अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
सर्ग ५ ] उत्तरकाण्ड ३५३
मूल संस्कृत श्लोक एवं हिन्दी अनुवाद
ननु क्रिया वेदमुखेन चोदिता
तथैव विद्या पुरुषार्थसाधनम् ।
कर्तव्यता प्राणभृतः प्रचोदिता
विद्यासहायत्वमुपैति सा पुनः ॥ ११ ॥
अकर्मकृतौ दोषमपि श्रुतिर्जगौ
तस्मात्सदा कार्यमिदं मुमुक्षुणा ।
ननु स्वतन्त्रा ध्रुवकार्यकारिणी
विद्या न किञ्चिन्मनसाऽप्यपेक्षते ॥ १२ ॥
न सत्यकार्योऽपि हि यद्वदध्वरः
प्रकाङ्क्षतेऽन्यानपि कारकादिकान् ।
तथैव विद्या विधिभिः प्रकाशितै-
र्विशिष्यते कर्मभिरेव मुक्तये ॥ १३ ॥
हिन्दी अनुवाद:
कुछ वितर्कवादी ऐसा कहते हैं कि—जिसप्रकार वेदके कथनानुसार ज्ञान पुरुषार्थका साधक है वैसे ही कर्म वेदविहित हैं; और प्राणियोंके लिये कर्मोंकी अवश्य-कर्त्तव्यताका विधान भी है, इसलिये वे कर्म-ज्ञानके सहकारी हो जाते हैं। साथ ही श्रुतिने कर्म न करनेमें दोष भी बतलाया है; इसलिये मुमुक्षु-को कर्म सदा ही करते रहना चाहिये, और यदि कोई कहे कि ज्ञान स्वतन्त्र है एवं निश्चय ही अपना फल देनेवाला है, उसे मनसे भी किसी औरकी सहायता-की आवश्यकता नहीं है, तो उसका यह कहना ठीक नहीं क्योंकि जिसप्रकार (वेदोक्त) यज्ञ सत्य कर्म होनेपर भी अन्य कारकादिकी अपेक्षा करता ही है, उसी प्रकार विधिसे प्रकाशित कर्मोंके द्वारा ही ज्ञान मुक्तिका साधक हो सकता है (अतः कर्मोंका त्याग उचित नहीं है) ॥ ११–१३ ॥
केचिद्वदन्तीति वितर्कवादिन-
स्तदप्यसद्दृष्टविरोधकारणात् ।
देहाभिमानादभिवर्धते क्रिया
विद्या गताऽहङ्कृतितः प्रसिद्धयति ॥ १४ ॥
हिन्दी अनुवाद:
(सिद्धान्ती--) ऐसा जो कोई कुतर्की कहते हैं उनके कथनमें प्रत्यक्ष विरोध होनेके कारण वह ठीक नहीं है, क्योंकि कर्म देहाभिमानसे होता है और ज्ञान अहंकारके नाश होनेपर सिद्ध होता है ॥ १४ ॥
विशुद्धविज्ञानविरोचनाञ्चिता
विद्याऽऽत्मवृत्तिश्चरमेति भण्यते ।
उदेति कर्माखिलकारकादिभि-
र्निहन्ति विद्याऽखिलकारकादिकम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अनुवाद:
(वेदान्त-वाक्योंका विचार करते-करते) विशुद्ध विज्ञानके प्रकाशसे उद्भासित जो चरम आत्मवृत्ति होती है उसीका नाम विद्या (आत्मज्ञान) है। इसके अतिरिक्त कर्म सम्पूर्ण कारकादिकी सहायतासे होता है किन्तु विद्या समस्त कारकादिका (अनित्यत्वकी भावनाद्वारा) नाश कर देती है ॥ १५ ॥
तस्मात्त्यजेत्कार्यमशेषतः सुधी-
र्विद्याविरोधान्न समुच्चयो भवेत् ।
आत्मानुसन्धानपरायणः सदा
निवृत्तसर्वेन्द्रियवृत्तिगोचरः ॥ १६ ॥
हिन्दी अनुवाद:
इसलिये समस्त इन्द्रियोंके विषयोंसे निवृत्त होकर निरन्तर आत्मानुसन्धानमें लगा हुआ बुद्धिमान् पुरुष सम्पूर्ण कर्मोंका सर्वथा त्याग कर दे। क्योंकि विद्याका विरोधी होनेके कारण कर्मका उसके साथ समुच्चय नहीं हो सकता ॥ १६ ॥
यावच्छरीरादिषु माययाऽऽत्मधी-
स्तावद्विधेयो विधिवাদকर्मणाम् ।
नेतीति वाक्यैरखिलं निषिध्य त-
ज्ज्ञात्वा परात्मानमथ त्यजेत्क्रियाः ॥ १७ ॥
हिन्दी अनुवाद:
जबतक मायासे मोहित रहनेके कारण मनुष्यका शरीरादिमें आत्मभाव है तभीतक उसे वैदिक कर्मानुष्ठान कर्त्तव्य है। 'नेति-नेति' आदि वाक्योंसे सम्पूर्ण अनात्म-वस्तुओंका निषेध करके अपने परमात्मस्वरूपको जान लेनेपर फिर उसे समस्त कर्मोंको छोड़ देना चाहिये॥ १७ ॥
यदा परात्मात्मविभेदभेदकं
विज्ञानमात्मन्यवभाति भास्वरम् ।
हिन्दी अनुवाद:
जिस समय परमात्मा और जीवात्माके भेदको दूर करने-वाला प्रकाशमय विज्ञान अन्तःकरणमें स्पष्टतया भासित...
उत्तरकाण्ड - सर्ग ५: रामगीता
| ३५४ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ५ |
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तदैव माया प्रविलीयतेऽञ्जसा<br>सकारका कारणमात्मसंसृतेः ॥१८॥<br>श्रुतिप्रमाणाभिविनाशिता च सा<br>कथं भविष्यत्यपि कार्यकारिणी ।<br>विज्ञानमात्रादमलाद्वितीयरू-<br>स्तस्मादविद्या न पुनर्भाविष्यति ॥१९॥<br>यदि स्म नष्टा न पुनः प्रसूयते<br>कर्ताऽहमस्येति मतिः कथं भवेत् ।<br>तस्मात्स्वतन्त्रा न किमप्यपेक्षते<br>विद्या विमोक्षाय विभाति केवला ॥२०॥<br>सा तैत्तिरीयश्रुतिराह सादरं<br>न्यासं प्रशस्ताखिलकर्मणां स्फुटम् ।<br>एतावदित्याह च वाजिनां श्रुति-<br>र्ज्ञानं विमोक्षाय न कर्म साधनम् ॥२१॥<br>विद्यासमत्वेन तु दर्शितस्त्वया<br>क्रतुर्न दृष्टान्त उदाहृतः समः ।<br>फलैः पृथक्त्वाद्वहुकारकैः क्रतुः<br>संसाध्यते ज्ञानमतो विपर्ययम् ॥२२॥<br>सप्रत्यवायो ह्यहमित्यनात्मधी-<br>रज्ञप्रसिद्धा न तु तत्त्वदर्शिनः ।<br>तस्माद्बुधैस्त्याज्यमविक्रियात्मभि-<br>र्विधानतः कर्म विधिप्रकाशितम् ॥२३॥<br>श्रद्धान्वितस्तत्त्वमसीति वाक्यतो<br>गुरोः प्रसादादपि शुद्धमानसः ।<br>विज्ञाय चैकात्म्यमथात्मजीवयोः<br>सुखी भवेन्मेरुरिवाप्रकम्पनः ॥२४॥<br>आदौ पदार्थावगतिर्हि कारणं | होने लगता है उसी समय आत्माके लिये संसार-प्राप्तिकी कारण माया अनायास ही कारकादिके सहित लीन हो जाती है ॥१८॥ श्रुति-प्रमाणसे उसके नष्ट कर दिये जानेपर फिर वह किसप्रकार अपना कार्य करनेमें समर्थ हो सकती है ? इसलिये उस एकमात्र ज्ञानस्वरूप निर्मल और अद्वितीय बोधकी प्राप्ति होनेपर फिर अविद्या उत्पन्न नहीं हो सकती ॥१९॥ जब एक बार नष्ट हो जानेपर अविद्याका फिर जन्म ही नहीं होता तो बोधवान्को 'मैं कर्ता हूँ' ऐसी बुद्धि कैसे हो सकती है ? इसलिये ज्ञान स्वतन्त्र है उसे जीवके मोक्षके लिये किसी और (कर्मादिकी) अपेक्षा नहीं है, वह स्वयं अकेला ही उसके लिये समर्थ है ॥२०॥ इसके सिवा तैत्तिरीय शाखाकी प्रसिद्ध श्रुति* भी स्पष्ट कहती है कि समस्त कर्मोंका त्याग करना ही अच्छा है, तथा 'एतावत्' इत्यादि वाजसनेयी शाखाकी श्रुति† भी कहती है कि मोक्षका साधन ज्ञान ही है कर्म नहीं ॥२१॥ और तुमने जो ज्ञानकी समानतामें यज्ञादिका दृष्टान्त दिया सो ठीक नहीं है, क्योंकि उन दोनोंके फल अलग-अलग हैं । इसके अतिरिक्त यज्ञ तो (होता, ऋत्विक्, यजमान आदि) बहुत-से कारकोंसे सिद्ध होता है और ज्ञान इससे विपरीत है (अर्थात् वह कारकादिसे साध्य नहीं है) ॥२२॥ (कर्मके त्याग करनेसे) मैं अवश्य प्रायश्चित्त-भागी होऊँगा — ऐसी अनात्म-बुद्धि अज्ञानियोंको हुआ करती है, तत्त्वज्ञानी-को नहीं । इसलिये विकाररहित चित्तवाले बोधवान् पुरुषको विहित कर्मोंका भी विधिपूर्वक त्याग कर देना चाहिये ॥२३॥<br><br>फिर शुद्ध-चित्त होकर श्रद्धापूर्वक गुरुकी कृपासे 'तत्त्वमसि' इस महावाक्यके द्वारा परमात्मा और जीवात्माकी एकता जानकर सुमेरुके समान निश्चल एवं सुखी हो जाय ॥२४॥ यह नियम ही है कि प्रत्येक वाक्यका अर्थ जाननेमें पहले उसके पदोंके |
* 'न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्त्वमानशुः ।
परेण नाकं निहितं गुहायां विभ्राजते यद्यतयो विशन्ति ॥ तै० आ० प्र० १० अ० १०
† 'एतावदरे खल्वमृतत्त्वम्'
सर्ग ५ ] । उत्तरकाण्ड । ३५५
| वाक्यार्थविज्ञानविधौ विधानतः ।<br>तत्त्वम्पदार्थौ परमात्मजीवका-<br>वसीति चैकात्म्यमथानयोर्भवेत् ॥२५॥ | अर्थका ज्ञान ही कारण है । इस 'तत्त्वमसि' महावाक्यके 'तत्' और 'त्वम्' पद क्रमसे परमात्मा और जीवात्माके वाचक हैं और 'असि' उन दोनोंकी एकता करता है ॥२५॥ |
| प्रत्यक्परोक्षादिविरोधमात्मनो-<br>र्विहाय सङ्गृह्य तयोश्चिदात्मताम् ।<br>संशोधितां लक्षणया च लक्षितां<br>ज्ञात्वा स्वमात्मानमथाद्वयो भवेत् ॥२६॥ | इन दोनों (जीवात्मा और परमात्मा) में जीवात्मा प्रत्यक् (अन्तःकरणका साक्षी) है और परमात्मा परोक्ष (इन्द्रियातीत) है, इस (वाच्यार्थरूप) विरोधको छोड़कर और लक्षणावृत्तिसे लक्षित उनकी शुद्ध चेतनताको ग्रहण कर उसे ही अपना आत्मा जाने और इसप्रकार एकीभावसे स्थित हो ॥२६॥ |
| एकात्मकत्वाज्जहती न सम्भवे-<br>त्तथाऽजहल्लक्षणता विरोधतः ।<br>सोऽयम्पदार्थाविव भागलक्षणा<br>युज्येत तत्त्वम्पदयोरदोषतः ॥२७॥ | इन 'तत्' और 'त्वम्' पदोंमें एकरूप होनेके कारण जहतीलक्षणा नहीं हो सकती और परस्पर विरुद्ध होनेके कारण अजहल्लक्षणा भी नहीं हो सकती । इसलिये 'सोऽयम्' (यह वही है) इन दोनों पदोंके अर्थकी भाँति इन तत् और त्वम् पदोंमें भी भागत्यागलक्षणा ही निर्दोषतासे हो सकती है * ॥२७॥ |
| रसादिपञ्चीकृतभूतसम्भवं<br>भोगालयं दुःखसुखादिकर्मणाम् ।<br>शरीरमाद्यन्तवदादिकर्मजं<br>मायामयं स्थूलमुपाधिमात्मनः ॥२८॥ | पृथिवी आदि पञ्चीकृत भूतोंसे उत्पन्न हुए, सुख-दुःखादि कर्म-भोगोंके आश्रय और पूर्वोपार्जित कर्मफलसे प्राप्त होनेवाले इस मायामय आदि-अन्तवान् शरीरको विज्ञजन आत्माकी स्थूल उपाधि मानते हैं |
