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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

विष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नहा द्यौसंशितः सूर्यतेजाः.
दिवमनु वि क्रमे ऽ हं दिवस्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.
स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (२७)
तू विष्णु का पराक्रम एवं शत्रुओं का विनाश करने वाला है. तू द्युलोक में आश्रित एवं
सूर्य का तेज है. मैं द्युलोक में पराक्रम प्रदर्शित करता और उसे द्युलोक से बाहर निकालता हूं.
जो हम से द्वेष करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं, वह जीवित न रहे. प्राण उसका
त्याग कर दें. (२७)
विष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नहा दिक्संशितो मनस्तेजाः.
दिशो ऽ नु वि क्रमे ऽ हं दिग्भ्यस्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं
द्विष्मः.
स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (२८)
तू विष्णु का पराक्रम एवं शत्रुओं का विनाश करने वाला है. तू दिशाओं में स्थित है एवं
मन का तेज है. मैं दिशाओं में पराक्रम का प्रदर्शन करता हूं तथा दिशाओं से उसे हटाता हूं.
जो हम से द्वेष करता है अथवा हम जिससे द्वेष करते हैं, उसका विनाश हो. प्राण उसका
त्याग कर दें. (२८)
विष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नहाशासंशितो वाततेजाः.
आशा अनु वि क्रमे ऽहमाशाभ्यस्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं
द्विष्मः.
स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (२९)
तू विष्णु का पराक्रम एवं शत्रुओं का विनाश करने वाला है. तू आकाश में स्थित है एवं
वायु का तेज है. मैं आकाश में पराक्रम का प्रदर्शन करता हूं और आकाश से उसे हटाता हूं.
जो हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं, उन का विनाश हो. प्राण उन का
त्याग कर दें. (२९)
विष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नह ऋक्संशितः सामतेजाः.
ऋचो ऽनु वि क्रमे ऽहमृग्भ्यस्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं
द्विष्मः.
स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (३०)
तू विष्णु का पराक्रम एवं शत्रु का विनाश करने वाला है. तू ऋचाओं में स्थित है. सोम
तेरा तेज है. मैं आकाश के मध्य ऋचाओं में पराक्रम का प्रदर्शन करता हूं और ऋचाओं से
उसे हटाता हूं. जो हम से द्वेष करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं, उस का विनाश हो.
प्राण उस का त्याग कर दें. (३०)
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विष्णोः क्रमो ऽ सि सपत्नहा यज्ञसंशितो ब्रह्मतेजाः.
यज्ञमनु वि क्रमे ऽ हं यज्ञात् तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.
स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (३१)
तू विष्णु का तेज एवं शत्रुओं का विनाश करने वाला है. तू यज्ञ में स्थित है एवं ब्रह्म का
तेज है. मैं ब्रह्म में पराक्रम का प्रदर्शन करता हूं तथा ब्रह्म से उसे हटाता हूं. हम जिस से द्वेष
करते हैं अथवा जो हम से द्वेष करता है, उस का विनाश हो. प्राण उस का त्याग कर दें. (३१)
विष्णोः क्रमो ऽ सि सपत्नहौषधीशितः सोमतेजाः.
ओषधीरनु वि क्रमे ऽ हमोषधीभ्यस्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं
द्विष्मः.
स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (३२)
तुम विष्णु के पराक्रम एवं शत्रुओं का विनाश करने वाले हो. तुम ओषधि में आश्रित हो
एवं सोम के तेज हो. मैं ओषधियों में अपने पराक्रम का प्रदर्शन करता हूं तथा ओषधियों से
उसे हटाता हूं. मैं जिस से द्वेष करता हूं अथवा जो हम से द्वेष करता है. उस का विनाश हो.
प्राण उस का त्याग करें. (३२)
विष्णो क्रमो ऽ सि सपत्नहाप्सुसंशितो वरुणतेजाः.
अपो ऽ नु वि क्रमे ऽ हमद्भ्यस्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं
द्विष्मः.
स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (३३)
तुम विष्णु के पराक्रम एवं शत्रुओं का विनाश करने वाले हो. तुम जलों में स्थित एवं
वरुण का तेज हो. मैं जलों में अपने पराक्रम का प्रदर्शन करता हूं तथा जलों से उसे हटाता हूं.
मैं जिस से द्वेष करता हूं अथवा जो मुझ से द्वेष करता है, उस का विनाश हो. प्राण उस का
त्याग करें. (३३)
विष्णोः क्रमो ऽ सि सपत्नहा कृषिसंशितो ऽ न्नतेजाः.
कृषिमनु वि क्रमे ऽ ह कृष्यास्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः.
स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (३४)
तुम विष्णु के पराक्रम एवं शत्रु विनाशकर्ता हो. तुम कृषि में स्थित एवं अन्न के तेज हो.
मैं कृषि में अपने पराक्रम का प्रदर्शन करता हूं तथा कृषि से उसे हटाता हूं. हम जिस से द्वेष
करते हैं अथवा जो हम से द्वेष करता है, उस का विनाश हो. प्राण उस का त्याग करें. (३४)
विष्णोः क्रमो ऽ सि सपत्नहा प्राणसंशितः पुरुषतेजाः.
प्राणमनु वि क्रमे ऽ हं प्राणात् तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं
द्विष्मः.
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स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (३५)
तुम विष्णु के पराक्रम एवं शत्रुविनाशकर्ता हो. तुम प्राणों में स्थित हो एवं पुरुष तुम्हारा
तेज है. हम प्राणों में अपने पराक्रम का प्रदर्शन करते हैं और उसे प्राण से दूर करते हैं. जो हम
से द्वेष करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं, उस का विनाश हो. प्राण उस का त्याग कर
दें. (३५)
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमभ्यष्ठां विश्वाः पृतना अरातीः.
इदमहमामुष्यायणस्यामुष्याः पुत्रस्य वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि
वेष्टयामीदमेनमधराज्चं पादयामि.. (३६)
जीते हुए पदार्थ हमारे हैं और लाए हुए सभी पदार्थ भी हमारे हैं. शत्रुओं की सभी सेनाएं
और शत्रु पराजित हो गए हैं. अमुक गोत्र में उत्पन्न एवं अमुक माता का पुत्र यह मेरा शत्रु है.
मैं इस के वर्च, तेज, प्राण एवं आयु को घेरता हूं तथा इस शत्रु को पराजित करता हूं. (३६)
सूर्यस्यावृतमन्वावर्ते दक्षिणामन्वावृतम्.
सा मे द्रविणं यच्छतु सा मे ब्राह्मणवर्चसम्.. (३७)
जो मार्ग दक्षिण में फैला हुआ है और जिसे सूर्य ने आवृत किया हुआ है, मैं उस मार्ग का
अनुगमन करता हूं. यह दक्षिण दिशा मुझे धन एवं ब्रह्म तेज प्रदान करे. (३७)
दिशो ज्योतिष्मतीरभ्यावर्ते. ता मे द्रविणं यच्छन्तु ता मे ब्राह्मणवर्चसम्..
