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अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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नगररक्षकराजश्यालकसमीपमानीतः। अङ्गुलीयकागमनकारणं पृष्टः स ब्रूते—स्वामिन् ! जालादिभिर्मत्स्यबन्धनोपायैः कुटुम्बभरणपोषणं करोमि। एकदा मया जाले एको रोहितो मत्स्य आसादितः। खण्डशः कल्पितस्य तस्य मत्स्यस्योदरे रत्नभास्वरमिदमङ्गुलीयकं मया लब्धा विक्रेतुमापणे आगतः, आभ्यां गृहीतः आनीतश्च। तदाकर्ण्य नगरपालः तदङ्गुलीयकमादाय राजकुलं गत्वा राजशासनं प्रतीक्ष्य प्रत्यागतो रक्षिणावुवाच—मुच्यतामेष जालोपजीवी धीवरः। विदितोऽस्याङ्गुलीयकस्यागमवृत्तान्तः, एपोऽङ्गुलीयकमूल्यसम्मितः प्रसादोऽपि सन्तुष्टेन राज्ञाऽस्मै प्रदत्त, इत्युक्त्वा तस्मै धीवराय स्वर्णकङ्कणं दत्तवान् चकार च तेन साकं कादम्बरो-मैत्रीम्।

अथ मेनकासहचरी सानुमती नामाप्सराः पर्यायनिवर्तनीयमप्सरस्तीर्थसान्निध्यं सम्पाद्य राज्ञो दुष्यन्तस्य प्रमदवने प्रविष्टा तिरस्करिणीं प्रतिच्छन्ना राज्ञः पार्श्ववर्तिनी भूत्वा तस्थौ। अङ्गुलीयकदर्शनेन स्मृतशकुन्तलो राजा क्वापि शान्तिं न लेभे, वसन्तोत्सवं प्रतिषिध्य माधव्याद्वितीयः शकुन्तलावृत्तान्तं भूयो भूयः स्मरन् निन्दंश्चात्मनश्चेष्टितं शकुन्तला-चित्रलेखनादिना तद्विपयकालापैश्च कथं कथमपि निनाय दिवसान्। प्रत्यादेश-विमानितायाः शकुन्तलाया विरहेन दुःखमनुभवन्, रात्रौ जागरणात् न मया धर्मासनमध्यासितुं सम्भावितमतो यत् प्रत्यवेक्षितममात्येन तत् पत्रमारोप्यतामिति पौरकार्यपर्यवेक्षणे नियुक्तममात्यमादिशति।

ततः समुद्रव्यापारव्यवहारी सार्थवाहो धनमित्रो नौव्यसने विपन्नः। अतोऽनपत्यस्य तस्यार्थसंचयो राजगामी भवेदित्यमात्येन लिखितं विचार्यात्मनोऽनपत्यतां स्मरन् मदवसाने पुरुवंशश्रिय एष एव विपाको भवितेति भावयन्, बहुपत्नीकस्य तस्य धनिकस्य काचिद्भार्या आपन्नासत्वा स्यात्तर्हि तद्भार्यागर्भस्थ एव शिशुः पित्र्यं रिक्तमर्हतीत्यादिशति धर्मात्मा राजा दुष्यन्तः। इमं निखिलं वृत्तान्तं मेनकानियुक्ता सा सानुमती प्रत्यक्षीकृत्य स्वसख्यै मेनकायै प्रियमिदं निवेदयितुं कामा ततो दिवं निर्जगाम।

अत्रान्तरे केनापि अलक्षितेन सत्त्वेनाक्रान्तो माधव्योऽब्राह्मण्यमुद्घोषितवान्। ततो भूयः तस्मिन् मेघप्रच्छन्ने प्रासादे आर्तस्वरं निशम्य स्ववयस्यस्य संरक्षणाय स्वधनुषि अमोघं स्वं वाणं सन्दधे। तदा माधव्यमुन्मुच्येन्द्रसारथिर्मातलिराविर्भूय ‘हरिणा असुरास्ते शरण्यं कृताः, तेष्वेवेदं धनुः विकृष्यतां न मयि’ इत्युवाच। तदनु राज्ञाभिनन्दितोऽसौ तस्मै स्वागमनकारणमाख्यत्—राजन् ! कालनेमिप्रसूतो दुर्जयो नाम दानवगणः ते सख्युरीन्द्रस्याजेयो जातः। तस्य त्वं निहन्ता स्थितः। अत आत्तशस्त्रं इममिन्द्ररथमारुह्य विजयाय प्रतिष्ठिताम्। तदाकर्ण्य राजा दुष्यन्तः 'अनुगृहीतोऽस्मि अनया मघोनः संभावनया’ इत्युक्त्वा माधव्यस्याक्रमणकारणं पृष्ट्वा ज्ञाततथ्यः स्वगमनवृत्तान्तममात्याय निवेदयितुमादिश्य तस्मिन् राजभारं च नियोजितवान् प्रहृष्टमना—

त्वन्मतिः केवला तावत् परिपालयतु प्रजाः।
अधिज्यमिदमन्यस्मिन् कर्मणि व्यापृतं धनुः ॥ ३२ ॥

तदनन्तरं स वासवीयं रथमारुह्य दिवं प्रस्थितवान्।

सप्तमेऽङ्के कथासारांशः

अस्मिन्नङ्के कालनेमिप्रसूतं दुर्जयदानवगणं निहत्य देवकार्य-सम्पादनानन्तरं देवराजस्य सत्क्रियया संभावितो राजा दुष्यन्तो व्योमयानेनावतरद् मातलि-परिचायिता देवभूमिरवलोक-

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यन् मध्ये मार्गे हेमकूटं किंपुरुषवर्षपर्वतं दृष्ट्वा तत्र तपश्चरतः सपत्नीकस्य मरीचिनन्दनस्य देवपितुः कश्यपस्य दर्शनलालसया तदाश्रममवतरति। तत्र प्रजापतिः कश्यपः स्वभार्यया दक्षकन्ययाऽऽदित्या पतिधर्ममधिकृत्य पृष्टो महर्षिपत्नीभिः सहितायै तस्यै उपदिशतोति ज्ञात्वाऽशोकवृक्षमूले राजा समुपविशति, मातलिंश्च राजागमनं निवेदयितुमवसरं ज्ञातुं च महर्षिसमीपे प्रस्थितः।

तत्र नरपतिः शुभसूचकचिह्नमनुभवन् तापसीभ्यां निषिध्यमानेनाबालसत्वेन बालेन संक्रीडितुं सिंहशिशुं बलादाकृष्टं जृम्भस्व सिंह ! दन्तांस्ते गणयिष्ये इति वीरोचितैः कृत्यैः औरससुतानुरागेण चाकृष्टो भवति। कस्य कृतिनो बीजमयं बाल इति विमृशन् स सिंहशावकादन्यत् क्रीडनकं ग्रहीतुं प्रसारितकरस्य तस्य बालकस्य हस्ते चक्रवर्तिलक्षणं दृष्ट्वा हृष्टः। ततो वाग्व्यापारेणायं विरमयितुमशक्य इति मत्वा एका तापसी तं प्रलोभयितुं मृत्तिकामयूर-मानेतुं स्वकुटीरे जगाम। ततो द्वितीया इतस्ततोऽवलोक्य राजानमवोचत्—भद्रमुख ! मोच्या-नेन दुर्मोकहस्तेन बाध्यमानं बालमृगेन्द्रम्। ततस्तावत्तद्वचनमनुतिष्ठन् बालस्पर्शसुखमुप-लभ्य कामपि अपूर्वां निर्वृतिमेतः स तां तद्बालकवंशपरिचयादिकं पप्रच्छ। सा च तस्य पुरुवंशप्रभवत्वम् अप्सरसः संभवत्वं चावोचत्।

यदा च केसरिकिशोरकविमर्दात्तन्मणिबन्धात् परिभ्रष्टं रक्षाकरण्डकं दुष्यन्तो यावद् गृह्णाति, तावत्तापसी निवेदयते-एषा अपराजिता नामौषधिरस्य शिशोः जातकर्मसमये भगवता कश्यपेन बद्धा। यदि जननी जनकं बालकं वा विहायान्यः कश्चिद्, भूमिपतितामेनां गृह्णाति तदा सर्पो भूत्वा तं दशतीत्यनेकशो दृष्टचरम्। ततः स्वपुत्र एवायमिति जातनिश्चयो बालं प्रेम्णापरिसस्वजे। ततस्तापसीभ्यां तदुदन्तमुपलभ्य तत्रागतां शकुन्तलां समीक्ष्य राजा तामभि-ननन्द। तंतो मातरमालोक्य सर्वदमनः-मातः ! क एषः पुत्र इति कथयित्वा मामालिंगति। ततः सा—आयुष्मन्ः स्वं भाग्यं पृच्छेत्युत्तरयति। ततः प्रणिपातादिना शकुन्तलाया विषादशल्यमुद्धरन्नुवाच राजा—प्रिये ! मया त्वं मोहात्स्वयमुपस्थितापि उपेक्षिता। एवं पश्चात्तापदूनहृदयो नृपोऽङ्गुलीयकोपालम्भात् स्मृतिरूपलब्धेत्युक्तत्वा तस्यै तदङ्गुलीयकं दर्शयति। विषमं कृतमनेन यत्तदाऽऽर्यपुत्रस्य प्रत्ययकाले दुर्लभमासीत्। नास्य विश्वसिमि। आर्यपुत्र एवैतद् धारयतु।

तत्र च तादृशं भूपं वीक्ष्य मातलिंसौभाग्येनायुष्मान् धर्मपत्नीसमागमेन पुत्रमुखदर्शनेन च वर्द्धसे इत्युक्त्वा तं संभावयामास। ततो राजा—मातले ! वृत्तान्तेनानेनाखण्डलोऽवबोद्धव्य इति विचारे मातलिः विहस्याह—किमीश्वराणामविदितं, सर्वं जानाति स सहस्राक्षो देवराजः। एतु आयुष्मान् सपत्नीको मरीचिनन्दनो महर्षिः कश्यपः ते दर्शनं वितरति। अनन्तरं सकलत्रपुत्रो राजा भगवन्तं कश्यपमदिति च द्रष्टुमुपस्थितः। ततो महर्षिः कश्यपोऽपि स्नेहदृष्ट्या शुभाशिषा तावनुगृह्य आयुष्मन् ! दुर्वाससः शापादियं तपस्विनी शकुन्तला त्वया प्रत्यादिष्टा नान्यथा, वत्से ! चरितार्थासि सहधर्मचारिणं दुष्यन्तं प्रति त्वया मन्युर्न कार्य इत्याभाष्य प्रत्यादेशविषये उभावपि निर्वृत्तचित्तौ कृत्वा शुभाशिषा संयोजयति—

आखण्डलसमो भर्ता जयन्तप्रतिमः सुतः। आशीरन्या न ते योग्या पौलोमीसदृशी भव ॥ २८ ॥

मेनकापि तत्र भर्तृपुत्रसहितां दुहितरं दृष्ट्वाऽतिमुमुदे। ततो दुष्यन्तो भगवता मारीचेन विसृष्टः पुत्रकलत्राभ्यां सहिते दिव्यमैन्द्रं रथमारुह्य पौरैरभिनन्द्यमान स्वं नगरं प्रविवेश।

