भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

सर्ग ४ ] युद्धकाण्ड २४९


आरुह्य मारुतिं रामो लक्ष्मणोऽप्यङ्गदं तथा।
दिदृक्षू राघवो लङ्कामारुरोहाचलं महत् ॥ ९ ॥

दृष्ट्वा लङ्कां सुविस्तीर्णां नानाचित्रध्वजाकुलाम् ।
चित्रप्रासादसम्बाधां स्वर्णप्राकारतोरणाम् ॥ १० ॥

परिखाभिः शतघ्नीभिः सङ्क्रमैश्च विराजिताम् ।
प्रासादोपरि विस्तीर्णप्रदेशे दशकन्धरः ॥ ११ ॥

मन्त्रिभिः सहितो वीरैः किरीटदशकोज्ज्वलः।
नीलाद्रिशिखराकारः कालमेघसमप्रभः ॥ १२ ॥

रत्नदण्डैः सितच्छत्रैरनेकौः परिशोभितः ।
एतस्मिन्नन्तरे बद्धो मुक्तो रामेण वै शुकः ॥ १३ ॥

वानरैस्ताडितः सम्यक् दशाननमुपागतः ।
प्रहसन् रावणः प्राह पीडितः किं परैः शुक॥ १४ ॥

रावणस्य वचः श्रुत्वा शुको वचनमब्रवीत् ।
सागरस्योत्तरे तीरेऽब्रुवं ते वचनं यथा ॥

तत उत्प्लुत्य कपयो गृहीत्वा मां क्षणात्ततः ॥ १५ ॥

मुष्टिभिर्नखदन्तैश्च हन्तुं लोप्तुं प्रचक्रमुः ।
ततो मां राम रक्षेति क्रोशन्तं रघुपुङ्गवः ॥ १६ ॥

विसृज्यतामिति प्राह विसृष्टोऽहं कपीश्वरैः।
ततोऽहमागतो भीत्या दृष्ट्वा तद्वानरं बलम् ॥ १७ ॥

राक्षसानां बलौघस्य वानरेन्द्रबलस्य च ।
नैतयोर्विद्यते सन्धिर्देवदानवयोरिव ॥ १८ ॥

पुरप्राकारमायान्ति क्षिप्रमेकतरं कुरु ।
सीतां वाऽस्मै प्रयच्छाशु युद्धं वा दीयतां प्रभो ॥ १९ ॥

मामाह रामस्त्वं ब्रूहि रावणं मद्वचः शुक ।
यद्बलं च समाश्रित्य सीतां मे हृतवानसि ॥ २० ॥

तद्दर्शय यथाकामं ससैन्यः सहवान्धवः ।


फिर, श्रीरामकी लंका देखनेकी इच्छा होनेपर रामचन्द्रजी हनुमान्‌के और लक्ष्मणजी अङ्गदके ऊपर बैठकर उस महान् पर्वतपर चढ़ गये ॥ ९ ॥ उन्होंने देखा कि लङ्कापुरी अति विस्तीर्ण है। वह नाना प्रकारकी ध्वजाओं, विचित्र प्रासादों तथा सुवर्णनिर्मित परकोटों और तोरणोंसे सुसज्जित है ॥ १० ॥ वह (सब ओरसे) खाइयों, तोपों और संक्रमों (सुरंगों) से सुशोभित है। उसके एक राजभवनके ऊपर अति विस्तृत भागमें अपने वीर मन्त्रियोंके सहित रावण बैठा है। उसके शिरोंपर दश मुकुट सुशोभित हैं, वह नीलाचलके शिखरके समान आकारवाला एवं श्याम मेघकी-सी आभावाला है ॥ ११-१२ ॥ नाना प्रकारके रत्नदण्डयुक्त श्वेत छत्रोंसे उसकी अपूर्व शोभा हो रही है। इसी समय भगवान् रामद्वारा बाँधकर छोड़ा हुआ शुकनामक दैत्य वानरोंसे भली प्रकार मार खाकर रावणके पास पहुँचा। उसे देखकर रावणने हँसते हुए पूछा—"शुक ! क्या शत्रुओंने तुम्हें कुछ कष्ट पहुँचाया है ?" ॥ १३-१४ ॥

रावणके वचन सुनकर शुकने कहा—"समुद्रके उत्तरतटपर जाकर ज्यों ही मैं आपका सन्देश सुनाने लगा त्यों ही कुछ वानरोंने उछलकर मुझे तत्क्षण पकड़ लिया ॥ १५ ॥ और मुझे घूँसों, नखों एवं दाँतोंसे मारने तथा लुप्त करनेका आयोजन करने लगे। तब, 'हे राम ! मेरी रक्षा करो' इस प्रकार मुझे पुकारते सुन रघुश्रेष्ठ रामने कहा, "इसे छोड़दो।" इससे उन वानरोंने मुझे छोड़ दिया। तब मैं वानरोंकी सेना देखकर बड़ा डरता-डरता यहाँ आया हूँ ॥ १६-१७ ॥ मेरे विचारसे देव और दानवोंके समान राक्षसोंके दलबल और वानरोंकी सेनामें किसी प्रकार मेल नहीं हो सकता ॥ १८ ॥ हे प्रभो ! वे शीघ्र ही नगरके परकोटपर आनेवाले हैं, आप दोनोंमेंसे कोई एक काम कीजिये—या तो उन्हें सीता दे दीजिये और या उनके साथ युद्ध कीजिये ॥ १९ ॥ रामने मुझसे कहा है कि 'शुक ! रावणसे मेरी ओरसे कहना कि जिस शक्तिके भरोसे तुमने हमारी जानकीको हरा है उसे भली प्रकार अपनी सेना और बन्धु-बान्धवोंके सहित मुझे दिखलाना। तू कल ही प्रकार और

२५० अध्यात्मरामायण [ सर्ग ४ ]


श्वःकाले नगरीं लङ्कां सप्राकारां सतोरणाम् ॥२१॥
राक्षसं च बलं पश्य शरैर्विध्वंसितं मया ।
घोररोषमहं मोक्ष्ये बलं धारय रावण ॥२२॥
इत्युक्त्वोपररामाथ रामः कमलोचनः ।
एकस्थानगता यत्र चत्वारः पुरुषर्षभाः ॥२३॥
श्रीरामो लक्ष्मणश्चैव सुग्रीवश्च विभीषणः ।
एत एव समर्थास्ते लङ्कां नाशयितुं प्रभो ॥२४॥
उत्पाट्य भस्मीकरणे सर्वे तिष्ठन्तु वानराः ।
तस्य यादृग् बलं दृष्टं रूपं प्रहरणानि च ॥२५॥
वधिष्यति पुरं सर्वमेकास्तिष्ठन्तु ते त्रयः ।
पश्य वानरसेनां तामसङ्ख्यातां प्रपूरिताम् ॥२६॥
गर्जन्ति वानरास्तत्र पश्य पर्वतसन्निभाः ।
न शक्यास्ते गणयितुं प्राधान्येन ब्रवीमि ते॥२७॥
एष योऽभिमुखो लङ्कां नदंस्तिष्ठति वानरः ।
यूथपानां सहस्राणां शतेन परिवारितः ॥२८॥
सुग्रीवसेनाधिपतिर्नीलो नामाग्निनन्दनः ।
एष पर्वतशृङ्गाभः पद्मकिञ्जल्कसन्निभः ॥२९॥
स्फोटयत्यभिसंरब्धो लाङ्गूलं च पुनः पुनः ।
युवराजोऽङ्गदो नाम वालिपुत्रोऽतिवीर्यवान् ॥३०॥
येन दृष्टा जनकजा रामस्यातीववल्लभा ।
हनूमानेष विख्यातो हतो येन तवात्मजः ॥३१॥
श्वेतो रजतसङ्काशो महाबुद्धिपराक्रमः ।
तूर्णं सुग्रीवमागम्य पुनर्गच्छति वानरः ॥३२॥
यस्त्वेष सिंहसङ्काशः पश्यत्यतुलविक्रमः ।
रम्भो नाम महासत्त्वो लङ्कां नाशयितुं क्षमः ॥३३॥
एष पश्यति वै लङ्कां दिधक्षन्निव वानरः ।
शरभो नाम राजेन्द्र कोटियूथपनायकः ॥३४॥
पनसश्च महावीर्यो मैन्दश्च द्विविदस्तथा ।
नलश्च सेतुकर्ताऽसौ विश्वकर्मसुतो बली ॥३५॥


तोरणादिके सहित लंकापुरी और राक्षसोंकी सेनाको मेरे बाणोंसे विध्वस्त हुई देखेगा। रावण! उस समय मैं भयंकर क्रोध छोड़ूँगा, तू अपने वलको स्थिर रखना' ॥२०–२२॥ ऐसा कहकर कमलनयन भगवान् राम चुप हो गये।

'हे प्रभो! और सब वानर एक ओर रहें तो भी, एक साथ मिल जानेपर, लंकाको जड़से उखाड़कर उसे भस्म और नष्ट करनेमें तो राम, लक्ष्मण, सुग्रीव और विभीषण ये चार पुरुषश्रेष्ठ ही पर्याप्त हैं। और मैंने, जैसे उनके बल, रूप और अस्त्र-शस्त्रादि देखे हैं उससे तो यही मालूम होता है कि और तीनों अन्यत्र रहें, अकेले राम ही समस्त नगर-को नष्ट कर सकते हैं। अब, सब ओर फैली हुई वानरोंकी उस असंख्य सेनाको देखिये ॥२३–२६॥ देखिये, ये पर्वतसदृश वानर वीर कैसे गर्ज रहे हैं। इन्हें गिना नहीं जा सकता, इसलिये मैं आपको इनमेंसे प्रधान-प्रधान बतलाता हूँ ॥२७॥ यह वानर, जो लंकाकी ओर देखकर बारम्बार गर्ज रहा है और एक लाख यूथपतियोंसे घिरा हुआ है, वानरराज सुग्रीवका सेनापति अग्निनन्दन 'नील' है। जो कमल-केशरकी-सी आभावाला तथा पर्वत-शिखरके समान विशालकाय है एवं रोषपूर्वक बारम्बार अपनी पूँछ पटक रहा है वह अति वीर्यवान् वालिपुत्र युवराज 'अंगद' है ॥ २८–३० ॥ जिसने रामकी अत्यन्त प्रिया जनक-नन्दिनी सीताको देखा और आपके पुत्रका वध किया, यह वही विख्यात वीर 'हनुमान्' है ॥ ३१ ॥ जिसकी कान्ति चाँदी-के समान शुक्ल वर्ण है, जो बड़ी शीघ्रतासे सुग्रीवके पास आकर फिर लौट जाता है तथा जो महाबुद्धिमान् पुरुषार्थी और सिंहके समान अतुलित पराक्रमी वानर इधर देख रहा है वह 'रम्भ' है। लंकाको नष्ट करनेमें यह अकेला ही समर्थ है ॥ ३२–३३ ॥ हे राजेश्वर ! यह दूसरा वानर, जो लंकाकी ओर इस प्रकार देखता है मानो जला ही डालेगा, करोड़ यूथपतियोंका नायक 'शरभ' है ॥ ३४ ॥ इनके अतिरिक्त महापराक्रमी पनस, मैन्द, द्विविद और सेतु बाँधनेवाला विश्वकर्माका पुत्र महा-बली नल—ये सब भी प्रधान-प्रधान योद्धा हैं ॥३५॥

सर्ग ४ ] युद्धकाण्ड २५१


वानराणां वर्णने वा सङ्ख्याने वा क ईश्वरः ।
शूराः सर्वे महाकायाः सर्वे युद्धाभिकाङ्क्षिणः ॥३६॥

शक्ताः सर्वे चूर्णयितुं लङ्कां रक्षोगणैः सह ।
एतेषां बलसङ्ख्यानं प्रत्येकं वच्मि ते शृणु ॥३७॥

एषां कोटिसहस्राणि नव पञ्च च सप्त च ।
तथा शङ्खसहस्राणि तथार्बुदशतानि च ॥३८॥

सुग्रीवसचिवानां ते बलमेतत्प्रकीर्तितम् ।
अन्येषां तु बलं नाहं वक्तुं शक्तोऽस्मि रावण ॥३९॥

रामो न मानुषः साक्षादादिनारायणः परः ।
सीता साक्षाज्जगद्धेतुश्चिच्छक्तिर्जगदात्मिका ॥४०॥

ताभ्यामेव समुत्पन्नं जगत्स्थावरजङ्गमम् ।
तस्माद्रामश्च सीता च जगतस्तस्थुषश्च तौ ॥४१॥

पितरौ पृथिवीपाल तयोर्वैरी कथं भवेत् ।
अज्ञानता त्वयाऽऽनीता जगन्मातैव जानकी ॥४२॥

क्षणनाशिनि संसारे शरीरे क्षणभङ्गुंरे ।
पञ्चभूतात्मके राजंश्चतुर्विंशतितत्त्वके ॥४३॥

मलमांसास्थिदुर्गन्धभूयिष्ठेऽहङ्कृतालये ।
कैवास्था व्यतिरिक्तस्य काये तव जडात्मके ॥४४॥

यत्कृते ब्रह्महत्यादिपातकानि कृतानि ते ।
भोगभोक्ता तु यो देहः स देहोऽत्र पतिष्यति ॥४५॥

