आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
ब्रह्माका विवाह । २२३ २६ आतशबाजी की शोभा अति भाला तारा के अनुमान १-- कउँधालपकनि खड्गचमकनि हूकनि गुड़गुड़दीन मचाय ॥ पैग पैग पर दूनों चलि चलि रुकिरुकिपैगपैगपर जायँ १४२ को गति बरणै महराजन कै मानो देव भूमिगे आय ॥ दो बिचवानी दउ दिशि घूमें रुकिरुकिपैगपैगपर जायँ १४३ उठै सुगन्धैं तहँ अतरन की बेला और चमेला हार ॥ का गति बरणों मैं निवारि की क्षत्री किये फूल श्रृंगार १४४ नीली पीली जंगाली औ लाली पगड़िनकेरि कतार ॥ मुँदरी छल्ला मोहनमाला क्यहुगरपरामोतिनकाहार १४५ देखें तमाशा जे नारी नर तिनका लागै नीकि बहार ॥ शाल दुशाले नीले पीले चमकैं इन्द्रधनुष अनुहार १४६ बाल सूर्य्यसम मूंगा चमकैं दमकैं तहाँ जवाहरलाल ॥ जब अगवानी पूरण हैगै गावन लगीं द्वारपरबाल १४७ संगम हैगा दुहुँ तरफा ते दूनों तरफ भये सतकार ॥ दूनों मिलिकै संगम हैकै पहुँचे पृथीराज के द्वार १४८ जौरा भौंरा हाथी ठाढ़े ताहर बोले बचन पुकार ॥ जौन शूरमा हों मोहबे के द्वारे हाथी देयँ पछार १४६ सुनिकै बातें ये ताहर की चलिभा उदयसिंह झन्नाय ॥ जावत देख्यो उदयसिंह को मलख्यो चला तुरत ठन्नाय १५० को गति बरणै दोउ बीरन की मानो चले कृष्ण बलराम ॥ ऊदन सुमिरयो श्रीशारद को मलखेलीनशिवाशिवनाम १५१ ऊदन चलिभा जौरा दिशिको मलखे भौंरा की दिशिजाय ॥ पूँछ पकरिकै तिन हाथिन कै जैसे सिंह घसीटै गाय १५२ तैसे ऊदन मलखे ठाकुर दोऊ नाग घसीटैं धाय ॥
३६ आल्हखण्ड । २२४
करो तमाशा दिल्लीवाले अँगुरी दाँते लीन चपाय १५३ मलखे ऊदन दोऊ ठाकुर सम्मुख गही सूँढ़ को आय ॥ दाबिकै मस्तक तिन हाथिनका दूनों दीन्हों भूमि लुटाय १५४ दाँत तूरिकै तिन हाथिन का दोऊ चढ़े घोड़ पर आय ॥ ताहर बोले फिरि दोउन ते गानो कही बनाफरराय १५५ कलश गिरावो अब खम्भन ते तौ हम कही शूर फिरि भाय ॥ इतना सुनिकै जगनिक ठाकुर कलशन पासपहुँचा जाय १५६ ताहर बोला कमलापति सों मारो याहि दौरि सरदार ॥ इतना सुनिकै कमलापति फिरि दौरे लिहे नाँगितलवार १५७ क्रोगति बरखै जगनायक कै भैनो जौन चँदेले क्यार ॥ आवत दीख्यो कमलापति को गरुई हाँक दीन ललकार १५८ लौटिज ठाकुर म्वरे मुर्चाते नहिं शिर काटि देउँ भुइँ डारि ॥ सुनिकै बातें जगनायक की कमलापतिउ बढ़ायोरारि १५६ हथी बढ़ायो फिरि आगे को जगनिक पास पहुंच्यो जाय ॥ ऐँड़ लगायो हरनागर को हौदा उपर बिराजा आय १६० भाला मार्यो कमलापति को सोतो लीन ढाल पर वार ॥ रिसहा बैकै जगनायक फिरि तुरतै खैंचिलीन तलवार १६१ ऐंचि महाउत की मारत भा तुरतै भूमि दीन शिरडार ॥ आवा मस्तक ते भूमा फिरि गरुई हाँक दीन ललकार १६२ सँभरिकै बैठै अब हौदापर ठाकुर हाथी के असवार ॥ की भगि जावै म्वरे मुर्चा ते नहिंअबजानचहतयमद्वार १६३ बातें सुनिकै जगनायक की कमलापतिउ दीन ललकार ॥ काह गवाँरे तू बोलत है ठाकुर घोड़े के असवार १६४ तू अस छत्री हम संगर में केतन्यो डारे खेलि शिकार ॥