| सूक्ष्मं मनो बुद्धिदशेन्द्रियैर्युतं<br>प्राणैरपञ्चीकृतभूतसम्भवम् । | और मन, बुद्धि, दश इन्द्रियाँ तथा पाँच प्राण (इन सत्रह अङ्गों) से युक्त और अपञ्चीकृत भूतोंसे उत्पन्न हुए सूक्ष्म शरीरको |
* जहाँ शब्दोंके वाच्यार्थ (अर्थात् उनकी शक्तिवृत्तिसे सिद्ध होनेवाले अर्थ) को छोड़कर दूसरा अर्थ लिया जाता है वहाँ लक्षणा वृत्ति होती है । यह जहती, अजहती और जहदजहती नामसे तीन प्रकारकी है । जहतीलक्षणा में शब्दके वाच्यार्थका सर्वथा त्याग करके उसका बिलकुल नया ही अर्थ किया जाता है। जैसे 'गङ्गायां घोषः' (गङ्गाजीपर पशुशाला है) इस वाक्यके वाच्यार्थसे गङ्गाजीके प्रवाहपर पशुशालाका होना सिद्ध होता है। परन्तु यह सर्वथा असम्भव है । इसलिये यहाँ 'गङ्गा' शब्दका अर्थ 'गङ्गाप्रवाह' न करके 'गङ्गा-तीर' किया जाता है । परन्तु 'तत्' और 'त्वम्' पदके वाच्यार्थ 'ईश्वर' और 'जीव' का सर्वथा त्याग कर देनेसे उन दोनोंकी चेतनताका भी त्याग हो जाता है और चेतनताकी एकता ही अभीष्ट है; इसलिये जहतीलक्षणासे इन पदोंके अर्थकी एकता नहीं हो सकती ।
अजहतीलक्षणामें वाच्यार्थका त्याग न करके उसके साथ अन्य अर्थ भी ग्रहण किया जाता है । जैसे 'काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्' (कौओंसे दहीकी रक्षा करो) इस वाक्यका अभिप्राय केवल कौओंसे दहीकी रक्षा कराना ही नहीं है बल्कि उसके साथ कुत्ता, बिल्ली आदि अन्य जीवोंसे सुरक्षित रखना भी है । यहाँ 'तत्' और 'त्वम्' पदके वाच्यार्थमें विरोध है फिर अन्य अर्थको सम्मिलित करनेसे भी वह विरोध तो दूर होगा ही नहीं; इसलिये अजहल्लक्षणासे भी उनकी एकता सिद्ध नहीं हो सकती । इन दोनोंके सिवा जहाँ कुछ अर्थ रक्खा जाता है और कुछ छोड़ा जाता है वह जहदजहती (भाग त्याग) लक्षणा होती है । जैसे 'सोऽयम्' (यह वही है) इस वाक्यमें 'अयम्' पदसे कहे जानेवाले पदार्थकी अपरोक्षता और 'सः' पदके वाच्य पदार्थकी परोक्षताका त्याग करके इन दोनोंसे रहित जो निर्विरोध पदार्थ है उसकी एकता कही जाती है । इसी प्रकार महावाक्यके 'तत्' पदके वाच्य 'ईश्वर' के गुण सर्वज्ञता, परोक्षता आदिका और 'त्वम्' पदके वाच्य 'जीव' के गुण अल्पज्ञता, प्रत्यक्ता आदिका त्याग करके केवल चेतनांशमें एकता बतलायी जाती है ।
| ३५६ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भोक्तुः सुखादेरनुसाधनं भवे-<br>च्छरीरमन्यद्विदुरात्मनो बुधाः ॥२९॥ | जो भोक्ताके सुख-दुःखादि-अनुभवका साधन है, आत्माका दूसरा देह मानते हैं॥२८–२९॥ |
| अनाद्यनिर्वाच्यमपीह कारणं<br>मायाप्रधानं तु परं शरीरकम्।<br>उपाधिभेदात्तु यतः पृथक् स्थितं<br>स्वात्मानमात्मन्यवधारयेत्क्रमात् ॥३०॥ | (इनके अतिरिक्त) अनादि और अनिर्वाच्य मायामय कारण-शरीर ही जीवका तीसरा देह है। इसप्रकार उपाधि-भेदसे सर्वथा पृथक् स्थित अपने आत्मस्वरूपको क्रमशः (उपाधियोंका बाध करते हुए) अपने हृदयमें निश्चय करे ॥३०॥ |
| कोषेष्वयं तेषु तु तत्तदाकृति-<br>र्विभाति सङ्गात्स्फटिकोपलो यथा।<br>असङ्गरूपोऽयमजो यतोऽद्वयो<br>विज्ञायतेऽस्मिन्परितो विचारिते ॥३१॥ | स्फटिकमणिके समान यह आत्मा भी (अन्नमयादि) भिन्न-भिन्न कोशोंमें उनके सङ्गसे उन्हींके आकारका भासने लगता है। किन्तु इसका भली-प्रकार विचार करनेसे यह अद्वितीय होनेके कारण असङ्गरूप और अजन्मा निश्चित होता है ॥३१॥ |
| बुद्धेस्त्रिधा वृत्तिरपीह दृश्यते<br>स्वप्नादिभेदेन गुणत्रयात्मनः।<br>अन्योन्यतोऽस्मिन्व्यभिचारतो मृषा<br>नित्ये परे ब्रह्मणि केवले शिवे ॥३२॥ | त्रिगुणात्मिका बुद्धिकी ही स्वप्न, जाग्रत् और सुषुप्ति-भेदसे तीन प्रकारकी वृत्तियाँ दिखायी देती हैं किन्तु इन तीनों वृत्तियोंमेंसे प्रत्येकका एक दूसरीमें व्यभिचार होनेके कारण, ये (तीनों ही) एकमात्र कल्याणस्वरूप नित्य परब्रह्ममें मिथ्या हैं (अर्थात् उसमें इन वृत्तियोंका सर्वथा अभाव है) ॥३२॥ |
| देहेन्द्रियप्राणमनश्चिदात्मनां<br>सङ्घादजस्रं परिवर्तते धियः।<br>वृत्तिस्तमोमूलतयाऽङ्गलक्षणा<br>यावद्भवेत्तावदसौ भवोद्भवः ॥३३॥ | बुद्धिकी वृत्ति ही देह, इन्द्रिय, प्राण, मन और चेतन आत्माके संघातरूपसे निरन्तर परिवर्तित होती रहती है। यह वृत्ति तमोगुणसे उत्पन्न होनेवाली होनेके कारण अज्ञानरूपा है और जबतक यह रहती है तबतक ही संसारमें जन्म होता रहता है ॥३३॥ |
| नेतिप्रमाणेण निराकृताखिलो<br>हृदा समास्वादितचिद्धनामृतः।<br>त्यजेदशेषं जगदात्तसद्रसं<br>पीत्वा यथाऽम्भः प्रजहाति तत्फलम् ३४ | 'नेति-नेति' आदि श्रुति-प्रमाणसे निखिल संसारका बाध करके और हृदयमें चिद्धनामृतका आस्वादन करके सम्पूर्ण जगत्को, उसके साररूप सत् (ब्रह्म) को ग्रहण करके त्याग दे, जैसे नारियलके जलको पीकर मनुष्य उसे फेंक देते हैं ॥३४॥ |
| कदाचिदात्मा न मृतो न जायते<br>न क्षीयते नापि विवर्धतेऽन्वयः।<br>निरस्तसर्वातिशयः सुखात्मकः<br>स्वयंप्रभः सर्वगतोऽयमद्वयः ॥३५॥ | आत्मा न कभी मरता है न जन्मता है; वह न कभी क्षीण होता है और न बढ़ता ही है। वह पुरातन, सम्पूर्ण विशेषणोंसे रहित, सुखस्वरूप, स्वयंप्रकाश, सर्वगत और अद्वितीय है ॥३५॥ |
| एवंविधे ज्ञानमये सुखात्मके<br>कथं भवो दुःखमयः प्रतीयते।<br>अज्ञानतोऽध्यासवशात्प्रकाशते<br>ज्ञाने विलीयेत विरोधतः क्षणात् ॥३६॥ | जो इसप्रकार ज्ञानमय और सुख-स्वरूप है उसमें (ज्ञान होनेके बाद) यह दुःखमय संसार कैसे प्रतीत हो सकता है? यह तो अध्यासके कारण अज्ञान-से ही प्रतीत होता है ज्ञानसे तो यह एक क्षणमें ही लीन हो जाता है क्योंकि ज्ञान और अज्ञानका परस्पर |
सर्ग ५ ] उत्तरकाण्ड ३५
यदन्यदन्यत्र विभाव्यते भ्रमा-
दध्यासमित्याहुरमुं विपश्चितः।
असर्षभूतेऽहिविभावनं यथा
रज्वादिके तद्वदपीश्वरे जगत्॥३७॥
विकल्पमायारहिते चिदात्मके-
ऽहङ्कार एष प्रथमः प्रकल्पितः।
अध्यास एवात्मनि सर्वकारणे
निरामये ब्रह्मणि केवले परे॥३८॥
इच्छादिरागादिसुखादिधर्मिकाः
सदा धियः संसृतिहेतवः परे।
यस्मात्सुसुप्तौ तदभावतः परः
सुखस्वरूपेण विभाव्यते हि नः॥३९॥
अनाद्यविद्योद्भवबुद्धिबिम्बितो
जीवः प्रकाशोऽयमितीर्यते चितः।
आत्मा धियः साक्षितया पृथक् स्थितो
बुद्ध्यापरिच्छिन्नपरः स एव हि॥४०॥
चिद्विम्बसाक्ष्यात्मधियां प्रसङ्गत-
स्त्वेकत्र वासादनलाक्तलोहवत्।
अन्योन्यमध्यासवशात्प्रतीयते
जडाजडत्वं च चिदात्मचेतसोः॥४१॥
गुरोः सकाशादपि वेदवाक्यतः
सञ्जातविद्यानुभवो निरीक्ष्य तम्।
स्वात्मानमात्मस्थमुपाधिवर्जितं
त्यजेदशेषं जडमात्मगोचरम्॥४२॥
प्रकाशरूपोऽहमजोऽहमद्वयो-
ऽसकृद्विभातोऽहमतीव निर्मलः।
विशुद्धविज्ञानघनो निरामयः
सम्पूर्ण आनन्दमयोऽहमक्रियः॥४३॥
सदैव मुक्तोऽहमचिन्त्यशक्तिमा-
नतीन्द्रियज्ञानमविक्रियात्मकः।
अनन्तपारोऽहमहर्निशं बुधै-
र्विभावितोऽहं हृदि वेदवादिभिः॥४४॥
विरोध है॥३६॥ भ्रमसे जो अन्यमें अन्यकी प्रतीति होती है उसीको विद्वानोंने अध्यास कहा है। जैसे प्रकार असर्परूप रज्जुमें सर्पकी प्रतीति होती है उस प्रकार ईश्वरमें संसारकी प्रतीति हो रही है॥३७॥ जो विकल्प और मायासे रहित है उस सबके पर निरामय, अद्वितीय और चित्स्वरूप परमात्मा ब्रह्ममें पहले इस 'अहंकार' रूप अध्यासकी ही कल्पना होती है॥३८॥ सबके साक्षी आत्मामें इच्छा, अनिच्छा, राग-द्वेष और सुख-दुःखादिरूप बुद्धिकी वृत्तियाँ ही जन्म-मरणरूप संसारकी कारण हैं; क्योंकि सुषुप्तिमें इनका अभाव हो जानेपर हमें आत्माका सुख-रूपसे भान होता है॥३९॥ अनादि अविद्यासे उत्पन्न हुई बुद्धिमें प्रतिबिम्बित चेतनका प्रकाश ही 'जीव' कहलाता है। बुद्धिके साक्षीरूपसे आत्मा उससे पृथक् है, वह परात्मा तो बुद्धिसे अपरिच्छिन्न है॥४०॥ अग्निसे तपे हुए लोहेके समान चिदाभास, साक्षी आत्मा तथा बुद्धिके एकत्र रहनेसे परस्पर अन्योन्याध्यास होनेके कारण क्रमशः उनकी चेतनता और जडता प्रतीत होती है। (अर्थात् जिस प्रकार अग्निसे तपे हुए लोहपिण्डमें अग्नि और लोहेका तादात्म्य हो जानेसे लोहेका आकार अग्निमें और अग्निकी उष्णता लोहेमें दिखायी देने लगती है उसी प्रकार बुद्धि और आत्माका तादात्म्य हो जानेसे आत्माकी चेतनता बुद्धि आदिमें और बुद्धि आदिकी जडता आत्मामें प्रतीत होने लगती है। इसलिये अध्यासवश बुद्धिसे लेकर शरीरपर्यन्त अनात्म-वस्तुओंको ही आत्मा मानने लगते हैं) ॥४१॥ गुरुके समीप रहनेसे और वेदवाक्योंसे आत्मज्ञानका अनुभव होनेपर अपने हृदयस्थ उपाधिरहित आत्माका साक्षात्कार करके आत्मारूपसे प्रतीत होनेवाले देहादि सम्पूर्ण जडपदार्थोंका त्याग कर देना चाहिये॥४२॥ मैं प्रकाशस्वरूप, अजन्मा, अद्वितीय, निरन्तर भासमान, अत्यन्त निर्मल, विशुद्ध-विज्ञानघन, निरामय, क्रियारहित और एकमात्र आनन्द-स्वरूप हूँ॥४३॥ मैं सदा ही मुक्त, अचिन्त्यशक्ति, अतीन्द्रिय, अविकृतरूप और अनन्तपार हूँ। वेद-वादी पण्डितजन अहर्निश मेरा हृदयमें चिन्तन करते हैं॥४४॥
