आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
उदयसिंहका विवाह । २७१ ३३ गोला लागै ज्यहि साँड़िया के तुरतै गिरै भूमि अललाय १५ जौने बैलके गोला लागै मानो मगर फुल्यावै खायँ ॥ जौने रथमाँ गोला लागै ताके टूक टूक द्वैजायँ १६ बड़ी दुर्दशा भै तोपन में धुवना रहा सरग में छाय ॥ दूनों दल आगे को बढ़िगे तोपन मारु बन्द द्वैजाय १७ उठीं बँदूकै बादलपूर की जो नब्बे कै याक बिकाय ॥ मघा के बूंदन गोली बरसें झरसैं सबै शूर त्यहि घाय १८ दूनों दल आगे को बढ़िगे रहिगा एक खेत मैदान ॥ भाला बरछी तलवारिन का लाग्यो होन घोर घमसान १६ अपन परावा कछु चीन्हैंना मारैं एक एक को जवान ॥ सूंढ़ि लपेटा हाथी भिड़िगे घोड़न भिरी रान में रान २० कउँधालपकनिबिजुलीचमकनि कहुँ कहुँ देखि परै तलवार ॥ दूनों दिशिके रजपूतन ने कीन्ह्यो तहां भड़ामड़मार २१ चलै कटारी बूँदी वाली ऊना चलै विलाइति क्यार ॥ तेगा धमकैं बर्दवान के कटि कटि गिरैं शूरसरदार २२ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ॥ रुधिर किसरिता तहँ बहिनिकरी जूझे क्षत्री अमित अपार २३ हाथी सोहैं त्यहि सरिता माँ छोटे दीपन्न के अनुमान ॥ परे बछेड़ा त्यहि नदिया माँ तिनको नदी कगाराजान २४ छुरी कटारी मछली ऐसीं ढालैं कछुवा परैं दिखाय ॥ वहैं सेवारा जस नदिया माँ तैसे बहे०गार तहँ जायँ २५ नचैं योगिनी खप्पर लीन्हे मज्जैं भूत प्रेत बैताल ॥ परीं लहासैं जो मनइन की तिनकाखावैं श्वानशृगाल २६ बड़ी सनेही नरदेही में कहुँ कहुँ चढ़े काक खगजायँ ॥
१४ आल्हाखण्ड । २७२ नदी नेवांरा जस नर ख्यालैं तैसे काक कंक गतिभाय २७ को गति बरणै समरभूमि कै हमरे बूत कही ना जाय ॥ जितने कायर रहें फौजन में तर लोथिन के रहे लुकाय २८ हेला आवै जब हाथिन का तब बिन मरे मौत व्हैजाय ॥ छाती धड़कै रण कायर कै सायरखुशीहोयअधिकाय २६ परम पियारी जिनके नारी आरी भये समर में आय ॥ कीरति प्यारी जिन क्षत्रिन के सम्मुख सहैं खड्ग के घाय ३० मकरँद ठाकुर मलखाने का परिगा समर बरोबरि आय ॥ दोऊ मारैं दोउ ललकारैं दोऊ लेवैं वार बचाय ३१ मकरँद बोले मलखाने ते ठाकुर लौटि धामको जाय ॥ वार हमारी ते बचिहै ना नाहक फँसे समर में आय ३२ सुनिकै बातें मकरन्दा की बोला बच्छराज को लाल ॥ बहिनि बियाहै तौ बचिजइहै नाहीं परे काल के गाल ३३ ज्यहिकी बिटिया सुन्दरि द्याखै त्यहिपर चढ़ै वीर मलखान ॥ बिना बियाहे घर नहिं जावै तजिकै कब्रों समर मैदान ३४ इतना सुनतै मकरँदठाकुर तुरतै खैंचि लीनि तलवार ॥ ऐंचिकै मारा मलखाने को मलखे लीन ढालपर वार ३५ सुमिरि भवानी शिवशङ्करको मारी साँग वीरमलखान ॥ मूड़ बिसानी सो घोड़ा के घोड़ा भाग्यो लिहे परान २६ सवैया ॥ भागिगयो [गोल्ह] तबै अरु जायकै धाममें बेगि विराजा । काटक छोड़ औ सेल शनीचर वाण अजीत लियो जय काजा ॥ मालिनि धाम गयो फिरि धाय बुलाय चल्यो रण साजिसमाजा । आगयो रणखेतन में ललिते मकरन्द बली फिरि गाजा ३७
