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१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

प्रकरण-२ मेरठ देशवीर मंगल पांडे के बलिदान से सन् 1857 का बीज जमते ही उसे अंकुरित होने में देर क्यों हो? जिस 19वीं रेजिमेंट में मंगल पांडे था उस रेजिमेंट के सूबेदार को भी इस आरोप में फांसी दी गई कि उसने रात में क्रांतिकारी बैठकें कीं और 19वीं रेजिमेंट व 34वीं रेजिमेंट इन दोनों ने मिलकर पूरे प्रदेश में विद्रोह करने का गुप्त षड्यंत्र रख-यह उनके पास मिले कागज-पत्रों से सिद्ध हो जाने पर उन्हें निःशस्त्र कर नौकरी से निकाल देने का दंड दिया गया। सरकार के हिसाब से वह दंड था; परंतु इन दोनों ही रेजिमेंट के सिपाहियों को यह अपना बड़ा सम्मान लग रहा था। जिस दिन उन्हें शस्त्र नीचे रखने का आदेश हुआ उस दिन युरोपियन सेना को पूरी तरह तैयार रखा गया था। अंग्रेज अधिकारियों को विश्वास था कि नौकरी से निकाल देने के दंड से सिपाही पश्चात्ताप करेंगे; परंतु उन हजारों सिपाहियों ने किसी बहुत ही अपवित्र वस्तु की तरह कंपनी की दासता पर खुशी से लात मारी। अपने बूट और यूनिफार्म फाड़-फूड़कर फेंक दिए। उन सिपाहियों को अपने वेतन से सैनिक टोपियां लेनी पड़ती थी। अतः उसे उनकी निजी संपत्ति मान कंपनी ने उन्हें छूट दी थी कि वे चाहें तो उसे ले जाएं । परंतु नदी में नहाकर बाहर आने के बाद फिर से गुलामी का चिह्न को स्पर्श किया तो। अब हिंदुस्थान को कोई दूसरा आकर टोपी पहनाए, वे दिन लद गए हैं। फेंक दो दासता की टोपियां। हजारों टोपियां आकाश में दिखने लगी। परंतु गुरूत्वाकर्षण के जिददी स्वभाव के कारण वे फिर से हिंदुस्थान की भूमि पर ही गिरी। फिर से भू देवी को 1857 का स्वातंत्र्य समर - 100

दासता की छूत लगी। दोड़ो सिपाहियों, उन दास्य चिन्हों को उन अंग्रेजी अधिकारियों के सामने फाड़कर और पैरों तले कुचलकर धूल में मिला दो। हजारों सिपाही उन दास्य-दूषित टोपियों को कुचलने लगे और बलहीन हुए अंग्रेज अधिकारी अपनी सत्ता का खुला अपमान करता यह भारतीय नृत्य देखते रहे।⁴⁴ उत्तर प्रदेश के उच्च पुरबिया ब्राह्मण कुल में जनमे मंगल पांडे का रक्त केवल बंगाल में ही स्वतंत्रता के बीज नहीं जमा रहा था, उधर अंबाला में भी उसकी विद्युत चेतना का संचार हो गया था। अंबाला में सिपाहियों ने एक नई पद्धति चालू की थी। वह था-यदि कोई अधिकारी उनके विरूद्ध जाए तो उसका घर-बार जलाकर भस्म कर डालना। रोज रात को देशद्रोहियों और विदेशियों के घर जलने लगे। यह काम इस झटके से और गुप्त ढंग से होता मानो प्रत्यक्ष अग्नि नारायण ही क्रांति पक्ष की गुप्त समिति का सदस्य बन गया है। बहुत आग गली और जो आग लगानेवाले को पकड़वा देगा, उसको हजारों रुपयों के इनाम भी घोषित किए गए। पर एक आदमी भी सूचना न देता। अंत में परेशान होकर स्वयं कमांडर-इन-चीफ ॲन्सन गवर्नर जनरल को लिखता है- “It is really strange that the incendiaries should never be detected. Everyone is on the alert here, but still there is no clue to trace the offenders.” फिर अप्रैल के अंत में वह लिखता है – “We have not been able to detect any of the incendiaries at Ambala. This appears to me extraordinary; but it shows how close the combinations among the conceive to be their wrongs and how great the dread of retaliation to any one who would dare to become an informer.” हिंदुस्थान के देशद्रोहियों पर तो अंग्रेजी साम्राज्य आधारित था! परंतु अंबाला में एक भी देशद्रोही न मिला। इससे स्वयं कमांडर-इन-चीफ गऊ बन गया और सिपाहियों के गुप्त षड्यंत्र की स्तुति करते हुए उनपर गुस्सा करता रहा तो इसमें आश्चर्य की बात क्या थी! अब यह आग हिंदुस्थान में जगह-जगह आरंभ हो गई थी। अंतिम विशाल आग भड़काने के पहले इधर-उधर छोटी-बड़ी गड़बड़ शुरू हो गई थी। अंबाला की भांति वहां भी अधिकारियों और देशद्रोहियों के घर सुलगने लगे थे। दिनांक 31 मई को सारा हिंदुस्थान एक साथ सुलगा दिया जाए, जिससे इधर-उधर जान छिपाने का अवसर न पाकर परतंत्रता अंदर-ही-अंदर राख हो जाएगी, यह निर्धारित योजना-लखनऊ की गुप्त समिति को यद्यपि मान्य थी, फिर भी वहां के तेजस्वी सिपाही बहादुरों को अपना गुस्सा दबाए रखना कठिन हो गया। उसमें भी हर रात की गुप्त सभाओं में चल रहे उद्दीपक भाषणों और जलनेवाले घरों के भयंकर दृश्यों से सिपाहियों को रुकना और अपने को रोकना कठिन 1857 का स्वातंत्र्य समर – 101 ⁴⁴ रेड पैफलेट, खंड 1, पृष्ठ 34।

हो गया। मई की 3 तारीख को ऐसे ही चार अटल सिपाही बहादुर बलपूर्वक लेफ्टिनेंट मेशम के तंबू में घुसे और बोले, “आपसे यद्यपि हमारा कोई व्यक्तिगत द्वेष नहीं हैं, फिर भी चूंकि आप फिरंगी हैं, इसलिए आपको मरना होगा।”⁴⁵ राक्षस रूप में आए उन सिपाहियों को देखते ही भयभीत हुआ वह लेफ्टिनेंट उनसे घिघियाकर कहने लगा, “आप चाहें तो मुझे एक क्षण में मार सकते हैं, परंतु मुझ गरीब को मारने से आपको क्या मिलेगा? दूसरा कोई आएगा और मेरा काम करने लगेगा। अपराध मेरा न होकर इस राज्य व्यवस्था का है। फिर मुझे क्यों नहीं छोड़ते?” इन बातों से सिपाही बहादुर थोड़े होश में आए और सारी राज्य व्यवस्था को एकदम मारना चाहिए, यह मानकर लौट आए। पर यह बात अधिकारियों तक गई और तुरंत ही हेनरी लॉरेंस ने पलटन को धोखे से तोपखाने की मार में खड़ा करके निःशस्त्र कर दिया। परंतु मेरठ की ओर तो दांव इससे भी अधिक रंगत पकड़ रहा था। कारतूसों के संबंध में सिपाही वास्तविक शिकायत करते हैं या नहीं, यह पक्का जानने के लिए एक टुकड़ी को वे कारतूस देने का निश्चय किया। उस परेड में आए नब्बे सिपाहियों में से पूरे पांच ने भी उन कारतूसों को नहीं छुआ। परंतु वे कारतूस फिर से दिए गए। फिर से सिपाहियों ने उन्हें स्पर्श करने से मना किया और वे अपने-अपने स्थान पर चले गए। उनका यह आचरण जनरल के कानों तक जाते ही उसने कोर्ट मार्शल के सामने उस सारे सिपाहियों को खड़ा कर पचासी घुड़सवारों को आठ से दस वर्ष तक सश्रम कारावास का दंड दिया। मई की 9 तारीख को एक हृदयद्रावक घटना घटी। यूरोपियन कंपनी और तोपखाने की मार के पहरे में ऊंचाई पर पचासी सिपाहियों को खड़ा किया गया। शेष नेटिव सिपाहियों को यह तमाशा देखने को जान-बूझकर बुलाया गया और फिर उन पचासी देशभक्त सैनिकों को अपने कपड़े उतरवाकर लोहे की भारी-भारी बेड़ियां उनके पैरों और हाथों में ठोंक दी गई। शत्रु की छाती में घुसनेवाली तलवार के सिवाए जिनके हाथों में अन्य कुछ भी न पड़ा था, अपने उन मर्द स्वदेश बंधुओं के हाथ में आज फिरंगियों ने लोहे की बेड़ियां ठोक दीं, यह देखकर सारे भारतीय सिपाहियों के शरीर थर्रा उठे। पर सामने ही खड़ी तोपों को देखकर हर तलवार म्यान में ही फड़फड़ाती रही। फिर उन पचासी शूर सिपाहियों को-तुम्हें दस वर्ष के कठोर कारावास का दंड दिया गया है-यह सुनाया गया और हाथ-पैर की भारी-भारी बेड़ियों के बोझ तले झुके वे धर्मवीर 1857 का स्वातंत्र्य समर - 102 ⁴⁵ “व्यक्तिगत रूप से तो तुम्हारे प्रति मन में कोई द्वेष भावना नहीं है; किंतु तू फिरंगी है, अतः तुझे मरना ही चाहिए।” -चार्ल्स बाल कृत-'इंडियन म्यूटिनी', खंड 1, पृष्ठ 42