३५८ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ५
एवं सदात्मानमखण्डितात्मना
विचारमाणस्य विशुद्धभावना ।
हन्यादविद्यामचिरेण कारकै
रसायनं यद्वदुपासितं रुजः ॥ ४५ ॥
अर्थ: इस प्रकार सदा आत्माका अखण्ड-वृत्तिसे चिन्तन करनेवाले पुरुषके अन्तःकरणमें उत्पन्न हुई विशुद्ध भावना तुरन्त ही कारकादिके सहित अविद्याका नाश कर देती है, जिस प्रकार नियमानुसार सेवन की हुई ओषधि रोगको नष्ट कर डालती है ॥ ४५ ॥
विविक्त आसीन उपारतेन्द्रियो
विनिर्जितात्मा विमलान्तराशयः ।
विभावयेदेकमनन्यसाधनो
विज्ञानदृक्केवल आत्मसंस्थितः ॥ ४६ ॥
अर्थ: (आत्मचिन्तन करनेवाले पुरुषको चाहिये कि) एकान्त देशमें इन्द्रियोंको उनके विषयोंसे हटाकर और अन्तःकरणको अपने अधीन करके बैठे तथा आत्मामें स्थित होकर और किसी साधनका आश्रय न लेकर शुद्ध-चित्त हुआ केवल ज्ञानदृष्टिद्वारा एक आत्माकी ही भावना करे ॥ ४६ ॥
विश्वं यदेतत्परमात्मदर्शनं
विलापयेदात्मनि सर्वकारणे ।
पूर्णश्चिदानन्दमयोऽवतिष्ठते
न वेद बाह्यं न च किञ्चिदान्तरम् ॥ ४७ ॥
अर्थ: यह विश्व परमात्मस्वरूप है ऐसा समझकर इसे सबके कारणरूप आत्मामें लीन करे; इस प्रकार जो पूर्ण चिदानन्दस्वरूपसे स्थित हो जाता है उसे बाह्य अथवा आन्तरिक किसी भी वस्तुका ज्ञान नहीं रहता ॥ ४७ ॥
पूर्वं समाधेरखिलं विचिन्तये-
दोङ्कारमात्रं सचराचरं जगत् ।
तदेव वाच्यं प्रणवो हि वाचको
विभाव्यतेऽज्ञानवशान्न बोधतः ॥ ४८ ॥
अर्थ: समाधि प्राप्त होनेके पूर्व ऐसा चिन्तन करे कि सम्पूर्ण चराचर जगत् केवल ओंकार-मात्र है। यह संसार वाच्य है और ओंकार इसका वाचक है। अज्ञानके कारण ही संसारकी प्रतीति होती है ज्ञान होनेपर इसका कुछ भी नहीं रहता ॥ ४८ ॥
अकारसंज्ञः पुरुषो हि विश्वको
ह्युकारस्तैजस ईर्यते क्रमात् ।
प्राज्ञो मकारः परिपठ्यतेऽखिलैः
समाधिपूर्वं न तु तत्त्वतो भवेत् ॥ ४९ ॥
अर्थ: (ओंकारमें अ उ और म ये तीन वर्ण हैं; इनमेंसे) अकार विश्व (जागृतिके अभिमानी) का वाचक है, उकार तैजस (स्वप्नका अभिमानी) कहलाता है और मकार प्राज्ञ (सुषुप्तिके अभिमानी) को कहते हैं; यह व्यवस्था समाधिलाभसे पहलेकी है, तत्त्वदृष्टिसे ऐसा कोई भेद नहीं है ॥ ४९ ॥
विश्वं त्वकारं पुरुषं विलापये-
दुकारमध्ये बहुधा व्यवस्थितम् ।
ततो मकारे प्रविलाप्य तैजसं
द्वितीयवर्णं प्रणवस्य चान्तिमे ॥ ५० ॥
अर्थ: नाना प्रकारसे स्थित अकाररूप विश्व पुरुषको उकारमें लीन करे और ओंकारके द्वितीय वर्ण तैजसरूप उकारको उसके अन्तिमवर्ण मकारमें लीन करे ॥ ५० ॥
मकारमप्यात्मनि चिद्घने परे
विलापयेत्प्राज्ञमपीह कारणम् ।
सोऽहं परं ब्रह्म सदा विमुक्तिम-
द्विज्ञानदृङ् मुक्त उपाधितोऽमलः ॥ ५१ ॥
अर्थ: फिर कारणात्मा प्राज्ञरूप मकारको भी चिद्घनरूप परमात्मामें लीन करे; (और ऐसी भावना करे कि) वह नित्यमुक्त विज्ञानस्वरूप उपाधिहीन निर्मल परब्रह्म मैं ही हूँ ॥ ५१ ॥
एवं सदा जातपरात्मभावनः
स्वानन्दतुष्टः परिविस्मृताखिलः ।
आस्ते स नित्यात्मसुखप्रकाशकः
साक्षाद्विमुक्तोऽचलवारिसिन्धुवत् ॥ ५२ ॥
अर्थ: इसप्रकार निरन्तर परात्मभावना करते-करते जो आत्मानन्दमें मग्न हो गया है तथा जिसे सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्च विस्मृत हो गया है वह नित्य आत्मानन्दका अनुभव करनेवाला जीवन्मुक्त योगी निस्तरंग समुद्रके
| सर्ग ५ ] | उत्तरकाण्ड | ३५९ |
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एवं सदाऽभ्यस्तसमाधियोगिनो<br>निवृत्तसर्वेन्द्रियगोचरस्य हि।<br>विनिर्जिताशेषरिपोरहं सदा<br>दृश्यो भवेयं जितषड्गुणात्मनः ॥५३॥ | समान साक्षात् मुक्तस्वरूप हो जाता है ॥५२॥ इस प्रकार जो निरन्तर समाधियोगका अभ्यास करता है, जिसके सम्पूर्ण इन्द्रियगोचर विषय निवृत्त हो गये हैं तथा जिसने काम-क्रोधादि सम्पूर्ण शत्रुओंको परास्त कर दिया है, उस छहों इन्द्रियों (मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियों) को जीतनेवाले महात्माको मेरा निरन्तर साक्षात्कार होता है॥५३॥
ध्यात्वैवमात्मानमहर्निशं मुनि-<br>स्तिष्ठेत्सदा मुक्तसमस्तबन्धनः।<br>प्रारब्धमश्नन्नभिमानवर्जितो<br>मय्येव साक्षात्प्रविलीयते ततः ॥५४॥ | इस प्रकार अहर्निश आत्माका ही चिन्तन करता हुआ मुनि सर्वदा समस्त बन्धनोंसे मुक्त होकर रहे तथा (कर्ता-भोक्तापनके) अभिमानको छोड़कर प्रारब्ध-फल भोगता रहे। इससे वह अन्तमें साक्षात् मुझहीमें लीन हो जाता है ॥५४॥
आदौ च मध्ये च तथैव चान्ततो<br>भवं विदित्वा भयशोककारणम्।<br>हित्वा समस्तं विधिवादचोदितं<br>भजेत्खमात्मानमथाखिलात्मनाम् ॥५५॥ | संसारको आदि, अन्त और मध्यमें सब प्रकार भय और शोकका ही कारण जानकर समस्त वेदविहित कर्मको त्याग दे तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तरात्मारूप अपने आत्माका भजन करे॥ ५५॥
आत्मन्यभेदेन विभावयन्निदं<br>भवत्यभेदेन मयात्मना तदा।<br>यथा जलं वारिनिधौ यथा पयः<br>क्षीरे वियद्व्योमन्यनिले यथानिलः ॥५६॥ | जिस प्रकार समुद्रमें जल, दूधमें दूध, महाकाशमें घटा-काशादि और वायुमें वायु मिलकर एक हो जाते हैं उसी प्रकार इस सम्पूर्ण प्रपञ्चको अपने आत्माके साथ अभिन्नरूपसे चिन्तन करनेसे जीव मुझ परमात्माके साथ अभिन्न भावसे स्थित हो जाता है ॥५६॥
इत्थं यदीक्षेत हि लोकसंस्थितो<br>जगन्मृषैवेति विभावयन्मुनिः।<br>निराकृतत्वाच्छ्रुतियुक्तिमानतो<br>यथेन्दुभेदो दिशि दिग्भ्रमादयः ॥५७॥ | यह जो जगत् है वह श्रुति, युक्ति और प्रमाणसे बाधित होनेके कारण चन्द्रभेद और दिशाओंमें होनेवाले दिग्भ्रम-के समान मिथ्या ही है—ऐसी भावना करता हुआ लोक (व्यवहार) में स्थित मुनि, इसे देखे ॥ ५७ ॥
यावन्न पश्येदखिलं मदात्मकं<br>तावन्मदाराधनतत्परो भवेत्।<br>श्रद्धालुरत्यूर्जितभक्तिलक्षणो<br>यस्तस्य दृश्योऽहमहर्निशं हृदि ॥५८॥ | जबतक सारा संसार मेरा ही रूप दिखलायी न दे तब-तक निरन्तर मेरी आराधना करता रहे। जो श्रद्धालु और उत्कट भक्त होता है उसे अपने हृदयमें सर्वदा मेरा ही साक्षात्कार होता है ॥ ५८ ॥
रहस्यमेतच्छ्रुतिसारसङ्ग्रहं<br>मया विनिश्चित्य तवोदितं प्रिय।<br>यस्त्वेतदालोचयतीह बुद्धिमान्<br>स मुच्यते पातकराशिभिः क्षणात् ॥५९॥ | हे प्रिय ! सम्पूर्ण श्रुतियोंके साररूप इस गुप्त रहस्यको मैंने निश्चय करके तुमसे कहा है। जो बुद्धिमान् इसका मनन करेगा वह तत्काल समस्त पापोंसे मुक्त हो जायगा ॥ ५९ ॥
भ्रातर्यदीदं परिदृश्यते जग-<br>न्मायैव सर्वं परिहृत्य चेतसा। | भाई ! यह जो कुछ जगत् दिखायी देता है वह सब माया है। इसे अपने चित्तसे
| ३६० | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ६ |
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मद्भावनाभावितशुद्धमानसः
सुखी भवानन्दमयो निरामयः ॥६०॥
अर्थ— निकालकर मेरी भावनासे शुद्धचित्त और सुखी होकर आनन्दपूर्ण और क्लेशशून्य हो जाओ ॥ ६० ॥
यः सेवते मामगुणं गुणात्परं
हृदा कदा वा यदि वा गुणात्मकम्।
सोऽहं स्वपादाश्रितरेणुभिः स्पृशन्
पुनाति लोकत्रितयं यथा रविः ॥६१॥
अर्थ— जो पुरुष अपने चित्तसे मुझ गुणातीत निर्गुणका अथवा कभी-कभी मेरे सगुण स्वरूपका भी सेवन करता है वह मेरा ही रूप है। वह अपनी चरणरजके स्पर्शसे सूर्यके समान सम्पूर्ण त्रिलोकीको पवित्र कर देता है ॥ ६१ ॥
विज्ञानमेतदखिलं श्रुतिसारमेकं
वेदान्तवेद्यचरणेन मयैव गीतम्।
यः श्रद्धया परिपठेद् गुरुभक्तियुक्तो
मद्रूपमेति यदि मद्वचनेषु भक्तिः ॥६२॥
अर्थ— यह अद्वितीय ज्ञान समस्त श्रुतियोंका एकमात्र सार है इसे वेदान्तवेद्य भगवत्पाद मैंने ही कहा है। जो गुरुभक्तिसम्पन्न पुरुष इसका श्रद्धापूर्वक पाठ करेगा उसकी यदि मेरे वचनोंमें प्रीति होगी तो वह मेरा ही रूप हो जायगा ॥ ६२ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे उत्तरकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥
षष्ठ सर्ग
लवण-वध, भगवान् रामके यज्ञमें कुश-लवके सहित महर्षि वाल्मीकिका पधारना और कुशको परमार्थोपदेश करना।