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३६ आल्हाखण्ड । २७४ ऊदन मारैं तलवारी सों बेंदुल हनै टाप के घाय ४८ यकइस हाथी असवारन को ऊदन दीन्ह्यो तुरत सुलाय ॥ ऊदन ठाकुर के मोर्चापर कउ राजपूत न रोंकै पायँ ४९ देखि वीरता बघऊदन की मकरँद दौरा गुर्ज उठाय ॥ यह गति दीख्यो मकरन्दा कै हिरियाबोली शीशनवाय ५० हमका लाये तुम काहे को जो अब दौरै गुर्ज उठाय ॥ जादू डारों बङ्गाले की इनकी कैद लेउ करवाय ५१ इतना कहिकै हिरिया मालिनि औ ऊदनपर डरा मशान ॥ मकरँद ठाकुर त्यहि समया में तुरतै बांधि लीन तहँ आन ५२ गा हरकारा तब आल्हा ढिग औ रण हाल बतावा जाय ॥ आल्हा बोले तब देवा ते तुम इन्दल का लवो बुलाय ५३ इतना सुनतै देवा ठाकुर अपने घोड़ भयो असवार ॥ माथ नवायो सो आल्हा को अपनी लई ढाल तलवार ५४ देवा चलिभा ह्याँ तम्बू ते दशहरिपुरै पहुँचा जाय ॥ जीति के डंका बाजन लागे मकरँद कूच दीन करवाय ५५ बड़ी खुशाली नरपति कीन्ह्यो हिरिये द्रव्यदियो अधिकाय ॥ देवा भेटा ह्याँ सुनवाँ का सबियाँहालगयोफिरिगाय ५६ देवा भेटा फिरि द्यावलि को दोऊ चरणन शीशनवाय ॥ कही हकीकति सब नरवर की देवलि गिरी मूर्च्छा खाय ५७ कैदी द्वैगे बघऊदन जो पकरे गये सबै सरदार ॥ मोहिं अभागिनि के बेड़ा को अवधौं कौन लगावै पार ५८ इतना देवलि के कहतै खन इन्दल तहाँ पहुँचाआय ॥ हाथ जोरिकै सो देवा के बोल्यो चरणनशीशनवाय ५६ कहौ हकीकति तुम चाचा की नरवर हाल देउ बतलाय ॥
उदयसिंहका विवाह । २७५ ३७ देवा बोला तहँ इन्दल ते बेटा कही बूत ना जाय ६० हिरिया मालिनि की जादूते पकड़े गये उदयसिंहराय ॥ जे व्यवहारी तुम्हरे दिशि के मकरँद कैद लीन करवाय ६१ घोड़ी जख्मी भै मलखे कै आल्हा पठयो तुम्हें बुलाय ॥ इतना सुनिकै इन्दल बोले सबकी कैद देउँ छुड़वाय ६२ हुकुम जो पावों महतारी को दादा चरण विलोकों जाय ॥ काह हकीकति है मालिनि कै सम्मुख लड़ै हमारे आय ६३ इतना सुनिकै सुनवाँ बोली बेटै बार बार समझाय ॥ पिता आज्ञा रघुनन्दन करि चौदह बर्ष रहे बनजाय ६४ कौन सिखाई सुत अपने को तुम ना करो पिताके बैन ॥ कही न मानैं पितु अपने की तेई गिरैं नरकके ऐन ६५ जैसे देवता पति नारी को तैसे पिता पुत्र को देव ॥ नीके जानैं धर्म शास्त्र जे ते नित करें पिता की सेव ६६ तेई सपूते नर बाजत हैं जिनके पिता बचन विशवाश ॥ कौन भरोसा नरदेही का कलियुग कौन जियनकी आश ६७ पिताहितैषी जग सब को है अपनो हुनर देय बतलाय ॥ रहै लालसा पितु उरमाहीं हमसों पुत्रहोय अधिकाय ६८ जे नहिं मानैं पितु अपने को तेई नीच जगत में भाय ॥ येई कुलीने अकुलीने के लक्षण साफपरै दिखलाय ६९ निन्दक होवैं रघुनन्दन को तासों कौन हमारो नात ॥ नेही गेही नरदेही का जगमें साँचो राम लखात ७० इतना सुनिकै इन्दलठाकुर देवी चरण शरण गा धाय ॥ विनय सुनाई भल देवी को पढ़िपढ़िवेदऋचनको भाय ७१ बरंबुहिभै तब मठिया ते इन्दल बोल्यो शीश नवाय ॥
आल्हाखण्ड । २७६ विजय हमारी नरवर होवै तुम सुनिलेउ शारदामाय ७२ एवमस्तु भा फिरि मठिया माँ इन्दल चलिभा शीशनवाय ॥ आयसु माँग्यो फिरि माता ते सुनवाँलीन्ह्यो हृदयलगाय ७३ यन्त्र बांधिकै भुजदण्डन में मस्तक रचना दियोलगाय ॥ पढ़ि पढ़ि रक्षाके मन्त्रन को भूली जादू दीन बताय ७४ घोड़ करिलिया आल्हावाला इन्दल तुरत लीन कसवाय ॥ विदा मांगिकै महतारी सों देवा साथ चले हरषाय ७५ देवी चलिकै मठभीतर सों नरवर गढ़ै पहुंची आय ॥ काठक घोड़ा बाण अजीता लीन्ह्योसेल शनीचरजाय ७६ किरपा करिकै जगदम्बा तहँ चेतन कीन फौजको जाय ॥ इन्दल पहुंचे जब तम्बू में आल्हालीन्ह्यो गोदबिठाय ७७ चूम्यो चाट्यो हृदय लगायो औ सब दीन्ह्यो कथासुनाय ॥ इन्दल बोल्यो तब आल्हा ते दादा सत्य देयँ बतलाय ७८ करो तयारी अब नरवर की सबकी कैद लेयँ छुड़वाय ॥ ठाढ़ो हाथी पचशब्दा था आल्हा तुरत लीन सजवाय ७९ बैठे हाथी आल्हाठाकुर इन्दल तुरत भये तय्यार ॥ बैठ कबूतरी पर मलखाने देवा भयो घोड़ असवार ८० मारु मारु करि मौहरि बाजी बाजी हाव हाव करनाल ॥ खर खर खर खर कै रथ दौरे रथ्वा चले पवनकी चाल ८१ कूचकराये आल्हा ठाकुर नरवरगढ़ै चले ततकाल ॥ कउ कउ घोड़ा हिरनचाल पर कउ कउ चलैं मोरकी चाल ८२ कउ कउ घोड़ा हंस चालपर कउ कउ सरपट रहे भगाय ॥ कदम चालपर कोऊ घोड़ा केहू टाप न परै सुनाय ८३ या विधि छैला अलबेला सब पहुँचे समरभूमि में जाय ॥
उदयसिंहका विवाह । २७७ १५
गा हरिकारा तब नरवरमें राजै खबरि दीन बतलाय ८४ गाफिल बैठे का महराजा शिरपर फौज पहूँची आय ॥ सुनिकै बातें हरिकारा की राजा गये सनाकाखाय ८५ आज्ञा दीन्ह्यो मकरन्दा को जावो समरभूमि तुम धाय ॥ इतना सुनतै मकरँद चलिभा तुरतै राजै शीश नवाय ८६ बाण अजीता सेल शनीचर ढूँढ़्यो घोड़ काठको जाय ॥ पता न पायो इन काहूका लाग्यो बार बार पछिताय ८७ हिरिया मालिनि के घर पहुँचा लीन्ह्यो ताको संग लिवाय ॥ चलि मकरन्दा भा नरवरते पहुँचा समरभूमि में आय ८८ आगे घोड़ा मकरन्दा का पाछे सकल सेन समुदाय ॥ ऐसी आगे इन्दल ठाकुर पहुँच्यो समरभूमिमें आय ८६ इन्दल बोल्यो मकरन्दा ते मामा काह गयो बौराय ॥ भाँवरि कैद्यो म्वरे चाचाकी चाची घरै देउ पठवाय ६० जीति न पैहौ कुल पूज्यनते मामा साँच दीन बतलाय ॥ सुनिकै बातें ये इन्दल की मकरँद बोला बचनरिसाय ६१ सुनवाँ भौजी के बालकतूम इन्दल बेटा लगो हमार ॥ समर जो करिहौ तुम फूफा ते जैहौ अवशि यमनके द्वार ६२ इतना कहिकै मकरँद ठाकुर तुरतै खैंचिलीन तलवार ॥ रान रान सों घोड़ा भिड़िगे ऊंटन भिड़िगै ऊंट कतार ६३ सूँड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुश भिड़े महौतन क्यार ॥ तेगा छूटे बर्दवान के कोताखानी चलीं कटार ६४ भाला बलछिनकी मारुइ कहुँ कहुँ कहुँ कड़ावीन की मार ॥ चलै भुजाली कहुँ कहुँ गद्दर कहुँकहुँकठिनचलैतलवार ६५ छूटे भाला बलछी सोहैं पै जस खेत बाजरे क्यार ॥
३. तृतीय भाग: बेला का विवाह, सिरसा की लड़ाई व मलखान का वीर-गति
मुण्डन केरे मुड़ चौरा मे औ रुण्डनके लगे पहार ६६ बड़ी लड़ाई भै नत्वर में मकरँद इन्दल के मैदान ॥ बड़े लड़ैया दूनों ठाकुर रणमाँ करें घोर घमसान ६७ मकरँद बोला तहँ हिरिया ते यहिपर छाँड़ो घोर मशान ॥ इतना सुनतै इन्दल ठाकुर हिरिया पास पहुँचा ज्वान ६८ पकरिकै जूरा त्यहि हिरियाको इन्दल काटिलीन ततकाल ॥ जादू झूठी भईं हिरिया की तुरतै हैगै हाल बिहाल ६६ देखि दुर्दशा यह हिरिया कै मकरँद खैंचि लीन तलवार ॥ ऐंचिकै मारा सो इन्दल के इन्दल लीन ढालपर वार १०० बचा कुँवरुवा आल्हावाला त्यहिका राखिलीन भगवान ॥ औ ललकारा मकरन्दा को मामा मौत आपनी जान १०१ ढाल कि औझरि इन्दलमारा मकरँद गिरा मूरछाखाय ॥ उतरिकै घोड़ी ते मलखाने तुरतै मुशकलीन बँधवाय १०२ मकरँद बँधिगे समरभूमि में भगिगे सबै सिपाही ज्वान ॥ कोउन रहिगा त्यहि समया में जो क्षण एक करै मैदान १०३ कूच करायो आल्हा ठाकुर तम्बुन फेरि पहुँचे आय ॥ खबरि पाय कै नरपति राजा तुरतै गयो सनाकाखाय १०४ कछू न सूझी तब नरपति को अपने मंत्री लये बुलाय ॥ मंत्र पूँछिकै तिन मंत्रिन सों आल्हा पास पहुँचे आय १०५ हाथ जोरिकै नरपति बोले मानो कही बनाफरराय ॥ कैद छुड़ायो सुत हमरे की अपने शूर लेउ छुड़वाय १०६ बेटी ब्याहैं हम ऊदन को सुख सों लौटि मोहोवे जाउ ॥ दगा जो राखै तुम्हरे सँग माँ नरपति कह्यो हमारो नाउँ १०७ सुनिकै बातें ये नरपति की आल्हा मकरँद दीन छुड़ाय ॥
