अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
[ १८ ] 'गोविंदचन्द्रेर गान' के अनुसार गोविंदचन्द्र का किसी दाक्षिणात्य राजा से युद्ध १०६३-१११२ ई० में हुआ था । इस पर यह अनुमान किया जा सकता है कि जालंधर का समय इससे सौ वर्ष पूर्व (लगभग ६६३ई०) रहा होगा । मत्स्येन्द्रनाथ का समय इससे भी पूर्व होना चाहिए । ( ६ ) वज्रयानी सिद्ध कह्नपा, जिन्होंने अपने गानों में जालंधरनाथ का नाम लिया है, तिब्बती परंपरा के अनुसार राजा देवपाल ( ८०६-८४६ ई० ) के समकालीन थे । अतः जालंधरपाद का समय इससे कुछ पूर्व ठहरता है । ( ७ ) चालुक्यराज मूलराज ( ६६३ ई० ) ने अणहिल्लपुर के शिवमंदिर का प्रबंधक कन्थड़ी नामक सिद्ध को बड़े छल-बल-कौशल से बनाया था । इस सिद्ध के सारे लक्षण नाथपंथी योगी के हैं, ऐसा प्रबंधचिंतामणि से पता चलता है । ऊपर के प्रमाणों के आधार पर नाथमार्ग के आद्य प्रवर्तकों का समय नवीं शताब्दी का मध्यभाग ही उचित जान पड़ता है ।३५ ऊपर के विवरण और विवेचन से यह निश्चत हो गया है कि मत्स्येन्द्रनाथ और गोरक्षनाथ का समय ६ वीं ई० शती के मध्य अथवा अन्त्य भाग में होना चाहिए । अभी तक जितने भी प्रमाणों का विचार लोगों ने किया है, उनमें उपर्युक्त विचार अपेक्षाकृत अधिक संगत और प्रामाणिक मालूम पड़ता है। डा० कल्याणी मल्लिक ने शताब्दी के अनुसार सामग्री का विभाजन कर यह निश्चय करने का प्रयत्न किया है कि गोरक्षनाथ का समय १२ वीं ई० श० के पूर्व किसी समय माना जा सकता है। उन्होंने कुछ प्रमाण ऐसे भी दिये हैं, जिनसे डा० द्विवेदी के मत की पुष्टि होती है । मालवराजकन्या मयनामती के पति माणिकचन्द्र के गीत रंगपुर के पाशुपत शैव गाते थे । वे लोग गोरक्षनाथ की गुरुरूप में पूजा करते थे । पैग-साम-जान-ज्वैन के अनुसार शंकरदिग्विजय के परवर्ती काल में मगध के, श्रीहर्ष के ज्येष्ठ पुत्र के राजत्वकाल में, बंगदेश में माणिकचन्द्र के पिता राज्य करते थे । शंकर का जन्मकाल ७८८ ई० है। गोरक्षनाथ ने नाथ संप्रदाय के दर्शन के साथ उपनिषद्दर्शन का सामंजस्य किया है। अतएव वे शंकर के बहुत परवर्ती नहीं हो ३५. नाथसिद्धों की वानियाँ—डा० हजारीप्रसाद द्विवेदी, भूमिका, पृ०-५-६ ।
[ १६ ] सकते । उनका दूसरा प्रमाण यह है कि आठवीं शताव्दी के प्रारंभ में हिन्दू-मुसलमानों में जो संघर्ष हुआ, उसमें गोरक्ष के शिष्य राजा रसालू ने विशिष्ट स्थान ग्रहण किया । रसालू और पूरन भगत दोनों ही गोरक्ष के शिष्य थे ।३६ अन्यत्र डा० कल्याणी मल्लिक ने यह स्वीकार किया है कि गोरक्षनाथ का समय दसवीं शताव्दी के बाद निश्चय होना चाहिए।३७ इस प्रकार गोरक्षनाथ के समय के सम्बन्ध में स्पष्टतः दो मत हैं । एक मत गोरक्षनाथ का जीवनकाल स्पष्टतः ईसा की नवीं शताव्दी का मध्यभाग मानता है और दूसरा मत उन्हें १० वीं से १२ वीं शताव्दी के मध्य किसी भी समय विद्यमान मानता है । दोनों मतों में पर्याप्त अन्तर है । डा० मल्लिक के कुछ प्रमाणों का उपयोग प्रथम मत की पुष्टि के लिए भी किया जा सकता है । सब देखने पर प्रथम मत ( ६ वीं ई० शताव्दी का मध्यभाग ) ही अधिक मान्य प्रतीत होता है । यद्यपि गोरक्षनाथ का समय अब प्रायः निश्चित हो गया है, लेकिन उनके नाम से मिलनेवाली सभी रचनाओं का कालनिर्णय अभी तक नहीं हो सका है । गोरक्षनाथ के नाम से संस्कृत, अपभ्रंश और हिन्दी तीनों भाषाओं में रचनाएँ मिलती हैं । ब्रिग्स ने गोरक्षनाथ के गोरक्षशतक को उनकी सबसे प्रामा- णिक रचना माना है। इसी गोरक्षशतक के बहुत से नाम मिलते हैं और इसी का संस्करण तथा परिवर्द्धन भी बहुत हुआ है । प्रथम शतक के गोरक्षकल्प, गोरक्षपद्धति, गोरक्षज्ञान, ज्ञानशतक, ज्ञानप्रकाशशतक आदि ऐसे ही नाम हैं । गोरक्षपद्धति की हिन्दी टीका में बहुत से ऐसे श्लोक भी मिलते हैं जो उसी रूप में हठयोगप्रदीपिका में भी मिलते हैं । गोरक्षशतक में दो शतक हैं । संपूर्ण ग्रंथ के गोरक्षशतक टीका, गोरक्षशतक टिप्पण, गोरक्षकल्प, ३६. नाथसंप्रदायेर इतिहास दर्शन ओ साधनाप्रणाली—डा० कल्याणी मल्लिक, पृ० ३४-३६ । ३७. सिद्धसिद्धान्तपद्धति ऐंड अदर वर्क्स आव नाथयोगीज—डा० कल्याणी मल्लिक, इंट्रोडक्शन, पृ० १० ।
[ २० ] गोरक्षपद्धति, योगसिद्धान्तपद्धति और सिद्धान्तपद्धति नामक अनेक नामान्तर और रूपान्तर हैं। गोरक्षपद्धति में इसे गोरक्षसंहिता भी कहा गया है। अतः व्रिग्स ने अनुमान लगाया है कि गोरक्षशतक इस संप्रदाय का मूलग्रन्थ है। इसे प्रमाण और परम्पराएं गोरक्ष- नाथकृत मानती हैं तथा इसे १२ वीं शताब्दी की रचना स्वीकार करती हैं। लेकिन गोरक्षसंहिता, जो आजकल अनुपलब्ध है और गोरक्षपद्धति का तुलनात्मक अध्ययन करने से यह बात साफ हो जाती है कि गोरक्षसंहिता अपेक्षाकृत अधिक प्राचीन है। गोरक्ष- पद्धति गोरक्षसंहिता के बहुत बाद का ग्रन्थ मालूम होता है। ऐसा मालूम होता है कि गोरक्षपद्धति का संग्राहक गोरक्षसंहिता और हठयोगप्रदीपिका दोनों को अपना आधार मानता है। गोरक्षपद्धति में गोरक्षसंहिता का उल्लेख कई बार हुआ है। अतः गोरक्षपद्धति एक स्वतन्त्र ग्रन्थ है। गोरक्षशतक के समान ही सिद्धसिद्धान्तपद्धति भी एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ के आधार पर आगे चलकर सिद्धसिद्धान्तसंग्रह और गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह जैसे ग्रन्थ बने बताये जाते हैं। इन ग्रन्थों में सिद्धसिद्धान्तपद्धति के उद्धरण भी मिलते हैं। अमरौधशासनम् और महार्थमंजरी ग्रन्थ भी गोरक्षकृत ही माने जाते हैं और विभिन्न दृष्टियों से महत्वपूर्ण हैं। शैवागमों से शैवनाथ मत का सम्बन्ध- निरूपण करने के लिए "अमरौघशासनम्" महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इस ग्रन्थ की रचनातिथि तथा लिपिकाल अज्ञात हैं। सांख्ययोग, काश्मीर शैवमत और तंत्रदर्शन के ३६ तत्वों के साथ सम्बन्ध-विचार के लिए महार्थमंजरी विचारणीय ग्रन्थ है। भाषा की दृष्टि से भी इसका महत्व कम नहीं है। कुछ लोग इसकी भाषा काश्मीरी अपभ्रंश मानते हैं। इन आधारों पर दार्शनिक, साधनात्मक तथा सांप्रदायिक धारा के विवेचन की दृष्टि से गोरक्षनाथ की ये चार रचनाएँ बहुत महत्वपूर्ण और प्रामाणिक मानी जा सकती हैं—(१) सिद्धसिद्धान्त- पद्धति, (२) महार्थमंजरी, (३) गोरक्षसंहिता, (४) अमरौध- शासनम्। डा० हजारी प्रसाद द्विवेदी ने सूचित किया है कि अमनस्क नामक ग्रन्थ की एक प्रति बड़ौदा लाइब्रेरी में है और गोरक्षसिद्धांत-
[ २१ ] संग्रह में बहुत से वचन उद्धृत हैं। ३८ लेकिन इसकी प्रति भी ढूंढ़े नहीं मिलती। अमनस्क ग्रन्थ तो अब प्रकाशित ही हो रहा है। द्विवेदी जी ने बताया है कि पं० प्रसन्नकुमार कविरत्न ने गोरक्ष- संहिता को १८६७ में छपाया था ! हमने एक दूसरा संस्करण काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के गायकवाड़ ग्रन्थालय में देखा, जिसकी टंकित प्रति मेरे पास सुरक्षित है। यह संस्करण श्री इन्द्र जी शर्मा द्वारा संवत् १६५० में प्रकाशित कराया गया था। इसका प्रकाशन स्थान काठियावाड़ का प्रभासपाटण स्थान है और मुद्रण स्थान अहमदाबाद है। यह संस्करण भी बहुत जीर्ण अवस्था में मुझे मिला। द्विवेदी जी ने आगे और बताया है कि इसकी एक प्रति नेपाल दर- बार लाइब्रेरी में भी है जिसका कुछ अंश डा० बागची ने कौलवलि- निर्णय की भूमिका में उद्धृत किया है। इसके बहुत से अंश मत्स्येन्द्र- नाथ के अकुलवीरतन्त्र में भी अविकल रूप में मिलते हैं। ३९ गोरक्ष संहिता भी बहुत महत्वपूर्ण ग्रंथ है और अब अप्राप्य है। अतः अमनस्क के बाद, उपर्युक्त सामग्री के आधार पर, इसका भी संपादन- प्रकाशन होना चाहिए। गोरक्षनाथ की हिन्दी रचनाएं भी अब पर्याप्त मात्रा में प्रका- शित हो चुकी हैं। सबसे पहले डा० पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल ने हस्त- लिखित पोथियों के आधार पर 'गोरखबानी' का प्रकाशन कराया जिसमें प्रमुख तेरह रचनाओं में सबदी अंश को सबसे अधिक प्रामा- णिक माना गया है। इनके अतिरिक्त १४ रचनाएं और संपादित हैं। डा० बड़थ्वाल द्वारा संग्रहीत नाथसिद्धों की बानियों का दूसरा भाग बहुत बाद में पर्याप्त नयी सामग्री के साथ डा० हजारीप्रसाद द्विवेदी ने प्रकाशित कराया। इसके पूर्व ही डा० कल्याणी मलिक ने सिद्धसिद्धान्तपद्धति और अन्य नाथयोगियों की रचनाओं के साथ गोरक्षनाथ के नाम से प्रसिद्ध 'गोरख उपनिषद्' नाम की रचना प्रकाशित की। कुछ लोग गोरक्षनाथ को हिन्दी का प्रथम गद्यलेखक मानते हैं। भाषा की दृष्टि से भी गोरक्षनाथ की रचनाएं बहुत ३८. नाथ संप्रदाय — डा० हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृ० ६८ । ३६. वही पृ० ६६-१००
[ २२ ] महत्वपूर्ण मानी जाती हैं, यद्यपि उनकी भाषा बहुत बदल गयी है।४० गोरक्षनाथ के दर्शन के मूल आधार ग्रंथ संस्कृत में हैं। ऊपर जिन संस्कृत रचनाओं की ओर संकेत किया गया है, उनमें गोरक्ष- दर्शन का तत्त्वविज्ञान बहुत ही पुष्ट रूप में प्रकाशित हुआ है। अन्य बहुत से भारतीय दर्शनों की तरह ही गोरक्ष-दर्शन के तत्व- विज्ञान का मूलाधार सांख्य का तत्वविज्ञान है। सिद्धसिद्धान्त- पद्धति में काश्मीर शैव दर्शन के ३६ तत्वों का पूरा समाहार प्रतीत होता है। वस्तुतः इस तत्त्वविज्ञान का मुख्य लक्ष्य नाथों का 'पिण्ड- ब्रह्माण्डवाद' है। पिण्ड और ब्रह्माण्ड की समतत्वता और सम- पदार्थता सिद्ध करने के लिए दार्शनिक आधार के रूप में इस तत्त्व- विज्ञान का विकास किया गया है, ऐसा प्रतीत होता है। डा० हजारीप्रसाद द्विवेदी, डा० कल्याणी मल्लिक आदि ने इस तत्त्व- विज्ञान का विस्तार से विवेचन किया है। प्रलयावस्था में शिव कार्य-कारण के चक्र-संचालन से विरत, कुल अकुल-भेद से परे और अव्यक्त रहते हैं। इस अवस्था को सिद्धसिद्धां- तपद्धति में 'स्वयं' कहा गया है।४१ इस परम शिव में सिसृक्षा उत्पन्न होने पर उन्हें सगुण शिव कहा जाता है। यह सिसृक्षा ही शक्ति है जिसके उत्पन्न होते ही शिव और शक्ति दो तत्व हो जाते हैं जो इस स्थिति में अभिन्न रहते हैं। इसके बाद इन दोनों तत्वों का पांच अवस्थाओं में विकास होता है, जो संक्षेप में इस प्रकार है- शिव शक्ति १-अपर : १--निजा (स्फुरित होने की पूर्ववर्तिनी, स्फुरित होने को उपक्रान्त) ४०. विस्तार के लिए देखिए, (१) नाथ संप्रदाय पृ० ६८-१०२, (२) नाथ संप्रदायेर इतिहास, दर्शन ओ साधनाप्रणाली, पृ० १२१-१५०, (३) नाथ सिद्धों की बानियां डा० हजारीप्रसाद द्विवेदी, (४) सिद्धसिद्धान्तपद्धति ऐंड अदर वर्क्स-डा० कल्याणी मल्लिक, (५) नाथ और संत साहित्य : तुलनात्मक अध्ययन-डा० ना० उपाध्याय, पृ० २७-३४। ४१. कार्यकारणकर्तृत्वं यदा नास्ति कुलाकुलम् । अव्यक्तं परमं तत्वं स्वयं नाम तदा भवेत् ॥ १-४ । सिद्धसिद्धान्तसंग्रह, रचयिता : बलभद्र, पृ० १ ।
