भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
प्रीतिभक्तिरस [२५६ चाहें कर सकते हैं। चाहे लक्ष्मी देवी मुझसे सन्तुष्ट न हों, मैं जानता हूँ कि आप सदा मेरी सेवा को स्वीकार करते रहेंगे।" भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में अनुरक्त भक्त तीन प्रकार के हो सकते हैं—शरणागत, भक्ति के ज्ञान में उन्नत, एवं पूर्ण रूप से सेवा- परायण । ऐसे भक्त क्रमशः साधक, सिद्ध और नित्यसिद्ध कहलाते हैं।
अध्याय ३७ श्रीकृष्णसेवा के उद्दीपन श्रीकृष्ण की अहैतुकी कृपा की प्राप्ति, उनके चरणकमल की रज की प्राप्ति, उनका प्रसाद, तथा उनके भक्तों का संग—ये वे कुछ उद्दीपन हैं जिनसे भक्त भगवान् की प्रेममयी सेवा में संलग्न होता है । भीष्म पितामह के देहत्याग के अवसर पर उपस्थित होकर श्रीकृष्ण ने अपनी अहैतुकी कृपा का परिचय दिया था। कुरुक्षेत्र के युद्ध में पौत्र अर्जुन से हारकर भीष्मदेव शरशय्या पर विराज रहे थे । प्राकृत-जगत् से उनके प्रस्थान का समय निकट था। जब भगवान् श्रीकृष्ण, महाराज युधिष्ठिर तथा अन्य पाण्डव भीष्मदेव के निकट पहुँचे तो वे भगवान् श्रीकृष्ण से बड़े अनुगृहीत हुए और कृपाचार्य से कह उठे, “हे कृपाचार्य जी ! भगवान् श्रीकृष्ण की अद्भुत अहैतुकी कृपा का अवलोकन कीजिये । मैं परम अभागा हूँ, मुझमें कोई योग्यता नहीं। युद्ध में मैं श्रीकृष्ण के परम अंतरंग सखा अर्जुन का विरोध कर रहा था, यहाँ तक कि मैंने उसे मारने की भी पूरी चेष्टा की। मुझमें इतने अवगुण हैं, परन्तु भगवान् फिर भी इतने दयामय हैं कि वे जीवन के इस अन्तिम क्षण में मुझे मिलने आये हैं। वे सम्पूर्ण महर्षिवृन्द के आराध्य हैं। परन्तु फिर भी करुणावश मुझ जैसे अधम को दर्शन देने पधारे हैं।” कभी-कभी श्रीकृष्ण की वंशी और श्रृंग की ध्वनि, उनकी हँसी, भूमि पर उनके चरणचिह्नों के अंक, उनकी दिव्य सौरभ और उनके वर्ण के समान आकाश में नवोदित मेघ—ये सब भी कृष्णप्रेम के उद्दीपन का काम करते हैं। 'विदग्धमाधव' में उल्लेख है—श्रीकृष्ण को वेणु बजाते देखकर बल- देव ने बड़ी आतुरता से कहा, "देखो देखो, श्रीकृष्ण के दिव्य वेणुरव को सुनकर देवराज इन्द्र अपने स्वर्ग में रोने लगा। भूमि पर उसकी अश्रुधारा के गिरने से वृन्दावन देवताओं का दिव्य निवास लग रहा है।”
श्रीकृष्णसेवा के उद्दीपन [ २६१ कृष्णप्रेम में होने वाले अनुभाव इस प्रकार हैं—पूर्ण रूप से भगवान् की सेवा के परायण हो जाना; निष्ठा और श्रद्धापूर्वक उनकी आज्ञापालन में लगे रहना, पूर्ण रूप से प्रेममयी भगवत्सेवा में तत्पर होकर उद्वेग और ईर्ष्या से मुक्त हो जाना तथा श्रद्धा प्रेमसहित भगवान् की सेवा करने वाले भक्तों से मैत्री करना। ये सब लक्षण प्रेम के अनुभाव हैं। प्रेम के पहले लक्षण अर्थात् किसी विशेष सेवा में तत्पर रहने का प्रतीक दारुक है। यह श्रीकृष्ण का सेवक है और निरन्तर उन्हें चँवर डुलाया करता है। इस प्रकार सेवा करते-करते वह प्रेमभाव से ओत-प्रोत हो गया और प्रेम के लक्षण उसके शरीर पर प्रकट हो गये। परन्तु दारुक की अपनी सेवा में ऐसी निष्ठा थी कि उसने प्रेम की सब अभिव्यक्तियों को रोक लिया क्योंकि उसके विचार में इनसे उसके सेवा कार्य में बाधा पड़ रही थी। ये सब लक्षण अपने आप उदित हुए थे; परन्तु उसने इन्हें कुछ भी महत्त्व नहीं दिया। श्रीमद्भागवत (१०.८६.३८) में उल्लेख है कि श्रीकृष्ण को अपने घर आया देख श्रुतदेव ब्राह्मण इतना आनन्दविह्वल हो उठा कि श्रीकृष्ण के चरणकमलों में प्रणाम करके हाथ उठा-उठाकर नाचने लगा। भगवान् श्रीकृष्ण का एक भक्त उन्हें सम्बोधित करते हुए कहने लगा, “हे नाथ ! यद्यपि आप वृत्तिक नाचने वाले नहीं हैं; परन्तु आपके नृत्य ने हमें इतना आश्चर्यचकित कर दिया है कि लगता है कि आप स्वयं अखिल नृत्यकला के गुरु हैं। निःसन्देह आप ने साक्षात् प्रेम की देवी से नाचना सीखा होगा।” जब कोई भक्त प्रेमभाव में भरकर नाचता है तो सात्त्विक भावों का उदय होता है। इन भावों को सात्त्विक कहने का तात्पर्य यह है कि वे शुद्ध सत्त्व के स्तर पर प्रकट होते हैं। ये प्राकृत भावना के लक्षण नहीं हैं, ये तो साक्षात् आत्मा की अभिव्यक्ति हैं। श्रीमद्भागवत (१०.८५.३८) में शुकदेव गोस्वामी परीक्षित महाराज से कहते हैं कि वामनदेव के चरणकमलों में अपना सर्वस्व अर्पण करके बलि महाराज ने तुरन्त उनके चरणों को पकड़ लिया और पकड़ कर अपने हृदय से लगा लिया। आनन्द विह्वल होने के कारण उनमें प्रेम के सारे दिव्य लक्षणों का उदय हुआ। उनकी वाणी कम्पित हो उठी और नेत्रों से अश्रुधारा बह चली। प्रेमभाव की ऐसी अभिव्यक्तियों में अनेक गौण लक्षण भी होते हैं—जैसे हर्ष, गर्व, धृति, निर्वेद, विषण्णता, दैन्य, चिन्ता, स्मृति, शंका, मति, उत्सुकता, चपलता, वितर्क, आवेग, लज्जा, जाड्य, मोह, उन्माद,