श्रीमहादेव उवाच
**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति !
एकदा मुनयः सर्वे यमुनातीरवासिनः।
आजग्मू राघवं द्रष्टुं भयाल्लवणरक्षसः ॥ १ ॥
अर्थ— एक दिन यमुना-तटपर रहनेवाले समस्त मुनिजन लवण राक्षससे भय-भीत होकर श्रीरामचन्द्रजीका दर्शन करनेके लिये आये ॥ १ ॥
कृत्वाऽग्रे तु मुनिश्रेष्ठं भार्गवं च्यवनं द्विजाः।
असङ्ख्याताः समायाता रामादभयकाङ्क्षिणः ॥२॥
अर्थ— वे अगणित मुनिगण भृगुपुत्र मुनिश्रेष्ठ च्यवन-को आगे कर भगवान् रामसे अभय-लाभ करनेकी इच्छा-से आये ॥२॥
तान्पूजयित्वा परया भक्त्या रघुकुलोत्तमः।
उवाच मधुरं वाक्यं हर्षयन्मुनिमण्डलम् ॥ ३ ॥
अर्थ— रघुकुलश्रेष्ठ रामजीने उन मुनीश्वरोंका अत्यन्त भक्तिभावसे पूजन कर उन्हें प्रसन्न करते हुए मधुर वाणीसे कहा—॥ ३ ॥
करवाणि मुनिश्रेष्ठाः किमागमनकारणम्।
धन्योऽस्मि यदि यूयं मां प्रीत्या द्रष्टुमिहागताः॥४॥
अर्थ— "हे मुनिश्रेष्ठगण ! आपके यहाँ पधारनेका क्या कारण है ? (मुझे जो आज्ञा होगी) मैं वैसा ही करूँगा। यदि आप लोग मुझे प्रीतिपूर्वक देखनेके लिये ही यहाँ आये हैं, तो मैं धन्य हूँ ॥ ४ ॥
दुष्करं चापि यत्कार्यं भवतां तत्करोम्यहम्।
आज्ञापयन्तु मां भृत्यं ब्राह्मणा दैवतं हि मे ॥ ५ ॥
अर्थ— आपका जो अत्यन्त दुष्कर कार्य होगा वह भी मैं अवश्य करूँगा। आप मुझ सेवकको आज्ञा दीजिये; ब्राह्मण ही मेरे इष्टदेव हैं" ॥ ५ ॥
तच्छ्रुत्वा सहसा हृष्टश्च्यवनो वाक्यमब्रवीत्।
मधुनामा महादैत्यः पुरा कृतयुगे प्रभो ॥ ६ ॥
अर्थ— भगवान् रामके ये वचन सुनकर महर्षि च्यवनने सहसा प्रसन्न होकर कहा—"प्रभो ! पहले सत्ययुगमें
सर्ग ६ ] उत्तरकाण्ड ३६१
| आसीदतीव धर्मात्मा देवब्राह्मणपूजकः ।<br>तस्य तुष्टो महादेचो ददौ शूलमनुत्तमम् ॥ ७ ॥<br>प्राह चानेन यं हंसि स तु भस्मीभविष्यति ।<br>रावणस्यानुजा भार्या तस्य कुम्भीनसी श्रुता ॥ ८ ॥<br>तस्यां तु लवणो नाम राक्षसो भीमविक्रमः ।<br>आसीदुरात्मा दुर्धर्षो देवब्राह्मणहिंसकः ॥ ९ ॥<br>पीडितास्तेन राजेन्द्र वयं त्वां शरणं गताः ।<br>तच्छ्रुत्वा राघवोऽप्याह मा भैर्बो मुनिपुङ्गवाः ॥१०॥<br>लवणं नाशयिष्यामि गच्छन्तु विगतज्वराः ।<br>इत्युक्त्वा प्राह रामोऽपि भ्रातॄन् को वा हनिष्यति ॥<br>लवणं राक्षसं दद्याद् ब्राह्मणेभ्योऽभयं महत् ।<br>तच्छ्रुत्वा प्राञ्जलिः प्राह भरतो राघवाय वै ॥१२॥<br>अहमेव हनिष्यामि देवाज्ञापय मां प्रभो ।<br>ततो रामं नमस्कृत्य शत्रुघ्नो वाक्यमब्रवीत् ॥१३॥<br>लक्ष्मणेन महत्कार्यं कृतं राघव संयुगे ।<br>नन्दिग्रामे महाबुद्धिर्भरतो दुःखमन्वभूत् ॥१४॥<br>अहमेव गमिष्यामि लवणस्य वधाय च ।<br>त्वत्प्रसादाद्रघुश्रेष्ठ हन्यां तं राक्षसं युधि ॥१५॥ | मधु नामक एक बड़ा ही धर्मात्मा और देवता तथा<br>ब्राह्मणोंका भक्त महादैत्य था । उससे प्रसन्न होकर<br>श्रीमहादेवजीने उसे एक अत्युत्तम त्रिशूल दिया ॥ ६-७ ॥<br>और कहा कि इससे तू जिसपर प्रहार करेगा वही<br>भस्मीभूत हो जायगा । सुना जाता है,<br>रावणकी छोटी बहिन कुम्भीनसी उसकी भार्या<br>थी ॥ ८ ॥ उससे उसके लवण नामका एक<br>महापराक्रमी दुष्ट-चित्त, दुर्जय और देवता-ब्राह्मणोंको<br>दुःख देनेवाला राक्षस उत्पन्न हुआ ॥ ९ ॥ हे राजेन्द्र !<br>उससे अत्यन्त पीड़ित होकर हम आपकी शरण आये<br>हैं।” यह सुनकर श्रीरघुनाथजीने कहा—“हे मुनि-<br>श्रेष्ठ ! आपलोग किसी प्रकारका भय न करें ॥१०॥ आप<br>निश्चिन्त होकर पधारें, मैं लवणको अवश्य मार डालूँगा।”<br>मुनीश्वरोंसे ऐसा कह भगवान् रामने अपने भाइयोंसे<br>पूछा—“तुममेंसे कौन लवण राक्षसको मारेगा और<br>ब्राह्मणोंको महान् अभय देगा ?” यह सुनकर भरतजी-<br>ने श्रीरघुनाथजीसे हाथ जोड़कर कहा-॥ ११-१२॥<br>“देव ! लवणको मैं ही मारूँगा । प्रभो ! इसके लिये मुझे<br>ही आज्ञा दीजिये।” फिर शत्रुघ्नजीने श्रीरामचन्द्रजीको<br>प्रणाम करके कहा—॥ १३ ॥ “हे राघव ! श्रीलक्ष्मण-<br>जी युद्धमें बड़ा भारी कार्य कर चुके हैं, महामति भरत-<br>जीने भी नन्दिग्राममें रहकर बहुत कष्ट सहा है ॥ १४ ॥<br>अब लवणका वध करनेके लिये तो मैं ही जाऊँगा ।<br>हे रघुश्रेष्ठ ! आपकी कृपासे मैं उस राक्षसको युद्धमें<br>अवश्य मार डालूँगा” ॥ १५ ॥ |
| तच्छ्रुत्वा स्वाङ्कमारोप्य शत्रुघ्नं शत्रुसूदनः ।<br>आहाद्यैवाभिषेक्ष्यामि मथुराराज्यकारणात् ॥१६॥<br>आनाय्य च सुसम्भारॉल्लक्ष्मणेनाभिषेचने ।<br>अनिच्छन्तमपि स्नेहादभिषेकमकारयत् ॥१७॥<br>दत्त्वा तस्मै शरं दिव्यं रामः शत्रुघ्नमब्रवीत् ।<br>अनेन जहि बाणेन लवणं लोककण्टकम् ॥१८॥<br>स तु सम्पूज्य तच्छूलं गेहे गच्छति काननम् ।<br>भक्षणार्थं तु जन्तूनां नानाप्राणिवधाय च ॥१९॥ | शत्रुघ्नके ये वचन सुनकर शत्रुदमन रघुनाथजीने<br>उन्हें अपनी गोदमें उठा लिया और कहा—“मैं आज<br>ही तुम्हारा (लवणकी राजधानी) मथुराके राज्यपर<br>अभिषेक करूँगा” ॥ १६ ॥ ऐसा कह लक्ष्मणजीसे<br>अभिषेककी सामग्री मँगा शत्रुघ्नजीकी इच्छा न होने-<br>पर भी श्रीरामचन्द्रजीने उनका प्रीतिपूर्वक अभिषेक<br>कर दिया ॥ १७ ॥ फिर उन्हें दिव्य बाण देकर<br>कहा—“तुम संसारके कण्टकरूप लवणको इस बाण-<br>से मार डालना ॥ १८ ॥ राक्षस लवण अपने घरमें<br>ही उस त्रिशूलकी पूजा कर नाना प्रकारके जीवोंको<br>खाने और मारनेके लिये वनको जाया करता है॥ १९॥ |
| ३६२ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ६ |
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स तु नायाति सदनं यावद्वनचरो भवेत् ।
तावदेव पुरद्वारि तिष्ठ त्वं धृतकार्मुकः ॥२०॥
योत्स्यते स त्वया क्रुद्धस्तदावध्यो भविष्यति ।
तं हत्वा लवणं क्रूरं तद्वनं मधुसंज्ञितम् ॥२१॥
निवेश्य नगरं तत्र तिष्ठ त्वं मेऽनुशासनात् ।
अश्वानां पञ्चसाहस्रं रथानां च तदर्द्धकम् ॥२२॥
गजानां षट् शतानीह पत्तीनामयुतत्रयम् ।
आगमिष्यति पश्चात्तवमग्र साधय राक्षसम् ॥२३॥
इत्युक्त्वा मूर्ध््न्यवघ्राय प्रेषयामास राघवः ।
शत्रुघ्नं मुनिभिः सार्धमाशीर्भिरभिनन्द्य च ॥२४॥
शत्रुघ्नोऽपि तथा चक्रे यथा रामेण चोदितः ।
हत्वा मधुसुतं युद्धे मथुरांमकरोत्पुरीम् ॥२५॥
स्फीतां जनपदं चक्रे मधुरां दानमानतः ।
सीतापि सुषुवे पुत्रौ द्वौ वाल्मीकेरथाश्रमे ॥२६॥
मुनिस्तयोर्नाम चक्रे कुशो ज्येष्ठोऽनुजो लवः।
क्रमेण विद्यासम्पन्नौ सीतापुत्रौ बभूवतुः ॥२७॥
उपनीतौ च मुनिना वेदाध्ययनतत्परौ ।
कृत्स्नं रामायणं प्राह काव्यं बालकयोर्मुनिः ॥२८॥
शङ्करेण पुरा प्रोक्तं पार्वत्यै पुरहारिणा ।
वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः ॥२९॥
कुमारौ स्वरसम्पन्नौ सुन्दरावाश्विनाविव ।
तन्त्रीतालसमायुक्तौ गायन्तौ चेरतुर्वने ॥३०॥
तत्र तत्र मुनीनां तौ समाजे सुररूपिणौ ।
गायन्तावमितो दृष्ट्वा विस्मिता मुनयोऽब्रुवन् ॥३१॥
गन्धर्वेष्वथ किन्नरेषु भुवि वा देवेषु देवालये
पातालेऽथतथा चतुर्मुखगृहे लोकेषु सर्वेषु च ।
अस्माभिश्चिरजीविभिश्चिरतरं दृष्ट्वा दिशः सर्वतो
अतः जबतक वह लौटकर घर न आवे, वनहीमें रहे, उससे पूर्व ही तुम नगरके द्वारपर धनुष धारण कर खड़े हो जाना ॥ २० ॥ लौटनेपर वह क्रोधपूर्वक तुमसे लड़ेगा और उसी समय मारा जायगा । इस प्रकार महाक्रूर लवणासुरको मारकर उसके मधुवनमें नगर बसाकर मेरी आज्ञासे वहीं रहो । तुम पहले जाकर उस राक्षसको ठीक करो, फिर तुम्हारे पीछे वहाँ पाँच हजार घोड़े, उनसे आधे ( ढाई हजार ) रथ, छः सौ हाथी और तीस हजार पैदल भी पहुँचेंगे ॥ २१–२३ ॥
ऐसा कह श्रीरघुनाथजीने शत्रुघ्नका शिर सूँघकर उनका आशीर्वादसे अभिनन्दन किया और उन्हें मुनियोंके साथ विदा किया ॥ २४ ॥ शत्रुघ्नजीने भी, भगवान् रामने जैसी आज्ञा दी थी वैसा ही किया । उन्होंने मधुपुत्र लवणासुरको मारकर मधुरापुरी बसायी ॥ २५ ॥ और दान-मानसे (लोगोंको सन्तुष्ट कर) उन्होंने मधुराको एक समृद्धिशाली नगर बना दिया ।
इस बीचमें श्रीसीताजीके वाल्मीकि मुनिके आश्रममें दो पुत्र उत्पन्न हुए ॥ २६ ॥ मुनिने उनमेंसे बड़ेका नाम कुश और छोटेका लव रक्खा । धीरे-धीरे सीताजीके वे दोनों पुत्र विद्यासम्पन्न हो गये ॥ २७ ॥ मुनिके उपनयन-संस्कार करनेपर वे वेदाध्ययनमें तत्पर हुए । श्रीवाल्मीकिजीने उन दोनों बालकोंको सम्पूर्ण रामायणकाव्य पढ़ा दिया ॥ २८ ॥ पूर्वकालमें इसे त्रिपुरविनाशक भगवान् शंकरने पार्वतीजीको सुनाया था । उसी आख्यानको समर्थ मुनि वाल्मीकिने वेदोंका विस्तृत ज्ञान करानेके लिये उन बालकोंको पढ़ाया ॥ २९ ॥ वे अश्विनीकुमारके समाने अति सुन्दर कुमार उसे वीणा बजाकर स्वरसहित गाते हुए वनमें विचरा करते थे ॥ ३० ॥ उन देवरूप बालकोंको जहाँ-तहाँ मुनियोंके समाजमें गाते देख वे मुनिगण अत्यन्त विस्मित हो आपसमें कहने लगते थे—॥ ३१ ॥ "हम चिरजीवियोंने बहुत दिनोंसे सभी दिशाएँ देखीं; किन्तु गन्धर्व, किन्नर, भूलोक, देवलोक, देवालय, पाताल अथवा ब्रह्मलोक आदि किसी भी लोकमें गाने-बजानेकी ऐसी कुशलता
