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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

२२ आल्हखण्ड । २६० चढ़िकै हाथी आल्हा चलिभे मनमाँ सुमिरि शारदामाय ७३ कीरतिसागरपर पहुंचत भा यहु रणबाघु बनाफरराय ॥ चढ़े पालकी परिमालिकजी सोऊ अटे वहाँपर जाय ७४ पौढ़ा पलँगापर बघऊदन पागल बना बनाफरराय ॥ देखि सनाका परिमालिक भे मनमाँ बार बार पछिताय ७५ ऊदन ऊदनकै गोहरायो आल्हा बैठि पलँगपर जाय ॥ जब नहिं बोले बघऊदन हैं आल्हा बोले बचन रिसाय ७६ तुम्हीं पठायो है ऊदन को साँची सुनो चँदेलेराय ॥ जो कछु जीका यहिके होईहै मोहवा तुरत द्याव फूँकवाय ७७ बोलि न आवा परिमालिक ते हाँ अरु हूँव बन्दभा भाय ॥ ऊदन ऊदन कै गोहरायो बारम्बार चँदेलेराय ७८ तबहूं ऊदन कछु बोले ना आल्हा बहुत गये घबड़ाय ॥ उठिकै चुप्पे चढ़ि हाथीमाँ दशहरिपुरै पहुंचे आय ७६ हाल बतायो सब सुनवाँ को सुनतै गई सनाकाखाय ॥ सोचन लागी अपने मनमाँ साँची बात गई जिय आय ८० आँखि लागिगै तहँ फुत्तवाकै ब्याकुल भये लघुरवामाय ॥ पूरी गवाही मन यह दीन्ह्यो साँची ठीक लीन ठहराय ८१ यहै सोचिकै सुनवाँ बोली लीजै ऊदन यहाँ बुलाय ॥ करब दवाई हम ऊदन कै नीको होय बनाफरराय ८२ यह मन भायगई आल्हा के तुरतै पलकी दीन पठाय ॥ सौंपिकै देवा को ऊदन का औ चलिभयो चँदेलेराय ८३ खबरि फैलिगै यह मोहवेमाँ ब्याकुल उदयसिंह सरदार ॥ जितनी रानी परिमालिक की रोईं छाँड़ि सबै डिंडकार ८४ जितनी रय्यत रह मोहवे की कीरतिसागर चली बिहाल ॥

उदयसिंहका विवाह । २६१ २३ जायके देखें जब ऊदन को रोवैं तहाँ बृद्ध औ बाल ८५ गई पालकी जब आल्हा की चकरन जाय कहा सब हाल ॥ सुनवाँ भौजीने बुलवायो चलिये देशराज के लाल ८६ हमसोंफिरिफिरि यह समुझायो आवैं यहाँ लहुरवाभाय ॥ करब दवाई हम नीकी बिधि चंगे होयँ बनाफरराय ८७ सुनिकै बातें ये चकरन की ऊदन ठीक लीन ठहराय ॥ हाल बतावब जो भौजीते हैहैं काम सिद्धि तहँ जाय ८८ यहै सोचिकै मन अपने माँ पलकी चढ़ा लहुरवाभाय ॥ चारि कहरवा हुँकरत चलिगे दशहरिपुरै पहुंचे आय ८६ उतरि पालकी ते भुइँ आवा द्यावलि देखिगई घबड़ाय ॥ रानी सुनवाँ तहँ चलिआई औ करगहिकै गईलिवाय ६० जायकै पहुंची निजमहलन में पलँगा उपर दीन बैठाय ॥ पूँछन लागी बघऊदन ते साँचे हालदेउ बतलाय ६१ आँखि लागिगै का फुलवा कै द्यावर विकलभयो अधिकाय ॥ सुनिकै बातें ये भौजीकी बोला तुरत बनाफरराय ६२ जैसे साँची तुम पुछती हौ तैसे साँच देयँ बतलाय ॥ किरिया कीन्ही हम फुलवा तै भौरी करब तुम्हारी आय ६३ काह बतावैं हम भौजी ते नाकछु सूझा और उपाय ॥ तब बौराहा बैनिकै आयन तुमते साँचदीन बतलाय ६४ इतना सुनिकै सुनवाँ बोली साँची सुनो लहुरवाभाय ॥ काठक घोड़ा बाण अजीता उनघर सेल शनीचर आय ६५ कैसे किरिया तुम कै लीन्ही देवर भूल भई अधिकाय ॥ तेहिते चुप्पे घरमाँ बैठो मानो कही बनाफरराय ६६ वैसी फुलवा लाखन मिलि हैं आपन साँच लहुरवा भाय ॥