(३८)
मैं प्रकाश से पूर्व दिशाओं का अनुवर्तन करता हूं. वे दिशाएं मुझे धन प्रदान करें एवं ब्रह्म
तेज दें. (३८)
सप्तऋषीनभ्यावर्ते. ते मे द्रविणं यच्छन्तु ते मे ब्राह्मणवर्चसम्.. (३९)
मैं सप्त ऋषियों का अनुवर्तन करता हूं. वे मुझे धन प्रदान करें एवं ब्रह्म तेज दें. (३९)
ब्रह्माभ्यावर्ते. तन्मे द्रविणं यच्छतु तन्मे ब्राह्मणवर्चसम्.. (४०)
मैं ब्रह्म का अनुवर्तन करता हूं. वह मुझे धन प्रदान करे और ब्रह्म तेज दे. (४०)
ब्राह्मणाँ अभ्यावर्ते. ते मे द्रविणं यच्छन्तु ते मे ब्राह्मणवर्चसम्.. (४१)
मैं ब्राह्मणों के अनुकूल आचरण करता हूं. वे ब्राह्मण मुझे धन एवं ब्रह्म तेज प्रदान करे.
(४१)
यं वयं मृगयामहे तं वधै स्तृणवामहै.
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व्यात्ते परमेष्ठिनो ब्रह्मणापीपदाम तम्.. (४२)
हम जिसे खोज रहे हैं, उसे वध के साधन अर्थात् आयुधों के द्वारा नष्ट करें. हम मंत्र बल
से उसे परमेष्ठी अर्थात् ब्रह्म की दाढ़ के नीचे डाल दें. (४२)
वैश्वानरस्य दंष्ट्राभ्यां हेतिस्तं समधादभि.
इयं तं प्सात्वाहूतिः समिद् देवी सहीयसी.. (४३)
वैश्वानर अर्थात् अग्नि की जो दाढ़ आयुध के समान है, हम शत्रु को उस में धारण करते
हैं अर्थात् रखते हैं. उस शत्रु का नाश कर के अग्नि में जो समिधा डाली जाती है, वह दिव्य
समिधा शत्रु को दूर भगाने में समर्थ है. (४३)
राज्ञो वरुणस्य बन्धो ऽ सि. सो ३ मुमामुष्यायणममुष्याः
पुत्रमन्ने प्राणे बधान.. (४४)
तू राजा वरुण के बंधन में पड़ा है. वे इस गोत्र वाले एवं अमुक माता के पुत्र को अन्न
और प्राण के बंधन में बांधते हैं. (४४)
यत् ते अन्नं भुवस्पत आक्षियति पृथिवीमनु.
तस्य नस्त्वं भुवस्पते संप्रयच्छ प्रजापते.. (४५)
हे पृथ्वी के स्वामी! तुम्हारा जो अन्न पृथ्वी पर बिखरा हुआ है, वह पृथ्वी के स्वामी
प्रजापति हमें प्रदान करें. (४५)
अपो दिव्या अचायिषं रसेन समपृक्ष्महि.
पयस्वानग्न आगमं तं मा सं सृज वर्चसा.. (४६)
हे दिव्य जलो! मैं तुम से याचना करता हूं. तुम मुझे अपने रस से संयुक्त करो. हे अग्नि
देव! मैं अन्न ले कर आ रहा हूं. तुम मुझे तेज से युक्त बनाओ. (४६)
सं मा ऽ ग्ने वर्चसा सृज सं प्रजया समायुषा.
विद्युर्मे अस्य देवा इन्द्रो विद्यात् सह ऋषिभिः.. (४७)
हे अग्नि देव! तुम मुझे तेज से युक्त करो एवं संतान प्रदान करो. समस्त देव मेरे इस
भाव को जानें. ऋषियों के साथ-साथ इंद्र भी मेरे इस भाव को जानें. (४७)
यदग्ने अद्य मिथुना शपातो यद्वाचस्तृष्टं जनयन्त रेभाः.
मन्योर्मनसः शरव्या ३ जायते या तया विध्य हृदये यातुधानान्.. (४८)
हे अग्नि देव! जो लोग एकत्र हो कर हमें गालियां दे रहे हैं तथा जो बोलने वाले दोष पूर्ण
वाणी का उच्चारण कर रहे हैं, जो शत्रु अपने क्रोधपूर्ण हृदयों के कारण तुम्हारे बाणों के लक्ष्य
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बन रहे हैं, अपने ज्वाला रूप बाणों से उन के हृदयों को भेद दो. (४८)
परा शृणीहि तपसा यातुधानान् परा ऽग्ने रक्षो हरसा शृणीहि.
परा ऽर्चिषा मूरेदेवांछृणीहि परासु तृपः शोशुचतः शृणीहि.. (४९)
हे अग्नि देव! अपनी ज्वालाओं से इन राक्षसों को दूर भगा दो एवं इन्हें नष्ट कर दो. तुम
अपनी लपटों से मूर्खों को दूर भगा दो. जो दूसरों के प्राणों को नष्ट कर के संतुष्ट होते हैं, तुम
उन का संहार करो. (४९)
अपामस्मै वज्रं प्र हरामि चतुर्भृष्टिं शीर्षभिद्याय विद्वान्.
सो अस्याङ्गानि प्र शृणातु सर्वा तन्मे देवा अनु जानन्तु विश्वे.. (५०)
इन मंत्रों को जानने वाला मैं इस शत्रु का सिर तोड़ने के लिए उस वज्र का प्रहार करता
हूं, जो जलों के चारों ओर विनाश करने वाला है. वह वज्र इस शत्रु के सभी अंगों को काट दे.
मेरा यह कर्म समस्त देव अनुकूलता से जानें अर्थात् उचित समझें. (५०)
सूक्त-६ देवता—वनस्पतिफला मणि
अरातीयोर्भ्रातृव्यस्य दुर्हृदो द्विषतः शिरः. अपि वृश्चाम्योजसा.. (१)
बंधुओं में जो मेरा शत्रु, दुष्ट हृदय वाला और द्वेष करने वाला है, उस का शीश भी मैं वेग
से तोड़ता हूं. (१)
वर्म मह्यमयं मणिः फालाज्जातः करिष्यति.
पूर्णो मन्थेन माग मद् रसेन सह वर्चसा.. (२)
फाल से उत्पन्न यह मणि मेरे लिए कवच बन कर रक्षा करेगी. मंथन की सामर्थ्य एवं रस
बल से युक्त होने के कारण समर्थ यह मणि मेरे पास आई है. (२)
यत् त्वा शिक्कः परा ऽ वधीत् तक्षा हस्तेन वास्या.
आपस्त्वा तस्माज्जीवलाः पुनन्तु शुचयः शुचिम्.. (३)
कुशल बढ़ई जो तुझे औजार सहित हाथ से मारता है अर्थात् छील कर तेरा निर्माण
करता है, इसी कारण जीवन देने वाले एवं पवित्र जल तुझे शुद्ध करें और पवित्र बनाएं. (३)
हिरण्यस्रगयं मणिः श्रद्धां यज्ञं महो दधत्. गृहे वसतु नो ऽ तिथिः.. (४)
सुवर्ण की माला से युक्त यह मणि श्रद्धा, यज्ञ एवं तेज को धारण करती हुई हमारे घर में
अतिथि बन कर निवास करे. (४)
तस्मै घृतं सुरां मध्वन्नमन्नं क्षदामहे.
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स नः पितेव पुत्रेभ्यः श्रेयः श्रेयश्चिकित्सतु भूयोभूयः श्वः श्वोः देवेभ्यो
मणिरेत्य.. (५)
हम इस अतिथि के लिए घृत, मदिरा, शहद और अन्न देते हैं. जिस प्रकार पिता पुत्र को
परम कल्याण देता है, उसी प्रकार यह मणि मुझे कल्याण दे. यह मणि देवों के समीप से मेरे
पास आ कर बारबार और प्रतिदिन मुझे सुख प्रदान करे. (५)
यमबध्नाद् बृहस्पतिर्मणिं फालं घृतश्रुतमुग्रं खदिरमोजसे.
