भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
४२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे मारण के योग्य तामा के लक्षण ९७७ | शुद्ध किये हुए शिलाजीत के गुण ९८८ मारण के योग्य तामा के लक्षण ९७७ | रस की स्वेदन विधि ९८८ तामा के शोधने की विधि ९७८ | रस की मर्दन विधि ९८९ तामे के ८ दोष ९७८ | रस की मूर्च्छन विधि ९८९ तामे के मारने की विधि ९७८ | मूर्च्छन विधि ९९० मारे हुए तामे के गुण ९७९ | रस की ऊर्ध्वपातन विधि ९९० रांगा का स्वरूप ९७९ | रस की अधःपात विधि ९९० अशुद्ध वङ्ग के दोष ९७९ | पारे के दोषों को दूर करने की शोधन विधि ९९१ रांगा तथा सीसा के शोधन की विधि ९७९ | पारे के मारने की विधि ९९१ रांगा के मारण की विधि ९८० | रसकर्पूर बनाने की विधि ९९२ मारे हुए रांगा के गुण ९८० | सिन्दूररस बनाने की विधि ९९३ सीसे का स्वरूप ९८० | मारित-मूर्च्छित पारे के गुण ९९३ सीसा के शोधन की विधि ९८० | हिङ्गुल की शोधन विधि ९९४ सीसा के मारने की विधि ९८१ | शुद्ध हिङ्गुल के गुण ९९४ मारे हुए सीसा के गुण ९८१ | सिंगरफ से पारा निकालने की विधि ९९४ अशुद्ध लोहा के दोष ९८१ | अशुद्ध गन्धक के दोष ९९५ लोहा के दोष की शान्ति के लिये शोधनविधि ९८१ | गन्धक शोधने की विधि ९९५ लोहा के मारणविधि ९८१ | शुद्ध गन्धक के गुण ९९५ मारे हुए लोह के गुण ९८२ | अशुद्ध अभ्रक के दोष ९९५ लौहभस्म खाने की मात्रा ९८३ | अभ्रक शोधन-मारण विधि ९९५ लौहभस्म खाने के समय त्याज्य द्रव्य ९८३ | धान्याभ्रक बनाने की विधि ९९६ धातुओं के मारने की साधारण विधि ९८३ | मारे हुये अभ्रक के गुण ९९६ अशुद्ध स्वर्णमाक्षिक के दोष ९८३ | अशुद्ध हरताल के दोष ९९६ सोनामाखी शोधने की विधि ९८३ | हरताल शोधने की विधि ९९६ सोनामाखी मारने की विधि ९८३ | हरताल मारने की विधि ९९७ रूपामाखी शोधने की विधि ९८४ | शुद्धाशुद्ध हरताल के गुण ९९७ रूपामाखी मारने की विधि ९८४ | अशुद्ध मैनसिल का स्वरूप ९९७ सोनामाखी तथा रूपामाखी के विशेष गुण ९८४ | मैनसिल शोधने की विधि ९९८ अशुद्ध तूतिया के शोधन की विधि . ९८४ | शुद्ध की हुई मैनसिल के गुण ९९८ शुद्ध तूतिया के गुण ९८४ | खपरिया के शोधन की विधि ९९८ कांसा तथा पीतल के शोधन की विधि ९८५ | शुद्ध खपरिया के गुण ९९८ कांसा तथा पीतल के मारने की विधि ९८५ | उपरसों के शोधन की साधारण विधि ९९८ मारे हुए कांसा तथा पीतल के गुण ९८५ | अशुद्ध हीरे के दोष ९९९ सिन्दूर के शोधने की विधि ९८५ | हीरा शोधने की विधि ९९९ सिन्दूर के गुण ९८५ | हीरा मारने की विधि ९९९ शिलाजीत के लक्षण ९८६ | मारे हुए हीरे के गुण ९९९ शिलाजीत के शोधन की विधि ९८६ | शेष रत्नों की शोधन-मारण विधि १०००
द्वितीयो भागः विषय-सूची ४३ वत्सनाभ विष के लक्षण १००० । ऋतुभेद से विरेचन द्रव्यों में भेद १०१३ विष शोधने की विधि १००० । अभयादिमोदक १०१४ विष के गुण १००० । विरेचन लेने के बाद कर्तव्य १०१४ उपविषों का निरूपण १००१ । न्यूनाधिक विरेचन का लक्षण और औषध १०१५ द्रव्यों के पूर्ण गुणयुक्त रहने की अवधि १००१ । अनुवासन तथा निरूह के भेद १०१६ घी तथा तैल के विषय में विशेषता १००१ । स्नेहबस्ति की विधि १०१६ स्नेहपानविधिप्रकरणम् । सभी प्रकार के विकारों को दूर करने वाली स्नेह के भेद तथा विशेष नाम १००२ । अनुवासन बस्ति १०२१ घी तथा तेल पिलाने योग्य व्यक्ति १००४ । निरूहबस्ति की विधि १०२२ मज्जा तथा घी पिलाने योग्य व्यक्ति १००४ । उत्क्लेशन बस्ति १०२४ शीतादि समयों तथा वातादि दोषों के भेद १००५ । दोषहर बस्ति १०२४ नस्य आदि लेने में तेल तथा घृत का प्रयोग १००५ । शमन बस्ति १०२४ घी आदि के पीने में अनुपान १००५ । लेखन बस्ति १०२४ स्नेह से द्वेष रखने वालों के लिये स्नेह-पान-विधि १००५ । बृंहणबस्ति १०२५ स्नेहन करने वाले अन्य भी पदार्थ १००५ । पिच्छिलबस्ति १०२५ स्नेह के न पचने पर कर्तव्य १००५ । निरूह बस्ति की मात्रा १०२५ स्नेह न पचने की आशङ्का में कर्तव्य १००६ । मधुतैलकबस्ति १०२५ स्नेह पीने से उत्पन्न प्यास की शान्ति १००६ । यापनबस्ति १०२६ स्नेह पीने के अयोग्य लोग १००६ । युक्तरथबस्ति १०२६ स्नेहपान के योग्य लोग १००६ । उत्तरबस्ति १०२७ स्नेहपान द्वारा भली भाँति स्निग्ध हुए लोगों । फलवर्ति की विधि १०२७ के लक्षण १००६ । नस्यग्रहण की विधि १०२८ अधिक मात्रा में स्निग्ध हुए लोंगों के लक्षण १००७ । रेचन नस्य की मात्रा १०२८ रूक्ष तथा अत्यन्त स्निग्ध हुए लोगों के । रेचन नस्य की विधि १०२९ लिये कर्तव्य १००७ । नस्य औषध का प्रमाण १०२९ स्नेह सेवन करने के गुण १००७ । रेचन नस्य के भेद १०२९ स्नेह सेवन करने के समय त्याज्य कर्म १००७ । रेचन नस्य के भेदों के लक्षण १०२९ पञ्चकर्मविधिप्रकरणम् । रेचन तथा स्नेहन नस्य के उपयोग १०२९ । रेचन औषधियों के गुण १०३० पञ्चकर्म के नाम १००७ । प्रधमन नस्य की औषधियाँ १०३० वमन कर्म में प्रथम वमन के योग्य समय और । स्नेहननस्य की कल्पना १०३० रोगियों का निर्देश १००८ । बृंहण नस्य की विधि १०३१ वमन कराने के अयोग्य लोगों का निर्देश १००८ । प्रतिमर्श की मात्रा १०३२ वमन कराने की विधि १००९ । प्रतिमर्श का समय १०३२ विरेचन के योग्य समय तथा व्यक्ति का निर्देश १०११ । प्रतिमर्श के विषय तथा गुण १०३२ मृदु, मध्यम तथा क्रूर कोष्ठ वाले मनुष्यों तथा । प्रतिमर्श के विषय तथा गुण १०३२ उनके योग्य मात्रा एवं द्रव्यों का वर्णन १०१२ । नस्य की सामान्य विधि १०३३ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA
४४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे नस्य देने के पश्चात् निषिद्ध कर्म १०३३ | उत्तम रीति से रक्तस्राव के लक्षण १०५१ नस्य के हीनयोग तथा अतियोग की चिकित्सा १०३४ | रक्तस्राव कराने के बाद त्याज्य १०५१ षष्ठंधूमपानादिविधिप्रकरणम् | नेत्र को स्वच्छ करने की विधि १०५१ धूमपान की विधि १०३४ | नेत्र को सेक करने की विधि १०५२ धूमपान में ओषधि का कल्क १०३७ | नेत्र के आश्च्योतन विधि १०५२ गृह में देने योग्य धूम १०३७ | पिण्डी की विधि १०५३ धूमपान में त्याग करने योग्य कार्य १०३७ | विडालक विधि १०५३ गण्डूष की विधि १०३७ | तर्पण विधि १०५३ गण्डूष के भेद १०३८ | तर्पण के योग्य नेत्रों के लक्षण १०५३ गण्डूष तथा कवल की औषधियों का मान १०३८ | रोगभेद से तर्पण धारण करने के काल का भेद १०५४ गण्डूष तथा कवल धारण करने में अवस्था | यथार्थ तर्पण के चिह्न १०५४ की मर्यादा १०३८ | अतितर्पित नेत्र के लक्षण १०५४ गण्डूष धारण के गुण १०३८ | पुटपाक की विधि और भेद १०५५ कवलधारण की विधि १०३८ | पुटपाकों के धारण काल की अवधि १०५५ प्रतिसारण की विधि १०३९ | तिक्तक द्रव्य १०५६ स्वेद की विधि १०३९ | तर्पण तथा पुटपाक धारण किये हुये लोगों के स्वेद के अयोग्य व्यक्ति १०४० | लिये त्याज्य कर्म १०५६ तापस्वेद की विधि १०४१ | अञ्जन की विधि और भेद १०५६ ऊष्मस्वेद की विधि १०४१ | लेखनकारिणी वर्ति १०५८ उपनाहस्वेद की विधि १०४२ | रोपणकारिणी वर्ति १०५८ द्रवस्वेद की विधि १०४३ | स्नेहनकारिणी वर्ति १०५८ सिर में तेल डालने की विधि १०४४ | लेखनकारिणी रसक्रिया १०५८ कान में तेल डालने की विधि १०४५ | रोपणकारिणी रसक्रिया १०५८ लेप की विधि १०४५ | स्नेहनकारिणी रसक्रिया १०५८ दोषघ्न लेप १०४६ | लेखन चूर्ण १०५९ विषहा लेप १०४६ | रोपण चूर्ण १०५९ मुखकान्तिदायक लेपं १०४६ | स्नेहन चूर्ण १०५९ लेप के दो भेद १०४७ | प्रत्यञ्जन सेवन विधि १०५९ शोणितस्राव की विधि १०४८ | नयनामृत चूर्ण १०६० वातादि से दूषित रक्तों के लक्षण १०४८ | दृष्टि को स्वच्छ करने वाली शलाका १०६० शुद्ध रक्त के लक्षण १०४८ | औषध खाने के पांच समय १०६० रक्तस्राव के विषय १०४९ | निरन्न कोष्ठ में ओषधि सेवन के गुण १०६१ रक्तस्राव के साधन १०४९ | अन्न के साथ ओषधि सेवन के गुण १०६२ सिरामोक्षण के अयोग्य जन १०४९ | ओषधि के पाकापाक का लक्षण १०६२ अधिक रक्त निकलने के दोष १०५० | रोगिपरीक्षाप्रकरणम् रक्त के अधिक निकल जाने पर वायु के | वाग्भटोक्त रोगी की परीक्षा १०६३ कुपित होने की चिकित्सा १०५१ | नेत्र की परीक्षा १०६३ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
द्वितीयो भागः विषय-सूची ४५ जिह्वा की परीक्षा १०६४ | अत्यन्त बढ़े हुए दोषादि के कारण तथा लक्षण १०७६ मूत्र की परीक्षा १०६४ | मेदोवृद्धि के लक्षण १०७७ स्पर्शद्वारा नाडी की परीक्षा १०६४ | दोष, धातु तथा मलों के कम होने के कारण १०७८ रोग जानने के कारण १०६५ | क्षीण हुए दोषादि के लक्षण १०७८ हेतु का लक्षण १०६५ | ओज के क्षय होने का कारण १०७९ सम्प्राप्ति के लक्षण तथा भेद १०६६ | ओज के क्षय होने के लक्षण १०७९ विकल्पसम्प्राप्ति १०६७ | मल के क्षय होने के लक्षण १०७९ प्राधान्यसम्प्राप्ति १०६७ | मूत्रादि के क्षय होने के लक्षण १०७९ बलसम्प्राप्ति का व्याख्यान १०६७ | क्षीण हुये दोष, धातु तथा मलों को बढ़ाने कालसम्प्राप्ति का व्याख्यान १०६७ | की विधि १०८० वातादि दोषों में कौन दोष किस ऋतु में | वात से क्षीण हुआ मनुष्य १०८० प्रकुपित होता है १०६८ | मांस से क्षीण हुआ मनुष्य १०८० पूर्वरूप के लक्षण १०६८ | भेद से क्षीण हुआ मनुष्य १०८१ लक्षण के लक्षण १०६९ | बल का क्षय होने में कारण १०८१ उपशय के लक्षण १०६९ | बलक्षय के लक्षण १०८२ वायु के उपशय १०७० | बलवृद्धि के कारण १०८२ पित्त के उपशय १०७० | बलवान् तथा निर्बल के प्रधान लक्षण १०८२ कफ के उपशय १०७० | परिशिष्ट- १ रोगों के निदान का विवेचन १०७० | अस्थियों के विषय में-संक्षिप्त विवरण १०८३ वायु के प्रकुपित होने के कारण १०७१ | मांस धातु १०८६ पित्त के प्रकुपित होने के कारण १०७२ | नारी-जननेन्द्रियों का संक्षिप्त विवरण १०८९ विदाही के लक्षण १०७२ | पुरुष-जननेन्द्रियों का संक्षिप्त विवरण १०९२ कफ के प्रकुपित होने के कारण १०७३ | आर्त्तव-गर्भाधान तथा बन्ध्यत्व का संक्षिप्त रोग के कारण स्वरूप रोग की विचित्रता १०७४ | विवरण १०९४ बढ़े तथा क्षीण हुए दोष, धातु तथा मल की | परिशिष्ट- २ सुश्रुतोक्त चिकित्सा १०७४ | अकारादि-क्रमानुसार निघण्टुभाग-स्थित द्रव्यों के स्वस्थ मनुष्य के लक्षण १०७५ | व्यवहारोपयोगी अङ्ग तथा उनकी मात्राएँ ११०१
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भावप्रकाशः प्रथम भाग (पूर्वार्द्ध) CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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श्रीमद्भावमिश्रप्रणीतः भावप्रकाशः 'विद्योतिनी' हिन्दीव्याख्योपेतः [ पूर्वखण्डम् ] अथ प्रथमप्रवक्तृप्रादुर्भावप्रकरणम् गजमुखममरप्रवरं सिद्धिकरं विघ्नहर्त्तारम्। गुरुमवगमनयनप्रदमिष्टकरीमिष्टदेवतां वन्दे ।।१।। श्रीमद्गुरोर्गुरुपदं बहुशोऽभिवन्द्यायुर्वेदमाप्तुमनसोऽद्य शिशोर्हृदीमाम्। 'भावप्रकाश'गतभावविभावनार्थं विद्योतिनीं ननु तनोत्यतनुं मुदाऽयम् ।। देवताओं में सर्वश्रेष्ठ, अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व, इन आठ सिद्धियों के देनेवाले और विघ्नों को दूर करनेवाले तथा हाथी के समान जिनका मुख है, ऐसे श्री गणेशजी और ज्ञानरूपी नेत्रों को देनेवाले श्रीगुरुदेव तथा अभीष्ट सिद्ध करनेवाले श्री इष्टदेव को मैं प्रणाम करता हूँ ।।१।। कवेरुक्तिः- आयुर्वेदागमनं क्रमेण येनाभवद्भूमौ। प्रथमं लिखामि तमहं नानातन्त्राणि संदृश्य ।।२।। जिस क्रमसे पृथ्वी पर आयुर्वेद अर्थात् वैद्यकशास्त्र का अवतरण हुआ, सबसे पहिले उसी (क्रम) को मैं अनेक महर्षिप्रणीत तन्त्रों (ग्रन्थों) को देखकर लिख रहा हूँ ।।२।। अथायुर्वेदस्य लक्षणमाह- आयुर्हिताहितं व्याधेर्निदानं शमनं तथा। विद्यते यत्र विद्वद्भिः स आयुर्वेद उच्यते ।।३।। आयुर्वेद का लक्षण—जिस शास्त्र में आयुष्य के लिये हितकारक और अहितकारक पदार्थों का उल्लेख हो और रोगों के निदान अर्थात् उत्पन्न होने का प्रधान कारण और उनकी शान्ति का उपाय अर्थात् चिकित्सा का वर्णन किया गया हो उसे विद्वान् लोग आयुर्वेद कहते हैं ।।३।। अथायुर्वेदस्य निरुक्तिमाह- अनेन पुरुषो यस्मादायुर्विन्दति वेत्ति च। तस्मान्मुनिवरैरेष आयुर्वेद इति स्मृतः ।।४।। आयुर्वेद की निरुक्ति—इस शास्त्र के द्वारा प्राणिमात्र को दीर्घायुष्यत्व की प्राप्ति तथा आयुर्विज्ञान विषयक सभी ४ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे तथ्यों का ज्ञान होने के कारण दूसरों की आयु का परिज्ञान होता है, इसी से मुनिश्रेष्ठों ने इसे ‘आयुर्वेद’ संज्ञा दी है। शरीरजीवयोर्योगो जीवनं तेनावच्छिन्नः काल आयुः, आयुर्वेदद्वारा आयुष्याणयनायुष्याणि च द्रव्यगुणकर्माणि ज्ञात्वा तेषां सेवनत्यागाभ्यामारोग्येणायुविंदति, तेनैव हेतुना परस्याप्यायुर्वेत्ति च ।।