भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

दिया है. उन के द्वारा उत्पन्न विशेष स्नेह से मैं तुम्हारे मन को संताप युक्त करता हूं. (१) शोचयामसि ते हार्दि शोचयामसि ते मनः. वातं धूम इव सध्य १ ङ् मामेवान्वेतु ते मनः.. (२) हे पति और पत्नी! मैं तुम दोनों के हृदयों को परस्पर प्रेम उत्पन्न कर के संतप्त करता हूं. मैं तुम्हारे मन को उसी प्रकार संतप्त करता हूं, जिस प्रकार धुआं वायु का अनुगमन करता है. तुम्हारा मन इसी प्रकार मेरा अनुगामी हो. (२) मह्यं त्वा मित्रावरुणो मह्यं देवी सरस्वती. मह्यं त्वा मध्यं भूम्या उभावन्तौ समस्यताम्.. (३) हे पत्नी! मित्र और वरुण देव तुम्हें मुझ से मिलाएं. सरस्वती देवी तुम्हें मुझ से मिलाएं. धरती पर स्थित सभी प्राणी तुम्हें मुझ से मिलाएं तथा इस भूमि के ऊपर और नीचे के प्रदेश तुम्हें मुझ से मिलाएं. (३) सूक्त-९० देवता—रुद्र यां ते रुद्र इषुमास्यदङ्गेभ्यो हृदयाय च. इदं तामद्य त्वद् वयं विषूचीं वि वृहामसि.. (१) हे रोगी! तेरे हाथ, पैर और हृदय आदि अंगों को बेधने के लिए रुद्र देव ने जो बाण अपने धनुष पर चढ़ा कर फेंका है, आज मैं उस का प्रतिकार करने के लिए उस बाण को तुझ से विमुख करने के लिए शरीर से दूर फेंकता हूं. (१) यास्ते शतं धमनयो ऽ ङ्गान्यनु विष्ठिताः. तासां ते सर्वासां वयं निर्विषाणि ह्वयामसि.. (२) हे शूल रोगी! तेरे हाथ, पैर आदि अंगों में जो सैकड़ों धमनी नाड़ियां स्थित हैं, उन के लिए मैं विषरहित एवं शूलहीन ओषधियां बनाता हूं. (२) नमस्ते रुद्रास्यते नमः प्रतिहितायै. नमो विसृज्यमानायै नमो निपतितायै.. (३) हे व्याधि रूप अस्त्र चलाने वाले रुद्र! तुम को नमस्कार है. धनुष पर चढ़े हुए तुम्हारे बाण को नमस्कार है. धनुष से छोड़े जाते हुए तुम्हारे बाण को नमस्कार है. लक्ष्य पर गिरने वाले तुम्हारे बाण को नमस्कार है. (३) सूक्त-९१ देवता—यक्ष्मा का विनाश ebook converter DEMO Watermarks*

इमं यवमष्टायोगैः षड्योगेभिरचर्कृषुः. तेना ते तन्वो ३ रपो ऽ पाचीनमप व्यये.. (१) ओषधि के रूप में प्रयोग में लाए जाते हुए जौ को आठ बैलों वाले तथा छः बैलों वाले हल से जोत कर उत्पन्न किया गया है. हे रोगी! उस जौ से मैं तेरे शरीर के रोग के कारण पाप को दूर करता हूं. (१) न्यग्् वातो वाति न्यक् तपति सूर्यः. नीचीनमघ्न्या दुहे न्यग् भवतु ते रपः.. (२) वायु जिस प्रकार नीचे चलती है, सूर्य जिस प्रकार नीचे तपते हैं, जिस प्रकार गायों से नीचे की ओर दूध काढ़ा जाता है, हे रोगी! उसी प्रकार तेरे रोग का कारण पाप शांत हो जाए. (२) आप इद् वा उ भेषजीरापो अमीवचातनीः. आपो विश्वस्य भेषजीस्तास्ते कृण्वन्तु भेषजम्.. (३) सभी ओषधियां जल का विकार हैं. इस प्रकार जल ही रोग निवारण के लिए उत्तम ओषधि है. जल सारे संसार के लिए ओषधि रूप है, वे ही जल तेरे लिए रोग निवारक ओषधि बनें. (३) सूक्त-९२ देवता—बाजि अर्थात् घोड़ा वातरंहा भव वाजिन् युज्यमान इन्द्रस्य याहि प्रसवे मनोजवाः. युञ्जन्तु त्वा मरुतो विश्ववेदस आ ते त्वष्टा पत्सु जवं दधातु.. (१) हे रथ के जुए में जुते हुए अश्व! तू वायु के समान तेज चलने वाला बन. इंद्र की प्रेरणा होने पर तू मन के समान वेग से गंतव्य पर पहुंच. सारे संसार को जानने वाले उनचास मरुद्गण तुझ से मिल जाएं एवं त्वष्टा देव तेरे चरणों को वेग प्रदान करें. (१) जवस्ते अर्वन् निहितो गुहा यः श्येने वात उत यो ऽ चरत् परीत्तः. तेन त्वं वाजिन् बलवान् बलेनाजिं जय समने पारयिष्णुः.. (२) हे अश्व! तेरा वेग असाधारण स्थान गुफा में छिपा है. तेरा जो वेग बाज पक्षी और वायु में सुरक्षित है, तू उसी वेगशाली बल से बलवान हो कर हमें संग्राम में सफलता दिला. (२) तनूष्टे वाजिन् तन्वं१ नयन्ती वाममस्मभ्यं धातवु शर्म तुभ्यम्. अहुतो महो धरुणाय देवो दिवीव ज्योतिः स्वमा मिमीयात्.. (३) हे वेगवान अश्व! सवार के शरीर को युद्धभूमि में पहुंचाता हुआ तेरा शरीर हमें धन प्राप्त ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-९३ देवता—यम

कराए तथा तुझे सुख पहुंचाता हुआ दौड़े. तू खाली स्थान में फैले गांव, जनपद आदि को धारण करने के लिए सीधा चलता हुआ इस प्रकार अपने स्थान को जा, जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश अपने स्थान पर पहुंचता है. (३) सूक्त-९३ देवता—यम यमो मृत्युरघमारो निर्ऋथो बभ्रुः शर्वो ऽ स्ता नीलशिखण्डः. देवजनाः सेनयोत्तस्थिवांसस्ते अस्माकं परि वृञ्जन्तु वीरान्.. (१) पापियों की हिंसा के लिए यम, मृत्यु, अघमार, निर्ऋति, बभ्रु, शर्व एवं नीलशिखंड आदि देवगण, अपने परिवार जनों के साथ अपनेअपने स्थान से चल दिए हैं. वे हमारे पुत्र, पौत्र आदि को छोड़ दें. (१) मनसा होमैर्हरसा घृतेन शर्वायास्त्र उत राज्ञे भवाय. नमस्येभ्यो नम एभ्यः कृणोम्यन्यत्रास्मदघविषा नयन्तु.. (२) शर्व के लिए, क्षेत्र के लिए एवं उन सब के स्वामी महादेव के लिए मैं मन से, तेज से, घृत और आज्यों से नमस्कार करता हूं. ये सभी नमस्कार के योग्य हैं. प्रसन्न हो कर ये पाप रूपी विष से पूर्ण कृत्याओं को हम से दूर ले जाएं. (२) त्रायध्वं नो अघविषाभ्यो वधाद् विश्वे देवा मरुतो विश्ववेदसः. अग्नीषोमा वरुणः पूतदक्षा वातापर्जन्ययोः सुमतौ स्याम.. (३) हे सब कुछ जानने वाले मरुदगण एवं विश्वे देव! तुम कृत्याओं की मारक शक्ति से हमारी रक्षा करो. हम अग्नि, सोम, वरुण, शुद्ध बलशाली मित्र, वायु एवं पर्जन्य के कृपा पात्र रहें. (३) सूक्त-९४ देवता—सरस्वती सं वो मनांसि सं व्रता समाकूतीर्नमामसि. अमी ये विव्रता स्थन तान् वः सं नमयामसि.. (१) हे उदास मन वाले लोगो! मैं तुम्हारे परस्पर विरुद्ध हृदयों को एक विषय पर सहमत करता हूं. मैं तुम्हारे कर्मों एवं संकल्पों को भी एक रूप बनाता हूं. पहले तुम सब परस्पर विरुद्ध कर्म करने वाले थे. मैं तुम सब को समान मन वाला बनाता हूं. (१) अहं गृभ्णामि मनसा मनांसि मम चित्तमनु चित्तेभिरेत. मम वशेषु हृदयानि वः कृणोमि मम यातमनुवर्त्मान एत.. (२) हे परस्पर विरोधी मन वाले लोगो! मैं तुम्हारे हृदयों को अपने हृदय के अधीन बनाता हूं. ebook converter DEMO Watermarks*