तमग्निः प्रत्यमुञ्चत सो अस्मै दुह आज्यं भूयोभूयः श्वः श्वस्तेन त्वं द्विषतो
जहि.. (६)
यह मणि फाल से उत्पन्न, घृत टपकाने वाली, बल युक्त एवं खदिर अर्थात् खैर वृक्ष की
लकड़ी से बनी है. बृहस्पति ने बल प्राप्ति के लिए इसे बांधा था. अग्नि ने यह मणि मुझे दी है.
हे यजमान! यह मणि तुझे बारबार और प्रतिदिन बल प्रदान करे, जिस से तू प्रतिदिन एवं
बारबार शत्रुओं का विनाश कर सके. (६)
यमबध्नाद् बृहस्पतिर्मणिं फालं घृतश्रुतमुग्रं खदिरमोजसे.
तमिन्द्रः प्रत्यमुञ्चत्तौजसे वीर्याय कम्.
सो अस्मै बलमिद् दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (७)
यह मणि फाल से उत्पन्न, घृत टपकाने वाली, बल युक्त एवं खदिर अर्थात् खैर वृक्ष की
लकड़ी से बनी है. बृहस्पति ने बल प्राप्ति के लिए इसे बांधा था. इंद्र ने बल, वीर्य और सुख
प्रदान करने हेतु इस मणि को मुझे दिया है. हे यजमान! यह मणि बारबार और प्रतिदिन तुझे
बल प्रदान करे. उस बल की सहायता से तू शत्रुओं का विनाश करे. (७)
यमबध्नाद् बृहस्पतिर्मणिं फालं घृतश्रुतमुग्रं खदिरमोजसे.
तं सोमः प्रत्यमुञ्चत महे श्रोत्राय चक्षसे.
सो अस्मै वर्च इद् दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (८)
बृहस्पति ने जिस फाल से उत्पन्न, घी टपकाने वाली, शक्तिशालिनी एवं खैर वृक्ष की
लकड़ी से बनी मणि को बल प्राप्त करने के लिए बांधा था, उसे सोम ने महत्त्व, सुनने की
शक्ति और उत्तम दृष्टि पाने के लिए मुझे प्रदान किया है. हे यजमान! यह मणि तुझे बारबार
एवं प्रतिदिन तेज प्रदान करे, जिस की सहायता से तू अपने शत्रुओं का विनाश कर सके. (८)
यमबध्नाद् बृहस्पतिर्मणिं फालं घृतश्रुतमुग्रं खदिरमोजसे.
तं सूर्यः प्रत्यमुञ्चत तेनेमा अजयद् दिशः.
सो अस्मै भूतिमिद् दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (९)
बृहस्पति ने फाल से उत्पन्न, घी टपकाने वाली, शक्तिशालिनी एवं खैर वृक्ष की लकड़ी
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से बनी मणि को बल प्राप्ति के लिए बांधा था. उसे सूर्य ने मुझे दिया था. इस से मैं ने इन
सभी दिशाओं को जीत लिया था. हे यजमान! यह मणि तेरे लिए प्रतिदिन और बार-बार
ऐश्वर्य प्रदान करे, जिस की सहायता से तू अपने शत्रुओं का विनाश कर सके. (९)
यमबध्नाद् बृहस्पतिर्मणिं फालं घृतश्रुतमुग्रं खदिरमोजसे.
तं बिभ्रच्चन्द्रमा मणिमसुराणां पुरो ऽ जयद् दानवानां हिरण्ययी:.
सो अस्मै श्रियमिद् दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (१०)
बृहस्पति ने फाल से उत्पन्न, घी टपकाने वाली, शक्तिशालिनी एवं खैर वृक्ष की लकड़ी
से बनी मणि को बल प्राप्ति के लिए बांधा था. उसे धारण करते हुए चंद्रमा ने असुरों के नगरों
एवं दानियों के स्वर्ण को जीत लिया था. यह मणि इस यजमान के लिए बारबार एवं प्रतिदिन
श्री प्रदान करे. हे यजमान! उस की सहायता से तू अपने शत्रुओं का विनाश कर. (१०)
यमबध्नाद् बृहस्पतिर्वाताय मणिमाशवे.
सो अस्मै वाजिनं दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि. (११)
बृहस्पति ने जिस को यह मणि वायु के समान शीघ्र गति प्राप्त करने के लिए बांधी, उस
के लिए यह मणि प्रतिदिन एवं बारबार घोड़े प्रदान करे. हे यजमान! उन की सहायता से तू
अपने शत्रुओं का विनाश कर. (११)
यमबध्नाद् बृहस्पतिर्वाताय मणिमाशवे.
तेनेमां मणिना कृषिमश्विनावभि रक्षतः.
स भिषग्भ्यां महो दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (१२)
बृहस्पति देव ने जिसे यह मणि वायु के समान शीघ्र गति प्राप्त करने के लिए बांधी,
उसी मणि के द्वारा अश्विनीकुमार इस कृषि की रक्षा करें. इस ने अश्विनीकुमारों का बारबार
एवं प्रतिदिन महत्त्व प्रदान किया. हे यजमान! इस मणि की सहायता से तू अपने शत्रुओं का
विनाश कर. (१२)
यमबध्नाद् बृहस्पतिर्वाताय मणिमाशवे.
तं बिभ्रत् सविता मणिं तेनेदमजयत् स्वः.
सो अस्मै सूनृतां दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (१३)
बृहस्पति देव ने जिस को यह मणि वायु के समान वेग प्राप्त करने के लिए बांधी थी,
उसे धारण करते हुए सविता देव ने स्वर्ग को विजय किया. उस ने यजमान के लिए सत्य
प्रदान किया. हे यजमान! इस से तू अपने शत्रुओं का विनाश कर. (१३)
यमबध्नाद् बृहस्पतिर्वाताय मणिमाशवे.
तमापो बिभ्रतीर्मणिं सदा धावन्त्यक्षिताः.
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सो आभ्यो ऽ मृतमिद् दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (१४)
बृहस्पति ने वायु के समान वेग प्राप्त करने के लिए जिस को यह मणि बांधी, उस मणि
को धारण करने वाले जल सदा अविनाशी हो कर दौड़ते है अर्थात् बहते हैं. इस मणि ने जलों
के लिए बारबार और प्रतिदिन अमृत प्रदान किया. हे यजमान! इस मणि की सहायता से तुम
शत्रुओं का विनाश करो. (१४)
यमबध्नाद् बृहस्पतिर्वाताय मणिमाशवे.
तं राजा वरुणो मणिं प्रत्यमुञ्चत शंभुवम्.
सो अस्मै सत्यमिद् दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (१५)
जिस मणि को बृहस्पति देव ने वायु के समान वेग प्राप्त करने के लिए बांधा, उसी
सुखदायी मणि को राजा वरुण ने हमें दिया है. वह मणि इस यजमान के लिए प्रतिदिन और
बारबार सत्य प्रदान करे. हे यजमान! इस की सहायता से तुम अपने शत्रु का विनाश करो.
(१५)
यमबध्नाद् बृहस्पतिर्वाताय मणिमाशवे.
तं देवा बिभ्रतो मणिं सर्वांल्लोकान् युधा ऽ जयन्.
स एभ्यो जितिमिद् दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (१६)
बृहस्पति देव ने जिस मणि को वायु के समान वेग प्राप्त करने के लिए बांधा था, उसी
मणि को धारण करने वाले देवों ने युद्ध के द्वारा सभी लोकों को जीत लिया. वह मणि इस
यजमान के लिए विजय प्रदान करे. हे यजमान! इस की सहायता से तू अपने शत्रुओं का
विनाश कर. (१६)
यमबध्नाद् बृहस्पतिर्वाताय मणिमाशवे.
