अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
१६६ * अग्निपुराण *
प्रार्थना करे—‘परमेश्वर! आप ही समस्त प्राणियोंकी गति हैं। आप ही चराचर जगत्की स्थितिके हेतुभूत (अथवा लयके आश्रय) हैं। आप सम्पूर्ण भूतोंके भीतर विचरते हुए उनके साक्षीरूपसे अवस्थित हैं। मन, वाणी और क्रियाद्वारा आपके सिवा दूसरी कोई मेरी गति नहीं है। महेश्वर! मैंने प्रतिदिन आपके पूजनमें जो मन्त्रहीन, क्रियाहीन, द्रव्यहीन तथा जप, होम और अर्चनसे हीन कर्म किया है, जो आवश्यक कर्म नहीं किया है तथा जो शुद्ध वाक्यसे रहित कर्म किया है, वह सब आप पूर्ण करें। परमेश्वर! आप परम पवित्र हैं। आपको अर्पित किया हुआ यह पवित्रक समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। आपने सर्वत्र व्याप्त होकर इस समस्त चराचर जगत्को पवित्र कर रखा है। देव! मैंने व्याकुलताके कारण अथवा अङ्गवैकल्य-दोषके कारण जिस व्रतको खण्डित कर दिया है, वह सब आपकी आज्ञारूप सूत्रमें गुँथकर एक—अखण्ड हो जाय’॥ १५–२२$\frac{१}{२}$॥
तत्पश्चात् जप निवेदन करके, उपासक भक्तिपूर्वक भगवान्की स्तुति करे और उन्हें नमस्कार करके, गुरुकी आज्ञाके अनुसार चार मास, तीन मास, तीन दिन अथवा एक दिनके लिये ही नियम ग्रहण करे। भगवान् शिवको प्रणाम करके उनसे त्रुटियोंके लिये क्षमा माँगकर व्रती पुरुष कुण्डके समीप जाय और अग्निमें विराजमान भगवान् शिवके लिये भी चार पवित्रक अर्पित करके पुष्प, धूप और अक्षत आदिसे उनकी पूजा करे। इसके बाद रुद्र आदिको अन्तर्बलि एवं पवित्रक निवेदन करे॥ २३–२६॥
तत्पश्चात् पूजा-मण्डपमें प्रवेश करके भगवान् शिवका स्तवन करते हुए प्रणामपूर्वक क्षमा-प्रार्थना करे। प्रायश्चित्त-होम करके खीरकी आहुति दे। मन्दस्वरमें मन्त्र बोलकर पूर्णाहुति करके अग्निमें विराजमान शिवका विसर्जन करे। फिर व्याहृति-होम करके, निष्ठुराद्वारा अग्निको निरुद्ध करे और अग्नि आदिको निम्नोक्त मन्त्रोंसे चार आहुति दे। तत्पश्चात् दिक्पालोंको पवित्र एवं बाह्य बलि अर्पित करे। इसके बाद सिद्धान्त-ग्रन्थपर उसके बराबरका पवित्रक अर्पित करे। पूर्वोक्त व्याहृति-होमके मन्त्र इस प्रकार हैं—‘ॐ हां भूः स्वाहा।’ ‘ॐ हां भुवः स्वाहा।’ ‘ॐ हां स्वः स्वाहा।’ ‘ॐ हां भूर्भुवः स्वः स्वाहा।’॥ २७—३१॥
इस प्रकार व्याहृतियोंद्वारा होम करके अग्नि आदिके लिये चार आहुतियाँ देकर दूसरा कार्य करे। उन चार आहुतियोंके मन्त्र इस प्रकार हैं—‘ॐ हां अग्नये स्वाहा।’ ‘ॐ हां सोमाय स्वाहा।’ ‘ॐ हां अग्नीषोमाभ्यां स्वाहा।’ ‘ॐ हां अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा।’ फिर गुरुकी शिवके समान वस्त्राभूषण आदि विस्तृत सामग्रीसे पूजा करे। जिसके ऊपर गुरुदेव पूर्णरूपसे संतुष्ट होते हैं, उस साधकका सारा वार्षिक कर्मकाण्ड आदि सफल हो जाता है—ऐसा परमेश्वरका कथन है। इस प्रकार गुरुका पूजन करके उन्हें हृदयतक लटकता हुआ पवित्रक धारण करावे और ब्राह्मण आदिको भोजन कराकर भक्तिपूर्वक उन्हें वस्त्र आदि दे। उस समय यह प्रार्थना करे कि ‘देवेश्वर भगवान् सदाशिव इस दानसे मुझपर प्रसन्न हों।’ फिर प्रातःकाल भक्तिपूर्वक स्नान आदि करके भगवान् शंकरके श्रीविग्रहसे पवित्रकोंको समेट ले और आठ फूलोंसे उनकी पूजा करके उनका विसर्जन कर दे। फिर पहलेकी तरह विस्तारपूर्वक नित्य-नैमित्तिक पूजन करके पवित्रक चढ़ाकर प्रणाम करनेके पश्चात् अग्निमें शिवका पूजन करे॥ ३२–३८॥
तदनन्तर अस्त्र-मन्त्रसे प्रायश्चित्त-होम करके पूर्णाहुति दे। भोग-सामग्रीकी इच्छावाले पुरुषको चाहिये कि वह भगवान् शिवको अपना सारा कर्म समर्पित करे और कहे—‘प्रभो! आपकी कृपासे मेरा यह कर्म मनोवाञ्छित फलका
* अध्याय ८० * १६७
साधक हो।' मोक्षकी कामना रखनेवाला पुरुष भगवान् शिवसे इस प्रकार प्रार्थना करे—'नाथ! यह कर्म मेरे लिये बन्धनकारक न हो।' इस तरह प्रार्थना करके अग्निमें स्थित शिवको नाडीयोगके द्वारा अन्तरात्मामें स्थित शिवमें संयोजित करे। फिर अणुसमूहका हृदयमें न्यास करके अग्निदेवका विसर्जन कर दे और आचमन करके पूजा-मण्डपके भीतर प्रविष्ट हो, कलशके जलको सब ओर छिड़कते हुए भगवान् शिवसे संयुक्त करके कहे—'प्रभो! मेरी त्रुटियोंको क्षमा करो।' इसके बाद विसर्जन कर दे॥ ३९—४२॥
तदनन्तर लोकपाल आदिका विसर्जन करके भगवान् शिवकी प्रतिमासे पवित्रक लेकर चण्डेश्वरकी प्रतिमामें उनकी भी पूजा करके उन्हें वह पवित्रक अर्पित करे और शिवनिर्माल्य आदि सारी सामग्री पवित्रकके साथ ही उन्हें समर्पित कर दे। अथवा वेदीपर पूर्ववत् विधिपूर्वक चण्डेश्वरकी पूजा करे और उनसे प्रार्थनापूर्वक कहे—'चण्डनाथ! मैंने जो कुछ वार्षिक कर्म किया है, वह यदि न्यूनता या अधिकताके दोषसे युक्त है, तो आपकी आज्ञासे वह दोष दूर होकर मेरा कर्म साङ्गोपाङ्ग परिपूर्ण हो जाय।' इस प्रकार प्रार्थना करके देवेश्वर चण्डको नमस्कार करे और स्तुतिके पश्चात् उनका विसर्जन कर दे। निर्माल्यका त्याग करके, शुद्ध हो भगवान् शिवको नहलाकर उनका पूजन करे। घरसे पाँच योजन दूर रहनेपर भी गुरुके समीप पवित्रारोहण-कर्मका सम्पादन करना चाहिये॥ ४३—४६॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'पवित्रारोपणकी विधिका वर्णन' नामक उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७९॥
अस्सीवाँ अध्याय
दमनकारोपणकी विधि
**भगवान् महेश्वर कहते हैं—**स्कन्द! अब मैं दमनकारोपणकी विधिका वर्णन करूँगा। इसमें भी सब कार्य पूर्ववत् करने चाहिये। प्राचीन कालमें भगवान् शंकरके कोपसे भैरवकी उत्पत्ति हुई। भैरवने देवताओंका दमन आरम्भ किया। यह देख त्रिपुरारि शिवने रुष्ट होकर भैरवको शाप दिया—'तुम वृक्ष हो जाओ।' फिर भैरवके क्षमा माँगनेपर प्रसन्न हो भगवान् शिव बोले—'जो मनुष्य तुम्हारे पत्रोंद्वारा पूजन करेंगे, अथवा तुम्हारी पूजा करेंगे, उनका मनोवाञ्छित फल पूरा होगा। उनकी इच्छा किसी तरह अपूर्ण नहीं रहेगी।' सप्तमी या त्रयोदशी तिथिको मन्त्रवेत्ता पुरुष संहिता-मन्त्रोंसे दमनक-वृक्षकी पूजा करके उसे भगवान् शंकरके वाक्यका स्मरण दिलाते हुए जगावे—॥ १—३ $\frac{१}{२}$ ॥
हरप्रसादसम्भूत त्वमत्र संनिधीभव।
शिवकार्यं समुद्दिश्य नेतव्योऽसि शिवाज्ञया॥
'दमनक! तुम भगवान् शंकरके कृपाप्रसादसे प्रकट हुए हो। तुम यहाँ संनिहित हो जाओ। भगवान् शिवकी आज्ञासे उन्हींके कार्यके उद्देश्यसे मुझे तुम्हें अपने साथ ले जाना है।' घरपर भी उस वृक्षको आमन्त्रित करे और सायंकालमें अधिवासन-कर्म सम्पन्न करे। विधिपूर्वक सूर्य, शंकर और अग्निदेवकी पूजा करके, इष्टदेवताके पश्चिम भागमें मिट्टीके साथ संयुक्त करके उस वृक्षकी जड़को स्थापित करे। वामदेव-मन्त्र अथवा शिरोमन्त्रसे उस वृक्षकी नाल तथा आँवलेका फल उत्तर दिशामें रखे। उसके टूटे हुए पत्रको दक्षिणमें तथा पुष्प और धावनको पूर्वमें स्थापित करे॥ ४—७॥
१६८ * अग्निपुराण *
ईशानकोणमें एक दोनेमें उसके फल और मूलको रखकर भगवान् शिवका पूजन करे। उस वृक्षकी जड़, नाल, पत्र, फूल और फल—इन पाँचों अङ्गोंको अञ्जलिमें लेकर आमन्त्रित करते हुए सिरपर रखे और इस प्रकार कहे—'देवेश्वर! मैं आज आपको निमन्त्रित करता हूँ। कल प्रातःकाल मुझे तपस्याका लाभ लेना है—की हुई उपासनाको सफल बनाना है। वह सब कार्य आपकी आज्ञासे पूर्ण हो।' तत्पश्चात् पात्रमें रखे हुए शेष पवित्रकको मूल-मन्त्रसे ढककर प्रातःकाल स्नान करनेके पश्चात् जगदीश्वर शिवका गन्ध-पुष्प आदिसे पूजन करे॥ ८—१०॥
तदनन्तर नित्य-नैमित्तिक कर्म करके दमनकसे पूजन करे। शेष दमनकको अञ्जलिमें लेकर—'ॐ हां आत्मतत्त्वाधिपतये शिवाय स्वाहा।', 'ॐ हां विद्यातत्त्वाधिपतये शिवाय स्वाहा।', 'ॐ हां शिवतत्त्वाधिपतये शिवाय स्वाहा।', 'ॐ हां सर्वतत्त्वाधिपतये शिवाय स्वाहा।'—इन चार मन्त्रोंद्वारा दमनक चढ़ाकर शिवका पूजन करना चाहिये। तदनन्तर दमनककी चौथी अञ्जलि लेकर 'ॐ ह्रौं महेश्वराय मखं पूरय पूरय शूलपाणये नमः।'—इस मन्त्रके उच्चारणपूर्वक भगवान् शिवको अर्पित करे॥ ११—१३॥
इस प्रकार शिव और अग्निकी पूजा करके गुरुकी विशेषरूपसे अर्चना करते हुए प्रार्थना करे—'भगवन्! मैंने दमनकद्वारा पूजनकर्ममें जो न्यूनता या अधिकता कर दी है, वह सब आपकी कृपासे परिपूर्ण हो जाय।' इस रीतिसे दमनकारोपण-कर्मका सम्पादन करके मनुष्य चैत्रमासजनित सम्पूर्ण फलको पाता है और अन्तमें स्वर्ग-लोकको जाता है॥ १४-१५॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'दमनकारोपणकी विधिका वर्णन' नामक अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८०॥
इक्यासीवाँ अध्याय
समयाचार-दीक्षाकी विधि
**भगवान् महेश्वर कहते हैं—**स्कन्द! अब मैं भोग और मोक्षकी सिद्धिके लिये दीक्षाकी विधि बताऊँगा, जो समस्त पापोंका नाश करनेवाली है तथा जिसके द्वारा मल और माया आदि पाशोंका निवारण किया जाता है। जिससे शिष्यमें ज्ञानकी उत्पत्ति करायी जाती है, उसका नाम 'दीक्षा' है। वह भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली है। पशु (पाश-बद्ध जीव) शुद्ध विद्याद्वारा अनुग्राह्य कहा गया है। वह तीन प्रकारका होता है—पहला विज्ञानाकल, दूसरा प्रलयाकल तथा तीसरा सकल॥ १ $\frac{१}{२}$॥
उनमेंसे प्रथम अर्थात् 'विज्ञानाकल' पशु केवल मलरूप पाशसे युक्त होता है,$^१$ दूसरा अर्थात् 'प्रलयाकल' पशु मल और कर्म—इन दो पाशोंसे आबद्ध होता है$^२$ तथा तीसरा अर्थात्
