाम से अपने हिंदुस्थान देश का इतिहास भूषित हुआ और जिनके पावन चरित्र का कथन आगे यथासंभव किया जानेवाला है, उन देशभक्त मौलवी अहमद शाह को लखनऊ में हिंदू और मुसलमानों को फिरंगियों के विरूद्ध एक साथ विद्रोह करने का खुला उपदेश देने के कारण फांसी का दंड दिया गया था। उपर्युक्त मौलवी की तरह ही सैकड़ों प्रचारक फकीरों और संन्यासियों का बाना धारण कर स्थान-स्थान पर गुप्त प्रचार करने लगे। भीख मांगने के बहाने हर घर में जाना सुलभ होने से और इस तरह शत्रु के मन में किसी तरह की आशंका उत्पन्न न होने के कारण ये देशभक्त फकीर और संन्यासी दर-दर घूमकर दासता के प्रति घृणा और भावी स्वतंत्रता की अभिलाषा लोक समूह में प्रदीप्त किया करते थे। विशेषतः सेना में इन लोगों का उपयोग बहुत था। क्योंकि हर टुकड़ी में एक पंडित और एक मुल्ला धार्मिक कार्यों के लिए रखना अनिवार्य होने से उस स्थान पर यही लोग जाकर बैठते थे। सिपाहियों के मन पर उनके धर्मगुरू का दबाव और प्रभाव होने से इन्हीं लोगों के द्वारा स्वतंत्रता के पवित्र धर्म की दीक्षा देना आवश्यक था। स्वतंत्रता के बना धर्मरक्षण असंभव है, यह मर्म जानकर हजारों धर्मगुरू इस राजनीतिक जिहाद का आह्वान करने आगे आए। सन् 1857 के अप्रैल माह में ऐसा ही एक देशभक्त फकीर वहां की सैनिक छावनी में आया। उसके पास हाथी-घोड़े आदि तथा अन्य संरजाम भी था। वहां के सिपाहियों को राजनीतिक जिहाद की दीक्षा देने में वह मग्न था-परंतु अंग्रेज अधिकारियों को उसपर शंका हुई और उन्होंने उसे वहां से निकल जाने का आदेश दिया। यह आदेश होते ही फकीर वहां से तो निकल गया, परंतु पास के ही एक गांव में घुसकर फिर अपनी गुप्त रचना का कार्य करने लगा।³³ ऐसे कितने की स्वतंत्रता के भक्त लोग अपनी जान हथेली पर लिये उस अपार रचना का गुप्त कार्य बड़े कौशल से कर रहे होंगे। परंतु वे ˙˙ थे कौन? कहां के? यह भी स्मृति आज जनता में नहीं रही-हाय-हाय! जिस प्रकार मस्जिद, मंदिर और भिक्षा के बहाने घर-घर में स्वतंत्रता की चेतना उत्पन्न करने मौलवी और पंडित, फकीर और संन्यासी भेजे गए वैसे ही विभिन्न स्थानों से अधिक महत्त्व के स्थान पर उपदेशकों और शिक्षकों को भेजा गया था। हिंदुस्थान में विभिन्न प्रदेशों के लोगों के एकत्रित होने के मुख्य स्थान बड़े-बड़े तीर्थ क्षेत्र हैं। ये क्षेत्र एक प्रकार से सारे प्रदेशों के लोगों के राष्ट्रीय सम्मेलन-स्थल ही हैं। मस्जिदों में स्थानीय लोग ही आएंगे, परंतु तीर्थों में भी राजकीय महंत नियुक्त किए गए और जल्दी ही गंगा के पुण्य स्नान के लिए आनेवाले हजारों बंधुओं को हिंदुस्थान के मन में मचल 1857 का स्वातंत्र्य समर – 83 ³³ मि. विलियम कृत-‘द मेरठ नैरटिव' ।