४।। शरीर और जीव का जो संयोग है, उसे 'जीवन' कहते हैं और जितने समय तक वह संयोग बना रहता है, उतने समय का नाम आयु है। आयुर्वेद के द्वारा आयु के लिये हितकर तथा अहितकर द्रव्य, गुण और कर्मों को जानकर तथा उनके सेवन और त्याग द्वारा अर्थात् आयु के लिये हितकर द्रव्य-गुण-कर्मों का सेवन और अहितकर द्रव्य-गुण-कर्मों का परित्याग करने के द्वारा, आरोग्य लाभ करने से मनुष्य दीर्घायु लाभ कर सकता है, तथा उक्त कारणों से दूसरे की आयु को भी जानने में समर्थ हो सकता है ॥४॥ क्रममाह, तत्रादौ ब्राह्मणः प्रादुर्भावः- विधाताऽथर्वसर्वस्वमायुर्वेदं प्रकाशयन् । स्वनाम्ना संहिता चक्रे लक्षश्लोकमयीमृजुम् ।।५।। आयुर्वेद का उत्पत्ति क्रम—सबसे पहले ब्रह्माजी ने अथर्ववेद का सर्वस्व अर्थात् सारभूत जो आयुर्वेद है, उसका प्रकाश करते हुए, अपने नामकी अर्थात् 'ब्रह्मसंहिता' इस नामकी एक १ लाख श्लोक वाली एक सरल संहिता बनाई ॥५॥ ततः प्रजापतिं दक्षं दक्षं सकलकर्मसु । विधिर्धीनीरधिः साङ्गप्रायुर्वेदमुपादिशत् ।।६।। इसके बाद बुद्धि के समुद्र ब्रह्माजी ने सभी कार्यों के करने में निपुण दक्ष नामक प्रजापति को अङ्ग तथा उपाङ्गों के सहित यह (सम्पूर्ण) आयुर्वेद पढ़ाया ॥६॥ अथ दक्षप्रादुर्भावः- अथ दक्षः क्रियादक्षः स्वर्वैद्यौ वेदमआयुषः । वेदयामास विद्वांसौ सूर्यांशौ सुरसत्तमौ ।।७।। दक्षप्रजापति से आयुर्वेद की उत्पत्ति—इसके (ब्रह्माजी से आयुर्वेद प्राप्त करने के) बाद सब क्रियाओं में निपुण दक्ष नामक प्रजापति ने स्वर्ग के वैद्य, देवगणों में श्रेष्ठ, सूर्य के पुत्र और विद्वान् दोनों अश्विनी-कुमारों को आयुर्वेद सिखाया ॥७॥ अथाश्विनीसुतप्रादुर्भावः- दक्षादधीत्य दस्रौ वितनुतः संहितां स्वीयाम् । सकलचिकित्सकलोकप्रतिपत्तिविवृद्धये धन्याम् ।।८।। अश्विनी-कुमारों से आयुर्वेद की उत्पत्ति—दोनों अश्विनी-कुमारों ने दक्ष नामक प्रजापति से आयुर्वेद पढ़कर सभी चिकित्सक लोगों के ज्ञान की वृद्धि के लिए अपनी प्रशंसनीय संहिता (अश्विनीकुमारसंहिता) बनाई ॥८॥ स्वयम्भुवः शिरश्छिन्नं भैरवेण रुषाऽथ तत् । अश्विभ्यां संहितं तस्मात्तौ जातौ यज्ञभागिनौ ।।९।। इसके बाद जब क्रुद्ध होकर भैरवजी ने ब्रह्माजी का शिर काट डाला था, तब अश्विनीकुमारों ने उसे फिर से जोड़ दिया था। इस प्रकार उसी दिन से वे दोनों यज्ञ में भाग पाने के अधिकारी हुए ।। देवासुरणे देवा दन्त्यैर्यै सक्षताः कृताः । अक्षतास्ते कृताः सद्यो दस्राभ्यामद्भुतं महत् ।।१०।। जब देवता तथा दैत्यों का युद्ध हुआ, तब उसमें जिन देवताओं को दैत्यों ने घायल कर दिया था, उन सबों को अश्विनी-कुमारों ने तत्क्षण (चिकित्सा करके) क्षत (घाव) से रहित (चङ्गा) कर दिया, उस समय उन दोनों का वह कार्य अत्यन्त अद्भुत प्रतीत हुआ ॥१०॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ प्रथमप्रवक्तृप्रादुर्भावप्रकरणम् ३ वज्रिणोऽभूद् भुजस्तम्भः स दस्राभ्यां चिकित्सितः । सोमान्निपतितश्चन्द्रस्ताभ्यामेव सुखीकृतः ।।११।। जब इन्द्र की भुजा का स्तम्भन हो गया था तथा चन्द्रमा जब सोम्लोक से गिर पढ़े थे, तब इन्हीं अश्विनी-कुमारों ने (चिकित्सा करके) उन्हें सुखी किया था ।।११।। विशीर्णा दशनाः पूष्णो नेत्रे नष्टे भगस्य च । शशिनो राजयक्ष्माऽभूद्द्द्विभ्यां ते चिकित्सिताः ।।१२।। जब पूषा नामक सूर्य के दाँत टूट गये और भग नामक सूर्य के नेत्र फूट गये थे तथा चन्द्रमा को राजयक्ष्मा हो गया था, तब इन लोगों की भी चिकित्सा अश्विनी-कुमारों ने ही की थी ।।१२।। भार्गवश्च्यवनः कामी वृद्धः सन् विकृतिं गतः । वीर्यवर्णस्वरोपेतः कृतोऽश्विभ्यां पुनर्युवा ।।१३।। भृगु महर्षि के गोत्र में उत्पन्न कामी च्यवन ऋषि जब वृद्ध होने से कुरूप हो गये थे, तब अश्विनी-कुमारों ने (चिकित्सा द्वारा) वीर्य, वर्ण ओर स्वर से युक्त करके फिर से उन्हें युवा कर दिया था ।।१३।। एतैश्चान्यैश्च बहुभिः कर्मभिर्भिषजां वरौ । बभूवतुर्भृशं पूज्याविन्द्रादीनां दिवौकसाम् ।।१४।। इन्हीं सब कार्यों एवं और-और भी बहुत से कार्यों के द्वारा वैद्यों में श्रेष्ठ ये दोनों अश्विनीकुमार इन्द्रादिक देवताओं के अत्यन्त पूज्य हुए ।।१४।। अथेन्द्रप्रादुर्भावः- संदृश्य दस्रयोरिन्द्रः कर्माण्येतानि यत्नवान् । आयुर्वेदं निरुद्वेगं तौ ययाचे शचीपतिः ।।१५।। इन्द्र से आयुर्वेद की उत्पत्ति-शची (इन्द्र की स्त्री) पति इन्द्र ने अश्विनी-कुमारों के पूर्वोक्त कार्यों को देखकर अतिशय यत्नशील होते हुए उन दोनों से निरुद्वेग होकर आयुर्वेद प्राप्त करने की प्रार्थना की ।।१५।। नासत्यौ सत्यसन्धेन शक्रेण किल याचितौ । आयुर्वेदं यथाऽधीतं ददतुः शतमन्यवे ।।१६।। तब सत्यसन्ध (दृढ़प्रतिज्ञ) इन्द्र के प्रार्थना करने पर अश्विनी-कुमारों ने जितना पढ़ा था, उतना सम्पूर्ण आयुर्वेद इन्द्र को पढ़ा दिया ।।१६।। नासत्याभ्यामधीत्यैव आयुर्वेदं शतक्रतुः । अध्यापयामास बहूनात्रेयप्रमुखान्मुनीन् ।।१७।। अश्विनी-कुमारों से आयुर्वेद पढ़कर इन्द्र ने भी आत्रेयादिक बहुत से मुनियों को पढ़ाया ।।१७।। अथात्रेयप्रादुर्भावः- एकदा जगदालोक्य गदाकुलभितस्ततः । चिन्तयामास भगवानात्रेयो मुनिपुङ्गवः ।।१८।। आत्रेय से आयुर्वेद की उत्पत्ति-एक समय मुनियों में श्रेष्ठ भगवान् आत्रेयजी इधर उधर (चारों तरफ) संसार के प्राणी को रोग से व्याकुल देखकर विचार करने लगे ।।१८।। किं करोमि क्व गच्छामि कथं लोका निरामयाः । भवन्ति साम्यानेतान्न शक्नोमि निरीक्षितुम् ।।१९।। मैं क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? और किस उपाय से संसार के प्राणी रोग रहित हों ? मैं इन सबको इस तरह रोग से युक्त अब अधिक देखने के लिये समर्थ नहीं हूँ ।।१९।। दयालुरहमत्यर्थं स्वभावो दुरतिक्रमः । एतेषां दुःखतो दुःखं ममापि हृदयेऽधिकम् ।।२०।। क्योंकि मैं अत्यन्त दयालु स्वभाव का हूँ और स्वभाव दुरतिक्रम होता है अर्थात् स्वभाव को कोई कभी बदल नहीं सकता । अस्तु, इन सबों को दुःख होने से मेरे भी हृदय में दुःख हो रहा है ।।२०।।