२४ आल्हखण्ड । २६२ यह नहिं भाई मन ऊदन के सुनतै वदन गयो कुम्हिलाय ६७ जब रुख दीख्यो यह ऊदन का सुनवाँ चली महलते धाय ॥ जायकै पहुँची आल्हा ढिगमाँ औ सब हाल कहा समुझाय ६८ सुनिकै बोले आल्हा ठाकुर तिरिया काह गई बौराय ॥ बेढब राजा है नरवर का तहँ शिर कौन कटावै जाय ६६ इतना सुनिकै सुनवाँ बोली क्षत्री पूत बनाफरराय ॥ तुमका बातें ये छाजैं ना कन्ता वार वार बलिजायँ १०० इतना सुनिकै आल्हा बोले तिरिया बिना बुद्धिकी आय ॥ नाहक हिंसा हम करिहैं ना मरिहैं जीवजन्तु अधिकाय १०१ इतना सुनिकै सुनवाँ बोली दोऊ हाथ जोरि शिर नाय ॥ यह नहिं हिंसा है क्षत्री कै कीन्हेनि युद्ध कृष्ण यदुराय १०२ सोलह सहस आठ कन्यन को लड़िकै लीन कृष्ण महराज ॥ तिनकी बहिनी के पति अर्जुन कीन्हेनि युद्ध द्रौपदी काज १०३ धर्म धुरंधर भीषम हैगे लड़िगे काशिराज घर जाय ॥ अम्बा अम्बे अम्बालिका को लाये जीति नृपन समुदाय १०४ पै कछु हिंसा तिन मानी ना जानैं धर्म कर्म अधिकाय ॥ पढ़िकै भूल्यो तुम महराजा की यहि अवसर गयो डेराय १०५ लड़नो मरनो समरभूमि में यहही क्षत्री को बयपार ॥ लहँगा लुगरा हमरो पहिरो अपनी देउ ढाल तलवार १०६ मैं चढ़िजाऊँ नरवरगढ़ को व्याहूं जाय लहुरुवा भाय ॥ किरिया कीन्ही बघऊदन ने भौंरी करब यहाँ पर आय १०७ झूठी किरिया जो ह्वैजैहै तौ मरि जाय जहर को खाय ॥ ऐसो वैसो बघऊदन ना गंगा झूठ उलीचै जाय १०८ उदय दिवाकर हों पश्चिम में चन्दा चहौ रसातल जाय ॥

उदयसिंहका विवाह । २६३ २५ सोंकि समुन्दर चहु महि लेवै बिल्ली लड़ै सिंहसों आय १०६ ये अनहोनी चहु हैव जावै झूठ न कहै लहुरवा भाय ॥ इतना सुनिकै आल्हा बोले अब तू चुपसाधिरहिजाय ११० टरिजा टरिजा री सम्मुख ते काहे बार बार बकाय । ब्याहन जैबे हम नरवर में तहदिल होयँ बनाफरराय १११ इतना सुनिकै सुनवाँ चलि भै आल्हा रूपना लीन बुलाय ॥ लिखिकै चिट्ठी मलखानेको सिरसा तुरतदीन पठवाय ११२ खबरि पायकै मलखे ठाकुर दशहरिपुरै पहुँचे आय । हाथ जोरिकै द्वउ आल्हा के बोले चरण शीश नवाय ११३ काह आज्ञा है दादा कै जो सेवक का लीन बुलाय ॥ सुनिकै बातें मलखाने की आल्हाहाल कहासमुझाय ११४ घोड़ खरीदन गे काबुल को नरवर नैन खरीदनि जाय ॥ बनि बौगहा ऊदन बैठे चलिये ब्याहकरन अबभाय ११५ बड़ी खुशहाली भै मलखे के बोले हाथ जोरि शिरनाय ॥ न्यवत पठावो सब राजन को दादा भली बनी यह आय ११६ इतना सुनिकै आल्ही ठाकुर तुरतै धावन लीन बुलाय ॥ पाती लिखिकै सबराजन को तुरतै न्यवतं दीनपठवाय ११७ यक हरिकारा गा भुन्नागढ़ यक नैनागढ़ दीन पठाय ॥ यक हरिकारा गा बौरीगढ़ दिल्ली एक पहुँचा जाय ११८ उरई कनौउज सिरसा मोहबे सबने न्यवत दीन पठवाय ॥ खबरि पायकै सब राजागण दशहरिपुरै पहूंचे आय ११९ कीनि खातिरी सबके आल्हा डंका तुरत दीन बजवाय ॥ बाजे डंका अहर्तका के हाहाकार शब्दगा छाय १२० ब्यावलिबोली फिरि आल्हा ते मानो कही बनाफरराय ॥

२४ आल्हखण्ड । २६४ रीती भाँती मल्हना करि हैं पाल्यो बारे दूध पिलाय १२१ कौन हितैषी है मल्हना सम ह्याँते कूच देउ करवाय ॥ सुनिकै बातें ये माता की आल्हा कूचदीन करवाय १२२ कीरतिसागर मदनताल पर डेरा गड़े नृपन के आय ॥ आल्हा ऊदन मलखे सुलखे मल्हना महल पहुँचेजाय १२३ द्यावलि बिरमा सुनवाँ आदिक येऊ गईं तहाँ पर आय ॥ बड़ी खुशहाली भै मल्हना के हमरे बूत कही ना जाय १२४ चूड़ामणि पण्डित को तुरतै आल्हा लीन तहां बुलवाय ॥ तेल कि साइति सो बतलायो सुवरणकलशलीनमँगाय १२५ घृतको दीपक धरि कलशापर चौकी तहाँ दीन डरवाय ॥ ऊदन बैठे फिरि चौकी पर मनमें सुमिरि शारदामाय १२६ एक कुमारी तेल चढ़ावै गावन लगीं तहाँ सब गीत ॥ आई विरिया फिरि नहखुर की पगियाधरी शीशपरपीत १२७ कङ्कण बांधा गा हाथेमाँ शिरपर मौरदीन धरवाय ॥ ब्याहके कपड़ा फिरि पहिरायो पलकीतुरतलीनमँगाय १२८ सुमिरि भवानी महिरवाली पलकी बैठ बनाफरराय ॥ बेटी बैठी चन्द्रावलि तहँ राईलोन उतारति जाय १२९ चली पालकी बघऊदन की कुँवना पास पहुँची आय ॥ इन्द्रसेन चन्द्रावलि दुलहा सोकुँवनापरगयोलिवाय १३० रानी मल्हना त्यहि समयामें दीन्ह्यो कुँवाँ पैर लटकाय ॥ पहिली भाँवरिके घूमत खन ऊदन लीन्ह्यो पैर उठाय १३१ प्राणनेग मैं तुमको दीन्हे माता कादु पैर डरपाय ॥ याविधि कहिकै सातों भाँवरि घूमे तहां बनाफरराय १३२ बैठे पलकी फिरि बघऊदन आल्हा नेगदीन चुकवाय ॥