ब्रह्माका विवाह । २२५ २६' ऐसी बातें जो फिरि बोलै तौ मुहँ धाँसिदेउँ तलवार १६५ बातैं सुनिकै कमलापति की भैने जौनु चँदेले क्यार ॥ ऐँड़ लगायो हरनागर के हाथी उपर गयो सरदार १६६ भाला मार्यो कमलापति के तोंदी परा घाव सो जाय ॥ द्वार जूझिगा कमलापति जब रहिमतसहिमतचलेरिसाय१६७ ऊदन बोले तब देवा ते ठाकुर मैनपुरी चौहान ॥ देखो आवत दुइ लड़ने को उतसों समर भूमिमें ज्वान १६८ मन्नागूजर को सँग लै कै मारो समर भूमि मैदान ॥ तुम्हरी दूनन की बरणी है मानो कही बीर चौहान १६६ सुनिकै बातें बघऊदन की दोऊ बढ़े अगाड़ी ज्वान ॥ रहिमत सहिमतको ललकार्यो होवो खड़े समर मैदान १७० सुनिकै बातें इन दोउन की उनहुन खैंचि लीन तलवार ॥ उसरिन उसरिन दोऊ मारैं दोऊ लेयँ ढालपर वार १७१ बड़ी लड़ाई भै द्वारेपर औ बहि चली रक्तकी धार ॥ रहिमत सहिमत जिन्सीवाले घायल भये द्वऊ सरदार १७२ सुमिरि भवानी महिरवाली मनियादेव मोहेबे क्यार ॥ घोड़ बढ़ायो बघऊदन ने दोऊ कलशा लिये उतार १७३ देखि वीरता बघऊदन की भा मन खुशी पिथौराराय ॥ हँसिकै बोल्यो बघऊदन ते मानो कही बनाफरराय १७४ उलटी रीती हमरे घरकी ऐसो सदा क्यार व्यवहार ॥ हो समधवारो जब द्वारेपर तबफिरिभौरिनकाव्यवहार१७५ अब तुम लावो परिमालिक को यहहू नेग यहाँ द्वैजाय ॥ होय तयारी फिरि भौरिनकै साँचे हाल दीन बतलाय १७६ इतना सुनिकै ऊदन चलिभो पहुँचा जहाँ रजापरिमाल ॥ १५
३० | आल्हखण्ड । २२६
जो कछु भाषा पृथीराज ने | ऊदन जाय कह्यो सब हाल १७७ सुनी हकीकति जब माहिल सब | पहुंचा पृथीराज के पास। बड़ी उदासी सों बोलत भा | राजा करो बचन विश्वास १७८ ब्याह जो होइहै ब्रह्मानँद का | होइहै बड़ा जगत उपहास॥ भेटन आवैं परिमालिक जब | तब तुम करो द्वारपर नाश १७६ इतना कहिकै माहिल चलिभे | अब ऊदनके सुनो हवाल॥ सुनिकै बातें बघऊदन की | बोले तुरत रजा परिमाल १८० ताकत हमरे अस नाहीं है | जो हम मिलैं द्वार समध्वार॥ गजभर छाती पृथीराज की | क्यहिके जमे करजे बार १८१ रह्यो भरोसे तुम हमरे ना | मानो कही बनाफरराय॥ मलखे बोले तब आल्हा ते | दोऊ हाथ जोगि शिर नाय १८२ भयो हँसौवा अब दिल्ली माँ | दादा साँच परे दिखराय॥ ऐसी बातें राजा बोलैं | सो तुम सुनी रह्यो है भाय १८३ अब तुम चलिहौ समध्वारे को | तौ सब बात यहाँ रहिजाय॥ हँसिहैं दिल्ली में नरनारी | भारी विपति परी अब आय १८४ जेठो भाई बाप बरोबरि | तुम्हरे गये बात बनि जाय॥ सुनिकै बातें ये मलखे की | आल्हा हाथी दीन बढ़ाय १८५ ठाढ़े पृथीराज जहाँ | तहँपर गये बनाफरराय॥ उतरिकै हाथी के हौदा ते | मनमें सुमिरि शारदा माय १८६ गये सामने जब पिरथी के | दधि औ पान दीन चपकाय॥ लखैं तमाशा तहँ नारी नर | भा समध्वार द्वार पर याय १८७ पिरथी बोले तहँ आल्हा सों | मानो कही बनाफरराय॥ अब तुम जावो निज तम्बू को | भौरी समय गयोन गचयाय १८८ निकै बातें ये पिरथी की | लश्कर कूच दीन करवाय॥
ब्रह्माका बिवाह । २२७ ३१ बाजे डंका अहतंका के तम्बुन फेरि पहुंचे आय १८६ पिरथी पहुंचे राजमहल को सबियाँ झगड़ा गयो पटाय ॥ खेत छूटि गा दिननायक सों झंडागड़ा निशाको आय १६० करों बन्दना पितु अपने की जिन बल भयोतरँगकोअन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त १६१