कारावास की ओर चल दिए। उस समय अपने धर्म की रक्षा के लिए कारावास में जा रहे उन सिपाहियों को स्वदेश बंधुओं ने कैसे नेत्र संकेत किए, यह भविष्य शीघ्र ही कहेगा। गाय और सूअर के रक्त से बने कारतूस अपने पर जबरन लादे जाएं और उसे कोई रोके तो उसे दस वर्ष के कठोर कारावास का दंड भुगतना पड़े, ऐसा भयंकर अपराध जिस दासता में होता है, उस फिरंगी दासता का हम टेंटुआ दबाएंगे और दस वर्ष के लिए तुम्हें पहनाई गई बेड़ियां और सौ वर्षों से अपनी मातृभूमि के पैरों में पड़ी गुलामी की बेड़ियां इन दोनों को जल्दी ही तोड़ देंगे, यह उन नेत्र संकेतों का अर्थ हो सकता है। यह घटना प्रातःकाल की थी। प्रिय देशबंधुओं को अपनी आंखों के सामने परदेशी और परधर्मी लोग बेड़ियां डालकर कारावास में डालें और उस दृश्य को खुली आंखों से देखें, इसका दुःख झेलते, मन-ही-मन जलते सिपाहियों का अपनी-अपनी बैरकों में लौटते ही धीरज टूटने लगा। शहर के बाजार में वे गए तो वहां की महिलाएं उनका तिरस्कार कर कहने लगी-‘‘तुम्हारे बाप कारावास में भेजे गए हैं और तुम यहां मक्खियां मारते फिर रहे हो। थू तुम्हारी जिंदगी पर!!’’46 पहले ही गुस्से से पगलाए सिपाहियों को यह कैसे सहन होता कि रास्ते में औरतें उनके जीवन पर थूकें! उस दिन रात में सारी लाइन पर सिपाहियों की गुप्त बैठकें होती रही। क्या अब भी मई की 31 तारीख तक रुकना है!? इधर अपने भाइयों के कारावास में पड़े होते हुए हम नामर्दों की तरह चुप होकर बैठें! रास्ते में औरतें-बच्चे अपने पर देशद्रोही कहकर थूकने लगें, फिर भी दूसरों की राह देखते चुप बैठना? 31 मई की तारीख अभी कितनी दूर है। तब तक उन फिरंगियों के झंडे तले रहना? नहीं-नहीं, कल ही रविवार है। इस रविवार का सूर्य नारायण अस्तमान होने के पहले कारावास के उन देशवीरों की बेड़ियां टूट ही जानी चाहिए। स्वदेश जननी की बेड़ियां टूटनी ही चाहिए और स्वतंत्रता का झंडा लहराना ही चाहिए। तत्काल दिल्ली संदेश भेजे गए-‘‘हम तारीख 11 या 12 को वहां आ रहे हैं; सारी तैयारी करके रखो।—’’ 10 मई का रवि उदय हुआ। सन् 1857 की गुप्त तैयारी की अंग्रेजों को इतनी कम जानकारी थी कि मेरठ के सिपाहियों की दूसरों से तो क्या आपस में भी कुछ सामान्य योजना बन रही है, इसकी भी उनको आशंका नहीं हुई। रविवार को सुबह उनका नित्यकर्म शांति से शुरू हुआ। घोड़े की गाड़ियां, शीत उपचार, सुगंधित फूल, हवाखोरी, गाना-बजाना-सारी बातें हमेशा की तरह चालू हो गई। साहबों के घर के नेटिव नौकर अकस्मात् नौकरी पर नहीं आए, इसका भी उन्हें कोई अधिक आश्चर्य नहीं हुआ। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 103 46 1. जे.सी. विल्सन। 2. रेड पैंफलेट, खंड 1 ।

इधर सिपाहियों के बीच बहस चल रही थी कि पूरा कत्लेआम करना है या नहीं। 20वीं पलटन और तीसरी घुड़सवार पलटन के सिपाही बोले, "चर्च में फिरंगियों के जाते ही 'हर-हर महादेव" बोलो। और लश्करी ओर मुलुकी, सैनिक और नागरिक बच्चे-औरतें-मर्द-जो मिले उसे काटते दिल्ली चलो।" यहीं अंत में तय हुआ। इधर मेरठ में पास-पड़ोस के गांवों से भी टूटे-टाटे शस्त्र हाथ में लिये हजारों लोग आकर मिल रहे थे। स्वदेश-कार्य के लिए आए उन ग्रामीणों की तरह मेरठ के नागरिक भी सज्जत होने लगे। फिर भी अंग्रेजों को तिनके भर जानकारी नहीं थी। रविवार की शाम के पांच बजे चर्च का घंटा उस शांत वातावरण में हल्के-हलके बजने लगा और अंग्रेज लोग अपनी-अपनी पत्नियों सहित हंसते-खेलते चर्च की ओर जाने लगे। परंतु उस दिन का चर्च का घंटा अंग्रेजों के लिए प्रार्थना नहीं बजा रहा था-वह तो उनकी मृत्यु वेला बजा रहा था। क्योंकि उधर सिपाहियों की लाइन में एक ही गर्जना उठ रही थी-'मारो फिरंगी को'। इस ध्वनि से सारा वातावरण भर गया। सबसे पहले कारावास में पड़े धर्मवीरों की बेड़ियां तोड़ने सैकड़ों घुड़सवार उधर गए। उस कारावास के रक्षक भी क्रांतिपक्ष के ही थे, अतः 'मारो फिरंगी की' की रण-ध्यानि सुनते ही वे कारागृह छोड़कर अपने साथियों से मिल गए। दूसरे ही क्षण उस अभागे कारागृह की दीवारें ढहने लगीं। दस वर्ष कठोर कारावास भोगने के लिए फिरंगियों द्वारा पहनाई गई बेंडियां थर-थर कांपने लगी। एक देशभिमानी लुहार आगे आया और उसने जल्द ही उन बेड़ियों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। प्रचंड वीर गर्जना करते वे कारावास भोग रहे धर्मवीर बाहर आए, घोड़ों पर चढ़े और अपनी मुक्ति के लिए आए देशबंधुओं के साथ उस कारावास को पीछे छोड़ चर्च की ओर पूरे जोश से दौड़े। इधर पैदल टुकड़ी ने दंगा शुरू कर दिया। ग्यारह पलटनों का कर्नल फिनीस अपने घोड़े पर बैठ यों ही उधर आया था। सिपाहियों के सामने खड़ा होकर हमेशा की अकड़ के साथ उन्हें डांटने-डपटने लगा तो सिपाही उसका काल बन उस पदा दौड़ पड़े। 20वीं पलटन के एक सिपाही ने अपनी पिस्तौल उस पर चलाई और वह कर्नल अपने घोड़े के साथ भूमि पर गिर गया। पैदल और घुड़सवार, हिंदू और मुसलमान सारे-के-सारे गोरे रक्त के लिए इतने बेचैन हो गए थे कि यह फिनीस का रक्त तो दरिया में खसखस थी। मेरठ के बाजार में यह समाचार पहुंचते ही वह पूरा शहर जलने लगा और जहां-जहां भी अंग्रेज मिला वहां-वहां उसे गारद किया गया। सदर बाजार के सारे लोग हाथ में तलवारें, भाले, लाठियां, छुरियां-जो जिसके हाथ में लगा वह शस्त्र लेकर गली-गली में दौड़ने लगे। जिस किसी भवन पर अंग्रेजी सत्ता के चिह्न थे वे सारे भवन, बंगले, कार्यालय सब आग में जलने लगे। आकाश में धुएं के बादल, अग्नि, अग्नि की रंग-बिरंगी ज्वालाएं हजारों लोगों के हल्ले-गुल्ले की मिली-जुली आवाजें और सबसे ऊंची आवाज-मारों फिरंगी को- 1857 का स्वातंत्र्य समर - 104