उत्तरकाण्ड - सर्ग ६: लवण-वध, वाल्मीकिका पधारना और कुशको परमार्थोपदेश
| सर्ग ६ ] | उत्तरकाण्ड | ३६३ |
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| नाज्ञासीद्गीतवाद्यगरिमा नादर्शि नांश्रावि च ॥ | न कभी जानी, न देखी और न सुनी ही है” ॥३२॥ | | एवं स्तुवद्भिरखिलैर्मुनिभिः प्रतिवासरम् । | इसप्रकार प्रतिदिन प्रशंसा करनेवाले समस्त मुनियोंके साथ वे दोनों बालक बहुत समयतक श्रीवाल्मीकिजीके एकान्त आश्रममें सुखपूर्वक रहे ॥ ३३ ॥ | | आसाते सुखमेकान्ते वाल्मीकेराश्रमे चिरम् ॥३३॥ | | | अथ रामोऽश्वमेधादींश्चकार बहुदक्षिणान् । | . इधर परम तेजस्वी श्रीरामचन्द्रजीने सुवर्णकी सीता बनाकर अश्वमेध आदि बहुत-से बड़ी-बड़ी दक्षिणाओं-वाले यज्ञ किये ॥३४॥ उस यज्ञशालामें यज्ञोत्सव देखनेके लिये सभी ऋषि, राजर्षि, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य आदि आये थे ॥ ३५ ॥ मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकिजी भी गान् करते हुए कुश और लवको साथ ले वहाँ आये और जहाँ मुनियोंके ठहरनेका स्थान था वहाँ उतरे ॥ ३६ ॥ वहाँ एक दिन एकान्तमें शान्तभावसे बैठे हुए वाल्मीकि मुनिसे उनकी समाधि खुलनेपर कुशने कथाके बीचमें ही ज्ञानशास्त्रके विषयमें पूछा ॥ ३७ ॥ | | यज्ञान् स्वर्णमयीं सीतां विधाय विपुलद्युतिः॥३४॥ | | | तस्मिन्विताने ऋषयः सर्वे राजर्षयस्तथा । | | | ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः समाजग्मुर्दिदृक्षवः॥३५॥ | | | वाल्मीकिरपि सङ्गृह्य गायन्तौ तौ कुशीलवौ । | | | जगाम ऋषियाटस्य समीपं मुनिपुङ्गवः ॥३६॥ | | | तत्रैकान्ते स्थितं शान्तं समाधिविरमे मुनिम् । | | | कुशः पप्रच्छ वाल्मीकिं ज्ञानशास्त्रं कथान्तरे॥३७॥ | | | भगवन् श्रोतुमिच्छामि सङ्क्षेपान्नृपतोऽखिलम् । | (वह बोला—) “भगवन् ! मैं आपके मुखारविन्दसे संक्षेप-में यह बात सुनना चाहता हूँ कि जीवको यह सुदृढ संसारबन्धन किस प्रकार प्राप्त होता है ? ॥ ३८ ॥ और फिर इस संसार नामक दृढ बन्धनसे उसे छुटकारा कैसे मिलता है ? हे मुने ! आप सर्वज्ञ हैं, मुझ प्रणत शिष्यसे आप यह सम्पूर्ण रहस्य कहिये” ॥ ३९ ॥ | | देहिनः संसृतिर्बन्धः कथमुत्पद्यते दृढः ॥३८॥ | | | कथं विमुच्यते देही दृढबन्धाह्वयान्मिथात् । | | | वक्तुमर्हसि सर्वज्ञ मह्यं शिष्याय ते मुने ॥३९॥ | | | वाल्मीकिरुवाच | **वाल्मीकिजी बोले—**सुन, मैं तुझे संक्षेपसे साधन-के सहित बन्ध और मोक्षका सम्पूर्ण स्वरूप सुनाता हूँ। मैं जैसा कहूँ वह सब सुनकर तू उसी प्रकार आचरण कर । इससे तेरा कल्याण होगा और तू जीवन्मुक्त हो जायगा । देहहीन चेतन आत्माका यह देह ही बड़ा भारी घर है ॥ ४०-४१ ॥ इसमें उसने अहंकारको ही अपना मन्त्री बना रक्खा है। यह अहंकाररूप मन्त्री देहगेहाभिमानरूप अपने आपको चेतन आत्मामें आरोपितकर उससे एकरूप होकर अपनी सारी चेष्टाओं-का आरोप उस चिदानन्दरूप आत्मामें ही करता है। उस अहंकारसे व्याप्त हुआ देही (जीव ) उसीके संकल्प-से प्रेरित होकर संकल्परूपी बेड़ियोंसे बँधता है और फिर रात-दिन पुत्र, स्त्री और गृह आदिके लिये संकल्प-विकल्प करता रहता है ॥ ४२-४४ ॥ इस प्रकार | | शृणु वक्ष्यामि ते सर्वं सङ्क्षेपाद्बन्धमोक्षयोः । | | | स्वरूपं साधनं चापि मत्तः श्रुत्वा यथोदितम्॥४०॥ | | | तथैवाचर भद्रं ते जीवन्मुक्तो भविष्यसि । | | | देह एव महागेहमदेहस्य चिदात्मनः ॥४१॥ | | | तस्याहङ्कार एवास्मिन्मन्त्री तेनैव कल्पितः । | | | देहगेहाभिमानं स्वं समारोप्य चिदात्मनि ॥४२॥ | | | तेन तादात्म्यमापन्नः स्वचेष्टितमशेषतः । | | | विदधाति चिदानन्दे तद्वासितवपुः स्वयम् ॥४३॥ | | | तेन सङ्कल्पितो देही सङ्कल्पनिगडावृतः । | | | पुत्रदारगृहादीनि सङ्कल्पयति चानिशम् ॥४४॥ | |
| ३६४ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ६ |
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संकल्पयन्स्वयं देही परिशोचति सर्वदा ।<br>त्रयस्तस्याहमो देहा अधमोत्तममध्यमाः ॥४५॥<br>तमःसत्त्वरजःसंज्ञा जगतः कारणं स्थितेः ।<br>तमोरूपाद्धि सङ्कल्पाश्नित्यं तामसचेष्टया ॥४६॥<br>अत्यन्तं तामसो भूत्वा कृमिकीटत्वमाप्नुयात् ।<br>सत्त्वरूपो हि सङ्कल्पो धर्मज्ञानपरायणः ॥४७॥<br>अदूरमोक्षसाम्राज्यः सुखरूपो हि तिष्ठति ।<br>रजोरूपो हि सङ्कल्पो लोके संव्यवहारवान् ॥४८॥<br>परितिष्ठति संसारे पुत्रदारानुरञ्जितः ।<br>त्रिविधं तु परित्यज्य रूपमेतन्महामते ॥४९॥<br>सङ्कल्पं परमाप्नोति पदमात्मपरिक्षये ।<br>दृष्टीः सर्वाः परित्यज्य नियम्य मनसा मनः॥५०॥<br>सबाह्याभ्यन्तरार्थस्य सङ्कल्पस्य क्षयं कुरु ।<br>यदि वर्षसहस्राणि तपश्चरसि दारुणम् ॥५१॥<br>पातालस्थस्य भूस्थस्य स्वर्गस्थस्यापि तेऽनघ ।<br>नान्यः कश्चिदुपायोऽस्ति सङ्कल्पोपशमादृते ॥५२॥<br>अनाबाधेऽविकारे स्वे सुखे परमपावने ।<br>सङ्कल्पोपशमे यत्नं पौरुषेण परं कुरु ॥५३॥<br>सङ्कल्पतन्तौ निखिला भावाः प्रोताः कलानघ ।<br>छिन्ने तन्तौ न जानीमः क्व यान्ति विभवाः पराः ॥<br>निःसङ्कल्पो यथाप्राप्तव्यवहारपरो भव ।<br>क्षये सङ्कल्पजालस्य जीवो ब्रह्मत्वमाप्नुयात् ॥५५॥<br>अधिगतपरमार्थतामुपेत्य<br>प्रसभमपास्य विकल्पजालमुच्चैः ।<br>अधिगमय पदन्तदद्वितीयं<br>विततसुखाय समुन्नचित्तवृत्तिः ॥५६॥ | संकल्प करनेसे जीव स्वयं ही सदा शोक करता है।<br>इस अहंकारके सत्त्व, रज, तम नामक उत्तम, अधम और मध्यम तीन प्रकारके देह हैं। ये ही तीनों संसारकी स्थितिके कारण हैं। इनमेंसे तामस संकल्पसे नित्यप्रति तामसिक चेष्टाएँ करनेसे ही जीव अत्यन्त तमोगुणी होकर कीड़े-मकोड़े आदि योनियोंको प्राप्त होता है। जो सात्त्विक संकल्पवाला होता है वह धर्म और ज्ञानमें ही तत्पर रहनेके कारण मोक्ष-साम्राज्यके पास ही सुखपूर्वक रहता है। तथा राजस संकल्प होनेसे लोकव्यवहार करता हुआ संसारमें पुत्र, स्त्री आदिमें अनुरक्त रहता है। हे महामते ! जो पुरुष इन तीनों प्रकारके संकल्पोंको छोड़ देता है वह चित्तके लीन होनेपर परमपद प्राप्त कर लेता है। इसलिये तू समस्त विचारोंको छोड़कर और अपने मनसे ही मनका संयम- कर बाहर-भीतरके सम्पूर्ण संकल्पोंका क्षय कर दे। हे अनघ ! यदि तू पाताल, पृथिवी अथवा स्वर्ग आदिमें कहीं भी रहकर हजारों वर्ष कठोर तपस्या भी करे तो भी (संसार-बन्धनसे मुक्त होनेका तो) संकल्पनाशके अतिरिक्त और कोई उपाय है ही नहीं ॥ ४५–५२ ॥ इसलिये जो दुःखहीन, विकारहीन, स्वानन्दस्वरूप और परम पवित्र है उस संकल्पशान्तिके लिये तू पुरुषार्थपूर्वक पूर्ण प्रयत्न कर ॥५३॥ हे अनघ ! ये जितने भाव-पदार्थ हैं वे सब संकल्पके तागेमें पिरोये हुए हैं; जिस समय वह तागा टूट जाता है उस समय पता भी नहीं चलता कि संसारके ये परम वैभव कहाँ चले जाते हैं ? ॥ ५४ ॥ अतः संकल्प-विकल्पको छोड़कर प्रारब्ध-प्रवाहसे प्राप्त हुए व्यवहारमें तत्पर रह । संकल्पजालके क्षीण हो जानेपर जीवको ब्रह्मत्व प्राप्त हो जाता है ॥ ५५ ॥ परमार्थज्ञानसे सम्पन्न होकर तू हठपूर्वक सम्पूर्ण विकल्पजालको त्याग दे और पूर्ण आनन्दकी प्राप्तिके लिये चित्तवृत्तिको लीन करके उस अद्वितीय पदको प्राप्त कर ले ॥ ५६ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
उत्तरकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥
सर्ग ७ ] उत्तरकाण्ड ३६५
सप्तम सर्ग
भगवान् रामके यज्ञमें कुश और लवका गान, सीताजीका पृथिवी-प्रवेश,
रामचन्द्रजीका माताको उपदेश।
| श्रीमहादेव उवाच | **श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! वाल्मीकि मुनि- |
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| वाल्मीकिना बोधितोऽसौ कुशः सद्योगतभ्रमः।<br>अन्तर्मुक्तो बहिः सर्वमनुकुर्वंश्चचार सः ॥ १ ॥ | के इस प्रकार समझानेपर तुरन्त ही कुशका सारा भ्रम जाता रहा और वह अपने अन्तःकरणसे मुक्त होकर बाहरसे सम्पूर्ण क्रियाएँ करते हुए विचरने लगा ॥ १ ॥ |
| वाल्मीकिरपि तौ प्राह सीतापुत्रौ महाधियौ।<br>यत्र तत्र च गायन्तौ पुरे वीथिषु सर्वतः ॥ २ ॥ | तत्र वाल्मीकिजीने जहाँ-तहाँ नगरकी गलियोंमें सब ओर गाते हुए उन दोनों महाबुद्धिमान् सीता-पुत्रोंसे कहा—॥ २ ॥ |
| तस्याग्रे प्रगायेतां शुश्रूषुर्यदि राघवः।<br>न ग्राह्यं वै युवाभ्यां तद्यदि किञ्चित्प्रदास्यति ॥३॥ | “यदि महाराज रामकी सुननेकी इच्छा हो तो उनके सामने भी गाओ, परन्तु वे कुछ देने लगें तो लेना मत” ॥ ३ ॥ |
| इति तौ चोदितौ तत्र गायमानौ विचेरतुः।<br>यथोक्तं ऋषिणा पूर्वं तत्र तत्राभ्यगायताम् ॥ ४ ॥ | मुनिकी ऐसी आज्ञा होनेपर वे गाते हुए विचरने लगे। ऋषिने जहाँ-जहाँ गान करनेको पहले कहा था उन्हीं-उन्हीं स्थानोंपर उन्होंने गान किया। |
