आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
उदयसिंहका विवाह । २४५ ७ बाण लागिगा उर मन्मथ का घायल देशराजका लाल ५५ आदर करिकै फिरि देवा का बोला उदयसिंह सरदार ॥ अब दिन थोड़ा अतिबाकी है देखो चलैं शहर को यार ५६ आखिर सोना है बिरवातर सबदिन मारग में सरदार ॥ भागि भरोसे शहर जो पावा तौकस त्यागि चलैं यहिवार ५७ सुनिकै बातें ये ऊदन की देवा मैनपुरी चौहान ॥ ज्योतिष बिद्या के परचय से जाना कुशलकरी भगवान ५८ देवा बोला फिरि ऊदन सों मानो कही लघुरवाभाय ॥ द्रव्य बांधिकै पर पुर जैये यहनहिं हृदयमोर पतियाय ५६ तासों रहिबो तर बिरवा के नीकी बात बनाफरराय ॥ द्रव्य प्राण की घातक जानो मानो साँच बचन तुमभाय ६० इतना सुनिकै ऊदन बोले साँचौ मानो कही हमार ॥ भय उर राखो कछु जियरे ना चलिये टिकैं यहाँ सरदार ६१ इतना कहिकै बघऊदन ने आगे दीन्ह्यो घोड़ बढ़ाय ॥ पाछे चलिभा देवाठाकुर मनमें बार बार पछिताय ६२ जायकै पहुंचे फुलबगिया में मालिन भीर दीखअधिकाय ॥ तहाँ पै उतरे बघऊदन जब माली पास पहुँचा आय ६३ माली बोला बघऊदन ते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ चलिकै उतरो बहु मोरे घर ह्याँनहिंटिको मुसाफिरभाय ६४ यह फुलवाई महाराजा की ह्याँसों मेख लेउ उखराय ॥ सुनिकै बातें त्यहि माली की चुप्पै मुहरैं दीन गहाय ६५ पांच अशर्फी माली पायो मनमाँ बड़ा खुशी ह्वैजाय ॥ हाथ जोरिकै माली बोला द्वारे टिको चलै तुम भाय ६६ द्वारे कुइँयाँ मीठा पानी नींबू वृक्ष तहाँ अधिकाय ॥
८ आल्हखण्ड । २४६ हाटक निकटै म्वरे द्वारे के सीधा घास लिह्यो मँगवाय ६७ सुनिकै बातैं त्यहि माली के ऊदन कूच दीन करवाय ॥ द्वारे पहुंचे फिरि माली के मेखैं तहाँ दीन गड़वाय ६८ मांगिकै पलँगा माली लायो द्वारे तुरत दीन डरवाय ॥ गद्दा परिगा मखमलवाला आला बैठ बनाफरराय ६६ माली चलिभा फुलवगियाका मालिनि द्वार पहुँची आय ॥ मालिनि बोली उदयसिंह ते ठाकुर हाल देउ बतलाय ७० कहाँ ते आये औ कहँ जैहौ तुम्हरो काह नाम है भाय ॥ बातैं सुनिकै ये मालिनि की बोले तुरत बनाफरराय ७१ नाम हमारो उदयसिंह है हमरो देश मोहोबा जान ॥ छोटे भैया हम आल्हा के साँचे बचन हमारे मान ७२ सुनिकै बातैं ये ऊदन की मालिनि फेरि कहा शिरनाय ॥ आल्हा बेहे कौन शहर में साँची साँची देउ बताय ७३ सुनिकै बातैं ये मालिनि की बोला उदयसिंह सरदार ॥ भैया ब्याहे नैनागढ़ माँ सुनवाँभौजी आय हमार ७४ बड़ी खुशहाली भै मालिनिके बोली हाथ जोरि शिरनाय ॥ हमहूँ सुनवाँ साथै खेलीं हिरिया नाम हमारो भाय ७५ मैको हमरो है नैनागढ़ सुनवाँ बहिनी लगे हमारि ॥ चलिकै बैठो म्वरे मन्दिर में देवर सेवा करों तुम्हारि ७६ बातैं सुनिकै ये हिरिया की भा मन खुशी बनाफरराय ॥ दिह्यो अशर्फी दश मालिनिको औयहबोल्योवचनसुनाय ७७ सीधा लावो तुम लरिकनको भोजन वेगि पकावो जाय ॥ दिना चारि यहि पुरमा रहिकै पाछे कूच देव करवाय ७८ सुनिकै ये ऊदन की मालिनि बैठि धाम में जाय ॥
उदयसिंहका बिवाह । २४७ ६ माली आवा जब बगिया ते तबसब हाल कहे समुझाय ७६ देवा बोला हाँ ऊदन ते अब रँग और परै दिखराय ॥ काहे अटक्यो तुम नरवर में साँचे हाल देव बतलाय ८० बातें सुनिकै ये देवा की बोला उदयसिंह सरदार ॥ फुलवा बेटी जो नरपति की तामें लाग्यो चित्त हमार ८१ कीनि प्रतिज्ञा हम अपने मन साँची तुम्हें देयँ बतलाय ॥ नैनन दीखे बिन फुलवा को ना हम धरब अगाड़ीपाँय ८२ सुनिकै बातें ये ऊदन की देवा बोला बचन बनाय ॥ ऐसी करिहौ जो बघऊदन तौ सब जैहैं काम नशाय ८३ घोड़ खरीदैन को आये तुम नरवर नैन खरीदे आय ॥ काह बतैहौ तुम राजा ते सोऊ कहो लहुरवाभाय ८४ तुमका सौंप्यो महराजा म्हिँ ऊत तुँकाह गयो बौराय ॥ तनिक मिहिरिया के देखै का ऊमफुलदेहौ लाज गवाँय ८५ अबै न बिगरा कछु बघऊदन ह्याँ ते कूच देव करवाय ॥ सुनिकै बातें ये देवा की बोला फेरि बनाफरराय ८६ मोहिं भरोसा है शारद को देवा मैनपुरी चौहान ॥ घोड़ खरीदन फिरि हम जैहैं करिहैं कुशलमोरिभगवान ८७ पै मन अटको है फुलवा में हटको मानै नहीं हमार ॥ खटको भटको पटको झटको सोवो आज यहाँ सरदार ८८ इतना कहतै बघऊदन के दोऊ नैन गये अलसाय ॥ देवा ऊदन दोऊ सोये चकरन पहरादीन बिठाय ८६ सोयकै जागे जब बघऊदन प्रातःक्रिया कीन हर्षाय ॥ फेरिकै पहुँचे मालिनि घरमाँ मालिनि हरवा रही बनाय ६० ऊदन बोले तहँ मालिनि सौं हिरिया भौजी बात बनाय ॥
१० आल्हखण्ड । २४८ लाव मलाई अब जल्दी सों दौरति चली बजारे जाय ६१ इतना सुनिकै हिरिया बोली साँची सुनो बनाफरराय ॥ हार छोड़िकै जाउँ बजारे तौ तकसीर बड़ी है जाय ६२ तनकिउ देरी हमका लागी फुलवा जाई बेगि रिसाय ॥ बातें सुनिकै ये हिरिया की बोले फेरि बनाफरराय ६३ हार तुम्हारो हम गूंथत हैं मालिनि जाउ बजरिया धाय ॥ पांच अशर्फी ऊदन दीन्ह्यो मालिनिचली तड़ाकाजाय६४ बेला चमेली औ निवारिको ऊदन हार कीन तय्यार ॥ मालिनि आई जब बजारेते देखा चार लरिनको हार ६५ हिरिया बोली तब ऊदन ते देवर मानो कही हमार ॥ हार डुलरिया रोज बनावों चौलर आज भयो तय्यार ६६ कर्री गांठि तुम्हारी की फूनन खूब सटा है यार ॥ हाल जो पूँछी फुलहर सें उत्तर काह देब सरदार ६७ बातें सुनिकै ये मालिन की बोला उदयसिंह त्यहिंवार ॥ बिटिया आई म्वरि बहिनी कै ताने हार कीन तय्यार ६८ इतनासुनिकै हिरियामालिनि तुरतै डलिया लीन उठाय ॥ जहँना बेटी रह नरपति कै मालिनि तहाँ पहुंची जाय ६६ बैठि पलँगरा फुलवा बेटी मालिनि हार दीन पहिराय ॥ चार लरिन को हरवा दीख्यो फुलवा बोलीवचनरिसाय १०० रोज डुलरिया लै आवति थी कौने गूँधा चौलरहार ॥ साँच बतावै री मालिनि अब नाहीं पेट फोरैहौं त्वार १०१ इतना सुनिकै मालिनि बोली दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ बिटिया आई म्वरि बहिनी कै ताने हार बनायो आय १०२ वह तो ब्याही है मोहबे माँ जहँपर बसैं रजापरिमल ॥
उदयसिंहका विवाह। २४६ ९९ पारस पत्थर तिनके घरमाँ उनकी रय्यति सबै निहाल १०३ बातें सुनिकै ये मालिनि की फुलवा हुकुमदीन फरमाय ॥ हार बनायो ज्यहि मालिनि है मोको बेगि दिखावै आय १०४ इतना सुनिकै मालिनि चलिभै मनमाँ बार बार पछिताय ॥ ज्यों त्यों आई घर अपने को तहँपर मिले बनाफरराय १०५ हाल बनायो सब फुलवाको मालिनि बार बार समुझाय ॥ मारे डरके पिंडुरी काँपै जर्दी आनन परै दिखाय १०६ ऊदन बोले तब मालिनि ते काहे सोच करो अधिकाय ॥ नई पुरानी जेवर लैके हमको देउआय पहिराय १०७ देखन जैबे हम फुलवा को मालिनि मानो कही हमार ॥ शंका लावो कछु जियरे ना तुम्हरो जाय न बांकोबार १०८ कौन डुमरिहा जग हमरो है जो तुम्हरे तन करै निगाह ॥ निश्चय जानो अपने मनमाँ हमफुलवाते करब विवाह १०६ बातें सुनिकै उदयसिंह की मालिनि शंका दीन भुलाइ ॥ तुरतै गहना को लै आई पहिरनलागलहुरवाभाय ११० मिस्सी रगरी सब दाँतन में तापर लीन्ह्यो पान चबाय ॥ काजल आँज्यो दोउ नैनन में शोभा कही बूत ना जाय १११ बेंदी बँदनी टीका तीनों मस्तक ऊपर धरा सँवार ॥ करनफूल कानन में पहिरा तामें गुज्झी करें बहार ११२ मोहनमाला मोतिनमाला पहिरे और फुलनके हार ॥ बाजू जोसन टाड़ैं तीनों दोऊभुजा पहिरि सरदार ११३ नीले रँगकी चुरियाँ पहिरी गोरे हाथनका श्रृङ्गार ॥ आगे अगेला पिछे पछेला तिनविच ककनाकैरेंबहार ११४ छल्ले पहिरे सब अँगुरिन में अँगुठा लीन आरसी धार ॥
