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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

१८ आल्हखण्ड। ४० = चिन्ता ठाकुर रुसनी वाला ताको जीति लीन फिरिजाय ॥ बजे नगारा हहकाराके तहँ ते चला बनाफरराय १८३ आयकै पहुँचा फिरि गोरखपुर सबियाँ शहर लीन घिरवाय ॥ सूरजठाकुर गोरखपुर का ऊदन लीन तहाँ बँधवाय १८४ तहँते चलिकै पटना आवा यहु रणबाघु बनाफरराय ॥ पूरन राजा पटना वाला ताको कैदलीन करवाय १८५ चला बनाफर फिरि तहँना ते काशीपुरी पहुँचा आय ॥ धन्य बखानैं हम काशी का मनमेंशिवाचरणकोध्याय१८६ अज अबिनाशी घट घट बासी पूरण ब्रह्म शम्भु करतार ॥ परम पियारी निज काशी के आजौ सत्य सत्य रखवार १८७ रहे भास्करानंद स्वामी हैं सबके माननीय शिरताज ॥ अब लग काशी हम देखी ना ना कछुपरा क्यहूने काज १८८ वर्ष अठारा कीन नौकरी बाबू प्रागनारायण धाम ॥ छपीं पुस्तकैं ह्याँ जितनी हैं ते सब पढ़ा पेटके काम १८६ सुनी बड़ाई भल काशी की दासी सरिस मुक्ति तहँ भाय ॥ तौनी काशी अविनाशी मा ऊदन तम्बू दीन गड़ाय १६० हंसामनि काशी का राजा ऊदन कैद लीन करवाय ॥ मारू डंका फिरि बजवाये कनउज चला बनाफरराय १६१ तीनि महीना औ तेरा दिन गाँजर खूब कीन तलवार ॥ बारह राजन को कैदी करि पठवा जयचंद के दरबार १६२ बोला मारग में लाखनि ते बेटा देशराज को लाल ॥ हम पर साँकर जहँ कहुँ परि है लाला रतीभानके लाल १६३ बदला देहौ की मुरिजैहौ लाखनि साँच देउ बतलाय ॥ सुनिकै बातें बघऊदन की लाखनिगंगशपथगाखाय १६४

गाँजरकीलड़ाई । ४०६ १६ साथ तुम्हारो साँचो देहैं प्यारे उदयसिंह तुम भाय ॥ करत बतकही द्वउ मारग में कनउजशहर पहूँचे आय १६५ अनँद बधैया घर घर बाजीं सबहिन कीन मंगलाचार ॥ पूरि लड़ाई भै गाँजर कै रक्षा करें सिया भर्त्तार १६६ खेत छूटिगा दिननायक सों झएडागड़ा निशाको आय ॥ आशिर्वाद देउँ मुन्शीसुत जीवो प्रागनारायणभाय १६७ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तबलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर १६८ माथ नवात्रों पितु अपने को जिन बल गाथ भई तय्यार ॥ बड़े यशस्वी पितु हमरे हौ साँचे धर्म कर्म रखवार १६६ करों तरंग यहाँ सों पूरण तवपद सुमिरि भवानीकन्त ॥ शम रमा मिलि दर्शन देवो इच्छा यही मोरि भगवन्त २०० इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायणजीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलां निवासिमिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनुपण्डितललिताप्रसाद कृत गाँजरयुद्धवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥ गाँजर का युद्ध समाप्त ॥ इति ॥

४. चतुर्थ भाग: दिल्ली-महोबा महासंग्राम, पृथ्वीराज चौहान से युद्ध व ऊदल बलिदान

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॥ श्रीगणेशाय नमः॥ अथ आल्हखण्ड ॥ सिरसाकासमरवर्णन ॥ सवैया ॥ ध्यावत तब पद कंज शिवा मनभावत दे वरदान भवानी । तवपति भंग नशे में परे अरु गावत गीत हरी हरि वानी ॥ नाहिं सुनय बिनती ललिते यह साँचहु साँचहु साँच बखानी । दे मृगनयनी कि दे मृगछाल यहै हम चाहत हैं शिवरानी १ सुमिरन ॥ सुमिरि भवानी शिवरानी को सिरसा समर करौं विस्तार ॥ नैया डगमग भवसागर में माता तुम्ही निबाहन हार १ आदि भवानी महरानी तुम तुम बल सृष्टि रचैं करतार ॥ परम पियारी त्रिपुरारी की धारी देह जगत उपकार २ पुत्र षडानन गजआनन हैं हमरे माननीय शिरताज ॥ प्रथमँ सुमिरैं गजआनन को होवैं सकल तासु के काज ३ सुमिरि षडानन का दुनियामाँ लाखन सिद्धभये द्विजराज ॥ मलखे पृथ्वी के संगर को वर्णन करौं सुमिरि रघुराज ४

