भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
हरीतक्यादिवर्गः २९७ (७) सिरके में इसे घिसकर मसूढ़ों पर रगड़ने से दंतशूल दूर होता है तथा मसूढ़े मजबूत होते हैं। (८) इससे सिद्ध तैल का प्रयोग कर्णशूल में कर्णबिन्दू के रूप में किया जाता है। (९) हैजे में हाथ पर ठंडे हो जाने पर इसके चूर्ण को सोंठ के साथ मिलाकर हाथ पैरों पर मलते हैं। (१०) इसके फलों को उबालने से एक मोम के सदृश पदार्थ निकलता है जिसका व्रण पूरण के लिये प्रयोग करते हैं। मात्रा-चूर्ण १०-३० र० आर्द्रक रस एवं मधु के साथ। बच्चों को १-२ रत्ती। अथ भार्गी (भारङ्गी) तस्या नामानि गुणाँश्चाह भार्गी भृगुभवा पद्मा फञ्जी ब्राह्मणयष्टिका। ब्राह्मण्याङ्गारवल्ली च खरशाकश्च हञ्जिका ।।१८२।। भार्गी रूक्षा कटुस्तिक्ता रुच्योष्णा पाचनी लघुः । दीपनी तुवरा गुल्मरक्तनुन्नाशयेद् ध्रुवम् ।। शोथकासकफश्वासपीनसज्वरमारुतान् ।।१८३।। भारङ्गी (बभनेटी) के नाम तथा गुण-भार्गी, भृगुभवा, पद्मा, फञ्जी, ब्राह्मणयष्टिका, ब्राह्मणी, अङ्गारवल्ल, खरशाक और हञ्जिका ये सब नाम भारङ्गी के हैं। भारङ्गी-रूक्ष, कटु, कषाय तथा तिक्तरसयुक्त रुचिजन्क, उष्णवीर्य, पाचक, लघु तथा अग्निदीपक होती है। एवं गुल्म, रक्तदोष, शोथ, कास, कफ, श्वास, पीनस, ज्वर और वायु को नष्ट करती है। [१८२-१८३] ६१. भार्गी (भारङ्गी) भारङ्गी के विषय में विद्वानों में कुछ मतभेद है तथा इस नाम से ४ वनस्पतियों की छाल ली जाती है। बङ्गाल में क्वाशिया नामक डाक्टरी ओषधि का प्रतिनिधि 'ख' का व्यवहार भारङ्गी नाम से होता है। श्रीमान् ठा० बलवन्तसिंहजी अपनी 'वनौषधि दर्शिका' नामक पुस्तक में लिखते हैं कि भारङ्गी नाम से बाजार में बिकने वाली छाल क्लेरोडेंड्रान (Clerodenron) की नहीं मालूम होती जिसे अधिकांश लोगों ने भारङ्गी माना है तथा यह संभवतः 'ख' की ही छाल हो। डॉ० देसाई 'क' को ही शास्त्रीय भारङ्गी मानते हैं तथा अन्य अधिकांश विद्वानों ने भी इसे ही भारङ्गी माना है। अन्य दो 'ग' वनस्पतियों का भी कहीं-कहीं व्यवहार होता है। इन चारों वनस्पतियों का अलग-अलग वर्णन नीचे दिया जा रहा है। प्राचीन समय में इसका आन्तरिक प्रयोग श्वास, कास आदि में किया गया है तथा सुश्रुत (उ० अ० ६१) में अपस्मार के लिये एक विशेष प्रकार से निर्मित सुरा का प्रयोग बतलाया गया है। इसका बाह्य प्रयोग गण्डमाला, कुरंड (वृद्धि) तथा शस्त्रक्षत में किया गया है। (क) Clerodendron serratum, Spreng. (क्लेरोडेण्ड्रोन् सेरैटम्, स्प्रेँग)। Fam. Verbenaceae (हर्बिनेंसी)। हिं०-भारङ्गी, भारिङ्गी, ब्रह्मयष्टि, बभनेटी। बं०-वामन हाटी, भुइजाम, म०-भारङ्ग। गु०-भारङ्गी। क०-गंटुभारङ्गी। ते०-नालनिरैडु। ने०-चूया। पं०-भाड़ङ्गी। मा०-भाराङ्गमूल। ता०-चेरूटेकू। जौनसार०- वनबाकरी। फा०-हञ्जिका। यह हिमालय में सतलज से खासिया पहाड़ और आसाम तक तथा ब्रह्मा, नीलगिरी, पश्चिमघाट थाना, रत्नांगिरी और सिलोन में पाई जाती है। इसके पौधे ३ से ५ हजार फीट की ऊँचाई तक प्रायः पर्वतों के घासवाले ढालों पर होते हैं। भारङ्गी क्षुप जाति की वनौषधि ४-८ फीट तक ऊँची होती है। शाखाएँ-इसके काष्ठमय मूलस्तम्भ से प्रतिवर्ष शाखाएँ निकलती हैं। प्रत्येक गाँठ पर तीन-तीन पत्ते रहते हैं जो ४ से ८ इञ्च लम्बे, १ १/२-२ १/२ इञ्च चौड़े, आयताकार,
२९८ भावप्रकाशनिघण्टुः अंडाकार-आयताकार या भालाकार, तीक्ष्ण दन्तुर तथा शिराओं के ५ जोड़ों से युक्त होते हैं। फूल-सफेद या कुछ नीले रङ्ग के आते हैं। फल-चौथाई इञ्च लम्बे, गोल, काले, पकने पर जामुनी रङ्ग के हो जाते हैं। इस क्षुप की छाल या जड़ का व्यवहार किया जाता है। अधिकांश विद्वान् इसको ही शास्त्रीय भारङ्गी मानते हैं लेकिन श्रीमान् ठा० बलवन्तसिंहजी लिखते हैं कि इस नाम से जो छाल बाजारों में बिकती है वह इस वनस्पति की न होकर सम्भवतः निम्न वर्णित 'ख' की छाल हो क्योंकि बाजार की छाल मोटी होती है जो इस छोटे से क्षुप की नहीं हो सकती। रासायनिक संगठन-इसमें एक नारङ्गी रंग का रालीय पदार्थ, स्टार्च तथा अन्य तिक्त पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, कफघ्न, श्वासहर, वातघ्न, दीपन, पाचन तथा शोथघ्न है। इसका प्रयोग श्वास, कास, प्रतिश्याय, यक्ष्मज कास, फुफ्फुस विकार, वातकफज्वर तथा आमवात में किया जाता है। इसमें ज्वरघ्न तथा कफघ्न गुण अल्प मात्रा में होने के कारण ज्वर में इसके साथ अन्य ज्वरहर औषधियाँ देनी पड़ती हैं तथा कफज व्याधियों में काकड़ासिंगी या कायफल इसके साथ दिया जाता है। प्रतिश्याय एवं कफयुक्त श्वास आदि में इसके साथ सोंठ या घोड़वच देते हैं। इसके पत्तों का पोल्टिस बनाकर फोड़ों के ऊपर लगाते हैं। उपदंशजन्य सन्धिवात में इसका गोंद लाभदायक है। इसके पत्तों तथा कोमल डालियों का रस परिसर्प (हरपीज) एवं पेंफीगस् नामक विस्फोटों पर लगाया जाता है। रत्नागिरी में इसके पत्तों का शाक मलेरिया में खाते हैं। इसके बीजों का चूर्ण घी में भूनकर शोथ में रसायन के रूप में खाते हैं। मात्रा-चूर्ण १ १/२-३ माशा। (ख) Picrasma quassioides, Ben. (पिक्रैस्मा क्वॅसिओइडिस्, वेन)। Fam. Simarubaceae (सिमॅरूबॅसी)। हिं०-भारङ्गी, करूई-तिथाई। बं०-भुरूंगी। म०-कशाँशिंग। पं०-तिथु, बेरिङ्ग, पुथोरिन। ने०- शामवारिंगी। अं०-Quassia (क्वॅसिया)। यह हिमालय के बाहरी भाग में चेनाब से लेकर पूर्व की ओर ३०००-८००० फीट की ऊँचाई पर तथा चम्बा, कुलू, वशहर, उत्तरी गढ़वाल में ६०००-८००० फीट की ऊँचाई पर एवं नेपाल, भूटान तथा आसाम में खासी एवं नागा पहाड़ियों पर ३०००-८००० फीट की ऊँचाई पर पायी जाती है। इसकी बड़ी-बड़ी झाड़ी या छोटे वृक्ष होते हैं जिनमें थोड़ी परन्तु मजबूत शाखायें होती हैं जिनपर प्रायः सफेद दाग होते हैं। पत्र-अयुग्म पक्षाकार, ९-१५ इञ्च लम्बे, अरलु वृक्ष के पत्तों के समान तथा रक्तररोमश मालूम होते हैं। पत्रक- ९-१५, अभिलट्वाकार, आरावत् तथा उनका अग्र लम्बा होता है एवं सबसे नीचे के पत्रक बहुत छोटे तथा उपपत्रों के समान होते हैं। पुष्प-हलके हरे रङ्ग के, पार्श्विक तथा सवृन्त काण्डज पुष्पव्यूहों में। अष्ठिफल-बहुत छोटे, पकने पर काले रंग के तथा प्रत्येक फल में एक बीज होता है। इस क्षुप के टुकड़ों या छाल का व्यवहार बंगाल में भारंगा नाम से किया जाता है। यह पीताभ श्वेत या चमकीले पीले रंग के, हलके, लचीले लेकिन आसानी से टूटने वाले, गन्धहीन तथा स्वाद में अत्यन्त कड़वे होते हैं। यह डाक्टरी की क्वाशिया नामक वनस्पति का अच्छा प्रतिनिधि है। रासायनिक संगठन-इसमें पिक्रैस्मिन् (Picrasmin) से ठीक मिलता जुलता एक क्षाराभ ०.०५%, एक क्वासीन् (Quassin) नामक कड़वा पदार्थ तथा एक अन्य प्रभायुक्त एवं क्लोरोफार्म में घुलनशील कड़वा पदार्थ ०.१५% पाया जाता है।
हरीतक्यादिवर्गः २९९ गुण और प्रयोग-यह एक अत्यन्त कटु द्रव्य है। इसका प्रयोग आमाशय के दौर्बल्य से उत्पन्न अग्निमान्द्य में लाभदायक होता है लेकिन अधिक मात्रा में लेने से इससे प्रक्षोभ होकर वमन होता है। इसमें अन्य कड़वे द्रव्यों की तरह टॅनिन् न होने के कारण इसको लौह के साथ प्रयोग कर सकते हैं। इसको फांट या हिम के रूप में अधिकतर व्यवहार करते हैं। पंजाब में ज्वर एवं कृमियों के लिये इसकी छाल तथा पत्तों का व्यवहार किया जाता है। सूत्रकृमि (Thread- worm) के लिये इसके फांट (१ में १०) की बस्ति दी जाती है। इसके पत्तों को पीसकर खुजली आदि में लगाते हैं। इसके सत्वों का उपयोग बागवानी में जन्तुओं का नाश करने के लिये किया जाता है। मात्रा-चूर्ण १-४ रत्ती। हिम १/२ - १ औंस। (ग) Premna herbacea, Roxb. (प्रेम्ना हर्बेसियॉ रॉक्स्य) । Fam. Verbenaceae (हर्बिनेंसी) हिं०- भारंगी। बं०-भुइजाम। क०-नयित याग। ता०-शिरूकेट। ने०-चूअ। कों०-निर्वश। लेप०-ई। इसकी छोटी झाड़ी हिमालय तथा दक्षिण में कोंकण के पहाड़ी भागों में बरसात के दिनों में होती है। इसका वायवीय भाग मुलायम एवं शात्रकीय होने से यह ऊँचा नहीं होता तथा पत्तियाँ जमीन पर फैली रहती हैं। पत्ते-४ इंच तक लंबे, २ से ३ इञ्च चौड़े, विनाल, अभिलट्वाकार, शिराओं पर मृदुरोमश एवं शिराएँ ५ युग्म होती हैं। पुष्प-छोटे, श्वेत एवं १ १/२ इञ्च व्यास के समस्थ काण्डज गुच्छ में आते हैं। फल-१/२ इञ्च एवं गोल होता है। मूल-जमीन के नीचे, लंबे परंतु थोड़ी-थोड़ी दूर पर गाँठदार होते हैं। ये गन्धहीन एवं स्वाद में कड़वे होते हैं तथा इनका चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके मूलत्वक् में एक नारङ्गी बादामी रङ्ग की अम्ल राल तथा अत्यल्प मात्रा में एक क्षाराभ तथा कुछ स्टार्च रहता है। इसमें टैनिन् नहीं होता। गुण और प्रयोग-भारङ्गी नाम से यद्यपि कोंकण की तरफ इसका व्यवहार होता है तब भी इसमें भारङ्गी के गुण नहीं हैं। डॉ. देसाई लिखते हैं कि इसका उपयोग करके देखा गया लेकिन इसमें भारङ्गी के गुण नहीं मालूम पड़े। प्रतिश्याय आदि में इसका उपयोग करते हैं। तमकश्वास में इसका कल्क सोंठ तथा उष्ण जल के साथ या भारङ्गी मूल को आर्द्रक स्वरस या उष्ण जल के साथ देते हैं। शिरःशूल में इसकी जड़ उष्ण जल में घिसकर सर में लगाई जाती है। कानों में व्रण होने पर इसको मधु में घिसकर कान में डालते हैं। गठिया में इसका उपयोग करते हैं। इसे बिहार में गठिया, गेंटिया कहते भी हैं। इसके बीजों को मट्ठे में उबाल कर उदर रोग में शौच साफ होने के लिये प्रयुक्त करते हैं। (घ) Clerodendrum siphonanthus. (R.Br.) C.B Clarke (क्लेरोडेन्ड्रम् सिफोनेन्थस्) । Fam. Verbeneae (हृबिनेंसी) । हिं०-चिनगारी, भारंगी। सं०-ब्रह्मयष्टिका। बं०-बामनहाटी। प०-अरनि। इसके क्षुप हिमालय में तथा दक्षिण के पर्वतीय भागों में मिलते हैं। यह ४-६ फीट ऊँचा होता है। कांड-१ इञ्च तक मोटा, नालीदार तथा भीतर से पोला होता है। पत्ते-प्रति चक्र में ३-५ की संख्या में तथा ६ से ९ इञ्च लम्बे, १ से १ ॥ इञ्च चौड़े, पतले भालाकार, विनाल तथा कड़े होते हैं। पुष्प-९-१८ इञ्च लम्बी डंडी पर सफेद रंग के कुछ रक्तिमा लिये हुये होते हैं। पुष्पकोश की नली ३-४ इञ्च लम्बी होती है। फल-गोलाकार, १/२ इञ्च लम्बे एवं जामुनी रंग के होते हैं तथा बाह्यपुट गहरे लाल रंग का एवं बढ़ा हुवा होता है। बीज-१ से ४ तक जुड़े हुए होते हैं। मूलका स्वाद-कड़वा तथा कषाय होता है तथा औषधि कार्य में इसी का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसका मुख्य सत्व एक क्षाराभ होता है। गुण और प्रयोग-इसके पोले कांड के टुकड़े बंगाल में तागे में पिरोकर कई रोगों से बचने के लिये पहने जाते हैं। इसका मूल खाँसी तथा तमक श्वास में दिया जाता है। राजयक्ष्मा में इसके मूल का कल्क तथा सोंठ को उष्ण जल
३०० भावप्रकाशनिघण्टुः के साथ खिलाते हैं इसके पत्तों का रस घी के साथ मिला कर परिसर्प में लगाया जाता है। मांसक्षय वाले बच्चों को इससे सिद्ध तैल की मालिश की जाती है। अथ पाषाणभेदः, तस्य नामानि गुणाँश्चाह पाषाणभेदकोऽश्मघ्नो गिरिभिद्भिद्र्नयोजिनी । अश्मभेदो हिमस्तिक्तः कषायो बस्तिशोधनः ॥१८४॥ भेदनो हन्ति दोषार्शोगुल्मकृच्छ्राश्महृद्रुजः । योनिरोगान्प्रमेहांश्च प्लीहशूलव्रणानि च ॥१८५॥ ६२. पाषाणभेद पाषाणभेद एक संदिग्ध वस्तु है। इसके स्थान पर अनेक वनस्पतियाँ ली जाती हैं तथा विभिन्न विद्वान् भिन्न-भिन्न वनस्पतियों को पाषाणभेद मानते हैं। राजनिघण्टु में पाषाणभेदक, वटपत्री, शिलावल्का तथा चतुष्पत्री ये पाषाणभेद के चार भेद वर्णित हैं। निम्नलिखित वनस्पतियों को भिन्न-भिन्न आधुनिक विद्वान् पाषाणभेद मानते हैं— १. Saxifraga ligulata, Wall. (सॅक्सिफ्रेगा लिग्युलेटा, वॉल)। Fam. Saxifragaceae (सॅक्सिफ्रॅगासी)। २. Aerva lanata, Juss (एरूवा लॅनेटा, जस०)। Fam. Amaranthaceae (अॅमरेन्थेसी)। ३. Kalanchoe pinnata Pers. (कॅलॅञ्च पिन्नॅटा पर्स०)। Fam. Crassulaceae (क्रॅस्सुलसी)। ४. Coleus aromaticus, Benth. (कोलिअस् ॲरोमेटिकस्, बेन्थ०)। Fam. Labiatae (लेबियेटी)। ५. Homonoia riparia, Lour. (होमोनोइया राइपेरिया, लोर)। Fam. Euphorbiaceae (यूफोर्बियेसी)। ६. Rotula aquatica Lour. (रोटूला ॲक्वॅटिका लोर०)। Fam. Boraginaceae (बोरॅजिनॅसी)। ७. Ocimum basilicum Linn. (ओसिमम् बॅसिलिकम् लिन०)। Fam. Labiatae (लेबिएटी)। इन वनस्पतियों के अतिरिक्त कुछ लोगों ने एक खनिज पाषाणभेद भी लिखा है लेकिन उसका विशेष वर्णन नहीं मिलता है। उपर्युक्त वनस्पतियों में से अधिकांश मूत्रल अवश्य हैं लेकिन प्रथम वनस्पति सॅक्सिफ्रेगा लिग्युलेटा का ही ग्रहण पाषाणभेद नाम से उचित है। उपर्युक्त वनस्पतियों का अलग-अलग वर्णन आगे दिया जा रहा है। ओसिसम् बॅसिलिकम् का वर्णन आगे तुलसी के साथ दिया जावेगा। (१) Saxifraga ligulata, Wall. (सॅक्सिफ्रेगा लिग्युलेटा, वाल.)। Fam. Saxifragaceae (सॅक्सिफ्रॅगासी)। सं०—पाषाणभेद, वटपत्रीभेद। हिं०—पखानभेद, सिलफडा, पोपल, वनपत्रक, दकचु। म०—पाषाणभेद। पं०— शफ्रोकी। ने०—सोहंपे सोआ। का०—बथेव। रावी—सप्रोत्री। खासिया—अतिअ। चिनाव—बलपिआ। कुमाऊँ— शिलफोडा। इसके पौधे काश्मीर, नेपाल तथा हिमालय के मध्य भाग में प्रायः ५००० फीट के ऊपर पर्वतों की ढालों पर पत्थरों की दरारों में बहुतायत से निकलते रहते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
हरीतक्यादिवर्गः ३०१ यह क्षुप जाति की वनस्पति बारहों मास पायी जाती है। मूलस्तम्भ-रक्ताभ (भीतर सफेद) और लगभग एक इञ्च मोटा होता है। इससे पतले उपमूल निकलकर पत्थरों के बीच में फैले रहते हैं। पत्र-मांसल, चिकने, कुछ-कुछ गोलाई लिये, प्रायः ३-५ इञ्च व्यास में, किनारे पर सूक्ष्म सघन शूकों से युक्त (Ciliate = सीलियेत) तथा निचले पृष्ठ पर प्रायः गुलाबी रंग के होते हैं। एक स्थान में प्रायः ३ या ४ पत्तियों से अधिक नहीं निकलतीं। फूल-छोटे, सफेद, गुलाबी या जामुनी रंग के आते हैं। फल-नीलाभ श्वेत तथा छोटे होते हैं। इनके मोटे मूल के टुकड़े बाजार में बिकते हैं। ये टुकड़े करीब १-२ इञ्च लम्बे, १/२-१ इञ्च मोटे, कपिशवर्ण के, कड़े एवं इनकी छाल खुरदरी तथा झुर्रीदार होती है। इन पर टूटे हुये उपमूलों के निशान एवं गोल गढ़े रहते हैं। इनका आन्तरिक भाग सफेद होता है। इनका स्वाद कुछ सुगन्धित एवं कसैला होता है। कुछ लोग इसे वटपत्री मानते हैं। रासायनिक संगठन-इसके मूल में चूना ११ १/२%, टॉनिक् तथा गॉलिकु ॲसिड १५ १/२%, शर्करा ५ १/२%, गोंद २ ३/४%, स्टार्च १९%, खनिजक्षार ३ ३/४% तथा कॅल्शियम ऑक्झॅलेट् (Calcium oxalate ११ ३/४% होता है। गुण और प्रयोग-इसका मूल स्नेहन, मूत्रजनन, अश्मरीघ्न, ग्राही एवं श्लेष्मघ्न है। इससे मूत्र की वृद्धि होकर उसकी अस्वच्छता दूर होती है तथा अश्मरी भी घुलकर निकल जाती है। इसका उपयोग मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात, अश्मरी, बस्तिरोग, आमातिसार एवं कास आदि फुप्फुस विकारों में किया जाता है। (१) वृक्कशूल एवं अश्मरी आदि में इससे बहुत लाभ होता है। (२) बच्चों में इसको दूध में घिसकर देने से पेशाब की अस्वच्छता दूर होती है। दन्तोद्भेद के समय जब मुख में व्रण होते हैं तब इसको मधु के साथ घिसकर लगाते हैं। (३) फोड़ों एवं नेत्राभिष्यन्द में इसका लेप किया जाता है। (४) ग्राही होने के कारण आमातिसार में इससे लाभ होता है। आंत्र के लिए बल्य होने के कारण ज्वर में अतिसार होने पर इसका उपयोग किया जाता है। आन्त्रशिथिलता के कारण उत्पन्न अतिसार में भी प्रयोग किया जा सकता है। मात्रा- चूर्ण ५-१० रत्ती। (२) Aerva lanata, Juss. (एरुवा लॅनेटा, जस०)। Fam. Amaranthaceae (ॲमॅरेन्थेसी)। सं०-आदानपाकी, शतकाभेदी ? हिं०-गोरखगांजा, गोरखबूटी, कपूरीजड़ी। बं०-चय। गु०-गोरख गांजो, कपुरी मधुरी। म०-कपुरफुटी, कुम्रपिंडी। पं०-भु(बु) इकल्लान। सिं०-बुइ। ता०-चिरूबूलै। ते०-पेंडिडोंड। क०-विलेसुलि। मला०-चिरापूल। इसके छोटे बहुवर्षायु क्षुप सभी स्थानों में मैदानों में पाये जाते हैं। कांड-अनेक, लचीले लेकिन स्वावलम्बी तथा श्वेत रोमों से युक्त। पत्र-एकांतारित, प्रधान काण्ड पर एक इञ्च तक लम्बे, आधा इञ्च तक चौड़े तथा अन्य शाखाओं पर छोटे, दीर्घ वृत्ताकार या अर्ध अंडाकार या कुछ गोलाई लिए हुये एवं अधोतल पर श्वेतरोमयुक्त होते हैं। पुष्प- छोटे, हरिताभ श्वेत, गुच्छों में आते हैं। फल-चर्मल फल होता है जिसमें चमकीला काला बीज होता है। मूल- अनन्तमूल के समान और कर्पूर सदृश गन्धयुक्त। इसके पुष्पों को उत्तर हिन्दुस्तान में भु(बु) इकल्लान एवं गुजरात में बूर कहते हैं।