तुम सब भी अपने हृदयों को मेरे हृदय का अनुगमन करने वाला बनाओ. तुम्हारे हृदय मेरे वश में हों एवं तुम सब मेरा अनुगमन करो. (२) ओते मे द्यावापृथिवी ओता देवी सरस्वती. ओतौ म इन्द्रश्चाग्निश्चर्ध्यास्मेदं सरस्वति.. (३) धरती और आकाश सदा मेरे सम्मुख और परस्पर संबद्ध रहें. देवी सरस्वती भी मेरे अभिमुख और अनुकूल रहे. इंद्र और अग्नि मेरे अनुकूल रहें. हे सरस्वती देवी! इस समय हम समृद्ध हों. (३) सूक्त-९५ देवता—वनस्पति अश्वत्थो देवसदनस्तृतीयस्यामितो दिवि. तत्रामृतस्य चक्षणं देवाः कुष्ठमवन्वत.. (१) तीसरे आकाश में देवों का स्थान पीपल है. वहां देवों ने अमृत के गुण वाले वनस्पति कूठ को जाना. (१) हिरण्ययी नौरचरद्धिरण्यरबन्धना दिवि. तत्रामृतस्य पुष्पं देवाः कुष्ठमवन्वत.. (२) देवों ने सोने के बंधनों वाली स्वर्ग की नाभि के द्वारा कूठ वनस्पति को प्राप्त किया, जो अमृत का पुरुष है. (२) गर्भो अस्योषधीनां गर्भो हिमवतामृत. गर्भो विश्वस्य भूतस्येमं मे अगदं कृधि.. (३) हे अग्नि! तुम वर्षा से उत्पन्न होने वाली वनस्पतियों के भीतर स्थित हो तथा शीतल स्पर्श वाली वनस्पतियों में भी स्थित हो. तुम संसार के सभी प्राणियों में स्थित हो. तुम मेरे इस मनुष्य को रोग रहित बनाओ. (३) सूक्त-९६ देवता—वनस्पति, सोम या ओषधयः सोमराज्ञीर्बह्वीः शतविचक्षणाः. बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१) जिन वृक्षों और वनस्पतियों के राजा सोम हैं तथा जो रस, वीर्य आदि के विपाक के कारण सैकड़ों प्रकार की दिखाई देती हैं, बृहस्पति देव के द्वारा उन रोगों की ओषधि के रूप में नियत वे वनस्पतियां हमें पाप से बचाएं. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

मुञ्चन्तु मा शपथ्या ३ दथो वरुण्या दुत. अथो यमस्य पड्वीशाद् विश्वस्माद् देवकिल्बिषात्.. (२) जल अथवा ओषधियां मुझे ब्राह्मणों के क्रोध से उत्पन्न पाप से बचाएं तथा वरुण देव द्वारा निश्चित असत्य भाषण आदि पाप से भी बचाएं. वे हमें यम के उस फंदे से बचाएं जो पैरों को बांधता है. वे मुझे सभी देवों से संबंधित पापों से बचाएं. (२) यच्चक्षुषा मनसा यच्च वाचोपारिम जाग्रतो यत् स्वपन्तः. सोमस्तानि स्वधया नः पुनातु.. (३) हमने आंखों के द्वारा, मन के द्वारा, वाणी के द्वारा जागते हुए अथवा सोते हुए जो पाप किए हैं. पितृलोक के स्वामी सोमदेव पितरों को लक्ष्य कर के किए गए पितृ कर्म के द्वारा हमें पवित्र करें. (३) सूक्त-९७ देवता—मित्र, वरुण अभिभूर्यज्ञो अभिभूरग्निरभिभूः सोमो अभिभूरिन्द्रः. अभ्य १ हं विश्वाः पृतना यथासान्येवा विधेमाग्निहोत्रा इदं हविः.. (१) विजय की कामना करने वाले हम लोगों के द्वारा किया हुआ यज्ञ शत्रुओं का पराभव करने वाला हो. यज्ञों को पूर्ण करने वाले अग्नि एवं यज्ञ के साधन सोम शत्रुओं को पराजित करें. इंद्र एवं सभी शत्रु सेनाओं को पराजित करने के इच्छुक हम शत्रु की सभी सेनाओं को जिस प्रकार पराजित करें, उसी के निमित्त संग्राम में विजय के इच्छुक हम हवि का हवन करते हैं. (१) स्वधा ऽ स्तु मित्रावरुणा विपश्चिता प्रजावत् क्षत्रं मधुनेह पिन्वतम्. बाधेथां दूरं निर्ऋतिं पराचैः. कृतं चिदेनः प्र मुमुक्तमस्मत्.. (२) हे मेधावी मित्र और वरुण! तुम्हारे लिए दिया गया वह हवि रूप अन्न तुम्हें तृप्ति दे. तुम इस राजा पर प्रजाओं से युक्त बल एवं मधुर रस सींचो. तुम पराजय करने वाली पाप देवी निर्ऋति को हम से विमुख कर के दूर देश में ले जाओ. तुम हमारे शत्रुओं के द्वारा किया हुआ पाप हम से दूर ले जाओ. (२) इमं वीरमनु हर्षध्वमुग्रमिन्द्रं सखायो अनु सं रभध्वम्. ग्रामजितं गोजितं वज्रबाहुं जयन्तमज्म प्रमृणन्तमोजसा.. (३) हे सैनिको! अधिक बलशाली एवं परम ऐश्वर्य युक्त इस वीर राजा की वीरता से प्रसन्न बनो एवं इस के लिए युद्ध हेतु तत्पर रहो. हे मरुतो! गांवों को एवं शत्रुओं की गायों को जीतने वाले तथा हाथ में वज्र धारण करने वाले इंद्र की वीरता से प्रसन्न बनो. इंद्र शत्रुओं को जीतने ebook converter DEMO Watermarks*