२ आल्हाखण्ड । ४१२ अथ कथाप्रसंग ॥ एक समैया माहिल ठाकुर लिल्ली घोड़ापर असवार ॥ तिकृतिकृतिकृतिकूघोड़ीहांकत पहुंचे दिल्ली के दर्बार १ आवत दीख्यो जब माहिल को पिरथी कीन बड़ा सत्कार ॥ आवो आवो बैठो बैठो ठाकुर उरई के सरदार २ कुशल बतावो अब मोहबेकी नीके राजकरैं परिमाल ॥ इतना सुनिकै माहिल बोले साँची सुनो आप नरपाल ३ अवसर नीको यहि समया माँ तुम्हरे हेतु रचा कर्त्तार ॥ आल्हा ऊदन गे कनउज का राजा जयचँद के दरबार ४ भले बुरे जो दिन बीतत हैं आवैं फेरि नहीं सो हाथ ॥ त्यहिते तुमका समुझावत हैं साँची सुनो धरणि के नाथ ५ सिरसा मोहबा यहि समया माँ दूनों आप लेउ लुटवाय ॥ सुनिकै बातें ये माहिल की भा मनखुशी पिथौराराय ६ सात लाख फिरि फौजैं लैंकै तुरतै कूचदीन करवाय ॥ चारकोस जब सिरसा रहिगा तम्बू तहाँ दीन गड़वाय ७ हुकुम लगायो महराजा ने सिरसा किला गिरावाजाय ॥ तब हरकारा सिरसा वाला मलखेखबरि जनावा आय ८ फौजैं आईं पृथीराज की ओ महराज बनाफरराय ॥ इतना सुनिकै मलखे ठाकुर डंका तुरत दीन बजवाय ६ हुकुम लगायो अपने दलमा फौजैं होन लगीं तय्यार ॥ तुरत कबूतरी पर चढ़िबैठा नाहर सिरसा का सरदार १० छींक तड़ाका भै सम्मुख मा माता बोली वचन सुनाय ॥ तुम नहिं जावो अब मुर्चा को मानो कही बनाफरराय ११ इतना सुनिकै मलखे बोले माता साँच देयँ बतलाय ॥

सिरसाकासमर । ४१३ ३

  • आशिर्वाद देउ जल्दी सों जामें काम सिद्ध है जाय १२ चढ़ा पिथौरा है सिरसा पर माता हुकुम देउ फरमाय ॥ बिरमा बोली तब मलखे ते तुम्हरो बार न बाँका जाय १३ चरण लागिकै महतारी के मलखे कूच दीन करवाय ॥ चौंड़ा ताहर चन्दन बेटा तीनों परे तहाँ दिखलाय १४ चौंड़ा बोला मलखाने ते मानो कही बनाफरराय ॥ किला गिराय देउ सिरसा का दीन्ह्यो हुकुम पिथौराराय १५ इतना सुनिकै मलखे बोले चौंड़ा काह गये बौराय ॥ अपने हाथे हम बनवाया हमहीं देवैं किला गिराय १६ जो कछु ताकति हो पिरथीकी सो अब हमैं देयँ दिखलाय ॥ असगति नाहीं है पिरथी कै हमरो किला देयँ गिरवाय १७ सुनिकै बातें मलखाने की चौंड़ा लागु दीन लगवाव ॥ झुके सिपाही दुहुँतरफा के मारैं एक एक को धाय १८ पैदल पैदल कै बरणी मै और असवार साथ असवार ॥ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्त की धार १६ अपन परावा क्यहु सूझैना दूनों हाथ करैं तलवार ॥ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लाग पहार २० जैसे भेड़िन भेड़हा पैठे जैसे अहिर बिडारै गाय ॥ तैसे मारै मलखे ठाकुर रणमा क्षत्रिन खेलखिलाय २१ बहुतक घायल भे खेतनमों बहुतक हैगे बिना परान ॥ फिरि फिरि मारै औ ललकारै नाहर समरधनी मलखान २२ चढ़ा चौंड़िया इकदन्तापर गरुई हाँक देय ललकार ॥ मोरि लालसा यह छावति है ठाकुर सिरसा के सरदार २३ मेरे सिपाहिन का पैहौ तुम ठाकुर मोरि तोरि तलवार ॥