पुण्यपापे समायातो जीवेन सुखदुःखयोः ।
कारणे देहयोगादिनाऽऽत्मनः कुरुतोऽनिशम् ॥४६॥

यावद्देहोऽस्मि कर्तास्मीत्यात्माऽहङ्कुरुतेऽवशः ।
अध्यासात्तावदेव स्याज्जन्मनाशादिसम्भवः ॥४७॥


इन वानरोंका वर्णन करने और गिननेकी सामर्थ्य किसमें है। ये सभी बड़े शूरवीर, विशालकाय और युद्धके लिये उत्सुक हैं ॥३६॥ राक्षसोंके सहित लंकाको चूर्ण करनेमें ये सभी समर्थ हैं। अब मैं इनमेंसे प्रत्येककी सेनाकी संख्या बतलाता हूँ, सावधान होकर सुनिये ॥ ३७ ॥ इनमेंसे प्रत्येकके नीचे इक्कीस हजार करोड़, हजारों शंख और सैकड़ों अरब सेना है॥३८॥

"हे रावण ! यह तो मैंने सुग्रीवके मन्त्रियोंकी ही सेना बतायी है; उनके अतिरिक्त औरोंकी सेना गिनानेमें तो मैं सर्वथा असमर्थ हूँ ॥ ३९ ॥ राम भी कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं, वे साक्षात् आदिनारायण परमात्मा हैं; और सीताजी जगत्की कारणरूपा साक्षात् जगद्रूपिणी चित्-शक्ति हैं ॥ ४० ॥ इन दोनोंसे ही समस्त स्थावर-जंगम संसार उत्पन्न हुआ है, अतः राम और सीता स्थावर-जंगम जगत्के माता-पिता हैं। हे पृथिवीपते ! सोचो तो, उनका वैरी कोई कैसे हो सकता है ? आप जिस जानकीको अनजानमें ले आये हैं वह साक्षात् जगन्माता ही हैं ॥४१-४२॥ हे राजन् ! क्षण-क्षणमें नष्ट होनेवाले संसारमें चौबीस तत्त्वों*के समूहरूप इस क्षणभंगुर पाञ्चभौतिक शरीरमें जिसमें मल, मांस, अस्थि आदि दुर्गन्धयुक्त पदार्थोंकी ही अधिकता है और जो अहंकारका आश्रय-स्थान तथा जडरूप है आप क्या आस्था करते हैं ? आप तो इससे सर्वथा पृथक् हैं ॥ ४३-४४॥ हाय ! जिस शरीरके लिये आपने ब्रह्महत्यादि अनेकों पाप किये हैं, सम्पूर्ण भोगोंका भोक्ता वह शरीर तो यहीं पड़ा रह जायगा ! ॥ ४५ ॥ सुख-दुःखके कारणरूप (पूर्वजन्मकृत) पाप-पुण्य जीवके साथ ही आते हैं और वे ही देह-सम्बन्ध आदिके द्वारा जीवको अहर्निश सुख-दुःखकी प्राप्ति कराते हैं ॥ ४६ ॥ जबतक अज्ञानजन्य अध्यासके कारण जीव 'मैं देह हूँ, मैं कर्त्ता हूँ' ऐसा अभिमान करता है तभीतक उसे विवश होकर जन्म-मृत्यु आदि भोगने पड़ते हैं


* प्रकृति, बुद्धि, अहंकार, ग्यारह इन्द्रियाँ, पञ्चभूत और शब्द-स्पर्शा आदि उनके पाँच विषय—ये सब मिलाकर चौबीस तत्त्व कहलाते हैं ।

२५२ अध्यात्मरामायण [सर्ग ४


तस्मात्त्वं त्यज देहादावभिमानं महामते ।
आत्माऽतिनिर्मलः शुद्धो विज्ञानात्माऽचलोऽव्ययः
स्वाज्ञानवशतो बन्धं प्रतिपद्य विमुह्यति ।
तस्मात्त्वं शुद्धभावेन ज्ञात्वाऽऽत्मानं सदा स्मर ॥४९॥

विरतिं भज सर्वत्र पुत्रदारगृहादिषु ।
निरयेष्वपि भोगः स्याच्छ्वशूकरतनावपि ॥५०॥

देहं लब्ध्वा विवेकाढ्यं द्विजत्वं च विशेषतः ।
तत्रापि भारते वर्षे कर्मभूमौ सुदुर्लभम् ॥५१॥

को विद्वानात्मसात्कृत्वा देहं भोगानुगो भवेत् ।
अतस्त्वं ब्राह्मणो भूत्वा पौलस्त्यतनयश्च सन् ॥५२॥

अज्ञानीव सदा भोगाननुधावसि किं मुधा ।
इतः परं वा त्यक्त्वा त्वं सर्वसङ्गं समाश्रय ॥५३॥

राममेव परात्मानं भक्तिभावेन सर्वदा ।
सीतां समर्प्य रामाय तत्पादानुचरो भव ॥५४॥

विमुक्तः सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं प्रयास्यसि ।
नो चेद्गमिष्यसेऽधोऽधः पुनरावृत्तिवर्जितः ।
अङ्गीकुरुष्व मद्वाक्यं हितमेव वदामि ते ॥५५॥

सत्सङ्गतिं कुरु भजस्व हरिं शरण्यं
श्रीराघवं मरकतोपलकान्तिकान्तम् ।
सीतासमेतमनिशं धृतचापबाणं
सुग्रीवलक्ष्मणविभीषणसेविताङ्घ्रिम् ॥५६॥


अर्थ / हिन्दी टीका:

॥ ४७ ॥ अतः हे महामते ! आप देह आदिमें अभिमान छोड़िये । आत्मा तो अत्यन्त निर्मल, शुद्धस्वरूप, विज्ञानमय, अविचल और अविकारी है ॥ ४८ ॥ अपने अज्ञानके कारण ही वह बन्धनमें पड़कर मोहको प्राप्त होता है । अतः आप आत्माको शुद्ध भावसे जानकर नित्य उसीका स्मरण कीजिये ॥ ४९ ॥ पुत्र, स्त्री और गृह आदि सभीसे उपराम हो जाइये क्योंकि भोग तो कुत्ते और शूक्रादिकी योनिमें तथा नरकादिमें भी मिल सकते हैं ॥ ५० ॥ सदसद्विवेक-बुद्धिसे युक्त मनुष्य-शरीर पाकर, उसमें भी विशेषतः द्विजत्व पाकर और अति दुर्लभ कर्मभूमि भारतवर्षमें जन्म ग्रहण कर, ऐसा कौन बुद्धिमान् होगा जो देहमें आत्मबुद्धि कर भोगोंका सेवन करेगा ?

"अतः आप ब्राह्मण-शरीर और सो भी पुलस्त्य-नन्दन विश्रवाके पुत्र होकर अज्ञानीके समान सदा ही इन भोगोंकी ओर व्यर्थ क्यों दौड़ते हैं ? आजसे आप सब प्रकारका संग छोड़कर अति भक्तिभावसे सदा परमात्मा रामका ही आश्रय लीजिये और श्रीसीताजीको भगवान् रामके अर्पण कर उनके चरणकमलोंकी सेवा कीजिये ॥ ५१–५४ ॥ यदि आप ऐसा करेंगे तो सब पापोंसे छूटकर विष्णुलोक प्राप्त करेंगे, नहीं तो पुनः ऊपर लौटनेसे वञ्चित रहकर उत्तरोत्तर नीचेके लोकोंमें ही जाते रहेंगे । मैं आपके हितकी ही बात कहता हूँ, आप इसे स्वीकार कीजिये ॥ ५५ ॥ हे रावण ! आप अहर्निश सत्संग कीजिये और जिनके शरीरकी कान्ति मरकतमणिके समान है तथा सुग्रीव, लक्ष्मण और विभीषण जिनके चरणकमलोंकी सेवा कर रहे हैं उन शरणागतवत्सल, धनुर्बाणधारी श्रीरघुनाथजीका सीताजीके सहित भजन कीजिये” ॥ ५६ ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
युद्धकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥

युद्धकाण्ड - सर्ग ५: शुकका पूर्व-चरित्र, माल्यवान्‌का रावणको समझाना तथा संग्राम

सर्ग ५ ]युद्धकाण्ड२५३

पञ्चम सर्ग

शुकका पूर्व-चरित्र, माल्यवान्‌का रावणको समझाना तथा वानर-राक्षस-संग्राम ।


श्रीमहादेव उवाच**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! शुकके मुखसे निकले हुए इन अज्ञाननाशक वचनोंको सुनकर रावण क्रोधसे मानो जलता हुआ उससे आँखें लाल करके बोला—॥१॥ “अरे दुर्बुद्धे ! मेरे ही टुकड़ोंसे पलकर तू इस प्रकार गुरुकी भाँति कैसे बोलता है ? तीनों लोकोंका शासन करनेवाला तो मैं हूँ, मुझे उपदेश देते हुए तुझको लज्जा नहीं आती ? ॥ २ ॥ तू यद्यपि वध करनेयोग्य है और मैं तुझे अभी मार डालता, परन्तु तेरे पूर्व-कृत्योंको याद करके मैं तुझे छोड़े देता हूँ ॥ ३ ॥ अरे मूढ़ ! तू तुरन्त यहाँसे टल जा, मैं ऐसी बातें नहीं सुनना चाहता ।” रावणके ये वचन सुनकर शुक 'महाराजकी बड़ी कृपा है' ऐसा कहकर काँपता हुआ अपने घर चला गया ॥ ४ ॥
श्रुत्वा शुकमुखोद्गीतं वाक्यमज्ञाननाशनम् ।<br>रावणः क्रोधताम्राक्षो दहन्निव तमब्रवीत् ॥ १ ॥
अनुजीव्य सुदुर्बुद्धे गुरुवद्भाषसे कथम् ।<br>शासिताऽहं त्रिजगतां त्वं मां शिक्षन्न लज्जसे ॥ २ ॥
इदानीमेव हन्मि त्वां किन्तु पूर्वकृतं तव ।<br>स्मरामि तेन रक्षामि त्वां यद्यपि वधोचितम् ॥ ३ ॥
इतो गच्छ विमूढ त्वमेवं श्रोतुं न मे क्षमम् ।<br>महाप्रसाद इत्युक्त्वा वेपमानो गृहं ययौ ॥ ४ ॥
शुकोऽपि ब्राह्मणः पूर्वं ब्रह्मिष्ठो ब्रह्मवित्तमः।<br>वानप्रस्थविधानेन वने तिष्ठन् स्वकर्मकृत् ॥ ५ ॥पूर्व-जन्ममें शुक एक वेदज्ञ और ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण था, तथा वानप्रस्थ-विधिसे अपने धर्म-कर्ममें तत्पर हुआ वनमें रहता था ॥ ५ ॥ इस महामतिने देवताओंकी वृद्धि और दैत्योंके नाशके लिये लगातार बहुत-से बड़े-बड़े यज्ञ किये ॥ ६ ॥ अतः देवताओंके हितमें लगे रहने-के कारण शुकका राक्षसोंसे विरोध हो गया । उस समय वज्रदंष्ट्र नामक एक महान् राक्षस शुकका अपकार करनेपर उतारू होकर अवसर देखने लगा ।
देवानांमभिवृद्ध्यर्थं विनाशाय सुरद्विषाम् ।<br>चकार यज्ञविततिमाविच्छिन्नां महामतिः ॥ ६ ॥
राक्षसानां विरोधोऽभूच्छुको देवहितोद्यतः ।<br>वज्रदंष्ट्र इति ख्यातस्तत्रैको राक्षसो महान् ॥ ७ ॥
अन्तरं प्रेप्सुरतिष्ठच्छुकापकरणोद्यतः ।<br>कदाचिदागतोऽगस्त्यस्तस्याश्रमपदं मुनेः ॥ ८ ॥एक दिन मुनिवर शुकके आश्रममें महर्षि अगस्त्य पधारे ॥७-८॥ शुकने अगस्त्यजीकी पूजा कर उन्हें भोजन के लिये निमन्त्रित किया । जिस समय महर्षि अगस्त्य स्नानके लिये गये हुए थे उस राक्षस (वज्रदंष्ट्र) ने अपना मौका देखकर अगस्त्यका रूप बनाया और शुकसे कहा—"हे ब्रह्मन् ! यदि तुम मुझे भोजन कराना चाहते हो तो मांसयुक्त अन्न खिलाओ ॥ ९-१० ॥ मैंने बहुत दिनोंसे छाग (बकरे) का मांस नहीं खाया है ।” तब शुकने 'जो आज्ञा' कह बड़ी तैयारीसे मांसमय भोजन बनवाया ॥ ११ ॥
तेन सम्पूजितोऽगस्त्यो भोजनार्थं निमन्त्रितः ।<br>गते स्नातुं मुनौ कुम्भसम्भवे प्राप्य चान्तरम् ॥ ९॥
अगस्त्यरूपधृक् सोऽपि राक्षसः शुकमब्रवीत् ।<br>यदि दास्यसि मे ब्रह्मन् भोजनं देहि सामिषम् ॥१०॥
बहुकालं न भुक्तं मे मांसं छागाङ्गसम्भवम् ।<br>तथेति कारयामास मांसभोज्यं सविस्तरम् ॥ ११॥
२५४अध्यात्मरामायण[सर्ग ५

उपविष्टे मुनौ भोक्तुं राक्षसोऽतीव सुन्दरम् ।
शुकभार्यावपुर्धृत्वा तां चान्तर्मोहयन् खलः ॥१२॥
नरमांसं ददौ तस्मै सुपक्वं बहुविस्तरम् ।
दत्त्वैवान्तर्दधे रक्षस्ततो दृष्ट्वा चुकोप सः ॥१३॥
अमेध्यं मानुषं मांसमगस्त्यः शुकमब्रवीत् ।
अभक्ष्यं मानुषं मांसं दत्तवानसि दुर्मते ॥१४॥
मह्यं त्वं राक्षसो भूत्वा तिष्ठ त्वं मानुषाशनः ।
इति शप्तः शुको भीत्या प्राह्ागस्त्यं मुने त्वया ॥१५॥
इदानीं भाषितं मेऽद्य मांसं देहीति विस्तरम् ।
तथैव दत्तं मे देव किं मे शापं प्रदास्यसि ॥१६॥
श्रुत्वा शुकस्य वचनं मुहूर्तं ध्यानमास्थितः ।
ज्ञात्वा रक्षःकृतं सर्वं ततः प्राह शुकं सुधीः ॥१७॥
तवापकारिणा सर्वं राक्षसेन कृतं त्विदम् ।
अविचार्यैव मे दत्तः शापस्ते मुनिसत्तम ॥१८॥
तथापि मे वचोऽमोघमेवमेव भविष्यति ।
राक्षसं वपुरास्थाय रावणस्य सहायकृत् ॥१९॥
तिष्ठ तावद्यदा रामो दशाननवधाय हि ।
आगमिष्यति लङ्कायाः समीपं वानरैः सह ॥२०॥
प्रेषितो रावणेन त्वं चारो भूत्वा रघूत्तमम् ।
दृष्ट्वा शापाद्विनिर्मुक्तो बोधयित्वा च रावणम् ॥२१॥
तत्त्वज्ञानं ततो मुक्तः परं पदमवाप्स्यसि ।
इत्युक्तोऽगस्त्यमुनिना शुको ब्राह्मणसत्तमः ॥२२॥
बभूव राक्षसः सद्यो रावणं प्राप्य संस्थितः ।
इदानीं चाररूपेण दृष्ट्वा रामं सहानुजम् ॥२३॥
रावणं तत्त्वविज्ञानं बोधयित्वा पुनर्द्रुतम् ।
पूर्ववद्ब्राह्मणो भूत्वा स्थितो वैखानसैः सह ॥२४॥

जिस समय मुनि भोजन करने बैठे उस दुष्ट राक्षसने शुककी पत्नीका अति सुन्दर रूप धारण किया, और उसे (शुककी स्त्रीको) आश्रमके भीतर ही मूर्च्छित कर मुनिवरको नाना प्रकारसे बनाया हुआ नरमांस परोसा। उसे परोसकर वह राक्षस अन्तर्धान हो गया। मुनिवर अगस्त्य अपने आगे अभक्ष्य नरमांस देखकर अति क्रोधित हुए और शुकसे बोले—"हे दुर्मते! तुमने मुझे अभक्ष्य नरमांस खानेको दिया है, अतः तुम मनुष्यभोजी राक्षस होकर रहो।" अगस्त्यजीके इस प्रकार शाप देनेपर शुकने डरते-डरते कहा—"मुने! आपने अभी कहा था कि आज मुझे नाना प्रकारका मांस खानेको दो; हे देव! मैंने आपकी आज्ञानुसार ही आपको मांस दिया है फिर आप मुझे शाप क्यों देते हैं?" ॥ १२–१६ ॥

शुकके वचन सुनकर महाबुद्धिमान् अगस्त्यजीने एक मुहूर्ततक ध्यानस्थ होकर राक्षसकी सब करतूत जान ली। तब वे शुकसे बोले ॥ १७ ॥ "हे मुनिश्रेष्ठ! यह सब करतूत तुम्हारे अपकार-कर्त्ता राक्षसकी है, मैंने तुम्हें बिना विचारे ही शाप दे दिया ॥ १८ ॥ तथापि मेरा वचन वृथा जानेवाला नहीं है, इसलिये होगा ऐसा ही। तुम राक्षसका शरीर धारण कर रावणकी तबतक सहायता करते रहो जबतक कि उसका नाश करनेके लिये श्रीरामचन्द्रजी वानरोंके सहित लंकाके समीप न आयें ॥ १९–२० ॥ इसके पश्चात् तुम रावणके भेजनेसे उसके दूत होकर रघुनाथजीके पास जाओगे और उनका दर्शन कर शापसे मुक्त हो जाओगे, फिर रावणको तत्त्वज्ञानका उपदेश कर मुक्त होकर परमपद प्राप्त करोगे।"

मुनिवर अगस्त्यके ऐसा कहनेपर विप्रवर शुक राक्षस होकर तुरन्त रावणके पास आकर रहने लगे। इस समय रावणके दूतरूपसे लक्ष्मणसहित भगवान् रामका दर्शन कर तथा रावणको तत्त्वज्ञानका उपदेश दे वे फिर शीघ्र ही पूर्ववत् ब्राह्मण-शरीर हो वानप्रस्थोंके साथ रहने लगे ॥ २१–२४ ॥

सर्ग ५ ] युद्धकाण्ड २५५


ततः समागमद्वृद्धो माल्यवान् राक्षसो महान् ।<br>बुद्धिमान्नीतिनिपुणो राज्ञो मातुःप्रियः पिता ॥२५॥( शुकके चले जानेपर ) राजा रावणकी माताका प्रिय पिता अति बुद्धिमान् और नीतिनिपुण वृद्ध राक्षस माल्यवान् वहाँ आया ॥ २५ ॥
प्राह तं राक्षसं वीरं प्रशान्तेनान्तरात्मना ।<br>शृणु राजन्वचो मेऽद्य श्रुत्वा कुरु यथेप्सितम् ॥२६॥वह शान्त-चित्तसे उस राक्षसवीर ( रावण ) से बोला—"हे राजन् ! मेरी प्रार्थना सुनिये, फिर आपकी जैसी इच्छा हो वह करना ॥ २६ ॥
यदा प्रविष्टा नगरीं जानकी रामवल्लभा ।<br>तदादि पुर्यां दृश्यन्ते निमित्तानि दशानन ॥२७॥<br>घोराणि नाशहेतूनि तानि मे वदतः शृणु ।<br>खरस्तनितनिर्घोषा मेघा अतिभयङ्कराः ॥२८॥<br>शोणितेनाभिवर्षन्ति लङ्काममुष्णेन सर्वदा ।<br>रुदन्ति देवलिङ्गानि खिद्यन्ति प्रचलन्ति च ॥२९॥हे दशानन ! जबसे नगरमें राम-भार्या जानकीका प्रवेश हुआ है तभीसे यहाँ बड़े भयंकर नाशकारी हेतु दिखायी दे रहे हैं, सो मैं आपको बतलाता हूँ, सुनिये—अति भयंकर मेघगण तीक्ष्ण कड़कके साथ गर्जते हैं और सर्वदा लंकाके ऊपर गर्म-गर्म रक्तकी वर्षा करते हैं । देवमूर्तियाँ रोती हैं, उनके शरीरमें पसीना आ जाता है और वे अपने स्थानसे स्खलित हो जाती हैं ॥ २७-२९ ॥
कालिका पाण्डुरैर्दन्तैः प्रहसन्त्यग्रतः स्थिता ।<br>खरा गोषु प्रजायन्ते मूषका नकुलैः सह ॥३०॥<br>मार्जारैण तु युध्यन्ति पन्नगा गरुडेन तु ।<br>करालो विकटो मुण्डः पुरुषः कृष्णपिङ्गलः ॥३१॥<br>कालो गृहाणि सर्वेषां काले काले त्ववेक्षते ।<br>एतान्यन्यानि दृश्यन्ते निमित्तान्युद्भवन्ति च ॥३२॥कालिकाएँ राक्षसोंके आगे अपने पीले-पीले दाँत निकालकर हँसती हैं, गौओंके गधे उत्पन्न होते हैं और चूहे न्यौले तथा बिल्लीसे एवं सर्प गरुडसे युद्ध करते हैं । समस्त राक्षसोंके घरोंको समय-समयपर काले और पीले रंगका एक महाभयंकर विकरालवदन मुण्डित-केश कालपुरुष देखा करता है । इस प्रकार ये तथा और भी बहुत-से अपशकुन उत्पन्न होते और दिखायी देते हैं ॥ ३०-३२ ॥
अतः कुलस्य रक्षार्थं शान्तिं कुरु दशानन ।<br>सीतां सत्कृत्य सधनां रामायाशु प्रयच्छ भोः ॥३३॥अतः हे दशशीश ! अपने कुलकी रक्षाके लिये इनकी शान्ति कीजिये और तुरन्त ही सीताको सत्कारपूर्वक बहुत-से धनके सहित रघुनाथजीको दे दीजिये ॥ ३३ ॥
रामं नारायणं विद्धि विद्वेषं त्यज राघवे ।<br>यत्पादपोतमाश्रित्य ज्ञानिनो भवसागरम् ॥३४॥<br>तरन्ति भक्तिपूतान्तास्ततो रामो न मानुषः ।<br>भजस्व भक्तिभावेन रामं सर्वहृदालयम् ॥३५॥रामको आप साक्षात् नारायण समझिये, इसलिये उनमें द्वेषभाव छोड़ दीजिये । इन रघुनाथजीके चरण-कमल-रूप नौकाका आश्रय लेकर भक्तिसे पवित्र अन्तःकरण हुए योगिजन संसारसागरको पार कर जाते हैं। अतः ये कोई साधारण पुरुष नहीं हैं । ये सबके अन्तःकरणोंमें विराजमान हैं, आप भक्तिभावसे इन रघुनाथजीका भजन कीजिये ॥ ३४-३५ ॥
यद्यपि त्वं दुराचारो भक्त्या पूतो भविष्यसि ।<br>मद्वाक्यं कुरु राजेन्द्र कुलकौशलहेतवे ॥३६॥यद्यपि आपका आचरण अच्छा नहीं है, तथापि उनकी भक्तिसे आप पवित्र हो जायेंगे । हे राजेन्द्र ! अपने कुलकी कुशलताके लिये मेरा यह वचन मान लीजिये” ॥ ३६ ॥
तत्त माल्यवतो वाक्यं हितमुक्तं दशाननः ।<br>न मर्षयति दुष्टात्मा कालस्य वशमागतः ॥३७॥किन्तु माल्यवान्‌के ये हितकर वाक्य दुष्टचित्त रावणको सहन न हुए, क्योंकि वह कालके वशीभूत हो रहा था॥३७॥ वह बोला—‘इस बेचारे एक तुच्छ

युद्धकाण्ड - सर्ग ६: लक्ष्मण-मूर्च्छा, राम-रावण-संग्राम, हनुमान्‌जीका ओषधि लेने जाना...