उदयसिंहका विवाह । २७६ ४१ जायके छांड़्यो राजा सबको तम्बु गयो यऊ सब आय १०८ साइति शोधी चूड़ामणि ने आल्है खबरि दीन पहुँचाय ॥ कालिह सबेरे भौंरी हैहैं नरपति खबरिगये यहपाय १०९ इतना सुनिकै माहिल चलिभा लिल्ली घोड़ीपर असवार ॥ जायकै पहुँचा नरवरगढ़ में जहँपर नरपति का दरबार ११० बड़ी खातिरी राजा कीन्ह्यो अपने पास लीन बैठाय ॥ माहिल बोले तहँ राजा ते मानो कही हमारी भाय १११ शूर छिपावो तुम महलन में भौरिन कटा देउ करवाय ॥ जाति बनाफर की नीची है हल्ला देशदेश अधिकाय ११२ पानी पीहै कोउ तुम्हरे ना मानो नरवर के महराज ॥ पगिया अरझी नहिं माहिलकै भावै तौन करो तुमकाज ११३ इतना कहिकै माहिल चलिभे तम्बुन फेरि पहुँचे आय ॥ तैसे कीन्ह्यो नरपति राजा जैसे माहिल गये बताय ११४ माड़ो छायो मालिन तुरतै राजै खम्भ दीन गड़वाय ॥ गऊ के गोबर आँगन लीप्यो बारिनि तुरततहांपरआय ११५ चौक बनावन प्रोहित लाग्यो आई नगर सुहागिल धाय ॥ ब्याह गीत सब गावन लागीं उत्सवदेखिपरे अधिकाय ११६ तब मकरन्दा को बुलवायो नरपति हालकह्यो समुझाय ॥ लैके नेगी तुम चलिजावो घरके ठाकुर लवो बुलाय ११७ इतना सुनिकै मकरँद चलिभा नाई बारी सङ्ग लिवाय ॥ जायकै पहुँच्यो त्यहि तम्बू में जहँपर बैठि बनाफरराय ११८ हाथ जोरिकै मकरँद बोल्यो जो कछु राजै दीन सिखाय ॥ दशै आदमी भौरिन आवैं यहजब सुन्यो बनाफरराय ११९ विस्मय कीन्ह्यो आल्हा मनमों मकरँद फेरि कहा समुझाय ॥
[Header] ४२ माहलखण्ड । १८०
रारि करैया को तुमते है हमहूँलड़िभिड़िगयनअघाय १२० इतना सुनिकै मलखे बोले मानी बात तुम्हारी भाय ॥ दशही चलिहैं अब भौंरिन में आल्है हुकुम दीन फर्माय १२१ मलखे सुलखे देवौं आल्हों इन्दलैं तुरत भयो तय्यार ॥ जोगाँ भोगाँ मन्नाँ ब्रह्माँ जंगनिक भैन चँदेलेक्यार १२२ चढ़ि चढ़ि घोड़ा हाथिन ठाकुर मड़येतर को भये तयार ॥ सुमिरि शारदा मइहरवाली ऊदनपलकी भे असवार १२३ नरपति राजा के द्वारेपर पहुँचे तुरत बनाफरराय ॥ मकरँद ठाकुर सब बीरन को घरके भीतरगयो लिवाय १२४ फाटक बन्दीकरि नरपति ने कन्या तुरत लीन बुलवाय ॥ वर औ कन्या इकठौरी भे भौरिनसमयगयोतहँआय १२५ फुलवा ऊदन का गठिबन्धन नाइनि बारिनि दीन कराय ॥ पग परछाल्यो नरपति राजा कन्या दान दीन हरषाय १२६ पहिली भाँवरिके परतै खन सबियाँ शूर गये तहँ आय ॥ मारु मारु का हल्ला हैगा येऊ उठे तड़ाका धाय १२७ आधे आँगन भाँवरि होवैं आधे चलन लागि तलवार ॥ मारे मारे तलवारिन के आँगन बही रक्तकी धार १२८ कोगति बरणै राजपूतन कै मानैं नहीं नेकहू हार ॥ ना मुँह फेरैं नरवलवाले ना ई मोहवे के सरदार १२६ बड़ी गचापच भै आँगन में मुण्डन लागे ऊंच पहार ॥ जोगा भोगा दोनों भाई दोनों हाथ करैं तलवार १३० बड़ा लड़ैया मकरँद ठाकुर आँगन भली मचाई रार ॥ जीति न दीख्यो इन दशहूँ ते नरपति गयो हियेसोंहार १३१ हाथ जोरिकै नरपति बोल्यो मानो कही बनाफरराय ?'
