भारतकोश
संग्रह पर लौटें

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

९४८ भावप्रकाशनिघण्टुः

नन्दिवृक्षः -अश्वत्थभेदः (अधोमुखपत्रशाखी 'वेलिया पीपर' इति लोके), तूणिश्च । ८१. नन्दिवृक्ष-पीपलभेद (अधोमुख पत्ते तथा शाखाओं वाला 'बेलिया पीपर' इस नाम से लोकप्रसिद्ध वृक्ष) और तून । पयः -क्षीरम्, उदकञ्च । ८२. पयः-दूध और जल । रुहा -दूर्वा, मांसरोहिणी १ च । ८३. रुहा-दूब और मांसरोहिणी । सिंही-बृहती, वासा च । ८४. सिंही-बड़ी कटेरी और अडूसा । कतकम्-विड्लवणम् २, निर्मलीफलं च । ८५. कतक-विरियाँ सञ्चर नोन और निर्मली का फल । कण्टकाढ्या-कुब्जकः, शाल्मली च । ८६. कण्टकाढ्या-कूजा और सेमर । यक्षधूपः -सरलनिर्यासः, ३ रालश्च । ८७. यक्षधूप-गन्धाविरोजा और राल । द्राविडी-शटी, सूक्ष्मैला च । ८८. द्राविडी-कचूर और छोटी इलायची । हट्टविलासिनी -हरिद्रा, नखी च । ८९. हट्टविलासिनी-हरदी और नखी । तिलपर्णम् ४ -रक्तचन्दनम्, ग्रन्थिपर्णं च । ९०. तिलपर्ण-लालचन्दन और गठिवन । मधुरः-जीवकः जीवनीयगणश्च । ९१. मधुर-जीवक और जीवनीय गण । लोहद्रावणी ५ -गण्डदूर्वा अम्लवेतसश्च ।

९२. लोहद्रावणी-गाँडरदूब और अमलबेंत । नागिनी-ताम्बूली, नागपुष्पी च । ९३. नागिनी-पान और नागपुष्पी । मृदुरेचनी-त्रिवृत् ६, मार्कण्डिका च । ९४. मृदुरेचनी-निसोत और सनाय । नटः-श्योनाकः, अशोकश्च । ९५. नट-सोनापाठा और अशोक । वनस्पतिः -वटः, नन्दिवृक्षश्च । ९६. वनस्पति-बरगद और बेलियापीपर । मन्दारः -श्वेतार्कः, महानिम्बश्च । ७ ९७. मन्दार-सफेद आक और बकायन । अम्बुजः-कमलम् ८, इज्जलश्च । ९८. अम्बुज-कमल और इज्जल (समुद्र-फल) । कबरी -बर्बरी ९, हिङ्गुपत्री च । ९९. कबरी-बर्बरी (वनतुलसी और हींगपत्री) । कुमारी -घृतकुमारिका, शतपत्री १० च । १००. कुमारी-घीकुवार और गुलाब । वरतिक्तकः-पाठा, पर्पटश्च । १०१. वरतिक्तक-पाठी और पित्तपापड़ा । चित्रकः -एरण्डः, ११ अनलनामा च । १०२. चित्रक-एरण्ड और चिता । यज्ञियः-खदिरः, पलाशश्च । १०३. यज्ञिय-खैर और पलाश । रक्तबीजः -अरिष्टकः, कन्दुंरी १२ च । १०४. रक्तबीज-रीठा और कन्दुंरी । क्षारश्रेष्ठः -पलाशः, मोक्षकश्च । १०५. क्षारश्रेष्ठः-पलाश और मोखा ।


१. मांसरोहिणी का पर्याय अतिरुहा आया है न कि केवल रुहा । ध. नि. में रुहा है । २. विडलवण का पर्याय कृतक है न कि कतक । ३. भा. प्र. में सरलनिर्यास के लिये वृक्षधूप आया है न कि यक्षधूप । ४. मूल में तैलपर्णकम् यह ग्रन्थिपर्ण के लिये पर्याय आया है । ५. गण्डदूर्वा का पर्याय लोहदद्राविणी आया है एवं अम्लवेतस के लिये यह पर्याय नहीं है । ६. त्रिवृत् का रेचनी पर्याय आया है न कि मृदुरेचनी । ७. महानिम्ब के लिये मन्दार पर्याय नहीं है । भा. प्र. में पारिभद्र के पर्याय में भण्डार लिखा हैं । ८. कमल के लिये अंबुज पर्याय अन्य निघण्टुओं में है । ९. बर्बरी के पर्याय में कबरी नहीं मिलता । १०. शतपत्री का पर्याय महाकुमारी आया है न कि कुमारी । ११. एरण्ड का पर्याय चित्रः दिया हुआ है । १२. कन्दुंरी नाम सन्दिग्ध है । रक्तबीज यह अनार का पर्याय अन्य निघण्टु में है । अनार का रक्तपुष्प पर्याय अन्य निघण्टुओं में मिलता है ।

यहाँ पृष्ठ का पूर्ण एवं शुद्ध लिप्यन्तरण (transcription) प्रस्तुत है:

अनेकार्थनामवर्गः १४१ श्वेतपुष्पः-श्वेतार्कः, इन्द्रवारुणी च। १०६. श्वेतपुष्प-सफेद आक और इन्द्रायण। तुवरी-सौराष्ट्री, आढकी च। १०७. तुवरी-सोरठी माटी और अरहर। कुम्भिका-कट्फलः, वारिपर्णी च। १०८. कुम्भिका-कायफल और जलकुम्भी। राजपुत्रिका-रेणुका, जाती च। १०९. राजपुत्रिका-रेणुका और जाई (चमेली)। रक्तपुष्पः-रक्तार्कः, कन्दुंरी१ च। ११०. रक्तपुष्प-लाल आक और कन्दुरी। सप्तला-शातला, वासन्ती च। १११. सप्तला-शातला और नेवारी। विषमुष्टिकः-महानिम्बः विषतिन्दुकश्च। १ ११२. विषमुष्टिक-बकायन और कुचला। [L16

९५० भावप्रकाशनिघण्टुः श्रीपर्णी-गम्भारी, गणिकारिका, कट्फलं च। १६. श्रीपर्णी-गम्भारि, अरनी और कायफर। अमृता-गुडूची, हरीतकी, धात्री च। १७. अमृता-गिलोय, हर्रा और आँवला। अनन्ता-दुरालभा, नीलदूर्वा, लाङ्गली च। १८. अनन्ता-धमासा, हरी दूब और कलिहारी। ऋष्यप्रोक्ता-अतिबला, महाशातावरी, कपि-कच्छुश्च। १९. ऋष्यप्रोक्ता-ककही, बड़ी शातावर और केवा च। कृष्णवृन्तः-पाढल, गम्भारी, माषपर्णी च। २०. कृष्णवृन्ता-पाटला, गम्भारी, माषपर्णी। जीवन्ती-गुडूची, शाकविशेषः, वन्द१ च। २१. जीवन्ती-गिलोय, जीवन्ती शाकविशेष और बन्दा। लता-सारिवा, प्रियङ्गु, ज्योतिष्मती च। २२. लता-अनन्तमूल (सारिवा), प्रियङ्गु और मालकांगुनी। समुद्रान्ता-दुरालभा, कार्पासी, स्पृक्का च। २३. समुद्रान्ता-धमासा, कपास और स्पृक्का। हैमवती-हरीतकी, श्वेतवचा, पीतदुग्धः सेहुण्डश्च२ (यस्य मूलं 'चोक' इति प्रसिद्धम्)। २४. हैमवती-हर्रा, सफेद वच और पीले दूध का सेहुंड, भड़भाड़ (इसके मूल को लोक में 'चोक' कहते हैं)। अव्यथा-हरीतकी, महाश्रावणी, पद्माचारिणी च। २५. अव्यथा-हर्रा, बड़ी मुण्डी और स्थल-कमल। २६. षड्ग्रन्था-गन्धकचरी, वच और करञ्जी। वरदा-सुवर्चला ('हुरहुर' इति लोके), अश्वगन्धा, वाराही ('गेठी'ति लोके)। २७. वरदा-हुरहुर, असगन्ध और वाराहीकंद ('गेंठी' नाम से लोकप्रसिद्ध)। इक्षुगन्धा-काशः, कोकिलाक्षा, क्षीरविदारी (गोक्षुरः) च। २८. इक्षुगन्धा-कास, तालमखाना और विदारी। (और इक्षुगन्धिका-गोखरू भी है)। कालस्कन्धः-तमालः तिन्दुकं कालखदिरश्च।३ २९. कालस्कन्ध-तमाल, तेन्दू और दुर्गन्ध-खैर। महौषधम्-शुण्ठी, रसोनरू, विषञ्च।४ ३०. महौषध-सोंठ, लहसुन और विष (वत्सनाभ)। मधु-क्षौद्रं, पुष्परसः, मद्यञ्च। ३१. मधु-शहद, फूल का रस और मद्य। कपीतनः-आम्रातकः, शिरीषः, गर्दभाण्डश्च। ३२. कपीतन-अम्बाडा, सिरस और पारस पीपल। मदनः-पिण्डीतकः, धत्तूरः, सिक्थकश्च। ३३. मदन-मैनफल, धतूर और मोम। शतपर्वा-वंशः, दूर्वा और वच। ३४. शतपर्वा-बाँस, दूब और वच। सहस्रवेधी५-अम्लवेतसः, मृगमदः, हिङ्गु च। ३५. सहस्रवेधी-अमलवेत, कस्तूरी और हींग। ताम्रपुष्पी-धातकी, पाटला, श्यामा त्रिवृच्च।६ ३६. ताम्रपुष्पी-धाय का फूल, पाढ़लभेद और काली निशोथ। सदापुष्पः-श्वेतार्कः, रक्तार्कः, ७कुन्दश्च। ३७. सदापुष्प-सफेद आक, लाल आक और कुन्द। सुरभिः-शल्लकी, मुरा, एलवालुकं८ च। ३८. सुरभिः-सालई, मुरा और एलवालुक। लक्ष्मीः-ऋद्धिः, वृद्धिः और शमी च। ३९ लक्ष्मी-ऋद्धि, वृद्धि और शमी। कालानुसार्यम्-कालीयकं, तगरं शैलेयञ्च। ४०. कालानुसार्य-पीला चन्दन (कलम्बक), तगर और भूरिछरीला। चाम्पेयः-चम्पकः नागकेसरः, पद्मकेसरश्च९। ४१. चाम्पेय-चंपा, नागकेशर और कमलका केसर। नादेयी-गणिकारिका, जलजम्बूः, जलवेतसञ्च। १. वन्दा का पर्याय जीवन्ती नहीं है यद्यपि जीवन्तीभेद, स्वर्ण जीवन्ती एक प्रकार का बांदा ही होता है। २. वास्तव में यह सेहुण्ड भेद नहीं है। ३. कालखदिर पर्याय भा. प्र. ने नहीं दिया है। इरिमेद (विट्खदिर) का पर्याय कालस्कन्ध दिया हुआ है। ४. ध. नि. में विष का पर्याय महौषध दिया है। ५. भा. प्र. में अम्लवेतस् के पर्याय शतवेधी एवं सहस्रनुत् हैं एवं कस्तूरी का पर्याय सहस्रभित् है। ६. रा. नि. ने श्यामाविशेष का ताम्रपुष्पिका पर्याय दिया है। ७. रक्तार्क के लिये सदापुष्प पर्याय नहीं दिया हुआ है। ८. भा. प्र. में एलवालुक का सुगन्धि पर्याय दिया है न कि सुरभिः। ९. रा. नि. ने पद्मकेसर का पर्याय चाम्पेयकं दिया है।