२५६अध्यात्मरामायण[सर्ग ५

मानवं कृपणं राममेकं शाखामृगाश्रयम् ।<br>समर्थं मन्यसे केन हीनं पित्रा मुनिप्रियम् ॥३८॥<br>रामेण प्रेषितो नूनं भाषसे त्वमनर्गलम् ।<br>गच्छ वृद्धोऽसि बन्धुस्त्वं सोढं सर्वं त्वयोदितम् ३९<br>इतो मत्कर्णपदवीं दहेत्येतद्वचस्तव ।<br>इत्युक्त्वा सर्वसचिवैः सहितः प्रस्थितस्तदा ॥४०॥<br>प्रासादाग्रे समासीनः पश्यन्वानरसैनिकान् ।<br>युद्धाययोजयत्सर्वराक्षसान्समुपस्थितान् ॥४१॥ | मनुष्य रामको, जिसने बन्दरका आश्रय लिया हुआ है और जिसे उसके पिताने भी निकाल दिया है, तुम किस बातमें समर्थ मानते हो ? वह तो केवल वनवासी मुनिजनोंका ही प्यारा है ॥ ३८ ॥ मालूम होता है, तुम्हें रामने ही भेजा है इसीलिये तुम इस प्रकार ऊटपटांग बातें बनाते हो । जाओ, तुम बूढ़े और अपने सगे-सम्बन्धी हो इसलिये मैंने तुम्हारी सब बातें सहन कर लीं हैं ॥ ३९ ॥ किन्तु अब तुम्हारे वचन मेरे कानोंको जलाते हैं ।” ऐसा कहकर वह अपने समस्त मन्त्रियोंसहित वहाँसे चल दिया ॥ ४० ॥ और अपने राजभवनके सर्वोच्च तलपर बैठकर वानर-सैनिकों- को देखता हुआ अपने आस-पास बैठे हुए राक्षसोंको युद्धके लिये नियुक्त करने लगा ॥ ४१ ॥ रामोऽपि धनुरादाय लक्ष्मणेन समाहृतम् ।<br>दृष्ट्वा रावणमासीनं कोपेन कलुषीकृतः ॥४२॥<br>किरीटिनं समासीनं मन्त्रिभिः परिवेष्टितम् ।<br>शशाङ्कार्धनिभेनेव बाणेनैकेन राघवः ॥४३॥<br>श्वेतच्छत्रसहस्राणि किरीटदशकं तथा ।<br>चिच्छेद निमिषार्धेन तदद्भुतमिवाभवत् ॥४४॥<br>लज्जितो रावणस्तूर्णं विवेश भवनं स्वकम् ।<br>आहूय राक्षसान् सर्वान्प्रहस्तप्रमुखान् खलः॥४५॥<br>वानरैः सह युद्धाय नोदयामास सत्वरः । | इधर, रामचन्द्रजीने रावणको बैठा देख अति क्रोधातुर हो लक्ष्मणजीका लाया हुआ धनुष उठाया ॥ ४२ ॥ वह शिरपर मुकुट धारण किये अपने अनेकों मन्त्रियोंसे घिरा हुआ बैठा था भगवान् रामने आधे निमेषमें ही एक अर्धचन्द्राकार बाणसे उसके हजारों श्वेत छत्र और दसों मुकुट काट डाले । यह बड़ा आश्चर्य-सा हो गया ॥ ४३-४४ ॥ इससे लज्जित होकर रावण तुरन्त अपने घरमें घुस गया; और उस दुष्टने शीघ्र ही प्रहस्त आदि मुख्य-मुख्य राक्षसोंको बुलाकर वानरोंके साथ युद्ध करनेकी आज्ञा दी । ततो भेरीमृदङ्गाद्यैः पणवानकगोमुखैः ॥४६॥<br>महिषोष्ट्रैः खरैः सिंहैर्द्दीपिभिः कृतवाहनाः ।<br>खड्गशूलधनुःपाशयष्टितोमरशक्तिभिः ॥४७॥<br>लक्षिताः सर्वतो लङ्कां प्रतिद्वारमुपाययुः ।<br>तत्पूर्वमेव रामेण नोदिता वानरर्षभाः ॥४८॥<br>उद्यम्य गिरिशृङ्गाणि शिखराणि महान्ति च ।<br>तरूंश्चोत्पाट्य विविधान्युद्धाय हरियूथपाः ॥४९॥<br>प्रेक्षमाणा रावणस्य तान्यनीकानि भागशः ।<br>राघवप्रियकामार्थं लङ्कामारुरुहुस्तदा ॥५०॥<br>ते द्रुमैः पर्वताग्रैश्च मुष्टिभिश्च प्लवङ्गमाः ।<br>ततः सहस्रयूथाश्च कोटियूथाश्च यूथपाः ॥५१॥ | तब राक्षसलोग भेरी, मृदंग, पणव, आनक और गोमुख आदि बाजे बजाते भैंसों, ऊँटों, गधों, सिंहों और हाथियोंपर चढ़कर खड्ग, शूल, धनुष, पाश, यष्टि (डण्डे), तोमर और शक्ति आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हो लङ्काके प्रत्येक द्वारपर आ गये । भगवान् रामने वानरोंको पहले ही आज्ञा दे दी थी ॥४५-४८॥ अतः वे पर्वतोंकी शिलाएँ तथा बड़े-बड़े शिखर उठ कर और नाना प्रकारके वृक्ष उखाड़कर युद्धके लिये चले और रावणकी वह पृथक्-पृथक् सेना देखकर रघुनाथजीका प्रिय कार्य करनेके लिये लंकापर चढ़ गये ॥ ४९-५० ॥ उनमेंसे कोई सहस्रयूथपति, कोई कोटियूथप और कोई शतकोटि-यूथनायकथे। उन वानरों ने उछलते-कूदते और गर्जते हुए

सर्ग ५ ] युद्धकाण्ड २५७

कोटीशतयुताश्चान्ये रुरुधुर्नगरं भृशम् ।<br>आप्लवन्तः प्लवन्तश्च गर्जन्तश्च प्लवङ्गमाः ॥५२॥<br>रामो जयत्यतिबलो लक्ष्मणश्च महाबलः ।<br>राजा जयति सुग्रीवो राघवेणानुपालितः ॥५३॥<br>इत्येवं घोषयन्तश्च समं युयुधिरेऽरिभिः ।<br>हनूमानङ्गदश्चैव कुमुदो नील एव च ॥५४॥<br>नलश्च शरभश्चैव मैन्दो द्विविद एव च ।<br>जाम्बवान्दधिवक्त्रश्च केसरी तार एव च ॥५५॥<br>अन्ये च बलिनः सर्वे यूथपाश्च प्लवङ्गमाः ।<br>द्वाराण्युत्प्लुत्य लङ्कायाः सर्वतो रुरुधुर्भृशम् ।<br>तदा वृक्षैर्महाकायाः पर्वताग्रैश्च वानराः ॥५६॥<br>निजघ्नुस्तानि रक्षांसि नखैर्दन्तैश्च वेगिताः ।<br><br>राक्षसाश्च तदा भीमा द्वारेभ्यः सर्वतो रुषा ॥५७॥<br>निर्गत्य भिन्दिपालैश्च खड्गैः शूलैः परश्वधैः ।<br>निजघ्नुर्वानरानीकं महाकाया महाबलाः ॥५८॥<br>राक्षसांश्च तथा जघ्नुर्वानरा जितकाशिनः ।<br>तदा बभूव समरो मांसशोणितकर्दमः ॥५९॥<br>रक्षांसां वानराणां च सम्प्रभूवाद्वुतोपमः ।<br>ते हयैश्च गजैश्चैव रथैः काञ्चनसंनिभैः ॥६०॥<br>रक्षोव्याघ्रा युयुधिरे नादयन्तो दिशो दश ।<br>राक्षसाश्च कपीन्द्राश्च परस्परजयैषिणः ॥६१॥<br>राक्षसान्वानरा जघ्नुर्वानरांश्चैव राक्षसाः ।<br>रामेण विष्णुना दृष्टा हरयो दिविजांशजाः ॥६२॥<br>बभूवुर्बलिनो हृष्टास्तदा पीतामृता इव ।<br>सीताभिमर्शपापेन रावणेनाभिपालितान् ॥६३॥<br>हृतश्रीकान्हतबलान् राक्षसान् जघ्नुरोजसा ।<br>चतुर्थांशावशेषेण निहतं राक्षसं बलम् ॥६४॥<br>स्वसैन्यं निहतं दृष्ट्वा मेघनादोऽथ दुष्टधीः ।<br>ब्रह्मदत्तवरः श्रीमानन्तर्धानं गतोऽसुरः ॥६५॥वृक्ष, पर्वतशिखर और मुट्ठियाँ तानकर नगरको सब ओर-<br>से घेर लिया ॥५१-५२॥ 'महाबली राम और वीरवर<br>लक्ष्मणकी जय हो, रघुनाथजीसे सुरक्षित राजा सुग्रीवकी<br>जय हो' इस प्रकार शब्द करते हुए वे शत्रुओंसे लड़ने<br>लगे। हनुमान्, अंगद, कुमुद, नील, नल, शरभ, मैन्द,<br>द्विविद, जाम्बवान्, दधिमुख, केसरी, तार तथा<br>अन्य समस्त बलवान् वानर और यूथपतियोंने उछल-<br>उछलकर लंकाके सब द्वारोंको चारों ओरसे घेर<br>लिया। तब ये महाकाय वानरगण वृक्ष, पर्वतशिखर<br>और नख तथा दाँतोंसे अति वेगपूर्वक उन राक्षसोंको<br>मारने लगे।<br><br>तब, महाभयानक और बड़े-बड़े डीलवाले महा-<br>बली राक्षसगण भी अति रोषपूर्वक सब द्वारोंसे<br>निकलकर भिन्दिपाल, खड्ग, शूल और परशु आदि<br>विविध अस्त्र-शस्त्रोंसे वानर-सेनापर प्रहार करने लगे<br>॥ ५३-५८ ॥ इसी प्रकार विजयी वानरवीर<br>भी राक्षसोंको मारने लगे। उस समय वहाँ राक्षसों<br>और वानरोंका बड़ा विचित्र युद्ध छिड़ गया, जिससे<br>उस रणभूमिमें रक्त और मांसकी कीच हो गयी। वीर<br>राक्षसकेसरी घोड़ों, हाथियों और सुवर्णमय रथोंपर चढ़-<br>कर अपने शब्दसे दशों दिशाओंको गुञ्जायमान करते हुए<br>लड़ रहे थे, और राक्षस तथा वानर दोनों ही परस्पर एक<br>दूसरेको जीतना चाहते थे ॥ ५९-६१ ॥ वानरगण<br>राक्षसोंको और राक्षसलोग वानरोंको मारने लगे।<br>विष्णुरूप भगवान् रामकी दृष्टि पड़नेसे देवताओंके अंश-<br>से उत्पन्न हुए वानरगण बड़े प्रबल हो गये; और मानो<br>अमृतपान कर अति हर्षसे उत्साहपूर्वक, सीताजीको<br>(हरण करते समय) स्पर्श करनेके कारण महापापी<br>रावणसे पालित निस्तेज और बलहीन राक्षसोंको<br>मारने लगे। धीरे-धीरे राक्षसोंकी सेना नष्ट होकर केवल<br>एक चौथाई रह गयी ॥ ६२-६४॥<br><br>अपनी सेनाको नष्ट हुई देख ब्रह्माजीके वरसे<br>श्रीसम्पन्न हुआ दुष्टबुद्धि राक्षस मेघनाद अन्तर्धान हो<br>गया ॥६५॥ वह दैत्य सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र चलानेमें

३३

  • २५८ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ५ ---|---|---

मूल संस्कृत श्लोक:

सर्वास्त्रकुशलो व्योम्नि ब्रह्मास्त्रेण समन्ततः ।
नानाविधानि शस्त्राणि वानरानीकमर्दयन् ॥ ६६ ॥
ववर्ष शरजालानि तदद्भुतमिवाभवत् ।
रामोऽपि मानयन्ब्राह्ममस्त्रमस्त्रविदां वरः ॥ ६७ ॥
क्षणं तूष्णीमुवासाथ ददर्श पतितं बलम् ।
वानराणां रघुश्रेष्ठश्चुकोपानलसन्निभः ॥ ६८ ॥
चापमानय सौमित्रे ब्रह्मास्त्रेणासुरं क्षणात् ।
भस्मीकरोमि मे पश्य बलमद्य रघूत्तम ॥ ६९ ॥

मेघनादोऽपि तच्छ्रुत्वा रामवाक्यमतन्द्रितः ।
तूर्णं जगाम नगरं मायया मायिकोऽसुरः ॥ ७० ॥

पतितं वानरानीकं दृष्ट्वा रामोऽतिदुःखितः ।
उवाच मारुतिं शीघ्रं गत्वा क्षीरमहोदधिम् ॥ ७१ ॥
तत्र द्रोणगिरिर्नाम दिव्यौषधिसमुद्भवः ।
तमानय द्रुतं गत्वा सञ्जीवय महामते ॥ ७२ ॥
वानरौघान्महासत्त्वान्कीर्तिस्ते सुस्थिरा भवेत् ।
आज्ञाप्रमाणमित्युक्त्वा जगामानिलनन्दनः ॥ ७३ ॥

आनीय च गिरिं सर्वान्वानरान्वानरर्षभः ।
जीवयित्वा पुनस्तत्र स्थापयित्वाऽऽययौ द्रुतम् ॥ ७४ ॥

पूर्ववच्चोद्भरं नादं वानराणां बलौघतः ।
श्रुत्वा विस्मयमापन्नो रावणो वाक्यमब्रवीत् ॥ ७५ ॥

राघवो मे महान् शत्रुः प्राप्तो देवविनिर्मितः ।
हन्तुं तं समरे शीघ्रं गच्छन्तु मम यूथपाः ॥ ७६ ॥
मन्त्रिणो बान्धवाः शूरा ये च मत्प्रियकाङ्क्षिणः ।
सर्वे गच्छन्तु युद्धाय त्वरितं मम शासनात् ॥ ७७ ॥

ये न गच्छन्ति युद्धाय भीरवः प्राणविप्लवात् ।
तान्हनिष्याम्यहं सर्वान्मच्छासनपराङ्मुखान् ॥ ७८ ॥

तच्छ्रुत्वा भयसन्त्रस्ता निर्जग्मू रणकोविदाः । -


हिन्दी अनुवाद:

कुशल था। अतः वह आकाशमें चढ़कर ब्रह्मास्त्रद्वारा वानर-सेनाको दलित करता हुआ सब ओर नाना प्रकारके शस्त्र और बाणसमूह बरसाने लगा। यह बड़ा आश्चर्य-सा होने लगा। अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भगवान् राम भी ब्रह्मास्त्रका मान रखनेके लिये एक क्षणतक चुपचाप वानर-सेनाका पतन देखते रहे। अन्तमें वे रघुश्रेष्ठ क्रोधसे अग्निके समान प्रज्वलित हो उठे ॥ ६६-६८ ॥ और बोले— "लक्ष्मण! मेरा धनुष तो लाओ, मैं एक क्षणमें ही इस दुष्ट दानवको ब्रह्मास्त्रसे भस्म कर डालूँगा। हे रघूश्रेष्ठ! आज तुम मेरा पराक्रम देखना" ॥ ६९ ॥

मेघनाद भी बहुत सावधान था; रामचन्द्रजीके ये वाक्य सुनते ही वह मायामयी दैत्य मायापूर्वक तुरन्त अपने नगरको चला गया ॥ ७० ॥