३०२ भावप्रकाशनिघण्टुः गुण और प्रयोग- यह स्नेहन, मूत्रजनन, वेदनाहर, अश्मरीघ्न, कृमिघ्न एवं कासहर है। इसकी क्रिया अपामार्ग की तरह होती है। बस्तिस्थ अश्मरी में इसके पुष्पों का फांट देने से बहुत लाभ होता है। मूत्रकृच्छ्र में इसके मूल का क्वाथ देने से मूत्र की राशि बढ़कर लाभ होता है। तमकश्वास में इसकी सूखी पत्तियों तथा पुष्पों का धूम्रपान किया जाता है। (३) Kalanchoe piunata pers. (कॅलॅञ्चो पिन्नॅटा पर्स०)। Fam. Crassulaceae (क्रासुलेसी)। सं०-पर्णबीज। हिं०-जखमेहयात, अहिरावण, महिरावण, पथरचूर। बं०-कोप्पाता। म०-घायमारी। क०-काडुसले। इसके मांसल, बहुवर्षायु क्षुप भारतवर्ष के सभी भागों में उत्पन्न होते हैं लेकिन दक्षिणी बंगाल में अधिक पाये जाते हैं। कांड-स्वावलम्बी, मोटा, पोला, लाल तथा ४ फीट तक ऊँचा। पत्र-नीचे के प्रायःसाधारण किन्तु ऊपर के संयुक्त, ३-५ या कभी ७ पत्रकों से युक्त। पत्रक-गोलदन्तुर, विपरीत क्रम में, मांसल एवं लट्वाकार। पुष्प-बड़े, नलिकाकार, २ इञ्च लम्बे, रक्ताभ हरित तथा नीचे की ओर झुके हुये। इसके पत्तों के मूल से अंकुर प्ररोह निकलकर नया पौधा उत्पन्न हो जाता है। इसके पत्तों एवं स्वरस का औषध में उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके स्वरस में कॅल्शियम् सल्फेट् (Calcium Sulphate) तथा ॲसिड टारट्रेट् ऑफ पोटॅशियम् (Acid Tartrate of Potassium) एवं बचे हुए कल्क में कॅल्शियम् ऑक्सॅलेट् (Calcium oxalate) होता है। गुण और प्रयोग-इसके पत्ते व्रणशोधक, व्रणरोपक, रक्तस्तम्भक, ग्राही तथा प्रतिदूषक हैं। इसका उपयोग रक्तस्राव, चोट, अतिसार, अश्मरी एवं विसूचिका आदि में किया जाता है। यह रक्तवाहिनी केशिकाओं का संकोच करके रक्तस्राव रोकता है इसलिये आन्तरिक एवं बाह्य दोनों प्रकार के रक्तस्राव में लाभदायक है। (१) रक्तयुक्त अतिसार में इसके पत्तों का रस १/४ से १/२ तोला, जीरा तथा दुगने घी के साथ देने से खून गिरना बन्द होता है। (२) चोट, मोच, सभी प्रकार के व्रण, फोड़े एवं कीटदंश आदि पर इसके पत्तों को जरा गरम करके कूचकर बाँधने से सूजन, रक्तिमा एवं वेदना कम होकर लाभ होता है। घावों के लिये यह बहुत ही अच्छी ओषधि है। नये व्रण का इतने जल्दी व्रण पूरण होता है कि बाद में निशान तक नहीं रहता। मात्रा-१/४-१/२ तोला। (४) Coleus aromaticus, Benth. (कोलिअस् ॲरोमेटिकस्, बेन्थ.) Fam. Labiatae (लॅवियेटी)। सं०-पाषाणभेदी। हिं०-पाथरचुर, पत्थरचूर, पाषाणभेद। बं०-पाथर कुची, अम्ल कुची, पातेरचूर। म०- पानांचा ओवा। गो०-ओवापान। ता०-कर्पूरवल्ली। अं०-Country borage (कण्ट्री बोरेज)। इसका बहुवर्षायु क्षुप भारतवर्ष के सभी प्रान्तों में तथा लङ्का में बगीचों आदि में रोपण किया जाता है। राजपुताना में वन्य अवस्था में भी मिलता है। इसका क्षुप-१-३ फीट ऊँचा; कांड-सरस; पत्र-मोटे, सरस, गूदेदार, दन्तुर, रोमश, १-३ इञ्च के घेरे में, गोलाकार, सुगन्धयुक्त एवं स्वाद में कटु। पुष्प-पुराने क्षुपों में १/८ इञ्च लम्बे, हलके बैंगनी तथा गुच्छों में आते हैं। मद्य को सुगन्धित करने के लिये इसका उपयोग करते हैं। औषध में इसके पञ्चाङ्ग का व्यवहार किया जाता है। मवेशियों के रोगों में भी इसे व्यवहार में लाते हैं। बंगाल की तरफ पाषाण भेद नाम से इसका उपयोग किया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
रासायनिक संगठन-इसमें एक कारह्वक्राल (Carvacrol) नामक उड़नशील तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग- यह दीपन, पाचन, वातनुलोमक, उद्वेष्ठननिरोधि एवं अश्म-रीघ्न है। इसका उपयोग अपचन, आध्मान, उदरशूल, दमा, जीर्णकास, अपस्मार एवं मूत्रसंस्थान के रोगों में किया जाता है। (१) अपचन, उदरशूल एवं आध्मान आदि में एक दो पत्तियों के ही उपयोग से शीघ्र लाभ होता है। बच्चों के उदरशूल में यह विशेष लाभदायक है। (२) दमा, जीर्णकास एवं अपस्मार आदि में इसका क्वाथ दिया जाता है। (३) नेत्राभिष्यन्द में इसका स्वरस पलकों पर लगाने से वेदना कम होती है। (४) शिरःशूल तथा गोजर के काटने पर इसको पीसकर लगाने से वेदना दूर होती है। मात्रा-स्वरस ५-६ बूँद शर्करा के साथ। (५) Homonoia riparia, Lour. (होमोनोइया राइपेरिया, लोर.)। Fam. Euphorbiaceae (यूफोर्बियेसी)। सं०-पाषाणभेदक। हिं०-छोटा पाषाणभेद। ता०-चेप्पुंजेरिज्झल। ने०-खोलासइस। बर्मा-मोमाका। इसकी हमेशा हरी रहने वाली झाड़ी आसाम, उत्तरी बंगाल, पश्चिम प्रायद्वीप, वर्मा तथा मध्य प्रदेश में उत्पन्न होती है। इसके पत्र-३ से ६ इञ्च लम्बे तथा १/२-३/४ इञ्च तक चौड़े होते हैं। पुष्प-मंजरी में छोटे-छोटे आते हैं। इसकी जड़ का उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग-यह मूत्रल तथा मृदुविरेचक होता है। इसका क्वाथ अर्श, मूत्राशय की अश्मरी, सोजाक एवं फिरंग में प्रयुक्त होता है। (६) Rotula aquatica Lour. (रोट्रला अॅक्वॅटिका लोर.)। Fam. Bora-ginaceae (बोर्रोजिनेंसी)। सं०-पाषाणभेद। ता०-चेप्पुनेरिज्झल। यह सभी स्थानों पर विशेषकर नदी के कछार में होता है। इसकी छोटी झाड़ी होती है। पत्ते-½-१ इंच लम्बे, विनाल, स्रुवाकार तथा न्यूनाधिक रोमश होते हैं। पुष्प-छोटे तथा गुलाबी रंग के आते हैं। गुण और प्रयोग-इसका मूल पाषाणभेदक के समान अर्श, मूत्राशय की अश्मरी एवं फिरंगादि रतिजन्य रोगों में व्यवहृत होता है।
अथ धातकी (धाई) तस्या नामानि गुणाँश्चाह
धातकी धातुपुष्पी च ताम्रपुष्पी च कुञ्जरा¹। सुभिक्षा बहुपुष्पी च वह्निज्वाला च सा स्मृता ।। १८४ ।। धातकी कटुका शीता मृदुकृत्तुवरा लघुः । तृष्णाऽतीसारपित्तास्रविषकृमिविसर्पजित् ।। १८६ ।। धायके नाम तथा गुण-धातकी, धातुपुष्पी, ताम्रपुष्पी, कुञ्जरा, सुभिक्षा, बहुपुष्पी और वह्निज्वाला ये सब धाय के नाम हैं। धाय-कटु तथा कषायरसयुक्त, शीतवीर्य, मृदुकारक (पाठान्तर मदकारक) और लघु है और यह प्यास, अतिसार, रक्तपित्त, विष, कृमि और विसर्प को दूर करती है। [१८४-१८६]
६३. धातकी
हिं०-धातकी, धवई, धाई, धाओला, धावा, धाय (धाय के फूल)। बं०-धाइफुल। म०-धायटी, धावस। गु०-धावणी, धावडी ना फूल। क०-धातकि। ते०-सेरिंजी, एर्रापुर्वु। उ०-जातिको। पं०-धा। अवध-धेती। १. 'मदकृदिति पाठा.।
३०४ भावप्रकाशनिघण्टुः ने०-दहिरी। ले०-Woodfordia floribunda, Salisb. (बुडफोर्डिआ फ्लोरीबंडा, सॅलिस्ब); Syn. Woodfordia fruticosa Kurz. (वुडफोर्डिआ फ्रूटिकोसा, कुर्ज.) । Fam. Lythraceae (लिथ्रेसी) । धातकी के क्षुप प्रायः सब प्रान्तों में कहीं-न-कहीं देखने में आते हैं। ये पहाड़ों में ५ हजार फीट की ऊँचाई तक एवं देहरादून के जंगलों में बहुतायत से पाये जाते हैं तथा वाटिकाओं में भी रोपण किये जाते हैं। इसका क्षुप-बड़ा तथा १०-१२ फीट तक ऊँचा होता है। शाखाएँ-लम्बी, फैली हुई और सघन रहती हैं। नवीन शाखाओं तथा पत्तियों पर काले-काले बिन्दु होते हैं। पत्ते-समवर्ती या कुछ विषमवर्ती और कहीं-कहीं तीन-तीन पत्ते एक साथ गुच्छों में दिखाई पड़ते हैं। वे २-४ इञ्च लम्बे, ३/४-११/४ इञ्च चौड़े, मालाकार या लट्वाकार-भालाकार, नोकदार तथा सरलधार होते हैं। पुष्प-१/२ से ३/४ इञ्च, चमकीले लालरंग के नलिकाकार फूल आते हैं। यह शाखाओं के संपूर्ण काण्ड से छोटे-छोटे गुच्छों में निकले रहते हैं। बीजकोष-छोटा और बीज-चिकने भूरे रंग के होते हैं। औषधि के लिये इसके फूलों का व्यवहार किया जाता है तथा इससे रेशम रँगने के लिये एक लाल रंग निकाला जाता है। रासायनिक संगठन-इसके फूलों में २०१/२% टॅनिन् होता है तथा इसके क्षुप से एक प्रकार का गोंद भी निकलता है जो रँगने के काम आता है। गुण और प्रयोग-इसके फूल संग्राहक, उत्तेजक, विषहर, रक्तस्राव रोकने वाले एवं व्रणशोधक तथा व्रणरोपक होते हैं। इनका प्रयोग अतिसार, रक्तातिसार, ज्वरातिसार, प्रवाहिका, संग्रहणी, रक्तप्रदर, श्वेतप्रदर, अर्श, यकृत् विकार, सर्पविष तथा व्रण में किया जाता है। गर्भिणी में उत्तेजक औषध के रूप में बिना किसी हानि के इसका प्रयोग किया जा सकता है। अतिसार आदि में इसके साथ अन्य औषधियाँ भी दी जाती हैं। आसवों में सन्धान क्रिया ठीक होने एवं उसका रंग सुन्दर बनाने के लिये इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। (१) अतिसार एवं प्रवाहिका आदि में मट्ठे या मधु के साथ इसका पुष्पचूर्ण दिया जाता है या धाय के फूल, बेल की गुद्दी, लोध्र की छाल, सुगन्धवाला एवं गजपीपल सब समान लेकर, २ तोले का क्वाथ बनाकर प्रयोग करते हैं। बच्चों के अतिसार में भी इसका प्रयोग कर सकते हैं। (२) मधु के साथ इसका चूर्ण या अवलेह रक्तप्रदर, श्वेतप्रदर एवं अर्श आदि में लाभदायक है। श्वेतप्रदर में १ तोला पुष्प चावल के धोवन के साथ दिया जाता है। (३) कोंकण की तरफ 'मण्यारी' नामक सर्पविष के लिये यह रामबाण औषध मानी जाती है। इसके लिये धाय के पत्तों का स्वरस पिलाते हैं, नाक में डालते हैं एवं शरीर पर उसे मलते हैं। (४) पैत्तिक शिरःशूल में इसके पत्तों का स्वरस सिर पर लगाया जाता है तथा उसके साथ-साथ मुख में तैल का कवलग्रह किया जाता है। (५) पानीदार विस्फोटों एवं दुर्गन्धयुक्त व्रणों में स्राव को कम करने के लिये तथा व्रण पूरण के लिये इसके पुष्पचूर्ण का उपयोग किया जाता है तथा इसके क्वाथ से व्रण प्रक्षालन भी करते हैं। (६) आसवारिष्टों में शीघ्र किण्वोत्पत्ति के लिए धाय के फूलों का व्यवहार किया जाता है। इससे सन्धान भली प्रकार हो जाता है। मात्रा-पुष्पचूर्ण १-२ माशा। अथ मञ्जिष्ठा (मंजीठ) तस्या नामानि गुणाँश्चाह मञ्जिष्ठा विकसा जिङ्गी समङ्गा कालमेषिका ।।१८६८।।