वाले, जयशील एवं अपने बल से शत्रुओं की हिंसा करने वाले हैं. (३) सूक्त-९८ देवता—इंद्र इन्द्रो जयाति न परा जयाता अधिराजो राजसु राजयातै. चर्कृत्य ईड्यो वन्द्यश्चोपसद्यो नमस्यो भवेह.. (१) इस संग्राम में इस राजा की सहायता के लिए आए हुए इंद्र विजयी हों. वह किसी से पराजित न हों. सभी राजाओं के स्वामी इंद्र इन राजाओं में सुशोभित हों. शत्रुओं को अत्यधिक काटने वाले ये स्तुत्य एवं वंदनीय हैं. हे सब के द्वारा सेवा करने योग्य इंद्र! तुम इस संग्राम में हमारे द्वारा पूजित बनो. (१) त्वमिन्द्राधिराजः श्रवस्युस्त्वं भूरभिभूतिर्जनानाम्. त्वं दैवीर्विश इमा वि राजायुष्मत् क्षत्रमजरं ते अस्तु.. (२) हे इंद्र! तुम राजाओं के राजा एवं यशस्वी हो. तुम अपने तेज से सभी प्राणियों को पराजित करते हो. ये देव संबंधिनी प्रजाएं तुम्हें शोभा देती है. हे राजन्! तुम्हारा बल चिरकाल तक जीवन से युक्त एवं वृद्धावस्था से विहीन हो. (२) प्राच्या दिशस्त्वमिन्द्रासि राजोतोदीच्या दिशो वृत्रहञ्छत्रुहोऽसि. यत्र यन्ति स्रोत्यास्तज्जितं ते दक्षिणतो वृषभ एषि हव्यः.. (३) हे इंद्र! तुम पूर्व दिशा के राजा हो. हे वृत्र राक्षस को मारने वाले इंद्र! तुम उत्तर दिशा के भी स्वामी तथा शत्रुओं के हंता हो. हमारी इच्छाएं पूर्ण करने वाले तुम हमारे द्वारा बुलाए जाने पर युद्ध के समय हमारे दक्षिण भाग में वर्तमान रहो. (३) पालनकर्ता इंद्र की भुजाएं हम अपने चारों ओर धारण करते हैं, वे सब ओर से हमारी रक्षा करें. हे सब के प्रेरक और राजा सोमदेव! मुझे संग्राम में कष्ट न होने वाला और शोभन विजयवाला बनाओ. (४) सूक्त-९९ देवता—इंद्र अभि त्वेन्द्र वरिमतः पुरा त्वांहूरणाद्धुवे. ह्वयाम्युग्रं चेत्तारं पुरुणामानमेकजम्.. (१) हे इंद्र! विस्तीर्ण शरीर के कारण मैं तुझे संग्रामों में बुला रहा हूं. मैं संग्राम में पराजय से बचने के लिए तुम्हारा आह्वान पहले ही करता हूं. हे इंद्र! तुम अत्यधिक शक्तिशाली, जय के उपाय जानने वाले, अनेक शत्रुओं को जीतने वाले एवं अकेले ही युद्ध जीतने वाले हो. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

यो अद्य सेन्यो वधो जिघांसन् न उदीरते. इन्द्रस्य तत्र बाहू समन्तं परि दद्म:... (२) इस समय शत्रुओं की सेनाओं के आयुध हमें मारने के लिए उठ रहे हैं. इस वध से हमारी रक्षा के लिए इंद्र की भुजाएं सर्वत्र सहायता करें. हे राजन्! हे सविता! हे सोम! विनाश से बचने के लिए मुझे संग्राम में उत्तम विजय प्रदान करो. (२) परि दद्म इन्द्रस्य बाहू समन्तं त्रातुस्त्रायतां नः. देव सवितः सोम राजन्सुमनसं मा कृणु स्वस्तये.. (३) पालनकर्ता इंद्र की भुजाएं हम अपने चारों ओर धारण करते हैं, वे सब ओर से हमारी रक्षा करें. हे सबके प्रेरक और राजा सोम देव! मुझे संग्राम ने नष्ट न होने वाला और शोभन विजय वाला बनाओ. (३) सूक्त-१०० देवता—वनस्पति देवा अदुः सूर्यो अदाद् द्यौरदात् पृथिव्यदात्. तिस्रः सरस्वतीरदुः सचित्ता विषदूषणम्.. (१) इंद्र आदि सभी देवों ने एकमत हो कर मुझे स्थावर और जंगम विष को दूर करने वाली ओषधि प्रदान की है. सूर्य, आकाश एवं पृथ्वी ने मुझे विष नाशक ओषधि दी है. इड़ा, सरस्वती और भारती—इन तीन देवियों ने एकमत हो कर मुझे विष नाशक ओषधि प्रदान की है. (१) यद् वो देवा उपजीका आसिञ्चन् धन्वन्युदकम्. तेन देवप्रसूतेनेदं दूषयता विषम्.. (२) हे देवो! तुम से संबंधित और वल्मीक का निर्माण करने वाले उपजीक नामक प्राणियों ने जलहीन स्थान में तुम्हारा वरदान पा कर जो जल बरसाया, देवों द्वारा दिए हुए उस जल से, इस विष का प्रभाव नष्ट करो. (२) असुराणां दुहितासि सा देवानामासि स्वसा. दिवस्पृथिव्याः संभूता सा चकर्थारसं विषम्.. (३) हे वल्मीक की मिट्टी! तुम देव विरोधी असुरों की पुत्री और देवों की बहन हो. आकाश और धरती से उत्पन्न वल्मीक की यह मिट्टी स्थावर और जंगम प्राणियों से उत्पन्न विष को प्रभावहीन करे. (३) सूक्त-१०१ देवता—बृहस्पति ebook converter DEMO Watermarks*

आ वृषायस्व श्वसिहि वर्धस्व प्रथयस्व च. यथाङ्गं वर्धतां शेपस्तेन योषितमिज्जहि.. (१) हे पुरुष! तू सांड़ के समान गर्भाधान समर्थ हो एवं जीवित रहे. तेरे अंगों का विकास हो और तेरा शरीर विस्तीर्ण हो. जैसे तेरी जननेंद्रिय बढ़े, वैसे ही तू संभोग की इच्छुक नारी के समीप जा. (१) येन कृशं वाजयन्ति येन हिन्वन्त्यातुरम्. तेनास्य ब्रह्मणस्पते धनुरिवा तानया पस:.. (२) जिस रस के द्वारा वीर्यरहित पुरुष को प्रजनन समर्थ बनाया जाता है, जिस रस के द्वारा रोगी पुरुष को प्रसन्न किया जाता है, हे मंत्रसमूह के पालक देव! उसी रस विशेष से इस पुरुष की इंद्रिय को धनुष के समान विस्तृत करो. (२) आहं तनोमि ते पसो अधि ज्यामिव धन्विनि. क्रमस्वर्श इव रोहितमनवग्लायता सदा.. (३) हे वीर्य के इच्छुक! हम तेरी पुरुषेंद्रिय को धनुष की डोरी के समान विस्तृत करते हैं. तू गर्भाधान में समर्थ बैल के समान प्रसन्न मन से अपनी पत्नी पर आक्रमण कर. (३) सूक्त-१०२ देवता—अश्विनीकुमार यथायं वाहो अश्विना समैति सं च वर्तते. एवा मामभि ते मनः समैतु सं च वर्तताम्.. (१) हे अश्विनीकुमारो! भलीभांति सिखाया हुआ घोड़ा जिस प्रकार सवार की इच्छा के अनुसार चलता है और उस के अधीन रहता है. हे कामिनी! उसी प्रकार तेरा मन मुझ कामुक को लक्ष्य कर के आए और मेरे अधीन रहे. (१) आहं खिदामि ते मनो राजाश्वः पृष्ट्यामिव. रेष्मच्छिन्नं यथा तृणं मयि ते वेष्टतां मनः.. (२) हे कामिनी! मैं तेरे मन को इस प्रयोग के द्वारा उसी प्रकार अपने अनुकूल बनाता हूं, जिस प्रकार श्रेष्ठ अश्व लगाम को चबाता है. हे कामिनी! वायु के द्वारा छिन्नभिन्न तिनका जिस प्रकार घूमता है, उसी प्रकार तेरा मन मेरे अधीन हो कर भ्रमण करे. (२) आज्जनस्य मदुघस्य कुष्ठस्य नलदस्य च. तुरो भगस्य हस्ताभ्यामनुरोधनमुद्धरे.. (३) हे नारी! मैं सौभाग्यकारी देव के शीघ्रता करते हुए हाथों के द्वारा त्रिककुद पर्वत पर ebook converter DEMO Watermarks*