आयुर्वेदं पठिष्यामि नैरुज्याय शरीरिणाम्। इति निश्चित्य गतवानात्रेयस्त्रिदशालयम् ।। २१।। अतः इन प्राणियों के आरोग्यार्थ अब मैं आयुर्वेद पढूंगा। ऐसा निश्चय करके आत्रेय मुनि स्वर्गलोक (इन्द्रपुरी अमरावती) को गये ॥२१॥ तत्र मन्दिरमिन्द्रस्य गत्वा शक्रं ददर्श सः। सिंहासनसमासीनं स्तूयमानं सुरर्षिभिः ।।२२।। भासयन्तं दिशो भासा भास्करप्रतिभं त्विषा। आयुर्वेदमहाऽऽचार्यं शिरोधार्यं दिवौकसाम् ।।२३।। वहाँ इन्द्र के भवन में जाकर देवर्षि लोगों से स्तुति किये जाते, सिंहासन पर बैठे, सूर्य के समान अपने प्रकाश से दर्शों दिशाओं को प्रकाशित करते हुए, आयुर्वेद के महान् आचार्य और देवताओं के शिरोमणि इन्द्र भगवान् को उन्होंने देखा ॥२२-२३॥ शक्रस्तु तं निरीक्ष्यैव त्यक्तसिंहासनः स्थितः। तमग्रे पूजयामास भृशं भूरितपःकृशम् ।।२४।। कुशलं परिपप्रच्छ तथाऽऽगमनकारणम् । स मुनिर्वक्तुमारेभे निजागमनकारणम् ।।२५।। इन्द्र भगवान् भी उन आत्रेयमुनि को देखते ही सिंहासन छोड़कर खड़े हो गये और तपस्या करने से जिनका शरीर अत्यन्त क्षीण हो गया था, ऐसे उन (आत्रेयमुनि) का पहले भली भाँति पूजन किया, तत्पश्चात् कुशल तथा आने का कारण पूछा। तदनन्तर आत्रेय मुनि भी अपने आने का जो कारण था, उसे कहने लगे ॥२४-२५॥ देवराज ! न राजाऽसि दिव एव यतो भवान्। विधात्रा विहितो यत्नात्त्रिलोकीलोकपालकः ।।२६।। व्याधिभिर्व्यथिता लोकाः शोकाकुलितचेतसः । भूतले सन्ति सन्तापं तेषां हन्तुं कृपां कुरु ।।२७।। आत्रेय ने कहा—हे देवेन्द्र ! आप केवल स्वर्गलोक के ही राजा नहीं हैं, किन्तु विधाता ने आपको तीनों लोकों के लोगों का भी पालन करने के लिये राजा बनाया है। अतएव इस समय पृथ्वीतल में रोगों से पीड़ित तथा शोक से व्याकुल चित्तवाले जो प्राणी हैं, उन सबों का सन्ताप दूर करने की कृपा करें ॥२६-२७॥ आयुर्वेदोपदेशं मे कुरु कारुण्यतो नृणाम्। तथेत्युक्त्वा सहस्राक्षोऽध्यापयाभास तं मुनिम् ।।२८।। मुनीन्द्र इन्द्रतः साङ्गमायुर्वेदमधीत्य सः । अभिनन्द्य तमाशीर्भिराजगाम पुनर्महीम् ।।२९।। आत्रेय ने कहा—हे देवेन्द्र ! प्राणियों के कल्याण के लिये दया करके आप मुझे आयुर्वेद का उपदेश कीजिये। यह सुन इन्द्र ने 'तथास्तु' कहकर आत्रेय को आयुर्वेद पढ़ाया। तदनुसार मुनिश्रेष्ठ आत्रेयजी इन्द्र से शल्य-शालाक्य- कायचिकित्सा-भूतविद्या-कौमारतन्त्र-अगदतन्त्र-रसायनतन्त्र और वाजीकरणतन्त्र इन ८ अङ्गों के सहित आयुर्वेद का अध्ययन कर और उन (इन्द्र) का आशीर्वाद द्वारा अभिनन्दन करके फिर पृथिवी पर लौट आये ॥२८-२९॥ अथात्रेयो मुनिश्रेष्ठो भगवान् करुणाऽऽकरः । स्वनाम्ना संहितां चक्र नरवर्गानुकम्पया ।।३०।। ततोऽग्निवेशं भेडञ्च जातूकर्णं पराशरम्। क्षीरपाणिञ्च हारीतमायुर्वेदमपाठयत् ।।३१।। इसके बाद करुणा-निधान मुनिश्रेष्ठ भगवान् आत्रेय ने मनुष्य वर्ग पर कृपा करके अपने नाम से आत्रेयसंहिता नामक ग्रन्थ बनाया। और अग्निवेश-भेड-जातूकर्ण-पराशर-क्षीरपाणि और हारीत इन ६ ऋषियों को आयुर्वेद पढ़ाया ॥३०-३१॥ तन्त्रस्य कर्त्ता प्रथममग्निवेशोऽभवत्पुरा। ततो भेडादयश्चक्रुः स्वं स्वं तन्त्रं कृतानि च ।।३२।। श्रावयामासुरात्रेयं मुनिवृन्देन वन्दितम्। श्रुत्वा च तानि तन्त्राणि हृष्टोऽभूदत्रिनन्दनः ।।३३।। यथावत्सूत्रितं दृष्ट्वा प्रहृष्टा मुनयोऽभवन्। दिवि देवर्षयो देवाः श्रुत्वा साध्विति चाब्रुवन् ।।३४।। प्राचीन समय में उन ६ ऋषियों में से प्रथम तन्त्र (ग्रन्थ) के कर्त्ता अग्निवेश हुए। उनके बाद भेडादिक ऋषियों ने
भी अपने-अपने नामसे एक-एक तन्त्र बनाया और उन बनाये हुये अपने-अपने तन्त्रों को मुनिवृन्द से वन्दित महर्षि आत्रेयजी को सुनाया। उन तन्त्रों को सुन कर अत्रि महर्षि के पुत्र (आत्रेय) अत्यन्त प्रसन्न हुये और जैसे चाहिए वैसे बने हुये अपने- अपने तन्त्रों को देखकर तन्त्रकर्ता अग्निवेशादि ऋषिवृन्द भी अत्यन्त हर्षित हुए और स्वर्ग में देवर्षि तथा देवता लोगों ने भी उन तन्त्रों को सुनकर साधु-साधु अर्थात् 'बहुत अच्छा हुआ-बहुत अच्छा हुआ' ऐसा कहा ॥३२-३४॥ अथ भरद्वाजप्रादुर्भावः- एकदा हिमवत्पार्श्वे दैवादागत्य सङ्गताः । मुनयो बहवस्तेषां नामभिः कथयाम्यहम् ।।३५।। भरद्वाजो मुनिवरः प्रथमं समुपागतः । ततोऽङ्गिरास्ततो गर्गो मरीचिर्भृगुभार्गवौ ।।३६।। पुलस्त्योऽगस्तिरसतो वसिष्ठः सपराशरः । हारीतो गौतमः सांख्यो मैत्रेयश्च्यवनोऽपि च ।।३७।। जमदग्निश्च गार्ग्यश्च कश्यपः काश्यपोऽपि च
६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे है। अतः उन रोगों को दूर करने के लिये आप सब योग्य विद्वानों को कोई उपाय सोचना चाहिये। इस प्रकार सभा में कह कर उन लोगों ने भरद्वाज मुनि से कहा—हे भगवन् ! आप इस कार्य को करने के योग्य हैं। अतः इन्द्र से आप ही आयुर्वेद पाने के लिये प्रार्थना करें। फिर इन्द्र से प्राप्त किया हुआ जो आयुर्वेद होगा, उसे हम लोग क्रम से पढ़कर रोगसम्बन्धी भय से मुक्त हो जावेंगे ॥ ४५-४६॥ इत्थं स मुनिभिर्योर्ग्यैः प्रार्थितो विनयान्वितैः । भरद्वाजोमुनिश्रेष्ठो जगाम त्रिदशालयम् ।।४७।। तत्रेन्द्रभवनं गत्वा सुरर्षिगणमध्यगम् । दृष्टवान् वृत्रहन्तारं दीप्यमानभिवानलम् ।।४८।। दृष्ट्वैव स मुनि प्राह भगवान् मघवा मुदा । धर्मज्ञ ! स्वागतं तेऽथ मुनिं तं समपूजयत् ।।४९।। इस प्रकार जब विनय से युक्त हो श्रेष्ठ मुनिवरों ने प्रार्थना की, तब मुनियों में श्रेष्ठ भरद्वाजजी स्वर्गलोक को गये। वहाँ इन्द्र के भवन में पहुँच कर उन्होंने प्रज्वलित अग्नि के समान प्रकाशमान, देवर्षिगणों के मध्य में स्थित, वृत्रासुर को मारनेवाले इन्द्र को देखा। भरद्वाज मुनि को देखते ही भगवान् इन्द्र ने प्रसन्नता के साथ कहा—हे धर्म के जाननेवाले मुने ! आपका स्वागत है। इसके बाद उन भरद्वाज मुनि का विधिपूर्वक पूजन किया ॥४७-४९॥ सोऽभिगम्य जयाशीर्भिरभिनन्द्य सुरेश्वरम् । वचनं सम्यक् श्रावयामास तत्त्वतः ।।५०।। व्याधयो हि समुत्पन्नाः सर्वप्राणिभयङ्कराः । तेषां प्रशमनोपायं यथावद्वक्तुमर्हसि ।।५१।। अपाठयन् मुनि साङ्गमायुर्वेदं शतक्रतुः । जीवेद्धर्षसहस्राणि देही नीरुङ्निशम्य यम् ।।