तमिमं देवता मणिं प्रत्यमुञ्चन्त शंभुवम्.
स आभ्यो विश्वमिद् दुहे भूयोभूयः श्वः श्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (१७)
बृहस्पति ने वायु के समान वेग प्राप्त करने के लिए जिस मणि को बांधा, देवों ने उसी
सुखदायी मणि को मुझे दिया है. इस मणि ने देवों के लिए बारबार और प्रतिदिन सत्य प्रदान
किया है. हे यजमान! इस मणि की सहायता से तू अपने शत्रुओं का विनाश कर. (१७)
ऋतवस्तमबध्नतार्तवास्तमबध्नत. संवत्सरस्तं बद्ध्वा सर्वं भूतं वि रक्षति..
(१८)
वसंत आदि ऋतुओं ने इस मणि को बांधा और ऋतुओं से उत्पन्न चैत्र आदि मासों ने इस
मणि को बांधा है. संवत्सर इसी मणि को बांध कर समस्त प्राणियों की रक्षा करता है. (१८)
अन्तर्देशा अबध्नत प्रदिशस्तमबध्नत. प्रजापतिस्सृष्टो मणिर्द्विषतो मे ऽ धरां
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अंक:... (१९)
आग्नेय, ईशान आदि अंतर्दिशाओं ने इस मणि को बांधा तथा पूर्व आदि दिशाओं ने भी
इस को बांधा. प्रजापति के द्वारा निर्मित यह मणि मेरे शत्रुओं को पराजित करे. (१९)
अथर्वाणो अबध्नताथर्वणा अबध्नत.
तैर्मेदिनो अङ्गिरसो दस्यूनां बिभिदुः पुरस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (२०)
अथर्वा ऋषियों ने इस मणि को बांधा तथा उन की संतान आथर्वणों ने भी इस मणि को
बांधा. उन की अर्थात् अथर्वा ऋषियों और उन की संतान की सहायता से शक्तिशाली बने
अंगिरा गोत्र वालों ने लुटेरों के नगरों का विनाश कर दिया. हे यजमान! इस मणि की सहायता
से तू अपने शत्रुओं को मार. (२०)
तं धाता प्रत्यमुञ्चत स भूतं व्यकल्पयत्. तेन त्वं द्विषतो जहि.. (२१)
इस मणि को विधाता ने हमें दिया. विधाता ने इस मणि की सहायता से समस्त प्राणियों
की रचना की. हे यजमान! इस मणि की सहायता से तू अपने शत्रुओं का विनाश कर. (२१)
यमबध्नाद् बृहस्पतिर्देवेभ्यो असुरक्षितिम्. स मा ऽ यं मणिरागमद् रसेन
सहवर्चसा... (२२)
बृहस्पति ने असुरों का विनाश करने वाली जिस मणि को देवों के हाथों में बांधा था,
वही मणि रस और तेज के साथ मेरे पास आई है. (२२)
यमबध्नाद् बृहस्पतिर्देवेभ्यो असुरक्षितिम्.
स मा ऽ यं मणिरागमत् सह गोभिरजाविभिरन्नेन प्रजया सह.. (२३)
बृहस्पति ने असुरों का विनाश करने वाली जिस मणि को देवों के हाथों में बांधा था,
वही मणि गायों, बकरियों, भेड़ों, अन्न एवं संतान के साथ मुझे प्राप्त हुई है. (२३)
यमबध्नाद् बृहस्पतिर्देवेभ्यो असुरक्षितिम्.
स मा ऽ यं मणिरागमत् सह व्रीहियवाभ्यां महसा भूत्या सह.. (२४)
बृहस्पति ने असुरों का विनाश करने वाली जिस मणि को देवों के हाथों में बांधा था,
वही मणि गेहूं, जौ एवं महान विभूति के साथ मुझे प्राप्त हुई है. (२४)
यमबध्नाद् बृहस्पतिर्देवेभ्यो असुरक्षितिम्.
स मा ऽ यं मणिरागन्मन्धोर्घृतस्य धारया कीलालेन मणिः सह.. (२५)
असुरों का विनाश करने वाली जिस मणि को बृहस्पति ने देवों के हाथों में बांधा था,
वही मणि मधु एवं घृत की धाराओं तथा मदिरा की धाराओं के साथ मुझे प्राप्त हुई है. (२५)
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यमबध्नाद् बृहस्पतिर्देवेभ्यो असुरक्षितिम्.
स मा ऽ यं मणिरागमदूर्जया पयसा सह द्रविणेन श्रिया सह.. (२६)
बृहस्पति देव ने असुरों का विनाश करने वाली जिस मणि को देवों के हाथों में बांधा था,
वही मणि ऊर्जा, दूध एवं शोभा के साथ मुझे प्राप्त हुई है. (२६)
यमबध्नाद् बृहस्पतिर्देवेभ्यो असुरक्षितिम्.
स मा ऽ यं मणिरागमत् तेजसा त्विष्या सह यशसा कीर्त्या सह.. (२७)
बृहस्पति ने असुरों का विनाश करने वाली जिस मणि को देवों के हाथों में बांधा था,
वही मणि तेज, प्रकाश, यश एवं कीर्ति के साथ मुझे प्राप्त हुई है. (२७)
यमबध्नाद् बृहस्पतिर्देवेभ्यो असुरक्षितिम्.
स मा ऽ यं मणिरागमत् सर्वाभिर्भूतिभिः सह.. (२८)
बृहस्पति ने असुरों का विनाश करने वाली जिस मणि को देवों के हाथों में बांधा था,
वही मणि मुझे समस्त विभूतियों के साथ प्राप्त हुई है. (२८)
तमिमं देवता मणिं मह्यं ददतु पुष्टये.
अभिभुं क्षत्रवर्धनं सपत्नदम्भनं मणिम्... (२९)
देव वही मणि मुझे पुष्टि के लिए प्रदान करें. वह मणि शत्रु नाशक, क्षात्र शक्ति बढ़ाने
वाली एवं शत्रु का विनाश करने वाली है. (२९)
ब्रह्मणा तेजसा सह प्रति मुञ्चामि मे शिवम्.
असपत्नः सपत्नहा सपत्नान् मेऽधरां अकः.. (३०)
ब्रह्म तेज के साथ मैं इस मणि को धारण करता हूं. यह मणि मेरे लिए कल्याणकारी है.
इस मणि का कोई शत्रु नहीं है. शत्रुघातक इस मणि ने मेरे शत्रुओं की अवनति की है. (३०)
उत्तरं द्विषतो मामयं मणिः कृणोतु देवजाः.
यस्य लोका इमे त्रयः पयो दुग्धमुपासते.
स मा ऽ यमधि रोहतु मणिः श्रेष्ठ्याय मूर्धतः.. (३१)
देवों से उत्पन्न इस मणि ने मुझे शत्रुओं की अपेक्षा उत्तम स्थिति में रखा. इस मणि से
दुहे सार रूप दूध का तीनों लोक सेवन करते हैं. यह मणि मुझे श्रेष्ठ स्थान पर आरोपित करे.
(३१)
यं देवाः पितरो मनुष्या उपजीवन्ति सर्वदा.
स मायमधि रोहतु मणिः श्रेष्ठ्याय मूर्धतः.. (३२)
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देव, मनुष्य और पितर सदा जिस मणि के सहारे जीवित रहते हैं, वह मणि मुझे श्रेष्ठ
स्थान पर आरोपित करे. (३२)
यथा बीजमुर्वरायां कृष्टे फालेन रोहति.