२६२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु अवहित्था, बोध, स्वप्न, क्लम, व्याधि, मृत्यु इत्यादि । श्रीकृष्ण से संयोग होने पर भक्त में हर्ष, गर्व, धृति, आदि लक्षण होते हैं और जब उसे श्रीकृष्ण से अति विरह का अनुभव होता है तो मोह, व्याधि, मृत्यु आदि लक्षण प्रधान रहते हैं । श्रीमद्भागवत (१.११.५) में उल्लेख है कि जब भगवान् श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र के युद्ध से अपने घर द्वारका लौटे तो सारे द्वारकावासी उनसे उसी प्रकार वार्तालाप करने लगे जैसे कोई बालक विदेशों को गये पिता से घर लौटने पर प्रेमपूर्वक बात करता है। यह हर्ष का उदाहरण है । जब मिथिला नरेश बहुलाश्व ने श्रीकृष्ण को अपने महल में देखा तो उसने संकल्प किया कि वह कम से कम सौ बार उन्हें दण्डवत् प्रणाम करेगा। परन्तु वह प्रेम के भाव में ऐसा विभोर हुआ कि केवल एक बार प्रणाम कर के अपनी स्थिति को भूल गया और फिर वापस नहीं उठ सका । स्कन्दपुराण में एक भक्त भगवान् श्रीकृष्ण से कहता है, “हे स्वामिन् ! जैसे सूर्य अपने प्रबल तेज से भूमि के सारे जल को सुखा डालता है उसी प्रकार मेरी मनोव्यथा ने मेरे मुख और शरीर के सारे तेज को सुखा डाला है। इसका कारण केवल आपका विरह है। "यह प्रेम में क्लम का उदाहरण है । निर्वेद की अभिव्यक्ति देवराज इन्द्र के कथन में है। उसने सूर्यदेव को देखा तो कहने लगा, "हे सूर्य ! तुम्हारी ज्योति धन्य है क्योंकि यह श्रीकृष्ण के चरणकमलों तक पहुँच रही है, जो यदुवंश के नायक हैं। मेरे हजार नेत्र भी निरर्थक ही सिद्ध हुए हैं,क्योंकि एक क्षण के लिये भी ये भगवान् के चरणारविन्द को नहीं देख पाये ।" सम्भ्रम प्रीति उत्तरोत्तर वृद्धि को प्राप्त होकर प्रेम में परिवर्तित हो जाती है। उससे आगे स्नेह और आगे बढ़कर राग का रूप धारण कर लेती है। श्रीमद्भागवत (१०.३८.६) में अक्रूर कहते हैं—"आज मेरे सब पापों का नाश हो गया है और जीवन धन्य-धन्य हो चुका है क्योंकि आज मैं योगियों के लिये ध्यान में भी दुर्लभ भगवान् के चरणकमलों को प्रणाम करूँगा ।" एक अन्य भक्त अपने सम्भ्रम प्रीतिभाव में कहने लगा, "मेरे जीवन में वह धन्यातिधन्य दिन कब होगा जब मैं यमुना तट पर भगवान् श्रीकृष्ण को गोपाल वेष में खेलते देख सकूँगा ।" जब इस प्रीति में ह्रास की शंका नहीं रहती उस समय भक्त प्रेम
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की अवस्था को प्राप्त हो जाता है। इस अवस्था में भक्त द्वारा अभिव्यक्त भावों को अनुभाव कहते हैं। बलि महाराज को जिस सम्भ्रम प्रीति का अनुभव हुआ था उसका वर्णन इस प्रकार है—"हे नाथ ! आपने एक साथ मुझे दण्डित भी किया है और मुझ पर अपनी अहैतुकी कृपा भी बरसाई है। अतएव यह निश्चित है कि यदि मैं आपके चरणकमलों के शरणागत हो जाऊँ तो फिर जीवन की किसी भी अवस्था में मुझे उद्वेग नहीं होगा। चाहे आप मुझे सारी यौगिक सिद्धियों को भोगने का अवसर दें अथवा नरक का भाग दें, मैं कभी उद्वेग में नहीं होऊँगा।" श्रीकृष्ण ने स्वयं बलि महाराज को देखने के बाद उद्धव से कहा, "हे सखे ! मैं बलि महाराज के गौरवमय चरित्र का वर्णन किस प्रकार करूँ ? यद्यपि भृगुनन्दन ने इसे शाप दिया और वामन अवतार में मैंने इससे छलपूर्वक ब्रह्माण्ड का साम्राज्य हरण कर लिया और अभी भी मैं प्रतिज्ञा को पूर्ण न करने के कारण इसकी निन्दा करता हूँ; फिर भी मैंने उसे देखा है और वह मेरे लिये प्रेम से पूर्ण है। मेरे लिए उसका प्रेम अब भी अभिव्यक्त हो रहा है।" प्रेम का यह भाव जब तीव्र हो उठता है तो उसे स्नेह कहते हैं। स्नेह की अवस्था में श्रीकृष्ण से क्षणभर का विरह भी नहीं सहा जा सकता। एक भक्त श्रीकृष्ण के सेवक दारुक से कहता है, "हे दारुक ! इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि श्रीकृष्ण के विरह में तुम काष्ठवत् हो जाते हो। जब भी कोई भक्त श्रीकृष्ण को देखता है तो उसके नेत्र अश्रुधारा से भर जाते हैं; उनके विरह में तुम्हारे जैसा कोई भी भक्त कठपुतली के समान स्तम्भित खड़ा रह जाता है। इसमें कोई बड़े आश्चर्य की बात नहीं है।" उद्धव के प्रेम-लक्षणों के सम्बन्ध में भी एक वाक्य है—"जब उन्होंने श्रीकृष्ण को देखा तो उसके नेत्र आँसुओं से भर आये, जिनके बहने से एक नदी बह चली, मानो कृष्णरूप समुद्र को समर्पण करने जा रही हो—उसी प्रकार जैसे पत्नी पति का अभिनन्दन करती है। रोमांच की अतिशयता के कारण उद्धव कदम्ब के पुष्प जैसे सुशोभित हो रहे थे। जब वे प्रार्थना करने लगे तो भक्तों के समूह में भी उनकी शोभा सबसे अधिक बढ़ गई।" स्नेह को जिस अवस्था में दुःख भी सुख प्रतीत होने लगता है उसको