४ आल्हाखण्ड । ४१४ इतना सुनिकै मलखे बोले चौंड़ा भली कही यहि वार २४ इतना कहिकै मलखे ठाकुर चौंड़ा पास पहुँचे जाय ॥ साँग चलाई तब चौंड़ा ने मलखे लीन्ह्यो वार बचाय २५ ऐंड़ लगाई फिरि घोड़ी के हौदा उपर पहुँचे जाय ॥ ढाल कि औझड़ मलखे मारा चौंड़ा गयो मूर्च्छा खाय २६ बांधिकै मुशकें तब चौंड़ाकी अपनी फौज पहुँचा आय ॥ कड़ा छड़ा औबिछिया अँगुठा चौंडै दीन तहाँ पहिराय २७ अगे अगेला पिछे पछेला तिन बिच चुरियाँ दीनडराय ॥ जोशन पट्टी और वज़ुल्ला कानन करनफूल पहिराय २८ बेंदीभाल नयन बिच काजर पीछे चुनरि दीन उड़ाय ॥ तुरत घाँघरा को पहिरावा मलखे पलकी लीनमँगाय २६ रूप जनाना करि चौंड़ा को पलकी उपर दीन बैठाय ॥ फिरि बुलवावा हरकारा को ताको हाल दीन समुझाय ३० कह्यो जबानी पृथीराज ते चौंडै मुहवा लीन लुटाय ॥ बेटी प्यारी परिमालिक की लैके कूच देउ करवाय ३१ चली पालकी फिरि चौंड़ा की लश्कर तुरत पहुँची आय ॥ दौरति धावन महराजा ते सबियो हाल बतावा जाय ३२ बड़ी खुशाली भै पिरथी के फूले अंग न सके समाय ॥ जल्दी आये फिरि पलकी ढिग देखन लागि पिथौराराय ३३ दीख जनाना तहँ चौंड़ा को पिरथी गये बहुत शर्माय ॥ बँधा चौंड़िया जो बैठा था बंधन तुरत दीन खुलवाय ३४ क्रोधित ह्वैकै महराजा फिरि आपै गये समर में आय ॥ औ ललकारा मलखाने को अबहीं किला देउ गिरवाय ३५ इतना सुनिकै मलखे बोले राजन साँच देयँ बतलाय ॥

सिरसाकासमर । ४१५ ५ बंजर धरती जब देखी हम तबफिर किलालीन बनवाय ३६ जैसे मालिक परिमालिक हैं तैसे आप पिथौराशय ॥ अदब तुम्हारो हम मानत हैं राजन कूच देउ करवाय ३७ इतना सुनिकै पिरथी बोले अभीं किला देउ गिरवाय ॥ सिरसा मुहवा नतु दूनों हम मलखे लेव आज लुटवाय ३८ इतना सुनिकै मलखे बोले ओ महराज पिथौराशय ॥ हथ्थी पछारा तब द्वारे मा आपन बूत दीन दिखलाय ३९ काह बतावैं महराजा ते सबियां देश रहा थर्याय ॥ किला गिरावो जो सिरसा का दिल्लीशहर देउँ फुँकवाय ४० कौने धोखे तुम भूले हौ मारौं राज भंग है जाय ॥ इतना सुनिकै पृथीराज ने तोपन आगिदीन लगवाय ४१ हाहाकारी तब बीतति भै मानो प्रलयगई नगच्याय ॥ बड़ी लड़ाई भै तोपन कै औ दल गिरा बहुत महराय ४२ चारकोस लौं गोला जावै गोली पांचखेत लौं जाय ॥ धुँवा उड़ाना अति तोपन का चहुँदिशि अंधकारगा छाय ४३ बन्द लड़ाई भै तोपन कै औ फिरि चलन लागि तलवार ॥ जितने कायर दूनों दल मा ते सब भागि डारि हथियार ४४ शूर सिपाही रणमण्डल मा मारैं फेरि फेरि ललकार ॥ कटि कटि मूड़ गिरैं धरती मा उठि उठि रुण्डकरैं तलवार ४५ मूँड़न केरे मुड़चौरा भै औ रुण्डन के लगे पहार ॥ मारे मारे तलवारिन के नदिया वही रक्तकी धार ४६ छुरी कटारी तिहि नदिया मा मछली सरिस पैरैं दिखलाय ॥ ढालै कछुवा त्यहि नदिया मा गोहैं सरिस भुजा उतरायँ ४७ को गति वर्णै त्यहि समया कै नदिया खूब बहै विकराल ॥

