अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
श्रीमान् शर्मा साहब ने बहुत मनोयोग से इसके कई सूत्रों के भाव को ग्रहण किया और मैंने इसकी विषय वस्तु सहित आधारभूत ग्रन्थों पर ध्यान दिया। उनके द्वारा अनुवाद रूप में यह प्रथम ग्रन्थ था किन्तु मुझे अनेक स्थलों के अनुवाद को लेकर भय था और जब समराङ्गणसूत्रधार का अनुवाद सम्पन्न हुआ तो आत्मविश्वास हो गया कि इसका अनुवाद ठीक हो गया है। समराङ्गण. का सम्पादन-अनुवाद करते - करते ही इस ग्रन्थानुवाद का संशोधन भी होता चला गया। इसलिए इसके प्रकाशन में भी किञ्चित विलम्ब हुआ, अन्यथा यह अनुवाद 2007 ई. में ही प्रकाशित हो जाता। मैं मानता हूँ कि भगवान् विश्वकर्मा ने ही स्वयं इस ग्रन्थ की गुत्थियों को खोला है क्योंकि अनेक स्थल ऐसे थे जो बहुत जटिल थे और प्रकाशित पाठ में अनेकत्र त्रुटियाँ थी, कई स्थलों पर प्रश्नवाचक चिह्न थे। इसे एक प्रकार से पुनर्सम्पादित किया गया है। पाठकों और विद्वानों को ऐसा सर्वत्र प्रतीत होगा, इसमें कई श्लोक नए भी जुड़े हैं जिन्होंने खण्डित पाठ की पूर्ति की है, इस सम्बन्ध में भूमिका में चर्चा की गई है और सूत्रस्थलों पर भी यथोचित पाद टिप्पणियाँ दी गई हैं। मैं श्रीमान् शर्मा साहब का आभार मानूँ या उनको धन्यवाद दूँ, कह नहीं पा रहा हूँ। यह तो अनुग्रह ही है कि विश्वकर्मा-वंशज स्वयं इस महत् कार्य में सूत्रधार बने। मैं उनके ऋणि होने की बात कहता हूँ तो वे कहते हैं कि आपके अभियान के साथ जुड़कर मुझे अपना जीवन सार्थक होता प्रतीत हो रहा है। उनकी पहल ने इस ग्रन्थ के अनुवादोद्धार की दिशा में एक सशक्त ताल दी तो मैंने और मेरे परिवार के सदस्यों ने भी कदम बढ़ाए। अनुदित स्वरूप को मैंने उत्स ढूँढ़कर पूर्णतः शास्त्र- सम्मत स्वरूप देने के लिए जीतोड़ प्रयास किया है, मेरी कनिष्ठ पुत्री अनुकृति चौहान ने इसका मूलपाठ टंकित किया तो इसकी टिप्पणियों को खोजने का श्रम ज्येष्ठ पुत्री आयुष्मति अनुभूति चौहान और अनुज अरविन्द चौहान ने किया है। सहधर्मिणी पुष्पा चौहान भी बहुत मददगार रही, पुत्र गौरव चौहान ने भी सहयोग किया। यह एक समूह-श्रम ही कहा जाएगा। मैं परिजनों के स्नेहाधीन और श्रीमान् शर्मा साहब के अनुग्रह से अभिषिंचित हूँ। इस क्रम में मैं बड़ौदा ऑरियण्टल इंस्टिट्यूट के निदेशक प्रो. मुकुन्दलालजी वाडेकर का भी आभार मानता हूँ कि जिन्होंने इसके अनुवाद की सदिच्छा प्रकट की और प्रोत्साहन दिया। उन्होंने इस ग्रन्थ की मातृकाओं के पृष्ठ भी उपलब्ध करवाए और यह कहा कि इस अनुवाद से इस ग्रन्थ के अध्ययन-अध्यापन और अभ्यास का कार्य आगे बढ़ेगा। मैं डूंगरपुर (राजस्थान) के वयोवृद्ध शिल्पी श्रीमान्
xi रघुनाथजी सोमपुरा का भी आभार मानता हूँ जिन्होंने अपने संग्रह से इसकी एक मातृका उपलब्ध करवाई। इसी प्रकार राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर के अधिकारियों के प्रति भी धन्यवाद, जहाँ से इसकी खण्डित मातृका मिली। मनीषी आदरणीय डॉ० महेन्द्र जी भानावत सदैव की तरह मेरे प्रेरक बने रहे, उनके प्रति आभार। इसके प्रकाशन की पहल करने के लिए परिमल पब्लिकेशंस, दिल्ली के संस्थापक संस्कृतविद् श्रीमान् कन्हैयालालजी जोशी का स्मरण करता हूँ, जिन्होंने इसकी पाण्डुलिपि देखकर सन्तोष किया और कहा था कि इसका प्रकाशन निश्चित ही गौरवशाली कार्य होगा। वे गत दिनों नित्यलीलालीन हो गए, उन स्मृतिशेष, यशात्मकाय के प्रति मैं श्रद्धावनत हूँ...। उनके पुत्र चि. श्री परिमल जोशी ने इस कार्य को आगे बढ़ाया। वे इसका पहला संस्करण बहुत समर्पित भाव से प्रकाशित कर रहे हैं। वे धन्यवादार्ह है। इस ग्रन्थ का पाठ तैयार करने में जिन ग्रन्थों की सामग्री का सहयोग लिया और चित्रादि का उपयोग हुआ, उनके लेखकों, सम्पादकों और प्रकाशकों का आभार। इस ग्रन्थ की जो भी अच्छाइयाँ हैं, वे आनन्द-कन्द-नन्द-नन्दन प्रभुप्रवर श्रीनाथजी की कृपा का प्रसाद है और जो त्रुटियाँ हों, वे मुझ अल्पज्ञ की हैं। मुझे आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि विद्वज्जनों के बीच इस ग्रन्थानुवाद को आदर और सम्मान मिलेगा तथा शोधजगत में इसकी विषय-वस्तु पर पुनः वैज्ञानिक शोधानुसन्धान होगा... 40 राजश्री कॉलोनी, विनायकनगर, विदुषां वशंवद उदयपुर (राजस्थान) श्रीकृष्ण 'जुगनू' राधाष्टमी विक्रम संवत् 2067 15 सितम्बर, 2010 ईस्वी
भारतीय कला ग्रन्थ और अपराजितपृच्छा भारतीय कला के मूल ग्रन्थों में अपराजितपृच्छा का अप्रतिम स्थान माना जाता है। नाट्यशास्त्र के लिए जो विश्वकर्मीय शास्त्र द्वितीय अध्याय से लेकर कई स्थलों पर उपस्कारक रहा, उसी प्रकाशमयी परम्परा की कीर्ति-रश्मियाँ अपराजितपृच्छा तक पहुँची जिसके आधार पर मध्यकाल में विश्वकर्मीयशिल्प, ज्ञानप्रकाश दीपार्णव, वृक्षार्णव, वास्तुसार समुच्चय, स्तम्भराज जैसे अनेक शिल्प ग्रन्थों की रचना हुई और सूत्रधार मण्डन, उसके अनुज सूत्रधार नाथा और मण्डन के पुत्र सूत्रधार गोविन्द आदि कृत लगभग दो दर्जन ग्रन्थों की रचनाएँ हुईं। भुवनदेवाचार्य कृत अपराजितपृच्छा केवल ग्रन्थ नहीं है बल्कि हजारों सूत्रधारों, शिल्पकारों के कार्य- सम्पादन का निर्देशक रहा है। इसलिए इसे शिल्पी समुदाय में गुरु-गौरव का स्थान प्राप्त है। विशेषकर, उत्तर और पश्चिमी भारत में इस ग्रन्थ के आधार पर अष्टांग वास्तु रचनाओं का न्यास-विन्यास हुआ है। सूत्रधार समुदाय में इस ग्रन्थ के पूजन- सबद के उच्चारण के बाद अपने कार्य के श्रीगणेश की परम्परा रही है, ऐसा गौरव सम्भवतः अन्य किसी शिल्प-ग्रन्थ को नहीं मिला। ग्रन्थ का स्वरूप विशिष्टताएँ : यह ग्रन्थ केवल वास्तु-स्थापत्य पर आधारित नहीं है बल्कि इसमें कई विषयों का वर्णन है और 12वीं सदी के समय के पश्चिम भारत में प्रचलित विभिन्न सामाजिक परम्पराओं तथा आवश्यकताओं सहित राजाज्ञाओं अथवा शासकोचित संकल्पों का भी सम्यक् विवरण प्रस्तुत करता है। अपराजित के प्रश्न पर विश्वकर्मा ने स्थल-स्थल पर ऐसे निर्देश किए हैं जो तत्कालीन समाज की आवश्यकताओं और अनुकरण योग्य प्रवृत्तियों का द्योतक है। 