१२ आल्हखण्ड । २५० पहिरि करधनी ली कम्मर में पायँन पायजेब झनकार ११५ कड़ाके ऊपर छड़ा बिराजै नीचे मेंहदी करै बहार ॥ बिछुआपहिरे सब अँगुरिन में अनवटअँगुठनकाश्रृंगार ११६ वेष जनाना ऊदन धरिकै तुरतै पालकी लीन मँग़ाय ॥ बैठि पालकी में नरनाहर मनमें सुमिरिशारदामाय ११७ हिरिया मालिनि को सँग लै कै फुलवा महल गयेनगन्याय ॥ उतरि पालकी सों नरनाहर शारदचरणकमलफिरिध्याय ११८ आगे हिरिया पाछे ऊदन फुलवा पास पहुँचे जाय ॥ फुलवा देख्यो जब ऊदन को मनमाँ बड़ी खुशी है जाय ११९ रूप देखिकै त्यहि मालिनिको मनमाँ गई सनाकाखाय ॥ कै पैताना खाली दीन्ह्यो आदरकीनफेरिअधिकाय १२० बैठि उसीसे जब ऊदनगे फुलवा बोली बचन रिसाय ॥ कैसी मालिनि यह लाई है मालिनिहालदेयबतलाय १२१ मालिनि बोली तब फुलवाते बेटी साँची देयँ बताय ॥ बेटी प्यारी परिमालिक की नौकरितासुपासकीआय १२२ राजनीति का यह जानति है राखति सबऊ सखी का भाय ॥ बैठि उसीसे यह जावै जो तौ वह क्षमा करै हर्षाय १२३ सुनिकै बातें ये मालिनि की फुलवा क्षमा कीन सुखपाय ॥ हँसिकै बोली फिरि मालिनिते साँची साँची देउ बताय १२४ कौन बहादुर परिमालिक घर कारो राजपुत्र यहिकाल ॥ बातें सुनिकै ये फुलवाकी बोला देशराजका लाल १२५ आल्हा ब्याहे हैं नैनागढ़ पथरीगढ़ै वीर मलखान ॥ पिरथी घरमाँ ब्रह्मा ब्याहे ठाकुर दिल्लीके चौहान १२६ कारो इकलो बघऊदनहै ज्यहिकै बाँड़ि बहै तलवार ॥
उदयसिंहका विवाह । २५१ १३ बड़ा लड़ैया जगमाँ जाहिर ठाकुर बेंदुलका असवार १२७ इतना सुनिकै फुलवा बोली मालिनि साँच देउ बतलाय ॥ हाथ पैर पुरुषन के ऐसे करै करै परै दिखाय १२८ इतना सुनिकै मालिनि बोली साँचे बचन करो परमान ॥ भैंसि चराई बालापनमाँ माता पिता दरिद्रीजान १२६ परी व्यवस्था लरिकाई में ताको करी कहाँलगगान ॥ जैसी गुजरी हमरे ऊपर ऐसी परै न काहू आन १३० फुलवा बोली फिरि हिरिया ते मालिनि जाउ घरै यहिबार ॥ काल्हि सबेरे यहि लैजायो साँची मानो कही हमार १३१ इतना सुनिकै हिरिया चलिमै अपने घरै पहुँचि आय ॥ फुलवा बाँदी को बुलवायो तासों चौपरलीन मँगाय १३२ खेलन लागी मालिनि सँगमाँ आधी राति गई नगच्याय ॥ लैकै पंखा बाँदी हाँकै ऊइन केर वस्त्र उड़िजाय १३३ कब्जा झलकै तलवारी का सो फुलवा के परा निगाह ॥ फुलवा बोली तब मालिनिते झलकै बगल तुम्हारे काह १३४ तुम नहिं बेटीहौ मालिनिकी औ छल किह्यो यहाँपर आय ॥ सुनि मकरन्दा तुमका पाई तुरतै खोदि लेइ गड़वाय १३५ अब पहिंचाना हम तुमको है बेटा देशराज के लाल ॥ जियत न जैहौ तुम महलनते औपारिग्योकालके गाल १३६ नाम तुम्हारो उदयसिंह है तुम्हीं बेंदुल के असवार ॥ इतना सुनिकै मालिनि बोली कीन्ह्योनीकी आजचिन्हार १३७ कहँ पै देख्यो तुम ऊदन को साँचे हाल देउ बतलाय ॥ इतना सुनिकै सब बाँदिनको फुलवा तुरतै दीन हटाय १३८ ओ फिरि बोली बबऊदन ते मानो कही बनाफरराय ॥