६ आल्हाखण्ड । ४१६ नचैं योगिनी खप्पर लीन्हे मज्‍जैं भूत प्रेत वैताल ४८ घोड़ी कबूतरी का चढ़वैया नाहर समरधनी मलखान ॥ सुमिरन करिकै शिवशंकर का मारिकै कीन खून खरिहान ४६ औ ललकारा रजपूतन का हमरे सुनो शूर सरदार ॥ जो कोउ पैदाहै दुनिया मा आखिर मरण होय इकवार ५० परे खटोलिन में मरिहैहौ आखिर ह्वैहौ भूत परेत ॥ सम्मुख जूझै तलवारी के त्यहि बैकुण्ठ धाम हरि देत ५१ दिह्यो बढ़ावा बहु क्षत्रिनको नाहर सिरसा के सरदार ॥ पैदल पैदल इकमिल ह्वैगे औ असवार साथ असवार ५२ विकट लड़ाई क्षत्रिन कीन्ह्यो नदिया बही रक्तकी धार ॥ सूरति राजा हाड़ावाला मलखे सिरसा के सरदार ५३ दूनों अभिरे समरभूमि मा दूनों खूब करैं तलवार ॥ भाला बलछी दूनों मारैं दूनों लेयँ ढालपर वार ५४ सूरति गिरिगा जब संगर में अंगद शूर पहुँचा आय ॥ औ ललकारा मलखाने को तुम भगि जाउ बनाफरराय ५५ इतना कहिकै अंगद ठाकुर तुरतै मारा साँँग चलाय ॥ घोड़ी कबूतरी का चढ़वैया तुरतै लीन्ह्यो वार बचाय ५६ खैंचिकै मारा तलवारी का औ शिर दीन्ह्यो भूमि गिराय ॥ तीनि शूर पिरथी के जूझे हाहाकार शब्द गा छाय ५७ मुर्चा फिरिगे रजपूतन के काहू धीर धरा न जाय ॥ मलखे मारै दश पंद्राको घोड़ी देवै बीस गिराय ५८ दाँतन काटै टापन मारै अद्भुत समर कहा ना जाय ॥ हटा पिथौरा तब पाछे का आगे बढ़े बनाफरराय ५६ मलखे ताहर का मुर्चा भा मारैं एक एक को धाय ॥

सिरसाकासमर । ४१७ ७ सात कोसलों मलखे ठाकुर मारत मारत गये हटाय ६० रंग बिरंगी पृथ्बी ह्वैगैं मज्जा चर्बिपरै दिखराय ॥ बड़ा लड़ैया बिरमा वाला ज्यहिका कही बनाफरराय ६१ त्यहि के संगर धरती काँपै थर थर आसमान थर्राय ॥ काह हकीकति है ताहर कै जो संगरते देयँ हटाय ६२ पाँउ पछारी को डारे ना यहु रणबाघु बीर मलखान ॥ कोऊ क्षत्री अस दूसर ना मलखे साथ करै मैदान ६३ मुर्चा फिरिगा पृथीराज का लौटा तबै बीर मलखान ॥ बाजे डंका अहंतंका के लौटे सबै सिपाही ज्वान ६४ पहुंचे पिरथी तब दिल्ली में सिरसा सिरसा का सरदार ॥ माता बिरमा त्यहि औसरमा द्वारे आरति लीन उतार ६५ एक समैया की बातें हैं आये उरई के सरदार ॥ आवो आवो बैठो बैठो बिरमा कीन बड़ा सतकार ६६ माहिल बैठा तब महलन मा करिकै रामचन्द्र को ध्यान ॥ बोला माहिल फिरि बिरमा ते तुम्हरौ पूत बड़ा बलवान ६७ बड़े लड़ैया दिल्ली वाले ते सब हारिगये चौहान ॥ कौनि तपस्या तुम कैराखी पैदा भये बीर मलखान ६८ सरबर मलखे की दुनियामा दूसर नहीं लीन औतार ॥ यहै मनावैं परमेश्वर ते इनका भलाकरौ कर्तार ६९ नाम हमारो है दुनिया मा भैने माहिल के बरियार ॥ आल्हा ऊदन मलखे सुलखे इनते हारि गई तलवार ७० यहै मनावैं जगदम्बा ते अंजलि जोरिज़ोरि शिरनाय॥ मलखे सुलखे आल्हा ऊदन नीके रहें बनाफरराय ७१ सुनि सुनि बातें ये माहिलकी नारी बुद्धिहीन जगजान ॥ २७