उत्पन्न नीलांजन, मधूक वृक्ष की लकड़ी, कूठ नामक वनस्पति और खस को पीस कर बनाए गए उबटन से तेरे शरीर पर लेप करता हूं. (३) सूक्त-१०३ देवता—बृह्मणस्पति संदानं वो बृहस्पतिः संदानं सविता करत्. संदानं मित्रो अर्यमा संदानं भगो अश्विना.. (१) हे शत्रु सेनाओ! बृहस्पति देव इन फेंके हुए पाशों के द्वारा तुम्हारा बंधन करें. सब के प्रेरक सविता देव तुम्हारा बंधन करें. मित्र तथा अर्यमा देव तुम्हारा बंधन करें. भग और अश्विनीकुमार तुम्हारा बंधन करें. (१) सं परमान्त्समवमानथो सं द्यामि मध्यमान्. इन्द्रस्तान् पर्यहार्दाम्ना तानग्ने सं द्या त्वम्.. (२) मैं शत्रु की दूर देश वर्तिनी तथा समीप वर्तिनी सेनाओं को पाशों के द्वारा बांधता हूं. मैं समीप और दूर के मध्य स्थान में वर्तमान सेनाओं को भी पाशों से बांधता हूं. इस प्रकार की सेनाओं एवं सेनापतियों को संग्राम के स्वामी इंद्र त्याग दें. हे अग्नि! इंद्र द्वारा त्यागे हुए इन क्षत्रियों को तुम पाशों से बांधो. (२) अमी ये युधमायन्ति केतून् कृत्वानीकशः. इन्द्रस्तान् पर्यहार्दाम्ना तानग्ने सं द्या त्वम्.. (३) हमारे प्रति प्रसन्न बने हुए इंद्र देव और अग्नि देव हमारे उन शत्रुओं को बंधन में बांधें. (३) सूक्त-१०४ देवता—इंद्र आदानेन संदानेनामित्रान्ा द्यामसि. अपाना ये चैषां प्राणा असुनासून्त्समच्छिदन्.. (१) आदान नाम के पाश यंत्र विशेष के द्वारा तथा संधान नाम के पाश यंत्र के द्वारा हम शत्रुओं को बांधते हैं. इन शत्रुओं की प्राण एवं अपान वायु को मैं अपने प्राण के द्वारा भलीभांति छिन्न करता हूं. (१) इदमादानमकरं तपसेन्द्रेण संशितम्. अमित्रा ये ऽ त्र नः सन्ति तानग्न आ द्या त्वम्.. (२) मैं ने तप के द्वारा बांधने का साधन यह पाश यंत्र निर्मित किया है. इसे इंद्र ने पहले ही तेज कर दिया है. इस संग्राम में हमारे जो शत्रु हैं, हे अग्नि! उन सब को पाश बंधन से बांधो. ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-१०५ देवता—कास

(२) ऐनान् द्यतामिन्द्राग्नी सोमो राजा च मेदिनौ. इन्द्रो मरुत्वानादानममित्रेभ्यः कृणोतु नः.. (३) हमारे द्वारा दिए गए हवि से प्रसन्न होने वाले इंद्र और अग्नि हमारे इन शत्रुओं को बांधें तथा राजा सोम इन्हें बांधें. मरुद्गणों के सहित इंद्र हमारे शत्रुओं का पाश बंधन करें. (३) सूक्त-१०५ देवता—कास यथा मनो मनस्केतैः परापतत्याशुमत्. एवा त्वं कासे प्र पत मनसोऽनु प्रवाव्यम्.. (१) जिस प्रकार मन के द्वारा जाने जाते हुए दूरस्थ विषयों के साथ पुरुष शीघ्रता से ध्रुव मंडल तक जाता है, उसी प्रकार हे खांसी और कफ रोग वाली कृत्व! तू मन के वेग से पुरुष के शरीर से निकल कर दूर देश में चली जा. (१) यथा बाणः सुसंशितः परापतत्याशुमत्. एवा त्वं कासे प्र पत पृथिव्या अनु संवतम्.. (२) जिस प्रकार अच्छी तरह तेज किया हुआ बाण धनुष से छूट कर शीघ्र ही भूमि को छेदता हुआ गिरता है. हे खांसी! तू उसी प्रकार बाण से बिंधी हुई पृथ्वी को लक्ष्य कर के इस पुरुष से दूर चली जा. (२) यथा सूर्यस्य रश्मयः परापतन्त्याशुमत्. एवा त्वं कासे प्र पत समुद्रस्यानु विक्षरम्.. (३) जिस प्रकार सूर्य की किरणें लोक परलोक तक शीघ्र जाती हैं. हे खांसी! तू उस देश को लक्ष्य कर के चली जा, जिस देश में सागर के जल के विविध प्रवाह हैं. (३) सूक्त-१०६ देवता—दूर्वा आयने ते परायणे दूर्वा रोहतु पुष्पिणीः. उत्सो वा तत्र जायतां हृदो वा पुण्डरीकवान्.. (१) हे अग्नि! तुम्हारे अभिमुख जाने में अथवा पराङ्मुख जाने में हमारे देश में पुष्प युक्त कोमल दूर्वा उत्पन्न हो. हमारे घर और खेत में पानी के सोते उत्पन्न हों तथा कमलों वाला सरोवर निर्मित हो. (१) अपामिदं नयनं समुद्रस्य निवेशनम्. ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-१०७ देवता—विश्वजित्