हरीतक्यादिवर्गः ३०५ मण्डूकपर्णी भण्डीरी भण्डी योजनवल्ल्यपि । रसायन्यरुणा काला रक्ताङ्गी रक्तयष्टिका ।।१८९।। भण्डीतकी च गण्डीरी मञ्जूषा वस्त्ररञ्जिनी । मञ्जिष्ठा मधुरा तिक्ता कषाया स्वरवर्णकृत् ।।१९०।। गुरुरुष्णा विषश्लेष्मशोथयोन्यक्षिकर्णरुक् । रक्तातीसारकुष्ठास्रवीसर्पव्रणमेहनुत् ।।१९१।। मंजीठ के नाम तथा गुण-मंजिष्ठा, विकसा, जिङ्गी, समङ्गा, कालमेषिका, मण्डूकपर्णी, भण्डीरी, भण्डी, योजनवल्ली, रसायनी, अरुणा, काला, रक्ताङ्गी, रक्तयष्टिका, भण्डीतकी, गण्डीरी, मञ्जूषा और वस्त्ररञ्जिनी ये सब मंजीठ के नाम हैं। मंजीठ-मधुर, तिक्त तथा कषाय रस युक्त, स्वर को उत्तम करने वाली तथा वर्ण को उज्ज्वल करने वाली, गुरु, तथा उष्णवीर्य होती है और विष, कफ, शोथ, योनि, नेत्र तथा कर्ण सम्बन्धी रोग, रक्तातिसार, कुष्ठ, रक्तदोष, विसर्प, व्रण और प्रमेह दूर करने वाली होती है। [१८८-१९१] ६४. मञ्जिष्ठा (मजीठ) हिं०-मजीठ, मंजीठ। बं०-मञ्जिष्ठा। म०-मञ्जिष्ठ। ते०-मञ्जिष्ठतीती, ताम्रवल्ली, मण्डास्टिक। ता०- मञ्जिट्टी, मन्दित्ता। गु०-मजीठ। पं०-मञ्जीठ। मल०-पून्त। फा०-रोदक। अ०-फुब्बतु, फुब्बाह, फौहुल अवागीन। अं०-Madder root (मँडर रूट); Indian madder (इण्डियन् मँडर)। ले०-Rubia cordifolia, Linn. (रूबिया कॉर्डिफोलिया, लिन०)। Fam. Rubiaceae (रूबिएसी)। मंजीठ इस देश की पहाड़ी भूमि में पश्चिमोत्तर हिमालय से पूर्व की ओर तथा दक्षिण की ओर नीलगिरी, सीलोन और मलाका एवं नेपाल में ८ हजार फीट तक उत्पन्न होती है। यह लता जाति की वनौषधि बहुत विस्तार में दूर-दूर तक फैल जाती है। इसकी लम्बी जड़ भूमि के भीतर दूर तक घुस जाती है। डंठल-कई गज लम्बा, गावदुम, खुरदरा, जड़ की ओर कठोर। छाल-सफेदी मायल किन्तु भीतर का भाग लाल होता है। शाखा-प्रशाखाओं करके सघन बेल निकटवर्त्ती वृक्षों पर चढ़कर फैलती है। पत्ते-प्रत्येक ग्रन्थि पर चार-चार के चक्रों में, जिसमें से दो बड़े होते हैं। ये १॥ से ४ इञ्च लम्बे, लट्वाकार-ताम्बूलाकार, नोकीले, खरस्पर्श युक्त या चिकने होते हैं। पत्रनाल-२ से ४ इञ्च लम्बा होता है। पुष्प-नन्हें-नन्हें श्वेतवर्ण के गुच्छों में रहते हैं। फल- काले, चने के बराबर तथा दो बीजों से युक्त होते हैं। मूल-लम्बे, लम्बगोल तथा ताजी अवस्था में लाल तथा सूखने पर कुछ काले हो जाते हैं। मूल का स्वाद प्रारम्भ में मिठास लिये हुये, लेकिन बाद में कुछ तीता और कड़वा होता है। इन्हीं मूलों का औषध में व्यवहार किया जाता है। बाजार में नेपाली, ईरानी, अफगानी तथा हिन्दुस्तानी नाम से चार प्रकार के मूल बिकते हैं जिसमें से अफगानी मूल जो सिन्ध के रास्ते से आता है वह अच्छा समझा जाता है तथा हिन्दुस्तानी कनिष्ठ मानते हैं। इनका व्यवहार रँगने के काम में भी किया जाता है। इसका पर्याय नाम जो 'समङ्गा' दिया गया है उसके विषय में विद्वानों में मतभेद है। इसकी कभी-कभी चिरायते में मिलावट रहती है। रासायनिक संगठन-इसके मूल में राल, गोंद, शर्करा, चूने के योग एवं रञ्जक पदार्थ पाये जाते हैं। रंजक द्रव्यों में रक्त रवेदार पर्प्यूरिन (Purpurin), पीत ग्लूकोसाइड मंजिस्टिन एवं गैरेंसिन् (Manjistin & Garancin), नारंगरक्त अॅलिझॅरिन् (Alizarin) एवं पीत क्झॅन्थाइन् (Xanthine) आदि पाये जाते हैं। गुण तथा प्रयोग-यह रक्तशोधक, ग्राही, पौष्टिक, गर्भाशय संकोचक, शोथघ्न, त्वग्दोषहर, वेदनास्थापक, मूत्रल एवं व्रणरोपक है। अल्पमात्रा में देने से इससे मस्तिष्क एवं वातनाड़ियों पर शामक प्रभाव पड़ता है लेकिन अधिक मात्रा में देने से कुछ भ्रम उत्पन्न होता है। इससे मूत्र एवं दुग्ध का रंग लाल हो जाता है। इसका क्वाथ अङ्गघात, कामला, मूत्रावरोध, अश्मरी, आर्तवविकार, अनार्तव, शोथ, रक्तातिसार, प्रमेह, छाती के शोथयुक्त विकार एवं चर्मरोग आदि में दिया जाता है। (१) मंजिष्ठादि क्वाथ का उपयोग चर्मरोगों में बहुत लाभदायक है। इसके प्रयोग से त्वचा की रक्ताभिसरण क्रिया २३ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
३०६ भावप्रकाशनिघण्टुः बढ़ कर उसकी विनिमय क्रिया में परिवर्तन होता है। इससे वातरक्त, दाद, खुजली, श्वित्र एवं व्यंग आदि में बहुत लाभ होता है। (२) यह गर्भाशय संकोचक होने से प्रसव के बाद गर्भाशय शुद्धि के लिये इसके साथ ईश्वर मूल, पिपरामूल आदि अन्य औषधियों का प्रयोग किया जाता है। इससे गर्भाशय संकोच होकर स्राव की वृद्धि होती है तथा पीड़ा कम होती है। (३) अश्मरी में शस्त्रकर्म करने के पूर्व एक बार इसका प्रयोग करके देखना चाहिये। इसके चूर्ण को १ माशे की मात्रा में दिन में ३ बार देना चाहिये। इससे सभी प्रकार की पथरी गलकर निकल जाती है। यदि इससे लाभ न हुआ तो फिर शस्त्रकर्म किया जा सकता है। (४) यह फक्कारोग (Rickets) राजयक्ष्मा, आंत्रिकशैथिल्य एवं दुर्गन्ध युक्त जीर्ण अतिसार आदि में भी लाभदायक है। राजयक्ष्मज अतिसार एवं आंत्रिक व्रणों में इसके उपयोग से वेदना की शांति होती है। फुप्फुसावरणशोथ (प्ल्यूरिसी- Pleurisy)) आदि छाती के विकारों में भी इससे लाभ होता है। (५) मंजिष्ठ में चन्दन के साथ इसका क्वाथ दिया जाता है। (६) मधु के साथ इसको घिस कर लगाने से व्यङ्ग, दाद एवं श्वित्र आदि जीर्ण चर्मरोगों में बहुत लाभ होता है। लोध्र एवं चन्दन के साथ पीस कर इसे लगाने से विसर्प में लाभ होता है। (७) मञ्जीठ, अर्जुन, मुलेठी एवं सुगन्धवाला इनका क्वाथ अस्थिभग्न में पिलाया जाता है तथा उसी का लेप भी करते हैं। केवल मञ्जीठ एवं मुलेठी को काञ्जी में पीस कर लगाने से भी शोथ कम होकर पीड़ा कम होती है। (८) अग्निदग्ध व्रण पर मञ्जीठ, रक्तचन्दन तथा मूर्वा से सिद्ध घृत का उपयोग किया जाता है। इससे पीड़ा का शमन होकर व्रण दूर होता है। (९) इसके फल का प्रयोग यकृत् के कारण उत्पन्न अवरोध में किया जाता है। मात्रा-मूल चूर्ण १ से ३ माशा दिन में तीन बार। अथ कुसुम्भम्, तस्य नामानि गुणाँश्चाह स्यात्कुसुम्भं वह्निशिखं वस्त्ररञ्जकमित्यपि। कुसुम्भं वातलं कृच्छ्ररक्तपित्तकफापहम् ।।१९२।। कुसुम के नाम तथा गुण-कुसुम्भ, वह्निशिख और वस्त्ररञ्जक ये नाम कुसुम के हैं। कुसुम्भ-वातकारक तथा मूत्रकृच्छ्र, रक्तपित्त और कफ का नाश करने वाला होता है। [१९२] ६५ कुसुम्भ हिं०-कुसुम, कुसुम्भ, बरें। बं०-कुसुम फूल। म०-करडई। गु०-कसुम्बो। क०-कसुम्बे। ते०-लतुक, लक्क, बंगारमु, वंगारम, अग्निशिखा, कुसुम्बा वित्तुलु। पं०-कूसम, कर्तुम, कुर्तुम, करर। उ० प्र०-बर्र, कर्र। फा०-खश्कदाने, गुलेमश्कर। अ०-अखरीज़, झरतम। अं०-Safflower (सैफ्फ्लावर); Parrot seed (पैरट्सीड); Bastard saffron (बॅस्टर्ड सॅस्फ़्रॉन्)। ले०-Carthamus tinctorius, Linn. (कार्थेमस् टिंक्टरियस, लिन.)। Fam. Compositae (कॉम्पोज़िटी)। इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है। इसका क्षुप-१-३ फीट ऊँचा होता है। पत्ते-लम्बे, किनारों पर कटे हुए, नुकीले और काँटेदार होते हैं। पुष्प-केसरिया लाल रंग के पुष्प गोल गुच्छों में आते हैं। फल- चतुष्कोणीय चर्मल फल आते हैं। बीज-सफेद, चिकने तथा शंख की आकृति के समान होते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
हरीतक्यादिवर्गः ३०७ कृषिजन्य इसके अनेक प्रभेद पाये जाते हैं तथापि इनका वर्गीकरण दो वर्गों में किया जा सकता है। एक में काँटे होते हैं और दूसरे में काँटे नहीं होते। काँटे वाले की अपेक्षा बिना काँटे वाले के फूलों से बहुत उत्तम रंग निकलता है। काँटेवाले पौधे तैल की दृष्टि से अच्छे समझे जाते हैं। इसके पुष्पों के किञ्जल्क केसर के समान दिखलाई देते हैं तथा केसर में इनकी मिलावट की जाती है। असली केसर के तन्तु सुगन्धित तथा एक रङ्ग के होते हैं किन्तु कुसुम के किंजल्क तन्तु गन्धरहित तथा श्वेत धब्बों से युक्त होते हैं। इसके बीज, पंचांग, तैल, पुष्प एवं मूल का व्यवहार चिकित्सा में किया जाता है। रासायनिक संगठन—इसके पुष्पों में जल में अविलेय कार्थामिन् (Carthamin) नामक एक लाल रंग एवं जल में विलेय अन्य पीत रंग पाये जाते हैं। इसके बीजों में २०-३०% तक एक स्थिर तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग—इसके बीज विरेचक, मूत्रल तथा बल्य होते हैं। इसका पुष्प विरेचक, स्वेदजनन, बल्य एवं आर्तव वृद्धिकर होता है। तैल विरेचक एवं व्रणरोपक है। इसका मूल मूत्रल तथा पंञ्चाग उष्ण होता है। (१) इसके कोमल पत्तों का शाक प्रतिश्याय में खाया जाता है। इसके पत्तों में रेनेट् (Rennet) की तरह दूध जमाने की शक्ति होती है। (२) इसके शुष्क