से मेरठ का आकाश भयानक हो उठा। विद्रोह प्रारंभ होते ही पूर्व संकेतों के अनुसार मेरठ से दिल्ली की ओर जानेवाली तार तोड़ डाली गई और उस रास्ते पर अपना कड़ा पहरा बैठा दिया। वह अंधियारी रात होने से अंग्रेजों को बड़ी आफत हुई। कोई तबेले में छुपा तो कोई सारी रात पेड़ के नीचे बैठा रहा-कोई घर की तीसरी मंजिल पर तो कोई जमीन के गड़ढे में। किसी ने किसान का वेश बनाया तो कोई बटलर के पांव पकड़े रहा। विद्रोही सिपाही अंधियारी होते ही दिल्ली की ओर कूच करने लगे थे; परंतु उनके प्रतिशोध का अधूरा काम मेरठ के लोगों ने स्वयं ही पूरा किया। अंग्रेजों के लिए इतना गुस्सा उत्पन्न हुआ था कि अंग्रेजों के स्पर्श होने से जो घर जलाने लायक हो गए थे, पर पत्थर के हाने से जलाए नहीं जा सकते थे, उन्हें चूर-चूर कर दिया गया। वहां के कमिश्नर ग्रीडेड के बंगले को आग लगा दी गई, फिर वह वह अंदर ही छिपा बैठा रहा। यह बात बाहर ज्ञात हुई तो मेरठ के लोग सशस्त्र होकर कर्कश गर्जना करते इकट्ठा हो गए। त बवह कमिश्नर अपने बटलर के पांव पड़ने लगा और पैरों के नीचे फैली आग और चारों ओर शत्रुओं का घेराव, मृत्यु के ऐसे जबड़े से अपने परिवार को बचाने के लिए उसकी चिरौरी करने लगा। वह बटलर उस पर द्रवित हो गया और क्रांतिकारियों से बोला, "कमिश्नर घर में नहीं है" और जहां वह छिपा था उसकी विपरीत दिशा में चलने का आग्रह करते हुए उन्हें दूर तक ले गया। इतने में वह कमिश्नर गिरते घर से भाग गया। मिसेज चैबर्स के बंगले में विद्रोहियों ने उसे छुरा भोंककर, खींच-घसीटकर फेंक दिया। कैप्टन क्रेजी ने अपनी पत्नी और बच्चों का गोरा रंग छिपाने के लिए उन्हें घोड़े की जीन पहनने को दी और उन्हें काले रंग से रंगकर एक मंदिर के खंडहर में रात भर छिपाके रखा। डॉक्टर ख्रिस्टे और व्हेटरनरी सर्जन फिलिप्स को पत्थरों से कुचलकर मारा गया। लेफ्टिनेंट हेंडरसन और लेफ्टिनेंट पेंट का पीछा कर उन्हें गारद कर दिया गया। घरों में आग लगाने से कितने ही औरत-बच्चें जल मरे। जैसे-जैसे अंग्रेजी रक्त अधिकाधिक गिरता गया वैसे-वैसे विद्रोहियों की कर्कश गर्जना और भयानक अट्टाहस का उत्साह बढ़ने लगा। रास्तों में पड़े अंग्रेजों के शवों को लोग लतियाने लगे। बीच में किसी विद्रोही को गोरे लोगों पर वार करते किंचित् दया आ जाती तो अन्य हजारों लोग 'मारो फिरंगी को' कहते-चिल्लाते-दौड़ते आते और कारावास में डाले गए उन पचासी निरपराध धर्मवीरों में से एकाध वहां होता तो उसके हाथ पर चढ़ाई गई फिरंगी बेड़ी के निशान की ओर अंगुली दिखाकर-'इसका प्रतिशोध लेना है' कहते हुए वार-पर-वार करने लगते।⁴⁷

वास्तविकता यह थी कि यदि कहीं पहले विद्रोह खड़ा होने की संभावना नहीं थी तो वह मेरठ में; क्योंकि वहां नेटिव सिपाहियों की दो पैदल रेजिमेंट और एक

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⁴⁷ एक हिंदू द्वारा लिखित 'विद्रोह के कारण'।

घुड़सवार रेजिमेंट थी। परंतु गोरे सिपाहियों की एक पूरी राठफलमेंस बटालियन और एक ड्रवून रेजिमेंट के साथ एक उत्तम तोपखाना उनके पास था। ऐसी स्थिति में सिपाहियों को सफलता मिलने की संभावना बिल्कुल नहीं थी। विद्रोह होते ही वहां अंग्रेजों से प्रतिशोध लेने का कार्य मेरठ शहर को सौंपकर विद्रोही सिपाही तत्काल इसी उद्देश्य से दिल्ली की ओर जा रहे थे। उनका पीछा कर उन्हें रोकना और पूर्ण नाश करने का काम भी बड़ा सरल था। पर अंग्रेजी सेना और उनके अधिकारियों में उस समय जो भीरूता, अव्यवस्था और चिंता दिखाई दी उस पर तो अंग्रेज इतिहासकारों को भी बहुत लज्जा आती है। नेटिव घुड़सवारों का कर्नल स्मिथ उसकी पलटन विद्रोह कर गई है, यह ज्ञात होते ही उधर देखे बिना भाग खड़ा हुआ। तोपखाने का अधिकारी तैयार होकर कुछ करे इससे पहले सिपाही दिल्ली की ओर चल पड़े थे। उसमें भी आगे न बढ़ते हुए अंग्रेजी सेना घबराई-सी जगह-जगह सारी रात पड़ी रही। वास्तविकता यह है कि मेरठ के ब्रिदोह से अंग्रेजों का बड़ा नुकसान हुआ। यह अभूतपूर्व और अकस्मात् घटित प्रचंड घटना क्या है, इसका दूसरे दिन तक उन्हें कुछ पता न चला। इधर सिपाहियों ने नक्शा अच्छी तरह बनाया हुआ था। विद्रोह करते ही कारागार से बंदियों को छुड़ाना और बाद में अंग्रेजी रक्त की बरसात करना। इस अकस्मात् हमले से अंग्रेज लोग बुरी तरह घबरा उठे। उस एक झटके में मेरठ शहर ने विद्रोह करके सब ओर आग लगाकर एवं चारों ओर से मार-पीटकर अंग्रेजों के लिए यह पता तब तक सैनिक दिल्ली की ओर रवाना हो गए। यह दिल्ली की ओर जाने की योजना बहुत चतुराई भरी थी। पहले झटके में दिल्ली पर कब्जा कर विद्रोह को एक क्षण में राष्ट्रीय होने की सूचना अंग्रेज अधिकारियों के कानों तक पहुंचती, तभी दिल्ली की ओर जानेवाले तार तोड़कर और रास्ता रोककर, कारागृह से अपने धर्मवीरों को मुक्त करके, अंग्रेजों के रक्त के नाले बहाकर, वे दो हजार सिपाही गोरे रक्त से रंगी अपनी तलवारें ऊंची उठाकर गर्जना करने लगे-'दिल्ली! दिल्ली!! चलो दिल्ली!!!' 1857 का स्वातंत्र्य समर – 106

प्रकरण-3 दिल्ली श्रीमंत नाना साहब पेशवा अप्रैल के अंतिम भाग में दिल्ली आ गए थे। तब निश्चित हुई बातों के अनुसार 31 मई के रविवार की सारे लोग उत्सुकता से राह देख रहे थे। दिनांक 31 मई को सारे हिंदुस्थान भर में 'हर-हर महादेव' एक साथ गूंज उठा होता तो सच में अंग्रेजी साम्राज्य की इतिश्री होने और स्वतंत्रता की विजय दुंदुभि बजाने के लिए इतिहास को अधिक देर ठहरना न पड़ता; परंतु मेरठ के अग्रिम विद्रोह से क्रांति की तुलना में अंग्रेजों को अधिक लाभ हुआ।48 मेरठ के बाजार में जिन तेजस्विनी महिलाओं ने सिपाहियों की जिंदगी पर थूका और मर्द हो तो कारागृह के वीरों को छुड़ाकर लाओ, 'ऐसा कहकर हमारे इतिहास की नारियों की तेजस्विनी चेतना में एक स्फूर्तिदायी कथा तो 1857 का स्वातंत्र्य समर - 107 48 "इतना सुनिश्चित था कि यदि संपूर्ण हिंदुस्थान में सहसा ही विद्रोह की ज्वाला धध उठती और अंग्रेजों को इस विद्रोह के होने से पूर्व इसका पता न लग पाता तो हमारे (गोरे) बहुत ही थोड़े व्यक्ति इस वेगवान संहार से बच पाते। ऐसी स्थिति में ब्रिटिश राष्ट्र के लिए भारत पर पुनः विजय प्राप्त कर पाना एक अत्यंत ही कठिन कार्य होता अथवा अपने पूर्वी साम्राज्य में पराजय एक एक अमिट कलंक सर्वदा के लिए हमारे मस्तक पर अंकित हो जाता।" "मेरठ के इस भयानक विद्रोह से हमें एक महान् लाभ अवश्य हुआ। वह यह था कि समूचे भारत के सैनिकों के विद्रोह का कार्यक्रम 31 मई, 1857 के निश्चित दिन कार्यान्वित होना था। किंतु इस समय से पूर्व भड़के उभार ने हमें समय से ही जाग्रत् कर दिया।" -व्हाइट का इतिहास, पृष्ठ 17