एवा मयि प्रजा पशवो ऽ न्नमन्नं वि रोहतु.. (३३)
जिस प्रकार हल के फाल से जुती हुई उपजाऊ भूमि में बीज उगता है, उसी प्रकार मुझे
पुत्र, पौत्र आदि संतान, अन्न और पशु प्राप्त हों. (३३)
यस्मै त्वा यज्ञवर्धन मणे प्रत्यमुचं शिवम्.
तं त्वं शतदक्षिण मणे श्रेष्ठ्याय जिन्वतात्.. (३४)
हे यज्ञ बढ़ाने वाली मणि! तू कल्याणकारिणी है. मैं तुझे जिस को बांधूं, तू उस को
श्रेष्ठता प्रदान कर. (३४)
एतमिध्मं समाहितं जुषाणो अग्ने प्रति हर्य होमैः.
तस्मिन् विदेम सुमतिं स्वस्ति प्रजां चक्षुः पशून्त्समिद्धे जातवेदसि
ब्रह्मणा.. (३५)
हे अग्नि! इस मणि को प्राप्त होते हुए तुम हवनों से समृद्धि प्राप्त करो. इस प्रज्वलित
अग्नि में ब्रह्म ज्ञान के द्वारा उत्तम बुद्धि, कल्याण, संतान, आंखें तथा पशुओं को प्राप्त करो.
(३५)
सूक्त-७ देवता—स्कंभ, अध्यात्म
कस्मिन्नङ्गे तपो अस्याधि तिष्ठति कस्मिन्नङ्ग ऋतमस्याध्याहितम्.
क्व व्रतं क्व श्रद्ध ऽ स्य तिष्ठति कस्मिन्नङ्गे सत्यमस्य प्रतिष्ठितम्.. (१)
इस मनुष्य के किस अंग में तपस्या करने की शक्ति स्थित है? इस मनुष्य के किस अंग
में सत्य भाषण की क्षमता स्थित है? इस मनुष्य के किस अंग में व्रत अर्थात् दृढ़ निश्चय और
श्रद्धा, किस अंग में स्थित रहती है? इस मनुष्य के किस अंग में सत्य प्रतिष्ठित है? (१)
कस्मादङ्गाद् दीप्यते अग्निरस्य कस्मादङ्गात् पवते मातरिश्वा.
कस्मादङ्गाद् वि मिमीते ऽ धि चन्द्रमा मह स्कम्भस्य मिमानो अङ्गम्.. (२)
इस परमेश्वर के किस अंग से अग्नि दीप्त होती है? इस के किस अंग से वायु चलती है?
चंद्रमा का निर्माण इस के किस अंग से हुआ है? वह चंद्रमा इस विश्वाधार से किस अंग को
नापता है? (२)
कस्मिन्नङ्गे तिष्ठति भूमिरस्य कस्मिन्नङ्गे तिष्ठत्यन्तरिक्षम्.
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कस्मिन्नङ्गे तिष्ठत्याहिता द्यौः कस्मिन्नङ्गे तिष्ठत्युत्तरं दिवः.. (३)
इस परमात्मा के किस अंग में भूमि स्थित रहती है? इस के किस अंग में अंतरिक्ष होता
है? यह दृढ़ द्यौ इस के किस अंग में स्थित है? ऊंचा स्वर्ग इस के किस अंग में स्थित है? (३)
क्व १ प्रेप्सन् दीप्यत ऊर्ध्वो अग्निः क्व १ प्रेप्सन् पवते मातरिश्वा.
यत्र प्रेप्सन्तीरभियन्त्यावृतः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः.. (४)
ऊपर की ओर चलने वाली अग्नि, कहां जाने की इच्छा से प्रज्वलित होती है? वायु कहां
जाने की इच्छा करती हुई चलती हैं? आवागमन के चक्कर में पड़े हुए प्राणी जहां जाने की
इच्छा से गतिशील हैं, उस जगदाधार का वर्णन करो कि वह कौन है. (४)
क्वार्धमासाः क्व यन्ति मासाः संवत्सरेण सह संविदानाः.
यत्र यन्त्यृतवो यत्रार्तवाः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः.. (५)
संवत्सर के साथ मिलते हुए अर्धमास अर्थात् पक्ष एवं मास कहां चले जाते हैं? ये ऋतुएं
और ऋतुओं से संबंधित पदार्थ कहां चले जाते हैं? उस परमात्मा के विषय में बताओ कि वह
क्या है? (५)
क्व १ प्रेप्सन्ती युवती विरूपे अहोरात्रे द्रवतः संविदाने.
यत्र प्रेप्सन्तीरभियन्त्यापः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः.. (६)
परस्पर विरोधी रूप वाले युवा दिन और युवती रात कहां जाने की इच्छा से एकमत हो
कर जाते हैं. जल जहां जाने की इच्छा से चले आ रहे हैं, उसी परमात्मा के विषय में बताओ
कि वह कौन है? (६)
यस्मिंस्तस्तब्ध्वा प्रजापतिर्लोकान्त्सर्वां अधारयत्.
स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः.. (७)
जिस में स्थित रह कर प्रजापति समस्त लोकों को धारण करता है, उस परमात्मा के
विषय में बताओ कि वह कौन है? (७)
यत् परममवमं यच्च मध्यमं प्रजापतिः ससृजे विश्वरूपम्.
कियता स्कम्भः प्र विवेश तत्र यन्न प्राविशत् कियत् तद् बभूव.. (८)
प्रजापति ने उत्तम, अधम और मध्यम के रूप में संसार की सभी वस्तुओं और प्राणियों
को बनाया है. इस संसार के कितने पदार्थ प्रजापति में प्रवेश कर चुके हैं? जो प्रवेश नहीं
करता, वह कौन है? (८)
कियता स्कम्भः प्र विवेश भूतं कियद् भविष्यदन्वाशये ऽस्य.
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एकं यदङ्गमकृणोत् सहस्रधा कियता स्कम्भः प्र विवेश तत्र.. (९)
कितने पदार्थ भूतकाल में प्रवेश कर चुके हैं अर्थात् नष्ट हो चुके हैं? इस के आशय
अर्थात् उदर में कितने पदार्थ होंगे? अर्थात् भविष्य में कितने पदार्थ उत्पन्न होंगे. इस ने
अर्थात् परमात्मा ने अपने एक अंश को हजारों रूपों में प्रकट किया है, उस में कितने पदार्थों
ने प्रवेश किया? (९)
यत्र लोकांश्च कोशांश्चापो ब्रह्म जना विदुः.
असच्च यत्र सच्चान्तः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः.. (१०)
ज्ञानी लोग जानते है कि जहां लोक और कोष निवास करते हैं तथा जहां जल एवं ब्रह्म
स्थित हैं, सत्य और असत्य दोनों प्रकार के पदार्थ जहां स्थित हैं, उस परमात्मा के विषय में
बताओ कि वह कौन है? (१०)
यत्र तपः पराक्रम्य व्रतं धारयत्युत्तरम्.
ऋतं च यत्र श्रद्धा चापो ब्रह्म समाहिताः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव
सः.. (११)
जिस को आधार बना कर तपस्या का विधान किया जाता है एवं उत्तम वृत्तों का निर्वाह
होता है, जिस में सत्य श्रद्धा जल एवं ब्रह्म व्याप्त हैं, उस परमात्मा के विषय में बताओ कि
वह कौन है? (११)
यस्मिन् भूमिरन्तरिक्षं द्यौर्यस्मिन्नध्याहिता.