८ आल्हखण्ड । ४१९ पदुम पैर है मलखाने के यहवरदीन रहे भगवान ७२, दुनिया बैरी है मलखे के भैया काह दनाई आय ॥ पदुम न फटि है जो तरवाका तौ नहिं मरी बनाफरराय ७३ लिखी बिधाता के मेटैको माता हाल दीन बतलाय ॥ बिदा माँगिकै फिरि जल्दी सों माहिल कूच दीन करवाय ७४ राह छोड़िकै फिरि उरई कै दिल्ली चला तड़ाका जाय ॥ लिल्ही घोड़ी का चढ़वैया दिल्लीपहुंचिगयोफिरआय ७५ हाल बतायो सब पिरथी को माहिल बार बार समुझाय ॥ भाला वलछी औ साँगनको खन्दक आप देउ गड़वाय ७६ पदुम न रैहै जब तरवा मा तब ना रही बनाफरराय ॥ मीचु आयगै मलखाने के माता हाल दीन बतलाय ७७ सुनिकै बातें ये माहिल की राजा कुँवर लीन बुलवाय ॥ इइसै खन्दक तुम खुदवावो आधे देउ जाय पटवाय ७८ एक छाँड़िकै इक पटवावो या विधि दीन खूब समुझाय ॥ अधीराति के फिरि अमला मा कुँवरनकीन तहाँ तसजाय ७६ पाँच रातिमें यह रचनाकरि दिल्ली फेरि पहुँचे आय ॥ हाल बतायो सब पिरथी को कुँवरन बार बार समुझाय ८० माहिल चलिभे फिरि उरई का राजा फौज कीन तैयार ॥ झीलमबखतरपहिरि सिपाहिन हाथम लई ढाल तलवार ८१ पहिल नगाड़ा में जिनबन्दी दूसरे फाँदि घोड़ असवार ॥ तिसर नगोड़ा के वाजत खन चलिभे सबै शूर सरदार ८२ जायकै पहुँचे फिरि संगर में तम्बू तहाँ दीन गड़वाय ॥ उलिखीहकीकति फिरिमलखेको अवहूं किला देउ गिरवाय-८३ लिखिकै चिट्ठी दी धावन को धावन तुरत पहूँचा जाय ॥

सिरसाकासमर। ४१६ द्वारे ठाढ़े मलखाने थे चिट्ठी तुरत दीन पकराय ८४ चढ़ा पिथौराहै सँभराभरि औ यह कहा बनाफरराय ॥ किला गिरावैं जो सिरसा का तौ सब रारि शान्तहैजाय ८५ नहीं तो बचिहैं न संगरमा जो बिधि आपु बचावैं आय ॥ लौटि पिथौरा अब जैहै ना सिरसा ताल देय करवाय ८६ मृत्यु आयगै मलखाने कै जो नहिं किला देयँ गिरवाय॥ लौटि पिथौरा अब जैहै ना नेका टका लेय निकराय ८७ चौंड़ा बकशी पृथीराज का सोऊ कहा सँदेशा आय ॥ बने जानना मलखाने अब घरमा बैठि रहैं शर्माय ८८ कौने राजा की गिनती मा जो नहिं किला देयँ गिरवाय॥ कह्यो सँदेशा यह ताहर है सो सुनिलेउ बनाफरराय ८९ मलखे चाकर परिमालिक का सो कस रारि मचावै आय ॥ दीन बड़ाई हम चाकरको पहिले फौज लीन हटवाय ९० जियति न जाई अब संगर ते जो बिधि आपु बचाई आय ॥ कह्यो सँदेशा सब लोगन को धावन बार बार समुझाय ९१ सुनिकै बातैं ये धावन की क्रोधित भयो बनाफरराय ॥ हुकुम लगायो फिरि सिरसामें बांजन सबै रहे हहराय ९२ बोले मलखे फिरि धावन ते यह तुम कह्यो पिथौरै जाय ॥ मारे मारे मुख धावन के धावन द्याव तहाँ समुझाय ९३ यहै बतायो तुम पिरथी ते आवत समरधनी मलखान ॥ कसरि न राखैं चौंड़ा ताहर संगर करैं दूनहू ज्वान ९४ कीन जनाना हम दोउन का उनके साथ कौन मैदान ॥ हमरो संगर पृथीराज को जावैं सँभरि आज चौहान ९५ इतना सुनिकै धावन चलि कै राजै खबरि बतावा आय ॥

१० आल्हखण्ड। ४२० हाल पायकै सिरसागढ़का क्रोधित भयो पिथौराराय ६६ बाजे डंका इत पिरथी के वैसी सिरसा के महराज ॥ सूरज वंशी औ यदुवंशी तोमर वंश केर शिरताज ६७ ये सब सजिसजि सिरसा गढ़में अपनी लीन ढाल तलवार ॥ नीले काले सब्जे सुर्खे सब रंग घोड़ भये तय्यार ६८ अंगद पंगद मकुना भौंरा सजिगे श्वेतवरण गजराज ॥ हाड़ा बूंदी गहिलवारके तिनपर बैठि शूर शिरताज ६६ सुमिरन करिकै शिवशंकरका मातै शीश नवावा जाय ॥ पीठि ठोंकि कै बिरमा माता आशिर्वाद दीन हर्षाय १०० चलिभा मलखे माताढिग ते रानी महल पहुंचा आय ॥ दीन दिलासा गजमोतिनिका ठाकुर चला खूब समुझाय १०१ बेटी बोली गजराजा की स्वामिन चेरी बोल बनाव ॥ पाँव पछारी का डारोना नाहीं हँसी देश औ गाँव १०२ होय हँसौंवा ज्यहि दुनिया मा त्यहिका मरण नीकही आय ॥ सुनी किहानी हम विप्रन ते स्वामी साँचदीनबतलाय १०३ इतना सुनिकै मलखे चुप्पै फौजन फेरि पहुंचे आय ॥ बाजे डंका अहलंका के मलखे कूच दीन करवाय १०४ सवैया ॥ चर्खनमों सब तोप चढ़ाय औ फौज अपारलिये मलखाना। बाजत डंक निशंक तहाँ औ यथा घन सावनको गहराना ॥ बिज्जु छटासों कटा करिवे कहँ चमकत खङ्ग तहाँ मर्दाना। मौहर बाजत हावकिये ललिते यह भाव न जात बखाना १०५ चढ़ा कबुतरी पर मलखाने मुर्चा सबै कीन तैयार ॥