२६४ भक्तिरसामृतसिन्धु राग कहते हैं। राग में सब प्रकार के दुःखों का शान्तिपूर्वक सामना करने की योग्यता आ जाती है। मृत्यु का भय उपस्थित होने पर भी ऐसा भक्त भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा से अपने को वंचित नहीं करता। प्रेम का गौरवमय उदाहरण राजा परीक्षित ने उपस्थित किया है। उनकी मृत्यु आसन्न थी और वे सम्पूर्ण विश्व में फैले अपने राज्य से वंचित हो चुके थे। जीवन के शेष सात दिनों में उन्होंने जल की एक बूँद भी ग्रहण नहीं की थी। फिर भी शुकदेव गोस्वामी से भगवान् की दिव्य लीलाकथा को सुनते हुए उन्हें लेशमात्र भी दुःख न था। इसके विपरीत, वे शुकदेव गोस्वामी के संग में प्रत्यक्ष दिव्य आनन्द का अनुभव कर रहे थे। एक भक्त का विश्वास इस प्रकार अभिव्यक्त हुआ है—"यदि मुझे श्रीकृष्ण की कृपा का एक बिन्दु भी मिल जाये तो फिर मैं अग्नि अथवा सागर से घिरा होने पर भी सब प्रकार से चिन्तामुक्त रहूँगा। परन्तु यदि मैं उनकी अहैतुकी कृपा से वंचित रहूँ तो फिर द्वारका का राजा बन जाने पर राज्य का सिंहासन भी मेरे लिये कुशकंटक के समान होगा।" महाराज परीक्षित और उद्धव जैसे सब भक्त स्नेह के आधार पर राग में स्थित हैं। इस प्रकार के स्नेह में सख्यभाव का लेश प्रकाशित होता है। सब प्रकार के सांसारिक द्वेषों से मुक्त होने पर जब उद्धव को भगवान् का दर्शन हुआ तो उनका कण्ठ रुद्ध हो गया और वे कुछ न बोल सके। केवल अपने भ्रू-विलास से ही भगवान् का आलिंगन कर रहे थे। महान् विद्वानों ने ऐसी प्रीति को दो भागों में विभाजित किया है—अयोग तथा योग। यदि भक्त को साक्षात् श्रीकृष्ण का संग प्राप्त नहीं है तो उसे विद्वानों ने अयोग कहा है। इस प्रकार उनके प्रेम में चित्त निरन्तर उनके चरणकमलों में एकाग्रित रहता है। ऐसा भक्त निरन्तर श्रीकृष्ण के दिव्य गुणगणों का अनुसन्धान किया करता है। उसके लिए सबसे महत्त्वपूर्ण भगवान् का संग प्राप्त करना है। 'नृसिंहपुराण' में राजा इक्ष्वाकु के सम्बन्ध में एक वाक्य है—जिससे इस प्रेमभाव का उदाहरण मिलता है--' श्रीकृष्ण के प्रति अत्यन्त स्नेह के वश राजा इक्ष्वाकु काले मेघ, काले मृग की काली आँखों और कमल जिसको सदा भगवान् की आंखों की उपमा दी जाती है, इन सब पदार्थों में आसक्त हो गये।" श्रीमद्भागवत (१०.३८.१०) में अक्रूर सोचते हैं, "इस समय श्रीभगवान् साक्षात् इस धरती पर भार हरण के लिये विद्यमान हैं, और सबको अपने निज रूप में दृष्टिगोचर हो रहे हैं। ऐसे में जब हम उन्हें अपने सामने पाते हैं तो क्या यह हमारे नेत्रों की परम कृतार्थता नहीं
श्रीकृष्णसेवा के उद्दीपन [ २६५ है ?" भाव यह है कि अक्रूर को अनुभव हुआ कि नेत्रों की कृतार्थता श्रीकृष्ण के दर्शनों में ही है। अतएव जिस समय श्रीकृष्ण पृथ्वी पर साक्षात् दृश्यमान थे तो जिस किसी ने उन्हें देखा उसने नेत्रों की पूर्णता को प्राप्त कर लिया । बिल्वमंगल ठाकुर के 'कृष्णकर्णामृत' में प्रेम में उत्सुकता का यह उदाहरण—"कैसा दुर्भाग्य है ! हे हरे ! हे दीनबन्धु ! हे प्रिय कृष्ण ! तुम्हें देखे बिना इन अधन्य दिनों को मैं कैसे व्यतीत करूँ ? हाय कैसे व्यतीत करूँ ?" इसी प्रकार की भावना उद्धव ने श्रीकृष्ण को लिखे अपने एक पत्र में व्यक्त की है, "हे व्रजराज ! आप नेत्रों के लिये अमृतसिन्धु हैं । आपके चरणकमलों और अंगकांति को देखे बिना मुझे किसी भी प्रकार, किसी भी अवस्था में शान्ति नहीं मिलती । चित्त निरन्तर दुःख-सागर में मग्न रहता है । आपके विरह का एक-एक क्षण मेरे लिये युगों के समान हो गया है।" 'कृष्णकर्णामृत' में ही कहा है—"हे नाथ ! आप कृपा के सागर हैं । अत्यन्त दीनता के साथ बद्धाञ्जलि होकर मैं आपसे निवेदन कर रहा हूँ । क्या आप कृपया अपने कृपाकटाक्ष रूपी शीतल जल से मेरा सिंचन करेंगे ? इससे मुझे बड़ा सन्तोष होगा।" श्रीकृष्ण के एक भक्त ने कहा, "जब शशिशेखर शिव तक आपको नहीं देख सकते, फिर मुझ कीट से अधम के लिये क्या कहना । हे नाथ मैंने केवल पाप ही पाप किये हैं। मैं जानता हूँ कि मैं आपसे प्रार्थना करने के योग्य नहीं । परन्तु आपका एक नाम दीनबन्धु है । इसलिये आपसे प्रार्थना है कि कृपया अपने दिव्य कृपाकटाक्ष की किरण से अभिषिक्त करके मुझे शुद्ध कर दें । मेरी रक्षा तभी हो सकती है जब मैं पूर्ण रूप से आपके कृपाकटाक्ष में स्नान कर लूँ । अतएव हे नाथ ! कृपा करें।"
अध्याय ३८ निर्वेद तथा वियोग महाभागवत उद्धव ने एक बार श्रीकृष्ण को यह पत्र लिखा-“हे कृष्ण ! मैंने अभी-अभी नाना प्रकार के दर्शन-ग्रन्थों और, वैदिक श्रुतियों का अध्ययन समाप्त किया है, जो जीवन के लक्ष्य का वर्णन करते हैं। अपने इस अध्ययन से मुझे प्रसिद्धि भी मिली है; परन्तु फिर भी मेरे इस ज्ञान को धिक्कार है क्योंकि यद्यपि मैं वैदिक ज्ञान की ज्योति का ओस्वादन कर रहा हूँ परन्तु आपके चरण नखांकुर से प्रस्फुटित द्युति का रसास्वादन नहीं कर पाया। अतएव मेरा यह अभिमान और वैदिक ज्ञान जितनी शीघ्र समाप्त हो जाये, अच्छा है।” यह निर्वेद का उदाहरण है। एक अन्य भक्त ने बड़ी आतुरता से अपने भाव को इन शब्दों में व्यक्त किया है—“हे नाथ ! मेरा मन बड़ा अस्थिर है। इसलिये इसे मैं आपके चरणकमलों में एकाग्र करने में सफल नहीं हो पा रहा हूँ। अपनी इस अयोग्यता के कारण मुझे लज्जा आती है और सारी रात अपनी इस अयोग्यता पर शोक करते हुए मैं सो नहीं पाता।” यह चिन्ता है। ‘कृष्णकर्णामृत’ में विल्वमंगल ठाकुर ने अपनी चपलता इस प्रकार व्यक्त की है—“हे नाथ ! तुम्हारी शैशवकालीन चपलता त्रिभुवन में सबसे अद्भुत है। अब तुम स्वयं इसे जानते हो इसलिये मेरे मन की चंचलता को भी सहज समझ सकते हो। इसे केवल तुम जानते हो अथवा मैं। मैं तो बस यह जानने को उत्सुक हूँ कि किस प्रकार तुम्हारे चरणकमलों में मेरा मन एकाग्र हो सकता है।” एक अन्य भक्त अपने को उद्धत बताकर कहता है, “हे नाथ ! अपनी शूद्रता पर विचार किये बिना मैं आपके सामने स्वीकार करता हूँ कि मेरे नेत्र श्याम भ्रमरों के समान आपके चरणकमलों पर मंडराना चाहते हैं।” श्रीमद्भागवत (७.४.३७) में देवर्षि नारद महाराज युधिष्ठिर को महाभागवत् प्रह्लाद महाराज की गाथा सुना रहे थे। प्रह्लादजी की