मध्ये ह्रदस्य नो गृहाः पराचीना मुखा कृधि.. (२) हमारा वह घर जल का स्थान एवं सागर का निवेश बने. हमारे घर गहरे तालाबों के मध्य में हों. हे अग्नि! तुम अपने ज्वाला रूपी मुख हमारी ओर से फेर लो. (२) हिमस्य त्वा जरायुणा शाले परि व्ययामसि. शीतह्रदा हि नो भुवो ऽ निष्कृणोतु भेषजम्.. (३) हे शाला! हम तुझे हिमालय के शीतल जल से इस प्रकार घेरते हैं, जिस प्रकार जरायु गर्भ को तथा शैवाल जल को घेरता है. हे शाला! तू हमारे लिए शीतल जल वाली बन जा. हमारी प्रार्थना सुन कर अग्नि हमारे घरों को जलने से बचाने वाली ओषधि बनें. (३) सूक्त-१०७ देवता—विश्वजित् विश्वजित् त्रायमाणायै मा परि देहि. त्रायमाणे द्विपाच्च सर्वं नो रक्ष चतुष्पाद यच्च नः स्वम्.. (१) हे विश्वजित् देव! जगत् का पालन करने वाली देवी के लिए रक्षा के हेतु मुझ स्वस्त्ययन इच्छुक को दो. हे त्रायमाणा नामक देवी! हमारे दो पैरों वाले सभी पुत्र, पौत्र आदि की रक्षा करो तथा मेरे सभी चौपायों की भी रक्षा करो. (१) त्रायमाणे विश्वजिते मा परि देहि. विश्वजिद् द्विपाच्च सर्वं नो रक्ष चतुष्पाद यच्च नः स्वम्.. (२) हे पालन करने वाली देवी त्रायमाणा! मुझे विश्वजित् नाम के देवता को दे दो. हे सब को जीतने वाले! हमारे दो पैरों वाले पुत्र, पौत्र आदि और सभी चौपायों की रक्षा करो. (२) विश्वजित् कल्याण्यै मा परि देहि. कल्याणि द्विपाच्च सर्वं नो रक्ष चतुष्पाद यच्च नः स्वम्.. (३) हे विश्वजित्! मुझे सर्वमंगलकारिणी देवी को दे दो. हे कल्याणी! हमारे सभी दो पैरों वाले पुत्र, पौत्र आदि और चौपायों की रक्षा करो. (३) कल्याणि सर्वविदे मा परि देहि. सर्वविद् द्विपाच्च सर्वं नो रक्ष चतुष्पाद यच्च नः स्वम्.. (४) हे कल्याणी! मुझे सब कुछ जानने वाले देव को दे दो. हे सर्वहित! हमारे सभी दो पैरों वाले पुत्र, पौत्र आदि और चौपायों की रक्षा करो. (४) सूक्त-१०८ देवता—मेधा, अग्नि ebook converter DEMO Watermarks*

त्वं नो मेधे प्रथमा गोभिरश्वेभिरा गहि. त्वं सूर्यस्य रश्मिभिस्त्वं नो असि यज्ञिया.. (१) हे देव और मनुष्य आदि के द्वारा उपासना की जाती हुई मेधा देवी! तुम हमें देने के लिए गाय और अश्वों के साथ आओ. तुम सूर्य की किरणों के समान अपनी व्याप्ति की सामर्थ्य के साथ हमारे समीप आओ. तुम हमारे लिए यज्ञ के योग्य हो. (१) मेधामहं प्रथमां ब्रह्मणवतीं ब्रह्मजूतामृषिष्टुताम्. प्रपीतां ब्रह्मचारिभिर्देवानामवसे हुवे.. (२) मैं वेदों से युक्त एवं देव, मनुष्य आदि के द्वारा पूजी जाती हुई मेधा देवी का आह्वान करता हूं. ब्राह्मणों के द्वारा सेवित, ऋषियों के द्वारा स्तुति की गई और ब्रह्मचारियों द्वारा सेवित मेधा देवी को मैं इंद्र आदि की रक्षा पाने के लिए बुलाता हूं. (२) यां मेधामृभवो विदुर्यां मेधामसुरा विदुः. ऋषयो भद्रां मेधां यां विदुस्तां मय्या वेशयामसि.. (३) ऋभु नाम के देव जिस मेधा को जानते थे, जिस मेधा को राक्षस जानते थे तथा वसिष्ठ आदि ऋषि वेद शास्त्र विषयक जिस मेधा को जानते थे, उसे हम अपने में स्थापित करते हैं. (३) यामृषयो भूतकृतो मेधां मेधाविनो विदुः. तया मामद्य मेधयाग्ने मेधाविनं कृणु.. (४) जिस मेधा को पृथ्वी आदि तत्त्वों का निर्माण करने में समर्थ, मंत्र द्रष्टा एवं प्रसिद्ध ऋषि जानते हैं. हे अग्नि! उसी मेधा के द्वारा तुम मुझे मेधावी बनाओ. (४) मेधां सायं मेधां प्रातर्मेधां मध्यन्दिनं परि. मेधां सूर्यस्य रश्मिभिर्वचसा वेशयामहे.. (५) मैं प्रातःकाल, सायंकाल और मध्याह्न काल में मेधा देवी की स्तुति करता हूं. मैं सूर्य की किरणों के साथ दिन में स्तुति वचनों के द्वारा उस महानुभावा मेधा को अपने में स्थापित करता हूं. (५) सूक्त-१०९ देवता—पिप्पली पिप्पली क्षिप्तभेषज्यु ३ तातिविद्धभेषजी. तां देवाः समकल्पयन्नियं जीवितवा अलम्.. (१) पिप्पली अर्थात् पीपल ने सभी ओषधियों का तिरस्कार कर दिया है तथा सभी रोगों को ebook converter DEMO Watermarks*

पीड़ित किया है. इंद्र आदि देवों ने अमृत मंथन के समय इस का निर्माण किया था, क्योंकि यही एक ओषधि सभी रोगों के निवारण में समर्थ है. (१) पिप्पल्य १: समवदन्तायतीर्जननादधि. यं जीवमश्नवामहै न स रिष्याति पूरुषः.. (२) पिप्पलियों ने सागर मंथन के समय अपने जन्म के पश्चात आ कर आकाश में संभाषण किया कि जीवित पुरुष को हम ओषधि के रूप में व्याप्त करते हैं. वह पुरुष नष्ट न हो. (२) असुरास्त्वा न्यखनन् देवास्त्वोदवपन् पुनः. वातीकृतस्य भेषजीमथो क्षिप्तस्य भेषजीम्.. (३) हे पिप्पली! असुरों ने तुझे खोदा तथा देवों ने सभी प्राणियों के हित के लिए तुझे उखाड़ा. तुम वातरोग से पीड़ित की ओषधि बनी हुई आक्षेपक अर्थात् मिरगी नाम के वातरोग की ओषधि हो. (३) सूक्त-११० देवता—अग्नि प्रत्नो हि कमीड्यो अध्वरेषु सनाच्च होता नव्यश्च सत्सि. स्वां चाग्ने तन्वं पिप्रायस्वास्मभ्यं च सौभगमा यजस्व.. (१) सभी देवों की आत्मा होने के कारण ये अग्नि चिरंतन हैं. ये स्तुति के योग्य एवं यज्ञों में देवों को बुलाने वाले हैं. हे अग्नि! इस प्रकार तुम नवीन बने रहते हो. तुम अपने शरीर को घृत आदि से पूर्ण करो तथा हमारे लिए सौभाग्य प्रदान करो. (१) ज्येष्ठघ्न्यां जातो विचृतोर्यमस्य मूलबर्हणात् परि पाह्येनम्. अत्येनं नेषद् दुरितानि विश्वा दीर्घायुत्वाय शतशारदाय.. (२) ज्येष्ठा नक्षत्र में उत्पन्न पुत्र पिता, बड़े भाई आदि का हंता होता है. मूल नक्षत्र में उत्पन्न पुत्र पूरे कुल की हिंसा करता है. इसलिए इस कुमार के यम द्वारा किए जाने वाले संतान के मूलोच्छेद से रक्षा करो. सौ वर्ष तक जीवित रहने के दीर्घ जीवन के लिए सभी पाप इस कुमार से दूर चले जाएं. (२) व्याघ्रेऽहन्यजनिष्ट वीरो नक्षत्रजा जायमानः सुवीरः. स मा वधीत् पितरं वर्धमानो मा मातरं प्र मिनीज्जनित्रीम्.. (३) बाघ के समान क्रूर एवं पाप नक्षत्र में वीर पुत्र ने जन्म लिया. दुष्ट नक्षत्र में उत्पन्न यह पुत्र जन्म लेते ही उत्तम शक्ति वाला बने. यह पुत्र बड़ा हो कर पिता का वध न करे तथा जन्म देने वाली माता की हिंसा न करे. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-१११ देवता—अग्नि