सिरसाकासमर । ४२१ ११ पाग बैजनी शिरपर बाँधे हाथ म लये ढाल तलवार १०६ फिरिफिरि ध्यावै शिवशंकरको गावै सुन्दर भजन बनाय ॥ चील्ह औ गीध उड़ैं खपरिनपर कुत्ता स्यार रहे चिल्लाय १०७ मरण काल के जो अशकुन हैं मलखे दीख तहाँपर आय ॥ पै भयलायो मन अन्तर ना यहु निशंक बनाफरराय १०८ इकडिशि तोपनको छुटवावा इकडिशि धावा दीन कराय ॥ जैसे भेड़िन भिड़हा पहुँचै जैसे अहिर बिडारै गाय १०६ तैसे मारै रजपूतन को यहु रणबाधु बनाफरराय ॥ ताहर चौड़ा औ चन्दन का मोर्चा मलखे दीन हटाय ११० जौनै हौदा मलखे ताकैं घोड़ी तहाँ देय पहुँचाय ॥ जाय महावत का हनिडारैं औ असवारै देयं गिराय १११ दहिने बाँये टापन मारै सम्मुख दाँतन लेय चबाय ॥ मलखे ठाकुर के मारुनमा बहुदल परा तहाँभहराय ११२ जहँना हाथी पृथीराज का मलखे तहाँ पहुंचे आय ॥ पतरी लकड़िन खन्दक पाटे ताके पार पिथौराराय ११३ खाली खन्दक एक बीच में ताको दीख बनाफरराय ॥ गर्दन ठोंकी तहँ घोड़ी की दूनों ऐँड़ा दीन लगाय ११४ चूकि कबुतरी धरती जाना खन्दक परी तड़ाकाजाय ॥ मलखे घोड़ी दोउ खन्दकमा भालन उपर गिरे भहराय ११५ बलछी भालनकी नोकन सों घायल भये बनाफरराय ॥ बड़ा सोचभा तहँ घोड़ी का रोवैं बारबार पछिताय ११६ घोड़ी तड़पी फिरि खन्दकते मलखे सहित पारगै आय ॥ पदुम फाटिगा तहँ तरवा का औ मरिगये बनाफरराय ११७ गा हरिकारा तब सिरसामा बिरमै खबरि बतावा जाय ॥

१२ आल्हखण्ड । ४२२ सुनिकै बातें हरिकारा की विरमा गिरी मूच्छाखाय ११८ खबरि पायकै गजमोतिनि तहँ फिरिउठिबैठिफिरि गिरिजायाँ ॥ सासु पतोहू बैली ह्वैकै शिरधुनिबारबार पछितायँ ११९ सुयश बखानैं मलखाने का महलन गई उदासी छाय ॥ सात पांच दश जुरीं सहिलरी सम्मत देन लगींसो आय १२० तब गजमोतिनि विरमा दूनों पलकी लीन तहाँ मँगवाय ॥ सुमिरि गजानन लम्बोदर को गौरा पारवती पद ध्याय १२१ चढ़ी पालकी सासु पतोहू पहुंचीं समरभूमि में आय ॥ गदहन पृथ्वी को जुतवावै यहु महराज पिथौराराय १२२ तब गजमोतिनि ने ललकारा यह सुनि लेउ वीर चौहान ॥ यह ना जान्यो अपने मनते की मरिगये वीर मलखान १२३ सुनी पतिव्रतकी महिमा ना ताते चढ़ी तुम्होरे शान ॥ हम जबलेबे तलवारी को तब नहिं रही तुम्हारोमान १२४ बातें सुनिकै गजमोतिनि की पृथ्वी कूच दीन करवाय ॥ कैयो दिन का धावा करिकै दिल्ली शहर पहुंचे आय १२५ लाश देखिकै मलखाने कै माता तुरत गई लपटाय ॥ उठै औ बैठै गिरि गिरि जावै रानीदशा कही ना जाय १२६ विपदा बरणौं गजमोतिनिकै तौ फिरिएकसाल लगिजाय ॥ सखी सहिलरी तहँ समुझावैं विरमा धीरज रही कराय १२७ तेज पतिव्रत का जाहिर है जाते सत्त चढ़ा अधिकाय ॥ चिता लगावा गा चन्दन सों रानी बैठि सरापर जाय १२८ सुमिरि भवानी महरानी को पतिशिर धरा जाँघपर आय ॥ हवा खैंचिकै सब देहीकै शिरपरदीनतुरतपहुंचाय १२६ संध्या वाले यह गति जानैं प्राणायाम करें जे भाय ॥