५२।। तदनन्तर उन भरद्वाज मुनि ने भी समीप जाकर जयशब्द युक्त आशीर्वादों से इन्द्र का अभिनन्दन करके ऋषियों के कहे हुये वचनों को यथार्थ रूप से भली-भाँति कह सुनाया और कहा कि हे देवेन्द्र ! इस समय संसार में सब प्राणियों के लिये भयङ्कर अनेक रोग उत्पन्न हुये हैं। उनके दूर करने का उपाय जिस तरह से हो, उस तरह से कहिये अर्थात् मुझे आयुर्वेद पढ़ाइये। भरद्वाज के इस वचन के सुनने के बाद इन्द्र ने मुनि को अङ्गों के सहित उस आयुर्वेद को पढ़ाया, जिसे सुनकर प्राणी रोग से रहित होकर हजारों वर्षों तक जी सकें ॥५०-५२॥ सोऽनन्तपारं त्रिस्कन्धमायुर्वेदं महामुनिः । यथावदचिरात्सर्वं बुबुधे तन्मना मुनिः ।।५३।। तेनायुःसुचिरं लेभे भरद्वाजो निरामयम् । अन्यानपि मुनींश्चक्रे नीरजः सुचिरायुषः ।।५४।। महामुनि भरद्वाजजी ने तन्मनस्क होकर जिसके पार का अन्त नहीं है तथा जिसके हेतु-लिङ्ग और औषधरूपी तीन स्कन्ध हैं, ऐसे आयुर्वेद को जैसा का तैसा थोड़े ही दिनों में पूर्णरूपेण (इन्द्र से) समझ लिया और उसी से रोगरहित होकर दीर्घ आयु को प्राप्त किया तथा दूसरे मुनियों को भी रोग से रहित दीर्घ आयुवाला बना दिया ॥५३-५४॥ तत्तन्त्रजनितज्ञानचक्षुषा ऋषयोऽखिलाः । गुणान्द्रव्याणि कर्माणि दृष्ट्वा तद्विधिमाश्रितः ।।५५।। आरोग्यं लेभिरे दीर्घमायुश्च सुखसंयुतम् । आयुर्वेदोक्तविधिनाऽन्येऽपि स्युर्मुुनयो यथा ।।५६।। तदनन्तर भरद्वाज मुनि के बनाये हुये तन्त्र (ग्रन्थ) से उत्पन्न ज्ञानरूपी नेत्रों के द्वारा सम्पूर्ण ऋषियों ने भी गुण-द्रव्य और कर्मों को देखकर तथा उस तन्त्र में कही हुई विधियों का आश्रय लेकर आरोग्य तथा सुख से युक्त दीर्घ आयु प्राप्त किया और उसी तरह अन्यान्य मुनियों ने भी आयुर्वेद में कही हुई विधियों के द्वारा आरोग्यता तथा सुख से युक्त दीर्घ आयु पायी ॥५५-५६॥ अथ चरकप्रादुर्भावः- यदा मत्स्यावतारेण हरिणा वेद उद्धृतः । तदा शेषश्च तत्रैव वेदं साङ्गमवाप्तवान् ।।५७।। अथर्वान्तर्गतं सम्यगायुर्वेदं च लब्धवान् । एकदा स महीवृत्तं द्रष्टुंचर इवागतः ।।५८।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmụ. Digitized by S3 Foundation USA
तत्र लोकानादैर्ग्यस्तान्व्यथया परिपीडितान् । स्थलेषु बहुषुव्यग्रान् म्रियमाणांश्च दृष्टवान् ।।५९।। तान्दृष्ट्वाऽतिदयायुक्तास्तेषां दुःखेन दुःखितः । अनन्तश्चिन्तयामास रोगोपशमकारणम् ।।६०।। सञ्चिन्त्य स स्वयं तत्र मुनेः पुत्रो बभूव ह । प्रसिद्धस्य विशुद्धस्य वेदवेदाङ्गवेदिनः ।।६१।। चरक से आयुर्वेद की उत्पत्ति-जिस समय मत्स्यावतार द्वारा भगवान् विष्णु ने वेदों का उद्धार किया था। उस समय शेष भगवान् ने उसी स्थान पर अङ्गों के सहित वेदों को प्राप्त किया और अथर्ववेद के अन्तर्गत जो आयुर्वेद था, उसे भी भली-भाँति से प्राप्त किया। एक समय वही शेषजी चर (जासूस) की भाँति छिपे तौर से भूलोक (संसार) का वृत्तान्त जानने के लिये पृथिवी पर आये और यहाँ उन्होंने बहुत से स्थानों पर लोगों को रोगों से ग्रस्त एवं व्यथा से अत्यन्त पीड़ित तथा व्यग्र एवं मरते हुये देखा। उन लोगों को देखकर वे अत्यन्त दया से युक्त हो उन सबों के दुःख से दुःखित होते हुये रोगों से निवृत्त होने का उपाय सोचने लगे। इस भाँति सोच-विचार कर स्वयं शेष भगवान् इसी भूलोक में वेद और वेद के व्याकरणादि छः अङ्गों के जाननेवाले 'विशुद्ध' नामक प्रसिद्ध मुनि के पुत्र हुए ।।५७-६१।। यतश्चर इवायातो न ज्ञातः केनचिद्यतः । तस्माच्चरकनाम्नाऽसौ ख्यातश्च क्षितिमण्डले ।।६२।। स भाति चरकाचार्यो देवाक्षार्यो यथा दिवि । सहस्त्रवदनस्यांशो येन ध्वंसो रुजां कृतः ।।६३।। आत्रेयस्य मुनेः शिष्या अग्निवेशादयोऽभवन् । मुनयो बहवस्तैश्च कृतं तन्त्रं स्वकं स्वकम् ।।६४।। तेषां तन्त्राणि संस्कृत्य समाहृत्य विपश्चिता । चरकेणात्मनो नाम्ना ग्रन्थोऽयं चरकः कृतः ।।६५।। यतः शेष भगवान् चर की भाँति छिप कर आये और किसी ने उनको नहीं पहचाना। अतः वे 'चरक' नाम से भूमण्डल में विख्यात हुए जिन्होंने रोगों का नाश कर दिया वे शेषजी के अंश चरकाचार्य स्वर्ग में देवताओं के आचार्य बृहस्पति के समान संसार में सुशोभित हुए। पूर्वोक्त आत्रेय महर्षि के शिष्य अग्निवेशादि मुनिवरों ने अपने-अपने जिन- जिन तन्त्रों की रचना की थी उन सभी का प्रतिसंस्कार तथा सङ्ग्रह करके आचार्य चरक ने अपने नाम से 'चरक' ग्रन्थ बनाया ।।६२-६५।। अथ धन्वन्तरिप्रादुर्भावः- एकदा देवराजस्य दृष्टिनिपतिता भुवि । तत्र तेन नरा दृष्टा व्याधिभिर्भृशपीडिताः ।।६६।। तान्दृष्ट्वा हृदयं तस्य दयया परिपीडितम् । दयाऽऽर्द्रहृदयः शक्रो धन्वन्तरिमुवाच ह ।।६७।। धन्वन्तरे! सुरश्रेष्ठ! भगवन् ! किञ्चिदुच्यते । योग्यो भवसि भूतानामुपकारपरो भव ।।६८।। उपकाराय लोकानांकेन किं न कृतं पुरा । त्रैलोक्याधिपतिर्विष्णुरभून्मत्स्यादिरूपवान् ।।६९।। तस्मात्त्वं पृथिवीं याहि काशीमध्ये नृपो भव । प्रतीकाराय रोगाणामायुर्वेदं प्रकाशय ।।७०।। इत्युक्त्वा सुरशार्दूलाः सर्वभूतहितेप्सया । समस्तमायुषो वेदं धन्वन्तरिमुपादिशत् ।।७१।। धन्वन्तरि से आयुर्वेद की उत्पत्ति-एक समय देवताओं के राजा इन्द्र की दृष्टि भूलोक पर पड़ी तो उन्होंने मनुष्यों को रोगों से अत्यन्त पीड़ित देखा। यह देख उनका हृदय दया से अत्यन्त पीड़ा युक्त हो गया और उन्होंने धन्वन्तरि से कहा-हे देवताओं में श्रेष्ठ, भगवान् धन्वन्तरि ! मैं आप से कुछ कहता हूँ। क्योंकि उसके योग्य आप ही हैं। आप प्राणियों के उपकार करने में तत्पर हों। पहले समय में लोगों के उपकार के लिये किसने क्या नहीं किया, यहाँ तक कि त्रिलोकी के स्वामी विष्णु भगवान् ने भी (परोपकार के लिये) मछली आदि का रूप धारण किया था। इसलिये आप पृथ्वीतल पर जावें और काशीपुरी में वहाँ के राजा होवें एवं रोगों को दूर करने के लिये आयुर्वेद का प्रकाश करें। ऐसा कह कर देवताओं में श्रेष्ठ भगवान् इन्द्र ने सकल प्राणियों को कल्याण प्राप्त कराने की इच्छा से धन्वन्तरि को समस्त आयुर्वेद सिखा दिया ।।६६-७१।।