१४ आल्हखण्ड । २५२ रानी कुशला के महलन में योगीरूपधरा तुम जाय १३९ घर घर लूटा तुम माड़ो माँ हमसों शपथकीन फिरिआय ॥ भेद बतावा घर अपने का तब तुमलीन बापका दायँ १४० ब्याह हमारो जब तुम कीन्हा मलखे हना मोहिं ततकाल ॥ मिलन आपनो तुम्हें बतावा नाहर देशराज के लाल १४१ साँचो चाहत जो जाको है ताको स्वई मिलै सबकाल ॥ यह सुनि राखा हम विप्रन सों सो सब साँचाभयो हवाल १४२ पै गति तुम्हरी ह्वाँ नहीं है हमसों ब्याह करो सरदार ॥ बड़ा लड़ैया मकरन्दा है ज्यहिते हारिगई तलवार १४३ सुनिकै बातें ये फुलवा की बोला उदयसिंह सरदार ॥ काह हकीकति मकरन्दा कै साँची मानो कही हमार १४४ भल पहिचान्यो तुम मोका है अब सब पूर भये मम काम ॥ ब्याह तुम्हारो अब कीन्हे बिन / लौटिन जायँ आपनेधाम १४५ इतना सुनिकै फुलवा बोली मानो कही बनाफरराय ॥ काठक घोड़ा बाण अजीता जादू सेल शनीचर भाय १४६ व्यापी जियरा अति मेरो है ताते धीर धरा ना जाय ॥ करो बियारी तुम महलन में सोवो सेज बनाफरराय १४७ ऊदन बोले तब फुलवा ते तुमको साँच देयँ बतलाय ॥ क्वारी कन्या की शय्यापर कबहुँ न धरैं बनाफर पायँ १४८ धीरज राखो अपने मनमाँ सोवो तुरत सेज में जाय ॥ भयो भरोसा तब फुलवा के सोई विकट नींदको पाय १४९ तारागण सब चमकन लागे सन्तन धुनी दीन परचाय ॥ उये निशाकर आसमान में विरहिनिपीरभईअधिकाय १५० माथ नवावों पितु अपने को ह्वाँ ते करों तरँग को अन्त ॥
उदयसिंहका विवाह । २५३ १५ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त १५१ इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागना- रायणजीकी आज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासिमिश्रवंशोद्भवबुध कृपाशंकरसूनु पं० ललिताप्रसादकृत ऊदनफुलवामिलाप वर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥ १ ॥ -⁘- सवैया ॥ कौन कि आश सुपासमिलै नितहोत मनैमन याहि बिचारा । आशकि पाश सुपास कहाँ यह सोचत मोचत दुःख अपारा ॥ भीतररी यहि लोकहिकि शिर शास्त्र औ वेद पुराण निहारा । बाम भये रघुनाथ सों साँच करै ललिते फिरि कौन उबारा १ सुमिरन ॥ मैं पद बन्दौं रिपुसूदन के लवणासुरै पराजय कीन ॥ मानों शत्रुन के जीतै को साँचो जन्म शत्रुहन लीन १ काटिकै मधुबन पुरी बसायो मथुरापुरी परा त्यहि नाम ॥ अश्वमेध में सब जग जीत्यो कीन्ह्यो शम्भु साथ संग्राम २ छोटे भाई लपणलाल के साँचे भये भरत के दास ॥ इन यश बरणा अश्वमेध में पूरण भई हमारी आश ३ मातु सुमित्रा के बालक ये जग में भये सुयश की राश ॥ जो कोउ सुमिरै रिपुसूदन का साँचो करै प्रेम बिश्वास ४ प्यारो होवै रघुनन्दन का साँचो स्वै रामको दास ॥ छूटि सुमिरनी गै ह्याँते अब ऊदन ब्याह करौं परकाश ५ अथ कथाप्रसंग ॥ उये दिवाकर जब पूरब में बालकरूप बिम्ब अतिलाल ॥
[Header] १६ आल्हखण्ड । २५४
बेटी फुलवा के महलन में जागा देशराजका लाल १ देवा बोला ह्याँ हिरियाते मालिनि मानो कही हमार ॥ देर लगावो अब घरमाँ ना लावो उदयसिंह सरदार २ लै कै पलकी मालिनि चलि भै फुलवा पास पहुँची जाय ॥ फुलवा बोली तब हिरियाते अब यहि जावो तुरत लिवाय ३ इतना सुनिकै ऊदन चलिभे पहुँचे तुरत द्वार में आय ॥ बैठ पालकी में बघऊदन मनमें सुमिरि शारदांमाय ४ आयकै पहुँचे जब मालिनिघर देवा बोला वचन सुनाय ॥ साथ जनाना का करिबे नाँ जैबे जहाँ चँदेलाराय ५ बन्यो जनाना तुम नरवर में कैहौं हाल जाय दरबार ॥ बाना छोड़े रजपूती का ऊदन जीवैका धिक्कार ६ इतना सुनतै कायल व्हैगा नाहर उदयसिंह सरदार ॥ पेट मारने के कारण सों ऊदन लीन्ही हाथ कटार ७ हाथ पकरिकै देवाठाकुर बोला सुनो बनाफरराय ॥ चरचा करिबे ना मोहबेमाँ ऊदन साँच देवँ बतलाय ८ भई लालसा हमरे मनमाँ फुलवा देखनको अधिकाय ॥ करु अभिलाषा पूरण हमरी आल्हाकेर ल्हुरवा भाय ६ ऊदन बोले तब देवाने तुमको कैसे लवँ दिखाय ॥ जैसे बताओ देवा ठाकुर तैसे साँचो करैं उपाय १० इतना सुनिकै देवा बोले योगी बनो बनाफरराय ॥ अलख जगैवें पुर घर घर में याही सीधोसाद उपाय ११ गइ मनभाई बघऊदन के दूनों लीन्ह्यो भस्म रमाय ॥ काँधे माला औ मृगछाला आला योगिरूप बनाय १२ गुदड़ी लीन्ही दोऊ ठाकुर तामें छिपी ढाल तलवार ॥