हिन्दी में कथासार

प्रथम अङ्क

नाटक के आरम्भ में मङ्गलाचरण के बाद सूत्रधार अपनी पत्नी नटी से कहता है—आर्ये ! कविवर कालिदास द्वारा रचित अभिनव अभिज्ञानशाकुन्तल नामक नाटक का अभिनय करना है। यह महाराज विक्रमादित्य की सभा है, जिसमें बड़े-बड़े विशिष्ट विद्वान् उपस्थित हैं और ग्रीष्म ऋतु का आरम्भिक समय है। अतः इनके मनोविनोद के निमित्त कोई उत्तम गाना गाओ। यह सुन नटी एक गीत गाती है, जिस पर सूत्रधार कहता है—प्रिये ! तुम्हारे गीत ने मेरे हृदय को इस प्रकार आकृष्ट कर लिया है जैसे शिकारी राजा दुष्यन्त को मृग ने महर्षि कण्व के आश्रम की ओर खींच लिया है। इसके बाद दो वैखानस ब्रह्मचारियों ने आकर राजा को रोकते हुए कहा कि—राजन् ! यह आश्रम का मृग अवध्य है, आप इसे न मारें। इसपर राजा धनुष से बाण उतार लेते हैं। तब ब्रह्मचारियों ने आशीर्वाद दिया कि—महाराज ! आप विजयी बनें और आपको चक्रवर्ती पुत्र की प्राप्ति हो। यह सामने कुलपति कण्व का पुनीत आश्रम है। यदि आपके किसी कार्य में बाधा न हो तो आप कृपया यहाँ पधारें। और आतिथ्य सत्कार स्वीकार करें। अतिथि-सत्कार का भार शकुन्तला को सौंप कर वे सोमतीर्थ की यात्रा में गये हुए हैं। हम लोग समिद् और कुश लाने के लिए पास के जंगल में जा रहे हैं। तदनुसार राजा ने विनीत भाव से आश्रम में प्रवेश किया। प्रवेश करते समय शकुन की सूचना पर राजा कहते हैं—यह तो आश्रम का स्थान है, पर मेरी दाहिनी भुजा फड़क रही है। यहाँ इसका फल कैसे संभव होगा, या हो भी सकता है, क्योंकि होनी के द्वार सर्वत्र होते हैं। बाद राजा ने सखियों के साथ वृक्षों में जल देती हुई सुन्दरी शकुन्तला को देखा। बातचीत के प्रसंग में उन्हें सखियों से पता चला कि यह शकुन्तला कुलपति कण्व की पोष्य पुत्री है। उसकी माँ मेनका अप्सरा और पिता राजर्षि विश्वामित्र हैं। अब राजा को आशा हो चली कि शकुन्तला का पाणिग्रहण मेरे साथ हो सकता है क्योंकि यह वस्तुतः क्षत्रिय-कन्या है। इसके पहले ऋषिकुमारी होने के कारण आग के समान समझा था। अनन्तर दोनों एक दूसरे के प्रति आकृष्ट होते हैं। हँसमुखी सखी प्रियम्वदा शकुन्तला को छेड़ती है जिससे वह नाराज होती है। इस बीच एक जङ्गली हाथी के उत्पात से भयभीत होकर वे मुनिकन्याएँ अपने आश्रम में जाने को उद्यत हो जाती हैं और सखियाँ कहती हैं—राजन् आपके स्वागत किये बिना पुनः दर्शन देने को कहने में हमलोग संकुचित होती हैं इस पर राजा कहते हैं कि आप लोगों की मधुरवाणी से ही मैं सत्कृत हो गया। अनन्तर वे अपने निवास पर चली जाती हैं, शकुन्तला घूम-घूमकर राजा को देखती हुई रुकती जाती है तथा राजा दुष्यन्त आश्रम की रक्षा के लिए बढ़ते हैं और शकुन्तला के प्रति आकृष्ट होकर अपनी राजधानी में जाना स्थगित कर देते हैं।

द्वितीय अङ्क

आलसी विदूषक आखेटक से परेशान होकर उससे अपने को बचाना चाहता है और उसके दोषों का उद्घाटन करते हुए कहता है—दोपहर के समय भी कड़ी धूप में वृक्षों की विरल छाया में इस वन से उस वन में यह मृग, यह सूकर, यह शार्दूल कह कर दौड़ना

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पड़ता है। मृगयाबिहारी राजा दुष्यन्त के स्नेहवश पहाड़ी झरनों का कसैला और गर्म पानी पीना पड़ता है। असमय पर पका या कच्चा मांस का भोजन घोड़े हाथियों की आवाज से रात में नींद नहीं आती। इतने पर भी दुःख का अन्त नहीं, सुना है कि दुष्यन्त ने दुर्भाग्य से शकुन्तला नामक किसी सुन्दरी तापसकुमारी को देख लिया, उस पर आकृष्ट होकर वे अब नगर जाने की चर्चा ही नहीं करते। यह देखो, प्यारे मित्र हाथ में धनुष लिए जंगली फूलों की माला पहने इधर ही आ रहे हैं, अब अंग भङ्ग करके रहूँगा। इससे शायद छुटकारा मिल जाय। राजा से—हे मित्र ! मेरे हाथ-पैर नहीं चल रहे हैं। अतः केवल वाणी से ही जयजयकार करता हूँ—कहता है। राजा के हँसकर मित्र ! यह अंग जकड़ना कैसे हो गया ? यह पूछने पर विदूषक कहता है मित्र ! खुद आँख दुखाकर आँसू का कारण पूछते हो। अतः अब मुझे आखेट से विश्राम दो। इधर राजा भी शकुन्तला के रूप-लावण्यपर मुग्ध होकर आखेट से बचना ही चाहते थे। अतः वे सेनापति को आदेश देते हैं कि अब आखेट बन्द कर दिया जाय। आश्रम के यज्ञ में राक्षस उपद्रव करते हैं। तपस्वियों की प्रार्थना पर राजा यज्ञ-रक्षा के निमित्त वहाँ रुक जाते हैं। इसलिए प्रवृत्तपारण उपवास व्रत की समाप्ति पर माँ के बुलाने पर भी राजधानी न जाकर पुत्र के समान माने गये अपने मित्र विदूषक को ही सेना के साथ वापस भेज देते हैं। राजा को भय था कि कहीं यह बातूनी विदूषक शकुन्तला विषयक मेरे अनुराग को अन्तःपुर की रानियों से कह न दे। यह सोचकर राजा ने विदूषक से कहा—मित्र ! यहाँ मैंने तुम से पहले जो शकुन्तला की चर्चा की थी वह परिहास में की थी वास्तविक बात नहीं है ‘परिहास विजल्पितं सखे ! परमार्थेन न गृह्यतां वचः’। कहाँ मैं नागरिक वैदग्ध्य प्रिय व्यक्ति और कहाँ मृगों के बच्चों के साथ पली हुई भोली-भाली तपस्वियों की कन्यायें। भला हमारा इनका क्या जोड़ा ? यह तो एक विनोद मात्र (हँसी मजाक) था। इसमें सच्चाई कुछ भी नहीं है। मित्र माढव्य ! मेरे कथनानुसार तुम नगर में जाकर माँ के उपवास व्रत में पुत्र का कार्य सम्पादन करो और मैं भी तपोवन की रक्षा के निमित्त आश्रम जाता हूँ।

तृतीय अङ्क

हाथ में कुश लिए हुए यजमान का एक शिष्य कहता है, वाह, राजा दुष्यन्त के तपोवन में प्रवेश करने मात्र से ही सब यज्ञ कर्म सम्पन्न हो गये, क्योंकि इनके धनुष के टंकार से सारे विघ्न दूर हो जाते हैं। इधर राजा दुष्यन्त यज्ञ-रक्षा कार्य से निवृत्त होकर मुनियों की अनुमति से मनोविनोदपूर्वक विश्राम करने के लिए मालिनी नदी के किनारे वैतस‌लता-मण्डप की ओर जाते हैं। वह कण्वपुत्री शकुन्तला का भी प्रिय स्थान है, जहाँ वह अपनी दोनों सखियों—प्रियम्बदा तथा अनसूया के साथ पहले से ही उपस्थित थी। राजा दुष्यन्त तथा शकुन्तला दोनों परस्परावलोकनजन्य कामपीड़ा से व्यथित होकर दुर्बल हो गये थे। सखियाँ शकुन्तला को रोगी समझकर नलिनीदल आदि से उपचार करती हुई रोग का कारण पूछती हैं। जब उन्हें मालूम होता है कि राजा दुष्यन्त से प्रेम करने के कारण इसकी यह दशा हुई है तब उन्होंने उसके उस कार्य का अनुमोदन किया और नलनीदल पर प्रेम-पत्र लिखवाती हैं। उस मदनलेख में शकुन्तला अपनी विरहव्यथा का वर्णन करती हुई कहती है कि सुभग ! आपका हाल तो मैं नहीं जानती, पर मैं रातदिन विरह की अग्नि में जलती जा रही हूँ। लताओं की ओट में छिपे हुए राजा दुष्यन्त यह सब सुनकर प्रकट हो जाने का उचित अवसर समझकर प्रकट हो जाते हैं।

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इन्हें देखकर सखियाँ उनका स्वागत करती हुई कहती हैं—राजन् ! हम लोगों की यह प्रियसखी आप को देखकर मदन द्वारा इस अवस्था को पहुँचा दी गई है। अब आपही इसके जीवन के आधार रहे हैं। अतः आप ऐसा करें कि यह बन्धुजनों के लिए शोचनीय न हो। इस प्रकार कह करके एक मृग के बच्चे को उसकी माँ ने मिलाने के बहाने लता मण्डप से बाहर चली जाती हैं। सखियों के साथ बाहर जाने की चेष्टा करती हुई शकुन्तला को रोककर राजा अपने अभिलषित मनोरथ को सफल करते हुए आनन्द का अनुभव करने लगे।

इतने में ही शकुन्तला को पुकारती हुई गौतमी स्वास्थ्य लाभ के लिए दर्भोदक लेकर वहाँ उपस्थित होकर कहती है वत्से ! इस दर्भोदक से तुम्हारा स्वास्थ्य ठीक हो जायगा। अब साम हो चली कुटी पर चलें। बड़े दुःख से उसके पीछे-पीछे जाती हुई शकुन्तला ने कहा-लतावलय ! सन्तापहारक ! पुनः मिलने के लिए आज से अनुरोध करती हूँ इस प्रकार लतावलय के व्याज से राजा को संकेत कर गौतमी के साथ वहाँ से चली जाती है। इसके बाद राजा प्रिया-परिसुक्त लतामण्डप में बड़ी खिन्नता से कुछ देर बिताकर यज्ञ कर्म में संलग्न ऋषियों के सन्ध्याकालीन निशाचरों के भय को दूर करने के लिए प्रस्थित हो जाते हैं।

चतुर्थ अङ्क

पुष्प तोड़ती हुई प्रियम्वदा और अनसूया की आपसी बातचीत से मालूम पड़ता है कि शकुन्तला के साथ गान्धर्वविवाह और निर्विघ्न यज्ञ रक्षा का कार्य समाप्त हो जाने के कारण ऋषियों से आज्ञा लेकर राजा दुष्यन्त अपनी राजधानी को चला गया। वहाँ जाकर वह शकुन्तला का स्मरण करेगा या नहीं ? इधर शकुन्तला भी उसके विरह में रात-दिन उनका चिन्तन करती हुई कुटी के पास ही रहती है। राजा के बुलाने वाले दूत की प्रतीक्षा कर थक जाती है और सोच में पड़ी रहती है।