३० आल्हखण्ड जो कछु भाषा पृथ्वीराज ने सुनी हकीकति जब माहिल सबै बड़ी उदासी सों बोलत भा ब्याह जो होइहै ब्रह्मानँद का भेटन आवैं परिमालिक जब इतना कहिकै माहिल चलिभे सुनिकै बातें बघऊदन की ताकत हमरे अस नाहीं है गजभर छाती पृथ्वीराज की रह्यो भरोसे तुम हमरे ना मलखे बोले तब आल्हा ते भयो हँसौवा अब दिल्ली माँ ऐसी बातें राजा बोलैं अब तुम चलिहौ समध्वारे को हँसिहैं दिल्ली में नरनारी जेठे भाई बाप बरोबरि सुनिकै बातें ये मलखे की ... ठाढ़े पृथ्वीराज जहाँ उतरिकै हाथी के हौदा ते गये सामने जब पिरथी के लखैं तमाशा तहँ नारी नर पिरथी बोले तहँ आल्हा से अब तुम जावो निज तम्बू के सुनिकै बातें ये पिरथी कें
ब्रह्माका विवाह । २२७ ३१ बाजे डंका अहतंका के तम्बुन फेरि पहुंचे आय १८६ पिरथी पहुंचे राजमहल को सबियाँ झगड़ा गयो पटाय ॥ खेत छूटि गा दिननायक सों झंडागड़ा निशाको आय१६० करों बन्दना पितु अपने की जिन बल भयोतरँगकोअन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त १६१ इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी,आई,ई ) मुंशी नवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागना- रायणजीकीआज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासिमिश्र वंशोद्भवबुधकृपाशङ्करसूनुपण्डितललिताप्रसादकृतब्रह्माद्वारचार वर्णनौनामाद्वितीयस्तरंगः ॥ २ ॥
३६ आल्हखण्ड । २३२ पहिली भाँवरि के परतै खन ताहर हनी तुरत तलवार ४४ दहिने ठाढ़ो मलखे ठाकुर सो लैलीन ढाल पर वार ॥ आधे आँगन भौंरी होवैं आधे चलनलागि तलवार ४५ ब्रह्मा ठाकुर की रक्षा में आल्हा ठाकुर भये तयार ॥ मलखे सुलखे जगनिक देवा आँगन करैं भड़ाभड़ मार ४६ तेगा चटकै बर्दवान का ऊना चलै विलाइति क्यार ॥ छुरी छूरा कोउ कोउ मारैं कोताखानी चलैं कटार ४७ फिरि फिरि मारैं औ ललकारैं नाहर दिल्ली के सरदार ॥ आँगन थिरकै उदन बाँकुड़ा लीन्हे हाथ नाँगि तलवार ४८ मूड़न केरे मुड़चौरा भे औ रुंडन के लगे पहार ॥ बड़ी लड़ाई भै आँगन में औ वहिचली रक्तकी धार ४६ अपन परावा कछु सूझै ना आमाझोर चलै तलवार ॥ बड़े लड़ैया मलखे सुलखे नामी सिरसा के सरदार ५० कोगति वरणै तहँ ताहर कै दूनों हाथ करै तलवार ॥ फिरि फिरि मारै औ ललकारै नाहर उदयसिंह सरदार ५१ कोगति वरणै तहँ देवाकै क्षत्री मैनपुरी चौहान ॥ मन्नागूजर जगना ठाकुर इनहुन खूबकीन मैदान ५२ मोहन ठाकुर बौरी वाला रणमाँ बड़ा लड़ैयाज्वान ॥ जोगा भोगा दोनों भाई मारिकै खूबकीन खरिहान ५३ विकट लड़ाई भै आँगन में साँगन खूब भई तहँ मार ॥ सातो लड़का पृथीराज के बाँध्यो सिरसाके सरदार ५४ सातो भँवरी ब्रह्मानँदकी आल्हा तुरत लीनकरवाय ॥ देखि तमाशा बघऊदन का पिरथी गये सनाकाखाय ५५ चौंड़ा बोला त्यहि समया में मानो कही पिथौरा राय ॥