'शस्यावतार सूत्र' में नित्य सुकाल के ध्येय से जल की बचत के लिए गाँव-गाँव जलाशयों की श्रृंखला खड़ी करने के मूल में रचनाकार समकालीन स्थितियों का सन्दर्भ ही प्रस्तुत करता है। संयोग से यह निर्देश कालजयी हो गया है। इसके पठन-पाठन और निर्देशों को राजा-प्रजा के लिए अनुकरण योग्य बनाने के उद्देश्य की पूर्ति का ग्रन्थकार ने सूत्र-दर-सूत्र ध्यान रखा है। विषय-विवरण के पार्थक्य के परम्परित 'अध्याय' संज्ञा के विपरीत 'सूत्र' नामकरण के मूल में भी यह ध्येय लक्षित है। इसमें सूत्र वह है जो श्लोक रूपेण मुक्ताओं को पिरोये हुए है और वह सूत्र अपने-आप में गुर (टिप्स, नियम) का स्वरूप लिए हुए है। चरक ने सूत्र को गम्भीरता के साथ किसी वेद की शाखा, विद्या, ज्ञान, शास्त्र, लक्षण और तन्त्र के पर्याय और समानार्थी के रूप में स्वीकृत
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किया है : तत्रायुर्वेदः शाखा विद्या सूत्रं ज्ञानं शास्त्रं लक्षणं तन्त्रमित्यनर्थान्तरम् ॥ (चरक. सूत्रस्थान 30, 31) इस प्रकार इसके अर्थ-गाम्भीर्य को लक्षित किया जा सकता है। इस ग्रन्थ में भारत में प्राचीन काल से ही चली आ रही वैज्ञानिक कलाओं का सम्यक् विवेचन मिलता है, चूँकि विश्वकर्मा ही इन कारू व चारू कलाओं के प्रवर्त्तक माने जाते हैं, अतः वे ही इसमें प्रवक्ता के स्वरूप में हैं। ग्रन्थ पूरी तरह उद्देश्यमूलक है और ग्रन्थकार ने इसकी संकल्पना के मूल में कलाओं के संरक्षण सहित उनके सम्पादन का विचार अपने सम्मुख रखा है। यह ग्रन्थ शास्त्रों का शास्त्र है, समकालीन समाज में जो कुछ कौतुक था अथवा जिन बातों को लेकर जन-मन में कुतूहल था, वह सब इस ग्रन्थ का प्रतिपाद्य है। यह कारू-कर्मनों का ही मैन्युअल नहीं है, बल्कि पुराविदों के लिए पौराणिक प्रसंगों की पूर्ति का प्रकाशपुंज है; दैवज्ञों के लिए साक्षात् ज्योतिर्ज्ञान है; सूत्रधारों के लिए स्थापत्य-शास्त्र है, मूर्तिकारों के लिए प्रतिमाशास्त्र, चित्रकारों के लिए चित्रकर्मशास्त्र है; तन्त्रज्ञों के लिए तन्त्रागम हैं; पटवों-आभूषणकर्मियों के लिए प्रसाधनीय आभरण-निर्देशिका, गजपालकों और अश्वपालकों के लिए पशुपालन है; सिकलीगरों-शस्त्रकारों के लिए आयुध-ज्ञानावली और गायकों-वादकों, नट-शैलूषों के लिए गान्धर्व-ज्ञानकोश है— जो जिस ज्ञानानुशासन का पण्डित है, यह उसके पूर्णतः पठन-पाठन योग्य प्रमाण-पुस्तक है, क्योंकि सब कोई विश्वकर्मा की सन्तान है और इससे उनके गुण-कौशल में अभिवृद्धि होती है, यह उनके लिए गुणमञ्जरी है। विषय-वस्तु के आधार पर इस ग्रन्थ में लोक-मान्यताओं सहित कई शास्त्रों का स्वरूप दिखाई देता है और उसे निम्न शीर्षकों में विभाजित किया जा सकता है—
- पुरागमशास्त्र : ग्रन्थरम्भ में गन्धमादन पर्वत के वर्णन से लेकर अट्ठासी तपस्वियों की तपश्चर्या, विश्वकर्मा के दिव्याश्रम और उनके स्वरूप का वर्णन और सूत्रधारों के लिए ज्ञातव्य विषयों का विवरण देते हुए ग्रन्थकार ब्रह्माण्डोत्पत्ति से अपने विषयों का चयन और उनका सम्यक् परिपाक करता हुआ बढ़ता है। इस क्रम में पातालों, द्वीपों, समुद्रों, पर्वतों, ऊर्ध्वाध लोकों का वर्णन एकदम पौराणिक शैली में करता है। इसमें प्रकृति, गुण, विप्रादि वर्णों, उनके गोत्रों, संसारावतरण और लोकों सहित जम्बूद्वीप, नव-वर्षों में निवास करने वाली प्रजा का वर्णन ज्ञेय है। इसके अन्तर्गत गन्धर्वादि संस्थान, संसारभूत ग्रामोत्पत्ति, गर्भ विकास, पञ्चतत्त्व, पञ्चगुण, गर्भविज्ञान, अठारह गुण-दोष, शिव-शक्ति ब्रह्मज्ञान और गीता के
xiv महत्त्वपूर्ण विषयों के प्रतिपादन के साथ ही सत्त्व-रज-तम गुणों के लक्षणों का वर्णन भी ज्ञातव्य है। देश जाति, कुल, स्थान, वर्ण भेद तत्कालीन स्थितियों का द्योतक है। 2. कल्प व अवतारशास्त्र : इस क्रम में कल्पान्त क्रम, कल्प के देवता, पञ्चलिंग, हरिक्षेत्र, मत्स्यादि दस अवतारों का वर्णन, एकादश रुद्र, विश्वकर्मा, बारह शिवरात्रि निर्णय, शिव पूजन विधि व माहात्म्य वर्णित है। इसी में विश्वकर्मावतार के साथ ही पृथु-पृथ्वी संवाद में पृथ्वी की रचना और जय-विजय-सिद्धार्थ पृच्छा और अपराजित के प्रश्न से पुनः पौराणिक विषयों का वर्णन ज्ञेय है। इसमें सप्तद्वीप, सागर, पर्वत, महाशैल, भारत के ग्रामों, नृपराज्यों का प्रमाण, महावन, उपवन एवं वनयात्रा का रोचक विवरण है। 3. ज्योतिषशास्त्र : इस क्रम में विष्णु व लिंगादि महापुराणों के अनुसार ग्रहादि ध्रुव मण्डल, सूर्यादि नव ग्रहों के बिम्बों के मान, ग्रहादिकों की ध्रुव प्रदक्षिण गति, काल-संख्या प्रमाण, तिथियों, कलाओं, पक्ष, मास, ऋतु, साठ संवत्सरों, युगों के भेद, चौदह मन्वन्तर का वर्णन और फिर ज्योतिष पञ्चाङ्ग वासना के अन्तर्गत आवश्यक निर्देश एवं नष्ट ध्रुवक ज्ञात करना, तिथि भुक्ति, संक्रांति, दिन नक्षत्र, महा नक्षत्र भुक्ति, योग निकालना, करण, सात वार, तिथि, अश्विनी आदि नक्षत्रों, योगों के नाम, अवकहॊडा ज्योतिष चक्र, नक्षत्र देवताओं के नाम, योनि वैर, आठ वर्ण, सूर्यादि ग्रहों की दशाओं के फलाफल, चन्द्रमा की बारह अवस्था व उसके फल और ज्योतिष लक्षण वर्णित है। 4. गणित-मपितशास्त्र : ग्रन्थ में संख्याओं की गणना व पहचान दी गई है वहीं गणित शब्द निघण्टु आया है। शिलामान निकालने, वृत्तफल, गोलफल, अष्टकोण फल, षट्कोण क्षेत्रफल, धनुषाकार क्षेत्रफल, त्रिकोणादि आकार सहित पिण्ड के क्षंत्रफल को निकालने के सूत्र दिए गए हैं। आयादि वास्तु-गणित भी ज्ञातव्य है। 5. वास्तुशास्त्र : इस क्रम में मानव वास्तु और देववास्तु का प्रधानता से वर्णन अवलोकनीय है। इसमें क्रमशः भूमि परीक्षण, शकुन निरीक्षण, ग्रह पूजा, वास्तुपूजा, आचार्यादि पूजन, सूत्रधार परीक्षा, भूपरिग्रह, कीलकारोपण, कूर्मप्रमाणपद प्रतिष्ठा, वास्तु की उत्पत्ति का आख्यान, देवता न्यास, सोलह सन्धि, अष्टाङ्ग, अष्टसूत्र पञ्चक्षेत्र का वास्तु स्वरूप एवं वास्तुदेवता निघण्टु ज्ञेय है। इसमें स्वस्तिकादि विभिन्न वास्तु क्षेत्रों, उनके पदों की संख्या, स्थान, चतुरश्रादि क्षेत्र व उनके प्रयोजन, वास्तु मर्म निर्णय, दिव्पालादि वास्तुदेव पूजा-बलि कर्मयुक्ति,