निर्वेद तथा वियोग [ २६७ स्वाभाविक भक्ति का प्रमाण इस बात से मिल जाता है कि जब वे नन्हें बालक थे तब भी उन्हें अपने सखाओं के साथ खेलना अच्छा नहीं लगता था। इसके स्थान पर वे सदा भगवान् की कीर्ति का प्रचार किया करते थे। अपने साथियों के खेलों में भाग लेने के स्थान पर वे जड़वत् समाधि में मग्न रहते, क्योंकि उनका ध्यान सदा श्रीकृष्ण पर था। अत- एव बाह्य जगत् उन्हें स्पर्श भी न कर सका। एक ब्राह्मण भक्त के सम्बन्ध में प्रसिद्ध उल्लेख है, "यह ब्राह्मण कर्मकाण्ड में बड़ा कुशल है पर न जाने क्यों यह अपलक नेत्र और निस्पंद देह को धारण किये हुए चित्रलिखित सा खड़ा है। लगता है उस विदग्ध वेणुवादन में रत कृष्ण की दिव्य माधुरी ने इसके मन को मोहित कर लिया है और उसके प्रति अनुरक्त होकर इसने अपनी दृष्टि को सामने घनश्याम मेघ पर लगा रखा है, जिससे इसे निरन्तर श्रीकृष्ण के विग्रह वर्ण का स्मरण हो रहा है।" यह प्रेमभाव में भक्त को होने वाली जड़ता का उदाहरण है। श्रीमद्भागवत (७.४.४०) में प्रह्लाद महाराज कहते हैं कि अपने शैशव काल में भी जब वे भगवान् की कीर्ति का गायन करते तो निर्लज्ज पागल के समान नाच उठते। भगवान् की लीला के चिन्तन में पूर्ण रूप से निमग्न हो जाने के कारण कभी-कभी इन लीलाओं का अनुकरण भी करने लगते। यह भक्त के उन्माद का उदाहरण है। इसी प्रकार कहा जाता है कि देवर्षि नारद का श्रीकृष्ण में ऐसा भावोन्मत्त प्रेम था कि वे कभी-कभी नंगे नाचने लगते; कभी उनका पूर्ण शरीर स्तम्भित हो जाता; कभी वे जोर-जोर से हँसते और कभी उच्च स्वर से रुदन करने लगते; कभी वे एक दम चुप पड़ जाते और कभी व्याधिग्रस्त लगते, यद्यपि उन्हें कोई रोग नहीं था। यह भी भक्तिभाव में होने वाले उन्माद का उदाहरण है। 'हरिभक्तिसुधोदय' में उल्लेख है कि जब महाराज प्रह्लाद अपने को भगवान् के समीप जाने के अयोग्य समझ रहे थे तो वे दुःख के सागर में निमग्न हो गये और इस प्रकार आँसू बहाते हुए भूमि पर गिर पड़े और अचेतन हो गये। एक महान् भक्त के शिष्यों ने एक बार आपस में इसप्रकार कहा—'हे भाइयों ! हमारे गुरु महाराज श्रीकृष्ण के चरणकमलों को देखकर शोक की अग्नि में कूद पड़े हैं और इस अग्नि के कारण उनका चेतना रूपी जल बिल्कुल सूख गया है। अतः आओ उनके कर्णों में भगवन्नामामृत का प्रवेश करायें, जिससे उनके प्राणरूपी हंस फिर चेष्टा करने लगें।"
२६८] भक्तिरसामृतसिन्धु जब भगवान् श्रीकृष्ण शोणितपुर नगर में बलिपुत्र बाण से लड़ने गये और उन्होंने उसके हाथ काट डाले तो श्रीकृष्ण के विरह में उनके युद्ध का चिन्तन करते हुए उद्धव पूर्ण रूप से स्तम्भित होकर अचेतन हो गया । जब कोई भक्त पूर्ण रूप से भगवत्प्रेम को प्राप्त हो जाता है तो भगवान् के विरह में उसमें ये भाव प्रकट हो सकते हैं—अंगों में संताप, कृशता, निद्रानाश, अनासक्ति, जड़ता, व्याधि, उन्माद, मूर्च्छा तथा मरण । अंगों में संताप का उदाहरण इस प्रकार है—उद्धव ने एक समय नारद से कहा "हे महर्षि ! कमल हमें संताप दे तो कोई बात नहीं, क्योंकि वह सूर्य का मित्र है; बड़वानल सागर भी हमारे लिये कष्टदायक हो सकता है तथा दैत्य का मित्र इन्दीवर भी हमें नाना प्रकार से कष्ट दे तो हमें दुःख न होगा; परन्तु सबसे बड़ा दुःख तो इस बात का है कि ये सब हमें श्रीकृष्ण का स्मरण कराकर बहुत अधिक दुःख के सागर में पहुँचा देते हैं।" यह श्रीकृष्ण के विरह में होने वाले संताप का उदाहरण है। श्रीकृष्ण के दर्शन के लिये द्वारका गये परन्तु द्वार पर ही रोके गये कुछ भक्त कहने लगे, 'हे कृष्ण ! हे पाण्डवों के बान्धव ! जैसे हँस जल में कमलों के बीच रहना चाहता है और जल से निकाल दिये जाने पर मर जाता है, उसी प्रकार हमारी एकमात्र इच्छा तुम्हारे साथ रहने की है। तुम्हारे वियोग में हमारे बाहु तक कृश और विवर्ण हो चले हैं।" राजा बहुलाश्व अपने महल में बड़े सुखपूर्वक विराजमान थे । परन्तु श्रीकृष्ण के विरह में उनके लिये रात्रि बहुत लम्बी और दुःखामक हो गई । राजा युधिष्ठिर ने एक बार कहा था, "हे कृष्ण ! हे पार्थसारथि ! अर्जुन के सारथि कृष्ण ही त्रिभुवन में मेरे एकमात्र बान्धव हैं, सम्बन्धी हैं। उनके चरणकमलों के विच्छेद में मेरा मन दिनरात उन्मत्त हो चला है। मैं नहीं जानता कि अपने को कहाँ टिकाऊँ अथवा मन की स्थिरता के लिये कहाँ जाऊँ।" यह आलम्बनशून्यता तथा अनासक्ति का भाव है। श्रीकृष्ण के कुछ गोप-सखा कहने लगे, "हे कृष्ण ! हे मुरारि ! तनिक अपने निजी सेवक रक्तक का तो विचार करो । इसने एक मोरपंख क्या देख लिया कि आँखें बन्द कर ली हैं और अब घास चरती हुई गायों की ओर भी ध्यान नहीं दे रहा, वरन् उन्हें चारण करते हुए दूर छोड़