ब्रह्माका विवाह। २३३ ३७ अबहीं जावैं हम मड़येतर सबके बन्धन देयँ छुड़ाय ५६ इतना कहिकै चौंड़ा चलिभा मड़ये तरे पहुँचा आय ॥ चौंड़ा बोला फिरि आल्हाते मानो कही बनाफरराय ५७ इकलो लड़का भीतर पठवो सो लहकौरि खानको जाय ॥ मुशकें छोड़ो सब लरिकन की यह कहिदीन पिथौराराय ५८ दया आयगै मलखाने के मुशकें तुरत दीन छुड़वाय ॥ अब तुम जावो जनवासे को बोला फेरि चौंडियाराय ५६ नाउनि आई फिरि भीतर सों औ आल्हासों कह्यो सुनाय ॥ इकलो दूलह अब पठवावो रानी भीतर रहीं बुलाय ६० ऊदन बोले तब नाइनिते सांची मानो कही हमार ॥ संग न छाँड़ै सहिबाला कहूँ यह है मोहबे का व्यवहार ६१ इतना सुनिकै नाइनि बोली जल्दी चलो करो नहिं बार ॥ आगे नाइनि फिरि दूलह भा पाछे बेंदुल का असवार ६२ और बीर सब तम्बुन आये ये दोउ महल पहुँचे जाय ॥ चौंड़ा बोला पृथीराज सों आयसु मोहिं देउ फरमाय ६३ मैं अब मारों बघऊदन को औसर नीक पहुँचा आय ॥ सुनिकै बातें ये चौंड़ा की आयसु दीन पिथौराराय ६४ बिछिया अँगुठा चौंड़ा पहिरयो लीन्ह्यो रूप जनाना धार ॥ ठुम्मुक ठुम्मुक चौंड़ा चलिभा बिषधर चापे बगलकटार ६५ जायकै पहुंच्यो त्यहि महलनमें ऊदन जहाँ करै ज्यउँनार ॥ इचिता दीख्यो जब ऊदन को चौंड़ा मारी तुरत कटार ६६ खाय मूर्च्छा ऊदन गिरिगे नारिन कीन तहाँ चिग्घार ॥ भये सनाका ब्रह्माठाकुर मनमाँ लागे करन विचार ६७ आजु बीरता गै मोहबे ते जो मरिगयो लहुरवा भाय ॥
३८ आल्हखण्ड । २३४ मई न ऐसो कहूँ पैदा भो जैसो रहै बनाफरराय ६८ सोच आयगा ब्रह्मानँद के मनमाँ बार बार पछिताय ॥ छाती पीटै रानी अगमा महलन गिरी पछाराखाय ६९ तोहिं चौंड़िया यह चाही ना कीन्हे घाटि महलमौँ आय ॥ नालति तेरी द्विज देही का चौंड़ा काहगये बौराय ७० घाव मूंदिकै बघऊदन का रानी औषध दीनलगाय ॥ कन्या राजनकी महरानी औ सब जानै भले उपाय ७१ मारु कूटकी घर घर चरचा क्षत्री बंश रहै तंत्र भाय ॥ राजा पिरथी की महरानी त्यहिबघऊदनदीनजियाय ७२ उठा दुलरूवा द्यावलिवाला बेला देखिगई हर्षाय ॥ ऐसि खुशहाली भै ब्रह्मा के जैसे योग सिद्धि है जाय ७३ गवैं सुहागिल दिल्ली वाली लैलै नाम बनाफरक्यार ॥ बड़ी खुशहाली भै महलन में होवन लाग मंगलाचार ७४ पायँ लागिकै महरानी के बोला उदयसिंह सरदार ॥ आयसु तुम्हरी जो हमपावैं तौ तम्बुन को होयँ तयार ७५ रूप देखिकै बघऊदन को नारी पीटन लगींकपार ॥ भई अभागिनिहमसब महलन अब ये चलन हेत तय्यार ७६ रूप न देखा क्यहु क्षत्री का जैसो उदयसिंह सरदार ॥ पाग बैंजनी शिरपर बाँधे ऊपर कलँगी करै बहार ७७ बेला चमेला के गजरा हैं तिनपर परा मोतियनहार ॥ बाँके नैना यहि क्षत्री के सखिया चुभै करेजे फार ७८ मन बौराना सहिवाला पर आला देवरूप अवतार ॥ दूसरि बाला त्यहि काला में बोली मानो कही हमार ७९ आगि तुम्हारी अस नाहीं है जो ये होयँ तोर भर्तार ॥