सिरसाकासमर । ४२३ १६

नाक चपावैं ते अँगूठा ते ऊपरश्वासचढ़ावत जायें १३० तैसे करिकै गजमोतिन ह्याँ ऊपर हवा दीन पहुँचाय ॥ जब फुफकारयो पति शव लैकै हाहाकार अग्निगै आय १३१ भम्भम्भम्भम् चन्दन लकड़ा सुलगनलागि तहाँपर भाय ॥ हाय पियारे बघऊदन के मारे गये बनाफरराय १३२ भाय पियारो ऊदन होते दिल्ली शहर देत फुँकवाय ॥ हाय विधाता यह गति कीन्ही न्यारे भये बनाफरराय १३३ कौन दुसरिया जग दादा को इन्दल पूत बड़ा बरियार ॥ मरत न देखा यहि समया मा देवर उदयसिंह सरदार १३४ जो हम जानति यह गतिहोई तुमका लेति तुरत बुलवाय ॥ दगा न करते दिल्ली वाले तौकसमरतिप्राणपतिआय १३५ कड़कै धड़कै फड़कै छाती ऐसो देखि शूर सरदार ॥ यहै मनाऊं औ ध्याऊं नित स्वामी दीनबन्धुकर्त्तार १३६ जहाँ जहाँ जन्मैं ये स्वामी मम तहँ तहँ होयँ मोरि भर्त्तार ॥ अग्नि प्रज्वलित त्यहिसमयाभै लागे जरन सबै श्रृंगार १३७ गमकै ढोलक त्यहि समया माँ धमकै थाप नगारे भाय ॥ चम्चम् चमकै गजमोतिनितहँ दमकैजरनहेमअधिकायं १३८ माता बिरमा मोती मूंगा सुवरण बस्त्रदीन छिरकाय ॥ रही न आशा धन लेबे की मलखेसोचतहूँअधिकाय १३६ ऐस प्रतापी नित होवैं ना ज्ञानी पुरुष विचारैं भाय ॥ दानी ध्यानी अभिमानी सब शोचैं सीयराम शिरनाय १४० घरी न बीती ह्याँ महरानी पहुँची स्वर्गलोक में जाय ॥ तहँहूँ सोचै सुख मल्हना को जाविधिदीनरहैअधिकाय १४१ सबियाँ रैयाति मलखाने की दर दर रोय रही अधिकाय ॥

१४ आल्हाखण्ड । ४२४ घर घर चर्चा मलखाने की पुर पुर रहे नारि नर गाय १४२ सवैया ॥ कौन कहै विपदा पुरकी अति श्वान श्रृगालन शोर मचायो । शान न मान न आन कहूं मलखान विना विपदा पुर छायो ॥ घोर मशान समान तहाँ मलखान जहाँ नित सेज लगायो । मानगयो अरमानगयो ललिते मलखान महायश पायो १४३ समर पूर मैं सिरसागढ़ का गायो सुमिरि शारदा माय ॥ आशिर्वाद देउं मुन्शीसुत जीवो प्रागनारायण भाय १४४ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तबलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर १४५ खेत छूटिगा दिननायक सों झएडा गेड़ा निशाको आय ॥ परे आलसीखटिया ताकि ताकि संतन धुनी दीन परचाय १४६ माथ नवावों मैं माता को जो प्रत्यक्ष अबौ संसार ॥ पाणिकमल धरि सो पीढ़ी मा हमरो करैं अबौ निस्तार १४७ माथ नवावों पितु अपने को ह्याँते करों तरँग को अन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त १४८ इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागनारायणजीकीआज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलां निवासि मिश्रवंशोद्भव बुध कृपाशङ्करसूनु पं० ललिताप्रसादकृत सिरसासमर वर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥ सिरसा समर सम्पूर्ण ॥ इति ॥

अथ आल्हखण्ड ॥ कीरतिसागरकायुद्धवर्णन ॥ सवैया ॥ कीरति सिंधु शिवा शिव पै हम अक्षत चन्दन फूल चढ़ावैं । मानस ऐसो चहै हमरो पर आलस सों अस होन न पावै ॥ धावैं सबै दिशि पापसमूह औ हूह मचावत हूलत आवैं । सार यही ललिते जगको मुदसों नित शम्भु शिवा मन ध्यावैं १ सुमिरन ॥ सुमिरन करिकै शिवशङ्कर को रणमें चढ़े राम महराज ॥ एकरूप सों हनुमत ह्वैकै कीन्हे सकल रामके काज १ मुख्य स्वरूपी शिवशङ्कर के डमरू एक हाथ में राज ॥ लिहे त्रिशूलौ दुसरे हाथे मुण्डनमाल गरे में भ्राज २ भस्म रमाये सब अंगन में खाये भंग धतूरा ईश ॥ कण्ठ हलाहल अतिसोहत है सोहैं श्वेतवरण जगदीश ३ नग्न अमंगल मंगलकारी हारी तीनि ताप वागीश ॥४