अनेकार्थनामवर्गः ९५९ ४२. नादेयी-अग्निमंथ, जलजामुन और जलवेतस । पाक्यम्-विडम्, सौवर्चलम्¹, यवक्षारश्च । ४३. पाक्य-बिरिया सञ्चर नमक, कालानोन और जवाखार । विशल्या-लाङ्गली, गुडूची लघुदन्ती च । ४४. विशल्या-कलिहारी, गिलोय और छोटीदंती । इन्द्रद्रुः-ककुभः देवदारुः,² कुटजश्च । ४५. इन्द्रद्रु-अर्जुन, देवदार और कुड़ा । काश्मीरं काश्मीरी च-कुङ्कुमम्, पुष्करमूलम्, गम्भारी च। ४६. काश्मीर और काश्मीरी-केशर, पुष्करमूल और गम्भारि । गुन्द्रः³-पटेरकः, मुञ्जः शरश्च । ४७. गुन्द्र-गोंदपटेर, मूँज और सरपत । गुन्द्रा-प्रियङ्गुः, गवेधुका⁴, भद्रमुस्तकञ्च । ४८. गुन्द्रा-प्रियङ्गु, गर हेडुओ और नागरमोथा । चुक्रम्-शुक्तम्, अम्लवेतसम्, वृक्षाम्लञ्च । ४९. चुक्र-चूक, अमलवेंत और कोकम । पारिभद्रः-निम्बः, पारिजातः, देवदारुश्च ।⁵ ५०. पारिभद्र-नीम, फरहद और देवदारु । पीतदारुः-हरिद्रा,⁶ देवदारुः⁷ सरलश्च ।⁸ ५१. पीतदारु-हरदी, देवदार और धूपसरल । वीरः-ककुभः, वीरणं, काकोली च । ५२. वीर-कोह, वीरण तृण और काकोली । वीरतरुः-ककुभः⁹, वीरणम्, शरश्च ।¹⁰ ५३. वीरतरु-कोह, वीरण तृण और सरपत । मयूरः-अपामार्गः, अजमोदा, तुत्थञ्च । ५४. मयूर-चिचिड़ा, अजमोद और तूतिया । रक्तसारः-रक्तचन्दनं, पुतङ्गः, खदिरश्च । ५५. रक्तसार-लालचन्दन, पतङ्ग और खैर । बदरा¹¹-सुवर्चला, अश्वगन्धा, वाराही च । ५६. बदरा-हरहुर, असगंध और बाराहीकंद । वशिरः-रक्तापामार्गः, गजपिप्पली, समुद्रलवणश्च । ५७. वशिर-लाल अपामार्ग, गजपीपर और समुद्री नोन । सौवीरम्-अञ्जनभेदः, वदरम्, सन्धानभेदश्च । ५८. सौवीर-सफेद सुरमा, बेर, कांजी का भेद । वञ्जुलः-अशोकः, वेतसः, तिनिशश्च । ५९. वञ्जुल-अशोक, वेतस और तिनिस । शिला-मनःशिला, शिलाजतु,¹² गैरिकञ्च¹³ । ६०. शिला-मैनसिल, शिलाजीत और गेरू । सोमवल्ली-वाकुची, गुडूची, ब्राह्मी च । ६१. सोमवल्ली-वाकुची, गिलोय और ब्राह्मी । अक्षीवः-शोभाञ्जनः, महानिम्बः,¹⁴ समुद्रलवणश्च । ६२. अक्षीव-सहिजन, वकायन और समुद्री नोन । कारवी-काकजाजी, शताह्वा अजमोदा च । ६३. कारवी-कलौंजी, सोआ और अजमोदा । धामार्गवः-रक्तापामार्गः, राजकोशातकी, महाकोशातकी च । ६४. धामार्गव-लाल अपामार्ग, तरोई और नेनुआ । दुःस्पर्शः-यवासः, कपिकच्छूः, कण्टकारी च । ६५. दुःस्पर्श-जवासा, कौंच और भटकटैया ।


१. सौवर्चल का पर्याय मन्थपाकं आया है न कि पाक्यम् । २. देवदारुः का पर्याय भा. प्र. ने इन्द्रदारु लिखा है । ३. मुंज एवं शर के लिये गुन्द्रः पर्याय नहीं दिखलाई देता । ४. गवेधुका का गुन्द्रा पर्याय नहीं मिलता किन्तु एरका का पर्याय गुन्द्रा है । ५. देवदारु का पर्याय पारिभद्र नहीं मिलता । ६. हरिद्रा का पर्याय पीतदारु नहीं है किन्तु दारुहरिद्रा का है । ७. देवदारु का पर्याय पीतदारु नहीं है । ८. सरल का पर्याय पीतवृक्ष दिया हुआ है । ९. ककुभ का पर्याय वीरवृक्ष है । वीरतरु अन्य वृक्ष है । १०. शर का पर्याय वीरतरु नहीं मिलता । ११. बदरा के स्थान पर वरदा अधिक उचित है क्योंकि अश्वगन्धा तथा वाराही का पर्याय वरदा है । १२. शिलाजतु का पर्याय शिलांज है । १३. गैरिक के पर्याय गैरेयं, गिरिजं हैं न कि शिला । १४. महानिम्ब का अक्षीर पर्याय अन्य निघण्टुओं में मिलता है, अक्षीव नहीं ।

९५२ भावप्रकाशनिघण्टुः [ बायाँ स्तम्भ ] पलाशः—किंशुकः, गन्धपलाशी,१ पत्रङ्गं२ । ६६. पलाश—पलाश, कपूरकचरी और तेजपात । कालमेषी—मञ्जिष्ठा, वाकुची, श्यामा त्रिवृच्च । ६७. कालमेषी—मञ्जीठ, वाकुची और काली निसोध । पलङ्कषा—गुग्गुलुः, गोक्षुरः, लाक्षा च । ६८. पलङ्कषा—गूगल, गोखरू और लाख । मधुरसा—द्राक्षा, मूर्वा, गम्भारी च । ६९. मधुरसा—दाख, मूर्वा और गंभारि । रसा—रास्ना, शाल्लकी, पाठा च । ७०. रसा—रास्ना, सलई और पाढ़ी । श्रेयसी—हरीतकी, रास्ना, गजपिप्पली च । ७१. श्रेयसी—हर्रा, रास्ना और गजपीपल । लोहम्—अयः, कांस्यम्३, अगुरु च । ७२. लोह—लोहा, कांसा और अगर । सहा—मुद्गपर्णी, बलाभेदः ('ककही' इति लोके), शतपत्री४ ('सेवती गुलाब' इति लोके) । ७३. सहा—मुगंवन, बरियारा का भेद (लोक प्रसिद्ध 'ककही') और सेवती गुलाब । सुवहा—रास्ना, नाकुली५, नीलपुष्पः सिन्दुवारश्च । ७४. सुवहा—रास्ना, नाकुली और नीले फूलकी मेउड़ी । कठिल्लकः—कारवेल्लः, रक्तपुनर्नवा, कृष्णबर्बरी च । [ दायाँ स्तम्भ ] ७५. कठिल्लक—करेला, लाल गदहपुर्ना और काली बर्बरी । मधूलिका—मूर्वा, यष्टी, जलमधूकश्च । ७६. मधूलिका—मूर्वा, मुलेठी और जल महुआ । वितुन्नकम्—धान्यकम्, तुत्थकम्, गोनर्दश्च । ७७. वितुन्नक—धनिया तूतिया और केवटी मोथा । देवी—स्पृक्का, मूर्वा, वन्ध्याकर्कोटी च । ७८. देवी—स्पृका, मूर्वा और बाँझ खेकसा । वसुकः—शिवमल्ल, श्वेतार्कः, रोमकं६ च । ७९. वसुक—बड़ी मौलसिरी, सफेद आक और सांभर नोन । गण्डीरः—शाकविशेषः, मञ्जिष्ठा, गण्ड दूर्वा च । ८०. गण्डीर—गण्डारी नामक शाकविशेष, मंजीठ और गांडर दू । लाङ्गली—कलिहारी, जलपिप्पली, नारिकेलश्च । ८१. पिच्छिला—कलिहारी, जलपीपल और नारियल । पिच्छिला—शिंशपा, शाल्मलिः, भूतवृक्षश्च । ८२. पिच्छिला—शीशम, सेमर और लिसोड़ा । महासहा—माषपर्णी, अम्लातकः, कुब्जकश्च । ८३. महासहा—माषपर्णी, बाणपुष्प और कूबजा । चन्द्रिका—मेथी, चन्द्रशूरः, श्वेतकण्टकारी च । ८४. चन्द्रिका—मेथी, चनसुर और सफेद भटकटैया । इति त्र्यर्थानि नामानि । अथ चतुर्थार्थकानि नामान्याह चार अर्थ वाले शब्द [ बायाँ स्तम्भ ] श्वेतपुष्पा—इन्द्रवारुणी, सिन्दुवारः, श्वेतार्कः, सैरेयकश्च । १ श्वेतपुष्पा—इन्द्रायण, मेउड़ी, सफेद आक और कटसरैया । [ दायाँ स्तम्भ ] कारवी—पृथ्वीका७, शतपुष्पा, कालाजाजी, अजमोदा च । २ कारवी—पृथ्वीका, शतपुष्पा, कलौंजी और अजमोदा ।