यत्राग्निश्चन्द्रमाः सूर्यो वातस्तिष्ठन्त्यार्पिताः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव
सः.. (१२)
जिस के आधार पर भूमि, आकाश और स्वर्ग टिके हुए हैं तथा अग्नि, चंद्रमा, सूर्य और
वायु जिस में अर्पित हो कर स्थित है, उस परमेश्वर के विषय में बताओ कि वह कौन है?
(१२)
यस्य त्रयस्त्रिंशद् देवा अङ्गे सर्वे समाहिताः.
स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः.. (१३)
जिस के अंग में सभी तैंतीस देव समाए हुए हैं, उस परमेश्वर के विषय में बताओ कि वह
कौन है? (१३)
यत्र ऋषयः प्रथमजा ऋचः साम यजुर्मही.
एकर्षिर्यस्मिन्नार्पितः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः.. (१४)
पूर्ववर्ती ऋषि, ऋचाएं, साममंत्र, यजुर्वेद के मंत्र तथा महती ब्रह्मविद्या जिस में स्थित है
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एवं एक ऋषि जिस में समाया हुआ है, उस परमात्मा के विषय में बताओ कि वह कौन है?
(१४)
यत्रामृतं च मृत्युश्च पुरुषे ऽ धि समाहिते.
समुद्रो यस्य नाड्य १: पुरुषे ऽ धि समाहिता:
स्कम्भं तं ब्रूहि कतम: स्विदेव स:.. (१५)
जिस आदि पुरुष में अमृत और मृत्यु स्थित हैं तथा सागर जिस आदि पुरुष की नाड़ियों
में समाया हुआ है, उस परमेश्वर के विषय में बताओ कि वह कौन है? (१५)
यस्य चतस्र: प्रदिशो नाड्य १ स्तिष्ठन्ति प्रथमा:.
यज्ञो यत्र पराक्रान्त: स्कम्भं तं ब्रूहि कतम: स्विदेव स:.. (१६)
जिस आदि पुरुष के शरीर में प्रथम कल्पित पूर्व, पश्चिम आदि चार दिशाएं नाड़ियों के
रूप में स्थित है तथा यज्ञ जहां पराक्रम करता है, उस परमेश्वर के विषय में बताओ कि वह
कौन है? (१६)
ये पुरुषे ब्रह्म विदुस्ते विदु: परमेष्ठिनम्.
यो वेद परमेष्ठिनं यश्च वेद प्रजापतिम्.
ज्येष्ठं ये ब्राह्मणं विदुस्ते स्कम्भमनुसंविदु:.. (१७)
जो इस आदि पुरुष में ब्रह्म को स्थित जानते हैं, वे परमेष्ठी को जानते हैं. जो परमेष्ठी
एवं प्रजापति को जानता है तथा जो उत्तम ब्राह्मण को जानता है, वह परमात्मा को
भलीभांति जानता है. (१७)
यस्य शिरो वैश्वानरश्चक्षुरङ्गिरसो ऽ भवन्.
अङ्गानि यस्य यातव: स्कम्भं तं ब्रूहि कतम: स्विदेव स:.. (१८)
जिस का शीश वैश्वानर अग्नि और नेत्र अंगिरस हुए, जिस के अंग ही राक्षस बने, उस
परमात्मा के विषय में बताओ कि वह कौन है? (१८)
यस्य ब्रह्म मुखमाहुजिह्वां मधुकशामुत.
विराजमूधो यस्याहु: स्कम्भं तं ब्रूहि कतम: स्विदेव स:.. (१९)
ब्रह्म जिस का मुख कहा गया है, मधुकशा जिस की जीभ बताई गई है एवं विराट् ऐन
कहा गया है, उस ब्रह्म के विषय में बताओ कि वह कौन है? (१९)
यस्मादृचो अपातक्षन् यजुर्यस्मादपाकषन्.
सामानि यस्य लोमान्यथर्वा ऽ ङ्गिरसो मुखं स्कम्भं तं ब्रूहि कतम: स्विदेव
स:.. (२०)
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जिस से ऋचाएं बनीं एवं जिस से यजुर्वेद के मंत्र बने, सामवेद के मंत्र जिस के रोम एवं
अथर्ववेद के मंत्र जिस का मुख है, उस परमेश्वर के विषय में बताओ कि वह कौन है? (२०)
असच्छाखां प्रतिष्ठन्तीं परममिव जना विदुः.
उतो सन्मन्यन्ते ऽ वरे ये ते शाखामुपासते.. (२१)
असत् अर्थात् निराकार से उत्पन्न हुई शाखा स्थित है. मनुष्य उसी को सब से श्रेष्ठ तत्त्व
मानते हैं तथा उस शाखा की उपासना करते हैं. (२१)
यत्रादित्याश्च रुद्राश्च वसवश्च समाहिताः.
भूतं च यत्र भव्यं च सर्वे लोकाः प्रतिष्ठिताः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव
सः.. (२२)
जिस में बारह आदित्य, एकादश रुद्र और आठ वसु समाए हुए हैं, उस परमेश्वर के
विषय में बताओ कि वह कौन है. (२२)
यस्य त्रयस्त्रिंशद् देवा निधिं रक्षन्ति सर्वदा.
निधिं तमद्य को वेद यं देवा अभिरक्षथ.. (२३)
तैंतीस देवता सदा जिस की निधि अर्थात् खजाने की रक्षा करते हैं, हे देवो! जिस की
निधि की तुम रक्षा करते हो, आज उसे कौन जानता है? (२३)
यत्र देवा ब्रह्मविदो ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते.
यो वै तान् विद्यात् प्रत्यक्षं स ब्रह्मा वेदिता स्यात्.. (२४)
उस ब्रह्म को जानने वाले देव ज्येष्ठ ब्रह्म की उपासना करते हैं, जो उस ब्रह्म को निश्चित
रूप से जानता है, वह ब्रह्म हो सकता है. (२४)
बृहन्तो नाम ते देवा ये ऽ सतः परि जज्ञिरे.
एकं तदङ्गं स्कम्भस्यासदाहुः परो जनाः.. (२५)
वे बृहत् नाम के देव हैं, जो असत् अर्थात् प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं. लोक उन्हें श्रेष्ठ कहता
है. (२५)
यत्र स्कम्भः प्रजनयन् पुराणं व्यवर्तयत्.
एकं तदङ्गं स्कम्भस्य पुराणमनुसंविदुः.. (२६)
जहां परमात्मा पुराण पुरुष को उत्पन्न करता हुआ विस्तृत करता है, उस परमात्मा के
एक अंग को ज्ञानी जन पुराण के नाम से ही जानते हैं. (२६)
यस्य त्रयस्त्रिंशद् देवा अङ्गे गात्रा विभेजिरे.
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तान् वै त्रयस्त्रिंशद् देवानेके ब्रह्मविदो विदुः.. (२७)
जिस के शरीर के अवयवों में तैंतीस देवता अलगअलग निवास करते हैं, उन तैंतीस देवों
को केवल वे ही जानते हैं जो ब्रह्म के ज्ञाता हैं. (२७)
हिरण्यगर्भं परममनत्युद्यं जना विदुः.
स्कम्भस्तदग्रे प्रासिञ्चद्धिरण्यं लोके अन्तरा.. (२८)
लोग हिरण्यगर्भ को महान और श्रेष्ठ जानते हैं. परमात्मा ने ही इस संसार के मध्य उस
हिरण्यगर्भ को बनाया था. (२८)
स्कम्भे लोकाः स्कम्भे तपः स्कम्भे ऽ ध्यृतमाहितम्.