२ आल्हाखण्ड । ४२६ शिवा विहारी सब सुखकारी धारी सदा गंग को शीश ४ तिनके भुजबल बल ललितेको फलिते करैं याहि गौरीश ॥ कीरति सागर की गाथा को ललिते कहैं नायकर शीश ५ अथ कथाप्रसंग ॥ सवन सुहावन जब आवत भा तब सब चले विदेशी ज्वान ॥ कीन चढ़ाई पृथीराज ने जब मरिगये वीर मलखान १ कीरतिसागर मदनताल पर सब रँग ध्वजा रहे फहराय ॥ परा पिथौरा दिल्ली वाला आला रूप शील समुदाय २ हाल पायकै परिमालिक ने फाटक बन्द लीन करवाय ॥ बन्धन छूटैं ना गौवन के ना कउ त्रिया सेजपर जायँ ३ मारे डरके पिंडुरी काँपै मोहबा थहर थहर थर्राय ॥ बिना इकेले बघऊदन के फाटक कौन खुलावै आय ४ ऐसी बातें घर घर होवैं दर दर नारिकुण्ड अधिकाय ॥ मस्तक पीटैं कर अपने सों औ यह कथा रहीं तहँ गाय ५ होत बनाफर जो सिरसा का फाटक आज देत खुलवाय ॥ पवनी आई है मूड़ेपर लूटन अवा पिथौराराय ६ कुशल न देखें हम मुहबे मा संकट परा आज दिनआय ॥ बिना इकेले अब आल्हा के फाटक कौन खुलावै धाय ७ देवा सुलखे की मारुन मा ठहरत कौन यहांपर माय ॥ हाय गुसैयाँ की मरजी अस पवनी गई मूड़पर आय ८ कौन बचाई पृथीराज सों झंडा मदन ताल फहराय ॥ सात कोस के चौगिर्दा में तम्बू तम्बू परैं दिखाय ६ पति औ देवर भोजन करते घरमा कहैं हमारे माय ॥ तब तो बुढ़िया तिरिया बोली मन में श्रीगणेशको ध्याय १०

[Header] कीरतिसागरकामैदान । ४२७ ३

धीरज राखो अपने मनमा करिहै काह पिथौरा आय ॥ मनियादेवन की शरणागत जावो हाथ जोरि शिरनाय ११ त्यई सहायी सुखदायी अब फाटक तुरत देयँ खुलवाय ॥ घर घर सुमिरैं नरनारी सब साँचे देव परैं दिखराय १२ घट घट ब्यापी अरि परितापी जापी चले जायँ तिनधाम ॥ आला देवन में देवता हैं मनियादेव मोहोबे ग्राम १३ भा खलभल्ला औ हल्लाअति घर घर गई उदासीछाय ॥ टोला टोला में हल्लाभा लल्ला नहीं बनाफरराय १४ बिना इकेले बघऊदन के फाटक कौन खुलावै आय ॥ ऐसे घर घर पुरवासी सब दरदर कहैं नारिनर धाय १५ भा खलभल्ला रनिवासे माँ मोहबा गँसा पिथौराआय ॥ द्यवी शारदा त्यहि सगया मा मल्हना ध्यायरही शिरनाय १६ तुम्हरे बूते बघऊदन ने जीता देश देश सब जाय ॥ तुम लैआवो उदयसिंह को ईजति राखु शारदामाय १७ सदा सहायी तुम मायी हौ गायी तीनि लोक गुणगाथ ॥ मोहिं अनाथिनिकी मातातुम तुम्हरे चरण हमारो माथ १८ दैकेँ सुपना बघऊदन को माता लावो यहाँ बुलाय ॥ नितप्रति पूजा हम मोहबे मा चन्दन अक्षत फूल चढ़ाय १६ चढ़ा पिथौरा है सँभरा भर हमरे प्राण रहे घबड़ाय ॥ कऊ सहायी ना दुनिया माँ ईजति राखु शारदा माय २० बैठि कुशासन रानी मल्हना सारी दीन्ही रैनि गँवाय ॥ स्वपना देखा ताही निशिमाँ औ जगि परा बनाफरराय २१ हाल बतावा सब देवा का ठाकुर उदयसिंह समझाय ॥ इतना सुनिकैं देवा बोला साँची सुनो बनाफरराय २२