ब्रह्माका विवाह । २३५ १६ लालति तुम्हरे मन चब्बन को तुमका बार बार धिक्कार ८० त्यही समैया ऊदन चलिभा सबसों बिदा मांगि त्यहिबार ॥ चढ़ा पालकी ब्रह्मा ठाकुर ऊदन बेदुल भा असवार ८१ आयकै पहुंचे दूउ लश्कर में जहाँ दरबार चँदेले क्यार ॥ हाथ पकरिकै ब्रह्मा ऊदन तम्बुन गये दोऊ सरदार ८२ चरणन परिकै परिमालिक के बैठे दूऊ बीर बलवान ॥ पूंछन लागे बघऊदन ते तुरतै तहाँ बीर मलखान ८३ कहौ हकीकति सब महलनकी कैसी भई रीति ब्यवहार ॥ सुनिकै बातें मलखाने की कहिगा यथातथ्य सरदार ८४ सुनिकै बातें बघऊदन की आल्हा ठाकुर लीन बुलाय ॥ कमर बिलोकै बघऊदन की कैसा परा कटारी घाय ८५ चिह्न न पायो कहूं घाव को आल्हा बोल्यो बचनसुनाय ॥ झूठ न बोलत तुम ऊदन रहौ कैसी किह्यो दिल्लगी भाय ८६ ब्रह्मा बोले तब आल्हा ते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ साँची दादा ऊदन बोल्यो झूठ न कह्यो लहुरवाभाय ८७ लीन्हे बूटी रानी आई सो ऊदन के दिह्यो लगाय ॥ घाव पूरिगा बघऊदन का औ उठि बैठ लहुरवा भाय ८८ सुनिकै बातें ब्रह्मानँद की गे परिमाल सनाकाखाय ॥ कूच कराओ अब लश्कर को बोला फेरि चँदेलाराय ८९ बातें सुनिकै महराजा की मलखे रुपना लीन बुलाय ॥ औ समझायो यह रुपना को यह तुम कहौ पिथौ रैजाय ९० कह्यो सँदेशा परिमालिक है बेटी बिदा देयँ करवाय ॥ इतना सुनिकै रुपना चलिभा औफिरि अटा द्वारपरजाय ९१ द्वारे ठाढे पिरथी राजा तिनसों बोला शीश नवाय ॥
विदा कि विरिया अब आई है यह मोहिं कह्यो चँदेलोराय ६२ यहु संदेशा हम लाये हैं ओ महराज पिथोराराय ॥ जो कछु उत्तर तुम ते पावैं राजै सर्वइ सुनावैं जाय ६३ बातें सुनिकै ये रूपन की बोले पृथीराज महराज ॥ देश हमारे की रीती यह पुरिखन कियो अगारी काज ६४ ब्याह के पीछे गौना देवैं तबहीं होवै पूर विवाह ॥ यहतुम कहियो परिमालिक ते ऐसे कहे बचन नरनाह ६५ धन्य बखानैं हम आल्हा को सातो भाँवरि लियो कराय ॥ हैं सब लायक मलखे ठाकुर हमरो कहौ संदेशो जाय ६६ सुनिकै बातें पृथीराज की रूपन चला तुरत शिरनाय ॥ आयकै पहुँच्यो त्यहि तम्बू में ज्यहि में रहैं चँदेलेराय ६७ आल्हा ऊदन मलखे सुलखे बैठे लिहे ढाल तलवार ॥ जोगा भोगा मन्नागूजर जगनिक भैने चँदेलेक्यार ६८ जो संदेशा पृथीराज का रूपन सो गा सबै सुनाय ॥ सुनिकै बातें पृथीराज की भा मन खुशीं चँदेलोराय ६६ हुकुम लगायो फिरि लश्कर में क्षत्री कूच देयँ करवाय ॥ मानि आज्ञा परिमालिक की आल्हा कूच दीन फरमाय १०० कूच क डंका तब बाजत भो क्षत्री सबै भये हुशियार ॥ हथी चढ़ैया हाथी चढ़िगे बाकी घोड़न भे असवार १०१ बाजे डंका अहलंका के घूमन लागे लाल निशान ॥ बैठि पालकी ब्रह्मा चलि भे साथै चले वीर मलखान १०२ ढोल औ तुरही कै गिनती ना बाजन कीन घोर घमंसान ॥ ग्यारा रोज कि मैजलि करिकै मोहवे आये बराती जवान १०३ आगे चलिकै रूपनबारी मल्हना महल पहुँचा आय ॥
[Header] ब्रह्माका विवाह । २३७ ४१
कुशल प्रश्नसों सब जन आये रूपनबोला शीश नवाय १०४ बड़ी खुशाली भै मल्हना के तुरतै सखियाँ लीन बुलाय ॥ चौमुख दियना रानी बारे पहुंची तुरतद्वारपर आय १०५ बारह रानी परिमालिक की गावन लगीं मंगलाचार ॥ पलकी आई ब्रह्मानँद की परछन होनलगी तबद्वार १०६ भई आरती ब्रह्मानँद की सबियाँ याचक भये निहाल ॥ जितनी रैयति मोहबे वाली आये ज्वान वृद्ध औ बाल १०७ भयो बुलौवा फिरि पंडित का धावन चला तड़ाका धाय ॥ लै कै पत्रा पंडित आवा साइति ठीकदीन बतलाय १०८ महलन पहुंचे ब्रह्माठाकुर विप्रन मोदभयो अधिकाय ॥ दान दक्षिणा मल्हना दीन्हे सीधा घरै दीन पहुँचाय १०६ दगीं सलामी दरवाजे पर धुँवना रहा सरगमें छाय ॥ बिदा मांगिकै नेवतहरी सब निजनिजदेशपहुंचेजाय ११० दशहरिपुरवा आल्हा पहुंचे सिरसा गये वीर मलखान ॥ कथा पूरी भै अब ब्याहे कै मानो सत्यवचन परमान १११ खेत छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥ तारागण सब चमकनलागे सन्तन धुनी दीन परचाय ११२ परे आलसीखटिया तकि तकि घों घों कण्ठ रहे घर्राय ॥ भल बनिआई तहँ योगिन कें निर्भयरहे रामयशगाय ११३ निशा पियारी सब योगिनको चोरन अर्द्धमास की भाय ॥ कछु नहिंभावै मनबिरहिन कें उनको कालरूपदिखराय११४ सदा सहायक पितु अपने को दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनारायण भाय ११५ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥
४२ आल्हखण्ड । २३= मालिक ललिते के तबलौंतुम यशसों रहौ सदाभरपूर ११६ माथ नवावों शिवशंकर को यहँसों करों तरंग को अन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देयो इच्छा यही मोरि भगवन्त ११७ इति श्रीलखनऊ निवासि (सी, आई, ई) मुंशी नवलकिशोरात्मज बाबू प्रयाग नारायणजी की आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलां निवासि मिश्रवंशोद्भवबुध कृपाशङ्करसूनु पण्डितललिताप्रसादकृत ब्रह्मापाणिग्रहणवर्णनोनाम तृतीयस्तरंगः ॥ ३ ॥ ब्रह्मा औ बेला का विवाह सम्पूर्ण ॥ इति ॥
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ अथ आल्हखण्ड ॥ उदयसिंहकाविवाह अथवा नरवर की लड़ाई ॥ सवैया ॥ भो प्रभु दीनदयाल गुपाल सदा नँदलाल दोऊ पदध्यावों । सागर कीर्त्ति सबै गुणआगर नागर मोहनलाल बतावों ॥ स्वर्ग औ नर्क रहूं कतहूं पै सदा शुचिसों तुम्हरो गुणगावों । याँच यही ललिते कर साँच मिलैं रघुनन्दन सो बर पावों १ सुमिरन ॥ दोउपद् ध्यावों बड़े प्रेम सों स्वामी कृष्णचन्द्र महराज ॥ काज सँवार्यो धर्मराज के राख्यो द्रुपदसुता की लाज १ कंस पछार्यो यदुनन्दन तुम दीन्ह्यो उग्रसेन को राज ॥ सदा पियारे तुम भक्तन के हमरे माननीय शिरताज २ भक्त तुम्हारे सुखी न देखे आवत नाम बतावत लाज ॥ भक्त सुदामा जग में जाहिर दूसर जनकपुरी द्विजराज ३
आलहखण्ड । २४० लक्ष्मीपति तुमको सब जानत चाहन सरन आपनो काज ॥ भूप युधिष्ठिर की गति देखी वनमाँ रहे छूटिगै राज ४ वस्त्र न देखा जिन देहीमां केवल चढ़ी भस्म सब अङ्ग ॥ रावण बाणासुर को देखा जिन सों जुरी आपसौं जङ्ग ५ छूटि सुमिरनी गै देवन कै औ ऊदन का सुनो विवाह ॥ घोड़ खरीदन काबुल जैहैं पठई मोहवे का नरनाह ६ अथ कथाप्रसङ्ग ॥ एक समैया परिमालिक का भारी लाग राजदरबार ॥ बैठे क्षत्री सब महिफिल हैं एकने एक शूर सरदार १ पारस पत्थर ज्यहि के घरमा लोहा छुये सोन है जाय ॥ कौन बड़ाई तिनकै करिकै शोभा वरणि पार लै जाय २ माहिल शाले परिमालिक के सोऊ गये तहां पर आय ॥ देखि बनाफर उदयसिंह को माहिल पीर भई अधिकाय ३ माहिल बोले तहँ राजा सों मानो कही चँदेलेराय ॥ नाम तुम्हारो देश देश में तुम पर कृपा कीन रघुराय ४ एक बात की अब कमती है सो बिन कहे रहा ना जाये ॥ घोड़ तुम्हारे घर कमती हैं बूढ़े घोड़ भरे अधिकाय ५ रुपिया पैसा की कमती ना थोड़े घोड़ लेउ मँगवाय ॥ आवैं बछेड़ा काबुलवाले तौ फिरि नामहोय अधिकाय ६ इतना सुनिकै राजा बोले काबुल कौन खरीदन जाय ॥ हाथ जोरिकै ऊदन बोले काबुल हमें देउ पठवाय ७ सुनिकै बातैं बघ ऊदन की राजा गये सनाका खाय ॥ बोलि न आवा परिमालिक ते मुहँका विरागयो कुम्हिलाय ८ कलँगी गिरिगे फिरि पगड़ी ते काँपन लाग चँदेलेराय ॥
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[Header] उदयसिंहका बिवाह । २४१ ३ रौंवाँ ठाढ़े भे देही के नैनन दीन्ह्यो झरी लगाय ६ माहिल बोले परिमालिक ते काहे सोच कीन अधिकाय ॥ लड़का बाउर ऊदन नाहीं जो तुम डरो चँदेलेराय १० इनसे बढ़िकै को मोहबेमाँ घोड़ा जौन खरीदन जाय ॥ है मर्दाना इनको बाना कालौ लड़े न सम्मुख आय ११ कहिकै पलटत नहिं ऊदन हैं जानो भली भांति महराज ॥ भय नहिं लावो अपने मनमाँ करिहैं सिद्धकाज रघुराज १२ बातें सुनिकै ये माहिलकी बोले फेरि रजापरिमाल ॥ तुम भल जानत हौ ऊदन को कलहा देशराजको लाल १३ रारि मचाई यहु मारग में आई फेरि ब्याधि कछु भाय ॥ बात चलाई तुम ऐसी है जासों सोचभयो अधिकाय १४ सुनिकै बातें परिमालिक की बोला उदयसिंह सरदार ॥ शपथ शारदा शिवशङ्कर की हम काबुल को खड़े तयार १५ भली बताई माहिल मामा राजाकरो बचन बिश्वास ॥ यक अवलम्बा जगदम्बा का सोई पूरि करें सब आश १६ क्षत्री ह्वैकै समरसकावै त्यहि को बार बार धिक्कार ॥ बाँझै होवै सो नारी जग नाहक रखै पेटमें भार १७ बेद यज्ञ औ दान युद्ध ये क्षत्री केर रूप श्रृंगार ॥ ये नहिं होवें ज्यहि क्षत्री के त्यहि को बार बार धिक्कार १८ एक ऋचा गायत्री जानै सोऊ बेद पढ़ैया ज्वान ॥ ब्राह्मण क्षत्री बनिया तीनों यासों विमुख श्वान अनुमान १६ बातें सुनिकै बघऊदन की बोले फेरि रजापरिमाल ॥ कहा न मनिहौ तुम बच्चा अब कलहा देशराज के लाल २० देवा ठाकुर को सँग लैके काबुल घोड़ खरीदो जाय ॥ १६
४ आल्हखण्ड । २४२ ररि मचायो कहुँ मारग ना मान्यो कही बनाफरराय २१ इतना कहिकै परिमालिकने फिरि यह हुकुम दीन फरमाय॥ पंद्रह खच्चर मुहरैं लै कै काबुल जाउ लहुरवा भाय २२ सुनिकै बातैं परमालिक की दोऊ हाथ जोरि शिर नाय ॥ बिदा मांगिकै परिमालिकते मल्हना महल पहुँचा जाय २३ कही हकीकति सब मल्हनाते ऊदन बार बार शिरनाय ॥ करतब जान्यो जब माहिलकै मल्हना बारवार पछिताय २४ पै भलजानै अपने मनमाँ मानी नहीं लहुरवाभाय ॥ तासों रोक्यो महरानी ना आशीर्वाद दीन हर्षाय २५ बिदा मांगिकै ऊदन चलिभा दशहरिपुरै पहुँचा जाय ॥ हालबतायो सब माता को ऊदन बार बार समुझाय २६ सुनिकै बातैं बघऊदन की भौजी माता उठीं रिसाय ॥ तुम नहिंजावो अब काबुलको ऊदन काह गये बौराय २७ आल्हा बरज्यो भल ऊदन को नीक न करो लहुरवाभाय ॥ तुम्हें पठावत नहिं राजा हैं तुमहीं कौन हेतु को जाय २८ बातैं सुनिकै ये आल्हा की ऊदन कहा बचन शिरनाय ॥ हम तो जैबै अब काबुल को बहुत न धजी धजी उड़ि जाय २६ हम को बरजो अब भाई ना इतना प्यार करो अधिकाय ॥ बातैं सुनिकै बघऊदन की आल्हा चुप्पसाधि रहि जाय ३० पायँ लागिकै फिरि माता के औ सुनवाँ को शीशनवाय ॥ बिदा मांगिकै बड़माई सों ऊदन कूच दीन करवाय ३१ घोड़ मनोहर देवा बैठा ऊदन बेंदुलपर असवार ॥ बजा काफिला फिरिकाबुलको दोऊ चले शूर सरदार ३२ एक कोस जब नरवर रहिगा ऊदन बोले बचन सुनाय ॥