स्कम्भं त्वा वेद प्रत्यक्षमिन्द्रे सर्वं समाहितम्.. (२९)
उस परमात्मा में समस्त लोक, तप और ऋत अर्थात् सत्य समाया हुआ है. हे परमात्मा!
मैं तुझे प्रत्यक्ष रूप से जानता हूं. इंद्र में ही यह सब समाया हुआ है. (२९)
इन्द्रे लोका इन्द्रे तप इन्द्रे ऽ ध्यृतमाहितम्.
इन्द्रं त्वा वेद प्रत्यक्षं स्कम्भे सर्वं प्रतिष्ठितम्.. (३०)
इंद्र में समस्त लोक, तप और ऋत अर्थात् सत्य समाया हुआ है. हे इंद्र! मैं तुझे प्रत्यक्ष
रूप से जानता हूं. परमात्मा में ही यह सब समाया हुआ है. (३०)
नाम नाम्ना जोहवीति पुरा सूर्यात् पुरोषसः.
यदजः प्रथमं संबभूव स ह तत् स्वराज्यमियाय यस्मान्नान्यत् परमस्ति
भूतम्.. (३१)
सूर्योदय से पूर्व एवं उषा काल से पूर्व श्रद्धालु जन नाम के द्वारा नाम का हवन करते हैं
अर्थात् परमात्मा के नाम के द्वारा उस के महत्त्व का वर्णन करते हैं. इस प्रकार प्रयत्नशील
जो अजन्मा आत्मा अर्थात् भक्त परमात्मा के साथ संयोग प्राप्त करता है, वह स्वराज्य को
प्राप्त करता है अर्थात् जन्ममरण के बंधन से मुक्ति पा जाता है. उस परमात्मा की अपेक्षा
कोई तत्त्व श्रेष्ठ नहीं है. (३१)
यस्य भूमिः प्रमा ऽ न्तरिक्षमुतोदरम्.
दिवं यश्चक्रे मूर्धानं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः.. (३२)
धरती जिस के पैरों का नाम है, अंतरिक्ष जिस का उदर है तथा जिस ने स्वर्ग को अपना
शीश बनाया है, उस ज्येष्ठ ब्रह्म को मेरा नमस्कार है. (३२)
यस्य सूर्यश्चक्षुश्चन्द्रमाश्च पुनर्णवः.
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अग्निं यश्चक्र आस्यं १ तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः.. (३३)
सूर्य एवं बारबार नवीन होने वाला चंद्रमा जिस के नेत्र हैं तथा अग्नि को जिस ने अपना मुख बनाया है, उस श्रेष्ठ ब्रह्म के लिए मेरा नमस्कार है. (३३)
यस्य वातः प्राणापानौ चक्षुरङ्गिरसो ऽ भवन्.
दिशो यश्चक्रे प्रज्ञानीस्तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः.. (३४)
वायु जिस के प्राण और अपान तथा अंगिरस जिस के नेत्र बने थे तथा दिशाओं को जिस ने अपनी प्रज्ञा का साधन बनाया था, उस ज्येष्ठ के लिए मेरा नमस्कार है. (३४)
स्कम्भो दाधार द्यावापृथिवी उभे इमे स्कम्भो दाधारोर्व१न्तरिक्षम्.
स्कम्भो दाधार प्रदिशः षडुर्वीः स्कम्भ इदं विश्वं भुवनमा विवेश.. (३५)
परमात्मा ने स्वर्ग और पृथिवी दोनों को धारण किया है. उसी ने अंतरिक्ष अर्थात् आकाश को धारण किया है. उसी परमात्मा ने छः विशाल दिशाओं —अर्थात् पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर और नीचे की दिशाओं को धारण किया है. वही परमात्मा इस सारे संसार में समाया हुआ है. (३५)
यः श्रमात् तपसो जातो लोकान्तसर्वान्‍त्समानशे.
सोमं यश्चक्रे केवलं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः.. (३६)
जो तपस्या रूपी श्रम से उत्पन्न हो कर समस्त लोकों में व्याप्त रहता है तथा जिस ने एक मात्र सोमलता को ही उत्तम जड़ी बनाया है, उस श्रेष्ठ परमात्मा के लिए मेरा नमस्कार है. (३६)
कथं वातो नेलयति कथं न रमते मनः.
किमापः सत्यं प्रेप्सन्तीर्नेलयन्ति कदा चन.. (३७)
वायु स्थिर क्यों नहीं रहती तथा मन शांत क्यों नहीं रहता? सत्य की अभिलाषा करते हुए जल कभी अस्थिर क्यों नहीं होते? (३७)
महत् यक्षं भुवनस्य मध्ये तपसि क्रान्तं सलिलस्य पृष्ठे.
तस्मिञ्छ्रयन्ते य उ के च देवा वृक्षस्य स्कन्धः परित इव शाखाः.. (३८)
संसार के मध्य महान यक्ष, अर्थात् परमात्मा है. संताप अर्थात् गरमी देने वाला वह परमात्मा जल के ऊपर वर्तमान है. ऐसा सुना जाता है कि सभी देव उस में इस प्रकार व्याप्त हैं, जिस प्रकार वृक्ष की शाखाएं उस में व्याप्त रहती हैं. (३८)
यस्मै हस्ताभ्यां पादाभ्यां वाचा श्रोत्रेण चक्षुषा.
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यस्मै देवाः सदा बलिं प्रयच्छन्ति विमिते ऽ मितं स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः
स्विदेव सः.. (३९)
जिस असीमित परमात्मा के लिए देवगण हाथों, पैरों, वाणी, कानों और आंखों के द्वारा
सदा उपहार प्रदान करते हैं, उसी परमात्मा के विषय में बताओ कि वह कौन है? (३९)
अप तस्य हतं तमो व्यावृतः स पाप्मना.
सर्वाणि तस्मिन्ज्योतींषि यानि त्रीणि प्रजापतौ.. (४०)
जो परमात्मा को जान लेता है, उस का अज्ञान मिट जाता है तथा उस का पाप नष्ट हो
जाता है. प्रजापति में जो तीन ज्योतियां हैं, वे उसे प्राप्त हो जाती हैं. (४०)
यो वेतसं हिरण्ययं तिष्ठन्तं सलिले वेद. स वै गुह्यः प्रजापतिः.. (४१)
जल में सोने का बेंत ठहरा हुआ है. जो इस बात को जानता है, वही गुप्त प्रजापति है.
(४१)
तन्त्रमेके युवती विरूपे अभ्याक्रामं वयत: षण्मयूखम्.
प्रान्या तन्तूंस्तिरते धत्ते अन्या नाप वृञ्जाते न गमातो अन्तम्.. (४२)
एक दूसरे से भिन्न रूप वाली दो युवतियां लगातार घूमती हैं तथा छः खूटियों वाला एक
ताना पूरती हैं. उन में से एक धागों को फैलाती है और दूसरी उन्हें संभाल कर रखती है
अर्थात् समेटती है. वे दोनों न विश्राम करती हैं और न अंत को प्राप्त होती हैं. तात्पर्य यह है
कि रात और दिन ही वे युवतियां हैं. छः ऋतुएं छः खूंटे तथा समय ही अनंग धागा है. (४२)
तयोरहं परिनृत्यन्त्योरिव न वि जानामि यतरा परस्तात्.