पुष्पों को ४ माशे की मात्रा में कामला में देते हैं। इसका फांट स्वेदल होता है तथा प्रतिश्याय, कष्टार्तव एवं मांसपेशीय आमवात (Muscular rheumatism—मसक्यूलर ह्यूर्मैटिज्म) में दिया जाता है तथा इसका हिम रोमान्तिका आदि स्फोटक ज्वरों में (Eruptive fevers—एरप्टिह फोवरस्) में विस्फोट बाहर निकालने के लिये प्रयुक्त करते हैं। (३) इसके बीजों से प्राप्त तैल खाने के काम आता है। बाजारू मीठे तेल में तथा घी में इसकी मिलावट करते हैं। इससे पाखाना साफ होता है। प्रमेह में इसके तैल को खाने से लाभ होता है। खुजली में इसको ५, ६ बार लगाने से बहुत लाभ होता है। आमवात एवं सन्थिशोथ में इसकी मालिश की जाती है तथा व्रणों पर इसको लगाते हैं। सुगन्धि के काम के लिए विदेशों में इसका निर्यात किया जाता है। कुछ लोगों ने इसके पंचांग से सिद्ध तिल तैल का व्यवहार सन्थिशोथ, आमवात, अङ्गघात, खुजली एवं पुराने घाव आदि में लगाने के लिये लिखा है। कुसुम बीजतैल का प्रयोग भी इसके स्थान पर किया जा सकता है। इसकी खली टिकाऊ होती है तथा जानवरों के खाने के काम में एवं ऊख आदि के लिये खाद के रूप में काम में ली जाती है। साबुन एवं तैलीय रंगों में भी खली का उपयोग होता है। (४) इसके बीज द्राक्षारस के साथ अश्मरी एवं मूत्रकृच्छ्र में लाभदायक हैं। इसके बीजों की मांड मृदुविरेचक होती है एवं उदरशूल तथा आमवात में दी जाती है। प्रसूता में गर्भाशय की पीडा हो तो इसकी पुल्टिस् बनाकर पेडू पर बाँधा जाता है। मात्रा—शुष्क पुष्प चूर्ण २-४ माशा। बीज २-४ माशा। अथ लाक्षा (लाही) तस्या नामानि गुणाँश्चाह लाक्षा पलंकषालक्तो'यावो वृक्षामयो जतुः । लाक्षा वर्ण्या हिमा बल्या स्निग्धा च तुवरालघुः ।। १९३।। (ब्राह्मण्यङ्गारवल्ली' च खरशाखा च हञ्जिका) । अनुष्णा कफपित्तास्रहिक्काकासज्वरप्रणुत् ।। १९४।। व्रणोरःक्षतवीसर्पकृमिकुष्ठगदापहा । अलक्तको गुणैस्तद्वद्विशेषाद्द्व्यङ्गनाशनः ।। १९५।। लाख के नाम तथा गुण—लाक्षा, पलङ्कषा, अलक्त, याव, वृक्षामय और जतु ये सब लाख के पर्यायवाची शब्द हैं। किसी-किसी पुस्तकों में ब्राह्मणी, अङ्गारवल्ली, खरशाखा और हञ्जिका ये अधिक पर्याय मिलते हैं। लाख—शरीर १. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः ।
३०८ भावप्रकाशनिघण्टुः के वर्ण को उज्ज्वल करने वाली, शीतल, बलकारक, स्निग्ध, कषायरसयुक्त, लघु और अनुष्ण (थोड़ी गरम) होती है तथा यह कफ, रक्तपित्त (पित्त, रक्त) हिचकी, कास, ज्वर, व्रण, उरःक्षत, विसर्प, कृमि और कुष्ठरोग को दूर करने वाली होती है। लाख से उत्पन्न हुये अलक्तक (महावर) में भी उपरोक्त लाख के भी सभी गुण होते हैं किन्तु विशेषतः यह व्यङ्गरोग (झाँई) की नाशक होता है। [१९३-१९५] ६६. लाख हिं०-लाख, लाही, लाई। बं०-गाला, लाहा। पं०, मा०, गु० म०-लाख। क०-अरगु। ते०-लवका, लक्का, लाका। ता०-अरकु। फा०-लाक। अ०-लुक, लुक मकसूल। अं०-Lac (लॅक) या Shell lac (शेल लॅक)। ले०-कीटनाम-Laccifer lacca (Kerr) (लॅसिफेर लॅक्का)। Fam. Lacciferidae (लसिफेरिडी)। लाख-पुराने वृक्षों की डालियों पर एक प्रकार के बारीक कीड़ों द्वारा स्वरक्षणार्थ निर्मित रक्ताभ या गाढ़े भूरे रङ्ग का रालदार पदार्थ है। बेर, पाकड़, पीपल आदि वृक्षों पर ये कीड़े इसे बनाते हैं। इनमें पीपल वृक्ष की लाही सर्वोत्तम समझी जाती है। वैशाख और आश्विन के महीने में व्यापारी लोग वृक्षों से छुड़ाकर सुखाते हैं। इसको साफकर कपड़े की लम्बी थैलियों में भरकर गरम करते हैं जिससे लाख गलकर टपकती है। चपड़ा बनाने के लिये गरम करने के पूर्व इसमें हरताल का घोल मिलाते हैं तथा बाद में उसे खींच खींचकर पतला बनाते हैं। लाख को औटाकर लाल रङ्ग तैयार करते हैं और उसे सेमल की रूई में तरकर महावर बनाते हैं। लाख के रङ्ग की बनी हुई रोशनाई बहुत पक्की होती है। औषध की अपेक्षा लाख का अन्य कार्यों में बहुत उपयोग होता है तथा या निर्यात व्यापार की एक प्रमुख वस्तु है। विदेशों में उत्पन्न न होने से यहाँ से इसका काफी निर्यात किया जाता है। इससे निर्मित रङ्ग का अब बहुत कम उपयोग होता है। उत्तर प्रदेश में मिरजापुर में इसके कारखाने हैं। गुण और प्रयोग-लाख शीतल, रक्तपित्तघ्न, ज्वरनाशक, दाहशामक, बल्य एवं वर्ण्य है। इसका उपयोग रक्तप्रदर, ऊर्ध्वग रक्तपित्त, उरःक्षत, ज्वर, दाह, रक्तविकार एवं कास आदि में किया जाता है। (१) रक्तप्रदर एवं उरःक्षत आदि में इसे दूध में उबालकर या घी में पकाकर फिर चूर्ण करके उसमें दूध मिलाकर पिलाते हैं। इसके चूर्ण को मधु तथा दूध के साथ भी दिया जा सकता है। साफ घोलकर बुकनी की हुई पीपल की कच्ची लाह १ माशा एवं घृत में भूना हुआ शुद्ध गैरिक ४ रत्ती दूध के साथ ऊर्ध्वग रक्तपित्त में देने से बहुत लाभ होता है। (२) इससे सिद्ध लक्षादि, अङ्गारकादि एवं चन्दनबलालाक्षादि आदि तैलों का उपयोग जीर्णज्वर, राजयक्ष्मा एवं दाह आदि में अभ्यङ्ग के लिये किया जाता है। (३) कृमिदन्त तथा व्रणों पर इसको लगाया जाता है। मात्रा-१-३ माशा। अथ हरिद्रा तस्या नामानि गुणाँश्चाह हरिद्रा काञ्चनी पीता निशाऽऽख्या वरवर्णिनी। कृमिघ्नी हलदी योषित्प्रिया हट्टविलासिनी१ ।।१९६।। हरिद्रा कटुका तिक्ता रूक्षोष्णा कफपित्तनुत्। वर्ण्या त्वग्दोषमेहास्त्रशोथपाण्डुव्रणापहा ।।१९७।। हलदी के नाम तथा गुण-हरिद्रा, काञ्चनी, पीता, निशाऽऽख्या (रात्रिवाची सभी शब्द), वरवर्णिनी, कृमिघ्नी, हल्दी, योषित्प्रिया और हट्टविलासिनी ये नाम हल्दी के हैं। हलदी-कटु तथा तिक्तरस युक्त, रूक्ष, उष्णवीर्य, कफ पित्त १. 'हरविलासिनी'ति पाठा.।
हरीतक्यादिवर्गः ३०९
नाशक, शरीर के वर्ण को उज्ज्वल करने वाली एवम् चर्मदोष, प्रमेह, रक्तविकार, शोथ, पाण्डु तथा व्रण को दूर करने वाली होती है । [१९६-१९७]
६७. हल्दी
हिं० - हल्दी, हरदी, हर्दी, हल्दी । बं० - हलुद । म० - हलद । गु० - हलदर । क० - अरसिन, अरिसिन । ते० - पसुपु । पं० - हल्दी, हलदर, हलज । ता० - मंजल । मला० - मञ्जल । फा० - जर्द चोब । अ० - उरुकुस्सफ । अं० - Turmeric (टर्मेरिक) । ले० - Curcuma longa, Linn. (कर्क्युमा लाँगा, लिन) । Fam. Zingiberaceae (झिंज़िबेरॅसी) । हल्दी-एक बहुत प्रसिद्ध प्रतिदिन के व्यवहार में आने वाली वस्तु प्रायः सब प्रान्तों के खेत में रोपण की जाती है लेकिन बंबई, मद्रास तथा बंगाल में इसकी विशेष रूप से उपज की जाती है । चीन एवं जावा आदि देशों में भी इसकी उपज होती है । इसका क्षुप - २-३ फीट ऊँचा होता है । पत्ते-केले के नवीन पौधे से निकले हुए पत्ते के समान १- १।। फुट लम्बे तथा ६-७ इञ्च चौड़े उतने ही लम्बे पर्णवृन्त से युक्त, आयताकार-भालाकार एवं पर्णतल की तरफ कुछ नुकीले होते हैं । पत्तों में आम के समान गन्ध आती है । फूल-अवृन्त काण्डज क्रम में निकले हुवे, पीतवर्ण के, संख्या में अल्प तथा करीब १ १/२ इञ्च लम्बे; पुष्पकाण्ड-६ इञ्च या अधिक लम्बा तथा पत्रनाल द्वारा आवृत्त; पुष्पकाण्ड की पत्तियाँ हलके हरे रंग की होती हैं । इसी कन्द को हल्दी कहते हैं । ये कन्द विभिन्न आकार के, मूल एवं पर्णवृन्तों के चिन्हों से युक्त होते हैं । अन्दर का भाग पीला या नारंगपीत । भग्न - शृङ्गवत् । गन्ध - मधुर । स्वाद - कड़वा । चूसने पर लालास्राव का वर्ण भी पीत हो जाता है । रँगने के काम में बिना उबाली हल्दी का व्यवहार किया जाता है और खाने के काम में हल्दी को उबाल कर सुखाकर प्रयुक्त करते हैं । उबालने से उष्णवीर्य हल्दी की तीव्रता कम हो जाती है । प्रमेह आदि कफ प्रधान व्यक्तियों में कच्ची हल्दी का रस सहपान या अनुपान के रूप में प्रयुक्त करते हैं । हल्दी को एक विशेष विधि से तैयार कर बाजार में बेची जाती है । पहले कन्दों को अलग करके साफ करते हैं । फिर मुलायम होने तक जल में उबालते हैं । स्थान भेद के अनुसार ३० मिनट से ६ घंटे तक उबाला जाता है । उबालते समय इसी के कुछ पत्तों को भी जल में डालते हैं । थोड़ा गोबर मिलाने से इसका रंग अच्छा हो जाता है । फिर इन्हें खुली हवा में फैलाकर बार-बार पलट कर धीरे-धीरे सुखाते हैं । सूखने पर रगड़कर साफ करके उपयोग में लाते हैं । रासायनिक संगठन-इसमें करक्यूमिन् (Curcumin, C₁₂H₂₀O₆) नामक एक पीला एवं रवेदार रंजक पदार्थ होता है जो मद्यसार में पूर्णतया घुल जाता है जिससे गहरे पीले रंग का घोल बनता है । इस घोल में क्षार मिलाने से घोल रक्ताभ बादामी वर्ण का हो जाता है । इसके अतिरिक्त हल्दी में ५-६% उड़नशील तैल होता है जिसमें कर्पूरवत् गन्ध आती है तथा इस तैल में करक्यूमेन (Curcumen) नामक एक टरपेन (Terpene) होता है जो स्नेहद्रव्य कोलेस्टेरॉल (Cholesterol) को घुलाने के लिए बहुत अच्छा द्रव्य है । हल्दी में उपर्युक्त पदार्थों के अतिरिक्त स्टार्च (Starch) २४% तथा अॅल्ब्युमिनाइड्स (Albuminoids) ३०% होते हैं । गुण और प्रयोग-हल्दी उष्ण, उत्तेजक, सुगन्धित, रक्तशोधक, त्वग्दोषहर, शोथहर, दीपन, ग्राही, कफघ्न, वातहर, विषघ्न एवं व्रण के लिए लाभदायक है । मसाले के रूप में इसका नित्य व्यवहार होते हुए भी यह एक बहुत अच्छी औषध है । इसका उपयोग प्रतिश्याय, कफविकार, चर्मरोग, रक्तविकार, प्रमेह, कामला, यकृत् विकार, पर्यायिक ज्वर, अतिसार, संग्रहणी, व्रण एवं नेत्राभिष्यन्द में किया जाता है ।