उदयसिंहका विवाह । २४३ ५ कौन शहर है देवा ठाकुर हमको साँच देउ बतलाय ३३ देवा बोला तब ऊदन ते जानो नहीं हमारो भाय ॥ इतना कहिकै दूनों चलि भे रहिगा पावकोस फिरिआय ३४ तहँ चरवाहन को देखत भो तिनसों कह्यो बनाफरराय ॥ कौन शहर औ को राजा है हमको साँच देउ बतलाय ३५ सुनिकै बातें बघऊदन की बोला अहिरपूत तब भाय ॥ नरपति राजा नरवरगढ़ है ओ परदेशी बात बनाय ३६ इतना सुनिकै दूनों चलिभे पुर के पास पहुंचे जाये ॥ तहाँ जलेड़ा बहु नारिन को खैन्नैं बारिकूप में आय ३७ को गति बरखै तिन नारिनकै पतली कमर तीनिबलखाय ॥ दाँत अनारन के बीजासम मीसी हँसत परै दिखलाय ३८ परी बत्तीसी है पानन कै आननकमलखिला जसभाय ॥ छाती सोहैं नवरंगी सम क्युएडी भौंर सरिस दिखरायँ ३६ गजकीशुण्डा सम भुजदण्डा जंघा कदलिथम्भ अनुमान ॥ रूप देखिकै तिन नारिन का तेंहा होयँ अनेकन ज्वान ४० ऐसी बाला सब आला हैं नाभी यमुन भँवरसम भाय ॥ रूप देखिकै तिन नारिन का पहुँचा पास बनाफरराय ४१ मनमाँ सोचा उदयसिंह तब औ यह ठीक लीन ठहराय ॥ जौने पुरकी अस नारी हैं रानिनरूप वरणि ना जाय ४२ यहै सोचिकै बघऊदन फिरि बोला एक नारिके साथ ॥ पूरब तेनी पश्चिम आये बाबा सूर्य चराचर नाथ ४३ घोड़ पियासा अति हमरो है याको पानी देउ पियाय ॥ बातें सुनिकै ये ऊदन की बोली तुरत नारिसिसियाय ४४ करन दिल्लगी हमसों आयो क्षत्री घोड़े के असवार ॥
६ आल्हखण्ड । २४४ पनी पियावन अब घोड़े का फेरि न कह्यो दूसरीबार ४५ नरपति राजा यहि नगरी का सबविधि शूरबीर सरदार ॥ टरिजा टरिजा अब जल्दी सों क्षत्री घोड़े के असवार ४६ इतना सुनिकै ऊदन बोले अब ना बोले फेरि गवाँरि ॥ ऐसी बातें जो फिरि बोलै तौ मुँहँ घाँसिदेउँ तरवारि ४७ नरपति खरपति कै गिनतीना बर बर करै बैजनी नारि ॥ काह हक़ीक़ति है नरपति कै हमरे साथ करै तरवारि ४८ सुनिकै बातें ये ऊदन की सहमी तहाँ तुरत सो नारि॥ औरी नारी त्यहि सों बोलीं आई संग भरन जे बारि ४९ रूप उजागर सब गुण सागर नागर घोड़े को असवार ॥ करुई वाणी नाहक बोलिउ बहिनी मानों कही हमार ५० यहु बर लायक है फुलवा के सबविधि रूपशील गुणवान ॥ वह तो बोली भल धीरज में पर परिगई बनाफर कान ५१ सवैया ॥ ऊदन बोलिउठा त्यहि नारि सों कौनअहै फुलवा सहिदानी । देहु बताय न राखु छिपाय चुभी मनमें सुनिबे को कहानी ॥ कोमल बैन सुन्यो जब भामिनि बोलिउठी तबहीं यह बानी । नरपतिकी कन्या लखिकै ललिते रतिहू मनमें सकुचानी ५२ त्यहि की समता सुन्दरता की यहिपुर नारिकौन यहिकाल ॥ काह बतावों परदेशी मैं फूलन शयनकरै वह बाल ५३ त्यहिमुख फुलवाकी गाथासुनि ऊदन आगम गयो जनाय ॥ दक्षिण बाहू फरकन लाग्यो दहिने भई शारदा माय ५४ यदि आगैं फिरि माड़ो कै जो कछुकहाविजैसिनिभाल ॥