१. जो परमात्माके स्वरूपको पहचानकर जप, ध्यान तथा संन्यासद्वारा अथवा भोगद्वारा कर्मोंका क्षय कर डालता है और कर्मोंका क्षय हो जानेके कारण जिसके लिये शरीर और इन्द्रिय आदिका कोई बन्धन नहीं रहता, उसमें केवल मलरूपी पाश (बन्धन) रह जाता है, उसे 'विज्ञानाकल' कहते हैं। मल तीन प्रकारके होते हैं—'आणव-मल', 'कर्मज-मल', तथा 'मायेय-मल'। विज्ञानाकलमें केवल आणव-मल रहता है। वह विज्ञान (तत्त्वज्ञान)-द्वारा अकल—कलारहित (कलादि भोग-बन्धनोंसे शून्य) हो जाता है, इसलिये उसकी 'विज्ञानाकल' संज्ञा होती है। २. जिस जीवात्माके देह, इन्द्रिय आदि प्रलयकालमें लीन हो जाते हैं, इससे उसमें मायेय मल तो नहीं रहता, परंतु आणव और कर्मज—ये दो मलरूपी पाश (बन्धन) रह जाते हैं, वह प्रलयकालमें ही अकल (कलारहित) होनेके कारण 'प्रलयाकल' कहलाता है।
- अध्याय ८१ * । १६९
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| ‘सकल’ पशु कला आदिसे लेकर भूमिपर्यन्त सारे तत्त्वसमूहोंसे बँधा होता है (अर्थात् वह | मल, माया तथा कर्म—त्रिविध पाशोंसे बँधा हुआ बताया गया है)॥* २-३ $\frac{१}{२}$ ॥ |
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* जिस जीवात्मामें आणव, मायेय और कर्मज—तीनों मल (पाश) रहते हैं, वह कला आदि भोग-बन्धनोंसे युक्त होनेके कारण ‘सकल’ कहा गया है। पाशुपत-दर्शनके अनुसार विज्ञानाकल पशु (जीव)-के भी दो भेद हैं—‘समाप्त कलुष’ और ‘असमाप्त कलुष’। (१) जीवात्मा जो कर्म करता है, उस प्रत्येक कर्मकी तह मलपर जमती रहती है। इसी कारण उस मलका परिपाक नहीं होने पाता; किंतु जब कर्मोंका त्याग हो जाता है, तब तह न जमनेके कारण मलका परिपाक हो जाता है और जीवात्माके सारे कलुष समाप्त हो जाते हैं, इसीलिये वह ‘समाप्त-कलुष’ कहलाता है। ऐसे जीवात्माओंको भगवान् आठ प्रकारके ‘विद्येश्वर’-पदपर पहुँचा देते हैं। उनके नाम ये हैं—
अनन्तश्चैव सूक्ष्मश्च तथैव च शिवोत्तमः। एकनेत्रस्तथैवैकरुद्रश्चापि त्रिमूर्तिकः ॥
श्रीकण्ठश्च शिखण्डी च प्रोक्ता विद्येश्वरा इमे।
‘(१) अनन्त, (२) सूक्ष्म, (३) शिवोत्तम, (४) एकनेत्र, (५) एकरुद्र, (६) त्रिमूर्ति, (७) श्रीकण्ठ और (८) शिखण्डी।’
(२) ‘असमाप्त-कलुष’ वे हैं, जिनकी कलुषराशि अभी समाप्त नहीं हुई है। ऐसे जीवात्माओंको परमेश्वर ‘मन्त्र’ स्वरूप दे देता है। कर्म तथा शरीरसे रहित किंतु मलरूपी पाशमें बँधे हुए जीवात्मा ही ‘मन्त्र’ हैं और इनकी संख्या सात करोड़ है। ये सब अन्य जीवात्माओंपर अपनी कृपा करते रहते हैं। ‘तत्त्व-प्रकाश’ नामक ग्रन्थमें उपर्युक्त विषयके संग्राहक श्लोक इस प्रकार हैं—
पशवस्त्रिविधाः प्रोक्ता विज्ञानप्रलयाकलौ सकलः। मलयुक्तस्तत्राद्यो मलकर्मयुतो द्वितीयः स्यात् ॥
मलमायाकर्मयुतः सकलस्तेषु द्विधा भवेदाद्यः। आद्यः समाप्तकलुषोऽसमाप्तकलुषो द्वितीयः स्यात् ॥
आद्या ननु गृह्य शिवो विद्येशत्वे नियोजयत्यष्टौ। मन्त्रांश्च करोत्यपरान् ते चोक्ताः कोटयः सप्त ॥
‘प्रलयाकल’ भी दो प्रकारके होते हैं—‘पक्वपाशाद्वय’ और ‘अपक्वपाशाद्वय’। (१) जिनके मल तथा कर्मरूपी दोनों पाशोंका परिपाक हो गया है, वे ‘पक्वपाशाद्वय’ होकर मोक्षको प्राप्त हो जाते हैं। (२) ‘अपक्वपाशाद्वय’ जीव पुर्यष्टकमय देह धारण करके नाना प्रकारके कर्मोंको करते हुए नाना योनियोंमें घूमा करते हैं।
‘सकल’ जीवोंके भी दो हैं—‘पक्वकलुष’ भेद और ‘अपक्वकलुष’। (१) जैसे-जैसे जीवात्माके मल, कर्म तथा माया—इन पाशोंका परिपाक बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे ये सब पाश शक्तिहीन होते जाते हैं। तब वे पक्वकलुष जीवात्मा ‘मन्त्रेश्वर’ कहलाते हैं। सात करोड़ मन्त्ररूपी जीव-विशेषोंके, जिनका ऊपर वर्णन हो चुका है, अधिकारी ये ही ११८ मन्त्रेश्वर जीव हैं। (२) अपक्वकलुष जीव भवकूपमें गिरते हैं।
नारदपुराणमें शैव-महातन्त्रकी मान्यताके अनुसार पाँच प्रकारके पाश बताये गये हैं—(१) मलज, (२) कर्मज, (३) मायेय (मायाजन्य), (४) तिरोधान—शक्तिज और (५) बिन्दुज। आधुनिक शैव दर्शनमें चार प्रकारके पाशोंका उल्लेख है—मल, रोध, कर्म तथा माया। रोध-शक्ति या तिरोधान-शक्ति एक ही वस्तु है। ‘बिन्दु’ मायास্বরূপ है। वह ‘शिवतत्त्व’ नामसे भी जानने योग्य है। यद्यपि शिवपद-प्राप्तिरूप परम मोक्षकी अपेक्षासे वह भी पाश ही है, तथापि विद्येश्वरादि-पदकी प्राप्तिमें परम हेतु होनेके कारण बिन्दु-शक्तिको ‘अपरा-मुक्ति’ कहा गया है। अतः उसे आधुनिक शैव दर्शनमें ‘पाश’ नाम नहीं दिया गया है। इसलिये यहाँ शेष चार पाशों (मल, कर्म, रोध और माया)-के ही स्वरूपका विचार किया जाता है—(१) जो आत्माके स्वाभाविक ज्ञान तथा क्रिया-शक्तिको ढक ले, वह ‘मल’ (अर्थात् अज्ञान) कहलाता है। यह मल आत्मास्वरूपका केवल आच्छादन ही नहीं करता, किंतु जीवात्माको बलपूर्वक दुष्कर्मोंमें प्रवृत्त करनेवाला पाश भी यही है। (२) प्रत्येक वस्तुमें जो सामर्थ्य है, उसे ‘शिवशक्ति’ कहते हैं। जैसे अग्निमें दाहिका शक्ति। यह शक्ति जैसे पदार्थमें रहती है, वैसा ही भला-बुरा स्वरूप धारण कर लेती है; अतः पाशमें रहती हुई यह शक्ति जब आत्माके स्वरूपको ढक लेती है, तब यह ‘रोध-शक्ति’ या ‘तिरोधान-पाश’ कहलाती है। इस अवस्थामें जीव शरीरको आत्मा मानकर शरीरके पोषणमें लगा रहता है; आत्माके उद्धारका प्रयत्न नहीं करता। (३) फलकी इच्छासे किये हुए ‘धर्माधर्म’ रूप कर्मोंको ही ‘कर्मपाश’ कहते हैं। (४) जिस शक्तिमें प्रलयके समय सब कुछ लीन हो जाता है तथा सृष्टिके समय जिसमेंसे सब कुछ उत्पन्न हो जाता है, वह ‘मायापाश’ है। अतः इन पाशोंमें बँधा हुआ पशु जब तत्त्वज्ञानद्वारा इनका उच्छेद कर डालता है, तभी वह ‘परम शिवतत्त्व’ अर्थात् ‘पशुपति-पद’ को प्राप्त होता है।
दीक्षा ही शिवत्व-प्राप्तिका साधन है। सर्वानुग्राहक परमेश्वर ही आचार्य-शरीरमें स्थित होकर दीक्षाकरणद्वारा जीवको परम शिवतत्त्वकी प्राप्ति कराते हैं; ऐसा ही कहा भी है—‘योजयति परे तत्त्वे स दीक्षयाऽऽचार्यमूर्तिस्थः।’
‘अपक्वपाशाद्वय प्रलयाकल’ जीव तथा ‘अपक्वकलुष सकल’ जीव जिस पुर्यष्टक देहको धारण करते हैं, वह पञ्चभूत तथा मन, बुद्धि, अहंकार—इन आठ तत्त्वोंसे युक्त होनेके कारण ‘पुर्यष्टक’ कहलाता है। पुर्यष्टक शरीर छत्तीस तत्त्वोंसे युक्त होता है। अन्तर्भोगके साधनभूत कला, काल, नियति, विद्या, राग, प्रकृति और गुण—ये सात तत्त्व, पञ्चभूत, पञ्चतन्मात्रा, दस इन्द्रियाँ, चार अन्तःकरण और पाँच शब्द आदि विषय—ये छत्तीस तत्त्व हैं। अपक्वपाशाद्वय जीवोंमें जो अधिक पुण्यात्मा हैं, उन्हें परम दयालु भगवान् महेश्वर भुवनेश्वर या लोकपाल बना देते हैं।
१७० * अग्निपुराण *
इन पाशोंसे मुक्त होनेके लिये जीवको आचार्यसे मन्त्राराधनकी दीक्षा लेनी होती है। वह दीक्षा दो प्रकारकी मानी गयी है—एक 'निराधारा' और दूसरी 'साधारा'। उपर्युक्त तीन पशुओंमेंसे विज्ञानाकल और प्रलयाकल—इन दो पशुओंके लिये निराधारा दीक्षा बतायी गयी है और सकल पशुके लिये साधारा। आचार्यकी अपेक्षा न रखकर शम्भुद्वारा ही तीव्र शक्तिपात करके जो दीक्षा दी जाती है, वह 'निराधारा' कही गयी है। आचार्यके शरीरमें स्थित होकर भगवान् शंकर अपनी मन्दा, तीव्रा आदि भेदवाली शक्तिसे जिस दीक्षाका सम्पादन करते हैं, वह 'साधारा' कहलाती है। यह साधारा दीक्षा सबीजा, निर्बीजा, साधिकारा और अनधिकारा—इन भेदोंके द्वारा जिस तरह चार* प्रकारकी हो जाती है, वह बताया जाता है॥४-७$\frac{१}{२}$॥
समर्थ पुरुषोंको जो समयाचारसे युक्त दीक्षा दी जाती है, उसे 'सबीजा' कहते हैं और असमर्थ पुरुषोंको दी जानेवाली समयाचारशून्य दीक्षा 'निर्बीजा' कही गयी है॥८$\frac{१}{२}$॥
जिस दीक्षासे साधक और आचार्यको नित्य-नैमित्तिक एवं काम्य कर्मोंमें अधिकार प्राप्त होता है, वह 'साधिकारा दीक्षा' है। 'निर्बीजा दीक्षा' में दीक्षित होनेवाले लोगोंको तथा समयाचारकी दीक्षा लेनेवाले साधारण शिष्य एवं पुत्रकसंज्ञक शिष्यविशेषको नित्यकर्म-मात्रके अधिकारी होनेके कारण जो दीक्षा दी जाती है, वह 'निरधिकारा दीक्षा' कहलाती है। साधारा और निराधारा भेदसे जो दीक्षाके दो भेद बताये गये हैं, उनमेंसे प्रत्येकके निम्नाङ्कित दो रूप (या भेद) और होते हैं—एक तो 'क्रियावती' कही गयी है, जिसमें कर्मकाण्डकी विधिसे कुण्ड और मण्डलकी स्थापना एवं पूजा की जाती है। दूसरी 'ज्ञानवती दीक्षा' है, जो बाह्य-सामग्रीसे
* शारदापटलमें दीक्षाके चार भेदोंका विस्तारसे वर्णन है। वे चार भेद हैं—क्रियावती, वर्णमयी, कलावती और वेधमयी। क्रियावती दीक्षामें कर्मकाण्डका पूरा उपयोग होता है। स्नान, संध्या, प्राणायाम, भूतशुद्धि, न्यास, ध्यान, पूजा, शङ्ख-स्थापन आदिसे लेकर शास्त्रोक्त पद्धतिसे हवन-पर्यन्त कर्म किये जाते हैं। षडध्वाके शोधन-क्रमसे पृथक्-पृथक् आहुति देकर, शिवमें विलीन करके पुनः सृष्टि-क्रमसे शिष्यका चैतन्ययोग सम्पादित होता है। गुरु शिष्यसे अपनी एकताका अनुभव करता हुआ आत्मविद्याका दान करता है। गुरु-मन्त्र प्राप्त करके शिष्य धन्य-धन्य हो जाता है।