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३१० भावप्रकाशनिघण्टुः (१) प्रतिश्याय, खाँसी, प्रमेह, प्रदर एवं नेत्राभिष्यन्द आदि रोगों में जिनमें श्लेष्मा का अत्यधिक स्राव होता है, इसको दूध में उबालकर गुड़ मिलाकर पिलाते हैं। प्रतिश्याय की प्रारंभिक अवस्था में रात के समय इसके धूएँ को नाक से सुँघाते हैं तथा उसके बाद कुछ देर तक जल नहीं पीने देते। इससे बहुत जल्दी लाभ होता है। खाँसी में इसको भूनकर १-२ माशा मधु अथवा घृत के साथ चटाने से लाभ होता है। (२) आँवले का रस, हल्दी तथा मधु इसके प्रयोग से सभी प्रकार के प्रमेहों में अच्छा लाभ होता है। प्रदर में इसके साथ गुग्गुलु या रसांजन का प्रयोग करते हैं। (३) खुजली, पामा, दाद, शीतपित्त, उदर्द, फोड़े एवं विचर्चिका आदि रक्तविकार एवं चर्म रोगों में यह बहुत लाभदायक है। इसके लिए हल्दी का चूर्ण गोमूत्र के साथ खिलाया जाता है एवं मक्खन के साथ स्थानीय लेप भी करते हैं। इसके विशेष योग हरिद्राखंड का १ तो० की मात्रा में नित्य कुछ समय तक लेने से उपर्युक्त विकारों में पर्याप्त लाभ होता है। (४) चूना या सज्जी खार हल्दी के साथ मिलाकर मोच, ऐंठन, चोट, पिच्चित व्रण एवं पुराने घावों पर लगाने से बहुत लाभ होता है। इसके साथ हल्दी तथा मिश्री को खिलाते भी हैं। बिच्छू एवं सर्प आदि के काटने पर वेदना शान्ति के लिए इसका धूआँ देते हैं। हल्दी एवं फिटकिरी (१ में २०) के सूक्ष्म चूर्ण का कर्णस्राव में कान में प्रधमन करते हैं। (५) सभी प्रकार के नेत्राभिष्यन्द के लिए यह बहुत लाभदायक है। एक भाग हल्दी २० भाग जल में उबाल कर छानकर उसे आँख में बार-बार डालते हैं जिससे आँख की वेदना कम होती है तथा कीचड़ आना भी कम होता है। इसके क्वाथ से रँगे हुए कपड़े का व्यवहार नेत्राच्छादन के लिए किया जाता है। (६) शलीपद में इसको गुड़ एवं गोमूत्र के साथ प्रयोग कराया जाता है। (७) शिरःशूल एवं जोंक के काटने पर रक्तप्रवाह को रोकने के लिए इसका लेप लाभदायक है। चक्कर आता हो तो ताजी हल्दी का सिरपर लेप करने से लाभ होता है। घृतकुमारी के गूदे में इसको घिसकर शोथयुक्त अर्श पर लगाते हैं। (८) भूतोन्माद एवं योषापस्मार आदि में इसका धूआँ दिया जाता है। (९) हल्दी के ताजे पत्तों का उपयोग मछली भूनने में एवं घृत की दुर्गन्ध को दूर करने के लिए उपयोग में लाते हैं। ताजी हल्दी का आचार भी बनाया जाता है। मात्रा- चूर्ण २-४ माशा। अथ कर्पूरहरिद्राया नामानि गुणाँश्चाह दार्बीभेदा१ऽऽम्रगन्धा च सुरभीदारुदारु च। कर्पूरा पद्मपत्रा स्यात्सूरीम२त्सुरतारका ।।१९८।। आम्रगन्धिर्हरिद्रा या सा शीता वातला मता। पित्तहृन्मधुरा तिक्ता सर्वकण्डूविनाशिनी ।।१९९।। कर्पूरहल्दी या आमाहरदी के नाम तथा गुण- दार्बीभेदा (यह दारुहल्दी के भेद में है अतः दार्बीभेदा भी नाम है), आम्रगन्धा (आम के फल के समान गन्ध होने से आम्रगन्धा भी कहते है), सुरभीदारु, दारु, कर्पूरा, पद्मपत्रा सूरीमत् और सुरतारका (पाठान्तर में सुरभी और सुरनायिका) ये सब आमाहरदी के पर्यायवाचक शब्द हैं। जो हल्दी आम के फल के समान गन्ध वाली होती है वह शीतल, वातकारक, पित्त को दूर करने वाली, मधुर तथा तिक्त रसयुक्त एवं सब प्रकार की खुजली का नाश करनेवाली होती है। [१९८-१९९] १. 'दार्बीभेदे'ति पाठान्तरमसङ्गतम्। २. 'सुरभी सुरनायिके'ति पाठ०। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
हरीतक्यादिवर्गः ३११ ६८. आमाहल्दी हिं० - अमिया हलदी, आमाहल (र) द, आमाहलदी। बं० - आम आदा। म० - अम्बे हलद, अम्बा हलद। गु० - आम्बा हलदर। क० - हुली आरसीन। ते० - कारुपुसुपु। ता० - पशु मंजल। मा० - आंबा हलदी। पं० - अंबिया हलदी। फा० - दारचोबबह। अ० - दारहल्द। अं० - Mango ginger (मँगो जिंजर)। ले० - Curcuma amada Roxb. (कर्क्यूमा अमाडा)। Fam. Zingiberaceae (झिंजिबेरेंसी)। आमाहलदी के क्षुप प्रायः सब प्रान्तों में कहीं-न-कहीं पाये जाते हैं। बंगाल और कोंकण में इसकी खेती की जाती है। इसका डंठल मोटा होता है। कन्द-हल्दी की गाँठों से बड़े-बड़े, आर्द्रक के समान, हल्के पीले रंग के एवं आम्र की तरह गन्धयुक्त होते हैं। क्षुप-२-३ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते-१-१॥ फुट लम्बे, ५-६ इञ्च चौड़े, आयताकार दीर्घवृत्ताकार और नुकीले होते हैं। फूल-फीके पीले रंग के आते हैं। गाँठों को छोटे-छोटे टुकड़े कर सुखा लेते हैं। डॉ० देसाई लिखते हैं कि बम्बई में आमाहलदी नाम से जो गाँठें बिकती हैं वे वनहरिद्रा की होती हैं। कुछ विद्वानों ने आमाहलदी का ले० नाम वनहरिद्रा वाला लिखा है। आमाहलदी का बंगाल में अधिक प्रयोग होता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील तैल, राल, शर्करा, गोंद, स्टार्च, ॲल्ब्यूमिनॉइड्स, ऑर्गैनिक अम्ल तथा राख आदि पदार्थ प्राप्त होते हैं। गुण और प्रयोग-यह वातानुलोमक, शीतल, सुगन्धित, दीपन, पाचन एवं ग्राही है। इसके गुण आर्द्रक के समान दीपन एवं वातानुलोमक हैं लेकिन आर्द्रक उष्ण है और यह शीतल है। इसका उपयोग हल्दी के स्थान पर किया जाता है। सुगन्धित होने के कारण इसे चटनी आदि में उपयोग में लाते हैं। मिठाइयों में आम की गन्ध लाने के लिये इसके फांट का व्यवहार करते हैं। चोट एवं खुजली आदि में इसका लेप किया जाता है। लताकरञ्ज के पत्र रस के साथ कृमि रोग में इसका उपयोग किया जाता है। मात्रा-चूर्ण २-४ माशा। अथ वनहरिद्राया नामगुणानाह अरण्यहलदीकन्दः कुष्ठवातास्रनाशनः ।। २०० ।। वनहरदी के गुण-वनहलदी का कन्द-कुष्ठ तथा वातरक्त का नाशक होता है। [२००] हिं० - बनहरदी, बनहलदी, जंगली हलदी। बं० - बनहलुद, बनहलद। म० - वेडीहलद, रानहलद। क० - काडरसन। ते० - अड़वि पसुपु, कस्तुरि पसुपु। ता० - कस्तुरि मंजल। गु० - बनहलदर, कपूरकाचली। पं०, मा० - जंगली हलदी। मला० - कट्टुमञ्जल। अं० - Wild turmeric (वाइल्ड टर्मेरिक); Yellow zedoary (यलो झिडोरी); Cochin turmeric (कोचीन टर्मेरिक)। ले० - Curcuma aromatica Salisb. (कर्क्यूमा ॲरोमॅटिका)। Fam. Zingiberaceae (झिंजिबेरेंसी)। वनहलदी-इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में कहीं-न-कहीं पाई जाती है। विशेषकर बंगाल एवं दक्षिण के कोचीन, मैसूर, अल्वारा आदि स्थानों में अधिक देखने में आती है। इसका क्षुप वर्षजीवी होता है। गरमी में इसका क्षुप सूख जाता है किन्तु भूमि के भीतर इसकी गाँठे जीवित रहती हैं और वर्षा ऋतु में वे अंकुरित हो पौधे के रूप में परिणत होती हैं। पत्ते जब कोमल अवस्था के होते हैं तब उनके बीच का भाग जामुनी रंग का होता है। जब यह अंकुरित होता है तभी इसमें फूल आते हैं। जड़ के नीचे काला सा पीले रंग का कन्द होता है। अच्छी खाद आदि होने से ये कन्द काफी बड़े होते हैं। साधारणतः बीच की गाठें अण्डे के समान, २ इञ्च से बड़ी, काली सी चक्राकार कड़ों से युक्त तथा अनेक मोटी उपमूलों से युक्त होती हैं। उपमूलों के अंतिम भाग में बदाम के बराबर नारंगपीत गाँठे होती हैं। बीच की गाँठों के