[Header] उदयसिंहका विवाह । २६५ २७ [Body] भये अयाचक सब याचकगण जयजयकार रहे तहँगाय १३३ कूच के डंका बाजन लागे घूमन लागे लाल निशान ॥ बैठे हाथी आल्हा ठाकुर करिकै रामचन्द्रको ध्यान १३४ मलखे सुलखे देवा ब्रह्मा मन्नागूजर भयो तयार ॥ औरो राजा न्योते आये तिनहुन बाँधिलीन हथियार १३५ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िंगे बाँके घोड़न भे असवार ॥ कूच कराय दयो मोहबेते चलिभे सबै शूर सरदार १३६ खर खर खर खर कै रथ दौरे चह चह धुरी रहीं चिल्लाय ॥ चलिभैं फौज दल बादल सों शोभाकही बूत ना जाय १३७ झम्झम्झम्झम् झीलमबोलैं मर्मर होयँ गैंड़की ढाल ॥ मारु मारु कै मौहरि बाजैं बाजैं हाव हाव करनाल १३८ छाय अँधेरिया गै मारग में छिपिगे अन्धकार सों भान ॥ को गति बरौ शहजाद्यन कै एकते एक रूप गुणखान १३६ तेगा लीन्हे बर्दवान के कोता खानी लिहे कटार ॥ यक यक भाला दुइ दुइ बरछी कम्मर परी एक तलवार १४० आठरोज का धावा करिकै नरवर पास गये नगच्याय ॥ पांचकोस जब नरवर रहिगा मलखे डेरा दीन डराय १४१ ऊंची टिकुरिन तम्बू गड़िगे नीचे लागीं खूब बजार ॥ हौदा उतरे तहँ हाथिन के क्षत्रिन छोरिधरा हथियार १४२ जहँना तम्बूहै आल्हा का तहँना लाग खूब दरबार ॥ चूड़ामणि पण्डित तहँ बैठे साइतिलागे करनविचार १४३ ऐपनवारी की साइति है पण्डित कहा सुनो मलखान ॥ मलखे बोले तब रुपना ते हमरे करो बचन परमान १४४ ऐपनवारी बारी लैके नरपति द्वार देउ पहुँचाय ॥

२८ आल्हखण्ड । २६६ इतना सुनिकै रूपन बोले दोऊहाथजोरिशिरनाय १४५ ऐपनवारी बारी लै कै दूसर जाय आज महराज ॥ नैना भुन्ना औ दिल्ली में कीन्हे हमीं अकेले काज १४६ मूड़ कटावन हम जैबे ना मानो कही वीर मलखान ॥ इतना सुनिकै मलखे बोले ⁃हारीबात कहौ तुम ज्वान १४७ गदका बाना पटा बनेठी अइहैं कौन दिवस ये काज ॥ पहिले मुर्चा तुम्हीं कैकै राख्यो देशदेशमें लाज १४८ उदन वियाहे का रहिहैं ना बतियाँ कहिबे का रहिजायँ ॥ यहु दिनमिलिहैं फिरिकबहूंना तातेसोचिसमझिवतलाय १४६ इतना सुनिकै रूपन बोला ठाकुर सिरसा के सरदार ॥ घोड़ बेंडुला हमको देवो ऊदन केरि देउ तलवार १५० घोड़ बेंडुला को मँगवायो औ दैदीन ढाल तलवार ॥ ऐपनवारी बारी लै कै , बेंडुल ऊपर भयो असवार १५१ ऐंड़ा मसक्यो जब बेंडुलके तुरतै चला हवाकी चाल ॥ राजा नरपति के द्वारेपर रूपनपहुँचिगयोततकाल १५२ द्वारपालने तब ललकार्यो नाहर घोड़े के असवार ॥ कहाँ ते आयो औ कहँ जैहौ कहँ है देश रावरे क्यार १५३ इतना सुनिकै रूपन बोले तुम सुनि लेउ हमारो हाल ॥ देश हमारो नगर मोहोबा जहँपर बसैं रजा परिमाल १५४ छोटो भय्या जो आल्हा को बेटा देशराज को लाल ॥ कारी कन्या जो नरपति कै ब्याहनअयेरजापरिमाल १५५ ऐपनवारी हम लै आये रूपन बारी नाम हमार ॥ खबरि जनावो तुम राजा को बारी खड़ा तुम्हारे द्वार १५६ नेग आपने को झगरत है सो अब पड़े देयँ सरदार ॥