एकदिन प्रसिद्ध क्रोधी दुर्वासा मुनि भिक्षा के लिए आश्रम में आये। उस समय वहाँ शकुन्तला के अतिरिक्त कोई नहीं था। वे आवाज देते हैं दुष्यन्त के सोच में डूबी हुई शकुन्तला कुछ नहीं सुन पाती। इससे ऋषि आग-बबूला होकर शाप देते हुए क्रोध में कह कर चल देते हैं कि तू जिस पुरुष की चिन्ता में इस तरह मग्न है कि मेरी बात तक नहीं सुनती, वह पुरुष स्मरण दिलाने पर भी तुझे स्मरण नहीं कर सकेगा। इस हृदयविदारक शाप को सुन अनसूया ने अनुनय-विनय कर उन्हें मनाने के निमित्त प्रियम्वदा को भेजकर उनके आतिथ्यसत्कार के लिए आश्रम में आ जाती है। जब प्रियम्वदा ने चरण पड़कर बड़ा अनुनय-विनय किया तो ऋषि ने कहा—मेरा शाप तो व्यर्थ नहीं होगा, पर कोई आभरण दिखाने पर यह शाप निवृत्त हो जायेगा। ( उस समय सखियों ने इस दुःखद घटना को शकुन्तला से नहीं कहा, केवल अपने ही तक सीमित रखा । )

सखियाँ परेशान थीं कि शकुन्तला ने जो अपने मन से राजा दुष्यन्त के साथ अपना गान्धर्व-विवाह कर लिया है, उससे कुलपति को कैसे अवगत कराया जाय ? सौभाग्य से जब महर्षि कण्व ने सोमतीर्थ की यात्रा से लौटकर यज्ञशाला में प्रवेश किया तब आकाश वाणी ने उनको दुष्यन्त के साथ शकुन्तला के गान्धर्वविवाह की घटना से अवगत करा

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दिया। सत्पात्र के चुनाव पर कण्व जी प्रसन्न हुए और शकुन्तला का अभिनन्दन करते हुए उन्होंने उस योग्य वर की प्राप्ति का अनुमोदन किया। बाद वे शार्ङ्गरव-शारद्वत इन दो शिष्यों तथा वृद्धा तापसी गौतमी के साथ शकुन्तला को दुष्यन्त के पास हस्तिनापुर भेजने का आदेश देते हैं। शकुन्तला की विदाई के अवसर पर वहाँ के वृक्षों ने दिव्य आभूषण तथा वस्त्र दिये। विदाई के समय कण्व के आश्रम में करुणा की अति हो गई। वीतराग तपस्वी कण्व तक रो पड़े। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी आदि से संयुक्त वह सारा तपोवन जीवित प्राणी के समान विकल हो उठा। वृक्षों ने पत्ते गिरने के बहाने अश्रुधारा बहाई मृग मुख में तृण लिए ही रह गये। इस प्रकार समस्त आश्रमवासी स्तब्ध हो गये।

महर्षि कण्व गृहस्थ जीवन को सुखमय बनाने की दृष्टि से शकुन्तला को अनेक समयोचित उपदेश देते हैं और राजा दुष्यन्त को शिष्यों द्वारा उत्तम कर्तव्योचित सन्देश देकर जलाशय के पास से अनसूया और प्रियम्बदा के साथ शकुन्तला से शून्य आश्रम पर आकर कहते हैं कि कन्या के जन्म से पिता को चिन्ता बनी रहती है कि इसे किस योग्य वर को दिया जाय। कन्यारूपी अमानत उसके योग्य अधिकारी को सौंपकर पिताओं का हृदय हलका हो जाता है। आज शकुन्तला को योग्य पति राजा दुष्यन्त के पास भेज कर मेरा भी हृदय निर्मल हो गया।

पञ्चम अङ्क

राजा दुष्यन्त विदूषक से कहता है कि मित्र ! सुनो, गीत का स्वर सुनाई पड़ रहा है मालूम पड़ता है कि सङ्गीतशाला में रानी हंसपदिका गाना सीख रही है जिसे सुनकर मेरा हृदय अन्तर्व्यथा का अनुभव कर रहा है। इतने में ही कञ्चुकी आकर कहता है—महाराज ! हिमालय की तराई के जङ्गल से महर्षि कण्व का सन्देश लेकर स्त्रियों के साथ तपस्वी लोग द्वार पर उपस्थित हैं। यह सुन राजा ने आदेश दिया कि पुरोहित सोमरातजी से कहो कि वे वैदिक रीति से उन तपस्वियों का सत्कार कर यज्ञशाला में लायें। मैं भी वहाँ जाकर उनसे भेंट करूँगा। बाद घूँघट काढ़ी हुई शकुन्तला गौतमी तथा कण्व के शिष्यों के साथ दुष्यन्त के दरबार में पहुँचती है। राजा शाप के कारण शकुन्तला के साथ गान्धर्वविवाह की बात भूल जाता है। सौन्दर्य की छटा देखकर वह शकुन्तला पर आकृष्ट होता है किन्तु धर्मनिष्ठा के कारण पराई स्त्री समझकर अस्वीकार कर देता है। गौतमी शकुन्तला का मुख देखती है। बाद शकुन्तला पहचान के लिए अंगूठी दिखाना चाहती है, पर वह अंगुली में नहीं मिलती, बाद कण्वाश्रम में साथ बिताए दिनों का मधुर प्रसङ्ग सुनाती है, फिर भी राजा को कुछ याद नहीं आता। अंगूठी का प्रसङ्ग उठाकर न दिखा पाने से राजा को और आशंका हो जाती है कि ये लोग मुझे धर्म से गिराना चाहते हैं।

स्त्री जाति परवञ्चना में बड़ी प्रवीण होती है मनुष्यों की कौन कहे पक्षी भो इससे बाज नहीं आते, कोयल उड़ने के पहले अपने बच्चों को कौए से पालन कराती हैं। इसी प्रकार शकुन्तला की माँ मेनका ने इसे जन्म देकर कण्व से पालन पोषण कराया है। जब अशिक्षित पक्षियों की यह हालत है तो शिक्षित मनुष्यों की क्या स्थिति होगी। अतः मैं इस वञ्चना में न फँसूंगा। इसके बाद शकुन्तला और शार्ङ्गरव राजा को भला बुरा भी सुनाते हैं, पर वह नहीं बदलता है। अन्त में शकुन्तला को छोड़ यह कहकर कि 'बिना बड़ों से पूछे जो तूने ऐसा कार्य किया है, उसका फल भोगो। विवाहिता लड़की के लिए पिता

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के घर की अपेक्षा पति के घर में दासता करते रहना भी अच्छा है। यह कहकर चल देते हैं और शकुन्तला रोती रह जाती है। बाद राजा उचित सलाह के लिए पुरोहित से कहता है, वे सुझाव देते हैं कि महाराज ! बच्चा होने तक यह देवी मेरे घर रहे, सिद्ध पुरुषों ने भविष्यवाणी की है कि आप को पहले चक्रवर्ती पुत्र होगा; यदि कण्व का दौहित्र चक्रवर्ती लक्षण से सम्पन्न होगा तो शकुन्तला की बात सत्य समझकर इसे निवास में स्थान दीजियेगा, अन्यथा इन दोनों को कण्व के आश्रम पर पहुँचा दिया जायेगा। राजा यह सुझाव मान लेते हैं। अपना भाग्य कोसती हुई शकुन्तला पुरोहित के पीछे-पीछे रोती हुई जा रही थी कि स्त्री के आकार की एक दिव्य ज्योति आकाश से आकर उसे उठा ले जाती है। जब पुरोहित जी आकर राजा से यह घटना बताते हैं तो वे आश्चर्य से व्याकुल होकर शयनागार में चले जाते हैं।

षष्ठ अङ्क

शक्रावतारतीर्थ का निवासी एक धीवर रत्नजटित एवं राजनामाङ्कित एक सोने की अंगूठी बेचने के लिए बाजार में जाता है, सिपाही उसे पकड़कर नगररक्षक कोतवाल के पास लाते हैं। अंगूठी की प्राप्ति का कारण पूछने पर वह बताता है कि 'स्वामिन् ! मैं जाल से मछलियों को मारकर अपने परिवार का पालन-पोषण करता हूँ। एक दिन शक्रावतारतीर्थ में जाल से फसाई गई रोहू मछली के पेट से यह अंगूठी मिली है। मैं इसे बेचने के लिए बाजार में आया तब इनके द्वारा पकड़कर आपके पास लाया गया हूँ। यह सुन वह नगर-रक्षक उस अंगूठी को लेकर राजा के पास जाता है, उसे देखते ही दुर्वासा के शाप का अन्त हो जाता है और राजा को शकुन्तला की स्मृति हो जाती है। उस अंगूठी के बदले धीवरको अपना स्वर्ण-कंकण पुरस्कार में दे डालता है। बाद राजा शकुन्तला के परित्याग के कारण वियोग से विकल हो जाता है। विदूषक को साथ लेकर अपने दुःख को दूर करने के लिए प्रमदवन में जाता है और वसन्तोत्सव न मनाने का आदेश दे देता है। इधर मेनका की सखी सानुमती नाम की एक अप्सरा शचीतीर्थ में अपनी पारी पूरी कर राजा के प्रमदवन में आकर तिरस्करिणी विद्या के प्रभाव से छिपकर राजा के पास खड़ी हो जाती है। राजा शकुन्तला के चित्र फलक को देखकर दुःखी हो जाता है, और उसमें कुछ परिवर्तन करने का संकेत करता है। बाद राजा नगरकार्य निरीक्षक अपने अमात्य को सन्देश देता है कि मैं रात में देर तक जग जाने के कारण आज धर्मासन पर नहीं जाऊँगा। आपने जो राजकार्य देखा हो उसे पत्र में लिखकर मेरे पास भेज दें। तदनुसार मन्त्री ने लिखा कि समुद्रमार्ग से व्यापार करनेवाला धनमित्र नाम का व्यापारी नौका दुर्घटना से मर गया है। वह सन्तानहीन था। अतः उसकी सम्पत्ति राजखजाने में जमा होनी चाहिए। सन्तानहीन की बात पढ़कर राजा दुःखी हो जाता है और अपने बाद पुरुवंश के विच्छेद हो जाने की आशंका से व्याकुल हो उठता है। अपने पितरों की भावी दशा का स्मरण कर अत्यन्त दुःखी हो जाता है। बाद आदेश देता है कि धनिकों की अनेक स्त्रियां होती हैं। पता लगाया जाय—यदि उसकी कोई स्त्री गर्भवती हो तो वह गर्भस्थ बालक ही इस सम्पत्ति का अधिकारी होगा। इस प्रकार अंगूठी देखने के बाद राजा का शकुन्तला में निश्चल प्रेम राजा को विरह व्यथा, और पुन मिलन की आशा बताने के लिए मेनका द्वारा भेजी हुई वह सानुमती अप्सरा चली जाती है।