निर्वेद तथा वियोग [ २६६ आया है। उनका नियंत्रण करने के लिये व्यष्टि का प्रयोग भी नहीं करता।" यह श्रीकृष्ण के विरह में होने वाली जड़ता का उदाहरण है। श्रीकृष्ण को राजा युधिष्ठिर की राजधानी को गया जानकर उद्धव कृष्णविरह की अग्नि से ऐसा पीड़ित हुआ कि उसकी दग्ध देह से स्वेदधारा और आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। इस प्रकार वह पूर्णतः स्तम्भित हो गया, जड़ता को प्राप्त हो गया। जब श्रीकृष्ण द्वारका छोड़कर स्यमंतक मणि को खोजने गये और लौटने में विलम्ब हो गया तो उनके विरह के अतिरेकवश उद्धव की देह में व्याधि के लक्षण प्रकट हो गये। वास्तव में श्रीकृष्णप्रेम की अतिशयता के कारण उद्धव द्वारका में पागल के रूप में प्रसिद्ध हो गया। सौभाग्यवश उस दिन उद्धव का पागलपन निश्चित रूप से सार्थक हुआ। रैवतक पर्वत पर नवीन घनश्याम मेघ को देखकर विचलित बुद्धि, अधीर उद्धव पागलों की तरह प्रसन्न होकर उस मेघ की स्तुति और वन्दना करने लगा। उद्धव ने श्रीकृष्ण को सूचित किया, "हे यदुनायक वृन्दावन में आपके अनुरागी सेवक आपके चिन्तन में डूबे रहने से रात को सो भी नहीं पाते। अतएव अब वे निश्चलांग होकर यमुना तट पर पड़े हैं। वे मृतप्राय हो रहे हैं और उनकी स्वास बहुत मन्द पड़ चुकी है।" यह श्रीकृष्ण के विरह में होने वाली मूर्छा का दृष्टान्त है। श्रीकृष्ण को एक बार बताया गया, "हे कृष्ण ! तुम सारे वृन्दावन वासियों के जीवनप्राण हो। अतएव तुम्हारे वृन्दावन छोड़ देने से वहाँ तुम्हारे चरणकमलों के सब सेवक पीड़ित हैं। तुम्हारे प्रचण्ड विरह के ताप से जिनके हृदयकमल सूख चुके हैं, इस प्रकार के तालाबों की पंक्ति में अब हंसरूप प्राण वास नहीं करना चाह रहे हैं।" इस उदाहरण में वृन्दावन- वासियों को तालाब की उपमा दी गयी है। कृष्णविरह रूपी प्रचण्ड तेजवश उनके हृदयकमल सूख चुके हैं; इसलिये अब प्राणरूपी हंस उनसे उड़ना चाहते हैं।" यह अलंकार श्रीकृष्ण के विरह में भक्तों की दशाको स्पष्ट करने के लिए दिया गया है।
अध्याय ३६ श्रीकृष्ण से योग के प्रकार जब श्रीकृष्ण और उनके भक्त मिलते हैं तो उनके इस मिलन को योग कहा जाता है। श्रीकृष्ण और उनके भक्तों के योग तीन प्रकार के हैं—सिद्धि, तुष्टि तथा स्थिति। जब कोई भक्त बड़ी उत्सुकता के साथ श्रीकृष्ण से मिलता है तो उस मिलन को सिद्धि कहते हैं। 'कृष्णकर्णामृत' में बिल्वमंगल ठाकुर ने वर्णन किया है कि किस प्रकार मोर मुकुटधारी, वक्षःस्थल पर मरकतमणियों से सुशोभित तथा नित्य मोहक स्मित, कान्ति और चंचल नेत्र एवं कोमल शरीरांग श्रीकृष्ण अपने भक्त से मिलते हैं। श्रीमद्भागवत (१०.३८.३४) में शुकदेव गोस्वामी राजा परीक्षित से कहते हैं, "हे राजन् ! रथ पर सवार अक्रूर ने जैसे ही वृन्दावन में अग्रज बलराम सहित श्रीकृष्ण को देखा, वैसे ही वह रथ से नीचे उतर पड़ा और वैकुण्ठनाथ के अतिशय स्नेहवश उनके चरणों में साष्टांग दण्डवत् करने लगा। ये सिद्ध योग के कुछ उदाहरण हैं। जब कोई भक्त लम्बे विरह के बाद श्रीकृष्ण से मिलता है तो उस मिलन को तुष्टि कहते हैं। श्रीमद्भागवत (१.११.१०) में उल्लेख है जब श्रीकृष्ण अपनी राजधानी द्वारका को लौटे तो वहाँ के निवासी कहने लगे, "हे नाथ ! आप विदेश में इतने लम्बे समय तक रहेंगे तो हमें निस्सन्देह आपके मुस्कराते मुख मण्डल के दर्शन से वंचित रहना पड़ेगा। हे प्रभो ! आपके मुख को देखकर हम आपके नित्य सेवकों को बड़ा सन्तोष होता है। सारी चिन्ताएँ और उद्वेग तुरन्त समाप्त हो जाते हैं। यदि द्वारका में आपकी अनुपस्थिति के कारण हम आपको न देख पाये तो और अधिक हमारे लिये जीवित रहना संभव न होगा।" यह दीर्घकालीन विच्छेद के बाद श्रीकृष्ण से योग होने से तुष्टि रूप का उदाहरण है। श्रीकृष्ण का निजी सेवक दारुक द्वारका के द्वार पर श्रीकृष्ण को आया देख उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम करना तक भूल गया।