उदयसिंहका विवाह । २६७ २६ इतना सुनिकै द्वारपाल कह बारी घोड़े के असवार १५७ नेग बतावो तुम द्वारे का राजै सबऊ सुनावैं जाय ॥ इतना सुनिकै रूपन बोला तुमसों साँचदेयँ बतलाय १५८ चार घरीभर चलै सिरोही द्वारे बहै रक्तकी धार ॥ नेग - हमारो यह साँचा है याँच आय तुम्हारे द्वार १५६ सुनिकै बातें ये रूपन की बोला द्वारपाल ततकाल ॥ पीकै दारू द्वारे आये टेढ़ी बात कहै मतवाल १६० टरिजा टरिजा अब द्वारे ते ओ मतवाले जाति गँवार ॥ असगति नाहीं क्यहुराजा की द्वारे करै आय तलवार १६१ काल गाल माँ तू बैठा है मानै साँच बात यहिवार ॥ हवा खायकै ठंढे ह्वैकै बोलै घोड़े के असवार १६२ इतना सुनिकै रूपन बोला गरुई हाँक दीन ललकार ॥ हाथ सिपाही पर डारै ना जबलग मिलै ढूँढ़िसरदार १६३ हमका जानैं दिल्ली वाले जिनके द्वारकीन तलवार ॥ भुन्नागढ़ औ नैनागढ़ में द्वारे बही रक्तकी धार १६४ चारि रुपल्ली का नौकर तू टिलटिलटिलटिल रहा मचाय ॥ इतना सुनिकै द्वारपाल चलि राजै खबरि सुनाई जाय १६५ जितनी गाथा रूपन बोले गासो यथातथ्य सब गाय ॥ सुनिकै बातें द्वारपाल की नरपति तुरतै उठा रिसाय १६६ हुकुम लगायो मकरन्दा ते बारी पकरि दिखावै आय ॥ विजयसिंह विजहट को राजा मकरँदसाथचला रिसियाय१६७ द्वारे दीख्यो जब रूपन को गरुई हाँक दीन ललकार ॥ खबरदार हो खबरदार हो बारी घोड़े के असवार १६८ काल गाल माँ तू बैठा है अबहीं जान चहत यमद्वार ॥

३० आल्हखण्ड । २६८ इतना सुनिकै विजयसिंहने अपनी खैंचिलई तलवार १६६ खैंचि सिरोही रूपन लीन्ह्यो द्वारे होन लगी तब मार ॥ अगल बगल में बेंदुल मारै रूपन खूब कीन तलवार १७० घायल ह्वैगे विजयसिंह जब तब सब बढ़े लड़ैया ज्वान ॥ दांतन काटै टापन मारै बेंदुल खूब कीन मैदान १७१ कोगति वरनै तहँाँ त्येनकै दोऊ हाथ करै तलवार ॥ रंग बिरंगे क्षत्री ह्वैगे मानो होली खेलैं गँवार १७२ कितन्यों क्षत्री घायल ह्वैगे कितन्यों गिरिगे खाय पछार ॥ मूंड़न केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डनके लगे पहार १७३ बड़ी लड़ाई भै रूपन ते द्वारे बही रक्तकी धार ॥ देखि तमाशा त्यहि बारीका क्षत्री गये मनैमन हार १७४ ऐंड़ा मसक्यो फिरि बेंदुल कें फाटक पार पहुँचा जाय ॥ मारो मारो हल्ला कैकै क्षत्री चले पछारी धाय १७५ रूपन पहुँचा त्यहि तम्बू में जहँपर बैठि बनाफरराय ॥ जितने क्षत्री नरवरगढ़के आये लौटि सबैकिसियाय १७६ जितनी गाथा रह द्वारे की रूपन यथातथ्य गा गाय ॥ रूपन बारी की बातें सुनि भे मन खुशी बनाफररांय १७७ खेन छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशा को आय ॥ तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय १७८ माथ नवायौं पितु अपने को ह्यँाँ ते करों तरँगको अन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं माँगों यही भवानीकन्त १७६ इतिश्रीलखनऊनवासि (सी, आई, ई) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागनारायणजीकीआज्ञानुसारउन्नामदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भववुधकृपाशंकरसूनुपं० ललिताप्रसादकृतरूपनबिजम वर्णनौनामद्वितीयस्तरंगः ॥ २ ॥

उदयसिंहका विवाह। २६६ ३१ सवैया ॥ दीनदयाल कृपाल भुवाल तुम्हीं सब काल करो रखवारी । मारीच सुबाहु सुरासुरनाहु तुम्हीं पल एकहि में संहारी ॥ बालिवली खरदूषण रावण आप हन्यो सबको धनुधारी । काम औ क्रोध औ लोभ हटाय करो ललिते रघुनाथ सुखारी १ सुमिरन ॥ दोउ पद वन्दौं भरतलालके जिनसम धन्यजगतकोआन ॥ बड़े पियारे रघुनन्दन के इनयशबालमीकि करगान १ भायप निबह्यो जस भारत जग आरत भये रामसों जाय ॥ राज्य न लीन्ही रघुनन्दन जब आपौ कीन योग घर आय २ सब जग ध्यावै रघुनन्दन को रघुवर करैं भरतको याद ॥ रघुवर लछिमन भरत शत्रुहन चहु ज्यहि भजैं छांड़िकै बाद ३ जो ज्यहि भावै सो त्यहि ध्यावै आवै सबै आपने काज ॥ क्यहू न ध्यावै सो दुखपावै औ बड़ होवै तासु अकाज ४ हमरे सर्वोपरि एकै हैं स्वामी रामचन्द्र महराज ॥ तिन्हें बिसारैं तौ दुखपावैं यह मन सदा हमारे राज ५ छूटि सुमिरनी गै रघुवर कै सुनिये नरवर केर हवाल ॥ ब्याह बखानैं उदयसिंह का लड़िहैं बड़े बड़े नरपाल ६ अथ कथाप्रसंग ॥ नरपति राजा नरवरगढ़ का भारी लाग राजदरवार ॥ बैठे छत्री अलबेला तहँ एकते एक शूर सरदार १ नरपति बोला मकरन्दा ते तुम सुत मानो कही हमार ॥ बड़े लड़ैया मोहबेवाले बारी भली कीन तलवार २ काह तुम्हारे अब मनमाँ है हमसे साँच देउ बतलाय ।