'वर्णमयी दीक्षा' न्यासरूपा है। अकारादि वर्ण प्रकृतिपुरुषात्मक हैं। शरीर भी प्रकृतिपुरुषात्मक होनेके कारण वर्णात्मक ही है। इसलिये पहले समस्त शरीरमें वर्णोंका सविधि न्यास किया जाता है। श्रीगुरुदेव अपनी आज्ञा और इच्छाशक्तिसे उन वर्णोंको प्रतिलोम-विधिसे अर्थात् संहार-क्रमसे विलीन कर देते हैं। यह क्रिया सम्पन्न होते ही शिष्यका शरीर दिव्य हो जाता है और गुरुके द्वारा वह परमात्मामें मिला दिया जाता है। ऐसी स्थिति होनेके पश्चात् श्रीगुरुदेव पुनः शिष्यको पृथक् करके दिव्य शरीरकी सृष्टि-क्रमसे रचना करते हैं। शिष्यमें परमानन्दस्वरूप दिव्यभावका विकास होता है और वह कृतकृत्य हो जाता है।
'कलावती दीक्षा'की विधि निम्नलिखित है—मनुष्यके शरीरमें पाँच प्रकारकी शक्तियाँ प्रतिष्ठित हैं। पैरके तलवेसे जानु-पर्यन्त 'निवृत्ति-शक्ति' है, जानुसे नाभि-पर्यन्त 'प्रतिष्ठा-शक्ति' है, नाभिसे कण्ठ-पर्यन्त 'विद्या-शक्ति' है, कण्ठसे ललाट-पर्यन्त 'शान्ति-शक्ति' है, ललाटसे शिखा-पर्यन्त 'शान्त्यतीतकला-शक्ति' है। संहार-क्रमसे पहलीको दूसरीमें, दूसरीको तीसरीमें और अन्तिम कलाको शिवमें संयुक्त करके शिष्य शिवरूप कर दिया जाता है। पुनः सृष्टि-क्रमसे इसका विस्तार किया जाता है और शिष्य दिव्य भावको प्राप्त होता है।
'वेधमयी दीक्षा' षट्चक्र-वेधन ही है। जब गुरु कृपा करके अपनी शक्तिसे शिष्यका षट्चक्रभेद कर देते हैं, तब इसीको 'वेधमयी दीक्षा' कहते हैं। गुरु पहले शिष्यके छः चक्रोंका चिन्तन करते हैं और उन्हें क्रमशः कुण्डलिनी शक्तिमें विलीन करते हैं। छः चक्रोंका विलयन बिन्दुमें करके तथा बिन्दुको कलामें, कलाको नादमें, नादको नादान्तमें, नादान्तको उन्मनीमें, उन्मनीको विष्णुमुखमें और तत्पश्चात् गुरुमुखमें संयुक्त करके अपने साथ ही उस शक्तिको परमेश्वरमें मिला देते हैं। गुरुकी इस कृपासे शिष्यका पाश छिन्न-भिन्न हो जाता है। उसे दिव्य बोधकी प्राप्ति होती है और वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार यह 'बोधमयी दीक्षा' सम्पन्न होती है।
- अध्याय ८१ * १७१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
नहीं, मानसिक व्यापारमात्रसे साध्य है॥९-१२॥
इस प्रकार अधिकारप्राप्त आचार्यद्वारा दीक्षा-कर्मका सम्पादन होता है।$^*$ स्कन्द! गुरुको चाहिये कि वह नित्यकर्मका विधिवत् अनुष्ठान करके शिष्यका दीक्षाकर्म सम्पन्न करे। प्रणवके जपपूर्वक गुरु अपने कर-कमलमें अर्घ्य-जल ले द्वारपालोंका पूजन करे। फिर विघ्नोंका निवारण करनेके अनन्तर, द्वार-देहलीपर अस्त्रन्यास करके अपने आसनपर बैठे। शास्त्रोक्त विधिसे भूतशुद्धि एवं अन्तर्याग करे। तिल, चावल, सरसों, कुश, दूर्वाङ्कुर, जौ, दूध और जल—इन सबको एकत्र करके विशेषार्घ्य बनावे। उसके जलसे समस्त द्रव्यों (पूजन-सामग्रियों)-की शुद्धि करे। फिर तिलक-सम्बन्धी अपने सम्प्रदायके मन्त्रसे भालदेशमें तिलक लगावे। फिर पूर्ववत् पूजन, मन्त्र-शोधन तथा पञ्चगव्य-प्राशन आदि कार्य करने चाहिये। क्रमशः लावा, चन्दन, सरसों, भस्म, दूर्वा, अक्षत, कुश और अन्तमें पुनः शुद्ध लावा—ये सब 'विकिर' (बिखरनेयोग्य द्रव्य) कहे गये हैं। इन सब वस्तुओंको एकत्र करके सात बार अस्त्र-मन्त्रसे अभिमन्त्रित करे। अस्त्र-मन्त्रद्वारा अभिमन्त्रित जलसे इनका प्रोक्षण करके फिर कवच-मन्त्र (हुम्)-से अवगुण्ठन करके यह भावना करे कि ये विघ्नसूहका निवारण करनेवाले नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र हैं॥ १३-१८$\frac{१}{२}$॥
तदनन्तर प्रादेशमात्र लंबे कुशके छत्तीस दलोंसे वेणीरूप बोधमय उत्तम खड्ग बनाकर उसे सात बार जपते हुए शिव-मन्त्रसे अभिमन्त्रित करे। फिर उसे शिवस्वरूप मानकर भावनाद्वारा अपने हृदयमें स्थापित करे। साथ ही जगदाधार भगवान् शिवकी जो झाँकी अपनेको अभीष्ट हो, उसी रूपमें उनका ध्यान-चिन्तन करके निष्कल परमात्मा शिवका अपने भीतर न्यास करे। तत्पश्चात् यह भावना करे कि 'मैं साक्षात् शिव हूँ।' फिर सिरपर (मूल-मन्त्रसे अभिमन्त्रित) श्वेत पगड़ी रखकर अपने शरीरको (गन्ध, पुष्प एवं आभूषणोंसे) अलंकृत करे। तत्पश्चात् गुरु अपने दाहिने हाथपर सुगन्ध-द्रव्य अथवा कुङ्कुमद्वारा मण्डलका निर्माण करे। फिर उसपर विधिपूर्वक भगवान् शिवकी पूजा करे। इससे वह 'शिवहस्त' हो जाता है। उस तेजस्वी शिवहस्तको शिव-मन्त्रसे अपने मस्तकपर रखकर यह दृढ़ भावना करे कि 'मैं शिवसे अभिन्न और सबका कर्ता साक्षात् परमात्मा शिव ही हूँ।' जब गुरु ऐसी भावना कर ले, तब वह यज्ञमण्डपमें कर्मोंका साक्षी, कलशमें यज्ञका रक्षक, अग्निमें होमका अधिष्ठान, शिष्यमें उसके अज्ञानमय पाशका उच्छेद करनेवाला तथा अन्तरात्मामें अनुग्रहीता—इन पाँच आकारोंमें अभिव्यक्त ईश्वररूप हो जाता है। गुरु इस भावको अत्यन्त दृढ़तर कर ले कि 'वह परमेश्वर मैं ही हूँ'॥१९-२५॥
तदनन्तर ज्ञानरूपी खड्ग हाथमें लिये गुरु यज्ञमण्डपके नैर्ऋत्यकोणवाले भागमें उत्तराभिमुख स्थित हो, अर्घ्य, जल और पञ्चगव्यसे उस
$^*$ सोमशम्भुकी 'कर्मकाण्ड-क्रमावली' (श्लोक ६१९-६२०$\frac{१}{२}$)-में 'इत्थं लब्धाधिकारेण दीक्षाचार्येण साध्यते।' इस पंक्तिके बाद दो श्लोक और अधिक उपलब्ध होते हैं, जो इस प्रकार हैं—
स च सद्देशसम्भूतः सुमूर्तिः श्रुतशीलवान्॥ ज्ञानाचारो गुणोपेतः क्षमी शुद्धाशयो वरः।
देशकालगुणाचारो गुरुभक्तिसमन्वितः॥ शिवानुध्यानवान् शस्तो विरक्तश्च प्रशस्यते।
'दीक्षाप्राप्त शिष्य यदि उत्तम देशमें उत्पन्न, सुन्दर शरीरवाला, शास्त्राध्ययन एवं शीलसे सम्पन्न, ज्ञानी, सदाचारी, गुणवान्, क्षमाशील, शुद्ध अन्तःकरणसे युक्त, श्रेष्ठ, देश-कालोचित गुण और आचारसे सुशोभित, गुरुभक्त, शिवध्यानपरायण तथा विरक्त हो तो वह उत्तम माना गया है और उसकी प्रशंसा की जाती है।'
१७२ * अग्निपुराण *
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मण्डपका प्रोक्षण करे। ईक्षण आदि चतुष्पथान्त-संस्कारोंद्वारा उसका संस्कार करे। फिर यज्ञमण्डपमें बिखरनेयोग्य पूर्वोक्त वस्तुओंको बिखेरकर कुशकी कूँचीसे उन सबको बटोर ले और उन्हें ईशानकोणमें स्थापित वर्धनी (जलपात्र)-में आसनके लिये रख दे। नैर्ऋत्यकोणमें वास्तुदेवताओंका और पश्चिम द्वारपर लक्ष्मीका पूजन करे। साथ ही यह भावना करे कि 'वे मण्डपरूपिणी लक्ष्मी देवी रत्नोंके भण्डारसे यज्ञमण्डपको परिपूर्ण कर रही हैं।' इस प्रकार ध्यान एवं आवाहन कर हृदय-मन्त्र 'नमः' के द्वारा अर्थात् 'लक्ष्मै नमः।'— इस मन्त्रसे उनकी पूजा करनी चाहिये। इसके बाद ईशानकोणमें सप्तधान्यपर स्थापित किये हुए वस्त्रवेष्टित पञ्चरत्नयुक्त एवं जलसे परिपूर्ण पश्चिमाभिमुख कलशपर भगवान् शंकरका पूजन करे। फिर उस कलशके दक्षिण भागमें सिंहपर विराजमान पश्चिमाभिमुखी शक्ति खड्गरूपिणी वर्धनीका पूजन करे॥ २६—३०॥
तदनन्तर पूर्व आदि दिशाओंमें इन्द्र आदि दिक्पालोंका और इसके अन्तमें विष्णुभगवान्का पूजन करे। ये सब-के-सब प्रणवमय आसनपर विराजमान हैं तथा अपने-अपने वाहनों और आयुधोंसे संयुक्त हैं—ऐसी भावना करके उनके नामोंके अन्तमें 'नमः' पद जोड़कर उन्हींसे उनकी पूजा करे। यथा—'इन्द्राय नमः।', 'विष्णवे नमः।' इत्यादि। पहले पूर्वोक्त वर्धनीको भलीभाँति हाथमें ले, उसे कलशके सामनेकी ओरसे ले जाकर प्रदक्षिणक्रमसे उसके चारों ओर घुमावे और उससे जलकी अविच्छिन्न धारा गिराता रहे। साथ ही मूलमन्त्रका उच्चारण करते हुए लोकपालोंको भगवान् शिवकी निम्नाङ्कित आज्ञा सुनावे—'लोकपालगण! आपलोग यथाशक्ति सावधानीके साथ इस यज्ञकी रक्षा करें।' यों आदेश दे, नीचे एक कलश रखकर उसके ऊपर उस वर्धनीको स्थापित कर दे। तत्पश्चात् सुस्थिर आसनवाले कलशपर भगवान् शंकरका साङ्ग पूजन करे। इसके बाद कला आदि षडध्वाका न्यास करके शोधन करे और वर्धनीमें अस्त्रकी पूजा करे॥ ३१—३४॥
पूजाके मन्त्र इस प्रकार हैं—'ॐ हः अस्त्रासनाय हूं फट् नमः।', 'ॐ ॐ अस्त्रमूर्तये हूं फट् नमः।', 'ॐ हूं फट् पाशुपतास्त्राय नमः।', 'ॐ ॐ हृदयाय हूं फट् नमः।', 'ॐ श्रीं शिरसे हूं फट् नमः।', 'ॐ यं शिखायै हूं फट् नमः।' 'ॐ शुं कवचाय हूं फट् नमः।', 'ॐ हूं फट् अस्त्राय हूं फट् नमः।' इसके बाद पाशुपतास्त्रके स्वरूपका इस प्रकार चिन्तन करे—'उनके चार मुख हैं। प्रत्येक मुखमें दाढ़ें हैं। उनके हाथोंमें शक्ति, मुद्गर, खड्ग और त्रिशूल हैं तथा उनकी प्रभा करोड़ों सूर्योंके समान है।' इस प्रकार ध्यान करके लिङ्गमुद्राके प्रदर्शनद्वारा भगलिङ्गका समायौग करे। हृदय-मन्त्र (नमः)-का उच्चारण करते हुए अङ्गुष्ठसे कलशका स्पर्श करे और मुट्ठीसे खड्गरूपिणी वर्धनीका। भोग और मोक्षकी सिद्धिके लिये पहले मुट्ठीसे वर्धनीका ही स्पर्श करना चाहिये। फिर कलशके मुखभागकी रक्षाके लिये उसपर पूर्वोक्त ज्ञान-खड्ग समर्पित करे। साथ ही मूल-मन्त्रका एक सौ आठ बार जप करके वह जप भी कलशको निवेदन कर दे। उसके दशांशका जप करके वर्धनीमें उसका अर्पण करे। तदनन्तर भगवान्से रक्षाके लिये प्रार्थना करे—'सम्पूर्ण यज्ञोंको धारण करनेवाले भगवान् जगन्नाथ! बड़े यत्नसे इस यज्ञ-मन्दिरका निर्माण किया गया है? कृपया आप इसकी रक्षा करें'॥ ३५—४०॥
इसके बाद वायव्यकोणमें प्रणवमय आसनपर
* अध्याय ८१ * १७३