जोड़ी, फिर भी उन्होंने परदेशियों में सारे सिपाही नेटिव ही थे। उन्हें भी मंगल पांडे का समाचार सुनने के बाद से धीरज रखना कठिन हो रहा था। पर बादशाह और बेगम जीतन महलने बड़ी कुशलता से सारी दिल्ली की गुप्त समिति को संदेश आया कि हम कल आ रहे हैं, तैयारी रखो!! यह अपूर्व और आकस्मिक संदेश दिल्ली में पहुंचते -न-पहुंचते मेरठ से दो हजार सिपाही ‘दिल्ली! दिल्ली! की गर्जना करते हुए निकल गए। उस रविवार की रात को पूर्ण रतजगा रहा। हजारों घोड़े दौड़ रहे हैं, हिनहिना रहे हैं, तलवारों और बैनेटों की खनखनाहट हो रही है-ऐसा यह भयानक दृश्य देखते हुए रात जाग रही थी। अंत में भोर हुई और अपना पीछा करता मेरठ का तोपखाना अभी भी नहीं आया, यह देखकर उत्साहित वे सिपाही रात भर हुए कष्टों को भूलकर एक क्षण भी कहीं न ठहरकर वैसे ही आगे बढ़े। मेरठ से दिल्ली कोई 32 मील है। सुबह के आठ बजे सेना के प्रमुख हिस्से को यमुना का पवित्र दर्शन हुआ। स्वतंत्रता के पवित्र कार्य के लिए जानेवाले योद्धाओं को अपने शातल जल से सिंचित कर प्रोत्साहन देनेवाली भगवती यमुना उन्हें दिखते ही उन हजारों योद्धाओं ने ‘जय जमुनाजी’ कहकर उसका वंदन किया। यमुना से दिल्ली शहर को जोड़नेवाले नाव के पुल पर से भारतीय घोड़े दौड़ते चले जा रहे थे। पर वे किसलिए दौड़ रहे हैं, यह यमुना नदी को ज्ञात है क्या? उसे यह बताए बिना जाना इष्ट नहीं है तो पकड़ो, वह कोई अंग्रेज पुल पर से जा रहा है; उसे और उसके गोरे रक्त को फेंक दो इस काली कालिंदी में। सिपाही क्यों दौड़े जा रहे हैं, इसका पूरा समाचार वह रक्त यमुना नदी को दे देगा। वह नाव का पुल उतरकर सिपाही दिल्ली की प्राचीर से भिड़ गए। यह भनक लगते ही दिल्ली में स्थित अंग्रेज अधिकारी नेटिव सिपाहियों को परेड पर बुलाकर उन्हें राजनिष्ठा के व्याख्यान देने लगे। फिर 54वीं पलटन को लेकर कर्नल रिप्ले विद्रोहियों का सामना करने निकला। 54 वीं पलटन के नेटिव सिपाहियों ने निकलते समय ही कहा किय कर्नल साहब, उन मेरठ के सिपाहियों को दिखाइए तो सही; फिर हम उन्हें देख लेंगे। क्या देख लेंगे, यह उस कर्नल को क्या मालूम? उसने बड़े गर्व से उन्हें शाबासी दी और वह पलटन विद्रोहियों का सामना करने चल दी। थोड़ा आगे जाते ही प्राचीर से मेरठ के घुड़सवार दौड़ते हुए आते दिखाई दिए। गुस्से से उग्रतम हुए और गोरे रक्त की अनिवार्य मांग करनेवाले उन घुड़सवारों के पीछे लाल रंग की वरदी में मेरठ का पैदल दल भी था। एक-दूसरे को देखते ही उन्होंने एक-दूसरे को सलामी दी और मेरठ की सेना दिल्ली की सेना से मिलने लगी। मेरठ की सेना ने ‘फिरंगी राज्य का नाश हो’ और ‘बादशाह की जय हो’ के नारे लगाए ये नारे सुनते ही दिल्ली की सेना ने ‘मारो फिरंगी को’ की प्रति गर्जना की। यह क्या है? कहनेवाला कर्नल रिप्ले क्षण में ही गोलियों की बौछार में भूमि 1857 का स्वातंत्र्य समर — 108

पर गिर गया और फिर उस रेजिमेंट के साथ आए सारे अंग्रेजों को एक साथ कत्ल कर दिया गया। इस तरह अपने स्वदेश-प्रेम पर फिरंगी रक्त की मुहर लगाकर मेरठ के घुड़सवार नीचे उतरे और दिल्ली के सिपाहियों से गले मिलने लगे। यह समाचार सुनते ही शहर का कश्मारी दरवाजा खुल गया और उस इतिहास-प्रसिद्ध दरवाजे से 'दीन-दीन' की गजना करते स्वतंत्रता योद्धा दिल्ली में प्रवेश कर गए। मेरठ सेना की दूसरी टुकड़ी कलकत्ता दरवाजे से अंदर घुसने लगी। वह दरवाजा पहले बंद किया हुआ था, परंतु इन सिपाहियों की भयानक थपकी पड़ते ह ीवह धीरे-धीरे हटने लगा और जल्दी ही उस दरवाजे पर नियुक्त पहरेवालों ने 'दीन-दीन' कहते विद्रोहियों को अंदर कर लिया। कलकत्ता दरवाजे से अंदर घुसे सिपाही प्रथम दरियागंज के यूरोपीय बंगलों की ओर गए और वे भवन कुछ क्षणों में आग बन गए। जो विदेशी लोगों को आश्रय दिया हुआ है, यह ज्ञात हुआ। विलायती आदमियों को अंदर लेने के कारण दरियागंज के घरों को जो दंड मिला उसे देखने के बाद भी यह अस्पताल यदि विलायती लोगों को अंदर लेने का साहस करे तो किसी को भी गुस्सा आना स्वाभाविक है। उस अस्पताल की जमकर पिटाई करने के बाद वह शस्त्रधारी उग्रता अपने असंख्य अवयवों के साथ दिल्ली के घर-घर में गोरे रक्त को सूंघने चली! पर निशान के बिना सेना कैसी? और ऐसी सेना का कपड़े का निशान किस काम का? इसलिए जहां भी गोरा सिर मिले वहां उसे भाले पर टांगकर उसका भयानक निशान 'दीन' के ताल पर नाचते हुए वह अपूर्व सेना आगे बढ़ती गई। बादशाह के नाम का जयघोष करते हुए सिपाही और शहर के सैकड़ों लोग दिल्ली के राजमहल में घुसने लगे। रास्ते से घायल होकर भागता आया कमिश्नर फ्रेजर एक छोटे दरवाजे पर खड़ा था। उसे देखते ही मुगल बेग नाम के आदमी ने उसके गाल पर वार किया। यह इशारा होते ही सब विद्रोही दौड़ पड़े और सीढ़ियों पर क्षत-विक्षत हुआ कमिश्नर फ्रेजर आने-जानेवालों के पैरों तले कुचला जाने लगा। उसे कुचलते सिपाही वहां न रुककर ऊपर चढ़ गए और जिस कमरे में जेनिंग और उसका परिवार रहता था, वहां जाकर वे डरावने राक्षस की तरह खड़े हो गए। इतने में किसी ने उस कमरे का दरवाजा लगाने का प्रयास किया; पर वह एक धक्के से चरमरा गया और सिपाहियों की तलवार के नीचे वह जेनिंग, उसकी युवा कन्या, उसके यहां की मेहमान एक अंग्रेज स्त्री का खात्मा हो गया। दिल्ली के रास्ते पर से मरते-मरते दौड़ा कैप्टन डगलस कहां है? भेजो उसे यम के घर! और ये कोने में घुसे कलेक्टर साहब! उन्हें भी जीवन की पेंशन पर भेजो। अब दिल्ली के राजमहल में फिरंगी सत्ता कानाम भी शेष नहीं रहा। अब जरा शांत बैठने में कोई हानि नहीं। घुड़सवारों ने अपने घोड़े राजमहल के मैदान में बांधे और सारी रात दौड़ते आए सिपाही दीवानेखास के राजमहल में अपना सामान रख विश्राम करने लगे। इस तरह दिल्ली का राजमहल लोक-सेना के हाथ आ गया और अब आगे क्या 1857 का स्वातंत्र्य समर – 109

करना है, इस विषय पर बादशाह, बेगम साहिबा और सिपाहियों के नेता वार्त्ता करने लगे। पहले निर्धारित योजना के अनुसार 31 मई तक रुकना अब मूर्खता थी। अतः कुछ सोच-विचार के बाद बादशाह ने क्रांतिकारियों से मिल जाना तय किया। इतना होते-होते मेरठ से विद्रोह कर निकला तोपखाने का बहुत सा भाग दिल्ली आ पहुंचा और उसने बादशाह के सम्मान में और स्वतंत्रता के लिए राजमहल में आकर इक्कीस तोपों की सलामी दी। सिपाहियों और अन्य लोगों की वार्त्ता के बाद भी जो थोड़ी चंचलता बादशाह के मन में शेष थी वह भी इन तोपों की गड़गड़ाहट में पिघल गई। और उस राजकीय सलामी की घन-गर्जना में उस वृद्ध बादशाह के हृदय का अनंत राज-तेज हड़बड़ाकर जाग उठा। उसकी उस भव्य और आदरणीय मूर्ति के सामने फिरंगियों के रक्त से सनी तलवार चलाते हुए सिपाहियों के नेता ने कहा, "खाविंद! मेरठ में अंग्रेजों की पराजय हो चुकी है, दिल्ली अपने हाथ में है और पेशावर से कलकत्ता तक के सारे सिपाही आपके आदेश की राह देख रहे हैं। अंग्रेजों की गुलामी की बेड़ियां तोड़कर अपनी प्रकृतिदत्त स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए सारा हिंदुस्थान जाग उठा है। ऐसे समय में यह स्वतंत्रता का निशान अपने हाथ में लें, जिससे हिंदुस्थान के सारे बहादुर उसके सम्मान के लिए मरने को तैया हो जाएंगे। हिंदुस्थान अपना स्वराज्य वापस लेने के लिए लड़ने लगा है और अब उसका नेतृत्व यदि आपने स्वीकार किया तो पल भर में हम उन फिरंगी राक्षसों को या तो समुद्र में डुबो देंगे या उनके शवों की दावत गिद्धों को देंगे।⁴⁹ हिंदू और मुसलमान दोनों ही जातियों के नेताओं का यह एक स्वर और उद्दीपक भाषण सुनकर बादशाह को स्वतंत्रता का उत्साह आने लगा। उसकी कल्पना के सामने शाहजहां और अकबर की मूर्तियां आने-जाने लगीं और अब गुलामी में रहने की अपेक्षा स्वदेश को स्वतंत्र करते-करते मरना ही अधिक श्रेयस्कर है, ऐसी दैवी स्फूर्ति उसके हृदय में संचरित होने लगी। आगे बादशाह ने कहा, "मेरे पास खजाना नहीं है और तुम्हें वेतन भी नहीं मिलेगा।" तब वे सिपाही बोले, "हम अंग्रेजों का खजाना लूटेंगे और आपके खजाने में भरेंगे"⁵⁰ "तो फिर आपका नेतृत्व मैं स्वीकार करता हूं।" ऐसा अभिवचन उस वृद्ध बादशाह से मिलते ही उस राजभवन में जमा उस प्रचंड जनसमूह ने बड़े जोर से गर्जना की। राजमहल में जब यह सब गड़बड़ी चल रही थी तब शहर में जोर का ऊधम हो रहा था। दिल्ली के सैकड़ों लोग घर में जो शस्त्र मिले वही लेकर विद्रोही सिपाहियों से मिल रहे थे और यूरोपीय लोगों को काट डालने के लिए यहां-वहां घूम रहे थे। बारह बजे के आसपास दिल्ली के बैंक पर हमला हुआ। उसमें बैंक का मैनेजर बेरेस फोर्ड, उसकी पत्नी और उसके पांच बच्चे मार डाले गए। वह भवन भी नष्ट कर दिया गया। फिर 'दिल्ली गजट' के छापाखाने की ओर लोग गए। मेरठ का समाचार छापने के लिए 1857 का स्वातंत्र्य समर - 110 ⁴⁹ चार्ल्स बाल कृत-'इंडियन म्यूटिनी', खंड 1, पृष्ठ 74। ⁵⁰ मेटकॉफ।