८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अधीत्य चायुषो वेदमिन्द्राद्धन्वन्तरिः पुरा। आगत्य पृथिवीं काश्यां जातो बाहुजवेश्मनि ।।७२।। नाम्ना तु सोऽभवत्ख्यातो दिवोदास इति क्षितौ। बाल एव विरक्तोऽभूच्चचार सुमहत्तपः ।।७३।। यत्नेन महता ब्रह्मा तं काश्यामकृन्नृपम्। ततो धन्वन्तरिलोकेः काशिराजोऽभिधीयते ।।७४।। हिताया देहिनां स्वीया संहिता विहिताऽमुना। अथ विद्यार्थिनो लोकान्संहितां तामपाठयत् ।।७५।। इस प्रकार इन्द्र भगवान् से आयुर्वेद का अध्ययन करके धन्वन्तरि पृथ्वीतल पर काशीपुरी में क्षत्रिय के घर में उत्पन्न हुये और 'दिवोदास' इस नाम से भूमण्डल में विख्यात हुये। वे लड़कपन से ही वैराग्य धारण कर बहुत बड़ा तप करने लगे। उसके बाद बड़े-बड़े यत्नों से (किसी भाँति) ब्रह्मा ने उन्हें काशीपुरी का राजा बनाया। उसी दिन से लोक धन्वन्तरि को काशी का राजा कहने लगे। इन्होंने प्राणियों के हित के लिये अपने नाम से धन्वन्तरि नामक संहिता बनाई और विद्यार्थी लोगों को वही संहिता पढ़ाई ॥७२-७५॥ अथ सुश्रुतप्रादुर्भावः- अथ ज्ञानदृशा विश्वामित्रप्रभृतयोऽविदन्। अयं धन्वन्तरिः काश्यां काशिराजोऽयमुच्यते ।।७६।। विश्वामित्रो मुनिस्तेषु पुत्रं सुश्रुतमुक्तवान्। वत्स ! वाराणसीं गच्छ त्वं विश्वेश्वरवल्लभाम् ।।७७।। तत्र नाम्ना दिवोदासः काशिराजोऽस्ति बाहुजः। स हि धन्वन्तरिः साक्षादायूर्वेदविदां वरः ।।७८।। आयुर्वेदं पठस्व त्वं लोकोपकृतिहेतवे। सर्वप्राणिदया तीर्थमुपकारो महामखः ।।७९।। पितुर्वचनमाकर्ण्य सुश्रुतः काशिकां गतः। तेन सार्द्धं समध्येतुं मुनिसूनुशतं ययौ ।।८०।। सुश्रुत से आयुर्वेद की उत्पत्ति-जब विश्वामित्र आदि ऋषियों ने अपनी-अपनी ज्ञानदृष्टि से देखा कि ये तो साक्षात् धन्वन्तरि हैं और ये काशीपुरा में 'काशिराज' नाम से कहे जाते हैं। तब विश्वामित्र ने सुश्रुत नामक पुत्र से कहा-हे वत्स ! तुम विश्वनाथजी की प्यारी वाराणसी (बनारस) जाओ। वहाँ पर 'दिवोदास' नाम से प्रसिद्ध जो क्षत्रिय काशी के राजा हैं, वे आयुर्वेद के जाननेवालों में श्रेष्ठ साक्षात् धन्वन्तरि हैं। अतः लोगों के उपकार के निमित्त तुम (उनसे) आयुर्वेद पढ़ो। क्योंकि सम्पूर्ण प्राणियों पर दया रखना ही तीर्थ है और उपकार करना ही बहुत भारी यज्ञ है। इस भाँति पिता का वचन सुन कर 'सुश्रुत' और उनके साथ पढ़ने के लिए और भी मुनियों के १०० पुत्र काशी गये ॥७६-८०॥ अथ धन्वन्तरिं सर्वे वानप्रस्थाश्रमे स्थितम्। भगवन्तं सुरश्रेष्ठं मुनिभिर्बहुभिः स्तुतम् ।।८१।। काशिराजं दिवोदासं तेऽपश्यन्विनयान्विताः। स्वागतं च तदा चाह दिवोदासो यशोधनः ।।८२।। कुशलं परिपप्रच्छ तथाऽऽगमनकारणम्। ततस्ते सुश्रुतद्वारा कथयामासुरुत्तरम् ।।८३।। भगवन्मानवाद्दृष्ट्वाव्याधिभिः परिपीडितान्। क्रन्दतो म्रियमाणांश्च जाताऽस्माकं हृदिव्यथा ।।८४।। आमयानां शमोपायं विज्ञातुं वयमागताः। आयुर्वेदं भवानस्मानध्यापयतु यत्नतः ।।८५।। (काशी में) विनय से युक्त होते हुए उन सबों ने जिनकी स्तुति बहुत से मुनि लोग कर रहे थे, ऐसे देवताओं में श्रेष्ठ भगवान् धन्वन्तरि को वानप्रस्थाश्रम में स्थित काशिराज दिवोदास के रूप में वर्त्तमान देखा। यशोधन (यश को ही धन मानने वाले) राजा दिवोदास ने उन सबों का स्वागत किया और कुशल तथा आने का कारण भी पूछा। उसके बाद उन सब मुनि के पुत्रों ने सुश्रुत के द्वारा उत्तर के रूप में यह कहा कि—हे भगवन् ! रोगों से अत्यन्त पीड़ित अतएव क्रन्दन करते तथा मृत्यु को प्राप्त होते हुए मनुष्यों को देख कर हम लोगों के हृदय में व्यथा उत्पन्न हुई और उन लोगों के रोगों के शान्त होने का उपाय जानने के लिये हम सब यहाँ आये हैं। अतः आप यत्नपूर्वक हम लोगों को आयुर्वेद का अध्ययन करावें ॥८१-८५॥
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अथ प्रथमप्रवक्तृप्रादुर्भावप्रकरणम् ९
अङ्गीकृत्य वचस्तेषां नृपतिस्तानूपादिशत्... -> `नृपतिस्तानुपादिशत् । व्याख्यातं तेनं ते यत्नाज्जगृहुर्मुनयो मुदा ।।८६।।`
काशिराजं जयाशीर्भिरभिनन्द्य मुदाऽन्विताः । सुश्रुताद्याः सुसिद्धार्था जग्मुर्गेहं स्वकं स्वकम् ।।८७।।
प्रथमं सुश्रुतस्तेषु स्वतन्त्रं कृतवान्स्फुटम् । सुश्रुतस्य सखायोऽपि पृथक्तन्त्राणि तेनिरे ।।८८।।
सुश्रुतेन कृतं तन्त्रं सुश्रुतं बहुभिर्यतः । तस्मात्तत्सुश्रुतं नाम्ना विख्यातं क्षितिमण्डले ।।८९।।
इति भावप्रकाशे पूर्वखण्डे आयुर्वेदप्रवक्तृप्रादुर्भावप्रकरणं समाप्तम् ।।१।।
उन लोगों की बात मान कर राजा दिव
अथ द्वितीयसृष्टिप्रकरणम् आयुर्वेदाब्धिमध्यादतिमतिमुनयो योगरत्नानि यत्नाल्लब्ध्वा स्वे स्वे निबन्धे दधुरखिलजनव्याधिविध्वंसनाय । तत्तद्ग्रन्थाद् गृहीतैः सुवचनमणिभिर्भावमिश्रश्चिकित्साशास्त्रे जाड्यान्धकारं प्रशमयितुमिमं संविधत्ते प्रकाशम् ।। १ ।। अत्यन्त बुद्धिमान् मुनियों ने सब लोगों का रोग दूर करने के लिये आयुर्वेदरूपी समुद्र के मध्य से औषधों के योगरूपों रत्नों का यत्नपूर्वक लाभ (निकाल) कर उन्हें अपने बनाये हुये जिन-जिन निबन्धों (ग्रन्थों) में रखा था, ‘भावमिश्र’ चिकित्साशास्त्रविषयक जड़तारूप अन्धकार को दूर करने के लिये उन्हीं ग्रन्थों से सङ्ग्रह किये गये सुन्दर वचनरूपी मणियों के द्वारा प्रकाश अर्थात् भावप्रकाश नामक ग्रन्थ रच रहे हैं ।। १ ।। श्रीपतिपदप्रसादादाशीर्भिर्भूमिदेवानाम् । भावप्रकाशनाम्ना ग्रन्थोऽयं पठ्यतां सर्वैः ।। २ ।। लक्ष्मी के पति भगवान् विष्णु के चरणों के प्रसाद से और पृथ्वी के देवता तथा ब्राह्मणों के आशीर्वाद से सब लोग इस ‘भावप्रकाश’ नामक ग्रन्थ को पढ़ें ।। २ ।। एतस्य निबन्धस्य फलं चिकित्सा, चिकित्सा च पुरुषस्य, पुरुषस्तु चतुर्विंशतितत्त्वजीवात्मसमवायस्तस्माच्चतुर्विंशतितत्त्वानां जीवात्मनश्च स्वरूपनिरूपणाय सृष्टिक्रममाह— आत्मा ज्योतिश्चिदानन्दरूपो नित्यश्च निःस्पृहः । निर्गुणः प्रकृतेर्योगात्सगुणः कुरुते जगत् ।। ३ ।। इस निबन्ध (ग्रन्थ) के बनाने का मुख्य फल चिकित्सा है। वह चिकित्सा पुरुष की होती है और वह पुरुष चौबीस तत्त्व तथा जीवात्मा के समवाय अर्थात् समूह से रचा हुआ कहलाता है। अतएव उन तत्त्वों का तथा जीवात्मा के स्वरूप का निरूपण करने के लिये सृष्टि का क्रम कहते हैं—आत्मा—ज्योतिःस्वरूप, चिदानन्दरूप, नित्य, निःस्पृह और निर्गुण होता हुआ भी प्रकृति से युक्त होने से सगुण होकर जगत् को उत्पन्न करता है ।। ३ ।। सगुणः=इच्छाऽऽदियुक्तः ।। ३ ।। ‘सगुणः’ इस पद से ‘इच्छा आदि गुणों से युक्त’ यह अर्थ समझना चाहिये ।। ३ ।। सत्त्वं रजस्तमश्चेति गुणास्ते प्रकृतिः समाः । सा जडाऽपि जगत्कर्त्री परमात्मचिदव्ययात् ।। ४ ।। सत्त्व, रज और तम ये तीन गुण प्रकृति में समान भाव से रहते हैं अर्थात् सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणों की साम्यावस्था ही प्रकृति कही जाती है और वह प्रकृति स्वयं जड़ होती हुई भी चैतन्यरूप अव्यय परमात्मा के आश्रय से जगत् का निर्माण करनेवाली हो जाती है अर्थात् प्रकृति और पुरुष इन दोनों के योग से ही सृष्टि-कार्य सम्पन्न होता है। केवल प्रकृति या पुरुष से सृष्टि नहीं हो सकती। क्योंकि पुरुष चैतन्यस्वरूप होते हुए भी स्वयं निर्गुण होने से तथा प्रकृति सगुण होती हुई भी स्वयं जड़ होने से पृथक्-पृथक् जगत् के निर्माण करने में समर्थ नहीं हैं ।। ४ ।। सतः साधोर्भावः सत्त्वं=प्रकाशकं ज्ञानसुखहेतुः, रजो=रागात्माकं दुःखहेतुः, ताम्यति ग्लानिं प्राप्नोत्यनेनेति तमः=आवरकं मोहहेतुः, ते गुणा समाः प्रकृतिरित्यर्थः । तथा सति न्यूनाधिकगुणा विकृतिः ।। ४ ।। सत् के भाव को सत्त्व कहते हैं। अतः सत्त्व गुण प्रकाश स्वभाववाला तथा ज्ञान का प्रकाशक है और ज्ञान तथा सुख का कारण भी है, अर्थात्-सत्त्व गुण के प्राधान्य में ज्ञान तथा सुख होते हैं। रज जो है, वह रागात्मक है और दुःख का कारण है। जिससे मनुष्य को ग्लानि हो, वह तमोगुण कहलाता है, अत एव तमोगुण बुद्धि का आच्छादन करनेवाला और मोह का मुख्य कारण है। समभाव को प्राप्त हुये वे तीनों गुण प्रकृति कहलाते हैं। ऐसा होने पर जब वे ही तीनों गुण न्यूनाधिक भाव को प्राप्त होते हैं, तब विकृति कहलाते हैं ।। ४ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ द्वितीयसृष्टिप्रकरणम् ११ अथ सुश्रुतमुपदिशन् धन्वन्तरिः प्रकृतेः स्वरूपविशेषमाह 'सर्वभूतानां कारणमकारणं सत्त्वरजस्तमोलक्षणमष्टरूपमखिलस्य जगतः सम्भवहेतुरव्यक्तंनामे'ति ।।क।। प्रकृति के स्वरूपविशेष—जो प्रकृति सब भूतों (पृथ्वी, जल, तेज, वायु आदिकों) का कारण हैं और स्वयं कारण से रहित है तथा जो सत्त्व, रज और तमोगुणस्वरूपिणी एवं आठ रूपवाली तथा सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति का कारण है उसे अव्यक्त कहते हैं और उसी को मूलप्रकृति भी कहते हैं ।।क।। ❖ अस्यायमर्थः-अव्यक्तं=न व्यज्यते स्मेत्यव्यक्तं मूलप्रकृत्यपरपर्यायम्, ततः सर्वभूतानां कारणं= समवायिकारणम्, अकारणं=न विद्यते कारणं यस्य तत्, सत्त्वरजस्तमोलक्षणं=सम-सत्त्वरजस्तमःस्वरूपम्, अष्टरूपम्=अव्यक्तं महान् अहङ्कारः पञ्चतन्मात्राणीत्यष्टौ रूपाणि यस्य तत्, यत इन्द्रियाणां महाभूतानां च कारणतया महदादयोऽपि सप्त प्रकृतयः, एवमखिलस्य जगतः सम्भवहेतुरव्यक्तमित्युपसंहारः ।।क।। उपर्युक्त 'अव्यक्त' का अर्थ यह है कि जो किसी से व्यक्त (प्रत्यक्ष योग्य) न हो । अव्यक्त का दूसरा नाम मूलप्रकृति भी है। मूलप्रकृति सब भूतों का समवायिकारण है। (जैसे वस्त्र का समवायिकारण सूत्र होता है) किन्तु मूलप्रकृति का कोई कारण नहीं है। वह साम्यावस्थाको प्राप्त हुए सत्त्वा दिक तीन गुणवाली अव्यक्त-महान्-अहङ्कार और पाँच तन्मात्र ये आठ रूपवाली है। इस जगह यह शङ्का होती है कि अव्यक्त ही प्रकृति है और महान्-अहङ्कार और पाँच तन्मात्र ये सात अव्यक्त ही के विकार हैं। अतएव ये सब उसकी विकृति हुई । तब फिर किस तरह से सात महदादि प्रकृति के रूप कहे जा सकते हैं। इसका उत्तर यह है कि यद्यपि महदादि सात विकृति हैं तथापि वे इन्द्रिय और पाँच महाभूतों (पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश) के कारण हैं। अतएव उन सबों की भी प्रकृति के रूप में गणना करते हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति का कारण मूलप्रकृति (अव्यक्त) है । इस प्रकार यहाँ पर यह उपसंहार हुआ ।।क।। अथ प्रकृतिपुरुषयोः साधर्म्यमाह- 'उभावप्यनादी उभावप्यनन्तौ उभावप्यलिङ्गो उभावपि नित्यौ उभावप्यपरौ उभावपि सर्वगतौ' इति ।।ख।। प्रकृति-पुरुष के परस्पर समान धर्म—प्रकृति और पुरुष दोनों ही अनादि, दोनों ही अनन्त, दोनों ही अलिङ्ग हैं। दोनों ही नित्य, दोनों ही अपर और दोनों ही सर्वगत अर्थात् सर्वत्र विद्यमान हैं ।।ख।। ❖उभावप्यलिङ्गौ=लयं क्वचिदपि न यात:, उभावप्यपरौ=न विद्यते परोऽपरो याभ्यां तावपरौ ।।ख।। दोनों ही अलिङ्ग अर्थात् कभी किसी कारण में लय (नाश) को नहीं प्राप्त होनेवाले, हैं दोनों ही अपर हैं अर्थात् इन दोनों से परे और दूसरा कोई नहीं है ।।ख।। अथातस्तयोर्वैधर्म्यमाह- 'एका तु प्रकृतिरचेतना त्रिगुणा बीजधर्मिणी प्रसवधर्मिण्यमध्यस्थधर्मिणी चे'ति ।।ग।। प्रकृति-पुरुष के परस्पर विभिन्न धर्म—प्रकृति तो एक, अचेतना (चेतना से रहित), तीन गुणों वाली, बीजधर्मवाली, प्रसवधर्मवाली और अमध्यस्थ धर्मवाली है ।।ग।। ❖ अचेतना=जडा, त्रिगुणा=तुल्यगुणत्रयात्मिका, बीजधर्मिणी=सर्वेषां महदादीनां विकाराणां बीजत्वेनावस्थिता, प्रसवधर्मिणी=पुरुषेणाक्रान्ता क्षोभं प्राप्य साम्यमतिक्रम्य महदहङ्कारादिक्रमेण जगतः प्रसवित्री, अमध्यस्थधर्मिणी=सुखदुःखभोगभोगिनी, न तु सुखदुःखभोगादुदासीना ।।ग।। अचेतना अर्थात् जड़, तीन गुणोंवाली अर्थात् समान भाव को प्राप्त हुए तीन गुणोंवाली, बीजधर्मवाली अर्थात् सम्पूर्ण महत्तत्वादिक सात विकारों के बीजरूप से स्थित, प्रसवधर्मवाली अर्थात् पुरुष से आक्रान्त होती हुई (जब पुरुष