विराजमान चार भुजाधारी गणेशजीका पूजन करे। तत्पश्चात् वेदीपर शिवका पूजन करके अर्घ्य हाथमें लिये साधक यज्ञकुण्डके पास जाय। वहाँ बैठकर मन्त्र-देवताकी तृप्तिके लिये बायें भागमें अर्घ्य, गन्ध और घृत आदिको तथा दाहिने भागमें समिधा, कुशा एवं तिल आदिको रखकर कुण्ड, अग्नि, स्रुक् तथा घृत आदिका पूर्ववत् संस्कार करके, हृदयमें ऊर्ध्वमुख अग्निकी प्रधानताका चिन्तन करे तथा अग्निमें भगवान् शिवका पूजन करे। फिर गुरु अपने शरीरमें, शिवकलशमें, मण्डलमें, अग्नि और शिष्यकी देहमें सृष्टिन्यासकी रीतिसे न्यासकर्मका सम्पादन करके अध्वाका विधिपूर्वक शोधन करनेके पश्चात् कुण्डकी लंबाई-चौड़ाईके अनुसार ही अग्निदेवके मुखकी लंबाई-चौड़ाईका चिन्तन करके अग्निजिह्वाओंके नाम-मन्त्रके अन्तमें 'नमः' (एवं 'स्वाहा') बोलकर अभीष्ट वस्तुकी आहुतियाँ देते हुए अग्निदेवको तृप्त करे। अग्निकी सात जिह्वाओंके सात बीज हैं। होमके लिये उनका परिचय दिया जाता है॥ ४१-४५॥
रेफरहित अन्तिम दो वर्णोंके सभी (अर्थात् सात) अक्षर यदि रकार और छठे स्वर (ऊ)- पर आरूढ़ हों और उनके भी ऊपर चन्द्रबिन्दुरूप शिखा हो तो वे ही अग्निकी सात जिह्वाओंके क्रमशः सात बीज-मन्त्र हैं। (यथा—यूँ लूँ वूँ श्रूँ षूँ स्रूँ हूँ)<sup>१</sup> अग्निकी सात जिह्वाओंके नाम इस प्रकार हैं—हिरण्या, कनका, रक्ता, कृष्णा, सुप्रभा, अतिरक्ता तथा बहुरूपा। ईशान, पूर्व, अग्नि, नैर्ऋत्य, पश्चिम, वायव्य तथा मध्य दिशामें क्रमशः इनके मुख हैं। (अर्थात् एक त्रिभुजके ऊपर दूसरा त्रिभुज बनानेसे जो छः कोण बनते हैं, वे क्रमशः ईशान, पूर्व, अग्नि, नैर्ऋत्य, पश्चिम तथा वायव्यकोणमें स्थित होते हैं। अग्निकी हिरण्या आदि छः जिह्वाओंको इन्हीं छः कोणोंमें स्थापित करे तथा अन्तिम जिह्वा 'बहुरूपा' को मध्यमें)<sup>२</sup> ॥ ४६-४७॥
शान्तिक एवं पौष्टिक कर्ममें खीर आदि मधुर पदार्थोंद्वारा होम करे। परंतु अभिचार कर्ममें सरसोंकी खली, सत्तू, जौकी काँजी, नमक, राई, मट्ठा, कड़वा तेल, काँटे तथा टेढ़ी-मेढ़ी समिधाओंद्वारा क्रोधपूर्वक भाष्याणु (भाष्यमन्त्र)- से हवन करे।<sup>३</sup> कदम्बकी कलिकाओंद्वारा होम करनेसे निश्चय ही यक्षिणी सिद्ध हो जाती है। वशीकरण और आकर्षणकी सिद्धिके लिये बन्धूक (दुपहरिया) और पलाशके फूलोंका हवन करना चाहिये। राज्यलाभके लिये बिल्वफलका और लक्ष्मीकी प्राप्तिके लिये पाटल (पाड़र) एवं चम्पाके फूलोंका होम करे। चक्रवर्ती सम्राट्का
१. ये सात बीज अग्निकी 'हिरण्या' आदि सात जिह्वाओंके नामके आदिमें लगाये जाते हैं और अन्तमें 'नमः' पद जोड़कर नाम-मन्त्रोंसे ही उनकी पूजा की जाती है। यथा—'ॐ यूँ हिरण्यायै नमः । ', 'लूँ कनकायै नमः ।', 'वूँ रक्तायै नमः ।', 'श्रूँ कृष्णायै नमः ।' 'षूँ 'सुप्रभायै नमः ।', 'स्रूँ अतिरक्तायै नमः ।', 'हूँ बहुरूपायै नमः ।'
२. सोमशम्भुने इन जिह्वाओंके स्वरूप तथा कामनाभेदसे विभिन्न कर्मोंमें इनके उपयोगके विषयमें इस प्रकार लिखा है—
हिरण्या तप्तहेमाभा कनका वज्रसुप्रभा। रक्तोदितारुणप्रख्या कृष्णा नीलमणिप्रभा॥
सुप्रभा मौक्तिकोद्योतातिरक्ता पद्मरागवत्। चन्द्रकान्तशरच्चन्द्रप्रभेव बहुरूपिणी ॥
फलं तु कामभेदेन क्रमादासामुदीर्यते। वश्याकर्षणयोराद्या कनका स्तम्भने रिपोः ॥
विद्वेषमोहने रक्ता कृष्णा मारणकर्मणि। सुप्रभा शान्तिके पुष्टौ सुरक्तोच्चाटने मता ॥
एकैव बहुरूपा तु सर्वकामफलप्रदा। (कर्मकाण्ड-क्रमावली ६६४-६६७)
३. सोमशम्भुके ग्रन्थमें इसके बाद यह एक श्लोक अधिक है—
विद्याधरत्वलाभाय चन्द्रागुरुयुतं पुरम्। अथवा पद्मकिञ्जल्कैर्जुहुयात् साधकोत्तमः॥
'साधक-शिरोमणिको चाहिये कि वह 'विद्याधर-पद' की प्राप्तिके लिये कपूर, अगुरु और गुग्गुलसे अथवा कमलके केसरोंसे हवन करे।'
१७४ * अग्निपुराण *
पद पानेके लिये कमलोंका तथा सम्पत्तिके लिये भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंका होम करे। दूर्वाका हवन किया जाय तो उससे व्याधियोंका नाश होता है। समस्त जीवोंको वशमें करनेके लिये विद्वान् पुरुष प्रियङ्गु तथा कदलीके पुष्पोंका हवन करे। आमके पत्तेका होम ज्वरका नाशक होता है॥ ४८—५२॥
मृत्युञ्जय देवता या मन्त्रका उपासक मृत्युविजयी होता है। तिलका होम करनेसे अभ्युदयकी प्राप्ति होती है। रुद्रशान्ति समस्त दोषोंकी शान्ति करनेवाली होती है। वे अब प्रस्तुत प्रसंगको पुनः प्रारम्भ करते हैं*॥ ५३॥
एक सौ आठ आहुतियोंसे मूलका और उसके दशांश आहुतियोंसे अङ्गोंका तर्पण करे। यह हवन अथवा तर्पण मूलमन्त्रसे ही करना चाहिये। फिर पूर्ववत् पूर्णाहुति दे। शिष्योंका दीक्षामें प्रवेश करानेके लिये प्रत्येक शिष्यके निमित्त मूलमन्त्रका सौ बार जप करना चाहिये। साथ ही दुर्निमित्तोंका निवारण तथा शुभ निमित्तोंकी सिद्धिके लिये मूलमन्त्रसे पूर्ववत् दो सौ आहुतियाँ देनी चाहिये। पहले बताये हुए जो अस्त्र-सम्बन्धी आठ मन्त्र हैं, उनके आदिमें मूल और अन्तमें 'स्वाहा' जोड़कर पाठ करते हुए एक-एक बार तर्पण करे। मूल-मन्त्रमें जो बीज हों, उन्हें 'शिखा' (वषट्)-से सम्पुटित करके अन्तमें 'हूं फट्' जोड़कर जप करे तो उससे मन्त्रका दीपन होता है। 'ॐ हूं शिवाय स्वाहा।' इत्यादि मन्त्रोंसे तर्पण किया जाता है। इसी प्रकार 'ॐ ॐ शिवाय हूं फट्।' इत्यादि दीपन-मन्त्र हैं॥ ५४—५७$\frac{१}{२}$॥
तदनन्तर शिव-मन्त्रसे अभिमन्त्रित जलसे धोयी हुई बटलोईको कवच-मन्त्रसे अवगुण्ठित करके उसमें रोली-चन्दन आदि लगा दे। फिर उसके गलेमें 'हूं फट्' मन्त्रसे अभिमन्त्रित उत्तम कुश और सूत्र बाँध दे। इससे चरुकी सिद्धि होती है। फिर धर्म आदि चार पायोंसे युक्त चौकी आदिका आसन देकर उसके ऊपर बने हुए अर्धचन्द्राकार मण्डलमें उस बटलोईको रखे तथा उसे आराध्यदेवताकी मूर्ति मानकर उसके ऊपर भावात्मक पुष्पोंसे भगवान् शिवका पूजन करे। अथवा उस बटलोईके मुखको वस्त्रसे बाँध दे और उसपर बाह्यपुष्पोंसे शिवका पूजन करे। इसके बाद पश्चिमाभिमुख रखे हुए चूल्हेको देख-भालकर शुद्ध करके उसमें अहंकार-बीजका
* इस प्रसंगमें सोमशम्भुने कुछ अधिक प्रयोग लिखे हैं। उनका कथन है कि—
विषमज्वरनाशाय चूतपत्राणि होमयेत्। घृतेन सह सार्द्राणि घृतप्लुतानि ज्वारिणः ॥
ॐ अमुकस्य ज्वरं नाशय जुं सः वौषट्। जले वरुणमभ्यर्च्य वृष्ट्यर्थं ग्रहसंयुतम्॥
तिलान् वारुणमन्त्रेण जुहुयाद् गुह्यकेन वा। मेघनाप्लाविताशेषदिगन्तधरणीतलान् ॥
धारयेत्तिलहोमेन शीघ्रं पाशुपताणुना। ॐ श्लीं पशु हूं फट् मेघान् स्फुटीक्रियताम् हूं फट्॥
सर्वोपद्रवनाशाय रुद्रशान्त्या तिलादिभिः। विधिना यजनं कुर्यादथ प्रस्तुतमुच्यते ॥
(कर्मकाण्ड-क्रमावली ६७६—६८०)
अर्थात् 'विषमज्वरका नाश करनेके लिये आमके पत्तोंका हवन करे। उन पत्तोंको घीसे आर्द्र करके अथवा घीमें डुबोकर उनकी आहुति दे। पत्तोंकी आहुति घीकी आहुतिके साथ देनी चाहिये। इससे ज्वरग्रस्त पुरुषको लाभ होता है। उस पुरुषका नाम लेकर कहे—'ॐ अमुकपुरुषस्य ज्वरं नाशय जुं सः वौषट्।'
'वृष्टिके लिये निम्नाङ्कित प्रयोग करे। जलमें ग्रहोंसहित वरुणदेवका पूजन करके वारुण अथवा गुह्यक-मन्त्रसे तिलोंकी आहुति दे। तिलके इस होमसे मनुष्य आकाशमें ऐसे मेघोंको स्थापित कर सकता है, जो सम्पूर्ण दिगन्तों तथा पृथ्वीको वर्षाके जलसे आप्लावित करनेमें समर्थ हों। फिर शीघ्र ही पाशुपतमन्त्रसे उन मेघोंको वर्षाके लिये विदीर्ण करे। मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ श्लीं पशु हूं फट् मेघान् स्फुटीक्रियताम् हूं फट्।'
'समस्त उपद्रवोंके नाशके लिये रुद्रमन्त्रसे शान्ति-अभिषेक करे तथा तिल आदिसे विधिपूर्वक होम-यज्ञ करे। अब प्रस्तुत विषयका प्रतिपादन करते हैं।'
- अध्याय ८१ * १७५
न्यास करे। तत्पश्चात् उसे कुण्डके दक्षिण भागमें रखे और यह भावना करे कि 'इस चूल्हेका शरीर धर्माधर्ममय है।' फिर उसकी शुद्धिके लिये उसके स्पर्शपूर्वक अस्त्र-मन्त्रका जप करे। इसके बाद अस्त्र-मन्त्र (फट्)-के जपसे अभिमन्त्रित गायके घीसे मार्जित हुई उस बटलोईको चूल्हेपर चढ़ावे॥ ५८—६२$\frac{१}{२}$॥
उसमें अस्त्र-मन्त्रसे शुद्ध किये हुए गोदुग्धको सौ बार प्रासाद-मन्त्र (हौं)-से अभिमन्त्रित करके डाले। फिर उस दूधमें साँवाँ आदिके चावल छोड़े। उसकी मात्रा इस प्रकार है—एक शिष्यकी दीक्षा-विधिके लिये पाँच पसर चावल डाले और दो-तीन आदि जितने शिष्य बढ़ें, उन सबके लिये क्रमशः एक-एक पसर चावल बढ़ाता जाय। फिर अस्त्र-मन्त्रसे आग जलावे एवं कवच-मन्त्र (हुम्)-से बटलोईको ढक दे। साधक पूर्वाभिमुख हो उक्त शिवाग्निमें मूल-मन्त्रके उच्चारणपूर्वक चरुको पकावे। जब वह अच्छी तरह सीझ जाय, तब वहाँ स्रुवाको घीसे भरकर स्वाहान्त संहिता-मन्त्रोंद्वारा उस चूल्हेमें ही 'तप्ताभिघार' नामक आहुति दे। तदनन्तर मण्डलमें चरु-स्थालीको रखकर अस्त्र-मन्त्रसे उसपर कुश रख दे। इसके बाद प्रणवसे चूल्हेमें उल्लेखन और हृदय-मन्त्रसे लेपन करके पूर्ववत् 'तप्ताभिघार' के स्थानमें 'सीताभिघार' नामक आहुति दे। इस तरह चूल्हा शीतल होता है। सीताभिघार-आहुतिकी विधि यह है कि संहिता-मन्त्रोंके अन्तमें 'वौषट्' पद जोड़कर उसके द्वारा कुण्ड-मण्डपके पश्चिम भागमें दर्भ आदिके आसनपर प्रत्येक शिष्यके निमित्तसे एक-एक आहुति दे। फिर स्रुक्द्वारा सम्पात-होम करनेके पश्चात् संहिता-मन्त्रसे शुद्धि करे। फिर अन्तमें 'वषट्' लगे हुए उसी संहिता-मन्त्रद्वारा एक बार चरु लेकर धेनुमुद्राद्वारा उसका अमृतीकरण करे। इसके बाद वेदीपर उसके द्वारा शान्ति-होम करे॥ ६३—७०$\frac{१}{२}$॥