[ २३ ] २—परम : २—परा ( स्फुरणोन्मुख ) • ३—शून्य : ३—अपरा ( स्पंदित होती है ) ४—निरंजन : ४—सूक्ष्मा अहंता। 'मैं'-पन का पृथक्ता का भाव। ५--परमात्म४२—इस अवस्था : ५-कुण्डली ।४३-( अपनी पृथक्ता में में शिव विश्वप्रपंच की में पूर्ण सचेत, इसी शक्ति की सहा- उत्पत्ति, पालन और यता से शिव इस विश्वप्रपंच की संहार में समर्थ होते हैं । उत्पत्ति, पालन और संहार में समर्थ होते हैं ) । [' • यह कुण्डली वेदान्तिक ब्रह्म की शक्ति 'माया' से भिन्न है । यह चिच्छक्ति चिच्छीला, चिद्रूपिणी, अनन्तरूपा और अनन्त शक्तिरूपा है। जगत् इसी शक्ति का परिणाम है और यही शक्ति जगत्-रूप में परिणत होती है। इसे वेदनशीला भी कहा गया है और इसके अन्य शक्तियों के समान ही पांच गुणपूर्णता, प्रतिबिम्बता, प्रबलता, प्रोच्च- लता, प्रत्यङ्मुखता बताये गये हैं।४४ इसके बाद यह शक्ति सृष्टि- क्रम को अग्रसर करने के लिए क्रमशः स्थूलता की ओर अग्रसर होती है। शिव और शक्ति के बाद तीन परवर्ती क्रमविकास हैं—३ सदा- शिव, अहंप्रधान, ४. ईश्वर इदंप्रधान, ५. शुद्धविद्या-उभयप्रधान ।४५ शिव क्रमशः उपर्युक्त पांच अवस्थाओं ( आनन्दों ) से होते हुए 'जीव' रूप की ओर अग्रसर होते हैं। वे क्रमशः स्थूल से स्थूलतर ४२-४३. ततोऽस्मिता पूर्वमर्चिमात्रं स्यादपरं परम् । तत्स्वसंवेदनाभास द्युत्पन्नं परमं पदम् । स्वेच्छोमात्रं ततः शून्यं सत्तामात्रं निरञ्जनम् । तस्मात्ततः स्वसाक्षाद्भूः परमात्मपदं मतम् ।' सि० सि० सं०, पृ० २, उप० १, श्लो० १४-१५ । ४४ नाथ संप्रदाय—पृ० १०४, सिद्धसिद्धान्तसंग्रह—'चिच्छीला कुण्डलिभ्यतः'— १.६, सिद्धिसिद्धान्तपद्धति—'ततो वेदनशीला कुण्डलिनी शक्तिरुद्रता ।'— १-७, पूर्णता, प्रतिबिम्बता, प्रबलता, प्रोच्चलता, प्रत्यङ्मुखता इति पंचगुणा कुण्डलिनी शक्तिः ॥'—१-१२ ॥ ४५. नाथ संप्रदाय—पृ० १०५ तथा पादटिप्पणी ।
[ २४ ] होते जाते हैं। इसी प्रकार गोरक्ष के तत्त्वविज्ञान के अनुसार तत्त्व- विकास (सृष्टिप्रक्रिया) में क्रमशः निम्नलिखित ३६ तत्त्व उत्पन्न होते हैं—उपर्युक्त ५ और ६—माया, ७-११ पंचकंचुक, १२. पुरुष, १३. प्रकृति, १४. महत्, १५. अहंकार, १६-२० पंचतन्मात्र, २१-३१ एकादश इन्द्रिय, ३२-३६ पंचभूत।४६ वस्तुतः यह सारा विकास सिद्धसिद्धान्तपद्धति में 'पिण्डोत्पत्ति' के प्रकरण में वर्णित है। अतः इस सारे विकास को पिण्डोत्पत्ति के अनुसार विभाजित किया गया है। १. परपिण्ड (तत्त्व १-२), २. आद्यपिण्ड (तत्त्व ३-५), ३. साकार पिण्ड (तत्त्व ६-१३), ४. प्राकृत पिण्ड (तत्त्व १४-२०), ५. अवलोकन पिण्ड (तत्त्व २१- ३१), ६. गर्भ पिण्ड (तत्त्व ३२-३६)। गर्भपिण्ड स्थूलतम पिण्ड है और सृष्टिप्रक्रिया में अंतिम स्थूलतम विकास है।४७ स्पष्ट है कि ऊपर की प्रक्रिया ब्रह्माण्ड और पिण्ड की समतुल्य विकास प्रक्रिया है। भेद केवल सत्त्व, रज, तम, काल और प्राणशक्ति की न्यूनता और अधिकता के कारण है। यहां तक कि प्रत्येक पर- माणु तक में उन सभी तत्त्वों की सत्ता स्वीकृत है। पिण्ड मानो ब्रह्माण्ड का संक्षिप्त संस्करण है।४८ इस प्रकार परशिव (स्वयं) की अवस्था ही परम अवस्था है। नाथमार्ग को कुछ विद्वान् अद्वैतवादी मानते हैं। लेकिन शांकर अद्वैतवाद से स्पष्ट भेद है। काश्मीर शैवाद्वैत दर्शन से इसका स्पष्ट नैकट्य है। सामरस्य, शक्तिकल्पना, परमशिव, सगुण शिव, जगत् का अमिथ्यात्व, परम शिव की इच्छाशक्ति और उसका विकास, पिण्डब्रह्माण्डवाद आदि विचार और सिद्धान्त ऐसे ही हैं। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि नाथ सिद्धाचार्य अपना भेद स्थिर करने के लिए सिद्धान्त की दृष्टि से अपने को द्वैताद्वैतविलक्षणवादी ४६. वही—पृ० १०६। ४७. वही -- पृ० १०७-१०८। ४८. वही- पृ० ११०, सिद्धसिद्धान्तसंग्रह-पृ० १८ 'ब्रह्माण्डवर्ति यत्किंचित्- पिण्डेऽप्यस्ति सर्वथा।"