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इसी समय मेघप्रच्छन्न प्रासाद के ऊपर इन्द्र का सारथी मातलि विदूषक को पकड़कर तङ्ग करना शुरू कर देता है। शोर करके अपनी रक्षा के लिए राजा को बुलाने पर वह धनुष-बाण लेकर उस ब्राह्मण मित्र को बचाने के लिए दौड़ पड़ता है। शरसन्धान करने पर मातलि विदूषक को छोड़कर प्रगट हो जाता है और बताता है कि राजन् ! कालनेमि की सन्तान दुर्जय नामक राक्षसगण इन्द्र के लिए अजेय हैं। अतः इन्द्र ने अपने शत्रु राक्षसों को मारने के लिए आपको आमन्त्रित किया है। ये बाण आप उन्हीं पर छोड़िए, मुझ पर नहीं। विदूषक को पकड़ने का कारण पूछने पर मातलि ने जवाब दिया कि किसी कार्य से आपको दुःखी देखकर वीरोचित कार्य के निमित्त उत्तेजित करने के लिए मैंने आपके मित्र विदूषक को इस प्रकार तङ्ग कर रखा था ।) अनन्तर राजा मन्त्री को राज्य-भार सँभालने का सन्देश विदूषक द्वारा भेजकर इन्द्र के रथ पर सवार होकर स्वर्ग को प्रस्थान कर देता है।

सप्तम अङ्क

राजा दुष्यन्त स्वर्ग जाकर उन कालनेमि प्रसूत दुर्जय राक्षसों को पराजित कर इन्द्र की आज्ञा पूरी करते हैं। बाद उनसे विशेष सत्कृत होकर उन्हीं के रथ से पुनः भारत के लिए लौट पड़ते हैं। रास्ते में किंपुरुषवर्ष का हेमकूट नामक पर्वत दीख पड़ता है, जहाँ देवताओं के पिता ब्रह्माजी के पौत्र, मरीचिनन्दन महर्षि कश्यप अपनी पत्नी दक्षकन्या अदिति के साथ तपस्या में संलग्न हैं। उनके दर्शन की लालसा से राजा रथ से उतर कर एक पेड़ के नीचे रुक जाते हैं और मातलि कश्यप की आज्ञा लेने के लिए चला जाता है, जहाँ कश्यपजी ऋषि पत्नियों के साथ अदिति को पातिव्रत्य धर्म का उपदेश दे रहे थे।

इधर एक बालक शेर के बच्चे के साथ खेलता हुआ दिखाई देता है सिंहशावक को माँ का दूध नहीं पीने देता, जबरदस्ती खींच कर कहता है—मुँह खोलो तुम्हारे दांत गिनूँगा, तथा दो तापसियाँ उसे मना कर रही हैं उस बालक को देखकर राजा का पुत्र-वात्सल्य उमड़ पड़ता है, वे उसे अपनी गोद में खेलाने वाले को धन्य समझते हैं। शेर के बच्चे को छोड़ दूसरे खिलौने के लिए हाथ पसारने वाले उस बालक के हथेली में चक्रवर्ती राजा का चिन्ह देखकर राजा अत्यन्त प्रसन्न होते हैं। एक तापसी ने यह कहकर कि यह बात से नहीं माननेवाला है उसे खेलने के लिए बनाया गया खिलौना देना ही होगा, यह कहकर मिट्टी के मयूर को लेने के लिए अपनी कुटी में चली जाती है। तब तक दूसरी तापसी इधर-उधर देखकर राजा से निवेदन करती है कि भद्रमुख ! इस बालक ने शेर के बच्चे को जोर से पकड़ रखा है। अतः कृपया इसे छुड़ा दीजिए। तदनुसार राजा शेर के बच्चे से छुड़ाकर उस बालक को अपनी गोद में लेकर स्पर्श सुख का अनुभव करने लगते हैं। दोनों का चेहरा मिलता देखकर वह तापसी आश्चर्यचकित हो जाती है। वह आश्चर्य चरमसीमा पर तब पहुँच जाता है जब वह देखती है कि बालक की कलाई से जमीन में गिरी ताबीज को उठा लेने पर भी उसका कुछ नहीं होता। उस अपराजिता नामक औषधि को कश्यपजी ने बालक के जातकर्म संस्कार के समय बांध दिया था जो माता, पिता और बालक के अतिरिक्त कोई अन्य उठा ले तो वह साँप बनकर उसे डँस देती थी। अब राजा को पूर्ण विश्वास हो गया कि यह मेरा ही औरसपुत्र है। इसके पूर्व तापसियों द्वारा राजा को मालूम हो गया था कि यह पुरुवंश का क्षत्रिय बालक है और एक अप्सरा की पुत्री में उत्पन्न हुआ है, उसके पति ने उसका परित्याग कर रखा है। ये सभी बातें उन्हीं में घटती थीं।

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यह सुखद समाचार तत्काल तापसियों ने शकुन्तला के पास पहुँचाया, जो पति-प्राप्ति के लिए नियमव्रत में थी, वह उसी वेग में वहाँ आती है, दोनों का मिलन होता है और राजा उसके चरणों पर गिरकर क्षमा माँगते हैं। इतने में मातलि आकर पुत्र और पत्नी के मिलन के सौभाग्य पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए राजा को धन्यवाद देता है और कहता है कि राजन् आपको दर्शन देने के लिए देवमाता के सहित महर्षि कश्यप प्रतीक्षा कर रहें हैं। तब पुत्र, पत्नी और मातलि के साथ राजा ऋषि के पास उपस्थित होकर साष्टाङ्गप्रणाम कर उनकी आज्ञा से सामने बैठ जाते हैं। बाद महर्षि स्नेहभरी दृष्टि से शुभाशीर्वाद देते हुए दोनों से कहते हैं कि आयुष्मन् ! मैंने अपने योगबल से जाना है कि तुमने दुर्वासा के शाप से मोहित होकर इस तपस्विनी का परित्याग कर दिया था। वत्से शकुन्तले ! तुम्हारा मनोरथ पूर्ण हो गया, अब तुम दुष्यन्त के प्रति क्रोध नहीं करना। बेटी ! यह तेरा पति इन्द्र के समान, यशस्वी और तुम्हारा यह पुत्र सर्वदमन जयन्त के समान बलवान् तथा तुम इन्द्राणी के समान चिर सौभाग्यवती होओ। तुम तीनों श्रद्धा, धन और विधि के प्रतीक हो, तुम तीनों का यह योग विश्व के कल्याण के लिए हो। इस प्रकार प्रत्यादेश विषय में दोनों को समझा बुझाकर निर्मल हृदय कर देते हैं और अन्त में उन्हें हस्तिनापुर जाने के लिए विदा कर देते हैं।


प्रमुख पात्रों का चरित्र-चित्रण

राजा दुष्यन्त

राजा दुष्यन्त अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक के नायक हैं। जाति से ये चन्द्रवंशी क्षत्रिय हैं और इनमें धीरोदात्त नायक के सभी गुण वर्तमान हैं। इनकी चाल ढाल व्यवहार आदि आकर्षक हैं। इनका शरीर लम्बा चौड़ा तथा सुडौल है। इनके सम्पर्क में आने वाले सभी लोगों पर इनके व्यक्तित्व का प्रभाव पड़ता है। ये शूरवीर धार्मिक राजा हैं। शिकार खेलने में इनका मन खूब लगता है। इनकी वीरता की इतनी ख्याति है कि देवराज इन्द्र भी अपनी सहायता के निमित्त इन्हें बुलाते हैं। ये बड़े मधुरभाषी हैं, प्रियंवदा इनके मधुर भाषण की प्रशंसा करती है। ये अपने कुल की प्रतिष्ठा का हमेशा ध्यान रखते हैं तथा अपने पूर्वज महाराज पुरु के पावन आचरण से सदा प्रेरणा लेते रहते हैं। ये कोई ऐसा कार्य नहीं कर बैठते हैं जिससे इनके कुल की मर्यादा पर धब्बा लगे। इस प्रकार दुष्यन्त सर्वश्रेष्ठ गुणों के प्रतीक एवं आदर्श राजा हैं।

जिस समय राजा दुष्यन्त तपोवन में प्रवेश करते हैं उस समय उनके दक्षिण बाहु फड़कने से शुभ शकुन होता है। जैसे ही वे आगे बढ़ते हैं वैसे ही कलश लेकर वृक्षों में पानी डालने के लिए आती हुई तीन तापस कन्याओं को देखते हैं। उनमें वल्कल पहने हुए शकुन्तला को देखकर वे मन में सोचते हैं कि इस कृशाङ्गी का सुन्दर शरीर वल्कल के योग्य नहीं, फिर भी वल्कल से इसकी शोभा बढ़ गई है। सहज सुन्दरों को क्या अच्छा नहीं लगता ? क्योंकि सेवार से आवृत रहता हुआ भी कमल सुन्दर मालूम पड़ता है और चन्द्रमा में पड़ा कलंक भी उसकी शोभा बढ़ाता है—

सरसिजमनुविद्धं शैवलेनापि रम्यं मलिनमपि हिमांशोर्लक्ष्म लक्ष्मीं तनोति । इयमधिकमनोज्ञा वल्कलेनापि तन्वी किमिह मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम् ।। १।२०

राजा दुष्यन्त को नैतिक चरित्र के विषय में बड़ा आत्मविश्वास था। जब राजा की दृष्टि शकुन्तला के अङ्गों पर पड़ती है। इसके लाल-लाल ओठ अभिनव किसलयों की दीप्ति से स्पर्धा कर रहे हैं। दोनों भुजाएँ कोमल शाखाओं जैसी मनोहर प्रतीत हो रही हैं और नया यौवन लुभावने कुसुम के समान उसके अङ्गों में व्याप्त हो गया है इस रूपसौन्दर्य से राजा का मन चंचल हो जाता है।

महर्षि कण्व के आश्रम में प्रवेश के समय अनुपम सौन्दर्य से मण्डित शकुन्तला को देखकर उसके लावण्य-कान्ति पर मुग्ध होकर प्रशंसा करते हैं और उसे पाने के लिए लालायित हो जाते हैं, फिर भी उनका विवेक ब्राह्मण कन्या के प्रति आकृष्ट होने से रोकता है। उनके मन से विचार उठता है कि क्या यह सम्भव है कि यह महर्षि कण्व की ब्राह्मणेतर भार्या में उत्पन्न हुई हो ! शीघ्र ही निर्णय कर लेते हैं कि अथवा सन्देह करना व्यर्थ है, निश्चय ही यह क्षत्रियों के ग्रहण योग्य है, क्योंकि मेरा पवित्र मन इसे चाहता है। सन्देहास्पद विषयों में सदाचारियों के अन्तःकरण के विचार ही प्रमाण हुआ करते हैं। इस प्रकार दुष्यन्त का आत्मसंयम पर पूर्ण विश्वास था—

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असंशयं क्षत्रपरिग्रहक्षमा यदार्यमस्यामभिलाषि मे मनः । सतां हि सन्देहपदेषु वस्तुषु प्रमाणमन्तःकरणप्रवृत्तयः ।। १।२२