श्रीकृष्ण के साथ भक्त के सहवास को विद्वान् लोग भक्ति की सिद्धि कहते हैं। भक्तियोग की इस सिद्ध अवस्था का वर्णन 'हंसदूत' नामक ग्रन्थ में है। वहाँ वर्णन है कि किस प्रकार जिसके नाम से भी गोपियों को भय लगता था वह अक्रूर कृष्ण को कुरुवंश के कार्यकलापों के विषय में बताता था। बृहस्पति के शिष्य उद्धव को भी वह स्थिति प्राप्त थी। यह श्रीकृष्ण के सामने भूमि पर घुटने टेक कर उनके चरणकमलों को दबाया करता था। जब कोई भक्त भगवान् की सेवा के परायण होता है तो उसे 'योग' को प्राप्त हुआ कहा जाता है। भाव यह है कि भगवान् श्रीकृष्ण से योग का प्रारम्भ तभी से हो जाता है जब भक्त उनकी सेवा करने में प्रवृत्त होता है। दास्यभाव वाले भक्त जब भी उनसे मिलते हैं तो वे अपनी विशिष्ट सेवा का अर्पण करते हैं। वे श्रीकृष्ण के आगे आज्ञा की प्रतीक्षा में बैठ जाते हैं। कुछ व्यक्ति भक्ति की इस अवस्था को यथार्थ भक्तियोग मानने में संकोच करते हैं और कुछ पुराणों में भी भक्तियोग के इस दास्यभाव को यथार्थ भक्तियोग नहीं माना गया है। परन्तु श्रीमद्भागवत में स्पष्ट निर्देश है कि श्रीकृष्ण से दास्य का सम्बन्ध योग साक्षात्कार का यथार्थ प्रारम्भ है। श्रीमद्भागवत (११.३.३२) में उल्लेख है कि भक्तगण श्रीकृष्ण का प्रेमपूर्वक चिन्तन करते हुए कभी हँसते हैं, कभी खिलखिलाते हैं, कभी असाधारण रूप में बोलने लगते हैं, कभी नाचते हैं, कभी गाते हैं, कभी पूर्ण रूप से उनकी सेवा में लग जाते हैं और कभी चुपचाप समाधिमग्न जैसे बैठ जाते हैं। इसी प्रकार श्रीमद्भागवत (७.७.३४) में प्रह्लाद महाराज अपने मित्रों से कह रहे हैं, "जैसे ही शुद्धभक्त लीलामय भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य लीला-कथा को सुनते हैं अथवा उनकी गुणावली का उनके कर्ण रन्ध्रों में प्रवेश होता है वैसे ही वे आनन्द विह्वल हो उठते हैं। उनके शरीर में सारे सात्त्विक भावों का उदय हो जाता है। वे आँसू बहाते हैं, रुक-रुक कर बोलते हैं, उच्च स्वर से भगवान् का कीर्तिगान करते हैं और भावोन्मत्त नृत्य भी करने लगते हैं। ये सब भाव निरन्तर रहते हैं। परन्तु कभी-कभी वे सब सीमाओं का उल्लंघन भी कर जाते हैं और इस प्रकार सबके समक्ष प्रकट हो जाते हैं। भगवान् की शरणागति के छः अंग हैं—भक्तियोग के अनुकूल जो कुछ हो उसका संकल्प; जो भक्तियोग के प्रतिकूल हो उसका त्याग; श्रीकृष्ण निरन्तर रक्षा करेंगे ऐसा दृढ विश्वास; अपने को श्रीकृष्ण के भक्तों के साथ
२७२] भक्तिरसामृतसिन्धु मानना; श्रीकृष्ण की सहायता के बिना अपने को निरन्तर अयोग्य समझना तथा श्रीकृष्ण के आगे सब प्रकार से दीनता का भाव धारण किये रहना, चाहे स्वयं कुछ करने की योग्यता भी हो। जब यह दृढ़ विश्वास हो जाये कि श्रीकृष्ण सदा-सर्वदा नित्य रक्षा करेंगे तो इस भाव को गौरवप्रीति कहते हैं। गौरवप्रीति श्रीकृष्ण और उनके अन्य रक्षित भक्तों के सम्बन्ध में होती है। जिस समय श्रीकृष्ण द्वारका में निवास कर रहे थे, यदुवंश के वयो- वृद्ध पुरुष प्रायः उनके सामने महत्त्वपूर्ण विषयों को रखते थे। ऐसे समय श्रीकृष्ण सावधानीपूर्वक इन विषयों पर ध्यान देते थे। यदि कोई हँसने योग्य बात होती तो वे तुरन्त मंद-मंद मुस्कराने लगते। कभी-कभी सुधर्मा सभा में राजकीय कर्तव्यों का पालन करते हुए श्रीकृष्ण वृद्ध सदस्यों से सत्परामर्श माँगते। इन सब कार्य-कलापों से वे महागुरु, महाकीर्तिशाली, महाबली, रक्षक वाले आदि गुणों को प्रकट करते हैं।
अध्याय ४० श्रीकृष्ण के मित्र तथा अन्य लाल्याभिमानियों की गौरवप्रीति यथार्थ गौरवप्रीति उनमें प्रकट होती है जो अपने को श्रीकृष्ण का कृपापात्र मानते हैं अथवा जो अपने को श्रीकृष्ण का पुत्र समझते हैं। इस लाल्याभिमान के सर्वोत्तम उदाहरण सारण, गद और सुभद्र हैं। ये सब यदुवंशी थे और निरन्तर अपने को श्रीकृष्ण द्वारा रक्षित समझते थे। इसी प्रकार श्रीकृष्ण के प्रद्युम्न, चारुदेष्ण, और साम्ब आदि पुत्र भी इसी प्रकार समझते थे। द्वारका में श्रीकृष्ण के अनेक पुत्र थे। अपनी सोलह हजार एक सौ आठ रानियों में से प्रत्येक से उनके दस-दस पुत्र थे। ये सब, जिनमें से प्रद्युम्न, चारुदेष्ण और साम्ब प्रधान थे, निरन्तर अपने को श्रीकृष्ण द्वारा रक्षित समझते थे। जब श्रीकृष्ण के पुत्र उनके साथ भोजन करते तो कभी-कभी वे अपना मुँह खोलते जिससे श्रीकृष्ण खिला सकें। जब श्रीकृष्ण अपने किसी पुत्र की पीठ पर हाथ फेरते तो वह झट उनकी गोद में जा बैठता। श्रीकृष्ण जैसे ही उसका सिर सूंघते हुए आशीर्वाद देते, दूसरे आँसू बहाने लगते—यह सोचते हुए कि पूर्वजन्म में उसने कितने पुण्य कर्म किए होंगे। श्रीकृष्ण के अनेक पुत्रों में पट्टमहिषी रुक्मिणी का पुत्र, प्रद्युम्न सर्वप्रधान समझा जाता है। प्रद्युम्न का रूप ठीक श्रीकृष्ण जैसा है। श्रीकृष्ण के शुद्धभक्त प्रद्युम्न को सर्वोत्कर्षशाली कहकर जय- जयकार करते हैं, क्योंकि वह अपने रूप से श्रीकृष्ण भ्रम का उत्पन्न करने वाला है। हरिवंश में प्रभावती का हरण करते हुए प्रद्युम्न के क्रियाकलाप का वर्णन है। उस समय प्रद्युम्न ने प्रभावती से कहा, "हे प्रभावती ! हमारे कुल के प्रधान श्रीकृष्ण गरुड़वाहन स्वयं साक्षात् नारायण हैं। वे ही हमारे परम स्वामी हैं। उनकी रक्षा का हमें ऐसा गौरव और विश्वास
४. उत्तर विभाग: सप्त गौण भक्ति रस व उपसंहार