वानर-सेनाको नष्ट हुई देख श्रीरामचन्द्रजी अति दुःखित होकर हनुमान्‌जीसे बोले— "हनुमान् ! तुम तुरन्त ही क्षीर-सागरपर जाओ। वहाँ द्रोणाचल नामक पर्वत है, जिसपर नाना प्रकारकी दिव्य ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं। हे महामते ! तुम झटपट जाकर उस पर्वतको ले आओ और इन महापराक्रमी वानरयूथोंको जीवित करो। इससे तुम्हारी कीर्ति अविचल हो जायगी।" यह सुनकर पवन-कुमार 'जो आज्ञा' ऐसा कहकर चल दिये ॥ ७१-७३ ॥

और तुरन्त ही उस पर्वतको लाकर (उसकी ओषधियों-से) समस्त वानरोंको जीवित कर उसे फिर वहीं रख आये ॥ ७४ ॥

तब वानर-सेनाका फिर पूर्ववत् भयानक शब्द सुनकर रावण अति विस्मित होकर कहने लगा—॥ ७५ ॥

"देवताओंका प्रकट किया हुआ यह राम मेरा महान् शत्रु आया है। इसे युद्धमें मारनेके लिये मेरे सेनापति, मन्त्री, बन्धु-बान्धव तथा और भी जो शूरवीर मेरा हित चाहते हों, वे सब मेरी आज्ञा मानकर तुरन्त जायँ ॥ ७६-७७ ॥

जो डरपोक अपने प्राणोंके भयसे युद्ध करने नहीं जायेंगे, अपनी आज्ञा न मानने-वाले उन सबको मैं मार डालूँगा" ॥ ७८ ॥

रावणकी यह आज्ञा सुनकर अतिकाय, प्रहस्त, महानाद, महोदर,

सर्ग ६ ] युद्धकाण्ड २५९


अतिकायः प्रहस्तश्च महानादमहोदरौ ॥७९॥ देवशत्रुर्निकुम्भश्च देवान्तकनरान्तकौ । अपरे बलिनः सर्वे ययुर्युद्धाय वानरैः ॥८०॥ एते चान्ये च बहवः शूराः शतसहस्रशः । प्रविश्य वानरं सैन्यं ममन्थुर्गलदर्पिताः ॥८१॥ भुशुण्डीभिन्दिपालैश्च बाणैः खड्गैः परश्वधैः । अन्यैश्च विविधैरस्त्रैर्निजघ्नुर्हरियूथपान् ॥८२॥ ते पादपैः पर्वतशृंगैर्नखदंष्ट्रैश्च मुष्टिभिः । प्राणैर्विमोचयामासुः सर्वराक्षसयूथपान् ॥८३॥ रामेण निहताः केचित्सुग्रीवेण तथाऽपरे । हनूमता चाङ्गदेन लक्ष्मणेन महात्मना । यूथपैर्वानराणां ते निहताः सर्वराक्षसाः ॥८४॥ रामतेजः समाविश्य वानरा बलिनोऽभवन् । रामशक्तिविहीनानामेवं शक्तिः कुतो भवेत् ॥८५॥ सर्वेश्वरः सर्वमयो विधाता मायामनुष्यत्वविडम्बनेन । सदा चिदानन्दमयोऽपि रामो युद्धादिलीलां वितनोति मायाम् ॥८६॥

देवशत्रु, निकुम्भ, देवान्तक और नरान्तक आदि रणकुशल वीर तथा और भी समस्त बलवान् योद्धा भयभीत होकर वानरोंके साथ युद्ध करनेके लिये चले ॥७९-८०॥ ये तथा और भी बहुत-से सैकड़ों-सहस्रों शूरवीर अपने-अपने बलके गर्वसे उन्मत्त हो वानर-सेनामें घुसकर उसे दलित करने लगे ॥ ८१ ॥ वे भुशुण्डी, भिन्दिपाल, बाण, खड्ग, परशु तथा और भी नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे वानर-यूथपतियोंपर प्रहार करने लगे ॥ ८२ ॥

इधर, वानरवीर भी वृक्षों, पर्वतशिखरों, नखों, दाढ़ों और मुष्टियोंसे समस्त राक्षस-यूथपोंको निष्प्राण करने लगे ॥ ८३ ॥ उन राक्षसोंमेंसे कोई श्रीरामके हाथसे, कोई सुग्रीवके द्वारा, कोई हनुमान् और अंगदके द्वारा, कोई महात्मा लक्ष्मणजीके हाथसे और कोई अन्यान्य वानर-यूथपोंके द्वारा मारे गये । इस प्रकार उन समस्त राक्षसोंका अन्त हो गया ॥ ८४ ॥ राम-तेजके समावेश-से वानरगण अत्यन्त प्रबल हो रहे थे । राम-शक्तिसे शून्य होनेपर उनमें इतनी सामर्थ्य कैसे हो सकती थी ? ॥ ८५ ॥ भगवान् राम सर्वेश्वर, सर्वमय, सबके नियन्ता और सर्वदा चिदानन्दमय हैं, तथापि मायासे मानव-चरित्रका अनुकरण करते हुए युद्धादि लीलाका विस्तार करते हैं ॥ ८६ ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे युद्धकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥


षष्ठ सर्ग

लक्ष्मण-मूर्च्छा, राम-रावण-संग्राम, हनुमानजीका ओषधि लेने जाना और रावण-कालनेमि-संवाद ।

श्रीमहादेव उवाच श्रुत्वा युद्धे बलं नष्टमतिकायमुखं महत् । रावणो दुःखसन्तप्तः क्रोधेन महताऽऽवृतः ॥ १ ॥ निधायेन्द्रजितं लङ्कारक्षणार्थं महाद्युतिः । स्वयं जगाम युद्धाय रामेण सह राक्षसः ॥ २ ॥

**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! युद्धमें अतिकाय आदि राक्षसोंकी महती सेनाको नष्ट हुई सुन रावण अति दुःखार्तुर हो महान् क्रोधसे भर गया ॥ १ ॥ और वह महातेजस्वी राक्षस लङ्काकी रक्षाके लिये इन्द्रजीतको नियुक्त कर स्वयं रघुनाथजीसे लड़नेके लिये चला ॥ २ ॥ महाबली राक्षसराज समस्त शस्त्रास्त्र-

  • २५८ ३६० | अध्यात्मरामायणं | [सर्ग ६ ---|---|---

दिव्यं स्यन्दनमारुह्य सर्वशस्त्रास्त्रसंयुतम् ।
राममेवाभिदुद्राव राक्षसेन्द्रो महाबलः ॥ ३ ॥
वानरान्बहुशो हत्वा बाणैराशीविषोपमैः ।
पातयामास सुग्रीवप्रमुखान्यूथनायकान् ॥ ४ ॥
गदापाणिं महासत्त्वं तत्र दृष्ट्वा विभीषणम् ।
उत्ससर्ज महाशक्तिं मयदत्तां विभीषणे ॥ ५ ॥
तामापतन्तीमालोक्य विभीषणविघातिनीम् ।
दत्ताभयोऽयं रामेण वधार्हो नायमासुरः ॥ ६ ॥
इत्युक्त्वा लक्ष्मणो भीमं चापमादाय वीर्यवान् ।
विभीषणस्य पुरतः स्थितोऽकम्प इवाचलः ॥ ७ ॥

सा शक्तिर्लक्ष्मणतनुं विवेशामोघशक्तितः ।
यावन्त्यः शक्तयो लोके मायायाः सम्भवन्ति हि ॥ ८ ॥
तासामाधारभूतस्य लक्ष्मणस्य महात्मनः ।
मायाशक्त्या भवेत्किं वा शेषांशस्य हरेस्तनोः ॥ ९ ॥
तथापि मानुषं भावमापन्नस्तदनुव्रतः ।
मूर्च्छितः पतितो भूमौ तमादातुं दशाननः ॥ १० ॥
हस्तैस्तोलयितुं शक्तो न बभूवातिविस्मितः ।
सर्वस्य जगतः सारं विराजं परमेश्वरम् ॥ ११ ॥
कथं लोकाश्रयं विष्णुं तोलयेल्लघुराक्षसः ।

ग्रहीतुकामं सौमित्रिं रावणं वीक्ष्य मारुतिः ॥ १२ ॥
आजघानोरसि क्रुद्धो वज्रकल्पेन मुष्टिना ।
तेन मुष्टिप्रहारेण जानुभ्यामपतद्भुवि ॥ १३ ॥
आस्यैश्च नेत्रश्रवणैरूद्वमन् रुधिरं बहु ।
वेघूर्णमाननयनो रथोपस्थ उपाविशत् ॥ १४ ॥

अथ लक्ष्मणमादाय हनूमान् रावणार्दितम् ।


से सुसज्जित एक दिव्य रथपर आरूढ़ हो श्रीरामचन्द्रजी-की ओर ही दौड़ा ॥ ३ ॥ उसने अपने सर्पके समान उग्र बाणोंसे बहुत-से वानरोंको मारकर सुग्रीव आदि यूथपतियोंको भी पृथिवीपर गिरा दिया ॥ ४ ॥ फिर महापराक्रमी विभीषणको वहाँ गदा लिये खड़ा देख उसने उसकी ओर मयदानवकी दी हुई महान् शक्ति छोड़ी ॥ ५ ॥ उस शक्तिको विभीषणका नाश करनेके लिये बढ़ती देख 'रामने इसे अभय दिया है, यह असुरकुमार वध किये जानेयोग्य नहीं है' ऐसा कहते हुए महावीर्यवान् लक्ष्मणजी अपना प्रचण्ड धनुष लेकर विभीषणके आगे पर्वतके समान अचल होकर खड़े हो गये ॥ ६-७ ॥

उस शक्तिकी सामर्थ्य अमोघ (कभी व्यर्थ न जानेवाली) थी, अतः वह लक्ष्मणजीके शरीरमें घुस गयी। संसारमें मायासे जितनी शक्तियाँ उत्पन्न होतीं हैं महात्मा लक्ष्मणजी, उन सबके आधार भगवान् विष्णुके स्वरूप भूत शेषनागके अंशावतार हैं। उनका उस मायाशक्तिसे क्या बिगड़ सकता था ? ॥ ८-९ ॥ तथापि इस समय मनुष्यभाव अंगीकार करनेसे उसका अनुकरण करते हुए वे मूर्च्छित होकर पृथिवीपर गिर पड़े। लक्ष्मणजीको ले जानेके लिये रावण उन्हें अपने हाथोंसे उठानेमें सफल न हुआ, अतः उसे बड़ा ही विस्मय हुआ। भला, जो सम्पूर्ण जगत्‌का सार परमेश्वर विराट् पुरुष है, उस निखिल लोकाधार विष्णुको एक क्षुद्र राक्षस कैसे उठा सकता था ?

जब हनुमान्जीने देखा कि रावण लक्ष्मणजीको ले जाना चाहता है तो उन्होंने अति क्रुद्ध होकर उसकी छातीमें एक वज्र-सदृश घूँसा मारा। उस घूँसेके आघातसे रावण घुटनोंके बल पृथिवीपर गिर पड़ा ॥ १०-१३ ॥ और अपने मुख, नेत्र और कानोंसे बहुत-सा रुधिर वमन करता हुआ घूमती हुई आँखोंसे रथके पिछले भागमें बैठ गया ॥ १४ ॥ तदनन्तर हनुमान्‌जी रावणद्वारा आहत लक्ष्मणजीको अपनी भुजाओंपर उठाकर श्रीरामचन्द्रजी-

सर्ग ६] युद्धकाण्ड २६१

आनयद्रामसामीप्यं बाहुभ्यां परिगृह्य तम् ॥१५॥ हनूमतः सुहृत्त्वेन भक्त्या च परमेश्वरः । लघुत्वमगमद्देवो गुरूणां गुरुरप्यजः ॥१६॥ सा शक्तिरपि तं त्यक्त्वा ज्ञात्वा नारायणांशजम् । रावणस्य रथं प्रागाद्रावणोऽपि शनैस्ततः ॥१७॥ संज्ञामवाप्य जग्राह चापासनमथो रुषा । राममेवाभिदुद्राव दृष्ट्वा रामोऽपि तं क्रुधा ॥१८॥ आरुह्य जगतां नाथो हनूमन्तं महाबलम् । रथस्थं रावणं दृष्ट्वा अभिदुद्राव राघवः ॥१९॥ ज्याशब्दमकरोत्तीव्रं वज्रनिष्पेषनिष्ठुरम् । रामो गम्भीरया वाचा राक्षसेन्द्रमुवाच ह ॥२०॥ राक्षसाधम तिष्ठाद्य क्व गमिष्यसि मे पुरः । कृत्वाऽपराधमेवं मे सर्वत्र समदर्शिनः ॥२१॥ येन बाणेन निहता राक्षसास्ते जनालये । तेनैव त्वां हनिष्यामि तिष्ठाद्य मम गोचरे ॥२२॥

श्रीरामस्य वचः श्रुत्वा रावणो मारुतात्मजम् । वहन्तं राघवं संख्ये शरैस्तीक्ष्णैरताडयत् ॥२३॥ हतस्यापि शरैस्तीक्ष्णैर्वायुसूनोः स्वतेजसा । व्यवधंत पुनस्तेजो ननर्द च महाकपिः ॥२४॥ ततो दृष्ट्वा हनूमन्तं सव्रणं रघूसत्तमः । क्रोधमाहारयामास कालरुद्र इवापरः ॥२५॥ साश्वं रथं ध्वजं सूतं शस्त्राैधं धनुरञ्जसा । छत्रं पताकां तरसा चिच्छेद शितसायकैः ॥२६॥ ततो महाशरेणाशु रावणं रघूसत्तमः । विव्याध वज्रकल्पेन पाकारिरिव पर्वतम् ॥२७॥ रामबाणहतो वीरश्चचाल च मुमोह च ।

के पास ले आये ॥ १५ ॥ हनुमान्‌जीके लिये, उनके सौहार्द और भक्तिभावके कारण वे अजन्मा और प्रकाश-स्वरूप परमेश्वर (लक्ष्मणजी) भारी-से-भारी होनेपर भी अत्यन्त लघु (हल्के) हो गये ॥ १६ ॥ श्रीलक्ष्मण-जीको साक्षात् नारायणका अंश जानकर वह शक्ति भी उन्हें छोड़कर फिर रावणके रथपर चली गयी । इधर, रावणको भी जब धीरे-धीरे कुछ चेत हुआ तो उसने अत्यन्त क्रोधसे अपना धनुष उठाया और रामचन्द्रजीकी ओर दौड़ा । उसे (अपनी ओर आता) देख जगत्पति भगवान् राम अति क्रुद्ध होकर महाबली हनुमान्‌जीके कन्धेपर चढ़े और रावणको रथमें बैठा देख उसकी ओर दौड़े ॥ १७-१९॥ भगवान् रामने अपने धनुषकी प्रत्यञ्चाका ऐसा कठोर शब्द किया जो मानो वज्र-को भी चूर्ण करनेवाला था, और फिर अति गम्भीर वाणीसे राक्षसराज रावणसे ऐसा कहा- ॥ २० ॥ "अरे राक्षसा-धम ! जरा ठहर तो, मुझ सर्वत्र समदर्शीका ऐसा अपराध करके तू कहाँ जा सकता है ? ॥ २१ ॥ अरे ! तू तनिक मेरे सामने खड़ा रह, जिस बाणसे मैंने जन-स्थानमें (खर-दूषणादिसे युद्ध करते समय) तेरे राक्षसोंको मारा था आज उसीसे तुझे भी मार डालूँगा" ॥ २२ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके ये वचन सुनकर रावणने उन्हें वहन करनेवाले हनुमान्‌जीके बड़े तीखे बाण मारे ॥ २३ ॥ किन्तु उन तीक्ष्ण बाणोंके लगनेपर भी पवन-पुत्रका तेज अपने प्रभावसे बराबर बढ़ता ही गया और वे महान् कपीश्वर बड़े जोरसे गर्जने लगे ॥ २४ ॥ जब रघुनाथजीने हनुमान्‌जीको क्षत-विक्षत देखा तो दूसरे कालरुद्रके समान बड़ा भयंकर क्रोध धारण किया ॥ २५ ॥ और अपने तीक्ष्ण बाणोंसे बड़ी फुर्तीके साथ सुगमतासे ही रावणके घोड़ेसहित रथ, ध्वजा, सारथी, शस्त्रसमूह, धनुष, छत्र और पताका आदि काट डाले ॥ २६ ॥ फिर इन्द्रने जैसे पर्वतोंपर आक्रमण किया था वैसे ही उन्होंने एक वज्रतुल्य महाबाणसे रावणको वेध डाला ॥ २७ ॥ भगवान् रामका बाण लगने-से वह वीर विचलित हो गया, उसे मूर्च्छा आ गयी और उसके हाथसे धनुष छूट गया ।

२६२अध्यात्मरामायण[ सर्ग...

हस्तान्निपतितश्चापस्तं समीक्ष्य रघूत्तमः ॥२८॥
अर्धचन्द्रेण चिच्छेद तत्किरीटं रविप्रभम् ।
अनुजानामि गच्छ त्वमिदानीं बाणपीडितः॥२९॥
प्रविश्य लङ्कामाश्वास्य श्वः पश्यसि बलं मम ।

उसकी ऐसी दशा देखकर रघुनाथजीने एक अर्द्धचन्द्राकार बाणसे उसका सूर्यसदृश प्रकाशमान मुकुट काट डाला और कहा—"रावण ! तुम मेरे बाणसे पीड़ित हो; अतः मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, इस समय तुम जाओ ॥२८-२९॥ आज लंकामें जाकर विश्राम करो, फिर कल मेरा पराक्रम देखना।"


रामबाणेन संविद्धो हतदर्पोऽथ रावणः ॥३०॥
महत्या लज्जया युक्तो लङ्कां प्राविशदातुरः ।
रामोऽपि लक्ष्मणं दृष्ट्वा मूर्च्छितं पतितं भुवि ॥३१॥
मानुषत्वमुपाश्रित्य लीलयानुशुशोच ह ।
ततः प्राह हनूमन्तं वत्स जीवय लक्ष्मणम् ॥३२॥
महौषधीः समानीय पूर्ववद्वानरानपि ।
तथेति राघवेणोक्तो जगामाशु महाकपिः ॥३३॥
हनूमान्वायुवेगेन क्षणात्तीर्त्वा महोदधिम् ।
एतस्मिन्नन्तरे चारा रावणाय न्यवेदयन् ॥३४॥

तब, श्रीरामचन्द्रजीके बाणसे विद्ध होनेके कारण सारा दर्प चूर्ण हो जानेपर रावणने लज्जित और व्याकुल हो लंकामें प्रवेश किया। इधर रामचन्द्रजी भी लक्ष्मणजीको मूर्च्छित अवस्थामें पृथिवीपर पड़े देख मनुष्यभावका आश्रय ले लीलासे शोक करने लगे और हनुमान्जीसे बोले—"वत्स ! पहली तरह ही (द्रोणाचलसे) महौषधि लाकर लक्ष्मण और वानरोंको जीवित करो।" रघुनाथजीके इस प्रकार कहनेपर महाकपि हनुमान्जी 'बहुत अच्छा' कह एक क्षणमें ही महासागरको पारकर वायुवेगसे चले। इसी समय रावणके गुप्तचरोंने उससे कहा—॥३०-३४॥


रामेण प्रेषितो देव हनूमान् क्षीरसागरम् ।
गतो नेतुं लक्ष्मणस्य जीवनार्थं महौषधीः ॥३५॥
श्रुत्वा तच्चारवचनं राजा चिन्तापरोऽभवत् ।
जगाम रात्रावेकाकी कालनेमिगृहं क्षणात् ॥३६॥

"स्वामिन् ! रामने हनुमान्को क्षीर-समुद्रपर भेजा है और वह लक्ष्मणको जीवित करनेके लिये महौषधि लेने गया है" ॥३५॥ उनके ये वचन सुनकर राक्षसराज अति चिन्तातुर हुआ और उसी क्षण रात्रिमें ही अकेला कालनेमिके घर गया ॥३६॥


गृहागतं समालोक्य रावणं विस्मयान्वितः ।
कालनेमिरुवाचेदं प्राञ्जलिर्भयविह्वलः ।
अर्घ्यादिकं ततः कृत्वा रावणस्याग्रतः स्थितः॥३७॥
किं ते करोमि राजेन्द्र किमागमनकारणम् ।
कालनेमिमुवाचेदं रावणो दुःखपीडितः ॥३८॥

रावणको घर आया देख कालनेमिको बड़ा आश्चर्य हुआ; वह उसे अर्घ्यादि दे उसके सामने खड़ा हो गया और अति भयभीत हो हाथ जोड़कर बोला ॥३७॥ "राजराजेश्वर ! आज किस निमित्तसे आना हुआ ? कहिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ?" तब रावणने अति दुःखित होकर कालनेमिसे कहा ॥३८॥


ममापि कालवशतः कष्टमेतदुपस्थितम् ।
मया शक्त्या हतो वीरो लक्ष्मणः पतितो भुवि ॥३९॥
तं जीवयितुमानेतुमोषधीर्हनुमान् गतः ।
यथा तस्य भवेद्विघ्नं तथा कुरु महामते ॥४०॥
मायया मुनिवेषेण मोहयस्व महाकपिम् ।
कालात्ययो यथा भूयात्तथा कृत्वैहि मन्दिरे ॥४१॥

"आज कालक्रमसे मुझे भी यह कष्ट उपस्थित हो गया। मेरी शक्तिसे आहत होकर वीर लक्ष्मण पृथिवीपर गिर पड़ा है ॥३९॥ उसे जीवित करनेके लिये हनुमान् ओषधि लेने गया है। हे महामते ! तुम कोई ऐसा उपाय करो जिससे उसके लानेमें विघ्न खड़ा हो जाय ॥४०॥ तुम मायासे मुनि-वेष बनाकर हनुमान्‌को मोहित करो जिससे (उस ओषधिके प्रयोग-का) समय निकल जाय। यह कार्य करके फिर अपने घर लौट आना" ॥४१॥

सर्ग ६ ] युद्धकाण्ड २६३


रावणस्य वचः श्रुत्वा कालनेमिरुवाच तम् ।<br>रावणेश वचो मेऽद्य शृणु धारय तत्त्वतः ॥४२॥रावणके वचन सुनकर कालनेमिने उससे कहा—<br>“महाराज रावण ! मेरी बात सुनिये और उसे यथार्थ समझकर धारण कीजिये॥ ४२॥ मैं आपका प्रिय करूँगा ही,
प्रियं ते करवाण्येव न प्राणान् धारयाम्यहम् ।<br>मारीचस्य यथाऽरण्ये पुराभून्मृगरूपिणः ॥४३॥<br>तथैव मे न सन्देहो भविष्यति दशानन ।<br>हताः पुत्राश्च पौत्राश्च बान्धवा राक्षसाश्च ते ॥४४॥उसके लिये मैं अपने प्राणोंकी परवा नहीं करता, (तथापि उससे क्या लाभ होगा ? ) हे दशानन ! इसमें सन्देह नहीं जो कुछ दण्डकारण्यमें मृगरूपधारी मारीचका हुआ था वही दशा मेरी भी होगी । देखिये, आपके पुत्र, पौत्र और अनेकों सगे-सम्बन्धी राक्षसलोग मारे गये ॥ ४३-४४॥ इस प्रकार राक्षस-
घातयित्वाऽसुरकुलं जीवितेनापि किं तव ।<br>राज्येन वा सीतया वा किं देहेन जडात्मना ॥४५॥वंशका नाश कराकर आपके जीवन, राज्य, सीता अथवा इस जड देहसे भी क्या लाभ है ? ॥ ४५ ॥ हे
सीतां प्रयच्छ रामाय राज्यं देहि विभीषणे ।<br>वनं याहि महाबाहो रम्यं मुनिगणाश्रयम् ॥४६॥महाबाहो ! आप रामचन्द्रजीको सीता और विभीषणको राज्य देकर मुनिगणसेवित सुरम्य तपोवनको जाइये
स्नात्वा प्रातः शुभजले कृत्वा सन्ध्यादिकाः क्रियाः॥ ४६ ॥ वहाँ प्रातःकाल शुद्ध जलमें स्नान कर तथा सन्ध्योपासनादि नित्य-कर्मोंसे निवृत्त हो एकान्त देशमें
तत एकान्तमाश्रित्य सुखासनपरिग्रहः ॥४७॥सुखमय आसनसे बैठिये ॥ ४७॥ और सब ओरसे
विसृज्य सर्वतः सङ्गामितरान्विषयान्वहिः ।<br>बहिःप्रवृत्ताक्षगणं शनैः प्रत्यक् प्रवाहय ॥४८॥निःसंग हो बाह्य विषयोंको छोड़ अपनी बाह्य वृत्तिवाली इन्द्रियोंको धीरे-धीरे अन्तर्मुख कीजिये ॥ ४८ ॥ हे
प्रकृतेर्भिन्नमात्मानं विचारय सदाऽनघ ।<br>चराचरं जगत्कृत्स्नं देहबुद्धीन्द्रियादिकम् ॥४९॥अनघ ! अपने आत्माको सदा प्रकृतिसे भिन्न विचारिये। देह, बुद्धि और इन्द्रियादिसे युक्त सम्पूर्ण चराचर जगत् अर्थात् ब्रह्मासे लेकर स्तम्ब ( कीटविशेष ) पर्यन्त जो
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं दृश्यते श्रूयते च यत् ।<br>सैषा प्रकृतिरित्युक्ता सैव मायेति कीर्तिता ॥५०॥कुछ दिखायी या सुनायी देता है वह सब प्रकृति है और वही माया भी कहलाती है ॥ ४९-५० ॥ वही
सर्गस्थितिविनाशानां जगद्वृक्षस्य कारणम् ।<br>लोहितश्वेतकृष्णादि प्रजाः सृजति सर्वदा ॥५१॥सर्वदा संसार-रूपी वृक्षकी उत्पत्ति, स्थिति और विनाशकी कारणरूप श्वेत (सात्त्विक) लोहित (राजस) और कृष्णवर्ण ( तामस ) प्रजा उत्पन्न करती है ॥५१ ॥
कामक्रोधादिपुत्रांश्चाहिंसातृष्णादिकन्यकाः ।<br>मोहयन्त्यनिशं देवमात्मानं स्वैर्गुणैर्विभुम् ॥५२॥तथा वही अपने गुणोंसे अहर्निश सर्वव्यापक आत्मदेवको मोहित कर काम-क्रोधादि पुत्रों और हिंसा-तृष्णादि कन्याओंको उत्पन्न करती है ॥ ५२॥ वह कर्तृत्व
कर्तृत्वभोक्तृत्वसुखान् स्वगुणानात्मनीश्वरे ।<br>आरोप्य स्ववशं कृत्वा तेन क्रीडति सर्वदा ॥५३॥और भोक्तृत्व आदि अपने गुणोंको अपने प्रभु आत्मामें आरोपित कर उसे अपने वशीभूत कर उससे सदा खेलती रहती है ॥ ५३ ॥ जिससे युक्त होकर
शुद्धोऽप्यात्मा यया युक्तः पश्यतीव सदा बहिः ।<br>विस्मृत्य च स्वमात्मानं मायागुणविमोहितः ॥५४॥आत्मा मायिक गुणोंसे मोहित होकर अपने स्वरूपको भूल जाता है, और नित्य-शुद्ध होता हुआ भी सदा बाह्य विषयोंको देखने लगता है ॥ ५४ ॥ जिस समय
यदा सद्गुरुणा युक्तो बोध्यते बोधरूपिणा ।सद्गुरुका साक्षात्कार होता है और वे इसे निर्मल ज्ञानदृष्टिसे जागृत करते हैं उस समय यह् बाह्य विषयों-
२६४अध्यात्मरामायण[सर्गः ६]

[संस्कृत श्लोक]

निवृत्तदृष्टिरात्मानं पश्यत्येव सदा स्फुटम् ॥५५॥
जीवन्मुक्तः सदा देही मुच्यते प्राकृतैर्गुणैः ।

त्वमप्येवं सदात्मानं विचार्य नियतेन्द्रियः ॥५६॥
प्रकृतेरन्यमात्मानं ज्ञात्वा मुक्तो भविष्यसि ।
ध्यातुं यद्यसमर्थोऽसि सगुणं देवमाश्रय ॥५७॥
हृत्पद्मकर्णिके स्वर्णपीठे मणिगणान्विते ।
मृदुश्लक्ष्णतरे तत्र जानक्या सह संस्थितम् ॥५८॥
वीरासनं विशालाक्षं विद्युत्पुञ्जप्रभाम्बरम् ।
किरीटहारकेयूरकौस्तुभादिभिरन्वितम् ॥५९॥
नूपुरैः कटकैर्भाान्तं तथैव वनमालया ।
लक्ष्मणेन धनुर्द्वन्द्वकरेण परिसेवितम् ॥६०॥
एवं ध्यात्वा सदाऽऽत्मानं रामं सर्वहृदि स्थितम् ।
भक्त्या परमया युक्तो मुच्यते नात्र संशयः ॥६१॥
शृणु वै चरितं तस्य भक्तैर्नित्यमनन्यधीः ।
एवं चेत्कृतपूर्वाणि पापानि च महान्त्यपि ।
क्षणादेव विनश्यन्ति यथाऽग्नेस्तूलराशयः ॥६२॥
भजस्व रामं परिपूर्णमेकं
विहाय वैरं निजभक्तियुक्तः ।
हृदा सदा भावितभावरूप-
मनामरूपं पुरुषं पुराणम् ॥६३॥


[हिन्दी अनुवाद]

से अपनी दृष्टि हटाकर अपने आपको ही स्पष्ट देखता है ॥५५॥ और फिर यह देहधारी जीव जीवन्मुक्त होकर प्राकृत गुणोंसे छूट जाता है ।

हे रावण ! आप भी संयतेन्द्रिय होकर इसी प्रकार अपने वास्तविक आत्मस्वरूपका चिन्तन कीजिये ॥५६॥ इससे आत्माको प्रकृतिसे भिन्न जानकर आप मुक्त हो जायँगे । और यदि आप इस प्रकार ध्यान करनेमें असमर्थ हों तो सगुण भगवान्‌का आश्रय लीजिये ॥५७॥ (उस सगुण ध्यानकी विधि इस प्रकार है) हृदयकमलकी कर्णिकाओंगें मणिगणजटित अति मृदुल और स्वच्छ सुवर्ण-सिंहासनपर जो जानकीजीसहित विराजमान हैं, जो वीरासनसे बैठे हैं, जिनके नेत्र अति विशाल और वस्त्र विद्युल्लताके समान तेजोमय हैं तथा जो किरीट, हार, केयूर और कौस्तुभमणि आदि आभूषणोंसे सुशोभित हैं; नूपुर, कटक और वनमाला आदिसे जिनकी अपूर्व शोभा हो रही है तथा लक्ष्मणजी अपने हाथोंमें दो धनुष (एक अपना और एक प्रभु रामका) लिये जिनकी सेवामें खड़े हैं, उन सबके हृदयमें विराजमान अपने आत्मारूप भगवान् रामका इस प्रकार सर्वदा अत्यन्त भक्तिपूर्वक ध्यान करनेसे आप मुक्त हो जायँगे—इसमें सन्देह नहीं ॥५८-६१॥ नित्य अनन्यबुद्धि होकर उनके भक्तोंके मुखारविन्दसे उनके पवित्र चरित्र सुनिये । ऐसा करनेसे आपके पूर्वकृत महान् पाप भी एक क्षणमें ही इस प्रकार भस्म हो जायँगे जैसे अग्निसे रूईका ढेर भस्म हो जाता है ॥६२॥ जो सर्वत्र परिपूर्ण हैं उन अद्वितीय भगवान् रामके साथ वैर छोड़कर आत्मप्रेम-पूर्वक उन नामरूपरहित पुराणपुरुषकी हृदयमें सगुण-भावसे भावना कर उनका सर्वदा भजन कीजिये”॥६३॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
युद्धकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥

युद्धकाण्ड - सर्ग ७: कालनेमिका कपट, लक्ष्मणजीका सचेत होना और कुम्भकर्णको जगाना

सर्ग ७ ] युद्धकाण्ड २६५


सप्तम सर्ग

कालनेमिका कपट, हनुमान्जीद्वारा उसका वध, लक्ष्मणजीका सचेत होना और रावणका कुम्भकर्णको जगाना।

श्रीमहादेव उवाचश्रीमहादेवजी बोले—
कालनेमिवचः श्रुत्वा रावणोऽमृतसन्निभम् ।<br>जज्वाल क्रोधताम्राक्षः सर्पिरद्भिरिवाग्निमान् ॥ १ ॥हे पार्वति ! जैसे अग्निसे तपाया हुआ घृत जल डालनेसे छुनछुनाने लगता है वैसे ही कालनेमिके ये अमृततुल्य वचन सुनकर रावण जल उठा और क्रोधसे उसके नेत्र लाल हो गये ॥१॥
निहन्मि त्वां दुरात्मानं मच्छासनपराङ्मुखम् ।<br>परैः किञ्चिद्गृहीत्वा त्वं भाषसे रामकिंकरः ॥ २ ॥वह कहने लगा— "अरे ! मालूम होता है तू शत्रुसे कुछ लेकर ही इस प्रकार रामके दासकी भाँति बातें बनाता है। याद रख, मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन करनेवाले तुझ दुष्ट-को मैं अभी मार डालूँगा" ॥२॥
कालनेमिरुवाचेदं रावणं देव किं क्रुधा।<br>न रोचते मे वचनं यदि गत्वा करोमि तत् ॥ ३ ॥तब कालनेमिने रावण-से कहा— "देव ! क्रोधकी क्या बात है ? यदि आपको मेरा कथन अच्छा नहीं लगता तो मैं अभी जाकर (आप जैसा कहते हैं) वही करता हूँ" ॥ ३ ॥
इत्युक्त्वा प्रययौ शीघ्रं कालनेमिर्महासुरः ।<br>नोदितो रावणेनैव हनूमद्विघ्नकारणात् ॥ ४ ॥इतना कह महादैत्य कालनेमि रावणकी ही प्रेरणासे हनुमान्जीके कार्यमें विघ्न करनेके लिये वहाँसे तुरन्त चल दिया ॥ ४ ॥
स गत्वा हिमवत्पार्श्वं तपोवनमकल्पयत् ।<br>तत्र शिष्यैः परिवृतो मुनिवेषधरः खलः ॥ ५ ॥<br>गच्छतो मार्गमासाद्य वायुसूनोर्महात्मनः ।उसने हिमालयकी तराईमें पहुँचकर उधरसे जाते हुए वायुपुत्र महात्मा हनुमान्‌के मार्गमें एक तपोवन बनाया और वहाँ वह दुष्ट स्वयं मुनिवेष बनाकर शिष्यवर्गसे घिरकर बैठ गया ।
ततो गत्वा ददर्शाथ हनूमाना श्रमं शुभम् ॥ ६ ॥<br>चिन्तयामास मनसा श्रीमान्पवननन्दनः ।जिस समय हनुमान्जी वहाँ पहुँचे तो उन्होंने वह सुन्दर आश्रम देखा ॥५-६॥ उसे देखकर श्रीमान् पवन-नन्दन मन-ही-मन सोचने लगे,
पुरा न दृष्टमेतन्मे मुनिमण्डलमुत्तमम् ॥ ७ ॥<br>मार्गो विभ्रंशितो वा मे भ्रमो वा चित्तसम्भवः ।'मैंने पहले तो यह उत्तम मुनिमण्डल देखा नहीं था ॥ ७ ॥ क्या मैं मार्ग भूल गया हूँ, या मेरे चित्तमें कोई भ्रम हो गया है ?
यद्वाऽऽविश्याश्रमपदं दृष्ट्वा मुनिमशेषतः ॥ ८ ॥<br>पीत्वा जलं ततो यामि द्रोणाचलमनुत्तमम् ।<br>इत्युक्त्वा प्रविवेशाथ सर्वतो योजनायतम् ॥ ९ ॥<br>आश्रमं कदलीशालखर्जूरपनसादिभिः ।<br>समावृतं पक्वफलैर्नम्रशाखैश्च पादपैः ॥ १० ॥अथवा चलो, इस आश्रममें चलकर सब मुनीश्वरों-का दर्शन करूँ और जल पीऊँ, तदुपरान्त पर्वतश्रेष्ठ द्रोणाचलपर चलूँगा।' ऐसा विचार वे उस आश्रममें गये, वह सब ओरसे एक योजन विस्तारवाला था तथा उसमें सब ओर, पके हुए फलोंसे जिनकी शाखाएँ झुकी हुई हैं ऐसे कदली, शाल, खजूर और कटहल आदिके वृक्ष लगे हुए थे ॥ ८-१० ॥
वैरभावविनिर्मुक्तं शुद्धं निर्मललक्षणम् ।<br>तस्मिन्महाश्रमे रम्ये कालनेमिः स राक्षसः ॥ ११ ॥वह शुद्ध और निर्मल आश्रम वैरभावसे सर्वथा रहित था। उस अति सुरम्य महाश्रममें राक्षस कालनेमि इन्द्रजाल विद्याका आश्रय कर शिवजीका

३४

२६६अध्यात्मरामायण[ सर्ग ७

इन्द्रयोगं समास्थाय चकार शिवपूजनम् ।
हनूमानभिवाद्याह गौरवेण महासुरम् ॥१२॥

भगवन् रामदूतोऽहं हनूमान्नाम नामतः ।
रामकार्येण महता क्षीराब्धिं गन्तुमुद्यतः ॥१३॥

तृषा मां बाधते ब्रह्मन्नुदकं कुत्र विद्यते ।
यथेच्छं पातुमिच्छामि कथ्यतां मे मुनीश्वर ॥१४॥

तच्छ्रुत्वा मारुतेर्वाक्यं कालनेमिस्तमब्रवीत् ।
कमण्डलुगतं तोयं मम त्वं पातुमर्हसि ॥१५॥

भुङ्क्ष्व चेमानि पक्वानि फलानि तदनन्तरम् ।
निवसस्व सुखेनारत्र निद्रामेहि त्वरास्तु मा ॥१६॥

भूतं भव्यं भविष्यं च जानामि तपसा स्वयम् ।
उत्थितो लक्ष्मणः सर्वे वानरा रामवीक्षिताः ॥१७॥

तच्छ्रुत्वा हनुमानाह कमण्डलुजलेन मे ।
न शाम्यत्यधिका तृष्णा ततो दर्शय मे जलम् ॥१८॥

तथेत्याज्ञापयामास वटुं मायाविकल्पितम् ।
वटो दर्शय विस्तीर्णं वायुसूनोर्जलाशयम् ॥१९॥

निमील्य चाक्षिणी तोयं पीत्वाऽऽगच्छ ममान्तिकम्।
उपदेक्ष्यामि ते मन्त्रं येन द्रक्ष्यसि चौषधीः ॥२०॥

तथेति दर्शितं शीघ्रं वटुना सलिलाशयम् ।
प्रविश्य हनुमांस्तोयमपिबन्मीलितेक्षणः ॥२१॥

ततश्चागत्य मकरी महामाया महाकपिम् ।
अग्रसत्तं महावेगान्मार्कति घोररूपिणी ॥२२॥

ततो ददर्श हनुमान् ग्रसन्तीं मकरीं रुषा ।
दारयामास हस्ताभ्यां वदनं सा ममार ह ॥२३॥

ततोऽन्तरिक्षे ददृशे दिव्यरूपधराङ्गना ।
धान्यमालीति विख्याता हनूमन्तमथाब्रवीत् ॥२४॥