तत्पश्चात् गुरु अपने शिष्योंके लिये, अग्निदेवताके लिये तथा लोकपालोंके लिये घृतसहित भाग नियत करे। ये तीनों भाग समान घीसे युक्त होते हैं। इन सबके नाम-मन्त्रोंके अन्तमें 'नमः' पद लगाकर उनके द्वारा उनका भाग अर्पित करे और उसी मन्त्रसे उन्हें आचमनीय निवेदित करे। तदनन्तर मूल-मन्त्रसे एक सौ आठ आहुति देकर विधिवत् पूर्णाहुति होम करे। इसके बाद मण्डलके भीतर कुण्डके पूर्वभागमें अथवा शिव एवं कुण्डके मध्यभागमें हृदय-मन्त्रसे रुद्र-मातृकागण आदिके लिये अन्तर्बलि अर्पित करे। फिर शिवका आश्रय ले, उनकी आज्ञा पाकर एकत्वकी भावना करते हुए इस प्रकार चिन्तन करे—'मैं सर्वज्ञता आदि गुणोंसे युक्त और समस्त अध्वाओंके ऊपर विराजमान शिव हूँ। यह यज्ञस्थान मेरा अंश है। मैं यज्ञका अधिष्ठाता हूँ' यों अहंकार-शिवसे अपने ऐकात्म्य-बोधपूर्वक गुरु यज्ञमण्डपसे बाहर निकले॥ ७१—७५$\frac{१}{२}$॥
फिर अस्त्र-मन्त्र (फट्)-द्वारा निर्मित मण्डलमें पूर्वाग्र उत्तम कुश बिछाकर, उसमें प्रणवमय आसनकी भावना करके, उसके ऊपर स्नान किये हुए शिष्यको बिठावे। उस समय शिष्यको श्वेत वस्त्र और श्वेत उत्तरीय धारण किये रहना चाहिये। यदि वह मुक्तिका इच्छुक हो तो उसका मुख उत्तर दिशाकी ओर होना चाहिये और यदि वह भोगका अभिलाषी हो तो उसे पूर्वाभिमुख बिठाना चाहिये। शिष्यके शरीरका घुटनोंसे ऊपरका ही भाग उस प्रणवासनपर स्थित रहना चाहिये, नीचेका भाग नहीं। इस प्रकार बैठे हुए शिष्यकी ओर गुरु पूर्वाभिमुख होकर बैठे। मोक्षरूपी प्रयोजनकी सिद्धिके लिये शिष्यके पैरोंसे लेकर शिखातकके अङ्गोंका क्रमशः निरीक्षण करना चाहिये और यदि भोगरूपी प्रयोजनकी सिद्धि अभीष्ट हो तो इसके विपरीत क्रमसे शिष्यके
१७६ * अग्निपुराण *
अङ्गोंपर दृष्टिपात करना उचित है, अर्थात् उस दशामें शिखासे लेकर पैरोंतकके अङ्गोंका क्रमशः निरीक्षण करना चाहिये।* उस समय गुरुकी दृष्टिमें शिष्यके प्रति कृपाप्रसाद भरा हो और वह दृष्टि शिष्यके समक्ष शिवके ज्योतिर्मय स्वरूपको अनावृतरूपसे अभिव्यक्त कर रही हो। इसके बाद अस्त्र-मन्त्रसे अभिमन्त्रित जलसे शिष्यका प्रोक्षण करके मन्त्राम्बु-स्नानका कार्य सम्पन्न करे (प्रोक्षण-मन्त्रसे ही यह स्नान सम्पन्न हो जाता है)। तदनन्तर विघ्नोंकी शान्ति और पापोंके नाशके लिये भस्म-स्नान करावे। इसकी विधि यों है—अस्त्र-मन्त्रद्वारा अभिमन्त्रित भस्म लेकर उसके द्वारा शिष्यको सृष्टि-संहार-योगसे ताडित करे (अर्थात् ऊपरसे नीचे तथा नीचेसे ऊपरतक अनुलोम-विलोम-क्रमसे उसके ऊपर भस्म छिड़के)॥ ७६–८०॥
फिर सकलीकरणके लिये पूर्ववत् अस्त्र-जलसे शिष्यका प्रोक्षण करके उसकी नाभिसे ऊपरके भागमें अस्त्र-मन्त्रका उच्चारण करते हुए कुशाग्रसे मार्जन करे और हृदय-मन्त्रका उच्चारण करके पापोंके नाशके लिये पूर्वोक्त कुशोंके मूलभागसे नाभिके नीचेके अङ्गोंका स्पर्श करे। साथ ही समस्त पाशोंको दो टूक करनेके लिये पुनः अस्त्र-मन्त्रसे उन्हीं कुशोंद्वारा यथोक्तरूपसे मार्जन एवं स्पर्श करे। तत्पश्चात् शिष्यके शरीरमें आसनसहित साङ्ग-शिवका न्यास करे। न्यासके पश्चात् शिवकी भावनासे ही पुष्प आदि द्वारा उसका पूजन करे। इसके बाद नेत्र-मन्त्र (वौषट्) अथवा हृदय-मन्त्र (नमः)-से शिष्यके दोनों नेत्रोंमें श्वेत, कोरदार एवं अभिमन्त्रित वस्त्रसे पट्टी बाँध दे और प्रदक्षिणक्रमसे उसको शिवके दक्षिण पार्श्वमें ले जाय। वहाँ षडुत्थ (छहों अध्वाओंसे ऊपर उठा हुआ अथवा उन छहोंसे उत्पन्न) आसन देकर यथोचित रीतिसे शिष्यको उसपर बिठावे॥ ८१–८४ $\frac{१}{२}$॥
संहारमुद्राद्वारा शिवमूर्तिसे एकीभूत अपने-आपको उसके हृदय-कमलमें अवरुद्ध करके उसका काय-शोधन करे। तत्पश्चात् न्यास करके उसकी पूजा करे। पूर्वाभिमुख शिष्यके मस्तकपर मूल-मन्त्रसे शिवहस्त रखना चाहिये, जो रुद्र एवं ईशका पद प्रदान करनेवाला है। इसके बाद शिव-मन्त्रसे शिष्यके हाथमें शिवकी सेवाकी प्राप्तिके उपायस्वरूप पुष्प दे और उसे शिवपर ही चढ़वावे। तदनन्तर गुरु उसके नेत्रोंमें बँधे हुए वस्त्रको हटाकर उसके लिये शिवदेवगणाङ्कित स्थान, मन्त्र, नाम आदिकी उद्भावना करे, अथवा अपनी इच्छासे ही ब्राह्मण आदि वर्णोंके क्रमशः नामकरण करे॥ ८५–८८ $\frac{१}{२}$॥
शिव-कलश तथा वर्धनीको प्रणाम करवाकर अग्निके समीप अपने दाहिने आसनपर पूर्ववत् उत्तराभिमुख शिष्यको बिठावे और यह भावना करे कि 'शिष्यके शरीरसे सुषुम्णा निकलकर मेरे शरीरमें विलीन हो गयी है।' स्कन्द! इसके बाद मूलमन्त्रसे अभिमन्त्रित दर्भ लेकर उसके अग्रभागको तो शिष्यके दाहिने हाथमें रखे और मूलभागको अपनी जंघापर। अथवा अग्रभागको ही अपनी जंघापर रखे और मूलभागको शिष्यके दाहिने हाथमें॥ ८९–९१ $\frac{१}{२}$॥
शिव-मन्त्रद्वारा रेचक प्राणायामकी क्रिया करते हुए शिष्यके हृदयमें प्रवेशकी भावना करके पुनः उसी मन्त्रसे पूरक प्राणायामद्वारा अपने हृदयाकाशमें लौट आनेकी भावना करे। फिर शिवाग्निसे इसी तरह नाडी-संधान करके उसके संनिधानके लिये हृदय-मन्त्रसे तीन आहुतियाँ दे।
* सोमशम्भुकी 'कर्मकाण्ड-क्रमावली' श्लोक ७०४ में दृष्टिपातका क्रम इसके विपरीत है। वहाँ 'मुक्तौ भुक्तौ विलोमतः' के स्थानमें 'भुक्त्यै मुक्त्यै विलोमतः' पाठ है।
- अध्याय ८२ * १७७
शिवहस्तकी स्थिरताके लिये मूल-मन्त्रसे एक सौ आहुतियोंका हवन करे। इस प्रकार करनेसे शिष्य समय-दीक्षामें संस्कारके योग्य हो जाता है॥ ९२-९५॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'समय-दीक्षाकी योग्यताके आपादक-विधानका वर्णन' नामक इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८१॥
बयासीवाँ अध्याय
समय-दीक्षाके अन्तर्गत संस्कार-दीक्षाकी विधिका वर्णन
भगवान् शिव कहते हैं—षडानन! अब मैं संस्कार-दीक्षाकी विधिका वर्णन करूँगा, सुनो—अग्निमें स्थित महेश्वरके शिवा-शिवममय (अर्ध-नारीश्वर) रूपका अपने हृदयमें आवाहन करे। शिव और शिवा दोनों एक शरीरमें ही परस्पर सटे हुए हैं—इस प्रकार ध्यानद्वारा देखकर उनका पूजन करके हृदय-मन्त्रसे संतर्पण करे। फिर उनके संनिधानके लिये हृदय-मन्त्रसे ही अग्निमें पाँच आहुतियाँ दे। तदनन्तर अस्त्र-मन्त्रसे अभिमन्त्रित पुष्पद्वारा शिष्यके हृदयमें ताड़ना दे, अर्थात् उसके वक्षपर उस फूलको फेंके। फिर उसके भीतर प्रकाशमान नक्षत्रकी आकृतिमें चैतन्य (जीव)-की भावना करे। तत्पश्चात् हुंकारयुक्त रेचक प्राणायामके योगसे शिष्यके हृदयमें भावनाद्वारा प्रवेश करके संहारिणीमुद्राद्वारा उस जीवचैतन्यको वहाँसे खींचकर पूरक प्राणायामके योगसे उसे अपने हृदयमें स्थापित करे॥ १-४॥
तदनन्तर 'उद्भव' नामक मुद्राका प्रदर्शन करके हृत्सम्पुटित आत्ममन्त्रका उच्चारण करते हुए रेचक प्राणायामके सहयोगसे उसका वागीश्वरी देवीकी योनिमें भावनाद्वारा आधान करे। उक्त मन्त्रका स्वरूप इस प्रकार है—ॐ हां हां हामात्मने नमः। इसके बाद अत्यन्त प्रज्वलित एवं धूमरहित अग्निमें अभीष्ट-सिद्धिके लिये आहुति दे। अप्रज्वलित तथा धूमयुक्त अग्निमें किया गया होम सफल नहीं होता है। यदि अग्निकी लपटें दक्षिणावर्त उठ रही हों, उससे उत्तम गन्ध प्रकट हो रही हो तथा वह अग्नि सुस्निग्ध प्रतीत होती हो तो उसे श्रेष्ठ बताया गया है। इसके विपरीत जिस अग्निसे चिनगारियाँ छूटती हों तथा जिसकी लपट धरतीको ही चूम रही हो, उसे उत्तम नहीं कहा गया है*॥ ५-८॥
इस प्रकारके चिह्नोंसे शिष्यके पापको जानकर उसका हवन कर दे, अथवा पाप-भक्षण-निमित्तक होमसे उस पापको जला डाले। फिर नूतन रूपसे उसमें द्विजत्वकी प्राप्ति, रुद्रांशकी भावना, आहार और बीजकी शुद्धि, गर्भाधान, गर्भ-स्थिति (पुंसवन), सीमन्तोन्नयन, जातकर्म तथा
* इस श्लोकके बाद सोमशम्भुकी 'कर्मकाण्ड-क्रमावली'में तीन श्लोक अधिक उपलब्ध होते हैं, जिनमें शिष्यके पापविशेषको जाननेके लिये अग्निके लक्षण दिये गये हैं। वे श्लोक इस प्रकार हैं—
अन्तेवासिकृतं पापं जानीयादग्निलक्षणैः। विष्ठागन्धे स भूहर्ता ब्रह्महा गुरुतल्पगः॥
सुरापो गुरुहन्ता च गोघ्नश्च कृतनाशनः। कृशेऽग्नौ शवगन्धे च गर्भभर्तृविनाशनः॥
भ्रमति स्त्रीवधे वह्निः कम्पते हेमहर्तरि। वधे स्फुटति बालस्य निस्तेजा गर्भघातके॥
'हवनीय अग्निके लक्षणोंसे शिष्यद्वारा किये गये पापविशेषको जानना चाहिये। यदि उस अग्निसे विष्ठाकी-सी दुर्गन्ध प्रकट होती हो तो यह जानना चाहिये कि वह शिष्य भूमिहर्ता, ब्रह्महत्यारा, गुरुपत्नीगामी, शराबी, गुरुघाती, गोवध करनेवाला तथा कृतघ्न रहा है। यदि अग्नि क्षीण हो और उससे मुर्देकी-सी बदबू आ रही हो तो उस शिष्यको गर्भ-हत्यारा और स्वामिघाती समझना चाहिये। यदि शिष्यमें स्त्रीवधजनित पाप हो तो उसके आहुति देते समय आगकी लपट सब ओर चक्कर देती है और यदि वह सुवर्णकी चोरी करनेवाला है तो उससे अग्निदेवमें कम्पन होने लगता है। यदि शिष्यने बालहत्याका पाप किया है तो अग्निमें किसी वस्तुके फूटनेकी-सी आवाज होती है। यदि शिष्य गर्भघाती है तो उसके संनिहित होनेसे आग निस्तेज हो जाती है।'
१७८ * अग्निपुराण *
नामकरणके लिये पृथक्-पृथक् मूल-मन्त्रसे एक सौ पाँच-पाँच आहुतियाँ दे तथा चूडाकर्म आदिके लिये इनकी अपेक्षा दशांश आहुतियाँ प्रदान करे। इस प्रकार जिसका बन्धन शिथिल हो गया है, उस जीवात्माके भीतर जो शक्तिका उत्कर्ष होता है, वही उसके रुद्रपुत्र होनेमें निमित्त बनकर 'गर्भाधान' कहलाता है। स्वतन्त्रतापूर्वक उसमें जो आत्मगुणोंकी अभिव्यक्ति होती है, उसीको यहाँ 'पुंसवन' माना गया है। माया और आत्मा—दोनों एक-दूसरेसे पृथक् हैं, इस प्रकार जो विवेक-ज्ञान उत्पन्न होता है, उसीका नाम यहाँ 'सीमन्तोन्नयन' है॥ ९—१३॥