२७४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु हो चला है कि कभी-कभी तो हम त्रिपुरारी (शिवजी) से लड़ने में भी संकोच नहीं करते। सम्भ्रम एवं गौरव से युक्त भक्ति दो प्रकार के भक्तों में पाई जाती है—जो भगवान् के कृपापात्र हैं और जो उनके पुत्र हैं। द्वारकानिवासी सेवक निरन्तर श्रीकृष्ण को परमाराध्य भगवान् के रूप में भजते हैं। उनमें श्रीकृष्ण के ऐश्वर्य ज्ञान की प्रधानता रहती है। वे इसी पर मोहित रहते हैं। अपने को निरन्तर श्रीकृष्ण द्वारा रक्षित समझने वाले यदुवंशियों का यह विश्वास प्रायः विपदा पड़ने पर बहुत शीघ्र प्रत्यक्ष अभिव्यक्त हो जाता था। ऐसे अनेक अवसरों का उल्लेख है। कभी श्रीकृष्ण के पुत्र अनधिकार चेष्टा करते; परन्तु फिर भी कृष्ण-बलराम ने सदा उन्हें पूर्ण संरक्षण दिया। श्रीकृष्ण के अग्रज बलराम भी कभी-कभी जाने-अनजाने उन्हें आदर देते थे। एक समय जब श्रीकृष्ण बलरामजी के सामने आये तो वे अपने अग्रज को प्रणाम करने को उद्यत हुए। परन्तु उसी समय बलराम की गदा श्रीकृष्ण के चरणकमलों में झुक गई। भाव यह है कि बलराम के हाथ ने श्रीकृष्ण को प्रणाम किया। ये लाल्य अथवा आश्रयता के भाव कभी-कभी अनुभाव के रूप में अभिव्यक्त होते हैं। जब स्वर्गीय देवता श्रीकृष्ण के पास आये तो श्रीकृष्ण के सारे पुत्रों ने उनका अनुगमन किया और ब्रह्माजी ने अपने कमण्डलु से उन पर सुगन्धित जल का परिवर्षण किया। जब देवता श्रीकृष्ण के सामने आये तो पुत्र स्वर्ण सिंहासनों पर बैठने के स्थान पर श्रीकृष्ण के सामने भूमि पर बिछे हुए मृगचर्म के ऊपर बैठ गये। कभी-कभी श्रीकृष्ण के पुत्रों का व्यवहार उनके निजी सेवकों के समान प्रतीत होता है। उदाहरण के लिये प्रणाम करना, अधिकतर चुप रहना, संकोच, विनय की बहुलता और अपने प्राणों को देकर भी आज्ञा का पालन करना, सिर नीचा रखना, स्थिरता, खांसने और हँसने आदि का परित्याग, और उनकी अत्यन्त गुप्त क्रीड़ा और बातों आदि से दूर रहना—ये सब दासों के समान लाल्यजनों में भी होने वाले अनुभाव हैं। अतएव गौरवभक्ति में लगे भक्तों को श्रीकृष्ण की माधुर्य लीला का वार्तालाप कभी नहीं करना चाहिए। मुक्त हुए बिना कोई भी श्रीकृष्ण से नित्य सम्बन्ध की घोषणा न करे बद्धदशा में भक्तों के लिये भक्तियोग के विधि-विधान का पालन अनिवार्य है। भक्ति- योग के परिपक्व होने पर और स्वरूप का साक्षात्कार होने पर ही वह
श्रीकृष्ण के मित्र तथा अन्य लाल्याभिमानियों की गौरवप्रीति [ :२७५ श्रीकृष्ण से अपने नित्यसम्बन्ध को जान सकता है। कृत्रिम रूप से किसी सम्बन्ध को स्थापित करने का प्रयत्न करना ठीक नहीं। अपरिपक्व दशा में कभी-कभी देखा जाता है कि कोई बद्ध पुरुष अस्वाभाविक रूप से श्रीकृष्ण से माधुर्य प्रेम का सम्बन्ध स्थापित करना चाहता है। इसका परिणाम यह होता है कि वह प्राकृत सहजिया बन जाता है। ऐसे व्यक्ति श्रीकृष्ण से माधुर्य सम्बन्ध स्थापित करने को तो बड़े आतुर रहते हैं; परन्तु देखा जाता है कि प्राकृत-जगत् में उनका बद्धजीवन फिर भी परम निकृष्ट बना रहता है। जिसका वास्तव में श्रीकृष्ण से सम्बन्ध हो गया है वह फिर प्राकृत स्तर पर कार्य नहीं कर सकता और उसका निजी चरित्र सर्वथा अनिन्द्य हो जाता है। श्रीकृष्ण के दर्शन के लिये कंदर्प को आया देख किसी भक्त ने उसे संबोधित करते हुए कहा, 'हे कंदर्प ! अपने नेत्रों से श्रीकृष्ण के चरण युगला- रविन्द देखने का तुम्हें सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इसलिये तुम्हारे शरीर पर स्वेदकण जमकर कंटकी के फलों की सी शोभा पा रहे हैं।" ये श्रीभगवान् के लिये प्रीति और गौरव के लक्षण हैं। जब यदुवंशी राजकुमारों ने दूर से श्रीकृष्ण के पांचजन्य शंख की ध्वनि सुनी तो तुरन्त भावमय आह्लादवश उनके शरीर में रोमांच हो आया। प्रतीत होता था मानो उस समय राज- कुमारों के रोम भावोन्माद में नृत्य कर रहे हैं। हर्ष के अतिरिक्त कभी-कभी निर्वेद के लक्षण भी होते हैं। प्रद्युम्न ने एक बार साम्ब को सम्बोधित किया, "हे साम्ब ! तुम्हें पता है कि एक बार जब तुम भूमि पर लोट रहे थे तो तुम्हारी देह धूल से लथपथ हो गई थी, फिर भी हमारे पिता भगवान् श्रीकृष्ण ने तुम्हें अपने अंक में उठा लिया। मैं ऐसा मन्दभाग्य हूँ कि पिता से ऐसा प्रेम कभी नहीं पा सका।" यह प्रेम में निर्वेद का लक्षण है। श्रीकृष्ण को अपना पूज्य मानना गौरवभाव है और जब इसके अतिरिक्त भक्त श्रीकृष्ण को अपना रक्षक मानता है तो श्रीकृष्ण के लिये उसका दिव्य प्रेम अधिक बढ़ जाता है। इस प्रकार के सम्मिलित भावों को गौरवप्रीति कहते हैं। यही स्थायी गौरवप्रीति आगे बढ़ने पर गौरव भक्तिमय प्रेम कहलाता है। इस अवस्था के दो प्रमुख लक्षण राग और स्नेह हैं। इस गौरव के भक्तिभाव में प्रद्युम्न ने अपने पिता से कभी उच्च स्वर में बात नहीं की। वास्तव में उसने अपनी होठों की मुद्रा को कभी तनिक भी नहीं खोला और न कभी प्रेमआँसुओं से पूर्ण अपने मुख को ऊपर
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२७६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