[ पाद-टिप्पणियाँ ] १. गन्धपलाशी का पर्याय पलाशी है न कि पलाशः । २. ध. नि. एवं रा. नि. ने पलाशी पर्याय तेजपत्र के लिये लिखा है । ३. ध. नि. एवं रा. नि. ने कांस्य का पर्याय लोह लिखा है । ४. शतपत्री का सहा पर्याय भा. प्र. रा. नि. एवं ध. नि. में नहीं है । ५. नाकुली का सुरसा पर्याय भा. प्र. में है, सुवहा नहीं । ६. रा. नि. एवं ध. नि. में रोमक के वसुकं, वसु पर्याय मिलते हैं । ७. पृथ्वीका का पर्याय कारवी नहीं मिलता । पृथ्वीका, बृहदेला तथा हिंगुपत्री दोनों का पर्याय है किन्तु इनके कारवी पर्याय न होने से यहाँ दोनों में से कोई नहीं हो सकता । ध. नि. में कारवी का एक अन्य पर्याय कटुहुञ्जी (ऋतुसविशेष) दिया है ।

अनेकार्थनामवर्गः ९५३ अम्बष्ठा—पाठा, चाङ्गेरी, माचिका, यूथिका च इति । ३ अम्बष्ठा—पाठी, चांगेरी, माचिका और जूही। इति चतुर्थार्थकानि नामानि । अथ बह्वर्थकानि नामान्याह बहुत अर्थवाले शब्द अक्षशब्दः स्मृतोऽष्टासु सौवर्चलबिभीतके। कर्षपद्माक्षरुद्राक्षशकटेन्द्रियपाशके ॥१॥ १. अक्ष—(१) काला नमक, (२) बहेड़ा, (३) कर्षनामक तौल (४) कमलगट्टा, (५) रुद्राक्ष, (६) गाड़ी, (७) इन्द्रिय और (८) पासा (जुआ खेलने का साधन) इन ८ अर्थों में अक्ष का प्रयोग होता है ॥१॥ काकाख्यः काकमाची च काकोली काकणन्तिका । काकजङ्घा काकनासा काकोदुम्बरिकाऽपि च॥ सप्तस्वर्थेषु कथितः काकशब्दो विचक्षणैः ॥२॥ २. काक—(१) कौवा, (२) मकोय, (३) काकोली, (४) लाल गुञ्जा, (५) काकजङ्घा, (६) काकनासा और (७) कठूमर इन सात अर्थों में काक शब्द का प्रयोग होता हैं।।२।। सर्पद्विरदमेषेषु सीसके नागकेसरे। नागवल्ल्यां नागदन्त्यां नागशब्दः प्रयुज्यते ॥३॥ ३. नाग—(१) साँप, (२) हाथी, (३) भेड़ा, (४) सीसा (धातु), (५) नागकेसर, (६) पान और (७) नागदन्ती (दन्तीभेद) इन ७ अर्थों में नाग शब्द का प्रयोग होता है ॥३॥ मांसद्रवे चेक्षुरसे पारदे मधुरादिषु । बोले¹ रागे विषे नीरे रसो नवसु वर्त्तते ॥४॥ ४ रसः—(१) मांस का रस, (२) द्रव पदार्थ, (३) ऊख का रस, (४) पारा, (५) मधुरादि ६ प्रकार के रस, (६) बोल, (७) राग (अनुराग), (८) विष और (९) जल इन ९ अर्थों में रस शब्द का प्रयोग होता है ॥४४॥ इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे अनेकार्थवर्गः समाप्तः । इति भावप्रकाशे पूर्वखण्डे प्रथमभागे द्रव्यगुणप्रकरणापरनामकं षष्ठं मिश्रप्रकरणं समाप्तम् ॥६॥ समाप्तश्चायं निघण्टुभागः । १. स्वादेति पाठा०।

CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

श्रीमद्भावमिश्रप्रणीतः भावप्रकाशः पूर्वखण्डे द्वितीयो भागः तत्र सप्तमं परिभाषादिप्रकरणम् ।।७।। अथ प्रथमं मानपरिभाषाप्रकरणम् ।।१।। तत्रादौ मानोक्तौ हेतुमाह- न मानेन विना युक्तिर्द्रव्याणां जायते क्वचित् । अतः प्रयोगकार्यार्थ मानमत्रोच्यते मया ।।१।। मानपरिभाषा प्रकरण आरम्भ करने के पूर्व मान (तौल) के विषय में कहने का प्रयोजन बिना मान (तौल) के द्रव्यों का किसी में योग नहीं किया जा सकता, अतः प्रयोग में काम करने के लिये यहाँ मैं (ग्रन्थकार) मान (तौल) को कहता हूँ ।।१।। अथ मागधमानमाह- चरकस्य मतं वैद्यैराद्यैर्यस्मान्मतं ततः । विहाय सर्वमानानि मागधं मानमुच्यते ।।२।। त्रसरेणुर्बुधैः प्रोक्तस्त्रिशता परमाणुभिः । त्रसरेणुस्तु पर्यायनाम्ना वंशी निगद्यते ।।३।। जालान्तरगतैः सूर्यकरैर्वंशी विलोक्यते । षड्वंशीभिर्मरीचिः स्यात्ताभिः षड्भिश्च राजिका ।। तिसृभी राजिकाभिश्च सर्षपः प्रोच्यते बुधैः । यवोऽष्टसर्षपैः प्रोक्तो गुञ्जा स्यात्तच्चतुष्टयम् ।।५।। षड्भिस्तु रक्तिकाभिः स्यान्माषको हेमधानकौ । माषैश्चतुर्भिःशाणः स्याद्धरणः स निगद्यते ।।६।। टङ्कः स एव कथितस्तद्वयं कोल उच्यते । क्षुद्रको वटकश्चैव द्रङ्क्षणः स निगद्यते ।।७।। कोलद्वयन्तु कर्षः स्यात्स प्रोक्तः पाणिमानिका । अक्षः पिचुः पाणितलं किञ्चित्पाणिश्च तिन्दुकम् ।। विडाल पदकं चैव तथा षोडशिका मता । करमध्यो हंसपदं सुवर्णं कवलग्रहः ।।९।। उदुम्बरञ्च पर्यायैः कर्षमेव निगद्यते । स्यात्कर्षाभ्यामर्द्धपलं शुक्तिरष्टमिका तथा ।।१०।। शुक्तिभ्याञ्च पलं ज्ञेयं मुष्टिराम्रंचतुर्थिका । प्रकुञ्चः षोडशी बिल्वं पलमेवात्र कीर्त्त्यते ।।११।। पलाभ्यां प्रसृतिर्ज्ञेया प्रसृतञ्च निगद्यते । प्रसृतिभ्यामञ्जलिः स्यात्कुडवोऽर्द्धशरावकः ।।१२।। अष्टमानञ्च स ज्ञेयः कुडवाभ्याञ्च मानिका । शरावोऽष्टपलं तद्वज्ज्ञेयमत्र विचक्षणैः ।।१३।। शरावाभ्यां भवेत्प्रस्थश्चतुःप्रस्थस्तथाऽऽढकः । भाजनं कांस्यपात्रं च चतुःषष्टिपलंश्च सः ।।१४।। चतुभिराढकैर्द्रोणः कलशो नल्वणोऽर्मणः । उन्मानञ्च घटो राशिर्द्रोणपर्यायसंज्ञितः ।।१५।। द्रोणाभ्यां शूर्पकुम्भौ च चतुःषष्टिशरावकः । शूर्पाभ्याञ्च भवेद् द्रोणी वाहो गोणी च सा स्मृता ।। द्रोणीचतुष्टयं खारी कथिता सूक्ष्मबुद्धिभिः । चतुःसहस्रपलिका षण्णवत्यधिका च सा ।।१७।। पलानां द्विसहस्रञ्च भार एकः प्रकीर्त्तितः । तुलापलशतं ज्ञेयं सर्वत्रैवैष निश्चयः ।।१८।। माषटङ्काक्षबिल्वानि कुडवप्रस्थमाढकम् । राशिर्गोणी खारिकेति यथोत्तरचतुर्गुणम् ।।१९।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