रहे स्वतंत्रता युद्ध में सम्मिलित होने का गुप्त उपदेश देते-देते पंडित लोग प्रत्येक तीर्थ में घूमने लगे।³⁴ विराट् जनसमूह के मन में एक ही इच्छा उत्कटता से उत्पन्न करने और उसकी अक्षय मुद्रा उनके हृदय पर अंकित करने के लिए कविता जैसा उत्तम साधन नहीं है। मार्मिक शब्द और आकर्षक पद्धति से पद्य में गुंथा हुआ सत्य जनता के हृदय में बहुत तेजी से अंकुरित होता है। इसीलिए राष्ट्रगीत की महत्ता बहुत मानी जाती है। राष्ट्रगीत राष्ट्र के हृदय की भावना एक वाक्य में प्रकट कर सकते हैं। जब-जब किसी प्रबल भावना से राष्ट्रीय आत्मा छटपटाने लगती है तब-तब उससे निकले सहज बोल ही तो राष्ट्रगीत हो जाते हैं। फ्रांस कि राष्ट्रीय आत्मा के बोल हैं-ला मार्सेलीज। सन् 1857 में स्वधर्म-रक्षण की उदात्त भावना से भारतभूमि की आत्मा फड़फड़ाते समय उसके मुख-मार्ग से ऐसा कोई राष्ट्रगीत निकला न होता तो आश्चर्य ही होता। दिल्ली के बादशाह के एक निजी गवैया ने सारे हिंदुस्थान के कंठ से निनादित होनेवाले एक राष्ट्रगीत की रचना स्वयं की थी। अपने पूर्वजों के पराक्रम का वर्णन करने के पश्चात् उस राष्ट्रगीत में वर्तमान की अवनति को करुण रस में चित्रित किया गया था। जो लोग एक दिन हिंदुस्थान के इस छोर से उस छोर तक विजयशाली वैभव से अभिषिक्त हुए थे उन्हीं लोगों को आज विश्व में गुलाम कहलाने की बारी आए, उनका धर्म अनाथ हो जाए और उनके अभिषिक्त सिर विदेशियों के पैरों तले कुचले जाएं-इस विपरीत और लज्जास्पद स्थिति के लिए उस राष्ट्रगीत में भारत माता आक्रोश कर रही थी। परंतु अब उसका यह आक्रोश हमें सुनाई देगा क्या? क्या अब वह सन् 1857 का गीत हम फिर सुन सकेंगे? उस राष्ट्रगीत का प्रारूप यदि कोई खोजकर निकाले तो अपने इतिहास पर उसके अक्षय उपकार होंगे। तब तक इतिहास इतना ही कहता है कि अपनी धरती माता सन् 1857 में आक्रोश कर रही थी और कानपुर के मैदान में कूदते समय नाना के कान में वही आक्रोश भयंकर रूप से गूंज रहा था। विस्तीर्ण रचना के साधन भी विस्तीर्ण ही होते हैं। जर्जर हुई मातृभूमि को मदोन्मत्त अत्याचारों के हाथ से छुड़ाने जैसा कार्य करने के लिए पहली मूलभूत एवं 1857 का स्वातंत्र्य समर - 84 ³⁴ 1. ट्रेवेलियन कृत-'कानपुर' । 2. “दिल्ली के राजमहल से बहुत पहले ही एक राजाज्ञा प्रसारित की गई थी, जिसमें मुसलमानों को यह निर्देश दिया गया था कि वे अपने सभी महत्त्वपूर्ण समारोहों पर एक गीत का गायन करें, जिसकी राज-दरबार के संगीतज्ञ ने रचना की है, जिसमें बड़े ही मार्मिक शब्दों में उनकी जाति के पराभव और उनके उस प्राचीन धर्म की अवमानना का वर्णन उपलब्ध है जो कभी उत्तर की हिममालाओं से दक्षिणी राज्यों तक व्याप्त था; किंतु जो अब शैतानों और विदेशियों द्वारा पददलित किया जा रहा है।” –ट्रेवेलियन कृत-'कानपुर' । मेरे मत से-वृत्ति का अभिप्राय समझ पाने में पूरी तरह असमर्थ ग्रंथकार को इतना लिखना ही पड़ा। यह उस राष्ट्रगीत की सुंदरता का परिचायक है।