उदयसिंहका बियाह। २५५ १७ डमरू लीन्ह्यो देवा ठाकुर बंशी उदयसिंह सरदार १३ धुरपद, सोरठ, जैजैवन्ती, गावैं पूरराग कल्यान ॥ टप्पा ठुमरी भजन रेखता तोरैं गजल पर्ज पर तान १४ को गति बरौ तिन योगिनकै एकते एक रूप गुणवान ॥ ड्योढ़ी दाबे दोउ नरपति कै योगी चले तुरत बलवान १५ देखि तमाशा तिन योगिनका मारग भीर भई अधिकाय ॥ ता ता थेई ता ता थेई थेई थेई दीन मचाय १६ बाजै डमरू भल देवा का ऊदन बंशी रहा बजाय ॥ मोर कि नाचन ऊदन नाचै मारग भूलि गये सबभाय १७ मोहीं तिरिया भल नरवर की चढ़िचढ़ि लखैं अटरिन आय ॥ एक एक सों बोलन लागीं जैसे नारिन केर स्वभाव १८ धन्य बखानों इन मातन को जिनकी कोखिलिन अवतार ॥ देखो आली इन योगिन को कैसो रूप दीन करतार १६ ये दोउ बालक क्यहू राजा के बारे लीन योग को धार ॥ सब गुण आगर दोउ नागर हैं योगी कामरूप अवतार २० क्यहू पियासे लरिका घर में भोजन करैं क्यहू भरतार ॥ पै ते भूलीं दोउ योगिन में तन मन केरो नहीं सँभार २१ गावत नाचत दोऊ योगी पहुँचे नरपति के दरबार ॥ बाजा डमरू तहँ देवा का नाचा बेंदुल का असवार २२ कमर झुकावै भाव बतावै गावै देशराज का लाल ॥ देखि तमाशा यहु योगिन का भा मनवड़ा खुशीनरपाल २३ नरपति बोला तब योगिन ने साँचे हाल देउ बतलाय ॥ कहाँ ते आयो औ कहँ जैहौ चाहौ काह लेनको भाय २४ हम तो आये बंगाले ते जावैं हिंगलाज महराज ५
१८ . आल्हखण्ड । २५६ द्रव्य न चाहैं कछु महराजा केवल उदरभरनसों काज २५ सुनिकै बातें ये देवा की बोला नरवरका सरदार ॥ धुरपद गावो यहि समया में भोजन अबै होय तय्यार २६ बातें सुनिकै महराजा की बोला देशराज का लाल ॥ ब्याही नारी के हाथे का भोजन करें नहीं नरपाल २७ इतना सुनिकै राजा बोले योगी मानो कही हमार ॥ है जो कन्या उपरोहित कै भोजन सोई करी तैयार २८ देवा बोला तब राजा ते यह नहिं ठीक भूमिभरतार ॥ जरिजा अँगुरी जो बाम्हनिकै हमरो योगहोय सब छार २६ शास्त्र पुराणन को जानैं हम मानैं लिखा ठीक महराज ॥ मारै शापै गारी देवै तबहूँ बिप्र पूजने काज ३० होय जो कन्या तुम्हरे घर की भोजन करै स्वई तैयार ॥ तौ तौ योगी भोजन करि हैं नाहीं मांगैं और दुवार ३१ इतना सुनिकै फिरि बोलत भा राजा नरवर का सरदार ॥ बेटी हमरी जो फुलवा है सोई भोजन करी तयार ३२ इतना सुनिकै योगी बोले यहही ठीक रहा महराज ॥ धर्म न जैहै कछु योगिन का रहि है दऊ दिशाकीलाज ३३ पुत्र आपने मकरन्दा को तबहीं बोलि लीन नरपाल ॥ फुलवा बहिनी जो तुम्हरी है तासों कहौजाय यह हाल ३४ इतना सुनिकै मकरँद चलिभा औ फुलवा ते कहा सुनाय ॥ बातें सुनि है मकरन्दा की माता पास पहुँची आय ३५ आयसु लैके महतारी की भोजन करन लागि तैयार ॥ नाचैं गावैं दोऊ योगी मोहित भयो राजदरबार ३६ भयो बुलावा फिरि महलन में योगी करें चलैं ज्यँउनार ॥
उदयसिंहका विवाह। २५७ १६ ˙ इतना सुनिकै योगी चलिभे पीढ़न बैठिगये सरदार ३७ भोजन परसन फुलवा लागी देवा चितय दीन कईबार ॥ बैठे पाटापर बघऊदन मनमाँलाग्यो करनविचार ३८ किह्यो रसोई कारी कन्या भोजन केर नहीं अधिकार ॥ बनि बौराहा जो हम जावैं तौ रहिजावै धर्म हमार ३६ देवा बोला फिरि ऊदन ते यहही फुलवा है सरदार ॥ इनही कारण नाक छिदायो धारयो बेष जनाना यार ४० किह्यो बहाना ह्याँ ऊदन ने औ गिरि गयो पछाराखाय ॥ रानी चंपा दौरति आई योगिन पास पहुँची आय ४१ कौर डारिकै देवा योगी तहँपर बार बार पछिताय ॥ देखिकै सूरति लघुयोगी कै चंपा बोली बचन सुनाय ४२ पाप आयगा यहिके मनमाँ तांते गिरा पछाराखाय ॥ योगी नाहीं यहु भोगी है यहिका डारों पेट फराय ४३ मकरँद लरिका का बुलवावों यहिका योग सिद्ध हैजाय ॥ इतना सुनिकै देवा बोला रानी काह गई बौराय ४४ भूत चुरैलै यहि महलन में की क्यहु नजरि लगाई आय ॥ जो कछु होई यहिके जीका तौ फिरि योग देयँदिखराय ४५ ऐसे वैसे हम योगी ना ना हम माँगैं खेत खरिहान ॥ हमतो योगी संतोषी हैं जाने काह नारि बैलान ४६ सुनिकै बातें ये देवा की रानी गई सनाकाखाय ॥ जल के छीटा फुलवा मारे जागा तुरत बनाफरराय ४७ बड़ी खुशाली देवा कीन्ह्यो लीन्ह्यो तुरत ताहि लपटाय ॥ ऊदन बोले तब रानी ते तुमका साँचदेयँ बतलाय ४८ परिगै छाया क्यहु ब्याही कै ताते गई मूरछा आय ॥ १७
२० आल्हाखण्ड । २५८ फुलवा बोली तब माताते योगी साँच रहा बतलाय ४६ परिगै छाया जब बाँदी कै तबहीं गिरा मूरछाखाय ॥ ऊदन बोले तब रानी ते ह्याँते जान चहैं हम माय ५० इतना सुनिकै चम्पा बोली योगी मानो कही हमार ॥ भोजन दूसर हम परसावैं योगी जँयलेउ ज्यवनार ५१ देवा बोला तब रानी ते साँचे बचन करो परमान ॥ फिरिकै बैठें हम चौकाना पूरण नियम हमारो जान ५२ ऐसे योगी आगे हैं हैं भोगिहैं भोगस्वादवश आय ॥ तैसे योगी हम नाहीं हैं अपनो डारैं नियम नशाय ५३ योगी हैकै भोगी होवै शोचन योग सोय अधिकाय ॥ इतना कहिकै दोऊ योगी माँगिकै बिदा चले हर्षाय ५४ आयकै पहुँचे मालिनि घरमाँ योगिनबाना धरे उतार ॥ पाग बैंजनी शिरपर बाँधी नाहर उदयसिंह सरदार ५५ ऊदन बोले फिरि देवा ते ठाकुर मैनपुरी चौहान ॥ कई महीना ह्याँपर गुजरे ना अब रहिगा द्रव्यठिकान ५६ घोड़ खरीदन कासों जावैं यहही शोच होय अधिकाय ॥ पै कछु औषधि ह्याँ सूझैना कैसी करी यहांपर भाय ५७ का लै जावैं अब मोहबे को काबुल काह खरीदैं जाय ॥ इतना सुनिकै देवा बोले धीरज धरो लहुरवाभाय ५८ गत नहिंशोधैं कहुँ पण्डितजन मत यह ठीक हृदय ठहराय ॥ कूच करावो अब नरवरते चलिये नगरमोहोबे भाय ५६ यह हम कहिबे परिमालिकते नरवर टिक्यन चँदेलेराय ॥ भूज तुरैलै इनके लागीं ऊदन तहां गये बौराय ६० कछु नहिं आशा तहँ बचनेकी निश्चय गई प्राणपै आय ॥
उदयसिंहका विवाह । २५६ २१ कीन दवाई हम ऊदन की सब धन आये तहाँ गँवाय ६१ यह मन भाई उदयसिंह के तुरतै कूच दीन करवाय ॥ कीरतिसागर के डाँड़े पर पहुंचे फेरि बनाफर आय ६२ उतरि बेंदुला ते भुइँ आये तम्बू तुरत दीन गड़वाय ॥ परिगा पलँगा तहँ ऊदन का लेटे तहाँ बनाफरराय ६३ उबटन लाग्यो भल हल्दी का पीली देह परै दिखराय ॥ भोजन कमती कैदिन खायो तासोंबदनगयो कुम्हिलाय ६४ करिकै सूरति बीमरिहा कै बोला उदयसिंह सरदार ॥ बात बनावो परिमालिक ते तौ रहिजावै धर्म हमार ६५ गंगा कीन्ही हम फुलवा सँग तुम्हरो ब्याह करब ह्याँ आय ॥ टरै प्रतिज्ञा जो क्षत्री कै तौफिरि जहरखाय मरि जाय ६६ मित्र साँकरो फिरि ऐसो अब परिहै बार बार नहिं आय ॥ इतना सुनिकै देवा चलिभा पहुंचा जहाँ चँदेलोराय ६७ सूरति दीख्यो जब देवा की भा मन खुशी रजापरिमाल ॥ हाथ जोरिकै देवा बोल्यो औ ऊदनके कह्यो हवाल ६८ लगीं चुरैलैं नरवरगढ़ में ऊदन हैगे हाल बिहाल ॥ रूपिया पैसा सब खर्चा भे रहिगा कछू नहीं नरपाल ६६ कीरतिसागर तम्बू भीतर ब्याकुल परा लहुरवाभाय ॥ इतना सुनिकै परिमालिक जी तुरतै गये सनाकाखाय ७० लिखिकै पाती आल्हाजी को तुरतै धावन लीन बुलाय ॥ दैके पाती फिरि धावन को बाकी हाल कह्यो समुझाय ७१ लैंकै पाती धावन चलिभा दशहरिपुरै पहूँचा जाय ॥ दीन्ह्यो पाती जब आल्हा को बाँचा आंकु आंकु निरताय ७२ पढ़िकै पाती आल्हा ठाकुर तुरतै हाथी लीन मँगाय ॥