१५६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे मागध मान—जब कि प्राचीन वैद्यों ने चरक के मत को माना है इसीसे अन्य सब मानों (तौलों) को छोड़ कर सर्वप्रथम मगध देश में प्रचलित 'मागध' नामक मान को कहता हूँ। पण्डितों ने ३० परमाणुओं¹ का 'त्रसरेणु' और त्रसरेणु का ही पर्यायवाची शब्द 'वंशी' कहा है। जाली के अन्तर्गत सूर्य की किरणों द्वारा वंशी दिखाई पड़ती है अर्थात् उन किरणों में ध्यान से देखने पर जो सूक्ष्म रज (धूल के कण) दिखाई पड़ते हैं वे ही वंशी हैं। ६ वंशी की (त्रसरेणु) १ मरीचि होती है और ६ मरीचि की १ राजिका (राई) होती है। ३ राई का १ सरसों, ८ सरसों का १ जौ, ४ जौ की एक रत्ती, ६ रत्ती का १ मासा होता है। इसी के पर्यायवाची शब्द हेम और धानकं (धान्यक) हैं। ४ मासे का एक शाण होता है और इसीको धरण तथा टङ्क भी कहते हैं। २ शाण का १ कोल होता है और इसी को क्षुद्रक, वटक तथा द्रङ्क्षण भी कहते हैं। २ कोल का एक कर्ष होता है और कर्ष ही के पर्यायवाची शब्द पाणिमानिका, अक्ष, पिचु, पाणितल, किञ्चित्पाणि, तिन्दुक, विडालपदक, षोडशिका, करमध्य, हंसपद, सुवर्ण, कवलग्रह तथा उदुम्बर ये सब कहे जाते हैं। दो कर्ष का १ अर्धपल (आधा पल) होता है, इसी को शुक्ति तथा अष्टमिका कहते हैं। २ शुक्ति का १ पल होता है। इसी के नामान्तर मुष्टि, आम्र, चतुर्थिका, प्रकुञ्च, षोडशी तथा बिल्व ये सब हैं। २ पल की १ प्रसृति होती है। इसी को प्रसृत भी कहते हैं। २ प्रसृति की १ अञ्जलि होती है। इसी के नामान्तर कुडव, अर्धशारावक तथा अष्टमान हैं। २ कुडव (अञ्जलि) की १ मानिका होती है। इसी को शराव तथा आठ पल का होने से अष्टपल भी विद्वान् लोग मानते हैं। २ शराव का एक प्रस्थ और ४ प्रस्थ का १ आढक होता है। इसी को भाजन, कांस्यपात्र तथा ६४ पल का होने से चतुःषष्टिपल भी कहते हैं। ४ आढक का १ द्रोण होता है। इसी के पर्यायवाची शब्द कलश, नल्वण, अर्मण, उन्मान, घट तथा राशि ये सब हैं। २ द्रोण का शूर्प होता है। इसी को कुम्भ तथा ६४ शराव का होने से चतुःषष्टिशरावक भी कहते हैं। २ शूर्प की १ द्रोणी होती है। इसी को वाह तथा गोणी भी कहते हैं। २ द्रोणी की १ खारी होती है। बुद्धिमान् लोग तौल में ४०९६ (चार हजार छानबे) पलों की खारी, २००० (दो हजार) पलों का एक भार तथा १०० (सौ) पलों की एक तुला कहते हैं। सर्वत्र शास्त्रों में यही निश्चित है। माष, टङ्क, अक्ष, बिल्व, कुडव, प्रस्थ, आढक, राशि, गोणी और खारी ये सब उत्तरोत्तर एक दूसरे की अपेक्षा चौगुने होते हैं अर्थात्— ४ माष (माशे) का १ टङ्क। ४ टङ्क का १ अक्ष। ४ अक्ष का १ बिल्व। ४ बिल्व का १ कुडव। ४ कुडव का १ प्रस्थ। ४ प्रस्थ का १ आढक। ४ आढक की १ राशि। ४ राशि की १ गोणी। ४ गोणी की १ खारी समझनी चाहिये ॥२-१९॥ १. जालान्तरगते भानौ यत्सूक्ष्मं दृश्यते रजः। तस्य त्रिंशत्तमो भागः परमाणुः स उच्यते ॥१॥ खिड़की के राह जो सूर्य की किरणें मकान के अन्दर आती हैं उनमें जो सूक्ष्म रज दिखाई पड़ते हैं उन रजों में एक के तीसवें भाग को परमाणु कहते हैं ॥१॥

अथ प्रथमं मानपरिभाषाप्रकरणम् ९५७ ❖ मागधपरिभाषायां षड्रक्तिको माषश्चतुर्विंशतिरक्तिकष्टङ्कः, षण्णवतिरक्तिकः कर्षः । अयं चरकसम्मतः । सुश्रुतमते तु पञ्चरक्तिको माषः, विंशतिरक्तिकष्टङ्कः, अशीतिरक्तिकः कर्षः । अयमेव कालिङ्गपरिभाषायामपि । यतस्तत्राष्टरक्तिको माषो द्वात्रिंशद्रक्तिकष्टङ्कः, सार्धटङ्कद्वयमितः कर्षः ।। २-१९ ।। मागधपरिभाषा में ६ रत्ती का एक मासा, २४ रत्ती का १ टङ्क और ९६ रत्ती का १ कर्ष होता है। यह मान चरकसम्मत है। सुश्रुत के मत में-५ रत्ती का १ माशा, २० रत्ती का १ टङ्क और ८० रत्ती का १ कर्ष होता है। यही कालिङ्ग परिभाषा में भी होता है। क्योंकि उसमें ८ रत्ती का १ माशा, ३२ रत्ती का १ टङ्क और २ ।। टङ्क का १ कर्ष होता है ।।२-१९।। अथ द्रवार्द्रशुष्कद्रव्याणां मानविषये परिभाषामाह- गुञ्जाऽऽदिमानमारभ्य यावत्स्यात्कुडवस्थितिः । द्रवार्द्रशुष्कद्रव्याणां तावन्मानं समं मतम् ।। प्रस्थादिमानमारभ्य द्विगुणं तद् द्रवार्द्रयोः । मानं तथा तुलायास्तु द्विगुणं न क्वचित्स्मृतम् ।। द्रव (पानी आदि के समान), गीले तथा सूखे द्रव्यों के मान के विषय में परिभाषा-रत्ती आदि से लेकर कुडवपर्यन्त द्रव, गीले तथा सूखे पदार्थों का मान (तौल) बराबर रहता है, अर्थात् जितना और द्रव्यों का मान है उसी के समान ही इसका भी रहता है। किन्तु प्रस्थ आदि मान से द्रव तथा आर्द्र (गीले) द्रव्यों का लिखित मान द्विगुण होना आरम्भ हो जाता है। तुला का मान द्रव्य द्रव्य या आर्द्र द्रव्यों में भी कहीं द्विगुण नहीं किया जाता अर्थात् जैसा लिखित रहता है उतना ही लिया जाता है ।।२०-२१।। अथ कुडवभाण्डस्य लक्षणमाह- मृद्वृक्षवेणुलोहादेर्भाण्डं यच्चतुरङ्गुलम् । विस्तीर्णञ्च तयोच्छ्रञ्च तन्मानं कुडवं वदेत् ।। २२ ।। कुडवसंज्ञक मानपात्र का लक्षण-मिट्टी, वृक्ष, बांस या लोहा के बने हुये चार अंगुल चौड़े तथा चार ही अंगुल ऊंचे मानपात्र को 'कुडव' कहते हैं ।।२२।। इति मागधमानं समाप्तम् । अथ कालिङ्गमानमाह- यतो मन्दाग्नयो ह्रस्वा हीनसत्त्वा नराः कलौ । अतस्तु मात्रा तद्योग्या प्रोच्यते सुज्ञसंमता ।। यवो द्वादशभिर्गौरसर्षपैः प्रोच्यते बुधैः । यवद्वयेन गुञ्जा स्यात्त्रिगुञ्जो वल्ल उच्यते ।। २४ ।। माषो गुञ्जाभिरष्टाभिः सप्तभिर्वा भवेत्क्वचित् । चतुर्भिर्माषकैः शाणः स निष्कष्टङ्क एव च ।। गद्याणो माषकैः षड्भिः कर्षः स्याद्दशमाषकैः । चतुष्कषैः पलं प्रोक्तं दशशाणमितं बुधैः ।। चतुष्पलैश्च कुडवः प्रस्थाद्याः पूर्ववन्मताः । स्थितिर्नास्त्येव मात्रायाः कालमग्निं वयो बलम् ।। प्रकृतिं दोषदेशौ च दृष्ट्वा मात्रां प्रकल्पयेत् । नाल्पं हन्त्यौषधं व्याधिं यथाऽम्भोऽल्पं महानलः ।। अतिमात्रं च दोषाय यथा शस्ये बहूदकम् ।। २८ ।। कालिङ्गमान-कलियुग में मनुष्य मन्द अग्नि वाले, छोटे शरीर के तथा हीन बलवाले हैं, अतः उनके योग्य विद्वानों के द्वारा स्वीकृत जो मात्रा (औषध देने में) है उसे कहते हैं। १२ सफेद सरसों का १ जौ और दो जौ की एक रत्ती, तीन रत्ती का एक बल्ल होता है। ८ रत्ती का अथवा कहीं कहीं ७ रत्ती का भी एक माशा और चार मासे का एक शाण होता है, इसी को निष्क और टङ्क भी कहते हैं। छः माशे का एक गद्याण होता है। दस माशे का एक कर्ष और चार कर्ष का एक पल जो कि दस शाण के बराबर होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

९५८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ४ पलों का एक कुडव होता है। इसके बाद प्रस्थादि का मान पूर्वोक्त रीति के समान ही माना गया है। वस्तुतः ओषधियों की मात्रा का कोई मर्यादा निश्चित नहीं है। अतः बुद्धिमान् वैद्य को चाहिये कि—काल (शीतादि ऋतु और प्रातः, सायं आदि), अग्नि (मन्द, दीप्त आदि), अवस्था (बाल्यादि), बल, प्रकृति (वातादि), दोष (वातादि) और देश (जाङ्गलादि) को देखकर तदनुसार मात्रा की कल्पना करें। उचित मात्रा की अपेक्षा हीन मात्रा की ओषधि बढ़े हुये रोग को उसी प्रकार शान्त नहीं कर सकती है जैसे कि—थोड़ा जल बड़े अग्निराशि को नहीं शान्त कर सकता। यदि ओषधि की अधिक मात्रा दी जाय तो भी हानिकारक ही होती है जैसे कि—धान में भी अधिक जल हानिकारक होता है। इससे बहुत समझ बूझ कर ओषधियों की मात्रा देनी चाहिये ॥२३-२८॥ मागध मान तथा कालिङ्ग मान की आधुनिक मान से तुलना—मागध मान का १ कर्ष १ तोले (१२ माशे) के बराबर तथा कालिङ्ग मान का १ कर्ष (१० माशे) एक रुपये भर का होता है। इतना ध्यान अवश्य देना चाहिये। मागध मान आधुनिक मान ६ रत्ती का १ माशा = ६ रत्ती ४ माशे का १ शाण (टङ्क) = ३ माशा २ शाण का १ कोल = ६ माशा (आधा तोला) २ कोल का १ कर्ष = १२ माशा (१ तोला) २ कर्ष का १ अर्धपल (शुक्ति) = २ तोले २ शुक्ति का १ पल = ४ तोले २ पल की १ प्रसृति = ८ तोले २ प्रसृति की १ अञ्जलि (कुडव) = १६ तोले २ कुडव की १ मानिका (शराव) = ३२ तोले २ शराव का १ प्रस्थ = ६४ तोले ४ प्रस्थ का १ आढक = २५६ तोले ४ आढक का १ द्रोण = १०२४ तोले २ द्रोण का १ शूर्प = २०४८ तोले २ शूर्प की १ द्रोणी = ४०९६ तोले ४ द्रोणी की १ खारी = १६३८४ तोले २००० पल का १ भार = ८००० तोले १००० पल की १ तुला = ४०० तोले कालिङ्ग मान आधुनिक मान ८ रत्ती का १ माशा = ८ रत्ती या १ माशा ४ मासे का १ शाण (टङ्क) = ४ माशे ६ मासे का १ गद्याण = ६ माशा (आधा तोला) १० मासे का १ कर्ष = १ भर ४ कर्ष का १ पल = ४ भर ४ पल का १ कुडव = १६ भर (३ छ. १ भर) २ कुडव की १ मानिका (शराव) = ३२ भर (६ छ. २ भर) २ शराव का १ प्रस्थ = ६४ भर (१२ छ. ४ भर)