फिर भी सही-सही पता लगाते हैं । दुष्यन्त विवेकहीन कामी पुरुषों के समान अन्धे नहीं बनते, अवसर मिलने पर शकुन्तला की सखियों से पूछ ही बैठते हैं—कुलपति कण्व तो आबाल ब्रह्मचारी हैं, आप लोगों की यह सखी उनकी कन्या कैसे ? जब उन्हें शकुन्तला विषयक सारा रहस्य ज्ञात हो जाता है । अर्थात् यह शकुन्तला अविवाहित है, इसके विवाह का किसी के साथ निश्चय नहीं हुआ है, यह क्षत्रिय की कन्या होने के कारण विवाह के योग्य है, और यह भी मुझे चाहती है। इत्यादि निश्चय हो जाने के अनन्तर ही वे शकुन्तला से गान्धर्व विवाह करते हैं । तपोवन से हस्तिनापुर लौटते समय शीघ्र ही बुलाने का वचन देकर अभिज्ञान के रूप में प्रेम से उसे अपनी अंगूठी दे देते हैं, पर दुर्भाग्यवश दुर्वासा के शाप के प्रभाव से उसकी स्मृति धूमिल हो गई उसे कुछ स्मरण ही नहीं रहा। वे परस्त्री समझकर दरबार में उपस्थित शकुन्तला को ठुकरा देते हैं, फिर भी पाठक उन्हें दोषी नहीं समझते। अंगूठी की प्राप्ति के पश्चात् जब सारी बातें स्मृतिपटल पर आ जाती हैं तब वे पश्चात्ताप की तीव्रता से व्यग्र हो उठते हैं। अतिशय दुःख का अनुभव करते हुए सामयिक उत्सवों से विरत होकर समय बिताते हैं। अन्त में इन्द्रपुरी से लौटते समय महर्षि कश्यप के आश्रम पर शकुन्तला का साक्षात्कार कर उसके पैरों पर गिर कर क्षमा माँगते हुए कहते हैं—

सुतनु हृदयात् प्रत्यादेशव्यलीकमपैतु ते । किमपि मनसः संमोहो मे तदा बलवानभूत् ।। ७।२४

राजा दुष्यन्त समदर्शी आदर्श पति हैं । अनेक स्त्रियों से सम्बन्ध रहने पर भी इन्हें नैतिकताका सदा ध्यान बना रहता है । नई स्त्री से प्रेम हो जाने पर भी ये पहली स्त्रियों को भूल नहीं जाते । ये अपनी रानियों की भावनाओं को पूरा-पूरा सम्मान करते हैं। पञ्चम अङ्क के आरम्भ में रानी हंसपदिका के उपालम्भ पूर्ण गीत को सुनकर वे उसे सान्त्वना देने के निमित्त माढव्य को भेजते हैं—गच्छ नागरिकवृत्त्या संज्ञापयैनाम् । षष्ठ अंक में प्रमद वन में चित्र पट पर शकुन्तला की छवि देखने में मग्न राजा दुष्यन्त चतुरिका चेटीमें महारानी वासुमती के आने का समाचार सुनकर मानगर्विता महारानी अप्रसन्न होगी, यह सोचकर शकुन्तला के चित्रपट को विदूषक से अन्यत्र भेज देते हैं—वयस्य ! उपस्थिता देवी बहुमानगर्विता च । भवानिमा प्रतिकृतिं रक्षतु । वह वसुमती के सम्मान एवं आदर में कमी नहीं आने देना चाहते हैं । इस प्रकार समदर्शी नायक दुष्यन्त के चरित्र को देखकर सानुमती अप्सरा उसकी प्रशंसा करती है ।

दुष्यन्त एक धर्मपरायण राजा हैं। आदि से अन्त तक उन्होंने धर्मनिष्ठा का पालन किया है। ऋषियों की प्रार्थना पर ही महर्षि कण्व के आश्रम में यज्ञ की रक्षा में संलग्न हैं । उन्हें हस्तिनापुर से आदरणीय मां का सन्देश मिलता है—आगामी चौथे दिन मेरे उपवास की पारणा है उस अवसर पर आपका उपस्थित होना आवश्यक है । माता का यह सन्देश सुनकर वे द्विविधा में पड़ जाते हैं । एक ओर तपस्वियों के यज्ञ का रक्षाकार्य जिसके लिए पहले ही वचन दे चुके हैं दूसरी ओर पूज्या माता का आदेश, क्या हो, कैसे हो । वे बड़ी बुद्धिमानी से दोनों कार्यों को सम्पन्न करने का मार्ग निकालते हैं, विदूषक को मां की सेवा में भेज देते हैं क्योंकि माता ने उसे भी तो पुत्र की भांति ही माना है । दुष्यन्त

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के हृदय में ऋषियों के प्रति अपार आदरभाव है, वे उनकी रक्षा तथा सेवा से प्राप्त पुण्य को अमूल्य निधि समझते हैं वे विदूषक से स्पष्ट कहते हैं—

यदुत्तिष्ठति वर्णेभ्यो नृपाणां क्षयि तत्फलम्।
तपः षड्भागमक्षय्यं ददत्यारण्यका हि नः॥ २।१३

अतः वे ऋषियों के आदेश पालन में अपने को कृतकृत्य समझते हैं। मृगया के शिकारी होते हुए भी वैखानसों के कहने से वे मृग को छोड़ देते हैं उस पर बाण नहीं चलाते। तपोवन की मर्यादा अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए वे विनीतभाव से आश्रम में प्रवेश करते हैं और अपने सैनिकों को आश्रम की मर्यादा का बोध कराते हैं। जब सेना का हाथी तपोवन में गड़बड़ मचाता है तब वे अपने मन में सोचते हैं कि क्या मैं तपस्वियों की दृष्टि में अपराधी ठहराया गया हूँ—कथमपराध्दः तपस्विनामस्मि। द्वितीय अंक में जब तपस्वियों की तरफ से तपोवन की रक्षा के निमित्त निवेदन आता है तब वे कहते हैं कि तपस्वियों की क्या आज्ञा है? किमाज्ञापयन्ति? पञ्चम अंक में जब शकुन्तला के निराकरण से शार्ङ्गरव बड़ी बातें कहता है तब वे क्रुद्ध नहीं होते केवल इतना ही कहकर चुप हो जाते हैं कि विशेषेणाधिक्षिप्तोऽस्मि। सप्तम अंक में मारीच (मरीचिनन्दन कश्यप) ऋषि के आश्रम में ऋषियों के प्रति उनका व्यवहार अपार श्रद्धा को व्यक्त करता है।

उनके आशीर्वाद को अपने भविष्य का मूल-मन्त्र समझते हैं। (देखिए सप्तम अंक का अन्तिम अंश।) दुष्यन्त एक उच्चकोटि के शासक हैं। उनमें तीन गुण प्रमुख हैं (१) कर्तव्य-परायणता (२) प्रजा-प्रेम और (३) लोभ का अभाव। प्रथम अङ्क में जब राजा दुष्यन्त गज के उपद्रव को सुनते हैं तो तत्काल संभ्रान्त होकर कुटी में जाने के लिए उद्यत ऋषि-कुमारियों को सान्त्वना देकर रक्षा के लिए चल देते हैं। द्वितीय अंक में जब दो ब्रह्मचारी तपोवन की रक्षा के निमित्त बुलाने आते हैं तब वे कहते हैं कि आप दोनों आगे-आगे चलें, मैं भी पीछे-पीछे आ ही गया—गच्छतां पुरो भवन्तौ। अहमप्यनुपदासमागत एव। पञ्चम अंक में कञ्चुकी के वाक्य से प्रतीत होता है कि वे प्रतिदिन दरबार में बैठते हैं एवं प्रजाओं के मुकदमों को सुनते हैं। उन्हें शासन तथा राज्य व्यवस्था से फुरसत नहीं मिलती। वे प्रतिदिन मन्त्रियों के कार्यों का स्वयं निरीक्षण किये बिना कोई भी आदेश प्रसारित नहीं होने देते, वे बड़े ही प्रजावत्सल हैं। अपनी प्रजाओं को स्वजनों के समान समझते हैं। षष्ठ अङ्क में वे एक प्रजारञ्जक राजा के समान प्रतिहारी से कहते हैं कि मेरे राज्य में यह घोषणा करा दो कि जिसका जो सम्बन्धी मर गया हो वह राजा दुष्यन्त को अपना वह सम्बन्धी समझे। अर्थात् यदि किसी स्त्री का पति मर गया हो तो मैं उसका पति तो नहीं हो सकता किन्तु यदि किसी का पुत्र, पिता या भाई आदि मर जाय तो मुझे ही उस जगह पर समझे।

येन येन वियुज्यन्ते प्रजाः स्निग्धेन बन्धुना।
स स पापाद्दृते तासां दुष्यन्त इति घुष्यताम् ॥ ६।२३

दुष्यन्त बड़े ही आदर्शमय निर्लोभी राजा हैं। वे अनुचित मार्ग से अपना कोष बढ़ाना नहीं चाहते। जब वे निःसन्तान समुद्रव्यापारी धनमित्र नाम के बनिये के नौका दुर्घटना से मरने का समाचार सुनते हैं तो वे उसके धन को अपने कोष में नहीं मिला लेते, वे इस बात की खोज करते हैं कि उसकी स्त्रियों में से कोई गर्भवती है या नहीं जब उन्हें यह

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पता लगता है कि मृत बनिये की एक स्त्री—अयोध्या के सेठ की कन्या—गर्भवती है तब वे कहते हैं कि वह गर्भस्थ बालक अपने पिता के धन का मालिक है। प्राचीन भारतीय परम्परा के अनुसार राजा दुष्यन्त संगीत और चित्रकला के अनुपम उपासक हैं। पञ्चम अंक के आरम्भ में वे रानी हंसपदिका के मधुर स्वर-संयोग को सुनकर विदूषक से भूरि-भूरि उसकी प्रशंसा करते हैं। उनकी चित्र निर्माण कला का निदर्शन षष्ठ अङ्क में है। उन्होंने शकुन्तला का चित्र स्वयं बनाया था, जिसकी चित्रकारी पर विदूषक तथा सानुमती अप्सरा दोनों मुग्ध हैं—

अहो, एषा राजर्षेर्निपुणता। जाने सख्यग्रतो मे वर्तते।

राजा दुष्यन्त अपने मुँह अपनी तारीफ नहीं करते। जब वे दुर्जयदानवों को पराजित कर तथा इन्द्र से सत्कृत हो लौटते समय मातलि मार्ग में उनकी तारीफ करता है तब वे कहते हैं कि जो कुछ मैंने किया उसका श्रेय मुझको मत दीजिए, वह सब देवराज इन्द्र के प्रभाव का फल है।

दुष्यन्त लम्पट नायक नहीं हैं। यदि वे लम्पट होते तो पञ्चम अङ्क में आत्मसमर्पण करने के निमित्त स्वयं उपस्थित शकुन्तला को राजमहल में दाखिल कर लेते, किन्तु उनकी मनोवृत्ति यह है कि परस्त्री को ध्यान से देखना उचित नहीं है—'अनिर्वर्णनीयं परकलत्रम्।' 'अनार्यः परदारव्यवहारः।' इस अवसर पर उनकी दृढता उनके नैतिक चरित्र को बहुत ऊँचा उठा देती है।

जब गौतमी राजा को याद दिलाने के लिए शकुन्तला का अवगुण्ठन हटाती है तब उसका सौन्दर्य देखकर राजा चकित हो जाता है। तो भी अधर्म के भय से वह उसे स्वीकार करने के लिए उद्यत नहीं होता।

इनकी दृष्टि बड़ी सूक्ष्म है जब ये शिकार खेलते हुए कुलपति कण्व के तपोवन के पास पहुंचते हैं तो झट समझ जाते हैं कि यह तपोवन का भूभाग है। भय से भगाते हुए मृग-का वर्णन, तथा तपोवन के आभोग का वर्णन आदि इनकी सूक्ष्म दृष्टि के परिचायक हैं।

इस प्रकार दुष्यन्त प्रजा संरक्षण में सदा सन्नद्ध रहने वाला अपने समय का एक अप्रतिम धनुर्धर, धार्मिक, तेजस्वी एवं महाप्रतापी राजा हैं—