शिव आदि शुद्ध सद्वस्तुको स्वीकार करना 'जन्म' माना गया है। मुझमें शिवत्व है अथवा मैं शिव हूँ, इस प्रकार जो बोध होता है, वही शिवत्वके योग्य शिष्यका 'नामकरण' है। संहार-मुद्रासे प्रकाशमान अग्निकणके समान प्रतीत होनेवाले जीवात्माको लेकर अपने हृदयकमलमें स्थापित करे। तदनन्तर कुम्भक प्राणायामके योगपूर्वक मूल-मन्त्रका उच्चारण करते हुए उस समय हृदयके भीतर शक्ति और शिवकी समरसताका सम्पादन करे॥ १४—१६॥
ब्रह्मा आदि कारणोंका क्रमशः त्याग करते हुए रेचक-योगसे जीवात्माको शिवके समीप ले जाकर फिर उद्भवमुद्राके द्वारा उसे वापस ले ले और पूर्वोक्त हृत्सम्पुटित आत्ममन्त्रद्वारा रेचक प्राणायाम करते हुए विधानवेत्ता गुरु शिष्यके हृदय-कमलकी कर्णिकामें उस जीवात्माको स्थापित कर दे। इसके बाद गुरु शिव और अग्निकी तत्कालोचित पूजा करे और शिष्यसे अपने लिये प्रणाम करवाकर उसे समयाचारका उपदेश दे। वह उपदेश इस प्रकार है—'इष्टदेवता (शिव)-की कभी निन्दा न करे; शिव-सम्बन्धी शास्त्रोंकी भी निन्दासे दूर रहे; शिव-निर्माल्य आदिको कभी न लाँघे। जीवन-पर्यन्त शिव, अग्नि तथा गुरुदेवकी पूजा करता रहे। बालक, मूढ़, वृद्ध, स्त्री, भोगार्थी (भूखे) तथा रोगी मनुष्योंको यथाशक्ति धन आदि आवश्यक वस्तुएँ दे।' समर्थ पुरुषके लिये सब कुछ दान करनेका नियम बताया गया है॥ १७—२१॥
व्रतके अङ्गभूत जटा, भस्म, दण्ड, कौपीन एवं संयमपोषक अन्य वस्तुओंको ईशान आदि नामोंसे अथवा उनके आदिमें 'नमः' लगाकर उन नाम-मन्त्रोंसे क्रमशः अभिमन्त्रित करके स्वाहान्त संहिता-मन्त्रोंका पाठ करते हुए उन्हें पात्रोंमें रखे और पूर्ववत् सम्पाताभिहत (संस्कारविशेषसे संस्कृत) करके स्थण्डिलेश (वेदीपर स्थापित-पूजित भगवान् शिव)-के समक्ष उपस्थित करे। इनकी रक्षाके लिये क्षणभर कलशके नीचे रखे। इसके बाद गुरु शिवसे आज्ञा लेकर उक्त सभी वस्तुएँ व्रतधारी शिष्यको अर्पित करे॥ २२—२४॥
इस प्रकार विशेषरूपसे विशिष्ट समय-दीक्षा-सम्पन्न हो जानेपर शिष्य अग्निहोम तथा आगमज्ञानके योग्य हो जाता है*॥ २५॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'समय-दीक्षाके अन्तर्गत संस्कार-दीक्षाकी विधिका वर्णन' नामक बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८२॥
* सोमशम्भुके ग्रन्थमें यहाँ निम्नाङ्कित पंक्तियाँ अधिक हैं—
नाडीसंधानहोमस्तु मन्त्राणां तर्पणं तथा। पूर्वजातेः समुद्धारो द्विजत्वापादनं तथा॥
चैतन्यस्यापि संस्कारो रुद्रांशापादनं तथा। दत्त्वा पवित्रकं होमशतं वाथ सहस्रकम्॥
दीक्षैषा सामयी प्रोक्ता रुद्रेशपददायिनी। (श्लोक ७४९—७५१)
'नाडीसंधान-होम, मन्त्रतर्पण, शिष्यका पूर्व-जातिसे उद्धार, उसमें नूतनरूपसे द्विजत्वका सम्पादन, चैतन्यसंस्कार, रुद्रांशका आपादन तथा पवित्रक-दानपूर्वक सौ बार या सहस्र बार होम—इन क्रियाओंको 'सामयी-दीक्षा' कहा गया है। यह रुद्रेश-पद प्रदान करनेवाली है।'
* अध्याय ८३ * १७९
तिरासीवाँ अध्याय
निर्वाण-दीक्षाके अन्तर्गत अधिवासनकी विधि
भगवान् शंकर कहते हैं—षडानन स्कन्द ! तदनन्तर निर्वाण-दीक्षामें पाशबन्धन-शक्तिके लिये और ताड़न आदिके लिये मूल-मन्त्र आदिका दीपन करे। उस समय प्रत्येकके लिये एक-एक या तीन-तीन आहुति देकर मन्त्रोंका दीपन-कर्म सम्पन्न करे। आदिमें प्रणव और अन्तमें 'हूं फट्' लगाकर बीचमें बीज, गर्भ एवं शिखाबन्ध-स्वरूप तीन 'हूं' का उच्चारण करे। इससे मूल-मन्त्रका दीपन होता है, यथा—'ॐ हूं हूं हूं हूं फट्।' इसीसे हृदयका दीपन होता है। यथा—'ॐ हूं हूं हूं हूं फट् हृदयाय नमः।' फिर 'ॐ हूं हूं हूं हूं फट् शिरसे स्वाहा।' आदि कहकर सिर आदि अङ्गोंका दीपन करे। समस्त क्रूर कर्मोंमें इसी तरह मूलादिका दीपन करना उचित है। शान्तिकर्म, पुष्टिकर्म और वशीकरणमें आदिगत प्रणव-मन्त्रके अन्तमें 'वषट्' जोड़कर उसी मन्त्रद्वारा प्रत्येकका दीपन करे। 'वषट्' और 'वौषट्' से युक्त तथा सम्पूर्ण काम्य-कर्मोंके ऊपर स्थित शम्बर-मन्त्रोंद्वारा आप्यायन आदि सभी कर्मोंमें हवन करना चाहिये॥ १–५॥
तत्पश्चात् अपने वामभागमें स्थित और मण्डलमें विराजमान शुद्ध शरीरवाले शिष्यका पूजन करके, एक उत्तम सूत्रमें सुषुम्णा नाड़ीकी भावना करके, मूल-मन्त्रसे उसको शिखाबन्धतक ले जाकर, वहाँसे फिर पैरोंके अंगूठेतक ले आवे। तत्पश्चात् संहार-क्रमसे उसे पुनः मुमुक्षु शिष्यकी शिखाके समीप ले जाय और वहीं उसे बाँध दे। पुरुषके दाहिने भागमें और नारीके वामभागमें उस सूत्रको नियुक्त करना चाहिये। इसके बाद शिष्यके मस्तकपर शक्तिमन्त्रसे पूजित शक्तिको संहारमुद्राद्वारा लाकर उक्त सूत्रमें उसी मन्त्रसे जोड़ दे। सुषुम्णा नाड़ीको लेकर मूल-मन्त्रसे उसका सूत्रमें न्यास करे और हृदय-मन्त्रसे उसकी पूजा करे। तदनन्तर कवच-मन्त्रसे अवगुण्ठित करके हृदय-मन्त्रद्वारा तीन आहुतियाँ दे। ये आहुतियाँ नाड़ीके संनिधानके लिये दी जाती हैं। शक्तिके संनिधानके लिये भी इसी तरह आहुति देनेका विधान है॥ ६–१०॥
तदनन्तर 'ॐ हां तत्त्वाध्वने नमः।', 'ॐ हां पदाध्वने नमः।', 'ॐ हां वर्णाध्वने नमः।', 'ॐ हां मन्त्राध्वने नमः।', 'ॐ हां कलाध्वने नमः।', 'ॐ हां भुवनाध्वने नमः।'—इन मन्त्रोंसे पूर्वोक्त सूत्रमें छः प्रकारके अध्वाओंका न्यास करके अस्त्र-मन्त्रद्वारा अभिमन्त्रित जलसे शिष्यका प्रोक्षण करे। फिर अस्त्र-मन्त्रके जपपूर्वक पुष्प लेकर उसके द्वारा शिष्यके हृदयमें ताड़न करे। इसके बाद हुंकारयुक्त रेचक प्राणायामके योगसे वहाँ शिष्यके शरीरमें प्रवेश करके, उसके भीतर हंस-बीजमें स्थित जीवचैतन्यको अस्त्र-मन्त्र पढ़कर वहाँसे विलग करे। इसके बाद 'ॐ हः हूं फट्।' इस शक्तिसूत्रसे तथा 'हां हां स्वाहा।' इस मन्त्रसे संहारमुद्राद्वारा उक्त नाड़ीभूत सूत्रमें उस विलग हुए जीवचैतन्यको नियुक्त करे। 'ॐ हां हां हामात्मने नमः।' इस मन्त्रका जप करते हुए जीवात्माके व्यापक होनेकी भावना करे। फिर कवच-मन्त्रसे उसका अवगुण्ठन करे और उसके सांनिध्यके लिये हृदय-मन्त्रसे तीन बार आहुतियाँ दे॥ ११–१८॥
तत्पश्चात् विद्यादेहका न्यास करके उसमें शान्त्यतीतकलाका अवलोकन करे। उस कलाके अन्तर्गत इतर तत्त्वोंसे युक्त आत्माका चिन्तन करे। 'ॐ हूं शान्त्यतीतकलापाशाय नमः।' इस मन्त्रसे उक्त कलाका अवलोकन करे। दो तत्त्व, एक मन्त्र, एक पद, सोलह वर्ण, आठ भुवन, क, ख आदि बीज और नाड़ी, दो कलाएँ, विषय, गुण और एकमात्र कारणभूत सदाशिव—इन सबका श्वेतवर्णा शान्त्यतीतकलामें अन्तर्भाव करके 'ॐ हूं शान्त्यतीतकलापाशाय हूं फट्।'
१८० * अग्निपुराण *
इस मन्त्रसे प्रताड़न करे। संहारमुद्राद्वारा उक्त कलापाशको लेकर सूत्रके मस्तकपर रखे और उसकी पूजा करे। तदनन्तर उसके सांनिध्यके लिये पूर्ववत् तीन आहुतियाँ दे। शान्त्यतीतकलाका अपना बीज है- 'हूं'। दो तत्त्व, दो अक्षर, बीज, नाड़ी, क, ख-ये दो अक्षर, दो गुण, दो मन्त्र, कमलमें विराजमान एकमात्र कारणभूत ईश्वर, बारह पद, सात लोक और एक विषय-इन सबका कृष्णवर्णा शान्तिकलाके भीतर चिन्तन करे। तत्पश्चात् पूर्ववत् ताड़न करके सूत्रके मुखभागमें इन सबका नियोजन करे। इसके बाद सांनिध्यके लिये अपने बीज-मन्त्रद्वारा तीन आहुतियाँ दे। शान्तिकलाका अपना बीज है- 'हूं हूं' ॥ १९-२७ ॥
सात तत्त्व, इक्कीस पद, छः वर्ण, एक शम्बर, पचीस लोक, तीन गुण, एक विषय, रुद्ररूप कारणतत्त्व, बीज, नाड़ी और क, ख-ये दो कलाएँ-इन सबका अत्यन्त रक्तवर्णवाली विद्याकलामें अन्तर्भाव करके, आवाहन और संयोजनपूर्वक पूर्वोक्त सूत्रके हृदयभागमें स्थापित करके अपने मन्त्रसे पूजन करे और इन सबकी संनिधिके लिये पूर्ववत् तीन आहुतियाँ दे। आहुतिके लिये बीज-मन्त्र इस प्रकार है- 'हूं हूं हूं।' चौबीस तत्त्व, पचीस वर्ण, बीज, नाड़ी, क, ख-ये दो कलाएँ, बाईस पद, साठ लोक, साठ कला, चार गुण, तीन मन्त्र, एक विषय तथा कारणरूप श्रीहरिका शुक्लवर्णा प्रतिष्ठा-कलामें अन्तर्भाव करके ताड़न आदि करे। फिर इन सबका पूर्वोक्त सूत्रके नाभिभागमें संयोजन करके संनिधिकरणके लिये तीन आहुतियाँ दे। उसके लिये बीज-मन्त्र इस प्रकार है- 'हूं हूं हूं हूं।' एक सौ आठ भुवन या लोक, अट्ठाईस पद, बीज, नाड़ी और समीरकी दो-दो संख्या, दो इन्द्रियाँ, एक वर्ण, एक तत्त्व, एक विषय, पाँच गुण, कारणरूप कमलासन ब्रह्मा और चार शम्बर-इन सबका पीतवर्णा निवृत्तिकलामें अन्तर्भाव करके ताड़न करे। इन्हें ग्रहण करके सूत्रके चरणभागमें स्थापित करनेके पश्चात् इनकी पूजा करे और इनके सांनिध्यके लिये अग्निमें तीन आहुतियाँ दे। आहुतिके लिये बीज-मन्त्र यों है- 'हूं हूं हूं हूं हूं' ॥ २८-३५ ॥