अथ द्वितीयं भेषजविधानप्रकरणम् ९५९ कालिङ्ग मान आधुनिक मान ४ प्रस्थ का १ आढक = २५६ भर (३ से. ३ छ. १ भर) ४ आढक का १ द्रोण = १०२४ भर (१२ से १३ छ. ४) भर) २ द्रोण का १ शूर्प = २०४८ भर (२५ सेर ९ छ. ३) भर) २ शूर्प की १ द्रोणी = ४०९६ भर (१ म. ११ सेर ३ छ. १) भर) ४ द्रोणी की १ खारी = १६३८४ भर (५ मन ४ सेर १२ छ. ४) भर) २००० पल का १ भार = ८००० भर (२ मन २० सेर) १०० पल की १ तुला = ४०० भर (५ सेर) इति कालिङ्गमानं समाप्तम्। इति श्रीमिश्रलटकनतनयश्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे पूर्वखण्डे परिभाषादि- प्रकरणे प्रथमं मानपरिभाषाख्यं प्रकरणं समाप्तम्।।१।। अथ द्वितीयं भेषजविधानप्रकरणम् ।।२।। अथ भेषजानां विधानानि । तत्रादौ कषायभेदानाह- स्वरसश्च तथा कल्कः क्वाथश्च हिमफाण्टकौ। ज्ञेयाः कषायाः पञ्चैते लघवः स्युर्यथोत्तरम् ।।१।। ओषधियों के बनाने में प्रथम कषाय के भेद-(१) स्वरस, (२) कल्क, (३) क्वाथ, (४) हिम और (५) फाण्ट ये ५ प्रकार के कषाय होते हैं। ये एक दूसरे की अपेक्षा उत्तरोत्तर लघु होते हैं अर्थात् स्वरस की अपेक्षा कल्क और क्वाथ की अपेक्षा क्वाथ लघु होता है। इसी भाँति हिम और फाण्ट को भी उत्तरोत्तर लघु समझना चाहिये ।।१।। अथ स्वरसविधिमाह- अहतात्तत्क्षणाकृष्टाद् द्रव्यात्क्षुण्णात्समुद्धवेत्। वस्त्रनिष्पीडितो यश्च स्वरसो रस उच्यते ।।२।। कुडवं चूर्णितं द्रव्यं क्षिप्तञ्च द्विगुणे जले। अहोरात्रं स्थितं तस्माद्द्भवेद्वा रस उत्तमः ।।३।। ❖ अहताद्=शीताग्निकीटादिभिरनुपहतात्। क्षुण्णात्=संपिष्टात् ।।२।। चूर्णितं=चूर्णी कृतम् ।।३।। स्वरस बनाने की विधि-शीत (पाला), अग्नि तथा कीड़े आदि से खराब नहीं हुई एवं तत्काल की लाई हुई गीली और भलीभाँति पीसी हुई ओषधियों से जो रस कपड़े से छान कर निकाला जाता है उसे 'स्वरस' कहते हैं। अथवा चूर्ण किये हुये १ कुडव (१६ तोले) द्रव्य को लेकर दुगुने (३२ तोले) जल में एक दिन रात भर भिगो कर रख देने के उपरान्त जो कपड़े से छान कर रस निकाला जाता है उसे भी उत्तम ही 'स्वरस' कहते हैं ।।२-३।। यहाँ 'अहतात्' पद का 'शीत, अग्नि तथा कीड़े आदि से खराब नहीं हुई' और 'क्षुण्णात्' पद का 'भली भाँति पीसी हुई' तथा 'चूर्णितम्' इस पद का 'चूर्ण किये हुये' यह अर्थ समझना चाहिये ।। आदाय शुष्कद्रव्यं वा स्वरसानामसंभवे। जलेऽष्टगुणिते साध्यं पादशिष्टं च गृह्यते ।।४।। अथवा जहाँ पर स्वरस बनाने का सम्भव न हो वहाँ सूखे द्रव्यों को लेकर उसे अठगुने जल के साथ हँड़िया में रख कर औंटाये किन्तु मुँह हँड़िये का खुला रखे। जब चौथाई जल शेष रहे तब उतार छान कर काम में ले ।।४।।

१६० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे स्वरसस्य गुरुत्वाच्च पलमर्द्धं प्रयोजयेत्। निशोषितं चाग्निसिद्धं पलमात्रं रसं पिबेत् ॥५॥ पाँच प्रकार के कषायों में स्वरस नामक कषाय गुरु होता है अतः इसकी मात्रा आधे पल (दो तोले) की देनी चाहिये। जो रातभर का रखा तथा अग्नि से सिद्ध किया हुआ अर्थात् औटाया हुआ रस हो उसकी मात्रा पीने में एक पल की देनी चाहिये ॥५॥ ❖ निशोषितं=निशायामुषितम् ॥५॥ ‘निशोषितम्’ पद का ‘रातभर का रखा हुआ’ यह अर्थ समझना चाहिये ॥५॥ सितामधुगुडक्षारञ्जीरकं लवणं तथा। घृतं तैलञ्च चूर्णादीन् कोलमात्रान् रसे क्षिपेत् ॥६॥ साफ किया हुआ शक्कर, मधु, गुड़, खार, जीरा, नमक, घी, तेल अथवा चूर्ण आदि यदि स्वरस में डालना हो तो एक कोल (६ माशे) डाले ॥६॥ ❖ कोलः=टङ्कद्वयम् ॥६॥ ‘कोल’ पद से दो टङ्क (६ माशे) का बोध करना चाहिये ॥६॥ अथ तण्डुलजलविधिमाह- कण्डितं तण्डुलपलं जलेऽष्टगुणिते क्षिपेत्। भावयित्वा जलं ग्राह्यं देयं सर्वत्र कर्मसु ॥७॥ चावल के धोवन की विधि—कूटे हुये साफ चावलों को एक पल (४ तोले) लेकर अठगुने (३२ तोले) जल में डाल कर, उन्हें कोमल अर्थात् एक घण्टे तक भिगो कर नरम कर ले। पश्चात् जहाँ-जहाँ आवश्यकता हो वहाँ-वहाँ सभी कार्यों में चावलों को अलग कर केवल जल ग्रहण करें ॥७॥ भावयित्वा=कोमलीकृत्य ॥७॥ ‘भावयित्वा’ पद का ‘कोमल कर के’ यह अर्थ समझना चाहिये ॥७॥ अथ हिमनिर्माणविधिमाह- क्षुण्णं द्रव्यपलं सम्यक् षड्भिर्नीरपलैः प्लुतम्। निशोषितं हिमः स स्यात्तथा शीतकषायकः। तस्य मानं मतं पाने पलद्वयमितं बुधैः ॥८॥ हिम बनाने की विधि—अच्छी तरह से चूर्ण किये हुये एक पल (४ तोले) द्रव्य (ओषधि) को ६ पल (२४ तोले) जल में भिगो कर रात भर पड़ा रहने देने पर प्रातःकाल उस जल को हिम तथा शीतकषाय कहते हैं। इसकी मात्रा पीने में पण्डितों ने २ पल (८ तोले) की मानी है ॥८॥ ❖ क्षुण्णं=चूर्णीकृतम् ॥८॥ ‘क्षुण्णम्’ पद का ‘चूर्ण किये हुये’ अर्थ समझना चाहिये ॥८॥ अथ मन्थनिर्माणविधिमाह- जले चतुष्पले शीते क्षुण्णं क्षुण्णं द्रव्यपलं क्षिपेत्। मृत्पात्रे मन्थयेत् सम्यक् तस्माच्च द्विपलं पिबेत् ॥९॥ मन्थ बनाने की विधि—४ पल (१६ तोले) शीतल जल में चूर्ण किये हुये एक पल (४ तोले) द्रव्य को डाल दे और उसे मिट्टी के पात्र (हंड़िया) में रख कर अच्छी तरह से मथे, उस मथे हुये जल को ‘मन्थ’ कहते हैं। इसकी मात्रा पीने में दो पल (८ तोले) की है ॥९॥ ❖ क्षुण्णं=चूर्णीकृतम्। मन्थयेत्=मथ्नीयात् ॥९॥ ‘क्षुण्णम्’ पद का ‘चूर्ण किये हुये’ और ‘मन्थयेत्’ पद का ‘मथे’ यह अर्थ समझना चाहिये ॥९॥