सूक्त-१११ देवता—अग्नि इमं मे अग्ने पुरुषं मुमुग्ध्ययं यो बद्धः सुयतो लालपीति. अतो ऽ धि ते कृणवद् भागधेयं यदानुन्मदितो ऽ सति.. (१) हे अग्नि! मेरे इस पुरुष को रोग के आधार पाप से बचाओ. पाप रूपी पाशों से बंधा हुआ यह पुरुष जो नियमित रूप से प्रलाप करता है, इसीलिए यह तुम्हारे निमित्त हवि रूपी भाग अधिक मात्रा में दे. इस प्रकार यह उन्माद रहित बने. (१) अग्निष्टे नि शमयतु यदि ते मन उद्युतम्. कृणोमि विद्वान् भेषजं यथानुन्मदितो ऽ ससि.. (२) हे गंधर्व ग्रह से गृहीत पुरुष! यदि तेरा मन गंधर्व ग्रह के विकार से उद्भ्रांत है तो अग्नि तेरे मन को शांत करें. प्रतिकार को जानता हुआ मैं इस ग्रह विकार की ओषधि करता हूं, जिस से तू उन्माद रहित बन. (२) देवैन्सादुन्मदितमुन्मत्तं रक्षसस्परि. कृणोमि विद्वान् भेषजं यदानुन्मदितो ऽ सति.. (३) हे पुरुष! तूने देवों के विषय में किए हुए पाप के कारण चित्त का उन्माद पाया है. राक्षसों अर्थात् ब्रह्मराक्षस आदि ग्रहों के कारण उन्मत्त इस पुरुष के रोग के प्रतिकार को जानता हुआ मैं इस की ओषधि करता हूं. (३) पुनस्त्वा दुरप्सरसः पुनरिन्द्रः पुनर्भगः. पुनस्त्वा दुर्विश्वे देवा यथानुन्मदितो ऽ ससि.. (४) हे उन्माद से गृहीत पुरुष! अप्सराएं और गंधर्व तेरा उन्माद रोग दूर कर के तुझे हमें पुनः प्रदान करें. इस के पश्चात इंद्र ने तुझे मेरे लिए दिया है. हवि एवं सभी देवों ने तुम्हें मेरे लिए इस हेतु दिया है कि तुम उन्माद रहित हो सको. (४) सूक्त-११२ देवता—अग्नि मा ज्येष्ठं वधीदयमग्न एषां मूलबर्हणात् परि पाह्येनम्. स ग्राह्याः पाशान् वि चृत प्रजानन् तुभ्यं देवा अनु जानन्तु विश्वे.. (१) हे अग्नि! यह वेदना इन पिता, माता, भ्राता आदि के मध्य बड़े भाई का वध न करे. तुम जड़ उखाड़ने के अर्थात् बड़े भाई से पहले विवाह करने वाले दोष के कारण भी इस की रक्षा करो. हे अग्नि! तुम इस को छुड़ाने के उपाय जानते हो, इसीलिए इसे पकड़ने वाली पिशाची के बंधन से छुड़ाओ. इस के बंधन छुड़ाने के लिए सभी देव तुम्हें अनुमति दें. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

उन्मुञ्च पाशांस्त्वमग्न एषां त्रयस्त्रिभिरुत्सिता येभिरासन्. स ग्राह्याः पाशान् वि चृत प्रजानन् पितापुत्रौ मातरं मुञ्च सर्वान्.. (२) हे अग्नि! माता, पिता और पुत्र को वेदना के दोष रूपी पाश बंधनों से छुड़ाओ. वेदना के दोष उत्तम, मध्यम और अधम—तीन प्रकार के हैं. हे अग्नि! तुम इस को छुड़ाने के उपाय जानते हो, इसलिए पकड़ने वाली पिशाची के बंधन की रस्सियां छुड़ाओ. इस के बंधन छुड़ाने के लिए तुम्हें सभी देव अनुमति दें. (२) येभिः पाशैः परिवित्तो विबद्धो ऽ ङ्गेअङ्ग अर्पित उत्सितश्च. वि ते मुच्यन्तां विमुचो हि सन्ति भ्रूणघ्नि पूषन् दुरितानि मृक्ष्व.. (३) बड़े भाई से पहले विवाह कराने वाला छोटा भाई जिन पाप रूप पाशों से प्रत्येक अंग में बंधा, रोगी एवं अशांत स्थिति वाला है; उस के वे पाश छूट जाएं. क्योंकि इंद्र आदि सभी देव छुड़ाने वाले हैं; हे देव! इस भ्रूण हंता को उन पापों से छुड़ाओ जो इसे बड़े भाई से पहले विवाह करने से प्राप्त हुए हैं. (३) सूक्त-११३ देवता—पूषा त्रिते देवा अमृजतैतदेनस्त्रित एनन्मनुष्येषु ममृजे. ततो यदि त्वा ग्राहिरानशे तां ते देवा ब्रह्मणा नाशयन्तु.. (१) अपने बड़े भाई से पहले विवाह करने से संबंधित पाप को प्राचीन काल के देवों ने त्रित में विसर्जित कर दिया था. त्रित ने अपने में विसर्जित पाप को मनुष्यों में स्थापित कर दिया. हे बड़े भाई से पहले विवाह करने वाले! इस कारण यदि ग्रहणशील पाप देवता ग्राही ने तुम्हें प्राप्त किया है, उसे देवगण मंत्र से नष्ट कर दें. (१) मरीचीर्धूम्रान् प्र विशानु पाप्मन्नुदारान् गच्छोत वा नीहारान्. नदीनां फेनाँ अनु तान् वि नश्य भ्रूणघ्नि पूषन् दुरितान मृक्ष्व.. (२) हे बड़े भाई से पहले विवाह करने से उत्पन्न पाप देवता! तू परिवित्ती अर्थात् बड़े भाई से पहले विवाह करने वाले को त्याग कर अग्नि, सूर्य आदि में, चमस में अथवा अग्नि से उत्पन्न धुएं में अथवा उस से बने बादलों में प्रवेश कर जा अथवा तू कोहरे में मिल जा. हे पाप देवता! तू नदियों के जल में प्रवेश कर के विविध प्रकार से गति कर. (२) द्वादशधा निहितं त्रितस्यापमृष्टं मनुष्यैनसानि. ततो यदि त्वा ग्राहिरानशे तां ते देवा ब्रह्मणा नाशयन्तु.. (३) त्रित के पाप को बारह स्थानों पर रखा गया. पहले मनुष्य में, उस के बाद तीन आप्तियों में, इस के पश्चात सूर्योदय की आठ दिशाओं में—इस प्रकार वह पाप बारह स्थानों पर रखा ebook converter DEMO Watermarks*