३१२ भावप्रकाशनिघण्टुः बगलवाली गाँठें अंगुली सदृश मोटी होती हैं तथा उनसे थोड़े से मांसल मूल निकले रहते हैं । जंगली हरदी का अन्दर का भाग गाढ़े नारंगी रंग का; गन्ध हरदी से तेज तथा कर्पूर मिश्रित सोंठ के समान; स्वाद कर्पूर के समान एवं हल्लासकारक होता है । हरदी के स्थान में रंगने के काम में यह आती हैं । त्रावणकोर में इससे तिखुर निकालते हैं। रासायनिक संगठन-हरिद्रा के समान । गुण और प्रयोग-इसके गुण हलदी की ही तरह होते हैं । रक्तविकार एवं चर्मरोगों में अन्य औषधियों के साथ इसका व्यवहार किया जाता है । (१) सर्पविष में जंगली हलदी, कुष्ठ, अजवायन तथा मैनसिल का धूम दिया जाता है । (२) विस्फोटज ज्वरों में दानों को बाहर निकालने के लिये इसे २-४ रत्ती खिलाते हैं तथा इसका बाह्यलेप भी करते हैं । (३) खुजली, चोट, सूजन एवं मोच आदि में इसका लेप अथवा इससे सिद्ध तैल का व्यवहार किया जाता है। (४) शिरःशूल में लोहवान के साथ इसे घिसकर लेप करते हैं । मात्रा-१-२ मा० । नोट-उपर्युक्त हरिद्राओं के अतिरिक्त बंगाल में एक कालीहलदी (नरकचूर, नीलकण्ठ) होती है जिसे कर्च्यूमा केसिआ (Curcuma caesia Roxb.) कहते हैं । इसकी गाँठें काली सी धूसरित वर्ण की एवं चक्राकार कड़ों से युक्त होती हैं । अन्दर का भाग धूसर नील वर्ण का, अत्यन्त कड़ा एवं शृङ्ग के समान होता है । इनका स्वाद एवं गन्ध कर्पूर के समान होता है । गुण और प्रयोग-इसके गुण कचूर की तरह होते हैं । सौन्दर्य प्रसाधनों (Cosmetics-कॉसमेटिक्स) में इसका उपयोग किया जाता है । इसका उबटन पसीना लाने के लिए व्यवहार में लाया जाता है। बंगाल में इसकी ताजी गाँठों का उपयोग हलदी की तरह किया जाता है । अथ दारुहरिद्राया नामानि गुणाँश्चाह दार्वी दारुहरिद्रा च पर्जन्या पर्जनीति च । कटङ्कटेरी पीता च भवेत्सैव पचम्पचा ।। सैव कालीयकः प्रोक्तस्तथा कालेयकोऽपि च ।।२०१।। पीतद्रुश्च हरिद्रुश्चपीतदारु१ च पीतकम् । दार्वी निशागुणा किन्तु नेत्र कर्णास्यरोगनुत् ।।२०२।। दारुहरदी के नाम तथा गुण-दार्वी, दारुहरिद्रा, पर्जन्या, पर्जनी, कटङ्कटेरी, पीता, पचम्पचा, कालीयक, कालेयक, पीतद्रु, हरिद्रु, पीतदारु और पीतक ये सब दारुहलदी के पर्यायवाची शब्द हैं । दारुहलदी-के गुण यद्यपि हलदी के समान ही होते हैं तथापि यह विशेषतः नेत्र, कर्ण तथा मुखसम्बन्धी रोगों को दूर करने वाली होती है । [२०१-२०२] ७०. दारुहलदी हिं०-दारुहलदी, दारुहलदी, दारहलद । बं०-दारुहरिद्रा । म०-दारुहलद, जरकि हलद । गु०-दारुहलदर । मा०-दारुहलदी । क०-दोद्दा मरद रिसिन । ते०-मनिपसुपु । ता०-मर मञ्जिल । कुमा०-चित्रा, कीलमॊरा । पं०- सुमलु । ने०-चित्रा । फा०-दार चोबह, फिलझरह । अ०-दार हलक । अं०-Indian berberry (इण्डियन बरबेरी) । ले०-Berberis species (बर्बेरिस् की विभिन्न जातियाँ) । Fam. Berberidaceae (बर्बेरिडेंसी) । १. 'कपीतकमिति पाठान्तरं चिन्त्यम् ।
हरीतक्यादिवर्गः ३१३ दारुहलदी की १२-१३ जाति की कंटकित झाड़ियाँ अधिकतर हिमालय के पहाड़ों पर तथा आसाम में पाई जाती हैं। इनमें से चार जातियाँ मध्य तथा दक्षिण भारत (निलगिरी पर्वत) में पाई जाती है। छोटा नागपुर के पारसनाथ की पहाड़ी पर भी एक भेद पाया जाता है। इनमें से विशेष रूप से ब० ॲरिस्टेटा एवं ३, ४ अन्य पौधों का उपयोग चिकित्सा में किया जाता है जिनका वर्णन आगे दिया जा रहा है। गुणों की दृष्टि से इनमें विशेष अन्तर न होने से सभी के गुण और प्रयोग एक साथ दिये गये हैं। गुणों की दृष्टि से इनमें विशेष अन्तर न होने से सभी के गुण और प्रयोग एक साथ दिये गये हैं। दारुहलदी के मूल, काष्ठ, कांड, फल (जिसे झरिक्क कहते हैं) एवं सत्व (रसौंत) का व्यवहार किया जाता है। रसौंत का स्वतन्त्र वर्णन किया गया है। झरिक्क—ये कालाई लिये लाल तथा सूखने पर काले अंगूर की तरह दिखलाई देते हैं। ये काले अंगूर से छोटे तथा अधिकांश में बीजहीन होते हैं। इनका स्वाद खट्टा या रुचिकर खटमिठ्ठा होता है। (क) Berberis aristata, DC. (बर्बेरिस् ॲरिस्टॅटा, डीसी०)। जौन०—काशमोई। गढ०—किंगोरा। इसके क्षुप हिमालय पर्वत पर ६००० से १०५०० फीट की ऊँचाई पर एवं निलगिरी के पहाड़ों पर पाये जाते हैं। इसका क्षुप—बड़ा, पतनशील (Deciduous-डेसिड्यूअस्), कँटीला एवं साधारणतः ६ से १२ फीट तक ऊँचा लेकिन कभी-कभी १५ फीट तक ऊँचा एवं ८ इञ्च व्यास के कांड से युक्त होता है। शाखाएँ—श्वेताभ या हलके पीताभ धूसर वर्ण की होती हैं। पत्ते-१.५-४ इञ्च लम्बे, १/२-१ इञ्च चौड़े, अभिलटवाकार, चर्मवत्, सूक्ष्म शिराओं से युक्त, सरल धार वाले या दूर-दूर पर तीक्ष्ण काँटों से युक्त एवं उनका अधीपृष्ठ हलके हरे रङ्ग का होता है। फूल-स्वर्ण- पीत पुष्प २-३ इञ्च लम्बी मंजरियों में आते हैं। फल-बीजिमांसल फल (Berry-बेरी), अण्डाकार, नीले बैंगनी रङ्ग के चमकीले एवं रजावृत होते हैं। मूल-पीताभ बादामी, नलिकाकार, कुछ गाँठदार, कड़े, मजबूत लेकिन लचीले, साधारणतः कटे हुवे टुकड़ों के रूप में एवं थोड़े सी शाखाओं से युक्त होते हैं। छाल-अंदर से गहरे बादामी रङ्ग की, मुलायम एवं तोड़ने पर चूर्ण रूप में हो जाती है। काष्ठ-नींबू के समान पीतवर्ण का, स्पष्ट एवं संकरी मज्जक किरणों से युक्त, जिसमें मज्जक प्रायः नहीं होता और यदि हो तो चमकीले पीतवर्ण का होता है। इसके काष्ठ में ताजी अवस्था में हलकी गन्ध एवं इसका स्वाद कड़वा होता है। इसको कितना भी उबालें तो भी यह पीला ही रहता है। (ख) B. asiatica, Roxb. ex DC. (ब० एशियाटिका, राक्सव, एक्स डीसी०)। हिं०-किलमोरा, किंगोरा। ने०-माटे किस्सी, चित्रा। इसके क्षुप प्रायः २-८ हजार फीट के बीच या कभी-कभी नीचे भी हिमालय की घाटियों में भूटान, गढ़वाल, बिहार, पारसनाथ की पहाड़ी तथा अफगानिस्तान आदि स्थानों पर पाये जाते हैं। इसका क्षुप-करीब ८ फीट ऊँचा होता है। शाखाएँ-धूसर वर्ण की होती हैं। इसकी पत्तियां-अण्डाकार या लट्वाकार, आयताकार, १-२ १/२ इञ्च लम्बी एवं चर्मवत् होती हैं। पत्तियों का शिराजाल ऊपरी पृष्ठ पर घना तथा दृढ़ होता है। पुष्प-मञ्जरियों में निकलते हैं। इसके फल-कृष्ण नील होते हैं। (ग) B. lycium, Royle (ब० लाइसियम्, रायलि०)। हि०-चतरोई, काशमल, दारुहरिद्रा। इसके क्षुप ३-७ हजार फीट की ऊँचाई पर पश्चिमी हिमालय में गढ़वाल से हजारा तक एवं चकरौता तथा मसूरी के नीचे विशेष रूप में प्राप्त होते हैं। ये छोटे एवं समूहबद्ध होकर आते हैं। इसके पत्ते-प्रायः पतले तथा लम्बे होते हैं एवं शिराजाल घना नहीं होता। इसके फल विशेष मांसल नहीं होते। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
३१४ भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन— बर्बेरिस् की विभिन्न उपजातियों में कम-से-कम आठ प्रकार के विभिन्न क्षाराभ पाये गये हैं जिनके नाम इस प्रकार हैं— बर्बेरिन् (Berberine), ऑक्सिअँकॅन्याइन् (Cxyacanthine), बबेमाइन् (Berbamine), पार्मेटाइन (Palmatine), जँट्रोहीझाइन् (Jatrorrhizine), कोलंर्बमाइन् (Columbamine), बर्बेरूबाइन् (Berberrubine) एवं हाइड्रैस्टाइन् (Hydrastine)। इनमें से प्रथम तीन विशेष महत्त्व के हैं तथा शेष विभिन्न अन्य वनस्पतियों के विशिष्ट क्षाराभ हैं। बर्बेरिन् (Berberine, C₂₀ H₁₉ NO₅), शीत जल में घुलनशील, मद्यसार में कम घुलनशील, पीतवर्ण का एवं सूइयों के आकार का क्षाराभ है। यह काष्ठ एवं छाल की अपेक्षा मूल में अधिक होता है। यह क्षाराभ और भी कई वनस्पतियों में पाया जाता है। इसके लवण भी बनाये गये हैं। इसके अतिरिक्त इसमें कषाय द्रव्य, गोंद, स्टार्च आदि पदार्थ पाये जाते हैं। इसके फल में मॅलिक् (Malic), टार्ट्रिक् (Tartric) एवं साइट्रिक् (Citric) अम्ल पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग— दारुहलदी के मूल एवं काष्ठ बल्य, तिक्त पौष्टिक, दीपन, पाचन, ग्राही, पित्तविरेचक, ज्वरहर, पर्यायिक ज्वरहर, स्वेदल, श्लेष्मघ्न, रसायन एवं त्वक् दोष-हर हैं। इसका उपयोग मलेरिया आदि विषम ज्वर, कुपचन, फिरङ्ग, गण्डमाला, अपची, त्वकदोष, भगंदर, प्रदर, अत्यार्तव, व्रण, गर्भिणीवमन, यकृत्प्लीहावृद्धि, कामला एवं सर्पदंश आदि में किया जाता है। (१) मलेरिया तथा अन्य विषमज्वरों में इसके क्वाथ का उपयोग किया जाता है। ज्वर के साथ हल्लास, वमन, विरेचन, शिरःशूल एवं थकावट अधिक होती है तब इसके क्वाथ का उपयोग, रसौत की अपेक्षा अच्छा होता है। ज्वर में इसके पूर्व विरेचन देना चाहिये। इससे पसीना होकर ज्वर उतर जाता है। क्विनीन की तरह हृदयावसाद एवं बाधिर्य आदि इससे नहीं होते तथा प्लीहा की वृद्धि कम हो जाती है। ज्वर अच्छा होने के पश्चात् इसके उपयोग से भूख आदि बढ़ती हैं। यद्यपि उपर्युक्त गुणों के लिये इसका उपयोग किया जाता रहा लेकिन नवीन प्रयोगों से देखा गया कि इसके क्षाराभ बर्बेरिन् सल्फेट् (Berberine Sulphate) को १ १/२-२ १/२ की मात्रा में दिन में ३ बार ३ दिन तक देने पर भी किसी प्रकार का लाभ नहीं हुआ। मलेरिया में इससे एक लाभ अवश्य होता है कि इसके देने से प्लीहा आदि धातुओं में छिपे हुवे मलेरिया के कीटाणु रक्त में आ जाते हैं जिससे रक्त परीक्षा में दिखलाई देने से निदान में आसानी होती है। क्विनीन के साथ ज्वर की चिकित्सा में इसका उपयोग लाभदायक है। (२) बर्बेरिन् (Berberine)—यह क्षाराभ अत्यंत विषैला नहीं है लेकिन अधिक मात्रा में देने से अवश्य विषैला है एवं मृत्यु भी हो सकती है। इसका प्रचूषण आन्त्र एवं सूचिकाभरण द्वारा हो सकता है। बिल्ली एवं कुत्तों को उनके वजन के प्रति किलोग्राम के लिये २ मिलीग्राम की मात्रा में देने से हृदय पर अवसादक प्रभाव पड़ता है तथा रक्तवाहिनियों का विस्फार होता है। यह क्रिया उन्हीं अंगों के ऊपर प्रत्यक्ष प्रभाव से एवं प्राणदा (Vagus = व्हागस्) नाड़ी की उत्तेजना से होती है। प्राणियों में मृत्युत्तर परीक्षण द्वारा देखा गया कि इससे फुफ्फुसों में अत्यन्त रक्ताधिक्य एवं हृदय के अलिन्दों (Auricle = ऑरिकल) का विस्फार होकर मृत्यु होती है। इससे वृक्कों में शोथ एवं रक्तस्राव होता है तथा इससे केन्द्रीय वातनाडीसंस्थान के कन्दों की कोशाओं को नुकसान पहुँचता है। यह श्वसन के लिये भी अवसादक है लेकिन १-१० मिलीग्राम की मात्रा में यह आन्त्र, गर्भाशय एवं श्वसनिका की अनैच्छिक मांसपेशियों को उत्तेजित करता है जिससे श्वसनका में संकोच उत्पन्न होता है। साधारण मात्रा में हृदय पर इसका उत्तेजक प्रभाव पड़ता है जिससे हृदय की पोषक रक्तवाहिनियों में रक्तप्रवाह की वृद्धि होती है लेकिन अधिक मात्रा में देने पर यह अवसादक है। इससे श्वेतकणों की वृद्धि होती है। मलेरिया में निदान की दृष्टि से प्रदीपक रूप में (Provocative dose-प्रोव्होकेटिव्ह डोस) इसका उपयोग लाभदायक है जिससे छिपे हुये कीटाणु रक्त में आ जाते हैं तथा रक्तपरीक्षण में दिखलाई देने लगते हैं। यह चर्म के नीचे की धातुओं एवं
श्लैष्मिक कला के लिये स्थानिक रूप से सौम्य स्वापजनक होने के कारण वेदनास्थापन के लिए प्रयुक्त होता है । क्विनीन जो कि कोशाओं के जीवरस (प्रोटोप्लाजम्-Protoplasm) के लिये विषैला होता है उसकी अपेक्षा ८० गुना कम शक्ति का इसका घोल (८०,००० में १) लोशर्मेनिया ट्रॉपिका (Leishmania tropica) नामक प्राच्यव्रण उत्पन्न करने वाले कीटाणु के संबर्ध की वृद्धि रोकने में समर्थ होता है। यह प्राच्यव्रण (Oriental sore-ओरियण्टल् सोर) की चिकित्सा के लिये सफल औषधि है । बर्बेरिन् ॲसिड सल्फेट .५-१% घोल की १-२ सी० सी० मात्रा व्रण के किनारों पर अत्यन्त महीन सूचिका द्वारा, ४, ५ जगह दी जाती है। सूचिकाभरण हफ्ते में एक बार किया जाता है साधारणत ३ हफ्तों में व्रण अच्छा हो जाता है लेकिन द्वितीयक उपसर्ग की तीव्रता के अनुसार २-१२ हफ्ते भी अच्छा होने में लग सकते हैं । यदि एक से अधिक व्रण हों तो एक दिन में २ व्रणों से अधिक एवं हफ्ते में ४ व्रणों से अधिक (विशेष कर जब व्रण बड़े हों) में सूचिकाभरण नहीं करना चाहिये । चिकित्साकाल में व्रण का बन्धन उचित रूप में करना चाहिये । इस औषधि का तयार घोल ओरिसॉल (Orisol) नाम से बिकता है । (३) दारुहलदी पित्त एवं मूत्रमार्ग की विकृति में लाभदायक है। पित्त एवं मूत्राश्मरी, तृष्णा, दाह एवं हलास आदि के लिये इसका उपयोग किया जाता है । बस्तिशोथ एवं प्रमेह आदि में आँवले के रस एवं मधु के साथ इसको देते हैं । गर्भाशय शैथिल्य के कारण उत्पन्न रक्तप्रदर में तथा श्वेतप्रदर में मधु के साथ इसके क्वाथ का सेवन करने से लाभ होता है । कामला में मधु के साथ इसका क्वाथ दिया जाता है। मूलत्वक् का क्वाथ तृणाणुनाशक (Bactericidal- बॅक्टेरिसाइड्ल्) है तथा जीर्ण व्रणों में व्रण प्रक्षालन के लिये लाभदायक है । (४) दारुहलदी के फल सौम्य विरेचक, शीतल एवं रोचक होते हैं । प्रतिनिधि एवं व्यामिश्रण-उत्तर भारत में इसमें विशेष मिलावट नहीं होती लेकिन बंबई की तरफ इसमें कई प्रकार की वनस्पतियों के काष्ठ को हल्दी में उबालकर बेचते हैं। झाडकी हल्दी (Coscinium fenestratum Gaertn.) Colebr. (कॉसिनिअम् फेनेस्ट्रेट्म्) के कांड को भी इसके स्थान पर देते हैं। मात्रा-चूर्ण २-३ माशा, टिंक्चर १/२-२ ड्रा०, बर्बेरिन के लवण १-५ ग्रेन । अथ दार्वीक्वाथजातं रसाञ्जनम् । तस्य निर्माणविधि नामानि गुणांश्चाह दार्वीक्वाथसमं क्षीरं पादं पाक्त्वा यदा घनम् । तदा रसाञ्जनाख्यं तन्नेत्रयोः परमं हितम् ।।२०३।। रसाञ्जनं तार्क्ष्यशैलं रसगर्भञ्च तार्क्ष्यजम् । रसाञ्जनं कटु श्लेष्मविषनेत्रविकारनुत् ।।२०४।। उष्णं रसायनं तिक्तं छेदनं व्रणदोषहृत् ।।२०५।। दारुहलदी के क्वाथ से तैयार होने वाले रसोत के बनाने की विधि, नाम तथा गुण-दारुहलदी का काढ़ा बनाकर उसी के बराबर उसमें दूध डालकर औटावें । बाद को जब चौथाई भाग शेष रह जाय तब उतार लें और उसमें से जो गाढ़ा भाग हो उसे अलग कर लें। उसी को रसोत कहते हैं। वह नेत्रों के लिये परम हितकर होता है । रसाञ्जन, तार्क्ष्यशैल, रसगर्भ और तार्क्ष्यज ये रसोत के नाम हैं। रसोत-कटु तथा तिक्त रस युक्त, कफ, विष तथा नेत्र सम्बन्धी विकारों को दूर करने वाला, उष्ण वीर्य, रसायन, छेदक (पिण्डी भाव को प्राप्त हुये कफादिकों को काट-काट कर अलग करने वाला), एवम् व्रणसम्बन्धी दोषों को नष्ट करने वाला होता है । [२०३-२०५] ७१. रसौत हिं०-रसोत, रसौत, रसवत्त । बं०-रसांजन । म०-रसवत, रसांजन । गु०-रसवंती । क०-रसांजन । ते०- रसांजनमु । मा०-रसोत । पं०-रसौत । फा०-फिलजहरः । अ०-हुलुजेंहिंदी । अं०-Extract of Indian Berberis (एक्स्ट्रॅक्ट ऑफ इण्डियन् बर्बेरिस्) । ले०-Extractum Berberis (एक्स्ट्रॅक्टम् बर्बेरिस्) ।
३१६ भावप्रकाशनिघण्टुः रसोत—कालापन लिये भूरे रङ्ग की, गोंद के समान मुलायम तथा पानी और मदिरा में घुलने वाली दारुहलदी के क्वाथ और बकरी के दूध से बनी हुई औषधि है। इसका स्वाद कड़वा तथा कसैला होता है। इसको बनाने के लिये वर्षा के आखिर में इसके क्षुप को काट कर उसके पंचांग का क्वाथ बनाकर बाद में उसे गाढ़ा बनाते हैं। कुछ लोग क्वाथ में बराबर मात्रा में बकरी का दूध मिलाकर फिर गाढ़ा करते हैं। इस बात में मतभेद है कि रसौत केवल ब० लाइसियम् के मूल एवं काष्ठ से बनता है या ब० एशियाटिका से या दोनों से। बाजार में बिकने वाला रसौत प्रायः दोनों के मिश्रण से बनाया जाता है। इसमें लकड़ी, मिट्टी आदि पदार्थ मिले रहते हैं। इसलिये इसे १० गुने गरम जल में मिलाकर छान कर सुखाते हैं एवं बचे हुये भाग में मद्यसार मिलाकर छानकर उस मद्यसार को ऊर्ध्वपातन यन्त्र द्वारा अलग कर गाढ़े भाग को उपर्युक्त जल से सुखाये गाढ़े भाग में मिलाकर बन्द शीशी में रखकर काम में लाते हैं। गुण और प्रयोग—यह कड़वा पौष्टिक, ज्वरहर, पार्यायिक ज्वरहर, स्वेदल, अर्शोघ्न, शोथघ्न, रक्तशोधक, श्लेष्मघ्न, व्रणरोपक एवं नेत्रविकारहर है। इसका आन्तरिक उपयोग ज्वर, यकृत् प्लीहा वृद्धि, कामला, अर्श एवं आमाशय तथा पक्वाशय के व्रण (Gastric & duodenal ulcer-गैस्ट्रिक, अँड ड्युओडेनल अल्सर) में लाभदायक है। इसका बाह्य प्रयोग अर्श, प्राच्यव्रण, कटे हुये भाग, फोड़े फुन्सियाँ एवं पुराने व्रण आदि में किया जाता है। (१) विषमज्वर के सभी प्रकारों में इसको १५ रत्ती दिन में ३ बार जल के साथ देते हैं। क्वाथ की अपेक्षा यह ज्यादा अच्छा होता है। इससे ज्वर का शमन होकर प्लीहा वृद्धि भी कम होती है। इसके प्रयोग में पहले विरेचन देना चाहिये तथा इसकी पूर्ण मात्रा खाली पेट पर देनी चाहिये। औषधि लेने के पश्चात् रोगी को कपड़ा ओढ़ा कर सुलाना चाहिये। थोड़ी देर में रोगी को प्यास मालूम पड़ती है तथा जी घबड़ाने लगता है लेकिन उसको जल पीने न दें। एक घण्टे में पसीना निकलने लगता है तथा कमजोरी मालूम होती है। उसके बाद शरीर पोंछ कर लाजमण्ड या चावल का मांड और दूध पीने को दें। इसके बाद रोगी प्रायः सो जाता है तथा उस दिन ज्वर की पारी नहीं आती। इस प्रयोग में एक दोष यह है कि रोगी को कभी पहले रक्तातिसार हुआ हो तो वह फिर उभड़ जाता है। (२) नये एवं पुराने नेत्राभिष्यन्द में इसको पलकों पर लगाने से बहुत लाभ होता है। इसके साथ इसमें अफीम, सैन्धव एवं फिटकिरी मिलाई जा सकती है। (३) रक्तार्श में इसको २ से ८ रत्ती मक्खन के साथ खिलाया जाता है एवं इसके घोल (३२ से १) से अर्श को धोते हैं। (४) कपूर एवं मक्खन के साथ बना इसका मलहम फोड़े, फुन्सियाँ, कटे हुये भाग एवं पुराने घावों पर लाभदायक है। मधु के साथ मिलाकर मुख के अन्दर के व्रणों पर एवं अन्य व्रणों पर लगाते हैं। शोथ पर इसके लेप से लाभ होता है। मुखरोग में इसके घोल से गण्डूष कराते हैं। प्राच्यव्रण के लिये भी यह लाभदायक है क्योंकि इसमें क्षाराम की पर्याप्त मात्रा रहती है। मात्रा—१/२-२ माशा। अथ बाकुची। तस्या नामानि तत्फलस्य च गुणाँश्चाह अवल्गुजो बाकुची स्यात्सोमराजी सुपर्णिका। शशिलेखा कृष्णफला सोमा पूतिफलीति च ॥२०६॥ सोमवल्ली कालमेषी कुष्ठघ्नी च प्रकीर्त्तिता। बाकुची मधुरा तिक्ता कटुपाका रसायनी ॥२०७॥ विष्टम्भहृद्धिमा रुच्या सरा श्लेष्मास्रपित्तनुत्। रूक्षा हृद्या श्वासकुष्ठमेहज्वरकृमिप्रणुत् ॥२०८॥ तत्फलं पित्तलं कुष्ठकफानिलहरं कटु। केश्यं त्वच्यकृ¹मिश्र्वासकासशोथामपाण्डुनुत् ॥२०९॥ १. पाठा० वमिश्र्वास। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmau. Digitized by S3 Foundation USA