| तं स शुश्राव काकुत्स्थः पूर्वचर्यां ततस्ततः।<br>अपूर्वपाठजातिं च गेयेन समभिप्लुताम् ॥ ५ ॥ | तब ककुत्स्थनन्दन रघुनाथजीने जहाँ-तहाँ अपने पूर्व-चरित्रके गाये जानेका समाचार सुना। |
| बाल्यो राघवः श्रुत्वा कौतूहलमुपेयिवान्।<br>अथ कर्मान्तरे राजा समाहूय महामुनीन् ॥६॥ | भगवान् रामको यह सुनकर कि, उन बालकोंकी गान-विधि निराले ही ढंगकी और स्वर-ताल-सम्पन्न है, बड़ा ही कुतूहल हुआ। |
| राज्ञश्चैव नरव्याघ्रः पण्डितांश्चैव नैगमान्।<br>पौराणिकाञ् शब्दविदो ये च वृद्धा द्विजातयः ॥७॥ | अतः नरशार्दूल महाराज रामने यज्ञकर्मके विश्राम-समयमें सम्पूर्ण मुनीश्वरों, राजाओं, पण्डितों, शास्त्रज्ञों, पौराणिकों, शब्दशास्त्रियों, बड़े-बूढ़ों और द्विजातियोंको बुलाया ॥ ४-७ ॥ |
| एतान्सर्वान्समाहूय गायकौ समवेशयत्।<br>ते सर्वे हृष्टमनसो राजानो ब्राह्मणादयः ॥ ८ ॥ | इन सबको बुला चुकनेपर उन्होंने गानेवाले बालकोंको बुलाया। वे सब राजा और ब्राह्मण आदि प्रसन्न-चित्तसे महाराज राम और उन |
| रामं तौ दारको दृष्ट्वा विस्मिता ह्यनिमेषणाः।<br>अवोचन् सर्व एवेते परस्परमथागताः ॥ ९ ॥ | दोनों बालकोंको देखकर आश्चर्यचकित हो गये और उनकी टकटकी बँध गयी। तब वहाँ एकत्रित हुए वे सब लोग आपसमें कहने लगे—॥ ८-९॥ |
| इमौ रामस्य सदृशौ बिम्बाद्विम्बमिवोदितौ।<br>जटिलौ यदि न स्यातां न च वल्कलधारिणौ ॥१०॥ | “ये दोनों तो, बिम्बसे प्रकट हुए प्रतिबिम्बके समान, श्रीरामचन्द्रजीके समान ही दिखायी देते हैं। यदि ये जटाजूट और वल्कल धारण किये न होते तो इनमें और रघुनाथजीमें कोई |
| विशेषं नाधिगच्छामो राघवस्यानयोस्तदा।<br>एवं संवदतां तेषां विस्मितानां परस्परम् ॥११॥ | अन्तर ही न जान पड़ता।” इस प्रकार, जब वे सब लोग आश्चर्यचकित होकर आपसमें विवाद कर रहे थे |
| उपनद्धमभूत्तूर्णं तावुभौ मुनिदारकौ।<br>ततः प्रवृत्तं मधुरं गान्धर्वमतिमानुषम् ॥१२॥ | उन दोनों मुनिकुमारोंने गानेकी तैयारी की और (कुछ ही देरमें) वहाँ अत्यन्त मधुर एवं अलौकिक गान होने लगा ॥ १०--१२ ॥ |
| ३६६ | अध्यात्मरामायण | [ सर्गः ७ |
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श्रुत्वा तन्मधुरं गीतमपराह्ने रघूत्तमः ।<br>उवाच भरतं चाभ्यां दीयतामयुतं वसु ॥१३॥<br>दीयमानं सुवर्णं तु न तज्जगृहतुस्तदा ।<br>किमनेन सुवर्णेन राजनौ वन्यभोजनौ ॥१४॥<br>इति सन्त्यज्य सन्दत्तं जग्मतुर्मु निसन्निधिम् ।<br>एवं श्रुत्वा तु चरितं रामः स्वस्यैव विस्मितः ॥१५॥<br>ज्ञात्वा सीताकुमारौ तौ शत्रुघ्नं चेदमब्रवीत् ।<br>हनूमन्तं सुषेणं च विभीषणमथाङ्गदम् ॥१६॥<br>भगवन्तं महात्मानं वाल्मीकिं मुनिसत्तमम् ।<br>आनयध्वं मुनिवरं ससीतं देवसम्मितम् ॥१७॥<br>अस्यास्तु पर्षदो मध्ये प्रत्ययं जनकात्मजा ।<br>करोतु शपथं सर्वे जानन्तु गतकल्मषाम् ॥१८॥<br>सीतां तद्वचनं श्रुत्वा गताः सर्वेऽतिविस्मिताः ।<br>ऊचुर्यथोक्तं रामेण वाल्मीकिं रामपार्षदाः ॥१९॥<br>रामस्य हृद्गतं सर्वं ज्ञात्वा वाल्मीकिरब्रवीत् ।<br>श्वः करिष्यति वै सीता शपथं जनसंसदि ॥२०॥<br>योषितां परमं दैवं पतिरेव न संशयः ।<br>तच्छ्रुत्वा सहसा गत्वा सर्वे प्रोचुर्मुनेर्वचः ॥२१॥<br>राघवस्यापि रामोऽपि श्रुत्वा मुनिवचस्तथा ।<br>राजानो मुनयः सर्वे शृणुध्वमिति चाब्रवीत् ॥२२॥<br>सीतायाः शपथं लोका विजानन्तु शुभाशुभम् ।<br>इत्युक्ता राघवेणाथ लोकाः सर्वे दिदृक्षवः ॥२३॥<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चैव महर्षयः ।<br>वानराश्च समाजग्मुः कौतूहलसमन्विताः ॥२४॥<br>ततो मुनिवरस्तूर्णं ससीतः समुपागमत् ।<br>अग्रतस्तमृषिं कृत्वाऽऽयान्ती किञ्चिदवाङ्मुखी २५<br>कृताञ्जलिर्बाष्पकण्ठा सीता यज्ञं विवेश तम् ।<br>दृष्ट्वा लक्ष्मीमिवायान्तीं ब्रह्माणमनुयायिनीम् ॥२६॥ | वह मधुर गान सुनकर श्रीरघुनाथजीने दिन ढलने-पर भरतजीसे कहा—"इन्हें दश सहस्र सुवर्ण-मुद्रा दो" ॥ १३ ॥ किन्तु उन बालकोंने उस दिये हुए सुवर्णको ग्रहण न किया । वे ऐसा कहकर कि 'हे राजन् ! हम तो वनके कन्द-मूल-फलादि खानेवाले हैं, हम यह द्रव्य लेकर क्या करेंगे' उस दिये हुए सुवर्णको वहीं छोड़कर मुनिके निकट चले आये । इस प्रकार भगवान् राम अपना ही चरित्र सुनकर विस्मित हो गये ॥ १४-१५ ॥ और उन्हें सीताजीके पुत्र जानकर शत्रुघ्न, हनुमान, सुषेण, विभीषण और अंगदादिसे कहा— ॥ १६ ॥ "देवंतुल्य महानुभाव मुनिश्रेष्ठ भगवान् श्रीवाल्मीकि मुनिको सीताजीके सहित लाओ ॥ १७ ॥ इस सभामें जानकीजी सबको विश्वास करानेके लिये शपथ करें, जिससे सब लोग सीताको निष्कलंक जान जायँ ।" भगवान् रामके ये वचन सुनकर उनके वे सब दूत अति आश्चर्यचकित हो वाल्मीकिजीके पास गये और जैसा श्रीरामचन्द्रजीने कहा था वह सब उनसे कह दिया ॥ १८-१९ ॥ इससे भगवान् रामका आशय जानकर श्रीवाल्मीकिजीने कहा-"सीताजी कल जनसाधारणमें शपथ करेंगी ॥ २० ॥ इसमें सन्देह नहीं, स्त्रियोंके लिये सबसे बड़ा देव पति ही है।" मुनिके ये वचन सुनकर उन सबने सहसा जाकर वे सब बातें रघुनाथजीसे कह दीं। तब श्रीरामचन्द्रजीने मुनिका सन्देश सुनकर कहा—"हे नृपतिगण और मुनिजन ! अब आप सब लोग सीताजीकी शपथ सुनें; और उससे उनका शुभाशुभ जान लें ।"<br><br>भगवान् रामके इस प्रकार कहनेपर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, महर्षि और वानर आदि सभी लोग कुतूहलवश सीताजीकी शपथ देखनेके लिये आये॥ २१-२४ ॥ तब तुरन्त ही सीताजीके सहित मुनीश्वर भी आये । श्रीसीताजीने वाल्मीकि मुनिको आगे कर (उनके पीछे-पीछे) मुख कुछ नीचेको किये हाथ जोड़े गद्गद-कण्ठसे यज्ञशालामें प्रवेश किया । ब्रह्माजीके पीछे आती हुई लक्ष्मीजीके समान सीताजीको वाल्मीकि मुनिके पीछे आती |
[ सर्ग ९७ ] | उत्तरकाण्ड | ३६७
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वाल्मीकेः पृष्ठतः सीतां साधुवादो महानभूत् ।<br>तदा मध्ये जनौघस्य प्रविश्य मुनिपुङ्गवः ॥२७॥<br><br>सीतासहायो वाल्मीकिरिति प्राह च राघवम् ।<br>इयं दाशरथे सीता सुव्रता धर्मचारिणी ॥२८॥<br><br>अपापा ते पुरा त्यक्ता ममाश्रमसमीपतः ।<br>लोकापवादभीतेन त्वया राम महावने ॥२९॥<br><br>प्रत्ययं दास्यते सीता तदनुज्ञातुमर्हसि ।<br>इमौ तु सीतातनयाविमौ यमलजातको ॥३०॥<br><br>सुतौ तु तव दुर्धर्षो तथ्यमेतद्ब्रवीमि ते ।<br>प्रचेतसोऽहं दशमः पुत्रो रघुकुलोद्वह ॥३१॥<br><br>अनृतं न स्मराम्युक्तं यथेमौ तव पुत्रकौ ।<br>बहून्वर्षगणान् सम्यक्तपश्चर्या मया कृता ॥३२॥<br><br>नोपाश्नीयां फलं तस्या दुष्टेयं यदि मैथिली ।<br>वाल्मीकिनैवमुक्तस्तु राघवः प्रत्यभाषत ॥३३॥<br><br>एवमेतन्महाप्राज्ञ यथा वदसि सुव्रत ।<br>प्रत्ययो जनितो मह्यं तव वाक्यैरकिल्विषैः ॥३४॥<br><br>लङ्कायामपि दत्तो मे वैदेह्या प्रत्ययो महान् ।<br>देवानां पुरतस्तेन मन्दिरे सम्प्रवेशिता ॥३५॥<br><br>सेयं लोकभयाद्ब्रह्मन्नपापाऽपि सती पुरा ।<br>सीता मया परित्यक्ता भवांस्तत्क्षन्तुमर्हति ॥३६॥<br><br>ममैव जातौ जानामि पुत्रावेतौ कुशीलवौ ।<br>शुद्धायां जगतीमध्ये सीतायां प्रीतिरस्तु मे ॥३७॥<br><br>देवाः सर्वे परिज्ञाय रामाभिप्रायमुत्सुकाः ।<br>ब्राह्मणमग्रतः कृत्वा समाजग्मुः सहस्रशः ॥३८॥<br><br>प्रजाः समागमन्हृष्टाः सीता कौशेयवासिनी ।<br>उदङ्मुखी ह्यधोदृष्टिः प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥३९॥ | देख उस जन-समाजमें बड़ा भारी साधुवाद (धन्य है, धन्य है—ऐसा शब्द) होने लगा । तब सीताजीके सहित मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकिने उस जन-समूहमें घुसकर श्रीरघुनाथजीसे कहा—"हे दशरथनन्दन ! इस पतिव्रता धर्मपरायणा निष्कलङ्का सीताको तुमने कुछ समय हुआ लोकापवादसे डरकर भयंकर वनमें मेरे आश्रमके पास छोड़ दिया था ॥ २५--२९ ॥ अब वह अपना विश्वास देना चाहती है, आप उसे आज्ञा दीजिये । ये दोनों (कुश और लव) सीताके एक साथ उत्पन्न हुए पुत्र हैं ॥ ३० ॥ मैं सच कहता हूँ, ये दोनों दुर्जय-वीर आपकी ही सन्तान हैं। हे राघव ! मैं प्रजापति प्रचेता-का दशवाँ पुत्र हूँ ॥ ३१ ॥ मैंने कभी मिथ्या भाषण किया हो—ऐसा मुझे स्मरण नहीं है; वही मैं आपसे कहता हूँ कि ये बालक आपकीके पुत्र हैं। मैंने अनेकों वर्षतक खूब तपस्या की है ॥३२॥ यदि इस मिथिलेश-कुमारीमें कोई दोष हो तो मुझे उस तपस्याका कोई फल न मिले ।"<br><br>वाल्मीकिजीके इस प्रकार कहनेपर श्रीरघुनाथजी बोले—॥ ३३ ॥ "हे महाप्राज्ञ ! हे सुव्रत ! आप जैसा कहते हैं, बात ऐसी ही है । आपके निर्दोष वाक्योंसे ही मुझे तो पूर्ण विश्वास हो गया ॥ ३४ ॥ जानकी-जीने लंकामें भी देवताओंके सामने बड़ी विकट परीक्षा दी थी, इसीलिये मैंने उन्हें अपने घरमें रख लिया था ॥ ३५ ॥ किन्तु हे ब्रह्मन् ! उन्हीं सती सीताजीको, सर्वथा निर्दोष होते हुए भी, मैंने लोकनिन्दाके भयसे कुछ दिन हुए छोड़ दिया, सो आप मेरा यह अपराध क्षमा करें ॥ ३६ ॥ मैं यह भी जानता हूँ कि ये दोनों पुत्र कुश और लव मुझसेही उत्पन्न हुए हैं; संसारमें परम साध्वी सीतामें मेरी प्रीति हो" ॥ ३७ ॥<br><br>उस समय, रामजीका अभिप्राय जानकर समस्त देवगण अति उत्सुक हो ब्रह्माजीको आगे कर सहस्रोंकी संख्यामें वहाँ आये ॥ ३८ ॥ तथा बहुत-से प्रजाजन भी प्रसन्नचित्तसे वहाँ एकत्रित हो गये । तब रेशमी वस्त्र धारण किये उत्तरकी ओर मुख और नीचेको नेत्र किये खड़ी हुई श्रीसीताजीने हाथ जोड़कर कहा— |