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आचार्य-सूत्रधार पूजा निर्णय, वास्तु परिभ्रमणादि गुण-दोष, प्रशस्त मास, प्राची साधन, आय-व्ययादि विचार, मेरु आदि छन्द और विकाश संख्या, विविध प्रकार के गृह, शाल, राजवेश्म, नगरों के प्रमाण, वहाँ निवेश योग्य रचनाओं की विधि, प्राकार के ऊपर स्थापनीय सूर्य यन्त्र, भैरवादि यन्त्र, विविध पुर-कूट-खेटक, ग्रामादि के स्वरूप और जलस्रोतों की रचना का वर्णन ज्ञेय है। इसी प्रकार त्रिविध राजालय, महामण्डलेश्वरादि के राजगृहों के प्रमाण, प्रतोली, एक से लेकर पाँच पोलें, धारागृह, जलयन्त्र, वेद्यशाला, ध्रुवादि षोडश गृह, गृहों के छह प्रकार के छन्द, हवेलियों के गुणदोष, एक से लेकर दशशाल भवन, शुद्धा-सम्बद्धा-संयुता, परिभ्रम चार शालाएँ, छन्दभिन्ना, सम्पुटा, प्रतिक्रम जैसी अन्य शालाएँ, गृहमाला, गृहनाभि, गृहसंघट्ट, गृहाण आदि चार गृह भेद, खण्ड, पाण्डु, वाजिपूर्ण, तृणच्छन्द, पट्टक नामक गृहकर्म षट्च्छन्द, बत्तीस देवताओं के पदानुसार द्वार के शुभाशुभ, राश्यानुसार द्वारमुख और महाराज प्रसादायतन निवेश, राजपुर-ब्रह्मपुर-शूद्रपुर के प्रमाण नामक सूत्रों में मनुष्य वास्तु का विवेचन है। इसी प्रकार देववास्तु के अन्तर्गत त्रैलोक्य दीक्षा का वर्णन, वैराज्यादि पाँच नागर प्रासाद, प्रासादों की संख्या, चौदह प्रकार के प्रासादों की उत्पत्ति, स्वस्तिकादि द्राविड प्रासादों की उत्पत्ति और उनके लक्षण, रुचकादि लतिन प्रासाद के भेद, उनकी उत्पत्ति व संख्या, वराट प्रासाद, विमान प्रासाद, केसरी प्रासाद, मिश्रक प्रासाद, भूमिज प्रासाद, विमान नागर प्रासाद, विमान पुष्पक प्रासाद, वलभी प्रासादों की उत्पत्ति, सिंहावलोकन प्रासाद, दारुज प्रासाद एवं फांसनाकार प्रासादों की उत्पत्ति का वर्णन ज्ञातव्य है। इसी प्रकार नागर-द्राविड-भूमिज-वराट-विमान प्रासादों के लक्षण, मिश्रक-सान्धार-विमाननागरादि प्रासाद और उनके प्रमाण, प्रासाद हर्म्य भेद, द्वार मान, प्रतोली मान, शिवतीर्थोदक का वर्णन, देवता प्रदक्षिणा, जीर्ण वास्तु चालन पर शुभाशुभता, वृष प्रकार दृष्टिस्थान, जीर्णवास्तु गुणदोष, प्रासाद देशानुक्रम, न्यूनाधिक लक्षण, सप्तपुण्याह व उनका माहात्म्य, चौदह शान्तियाँ, चौदह प्रकार की जगती, शिवालय, ब्रह्मालय, विष्णुवालय, सूर्यालय, गौर्यालय, जिनालय के साथ-साथ बलाणक के मान व भेद, भिट्ट का मान व लक्षण, पीठ का मान इत्यादि अनेक विषयों का वर्णन अवलोकनीय है। इसी में कलाओं का विचार बहुत वैज्ञानिक रूप से दिया गया है। प्रासादों के विभिन्न अङ्गों के विवरण सहित यज्ञ-मण्डप विचार, मण्डल विधि, प्रतिष्ठा के लिए रत्नादि न्यास, महोत्सव, प्रासादाङ्गों में देवताओं का न्यास और सात प्रकार के मठों का वर्णन भी ज्ञातव्य है।
XVI 6. कृषिशास्त्र : इसके अन्तर्गत जलाशय माहात्म्य, कलियुग और लोकोत्तर प्रश्न, सुभिक्ष-दुर्भिक्ष लक्षण, कलियुग में तारण के लिए शस्योद्भव, जलोत्थान यन्त्र और जल बचत के निर्देश अध्ययन-अनुसरण के योग्य हैं। 7. पशुपालनशास्त्र : इस विषय के अन्तर्गत भद्रादि जातियों के गज और उनके उत्पत्ति एवं विहार योग्य वन तथा अश्व और उनकी विप्रादि प्रजातियों सहित दन्तिन्यादि गजशालाएँ एवं अश्वशाला बनाने के नियमों के निर्देश ज्ञातव्य है। यह वर्णन परम्परित रूप से संहिता ग्रन्थों के अनुसार मानक है। शस्यावतार सूत्र में बैलों की महिमा भी आई है। 8. शिल्पशास्त्र : राजोपस्कारक वस्तुओं के अन्तर्गत आसन व मसूरक, गदिका एवं पट्टगदी, राजच्छत्र, सिंहासन, नौ प्रकार के रथ, नन्दादि सभाष्टक लक्षण, चतुर्विध वेदी, कवच-आयुध आदि का निर्माण निर्देश ज्ञातव्य है। 9. प्रतिमाशास्त्र : इस शास्त्र के अन्तर्गत लिङ्गार्चादि उपयोगी शिलाओं के लक्षण, हस्त-कम्बी प्रमाण, परमाणु प्रमाण, उत्तम-मध्यम-अधम हस्त मान, कम्बिका के वास्तु देवता, उत्तम-मध्यम-अधम कम्बिका और उसका पूजन, शल्यदोष, विविध प्रकार के लिङ्गों व उनकी पीठिकाओं के लक्षण और शिव सहित विष्णु, ब्रह्मा, सूर्य, देवियों और जिन देवताओं उनके लाञ्छनों, यक्षों, शासन देवी- देवताओं की प्रतिमाओं का वर्णन भी ज्ञातव्य है। स्वच्छन्द भैरव के अवतार व उनके रूप-आयुधों का वर्णन पठनीय है। इसी प्रकार प्रतिमाओं के ताल-मान, पूजा-मन्त्र आदि का विवरण भी पठनीय है। 10. चित्रशास्त्र : इसके अन्तर्गत चित्रों व पत्रों की उत्पत्ति, पत्रजाति, कण्टकभेद जीव सूत्र निर्णय, जातिक्रम छन्द से आठ कण्टक, पत्राकारादि का वर्णन, पट्ट, पत्र, वर्तना निर्णय, लेपकर्म विधि, गुरु-शिष्य सम्बन्ध व उनके लक्षण, रूपालङ्कार संयुत् चित्रकर्म कथन, षोडश व्यालों, स्त्री-पुरुष के लक्षण आदि ज्ञातव्य है। 11. आयुध-आभरणशास्त्र : इस विषय के अन्तर्गत कवच और आयुधों की संख्या एवं लक्षणादि का वर्णन तथा सोलह आभूषणों का वर्णन ज्ञातव्य है। 12. गान्धर्वशास्त्र : नाट्य शास्त्रसम्मत इस विषयानुशासन में ताल एवं वादित्र लक्षण, ताल के प्रकार, वाद्यों के प्रकार, सात स्वर, राग और रागिनियाँ, चौदह प्रकार के गीतों के दोष और नौ प्रकार के ताण्डव नृत्यों का वर्णन पठनीय है।