उठाया। वह निरन्तर अपने पिता के चरणकमलों की ओर ही देखा करता था। श्रीकृष्ण का स्थायी प्रेम तब भी प्रकट हुआ है जब अर्जुन ने उन्हें अपने पुत्र अभिमन्यु की मृत्यु का समाचार सुनाया। वह कुरुक्षेत्र के युद्ध में दुर्योधन के सारे सेनापतियों, अर्थात् वर्ण, अश्वत्थामा, जयद्रथ, भीष्म, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य के समवेत बल के आगे परास्त होकर मारा गया। यह आश्वासन देने के लिये कि इस पर भी उनके प्रति सुभद्रा के प्रेम में कोई अन्तर नहीं आया है, अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा, "यद्यपि अभिमन्यु प्रायः आपकी उपस्थिति में मारा गया; फिर भी आपके लिये सुभद्रा के प्रेम में कोई अन्तर नहीं आया है और न ही उसमें मलिनता का लेश उठा है।" श्रीकृष्ण अपने भक्तों के लिये जो स्नेह रखते हैं उसकी अभिव्यक्ति उन्होंने स्वयं प्रद्युम्न से इन शब्दों में की है—वे बोले, "हे पुत्र ! इस लज्जा के भाव को छोड़कर मुख मत लटकाओ। आँसू न बहाओ, मुझसे स्पष्ट वाणी में बोलो, सीधे मेरी ओर देखते हुए अपने हाथ को निःसंकोच मेरे शरीर पर रखो। अपने पिता के आगे गौरवबुद्धि प्रकट करना कहाँ तक उचित है।" श्रीकृष्ण के लिये प्रद्युम्न की आसक्ति सदा उसके कार्यकलाप में अभिव्यक्त होती है। जब भी पिता उसे कुछ करने का आदेश देते वह अविलम्ब उनका आज्ञापालन करता और विष जैसे कठिन कार्य को भी अमृतमय समझता। इसी प्रकार जब वह किसी कार्य में पिता की असम्मति देखता तो उसे तुरन्त त्याग देता, चाहे वह अमृत के समान ही क्यों न हो। श्रीकृष्ण के लिये प्रद्युम्न की उत्कंठित आसक्ति अपनी पत्नी रति से कहे उसके इन शब्दों में प्रकट होती है—"शम्बर दैत्य पहले ही मारा जा चुका है। अब मैं पाञ्चजन्य नामक शंख को धारण किये हुए अपने गुरु अर्थात् पिता को कब देख सकूँगा ?" जब श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र के युद्ध के कारण द्वारका से अनुपस्थित थे तो प्रद्युम्न को उनका तीव्र विरह पीड़ित कर चला। वह बोला, "पिताजी के हस्तिनापुर को चले जाने से अब मेरा मन अपनी प्रिय कन्दुकक्रीड़ा को नहीं चाहता और न सुन्दर शास्त्राभ्यास में ही लगता है। इन सबका क्या कहना—अब तो द्वारका तक भी मुझे कारागार के समान प्रतीत होती है।" शम्बरासुर का वध करके घर लौटकर जब प्रद्युम्न ने अपने सामने पिता श्रीकृष्ण को देखा तो वह तुरन्त ऐसा आनन्द विह्वल हुआ कि स्वयं अपने को ही न समझ सका। यह वियोग में सिद्धि का उदाहरण है। इसी
श्रीकृष्ण के मित्र तथा अन्य लाल्याभिमानियों की गौरवप्रीति [ २७७ प्रकार की तुष्टि तब देखी गई, जब श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि से अपने घर द्वारका को लौटे। आनन्द की अतिशयतावश उनके भावोन्मत्त पुत्र बारम्बार हड़बड़ा गये। इस प्रकार का हड़बड़ाना पूर्णतुष्टि का लक्षण है। प्रद्युम्न प्रतिदिन अश्रुपूरित नेत्रों से श्रीकृष्ण के चरणकमलों का दर्शन किया करते थे। जिन लक्षणों को पूर्व में सम्भ्रमप्रीति के विषय में कहा गया है, उन्हीं को प्रद्युम्न की गौरवप्रीति के सम्बन्ध में भी समझ लेना चाहिये।
अध्याय ४१ सख्यभक्तिरस जब कोई भक्त स्थायी रूप से भक्तियोग में स्थिर रहता है और नाना प्रकार के भाव-लक्षणों के द्वारा श्रीकृष्ण के सम्बन्ध में एक सख्यरस अथवा स्वाद को विकसित और परिपक्व कर लेता है तो उसकी भाववृत्ति को सख्यरस कहते हैं। भगवान् के लिये इस प्रकार के सख्यरस के उद्दीपन स्वयं भगवान् हैं। जब कोई जीवन्मुक्त हो जाता है और भगवान् से अपने शाश्वत् सम्बन्ध को जान जाता है तो भगवान् स्वयं उसके सख्य प्रेम को बढ़ाने में उद्दीपन का काम करते हैं। भगवान् के वृन्दावनीय शाश्वत् पार्षदों ने यह इस प्रकार वर्णन किया है, "जिनके श्रीविग्रह का वर्ण इन्द्रनील मणि जैसा है, जिनकी मुस्कान कुन्द के फूल के समान मधुर है; जो शरदकालीन स्वर्ण दुर्वा के समान पीतवर्ण का वस्त्र धारण किये हुए हैं; जिनका वक्षःस्थल वैजयन्तीमाला से सुशोभित है और जो निरन्तर अपनी वेणु के वादन में निरत हैं—ऐसे ये अघासुर के शत्रु श्रीहरि वृन्दावन में भ्रमण करते हुए निरन्तर हमारे हृदयों का आकर्षण कर रहे हैं।" वृन्दावन के बाहर भी सख्यरस के ऐसे ही भाव व्यक्त हुए हैं। जब युधिष्ठिर आदि पाण्डवों ने कुरुक्षेत्र के युद्ध से श्रीकृष्ण को शंख, चक्र, गदा, पद्मधारी चतुर्भुज रूप में देखा तो वे अपने को बिल्कुल भूल गये और आनन्द अमृत के सिन्धु में निमग्न हो गये। इससे प्रकट होता है कि किस प्रकार पाण्डुपुत्र—युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव, सबके सब श्रीकृष्ण के लिये सख्यप्रेम के वशीभूत थे। कभी-कभी नाना नाम, रूप, परिकर, उपकरण तथा दिव्य गुण आदि सख्यरस को उद्भूत करते हैं। उदाहरण के लिये, श्रीकृष्ण का सुन्दर परिधान, उनका सुगठित शरीर, उनके शरीर पर विद्यमान सर्वमंगलमय चिह्न, नाना भाषाओं का ज्ञान, गीता के रूप में पाण्डित्यमय शिक्षा, सब प्रकार की चेष्टाओं में उनकी अद्वितीयता, विदग्धज्ञान, दया, वीरता,