२२ आल्हखण्ड । २६० चढ़िकै हाथी आल्हा चलिभे मनमाँ सुमिरि शारदामाय ७३ कीरतिसागरपर पहुंचत भा यहु रणबाघु बनाफरराय ॥ चढ़े पालकी परिमालिकजी सोऊ अटे वहाँपर जाय ७४ पौढ़ा पलँगापर बघऊदन पागल बना बनाफरराय ॥ देखि सनाका परिमालिक भे मनमाँ बार बार पछिताय ७५ ऊदन ऊदनकै गोहरायो आल्हा बैठि पलँगपर जाय ॥ जब नहिं बोले बघऊदन हैं आल्हा बोले बचन रिसाय ७६ तुम्हीं पठायो है ऊदन को साँची सुनो चँदेलेराय ॥ जो कछु जीका यहिके होईहै मोहवा तुरत द्याव फूँकवाय ७७ बोलि न आवा परिमालिक ते हाँ अरु हूँव बन्दभा भाय ॥ ऊदन ऊदन कै गोहरायो बारम्बार चँदेलेराय ७८ तबहूं ऊदन कछु बोले ना आल्हा बहुत गये घबड़ाय ॥ उठिकै चुप्पे चढ़ि हाथीमाँ दशहरिपुरै पहुंचे आय ७६ हाल बतायो सब सुनवाँ को सुनतै गई सनाकाखाय ॥ सोचन लागी अपने मनमाँ साँची बात गई जिय आय ८० आँखि लागिगै तहँ फुत्तवाकै ब्याकुल भये लघुरवामाय ॥ पूरी गवाही मन यह दीन्ह्यो साँची ठीक लीन ठहराय ८१ यहै सोचिकै सुनवाँ बोली लीजै ऊदन यहाँ बुलाय ॥ करब दवाई हम ऊदन कै नीको होय बनाफरराय ८२ यह मन भायगई आल्हा के तुरतै पलकी दीन पठाय ॥ सौंपिकै देवा को ऊदन का औ चलिभयो चँदेलेराय ८३ खबरि फैलिगै यह मोहवेमाँ ब्याकुल उदयसिंह सरदार ॥ जितनी रानी परिमालिक की रोईं छाँड़ि सबै डिंडकार ८४ जितनी रय्यत रह मोहवे की कीरतिसागर चली बिहाल ॥
उदयसिंहका विवाह । २६१ २३ जायके देखें जब ऊदन को रोवैं तहाँ बृद्ध औ बाल ८५ गई पालकी जब आल्हा की चकरन जाय कहा सब हाल ॥ सुनवाँ भौजीने बुलवायो चलिये देशराज के लाल ८६ हमसोंफिरिफिरि यह समुझायो आवैं यहाँ लहुरवाभाय ॥ करब दवाई हम नीकी बिधि चंगे होयँ बनाफरराय ८७ सुनिकै बातें ये चकरन की ऊदन ठीक लीन ठहराय ॥ हाल बतावब जो भौजीते हैहैं काम सिद्धि तहँ जाय ८८ यहै सोचिकै मन अपने माँ पलकी चढ़ा लहुरवाभाय ॥ चारि कहरवा हुँकरत चलिगे दशहरिपुरै पहुंचे आय ८६ उतरि पालकी ते भुइँ आवा द्यावलि देखिगई घबड़ाय ॥ रानी सुनवाँ तहँ चलिआई औ करगहिकै गईलिवाय ६० जायकै पहुंची निजमहलन में पलँगा उपर दीन बैठाय ॥ पूँछन लागी बघऊदन ते साँचे हालदेउ बतलाय ६१ आँखि लागिगै का फुलवा कै द्यावर विकलभयो अधिकाय ॥ सुनिकै बातें ये भौजीकी बोला तुरत बनाफरराय ६२ जैसे साँची तुम पुछती हौ तैसे साँच देयँ बतलाय ॥ किरिया कीन्ही हम फुलवा तै भौरी करब तुम्हारी आय ६३ काह बतावैं हम भौजी ते नाकछु सूझा और उपाय ॥ तब बौराहा बैनिकै आयन तुमते साँचदीन बतलाय ६४ इतना सुनिकै सुनवाँ बोली साँची सुनो लहुरवाभाय ॥ काठक घोड़ा बाण अजीता उनघर सेल शनीचर आय ६५ कैसे किरिया तुम कै लीन्ही देवर भूल भई अधिकाय ॥ तेहिते चुप्पे घरमाँ बैठो मानो कही बनाफरराय ६६ वैसी फुलवा लाखन मिलि हैं आपन साँच लहुरवा भाय ॥
२४ आल्हखण्ड । २६२ यह नहिं भाई मन ऊदन के सुनतै वदन गयो कुम्हिलाय ६७ जब रुख दीख्यो यह ऊदन का सुनवाँ चली महलते धाय ॥ जायकै पहुँची आल्हा ढिगमाँ औ सब हाल कहा समुझाय ६८ सुनिकै बोले आल्हा ठाकुर तिरिया काह गई बौराय ॥ बेढब राजा है नरवर का तहँ शिर कौन कटावै जाय ६६ इतना सुनिकै सुनवाँ बोली क्षत्री पूत बनाफरराय ॥ तुमका बातें ये छाजैं ना कन्ता वार वार बलिजायँ १०० इतना सुनिकै आल्हा बोले तिरिया बिना बुद्धिकी आय ॥ नाहक हिंसा हम करिहैं ना मरिहैं जीवजन्तु अधिकाय १०१ इतना सुनिकै सुनवाँ बोली दोऊ हाथ जोरि शिर नाय ॥ यह नहिं हिंसा है क्षत्री कै कीन्हेनि युद्ध कृष्ण यदुराय १०२ सोलह सहस आठ कन्यन को लड़िकै लीन कृष्ण महराज ॥ तिनकी बहिनी के पति अर्जुन कीन्हेनि युद्ध द्रौपदी काज १०३ धर्म धुरंधर भीषम हैगे लड़िगे काशिराज घर जाय ॥ अम्बा अम्बे अम्बालिका को लाये जीति नृपन समुदाय १०४ पै कछु हिंसा तिन मानी ना जानैं धर्म कर्म अधिकाय ॥ पढ़िकै भूल्यो तुम महराजा की यहि अवसर गयो डेराय १०५ लड़नो मरनो समरभूमि में यहही क्षत्री को बयपार ॥ लहँगा लुगरा हमरो पहिरो अपनी देउ ढाल तलवार १०६ मैं चढ़िजाऊँ नरवरगढ़ को व्याहूं जाय लहुरुवा भाय ॥ किरिया कीन्ही बघऊदन ने भौंरी करब यहाँ पर आय १०७ झूठी किरिया जो ह्वैजैहै तौ मरि जाय जहर को खाय ॥ ऐसो वैसो बघऊदन ना गंगा झूठ उलीचै जाय १०८ उदय दिवाकर हों पश्चिम में चन्दा चहौ रसातल जाय ॥
उदयसिंहका विवाह । २६३ २५ सोंकि समुन्दर चहु महि लेवै बिल्ली लड़ै सिंहसों आय १०६ ये अनहोनी चहु हैव जावै झूठ न कहै लहुरवा भाय ॥ इतना सुनिकै आल्हा बोले अब तू चुपसाधिरहिजाय ११० टरिजा टरिजा री सम्मुख ते काहे बार बार बकाय । ब्याहन जैबे हम नरवर में तहदिल होयँ बनाफरराय १११ इतना सुनिकै सुनवाँ चलि भै आल्हा रूपना लीन बुलाय ॥ लिखिकै चिट्ठी मलखानेको सिरसा तुरतदीन पठवाय ११२ खबरि पायकै मलखे ठाकुर दशहरिपुरै पहुँचे आय । हाथ जोरिकै द्वउ आल्हा के बोले चरण शीश नवाय ११३ काह आज्ञा है दादा कै जो सेवक का लीन बुलाय ॥ सुनिकै बातें मलखाने की आल्हाहाल कहासमुझाय ११४ घोड़ खरीदन गे काबुल को नरवर नैन खरीदनि जाय ॥ बनि बौगहा ऊदन बैठे चलिये ब्याहकरन अबभाय ११५ बड़ी खुशहाली भै मलखे के बोले हाथ जोरि शिरनाय ॥ न्यवत पठावो सब राजन को दादा भली बनी यह आय ११६ इतना सुनिकै आल्ही ठाकुर तुरतै धावन लीन बुलाय ॥ पाती लिखिकै सबराजन को तुरतै न्यवतं दीनपठवाय ११७ यक हरिकारा गा भुन्नागढ़ यक नैनागढ़ दीन पठाय ॥ यक हरिकारा गा बौरीगढ़ दिल्ली एक पहुँचा जाय ११८ उरई कनौउज सिरसा मोहबे सबने न्यवत दीन पठवाय ॥ खबरि पायकै सब राजागण दशहरिपुरै पहूंचे आय ११९ कीनि खातिरी सबके आल्हा डंका तुरत दीन बजवाय ॥ बाजे डंका अहर्तका के हाहाकार शब्दगा छाय १२० ब्यावलिबोली फिरि आल्हा ते मानो कही बनाफरराय ॥
२४ आल्हखण्ड । २६४ रीती भाँती मल्हना करि हैं पाल्यो बारे दूध पिलाय १२१ कौन हितैषी है मल्हना सम ह्याँते कूच देउ करवाय ॥ सुनिकै बातें ये माता की आल्हा कूचदीन करवाय १२२ कीरतिसागर मदनताल पर डेरा गड़े नृपन के आय ॥ आल्हा ऊदन मलखे सुलखे मल्हना महल पहुँचेजाय १२३ द्यावलि बिरमा सुनवाँ आदिक येऊ गईं तहाँ पर आय ॥ बड़ी खुशहाली भै मल्हना के हमरे बूत कही ना जाय १२४ चूड़ामणि पण्डित को तुरतै आल्हा लीन तहां बुलवाय ॥ तेल कि साइति सो बतलायो सुवरणकलशलीनमँगाय १२५ घृतको दीपक धरि कलशापर चौकी तहाँ दीन डरवाय ॥ ऊदन बैठे फिरि चौकी पर मनमें सुमिरि शारदामाय १२६ एक कुमारी तेल चढ़ावै गावन लगीं तहाँ सब गीत ॥ आई विरिया फिरि नहखुर की पगियाधरी शीशपरपीत १२७ कङ्कण बांधा गा हाथेमाँ शिरपर मौरदीन धरवाय ॥ ब्याहके कपड़ा फिरि पहिरायो पलकीतुरतलीनमँगाय १२८ सुमिरि भवानी महिरवाली पलकी बैठ बनाफरराय ॥ बेटी बैठी चन्द्रावलि तहँ राईलोन उतारति जाय १२९ चली पालकी बघऊदन की कुँवना पास पहुँची आय ॥ इन्द्रसेन चन्द्रावलि दुलहा सोकुँवनापरगयोलिवाय १३० रानी मल्हना त्यहि समयामें दीन्ह्यो कुँवाँ पैर लटकाय ॥ पहिली भाँवरिके घूमत खन ऊदन लीन्ह्यो पैर उठाय १३१ प्राणनेग मैं तुमको दीन्हे माता कादु पैर डरपाय ॥ याविधि कहिकै सातों भाँवरि घूमे तहां बनाफरराय १३२ बैठे पलकी फिरि बघऊदन आल्हा नेगदीन चुकवाय ॥