पूजन कर रहा था । हनुमान्‌जीने उस महादैत्यको बड़े गौरवसे नमस्कार कर कहा—॥११-१२॥
"भगवन् ! मैं भगवान् रामका दूत हूँ, मेरा नाम हनुमान् है और मैं श्रीरामचन्द्रजीके एक महान् कार्यसे क्षीर-सागरको जा रहा हूँ ॥१३॥ ब्रह्मन् ! मुझे बहुत प्यास लगी हुई है, मैं खूब जल पीना चाहता हूँ। हे मुनीश्वर ! कृपया बतलाइये यहाँ जल कहाँ है ?" ॥१४॥

हनुमान्‌जीके ये वचन सुनकर कालनेमिने कहा—
"तुम मेरे कमण्डलुका जल पी सकते हो ॥१५॥ यहाँ ये फल मौजूद हैं, इन्हें खाओ और फिर सुखपूर्वक यहाँ विश्राम लेकर कुछ सो लो, ऐसी जल्दी मत करो ॥१६॥ मैं अपने तपोबलसे भूत, भविष्यत् और वर्तमान तीनों कालोंकी बात जानता हूँ। इस समय रामचन्द्रजीके देखनेसे ही लक्ष्मणजी और समस्त वानर-गण सचेत होकर उठ बैठे हैं" ॥१७॥ यह सुनकर हनुमान्‌जीने कहा— "मुझे बड़े जोरकी प्यास लगी हुई है, इस कमण्डलुके जलसे वह शान्त नहीं हो सकती, अतः मुझे जलाशय ही दिखला दीजिये" ॥१८॥

तब 'अच्छी बात है' ऐसा कहकर उसने एक माया-कल्पित ब्रह्मचारीको आज्ञा दी, "ब्रह्मचारिन् ! हनुमान्‌जी-को वह विस्तृत जलाशय दिखला दो" ॥१९॥ (फिर हनुमान्‌जीसे बोला—) "देखो, तुम आँखें मूँदकर जल पीना और फिर तुरन्त मेरे पास चले आना । मैं तुम्हें एक मन्त्रका उपदेश करूँगा, जिससे तुम ओषधिको देख सकोगे" ॥२०॥

तब वटुने 'जो आज्ञा' कह तुरन्त ही जलाशय दिखला दिया। उसमें घुसकर हनुमान्‌जी आँख मूँदकर जल पीने लगे ॥२१॥ इतनेहीमें वहाँ एक महामायाविनी घोररूपिणी मकरी आकर बड़ी शीघ्रतासे महाकपि हनुमान्‌जीको निगलने लगी ॥२२॥ हनुमान्‌जीने उस मकरीको अपनेको निगलते देख अति क्रुद्ध अपने हाथोंसे उसका मुख फाड़ डाला, जिससे तत्काल मर गयी ॥२३॥

इसी समय आकाशमें एक दिव्यरूप स्त्री दिखलायी दी, उसका नाम धान्य-

सर्ग ७ ] युद्धकाण्ड २६९


त्वत्प्रसादादहं शापाद्विमुक्तास्मि कपीश्वर ।
शप्ताऽहं मुनिना पूर्वमप्सरा कारणान्तरे ॥२५॥

आश्रमे यस्तु ते दृष्टः कालनेमिर्महासुरः ।
रावणप्रहितो मार्गे विघ्नं कर्तुं तवानघ ॥२६॥

मुनिवेषधरो नासौ मुनिर्विप्रविहिंसकः ।
जहि दुष्टं गच्छ शीघ्रं द्रोणाचलमनुत्तमम् ॥२७॥

गच्छाम्यहं ब्रह्मलोकं त्वत्स्पर्शाद्धतकल्मषा ।
इत्युक्त्वा सा ययौ स्वर्गं हनूमानप्यथाश्रमम् ॥२८॥

आगतं तं समालोक्य कालनेमिरभाषत ।
किं विलम्बेन महता तव वानरसत्तम ॥२९॥

गृहाण मत्तो मन्त्रांस्त्वं देहि मे गुरुदक्षिणाम् ।
इत्युक्तो हनुमान्मुष्टिं दृढं बद्ध्वाऽऽह राक्षसम् ॥३०॥

गृहाण दक्षिणामेतामित्युक्त्वा निजघान तम् ।
विसृज्य मुनिवेषं स कालनेमिर्महासुरः ॥३१॥

युयुधे वायुपुत्रेण नानामायाविधानतः ।
महामायिकदूतोऽसौ हनूमान्मायिनां रिपुः ॥३२॥

जघान मुष्टिना शीर्ष्णि भग्नमूर्धा ममार सः ।
ततः क्षीरनिधिं गत्वा दृष्ट्वा द्रोणं महागिरिम् ॥३३॥

अदृष्ट्वा चौषधीस्तत्र गिरिमुत्पाट्य सत्वरः ।
गृहीत्वा वायुवेगेन गत्वा रामस्य सन्निधिम् ॥३४॥

उवाच हनुमान् राममानीतोऽयं महागिरिः ।
यद्युक्तं कुरु देवेश विलम्बो नात्र युज्यते ॥३५॥

श्रुत्वा हनूमतो वाक्यं रामः सन्तुष्टमानसः ।
गृहीत्वा चौषधीः शीघ्रं सुषेणेन महामतिः ॥३६॥


हनूमान्‌जीसे बोली—॥२४॥ “हे कपीश्वर ! आपकी कृपासे मैं आज शाप-मुक्त हो गयी। पहले मैं एक अप्सरा थी। किसी कारणवश मुझे एक मुनीश्वरने शाप दिया था। (इसीसे मैं मकरी हो गयी थी) ॥२५॥ इस आश्रममें आपने जिस पुरुषको देखा है वह कालनेमि नामक महादैत्य है। हे अनघ ! इसे रावणने आपके मार्गमें विघ्न डालनेके लिये भेजा है ॥२६॥ यह मुनिवेष धारण करनेवाला वस्तुतः कोई मुनि नहीं है, बल्कि ब्राह्मणोंकी हिंसा करनेवाला है। इस दुष्टको शीघ्र ही मारकर आप पर्वतश्रेष्ठ द्रोणाचलको जाइये ॥२७॥ मैं आपके स्पर्शसे निष्पाप होकर अब ब्रह्मलोकको जाती हूँ।” ऐसा कह वह स्वर्गलोकको चली गयी और हनुमान्‌जी भी आश्रमको चले ॥२८॥

हनूमान्‌जीको आये देख कालनेमिने कहा—"हे वानरश्रेष्ठ ! अब बहुत विलम्ब करनेसे तुम्हें क्या लाभ है? ॥२९॥ लो, मुझसे मन्त्र ग्रहण करो और मुझे गुरुदक्षिणा दो।” उसके इस प्रकार कहनेपर हनुमान्‌जीने अपनी मुट्ठी कसकर बाँधी और उस राक्षससे कहा—॥३०॥ “लो दक्षिणा तो यह लो”—ऐसा कह उसके एक मुक्का मारा। उसके लगते ही महादैत्य कालनेमि मुनिवेष त्यागकर नाना प्रकारकी मायाओंसे पवनपुत्रके साथ लड़ने लगा। किन्तु हनुमान्‌जी तो महामायावी (मायापति भगवान् राम) के दूत और इन तुच्छ मायावी राक्षसोंके शत्रु थे, (उनपर इन तुच्छ मायाओंका क्या प्रभाव हो सकता था?) ॥३१-३२॥ उन्होंने उसके शिरमें एक मुक्का मारा जिससे मस्तक फट जानेके कारण वह तुरन्त मर गया।

तदनन्तर वे क्षीर-समुद्रपर पहुँचे और महापर्वत द्रोणाचलको देखा। किन्तु उन्हें वह ओषधि न मिली। अतः फौरन ही उस पर्वतको उखाड़ लिया और उसे वायुवेगसे रामचन्द्रजीके पास ले जाकर उनसे कहा—"हे देवेश्वर ! मैं इस महापर्वतको ले आया हूँ। आप जो उचित समझें शीघ्र ही करें, इस कार्यमें विलम्ब करना ठीक नहीं है” ॥३३-३५॥

हनूमान्‌जीका यह वचन सुनकर भगवान् राम अति प्रसन्न हुए और उन महामति प्रभुने तुरन्त ही

२६८अध्यात्मरामायण[ सर्ग ७

चिकित्सां कारयामास लक्ष्मणाय महात्मने ।
ततः सुप्तोत्थित इव बुद्ध्वा प्रोवाच लक्ष्मणः ॥३७॥
तिष्ठ तिष्ठ क्व गन्तासि हन्मीदानीं दशानन ।
इति ब्रुवन्तमालोक्य मूर्ध्न्यवघ्राय राघवः ॥३८॥
मारुतिं प्राह वत्साद्य त्वत्प्रसादान्महाकपे ।
निरामयं प्रपश्यामि लक्ष्मणं भ्रातरं मम ॥३९॥
इत्युक्त्वा वानरैः सार्धं सुग्रीवेण समन्वितः ।
विभीषणमतेनैव युद्धाय समवस्थितः ॥४०॥
पाषाणैः पादपैश्चैव पर्वताग्रैश्च वानराः ।
युद्धायाभिमुखा भूत्वा ययुः सर्वे युयुत्सवः ॥४१॥

रावणो विव्यथे रामवाणैर्विद्धो महासुरः ।
मातङ्ग इव सिंहेन गरुडेनेव पन्नगः ॥४२॥
अभिभूतोऽगमद्राजा राघवेण महात्मना ।
सिंहासने समाविश्य राक्षसानिदमब्रवीत् ॥४३॥
मानुषेणैव मे मृत्युमाह पूर्वं पितामहः ।
मानुषो हि न मां हन्तुं शक्तोऽस्ति भुवि कश्चन ॥४४॥
ततो नारायणः साक्षान्मानुषोऽभून्न संशयः ।
रामो दाशरथिर्भूत्वा मां हन्तुं समुपस्थितः ॥४५॥
अनरण्येन यत्पूर्वं शप्तोऽहं राक्षसेश्वर ।
उत्पत्स्यते च मद्बंशे परमात्मा सनातनः ॥४६॥
तेन त्वं पुत्रपौत्रैश्च बान्धवैश्च समन्वितः ।
हनिष्यसे न सन्देह इत्युक्त्वा मां दिवं गतः ॥४७॥
स एव रामः संजातो मदर्थे मां हनिष्यति ।
कुम्भकर्णस्तु मूढात्मा सदा निद्रावशं गतः ॥४८॥
तं विबोध्य महासत्त्वमानयन्तु समान्तिकम् ।
इत्युक्तास्ते महाकायास्तूर्णं गत्वा तु यत्नतः ॥४९॥


उस पर्वतसे ओषधि लेकर सुषेणसे महात्मा लक्ष्मणकी चिकित्सा करायी। तब नींदसे उठे हुएके समान लक्ष्मणजीने सचेत होकर कहा—॥३६-३७॥ "अरे दुष्ट दशानन ! खड़ा रह, खड़ा रह, तू जायगा कहाँ ? मैं तुझे अभी मारे डालता हूँ।" उन्हें इस प्रकार कहते देख रघुनाथजीने उनका शिर सूँघकर हनुमान्जीसे कहा—"हे वत्स ! हे महाकपे ! आज तुम्हारी कृपासे ही मैं अपने भाई लक्ष्मणको सकुशल देख रहा हूँ" ॥३८-३९॥ हनुमान्जीसे इस प्रकार कह श्रीरामचन्द्रजी सुग्रीव और अन्यान्य वानरोंके साथ विभीषणकी सम्मतिसे युद्धकी तैयारी करने लगे ॥४०॥ तब युद्धके लिये अत्यन्त उत्सुक समस्त वानरगण पाषाण, वृक्ष और पर्वतशिखर आदि लेकर लड़नेके लिये चले ॥४१॥

इधर, भगवान् रामके बाणोंसे विद्ध होकर महाराक्षस रावण ऐसा व्याकुल हो रहा था जैसे सिंहसे हाथी और गरुडसे सर्प हो जाता है। अतः वह राक्षसराज महात्मा रामसे परास्त होकर लंकापुरीमें गया और अपने राजसिंहासनपर बैठकर राक्षसोंसे इस प्रकार कहने लगा—॥४२-४३॥ "पूर्वकालमें पितामह ब्रह्माजीने मेरी मृत्यु मनुष्यके ही हाथसे बतलायी थी, किन्तु संसारमें ऐसा कोई मनुष्य नहीं है जो मुझे मार सके ॥४४॥ अतः इसमें सन्देह नहीं साक्षात् नारायणहीने मनुष्यका अवतार लिया है और वे दशरथकुमार राम होकर मुझे मारनेके लिये आये हैं ॥४५॥ पूर्वकालमें मुझे जो अनरण्यने शाप दिया था कि 'हे राक्षसराज ! मेरे वंशमें सनातन पुरुष परमात्मा अवतार लेंगे और उन्हींके हाथसे तुम निःसन्देह अपने पुत्र, पौत्र और बान्धवोंके सहित मारे जाओगे' और ऐसा कहकर वह स्वर्गको चला गया था, सो उन्हीं रामने मेरेलिये अवतार लिया है और ये मुझे अवश्य मारेंगे। हमारा भाई कुम्भकर्ण तो बड़ा ही मूढ़ है, वह सदा ही निद्राके वशीभूत रहता है ॥४६-४८॥ तुम उस महावीरको जगाकर मेरे पास ले आओ।" रावणके इस प्रकार कहनेपर वे महाकाय राक्षसगण तुरन्त ही गये और प्रयत्नपूर्वक कुम्भकर्णको जगाकर