३२ आल्हखण्ड । २७० रारि बचैहौ की लड़िजैहौ तैसो जल्दी करी उपाय ३ इतना सुनिकै मकरँद बोला दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ हुकुम जो पावैं महाराजा को सबको बांधि दिखावैं आय ४ सुनिकै बातैं मकरन्दा की राजै हुकुम दीन फरमाय ॥ तुरत नगड़ची को बुलवायो पुरमें डौंडी दीन पिटाय ५ हुकुम पायकै मकरन्दा का फौजैं होन लगीं तय्यार ॥ रण की मौहरि बाजन लागी रणका होन लाग ब्यवहार ६ बाजे डंका अह्तंका के क्षत्री सबै भये हुशियार ॥ ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन बेद उच्चार ७ पहिल नगाड़ा में जिनबन्दी दुसरे बांधि लीन हथियार ॥ तिसर नगाड़ा के बाजत खन क्षत्री सबै भये तय्यार ८ मारु मारु करि मौहरि बाजी बाजी हाव हाव करनाल ॥ बैठ्यो घोड़ा पर मकरन्दा मनमें सुमिरि यशोदालाल ९ कूच करायो नरवरगढ़ ते पहुँच्यो समरभूमि मैदान ॥ गर्दा दीख्यो आसमान में बोल्यो यहां वीर मलखान १० यहु दल आवतहै नरपति का गर्दा छाय रही असमान ॥ सँभरो सँभरो ओ रजपूतौ हमरे करो बचन अब कान ११ इतना सुनिकै मोहबेवाले तुरतै बाँधि लीन हथियार ॥ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़न भे असवार १२ बड़िबड़ि तोपैं अष्टधातु की सो चरखिन में दीन चढ़ाय ॥ दुहूँ ओर ते गोला छूटे हाहाकार शब्द गा छाय १३ गोला लागै ज्यहि क्षत्री के आधे सरग लिहे मड़राय ॥ गोला लागै ज्यहि घोड़े के धुनकततूलसरिसउड़िजाय १४ गोला लागै ज्यहि हाथी के मानो गिरा धौरहर आय ॥

उदयसिंहका विवाह । २७१ ३३ गोला लागै ज्यहि साँड़िया के तुरतै गिरै भूमि अललाय १५ जौने बैलके गोला लागै मानो मगर फुल्यावै खायँ ॥ जौने रथमाँ गोला लागै ताके टूक टूक द्वैजायँ १६ बड़ी दुर्दशा भै तोपन में धुवना रहा सरग में छाय ॥ दूनों दल आगे को बढ़िगे तोपन मारु बन्द द्वैजाय १७ उठीं बँदूकै बादलपूर की जो नब्बे कै याक बिकाय ॥ मघा के बूंदन गोली बरसें झरसैं सबै शूर त्यहि घाय १८ दूनों दल आगे को बढ़िगे रहिगा एक खेत मैदान ॥ भाला बरछी तलवारिन का लाग्यो होन घोर घमसान १६ अपन परावा कछु चीन्हैंना मारैं एक एक को जवान ॥ सूंढ़ि लपेटा हाथी भिड़िगे घोड़न भिरी रान में रान २० कउँधालपकनिबिजुलीचमकनि कहुँ कहुँ देखि परै तलवार ॥ दूनों दिशिके रजपूतन ने कीन्ह्यो तहां भड़ामड़मार २१ चलै कटारी बूँदी वाली ऊना चलै विलाइति क्यार ॥ तेगा धमकैं बर्दवान के कटि कटि गिरैं शूरसरदार २२ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ॥ रुधिर किसरिता तहँ बहिनिकरी जूझे क्षत्री अमित अपार २३ हाथी सोहैं त्यहि सरिता माँ छोटे दीपन्न के अनुमान ॥ परे बछेड़ा त्यहि नदिया माँ तिनको नदी कगाराजान २४ छुरी कटारी मछली ऐसीं ढालैं कछुवा परैं दिखाय ॥ वहैं सेवारा जस नदिया माँ तैसे बहे०गार तहँ जायँ २५ नचैं योगिनी खप्पर लीन्हे मज्जैं भूत प्रेत बैताल ॥ परीं लहासैं जो मनइन की तिनकाखावैं श्वानशृगाल २६ बड़ी सनेही नरदेही में कहुँ कहुँ चढ़े काक खगजायँ ॥