कंपोजिटर कंपोजिंग कर रहे थे, तभी दरवाजे पर 'दीन-दीन' की गर्जना हुई और कुछ ही देर में छापाखाने का हर ईसाई चीर दिया गया। वहां का सबकुछ-मशीनें आदि जो कुछ भी था-फिरंगियों के स्पर्श से अपवित्र हो गया था, अतः उसका नष्ट करके क्रांति की वह भयानक हवा आगे बढ़ी। परंतु अभी भी वह चर्च खड़ा होकर अपने धर्मयुद्ध की ओर देखता रहे, यह पूरी तरह अनुचित है। इस चर्च में हिंदुस्तान में तुम्हारा राज्य रहना ही भयानक पाप है, अपने अनुयायियों को एक दिन भी इस चर्च ने ऐसा कहा था क्या? उलटे ऐसे पाप के अधिकारियों को ऐहिक और परलौकिक संरक्षण देने के लिए इस पक्षपाती चर्च ने अपने पंखों को फैलाया हुआ है। हिंसा की ऐसी गुफा हमने अपने देश में निर्मित होने दी, उसका प्रायश्चित्त गया और सूअर के रक्त से बने कारतूसों के रूप में हमें मिला। अभी भी संभलों और उस चर्च की व्यवस्था करने के लिए पहले उसी की ओर बढ़ो! देखते क्या हो? फोड़ो वह क्रॉस! दीवारों की सारी चमड़ी उखाड़ो, उस व्यासपीठ का चूरा बनाओ और बोलो-दीन! रोज चर्च में आते समय यह घंटा बजता है। अब हम उसको घनघनाएं। बज घंटा, बज! आज तू इतना बज रहा है, पर कोई गोरा तेरी ओर क्यों नहीं बढ़ रहा? तुझे इन काले हाथों का स्पर्श भाता है क्या? हाथ का स्पर्श भला न लग रहा हो तो गिर जा नीचे! हमारे वे बंधु अपने पैरों का स्पर्श करने बुला रहे हैं। सारे घंटे टूटकर नीचे गिरने के बाद उनके गिरने की आवाज के साथ वे सिपाही भी विकट हास्य करते हुए एक-दूसरे को कहने लगे-“कैसा तमाशा है! क्या मजा है!!” परंतु उधर देसरी तरफ इससे भी भयानक तमाशा चल रहा था। राजमहल के एक ओर अंग्रेजों की सेना के लिए तैयार किया हुआ एक बारूदखाना था। इस बारूदखाने में लड़ाई में आवश्यक सारा सामान ठूंस-ठूंसकर भरा हुआ था। उसमें कम-से-कम नौ लाख कारतूस, आठ-दस हजार बंदूकें, तोपें और सीजट्रेन भरी हुई थी। यह बारूदखाना अपने कब्जे में लेने का क्रांतिवीरों ने दृढ़ संकल्प किया। पर यह काम सरल नहीं था। उस बारूदखाने में नियुक्त अंग्रेज चाहे तो वहां लड़ने पहुंचनेवाले सबका नाश करने में एक क्षण भी लगनेवाला नहीं हैं। क्योंकि उस बारूदखाने को सुलगा देने के लिए एक तीली जलाकर डालना काफी था। इस काम में हाथ डालना बहुत ही जोखिमपूर्ण था। फिर भी वह बारूदखाना कब्जे में लिये बगैर क्रांति का जीवन क्षण भर भी सुरक्षित न रहता। अतः यह काम पूरा करने को हजारों सिपाही तैयार हो गए। उन्होंने उस बारूदखाने के अंग्रेज अधिकारी को शरण आने के लिए बादशाह के नाम से संदेश भेजा। परंतु ऐसे कागज के टुकड़ों को मान देकर अंग्रेजों ने इस देश का शासन प्राप्त नहीं किया था। लेफ्टिनेंट बिलोमी ने उस चिट्ठी को उत्तर देने का भी मान नहीं दिया। यह अपमान देखकर गुस्सा हुए हजारों सिपाही उस बारूदखाने की दीवार पर चढ़ने लगे। बारूदखाने 1857 का स्वातंत्र्य समर - 111

के अंदर नौ अंग्रेज और कुछ भारतीय लोग थे। दीवार पर दिल्ली के बादशाह का निशान लगा देखकर भारतीय लोग अपने स्वदेश बंधुओं को तेजी से आकर मिलने लगे और उन नौ अंग्रेजों पर निराशा की छाया मंडराने लगी। सिपाहियों की लगातार मार के आगे अंग्रेज कितनी देर टिक सकेंगे, यह दिख ही रहा था। उन्होंने समय अपने पर बारूदखाना उड़ा देने का निश्चय किया था, इसमें संदेह नहीं; क्योंकि यदि वे बारूदखाना स्वयं सौंप देते तो भी उनके प्राण सिपाही न लेते, इसपर उनका कोई भरोसा नहीं था। इधर सिपाही भी यह जानते हुए भी कि बारूदखाना उड़ाया जाएगा तो अपनी ओर की प्रचंड हानि होगी, टूट पड़े थे। इतने में दोनों ओर से लोग जिस भयानक आवाज की प्रतीक्षा में आशंकित थे वे हजारों तोपें एक साथ छूटने की जंगी आवाज हुई और उस बारूदखाने से आग की प्रचंड ज्वाला आकाश की ओर बढ़ गई। उन अंग्रेज वीरों ने स्वयं के प्राणों की आशा छोड़क रवह बारूदखाना शत्रु के कब्जे में न देते हुए अपने हाथों से सुलगा दिया और उस एक आवाज के साथ करीब पच्चीस सिपाही और आसपास के रास्तों पर के तीन सौ आदमी आकाश में उड़ गए। परंतु क्रांति पक्षवालों ने इस बारूदखाने की आग में जान-बूझकर जो अपना नाम करवा लिया वह यों ही नहीं था। क्योंकि जो लोग इस बारूद के विस्फोट में बलि हुए उनके आत्मयक्ष से उस राज्य क्रांति को अपूर्व शक्ति मिली। जब तक यह प्रचंड बारूदखाना अंग्रेजों के कब्जे में था तब तक मुख्य केंद्र के नेटिव सिपाही अपने अधिकारियों की अधीनता में थे। वे अपने स्वदेश बंधुओं पर हमला नहीं कर रहे थे, पर अंग्रेजों के विरुद्ध भी नहीं हुए थे। दोपहर चार बजे सारा दिल्ली शहर हिलानेवाले विस्फोट की आवाज सुनते ही वे केंटोनमेंट के सिपाही इकट्ठे हुए और 'मारो फिरंगी को' की गर्जना करते हुए अंग्रेजों पर टूट पड़े। मुख्य रक्षक गार्डन को किसी ने उड़ा दिया। स्मिथ और रेह्ले को मार डाला और गोरा रंग देखते ही 'टूट पड़ो-मार डालो' की ध्वनि होने लगी। एक शतक के बाद जाग्रत हुआ राष्ट्र-क्षोभ अपने उग्र जबड़े के नीचे पुरूष, महिलाएं, बच्चे, घर, दरवाजे, पत्थर, ईंट, घड़ियां, मेज-कुरसियां, रक्त, मांस, अस्थियां-जिन-जिन चीजों को फिरंगी स्पर्श हुआ था सब पर क्रांतिकारियों का आक्रोश टूटा। उस सारी सचेतन दिल्ली के बादशाह का बहुत सख्त आदेश हो जाने के बाद ही बहुत से अंग्रेज लोग मृत्यु से बच पाए और राजमहल की कैद में पहुंचा दिए गए। परंतु लोकमत बादशाह के इस कृत्य के इतना विरुद्ध था कि चार-पांच दिन खींचतान करने के बाद उसे अपने कब्जे के उन पचास फिरंगियों को लोगों को सौंप देना अनिवार्य हो गया। 16 मई को एक सार्वजनिक मैदान पर वे पचास फिरंगी ले जाए गए। वह दृश्य देखने के लिए इकट्ठा हुए हजारों नागरिकों ने उनके सामने फिरंगी राज्य और अंग्रेजों की बेईमानी की पूरी-पूरी निंदा की और फिर सिपाहियों का आदेश होते ही एक क्षण में उन पचासों के 1857 का स्वातंत्र्य समर - 112

टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए। सिपाही की तलवार से बचने कोई महिला या बच्चा गिड़गिड़ाने लगता तो-'मेरठ की बेड़ियों का बदला, गुलामी का बदला, बारूदखाने का बदला'-कहते हुए लोग बड़े जोर से चिल्लाने लगते। इस बदले की धार चढ़ी तलवार वह गिड़गिड़ाता भूरा सिर छांट देती। 11 मई को अंग्रेजों के कत्लेआम का आरंभ होकर उसकी पूर्णाहूति 16 मई को हुई। इस बीच सैकड़ों अंग्रेज जान बचाके दिल्ली से भाग गए। किसी ने मुंह पर काला रंग पोतकर नेटिव होने का स्वांग रचा तो कोई जंगल-जंगल भागता धूप में छिपने का साहस किया, भेद खुलते ही गांववालों के हाथों मारा गया। कोई –यात्रा में थककर रास्ते में बैठ जाने पर –पास-पड़ोस के गांववालों द्वारा फिरंगी कहकर काट डाला गया और कोई दयालु गांववाले मिल जाने से उनकी कृपा पाकर मेरठ छावनी पहुंच गया। बारूदखाने के विस्फोट में विद्रोही सैनिकों को भरमूर बंदूकें मिली और उसके कारण हर सिपाही के हिस्से में जो कत्ल हुआ, उसका समाचार सुनते ही सैकड़ों गांवों ने अपनी सीमा में फिरंगी को घुसने न देने का संकल्प लिया। परंतु इन गांवों या दिल्ली में इतने बवंडर के चलते हुए भी एक भी अंग्रेज महिला के शील पर किसी ने आक्रमण नहीं किया था। यह बात अब अंग्रेजों द्वारा की गई जांच-पड़ताल में ही सिद्ध हुई है।⁵¹ दिल्ली में कत्ल हो जाने के बाद उस अवसर के प्रत्यक्ष देखे हुए वर्णन के नाम पर कितने ही अंग्रेज धर्माधिकारियों ने जो भयंकर वर्णन किए हैं उनसे अधिक निंदात्मक, असत्य और घटिया बयान आज तक किसी ने नहीं किया होगा। दिल्ली के रास्तों पर महिलाओं को नंगा कर घुमाया, सार्वजनिक रूप से उनका शील भंग किया गया, उनके स्तन काटे गए, छोटी बच्चियों पर अत्याचार किए गए आदि अमानवीय झूठ जिनके धर्मोपदेशक प्रकाशित करते हैं उन अंग्रेज लोगों की सत्यनिष्ठा कितनी घटिया होगी।⁵² सन् 1857 की राष्ट्रीय क्रांति इसलिए नहीं हुई थी कि हिंदुस्थान के लोगों को गोरी औरतें नहीं मिलती थी। उलटे, गोरी महिला के मनहूस कदम (मराठी में पाढरा पाप अर्थात् गोरे पांव) फिर से अपने घर में न पड़ें, इसलिए सन् 1857 का राष्ट्र-क्षोभ उद्भूत हुआ था। इस तरह मेरठ की महिलाओं के फुफकार से उठे उस भयानक चक्रवात के चक्कर में पड़ पांच दिन के अंदर हिंदुस्थान में सौ वर्ष से जमा हुआ गुलामी का विषवृक्ष भरभराकर गिर गया। इन पहले पांच दिनों में क्रांति पक्ष में नेताओं को जो अपूर्व 1857 का स्वातंत्र्य समर – 113 ⁵¹ 1. “चाहे कितनी भी क्रूरता अथवा रक्तपात क्यों न किया गया और बाद में कितनी भी जनश्रुतियां क्यों न प्रसाहित की गई हों कि महिलाओं से भी छेड़छाड़ की गई है, उनका अपमान किया गया है; किंतु जहां तक मैंने जांच की है, इसकी सत्यता का कोई भी प्रमाण मुझे नहीं मिला।” –ऑनरेबल सर विलियम म्यूर, के.सी.एस.आई., गुप्तचर विभाग के प्रमुख ⁵² चार्ल्स बाल कृत –इंडियन म्यूटिनी', खंड 1, पृष्ठ 105।

सफलता मिली, उसका मूल कारण था अंग्रेजों की गुलामी से छूटने की उत्कट इच्छा का सारी जनता में पैदा होना। मेरठ की महिलाओं से दिल्ली के बादशाह तक सबके हृदय में स्वतंत्रता और स्वधर्म-रक्षण की अनिवार्य इच्छा प्रादुर्भूत होने से और उस इच्छा को गुप्त संगठन के द्वारा पहले से ही व्यवस्था प्राप्त हो जाने से केवल पांच दिन के अंदर हिंदुस्थान की इतिहास-प्रसिद्ध राजधानी में स्वराज्य की प्राण-प्रतिष्ठा हो गई। दिनांक 16 मई को दिल्ली में फिरंगी सत्ता का एक भी चिह्न शेष नहीं रहा था। अंग्रेजी वस्तुओं से दिल्ली को इतनी घृणा हो गई थी कि कोई अंग्रेजी भाषा का एक शब्द भी बोले तो उसे जमकर मार खानी पड़ती। अंग्रेजी निशान के टुकड़े गली-कूचों में कुचले जा रहे थे। और अपने आज तक के अपमान के दाग दासता के उष्ण रक्त से धोकर स्वच्छ हुआ स्वराज्य का चिह्न उस प्रचंड क्रांति के सिर पर डोल रहा था। यह स्वतंत्रता की इच्छा इतनी प्रबल थी कि पहले पांच दिन में देशद्रोह की छूत कहीं नहीं लगी। पुरुष और महिलाएं, श्रीमंत व गरीब, तरूण और वृद्ध, सिपाही और नागरिक, मौलवी और पंडित, हिंदू और मुसलमान - सारे-के-सारे स्वदेश के निशान के नीचे अपने-अपने शस्त्र निकालकर परदेशी दासता पर हमले कर रहे थे। ऐसी विलक्षण स्वदेश-प्रीति और स्वातंत्र्य-प्रीति उबल रही थी और पर-सत्ता के प्रति इतनी घृणा उत्पन्न हो गई थी। इसलिए मेरठ की ललनाओं के बागबाणों से दिल्ली का सिंहासन प्रादुर्भूत हुआ। ये पांच दिन हिंदुस्थान के इतिहास में हमेशा चिरस्मरणीय रहें, क्योंकि मुहम्मद गजनवी के आक्रमणों से प्रारंभ हुआ हिंदू और मुसलमान का प्रचंड युद्ध समाप्त हो जाने की घोषणा इन पांच दिनों में हुई और हिंदू और मुसलमान के बीच का परायापन तथा विजतो-विजित भाव नामशेष होकर उनमें आपसी बंधुत्व भाव इन्हीं दिनों में प्रकट हुआ। मुसलमानों की परतंत्रता से श्री शिवराज, प्रताप सिंह, छत्रसाल, प्रतापादित्य, गुरू गोविंद सिंह तथा महादजी शिंदे द्वारा मुक्त हुई भारत माता ने-'इसके बाद तुम सब समान और सरोहर हो और मैं तुम दोनों की मां हूं, इस दिव्य मंत्र का उच्चारण किया। हिंदुस्थान अपना देश है और हमस ब सगे भाई हैं, ऐसी गर्जना करते हिंदू-मुसलमानों ने सम समानता से और एकमत से दिल्ली के तख्त पर स्वराज्य का उभय स्वीकृत झंडा तभी खड़ा किया। ऐसे ये पांच दिन इतिहास में चिरस्मरणीय रहें। इन पांच दिनों में हिंदुस्थान में लोकशक्ति का प्रथमोदय हुआ। अपेन पर कौन राज्य करे, इस प्रश्न का निर्णय करने का कार्य लोकपक्ष का है। इस संवेदना का जन्म हिंदुस्थान में इन पांच का निर्णय करने का कार्य लोकपद्वक्ष का है। इस संवेदना का जन्म हिंदुस्थान में इन पांच दिनों में हुआ। लोकपक्ष ने ही उस राज सिंहासन पर स्वसम्मत पुरुषार्थ की योजना की। लोगों को जो पसंद होगा उसी का राज्य स्वदेश पर चले, यह भावना और राजनीति लोकपक्ष का कर्तव्य है, यह चेतना हिंदुस्थान के शरीर में इन पांच दिनों में उदय हुई। लोकपक्ष की यह जयंती हिंदुस्थान के इतिहास में अविस्मरणीय रहे। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 114

द्वितीय भाग: प्रस्फोट (मेरठ, दिल्ली, मंगल पाण्डे व क्रांति)

प्रकरण-4 मध्यांतर और पंजाब दिल्ली स्वतंत्र हो जाने की वार्त्ता विद्युत वेग से फैलते ही उसकी आकस्मिकता ने सारे हिंदुस्थान में अपनों और परायों दोनों को क्षण भर के लिए तो चकित कर दिया। अंग्रेजों को तो तुरंत यह भी समझते न बना कि हम जो सुन रहे हैं उसका अर्थ क्या है? सारे देश में शांति का साम्राज्य है, ऐसा जान कलकत्ता में लॉर्ड केनिंग सोए पड़े थे और इधर कमांडर-इन-चीफ ॲन्सन शिमला की ठंडी हवा में जाने के लिए सज रहे थे। उन्हें पहले जब दिल्ली स्वतंत्र हो जाने का अधूरा तार आया तब उस तार का वास्तविक हड़बड़ी चकित-विस्मित सारे हिंदुस्थानी लोगों में भी मची हुई थी। क्योंकि दिल्ली के इस अकल्पनीय विद्रोह के आकस्मिक हल्ले में अंग्रेजों को भावी संकट की सूचना मिलने से उस संकट का परिहार करने का अवसर मिल गया। अकल्पित हमले से दिल्ली का सिंहासन जैसे एक-दो दिन में उनसे झटक लिया गया, वैसे ही 31 मई को निश्चित पूर्व संकेत के अनुसार एक समय में यदि सब जगह विस्फोट होता तो सारे हिंदुस्थान का सिंहासन एक झटके में हथियाया जा सकता था। अ बवह योजना तो मेरठ के विद्रोह के कारण उलझ गई थी, फिर भी दिल्ली कब्जे में आ जाने से विद्रोह को राज्य क्रांति का स्वरूप मिल गया और इस असंभव वार्त्ता से एक विलक्षण चेतना का जन्म हो गया था। 1857 का स्वातंत्र्य समर -115

अब इस चेतना का लाभ उठाकर एकदम विद्रोह किया जाए या पूर्व नियोजित संकेत के अनुसार 31 मई की राह देखी जाए? दिल्ली के विद्रोह की वार्त्ता सुन अन्यत्र क्या योजना चल रही है? दिल्ली की जल्दबाजी से जैसा घोटाला हुआ वैसे ही अन्य स्थानों की सम्मति लिये बिना हम भी विद्रोह करें और घोटाला फैल गया तो क्या होगा? ऐसी अनेक अनिश्चिताओं के कारण क्रांतिकारी नेताओं को-आगे क्या होना है-उसकी प्रतीक्षा करते हुए अपनी-अपनी जगह रूके रहना पड़ा। मंद गति जैसा क्रांति का प्राण हरण करनेवाला दूसरा विष नहीं है। क्रांति का विस्तार जितना त्वरित और जितना आकस्मिक होता है उतनी ही उसकी विजय की संभावना अधिक होती है। यह विस्तार का वेग शिथिल तो शत्रु को संरक्षण का अवसर मिल जाता है। जो पहले उठते हैं उनका उत्साह यह देखकर घटने लगता है कि अपने साथ कोई नहीं आ रहा और जो बाद में आते हैं उनके रास्ते में बीच के अवसर का लाभ लेनेवाला चतुर शत्रु अनेक बाधाएं खड़ी कर देता है। इसलिए उठाव और प्रसार के बीच में अधिक समय जाने देना क्रांतियुद्ध के लिए हमेशा हानिकारक होता है। फिर भी जहां तक बने, एक साथ विद्रोह करना निश्चित होते हुए भी बीच में ही आ पड़े पेंच के कारण विभिन्न स्थानों के क्रांतिकारी नेताओं को न ठहरते बन रहा था और न आगे बढ़ते। क्रांतिकारी पक्ष की इस अपरिहार्य स्तब्धता का अंग्रेजों को बहुत लाभ हुआ। अंग्रेजों के पैर हिंदुस्थान में पड़ने के बाद से आज तक उन्हें ऐसी भयानक वार्त्ता सुनने का अवसर कभी भी नहीं आया था। इस मई माह में बैरकपुर से सीधे आगरा तक कोई सात सौ पचास मील में केवल एक गोरी रेजिमेंट थी। ऐसी स्थिति में क्रांतिकारी पक्ष के पूर्व संकेतानुसार यदि यह सारा प्रदेश एकदम उठ गया होता तो दस इंग्लैंड भी इकट्ठा हो जाते तो भी हिंदुस्थान कब्जे में न रहता। यह गोरी रेजिमेंट दानापुर में रखी गई थी। उधर पंजाब में सरहद पर पर्याप्त गोरी सेना थी। परंतु उसे उधर-से-अधिक गोरी सेना को जमा करना। उसी समय अंग्रेजों के भाग्य से ईरान की लड़ाई समाप्त हुई थी-इसलिए उस सेना को हिंदुस्थान जल्दी आने के आदेश हुए। ईरान की लड़ाई सामप्त होते ही अंग्रेजों ने चीन से बखेड़ा खड़ा कर उधर सेना भिजवाई थी। परंतु हिंदुस्थान में यह भयानक आंधी आते ही केनिंग ने चीन की ओर जानेवाली सारी सेना बीच में ही रोक लेने का निश्चय किया। इन दो सेनाओं के सिवाय रंगून में स्थित गोरी रेजिमेंट भी कलकत्ता में रख ली गई और मद्रास फ्युजिलयर नामक गोरी सेना को तैयार रहने को लिख गया। ये गोरी सेनाएं जब सभी दिशाओं से यथासंभव वेग से कलकत्ता के लिए चली थीं तब केनिंग ने सिपाहियों के मन को फिर से एक बार कब्जे में लेने का प्रयास किया। उसने कहा, "आपकी जाति और वर्ण विषयक रीति में हाथ डालकर हिंदुस्थान के धर्म को दुखाने का हमारा कोई इरादा नहीं हैं सिपाही चाहें तो कारतूस अपने हाथों से बना लें। कंपनी का नमक जिन्होंने खाया है उनका ही यह विद्रोह करना पाप है।" इस प्रकार की 1857 का स्वातंत्र्य समर - 116

बातों से भरा एक घोषणापत्र निकालने का अधिकार है या नहीं, जहां यही विवादास्पद विषय है वहां नया घोषणापत्र निकालने का अर्थ वह विवाद समाप्त करना नहीं बल्कि उसे चिढ़ाना है। लेकिन हिंदुस्थान के पास अब यह घोषणापत्र पढ़ने का समय नहीं है, क्योंकि दिल्ली में उसी समय घोषित दिव्य घोषणापत्र की ओर सबकी आंखें लगी हुई हैं। एक ही समय दो घोषणापत्र जारी हुए। कलकत्ता में गुलामी का, दिल्ली में स्वतंत्रता का। हिंदुस्थान को उस समय दिल्ली का घोषणापत्र भाया, इसलिए केंनिंग ने कलम तोड़कर कमांडर-इन-चीफ, दिल्ली को तुरंत तोपें दागने का ओदश दिया। कमांडर-इन-चीफ अॅन्सन जब शिमला में था तब उसे दिल्ली के विद्रोह का तार मिला। उसे पढ़कर, अब क्या करना चाहिए, इसका विचार वह कर ही रहा था कि केनिंग ने उसे तुरंत दिल्ली जीतने का आदेश दिया। विद्रोहियों की योजना का या शक्ति का अंग्रेजों को इतना अज्ञान था कि उन्हें लगता था, दिल्ली एक हफ्ते में छीनी जा सकती है और एक बार दिल्ली जीती तो उस माह के अंत में विद्रोह का अंत हो जाएगा। पंजाब का मुख्य अधिकारी सर जॉन लॉरेंस भी दिल्ली पर कब्जा करने को जोर डाल रहा था। परंतु दिल्ली जीतना कितना कठिन है, इसका कनिंग और लॉरेंस की तुलना में कुछ अधिक सही अनुमान अॅन्सन को था, अतः समुचित सामग्री इकट्ठी करने के पहले दिल्ली की ओर नहीं जाने की नीति उसने बनाई। शिमला की ठंडी हवा छोड़ मुख्य सेना स्थल की ओर अॅन्सन आ भी न पाया था कि वहां शिमला में हुल्लड़ मच गया। गुरखाओं की नासिरी बटालियन ने विद्रोह किया, यह समाचार शिमला आते ही अंग्रेजों का धीरज छूट गया। उस वर्ष शिमला में बनाए गए हवादार बंगलों और वृक्षों के बगीचों में आज तक भोगे राजविलास का अब भयंकर किराया देना पड़ेगा। गुरखा पलटन आई, ऐसा एक शोर होते ही गोरी औरतें और बच्चे जिधर राह दिखे उस तरफ भाग निकले। इस भागमभाग में अंग्रेज पुरूषों ने स्वाभाविक ही महिलाओं को पीछे छोड़ दिया-और वह भी अपने सामान के थैले पीठ पर बंधे होते हुए। अंग्रेजी धैर्य का प्रदर्शन दो दिन निरंतर चलता रहाः लेकिन जब गुरखा न आए तो हारकर वह प्रदर्शन बंद करना पड़ा। इसी समय कलकत्ता में भी रोज ऐसा ही होता था। कलकत्ता के पास बैरकपुर की नेटिव रेजिमेंट ने विद्रोह किया, यह अफवाह बार-बार उठती और अंग्रेजों की औरतें, बच्चे और पुरुष रास्ते से पोर्ट की ओर दौड़ते दिखाई देते। कितनों ने इंग्लैंड का टिकट निकाल लिया, कितनों ने अपनी गठरियां बांधकर पोर्ट की ओर भागने की तैयारी रखी और अनेक दफ्तर के काम छोड़ कोने-कोने में छिपे रहते। ऐसा डर मेरठ और दिल्ली में था, फिर भी अंग्रेजों का कानपुर अभी बचा हुआ था! कमांडर-इन-चीफ अॅन्सन ने अंबाला आते ही दिल्ली पर घेरा डालने के लिए सीजट्रेन तैयार करना शुरू किया। हिंदुस्थान पर आज तक कभी ऐसा संकट न आया था। अंग्रेजों की शक्ति की बंद मुट्ठी लाख की होते हुए भी अंदर की स्थिति शोचनीय थी। अॅन्सन को किसी 1857 का स्वातंत्र्य समर — 117