का कथा बाणसन्धाने ज्याशब्देनैव दूरतः।
हुङ्कारेणेव धनुषः स हि विघ्नानपोहति ॥ ३।१

वस्तुतः कविताकामिनी के विलास कविवर कालिदास ने अपने इस धीरोदात्त नायक राजा दुष्यन्त को बहुत सोच विचार कर प्रस्तुत किया है, इनको सफल शासक के सभी गुणों से अलङ्कृत किया है। ये कर्तव्यनिष्ठ, प्रजावत्सल, निर्लोभी, निर्भय, सहृदय, पराक्रमी, विनीत एवं आत्मप्रशंसा से रहित परमोत्साही व्यक्ति के रूप में अङ्कित किये गये हैं। इनकी जितनी महिमा गाई जाय थोड़ी है।

शकुन्तला

निसर्गसुन्दरी शकुन्तला अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक की मुग्धा नायिका है और कुलपति कण्व की पालिता पुत्री है। इसकी माता मेनका अप्सरा है तथा पिता राजर्षि विश्वा-मित्र हैं इसका प्रसंग इस प्रकार है। एक बार विश्वामित्र मुनि तप में रम रहे थे। उनके उग्रतप से इन्द्र घबड़ा उठे। उन्होंने उनकी तपस्या को भंग करने के लिए देवसुन्दरी

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मेनका अप्सरा को भेजा। एक तो मेनका का त्रिलोकविलक्षण सौन्दर्य पर्याप्त था ही, दूसरी ओर बसन्त का आविर्भाव और मादक बन गया। मेनका के अनुपम हाव-भाव, नृत्य-गीत, चाल ढाल आदि से सम्बलित बसन्त के झोंके से विश्वामित्र जी अपने को बचा न सके। उसे देखते ही वे मुग्ध हो गये उनका मन विचलित हो उठा, तप की गाढ़ी कमाई धूल में मिल गई। परिणामतः मेनका के मिलन से शकुन्तला का जन्म हुआ। मेनका उसे वही छोड़ कर स्वर्ग चली गई और विश्वामित्र आँख मूँद कर पुनः तपस्या में लीन हो गये किन्तु दयालु शकुन्त (पक्षियों) ने उस नवजात शिशु का पालन-पोषण करना प्रारम्भ किया। मालिनी नदी में स्नान करने के लिए जाते हुए महर्षि कण्व की उस पर दृष्टि पड़ी। उसे वे आश्रम में लाये और लालन पालन करने लगे। इस प्रकार शकुन्तला विश्वामित्र-मेनका की कन्या तथा महर्षि कण्व की पोष्य पुत्री है।

शकुन्तला कुलपति कण्व के पावन आश्रम में पलती और बढ़ती है। आश्रम का वातावरण शान्त है अवस्था के साथ-साथ शकुन्तला का शारीरिक सौन्दर्य भी निखर जाता है। वह शैशव, एवं किशोरावस्था को पार कर प्रौढ़ा हो गयी है उसका अनुपम सौन्दर्य बनावटी नहीं स्वाभाविक है। एक दिन हस्तिनापुर का चक्रवर्ती राजा दुष्यन्त शिकार खेलते-खेलते कण्व के तपोवन में जा पहुँचते हैं जहाँ वह अनुपम सुन्दरी एवं सुकुमारी शकुन्तला को देखकर मुग्ध हो जाते हैं समान रूप और अवस्था वाली दो सखियों के साथ छोटे बड़े से वृक्षों को सींचते हुए देखकर राजा अपने मन में सोचते हैं—आश्रम के कार्यों में इसे लगाना ऋषि की विवेकहीनता है।

इदं किलाव्याजमनोहरं वपुः तपःक्षमं साधयितुं य इच्छति।
ध्रुवं स नीलोत्पलपत्रधारया समीलतां छेत्तुमृषिर्व्यवस्यति ॥ १।१६

वस्तुतः शकुन्तला का शरीर सुकुमारलता की भाँति कोमल है, उसका अधर किसलय के समान लाल है, उसकी बाहें लता शाखा के तुल्य मृदु हैं और उसके शरीर पर लुभावना यौवन प्रस्फुटित हो गया है, जिसका संकेत हँसाती हुई प्रियम्वदा उस समय करती है—जब शकुन्तला अनसूया से कहती है कि सखि ! प्रियम्वदा के द्वारा कसकर बाँधी हुई मेरी चोली को जरा ढोली कर दो। तब प्रियम्वदा उपालम्भपूर्वक कहती है—

इसके लिए तुम अपने स्तनों को विशाल बना देने वाली युवावस्था को उलाहना दो मुझे क्यों दोषी बना रही हो—अत्र पयोधरविस्तारयितृ आत्मनो यौवनमुपालभस्व, मां किमुपालभसे ? इससे प्रतीत होता है कि उसके अवयव व्यक्त हो गये हैं। संभवतः वह श्याम वर्ण की है। तृतीय अङ्क में राजा कहता है—हे सुन्दरी ! तुम्हारे श्याम वर्ण के सुन्दर हाथ में सौन्दर्य पाने के लिए चन्द्रमा मृणाल रूप से विद्यमान प्रतीत होता है—अयं स ते श्यामलतामनोहरम् । वह स्त्री रूप से विधाता की विलक्षण सृष्टि है—स्त्रीरत्न-सृष्टिरपरा प्रतिभाति सा मे । उसका रूप न सूँघा गया प्रसून है, नखक्षतविहीन कोमल किसलय है, न विंधा हुआ रत्न है, अनास्वादित अभिनव मधु है और अखण्डित पुण्यों का फल है। इसीसे दुष्यन्त जैसा चक्रवर्ती राजा कण्वाश्रम की ललामभूता शकुन्तला का दर्शन नेत्र का फल मानता है, उसे ही भूमण्डल की दर्शनीय वस्तु समझता है और विदूषक से स्पष्ट कहता है—माधव्य ! अनवाप्तचक्षः फलोऽसि, येन त्वया दर्शनीयं न दृष्टम् । शकुन्तला का पालन-पोषण तपस्वियों के बीच में हुआ है। अतः उसका जीवन तापसकन्या जैसा हो गया है। वह वल्कल पहनती है और शृङ्गार चेष्टाओं से अनभिज्ञ है।

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द्वितीय अङ्क में दुष्यन्त शकुन्तला के रूप सौन्दर्य पर रीझकर विदूषक से कहता है कि ब्रह्मा ने सर्वप्रथम इसकी मूर्त्ति का चित्त में रूपायित किया होगा, बिना मन के सक्रिय सहयोग से इस प्रकार का अद्वितीय स्त्रीरत्न उत्पन्न ही नहीं हो सकता है—

चित्ते निवेश्य परिकल्पितसत्त्वयोगात् रूपोच्चयेन विधिना मनसा कृता नु। स्त्रीरत्नसृष्टिरपरा प्रतिभाति सा मे धातुर्विभुत्वमनुचिन्त्य वपुश्च तस्याः॥ २।६

प्रथम अंक में शकुन्तला की रूपलक्ष्मी से चमत्कृत होकर दुष्यन्त कहता है कि मानवी स्त्रियों में भला ऐसा रूप कहाँ से उत्पन्न हो सकता है। चञ्चल चमक वाली बिजली पृथ्वीतल से थोड़े ही निकल सकती है ?

मानुषीषु कथं वा स्यादस्य रूपस्य संभवः। न प्रभा तरलं ज्योतिरुदेति वसुधातलात्॥ १।२५

तपोवन में रहते-रहते शकुन्तला का प्रकृति से घनिष्ठतम सम्बन्ध हो गया है। वह आश्रम के वृक्ष, लता, एवं पशु-पक्षियों को भी अपने सगे सम्बन्धी समझती है और स्पष्ट कहती है—न केवलं तातनियोग एव, अस्ति मे एतेषु सोदरस्नेहः। उसके हृदय में तपोवन के जड़-चेतन सभी पदार्थों के लिए सहानुभूति है। वह पहले आश्रम के पौधों को जल से सींच लेती है तब स्वयं जल पीती है। यद्यपि उसे मण्डन अतिप्रिय है तथापि वह वृक्षों को कष्ट होने के भय से उनके पल्लव-पुष्प आदि नहीं तोड़ती—

पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्मास्वपीतेषु या। नादत्ते प्रियमण्डनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम्॥ ४।८

यदि चरते समय आश्रम के मृगों के मुख कुश से कट जाते थे तो उन्हें इंगुदी का तेल लगाकर उनके घावों को अच्छा करती थीं। चतुर्थ अङ्क में आश्रम से विदा होने के समय वह सखियों के समान आश्रमस्थ लता, वृक्ष और मृगों से भी मिलती है। प्रकृति प्रेम की उपासिका शकुन्तला की विदाई के अवसर पर वृक्ष एवं वनदेवताओं ने विविध प्रकार के वस्त्र और आभूषण दिये थे, वृक्षों ने पक्षियों के द्वारा स्वागत गान किये और लताओं ने अपने पुष्पों को बिखेरते हुए अभिनन्दन किया। अनन्तर शकुन्तला के जाते समय सारा तपोवन स्तब्ध-सा हो गया।

शकुन्तला में शालीनता कूट-कूट कर भरी है। वह सुशील तथा लज्जाशील नायिका है। प्रथम अङ्क में राजा दुष्यन्त को देखकर उसके मन में काम-विकार उत्पन्न होता है, परन्तु वह अपनी कामवेदना किसी से नहीं कहती, अपनी सखियों से भी छिपाती है उसके कामजनित हाव-भाव बड़े ही मर्यादित ढङ्ग से होते हैं। जब उसकी कामपीडा अति उग्र हो गई, तब सखियाँ व्यग्र हुईं। उन्होंने बार-बार उस वेदना का कारण जानकर प्रतिकार करने का आग्रह किया। तब कहीं शकुन्तला ने अपनी जबान खोली—सखि ! यतः प्रभृति तपोवनरक्षिता स राजर्षिः मम दर्शनपथमागतः। तपोवन के रक्षक वे राजर्षि जब से मेरी दृष्टि के विषय बने—बस इतना कहकर लज्जा के मारे चुप हो जाती है। प्रथम अंक में जब राजा उसके रूप की सराहना करते हैं तब वह लज्जा से शिर झुका लेती है। आगे जब प्रियम्वदा उसके विवाह की चर्चा चलाती है तब वह वहाँ से हट जाना चाहती है।

5 ५ शा० भू०

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तृतीय अङ्क में मालिनी नदी के पास एकान्त स्थान लता मण्डप में जब राजा उसका अंचल पकड़ना चाहता है तब वह कहती है—पौरव ! चंचलता न कीजिए, अपने विनय की रक्षा कीजिए। कामपीडित होने पर भी मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ। पौरव ! रक्ष, रक्ष विनयम्। कामपीडिताऽपि न खल्वात्मनः प्रभवामि।

राजा दुष्यन्त के साथ शकुन्तला का गान्धर्व विवाह हो जाने के अनन्तर वह गर्भवती हो जाती है। राजा हस्तिनापुर जा चुके हैं, कुलपति कण्व सोमतीर्थ से वापस आ गये हैं, उनसे कैसे कहा जाय यह शकुन्तला के सामने एक समस्या उपस्थित थी, किन्तु अग्निशाला में आकाशवाणी ने इस समस्या का समाधान शकुन्तला के सामने प्रस्तुत कर दिया।