१४ आल्हाखण्ड । २७२ नदी नेवांरा जस नर ख्यालैं तैसे काक कंक गतिभाय २७ को गति बरणै समरभूमि कै हमरे बूत कही ना जाय ॥ जितने कायर रहें फौजन में तर लोथिन के रहे लुकाय २८ हेला आवै जब हाथिन का तब बिन मरे मौत व्हैजाय ॥ छाती धड़कै रण कायर कै सायरखुशीहोयअधिकाय २६ परम पियारी जिनके नारी आरी भये समर में आय ॥ कीरति प्यारी जिन क्षत्रिन के सम्मुख सहैं खड्ग के घाय ३० मकरँद ठाकुर मलखाने का परिगा समर बरोबरि आय ॥ दोऊ मारैं दोउ ललकारैं दोऊ लेवैं वार बचाय ३१ मकरँद बोले मलखाने ते ठाकुर लौटि धामको जाय ॥ वार हमारी ते बचिहै ना नाहक फँसे समर में आय ३२ सुनिकै बातें मकरन्दा की बोला बच्छराज को लाल ॥ बहिनि बियाहै तौ बचिजइहै नाहीं परे काल के गाल ३३ ज्यहिकी बिटिया सुन्दरि द्याखै त्यहिपर चढ़ै वीर मलखान ॥ बिना बियाहे घर नहिं जावै तजिकै कब्रों समर मैदान ३४ इतना सुनतै मकरँदठाकुर तुरतै खैंचि लीनि तलवार ॥ ऐंचिकै मारा मलखाने को मलखे लीन ढालपर वार ३५ सुमिरि भवानी शिवशङ्करको मारी साँग वीरमलखान ॥ मूड़ बिसानी सो घोड़ा के घोड़ा भाग्यो लिहे परान २६ सवैया ॥ भागिगयो [गोल्ह] तबै अरु जायकै धाममें बेगि विराजा । काटक छोड़ औ सेल शनीचर वाण अजीत लियो जय काजा ॥ मालिनि धाम गयो फिरि धाय बुलाय चल्यो रण साजिसमाजा । आगयो रणखेतन में ललिते मकरन्द बली फिरि गाजा ३७

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३६ आल्हाखण्ड । २७४ ऊदन मारैं तलवारी सों बेंदुल हनै टाप के घाय ४८ यकइस हाथी असवारन को ऊदन दीन्ह्यो तुरत सुलाय ॥ ऊदन ठाकुर के मोर्चापर कउ राजपूत न रोंकै पायँ ४९ देखि वीरता बघऊदन की मकरँद दौरा गुर्ज उठाय ॥ यह गति दीख्यो मकरन्दा कै हिरियाबोली शीशनवाय ५० हमका लाये तुम काहे को जो अब दौरै गुर्ज उठाय ॥ जादू डारों बङ्गाले की इनकी कैद लेउ करवाय ५१ इतना कहिकै हिरिया मालिनि औ ऊदनपर डरा मशान ॥ मकरँद ठाकुर त्यहि समया में तुरतै बांधि लीन तहँ आन ५२ गा हरकारा तब आल्हा ढिग औ रण हाल बतावा जाय ॥ आल्हा बोले तब देवा ते तुम इन्दल का लवो बुलाय ५३ इतना सुनतै देवा ठाकुर अपने घोड़ भयो असवार ॥ माथ नवायो सो आल्हा को अपनी लई ढाल तलवार ५४ देवा चलिभा ह्याँ तम्बू ते दशहरिपुरै पहुँचा जाय ॥ जीति के डंका बाजन लागे मकरँद कूच दीन करवाय ५५ बड़ी खुशाली नरपति कीन्ह्यो हिरिये द्रव्यदियो अधिकाय ॥ देवा भेटा ह्याँ सुनवाँ का सबियाँहालगयोफिरिगाय ५६ देवा भेटा फिरि द्यावलि को दोऊ चरणन शीशनवाय ॥ कही हकीकति सब नरवर की देवलि गिरी मूर्च्छा खाय ५७ कैदी द्वैगे बघऊदन जो पकरे गये सबै सरदार ॥ मोहिं अभागिनि के बेड़ा को अवधौं कौन लगावै पार ५८ इतना देवलि के कहतै खन इन्दल तहाँ पहुँचाआय ॥ हाथ जोरिकै सो देवा के बोल्यो चरणनशीशनवाय ५६ कहौ हकीकति तुम चाचा की नरवर हाल देउ बतलाय ॥