[Header] उदयसिंहका विवाह । २८१ ९३
बाजी लरिका मकरन्दा है ज्यहियहदीन्ह्यो रारिमचाय १३२ स्याबसिस्याबसि तुमेकाआल्हा काहे न विजयहोय सबकाल ॥ मलखे सुलखे जिनके भाई नामी बच्छराजके लाल १३३ मेलजोल भा दुहुँ तरफा ते हैगै मारु बन्द त्यहिकाल ॥ सातौ भाँवरि फुलवा सँगमें घूमी देशराज के लाल १३४ राजा नरपति के महलन में तुरतै भात भयो तय्यार ॥ भयो बुलौवा फिरि क्षत्रिनको पहुँचे मोहबे के सरदार १३५ जेंवन बैठे आल्हा ऊदन तबहूँ चलनलागि तलवार ॥ गेडुवा पाटन की मारुन में सबियाँ शूरगये तहँ हार १३६ कीनि नम्रता फिरि नरपतिने बेटी बिदा दीन करवाय ॥ दायज दीन्ह्यो भल नरपतिने आल्हासबधनदीनलुटाय१३७ उठी पालकी नृप द्वारेते तम्बुन फेरि पहुँची आय ॥ कूचको डङ्का बाजन लाग्यो हाहाकार शब्द गोहाय १३८ खीमा उखरे रजपूतन के सो छकरन में लिये लदाय ॥ कूच करायो नरवरगढ़ते मोहबे चले शूर समुदाय १३६ बारा दिनका धावाकरिकै दशहरिपुरै पहुँचे आय ॥ दगैं सलामी तहँ आल्हाकी सुनवाँचढ़ी अटापरधाय १४० दीख कबूतरी पर मलखाने बेंदुल चढ़ा लहुरखाभाय ॥ आल्हा इन्दल इक हौदा पर सुनवाँ गई द्वारपर आय १४१ पलकी आई तहँ फुलवा की नारिन कीन नेग सबगाय ॥ घर के भीतर के जानेकी पण्डितसाइतिदीनबताय १४२ बधू पुत्र घर भीतर गमने द्यावलि रूपन लीन बुलाय ॥ जल्दी जावो तुम मोहबे को मल्हनेखबरिजनावोजाय १४३ इतना सुनिकै रुपना चलिभा मल्हना महल पहुँचाआय ॥
९४ आल्हखण्ड । २८२ खबरि सुनाई सब मल्हना को रूपना वारबार शिरनाय १४४ बारह रानी परिमालिक की अपने कीन सबन श्रृंगार ॥ मनियादेवन को सुमिरन करि पलकी उपरभई असवार १४५ आल्हा ऊदनके महलन में रानी गई तड़ाका आय ॥ रूप देखिकै तहँ फुलवा को रानिनखुशीभईअधिकाय १४६ विदा माँगिकै न्यवतहरी सब अपने नगर चले ततकाल ॥ बाजत डङ्का अहतङ्का के पहुँचतभयेनगरनरपाल १४७ पूर मनोरथ भे ऊदन के घर घर भयो मंगलाचार ॥ ब्याह पूरभा अब फुलवा का सोये सबै शूरसरदार १४८ खेत छूटि गा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाकरकेर ॥ तुम सों ब्रह्मा यह मागतहौं सबविधिअपनिदीनताहेर १४९ नदी औ पर्वत चहु जंगल में कतहूँ जाय लेउँ अवतार ॥ तहँ तहँ स्वामी रघुबर होवें चाहौं यही सृष्टि कर्त्तार १५० करों बन्दना पितु अपने की दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनारायणभाय १५१ बढ़े साहिबी दिन दिन दूनी औ कविकरैं सुयशको गान ॥ ललिते ऐसे नर दुर्बल को करतो कौन और सनमान १५२ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललितेके तबलों तुम यशसोंरहौ सदा भरपूर १५३ माथ नवायौं शिवशंकर को ह्याँते करों तरंग को अन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त १५४ इति श्रीलखनऊनिवार्सि(सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रागनारायण जीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भव बुधकृपा- ऽनु पण्डितललिताप्रसादकृतउदनपाणिग्रहणवर्णनोनाम तृतीयस्तरंगः॥ ३॥ इति उदयसिंहका विवाह सम्पूर्ण ॥