पुमानेनद् वयत्युद् गृणत्ति पुमानेनद् वि जभाराधि नाके.. (४३)
उन नृत्य करती हुई दो स्त्रियों अर्थात् दिन और रात में कौन सी दूसरी है, यह मैं नहीं
जानता. उस वस्त्र को एक पुरुष बुनता है तथा दूसरा उधेड़ता है. इसे वह स्वर्ग में धारण
करता है. (४३)
इमे मयूखा उप तस्तभुर्दिवं सामानि चक्रुस्तसराणि वातवे.. (४४)
ये खूटियां अर्थात् छः ऋतुएं स्वर्ग को धारण करती है तथा वस्त्र बुनने के लिए सामवेद
के मंत्रों को धागा बनाए हुए हैं. (४४)
सूक्त-८ देवता—अध्यात्म
यो भूतं च भव्यं च सर्वं यश्चाधितिष्ठति.
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स्व १ र्यस्य च केवलं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः.. (१)
जो इन भूत, भविष्य तथा वर्तमान कालों को व्याप्त कर के स्थित है तथा जिस का
स्वरूप केवल प्रकाशमय है, उसी ज्येष्ठ ब्रह्म को मैं नमस्कार करता हूं. (१)
स्कम्भेनेमे विष्टभिते द्यौश्च भूमिश्च तिष्ठतः.
स्कम्भ इदं सर्वमात्मन्वद् यत् प्राणन्निमिषच्च यत्.. (२)
परमात्मा के द्वारा धारण की हुई भूमि और स्वर्ग अपने स्थान पर स्थित हैं. जो सांस
लेते हैं और जो पलक झपकाते हैं, वे सब आत्मा के समान परमात्मा में व्याप्त हैं. (२)
तिस्रो ह प्रजा अत्यायमायन् न्य १ न्या अर्कमभितो ऽ विशन्त.
बृहन् ह तस्थौ रजसो विमानो हरितो हरिणीरा विवेश.. (३)
तीन प्रकार की प्रजाएं अतिक्रमण करती हुई परमेश्वर को प्राप्त होती हैं. एक प्रकार की
अर्थात् सतोगुणी प्रजाएं सूर्य में प्रविष्ट होती हैं. दूसरे प्रकार की अर्थात् रजोगुणी प्रजाएं
रजौलोक को नापती हुई स्थित रहती हैं. तीसरी अर्थात् तमोगुणी प्रजाएं सब का हरण करती
हुई हरे रंग में अर्थात् अंधकार में प्रवेश करती हैं. (३)
द्वादश प्रधयश्चक्रमेकं त्रीणि नभ्यानि क उ तच्चिकेत.
तत्राहतास्त्रीणि शतानि शङ्कवः षष्टिश्च खीला अविचाचला ये.. (४)
बारह अरे तथा तीन नेमियां एक पहिए से संबंधित हैं. बारह मास, बारह अरे तथा शीत,
ग्रीष्म, वर्षा, तीन ऋतुएं तीन नेमियां हैं. ये समय रूपी पहिए में स्थित हैं. इस बात को कौन
जानता है अर्थात् कोई नहीं जानता. उस पहिए में तीन सौ साठ खूंटियां तथा इतनी ही कीलें
लगाई गई हैं जो स्थिर हैं. वर्ष के दिन और रात ही खूंटियां और कीलें हैं. (४)
इदं सवितर्वि जानीहि षड् यमा एक एकजः.
तस्मिन् हापित्वमिच्छन्ते य एषामेक एकजः.. (५)
हे सविता देव! तुम यह जानो कि ये एक से एक बने हुए छः जोड़े हैं. इन में जो एकएक
से बने जोड़े हैं, वे उस में समाहित होना चाहते हैं. तात्पर्य दो-दो मासों वाली छः ऋतुओं के
वर्ष अथवा काल में समाहित होने से है. (५)
आविः सन्निहितं गुहा जरन्नाम महत् पदम्.
तत्त्रेदं सर्वमार्पितमेजत् प्राणत् प्रतिष्ठितम्.. (६)
प्रकट होने वाला एवं संचार करने वाला महत्त्व पद गुफा में है. यह शरीर ही गुफा है
और आत्मा उस में संचार करने वाला महत्त्व पद है. वह महत्त्व पद अर्थात् आत्मा गतिशील
एवं सांस लेने वाला है तथा उसी में यह सारा विश्व समाहित और प्रतिष्ठित है. (६)
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एकचक्रं वर्तत एकनेमि सहस्राक्षरं प्र पुरो नि पश्चा.
अर्धेन विश्वं भुवनं जजान यदस्यार्धं क्व १ तद् बभूव.. (७)
बीच की नाभि वाला एक पहिया है. इस में आगेपीछे से हजार अरे लगे हुए हैं. यह
पहिया लगातार चल रहा है. इस के आधे भाग से संसार उत्पन्न हुआ है तथा इस का शेष भाग
कहां है? सूर्य ही एक नाभि वाला एक पहिया है. उस की हजार किरणें हजार अरे हैं. दिन
उस का आधा भाग है, जिस के कारण संसार गतिशील रहता है. शेष आधा भाग अर्थात् रात्रि
में वह सूर्य न जाने कहां चला जाता है? (७)
पञ्चवाही वहत्यग्रमेषां प्रष्टयो युक्ता अनुसंवहन्ति.
अयातमस्य ददृशे न यातं परं नेदीयो ऽ वरं दवीय:.. (८)
इन में जो आगे चलने वाला है, वह पंचवाही (पांच के द्वारा उठाया जाने वाला). इस में
जुड़े हुए घोड़े इसे ठीक से ले कर चलते हैं. इस का न आना दिखाई देता है और न जाना. यह
अत्यंत दूर और अत्यधिक समीप है. तात्पर्य यह है कि प्राण, अपान पांच वायुएं जीवन को
गतिशील रखती हैं. इंद्रियां ही शरीर को आगे बढ़ाने वाले घोड़े हैं. शरीर में आत्मा का आना
और जाना दृष्टिगोचर नहीं होता है. यह आत्मा अत्यंत समीप और अत्यधिक दूर है. (८)
तिर्यग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नस्तस्मिन् यशो निहितं विश्वरूपम्.
तदासत ऋषय: सप्त साकं ये अस्य गोपा महतो बभूवु:.. (९)
एक चमचा है, जिस का मुख नीचे की ओर है और जड़ अर्थात् पकड़ने वाला भाग
ऊपर की ओर है. उस में अनेक रूपों वाला यशस्वी छिपा हुआ है. वहां सात ऋषि एक साथ
बैठे हैं. वे ही अनेक रूपों वाले के रक्षक बनें. (९)
या पुरस्ताद् युज्यते या च पश्चाद् या विश्वतो युज्यते या च सर्वतः.
यया यज्ञः प्राङ् तायते तां त्वा पृच्छामि कतमा सर्चाम्.. (१०)
ऋचाओं के मध्य वह कौन सी ऋचा है जो आगे से और पीछे से जुड़ी हुई है. जो चारों
ओर से तथा सभी प्रकार जुड़ी हुई है. जिस की सहायता से पूर्व की ओर यज्ञ विस्तृत किया
गया, मैं तुम से उसी के विषय में पूछता हूं. (१०)
यदेजति पतति यच्च तिष्ठति प्राणदप्राणन्निमिषच्च यद् भुवत्.
तद् दाधार पृथिवीं विश्वरूपं तत् संभूय भवत्येकमेव.. (११)
जो कांपता है, गिरता है और स्थित रहता है; जो सांस लेता है, सांस नहीं लेता तथा सत्
है, उसी विश्व रूप ने पृथ्वी को धारण किया है. वह सब से मिल कर एक रूप हो जाता है.
(११)
अनन्तं विततं पुरुत्रा ऽ नन्तमन्तवच्चा समन्ते.
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