शकुन्तला का हृदय मनुष्यों से ही नहीं आश्रमस्थ लता, पादप और पशुपक्षियों से भी प्रेमसूत्र में निबद्ध है। वह सचमुच प्रकृति कन्या तथा निःसर्ग सुन्दरी है। ऐसी द्रवणशील हृदयवाली नारी, कठिनाई से मिलती है। वन की लताओं, वृक्षों, कुसुमों, पशुओं और पक्षियों सभी से उसकी आत्मीयता है। वह उनकी भाषा समझती है और वे भी उसकी भाषा समझते हैं। वह उनकी परिचर्या करती है और वे उसकी मंगल कमना करते हैं। उसकी विदाई के अवसर पर हरिणों ने मुख में चलती हुई कुशा के कौर उगल दिये। मोरों ने नाचना बन्द कर दिया। लताओं ने अपने पीले पत्तों के रूप में आँसू गिराना आरम्भ कर दिया। शकुन्तला सबसे मिलती है और सबसे विदा लेती है। अपनी बहन वनज्योत्स्ना की भुजाओं से लिपटती है, पुत्र के समान पालित मृग को जो मार्ग रोककर खड़ा हो जाता है समझा बुझाकर लौटाती है गर्भ मन्थरा मृगवधू के लिए पिताजी से यह निवेदन करती है जब इसे बच्चा हो जाय तब यह प्रिय सन्देश मेरे पास भेजवा दीजियेगा।

शकुन्तला पतिव्रता पत्नी है अपने पति को अत्यन्त प्रेम करती है। गान्धर्व विधि से विवाह हो जाने पर राजा दुष्यन्त के प्रति उसका प्रेम और बढ़ जाता है। राजा के हस्तिनापुर चले जाने पर उसका मन उन्हीं में निरन्तर लगा रहता है। उनकी तन्मयता में वह अपनी सुधबुध खो बैठती है। सुलभकोप महर्षि दुर्वासा के आने और भिक्षा न पाकर क्रोध से शाप देकर चले जाने का उसको कुछ भी पता नहीं है। वत्सल पिता महर्षि कण्व के आदेश से हस्तिनापुर जाते समय उसके मन में एक प्रकार का उत्साह दिखाई पड़ता है। वहाँ जब राजा शापवस न पहचानने के कारण उसका परित्याग कर देते हैं तब कुछ क्षणों के लिए क्रुद्ध हो जाती है, किन्तु उसका क्रोध अधिक काल तक नहीं रहता। वह दुष्यन्त को दोष न देकर अपने भाग्य को ही कोसती है—नूनं मे सुचरितप्रतिबन्धकं पुराकृतं तेषु दिवसेषु परिणाममुखमासीत्। महर्षि कश्यप के आश्रम में वह विरहिणी के वेश में रहती है। पतिदेव को हृदय में रखकर अपने चरित्र की रक्षा करते हुए वह समय बिताती है—

वसने परिधूसरे वसाना नियमक्षाममुखी धृतैकवेणिः।
अतिनिष्करुणस्य शुद्धशीला मम दीर्घं विरहव्रतं बिभर्ति ॥ ७।२१

इस नाटक के सप्तम अङ्क का उत्तरार्ध शकुन्तला के सुचरित से भरा हुआ है। उसकी तपस्या का ही परिणाम है कि उसका पति उससे मिलता है, पैरों पड़ता है, क्षमा माँगता है और अनुपम सुख भोग के निमित्त पुत्र सहित उसे सादर अपनी राजधानी हस्तिनापुर में ले आता है।

शकुन्तला का स्वभाव बड़ा ही सरल है। जब उसकी सखियाँ उसका मजाक उड़ाती हैं

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तब वह केवल इतना ही कह कर चुप हो जाती है कि यह तुम्हारे मन बात है—एष ते आत्मनश्चित्तगतो मनोरथः। उसकी सखियाँ उसे आज्ञा देती हैं, वह अपने को कुलपति की कन्या होने का घमण्ड नहीं करती। जब राजा दुष्यन्त महर्षि कण्व के आश्रम में प्रवेश करते हैं तब प्रियम्वदा कहती है—सखि शकुन्तले ! जाओ, कुटिया से फलयुक्त अर्ध्यपात्र लाओ, और यह घड़े का जल पैर धोने के लिए काम में आयेगा—हला, शकुन्तले ! गच्छो-टज फलमिश्रमर्घ्यभाजनमुपहर, इदमपि पादोदकं भविष्यति। चतुर्थ अंक में विदाई के समय उसकी सखियाँ उससे कहती हैं यदि राजा तुम्हें न पहचाने तो उसको अंगूठी दिखा देना।—सखि ! यदि नाम स राजर्षिः प्रत्यभिज्ञानमन्थरो भवेत्तदा अस्येदमात्मनो नामधेयाङ्कितमङ्गुलीयकं दर्शयिष्यसि। यह सुनकर शकुन्तला का हृदय काँप उठता है। उस समय सखियाँ कहती है—सखि ! मा बिभेहि स्नेहः पापम-शङ्कते। सखियों का इतना कहना ही उसकी घबराहट से दूर करने के लिए पर्याप्त है। उसने उस पर पुनः कोई प्रश्न नहीं किया। शकुन्तला काव्यकला में भी निपुण है। प्रणय पत्रिका में लिखने के निमित्त वह स्वयं पद्य बनाती है।

शकुन्तला के मन में पूजनीय गुरुजनों के प्रति अत्यन्त श्रद्धा है। वह जानती है कि स्वतन्त्रता पूर्वक कोई काम करने पर गुरुजनों का अनादर होता है। तृतीय अंक में लता-मण्डप के अन्दर जब राजा उससे कहता है कि बताओ, इस समय तुम्हारी क्या सेवा करूँ—नलिनीदल से पंखा करूँ या पैर दबाऊँ ? इस पर शकुन्तला कहती है—मै आप जैसे माननीय पुरुष के निकट अपने को अपराधिनी नहीं बनाऊँगी—न माननीयेषु जनेषु आत्मानमपराध्यिष्यामि। अपने धर्मपिता महर्षि कण्व के प्रतिविशेष आदर एवं प्रेम करती है। चतुर्थ अङ्क में तपोवन से हस्तिनापुर को प्रस्थान करते समय वह कण्व के चरणों पर गिर पड़ती है। उसे उन्हें छोड़कर आगे जाते नहीं बनता पर—जाओ, तुम्हारा मार्ग मङ्गलमय हो—यह कह कर कण्व जी उसे भेजते हैं। जब शार्ङ्गरव आदि उसे दुष्यन्त के दरबार में छोड़कर जाने लगते हैं तब वह भी उनके पीछे-पीछे जाने लग जाती है, पर शार्ङ्गरव घूमकर डांटते हुए उसे कहता है कि अयि दोपकारिणि ! यह क्या तू स्वतन्त्रता का अवलम्बन करना चाहती है—आ पुरोभागे ! किमिदं स्वातन्त्र्यमवलम्बसे। इसपर वह डर के मारे कापने लगती है, आगे नहीं बढ़ती। सप्तम अङ्क में दुष्यन्त से पुनः मिलने पर वह उनके साथ महर्षि कश्यप और अदिति के सामने जाने में लजाती है। जब दुष्यन्त कहते हैं कि प्रिये ! बच्चे को संभालो तुम्हें आगेकर मैं देवपिता का दर्शन करना चाहता हूँ, तब शकुन्तला कहती है। आर्यपुत्र के साथ गुरुजन के समीप जाने में मुझे शरम मालूम पड़ती है—लज्जे खलु आर्यपुत्रेण सार्द्धं गुरुजनसमीपं गन्तुम्।

कालिदास ने उपेक्षिता कलंकिता शकुन्तला को कण्व के आश्रम में न भेजकर गहरी काव्यात्मक सहृदयता का परिचय दिया है। वह अब पहले जैसी नहीं थी विश्व के साथ उसका सम्बन्ध बदल गया था। इस प्रकार शकुन्तला का चरित्र न केवल संस्कृत जगत् में ही आदर्श माना जाता है अपितु विश्वसाहित्य में आदर्श के रूप में देखा जाता है जिसकी भूरि-भूरि प्रशंसा पाश्चात्य विद्वानों ने भी मुक्तकण्ठ से की है। मधुरभाषिणी, कोकिलकण्ठी शकुन्तला ने यदि अभिनव यौवन की उमंग में राजा दुष्यन्त के साथ गान्धर्वविधि से विवाह न किया होता तो कोई भी विचारवान व्यक्ति उनके चारित्रिक दुर्बलता पर अंगुली नहीं उठा सकता था। धन्य है वह दुर्जय मदनलीला, जो देव-

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दानव, ऋषि-महर्षि, ज्ञानवान् मानव और पशु-पक्षी कीट पतङ्ग आदि को भी व्यग्र बना देती है।

कण्व ऋषि

महर्षि कण्व आश्रम के कुलपति हैं। कुलपति उसे कहते हैं जो प्रतिदिन दश हजार विद्यार्थियों को अपने आश्रम में रखकर पढ़ाता है और उनके भरण पोषण एवं रहने का प्रबन्ध करता है।

मुनीनां दशसाहस्रं योऽन्नदानादिपोषणात् ।
अध्यापयति विप्रर्षिरसौ कुलपतिः स्मृतः ॥

उनका दूसरा नाम काश्यप भी है। क्योंकि वे महर्षि मरीचिनन्दन कश्यप के पुत्र हैं। वे नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं। उनका पुनीत आश्रम मालिनी नदी के तट पर तथा यज्ञशाला से अलंकृत है। वे श्रौतविधि से प्रतिदिन अग्निहोत्र करने वाले ब्रह्मर्षि हैं उन्हें शकुन्तला को राजा दुष्यन्त द्वारा गान्धर्व विवाह के बाद गर्भवती होने का समाचार सर्वप्रथम अग्निशाला में आकाशवाणी बतलाती है वे अपने अनुपम तपोबल से त्रिकाल का रहस्य हस्तामलकवत् जान लेते हैं। वे स्नान, सन्ध्या कर्मानुष्ठान में निरत धार्मिक भावना से ओतप्रोत उदार हृदय वाले एवं तेजस्वी ब्राह्मण हैं उनके तपोबल का प्रभाव चतुर्थ अङ्क में शकुन्तला के विदाई के समय देखते बनता है, जिससे प्रभावित होकर वृक्ष एवं वन देवताओं ने विविध प्रकार के दिव्य वस्त्र आभूषण आदि प्रस्तुत किये हैं।