इस प्रकार सूत्रगत पाँच कलाओंको लेकर शिष्यके शरीरमें उनका संयोजन करे। सबीजादीक्षामें समयाचार-पाशसे, देहारम्भक धर्मसे, मन्त्रसिद्धिके फलसे तथा इष्टापूर्तादि धर्मसे भी भिन्न चैतन्यरोधक सूक्ष्म प्रबन्धकका कलाओंके भीतर चिन्तन करे। इसी क्रमसे अपने मन्त्रद्वारा तीन-तीन आहुतियाँ देते हुए तर्पण और दीपन करे। 'ॐ हूं शान्त्यतीत-कलापाशाय स्वाहा।' इत्यादि मन्त्रसे तर्पण करे। 'ॐ हूं हूं शान्त्यतीतकलापाशाय हूं हूं फट्।'-इत्यादि मन्त्रसे दीपन करे। पूर्वोक्त सूत्रको व्याप्ति-बोधके लिये पाँच कला-स्थानोंमें सुरक्षापूर्वक रखकर उसपर कुङ्कुम आदिके द्वारा साङ्ग-शिवका पूजन करे। फिर कला-मन्त्रोंके अन्तमें 'हूं फट्।'-इन पदोंको जोड़कर उनका उच्चारण करते हुए क्रमशः पाशोंका भेदन करके नमस्कारान्त कलामन्त्रोंद्वारा ही उनके भीतर प्रवेश करे। साथ ही उन कलाओंका ग्रहण एवं बन्धन भी करे। 'ॐ हूं हूं हूं शान्त्यतीतकलां गृह्णामि बध्नामि च।'-इत्यादि मन्त्रोंद्वारा कलाओंके ग्रहण एवं बन्धन आदिका प्रयोग होता है। पाश आदिका वशीकरण (या भेदन), ग्रहण और बन्धन तथा पुरुषके प्रति सम्पूर्ण व्यापारोंका निषेध-यह बारंबार प्रत्येक कलाके लिये आवश्यक कर्तव्य है ॥ ३६-४४ ॥
तदनन्तर शिष्यको बिठाकर, पूर्वोक्त सूत्रको उसके कंधेसे लेकर उसके हाथमें दे और भूले-भटके पापोंका नाश करनेके लिये सौ बार मूल-मन्त्रसे हवन करे। अस्त्र-सम्बन्धी मन्त्रके सम्पुटमें पुरुषके और प्रणवके सम्पुटमें स्त्रीके सूत्रको रखकर, उसे हृदय-मन्त्रसे सम्पुटित करके उसी मन्त्रसे उसकी पूजा करे। साङ्ग-शिवसे सूत्रको
- अध्याय ८३ * १८१
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सम्पात-शोधित करके कलशके नीचे रखे और उसकी रक्षाके लिये इष्टदेवसे प्रार्थना करे। शिष्यके हाथमें फूल देकर कलश आदिका पूजन एवं प्रणाम करनेके अनन्तर याग-मन्दिरके मध्यभागसे बाहर जाय। वहाँ तीन मण्डल बनाकर मुक्तिकी इच्छा रखनेवाले शिष्योंको उत्तराभिमुख बिठावे और भोगकी अभिलाषा रखनेवाले शिष्योंको पूर्वाभिमुख ॥ ४५—४९ ॥
पहले कुशयुक्त हाथसे तीन चुल्लू पञ्चगव्य पिलावे। बीचमें कोई आचमन न करे। तत्पश्चात् दूसरी बार प्रत्येक शिष्यको तीन या आठ ग्रास चरु दे। मुक्तिकामी शिष्यको पलाशके दोनेमें और भोगेच्छुको पीपलके पत्तेसे बने हुए दोनेमें चरु देकर उसे हृदय-मन्त्रके उच्चारणपूर्वक दाँतोंके स्पर्शके बिना खिलाना चाहिये। चरु देकर गुरु स्वयं हाथ धो शुद्ध होकर, पवित्र जलसे उन शिष्योंको आचमन करावे। इसके बाद हृदय-मन्त्रसे दातुन करके उसे फेंक दे।$^१$ उसका मुखभाग शुभ दिशाकी ओर हो तो उसका शुभ फल होता है। न्यूनता आदि दोषको दूर करनेके लिये मूल-मन्त्रसे एक सौ आठ बार आहुति दे। स्थण्डिलेश्वर (वेदीपर स्थापित-पूजित शिव)-को सम्पूर्ण कर्म समर्पित करे। तदनन्तर इनकी पूजा और विसर्जन करके चण्डेशका पूजन करे ॥ ५०—५४ ॥
तत्पश्चात् निर्माल्यको हटाकर चरुके शेष भागको अग्निमें होम दे। कलश और लोकपालोंका पूजन एवं विसर्जन करके गण और अग्निका भी, यदि वे बाह्य दिशामें रक्षित हों तो, विसर्जन करे। मण्डलसे बाहर लोकपालोंको भी संक्षेपसे बलि अर्पित करके भस्म और शुद्ध जलके द्वारा स्नान करनेके पश्चात् यागमण्डपमें प्रवेश करे। वहाँ गृहस्थ साधकोंको कुशकी शय्यापर अस्त्र-मन्त्रसे रक्षित करके सुलावे। उनका सिरहाना पूर्वकी ओर होना चाहिये। जो साधक या शिष्य विरक्त हों उन्हें हृदय-मन्त्रसे उत्तम भस्ममयी शय्यापर सुलावे। उन सबके मस्तक दक्षिण दिशाकी ओर होने चाहिये। सभी शिष्य अस्त्र-मन्त्रसे रक्षित होकर शिखा-मन्त्रसे अपनी-अपनी शिखा बाँध लें। तदनन्तर गुरु उन्हें स्वप्न-मानवका परिचय देकर सो जानेकी आज्ञा प्रदान करे और स्वयं मण्डलसे बाहर चला जाय ॥ ५५—५९ ॥
इसके बाद ‘ॐ हिलि हिलि शूलपाणये नमः स्वाहा।’ इस मन्त्रसे पञ्चगव्य और चरुका प्राशन करके दन्तधावन ले आचमन करे। फिर भगवान् शिवका ध्यान करके पवित्र शय्यापर आकर दीक्षागत क्रियाकाण्डका स्मरण करते हुए गुरु शयन करे।$^२$ इस प्रकार दीक्षाधिवासनकी विधि संक्षेपसे बतायी गयी ॥ ६०—६२ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'निर्वाण-दीक्षाके अन्तर्गत अधिवासनकी विधिकी वर्णन' नामक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८३ ॥
१. ‘दन्तकाष्ठं हृदा कृत्वा प्रक्षिपेत् शोभने शुभम्।’ इस पंक्तिके स्थानमें सोमशम्भुकी ‘कर्मकाण्ड-क्रमावली’में इस प्रकार पाठ उपलब्ध होता है— दन्तकाष्ठं हृदा दत्त्वा तद्दन्ताग्रविचर्वितम् ॥ धौतमूर्ध्वमुखं भूमौ क्षेपयेतात्मुन्नयेत् । प्राक्पश्चिमोत्तरे चोर्ध्वं वदने पातुमुत्तमम् ॥ सर्वेषामेव शिष्याणामितरास्यमशोभनम् । अशोभननिषेधार्थं शतमस्त्रेण होमयेत् ॥ (७९७—७९९) अर्थात् ‘इसके बाद हृदय-मन्त्रसे दन्तकाष्ठ देकर उसे चबानेको कहे। शिष्यके दन्ताग्रभागसे जब वह अच्छी तरह चर्वित हो जाय (कूँच लिया जाय) तो उसे धोकर उसका मुखभाग ऊपरकी ओर रखते हुए पृथ्वीपर फेंकवा दे। जब वह गिर जाय तो उसके सम्बन्धमें निम्नाङ्कित प्रकारसे शुभाशुभका विचार करे। यदि उस दातुनका मुखभाग पूर्व, पश्चिम, उत्तर अथवा ऊर्ध्व दिशाकी ओर हो तो उसका वह गिरना उत्तम माना गया है। इसके सिवा दूसरी दिशाकी ओर उसका मुख हो तो वह सभी शिष्योंके लिये अशुभ होता है। अशुभका निवारण करनेके लिये अस्त्र-मन्त्रसे सौ आहुतियाँ दे।’ २. दीक्षागत क्रियाकाण्डके स्मरणीय स्वरूपका वर्णन सोमशम्भुकी ‘कर्मकाण्ड-क्रमावली’ में इस प्रकार मिलता है— मन्त्राणां दीपनं प्रोक्तं ततः सूत्रावलम्बनम् । सुषुम्णानाडिसंयोगं शिष्यचैतन्ययोजनम् ॥
१८२ * अग्निपुराण *
चौरासीवाँ अध्याय
निर्वाण-दीक्षाके अन्तर्गत निवृत्तिकला-शोधन-विधि
**भगवान् शंकर कहते हैं—**स्कन्द! तदनन्तर प्रातःकाल उठकर गुरु स्नान आदिसे निवृत्त हो शिष्योंसे उनके द्वारा देखे गये स्वप्नको पूछे। स्वप्नमें दही, ताजा कच्चा मांस और मद्य आदिका दर्शन या उपयोग उत्तम बताया गया है। ऐसा स्वप्न शुभका सूचक होता है। सपनेमें हाथी और घोड़ेपर चढ़ना तथा श्वेत वस्त्र आदिका दर्शन शुभ है। स्वप्नमें तेल लगाना आदि अशुभ माना गया है। उसकी शान्तिके लिये अघोर-मन्त्रसे होम करना चाहिये। प्रातः और मध्याह्न—दो कालोंका नित्य-कर्म करके यज्ञमण्डपमें प्रवेश करे तथा विधिवत् आचमन करके नैमित्तिक विधिमें भी नित्यके समान ही कर्म करे। तत्पश्चात् अध्व-शुद्धि करके अपने ऊपर शिवहस्त रखे। फिर कलशस्थ शिवका पूजन करके क्रमशः इन्द्रादि दिक्पालोंकी भी पूजा करे। मण्डलमें और वेदीपर भी भगवान् शिवका पूजन करना चाहिये। इसके बाद तर्पण, अग्निपूजन, पूर्णाहुति-पर्यन्त होम एवं मन्त्र-तर्पण* करे॥ १–५॥
दुःस्वप्न-दर्शनजनित दोषका निवारण करनेके लिये ‘हूं’ सम्पुटित अस्त्र-मन्त्र (हूं फट् हूं)-के द्वारा एक सौ आठ आहुतियाँ देकर मन्त्र-दीपन करे। वेदी और कलशके मध्यभागमें अन्तर्बलिका अनुष्ठान करके, शिष्योंके प्रवेशके लिये इष्टदेवसे आज्ञा लेकर, गुरु मण्डपसे बाहर जाय। वहाँ समय-दीक्षाकी ही भाँति मण्डलारोपण आदि करे। सम्पातहोम तथा सुषुम्णा नाड़ीरूप कुशको शिष्यके हाथमें देने आदिसे सम्बद्ध कार्यका सम्पादन करे। फिर निवृत्तिकलाके सांनिध्यके लिये मूल-मन्त्रसे तीन आहुतियाँ देकर, कुम्भस्थ शिवकी पूजा करके कलापाशमय सूत्र अर्पित करे। तदनन्तर पूजित शिष्यके ऊपरी शरीरके दक्षिणी भागमें—उसकी शिखामें उस सूत्रको बाँधे और उसे पैरके अँगूठेतक लंबा रखे। इस प्रकार उस पाशका निवेश करके उसमें मन-ही-मन निवृत्तिकलाकी व्याप्तिका दर्शन करे। उसमें एक सौ आठ भुवन जानने योग्य हैं॥ ६–११॥
१. कपाल, २. अज, ३. अहिर्बुध्न्य, ४. वज्रदेह, ५. प्रमर्दन, ६. विभूति, ७. अव्यय, ८. शास्ता, ९. पिनाकी, १०. त्रिदशाधिप—ये दस रुद्र पूर्व दिशामें विराजते हैं। ११. अग्निभद्र, १२. हुताश, १३. पिङ्गल, १४. खादक, १५. हर, १६. ज्वलन, १७. दहन, १८. बभ्रु, १९. भस्मान्तक, २०. क्षपान्तक—ये दस रुद्र अग्निकोणमें स्थित हैं। २१. दम्य, २२. मृत्युहर, २३. धाता, २४. विधाता, २५. कर्ता, २६. काल, २७. धर्म, २८. अधर्म, २९. संयोक्ता, ३०. वियोजक—ये दस रुद्र दक्षिण दिशामें शोभा पाते हैं। ३१. नैर्ऋत्य, ३२. मारुत, ३३. हन्ता, ३४. क्रूरदृष्टि, ३५. भयानक, ३६. ऊर्ध्वकेश, ३७. विरूपाक्ष, ३८. धूम्र, ३९. लोहित, ४०. दंष्ट्री—ये दस रुद्र नैर्ऋत्यकोणमें स्थित हैं। ४१. बल, ४२. अतिबल, ४३. पाशहस्त,
ग्रहणं ताडनं योगं पूजातर्पणदीपनम्। बन्धनं शान्त्यतीतादेः शिवकुम्भसमर्पणम्॥
एवं कर्मक्रमः प्रोक्तः पाशबन्धे शिवेन तु। (८०८–८०९ई)
'पहले तो मन्त्रोंका दीपन कहा गया है। फिर सूत्रावलम्बन, उसमें सुषुम्णा नाड़ीका संयोग, शिष्यचैतन्यका संयोजन, ग्रहण, ताड़न, योग, पूजा, तर्पण, दीपन, शान्त्यतीत आदि कलाओंका बन्धन तथा शिव-कलश-समर्पण—इस प्रकार भगवान् शिवने पाशबन्धविषयक कर्मकाण्डके क्रमका प्रतिपादन किया है।'
* कहीं-कहीं बहिरतर्पण पाठ भी मिलता है।
- अध्याय ८४ * १८३
४४. महाबल, ४५. श्वेत, ४६. जयभद्र, ४७. दीर्घबाहु, ४८. जलान्तक, ४९. वडवास्य, ५०. भीम—ये दस रुद्र वरुणदिशामें स्थित बताये गये हैं। ५१. शीघ्र, ५२. लघु, ५३. वायुवेग, ५४. सूक्ष्म, ५५. तीक्ष्ण, ५६. क्षमान्तक, ५७. पञ्चान्तक, ५८. पञ्चशिख, ५९. कपर्दी, ६०. मेघवाहन—ये दस रुद्र वायव्यकोणमें स्थित हैं। ६१. जटामुकुटधारी, ६२. नानारत्नधर, ६३. निधीश, ६४. रूपवान्, ६५. धन्य, ६६. सौम्यदेह, ६७. प्रसादकृत्, ६८. प्रकाम, ६९. लक्ष्मीवान्, ७०. कामरूप—ये दस रुद्र उत्तर दिशामें स्थित हैं। ७१. विद्याधर, ७२. ज्ञानधर, ७३. सर्वज्ञ, ७४. वेदपारग, ७५. मातृवृत्त, ७६. पिङ्गाक्ष, ७७. भूतपाल, ७८. बलिप्रिय, ७९. सर्वविद्याविधाता, ८०. सुख-दुःखकर—ये दस रुद्र ईशानकोणमें स्थित हैं। ८१. अनन्त, ८२. पालक, ८३. धीर, ८४. पातालाधिपति, ८५. वृष, ८६. वृषधर, ८७. वीर, ८८. ग्रसन, ८९. सर्वतोमुख, ९०. लोहित—इन दस रुद्रोंकी स्थिति नीचेकी दिशा पाताललोकमें समझनी चाहिये। ९१. शम्भु, ९२. विभु, ९३. गणाध्यक्ष, ९४. त्र्यक्ष, ९५. त्रिदशवन्दित, ९६. संवाह, ९७. विवाह, ९८. नभ, ९९. लिप्सु, १००. विचक्षण—ये दस रुद्र ऊर्ध्व दिशामें विराजमान हैं। १०१. हूहूक, १०२. कालाग्निरुद्र, १०३. हाटक, १०४. कूष्माण्ड, १०५. सत्य, १०६. ब्रह्मा, १०७. विष्णु तथा १०८. रुद्र—ये आठ रुद्र ब्रह्माण्ड-कटाहके भीतर स्थित हैं। यह स्मरण रखना चाहिये कि इन्हींके नामपर एक सौ आठ भुवनोंके भी नाम हैं॥ १२-२५॥