उत्तरकाण्ड - सर्ग ७: कुश-लवका गान, सीताजीका पृथिवी-प्रवेश, माताको उपदेश
| ३६८ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ७ |
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रामादन्यं यथाऽहं वै मनसापि न चिन्तये ।<br>तथा मे धरणी देवी विवरं दातुमर्हति ॥४०॥ | ॥ ३९ ॥ "यदि मैं भगवान् रामके अतिरिक्त अन्य पुरुषका मनसे भी चिन्तन नहीं करती तो पृथिवीदेवी मुझे आश्रय दें" ॥ ४० ॥ तथा शपन्त्याः सीतायाः प्रादुरासीन्महाद्भुतम् ।<br>भूतलाद्दिव्यमत्यर्थं सिंहासनमनुत्तमम् ॥४१॥<br>नागेन्द्रैर्ध्रियमाणं च दिव्यदेहै रविप्रभम् ।<br>भूदेवी जानकीं दोर्भ्यां गृहीत्वा स्नेहसंयुता ॥४२॥<br>स्वागतं तासुवाचैनामासने संन्यवेशयत् ।<br>सिंहासनस्थां वैदेहीं प्रविशन्तीं रसातलम् ॥४३॥<br>निरन्तरा पुष्पवृष्टिर्दिव्या सीतामवाकिरत् ।<br>साधुवादश्च सुमहान् देवानां परमाद्भुतः ॥४४॥<br>ऊचुश्च बहुधा वाचो ह्यन्तरिक्षगताः सुराः ।<br>अन्तरिक्षे च भूमौ च सर्वे स्थावरजङ्गमाः ॥४५॥<br>वानराश्च महाकायाः सीताशपथकारणात् ।<br>केचिच्चिन्तापरास्तस्य केचिद्ध्यानपरायणाः॥४६॥<br>केचिद्रामं निरीक्षन्तः केचित्सीतामचेतसः ।<br>मुहूर्तमात्रं तत्सर्वं तूष्णीं भूतमचेतनम् ॥४७॥ | श्रीसीताजीके इस प्रकार शपथ करते ही भूमितलसे एक अति अद्भुत, परम दिव्य और अत्यन्त श्रेष्ठ सिंहासन प्रकट हुआ ॥ ४१ ॥ उस सूर्यके समान् तेजस्वी सिंहासनको दिव्यशरीरधारी नागराजोंने धारण किया हुआ था। तब पृथिवीदेवीने जानकीजीको अपनी दोनों भुजाओंसे प्रेमपूर्वक ग्रहण कर उनका स्वागत किया और उन्हें आसनपर बिठा लिया। जब श्रीसीताजी सिंहासनपर बैठकर रसातलको जाने लगीं तो उनपर दिव्य पुष्पोंकी निरन्तर वर्षा होने लगी और देवताओंके मुखसे साधुवादका अति अद्भुत और महान् घोष होने लगा ॥ ४२--४४ ॥ आकाशमें स्थित देवगण नाना प्रकारके वचन बोलने लगे । सीताजीके शपथ करनेसे आकाश और पृथिवीतलके समस्त स्थावर-जंगम प्राणियों और बड़े-बड़े डीलवाले वानरोंमेंसे कोई चिन्ता करने लगे, कोई ध्यानस्थ हो गये ॥ ४५-४६ ॥ तथा कोई रामजीकी और कोई सीताजीकी ओर देखकर अचेत हो गये । एक मुहूर्तके लिये वह सारा समाज स्तब्ध और चेतनाशून्य हो गया ॥ ४७॥ सीताप्रवेशनं दृष्ट्वा सर्वं संमोहितं जगत् ।<br>रामस्तु सर्वं ज्ञात्वैव भविष्यत्कार्यगौरवम् ॥४८॥<br>अजानन्निव दुःखेन शुशोच जनकात्मजाम् ।<br>ब्रह्मणा ऋषिभिः सार्धं बोधितो रघुनन्दनः ॥४९॥<br>प्रतिबुद्ध इव स्वप्नाच्चकारानन्तराः क्रियाः ।<br>विससर्ज ऋषीन् सर्वानृत्विजो ये समागताः॥५०॥<br>तान् सर्वान् धनरत्नाद्यैस्तोषयामास भूरिशः ।<br>उपादाय कुमारौ तावयोध्यागमत्प्रभुः ॥५१॥<br>तदादि निःस्पृहो रामः सर्वभोगेषु सर्वदा ।<br>आत्मचिन्तापरो नित्यमेकान्ते समुपस्थितः॥५२॥<br>एकान्ते ध्याननिरते एकदा राघवे सति ।<br>ज्ञात्वा नारायणं साक्षात्कौसल्या प्रियवादिनी ॥५३॥ | सीताजीका पृथिवी-प्रवेश देखकर सारा संसार मोहित हो गया । भगवान् राम आगामी कार्यका सम्पूर्ण महत्व जानते थे तथापि अनजानके समान सीताजीके लिये शोक करने लगे । तब ऋषियोंके सहित ब्रह्माजीने रघुनाथजीको समझाया ॥ ४८-४९ ॥ तदनन्तर उन्होंने सोकर उठे हुएके समान यज्ञका अवशेष कर्म समाप्त किया और यज्ञके ऋत्विक् होकर जो ऋषिगण आये थे उन सबको रत्न और धन आदिसे भली प्रकार सन्तुष्टकर विदा किया। फिर प्रभु राम उन दोनों कुमारोंको साथ लेकर अयोध्यापुरीमें आये ॥ ५०-५१ ॥ तबसे श्रीरामचन्द्रजी सब भोगोंसे विरक्त होकर निरन्तर आत्मचिन्तन करते हुए एकान्तमें रहने लगे ॥ ५२ ॥<br>एक दिन जब श्रीरघुनाथजी एकान्तमें ध्यानमग्न थे, प्रियभाषिणी श्रीकौसल्याजीने उन्हें साक्षात् नारायण
| सर्ग ७ ] | उत्तरकाण्ड | ३६९ |
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| भक्त्याऽऽगत्य प्रसन्नं तं प्रणता प्राह हृष्टधीः ।<br>राम त्वं जगतामादिरादिमध्यान्तवर्जितः ॥५४॥ | जानकर अति भक्तिभावसे उनके पास आ उन्हें प्रसन्न जान अति हर्षसे विनयपूर्वक कहा—“हे राम ! तुम संसारके आदिकारण हो, तथा स्वयं आदि, अन्त और मध्यसे रहित हो ॥ ५३-५४॥ |
| परमात्मा परानन्दः पूर्णः पुरुष ईश्वरः ।<br>जातोऽसि मे गर्भगृहे मम पुण्यातिरेकतः ॥५५॥ | तुम परमात्मा, परानन्दस्वरूप, सर्वत्र पूर्ण, जीवरूपसे शरीररूप पुरमें शयन करनेवाले और सबके स्वामी हो; मेरे प्रबल पुण्यके उदय होनेसे ही तुमने मेरे गर्भसे जन्म लिया है ॥५५॥ |
| अवसाने ममाप्यद्य समयोऽभूद्रघूत्तम ।<br>नाद्याप्यबोधजः कृत्स्नो भवबन्धो निवर्तते ॥५६॥ | हे रघुश्रेष्ठ ! अब अन्त-समयमें मुझे आज ही (आपसे कुछ पूछनेका) समय मिला है, अभीतक मेरा अज्ञानजन्य संसार-बन्धन पूर्णतया नहीं टूटा ॥५६॥ |
| इदानीमपि मे ज्ञानं भवबन्धनिर्वर्तकम् ।<br>यथा संक्षेपतो भूयात्तथा बोधय मां विभो ॥५७॥ | हे विभो! मुझे संक्षेपमें कोई ऐसा उपदेश दीजिये जिससे अब भी मुझे भवबन्धनका काटनेवाला ज्ञान हो जाय” ॥५७॥ |
| निर्वेदवादिनीमेवं मातरं मातृवत्सलः ।<br>दयालुः प्राह धर्मात्मा जराजर्जरितां शुभाम् ॥५८॥ | माताके इस प्रकार वैराग्यपूर्ण वचन कहनेपर मातृ-भक्त, दयामय, धर्मपरायण भगवान् रामने जराजर्जरित शुभलक्षणा कौसल्याजीसे कहा—॥ ५८ ॥ |
| मार्गास्त्रयो मया प्रोक्ताः पुरा मोक्षाप्तिसाधकाः।<br>कर्मयोगो ज्ञानयोगो भक्तियोगश्च शाश्वतः ॥५९॥ | “मैंने पूर्व-कालमें मोक्षप्राप्तिके साधनरूप तीन मार्ग बतलाये हैं—कर्मयोग, ज्ञानयोग और सनातन भक्तियोग ॥ ५९ ॥ |
| भक्तिर्विभिद्यते मातस्त्रिविधा गुणभेदतः ।<br>स्वभावो यस्य यस्तेन तस्य भक्तिर्विभिद्यते ॥६०॥ | हे मातः ! (साधकके) गुणानुसार भक्तिके तीन भेद हैं। जिसका जैसा स्वभाव होता है उसकी भक्ति भी वैसे ही भेदवाली होती है ॥६०॥ |
| यस्तु हिंसां समुद्दिश्य दम्भं मात्सर्यमेव वा ।<br>भेददृष्टिश्च संरम्भी भक्तो मे तामसः स्मृतः ॥६१॥ | जो पुरुष हिंसा, दम्भ या मात्सर्यके उद्देश्यसे भक्ति करता है, तथा जो भेददृष्टिवाला और क्रोधी होता है वह तामस भक्त कहा गया है ॥ ६१ ॥ |
| फलाभिसन्धिर्भोगाथीं धनकामो यशस्तथा ।<br>अर्चादौ भेदबुद्ध्या मां पूजयेत्स तु राजसः॥६२॥ | जो फलकी इच्छावाला, भोग चाहनेवाला तथा धन और यशकी कामनावाला होता है और भेदबुद्धिसे प्रतिमा आदिमें मेरी पूजा करता है वह रजोगुणी होता है ॥ ६२ ॥ |
| परस्मिन्नर्पितं यस्तु कर्मनिर्हरणाय वा ।<br>कर्तव्यमिति वा कुर्याद्भेदबुद्ध्या स सात्त्विकः । ६३। | तथा जो पुरुष परमात्माको अर्पण किये हुए कर्म-सम्पादन करनेके लिये अथवा 'करना चाहिये' इसलिये भेदबुद्धिसे कर्म करता है वह सात्त्विक है ॥ ६३ ॥ |
| मद्गुणाश्रयणादेव मय्यनन्तगुणालये ।<br>अविच्छिन्ना मनोवृत्तिर्यथा गङ्गाम्बुनोऽम्बुधौ ।<br>तदेव भक्तियोगस्य लक्षणं निर्गुणस्य हि ॥६४॥ | जिस प्रकार गङ्गाजीका जल समुद्रमें अविच्छिन्न-भावसे लीन रहता है उसी प्रकार मनोवृत्तिका मेरे गुणों-के आश्रयसे मुझ अनन्त-गुणधाममें निरन्तर लीन हो जाना ही मेरे निर्गुण-भक्तियोगका लक्षण है ॥ ६४ ॥ |
| अहैतुक्यव्यवहिता या भक्तिर्मयि जायते । | मेरे प्रति जो निष्काम और अखण्ड भक्ति उत्पन्न होती है |