१२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे द्रष्टा और भोक्ता होता है, उस समय) क्षोभ को प्राप्त होकर और गुणों से समभाव को छोड़ कर महत्तत्त्व से अहङ्कार और अहङ्कार से पाँच तन्मात्र इत्यादि क्रम से जगत् को उत्पन्न करनेवाली, अमध्यस्थ धर्मवाली अर्थात् सुख-दुःख के भोगों को भोगनेवाली न कि सुख-दुःख के भोग से उदासीन रहनेवाली है ॥ग॥ 'पुरुषस्तु चेतनावान् निर्गुणोऽप्रसवधर्माऽबीजधर्मा मध्यस्थधर्मा चे'ति ।।घ।। पुरुष तो (अनेक) चेतनावाला, निर्गुण, अप्रसवधर्म, अबीजधर्म तथा मध्यस्थ धर्म से युक्त है ॥घ॥ ❖ निर्गुणः=अविद्यमानसत्त्वादिगुणः, अबीजधर्मा=महाप्रलये महदादीनां विकाराणां प्रकृताविव तस्मिन्ननवस्थानाद्, मध्यस्थधर्मा=सुखदुःखेच्छाद्वेषादिभ्य उदासीनः ।।घ।। निर्गुण अर्थात् जिसमें सत्त्व, रज और तम इनमें से कोई भी गुण वर्त्तमान न हो, अबीजधर्मा अर्थात् महाप्रलय होने पर महत्तत्त्वादिक विकार जिस तरह प्रकृति में रहते हैं, उस तरह पुरुष में न रहने से पुरुष प्रकृति की भाँति बीजधर्मवाला नहीं है। वह तो मध्यस्थधर्मा अर्थात् सुख-दुःख इच्छा द्वेषादिक से उदासीन रहनेवाला है ॥घ॥ अथ प्रकृतेर्नामान्याह- प्रधानं प्रकृतिः शक्तिर्नित्या चाविकृतिस्तथा। एतानि तस्या नामानि पुरुषं या समाश्रिता ।।५।। प्रकृति के नाम—जो प्रकृति पुरुष का भली प्रकार आश्रय लिये हुई है, उसके प्रधान प्रकृति, शक्ति, नित्या और अविकृति ये नाम हैं ॥५॥ अथ प्रकृतेर्गुणानाह- सत्त्वं रजस्तमस्त्रीणि विज्ञेयाः प्रकृतेर्गुणाः। तैश्च युक्तस्य चित्तस्य कथयाभ्यखिलान् गुणान् ।।६।। प्रकृति के गुण—सत्त्व, रज और तम. ये तीनों प्रकृति के गुण हैं। इनसे युक्त चित्त (मन) के सम्पूर्ण गुणों को आगे कहते हैं ॥६॥ अथ सत्त्वगुणयुक्तस्य मनसो लक्षणमाह- आस्तिक्यं प्रविभज्य भोजनमनुत्तापश्च तथ्यं वचोमेधाबुद्धिधृतिक्षमाश्च करुणा ज्ञानं च निर्दम्भता। कर्मानिन्दितमस्पृहं च विनयो धर्मः सदैवादरादेते सत्त्वगुणान्वितस्य मनसो गीता गुणा ज्ञानिभिः ।।७।। सत्त्वगुण से युक्त मन के लक्षण—आस्तिकपन, भक्ष्याभक्ष्य का विचार कर भोजन करना, उत्ताप न करना, सत्य बात बोलना, मेधा, अर्थात् सुनी हुई बात को धारण करने की शक्ति रखनेवाली बुद्धि, धृति, क्षमा, करुणा, ज्ञान, निर्दम्भता, अनिन्दित (लोक-शास्त्र से जो निन्दित न हो) तथा स्पृहा से रहित कर्म, विनय और धर्म इन सब सत्त्वगुणों से युक्त मन के गुणों का ज्ञानियों ने सदैव आदर से वर्णन किया है ॥७॥ ❖ अस्ति धर्ममोक्षपरलोकादिकमिति बुद्ध्या चरतीत्यास्तिकस्तस्य भाव आस्तिक्यम्, अनुत्तापः=अक्रोधः, धृतिः=भूतप्रेतस्मरक्रोधलोभाद्यावेशराहित्यम्, ज्ञानम्=आत्मज्ञानम्, निर्दम्भता=कपटाभावः, कर्म-अनिन्दितम्, अस्पृहम्=निष्कामं च ।।७।। धर्म, मुक्ति और परलोक (स्वर्गादिक) ये सब यथार्थ में हैं, इस बुद्धि से इनकी प्राप्ति के लिये जो कर्म करते हैं, वे आस्तिक कहलाते हैं और उनके भाव को आस्तिक्य (आस्तिकपन) कहते हैं। अनुत्ताप अर्थात् क्रोध से रहित होना, धृति अर्थात् भूत, प्रेत, काम, क्रोध और लोभादिकों के आवेश से बचकर रहना, ज्ञान अर्थात् आत्मज्ञान, निर्दम्भता अर्थात् कपट न रखना, अनिन्दित और अस्पृह, अर्थात् कामना से रहित कर्म ॥७॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ द्वितीयसृष्टिप्रकरणम् १३ अथ रजोगुणयुक्तस्य मनसो लक्षणमाह- क्रोधस्ताडनशीलता च बहुलं दुःखं सुखेच्छाऽधिका दम्भः कामुकताऽप्यलीकवचनं चाधीरताऽहङ्कृतिः । ऐश्वर्यादभिमानिताऽतिशयितानन्दोऽधिकश्चाटनं प्रख्याता हि रजोगुणेन सहितस्यैते गुणाश्चेतसः ॥१८॥ रजोगुण से युक्त मन के लक्षण—क्रोध करना, मारने-पीटने का स्वभाव रखना, बहुत दुःख करना, सुख की इच्छा अधिक रखना, दाम्भिक तथा कामी होना, झूठ बोलना, धैर्य न रखना, अहङ्कार करना, ऐश्वर्य होने से अभिमान करना, अधिक आनन्द मानना और पृथ्वी में अधिक परिभ्रमण करना, ये सब रजोगुण से युक्त मन के गुण (लक्षण) प्रसिद्ध हैं ॥१८॥ ❖ अलीकवचनं=मिथ्याकथनम्, अटनं=पृथ्वीपरिभ्रमणम् ।।८।। 'अलीकवचन' का 'झूठ बोलना' तथा 'अटन' का पृथ्वी में परिभ्रमण करना है ॥८॥ अथ तमोगुणयुक्तस्य मनसो लक्षणमाह- नास्तिक्यं सुविषण्णताऽतिशयितालस्यं च दुष्टा मतिः प्रीतिर्निन्दितकर्मशर्मणि सदा निद्रालुताऽहर्निशम् । अज्ञानं किल सर्वतोऽपि सततं क्रोधान्धता मूढता प्रख्याता हि तमोगुणेन सहितस्यैते गुणाश्चेतसः ॥१९॥ तमोगुण से युक्त मन के लक्षण—नास्तिकपन रखना, अत्यन्त खेद से युक्त रहना, अत्यन्त आलस्य रखना, दुष्ट बुद्धि का होना, निन्दित कर्म करने से उत्पन्न सुखों में निरन्तर प्रीति रखना, दिनरात सोना, सभी विषयों में अज्ञान रहना, सदैव क्रोध से अन्धा रहना और मूर्खता करना, ये तमोगुण से युक्त मन के (लक्षण) हैं ॥१९॥ तत्र प्रभूतसत्त्वस्तु सात्त्विकः पुरुषः स्मृतः । राजसस्तामसश्चैव त्रिविधस्तेन मानवः ॥१२०॥ उसमें अधिक सत्त्वगुणवाला पुरुष सात्त्विकी, अधिक रजोगुणवाला राजसी और अधिक तमोगुणवाला तामसी प्रकृति का मनुष्य कहलाता है। इस तरह तीन प्रकार के मनुष्य विश्व में होते हैं ॥१२०॥ अथ महत्तत्त्वोत्पत्तिमाह- ततोऽभवन्महत्तत्त्वं बुद्धितत्त्वापराभिधम् । त्रिगुणं सत्त्वबहुलं निर्मलं स्फटिकोपभम्। चिच्छायाप्राप्तचैतन्यं तदिच्छामयमीरितम् ॥१२१॥ महत्तत्त्व की उत्पत्ति—उस (समसत्त्व रजस्तमः स्वरूपिण प्रकृति) से महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ है उसका दूसरा नाम 'बुद्धितत्त्व' भी है। महत्तत्त्व यद्यपि त्रिगुणात्मक (तीन गुणोंवाला) है, तथापि वह अधिक सत्त्वगुणवाला है अर्थात् उसमें और गुणों की अपेक्षा सत्त्वगुण अधिक है और वह स्फटिक के समान निर्मल है। ऋषियों ने उसे चित् (आत्मतत्त्व) का प्रतिबिम्ब पड़ने से चेतना को प्राप्त किया हुआ अत एव परमात्मा का इच्छामय कहा है ॥१२१॥ ❖ ततः प्रकृते स्त्रिगुणं=त्रयो गुणा यत्र तत्, तच्च सत्त्वबहुलम्, अत्रायमभिप्रायः-यथा निश्चले ह्रदादौ बहुद्रव्यपातात् तदीयं जलं वर्द्धते तथा चिद्रूपपुरुषेणाक्रमणात् तुल्यगुणत्रयात्मिकायाः प्रकृतेर्ज्ञानहेतुः प्रकाशकः सत्त्वगुणो वृद्धः प्रवृद्धसत्त्वतः प्रकृतेः सत्त्वबहुलं बुद्धितत्त्वमभवत् ॥१२१॥ उससे अर्थात् प्रकृति से त्रिगुण अर्थात् जिसमें सत्त्व, रज और तम, ये ३ गुण विद्यमान हों उसे त्रिगुण कहते हैं, और वह त्रिगुण कैसा हो कि 'सत्त्वबहुल' अर्थात् सत्त्वादि ३ गुणों के मध्य में सत्त्वगुण ही जिसमें अधिक मात्रा से विद्यमान हो, वह सत्त्वबहुल कहलाता है। त्रिगुण और सत्त्व बहुल इन दोनों विशेषणों को यहाँ पर देने का अभिप्राय यह है कि— जैसे निश्चल (स्थिर) जल-वाले तालाब आदि में बहुत से द्रव्य प्रस्तरादि गिर जाने से उसका जल बढ़ जाता है, उसी तरह चैतन्यरूप पुरुष के आक्रमण करने से अर्थात् आत्मतत्त्व के द्रष्टा और भोक्ता होने से तुल्यगुणत्रयात्मिका प्रकृति का कारणरूप जो प्रकाशक सत्त्वगुण है, वह वृद्धि को प्राप्त हुआ। फिर सत्त्वगुण की वृद्धि होने से प्रकृति से अधिक सत्त्वगुणवाला बुद्धितत्त्व (महत्तत्त्व) उत्पन्न हुआ ॥१२१॥