कहते हैं, क्योंकि नाथतत्व द्वैत और अद्वैत दोनों से परे है। वह निरुपाधि है और संख्या उपाधि है। वह अवाच्य पद है। जगत् का प्रपंच शक्ति के स्फोट के बाद शुरू होता है। इसलिए शक्ति ही जगत्कर्त्री है, शिव नहीं। इस संप्रदाय में ब्रह्म या शिव की शक्ति को चित्स्वभावा माना गया है और वेदान्तियों में जड़स्वभावा। इसीलिए नाथदर्शन में जगत् चिच्छक्ति का विकास है। धर्मी शिव और धर्म शक्ति को केवल व्यवहारानुरोध से भिन्न मान लिया गया है। चित् ब्रह्म की शक्ति भी चिद्रूपा ही होनी चाहिए। शिव का स्वरूपनिर्धारण अशक्य होने से अभिन्न-भिन्नरूपा शक्ति ही उपास्य हो सकती है। नाथयोगी साधक का लक्ष्य है, शिव और शक्ति का सामरस्यरूप सहज समाधि ' इस प्रकार की शक्ति की उपासना अन्ततः शिवोपासना ही है। व्यवहारानुरोध से ही शक्ति की उपा- सना कही जाती है। डा० कल्याणी मल्लिक ने बताया है कि गोरक्ष का दर्शन प्राचीन- काल के शैवमत के अद्वैतवाद पर आधृत है। किन्तु उनका नाथ तत्व द्वैत-अद्वैत, साकार-निराकार से अतीत है। शिव शुद्ध चिद्रूप हैं और शक्ति उसका 'परिवर्तन और विकास का पक्ष है। नाथ लोग जगत्प्रपंच के अद्वितीय परम कारण को शिव या आदिनाथ के नाम से अभिहित करते हैं। वे स्वरूपतः अनादि, अनन्त, स्वयंसिद्ध, स्वप्रकाश, नित्य तत्त्व, देशकालातीत, सर्व- अवच्छेदहीन और सकल भेद-बाधाशून्य है। वह सर्वथा निरपेक्ष सत्ता है। वे स्वयं निष्कारण और समस्त चराचर के एकमात्र कारण हैं। यह कारणता ही उनकी शक्ति है। इस शक्ति के साथ वे नित्य- युक्त रहते हैं। शिवशक्तिसम्बन्ध के विषय में नाथगण कहते हैं- शिवस्याभ्यन्तरे शक्तिः शक्तेरभ्यन्तरे शिवः। अन्तरं नैव पश्यामि चन्द्रचन्द्रिकयोरिव ॥४६ ४६. सिद्धसिद्धातपद्धति ऐंड अदर वर्क्स-भूमिका, पृ० १६, नाथ संप्रदायेर इतिहास०-पृ० २२८; सिद्धसिद्धान्तसंग्रह--पृ० २६-२७, ४.३७; सिद्ध- सिद्धांतपद्धति--४.२६ ।
[ २६ ] एकही अद्वितीय परमतत्त्व दृष्टिभेद से शिव या शक्ति आख्या को प्राप्त करता है । शिव शक्तिरूप होकर सर्वाकारों में स्फुरित होते हैं। दोनों ही अन्योन्याश्रयभूत हैं । धर्म के बिना धर्मी अकल्पनीय है । इस प्रकार दोनों तत्त्वतः अभिन्न हैं-- प्रसरं भासते शक्तिः संकोचं भासते शिवः । तयोः संयोगकर्त्ता यः स भवेद्योगयोगराट् ॥५० इस प्रसार और संकोच का जो आदि और अन्त है, वही साम्यावस्था है और वही निराभास है, वही शिवावस्था है। जब यह साम्य भंग होता है, अर्थात् शक्ति के स्फुरण या प्रसर में स्तरानुसार विश्व का आविर्भाव होता है, तब शक्ति परिणाम लाभ करती है या जगत् आभासित होता है। शक्ति की संकोचन क्रिया के अवसान- काल तक जगत् क्रमशः स्थूल-सूक्ष्म-भेद से आभासित होता है। अतएव जगत् का आभास ही शक्तिभाव और निराभास ही शिव- भाव है। शिव एकरस और अपरिणामी हैं। शक्ति का तिरोभाव ही जगत् का लय है। फिर भी शिव और शक्ति सूर्य और सूर्यकिरण के समान अभिन्न हैं। अतएव शक्ति की साधना से शिवकी उपलब्धि होती है। शक्तिउपासना साधन है और शिवत्वलाभ उसका फल । विमर्श ही शिवकी शक्ति है। इस प्रकार नाथसिद्ध सगुण-सक्रिय, अर्थात् विचित्र ब्रह्माण्डरूपी शिव और निर्गुण, निष्क्रिय शिव नामक ये दो तत्त्व स्वीकार करते हैं। सगुण-निर्गुण, सक्रिय-निष्क्रिय की मिलनभूमि को ही वे नाथस्वरूप कहते हैं।५१ परब्रह्म के स्वरूप के सम्बन्ध में नाथसिद्धान्त यह है कि ईश्वर में क्रिया और अक्रिया, दोनों प्रकार की शक्तियाँ विद्यमान हैं। पूर्णब्रह्म सक्रिय अथवा निष्क्रिय नहीं है। नाथ और निर्गुण ब्रह्म में भेद है। नाथस्वरूप निर्गुण-सगुण दोनों से अतीत है। नाथ लोग सभी देवताओं से शिवको उत्तम मानते हैं और शिव से भी उत्तम नाथ को। गोरखसिद्धान्तसंग्रह का कथन है कि गोरख के अनुसार ५०. नाथ सम्प्रदायेर इतिहास०-पृ० २२८-२२६, सिद्धसिद्धान्तसंग्रह-पृ० ३६-३७, ६.६ । ५१. नाथ सम्प्रदायेर इतिहास०--पृ० २३०-२३१ ।
[ २७ ] विश्वकर्तृत्व नाथ का नहीं है, शिव का है। शिव ही विश्वकर्ता हैं और नाथ निर्गुण निरुपाधिरूप हैं। अतः उनके लिए प्राकृतिक कार्य-कारण का कोई माहात्म्य नहीं है। विश्व के सृष्टिकर्ता सगुण सोपाधि शिव हैं। ५२ सिद्धमत में परमतत्त्व को द्वैताद्वैतविवर्जित कहा गया है। यही सिद्धमत का वैशिष्ट्य है। यह विवर्जितत्व ही पूर्ण सत्य है। निर्गुण ब्रह्म और सिद्धों के नाथ में भेद-प्रभेद यह है कि नाथ अद्वैतोपरि और निराकार-साकारातीत हैं। इसी नाथ से निराकार ज्योतिर्नाथ और साकार नाथ का जन्म होता है। साकार नाथ से सदाशिव, भैरव और उनकी शक्ति भैरवी का जन्म होता है। नाथ सर्वविलक्षण अर्थात् 'यादृश एव तादृश एव' हैं। उनकी कोई तुलना नहीं। वे ही महासिद्धों के लक्ष्य हैं। ५३ नाथदर्शन के अनुसार जीवन्मुक्ति की ही अवस्था आदर्श अवस्था है। देहपात में जो मुक्ति होती है, उसे यथार्थ मुक्ति नहीं कहा गया है। कारण यह है कि यह मुक्ति देहपातरूप प्रतिबन्धक द्वारा बाधित है। नाथ गण कहते हैं कि जिस देह से परमपदप्राप्ति होती है, उसी देह की रक्षा, अजर-अमर करना कर्तव्य है। विदेह-मुक्ति में इस देह का ही त्याग हो जाता है। 'योगबीज' में कहा गया है- "अजरामरपिण्डो यो जीवन्मुक्तः स एव हि।" जीवन्मुक्तियोग में दैहिक परिवर्तन साधित होता है। इस सिद्ध- देह का लाभ होने पर योगी के लिए इच्छामृत्युवरण संभव हो जाता है। वेदान्त का आत्मसाक्षात्कार नाथमार्ग की परमपद प्राप्ति है, किन्तु साथ ही नाथ लोग उस देह को ही स्थायी करने के लिए सचेष्ट हैं। योग से सिद्धयोगी प्रारब्ध का क्षय करता है। तत्पश्चात् देह को रखे या न रखे, यह उसकी इच्छा पर निर्भर है। सिद्धमत में देह ही आत्मा है। विक्षेप के दूर न होने पर शुद्ध देहलाभ नहीं होता। शक्तियुक्त चैतन्य को सिद्ध लोग स्वीकार करते हैं। उसको जीतकर विशेष रूप से अज्ञान को दूर कर मुक्तिलाभ होता है। योगी चैतन्यशक्ति का जय करके कालजयी होता है। योगी का शरीर ही योगदेह है। सिद्धमत है कि जो मृत्यु को प्राप्त करता है, वह मुक्त ५२. वही-पृ० २५४-२५६ ।
[ २८ ] नहीं है। परामुक्त का देहपात नहीं होता ।⁵⁴ नाथमत में मोक्ष वह अवस्था मानी गयी है जिसमें समाधि के क्रम से मन द्वारा मन का अवलोकन किया जाता है। इसी को जीवन्मुक्ति पद कहा गया है ।⁵⁵ नाथयोगी का लक्ष्य होता है ऐसे शरीर की प्राप्ति जिसका पतन न हो, जिसके बाहर प्राण न जाता हो। इनका लक्ष्य वह अवस्था है जिसमें शरीर भी ब्रह्मत्व को प्राप्त करता है। शरीर चिन्मय हो जाता है और फिर अनन्यता की प्राप्ति होती है। यह पिंडसिद्धि परमपद की प्राप्ति का अनिवार्य सोपान है। इस प्रकार संक्षेप में नाथों का लक्ष्य है जीवन्मुक्तियुक्त सिद्ध देह से नाथरूप में अवस्थान या पिंडपद का परमपद में समरसीकरण ।⁵⁶ महामहो- पाध्याय पंडित गोपीनाथ कविराज ने नाथों के जीवन्मुक्तिक्रम का इस प्रकार व्याख्यान किया है—“इस मत के अनुसार सद्गुरु की कृपा से चित्तविश्रांतिलाभ सबसे पहले होना चाहिए, क्योंकि बिना उसके सामरस्यप्राप्ति नहीं हो सकती। जबतक चित्त देहात्मबोध मूलक क्षोभ से मुक्त न हो, तब तक इसमें शांति नहीं होती और यथार्थ साधना का प्रारंभ नहीं होता। चित्त-विश्रांति से स्वभावतः भगवदानंद और अनंत ज्योतियों का आविर्भाव होता है। इस अद्वय प्रकाश से द्वैत भाव निवृत्त हो जाता है। इसके बाद चित् शक्ति का प्रकाश होता है और योगी निज देह के पूर्णज्ञान को प्राप्त करता है। इसका फल है देह सिद्धि या पिंडसिद्धि। इसका नामान्तर है देह का अमरत्व । इसे नामान्तर से सिद्ध अवस्था कह सकते हैं। परन्तु अभी भी जो यथार्थ अंतिम लक्ष्य है, वह दूर है। इस समय योगी की देह ज्योतिर्मय आकार को लेकर प्रकाशमान होती है। यह चैतन्य की सारभूत सत्ता है। परमपद के नित्य सिद्ध प्रकाश के साथ इस प्रकाशमय आकार का एकत्वसंपादन ˙˙˙ सुदीर्घकाल तक आत्मा के स्वरूपानुसंधान में तल्लीन रहने से हो सकता है। यही ५३. नाथ संप्रदायेर इतिहास०-पृ० २६६, २७१ । ५४. वही—पृ०२६२, २६३, २६६-२६७, ३०१, ३०३ । ५५. अमरौघशासनम्—पृ० ६ । ५६. नाथ और संत साहित्य : तुलनात्मक अध्ययन-डा० ना० उपाध्याय, पृ० २७३ ।
[ २६ ]
सामरस्य है । ' ' ' सामरस्य और निरुत्थान दशा, दोनों के अंतराल में कुछ अवस्थाओं का पता चलता है । पूर्ण स्वातन्त्र्य से समन्वित आत्मा का स्फुरण निरुत्थान दशा के नाम से प्रसिद्ध है । ' ' ' नाथयो- गियों का लक्ष्य यह है कि पहले पिंडसिद्धि के द्वारा जीवन्मुक्ति की प्राप्ति हो । इस समय में कालवंचन सिद्ध होता है । अर्थात् काल के प्रभाव से योगी मुक्त हो जाता है । इसके अनन्तर समरसीकरण के द्वारा परा मुक्ति की सिद्धि होती है । प्रकारान्तर से कहा जा सकता है कि पिंडसिद्धि या जीवन्मुक्ति के अनन्तर ओंकार साधना के द्वारा परामुक्ति का आविर्भाव होता है ।५७ ऊपर बतायेगये नाथों के लक्ष्य से यह बात स्पष्ट हो गयी कि नाथों के दो लक्ष्य हैं—प्रथम गौण और द्वितीय मुख्य । गौण लक्ष्य है पिण्डसिद्धियुक्त जीवन्मुक्ति और मुख्य लक्ष्य है पिण्डपद का परमपद में समरसीकरण । यदि पहले की दार्शनिक तत्त्वज्ञानात्मक विचारणा को ध्यान में रखा जाय तो यह दूसरा लक्ष्य पूर्णतया स्पष्ट हो जायगा । इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए नाथसंप्रदाय में विशेषकर गोरक्षनाथ के ग्रंथों में साधनाक्रम का पूर्ण प्रकाशित रूप मिलता है । गोरक्ष के साधनमार्ग में 'गुरु' को बहुत महत्व दिया गया है । परमपद में समरसीकरण, जो नाथों का चरम लक्ष्य है, गुरु की कृपा से ही होता है । गुरुचरणों में रत रहने से स्वसंवेद्य परमपद की सिद्धि सम्भव बतलायी गयी है । केवल इसी साधन से योगियों को पिण्ड के निरुत्थान का अनुभव होता है तथा उसके पश्चात् समरसीकरण की सिद्धि होती है ।५८ सिद्धसिद्धान्तपद्धति में कहा गया है कि सिद्धपुरुष अदैहिक साधनों का आश्रयण कर परमपद को प्राप्त करते हैं और इन साधनों में स्थिति गुरु के दृक्पात से होती है । इसलिए गुरु से बड़ा कोई नहीं है । वह अपनी करुणा के खड्गपात से पशु (साधक) के आठों प्रकार के पाशों का छेदन
५७. वही—प्राक्कथन—म० म० डा० गोपीनाथ कविराज, पृ० ५-६ । ५८. नाथ और सन्त-साहित्य : तुलनात्मक अध्ययन—डा० ना० उपाध्याय, पृ० २६७; सि० सि० प० अ० ना० यो० : सम्पादक—डा० कल्याणी मल्लिक, सिद्धसिद्धान्तपद्धति, ५.१-१२ । ५
[ ३० ] करता है। उसकी इस प्रकार की क्रिया से साधक सम्यक् आनन्द में मग्न हो जाता है। उसकी यह कृपा विश्रांतिकारक होती है। बिना स्वात्मगत विश्रांति के पिंडपद का परमपद में समरसीकरण नहीं हो सकता। शास्त्र, अनुमान, तर्क आदि से भ्रांत करनेवाला गुरु गुरु नहीं। उपर्युक्त गुण-धर्मों से समलंकृत गुरु को प्राप्त कर शिष्य जन्म और संसार-बंधन से मुक्त हो जाता तथा परानन्दमय होकर निष्कल शिवत्व की उपलब्धि करता है।५९ प्रकृति के सभी विकारों का अवधूनन करनेवाला सिद्ध ही, अवधूत योगी ही सद्गुरु का पद प्राप्त कर सकता है। सिद्धसिद्धान्तपद्धति में सिद्ध योगी अवधूत को अत्याश्रमी, योगी, सिद्धयोगी, जितेन्द्रिय आदि कहा गया है।६० गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह में षोडशनित्यातन्त्र का उद्धरण देकर गुरु रूप में शिव को नमस्कार किया गया है। गुरु की ही कृपा से स्वल्प कल्प मात्र से सहज सिद्धि प्राप्त होती है। इस गुरु को ३६ लक्षणों से सम्पन्न होना चाहिए। अधिक तत्वों से गुरु कहा जाता है। गुरु से शिष्य के ४ लक्षण कम होते हैं अर्थात् उसमें ३२ लक्षण आवश्यक माने गये हैं। इनसे कम लक्षणों से युक्त सिद्ध व्यक्ति को गुरु रूप में स्वीकार नहीं करना चाहिए। ३२ से कम लक्षणों से युक्त व्यक्ति को शिष्य भी नहीं बनाना चाहिए। इन ३२ लक्षणों के लिए आठ परीक्षाएं स्वीकार की गयी हैं। गोरक्ष- सिद्धान्तसंग्रह में वर्णित ये लक्षण अवधूत-सम्प्रदाय के अनुसार बताये गये हैं।६१ संक्षेप में हम इसे 'गोरक्षनाथ का गुरु-शिष्यवाद और अधिकार-भेदवाद' कह सकते हैं। नाथ मार्ग का परमपद 'नाथ' है। गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहकार ने 'नाथस्वरूपेणावस्थानम्' को ही लक्ष्य के रूप में स्वीकार किया है। नाथ के सम्बन्ध में पहले ही कहा गया है कि प्रसार और संकोच का जो आदि अन्त है, वही साम्यावस्था है, वही निराभास है, वही शिवावस्था है। यह समरसावस्था ही अद्वयावस्था है और यही समाधि ५९. सि० सि० ग्र० व० ना० यो० में सिद्धसिद्धान्तपद्धति, ५.५४-८१ । ६०. वही, सिद्धसिद्धान्तपद्धति : सम्पूर्ण षष्ठ उपदेश । ६१. गो० सि० सं०, पृ० ३१-३२, ४५, ४६, १४, ४०, ५६-५७ । नाथ और सन्त साहित्य : पृ० २६८-७० ।
२. द्वितीय अध्याय: अमनस्क राजयोग, मनोलय प्रक्रिया एवं नाद-लय
[ ३१ ] की स्थिति है। इस प्रकार समरस और अद्वय रूप से अवस्थान ही नाथस्वरूप से अवस्थान है।६२. इस समरसीकरण के लिए, गुरुकृपा से पिण्डसंवित्ति के लिए शुद्ध या दिव्यदेह की आवश्यकता है। बिना गुरु-कृपा और शुद्ध देह के इस लक्ष्य की सिद्धि नहीं हो सकती। इसी- लिए गोरक्ष के साधनमार्ग में यह कायसिद्धि आवश्यक मानी गयी है, जिसका लक्ष्य समरसीकरण है।६३ नाथमतानुसार मोक्ष वह अवस्था है, जिसमें समाधि के क्रम से मन द्वारा मन का अवलोकन किया जाता है। इसी को आगे जीवन्मुक्ति पद कहा गया है।६४ इसी प्रकार इस जीवन्मुक्ति के लिए कायसिद्धि और कायसिद्धि के लिए पिण्डज्ञान आवश्यक है। सिद्धसिद्धान्तपद्धति के अनुसार योगी को पिण्डगत नवचक्र, षोडशाधार, तीन लक्ष्य, पंचव्योम अवश्य जानना चाहिए। अन्यत्र गोरक्ष ने कहा है कि जो योगी पिण्डगत एक स्तम्भ, नव द्वार, पंचदेवता आदि को नहीं जानता, वह सिद्धि नहीं प्राप्त कर सकता। तत्त्वविज्ञान की दृष्टि से ब्रह्माण्ड का जो समतुल्य और विकासात्मक वर्णन प्रस्तुत किया गया है, उसका यही प्रयोजन है। उपर्युक्त समरसीकरण के लिए 'योगबीज' योगरहित ज्ञान और ज्ञानरहित योग की निरर्थकता बतलाते हुए योगयुक्त ज्ञान को ही मोक्षोपाय के रूप में स्वीकार करता है।६५ उपर्युक्त विवेचन से मिलान करने पर संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि पिण्डसिद्धि परमपद की प्राप्ति का अनिवार्य सोपान है। अर्थात् नाथों का लक्ष्य जीवन्मुक्तियुक्त सिद्धदेह से नाथरूप से अवस्थान या पिण्डपद का परमपद में समरसीकरण है।६६ ६२. सि० सि० ग्र० व० ना० यो०-इंट्रो०, पृ० २१। ६३. नाथ और सन्त साहित्य—पृ० २७०-२७१। ६४. अमरौघशासनम् : पृ० ६। ६५. सि० सि० प०-२.३१। गोरक्ष संहिता-१.१३-१४। गोरक्षपद्धति- १.१३-१४। ६६. नाथ और संतसाहित्य (तु० ग्र०) पृ० २७२-२७३। योगबीजम्- श्लो० १५-१६।
[ ३२ ] परिपक्व देह या सिद्धदेह की प्राप्ति के लिए योग ही उपाय है। नाथयोगी हठयोग को प्रधान मानते हैं। हठयोग से राजयोग की सिद्धि होती है। हठयोग प्राणायामप्रधान है। मन्त्रयोग, लययोग और राजयोग में भी प्राणायाम और हठयोग सहायक है। प्राण अधिभूत तत्त्व है। अतः इस दृष्टि से प्राणायाम या हठयोग आधि- भौतिक साधन है। एक सफल ध्यानयोगी शरीर और स्वास्थ्य से क्षीण, दुर्बल अल्पायु और रोगी हो सकता है किंतु वह अपनी इच्छा से शरीर त्याग नहीं कर सकता। हठयोग की क्रियाओं से सिद्धदेह या परिपक्व देह की प्राप्ति होती है। मानस साधन के लिए ऐसा शरीर सर्वाधिक उपयुक्त और उचित माध्यम हो सकता है। ऐसे योगी की मृत्यु इच्छा-मृत्यु होती है। गोरक्षनाथादि ने हठयोग या उससे प्राप्त सिद्धियों को भी लक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया। ६७ हठयोगप्रदीपिका में स्पष्टतः कहा गया है कि राजयोग में आरूढ़ होने के लिए हठयोगविद्या का अभ्यास करना चाहिए। ६८ इस योगाभ्यास के आरम्भ के लिए नाथाचार्यों ने संयम का विधान किया है। घेरण्डसंहिता की तरह ही स्वात्मारामरचित हठयोगप्रदीपिका में भी हठयोग का अभ्यास आरम्भ करने के पूर्व आहार, अपथ्य, पथ्य, भोजन आदि से सम्बद्ध संयमों के पालन का उपदेश किया गया है। योगाभ्यास के प्रतिबन्धकों के विवरण में अत्याहार, परिश्रम, प्रजल्पन ( या बहुभाषण ), यमग्रहण ( स्नान, रात्रि में ही भोजनग्रहण, फलाहारादि का नियम ग्रहण ) जनसंगम, चंचलता इन छः की गणना की गयी है। योगसाधकों में उत्साह, साहस, धैर्य, तत्वज्ञान, निश्चय, जगत्संगपरित्याग इन छः की गणना की गयी है। बताया गया है कि यम में मिताहार मुख्य है तथा नियम में अहिंसा । ६९ हठयोगप्रदीपिका के यमनियमसम्बन्धी श्लोक मूल श्लोकों में अन्तर्गणित नहीं हैं। वे ही श्लोक थोड़े-से अन्तर से तांत्रिक ग्रन्थ 'शारदातिलक' में मिलते हैं। ६७. नाथयोग : अक्षयकुमार बनर्जी, पृ० १६ । ६८. हठयोगप्रदीपिका १.१ । ६९. हठयोगप्रदीपिका—१.५७-६३, १.१५, १६, १.३८, ४० । विस्तार के लिए द्रष्टव्य—नाथ और सन्त साहित्य , पृ० २७५-२७७ ।
[ ३३ ] हठयोग शब्द की विभिन्न व्याख्याएँ मिलती हैं, जो इस प्रकार हैं : ह + ठ + योग = सूर्य + चन्द्र + योग ह + ठ + योग = प्राण + अपान + योग ह + ठ + योग = दक्षिण + वाम + योग ह + ठ + योग = यमुना + गंगा + योग ह + ठ + योग = पिंगला + इड़ा + योग ह + ठ + योग = रजस् + रेतस् + योग ।७० गोरक्षनाथ का योग षडंग है । अर्थात् इसमें आसन के बाद के पंतजलि के ६ अंग स्वीकृत हैं । यम-नियम को सामान्यतया अनि- वार्य समझकर छोड़ दिया है । आसनस्थैर्य के बाद प्राणायाम के अभ्यास का विधान है । इस प्राणायाम का नाड़ीशोधन से घनिष्ठ सम्बन्ध है । सिद्धसिद्धान्तपद्धति के अनुसार प्राणायाम प्राण की स्थिरता है। रेचक, पूरक, कुम्भक और संघट्टीकरण इसके चार लक्षण हैं।७१ बताया गया है कि प्राणायाम के अभ्यास से यदि पवन को गगन में प्रेरित किया जाय तो घंटा वाद्यादिकों की ध्वनियां उत्पन्न होती हैं तथा सिद्धि की प्राप्ति की सम्भावना होती है ।७२ इस प्रकार प्राणायामाभ्यास में अग्रसर होने पर उसका संबंध नादानुसंधान से भी सिद्ध होता है । इस प्रकार आसन और प्राणायाम के पूर्णाभ्यास से सम्पन्न होकर धारणा का अभ्यास करने का विधान किया गया है ।७३ गोरक्षसंहिता, योगबीज आदि ग्रन्थों में प्राणायाम के साथ मुद्रा, बन्ध, वेध का भी वर्णन सम्बद्ध भाव से वर्णित है । किन्तु ऐसा मालूम होता है कि प्राणायाम की तुलना में इन्हें अधिक महत्व नहीं दिया गया है । प्राणायाम से ओंकारसाधन ७०. हठयोगप्रदीपिका—१·१ तथा उसकी टीका, वही ३·१५ तथा उसकी टीका, योगबीजम् १·८३-६०, नाथ सम्प्रदाय-पृ० १०३ । ७१. सि० सि० प०—२·३५ । ७२. गो० सं०—२·१८-२०; योगामार्तण्ड—१०८ । ७३. गोरक्ष संहिता—२.२१,५२ ।
[ ३४ ] भी सम्बद्ध है। ओंकारसाधन और अजपाजप दोनों ही प्राणायाम में अन्तर्भूत हैं। 'ओंकार' की विस्तृत प्रतीकात्मक व्याख्या गोरक्ष-ग्रन्थों में उपलब्ध है। गोरक्षादि सिद्धाचार्य इस प्रणव को वेद का सार नहीं, वेद मानते हैं। इसी को शिवशक्ति-साधन भी कहा गया है। ओंकार को आदिनाद कहा गया है। यह अनाहत और अखण्ड है। इसका अनुसंधान ही नादानुसंधान है। अन्तस् में इसकी सत्ता ही ब्रह्म की अन्तस् में सत्ता है। उसे नाद-ब्रह्म कहते हैं। इसका अनुसंधान ब्रह्मानुसंधान है। ७४ सिद्धसिद्धान्तपद्धति के अनुसार चैतन्य-तरंगों का प्रत्याहरण, नाना प्रकार के विकारों से चित्त के ग्रस्त हो जाने के कारण उत्पन्न विकारों से भी निवृत्ति प्रत्याहार का लक्षण है। गोरक्षसंहिता में चक्षु आदि के अपने विषयों में विचरण से आहरण को प्रत्याहार कहा गया है। प्रत्याहार से योगी अपने मानस-विकारों का मोचन करता है। ७५ धारणा में बाह्य और अन्तस् के एकमात्र निजतत्त्वस्व- रूप का अन्तःकरण से साधन किया जाता है। जो कुछ उत्पन्न होता है, उसे निराकार में धारण—जीवात्मा का निर्वात दीप की तरह धारण—ये धारणा के लक्षण हैं। इससे मानसस्थैर्य की प्राप्ति बतायी गयी है। हृदय में पंचभूतों के पृथक् धारण तथा मानस के निश्चलत्व के धारण के कारण ही इसे धारणा कहते हैं। भूत-तत्त्वों के अनुसार ही यह धारणा भी पांच प्रकार की मानी जाती है। इन धारणाओं के बाद सिद्धसिद्धान्तपद्धति के अनुसार चित्त का निरा- कार निजतत्त्व में एकत्व तथा आत्मा का निर्वातदीपत्व सिद्ध होना चाहिए। ऐसा प्रतीत होता है कि कुंडलिनी-योग की साधना धार- णान्तर्गत है। इस कुंडलिनीयोग से हो लययोग, भूतजय, भूतलय, भूतशुद्धि, षट्चक्रभेद आदि संबद्ध हैं। कुंडलिनी की मूलाधार से से सहस्रार तक की यात्रा को पृथिवी से आकाश तक की यात्रा कहा गया है। यह आध्यात्मिक यात्रा है। यह साधन आध्यात्मिक साधन है। इस कुंडलिनी को षोडशी तथा उसकी साधना को षोडशीसाधना
७४. नाथ और संत साहित्य—पृ० २८३-२८८ । ७५. सि० सि०प०—२.३६; गो० सं०—२.२३-३१; योग-मार्तण्ड ११३-११६ ।
[ ३५ ] कहा गया है । पिण्ड-ब्रह्माण्ड-एकत्व का सिद्धान्त इस साधन का ही सिद्धांत पक्ष है । गोरख-मत के मान्य चक्रों की कुछ निश्चित संख्या नहीं बतायी जा सकती । फिर भी तांत्रिकों के कुल सात चक्र अधि- कांशतः और सामान्यतः स्वीकृत हैं ।⁷⁶ सिद्धसिद्धान्तपद्धति में कहा गया है कि ध्यान परमाद्वैतभाव है । जिन-जिन तत्वों या पदार्थों का स्फुरण होता है, आत्मा उनकी अपने ही स्वरूप के अनुसार भावना करती है । इस प्रकार ध्यान में सभी भूतों में समदृष्टि हो जाती है । इस ध्यान-साधन में चित्त पूर्ण- रूप से निश्चल रहता है । सगुण और निर्गुण नामक दो प्रकार के ध्यान बताये गये हैं । सगुण ध्यान विभिन्न वर्णों (रंगों) वाला होता है तथा निर्गुण ध्यान केवल ज्ञानात्मक, अनुभृत्यात्मक । स्थूल और सूक्ष्म भेद से भी ध्यान दो प्रकार का होता है । स्थूल ध्यान के बाद तेजोध्यान या ज्योतिर्ध्यान और सूक्ष्म ध्यान का वर्णन किया गया है ।⁷⁷ समाधि में सभी तत्वों की सम-अवस्था रहती है, निरू- द्यमत्व और अनायास की स्थिति रहती है । इससे मोक्ष की प्राप्ति होती है जिसमें शुभ-अशुभ कार्यों का त्याग हो जाता है, विश्वतो- मुख अनन्त परम ज्योति का साक्षात्कार होता है । जब प्राण सम्यक् प्रकार से क्षीण हो जाते हैं तथा मानस भी लय को प्राप्त हो जाता है, जब समरसत्व की प्राप्ति हो जाती है, तब कहा जाता है कि समाधि की अवस्था प्राप्त हो गयी । इस समय अपना - पराया कुछ भी नहीं रहता । हठयोगप्रदीपिका में इस स्थिति के विभिन्न नाम बताये गये हैं : राजयोग, समाधि, उन्मनी, मनोन्मनी, अमरत्व, लय, तत्व, शून्याशून्य, परमपद, अमनस्क, अद्वैत, निरालम्ब, निरं- जन, जीवन्मुक्ति, सहजा, तुर्या । इन शब्दों की अलग-अलग विस्तृत व्याख्याएं मिलती हैं ।⁷⁸ इस प्रकार गोरख के षडंग-योग के दो उद्देश्य बताये गये हैं । ७६. नाथ और संत साहित्य—पृ० २८८-२६६ ७७. सि० सि० प०-२.३८; योगमार्तण्ड-१०२, १५७; गो० प०-२.६५-७५; योगमार्तण्ड-१५६-१६६; घेरण्डसंहिता-६.२-२२ । ७८. नाथ और संत साहित्य--पृ० २६७-२६८ ।
[ ३६ ] प्रथम गौण उद्देश्य है सिद्धदेह या दिव्यदेह की प्राप्ति या जीवन्मुक्ति। दूसरा मुख्य उद्देश्य है द्वैताद्वैत-विवर्जित नाथरूप में अवस्थान या पिण्डपद का परमपद में समरसीकरण। संस्कृत-ग्रन्थों के आधार पर उपस्थित किये गये इस गोरक्ष-योग में दो प्रधान साधन हैं : हठयोग और लययोग। इसी प्रकार दो कार्य हैं:—विन्दुरक्षा और नादानुसंधान। गोरक्ष योगसाधना का मुख्य तत्व है प्राणायाम। दोनों कार्य इसी से साधित होते हैं। इसी आधार पर नाथ लोगों का यह भी कथन है कि यह स्थूल शरीर भी मुक्ति प्राप्त करता है। सिद्धदेह की प्राप्ति के लिए अमृतसाधन भी नाथों को स्वीकार्य है। रस (पारद + अभ्रक) से सिद्धदेह की प्राप्ति की निन्दा गोरक्ष ने अपनी हिन्दी रचनाओं में की है, क्योंकि उससे वास्तविक स्थिर सिद्धदेह की प्राप्ति नहीं होती। गोरक्ष साधन में लोग वज्रोली, सहजोली आदि की भी गणना करते हैं। किन्तु सारी सामग्री की छानबीन करने पर ऐसा संगत प्रतीत नहीं होता कि गोरक्ष ने उनको अपने साधन में स्थान दिया होगा अथवा उनका प्रचार किया होगा। इस प्रकार गोरक्षनाथ की दर्शन और साधना की परम्परा भारतीय वैदिक परम्परा से भिन्न है। दार्शनिक और साधनात्मक दृष्टि से विचार कर डा० गोपीनाथ कविराज ने श्री अक्षयकुमार बनर्जी के ‘फिलासफी आफ गोरक्षनाथ’ नामक ग्रन्थ की प्रस्तावना में कहा है कि नाथों की योगसाधना का आदर्श पातंजल योग से ही तत्त्वतः भिन्न नहीं है, प्रत्युत् पूर्ववर्ती और परवर्ती बौद्ध मतवादों के साथ ही वह बहुत दूर तक शांकर वेदान्त से भी भिन्न है। प्राचीन और मध्यकालीन आगमानुयायी अद्वैतवादी मतवादों से इस नाथा- दर्श की पर्याप्त समानता है जिसे ‘सामरस्य’ कहा गया है। इसी प्रकार नाथसिद्धों की पिण्डसिद्धि और पातंजल कायसंपत् में भी पूर्ण साम्य नहीं है। नाथों का आदर्श है पिण्डसिद्धि से जीवन्मुक्ति प्राप्त करना। तत्पश्चात् समरसीकरण के द्वारा परामुक्ति के आदर्श को वे स्वीकार करते हैं। अतः अब इस निर्देश के प्रकाश में नाथ- साधन और दर्शन के विचार की नई आवश्यकता स्पष्ट हो गयी है। —नागेन्द्रनाथ उपाध्याय
स्वयंबोध अमनस्कयोग१ अमनस्कखण्ड२ प्रथमाध्याय३ कैलासशिखरासीनं सर्वज्ञं सर्वगं शिवम्४। वामदेवो मुनिश्रेष्ठः प्रणम्य परिपृच्छति ॥ १ ॥ मुनिश्रेष्ठ वामदेव जी ने कैलास पर्वत के शिखर पर बैठे हुए सर्वज्ञ सर्व- व्यापी भगवान् शिवजी को प्रणाम कर पूछा ॥ १ ॥ वामदेव उवाच- देवदेव महादेव सर्वानुग्रहकारक५ । जीवन्मुक्तिप्रदोपायं कथयस्व मम प्रभो ॥ २ ॥ वामदेव जी ने कहा—सब पर अनुग्रह करनेवाले देवाधिदेव हे महादेव जी ! हे प्रभो ! जीवन्मुक्ति प्रदान करनेवाला उपाय मुझसे कहने की कृपा कीजिये ॥ २ ॥ १. (ख) अमनस्क योगशास्त्र । २. (ख) नहीं है । ३. (ख) नहीं है । ४. (ख) नहीं है । ५. (ख) प्रणम्य शिरसा देवं कृतांजलिरुमापतिम् । जीवन्मुक्तिप्रदोपायं कथयस्वेति पृच्छति ।