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ अथ आल्हखण्ड ॥ चन्द्रावलिकी चौथि अथवा बौरीगढ़की लड़ाई ॥ सवैया ॥ शेष महेश गणेश रमेश धनेश सुरेश दिनेश मनावैं । बावन पावन धोवन को सुखकारि पुरारि धरे सुखपावैं ॥ सोई भये जमदग्नि के बंश औ पूरण अंश पुराण बतावैं । वोई भये रघुनन्दन भूप सो रूप लखे ललिते मुद पावैं १ सुमिरन ॥ धन्य बखानों मैं दिनकर को जिनते पढ़ा बीर हनुमान ॥ तिनके कुलमाँ रघुनन्दन भे जिनकोजानतसकलजहान १ तिनको मानत हम परमेश्वर पूर्ण ब्रह्म सुरासुरपाल ॥ चारो प्यारे नृप दशरथ के कीन्हेनिबाल रूप जो ख्याल २ सोई धारे उर गिरिजापति मनमें बालरूप के हाल ॥ काकभुशुण्डी कौवा तन को मुनि सों मांगि लीनसत्रकाल ३ कितन्यो राजा सिंहासन तजि इनके परे प्रेम के जाल ॥ सुन्यो बिभीषण की गाथा है शरणहिताकत भयो निहाल ४
२ आल्हाखण्ड । २८४ सोई ललिते जब उर आवै जावैं सबै लोक जंजाल ॥ चौथि बखानों चन्द्रावलि की सुनिये ताको पूर हवाल ५ अथ कथाप्रसङ्ग ॥ लागो सावन मनभावन जब वर्षन मेघ झमाझम लाग ॥ दुःख छूटिगा नर नारिन का उपजा हिये प्रेम अनुराग १ गड़े हिंडोला सब घर घर हैं दर दर झुंड खड़े अधिकार ॥ सावन आवन मनभावन की गावन लागीं गीत बहार २ कजली जाहिर मिर्जापुर की सिर्जा जनों वहाँ कर्त्तार ॥ गड़ैं हिंडोला कोशलपुर में अबहूँ देखें लोग बहार ३ सोई महीना जब आवत भा तब मल्हना को सुनो हवाल ॥ बेटी प्यारी चन्द्रावलि जो ताको शोच करै सब काल ४ नयनन आँसू ढरकन लागे बयनन कढ़े चित्त घबड़ाय ॥ ऐसी हालत मै मल्हना कै तबहीं गये उदयसिंहआय ५ लखिअसहालत उदयसिंह तब दोऊ हाथजोरि शिरनाय ॥ पूँछन लागे महरानी ते काहे गई उदासी छाय ६ सुनिकै बातें उदयसिंह की मल्हना बोली बचन बनाय ॥ याद आयगै लरिकाई कै सोई बात गई उरछाय ७ ताहि विसूरति मैं ऊदन थी सोई गई उदासी छाय ॥ सखी हमारी एक साथ की पायो दुःख रहै अधिकाय ८ दुःख याद हो जब काहू को कोमल चित्त जाय घबड़ाय ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले माता साँच देउ बतलाय ६ आजुइ तुमका अस देखा ना बहुदिन लखातुम्हें असमाय ॥ की विप देवो उदयसिंह को की दुख देवो साँच बताय १० करो बहाना चहू केते तुम मानी नहीं लहुरवा भाय ॥
चन्दावलि की चौथि। २८५ ३ इतना सुनिकै मल्हना बोली ऊदन साँच देयँ बतलाय ११ लाग महीना अब सावन को गावन लगे नारि नर गीत ॥ सुधि जब आवै चन्द्रावलि की तबहीं लेय मोह दलजीत १२ कठिन यादवा बौरीगढ़के जिनके लूटि मार का काम ॥ बेटी ब्याही तिनके घरमाँ कबहुँन लखी आपनोधाम १३ चौथि पठावैं जो बौरीगढ़ तौ फिर होय वहाँ पर मार ॥ है बहनोई इन्द्रशाह तब ताके परी बांट है रार १४ गउना रउना सबके आवैं बेटी परी मोरि ससुराल ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले माता मानो कही हमार १५ चौथी लैके बौरी जैबै बहिनी बिदा लेव करवाय ॥ अब मैं जावों महाराजा ढिग माँगों बिदा बेगिही जाय १६ इतना सुनिकै मल्हना बोली मानो कही बनाफरराय ॥ मोहिं पियारी अस बेटी ना जो तुम जाउ लहुरवा भाय १७ कछु तुम कहियो ना राजाते ना बौरी को होउ तयार ॥ प्राण पियारे तुम ऊदनहौ साँची मानो कही हमार १८ सुनिकै बातें ये मल्हना की ऊदन चले जहाँ परिमाल ॥ हाथ जोरिकै उदयसिंहने औ राजाते कहा हवाल १६ हम अब जैहैं बौरीगढ़ को बहिनी बिदा करैहैं जाय ॥ कहा न मानब हम काहूको राजन हुकुम देउ फरमाय २० बातैं सुनिकै बघऊदन की तुरतै उठा चँदेलाराय ॥ साथै लैके बघऊदन को फिरि रनिवास पहुँचाआय २१ डाटन लाग्यो तहँ मल्हनाको री कस जौहर दीन लगाय ॥ ऊदन जैहैं चलिबौरी को बेटी बिदा करैहैं जाय २२ इवैं लुटेरा बौरी वाले ओ बइलानी बात बनाय ॥