शकुन्तला महर्षि कण्व की पोष्यपुत्री है। वे जननी-जनक विहीन शकुन्तला का अपनी औरस पुत्री के समान लालन-पालन करते हैं। शकुन्तला के प्रतिकूल दैव को शान्त करने के निमित्त वे सोमतीर्थ की यात्रा करते हैं। वे शकुन्तला की शालीनता से अत्यन्त सन्तुष्ट हैं। अपनी अनुपस्थिति में वे अतिथिसत्कार का भार व्यवहारकुशल शकुन्तला को सौंपते हैं। शकुन्तला के पतिगृहगमन के समय उनकी सारी ममता उमड़ पड़ती है। सगे पिता के समान शोक उन्हें व्याकुल कर देता है आंखों में आंसू आ जाते हैं उनका गला रुँधने लगता है, दृष्टि जड़ हो जाती है, हृदय धबड़ाने लगता है, तपस्वी होने पर भी वे अपने दुःख के वेग को रोक नहीं पाते। वे अपने मन में विचार करते हैं जब मेरे सदृश अरण्य-वासी मनुष्य की कन्या के प्रेम से ऐसी दशा हो जाती है तो सांसारिक जनों की क्या दशा होती होगी। ‘वत्से ! मामेव जड़ीकरोषि।’ ‘अपयास्यति मे शोकः कथं नु वत्से।’ ‘वत्से ! किमेवं कातरासि।’ ‘वत्से ! एहि परिष्वजस्व मां सखीजनं च।’ ‘वत्से ! त्वमिदानीमनुशासनीयासि।’ ‘वत्से ! अलं रुदितेन’ ‘स्थिरा भव वत्से !’ ‘नेदं विस्मरिष्यामि।’ ‘अनसूये ! प्रियंवदे ! गता वां सहचरी।’ इत्यादि महर्षि कण्व की उक्तियाँ वात्सल्य से भरी हुई हैं। वस्तुतः शकुन्तला के प्रति उनका वात्सल्य निःस्वार्थ, आदर्श तथा अनुकरणीय तथा स्पृहणीय है।

कण्व का तपोबल अपार है जिससे प्रभावित होकर राजा दुष्यन्त तृतीय अङ्क में कहते हैं—‘जाने तपसो वीर्यम्।’ महर्षि कण्व की उपस्थिति में राक्षस उनके तपोवन के पास नहीं पहुँच पाते, उनकी अनुपस्थिति में ही वे उपद्रव मचाते रहते हैं। तपोबल के प्रभाव से उन्हें त्रिकाल की बातें ज्ञात हो जाती हैं। सप्तम अंक में जब दुष्यन्त से शकुन्तला के मिलन का समाचार शिष्य द्वारा सुना देने के लिए अदिति महर्षि कश्यप से कहती हैं तब वे

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कहते हैं कि तपस्या के प्रभाव से कण्व को शकुन्तला के दुष्यन्त से पुनर्मिलन का वृत्तान्त अवगत हो गया है—तपः प्रभावात् प्रत्यक्षं सर्वमेव तत्र भवतः कण्वस्य।

चतुर्थ अङ्क में महर्षि कण्व के तपोबल का प्रभाव अद्भुत एवं आश्चर्यजनक प्रतीत होता है। शकुन्तला की विदाई के समय वृक्षों ने माङ्गलिक वस्त्र एवं चरण-रञ्जन के लिए महावर दिये। वनदेवियों ने आभूषण दिये तथा प्यारी सखियों ने उसे पहनाकर चित्र के समान शकुन्तला को अलङ्कृत किया।

मुनित्रय

शाकुन्तल में तीन ऋषि अङ्कित हैं और तीनों का स्वभाव भिन्न-भिन्न है। एक तो महर्षि दुर्वासा हैं जिनको थोड़े में ही क्रोध आ जाता है और दारुण शाप दे बैठते हैं। इन्हीं के शाप के परिणाम-स्वरूप शकुन्तला को कुछ दिनों तक दुःख भोगना पड़ा था। दूसरे महर्षि हैं कुलपति कण्व। ये दुर्वासा की तरह ही तपोनिष्ठ, महाप्रभावशाली और अन्तर्यामी हैं किन्तु कण्व और दुर्वासा में अत्यन्तवैषम्य है। दुर्वासा जी अत्यन्त क्रोधी हैं तो कुलपति कण्व अतिशान्त। वे निष्ठुर हैं तो ये कोमलहृदय और अत्यन्त दयालु। उन्हें शकुन्तला अकस्मात् वन में माता-पिता से परित्यक्त मिली तो उन्होंने दया से अपनी पुत्री के समान पालन-पोषण किया, विविध प्रकार से शिक्षित किया उसके प्रतिकूलदैव को शान्त करने के लिए सोमतीर्थ की यात्रा की। शकुन्तला मानो कुलपति का प्राण है—सा कुलपतेरुच्छ्वसितमिव। उनकी अनुपस्थिति में उसने राजा दुष्यन्त के साथ अपना गान्धर्व-विवाह कर लिया। इससे वे नाराज नहीं हुए, प्रत्युत उन्होंने उसका समर्थन करके उसको तत्काल पतिगृह भेज दिया। और उन्होंने अपना आशय इस प्रकार व्यक्त किया—दृष्ट्या धूमाकुलितदृष्टेरपि यजमानस्य पावके एवाहुतिः पतिता। तीसरे ऋषि हैं—मरीचिनन्दन कश्यप। उनके आश्रम में सब स्वर्गीय सुखसाधन हैं परन्तु उसमें आसक्त न होकर वे तपस्या करते रहते हैं। वे इन्द्र आदि देवताओं के पिता हैं, भगवान् विष्णु वामनावतार में उनके पुत्र हुए थे। वे आप्तकाम हैं, फिर भी लोककल्याण के निमित्त तपश्चर्या में लग्न रहते हैं। इनके पुनीत आश्रम में दुष्यन्त द्वारा परित्यक्ता शकुन्तला को आश्रय मिला। इनके पातिव्रतधर्म के उपदेश से उसे मानसिक शान्ति मिली। जब उसे पुत्र पैदा हुआ तब उन्होंने उस बालक के जातकमीदि संस्कार किये। इन्हीं के आश्रम पर पुत्र सहित शकुन्तला पुनः पति से मिलकर सुखी हुई। ऐसे ज्ञाननिष्ठ, लोकहितैषी एवं सर्वसम्मान्य महात्मा के आशीर्वाद के द्वारा इस नाटक की समाप्ति करने में कवि ने अत्यन्त औचित्य प्रदर्शित किया है।

तपस्वी होते हुए भी महर्षि कण्व बड़े व्यावहारिक हैं। उनका हृदय सहानुभूतिपूर्ण है। जब उन्हें आकाशवाणी द्वारा राजा दुष्यन्त के साथ शकुन्तला के सम्बन्ध का पता चलता है तब वे धर्मतः विचार कर अपनी अनुमति दे देते हैं। उनके मत में क्षत्रियों के लिए गान्धर्व-विवाह उत्तम प्रकार का विवाह है। वे शकुन्तला को विदा करते समय राजा दुष्यन्त को जो सन्देश भेजते हैं, वे सरल, स्वाभाविक सारगर्भित एवं ध्यान देने योग्य हैं। वे अपनी कन्या शकुन्तला के लिए राजा की अन्य पत्नियों के समान पद चाहते हैं, उनके अनुसार अन्य सब पदार्थ तो भाग्य के आधीन होते हैं। शकुन्तला के लिए दिया गया उपदेश तो स्वर्णाक्षरों में अङ्कित करने लायक है। उसका मूल्य निर्धन महिला से लेकर महारानी तक के लिए समान है। उस आदर्श उपदेश में भारतीयता भावना कूट-कूट कर भरी हुई है। वे

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बिलखती हुई शकुन्तला को गृहिणी के कर्त्तव्य का उपदेश देते हैं कि श्वसुरगृह में जो लोग बड़े हों उनकी यथाविधि सेवा करना, सौतों के साथ सहेलियों जैसा व्यवहार करना, कभी किसी कारणवश पति अपमान करे तो उससे झगड़ना मत, सेवकों के साथ उदारता का व्यवहार करना, और सम्पत्ति के समय भोगों में आसक्त होकर अहंकार नहीं करना, इस प्रकार का व्यवहार करने वाली कुल-वधुएँ अनायास ही गृहिणीपद प्राप्त कर लेती हैं तथा प्रतिकूल चलने वाली स्त्रियाँ कुल के दुःख का कारण बनती हैं। शकुन्तला अपने साथ सखियों से चलने का आग्रह करती है पर महर्षि कण्व अनसूया और प्रियंवदा को शकुन्तला के साथ नहीं भेजते, क्योंकि उनका भी विवाह करना है। वे युवती कुमारी कन्याओं को विवाहिता कन्या के साथ उसके ससुराल भेजना उचित नहीं समझते, क्योंकि यह भारतीय परम्परा एवं मर्यादा के प्रतिकूल अव्यावहारिक कार्य है—वत्से ! इमे अपि प्रदेये, न युक्तमनयोस्तत्र गन्तुम्, त्वया सह गौतमी यास्यति। यह कह कर बड़ी बुद्धिमानी से शकुन्तला के आग्रह को टाल देते हैं।

वे कन्या को धरोहर समझते हैं। और उसके भार का सँभालना वे बड़ी सतर्कता तथा योग्यता का काम मानते हैं। कण्व जी शकुन्तला को अपने पति के घर भेजकर अपनी अन्तरात्मा में विशदता का अनुभव करते हैं।

अर्थो हि कन्या परकीय एव तामद्य सम्प्रेष्य परिग्रहीतुः।
जातो ममायं विशदः प्रकामं प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा ॥ ४।२२

पति के घर जाने को उद्यत शकुन्तला जब महर्षि कण्व के गले में लिपट कर कहती है कि पिता जी ! आपकी गोद से बिछुड़ी हुई मैं मलय पर्वत से उखाड़ी गई चन्दनलता की भाँति दूसरे देश में कैसे जीवन को धारण कर सकूँगी ? तब कण्व जी बड़े मनोवैज्ञानिक ढंग से उसकी व्यग्रता को दूर करते हुए समझाते हैं बेटा ! तुम अतिकुलीन पति के प्रशंसनीय गृहिणी पद पर स्थित होकर उसके ऐश्वर्य कार्यों में हमेशा व्यस्त रहोगी और शीघ्र ही जिस प्रकार पूर्व दिशा पावन सूर्य को जन्म देती है उसी प्रकार पवित्र चक्रवर्ती पुत्र को पैदा कर मेरे विरहजन्य शोक को भूल जाओगी। अतः घबड़ाओ मत, स्वस्थ चित्त से पति के घर जाओ। कण्व जी के मतानुसार दुःख का सबसे उत्तम औषध समय-यापन है। कुछ समय बीतने पर दुःख अपने आप कम हो जाता है।

परिवार के किसी व्यक्ति के परदेश चले जाने पर घर के लोगों को अपना घर सूना लगने लगता है। इसका कारण प्रेम होता है। कुछ दिनों के बाद विरह भूल जाता है और मन धीरे-धीरे स्वस्थ हो जाता है। इस रहस्य से कण्व खूब परिचित हैं। शकुन्तला के चले जाने से बाद प्रियम्वदा और अनसूया महर्षि कण्व से कहती हैं—तात ! हमलोग शकुन्तला से शून्य इस तपोवन में कैसे प्रवेश करें—तात ! शकुन्तला विरहितं शून्यमिव तपोवनं कथं प्रविशावः। इस पर महर्षि कण्व कहते हैं—प्रेम के कारण ऐसा अनुभव हो रहा है, चलो कुछ दिनों के बाद सब ठीक हो जायेगा। इस प्रकार महर्षि कण्व का विशुद्ध जीवन गंगा के प्रवाह के समान परम पवित्र है, हिमालय की भांति उज्ज्वल है, समुद्र के समान गम्भीर तथा त्रिवेणी की तरह तरल है। इसकी जितनी भी प्रशंसा की जाय थोड़ी ही है।

कण्व की शिक्षा में भारतीय धर्म की मर्यादा बोल उठी है। कवि की वर्णाश्रम धर्म के प्रति आस्था तथा कौटुम्बिक कर्त्तव्यों के प्रति जागरूकता का सुन्दर प्रतिपादन इस प्रसंग में