अथ द्वितीयं भेषजविधानप्रकरणम् ९६१ अथ फाण्टनिर्माणमाह- क्षुण्णे द्रव्यपले सम्यग्जलमुष्णं विनिक्षिपेत्। मृत्पात्रे कुडवोन्मानं ततस्तु स्त्रावयेत्पटात् ॥११०॥ स स्याच्चूर्णद्रवः फाण्टस्तन्मानं द्विपलोन्मितम्। क्षौद्रं सितागुडादींस्तु कर्षमात्रान्विनिक्षिपेत् ।। फाण्ट बनाने की विधि-अच्छी तरह से चूर्ण किये हुये एक पल (४ तोले) द्रव्य को मिट्टी के पात्र में रख कर उस में एक कुडव (१६ तोले) खूब गरम जल छोड़ कर भिगो दे जब खूब भीग जाय तब कपड़े से छांन ले इसी जल को 'फाण्ट' कहते हैं। इसकी मात्रा दो पल (८ तोले) की होती है। इसमें मधु, साफ शक्कर अथवा गुड़ आदि के छोड़ने की मात्रा एक कर्ष (१ तोले) की है ॥११०-११॥ ❖ क्षुण्णे=चूर्णीकृते, स चूर्णद्रवः फाण्टः स्यादित्यन्वयः ॥११०-११॥ यहाँ 'क्षुण्णे' पद का 'चूर्ण किये हुये' यह अर्थ है और 'वह चूर्ण द्रव (चूर्ण मिश्रित छना हुआ जल) फाण्ट कहलाता है' ऐसा अन्वय है ॥११०-११॥ अथ कल्कविधिमा- द्रव्यमार्द्रं शिलापिष्टं शुष्कं वा सजलं भवेत्। तदेव कल्को विज्ञेयस्तन्मानं कर्षसम्मितम् ।। कल्के मधुघृतं तैलं देयं द्विगुणमात्रया । सितां गुडं समं दद्याद् द्रवो देयश्चतुर्गुणः ।।१३।। कल्क (चटनी) बनाने की विधि-यदि गीला द्रव्य हो तो बिना जल के और सूखा हो तो जल के साथ सिल पर पीसा जाय तो उसे 'कल्क' कहते हैं। इस की मात्रा एक कर्ष (१ तोले) की होती है। यदि कल्क में मधु, घी अथवा तेल मिलाना हो तो उसकी मात्रा कल्क से दूनी होनी चाहिये। यदि साफ शक्कर तथा गुड़ डालना हो तो उस की मात्रा कल्क के समान होनी चाहिये और यदि द्रव पदार्थ (जलादि) मिलाना हो तो उस की मात्रा कल्क से चौगुनी होनी चाहिये ॥ अथ चूर्णविधिमाह- अत्यन्तशुष्कं यद् द्रव्यं सुपिष्टं वस्त्रगालितम्। तत्स्याच्चूर्णं रजः क्षोदस्तन्मात्रा कर्षसम्मिता ।। चूर्णे गुडः समो देयः शर्करा द्विगुणा मता। चूर्णेषु भज्जतं हिङ्गु देयं नोत्क्लेशकृद्भवेत् ।।१५।। लिहेच्चूर्णं द्रवैः सर्वैर्घृताद्यैर्द्विगुणोन्मितैः। पिबेच्चतुर्गुणैरेवं चूर्णमालोडितं द्रवैः ।।१६।। चूर्ण बनाने की विधि-जो अत्यन्त सूखा द्रव्य होता है उसे खरल आदि में रख कर अत्यन्त महीन कूट कर वस्त्र से छान लिया जाय तो उसे चूर्ण कहते हैं। इसी का नामान्तर रज तथा क्षोद भी है। इसकी मात्रा एक कर्ष (१ तोले) की होती है। यदि चूर्ण में गुड़ मिलाना हो तो उस की मात्रा चूर्ण के बराबर और साफ शक्कर मिलाना हो तो उसकी मात्रा चूर्ण से दुगुनी होनी चाहिये। यदि हींग मिलानी हो तो उसे घी में भून कर इतनी मात्रा में डाले कि जितनी खाने से जी न मिचलाये। यदि घृतादि द्रव पदार्थ के साथ चूर्ण चाटना हो तो घृतादि की मात्रा चूर्ण से दुगुनी लेनी चाहिये और यदि पीना हो तो चूर्ण को चौगुने जलादि द्रव पदार्थों में खूब घोल कर पीवे ॥१४-१६॥ अथानुपानमाह- चूर्णावलेहगुटिकाकल्कानामनुपानकम् । पित्तवातकफातङ्के त्रिद्व्येकपलमाहरेत् ।।१७।। यथा तैलं जले क्षिप्तं क्षणेनैव विसर्पति । अनुपानबलादङ्गे तथा सर्पति भेषजम् ।।१८।। अनुपान की मात्रा-चूर्ण, अवलेह, गोली और कल्क इनके अनुपान (दुग्धादि) की मात्रा पित्त, वात तथा कफसम्बन्धी रोगों में क्रम से तीन पल (१२ तोले), दो पल (८ तोले) और एक पल (४ तोले) की होनी चाहिये। जिस प्रकार जल में तेल छोड़ने से वह क्षण मात्र में (जल के ऊपर) चारो तरफ फैल जाता है उसी प्रकार अनुपान के बल से ओषधि भी क्षणमात्र में ही संपूर्ण अङ्गों में फैल जाती है ॥१७-१८॥ ६४ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmụ. Digitized by S3 Foundation USA

१६२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ भावनाविधिमाह- द्रवेण यावता सम्यक् चूर्णं सर्वं प्लुतं भवेत्। भावनाथाः प्रमाणं तु चूर्णे प्रोक्तं भिषग्वरैः ।। भावना की विधि-द्रव पदार्थों की जितनी मात्रा से सम्पूर्ण चूर्ण भली-भाँति डूब जाय उतनी मात्रा से चूर्ण में द्रवपदार्थों की भावना देनी चाहिये ॥१९॥ अथ पुटपाकविधिमाह- पुटपाकस्य कल्कस्य स्वरसो गृह्यते यतः । अतस्तु पुटपाकानां युक्तिरत्रोच्यते मया ।।२०।। पुटपाकस्य पाकोऽयं लेपस्याङ्गारवर्णता । लेपञ्च द्व्यङ्गुलं स्थूलं कुर्याद् द्व्यङ्गुलमात्रकम् ।।२१।। काश्मरीवटजम्ब्वादिपत्रैर्वेष्टनमुत्तमम् ।।२२।। पलमात्रो रसो ग्राह्यः कर्षमात्रं मधु क्षिपेत्। कल्कचूर्णद्रवाद्यास्तु देयाः कोलमिता बुधैः ।। पुटपाक की विधि-अनेक स्थलों पर पुटपाक की विधि से परिपक्क कल्क का स्वरस ग्रहण किया जाता है। अतः यहाँ मैं पुटपाक की विधि कहता हूँ। पुटपाक के परिपाक होने का लक्षण-जब ऊपर लेप की हुई मिट्टी दहकते अंगारे के समान हो जाय तब समझना चाहिये कि पुटपाक सिद्ध हो गया। पुटपाक की विधि-कल्क किये हुये द्रव्य के ऊपर खम्भारि, बरगद वा जामुन आदि के पत्तों को दो अङ्गुल मोटा खूब उत्तम रीति से लपेट कर ऊपर से दो अंगुल मोटा मिट्टी का लेप कर दे और अग्नि में डाल दे। जब मिट्टी लाल हो जाय तब निकाल ले। पश्चात् ऊपर की मिट्टी आदि अलग करके उस कल्क के रस को निचोड़ ले। इसकी मात्रा एक पल (४ तोले) की है। इसमें यदि मधु डालना हो तो एक कर्ष (१ तो.) डाले। यदि पण्डित लोग इसमें अन्य कोई कल्क, चूर्ण अथवा द्रवपदार्थ (जलादि) डालते हैं तो उसकी एक कोल (६ माशे) की मात्रा रखते हैं ॥२०-२३॥ अथोष्णोदकविधिमाह- अष्टमेनांशशेषेण चतुर्थेनार्द्धकेन वा। अथवा क्वथनेनैव सिद्ध मुष्णोदकं भवेत् ।।२४।। श्लेष्मामवातमेदोघ्नं वस्तिशोधनदीपनम्। कासश्वासज्वरान् हन्ति पीतमुष्णोदकं निशि ।।२५।। उष्णोदक (गरम जल) की विधि-जल को गरम करने पर उसका आठवाँ हिस्सा, चौथा हिस्सा या आधा हिस्सा शेष रहने पर अथवा केवल उबाल लेने पर ही उसे उष्णोदक कहते हैं। यदि उष्णोदक रात में पिया जाय तो कफ, आमवात तथा भेद को नष्ट करने वाला, वस्तिशोधक, अग्निदीपक एवं कास, श्वास तथा ज्वर को दूर करने वाला होता है ॥२४-२५॥ अथ क्षीरपाकविधिमाह- क्षीरपाक की विधि-द्रव्य से अठगाना दूध और दूध से चौगुना जल छोड़ कर औंटाये जब केवल दूध रह जाय तब उतार ले। इसे पीने से आम से उत्पन्न हुआ शूल नष्ट होता है ॥२६॥ अथ क्वाथविधिमाह- पानीयं षोडशगुणं क्षुण्णे द्रव्यपले क्षिपेत् । मृत्पात्रे क्वाथयेद् ग्राह्यमष्टमांशावशेषितम् ।।२७।। क्वाथ बनाने की विधि-चूर्ण किये हुए एक पल (४ तोले) द्रव्य को मिट्टी के पात्र में रख कर उसमें १६ गुना (६४ तोले) जल डालकर आग पर रख बिना ढके खौलाये जब अष्टमांश (८ तोले) जल रह जाय तब उतार ले ॥२७॥ कर्षार्दौ तु पलं यावद् दद्यात्षोडशिकं जलम् । ततस्तु कुडवं यावत्तोयमष्टगुणं भवेत् ।। चतुर्गुणमतश्चोर्ध्वं यावत् प्रस्थादिकं जलम् ।।२८।।