उदयसिंहका विवाह । २७५ ३७ देवा बोला तहँ इन्दल ते बेटा कही बूत ना जाय ६० हिरिया मालिनि की जादूते पकड़े गये उदयसिंहराय ॥ जे व्यवहारी तुम्हरे दिशि के मकरँद कैद लीन करवाय ६१ घोड़ी जख्मी भै मलखे कै आल्हा पठयो तुम्हें बुलाय ॥ इतना सुनिकै इन्दल बोले सबकी कैद देउँ छुड़वाय ६२ हुकुम जो पावों महतारी को दादा चरण विलोकों जाय ॥ काह हकीकति है मालिनि कै सम्मुख लड़ै हमारे आय ६३ इतना सुनिकै सुनवाँ बोली बेटै बार बार समझाय ॥ पिता आज्ञा रघुनन्दन करि चौदह बर्ष रहे बनजाय ६४ कौन सिखाई सुत अपने को तुम ना करो पिताके बैन ॥ कही न मानैं पितु अपने की तेई गिरैं नरकके ऐन ६५ जैसे देवता पति नारी को तैसे पिता पुत्र को देव ॥ नीके जानैं धर्म शास्त्र जे ते नित करें पिता की सेव ६६ तेई सपूते नर बाजत हैं जिनके पिता बचन विशवाश ॥ कौन भरोसा नरदेही का कलियुग कौन जियनकी आश ६७ पिताहितैषी जग सब को है अपनो हुनर देय बतलाय ॥ रहै लालसा पितु उरमाहीं हमसों पुत्रहोय अधिकाय ६८ जे नहिं मानैं पितु अपने को तेई नीच जगत में भाय ॥ येई कुलीने अकुलीने के लक्षण साफपरै दिखलाय ६९ निन्दक होवैं रघुनन्दन को तासों कौन हमारो नात ॥ नेही गेही नरदेही का जगमें साँचो राम लखात ७० इतना सुनिकै इन्दलठाकुर देवी चरण शरण गा धाय ॥ विनय सुनाई भल देवी को पढ़िपढ़िवेदऋचनको भाय ७१ बरंबुहिभै तब मठिया ते इन्दल बोल्यो शीश नवाय ॥

आल्हाखण्ड । २७६ विजय हमारी नरवर होवै तुम सुनिलेउ शारदामाय ७२ एवमस्तु भा फिरि मठिया माँ इन्दल चलिभा शीशनवाय ॥ आयसु माँग्यो फिरि माता ते सुनवाँलीन्ह्यो हृदयलगाय ७३ यन्त्र बांधिकै भुजदण्डन में मस्तक रचना दियोलगाय ॥ पढ़ि पढ़ि रक्षाके मन्त्रन को भूली जादू दीन बताय ७४ घोड़ करिलिया आल्हावाला इन्दल तुरत लीन कसवाय ॥ विदा मांगिकै महतारी सों देवा साथ चले हरषाय ७५ देवी चलिकै मठभीतर सों नरवर गढ़ै पहुंची आय ॥ काठक घोड़ा बाण अजीता लीन्ह्योसेल शनीचरजाय ७६ किरपा करिकै जगदम्बा तहँ चेतन कीन फौजको जाय ॥ इन्दल पहुंचे जब तम्बू में आल्हालीन्ह्यो गोदबिठाय ७७ चूम्यो चाट्यो हृदय लगायो औ सब दीन्ह्यो कथासुनाय ॥ इन्दल बोल्यो तब आल्हा ते दादा सत्य देयँ बतलाय ७८ करो तयारी अब नरवर की सबकी कैद लेयँ छुड़वाय ॥ ठाढ़ो हाथी पचशब्दा था आल्हा तुरत लीन सजवाय ७९ बैठे हाथी आल्हाठाकुर इन्दल तुरत भये तय्यार ॥ बैठ कबूतरी पर मलखाने देवा भयो घोड़ असवार ८० मारु मारु करि मौहरि बाजी बाजी हाव हाव करनाल ॥ खर खर खर खर कै रथ दौरे रथ्वा चले पवनकी चाल ८१ कूचकराये आल्हा ठाकुर नरवरगढ़ै चले ततकाल ॥ कउ कउ घोड़ा हिरनचाल पर कउ कउ चलैं मोरकी चाल ८२ कउ कउ घोड़ा हंस चालपर कउ कउ सरपट रहे भगाय ॥ कदम चालपर कोऊ घोड़ा केहू टाप न परै सुनाय ८३ या विधि छैला अलबेला सब पहुँचे समरभूमि में जाय ॥

उदयसिंहका विवाह । २७७ १५

गा हरिकारा तब नरवरमें राजै खबरि दीन बतलाय ८४ गाफिल बैठे का महराजा शिरपर फौज पहूँची आय ॥ सुनिकै बातें हरिकारा की राजा गये सनाकाखाय ८५ आज्ञा दीन्ह्यो मकरन्दा को जावो समरभूमि तुम धाय ॥ इतना सुनतै मकरँद चलिभा तुरतै राजै शीश नवाय ८६ बाण अजीता सेल शनीचर ढूँढ़्यो घोड़ काठको जाय ॥ पता न पायो इन काहूका लाग्यो बार बार पछिताय ८७ हिरिया मालिनि के घर पहुँचा लीन्ह्यो ताको संग लिवाय ॥ चलि मकरन्दा भा नरवरते पहुँचा समरभूमि में आय ८८ आगे घोड़ा मकरन्दा का पाछे सकल सेन समुदाय ॥ ऐसी आगे इन्दल ठाकुर पहुँच्यो समरभूमिमें आय ८६ इन्दल बोल्यो मकरन्दा ते मामा काह गयो बौराय ॥ भाँवरि कैद्यो म्वरे चाचाकी चाची घरै देउ पठवाय ६० जीति न पैहौ कुल पूज्यनते मामा साँच दीन बतलाय ॥ सुनिकै बातें ये इन्दल की मकरँद बोला बचनरिसाय ६१ सुनवाँ भौजी के बालकतूम इन्दल बेटा लगो हमार ॥ समर जो करिहौ तुम फूफा ते जैहौ अवशि यमनके द्वार ६२ इतना कहिकै मकरँद ठाकुर तुरतै खैंचिलीन तलवार ॥ रान रान सों घोड़ा भिड़िगे ऊंटन भिड़िगै ऊंट कतार ६३ सूँड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुश भिड़े महौतन क्यार ॥ तेगा छूटे बर्दवान के कोताखानी चलीं कटार ६४ भाला बलछिनकी मारुइ कहुँ कहुँ कहुँ कड़ावीन की मार ॥ चलै भुजाली कहुँ कहुँ गद्दर कहुँकहुँकठिनचलैतलवार ६५ छूटे भाला बलछी सोहैं पै जस खेत बाजरे क्यार ॥

३. तृतीय भाग: बेला का विवाह, सिरसा की लड़ाई व मलखान का वीर-गति

मुण्डन केरे मुड़ चौरा मे औ रुण्डनके लगे पहार ६६ बड़ी लड़ाई भै नत्वर में मकरँद इन्दल के मैदान ॥ बड़े लड़ैया दूनों ठाकुर रणमाँ करें घोर घमसान ६७ मकरँद बोला तहँ हिरिया ते यहिपर छाँड़ो घोर मशान ॥ इतना सुनतै इन्दल ठाकुर हिरिया पास पहुँचा ज्वान ६८ पकरिकै जूरा त्यहि हिरियाको इन्दल काटिलीन ततकाल ॥ जादू झूठी भईं हिरिया की तुरतै हैगै हाल बिहाल ६६ देखि दुर्दशा यह हिरिया कै मकरँद खैंचि लीन तलवार ॥ ऐंचिकै मारा सो इन्दल के इन्दल लीन ढालपर वार १०० बचा कुँवरुवा आल्हावाला त्यहिका राखिलीन भगवान ॥ औ ललकारा मकरन्दा को मामा मौत आपनी जान १०१ ढाल कि औझरि इन्दलमारा मकरँद गिरा मूरछाखाय ॥ उतरिकै घोड़ी ते मलखाने तुरतै मुशकलीन बँधवाय १०२ मकरँद बँधिगे समरभूमि में भगिगे सबै सिपाही ज्वान ॥ कोउन रहिगा त्यहि समया में जो क्षण एक करै मैदान १०३ कूच करायो आल्हा ठाकुर तम्बुन फेरि पहुँचे आय ॥ खबरि पाय कै नरपति राजा तुरतै गयो सनाकाखाय १०४ कछू न सूझी तब नरपति को अपने मंत्री लये बुलाय ॥ मंत्र पूँछिकै तिन मंत्रिन सों आल्हा पास पहुँचे आय १०५ हाथ जोरिकै नरपति बोले मानो कही बनाफरराय ॥ कैद छुड़ायो सुत हमरे की अपने शूर लेउ छुड़वाय १०६ बेटी ब्याहैं हम ऊदन को सुख सों लौटि मोहोवे जाउ ॥ दगा जो राखै तुम्हरे सँग माँ नरपति कह्यो हमारो नाउँ १०७ सुनिकै बातें ये नरपति की आल्हा मकरँद दीन छुड़ाय ॥

उदयसिंहका विवाह । २७६ ४१ जायके छांड़्यो राजा सबको तम्बु गयो यऊ सब आय १०८ साइति शोधी चूड़ामणि ने आल्है खबरि दीन पहुँचाय ॥ कालिह सबेरे भौंरी हैहैं नरपति खबरिगये यहपाय १०९ इतना सुनिकै माहिल चलिभा लिल्ली घोड़ीपर असवार ॥ जायकै पहुँचा नरवरगढ़ में जहँपर नरपति का दरबार ११० बड़ी खातिरी राजा कीन्ह्यो अपने पास लीन बैठाय ॥ माहिल बोले तहँ राजा ते मानो कही हमारी भाय १११ शूर छिपावो तुम महलन में भौरिन कटा देउ करवाय ॥ जाति बनाफर की नीची है हल्ला देशदेश अधिकाय ११२ पानी पीहै कोउ तुम्हरे ना मानो नरवर के महराज ॥ पगिया अरझी नहिं माहिलकै भावै तौन करो तुमकाज ११३ इतना कहिकै माहिल चलिभे तम्बुन फेरि पहुँचे आय ॥ तैसे कीन्ह्यो नरपति राजा जैसे माहिल गये बताय ११४ माड़ो छायो मालिन तुरतै राजै खम्भ दीन गड़वाय ॥ गऊ के गोबर आँगन लीप्यो बारिनि तुरततहांपरआय ११५ चौक बनावन प्रोहित लाग्यो आई नगर सुहागिल धाय ॥ ब्याह गीत सब गावन लागीं उत्सवदेखिपरे अधिकाय ११६ तब मकरन्दा को बुलवायो नरपति हालकह्यो समुझाय ॥ लैके नेगी तुम चलिजावो घरके ठाकुर लवो बुलाय ११७ इतना सुनिकै मकरँद चलिभा नाई बारी सङ्ग लिवाय ॥ जायकै पहुँच्यो त्यहि तम्बू में जहँपर बैठि बनाफरराय ११८ हाथ जोरिकै मकरँद बोल्यो जो कछु राजै दीन सिखाय ॥ दशै आदमी भौरिन आवैं यहजब सुन्यो बनाफरराय ११९ विस्मय कीन्ह्यो आल्हा मनमों मकरँद फेरि कहा समुझाय ॥