तरह भी जल्दी करना असंभव हो गया। अंग्रेजों के काले सिपाहियों को 'चल' कहते ही चलाया जा सकता था, परंतु अब गोरे सिपाहियों को केवल 'चल' कहने से कैसे चलेगा? उनका एक-एक का दिमाग और आज तक बढ़ता मिजाज अब एकाएक कैसे संभले। उसमें भी अब नेटिवों से पहले जैसी हर तरह की सहायता मिलना पूरी तरह असंभव था। गाड़ियां मिली नहीं, मजूर मिले नहीं, रसद मिली नहीं, जख्मी लोगों के लिए डोली मिली नहीं। ऍडज्युटेंट, क्वार्टर मास्टर, मेडिकल चीफ-हर कोई अपने-अपने विभाग की तैयारी करना छोड़ –नकार' का घंटा बजाने लगा। हिंदुस्थानी लोगों के आश्रय बिना अंग्रेजी सत्ता धूल पर की गई लिपाई जैसी है। सन् 1857 में इस कुचली हुई धूल में थोड़ा चैतन्य आते ही अंग्रेजों को अंबाला से दिल्ली तक आना कठिन हो गया। क्योंकि-"Natives of all classes stood aloof, waiting and watiching the issue of events. From the capitalists to the coolie al shrunk alike from rendering assisatance to those whose power might be swept away in a day."^{53} उपर्युक्त लेखक कहता है, हिंदुस्थान के नेटिव ऐसे ही चुप हो बैठते तो अंग्रेजी सत्ता वास्तव में एक दिन में फेंक दी गई होती। परंतु सन् 1857 में वह दिन उगनेवाला नहीं था। सन् 1857 उस दिन के भोर की रात थी। जिन्हें वह भावी भोर दिखने लगी वे नींद छोड़कर उठे। परंतु जिन्हें वह तत्कालीन रात ही दिखी वे अपना गुलामी का खींचा हुआ ओढ़ावन और खींचकर सो गए। इन उनींदे लोगों में कुभकर्ण का सम्मान पानेवाले पटियाला, नाभा और जींद-ये तीन रियासतें थी। इन रियासतों के हाथों में सन् 1857 की क्रांति का जीवन या मृत्यु थी। ये रियासतें दिल्ली और अंबाला के बीच में थी, अतः उनके आधार के बिना अंग्रेजों की पीठ बिलकुल सुरक्षित रहनेवाली नहीं थी। ये रियासतें अन्य रियासतों की तरह केवल चुप रही होती तो भी क्रांति सफल होने की बहुत संभावना थी। परंतु पटियाला, जींद और नाभा-इन तीनों ने जब अंग्रेजों से भी अधिक क्रूरता से सन् 1857 की राज्य क्रांति को चोट पहुंचाना प्रारंभ किया तब पंजाब और दिल्ली, इन दो हिस्सों की यह जंजीर एकाएक टूट गई और उस क्रांति के अवयवों की संगति क्षणार्थ में नष्ट हो गई। इन रियासतों ने दिल्ली के बादशाह की ओर से आए निमंत्रण को धिक्कार दिया; निमंत्रण देने आए सवारों को मार डाला;स्वयं के खजाने से अंग्रेजों पर धन की सतत वर्षा की। जिस प्रदेश से अंग्रेजी सेना जानेवाली थी उस प्रदेश को सैन्य संरक्षण दिया; अंग्रेजों के साथ निशान को संभालने घर-द्वार छोड़कर दौड़ने आए तब इन सिख रियासतों ने-इन गुरू गोविन्द सिंह के चेलों ने-अत्यधिक क्रूरता से उनका वध किया, यंत्रणा दी ।^{54} 1857 का स्वातंत्र्य समर – 118 ^{53} 1. के कृत-'इंडियन म्युटिनी', खंड 2। ^{54} 2. इस वर्णन से अधिक हृदयद्रावक वर्णन इ57 के क्रांतियुद्ध में मिलना मुश्किल है। जिस प्रदेश से अंग्रेजों को संरक्षण मिलता था उसी प्रदेश के स्वधर्म और स्वराज्य के लिए हथेली पर सिर लिये

पटियाला, नाभा और जींद की सहायता मिलना पक्का होते ही अंग्रेजों में विलक्षण धीरज आ गया। पटियाला के राजा ने अपने भाई के साथ उत्तम सेना और तोपें देकर उसे ठाणेश्वर का रास्ता रोकने भेज दिया और जींद के राजा ने पानीपत को चौकी पर कब्जा जमाया। ये दो अति महत्त्वपूर्ण चौकियां इस तरह परस्पर रोकी जाने से अंबाला से दिल्ली तक के मार्ग और पंजाब का निरंतर यातायात-ये दो बहुत नाजुक बातें संरक्षित हो गईं और कमांडर-इन-चीफ ने 25 मई को अंबाला छोड़ दिल्ली की ओर स्वयं कूच किया। पर दिल्ली स्वतंत्र हो जाने का समाचार सुनने के पश्चात् उसके धक्के से ॲन्सन पूरी तरह हताशा से भर गया था। उसमें भी शिमला की ठंडी हवा में जो आज तक कभी अनुभव नहीं हुई, ऐसी गरमी में उसे झुलसना पड़ा था। इन मानसिक और शारीरिक चिंताओं से कृश हुआ वह कमांडर-इन-चीफ करनाल तक आते-आते 27 मई को कालरा की बीमारी से मर गया। उस दिन उसके अधीनस्थ अधिकारी बर्नार्ड ने कमांडर-इन-चीफ के अधिकारों को संभाला। इस तरह पुराने कमांडर-इन-चीफ को गाड़कर अंग्रेजी सेना नए कमांडर के नेतृत्व में दिल्ली की ओर बढ़ी। उस समय उस अंग्रेजी सेना में इतना उत्साह था कि सुबह लड़ाई आरंभ कर शाम को दिल्ली शहर में शत्रु का रक्त गटगट पिएंगे, ऐसी घमंड भरी बातें वे खुलेआम करने लगे। गोरे सिपाहियों के काले हृदय में कितना हलाहल भरा हुआ है, यह सेना अंबाला से दिल्ली आ रही थी उस समय वे पूरे जग को यह दिखा रहे थे कि मेरठ की नेटिव सेना का क्या? वे तो हर तरह से काफिर (Heathen) थे। उन्होंने कारतूसों के निर्माण में हड्डियों का चूरा मिलाने की गप पर विश्वास कर मेरठ और दिल्ली में निरपराध अंग्रेजों को कत्ल किया। यह नेटिव के देश और धर्म का जंगलीपन था; परंतु इसके नीचे जो ढका हुआ है, संभव है, वह कभी स्पष्टता से प्रकट भी न हो। क्योंकि काफिरों की अपेक्षा ईसाई गप्पों की विश्वसनीय बातों और जंगलीपन में सुधार को ही परमेश्वर अधिक धिक्कारेगा और उस गंदगी को धोने के लिए उसे रक्त की वर्षा करनी पड़ेगी। अंबाला से दिल्ली की ओर आते समय हजारों गांवों में से जिन-जिनपर हाथ डाला जा सका, उन सारे भारतीय आदमियों को एक साथ पकड़ा जाता और तुरंत आधे घंटे में उनका कोर्ट मार्शल कर पंक्ति में खड़ा कर, सबको फांसी का दंड देकर, तरह-तरह की यंत्रणाएं देकर मार डाला जाता। मेरठ में नेटिवों ने भी अंग्रेजों को मार डाला 55 1857 का स्वातंत्र्य समर – 119 55 स्वकीयों को केवल रास्ता भी न मिले! इतना ही नहीं अपितु उनमें के हजारों लोगों को शत्रु से भी अधिक यंत्रणा देकर मा डाला जाए! इस अमानुषकि पाप का प्रायश्चित्त हिंदुस्थान के इतिहास में कभी हो तो हो। इस यंत्रणा का वर्णन –'टू नेटिव नैरेटिव्स ऑफ द म्युटिनी इन दिल्ली' में देखने को मिलेगा।