महत्त्वपूर्ण कोई बात है तो वह है सब लोगों का मनःप्रवर्तन। वस्तुस्थिति के क्रांति करनी हो तो सबसे पहले मनःस्थिति पर विजय पानी चाहिए। यह मनःक्रांति की चौकियां स्थापित करनी चाहिए। यह मनःक्रांति संपादित करने के लिए मन की ओर जो भी रास्ते जाते हैं उन सारे रास्तों का क्रांति की चौकियां स्थापित करनी चाहिए। मानव मन सहज ही उत्सवप्रिय होता है, अतः सामान्य जनसमूह को वश में करने के लिए उत्सव के अतिरिक्त दूसरा राजमार्ग नहीं दिखता। इन उत्सवों को शक्कर में घोलकर सिद्धांतों की गोली दी जाए तो समाज का बालमन उसे रूचि से गटक लेता है और उससे रोग भी ठीक हो जाते हैं। ऐसे गहरे विचार से उस गुप्त संगठन के कार्य में विभिन्न चित्ताकर्षक उत्सवों से सामान्य जन को स्वतंत्रता युद्ध की शिक्षा देने की व्यवस्था की गई थी। विभिन्न प्रकार के चित्रों के खेल तैयार कर, स्वधर्म की और स्वतंत्रता की कसी अवहेलना हुई है-इसका हूबहू नाटक उन चित्रों द्वारा प्रस्तुत कराया जाता था; और उस सारे अपमान, गुलामी और परतंत्रता का प्रतिशोध किस तरह लिया जाए, इसके उद्दीपक और अनिवार्य चेतना देनेवाले चरित्र इन तारों से बंधी गुड़ियों से दरशाए जाते थे। चौपाल, पनघट, चौकी, धर्मशाला आदि बस्ती की खुली जगह में वीर रसोत्पादक गीत गाकर लोगों को चेताया जाता था। उत्तरी हिंदुस्थान का अति प्रिय गीत आल्हा, जिसे सुनने पर आठ दिन में कहीं-न-कहीं लड़ाई होनी ही चाहिए, ऐसी धारणा है, वह वीर रस से भरा गीत-गाते लोगों की बाहें फड़कने लगी। पूर्वजों के पराक्रम के स्मरण से जब उनका रक्त खौलने लगता तो तुरंत विषय घुमाकर वर्तमान दासता की पूरी बात प्रस्तुत की जाती, इस पर जो 'हर-हर महादेव' की गर्जना न करे, ऐसा कापुरुष कौन होगा? राष्ट्रकार्य के लिए केवल उस राष्ट्र के पुरुषों की अनुमति होने से ही बात पूरी नहीं होती। इसके लिए तो पुरुषों को जन्म देनेवाली कोख में भी राष्ट्र-क्षोभ के बीज अंकुरित होना आवश्यक है। भारतीय महिलाओं की शूरता कितनी सहायक होती है-यह सिखों का और राजपूतों का इतिहास अभिमानपूर्वक कहता है। भारतीय स्त्रियों की मन-सामर्थ्य संपादन हेतु इस गुप्त संगठन के कार्यक्रम में वैदू लोगों की महिलाओं को लगाया गया था।³⁵ इन वैदू महिलाओं की घरेलू दवाइयां एवं सामान्य ज्योतिष कार्य के लिए हिंदुस्थान के सामान्य वर्ग की महिलाओं में हमेशा आवाजाही होती है। अतः भारतीय स्त्रियों को ऐसी दवाई देने के लिए जिससे अपनी मातृभूमि का यह गुलामी का रोग ठीक हो और वह दवाई देने पर गुलामी का भूत मां को कब छोड़ेगा और यह भूत-बाधा उतरते ही उसे स्वतंत्रता का सुंदर बालक कब उत्पन्न होगा, यह भविष्य बताने का कार्य ये वैदू महिलाएं जितनी कुशलता से करती थीं उतना कोई धन्वंतरि भी नहीं कर सकता था। इन वैदू महिलाओं ने महिलाओं में और मौलवी तथा पंडितों ने पुरुष समाज 1857 का स्वातंत्र्य समर - 85 ³⁵ ट्रेवेलियन।