| ३७० | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ७ |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सा मे सालोक्यसामीप्यसार्ष्ट्रिसायुज्यमेव वा ॥६५॥<br>ददात्यपि न गृह्णन्ति भक्ता मत्सेवनं विना ।<br>स एवात्यन्तको योगो भक्तिमार्गस्य भामिनि ६६<br>मद्भावं प्राप्नुयात्तेन अतिक्रम्य गुणत्रयम् ॥६७॥<br><br>महता कामहीनेन स्वधर्माचरणेन च ।<br>कर्मयोगेन शस्तेन वर्जितेन विहिंसनात् ।<br>मद्दर्शनस्तुतिमहापूजाभिः स्मृतिवन्दनैः ॥६८॥<br>भूतेषु मद्भावनया सङ्गेनासत्यवर्जनैः ।<br>बहुमानेन महतां दुःखिनाम नुकम्पया ॥६९॥<br>स्वसमानेषु मैत्र्या च यमादीनां निषेवया ।<br>वेदान्तवाक्यश्रवणान्मम नामानुकीर्तनात् ॥७०॥<br>सत्सङ्गेनाऽऽर्जवेनैव ह्यहमः परिवर्जनात् ।<br>काङ्क्षया मम धर्मस्य परिशुद्धान्तरो जनः ॥७१॥<br>मद्गुणश्रवणादेव याति मामञ्जसा जनः ॥७२॥<br>यथा वायुवशाद्गन्धः स्वाश्रयाद्घ्राणमाविशेत् ।<br>योगाभ्यासरतं चित्तमेवमात्मानमाविशेत् ।<br>सर्वेषु प्राणिजातेषु ह्यहमात्मा व्यवस्थितः ॥७३॥<br>तमज्ञात्वा विमूढात्मा कुरुते केवलं बहिः ।<br>क्रियोत्पन्नैरनेकभेदैर्द्रव्यैर्ने माम्ब तोषणम् ॥७४॥<br>भूतावमानिनाऽर्चाय्यामर्चितोऽहं न पूजितः॥७५॥<br>तावन्मामर्चयेद्देवं प्रतिमादौ स्वकर्मभिः ।<br>यावत्सर्वेषु भूतेषु स्थितं चात्मनि न स्मरेत् ॥७६॥<br>यस्तु भेदं प्रकुरुते स्वात्मनश्च परस्य च ।<br>भिन्नदृष्टेर्भयं मृत्युस्तस्य कुर्यान्न संशयः ॥७७॥ | वह साधकको सालोक्य, सामीप्य, सार्ष्टि और सायुज्य* चार प्रकारकी मुक्ति देती है; किन्तु उसके देनेपर भी वे भक्तजन मेरी सेवाके अतिरिक्त और कुछ ग्रहण नहीं करते । हे मात: ! भक्तिमार्गका आत्यन्तिक योग यही है ॥ ६५-६६ ॥ इसके द्वारा भक्त तीनों गुणोंको पार कर मेरा ही रूप हो जाता है ॥ ६७ ॥<br><br>(अब इस निर्गुण भक्तिका साधन बतलाता हूँ-)<br>अपने धर्मका अत्यन्त निष्काम भावसे आचरण करनेसे, अत्युत्तम हिंसारहित कर्म-योगसे, मेरे दर्शन, स्तुति, महापूजा, स्मरण और वन्दनसे ॥६८॥ प्राणियोंमें मेरी भावना करनेसे, असत्यके त्याग और सत्सङ्गसे, महापुरुषोंका अत्यन्त मान करनेसे, दुःखियोंपर दया करनेसे ॥६९॥ अपने समान पुरुषोंसे मैत्री करनेसे यम-नियमादिका सेवन करनेसे, वेदान्तवाक्योंका श्रवण करनेसे, मेरा नाम-सङ्कीर्तन करनेसे ॥७०॥ सत्सङ्ग और कोमलतासे, अहङ्कारका त्याग करनेसे और मेरे भागवत-धर्मोंकी इच्छा करनेसे जिसका चित्त शुद्ध हो गया है, वह पुरुष मेरे गुणोंका श्रवण करनेसे ही अति सुगमतासे मुझे प्राप्त कर लेता है ॥७१-७२॥ जिस प्रकार वायुके द्वारा गन्ध अपने आश्रयको छोड़कर घ्राणेन्द्रियमें प्रविष्ट होता है उसी प्रकार योगाभ्यासमें लगा हुआ चित्त आत्मामें लीन हो जाता है । समस्त प्राणियोंमें आत्मारूपसे मैं ही स्थित हूँ ॥७३॥ हे मात: ! उसे न जानकर मूढ-पुरुष बाह्य भावना करता है, किन्तु क्रियासे उत्पन्न हुए अनेक पदार्थोंसे भी मेरा सन्तोष नहीं होता ॥ ७४ ॥ अन्य जीवोंका तिरस्कार करनेवाले प्राणियोंसे प्रतिमामें पूजित होकर भी मैं वास्तवमें पूजित नहीं होता ॥७५॥ मुझ परमात्मदेवका अपने कर्मोंद्वारा प्रतिमा आदिमें तभीतक पूजन करना चाहिये जबतक कि समस्त प्राणियोंमें और अपने आपमें मुझे स्थित न जाने ॥७६॥ जो अपने आत्मा और परमात्मामें भेद-बुद्धि करता है उस भेददर्शीको मृत्यु अवश्य भय उत्पन्न करती है, इसमें सन्देह नहीं ॥७७॥ इस- |
* वैकुण्ठादि भगवान्के लोकोंको प्राप्त करना 'सालोक्य' मुक्ति है। हर समय भगवान्हीके निकट रहना 'सामीप्य' है, भगवान्के समान ऐश्वर्य लाभ करना 'सार्ष्टि' है और भगवान्में लीन हो जाना 'सायुज्य' है।
सर्ग ७] — उत्तरकाण्ड — ३७१
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मामन्तः सर्वभूतेषु परिच्छिन्नेषु संस्थितम् ।<br>एकं ज्ञानेन मानेन मैत्र्या चार्चेदभिन्नधीः ॥७८॥ | लिये अभेददर्शी भक्त समस्त परिच्छिन्न प्राणियोंमें स्थित मुझ एकमात्र परमात्माका ज्ञान, मान और मैत्री आदिसे पूजन करे ॥७८॥ |
| चेतसैवानिशं सर्वभूतानि प्रणमेत्सुधीः ।<br>ज्ञात्वा मां चेतनं शुद्धं जीवरूपेण संस्थितम् ॥७९॥ | इस प्रकार मुझ शुद्ध चेतनको ही जीवरूपसे स्थित जानकर बुद्धिमान् पुरुष अहर्निश सब प्राणियोंको चित्तसे ही प्रणाम करे ॥७९॥ |
| तस्मात्कदाचिन्नैक्षेत भेदमीश्वरजीवयोः ।<br>भक्तियोगो ज्ञानयोगो मया मातरुदीरितः ॥८०॥<br>आलम्ब्यैकतरं वापि पुरुषः शुभमृच्छति । | इसलिये जीव और ईश्वरका भेद कभी न देखे । हे मातः ! मैंने तुमसे यह भक्तियोग और ज्ञानयोगका वर्णन किया ॥८०॥ इनमेंसे एकका भी अवलम्बन करनेसे पुरुष आत्यन्तिक शुभ प्राप्त कर लेता है । |
| ततो मां भक्तियोगेन मातः सर्वहृदि स्थितम् ।<br>पुत्ररूपेण वा नित्यं स्मृत्वा शान्तिमवाप्स्यसि ॥८१॥ | अतः हे मातः ! मुझे सब प्राणियोंके अन्तःकरणमें स्थित जानते हुए अथवा पुत्ररूपसे भक्तियोगके द्वारा नित्यप्रति स्मरण करते रहनेसे तुम शान्ति प्राप्त करोगी” ॥८१॥ |
| श्रुत्वा रामस्य वचनं कौसल्याऽऽनन्दसंयुता ॥८२॥<br>रामं सदा हृदि ध्यात्वा छित्त्वा संसारबन्धनम् ।<br>अतिक्रम्य गतीस्तिस्रोऽप्यवाप परमां गतिम् ॥८३॥ | भगवान् रामके ये वचन सुनकर कौसल्याजी आनन्दसे भर गयीं ॥८२॥ और हृदयमें निरन्तर श्रीरामचन्द्रजीका ध्यान करती हुई संसार-बन्धनको काटकर (जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति) तीनों प्रकारकी अवस्थाओंको पारकर परम गतिको प्राप्त हुईं ॥८३॥ |
| कैकेयी चापि योगं रघुपतिगदितं पूर्वमेवाधिगम्य<br>श्रद्धाभक्तिप्रशान्ता हृदि रघुतिलकं भावयन्ती गतासुः ।<br>गत्वा स्वर्गं स्फुरन्ती दशरथसहिता मोदमानावतस्थे<br>माता श्रीलक्ष्मणस्याप्यतिविमलमतिः प्राप भर्तुः समीपम् ॥८४॥ | कैकेयीने भी रघुनाथजीद्वारा पहले (चित्रकूट पर्वतपर) कहे हुए योगको हृदयंगम कर श्रद्धा और भक्ति-भावसे शान्तिपूर्वक हृदयमें रघुकुलतिलक भगवान् रामका ध्यान करते हुए प्राणत्याग किया और स्वर्गलोकमें जाकर दशरथजीके साथ सुशोभित हो आनन्दपूर्वक रहने लगीं । इसी प्रकार श्रीलक्ष्मणजीकी माता अत्यन्त विमल बुद्धिवाली सुमित्राने भी अपने पतिका सामीप्य प्राप्त किया ॥ ८४ ॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे उत्तरकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥
३७२ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ८]
अष्टम सर्ग
कालका आगमन, लक्ष्मणजीका परित्याग और उनका स्वर्गगमन।
| श्रीमहादेव उवाच | श्रीमहादेवजी बोले— |
|---|---|
| अथ काले गते कस्मिन् भरतो भीमविक्रमः ।<br>युधाजिता मातुलेन ह्याहूतोऽगात्ससैनिकः ॥ १ ॥<br><br>रामाज्ञया गतस्तत्र हत्वा गन्धर्वनायकान् ।<br>तिस्रः कोटीः पुरे द्वे तु निवेश्य रघुनन्दनः ॥ २ ॥<br><br>पुष्करं पुष्करावत्यां तक्षं तक्षशिलाह्वये ।<br>अभिषिच्य सुतौ तत्र धनधान्यसुहृद्वृतौ ॥ ३ ॥<br><br>पुनरागत्य भरतो रामसेवापरोऽभवत् ।<br>ततः प्रीतो रघुश्रेष्ठो लक्ष्मणं प्राह सादरम् ॥ ४ ॥<br><br>उभौ कुमारौ सौमित्रे गृहीत्वा पश्चिमां दिशम् ।<br>तत्र भिल्लान्विनिर्जित्य दुष्टान् सर्वापकारिणः ॥ ५ ॥<br><br>अङ्गदश्चित्रकेतुश्च महासत्त्वपराक्रमौ ।<br>द्वयोर्द्वे नगरे कृत्वा गजाश्वधनरत्नकैः ॥ ६ ॥<br><br>अभिषिच्य सुतौ तत्र शीघ्रमागच्छ मां पुनः ।<br>रामस्याज्ञां पुरस्कृत्य गजाश्वबलवाहनः ॥ ७ ॥<br><br>गत्वा हत्वा रिपून् सर्वान् स्थापयित्वा कुमारकौ ।<br>सौमित्रिः पुनरागत्य रामसेवापरोऽभवत् ॥ ८ ॥ | हे पार्वति ! कुछ काल बीतनेपर उग्रपराक्रमी भरतजी अपने मामा युधाजित्-द्वारा बुलाये जानेपर भगवान् रामकी आज्ञा लेकर सेनासहित उनके यहाँ गये। वहाँ पहुँचकर रघुकुलनन्दन भरतजीने तीन करोड़ प्रमुख गन्धर्वोंको मार कर दो नगर बसाये ॥१-२॥ उन्होंने पुष्करावतीमें पुष्कर और तक्षशिलामें तक्ष नामक अपने दोनों पुत्रोंको अभिषिक्त कर और उन्हें धन-धान्य तथा मित्र-मण्डलसे सम्पन्न कर वे लौट आये और भगवान् रामकी सेवामें तत्पर हो गये। तब रघुनाथजीने प्रसन्न होकर आदरपूर्वक लक्ष्मणजीसे कहा—॥३-४॥ "हे सुमित्रानन्दन ! तुम अपने दोनों कुमारोंको लेकर पश्चिम दिशामें जाओ और वहाँ सबका अपकार करनेवाले दुष्ट भिल्लोंको जीतकर दोनोंके लिये दो नगर बसाओ और उनमें महाबलवान् और पराक्रमी अङ्गद तथा चित्रकेतुका हाथी, घोड़े, धन और रत्नादि उपकरणोंसे राजतिलक कर फिर तुरन्त ही मेरे पास लौट आओ।" भगवान् रामकी इस आज्ञाको शिरोधार्य कर लक्ष्मणजी हाथी-घोड़े आदि दल-बलके सहित गये और समस्त शत्रुओंको मारकर दोनों कुमारोंको राजपदपर नियुक्त कर लौट आये तथा फिर रामसेवामें तत्पर हो गये ॥५-८॥ |
| ततस्तु काले महति प्रयाते<br>रामं सदा धर्मपथे स्थितं हरिम् ।<br>द्रष्टुं समागादृषिवेषधारी<br>कालस्ततो लक्ष्मणमित्युवाच ॥ ९ ॥<br><br>निवेदयस्वातिबलस्य दूतं<br>मां द्रष्टुकामं पुरुषोत्तमाय ।<br>रामाय विज्ञापनमस्ति तस्य<br>महर्षिमुख्यस्य चिराय धीमन् ॥ १० ॥<br><br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सौमित्रिस्त्वरयान्वितः ।<br>आचचक्षेऽथ रामाय स सम्प्राप्तं तपोधनम् ॥ ११ ॥<br><br>एवं ब्रुवन्तं प्रोवाच लक्ष्मणं राघवो वचः ।<br>शीघ्रं प्रवेश्यतां तात मुनिः सत्कारपूर्वकम् ॥ १२ ॥ | तदनन्तर बहुत-सा काल व्यतीत होनेपर सर्वदा धर्ममार्गका अवलम्बन करनेवाले भगवान् रामका दर्शन करनेके लिये ऋषिवेष धारण कर काल आया और लक्ष्मणजीसे यों बोला—॥९॥ "हे बुद्धिमान् ! तुम पुरुषोत्तम महाराज रामसे निवेदन करो कि महर्षि अतिबलका दूत आपके दर्शनकी इच्छासे आया है। मुझे उन्हें बहुत देरतक उन महर्षिश्रेष्ठका सन्देश सुनाना है" ॥१०॥ उसके ये वचन सुनकर लक्ष्मणजीने तुरन्त ही श्रीरघुनाथजीसे कहा कि 'एक तपोधन आये हैं' ॥११॥ लक्ष्मणजीके ऐसा कहनेपर श्रीरघुनाथजीने उनसे कहा—"भैया, मुनिराजको तुरन्त ही बड़े सत्कारपूर्वक भीतर ले आओ" ॥१२॥ |