४ आल्हखण्ड । २८६ कुशल न होइहै ऊदन जैहैं त्वहिते साँचदेयँ बतलाय २३ कहा न मनिहैं ये काहू का कलहा देशराज के लाल ॥ इतना सुनिकै मल्हनारानी सब राजा ते कहा हवाल २४ दोष हमारो कछु नाहीं है साँची सुनो बात महराज ॥ काम न अबरा कछु हमरे घर बिन चन्द्रावलि होय अकाज २५ कहा न हमरो ऊदन मानैं अपनो कहा करै सबकाल ॥ पूँछो इनसे तुम महराजा पासै देशराज के लाल २६ इतना सुनिकै ऊदन बोले साँची मानो कही हमार ॥ खर्चा देवो मोहिं जल्दी अब मैं बौरी का खड़ात यार २७ कहा न मानब हम काहू को यहुतो साँच दीन बतलाय ॥ जान न पावब जो बौरीका तौ मरिजाब जहरको खाय २८ सुनिकै बातैं ये ऊदन की निश्चय जानि लीन परिमाल ॥ यहु समझायेते मानीना रिसहा देशराजका लाल २९ यहै सोचिकै मन अपनेमाँ राजा सामा दीन कराय ॥ हीरा कलँगी औ दूरा तोड़ा सो ऊदन को दियो मँगाय ३० बाइस हाथी साठि पालकी रथ चौरासी घोड़ हजार ॥ यह सब सामा तहँ दीन्ह्यो तुम नाहर उदयसिंह सरदार ३१ दिल्ली ह्वैकै तुम चलिजावो औ मिलि लेउ पिथौरै जाय ॥ जौन बतावैं पिरथी राजा तौनै किह्यो लहुरवा भाय ३२ इतना कहिकै गे परिमालिक पहुँचे फेरि राजदरबार ॥ वस्त्र आभूषण औ मोतिनके मल्हना दीन आय दशहार ३३ भरि भरि मेवा औ कतारूको मल्हना मटुका लीनरँगाय ॥ नाई बारी भाट तँबोली चारो नेगी लीन बुलाय ३४ कहि समुझावा सब नेगिनको औ सब सामा दीन गहाय ॥
चन्द्रावलि की चौथ। २८७ ५ बिदा होन जब ऊदन लागे मल्हना छाती लीन लगाय ३५ कहि समुझावा भल ऊदन को कीन्ह्यो रारि नहीं तुम जाय ॥ देश पराये में गमखाना यहही नीति बनाफरराय ३६ इतना कहिकै रानी मल्हना आशिर्वाद दीन हरषाय ॥ सुमिरि भवानी मइहरवाली मनियादेव हृदयसों ध्याय ३७ तुरत बेंदुला पर चढ़ बैठ्यो औ चलि दियो बनाफरराय ॥ माहिल शाले चंदेले के सोतो गये महोबे आय ३८ गये कचहरी परिमलिक की माहिल बोल शीश नवाय ॥ सबियां क्षत्री ह्याँ बैठे हैं पै नहिं ऊदन परें दिखाय ३६ इतना सुनिकै राजा बोले नींके हवैं लहुरवा भाय ॥ पता लगावैं माहिल ठाकुर कहँ पर गये बनाफरराय ४० नीके जानैं सब माहिल को इनके चुगुलिन का वयपार ॥ कउन बतावा तहँ माहिल को कहँ पर उदयसिंह सरदार ४१ तहँ ते उठिकै माहिल चलिभे मारग पता लगावत जायँ ॥ चुगुल शिरोमणि माहिलठाकुर याते कौन देय बतलाय ४२ मालिनि बिटिया उरईवाली बेही नगरमहोबे भाय ॥ पता नं पायो जब काहू ते माहिल गये तासुघर धाय ४३ हाल बतायो सब माहिल को सुनतै कूच दीन करवाय ॥ जायकै पहुँचे फिरि दिल्ली में जहँ पर रहै पिथौराराय ४४ ऊदन पहुँचे ह्याँ दिल्ली में डेरा परा बाग में जाय ॥ बड़ी खातिरी भै माहिल कै राजा पास लीन बैठाय ४५ माहिल बोले तहँ राजाते मानो कही पिथौराराय ॥ ऊदन आये हैं मोहबे ते साँचे हाल देयँ बतलाय ४६ कालिह सबेरे मलखे अइहैं दिल्ली देहैं आगिलगाय ॥
९ आल्हखण्ड । १८८ यह सुनि आयन परिमालिकते मानो साँच पिथौराराय ४७ इतना सुनिकै पिरथी बोले माहिल काह गयो बौराय ॥ कौन दुश्मनी परिमालिक ते . दिल्ली शहर देयँ फुकवाय ४८ ऊदन जैहैं बौरीगढ़को हमको खबरि मिली है साँच ॥ असरिस लागी माहिल ठाकुर मारों निकरि परै तबकाँच ४६ इतना सुनिकै माहिल चलिभे बौरीगढ़ै पहुँचे जाय ॥ बोले ताहर सों पिरथीपति तुम ऊदनको लवो बुलाय ५० इतना सुनिकै ताहर चलिभे बगिया फेरि पहुंचे जाय ॥ तुम्हें बुलायो महराजा है यह ऊदन ते कह्यो सुनाय ५१ इतना सुनते ऊदन ठाकुर बेंदुल उपर भयो असवार ॥ सुमिरि शारदा महिरवाली अपनी लीन ढालतलवार ५२ ताहर ऊदन दूनों चलि भे औ दरबार पहुंचे आय ॥ हाथ जोरिकै महराजा के सम्मुख ठाढ़भयो शिरनाय ५३ पाग उतारी बघऊदन ने औ धरिदीन चरणपर जाय ॥ देखि नम्रता उदयसिंह कै राजा पास लीन बैठाय ५४ पिरथी बोले उदयसिंह ते कहँ को चले बनाफरराय ॥ इतना सुनते ऊदन बोले मानो साँच पिथौराराय ५५ बहिनी हमरी जो चन्द्रावलि ताकी चौथि लेन को जायँ ॥ दर्शन करिकै पृथ्वीराज के जायो कह्यो चँदेलोराय ५६ सोई दर्शन को आयेहन मानो सत्य वचन महिपाल ॥ इतना सुनिकै पिरथी बोले बेटा देशराज के लाल ५७ लौटि मोहोवे ऊदन जावो मानो सत्य वचन यहिकाल ॥ मारे जैहौ बौरीगढ़ में ऊदन साँचे कहैं हवाल ५८ हवैं लुटेरा यदुवंशी सब कैसे पठे दीन परिमाल ॥
[Header] चन्द्रावलि की चौथ । २८६ ७
भलो बुरो कछु वै मानैं ना बेटा देशराज के लाल ५६ इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ कीन प्रतिज्ञा हम महाराजा वहिनी विदा लेब करवाय ६० झूॅठि प्रतिज्ञा हम करिहैं ना चहुतनधजीधजी उड़िजाय ॥ करो आज्ञा अब जाने की आशिर्वाद देउ हरषाय ६१ इतना सुनिकै महाराजा तब चीराकलँगी दीन मँगाय ॥ शाल दुशाला मोहनमाला सबधनदीन लाखको भाय ६२ रानी अगमा यह सुनि पावा आये देशराज के लाल ॥ भयो बुलौवा जब महलन ते आयसु दीन तबै महिपाल ६३ तुरतै ऊदन तहँ ते चलिभे रानी भवन पहुँचे आय। आई नारी बहु दिल्ली की देखन हेतु लाहुरवा भाय ६४ रूप देखिकै बघऊदन को मनमें कहैं गिरीश मनाय ॥ मेरो बालम ऊदन होतो देतो शिव यह योगबनाय ६५ तौ मनभाती दिखलाती सब छाती फेरि यहाँलग कौन ॥ छाती खोले दिखलाती सो गाती गीत रँगीले जौन ६६ ऐसी नारी नहिं केहू युग कलियुगकुलटनको अधिकार। उलटन पुलटन कुलटन दीख्यो ऊदन जानिगयो बयपार ६७ भगिनी माता औ कन्या सम कीन्होतीनि भांति ब्यवहार ॥ रानी अगमा बोलन लागी मानों उदयसिंह सरदार ६८ तुम नहिं जावो गढ़बौरी को बेटा देशराज के लाल ॥ बिना बिचारे औ शोचे बिन कैसे पठै दीन परिमाल ६९ बिना दयाके बौरीवाले नित उठिकरैं निर्दयी काम ॥ जानि बूझिकै कैसे पठवैं ऊदनजाउ यमन के धाम ७० इतना सुनिकै ऊदन बोले माता साँच देयँ बतलाय ॥ १६
८ आल्हाखण्ड । २६० ना मोहिं पठयो परिमालिक ने ना मोहिंमलहनादीनपठाय ७१ मनसे आई चन्द्रावलि को सावन मुहवा देउँ दिखाय ॥ राजा रानी की सम्मत ना अपने बूत चल्यनहममाय ७२ रीछ औ बाँदर सँगमा लैकै जीत्यो लङ्क राम महराज ॥ ग्वालनबालनयशुमति लालन लैकै हना कंस शिरताज ७३ छोटो अंकुश मानुष लैकै बैठै नित्त नाग शिर जाय ॥ जहँ मनभावै तहँ लैजावै तेजै सबल परै दिखलाय ७४ तेज न होई ज्यहि देही माँ सो लै करी फौज का माय ॥ दया धर्ममाँ कछु अन्तर ना मन्तर साँच देयं बतलाय ७५ धरम युधिष्ठिर का जाहिर है अधरम कौरौ गये नशाय ॥ लौटि बनाफर अब जाई ना बहुतनधजीधजीउड़िजाय ७६ इतना सुनिकै रानी अगमा मनमाँ ठीक लीन ठहराय ॥ क्यहु समुझायेते मानी ना साँचो । हठी बनाफरराय ७७ बहु धन दीन्ह्यो फिरि ऊदनको आशिर्वाद दीन हर्षाय ॥ पायँ लागिकै महरानी के ऊदन कूच दीन करवाय ७८ छाय उदासी गै महलन में तम्बुन अटा बनाफर आय ॥ कूच करायो फिरि बगिया ते औ बैरीगढ़ चला दबाय ७६ बारा दिनकी मैजलि करिकै बौरी पास पहुँचे आय ॥ एक कोस जब बौरी रहिगै ऊदन तम्बू दीन गड़ाय ८० परा पलँगरा त्यहि तम्बू माँ तापर बैठ बनाफरराय ॥ लिखिकै चिट्ठी वीरशाहको धावन हाथ दीन पठवाय ८१ बैठक बैठे तहँ क्षत्री सब एकते एक शूर सरदार ॥ चिट्ठी लैकै धावन दीन्ह्यो आवन पढ़ा बनाफर क्यार ८२ बड़ी खुशाली वीरशाह करि जोरावरको लीन बुलाय ॥