xvii इस प्रकार अनेकानेक शास्त्रीय विषयों की पृष्ठभूमि पर इस अपराजितपृच्छा का न्यास-विन्यास हुआ है। लोकावश्यकताओं की पूर्ति के लिए इसमें यथेष्ट शास्त्रीय निर्देशों से पूर्णता प्रदान की गई है। रचनाकार इस ग्रन्थ की संकल्पना से लेकर समाहार तक पूरी तक केन्द्रीय-चित्त रहा है। उसके ध्येय में अबोध शिल्पी से लेकर पाण्डित्य-प्रतिभा सम्पन्न सृजन तक के लिए इसकी उपादेयता सिद्ध करना रहा है और इसमें वह सर्वाङ्गतया सफल रहा है। नामकरण, आशय और पृष्ठभूमि : जैसा कि कहा गया है कि अपराजितपृच्छा अनेक शास्त्रों का सूत्रित-स्वरूप है। इससे ग्रन्थकार के अध्ययन-आसमान का अवज्ञान तो होता ही है जो कि बहुत विस्तृत एवं व्यापक है, साथ ही उसके विषय चयन और उसे सूत्रित करने के कौशल का बोध होता है— एक गुरुकुल के परिवेश रूप में वह ग्रन्थ की संकल्पना करता है और जनता की ओर से की जाने वाली जिज्ञासाओं को वह अपराजित के मुख से प्रश्न के रूप में प्रस्तुत करता है और उनका उत्तर-प्रत्युत्तर स्वयं विश्वकर्मा प्रस्तुत करते हैं। अपराजित के प्रश्नों के कारण ही यह 'पृच्छा' संज्ञाभिधान लिए हुए है। प्रश्न या पृच्छा की परम्परा हमारे यहाँ ब्राह्मण और उपनिषद-काल से तो रही है ही उत्तर- बौद्धकाल में ग्रन्थों के नामकरण के रूप में भी ज्ञातव्य है। 'मिलिन्दपञ्ह' ग्रन्थ तो बहुत प्रसिद्ध है ही जिसमें भिक्षु नागसेन और मिलिन्द का संवाद है, इसमें मिलिन्द जिसे यवन मिनेण्डर के रूप में पहचाना गया है, के प्रश्नों का विवरण मात्र नहीं है बल्कि उसके प्रश्नों का समाधान इसका मुख्य विषय है, इसी ग्रन्थ में लक्खणपञ्ह, विमतिच्छेदकपञ्ह, मेण्डकपञ्ह, योगिकथापञ्ह, अनुमानपञ्ह और ओपम्मकथापञ्ह जैसे प्रश्नों की श्रृंखला है और इन सबमें मिलिन्द के अनेक प्रश्नों का समाधान है। (विशेष विवरण : आर. डी. वाडेकर सम्पादित मिलिन्दपञ्ह, मुम्बई विश्वविद्यालय, मुम्बई, 1940 ई.) शब्दकोशों में 'प्रच्छ जिज्ञासायाम् + गुरोश्च हल:' के रूप में इस शब्द पर विचार हुआ है। अमरकोश में इसे प्रश्न का पर्याय कहा है। (शब्दकल्पद्रुम खण्ड 3, पृष्ठ 224) चरक के सूत्रस्थान में कहा गया है कि शास्त्र में जो विषय जिस प्रकार से कहा गया है, उसे उसी रूप में विधिपूर्वक पूछना प्रश्न कहलाता है : पृच्छा तन्त्राद्यथाप्रायं विधिना प्रश्न उच्यते। प्रश्नार्थो युक्तिमांस्तस्य तन्त्रेणैवार्थनिश्चयः ॥ (चरकसंहिता सूत्र. 30, 69) भरत के नाट्यशास्त्र में आया है कि जब कोई जिज्ञासुभाव से अपनी अभीष्ट वस्तु की तलाश करते हुए अनुनय-विनयपूर्वक प्रश्न करता हो तो उसे पृच्छा
xviii समझना चाहिए : यत्रान्वेषणमर्थानां वाक्यैरभ्यर्थनापरैः। जिज्ञासुः पृच्छति परं सा पृच्छा त्वभिधीयते॥ (नाट्य. 17, 32; एवं नाटक लक्षणरत्नकोश, 179) कतिपयों का यह मत भी है कि जब कोई व्यक्ति स्वयं से या दूसरे से प्रश्न करते हुए किसी भावना एवं रस से पूर्ण तथ्य को कहता हो तो उसे पृच्छा समझना चाहिए : यत्र भावरसोपेतमात्मानमथवा परम्। पृच्छन्निवाभिधत्तेऽर्थं सा पृच्छेत्युच्यते यथा ॥ (तत्रैव) इस प्रकार अपराजितपृच्छा में अपराजित के प्रश्न ही नहीं है अपितु उसके प्रश्नों का सारगर्भित समाधान है। इसमें अपराजित पुत्र के रूप में और विश्वकर्मा पिता के रूप में हैं। जैसे पिता वात्सल्य भाव के साथ अपने पुत्र की प्रत्येक जिज्ञासा के शमन का प्रयत्न करता है, वैसा ही प्रयास इसमें हुआ है। अपराजित निश्चित ही गुणग्राहक होकर उभरते हैं। यह इसके 'सूत्रसन्तान गुणकीर्ति' के नाम को भी सार्थक करता है। फिर, यहाँ सूत्रसन्तान से आशय सूत्रधार है— वह नाटक से लेकर स्थापत्य शास्त्र तक अपनी ज्ञानात्मक धारणा के लिए प्रसिद्ध है, उनका ज्ञानकोश केवल कल्पना तक सीमित नहीं हैं बल्कि वह कलम और करनी की करामात दिखाने में सुकान्त होता है। भरताचार्य की परिभाषा पर विचार करें तो सूत्रसन्तान या सूत्रधार वह है जो चारों प्रकार के वाद्यों के वादन में प्रवीण होता है, जिसे अनेकानेक व्यावहारिक कार्यों का अनुभव होता हैं, जिसे अनेक धार्मिक परंपराओं और धर्मों- मतों का व्यवहार विदित हो, जो नीति व अर्थशास्त्र का ज्ञाता हो, वेशोपचार का जानकार हो, जिसे कामशास्त्र का व्यवस्थित ज्ञान हो, पात्रों की अनेक प्रकार की गतियों व उनके रङ्गमञ्च पर चलने के परम्परागत आचार का जिसे भली प्रकार परिचय हो, जिसे रस और भावों का पूर्णतः ज्ञान हो, प्रस्तुति-प्रदर्शन में जो दक्ष हो, सभी शिल्प और कलाओं का सम्यक् वेत्ता हो, जिसे पदों व छन्दों का विभाग विदित हो, जो अनेक शास्त्रों का जानकार हो, जिसे ग्रह, नक्षत्र आदि विज्ञानों की तत्त्वतः जानकारी हो, जिसे शारीर-शास्त्र तथा शारीरिक गतियों का व्यवस्थित ज्ञान हो, जो पृथ्वी पर विद्यमान द्वीप, वर्ष, पर्वत, वहाँ के निवासीगण और उनके उचित आचार-विचार, वेशभूषा आदि का प्रामाणिक ज्ञान रखता हो, जिसे अनेक राजवंशों की परंपराओं व इतिवृत्त का ज्ञान हो, जिसने शास्त्रों में प्रतिपादित गुण, आचार और कार्यों का व्यवस्थित रूप से श्रवण किया हो और उन तत्त्वों को सम्यक् रूप से हृदयङ्गम किया हो और इन्हीं तत्त्वों का जो दूसरों को शिक्षण या उपदेश देने में भी समर्थ हो तो इन गुणों से युक्त पुरुष सूत्रधार होता है : चतुरातोद्य कुशलः नानाकर्मसु शिक्षितः। नानापाषण्डकार्यज्ञो नीतिशास्त्रार्थतत्ववित्॥ वेशोपचारनिपुणः
xix कामशास्त्रविचक्षणः। नानागतिप्रचारज्ञ रसभावा विशारदः॥ नाट्यप्रयोगकुशलो नानाशिल्पसमन्वितः। पदच्छन्दोविधानज्ञः सर्वशास्त्रविचक्षणः ॥ ग्रहनक्षत्रतत्त्वज्ञो देहव्यापारपण्डितः। पृथिवी द्वीपवर्षाणां पर्वतानां जनस्य च॥ प्रमाणाचरितज्ञश्च राजवंशप्रसूतिवित्। श्रोता शास्त्रार्थकार्याणां श्रुत्वा चैवावधारकः ॥ अवधार्य प्रयोक्ता च शक्तश्चैवोपदेशने। एवं गुणस्तथाचार्यः सूत्रधारो विधीयते ॥ (नाट्यशास्त्रम् 35, 66- 71) देखा जाए तो भरतोक्त ये सारे ही विषय अपराजितपृच्छा में विद्यमान हैं। निश्चित ही यह सूत्रसन्तान-गुणकीर्तिप्रदायक है। रचनाकाल और रचना स्थल : अपराजितपृच्छा के रचनाकाल को लेकर विद्वानों में निश्चित ही उहापोह की स्थिति रही है। इस ग्रन्थ के बड़ौदा संस्करण के सम्पादक, जूनागढ़ रियासत सहित जोधपुर और हैदराबाद व अन्य म्यूनिसिपलिटीज में इंजीनियर रहे श्री पोपटभाई अम्बाशङ्कर मंकड; स्थापत्य शास्त्र के विद्वान मधुसूदन अमीभाई ढाकी, एम. पी. वोरा आदि ने इस समस्या के निस्तारण की दिशा में अपने कतिपय प्रयास किए हैं और इन्हीं मतों की समीक्षा इस ग्रन्थ के शोधार्थी प्रो. लालमणि दुबे ने भी की है। श्री मंकड ने माना है कि इसका रचनाकाल 12वीं और 13वीं सदी के मध्य रखा जाना उचित है। (अपराजित. बड़ौदा, भूमिका पृष्ठ 12) श्रीवोरा और श्रीढाकी ने कतिपय उद्धरणों के आधार पर इसके रचनाकाल के पुनर्निर्धारण का प्रयास किया व कहा कि पीठ के जाड्यकुम्भ, वाजीपीठ जैसी गुजरात के देवालयों के निर्माण में प्रचलित इस पीठ की परम्परा इसे 12वीं सदी में प्रवर्तित बताती है क्योंकि सोमनाथ में 1169 ई. की ऐसी रचनाएँ सामने आई हैं। इसी प्रकार 1140 में सिद्धपुर-गुजरात में बने रुद्रमातरालय में यह विधान परिलक्षित होता है। भित्ति में मञ्जिका, शिरावटी और कूटछाद्य जैसी रचनाएँ 11वीं सदी से पहले सामने नहीं आती और इनका वर्णन अपराजितपृच्छा में हुआ है। इस आधार पर इस ग्रंथ का रचनाकाल 12वीं सदी कल्पित किया जा सकता है। इसी प्रसङ्ग में केसरादि, श्रीधरादि, सुरटर्वादि, सागरतिलकादि और मेरु शैली के मन्दिर गुजरात व राजस्थान में इसी काल में दिखाई देते हैं। (द डेट ऑफ अपराजितपृच्छा, जर्नल ऑफ ओरियण्टल इंस्टीट्यूट, बडौदा, भाग 9, पृष्ठ 426-431) यही नहीं, साधारण शैली के चार स्तम्भों वाले प्राग्ग्रीव मण्डप एवं कई स्तम्भों वाले सभागारों का जो वर्णन अपराजितकार ने किया है, वैसे 11वीं सदी से ही बनने आरम्भ होते हैं। घट-पल्लवों से युक्त स्तम्भों का विधान जो कि इस ग्रन्थ में आया है, वह 12वीं सदी के बाद दिखाई नहीं देता है, ऐसे में भी इस ग्रन्थ का
xx रचनाकाल 12वीं सदी के समापन से पूर्व का ही निर्धारित होता है। यही स्थिति मण्डपादि में स्वास्तिकाकार संवराणाओं की हैं जो कि उक्त अवधि में ही गुजरात, राजस्थान सहित मध्य भारत में प्रचलित रही हैं। चतुर्भुजी दिक्पालों की मूर्तियाँ और उनमें आयुध-न्यास का जो वर्णन अपराजितकार ने किया है, वह 11वीं सदी और अधिकतम 12वीं सदी में गुजरात में निर्मित देवालयों में ही सामने आता है। (उपर्युक्त) उक्त विवरणों से स्पष्ट होता है कि यह ग्रन्थ 11वीं-12वीं सदी के मध्य आकार ले चुका था। चूँकि इस ग्रन्थ पर 'समराङ्गणसूत्रधार' का पूरा प्रभाव है, ऐसे में यह ग्रन्थ समराङ्गण के रचयिता धाराधिप भोजराज (1010-1053 ई.) के बाद ही अस्तित्व में आया होगा। प्रो. ढाकी ने अपराजितपृच्छा पर समराङ्गणसूत्रधार के प्रभाव की चर्चा अपने एक आलेख में की है (द इन्फ्लुएंस ऑफ समराङ्गणसूत्रधार ऑन अपराजितपृच्छा, जर्नल ऑफ ओरियण्टल इंस्टीट्यूट, भाग 10, पृष्ठ 231- 234) किन्तु, यह भी प्रतीत होता है कि समराङ्गण व अपराजित दोनों ही ग्रन्थों के सामने कोई अन्य विश्वकर्मीय ग्रन्थ भी रहा होगा और उसी से इन ग्रन्थकारों ने सामग्री और विषय को उद्धृत किया है। समराङ्गणसूत्रधार के पहले ही अध्याय में विश्वकर्मीय ग्रन्थ-परम्परा का उल्लेख किया गया है और अपराजितकार ने भी जय, विजय, सिद्धार्थ आदि के नाम से ग्रन्थों के विद्यमान रहने और उनके विषयों की सूची भी दी है। बहुत सम्भव है कि उस काल में कोई विश्वकर्मीय मत-ग्रन्थ प्रधान स्रोत के रूप में या आदर्श के रूप में सबके लिए ज्ञातव्य था। हालांकि भुवनदेवाचार्य ने कहीं भी समराङ्गणसूत्रधार का स्पष्टतः उल्लेख नहीं किया है, हाँ अनेकत्र विश्वकर्मा के मुख से भी 'आद्य विश्वकर्मा' का उल्लेख अवश्य करवाया है। यह विश्वकर्मीय ग्रन्थ कहीं विश्वकर्मा प्रकाश या वास्तुतन्त्र प्रतीत होता है तो कहीं-कहीं 'जयपृच्छा' (विद्यमान अहमदाबाद संस्करण से भिन्न और 10वीं सदी में प्रचलित आधारभूत पाठ जिसे भोज, सूत्रधार नकुल, हेमाद्रि पण्डित, महाराणा कुम्भा आदि ने उद्धृत किया है) का प्रभाव जान पड़ता है। स्कन्दपुराण, बृहद्देशी, नारदपुराण, विष्णुधर्मोत्तरपुराण, लिङ्गपुराण, नन्दीकेश्वरपुराण, शिवधर्म और शिवधर्मोत्तर, सुप्रभेदादि शैवागम आदि का प्रभाव भी अनेकत्र दिखाई देता है। स्कन्दपुराण के श्लोक ग्रन्थकार ने 'स्कन्दागम' के नाम से स्मरण भी किए गए हैं। भुवनदेवाचार्य की यह सूचना भी महत्वपूर्ण है कि उस काल तक छिन्न-भिन्न हो चुके स्कन्दपुराण को पुनर्संस्कारित किया जा रहा था। वास्तव में यह वही काल है जबकि पाटन-
xxi गुजरात के राजा कुमारपाल चालुक्य (1140-1174 ई.) का चरित्र भी स्कन्दपुराण में (ब्राह्मखण्ड, धर्मारण्य माहात्म्य अन्तर्गत) स्थान पा चुका था। यह सङ्केत स्कन्दपुराण के स्वरूप को लेकर विद्वानों के उन प्रश्नों का उत्तर भी देता है कि इस पुराण के दो स्वरूप है—संहितात्मक और खण्डात्मक; यह पुराण वर्तमान में खण्डात्मक (माहेश्वरखण्ड, वैष्णव, ब्राह्म, काशी, आवन्त्य, नागर एवं प्रभास) ही मिलता है जबकि संहितात्मक स्कन्दपुराण से केवल 'सूतसंहिता' लब्ध होती है शेष सनत्कुमारसंहिता, शाङ्करी, वैष्णवी, ब्राह्मी एवं सौरसंहिता अनुपलब्ध है। महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री का कथन है कि संहितात्मक स्कन्दपुराण की एक प्रति नेपाल दरबार पुस्तकालय में 7वीं सदी की प्राप्त होती है। प्रो. पी. वी. काणे ने इस समस्या के उत्तर में कहा है कि यह स्कन्दपुराण 7वीं सदी के पूर्व नहीं रखा जा सकता है और न ही नवीं सदी के पश्चात् का हो सकता है। (धर्मशास्त्र का इतिहास खण्ड 4, पृष्ठ 428) इन मतों के विपरीत अपराजितकार के सङ्केत और कुमारपाल चरित्र का इस पुराण में मिलना इसे 12वीं सदी तक ले जाता है। कुमारपाल चालुक्य के चरित्र-मूलक ग्रन्थों पर विश्वास करें तो सहज विश्वास होता है कि गुर्जर-चालुक्य चक्रवर्ती इस नृपति के जीवन प्रसङ्गों को समकालीन और परवर्ती विद्वानों को बहुत प्रभावित किया। तभी तो अज्ञातकर्तृक ने पुरातन संक्षिप्त कुमारपालदेव चरित की रचना की, सोमतिलक सूरि ने कुमारपालदेवचरित रचा, जिनमण्डन ने कुमारपाल प्रबन्ध लिखा, किसी अन्य ने कुमारपाल-प्रतिबोध की रचना की। इसी प्रकार चतुरशीतिप्रबन्ध में कुमारपालदेवप्रबन्ध का निबन्धन किया वहीं हीरकलश, देवप्रभगणि, ऋषभदास व जिनहर्ष ने कुमारपालरास नाम से पृथक्-पृथक् काल में कृतियों का प्रणयन किया तो सोमप्रभाचार्य ने कुमारपालप्रतिबोध को उद्धृत किया। तीर्थकल्प, मोहपराजय नाटक, प्रभावकचरित्र, प्रबन्धचिन्तामणि, उपदेशतरङ्गिणी, उपदेशप्रसाद सहित कई प्रशस्तियों में कुमारपाल का वर्णन आया है। (कुमारपालचरित्र संग्रह, सिंघी जैन ग्रन्थमाला, क्रमाङ्क 41) इसी प्रकार चित्रकूट (चित्तौड़गढ़) के समीधेश्वर महादेव मन्दिर से उसका शिलालेख 1141 ई. का मिला है। उस समय तक वह शैव मतावलम्बी था और विक्रम संवत् 1216 के मार्गशीर्ष की शुक्ल पक्ष की द्वितीया (दिसम्बर 1160 ई.) को कुमारपाल ने जैनधर्म स्वीकार कर लिया था, जैसा कि प्रो. पीटर पीटर्सन का मत भी है। अपराजितकार उस समय के जैनधर्म के प्रसार-प्रभाव से अनभिज्ञ नहीं था। उसने यदुवंशी श्रीकृष्ण के नेमिनाथ के रूप में गिरनार-रैवताचल या उज्जयन्त पर्वत
xxii पर प्रकट होने की सूचना दी है। ऐसा प्रतीत होता है कि यदुवंश में माण्डलिक राजा के गुरु हेमाचार्य ने उक्त पर्वत पर नेमिनाथ या नेमनाथ की मूर्ति प्रतिष्ठित की थी। (कर्नल जेम्स टॉड कृत पश्चिम भारत की यात्रा, जोधपुर 1965, परिशिष्ट पृ. 540) कदाचित इसी प्रसङ्ग को अतिशयोक्ति के रूप में ग्रन्थकार ने दिया हो। इस उज्जयन्त पर्वत के श्रीनेमिनाथ मन्दिर का जीर्णोद्धार विक्रम संवत् 1333 (1276 ई.) के ज्येष्ठ की चतुर्दशी को हुआ था। संवत् 1227 (1170 ई.) के एक अभिलेख में आया है कि तब तक नेमीश्वर तीर्थ बहुत प्रसिद्ध हो चुका था और अनेक प्रकार के ऐसे रत्नों से विभूषित था जिनको धनिक व्यापारी दूर-दूर के समुद्र-तटों से लेकर आए थे। इससे पूर्व संवत् 1204 (1147 ई.) के फाल्गुन मास की षष्ठि, बुधवार के तेजपाल और बसन्तपाल बन्धुओं द्वारा स्थापित एक लेख में कहा गया है कि पवित्रता के सागर के समान यदुवंश में इन्दु नेमीश्वर हुए जिनके चरण कमलों का अनुसरण करते हुए परमोच्च उज्जयन्ति तक चढ़कर यदुवंशियों के समूह के समूह युग-युग से नेमिनाथ के चरणों में शीश नवाते आए हैं। (वही, पृष्ठ 524-526) इस प्रकार अपराजितकार इससे पूर्व हो चुका था और तब तक गिरनार पर नेमिनाथ- तीर्थ की मान्यता का विकास हो चुका था। अन्तःसाक्ष्य के अन्तर्गत ही ग्रन्थकार ने महाग्रावभी रत्नकूट, मेरुतिलकादि संज्ञक जिन देवालयों के स्वरूपों का वर्णन किया है, वे अन्यान्य वास्तु विधियाँ 12वीं सदी के पूर्वार्द्ध तक समाज में प्रचलित थी। इनमें से कई नाम वलभी संवत् 850 तद्नुसार 1169 ई. के कुमारपाल चालुक्य के एक अभिलेख में आए हैं। यथा— बस्तियों में ब्रह्मपुर, राजाओं के मण्डल, यतियों के मठ, नृपशाला, कूपिका, रौप्यप्रणाल, मण्डुकासन, पट्टशालिका, सोपान, महागृह, वापिका आदि मुख्य हैं। मन्दिरों के लिए कैलाश-शैल के समान जैसी तुलनाएँ आई हैं। मेरु के समान मन्दिर को खड़ा करवाना, जीर्णोद्धार कार्य की प्रशंसा, देवालयों पर स्वर्ण-कलश की स्थापना, जल-कुल्याएँ बनवाना और देव प्रतिमाओं के लिए सिंहासन निर्माण जैसे प्रसङ्ग तत्कालीन परम्परानुसार अपराजितपृच्छा में आए हैं। फिर, तब तक सोमनाथ-प्रभास क्षेत्र का महत्व उजागर हो चुका था। अपराजितकार ने विस्तार से सोमनाथ का वर्णन किया है। वहाँ तब शिल्पियों का बृहद् समूह विद्यमान था और उक्त मन्दिर के लिए विशिष्ट कार्य के सम्पादक होने के कारण उनकी ख्याति सोमनाथपुरवासी होने से सोमपुरा के रूप में ख्यातिलब्ध हुई। ऐसा प्रतीत होता है कि संक्रमण युग में जबकि कला की काया ऐसे दौर में थी
xxiii जिसमें भाव पुरातन थे और विचार नए रूप में थे, यह ग्रन्थ लिखा गया। यह पश्चिमोत्तर भारत में गुर्जर-गुहिल काल में प्रवर्तित प्रवृत्तियों का ग्रंथन है जिसमें कला का प्रवाह कुछ आहत हुआ, शिल्पी समुदाय सताया गया, उन्हें ग्रामादि से विमुख किया गया था और तब उन्हें एक शास्त्र की जरूरत पड़ी। दिक्पालों को विशेष प्रतिष्ठा देने के लिए चारभुजा सहित मूर्त्यांकन किया गया — यह पश्चिमी भारत के राजाओं और राजन्यशक्ति की अभिवृद्धि के ध्येय का भी सूचक है क्योंकि इसी ओर से अरबों की आक्रमणकारी गतिविधियाँ निरन्तर थी और दिक्पाल के रूप में राजाओं को सशक्त करने का विचार शिल्पियों के मानस में भी जन्म ले चुका था। फिर प्रतिहार युगीन शिल्प के शिखर अल्पवय में ही झूलते दिखाई दे रहे थे। ऐसे में रेखावर्णन का विन्यास किया गया — अपराजितपृच्छा की रचनात्मक पृष्ठभूमि में इन बातों का भी विचार किया जाना चाहिए। ऐसे ही विभिन्न वर्णनों के आधार पर इस ग्रन्थ का रचनाकाल 12वीं सदी निर्धारित होता है। प्रो. ढाकी ने भी ऐसे ही प्रमाणों की बुनियाद पर विभिन्न मारु- गुर्जर शिल्प ग्रन्थों का परीक्षण करते हुए इसे कुमारपाल चालुक्य की शासनावधि की देन सिद्ध किया है। इस प्रसङ्ग में कुमारपाल के अभिन्न, मन्त्रियों में प्रधान गुरु भावबृहस्पति ने इस काल में जीर्णोद्धार के कार्यों को प्रमुखता दी। कुमारपाल ने उसे अपनी मुद्रा, कोष और सर्वस्व दे दिया और कहा कि जाओ एवं देवपत्तन के तीरन (देवसमुद्र-तटवर्ती) मन्दिरों का जीर्णोद्धार करवाओ। वहाँ उत्सव हुआ, प्रथमतः चन्द्रमा ने स्वर्णमन्दिर खड़ा किया, फिर रावण ने चाँदी का मन्दिर बनवाया। बाद में कृष्ण, भीमदेव ने इसका पुनर्निर्माण करवाया। इसमें जवाहरात जड़वाए। एक बार पुनः कुमारपाल के प्रयासों से यह मेरु संज्ञक प्रासाद के समान बनाया गया...। इसे भावबृहस्पति ने कैलास के समान बनवा दिया और राजा को अपने कार्यों के अवलोकन के लिए आमन्त्रित किया। कुमारपाल ने जब उनको देखा तो प्रशंसापूर्वक कहा कि मेरा हृदय आनन्दित है, मैं तुम्हें और तुम्हारी सन्ततियों को मेरे राज्य में प्रधानता प्रदान करता हूँ। जैसा कि 1169 ई. के एक अभिलेख में आया है— एवं राज्यमनारत विदधति श्रीवीरसिंहासने श्रीमद्दीरकुमारपालनृपतौ त्रैलोक्यकल्पद्रुमे। गण्डो भावबृहस्पतिः स्मररिपोरुद्वीक्ष्य देवालये जीर्णं भूपतिमाह देवसदनं प्रोद्धर्तुमेतद्वचः॥
xxiv आदेशात् स्मरशासनस्य सुबृहत्प्रासादनिष्पादकं चातुर्जातकसम्मतं स्थिरधियं गार्गेयवंशोद्भवम् । श्रीमद्भावबृहस्पतिं नरपतिः सर्वेशगण्डेश्वरं चक्रे तं च सुगोत्रमण्डलतया ख्यातं धरित्रीतले ॥ दत्वालङ्करणं करेण तु गले व्यालम्ब्य मुक्त्या... प्रणम्याग्रतः । उत्सार्यात्म महत्तरं निजतमामुच्छिद्य मुद्रामदात् । स्थानं भव्य पुराणपद्धतियुतं निस्तन्त्रभक्त्यव्ययम् ॥ प्रासादं यदकारयेत् स्मररिपोः कैलासशैलोपमं भूपालस्तदतीवहर्षमगमत् प्रोवाच चेदं वचः । श्रीमद्दण्डमहामतिं प्रति गण्डत्वमेतत्तव प्रत्तं सम्प्रति पुत्रपौत्रसहिताया चन्द्रतारारुणम् ॥ सौवर्णं सोमराजो रजतमयमथो रावणोदारवीर्यः कृष्णश्रीभीमदेवो रुचिरमहाग्रावभी रत्नकूटम् । तं कालज्
xxv किया है और सम्मान स्वरूप दानादि का विधान भी वर्णित किया है। प्रतीत होता है कि अपराजितकार उस घटना का दर्शक रहा होगा और यह ग्रन्थ 1150 ई. के आसपास लिखा जा चुका था अथवा लिखा जा रहा था। किन्तु, यह सन्देह स्थल- स्थल पर प्रकट होता है कि भुवनदेव गुजरात से लगे प्रदेश मेवाड़ से परिचित था। यद्यपि कुमारपाल ने मेवाड़ को विजित किया था, ऐसे में धारानगरी के परमारों के पश्चात् मेवाड़ गुजरात के चालुक्यों के अधिकार में रहा। कुमारपाल ने चित्तौड़गढ़ स्थित परमार भोज के बनवाए समीधेश्वर मन्दिर में पूजन किया था और वहाँ स्वर्णकलश चढ़ाकर भूमिदान किया— सन्निवेश्य शिविरं पृथु तत्र त्रासिता सहनभूपतिचक्रम्। चित्रकूटगिरि पुष्कलशोभां द्रष्टुकुमारनृपतिः कुतुकेन॥ यदुच्चसुरसद्माग्रोपरिष्टात् प्रपतन् सदा। रथं नयत्यलं मन्दं मन्दं भङ्गभयाद्रविः॥ यत्सौधशिखरारूढकामिनीमुखसन्निधौ। वर्तमानो निशानाथो लक्ष्यते लक्ष्मलेखया॥ (प्रो. कीहॉर्न सम्पादित चित्तौड़गढ़ स्थित कुमारपाल का अभिलेख : इण्डियन एण्टीक्वेरी भाग 2, पृष्ठ 521) इस समस्त पृष्ठभूमि में मेरा विचार है कि यह ग्रन्थ निश्चित तौर पर 1140 से लेकर 1150 ई. तक तैयार हो गया था। इसके तैयार होते ही इसकी प्रतिलिपियों का देशभर में आदान-प्रदान हुआ। देवगिरिराज्य के यादववंशीय नरेश महादेव (1260-1271 ई.) के धर्मशास्त्री हेमाद्रि पण्डित ने अपराजितपृच्छा के श्लोक प्रथमतयाः ग्रन्थ के नामोल्लेख के साथ अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘चतुर्व्वर्गचिन्तामणि' के परिशेषखण्ड के तीसरे भाग कालनिर्णयोक्त ‘प्रासादाद्यारम्भकालः' के प्रसङ्ग में प्रमाण के रूप में उद्धृत किए। इससे इस ग्रन्थ के 12वीं सदी के बाद लिखे जाने की धारणा निर्मूल हो जाती है। ये श्लोक हैं — रवौ कन्यातुलालिस्थे वास्तौ पूर्वे शिरः स्थितम्। चापे च मकरे कुम्भे दक्षिणेन व्यवस्थितम्। आदित्यवारयोगेन स वास्तुः सरति भ्रमात्॥ यत्र भानुः शिरस्तत्र लक्षितव्यं रविक्रमात्। देवागारं गृहञ्चैव न कुर्याच्छीर्षसन्मुखम्॥ मृत्युरोगभयानि स्युः प्रशस्तं कुक्षिसन्मुखम्।
तुला-वृश्चिक-कन्यासु भास्करो यदि संस्थितः । न तदा प्राङ्मुखं कुर्यात् गृहं भवति निष्फलम् ॥ धनुर्मकरकुम्भेषु यदि तिष्ठति भास्करः । तदा याम्यमुखं वेश्म राजचौराग्निभीतिदम् ॥ मीने मेषे वृषे प्रत्यङ्मुखं स्त्रीकलहावहम् । मिथुने कर्कटे सिंहे न कुर्याच्चोत्तराननम् । तथा कृतं भवेद्वेश्म दोष-शोक-भयावहम् ॥ (हेमाद्रि : चतुर्वर्गचिन्तामणि, परिशेषखण्ड कालनिर्णय अध्याय 15, पृष्ठ 819-820) अपराजितपृच्छा के वर्तमान पाठ में ये श्लोक निम्नांकित क्रम और पाठान्तर के साथ प्राप्त होते हैं— रवौ कन्यातुलालौच पूर्वे शिरः समाश्रितः । धनोश्च मकरे कुम्भे दक्षिणे तु व्यवस्थितः ॥ मीने मेषे वृषे चैव पश्चिमे तु समाश्रितः । मिथुने सिंहकर्कै च ह्युत्तरेण व्यवस्थितः ॥ सर्वकालक्रमोऽयं च राशिमध्ये ह्यतः शृणु । देवताश्च क्रमयोगेन स वास्तुः सरते महीम् ॥ यत्र भानुस्तत्र शिरं लक्षितव्यं रविक्रमात् । अन्यथा कुरुते दुःखं शिरो वास्तावलङ्कृतम् ॥ देवागारं गृहं यत्र न कुर्याच्छिरः सन्मुखम् । मृत्युरोगभया नित्यं शस्तं च कुक्षिसन्मुखम् ॥ कन्यातुलावृश्चिके च भास्करो यदि संस्थितः । पूर्वे मुखं न कर्तव्यं गृहं भवति निष्फलम् ॥ मकरे चैव धनुषि कुम्भे वा च दिवाकरे । याम्यादिशि मुखं कुर्याद्राजचौराग्निजं भयम् ॥ मीने मेषे वृषे चेव पश्चिमा दिग् च दूषिता । स्त्रीणां रोगं महाघोरं भवति ह्यतिदारुणम् ॥ मिथुने सिंहकर्कै च वेश्म नैवोत्तराननम् । दोषशोकभयं तत्तु न कुर्याच्च विचक्षणैः ॥ (अपराजित. 62, 3-11)
xxvii इससे यह भी प्रतीत होता है कि यह ग्रन्थ रचनाकाल के बाद पुनर्संस्कारित या पुनर्सम्पादित हुआ है क्योंकि श्लोकों के बीच-बीच भी अन्य पङ्क्तियाँ मिलती हैं और पाठ भेद भी है। इसके अतिरिक्त भुवनदेव ने शिवरात्रि का विस्तृत वर्णन किया है, वर्ष की सभी शिवरात्रियों का नामोल्लेख किया है। उसके काल में शिवरात्रि का महत्व इस बात से भी प्रतीत होता है कि किराडू-जोधपुर के 1152 ई. के एक अभिलेख में कुमारपाल के एक सामन्त आह्लणदेव द्वारा एक आज्ञा से शिवरात्रि पर पशुवध निषेध करने का निर्देश दिया गया है। (एन्यूअल रिपोर्ट ऑफ राजपूताना म्यूजियम 1931) हमें याद रखना चाहिए कि शिवरात्रि के व्रत की कथा आबू से जुड़ी हुई है और उस कथा में मूलतः शिकारी द्वारा मृग-मृगी का वध नहीं करने का वर्णन ही है। ग्रन्थ के साङ्गोपाङ्ग अध्ययन से प्रतीत होता है कि भुवनदेव जितना गुजरात से परिचित था, उतना ही वह गुजरात से लगे मेवाड़ क्षेत्र से भी परिचित था। बहुत सम्भव है कि वह सोमपुरा हो किन्तु बहुत विद्वान था। वह कुमारपाल के साथ मेवाड़ आया हो जैसा कि कुमारपाल के साथ दण्डपाल सज्जन भी आया था जिसे पाटी सहित चित्तौड़ दिया और वहाँ का राजा किया (जैसा कि कुमारपालदेव प्रबन्ध गाथा 14 में आया है) अथवा भुवनदेव मेवाड़ में उस काल में चल रही शिल्प गतिविधियों के क्रम में निमन्त्रण पर आया हो किन्तु जब परमारों के प्रभाव से मेवाड़ में समराङ्गणसूत्रधार जैसे ग्रन्थ प्रचलित रहे होंगे तो ऐसे में अपराजितपृच्छा जैसे ग्रन्थ की क्या आवश्यकता रही होगी ? ऐसे में कुछ कारण दिखाई देते हैं -
- प्रथमतः चालुक्यों का परमार भोज के साथ वैर-भाव था। भोज के पूर्वजों ने गुजरात पर अधिकार के लिए चढ़ाई की थी और वहाँ पर्याप्त रक्तपात हुआ था। इसके बदले में चालुक्यों ने भोज की राजधानी को रौंद डाला था, जैसा कि विक्रमाङ्कदेवचरित (अध्याय प्रथम) आदि से विदित होता है। ऐसे में चालुक्य नहीं चाहते थे कि वे परमार शासकों के किसी मत को स्वीकार करें। ग्रन्थों और विचारधारा के प्रसङ्ग में यह विचार कुछ अधिक ही चरितार्थ होता है। इसलिए भुवनदेव ने भोजकृत समराङ्गणसूत्रधार के श्लोकों को ज्यों-का-त्यों लिया भी है किन्तु कहीं भी भोज का नामोल्लेख नहीं किया है बल्कि उन्हें विश्वकर्मा-वचन कहा है।
- द्वितीयतः समराङ्गणसूत्रधार के निर्देश लगभग एक सदी पुराने हो चुके थे और कला में नवीनता देना अपरिहार्य हो चुका था। फिर मालवा व गुजरात में
xxviii
भौगोलिक स्थितियाँ पृथक् भी थीं। ऐसे में नवीन कला परम्परा का प्रवर्तन होना प्रासङ्गिक ही था। अरबों के हमले में विनाश को प्राप्त सोमनाथ व अन्य देवालयों के जीर्णोद्धार के साथ ही कला में नवीन धारा का प्रवाह अनिवार्य था। 3. सोमनाथ पर आक्रमण के साथ ही कई सोमपुरा शिल्पी वहाँ से तत्काल मेवाड़ आदि की ओर पलायन कर गए हों और उनमें से किसी को अपने सूत्रसन्तानों के लिए निर्देश तैयार करने हों और उसने अपनी स्मृति के अनुसार भोज के मतों को लिखते हुए नवीन ग्रन्थ की रचना की हो। बहुत सम्भव है कि इस ग्रन्थ की रचना चित्तौड़गढ़ स्थित समीधेश्वर (समाधीश्वर) मन्दिर में हुई हो क्योंकि वह भोजकृत रहा है और वहाँ चालुक्यों का अधिकार और परमारों की प्रभुत्व के अवसान के बाद भुवनदेव निश्चिन्त रहा हो। इस क्रम में मेवाड़ के शिल्पियों का वह प्राचीन 'सबद-सूत्र' उद्धृत करना अप्रासङ्गिक नहीं होगा जिसमें समीधेश्वर मन्दिर में विश्वकर्मा-अपराजित संवाद के रूप में इस ग्रन्थ की रचना का उल्लेख आता है। यह कहना न होगा कि जहाँ इतिहास के अन्य स्रोत मौन होते हैं, तब एक वातायन लोकसाहित्य भी खोलने का यत्न करता है। इस सबद-सूत्र में अपराजितपृच्छा की न केवल विषय-वस्तु दी गई है, बल्कि भुवनदेवाचार्य का परिचय भी है। भुवनदेव की शिल्पविद्या का प्राचीन 'सबद' (कण्ठ-दर-कण्ठ) स्मृत्यमान चम्पूतुल्य यह रचना इस प्रकार हैं— ॐ गुरुजी! विद्या में सिलपविद्या जो साधे सो पावै अमरापुरवास। जो भणै सो सधरै जावै कैलासवास॥ चितरकोट समाधीसर बैठ भणै चेजारो भवनदेव, गंधमंगरे वराज्या मादेव, रिसी वन्दावै। विस्क्रमाजी भाषै हुणै अपराजित- अगम, पछम, स्त्रस्टि री उतपत-लोप, जडखान, पिण्डखान, परेवखान, बीजखान, चार समन्द सतखण्डी प्रथ्वी, सात लोक, नौ नाथ, साम्भरूं मेवाड़। रिश्यां री सन्ताण। गणतभणै, जोतीस भणै, भणत भणै, गड़त भणै, जोऊं लेयर हाथ तईं नापै, मिण्डीऊं करोड़ नापै। आवक आछौ लागै, जावतो रंज लागै। भाण्डता देवल जोड़े, नवा करै। चोथ, सिवरात, मैल-माळिया, तळाब-नाड़ी-बावड़ी-कूडा-निवाण, नीम-सीम, इण्ड-मीण्ड, देवळ-मूरत, पूजा-परसाद, राग-रागणी, नरतन-किरतन कोइ भेद बाकी नहीं। आठ सेहस गरन्थ माण्ड्या, दो पोटी पानड़ा। जदी चाल्या चीरवे ने नागदा ने धोके है। कैलास नगरी में राजा वैसळ सन्माने। आबू रे मथारे हुणै टंकोड़, पाथोड़, राठौड़ चाक दे, क्रमचारो देवळ बांधता। अठी नाळे तो मारवाड़, वठी जावै तो गुजरात। वणै सूरी जो चेला वदावै। करै भगती वदावै
xxix
अगती। भुवनदेव री वात कुण भणै। मैल वणातो राजा, देवळ बांधतो सूतरपत, मठ वणातो जत्ती, मूरत घड़तो रूपौ, चणतो चेजारो, पीणतो पिंजारो, गावतो गवैयो, नाचतो नच्चयौ, कटार-तरवार-नेजो चलावतो सूर, वणती विंदणी, ओतरतो भेरू रो भोपो। भवन सुधर्यां भव सुधरे, सुधरे भजन भाव। विस्क्रमाजी ते उपराजित सुत सन्ता (न) रे ग्यान॥ इति सिलप-सबद सम्पूर्ण भयो, अनन्त क्रोड़ सिद्धां में गादी बैठ गुरु माराज भाषिया। साईं ने सलाम, गुरांजी ने प्रणाम, नाथजी कूं आदेस, सब सन्तां ने हरे हर। (सांवरियाजी मन्दिर मण्डफिया के शिल्पी कजोड़ीदास से 1989 में सङ्कलित) अर्थ :- ॐ गुरुजी, विद्याओं में शिल्पविद्या प्रमुख है। इसकी जो साधना करता है, वह देवलोक में निवास करता है। जो इसे पढ़ता है, वह कैलासवास प्राप्त करता है। चित्रकूट (चित्तौड़गढ़) के समाधीश्वर मन्दिर में बैठकर स्थपति भुवनदेव रचना-पाठ करता है। गन्धमादन पर्वत पर विराजित शिव की ऋषि वन्दना करते हैं। विश्वकर्मा कहते हैं और अपराजित सुनते हैं। वे पूर्व मत, परवर्ती मत, सृष्टि की उत्पत्ति, प्रलय, जड़ योनि, पिण्डयोनि, श्वेदज, बीज योनि कहते हैं। चारों समुद्र, सप्तखण्डा पृथ्वी, सप्त लोक, नौ नाथ के बारे में बताते हैं। साम्भर से लेकर मेवाड़ तक का देश-वृतान्त कहते हैं। ऋषियों की वंश परम्परा बताते हैं। इसी क्रम में गणित का वर्णन, ज्योतिष का वर्णन, शिक्षा-व्याकरण का वर्णन, प्रस्तर व उसकी गड़ाई का वर्णन करते हैं। यव से लेकर हस्त का प्रमाण बताते हैं। शून्य से लेकर कोटि तक गणना बताते हैं। वास्तु में आय श्रेष्ठ व व्यय अनुचित होता है। जीर्ण देवालय का उद्धार, नवीनीकरण बताते हैं। चतुर्थी व्रत, शिवरात्रि, महल-हवेली, तालाब, जलाशय, बावड़ी, कूप, शस्य, शिलान्यास, शिखर, आमलक, कलश, देवालय, मूर्ति, पूजा-विधि, प्रसाद बताते हैं। इसी क्रम में राग-रागिनी, नृत्य, कीर्तन मिलाकर कोई शिल्प विद्या का भेद शेष नहीं रहता। आठ हजार (श्लोकों) का ग्रन्थ प्रमाण लिखते हैं। दो बैलों पर उठाने योग्य भार प्रमाण के पत्रों पर यह शास्त्र लिखा गया। भुवनदेव (चित्तौड़गढ़) से निकलकर चीरवा होकर नागदा (मेवाड़ की प्राचीन राजधानी) जाते हैं। कैलासपुरी में राज वैजल (विजयसिंह) सम्मानित करता है। आबू के पर्वत पर इस ग्रन्थ को टाँकी चलाने वालों ने सुना, पत्थर तोड़ने वालों ने सुना। राठौड़ों ने सुना व तलच्छन्द बनवाया। वहाँ देवालय निर्माण में जुटे कर्मचारियों ने सुना। इधर देखें तो मारवाड़, उधर देखें तो गुजरात तक इस ग्रन्थ का परिचय फैला। इसके बाद भुवनदेव तत्कालीन सूरीश्वर का शिष्य होता है, शिष्यों को बढ़ाता है। भक्ति करता है, जन्म सुधारता है। इस भुवनदेव की वार्ता को कौन