(१) सद्भावेश्वर, (२) महातेजः, (३) योगाधिपते, (४) मुञ्च मुञ्च, (५) प्रमथ प्रमथ, (६) शर्व शर्व, (७) भव भव, (८) भवोद्भव, (९) सर्वभूतसुखप्रद, (१०) सर्वसांनिध्यकर, (११) ब्रह्मविष्णुरुद्रपर, (१२) अनर्चितानर्चित, (१३) असंस्तुतासंस्तुत, (१४) पूर्वस्थित पूर्वस्थित, (१५) साक्षिन् साक्षिन्, (१६) तुरु तुरु, (१७) पतंग पतंग, (१८) पिङ्ग पिङ्ग, (१९) ज्ञान ज्ञान, (२०) शब्द शब्द, (२१) सूक्ष्म सूक्ष्म, (२२) शिव, (२३) सर्व, (२४) सर्वद, (२५) ॐ नमो नमः, (२६) ॐ नमः, (२७) शिवाय, (२८) नमो नमः—ये अट्ठाईस पद हैं। स्कन्द! व्यापक आकाश मन है। ‘ॐ नमो वौषट्’—ये अभीष्ट मन्त्रवर्ण हैं। अकार और लकार (अं लं) बीज हैं। इडा और पिङ्गला नामवाली दो नाड़ियाँ हैं। प्राण और अपान—दो वायु हैं और घ्राण तथा उपस्थ—ये दो इन्द्रियाँ हैं। गन्धको ‘विषय’ कहा गया है तथा इसमें गन्ध आदि पाँच गुण हैं। यह पृथ्वीतत्त्वसे सम्बन्धित है। इसका रंग पीला है। इसकी मण्डलाकृति (भूपुर) चौकोर है और चारों ओरसे वज्रसे अङ्कित है। इस पार्थिव मण्डलका विस्तार सौ कोटि योजन माना गया है। चौदह योनियोंको भी इसीके अन्तर्गत जानना चाहिये ॥ २६-३१ ॥
प्रथम छः योनियाँ मृग आदिकी हैं और आठ दूसरी देवयोनियाँ हैं। उनका विवरण इस प्रकार है—मृग पहली योनि है, दूसरी पक्षी, तीसरी पशु, चौथी सर्प आदि, पाँचवीं स्थावर और छठी योनि मनुष्यकी है। आठ देवयोनियोंमें प्रथम पिशाचोंकी योनि है, दूसरी राक्षसोंकी, तीसरी यक्षोंकी, चौथी गन्धर्वोंकी, पाँचवीं इन्द्रकी, छठी सोमकी, सातवीं प्रजापतिकी और आठवीं योनि ब्रह्माकी बतायी गयी है। पार्थिव-तत्त्वपर इन आठोंका अधिकार माना गया है। लय होता है प्रकृतिमें, भोग होता है बुद्धिमें और ब्रह्मा कारण हैं। तदनन्तर जाग्रत् अवस्था-पर्यन्त समस्त भुवन आदिसे गर्भित हुई निवृत्तिकलाका ध्यान करके उसका अपने मन्त्रमें विनियोग करे। वह मन्त्र इस प्रकार है—
१८४ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
'ॐ हां हां हां निवृत्तिकलापाशाय हूं फट् स्वाहा।' इसके बाद 'ॐ हां हां हों निवृत्तिकलापाशाय हूं फट् स्वाहा।'—इस मन्त्रसे अङ्कुशमुद्राके प्रदर्शनपूर्वक पूरक प्राणायामद्वारा उक्त कलाका आकर्षण करे। फिर 'ॐ हूं हां हां हां हूं निवृत्तिकलापाशाय हूं फट्।'—इस मन्त्रसे संहारमुद्रा एवं कुम्भक प्राणायामद्वारा उसे नाभिके नीचेके स्थानसे लेकर 'ॐ हां निवृत्तिकलापाशाय नमः।'—इस मन्त्रसे उद्भव-मुद्रा एवं रेचक प्राणायामके द्वारा उसको कुण्डमें किसी आधार या आसनपर स्थापित करे। तत्पश्चात् 'ॐ हां निवृत्तिकलापाशाय नमः।'—इस मन्त्रसे अर्घ्यदानपूर्वक पूजन करके इसीके अन्तमें 'स्वाहा' लगाकर तर्पण और संनिधानके उद्देश्यसे पृथक्-पृथक् तीन-तीन आहुतियाँ दे। इसके बाद 'ॐ हां ब्रह्मणे नमः।'—इस मन्त्रसे ब्रह्माका आवाहन और पूजन करके उसीके अन्तमें 'स्वाहा' जोड़कर तीन आहुतियोंद्वारा ब्रह्माजीको तृप्त करे। तदनन्तर उनसे इस प्रकार विज्ञप्तिपूर्वक प्रार्थना करे—'ब्रह्मन् ! मैं इस मुमुक्षुको आपके अधिकारमें दीक्षित कर रहा हूँ। आपको सदा इसके अनुकूल रहना चाहिये' ॥ ३२-३८ ॥
तदनन्तर रक्तवर्णा वागीश्वरीदेवीका मन-ही-मन हृदय-मन्त्रसे आवाहन करे। वे देवी इच्छा, ज्ञान और क्रियारूपिणी हैं। छः प्रकारके अध्वाओंकी एकमात्र कारण हैं। फिर पूर्वोक्त प्रकारसे वागीश्वरीदेवीका पूजन और तर्पण करे। साथ ही समस्त योनियोंको विक्षुब्ध करनेवाले और हृदयमें विराजमान वागीश्वरदेवका भी पूजन और तर्पण करना चाहिये। आदिमें अपने बीज और अन्तमें 'हूं फट्' से युक्त जो अस्त्र-मन्त्र हैं, उसीसे विधानवेत्ता गुरु शिष्यके हृदयका ताड़न करे और भावनाद्वारा उसके भीतर प्रविष्ट हो। तत्पश्चात् हृदयके भीतर अग्निकणके समान प्रकाशमान जो शिष्यका जीवचैतन्य निवृत्तिकलामें स्थित होकर पाशोंसे आबद्ध है, उसे ज्येष्ठाद्वारा विभक्त करे। उसके विभाजनका मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ हां हूं हः हूं फट्।' 'ॐ हां स्वाहा।' इस मन्त्रसे पूरक प्राणायाम और अङ्कुश-मुद्राद्वारा उस जीवचैतन्यको हृदयमें आकृष्ट करके, आत्म-मन्त्रसे पकड़कर, उसे अपने आत्मामें योजित करे। वह मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ हां हां हामात्मने नमः।' ॥ ३९-४५ ॥
फिर माता-पिताके संयोगका चिन्तन करके रेचक प्राणायामद्वारा ब्रह्मादि कारणोंका क्रमशः त्याग करते हुए उक्त जीवचैतन्यको शिवरूप अधिष्ठानमें ले जाय और गर्भाधानके लिये उसे लेकर एक ही समय सब योनियोंमें तथा वामा उद्भव-मुद्राके द्वारा वागीश्वरी योनिमें उसे डाल दे। इसके बाद 'ॐ हां हां हामात्मने नमः।' इसी मन्त्रसे पूजन और पाँच बार तर्पण भी करे। इस जीवचैतन्यका सभी योनियोंमें हृदय-मन्त्रसे देह-साधन करे। यहाँ पुंसवन-संस्कार नहीं होता; क्योंकि स्त्री आदिके शरीरकी भी उत्पत्ति सम्भव है। इसी तरह सीमन्तोन्नयन भी नहीं हो सकता; क्योंकि दैववश अन्ध आदिके शरीरसे भी उत्पत्तिकी सम्भावना है ॥ ४६-५० ॥
शिरोमन्त्र (स्वाहा)-से एक ही समय समस्त देहधारियोंके जन्मकी भावना करे। इसी तरह शिव-मन्त्रसे भी भावना करे। कवच-मन्त्रसे भोगकी और अस्त्र-मन्त्रसे विषय और आत्मामें मोहरूप लय नामक अभेदकी भी भावना करे। तदनन्तर शिव-मन्त्रसे स्रोतोंकी शुद्धि और हृदय-मन्त्रसे तत्त्वशोधन करके गर्भाधान आदि संस्कारोंके
- अध्याय ८५ * १८५
निमित्त क्रमशः पाँच-पाँच आहुतियाँ दे। मायेय (मायाजनित), मलजनित तथा कर्मजनित आदि* पाश-बन्धनोंकी निवृत्तिके लिये हृदय-मन्त्रसे निष्कृति (प्रायश्चित्त अथवा शुद्धि) कर लेनेपर पीछे अग्निमें सौ आहुतियाँ दे। मलशक्तिका तिरोधान (लय) और पाशोंका वियोग सम्पादित करनेके लिये 'स्वाहान्त' अस्त्र-मन्त्रसे पाँच-पाँच आहुतियोंका हवन करे। अन्तःकरणमें स्थित मल आदि पाशका सात बार अस्त्र-मन्त्रके जपसे अभिमन्त्रित कटार-कला-शस्त्रसे छेदन करे। कला-शस्त्रसे छेदनका मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ हां हां हां निवृत्तिकलापाशाय हः हूं फट्'॥ ५१—५७॥
बन्धकताकी निवृत्तिके लिये अस्त्र-मन्त्रसे दोनों हाथोंद्वारा मसलकर गोलाकार करके पाशको घीसे भरे हुए स्रुवमें डाल दे। फिर कलामय अस्त्रसे अथवा केवल अस्त्र-मन्त्रसे उसको जलाकर भस्म कर डाले। तदनन्तर पाशाङ्कुरकी निवृत्तिके लिये पाँच आहुतियाँ दे। आहुतिका मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ हः अस्त्राय हूं फट् स्वाहा।' उक्त आहुतिके पश्चात् अस्त्र-मन्त्रसे आठ आहुतियाँ देकर प्रायश्चित्त-कर्म सम्पन्न करे। उसके बाद विधाताका आवाहन करके उनका पूजन और तर्पण करे। फिर 'ॐ हां शब्दस्पर्शौ शुल्कं ब्रह्मन् गृहाण स्वाहा।' इस मन्त्रसे तीन आहुतियाँ देकर शिष्यको अधिकार अर्पित करे। उस समय ब्रह्माजीको भगवान् शिवकी यह आज्ञा सुनावे—'ब्रह्मन्! इस बालकके सम्पूर्ण पाश दग्ध हो गये हैं। अब आपको पुनः इसे बन्धनमें डालनेके लिये यहाँ नहीं रहना चाहिये।'॥ ५८—६३॥
—यों कहकर ब्रह्माजीको बिदा कर दे और संहारमुद्राद्वारा एवं कुम्भक प्राणायामपूर्वक राहुमुक्त एक देशवाले चन्द्रमण्डलके सदृश आत्माको तत्सम्बन्धी-मन्त्रका उच्चारण करते हुए दक्षिण नाड़ीद्वारा धीरे-धीरे लेकर रेचक प्राणायाम एवं 'उद्भव' नामक मुद्राके सहयोगसे पूर्वोक्त सूत्रमें योजित करे। फिर उसकी पूजा करके गुरु अर्घ्यपात्रमें स्थित अमृतोपम जलबिन्दु ले, शिष्यकी पुष्टि एवं तृप्तिके लिये उसके सिरपर रखे। तत्पश्चात् माता-पिताका विसर्जन करके 'वौषडन्त' अस्त्र-मन्त्रके द्वारा विधिकी पूर्तिके लिये पूर्णाहुति-होम करे। ऐसा करनेसे निवृत्तिकलाकी शुद्धि होती है। पूर्णाहुतिका पूरा मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ हूं हां अमुक आत्मनो निवृत्तिकलाशुद्धिरस्तु स्वाहा फट् वौषट्'॥ ६४—६७॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'निर्वाण-दीक्षाके अन्तर्गत निवृत्तिकला-शोधन' नामक चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८४॥
पचासीवाँ अध्याय
निर्वाण-दीक्षाके अन्तर्गत प्रतिष्ठाकलाके शोधनकी विधिका वर्णन
भगवान् शंकर कहते हैं—स्कन्द! तदनन्तर शुद्ध और अशुद्ध कलाओंका शान्त और नादान्तसंज्ञक ह्रस्व-दीर्घ-प्रयोगद्वारा संधान करे। संधानका मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ हां हां ह्रीं हां।' इसके बाद प्रतिष्ठाकलामें निविष्ट जल, तेज, वायु, आकाश, पाँच तन्मात्रा, दस इन्द्रिय, बुद्धि, तीनों गुण, चौबीसवाँ अहंकार और पुरुष—इन पचीस तत्त्वों तथा 'क' से लेकर 'य' तकके पचीस अक्षरोंका चिन्तन करे। प्रतिष्ठाकलामें छप्पन भुवन हैं और उनमें उन्हींके समान
* 'आदि' पदसे यहाँ 'तिरोधान', 'शक्तिज', और 'बिन्दुज' नामक पाश समझने चाहिये।