अथ द्वितीयं भेषजविधानप्रकरणम्. ९६३ परिभाषा-यदि द्रव्य की मात्रा कर्ष से लेकर पल पर्यन्त की हो तो जल १६ गुना डालना चाहिये और उससे (पल से) अधिक यदि कुडव (४ पल) पर्यन्त द्रव्य की मात्रा हो तो अठगुना जल डाले। इसके (कुडव के) उपरान्त प्रस्थ आदि पर्यन्त यदि द्रव्य की मात्रा हो तो चौगुना जल डाले ॥२८॥ ❖ षोडशिकं = षोडशगुणम् ।।२८।। यहां 'षोडशिकम्' इस पद का '१६ गुना' यह अर्थ समझना चाहिये ॥२८॥ तज्जलं पाययेद्धीमान्कोष्णं मृद्वग्निसाधितम् । शृतः क्वाथः कषायश्च निर्यूहः स निगद्यते ।। बुद्धिमान वैद्य रोगी को उक्त जल किञ्चिद् गर्म रहते ही पिलावे और धीमी आँच से औटा कर तैयार करे। इसी को संस्कृत में शृत, क्वथ, कषाय तथा निर्यूह कहते हैं ॥२९॥ अथ क्वाथपानमात्रामाह- मात्रोत्तमा पलेन स्यात्त्रिभिरक्षैस्तु मध्यमा । जघन्या च पलाईद्धेन स्नेहक्वाथौषधेषु च ।। ३० ।। क्वाथ (काढ़ा) पीने की मात्र-स्नेह घृतादि), क्वाथ (काढ़ा) तथा औषध में देने में उत्तम मात्रा एक पल (४ तोले) की, मध्यम मात्रा-३ कर्ष (तोले) की और निकृष्टमात्रा-आधे पल (२ तोले) की कही जाती है ॥३०॥ तन्त्रान्तरे- क्वाथ्यद्रव्यपले वारि द्विरष्टगुणमिष्यते । चतुर्थांशावशिष्टन्तु पेयं पलचतुष्टयम् ।।३१।। दीप्तानलं महाकायं पाययेदञ्जलिं जलम् । अन्ये त्वर्द्धं परित्यज्य प्रसुतिं तु चिकित्सकाः ।। क्वाथत्यागमनिच्छन्तस्त्वष्टभागावशेषितम् । पारम्पर्योपदेशेन वृद्धवैद्याः पलद्वयम् ।।३२।। अन्य ग्रन्थों में यह लिखा है कि-जिस द्रव्य का क्वाथ बनाना हो, उसे एक पल (४ तोले) लेकर उसमें १६ गुना (१६ पल) जल डालकर औँटाये जब चतुर्थांश (४ पल) जल अवशिष्ट रह जाय तब उसे पीना चाहिये। जिसके शरीर का आकार बड़ा हो तथा अग्नि प्रदीप्त हो उसे एक अञ्जलि अर्थात् ४ पल) पिलावे। अन्य चिकित्सक लोग अञ्जलि से आधा भाग छोड़ कर केवल प्रसुति मात्र (२ पल) क्वाथ पिलाते हैं और जो वृद्ध वैद्य क्वाथ बना कर उसमें से आधा भाग पिला कर शेष आधा भाग छोड़ना नहीं चाहते वे लोग गुरुपरम्परा-प्राप्त उपदेश से पूर्वोक्त रीति से क्वाथ बनाने के समय चतुर्थांश जल अवशिष्ट न करके अष्टमांस जल अवशिष्ट रहने पर ही क्वाथ उतारते हैं ऐसी अवस्था में दो पल अवशिष्ट रहता है उसी को पिलाते हैं ॥३१-३३॥ ❖ अष्टभागावशेषितस्य चतुर्थांशावशिष्टापेक्षया गुरुत्वाद् दीप्तानलं महाकायं पलद्वयं पाययेत् । मध्यमाग्निमल्पकायं पलमात्रं पाययेत् । 'मात्रोत्तमापलेन स्याद्' इत्यादि वचनात् ।।३१-३३।। यहाँ यह स्मरण रखना चाहिये कि-जब अष्टमांश जल अवशिष्ट रहने पर क्वाथ उतारा जायगा तब वह चतुर्थांश अवशिष्ट क्वाथ की अपेक्षा गुरु होग अतः जिनकी जठराग्नि अत्यन्त प्रदीप्त है और शरीर भी विशाल है उन्हें ही अष्टमांशावशिष्ट दो पल की मात्रा पिलानी चाहिये। और जिनकी जठराग्नि मध्यम तथा छोटे शरीर वाले हैं उन्हें एक पल की ही मात्रा पिलानी चाहिये। क्योंकि 'एक पल की मात्रा उत्तम होती है' इत्यादि वचनों का प्रमाण भी मिलता है ॥३१- ३३॥ अथ क्वाथे सितादीनां प्रक्षेपमानमाह- क्वाथे क्षिपेत्सितामंशैश्चतुर्थाष्टमषोडशैः । वातपित्तकफातङ्के विपरीतं मधु स्मृतम् ।।३४।। जीरकं गुग्गुलुं क्षारं लवणं च शिलाजतु । हिङ्गु त्रिकटुकञ्चैव क्वाथे शाणोन्मितं क्षिपेत् ।। ३५ ।। क्षीरं घृतं गुडं तैलं मूत्रं चान्यद् द्रवं तथा । कल्कं चूर्णादिक क्वाथे निक्षिपेत् कर्षसम्मितम् ।। ३६ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

१६४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे क्वाथ में साफ शक्कर आदि डालने की मात्रा-क्वाथ में वात, पित्त तथा कफसम्बन्धी रोगों में क्रम से साफ शक्कर (क्वाथ के) चतुर्थांश, अष्टमांश तथा षोडशांश के बराबर छोड़ना चाहिये। किन्तु यदि शहद छोड़ना हो तो इससे विपरीत क्रम से छोड़ना चाहिये अर्थात् वातज रोगों में क्वाथ का १६ वाँ भाग, पित्तज में आठवाँ भाग और कफज में चौथा भाग शहद छोड़ना चाहिये। जीरा, गूगल, खार, नमक, शिलाजीत, हींग, त्रिकटु, (सोंठ, पीपरि, मरिच) ये सब यदि क्वाथ में छोड़े जायें तो शाण (३ माशे) के बराबर होने चाहिये। दूध, घी, गुड़, तेल, मूत्र तथा अन्य प्रकार के द्रवपदार्थ या कल्क एवं चूर्ण आदि क्वाथ में छोड़ना हो तो उसकी मात्रा एक कर्ष (१२ माशे) की होनी चाहिये ॥३४-३६॥ अथौषधभक्षणविधिमाह- तत्रोपविश्य विश्रान्तः प्रसन्नवदनेक्षणः । औषधं हेमरजतमृद्भाजनपरिस्थितम् ।।३७।। पिबेत् प्रसन्नहृदयः पीत्वा पात्रमधोमुखम् । विधायाक्षाभ्य सलिलं ताम्बूलाद्युपयोजयेत् ।।३८।। औषध भक्षण की विधि-औषध खाने के समय प्रथम सोने, चांदी अथवा मिट्टी के पात्र में औषध (क्वाथ) को रख कर थकावट दूर हो जाने पर प्रसन्नमुख तथा नेत्र होकर और सुस्थिर बैठ कर पीवे (खावे)। प्रसन्न मन से पीकर पात्र को औंधे मुख रख कर तत्पश्चात् जल से आचमन कर के पान आदि खावे ॥३७-३८॥ अथावलेहविधिमाह- क्वाथादेर्यत्पुनः पाकाद् घनत्वं सा रसक्रिया । सोऽवलेहश्च लेहश्च तन्मात्रा स्यात्पलोन्मिता ।। सिता चतुर्गुणा कार्या चूर्णाच्च द्विगुणो गुडः । द्रवं चतुर्गुणं दद्यादिति सर्वत्र निश्चयः ।।४०।। सुपक्वे तन्तुमत्त्वं स्यादवलेहेऽप्सु मज्जनम् । स्थिरत्वं पीडिते मुद्रा गन्धवर्णरसोद्भवः ।।४१।। दुग्धमिक्षुरसं यूषं पञ्चमूलकषायकम् ।। वासाक्वाथं यथायोग्यमनुपानं प्रशस्यते ।।४२।। अवलेह बनाने की विधि-क्वाथ आदि जो पुनः पाक करने से अत्यन्त गाढ़ा हो जाता है उसी को रसक्रिया, अवलेह तथा लेह कहते हैं। उसकी मात्रा एक पल (४ तोले) की होती है। यदि इसमें साफ शक्कर डालनी हो तो चूर्ण की चौगुनी और गुड़ दुगुना डाले तथा द्रवपदार्थ चौगुना डाले। अवलेह का परिपाकज्ञान-अवलेह के परिपक्व होने पर उठा कर खींचने से उससे चाशनी के समान तार निकलना, जल में डालने पर डूब जाना, रखने पर स्थिर रहना (इधर उधर न फैलना), दबाने पर अंगुली की रेखायें उस पर उभड़ आना और शास्त्रोक्त गन्ध, वर्ण तथा रस का उत्पन्न हो जाना ये सब लक्षण प्रकट हो जाते हैं। अनुपान-दूध, ऊख का रस, मूंग आदि का जूस, पञ्चमूल का क्वाथ और अडूसा का क्वाथ इनमें से किसी का योग्यतानुसार अवलेह में अनुपान उत्तम होता है ॥३९-४२॥ गुटिकानिर्माणविधिमाह- वटका अथ कथ्यन्ते तन्नाम गुटिका वटी । मोदको वटिका पिण्डी गुडो वर्त्तिस्तथोच्यते ।।४३।। लेहवत्साध्यते वह्नौ गुडो वा शर्कराऽथवा । गुग्गुलुर्वा क्षिपेत्तत्र चूर्णं तन्निर्मिता वटी ।।४४।। गोली बनाने की विधि-गुटिका, वटी, मोदक, वटिका, पिण्डी, गुड तथा वर्ति ये सब नाम गोली के हैं। आग के ऊपर गुड़, शक्कर या गूगल रखकर अवलेह के समान बनावे पश्चात् उसमें औषध चूर्ण डालकर उसकी गोली बनावे ॥४३-४४॥ ❖ तत्र=वह्निसिद्धे गुडादौ ।।४४।। यहाँ 'तत्र' पद का 'आग पर रख कर सिद्ध किये हुये गुडादि में' यह अर्थ समझना चाहिये ।। कुर्याद्वह्निसिद्धेन क्वचिद् गुग्गुलुना वटीम् । द्रवेण मधुना वाऽपि गुटिकां कारयेद् बुधः ।।४५।। सिता चतुर्गुणा देया वटीषु द्विगुणो गुडः । चूर्णे चूर्णसमः कार्यो गुग्गुलुर्मधु तत्समम् ।।४६।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ द्वितीयं भेषजविधानप्रकरणम् १६५ कहीं-कहीं विद्वान् लोग बिना आग पर पकाये ही गूगल से गोली तैयार करते हैं। अथवा द्रव पदार्थ या शहद से ही गोली बना लेते हैं। गोली बनाने में चूर्ण की अपेक्षा साफ शक्कर चौगुनी, गुड़ दुगुना और गुग्गुल या मधु चूर्ण के समान डालना चाहिये ॥४५-४६॥ ❖ तत्समं=चूर्णसमम् ।।४६।। यहाँ 'तत्समम्' पदका 'चूर्ण के समान' यह अर्थ है ॥४५-४६॥ द्रवं तु द्विगुणं देयं मोदकेषु भिषग्वरैः ।।४७।। वैद्यवरों को चाहिये कि गोली बनाने में यदि द्रवरूप पदार्थ डालना हो तो उसकी मात्रा चूर्ण से दुगुनी लेवे ॥४७॥ ❖ द्रवं=द्रवरूपं द्रव्यम् ।।४७।। यहाँ 'द्रवम्' पद का 'द्रव रूप पदार्थ' यह अर्थ समझना चाहिये ॥४७॥ कर्षप्रमाणं तन्मात्रा बलं दृष्ट्वा प्रयुज्यते ।।४८।। गोलियों की मात्रा यद्यपि एक कर्ष (१ तोले) की कही हुई है, तथापि रोगियों के बल को देख कर तदनुसार इसकी मात्रा की कल्पना करनी चाहिये ॥४८॥ ❖ बलमिति कालादेरप्युपलक्षणम् ।।४८।। यहाँ 'बलम्' यह पद कालादि का भी उपलक्षण है इससे 'बल, काल, अवस्था, देश आदि को देख कर' ऐसा अर्थ समझना चाहिये ॥४८॥ अथ घृततैलयोर्विधिमाह- कल्काच्चतुर्गुणीकृत्य घृतं वा तैलमेव च । चतुर्गुणद्रवे साध्यं तस्य मात्रा पलोन्मिता ।।४९।। घृत और तेल बनाने की विधि-कल्क से चौगुना घी अथवा तेल लेकर उससे (घी तथा तेल से) चौगुने द्रव पदार्थ के साथ उसे सिद्ध करना चाहिये। जब केवल घी या तेल रह जाय तब उसे उतार लेना चाहिये, उसकी मात्रा एक पल की होती है ॥४९॥ ❖ मात्रा पलोन्मिता भक्षणाय ।।४९।। यहाँ 'मात्रा एक पल की होती है' ऐसा जो कहा गया है वह खाने के लिये समझना चाहिये ॥ निक्षिप्य क्वाथयेत्तोयं क्वाथ्यद्रव्याच्चतुर्गुणम् । पादशिष्टं गृहीत्वा तु स्नेहं तेनैव साधयेत् ।।५०।। चतुर्गुणं मृदुद्रव्ये कठिनेऽष्टगुणं जलम् । मृद्वादिक्वाथ्यसंघाते दद्यादष्टगुणं पयः ।। अत्यन्तकठिने द्रव्ये नीरं षोडशिकं मतम् ।।५१।। जिस द्रव्य का क्वाथ बनाना हो उससे चौगुना जल छोड़ कर क्वाथ बनाना चाहिये और जब चतुर्थांश शेष रह जाय तब उसमें स्नेह (घृत या तेल) डालकर पकावे जब केवल स्नेह पदार्थ रह जाय तब उतार कर काम में ले। यहाँ चौगुना जल छोड़ना जो कहा है वह मृदु द्रव्यों के लिये कठिन द्रव्यों के लिये तो अठगुना जल छोड़ना चाहिये। जहाँ मृदु आदि अर्थात् क्वाथ करने योग्य मृदु तथा कठिन द्रव्यों का समूह हो वहाँ अठगुना ही जल छोड़ना चाहिये। यदि अत्यन्त कठिन द्रव्य हो तो उसमें १६ गुना जल छोड़ना चाहिये ॥५०-५१॥ ❖ मृदुद्रव्ये=आर्द्रद्रव्ये गुडूच्यादौ । कठिने=शुष्कद्रव्ये शुण्ठ्यादौ । अत्यन्तकठिने=चिरशुष्के देवदारर्वादौ ।।५०-५१।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