गया है. इस कारण यदि ग्रहणशील पाप देवता ग्राही ने तुम्हें प्राप्त किया है तो उसे देवगण मंत्र के द्वारा नष्ट कर दें. (३) सूक्त-११४ देवता—विश्वे देव यद् देवा देवहेडनं देवासश्चकृमा वयम्. आदित्यास्तस्मान्नो यूयमृतस्यर्तेन मुञ्चत.. (१) हे अग्नि आदि देवो! इंद्रियों के वशीभूत हो कर हम ने जो पाप किया है, हे अदिति पुत्र देवो! तुम यज्ञ संबंधी सत्य के द्वारा उस पाप से हमें बचाओ. (१) ऋतस्यर्तेनादित्या यजत्रा मुञ्चतेह न:. यज्ञं यद् यज्ञवाहस: शिक्षन्तो नोपशेकिम.. (२) हे अदिति पुत्र देवो! तुम यज्ञ के द्वारा प्रसन्न करने योग्य हो. तुम यज्ञ संबंधी सत्य के द्वारा इस यज्ञ कार्य द्वारा हमें सभी पापों से मुक्त करो. (२) मेदस्वता यजमाना: सुचाज्यानि जुह्वत:. अकामा विश्वे वो देवा: शिक्षन्तो नोप शेकिम.. (३) चरबी वाले पशु से यज्ञ पूर्ण करते हुए यजमान सुच (चमस) के द्वारा यज्ञ में आज्य डालते हैं. हे विश्वे देव! हम कामना रहित हो कर और पाप से डरते हुए पाप के वश में न हों. (३) सूक्त-११५ देवता—विश्वे देव यद् विद्वांसो यदविद्वांस एनांसि चकृमा वयम्. यूयं नस्तस्मान्मुञ्चत विश्वे देवा: सजोषस:.. (१) हे विश्वे देवो! पाप का निमित्त जानते हुए अथवा न जानते हुए हम ने जो पाप किया, हमारे साथ प्रसन्न होते हुए तुम हमें उस पाप से छुड़ाओ. (१) यदि जाग्रद् यदि स्वप्नेन एनस्यो ऽ करम्. भूतं मा तस्माद् भव्यं च द्रुपदादिव मुञ्चताम्.. (२) पाप को प्रेम करने वाले हम ने जाग्रत अवस्था में अथवा सोते हुए जो पाप किए, उन से विश्वे देव हमें भूतकाल और भविष्यकाल में काठ के चरण बंधन के समान छुड़ाएं. (२) द्रुपदादिव मुमुचान: स्विन्न: स्नात्वा मलादिव. पूतं पवित्रेणेवाज्यं विश्वे शुम्भन्तु मैनस:.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-११६ देवता—विवस्वान

काठ के चरण बंधन से छूटने अथवा पसीने से भीगा हुआ स्नान कर के मैल से मुक्त होने से पवित्र होता है अथवा घी जिस प्रकार कपड़े से छानने पर शुद्ध होता है, उसी प्रकार विश्वे देव मुझे पाप से छुड़ाएं. (३) सूक्त-११६ देवता—विवस्वान यद् यामं चक्रुर्निखनन्तो अग्रे कार्षीवणा अन्नविदो न विद्यया. वैवस्वते राजनि तज्जुहोम्यथ यज्ञियं मधुमदस्तु नो ऽ न्नम्.. (१) खेती करने वाले किसानों ने प्राचीनकाल में भूमि को खोदते हुए जो यम संबंधी क्रूर कर्म किया था, वे बुरे और भले काम में विभाजन न करने के कारण जानकार नहीं थे. घृत, मधु, तेल से युक्त अन्न हम अदिति पुत्र देवों और यमराज के लिए हवन करते हैं. इस के पश्चात वह यज्ञ योग्य अन्न मधुरता युक्त तथा हमारे भोग करने योग्य है. (१) वैवस्वतः कृणवद् भागधेयं मधुभागो मधुना सं सृजाति. मातुर्यदेन इषितं न आगन् यद् वा पितापराद्धो जिहीडे.. (२) विवस्वान अर्थात् सूर्य के पुत्र यमराज अपने लिए हवि का भाग करें तथा माधुर्य से युक्त उस भाग को हमें प्रदान करें. माता के पास से जो पाप हम अपराध करने वालों के पास आया है अथवा पिता हमारे द्वारा किए गए अपराध से क्रोधित है, वह पाप भी शांत हो. (२) यदीदं मातुर्यदि वा पितुर्नः परि भ्रातुः पुत्राच्चेतस एन आगन्. यावन्तो अस्मान् पितरः सचन्ते तेषां सर्वेषां शिवो अस्तु मन्युः.. (३) दिखाई देता हुआ यह पाप यदि हमारे मातापिता, भाई, किसी परिजन, पुत्र अथवा आत्मीय व्यक्ति के पास से आया है, उस पाप के कारण क्रोधित जितने पितर हमारे समीप आते हैं, उन सब का क्रोध शांत हो. (३) सूक्त-११७ देवता—अग्नि अपमित्यमप्रतीत्तं यदस्मि यमस्य येन बलिना चरामि. इदं तदग्ने अनृणो भवामि त्वं पाशान् विचृतं वेत्थ सर्वान्.. (१) मैं ही इस प्रकार का ऋणी हूं जो ऋण लेने के बाद धनी को नहीं लौटाता हूं. उसी शक्तिशाली ऋण के कारण मैं शासक यम के वश में रहता हूं. हे अग्नि, तुम्हारे प्रभाव से मैं उस ऋण से छूट गया हूं. मैं ऋण न चुकाने के कारण होने वाले पारलौकिक पाशों से छूट जाऊंगा. (१) इहैव सन्तः प्रति दद्म एनज्जीवा जीवेभ्यो नि हराम एनत्. ebook converter DEMO Watermarks*

अपमित्य धान्यं १ यज्जघसाहमिदं तदग्ने अनृणो भवामि.. (२) हम इस लोक में रहते हुए ही धनी को ऋण लौटाते हैं. इस लोक में जीवित रहते हुए ही जीवित धनी को ऋण चुकाना चाहिए. मैं ने धनी से ले कर जो अन्न खाया है, हे अग्नि! तुम्हारी कृपा से मैं दूसरे का धान्य खाने के ऋण से छूट जाऊं. (२) अनृणा अस्मिन्ननृणाः परस्मिन् तृतीये लोके अनृणाः स्याम. ये देवयानाः पितृयाणाश्च लोकाः सर्वान् पथो अनृणा आ क्षियेम.. (३) हे अग्नि! तुम्हारी कृपा से मैं इस लोक में, स्वर्ग आदि परलोकों में तथा स्वर्ग से उत्तम लोक में ऋण रहित हो कर जाऊं. जो देवों के गमन के लोक हैं, पितरों के गमन से लोक हैं, मैं वहां ऋण रहित हो कर ही जाऊं. (३) सूक्त-११८ देवता—अग्नि यद्धस्ताभ्यां चकृम किल्बिषाण्यक्षाणां गत्नुमुपलिप्समानाः. उग्रंपश्ये उग्रजितौ तदद्याप्सरसावनु दत्तामृणं नः.. (१) इंद्रियों के विषयों—शब्द, स्पर्श, रूप आदि को प्राप्त करने के लिए हम ने जो पाप किए हैं, हे उग्रंपश्या एवं उग्रजिता नाम की अप्सराओ! आज हमारा ऋण अनुकूल रूप से धनी को चुकाओ, जिस से हम उऋण हो सकें. (१) उग्रंपश्ये राष्ट्रभृत् किल्बिषाणि यदक्षवृत्तमनु दत्तं न एतत्. ऋणान्नौ नर्णमेर्त्समानो यमस्य लोके अधिरज्जुरायत्.. (२) हे उग्रंपश्या और राष्ट्रभीति नामक अप्सराओ! हम ने जो पाप किए हैं जैसे इंद्रियों का निषिद्ध विषयों में जाना; हमारे ऊपर ऋण के रूप में चढ़ा हुआ जो पाप है, उसे हमारे अनुकूल हो कर समाप्त कर दो. इस से हमारे ऋणी होने के कारण यमराज इस लोक में पाश ले कर हमें पकड़ने न आ सकें. (२) यस्मा ऋणं यस्य जायामुपैमि यं याचमानो अभ्यैमि देवाः. ते वाचं वादिषुर्मोत्तरां मद्देवपत्नी अप्सरसावधीतम्.. (३) मैं जिस धनी का ऋण धारण करता हूं, मैं कामुक बन कर जिस की पत्नी के पास जाता हूं अथवा जिस पुरुष के पास मैं ऋण के रूप में धन मांगने के लिए जाता हूं, हे देव! वे सब मुझ से प्रतिकूल बातें न कहें. हे अप्सराओ! मेरी यह बात अपने मन में धारण करो. (३) सूक्त-११९ देवता—वैश्वानर अग्नि यददीव्यन्नृणमहं कृणोम्यदास्यन्नग्न उत संगृणामि.

वैश्वानरो नो अधिपा वसिष्ठ उदिन्नयाति सुकृतस्य लोकम्.. (१) हे अग्नि देव! व्यवहार करने में अशक्त हो कर मैं ने जो ऋण लिया और उसे नहीं चुका पाया; मैं उसे देने की प्रतिज्ञा करता हूं. सभी प्राणियों के हितैषी, पालन कर्ता एवं वश में करने वाले अग्नि हमें पुण्य कर्मों के फल के रूप में मिलने वाला लोक प्रदान करें. (१) वैश्वानराय प्रति वेदयामि यदृणं संगरो देवतासु. स एतान् पाशान् विचृतं वेद सर्वानथ पक्वेन सह सं भवेम.. (२) मुझ पर जो लौकिक ऋण एवं देवों के प्रति की गई प्रतिज्ञा पूर्ण न करने का ऋण है, उन सब को मैं अग्नि देव को बताता हूं. अग्नि देव इन लौकिक और दैविक ऋण रूपी पाशों को ढीला करना जानते हैं. (२) वैश्वानरः पविता मा पुनातु यत् संगरमभिधावाम्याशाम्. अनाजानन् मनसा याचमानो यत् तत्रैनो अप तत् सुवामि.. (३) सभी भावों को पवित्र करने वाले अग्नि मुझे पवित्र करें. मैं ने ऋण चुकाने एवं यज्ञ करने का जो वचन दिया है तथा मैं देवों में जो आशा उत्पन्न करता हूं, उन के ऋण को चुकाता नहीं हूं. मैं अपने मन से लौकिक सुखों की याचना करता हूं. इस प्रकार के असत्य भाषण में जो पाप है, उसे मैं दूर करता हूं. (३) सूक्त-१२० देवता—अंतरिक्ष आदि यदन्तरिक्षं पृथिवीमुत द्यां यन्मातरं पितरं वा जिहिंसिम. अयं तस्माद् गार्हपत्यो नो अग्निरुदिन्नयाति सुकृतस्य लोकम्.. (१) मैं ने अंतरिक्ष में रहने वाले, पृथ्वी पर रहने वाले तथा स्वर्गलोक में रहने वाले जनों की हिंसा के रूप में जो पाप किया है, मैं ने अपने मातापिता के प्रतिकूल आचरण कर के जो हिंसा रूपी पाप किया है, गृहस्थों द्वारा सेवित यह अग्नि मुझे उन पापों से छुड़ा कर उन लोकों को प्राप्त कराएं जो पुण्य कर्म करने वालों को प्राप्त होते हैं. (१) भूमिर्मातादितिर्नो जनित्रं भ्राता ऽ न्तरिक्षमभिशस्त्या नः. द्यौर्नः पिता पित्र्याच्छं भवाति जामिमृत्वा माव पत्सि लोकात्.. (२) पृथ्वी हमारी माता है और देवमाता अदिति हमारे जन्म का कारण है. अंतरिक्ष हमारा भाई है. यह मुझे मिथ्या भाषण रूपी पाप से बचाए. आकाश हमारा पिता है. वह पिता से आए दोष से हमें बचाए एवं हमें सुखी बनाए. मैं व्यर्थ ही प्राण त्याग कर के तथा यज्ञ आदि न कर के स्वर्गलोक से अधोगति प्राप्त न करूं. (२) यत्रा सुहार्दः सुकृतो मदन्ति विहाय रोगं तन्व १: स्वायाः.

सूक्त-१२१ देवता—अग्नि आदि

अश्लोणा अङ्गैर्ह्रुताः स्वर्गे तत्र पश्येम पितरौ च पुत्रान्.. (३) यज्ञ आदि करने वाले सहृदय जन अपने शरीर के ज्वर आदि रोगों को त्याग कर स्वर्ग आदि लोकों में प्रसन्न होते हैं. हम भी कुष्ठ आदि रोगों से हीन अंगों के द्वारा सरल गति से चलते हुए स्वर्गलोक में अपने पिता, माता और पुत्रों से मिलें. (३) सूक्त-१२१ देवता—अग्नि आदि विषाण पाशान् वि ष्या ऽ ध्यस्मद् य उत्तमा अधमा वारुणा ये. दुष्ष्वप्न्यं दुरितं निः ष्वास्मदथ गच्छेम सुकृतस्य लोकम्.. (१) हे बंधन की देवी निर्ऋति! हमारे शरीर के मार्गों को बांधने वाले फंदे की रस्सियों को हम से छुड़ाती हुई हमें मुक्त करो. जो पाश उत्तम, अधम और वरुण से संबंधित हैं, उन्हें हम से अलग करो. बुरे स्वप्न से उत्पन्न पाप के फंदों को भी हम से अलग करो. इन फंदों से छूट कर हम पुण्य के फल के रूप में मिलने वाले लोकों को प्राप्त करें. (१) यद् दारुणि बध्यसे यच्च रज्जवां यद् भूम्यां बध्यसे यच्च वाचा. अयं तस्माद् गार्हपत्यो नो अग्निरुद्निन्याति सुकृतस्य लोकम्.. (२) हे पुरुष! तुम काठ के बंधन में, रस्सी में अथवा धरती के गड्ढे में राजा की आज्ञा से बांधे गए हो. यह गार्हपत्य अग्नि तुम्हें उन बंधनों से छुड़ा कर वह लोक प्राप्त कराएं, जो उत्तम कर्म करने के फल के रूप में मिलता है. (२) उदगातां भगवती विचृतौ नाम तारके. प्रेहामृतस्य यच्छतां प्रैतु बद्धकमोचनम्.. (३) विचृत अर्थात् मूल नक्षत्र में उदय या उत्पन्न होने वाली विचृत नाम की तारिकाएं इस बंधे हुए पुरुष को मरने से बचाएं तथा साथ ही बंधन से मुक्त करें. (३) वि जिहीष्व लोकं कृणु बन्धान्मुञ्चासि बद्धकम्. योन्या इव प्रच्युतो गर्भः पथः सर्वा अनु क्षिय.. (४) हे बंधन से संबंधित देवता! तुम अनेक प्रकार से आओ और इस स्थान पर बंधे हुए पुरुष को उसके बंधन से छुड़ाओ. हे पुरुष! जिस प्रकार माता के गर्भ से बच्चा बाहर निकल आता है, उसी प्रकार तू बंधन से छूट कर स्वच्छंद रूप से सभी मार्गों पर चल. (४) सूक्त-१२२ देवता—विश्वकर्मा एतं भागं परि ददामि विद्वान् विश्वकर्मन् प्रथमजा ऋतस्य. अस्माभिर्दत्तं चरसः परस्तादच्छिन्नं तन्तुमनु सं तरेम.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*