यहाँ 'मृदु द्रव्य' से 'गीले द्रव्य गिलोय आदि' 'कठिन द्रव्य' से 'सूखे द्रव्य सोंठ आदि' तथा 'अत्यन्त कठिन द्रव्य' से 'बहुत दिन के सूखे हुये देवदारु आदि' का बोध करना चाहिये ॥५०-५१॥ कर्षादितः पलं यावत्क्षिपेत्षोडशिकं जलम् । तदूर्ध्वं कुडवं यावद् भवेदष्टगुणं पयः ॥ प्रस्थादितः क्षिपेन्नींरं खारीं यावच्चतुर्गुणम् ॥५२॥ एक कर्ष (१ तोले) से लेकर पल (४ तोले) पर्यन्त द्रव्य में १६ गुना जल डालना चाहिये । उसके उपरान्त कुडव (४ पल) पर्यन्त में ८ गुना जल डालना चाहिये । प्रस्थ (१६ पल) से लेकर खारी (४०९६ पल) पर्यन्त में चौगुना जल डालना चाहिये ॥५२॥ ❖ पूर्वं 'चतुर्गुणं मृदुद्रव्य' इत्यादिना क्वाथ्यद्रव्यगतमृदुत्वादिगुणभेदेन जलगतपरिमाणमुक्तम् । इदानीं केचिदाचार्याः 'कर्षादितः पलं यावदि' त्यादिवचनेन क्वाथ्यद्रव्यगतपरिमाणभेदेन जल

अथ द्वितीयं भेषजविधानप्रकरणम् १६७ इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि-जिन स्नेह के बनाने में दूध, दही, स्वरस, तक्र और कल्क में उपयोग किया हुआ जल, इन पाँचों द्रव पदार्थों का प्रयोग होता है वहाँ प्रत्येक वे सब तौल में स्नेह के बराबर हों ऐसा समझना चाहिये । अर्थात् उन पांचों में जो-जो पूर्व में हैं अर्थात् दही, दूध, स्वरस तथा तक्र वे सब चारो मिलकर स्नेह के चौगुने होने चाहिये ॥५५॥ द्रव्येण केवलेनैव स्नेहपाको भवेद् यदि । तत्राम्बुपिष्टः कल्कः स्याज्जलं चात्र चतुर्गुणम् ।। ५५ ।। क्वाथेन केवलेनैव पाको यत्रोदितः क्वचित् । क्वाथ्यद्रव्यस्य कल्कोऽपि तत्र स्नेहे प्रयुज्यते ।। ५७ ।। जहाँ केवल द्रव्य ही से स्नेह बनाना हो वहाँ उस द्रव्य का कल्क जल से पीसना चाहिये । और जल कल्क द्रव्य से चौगुना लेना चाहिये । जहाँ केवल क्वाथ से स्नेह बनाना कहा हो वहाँ यह भी समझना चाहिये कि जिस द्रव्य का क्वाथ बना है उसके कल्क का भी उस स्नेह में प्रयोग किया जाता है ।। ५६-५७ ।। कल्कहीनस्तु यः स्नेहः स साध्यः केवले द्रवे ।। ५८ ।। यदि कोई स्नेह बिना कल्क ही के बनाया जाय तो वहाँ केवल द्रव में ही उसे सिद्ध करना चाहिये ॥ ❖ केवले द्रवे=क्वाथेतरस्मिन् स्वरसादिरूपे ।। ५८ ।। यहाँ 'केवल द्रव में' ऐसा कहने का यह भाव समझना चाहिये कि—क्वाथ से भिन्न स्वरसादिरूप द्रव में ।। ५८ ।। पुष्पकल्कस्तु यः स्नेहस्तत्र तोयं चतुर्गुणम् । स्नेहात् स्नेहाष्टमांशश्च पुष्पकल्कः प्रयुज्यते ।। ५९ ।। जिस स्नेह में फूलों का कल्क बनाया जाता हो वहाँ स्नेह का चौगुना जल और स्नेह का अष्टमांश फूलों का कल्क डालना चाहिये ।। ५९ ।। वर्त्तिवत्स्नेहकल्कः स्याद् यदाऽङ्गुल्या विवर्त्तितः । शब्द हीनोऽग्निक्षिप्तः स्नेहः सिद्धो भवेत्तदा ।। ६० ।। यदा फेनोद्गमस्तैले फेनशान्तिश्च सर्पिषि । वर्णगन्धरसोत्पत्तिः स्नेहः सिद्धो भवेत्तदा ।। ६१ ।। सिद्ध हुये स्नेह के लक्षण-जब अङ्गुली से बटने पर स्नेह के कल्क की बत्ती बन जाने लगे और स्नेह को अग्नि में छोड़ने पर उससे फट्-फट् शब्द न होने लगे तब स्नेह को सिद्ध हुआ समझना चाहिये । जब तेल में फेन निकलने लगे और घी में जब फेन का निकलना बन्द होने लगे तथा दोनों के यथोक्त वर्ण, गन्ध तथा रस मालूम पड़ने लगे तब स्नेह (तेल तथा घी) को सिद्ध हुआ समझना चाहिये ।। ६०-६१ ।। अथ स्नेहपाकस्य लक्षणपूर्वकं त्रैविध्यमाह- स्नेहपाकस्त्रिधा प्रोक्तो मृदुर्मध्यः खरस्तथा । ईषत्सरसकल्कस्तु स्नेहपाको मृदुर्भवेत् ।। ६२ ।। मध्यपाकस्य सिद्धिश्च कल्के नीरसकोमले । ईषत्कठिनकल्कश्च स्नेहपाको भवेत्खरः ।। ६३ ।। स्नेह परिपाक के लक्षण पूर्वक तीन प्रकार-स्नेह का परिपाक तीन प्रकार का होता है । (१) मृदुपाक, (२) मध्यपाक और (३) खरपका । (१) मृदुपाक—जिस स्नेह के पाक में स्नेह कल्क के कुछ सरस रहते ही उतार लिया जाय उसे मदुपाक कहते हैं । (२) मध्यपाक—जिसमें कल्क के नीरस तथा कोमल रहते ही पाक बन्द कर दिया जाय उसे मध्यपाक कहते हैं । (३) खरपाक—जिस स्नेहपाक में कल्क कुछ कठिन हो जाता है उसे खरपाक कहते हैं ।। ६२-६३ ।। अथ दग्धपाकस्य निष्प्रयोजनत्वं तथाऽऽमपाकस्य दोषानाह- तदूर्ध्वं दग्धपाकः स्याद्दाहकृन्निष्प्रयोजनः । आमपाकश्च निर्वीर्यो वह्निमान्द्यकरो गुरुः ।। ६४ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA