भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
नामसे पार्वतीका पूजन कर सिद्ध पिण्ड आदि नैवेद्यके रूपमें समर्पित करे। तिलकुटका प्राशन करे। प्रातः सपलीक ब्राह्मणका पूजन करे, इससे इष्टापूर्त-यज्ञका फल प्राप्त होता है।
भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयामें 'हिमाद्रिजा' नामसे पार्वतीका पूजन कर गोधूमका नैवेद्य समर्पित करे। श्वेत चन्दन तथा गन्धोदकका प्राशन कर शयन करे। प्रातः सपलीक ब्राह्मणका पूजन करे, इससे सैकड़ों उद्यान लगानेका फल प्राप्त होता है। भाद्रपद कृष्ण-तृतीयाको दुर्गाकी पूजा करे। गुडयुक्त पिष्ट और फलका नैवेद्य समर्पित करे, गोमूत्रका प्राशन कर शयन करे। प्रातः सपलीक ब्राह्मणकी पूजा करे। इससे सदावर्तका फल प्राप्त होता है।
आश्विनमें उपवासकर 'नारायणी' नामसे पार्वतीका पूजनकर पक्वानका नैवेद्य समर्पित करे। रक्त चन्दनका प्राशन कर रात्रिमें शयन करे। प्रातः ब्राह्मण-दम्पतिकी पूजा करे। इससे अग्निहोत्र-यज्ञका फल प्राप्त होता है। आश्विन कृष्ण-तृतीयाको 'स्वस्ति' नामसे पार्वतीकी पूजा करे। गुड़के साथ शाल्योदन समर्पित करे। कुसुम्भके बीजोंका प्राशन कर रात्रिमें विश्राम करे। प्रातःकाल सपलीक ब्राह्मणको भोजन कराये। इससे गवाह्निक (अन्न, घास आदिसे दिनभर गो-सेवा करने)-का फल प्राप्त होता है।
कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको 'स्वाहा' नामसे पार्वतीका पूजन कर घृत, खाँड़ और खीरका नैवेद्य समर्पित करे। कुंकुम, केसरका प्राशन कर शयन करे और प्रातः ब्राह्मण-दम्पतिकी पूजा करे। इससे एकभुक्त-व्रतका फल प्राप्त होता है। कार्तिककी कृष्ण-तृतीयाको 'स्वधा' नामसे पार्वतीका पूजन कर मूँगकी खिचड़ीका नैवेद्य समर्पित करे और घीका प्राशन कर रातमें शयन करे। प्रातः सपलीक ब्राह्मणका पूजन करे। इससे नक्तव्रतका फल प्राप्त होता है।
इस प्रकार वर्षभर प्रत्येक मास एवं पक्षकी तृतीयाको व्रतादि करनेसे व्रती सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त और पवित्र हो जाता है। व्रत पूर्ण कर उद्यापन इस प्रकार करना चाहिये—
मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको उपवास कर शास्त्र-रीतिसे एक मण्डप बनाकर सुवर्णकी शिव-पार्वतीकी प्रतिमा बनवाये। उन प्रतिमाओंके नेत्रोंमें मोती और नीलम लगाये। ओष्ठोंमें मूँगा और कानोंमें रत्नकुण्डल पहनाये। भगवान् शंकरको यज्ञोपवीत और पार्वतीजीको हारसे अलंकृत कर क्रमशः श्वेत और रक्त वस्त्र पहनाये। चतुःसम (एक गन्ध-द्रव्य जो कस्तूरी, चन्दन, कुंकुम और कपूरके समान-भागके योगसे बनता है)-से सुशोभित करे। तदनन्तर गन्ध, पुष्प, धूप आदि उपचारोंसे मण्डलमें पूजनकर अगुरुका हवन करे। इसमें अपराजिता भगवतीकी अर्चना करे। मृत्तिकाका प्राशन कर रातमें जागरण करे। गीत, नृत्य आदि उत्सव करे। सूर्योदयपर्यन्त जप करे। प्रातः उत्तम मण्डल बनाकर मण्डलमें शय्यापर शिव-पार्वतीकी प्रतिमा स्थापित करे। वितान, ध्वज, माला, किंकिणी, दर्पण आदिसे मण्डपको सुशोभित करे, अनन्तर शिव-पार्वतीकी पूजा करे। सपलीक ब्राह्मणको भोजनादिसे संतुष्ट करे। पान निवेदित कर प्रार्थना करे कि 'हे भगवान् शिव-पार्वती! आप दोनों मुझपर प्रसन्न होवें।' इसके बाद उच्छिष्ट स्थानको पवित्र कर ले। तत्पश्चात् सुवर्णसे मण्डित सींग तथा चाँदीसे मण्डित खुरवाली, कांस्य-दोहनपात्रसे युक्त, लाल वस्त्रसे आच्छादित, घण्टा आदि आभरणोंसे युक्त पयस्विनी लाल रंगकी गौकी प्रदक्षिणा कर दक्षिणाके साथ जूता, खड़ाऊँ, छाता एवं अनेक प्रकारके भक्ष्य पदार्थ गुरुको समर्पित करे। पुनः शिव-पार्वतीको प्रणाम कर गुरुके चरणोंमें भी
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- उत्तरपर्व *
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प्रणाम कर क्षमा माँगें। इस प्रकार इस आनन्तर्य-व्रतकी समाप्ति करे। जो स्त्री या पुरुष इस व्रतको करता है, वह दिव्य विमानमें बैठकर गन्धर्वलोक, यक्षलोक, देवलोक तथा विष्णुलोकमें जाता है। वहाँ बहुत समयतक उत्तम भोगोंको भोगकर शिवलोकको प्राप्त करता है और फिर भूमिपर जन्म लेकर प्रतापी चक्रवर्ती राजा होता है। व्रत करनेवाली उसकी स्त्री उसकी पटरानी होती
है। जिस प्रकार शिवजीके साथ पार्वती, इन्द्रके साथ शची, वसिष्ठके साथ अरुन्धती, विष्णुके साथ लक्ष्मी, ब्रह्माके साथ सावित्री सदा विराजमान रहती हैं, उसी प्रकार वह नारी भी जन्म-जन्ममें अपने पतिके साथ सुख भोगती है। इस व्रतको करनेवाली नारी पतिसे वियुक्त नहीं होती तथा पुत्र, पौत्र आदि सभी वस्तुओंको प्राप्त करती है। (अध्याय २९)
अक्षय-तृतीयाव्रतके प्रसंगमें धर्म वणिकका चरित्र
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! अब आप वैशाख मासके शुक्ल पक्षकी अक्षय-तृतीयाकी कथा सुनें। इस दिन स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय, तर्पण आदि जो भी कर्म किये जाते हैं, वे सब अक्षय हो जाते हैं*। सत्ययुगका आरम्भ भी इसी तिथिको हुआ था, इसलिये इसे कृतयुगादि तृतीया भी कहते हैं। यह सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाली एवं सभी सुखोंको प्रदान करनेवाली है। इस सम्बन्धमें एक आख्यान प्रसिद्ध है, आप उसे सुनें—
शाकल नगरमें प्रिय और सत्यवादी, देवता और ब्राह्मणोंका पूजक धर्म नामक एक धर्मात्मा वणिक रहता था। उसने एक दिन कथाप्रसंगमें सुना कि यदि वैशाख शुक्लकी तृतीया रोहिणी नक्षत्र एवं बुधवारसे युक्त हो तो उस दिनका दिया हुआ दान अक्षय हो जाता है। यह सुनकर उसने अक्षय तृतीयाके दिन गङ्गामें अपने पितरोंका तर्पण किया और घर आकर जल और अन्नसे पूर्ण घट, सत्तू दही, चना, गेहूँ, गुड़, ईख, खाँड़ और सुवर्ण श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणोंको दान दिया। कुटुम्बमें आसक्त
रहनेवाली उसकी स्त्री उसे बार-बार रोकती थी, किंतु वह अक्षय तृतीयाको अवश्य ही दान करता था। कुछ समयके बाद उसका देहान्त हो गया। अगले जन्ममें उसका जन्म कुशावती (द्वारका) नगरीमें हुआ और वह वहाँका राजा बना। दानके प्रभावसे उसके ऐश्वर्य और धनकी कोई सीमा न थी। उसने पुनः बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले यज्ञ किये। वह ब्राह्मणोंको गौ, भूमि, सुवर्ण आदि देता रहता और दीन-दुःखियोंको भी संतुष्ट करता, किंतु उसके धनका कभी ह्रास नहीं होता। यह उसके पूर्वजन्ममें अक्षय तृतीयाके दिन दान देनेका फल था। महाराज! इस तृतीयाका फल अक्षय है। अब इस व्रतका विधान सुनें—सभी रस, अन्न, शहद, जलसे भरे घड़े, तरह-तरहके फल, जूता आदि तथा ग्रीष्म-ऋतुमें उपयुक्त सामग्री, अन्न, गौ, भूमि, सुवर्ण, वस्त्र जो पदार्थ अपनेको प्रिय और उत्तम लेंगे, उन्हें ब्राह्मणोंको देना चाहिये। यह अतिशय रहस्यकी बात मैंने आपको बतलायी। इस तिथिमें किये गये कर्मका क्षय नहीं होता, इसीलिये मुनियोंने इसका नाम अक्षय-तृतीया रखा है। (अध्याय ३०—३३)
- मत्स्यपुराणके अध्याय ६५ में इसके विषयमें एक दूसरी कथा आती है, जिसमें कहा गया है कि 'इस दिन अक्षतसे भगवान् विष्णुकी पूजा करनेसे वे विशेष प्रसन्न होते हैं और उसकी संतति भी अक्षय बनी रहती है—
अक्षया संततिस्तस्य तस्यां सुकृतमक्षयम्। अक्षतैः पूज्यते विष्णुस्तेन साक्षया स्मृता।
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
शान्तिव्रत
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! अब मैं पञ्चमी-कल्पमें शान्तिव्रतका वर्णन करता हूँ। इसके करनेसे गृहस्थोंको सब प्रकारकी शान्ति प्राप्त होती है। कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी पञ्चमीसे लेकर एक वर्षपर्यन्त खट्टे पदार्थोंका भोजन न करे। नक्तव्रत कर शेषनागके ऊपर स्थित भगवान् विष्णुका पूजन करे और निम्नलिखित मन्त्रोंसे उनके अङ्गोंकी पूजा करे—
‘ॐ अनन्ताय नमः, पादौ पूजयामि’ से भगवान् विष्णुके दोनों पैरोंकी, ‘ॐ धृतराष्ट्राय नमः, कटि पूजयामि’ से कटिप्रदेशकी, ‘ॐ तक्षकाय नमः, उदरं पूजयामि’ से उदरदेशकी, ‘ॐ कर्कोटकाय नमः, उरः पूजयामि’ से हृदयकी, ‘ॐ पञ्चाय नमः, कर्णौ पूजयामि’ से दोनों कानोंकी,
‘ॐ महापञ्चाय नमः, दोर्युगं पूजयामि’ से दोनों भुजाओंकी, ‘ॐ शङ्खुपालाय नमः, वक्षः पूजयामि’ से वक्षःस्थलकी तथा ‘ॐ कुलिकाय नमः, शिरः पूजयामि’ से उनके मस्तककी पूजा करे। तदनन्तर मौन हो भगवान् विष्णुको दूधसे स्नान कराये, फिर दुग्ध और तिलोंसे हवन करे। वर्ष पूरा होनेपर नारायण तथा शेषनागकी सुवर्णप्रतिमा बनवाकर उनका पूजन कर ब्राह्मणको दान दे, साथ ही उसे सवत्सा गौ, पायससे पूर्ण कांस्यपात्र, दो वस्त्र और यथाशक्ति सुवर्ण भी प्रदान करे। तत्पश्चात् ब्राह्मण-भोजन कराकर व्रत समाप्त करे। जो व्यक्ति इस व्रतको भक्तिपूर्वक करता है, वह नित्य शान्ति प्राप्त करता है और उसे नागोंका कभी भी कोई भय नहीं रहता। (अध्याय ३४)
सरस्वतीव्रतका विधान और फल
राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! किस व्रतके करनेसे वाणी मधुर होती है? प्राणीको सौभाग्य प्राप्त होता है? विद्यामें अतिकौशल प्राप्त होता है? पति-पत्नीका और बन्धुजनोंका कभी वियोग नहीं होता तथा दीर्घ आयुष्य प्राप्त होता है? उसे आप बतलायें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! आपने बहुत उत्तम बात पूछी है। इन फलोंको देनेवाले सारस्वतव्रतका विधान आप सुनें। इस व्रतके कीर्तनमात्रसे भी भगवती सरस्वती प्रसन्न हो जाती हैं। इस व्रतको वत्सरारम्भमें चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी पञ्चमीको आदित्यवारसे प्रारम्भ करना चाहिये। इस दिन भक्तिपूर्वक ब्राह्मणके द्वारा स्वस्तित्वाचन कराकर गन्ध, श्वेत माला, शुक्ल
अक्षत और श्वेत वस्त्रादि उपचारोंसे, वीणा, अक्षमाला, कमण्डलु तथा पुस्तक धारण की हुई एवं सभी अलंकारोंसे अलंकृत भगवती गायत्रीका पूजन करे। फिर हाथ जोड़कर इन मन्त्रोंसे प्रार्थना करे— यथा तु देवि भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः। त्वां परित्यज्य नो तिष्ठेत् तथा भव वरप्रदा॥ वेदशास्त्राणि सर्वाणि नृत्यगीतादिकं च यत्। वाहितं यत् त्वया देवि तथा मे सन्तु सिद्धयः॥ लक्ष्मीर्मधा वरा रिष्टिर्गौरी तुष्टिः प्रभा मतिः। एताभिः पाहि तनुभिरष्टाभिर्मा सरस्वति॥
(उत्तरपर्व ३५।७—९)
‘देवि! जिस प्रकार लोकपितामह ब्रह्मा आपका परित्यागकर कभी अलग नहीं रहते, उसी प्रकार
अक्षतस्तु नरा स्नाता विष्णोर्दत्त्वा तथाक्षतान्॥ (मत्स्यपुराण ६५।४)
(सामान्यतया अक्षतके द्वारा विष्णुपूजन निषिद्ध है, पर केवल इस दिन अक्षतसे उनकी पूजा की जाती है। अन्यत्र अक्षतके स्थानपर सफेद तिलका विधान है।)
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- उत्तरपर्व *
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आप हमें भी वर दीजिये कि हमारा भी कभी अपने परिवारके लोगोंसे वियोग न हो। हे देवि! वेदादि सम्पूर्ण शास्त्र तथा नृत्य-गीतादि जो भी विद्याएँ हैं, वे सभी आपके अधिष्ठानमें ही रहती हैं, वे सभी मुझे प्राप्त हों। हे भगवती सरस्वती देवि! आप अपनी—लक्ष्मी, मेधा, वरा, रिष्टि, गौरी, तुष्टि, प्रभा तथा मति—इन आठ मूर्तियोंके द्वारा मेरी रक्षा करें।’
इस विधिसे प्रार्थनाकर मौन होकर भोजन करे। प्रत्येक मासके शुक्ल पक्षकी पञ्चमीको सुवासिनी स्त्रियोंका भी पूजन करे और उन्हें तिल तथा चावल, घृतपात्र, दुग्ध एवं सुवर्ण प्रदान करे और देते समय ‘गायत्री प्रीयताम्’ ऐसा उच्चारण करे। सार्यकाल
मौन रहे। इस तरह वर्षभर व्रत करे। व्रतकी समासिपर ब्राह्मणको भोजनके लिये पूर्णपात्रमें चावल भरकर प्रदान करे। साथ ही दो श्वेत वस्त्र, सवत्सा गौ, चन्दन आदि भी दे। देवीको निवेदित किये गये वितान, घण्टा, अन्न आदि पदार्थ भी ब्राह्मणको दान कर दे। पूज्य गुरुका भी वस्त्र, माल्य तथा धन-धान्यसे पूजन करे। इस विधिसे जो पुरुष सारस्वतव्रत करता है, वह विद्वान्, धनवान् और मधुर कण्ठवाला होता है। भगवती सरस्वतीकी कृपासे वह वेदव्यासके समान कवि हो जाता है। नारी भी यदि इस व्रतका पालन करे तो उसे भी पूर्वोक्त फल प्राप्त होता है। (अध्याय ३५-३६)
श्रीपञ्चमीव्रत-कथा
राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! तीनों लोकोंमें लक्ष्मी दुर्लभ है; पर व्रत, होम, तप, जप, नमस्कार आदि किस कर्मके करनेसे स्थिर लक्ष्मी प्राप्त होती है? आप सब कुछ जाननेवाले हैं, कृपाकर उसका वर्णन करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! सुना जाता है कि प्राचीन कालमें भृगुमुनिकी ‘ख्याति’ नामकी स्त्रीसे लक्ष्मीका आविर्भाव हुआ। भृगुने विष्णुभगवान्के साथ लक्ष्मीका विवाह कर दिया। लक्ष्मी भी संसारके पति भगवान् विष्णुको वरके रूपमें प्राप्तकर अपनेको कृतार्थ मानकर अपने कृपाकटाक्षसे सम्पूर्ण जगत्को आनन्दित करने लगीं। उन्हींसे प्रजाओंमें क्षेम और सुभिक्ष होने लगा। सभी उपद्रव शान्त हो गये। ब्राह्मण हवन करने लगे, देवगण हविष्य-भोजन प्राप्त करने लगे और राजा प्रसन्नतापूर्वक चारों वर्णोंकी रक्षा करने लगे। इस प्रकार देवगणोंको अतीव आनन्दमें निमग्न देखकर विरोचन आदि दैत्यगण लक्ष्मीकी प्राप्तिके लिये तपस्या एवं यज्ञ-यागादि करने लगे।
वे सब भी सदाचारी और धार्मिक हो गये। फिर दैत्योंके पराक्रमसे सारा संसार आक्रान्त हो गया।
कुछ समय बाद देवताओंको लक्ष्मीका मद हो गया, उन लोगोंके शौच, पवित्रता, सत्यता और सभी उत्तम आचार नष्ट होने लगे। देवताओंको सत्य आदि शील तथा पवित्रतासे रहित देखकर लक्ष्मी दैत्योंके पास चली गयीं और देवगण श्रीविहीन हो गये। दैत्योंको भी लक्ष्मीकी प्राप्ति होते ही बहुत गर्व हो गया और दैत्यगण परस्पर कहने लगे कि ‘मैं ही देवता हूँ, मैं ही यज्ञ हूँ, मैं ही ब्राह्मण हूँ, सम्पूर्ण जगत् मेरा ही स्वरूप है, ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, चन्द्र आदि सब मैं ही हूँ।’ इस प्रकार अतिशय अहंकारयुक्त हो वे अनेक प्रकारका अनर्थ करने लगे। अहंकारमति दैत्योंकी भी यह दशा देखकर व्याकुल हो वह भृगुकन्या भगवती लक्ष्मी क्षीरसागरमें प्रविष्ट हो गयीं। क्षीरसागरमें लक्ष्मीके प्रवेश करनेसे तीनों लोक श्रीविहीन होकर अत्यन्त निस्तेज-से हो गये।
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
देवराज इन्द्रने अपने गुरु बृहस्पतिसे पूछा— महाराज! कोई ऐसा व्रत बतायें, जिसका अनुष्ठान करनेसे पुनः स्थिर लक्ष्मीकी प्राप्ति हो जाय।
देवगुरु बृहस्पति बोले—देवेन्द्र! मैं इस सम्बन्धमें आपको अत्यन्त गोपनीय श्रीपञ्चमीव्रतका विधान बतलाता हूँ। इसके करनेसे आपका अभीष्ट सिद्ध होगा। ऐसा कहकर देवगुरु बृहस्पतिने देवराज इन्द्रको श्रीपञ्चमीव्रतकी साङ्गोपाङ्ग विधि बतलाई। तदनुसार इन्द्रने उसका विधिवत् आचरण किया। इन्द्रको व्रत करते देखकर विष्णु आदि सभी देवता, दैत्य, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, सिद्ध, विद्याधर, नाग, ब्राह्मण, ऋषिगण तथा राजागण भी यह व्रत करने लगे। कुछ कालके अनन्तर व्रत समाप्तकर उत्तम बल और तेज पाकर सबने विचार किया कि समुद्रको मथकर लक्ष्मी और अमृतको ग्रहण करना चाहिये। यह विचारकर देवता और असुर मन्दरपर्वतको मथानी और वासुकिनागको रस्सी बनाकर समुद्र-मन्थन करने लगे। फलस्वरूप सर्वप्रथम शीतल किरणोंवाले अति उज्ज्वल चन्द्रमा प्रकट हुए, फिर देवी लक्ष्मीका प्रादुर्भाव हुआ। लक्ष्मीके कृपाकटाक्षको पाकर सभी देवता और दैत्य परम आनन्दित हो गये। भगवती लक्ष्मीने भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलका आश्रय ग्रहण किया, भगवान् विष्णुने इस व्रतको किया था, फलस्वरूप लक्ष्मीने इनका वर्ण किया। इन्द्रने राजस-भावसे व्रत किया था, इसलिये उन्होंने त्रिभुवनका राज्य प्राप्त किया। दैत्योंने तामस-भावसे व्रत किया था, इसलिये ऐश्वर्य पाकर भी वे ऐश्वर्यहीन हो गये। महाराज! इस प्रकार इस व्रतके प्रभावसे श्रीविहीन सम्पूर्ण जगत् फिरसे श्रीयुक्त हो गया।
महाराज युधिष्ठिरने पूछा—यदूतम! यह श्रीपञ्चमीव्रत किस विधिसे किया जाता है, कबसे यह प्रारम्भ होता है और इसकी पारणा कब होती है? आप इसे बतानेकी कृपा करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! यह व्रत मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी पञ्चमीको करना चाहिये। प्रातः उठकर शौच, दन्तधावन आदिसे निवृत्त हो व्रतके नियमको धारण करे। फिर नदीमें अथवा घरपर ही स्नान करे। दो वस्त्र धारण कर देवता और पितरोंका पूजन-तर्पण कर घर आकर लक्ष्मीका पूजन करे। सुवर्ण, चाँदी, ताम्र, आरकूट, काष्ठकी अथवा चित्रपटमें भगवती लक्ष्मीकी ऐसी प्रतिमा बनाये जो कमलपर विराजमान हो, हाथमें कमल-पुष्प धारण किये हो, सभी आभूषणोंसे अलंकृत हो, उनके लोचन कमलके समान हों और जिन्हें चार श्वेत हाथी सुवर्णके कलशोंके जलसे स्नान करा रहे हों। इस प्रकारकी भगवती लक्ष्मीकी प्रतिमाकी निम्नलिखित नाम-मन्त्रोंसे ऋतुकालोद्भूत पुष्पोंद्वारा अङ्गपूजा करे—
‘ॐ चपलायै नमः, पादौ पूजयामि’, ‘ॐ चञ्चलायै नमः, जानुनी पूजयामि’, ‘ॐ कमलवासिन्यै नमः, कटि पूजयामि’, ‘ॐ ख्यात्यै नमः, नाभि पूजयामि’, ‘ॐ मन्मथवासिन्यै नमः, स्तनौ पूजयामि’, ‘ॐ ललितायै नमः, भुजद्वयं पूजयामि’, ‘ॐ उत्कण्ठितायै नमः, कण्ठ पूजयामि’, ‘ॐ माधव्यै नमः, मुखमण्डलं पूजयामि’ तथा ‘ॐ श्रियै नमः, शिरः पूजयामि’ आदि नाम-मन्त्रोंसे पैरसे लेकर सिरतक पूजा करे। इस प्रकार प्रत्येक अङ्गोंकी भक्तिपूर्वक पूजाकर अंकुरित विविध धान्य और अनेक प्रकारके फल नैवेद्यमें देवीको निवेदित करे। तदनन्तर पुष्प और कुंकुम आदिसे सुवासिनी स्त्रियोंका पूजन कर उन्हें मधुर भोजन कराये और प्रणाम कर बिदा करे। एक प्रस्थ (सेरभर) चावल और घृतसे भरा पात्र ब्राह्मणको देकर ‘श्रीशः सम्प्रीयताम्’ इस प्रकार कहकर प्रार्थना करे। इस तरह पूजन कर मौन हो भोजन करे। प्रतिमास यह व्रत करे और श्री, लक्ष्मी, कमला, सम्पत्, रमा,
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- उत्तरपर्व *
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नारायणी, पद्मा, धृति, स्थिति, पुष्टि, ऋद्धि तथा सिद्धि—इन बारह नामोंसे क्रमशः बारह महिनोंमें भगवती लक्ष्मीकी पूजा करे और पूजनके अन्तमें 'प्रीयताम्' ऐसा उच्चारण करे। बारहवें महिनेकी पञ्चमीको वस्त्रसे उत्तम मण्डप बनाकर गन्ध-पुष्पादिसे उसे अलंकृतकर उसके मध्य शय्यापर उपकरणोंसहित भगवती लक्ष्मीकी मूर्ति स्थापित करे। आठ मोती, नेत्रपट्ट, ससधान्य, खड्गऊँ, जूता, छाता, अनेक प्रकारके पात्र और आसन वहाँ उपस्थापित करे। तदनन्तर लक्ष्मीका पूजन कर वेदवेत्ता और सदाचारसम्पन्न ब्राह्मणको सवत्सा गौसहित यह सब सामग्री प्रदान करे। यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा दे। अन्तमें भगवती लक्ष्मीसे ऋद्धिकी कामनासे इस प्रकार प्रार्थना करे—
क्षीराब्धिमथनोद्भूते विष्णोर्वक्षःस्थलालये। सर्वकामप्रदे देवि ऋद्धिं यच्छ नमोऽस्तु ते ॥
(उत्तरपर्व ३७।५४)
'हे देवि! आप क्षीरसागरके मन्थनसे उद्भूत हैं, भगवान् विष्णुका वक्षःस्थल आपका अधिष्ठान है, आप सभी कामनाओंको प्रदान करनेवाली हैं, अतः मुझे भी आप ऋद्धि प्रदान करें, आपको नमस्कार है।'
जो इस विधिसे श्रीपञ्चमीका व्रत करता है, वह अपने इक्कीस कुलोंके साथ लक्ष्मीलोकमें निवास करता है। जो सौभाग्यवती स्त्री इस व्रतको करती है, वह सौभाग्य, रूप, संतान और धनसे सम्पन्न हो जाती है तथा पतिको अत्यन्त प्रिय होती है।
(अध्याय ३७)
विशोक-षष्ठी-व्रत
राजा युधिष्ठिरने कहा—जनार्दन! आपके श्रीमुखसे पञ्चमी-व्रतोंका विधान सुनकर बहुत प्रसन्नता हुई। अब आप षष्ठीव्रतोंका विधान बतलायें। मैंने सुना है कि षष्ठीको भगवान् सूर्यकी पूजा करनेसे सभी व्याधियाँ शान्त हो जाती हैं और सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! सर्वप्रथम मैं विशोक-षष्ठी-व्रतका विधान बतलाता हूँ। इस तिथिको उपवास करनेसे मनुष्यको कभी शोक नहीं होता। माघ मासके शुक्ल पक्षकी पञ्चमीको प्रभातकालमें उठकर दन्तधावन करे, कृष्ण तिलोंसे स्नान आदिद्वारा पवित्र हो कृशर (खिचड़ी)-का भोजन करे, रात्रिमें ब्रह्मचर्यपूर्वक रहे। दूसरे दिन षष्ठीको प्रभातकालमें उठकर स्नान आदिसे पवित्र हो जाय। सुवर्णका एक कमल बनाये, उसे सूर्यनारायणका स्वरूप मानकर रक्तचन्दन, रक्तकरवीर-पुष्प और रक्तवर्णके दो वस्त्र, धूप,
दीप, नैवेद्य आदिसे उनका पूजन करे। तदनन्तर हाथ जोड़कर इस मन्त्रसे प्रार्थना करे—
यथा विशोकं भवनं त्वयैवादित्य सर्वदा।
तथा विशोकता मे स्यात् त्वद्भक्तिर्जन्मजन्मनि ॥
(उत्तरपर्व ३८।७)
'हे आदित्यदेव! जैसे आपने अपना स्थान शोकसे रहित बनाया है, वैसे ही मेरा भी भवन सदा शोकरहित हो तथा जन्म-जन्ममें मेरी आपमें भक्ति बनी रहे।'
इस विधिसे पूजनकर षष्ठीको ब्राह्मण-भोजन कराये। गोमूत्रका प्राशन करे। फिर गुड़, अन्न, उत्तम दो वस्त्र और सुवर्ण ब्राह्मणको प्रदान करे। सप्तमीको मौन होकर तेल और लवणरहित भोजन करे तथा पुराण भी श्रवण करे। इस प्रकार एक वर्षपर्यन्त दोनों पक्षोंकी षष्ठीका व्रतकर अन्तमें शुक्ल सप्तमीको सुवर्ण-कमलयुक्त कलश, श्रेष्ठ सामग्रियोंसे युक्त उत्तम शय्या और पयस्विनी
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
कपिला गौ ब्राह्मणको दान करे। इस विधिसे कृपणता छोड़कर जो इस व्रतको करता है, वह करोड़ों वर्षोंसे भी अधिक समयतक शोक, रोग, दुर्गति आदिसे मुक्त रहता है। यदि किसी कामनासे यह व्रत किया जाय तो उसकी वह कामना
अवश्य पूर्ण होती है और यदि निष्काम होकर व्रत करे तो उसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। जो इस शोक-विनाशिनी विशेष-षष्ठीको एक बार भी उपवास करता है, वह कभी दुःखी नहीं होता और इन्द्रलोकमें निवास करता है। (अध्याय ३८)
कमलषष्ठी ( फलषष्ठी )-व्रत
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! अब मैं कमल-षष्ठी नामक व्रतको बतलाता हूँ, जिसमें उपवास करनेसे व्यक्ति पापमुक्त होकर स्वर्गको प्राप्त करता है। मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी पञ्चमीको नियतव्रत होकर षष्ठीको उपवास करे। कृष्ण सप्तमीको सुवर्णकमल, सुवर्णफल तथा शर्कराके साथ कलश ब्राह्मणको प्रदान करे। इसी विधिसे एक वर्षपर्यन्त दोनों पक्षोंमें प्रत्येक षष्ठीको उपवास करे। भानु, अर्क, रवि, ब्रह्मा, सूर्य, शुक्र, हरि, शिव, श्रीमान्, विभावसु, त्वष्टा तथा वरुण—इन बारह नामोंसे क्रमशः बारह महीनोंमें पूजन करे और 'भानुमें प्रीयताम्', 'अर्को मे प्रीयताम्' इस प्रकार प्रतिमास सप्तमीको दान और षष्ठी-पूजन आदिके समय उच्चारण करे। व्रतके अन्तमें ब्राह्मण-दम्पतिकी पूजाकर वस्त्र-आभूषण, शर्करापूर्ण कलश और
सुवर्णकमल तथा स्वर्णफल ब्राह्मणको देकर निम्नलिखित मन्त्र पढ़कर व्रत पूर्ण करे—
यथा फलकरो मासस्त्वद्भक्तानां सदा रवे। तथानन्तफलावासिरस्तु जन्मनि जन्मनि॥
(उत्तरपर्व ३९।११)
'हे सूर्यदेव! जिस प्रकार आपके भक्तोंके लिये यह मास-व्रत फलदायी होता है, उसी प्रकार मुझे भी जन्म-जन्ममें अनन्त फलोंकी प्राप्ति होती रहे।'
इस अनन्त फल देनेवाली फलषष्ठी-व्रतको जो करता है, वह सुरापानादि सभी पापोंसे मुक्त हो सूर्यलोकमें सम्मानित होता है और अपने आगे-पीछेकी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करता है। जो इसका माहात्म्य श्रवण करता है, वह भी कल्याणका भागी होता है।*
(अध्याय ३९)
मन्दारषष्ठी-व्रत
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! अब मैं सभी पापोंको दूर करनेवाले तथा समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले मन्दारषष्ठी नामक व्रतका विधान बतलाता हूँ। व्रती माघ मासके शुक्ल पक्षकी पञ्चमी तिथिको स्वल्प भोजन कर नियमपूर्वक रहे और षष्ठीको उपवास करे। ब्राह्मणोंका पूजन करे तथा मन्दारका पुष्प भक्षण कर रात्रिमें शयन करे। षष्ठीको प्रातः उठकर स्नानादि करे तथा ताम्रपत्रमें काले तिलोंसे एक अष्टदल कमल बनाये।
उसपर हाथमें कमल लिये भगवान् सूर्यकी सुवर्णकी प्रतिमा स्थापित करे। आठ सोनेके अर्कपुष्पोंसे तथा गन्धादि उपचारोंसे अष्टदल-कमलके दलोंमें पूर्वदि क्रमसे भगवान् सूर्यके नाम-मन्त्रोंद्वारा इस प्रकार पूजा करे—'ॐ भास्कराय नमः' से पूर्व दिशामें, 'ॐ सूर्याय नमः' से अग्रिकोणमें, 'ॐ अर्काय नमः' से दक्षिणमें, 'ॐ अर्यम्नो नमः' से नैऋत्यमें, 'ॐ वसुधात्रे नमः' से पश्चिममें, 'ॐ चण्डभानवे नमः' से वायव्यमें,
- मत्स्यपुराणके अध्याय ७६ में फलसप्तमी नामसे इसी व्रतका वर्णन हुआ है।
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- उत्तरपर्व *
४२९
'ॐ पूष्णे नमः' से उत्तरमें, 'ॐ आनन्दाय नमः' से ईशानकोणमें तथा उस कमलकी मध्यवर्ती कर्णिकामें 'ॐ सर्वात्मने पुरुषाय नमः' यह कहकर शुक्ल वस्त्र, नैवेद्य तथा माल्य एवं फलादि सभी उपचारोंसे भगवान् सूर्यका पूजन करे। ससमीको पूर्वाभिमुख मौन होकर तेल तथा लवण भक्षण करे। इस प्रकार प्रत्येक मासकी शुक्ल-षष्ठीको व्रतकर ससमीको पारण करे। वर्षके अन्तमें वही मूर्ति कलशके ऊपर स्थापित कर यथाशक्ति वस्त्र, गौ, सुवर्ण आदि ब्राह्मणको प्रदान करे और दान करते समय यह मन्त्र पढ़े—
नमो मन्दारनाथाय मन्दारभवनाय च। त्वं च वै तारयस्वास्मानस्मात् संसारकर्दमात्॥
(उत्तरपर्व ४०।११)
'हे मन्दारभवन, मन्दारनाथ भगवान् सूर्य! आप हमलोगोंका इस संसाररूपी पङ्कसे उद्धार कर दें, आपको नमस्कार है।'
इस विधिसे जो मन्दारषष्ठीका व्रत करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर एक कल्पतक सुखपूर्वक स्वर्गमें निवास करता है और जो इस विधानको पढ़ता है अथवा सुनता है, वह भी सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है*। (अध्याय ४०)
ललिताषष्ठी-व्रतकी विधि
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी षष्ठीको यह व्रत होता है। उस दिन उत्तम रूप, सौभाग्य और संतानकी इच्छावाली स्त्रीको चाहिये कि वह नदीमें स्नान करे और एक नये बाँसके पात्रमें बालू लेकर घर आये। फिर वस्त्रका मण्डप बनाकर उसमें दीप प्रज्वलित करे। मण्डपमें वह बाँसका बालुकामय पात्र स्थापित कर उसमें बालुकामयी, तपोवन-निवासिनी भगवती ललितागौरीका ध्यानकर पूजन करे और उस दिन उपवास रहे, तदनन्तर चम्पक, करवीर, अशोक, मालती, नीलोत्पल, केतकी तथा तगर-पुष्प—इनमेंसे प्रत्येककी १०८ या २८ पुष्पाञ्जलि अक्षतोंके साथ निम्नलिखित मन्त्रसे दे—
ललिते ललिते देवि सौख्यसौभाग्यदायिनि।
या सौभाग्यसमुत्पन्ना तस्यै देव्यै नमो नमः॥
(उत्तरपर्व ४१।८)
इस प्रकारसे पूजन करनेके पश्चात् तरह-तरहके सोहाल, मोदक आदि पक्वान, कूष्माण्ड, ककड़ी,
बिल्व, करेला, बैगन, करंज आदि फल भगवती ललिताको निवेदित करे और धूप, दीप, वस्त्राभूषण आदि भी समर्पित करे। इस विधिसे पूजनकर रात्रिको जागरण करे तथा गीत-नृत्यादि उत्सव करे। दूसरे दिन प्रातः गीत-वाद्यसहित मूर्तिको नदीके समीप ले जाय। वहाँ पूजनकर पूजन-सामग्री ब्राह्मणको निवेदित कर दे और भगवती ललिताकी बालुकामयी मूर्तिको नदीमें विसर्जित कर दे। घर आकर हवन करे और देवता, पितर, मनुष्य तथा सुवासिनी स्त्रियोंका पूजन करे। पंद्रह कुमारी कन्याओंको और उतने ही ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारके स्वादिष्ट भोजनोंसे संतुष्ट कर दक्षिणा प्रदान करे और 'ललिता प्रीतियुक्ता अस्तु' यह कहकर उन्हें बिदा करे। जो पुरुष अथवा स्त्री इस ललिताषष्ठी-व्रतको करते हैं, उन्हें संसारमें कोई पदार्थ दुर्लभ नहीं रहता। व्रत करनेवाली स्त्री बहुत कालपर्यन्त सुख-सौभाग्यसे सम्पन्न रहकर अन्तमें गौरीलोकमें निवास करती है। (अध्याय ४१)
- मत्स्यपुराणके अध्याय ७९ में मन्दारससमी नामसे इसी व्रतका वर्णन हुआ है।
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४३०
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
कुमारषष्ठी-व्रतकी कथा
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—भरतसत्तम महाराज युधिष्ठिर! मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी षष्ठी तिथि समस्त पापनाशिनी, धन-धान्य तथा शान्ति-प्रदायिनी एवं अतिकल्याणकारिणी है। उसी दिन कार्तिकेयने तारकासुरका वध किया था, इसलिये यह षष्ठी तिथि स्वामिकार्तिकेयको बहुत प्रिय है। इस दिन किया हुआ स्नान-दान आदि कर्म अक्षय होता है। दक्षिण देशमें स्थित कार्तिकेयका जो इस तिथिमें दर्शन करता है, वह निःसंदेह ब्रह्महत्यादि पापोंसे मुक्त हो जाता है, इसलिये इस तिथिमें कुमारस्वामीकी सोने, चाँदी अथवा मिट्टीकी मूर्ति बनवाकर पूजा करनी चाहिये। अपराह्णमें स्नान तथा आचमनकर, पद्मासन लगाकर बैठ जाय और स्वामी कुमारका एकाग्रचित्तसे ध्यान करे। इस दिन उपवासपूर्वक निम्नलिखित मन्त्र पढ़ते हुए इनके मस्तकपर कलशसे अभिषेक करे—
चन्द्रमण्डलभूतानां भवभूतिपवित्रिता।
गङ्गाकुमार धारेर्यं पतिता तव मस्तके॥
(उत्तरपर्व ४२।७)
इस प्रकार अभिषेक कर भगवान् सूर्यका पूजन करे, तदनन्तर गन्ध, पुष्प, धूप, नैवेद्य आदि उपचारोंद्वारा कृतिकापुत्र कार्तिकेयकी निम्न मन्त्रसे पूजा करे—
देव सेनापते स्कन्द कार्तिकेय भवोद्भव।
कुमार गुह गाङ्ग्रेय शक्तिहस्त नमोऽस्तु ते॥
(उत्तरपर्व ४२।९)
दक्षिण-देशोत्पन्न अन्न, फल और मलय चन्दन भी चढ़ाये। इसके बाद स्वामिकार्तिकेयके परमप्रिय छाग, कुकुट, कलापयुक्त मयूर तथा उनकी माता भगवती पार्वती—इनका प्रत्यक्ष पूजन करे अथवा इनकी सुवर्णकी प्रतिमा बनाकर पूजन करे। पूजनके अनन्तर पूर्वोक्त देवसेनापति
तथा स्कन्द आदि नाम-मन्त्रोंसे आज्ययुक्त तिलोंसे हवन करे, अनन्तर फल भक्षण कर भूमिपर कुशाकी शय्यापर शयन करे। क्रमशः बारह महीनोंमें नारियल, मातुलुंग (बिजौरा नींबू), नारंगी, पनस (कटहल), जम्बीर (एक प्रकारका नींबू), दाड़िम, द्राक्षा, आम्र, बिल्व, आमलक, ककड़ी तथा केला—इन फलोंका भक्षण करे। ये फल उपलब्ध न हों तो उस कालमें उपलब्ध फलोंका सेवन करे। प्रातःकाल सोनेके बने छाग अथवा कुकुटका 'सेनानी प्रीयताम्' ऐसा कहकर ब्राह्मणको दे। बारह महीनोंमें क्रमसे सेनानी, सम्भूत, क्रीञ्चारि, षण्मुख, गुह, गाङ्ग्रेय, कार्तिकेय, स्वामी, बालग्रहाग्रणी, छागप्रिय, शक्तिधर तथा द्वार—इन नामोंसे कार्तिकेयका पूजन करे और नामोंके अन्तमें 'प्रीयताम्' यह पद योजित करे। यथा—'सेनानी प्रीयताम्' इत्यादि। इसके पश्चात् ब्राह्मणोंको भोजन कराकर स्वयं भी मौन होकर भोजन करे। वर्ष समाप्त होनेपर कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी षष्ठीको वस्त्र, आभूषण आदिसे कार्तिकेयका पूजन एवं हवन करे और सब सामग्री ब्राह्मणको निवेदित कर दे।
इस विधिसे जो पुरुष अथवा स्त्री इस व्रतको करते हैं, वे उत्तम फलोंको प्राप्त कर इन्द्रलोकमें निवास करते हैं, अतः राजन्! शंकरात्मज कार्तिकेयका सदा प्रयत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये। राजाओंके लिये तो कार्तिकेयकी पूजाका विशेष महत्त्व है। जो राजा स्वामी कुमारका इस प्रकार पूजनकर युद्धके लिये जाता है, वह अवश्य ही विजय प्राप्त करता है। विधिपूर्वक पूजा करनेपर भगवान् कार्तिकेय पूर्ण प्रसन्न हो जाते हैं। जो षष्ठीको नक्तव्रत करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर कार्तिकेयके लोकमें निवास करता है। दक्षिण दिशामें जाकर
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- उत्तरपर्व *
४३१
जो भक्तिपूर्वक कार्तिकेयका दर्शन और पूजन करता है वह शिवलोकको प्राप्त करता है। जो सदा शरवणोद्भव आदिदेव कार्तिकेयकी आराधना
करता है, वह बहुत कालतक स्वर्गका सुख भोगकर पृथ्वीपर जन्म ग्रहण करता तथा चक्रवर्ती राजाका सेनापति होता है। (अध्याय ४२)
विजयाससमी-व्रत
युधिष्ठिरने पूछा—देव! विजयाससमी-व्रतमें किसकी पूजा की जाती है, उसका क्या विधान है और क्या फल है? इसे आप बतलानेकी कृपा करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! शुक्ल पक्षकी ससमी तिथिको यदि आदित्यवार हो तो उसे विजया ससमी कहते हैं। वह सभी पातकोंका विनाश करनेवाली है। उस दिन किया हुआ स्नान, दान, जप, होम तथा उपवास आदि कर्म अनन्त फलदायक होता है। जो उस दिन फल, पुष्प आदि लेकर भगवान् सूर्यकी प्रदक्षिणा करता है, वह सर्वगुणसम्पन्न उत्तम पुत्रको प्राप्त करता है। पहली प्रदक्षिणा नारियल-फलोंसे, दूसरी रक्तनागरसे, तीसरी बिजौरा नींबूसे, चौथी कदलीफलसे, पाँचवीं श्रेष्ठ कृष्णाण्डसे, छठी पके हुए तेंदुके फलोंसे और सातवीं वृन्ताक-फलोंसे करे अथवा अष्टोत्तरशत प्रदक्षिणा करे। मोती, पद्मराग, नीलम, पन्ना, गोमेद, हीरा और वैदूर्य आदिसे भी प्रदक्षिणा करे तथा अखरोट, बेर, बिल्व, करौंदा, आम्र, आम्रातक (आमड़ा), जामुन आदि जो भी उस कालमें फल-फूल मिले उससे प्रदक्षिणा करे। प्रदक्षिणा करते समय बीचमें बैठे नहीं, न किसीको स्पर्श करे और न किसीसे बात करे। एकाग्रचित्तसे प्रदक्षिणा करनेसे सूर्यभगवान् प्रसन्न होते हैं। गौके घृतसे वसोर्धारा भी दे। किंकिणीयुक्त ध्वजा तथा श्वेत छत्र चढ़ाये और फिर कुंकुम, गन्ध, पुष्प, धूप तथा नैवेद्य आदि उपचारोंसे पूजन कर इस मन्त्रसे भगवान् सूर्यसे क्षमा-प्रार्थना करे—
भानो भास्कर मार्तण्ड चण्डरश्मे दिवाकर।
आरोग्यमायुर्विजयं पुत्रं देहि नमोऽस्तु ते॥
(उत्तरपर्व ४३।१४)
इस व्रतमें उपवास, नक्तव्रत अथवा अयाचित-व्रत करे। इस विजयाससमीका नियमपूर्वक व्रत करनेसे रोगी रोगसे मुक्त हो जाता है, दरिद्र लक्ष्मी प्राप्त करता है, पुत्रहीन पुत्र प्राप्त करता है तथा विद्यार्थी विद्या प्राप्त करता है। शुक्ल पक्षकी आदित्यवारयुक्त सात ससमियोंमें नक्तव्रत कर मूँगका भोजन करना चाहिये। भूमिपर पलाशके पत्तोंपर शयन करना चाहिये। इस प्रकार व्रतकी समाप्तिपर सूर्यभगवान्का पूजनकर षडक्षर-मन्त्र ('खखोल्लाक्य नमः')-से अष्टोत्तरशत हवन करे। सुवर्णपात्रमें सूर्यप्रतिमा स्थापित कर रक्त वस्त्र, गौ और दक्षिणा इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए ब्राह्मणको प्रदान करे—
ॐ भास्कराय सुदेवाय नमस्तुभ्यं यशस्कर॥
ममाद्य समीहितार्थप्रदो भव नमो नमः।
(उत्तरपर्व ४३।२३-२४)
तदनन्तर शय्या-दान, श्राद्ध, पितृर्पण आदि कर्म करे। इस व्रतके करनेसे यात्रियोंकी यात्रा प्रशस्त हो जाती है, विजयकी इच्छावाले राजाको युद्धमें विजय अवश्य प्राप्त होती है, इसलिये लोकमें यह विजया ससमीके नामसे विश्रुत है। इस व्रतको करनेवाला पुरुष संसारके समस्त सुखोंको भोगकर सूर्यलोकमें निवास करता है और फिर पृथ्वीपर जन्म ग्रहणकर दानी, भोगी, विद्वान्, दीर्घायु, नीरोग, सुखी और हाथी, घोड़े तथा रत्नोंसे सम्पन्न बड़ा प्रतापी राजा होता है। यदि स्त्री इस व्रतको करे तो वह पुण्यभागिनी होकर उत्तम फलोंको प्राप्त करती है। राजन्! इसमें आपको किंचित् भी संदेह नहीं करना चाहिये। (अध्याय ४३)
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४३२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
आदित्य-मण्डलदान-विधि
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! अब मैं समस्त अशुभोंके निवारण करनेवाले श्रेयस्कर आदित्य-मण्डलके दानका वर्णन करता हूँ। जो अथवा गोधूमके चूर्णमें गुड़ मिलाकर उसे गौके घृतमें भलीभाँति पकाकर सूर्यमण्डलके समान एक अति सुन्दर अपूप बनाये और फिर सूर्यभगवान्का पूजनकर उनके आगे रक्त चन्दनका मण्डप अंकितकर उसके ऊपर वह सूर्यमण्डलात्मक मण्डक (एक प्रकारका पिष्टक) रखे। ब्राह्मणको सादर आमन्त्रित कर रक्त वस्त्र तथा दक्षिणासहित वह मण्डक इस मन्त्रको पढ़ते हुए ब्राह्मणको प्रदान करे—
आदित्यतेजसोत्पन्नं राजतं विधिनिर्मितम्।
श्रेयसे मम विप्र त्वं प्रतिगृह्णैदमुत्तमम्॥
(उत्तरपर्व ४४।५)
ब्राह्मण भी उसे ग्रहणकर निम्नलिखित मन्त्र बोले— कामदं धनदं धर्म्यं पुत्रदं सुखदं तव। आदित्यप्रीतये दत्तं प्रतिगृह्णाहि मण्डलम्॥
(उत्तरपर्व ४४।६)
इस प्रकार विजयससमीको मण्डकका दान करे और सामर्थ्य होनेपर सूर्यभगवान्की प्रीतिके लिये शुद्धभावसे नित्य ही मण्डक प्रदान करे। इस विधिसे जो मण्डकका दान करता है, वह भगवान् सूर्यके अनुग्रहसे राजा होता है और स्वर्गलोकमें भगवान् सूर्यकी तरह सुशोभित होता है। (अध्याय ४४)
वर्ज्यससमी-व्रत
महाराज युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! धन, सौख्य तथा समस्त मनोवाञ्छित कामनाओंको प्रदान करनेवाली किसी ससमीव्रतका आप वर्णन करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! उत्तरायणके व्यतीत हो जानेपर शुक्ल पक्षमें पुरुषवाची नक्षत्रमें आदित्यवारको ससमी-तिथि-व्रत ग्रहण करे। धान, तिल, जौ, उड़द, मूँग, गेहूँ, मधु, निन्द्य भोजन, मैथुन, कांस्यपात्रमें भोजन, तैलाभ्यङ्ग, अंजन और शिलापर पीसी हुई वस्तु—इन सबका
षष्ठी तिथिको प्रयोग न करे। इन पदार्थोंका षष्ठीके दिन परित्याग कर केवल चनाका भोग करे और देवता, मुनि तथा पित्र—इन सबका तर्पण कर भगवान् सूर्यका पूजन करे। घृतयुक्त तिल और जौका हवन कर भगवान् सूर्यका ध्यान करता हुआ भूमिपर शयन करे। इस विधिसे जो एक वर्षतक व्रत करता है, वह अपने सभी मनोवाञ्छित फलको प्राप्त कर लेता है।
(अध्याय ४५)
कुक्कुट-मर्कटी-व्रतकथा (मुक्ताभरण ससमीव्रत-कथा)
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज युधिष्ठिर! एक बार महर्षि लोमश मथुरा आये और वहाँ मेरे माता-पिता—देवकी-वसुदेवने उनकी बड़ी श्रद्धासे आवभगत की। फिर वे प्रेमसे बैठकर अनेक
प्रकारकी कथाएँ कहने लगे। उन्होंने उसी प्रसंगमें मेरी मातासे कहा—‘देवकी! कंसने तुम्हारे बहुतसे पुत्रोंको मार डाला है, अतः तुम मृतवत्सा एवं दुःखभागिनी बन गयी हो। इसी प्रकारसे प्राचीन
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- उत्तरपर्व *
४३३
कालमें चन्द्रमुखी नामकी एक सुलक्षण रानी भी मृतवत्सा एवं दुःखी हो गयी थी। परंतु उसने एक ऐसे व्रतका अनुष्ठान किया, जिसके प्रभावसे वह जीवत्पुत्रा हो गयी। इसलिये देवकी! तुम भी उस व्रतके अनुष्ठानके प्रभावसे वैसी हो जाओगी, इसमें संशय नहीं।'
माता देवकीने उनसे पूछा—महाराज! वह चन्द्रमुखी रानी कौन थी? उसने सौभाग्य और आरोग्यकी वृद्धि करनेवाला कौन-सा व्रत किया था? जिसके कारण उसकी संतान जीवित हो गयी। आप मुझे भी वह व्रत बतलानेकी कृपा करें।
लोमशमुनि बोले—प्राचीन कालमें अयोध्यामें नहुष नामके एक प्रसिद्ध राजा थे, उन्हींकी महारानीका नाम चन्द्रमुखी था। राजाके पुरोहितकी पत्नी मानमानिकासे रानी चन्द्रमुखीकी बहुत प्रीति थी। एक दिन वे दोनों सखियाँ स्नान करनेके लिये सरयू-तटपर गयीं। उस समय नगरकी और भी बहुत-सी स्त्रियाँ वहाँ स्नान करने आयी हुई थीं। उन सब स्त्रियोंने स्नानकर एक मण्डल बनाया और उसमें शिव-पार्वतीकी प्रतिमा चित्रितकर गन्ध, पुष्प, अक्षत आदिसे भक्तिपूर्वक यथाविधि उनकी पूजा की। अनन्तर उन्हें प्रणामकर जब वे सभी अपने घर जानेको उद्यत हुईं, तब महारानी चन्द्रमुखी तथा पुरोहितकी स्त्री मानमानिकाने उनसे पूछा—'देवियो! तुमलोगोंने यह किसकी और किस उद्देश्यसे पूजा की है?' इसपर वे कहने लगीं—'हमलोगोंने भगवान् शिव एवं भगवती पार्वतीकी पूजा की है और उनके प्रति आत्म-समर्पण कर यह सुवर्णसूत्रमय धागा भी हाथमें धारण किया है। हम सब जबतक प्राण रहेंगे, तबतक इसे धारण किये रहेंगी और शिव-पार्वतीका पूजन भी किया करेंगी।' यह सुनकर उन दोनोंने
भी यह व्रत करनेका निश्चय किया और वे अपने घर आ गयीं तथा नियमसे व्रत करने लगीं। परंतु कुछ समय बाद रानी चन्द्रमुखी प्रमादवश व्रत करना भूल गयीं और सूत्र भी न बाँध सकीं। इस कारण मरनेके अनन्तर वह वानरी हुई, पुरोहितकी स्त्रीका भी व्रत भङ्ग हो गया, इसलिये मरकर वह कुक्कुटी हुई। उन योनियोंमें भी उनकी मित्रता और पूर्वजन्मकी स्मृतियाँ बनी रहीं।
कुछ कालके अनन्तर दोनोंकी मृत्यु हो गयी। फिर रानी चन्द्रमुखी तो मालव देशके पृथ्वीनाथ नामक राजाकी मुख्य रानी और पुरोहित अग्रिमिलकी स्त्री मानमानिका उसी राजाके पुरोहितकी पत्नी हुई। रानीका नाम ईश्वरी और पुरोहितकी स्त्रीका नाम भूषणा था। भूषणाको अपने पूर्वजन्मोंका ज्ञान था। उसके आठ उत्तम पुत्र हुए। परंतु रानी ईश्वरीको बहुत समयके बाद एक पुत्र उत्पन्न हुआ, वह रोगग्रस्त रहता था। इस कारण थोड़े ही समय बाद (नवें वर्ष) उसकी मृत्यु हो गयी। तब दुःखी हो भूषणा अपनी सखी रानी ईश्वरीको आश्वासन देने उनके पास आयी। भूषणाके बहुतसे पुत्रोंको देखकर ईश्वरीके मनमें ईर्ष्या उत्पन्न हो गयी, फलस्वरूप रानी ईश्वरीने धीरे-धीरे भूषणाके सभी पुत्र मरवा डाले, परंतु भगवान् शंकरके अनुग्रहसे वे मरकर भी पुनः जीवित हो उठे। तब ईश्वरीने भूषणाको अपने यहाँ बुलवाया और उससे पूछा—'सखि! तुमने ऐसा कौन-सा पुण्यकर्म किया है, जिसके कारण तुम्हारे मरे हुए भी पुत्र जीवित हो जाते हैं और तुम्हारे बहुतसे चिरजीवी पुत्र उत्पन्न हुए हैं, मुक्ता आदि आभूषणोंसे रहित होनेपर भी कैसे तुम सदा सुशोभित रहती हो?'
भूषणाने कहा—सखि! मुक्ताभरण ससमी-व्रतका विलक्षण माहात्म्य है। भाद्रपद मासके
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४३४
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
शुक्ल पक्षकी सप्तमीको किये जानेवाले इस व्रतमें स्नानकर एक मण्डल बनाकर उसमें शिव-पार्वतीका पूजन करे और शिवको आत्म-निवेदित सूत्र (दोरक)- को हाथमें धारण करे अथवा चाँदी, सोनेकी अँगूठी बनाकर अँगुलीमें पहने। उस दिन उपवास करे। बादमें व्रतका उद्यापन करे। उद्यापनके दिन शिव-पार्वतीका मण्डलमें पूजन कर वह अँगूठी ताम्रके पात्रमें रखकर ब्राह्मणको दे दे तथा यथाशक्ति ब्राह्मण-भोजन भी कराये। इस व्रतके करनेसे सभी पदार्थ प्राप्त होते हैं।
सखि! भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी सप्तमी तिथिको तुमने और मैंने साथ ही इस व्रतका नियम ग्रहण किया था, परंतु प्रमादवश तुमने इसे छोड़ दिया, इसीसे तुम्हारा पुत्र नष्ट हो गया और राज्य पाकर भी तुम दुःखी ही रहती हो। मैंने व्रतका भक्तिपूर्वक पालन किया, इससे मैं सब प्रकारसे सुखी हूँ, परंतु मेरा व्रत अन्तमें भङ्ग हो गया था, इसलिये एक जन्ममें मुझे कुक्कुटी बनना पड़ा। सखि! मैं तुम्हें अपने द्वारा किये गये
व्रतका आधा पुण्यफल देती हूँ, इससे तुम्हारे सभी दुःख दूर हो जायेंगे। इतना कहकर भूषणने अपने व्रतका आधा पुण्यफल ईश्वरीको दे दिया। उसके प्रभावसे ईश्वरीके दीर्घ आयुवाले बहुत पुत्र उत्पन्न हुए और उसे सब प्रकारका सुख प्राप्त हुआ तथा अन्तमें मोक्ष भी प्राप्त हुआ।
लोमशमुनि बोले—देवकी! तुम भी इस व्रतको करो, इससे तुम्हारी संतान स्थिर हो जायगी और तुम्हारा पुत्र तीनों लोकोंका स्वामी होगा। यह कहकर लोमशमुनि अपने आश्रमको चले गये।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! (मेरी माताको इसी व्रतके प्रभावसे मेरे-जैसा पुत्र पैदा हुआ और मेरी इतनी आयु बढ़ी तथा कंस आदि दुष्टोंसे बच भी गया।) यह प्रसंगवश मैंने इस व्रतका माहात्म्य बतलाया है, अन्य जो भी कोई स्त्री इस व्रतका आचरण करेगी, उसे कभी संतानका वियोग नहीं होगा और अन्तमें वह शिवलोकको प्राप्त करेगी*।
(अध्याय ४६)
उभय-सप्तमीव्रत
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! अब मैं सप्तमी-कल्पका वर्णन करता हूँ। आप इसे प्रीतिपूर्वक सुनें। माघ महीनेकी शुक्ला सप्तमीको संकल्पकर भगवान् सूर्यका वरुणदेव नामसे पूजन करे। अष्टमीके दिन तिल, पिष्ट, गुड़ और ओदन ब्राह्मणोंको भोजन कराये, ऐसा करनेसे अग्निष्टोम यज्ञका फल प्राप्त होता है। फाल्गुन शुक्ला सप्तमीको भगवान् सूर्यका पूजन करनेसे वाजपेय-यज्ञका फल प्राप्त होता है। चैत्र शुक्ला सप्तमीमें वेदांशु नामसे सूर्य-
पूजन करनेसे उक्थ नामक यज्ञके समान पवित्र फल प्राप्त होता है। वैशाखके शुक्ल पक्षकी सप्तमीको धाता नामसे पूजा करनेसे पशुबन्ध-यागके पुण्यके समान फल प्राप्त होता है। ज्येष्ठ मासकी सप्तमीको इन्द्र नामसे सूर्यकी पूजा करनेसे वाजपेय-यज्ञका दुर्लभ फल प्राप्त होता है। आषाढ़ मासकी सप्तमीको दिवाकरकी पूजा करनेसे बहुत सुवर्णकी दक्षिणावाले यज्ञका फल प्राप्त होता है। श्रावणकी सप्तमीको मातापि (लोलार्क)-को पूजनेसे सौत्रामणि यागका
- इसी व्रतका ठीक इन्हीं श्लोकोंमें हेमाद्रि, जयसिंह-कल्पद्रुम तथा व्रतराज आदि निबन्ध-ग्रन्थोंमें मुक्ताभरण-सप्तमीके नामसे उल्लेख किया गया है और उसके श्लोक भविष्यपुराणके नामसे सूचित किये गये हैं, किंतु आश्चर्य है कि वहाँ इसे कुक्कुट-मर्कटी-सप्तमी नहीं कहा गया है। सम्भव है कि भविष्यपुराणके अन्य किन्हीं हस्तलिखित प्रतियोंकी पुष्पिकामें इन्हें मुक्ताभरण-सप्तमीके नामसे निर्दिष्ट किया गया हो। मोनियर विलियम नामक संस्कृत अंग्रेजीके विख्यात कोशमें कैटलगस नामसे कुक्कुट-मर्कट-सप्तमीके नामका ही उल्लेख किया गया है।
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- उत्तरपर्व *
४३५
फल प्राप्त होता है। भाद्रपद मासमें शुचि नामसे सूर्यका पूजन करे तो तुलापुरुष-दानका फल प्राप्त होता है। आश्विन शुक्ला सप्तमीको सविताकी पूजा करनेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है। कार्तिक शुक्ला सप्तमीमें सप्तवाहन दिनेशकी पूजा करनेसे पुण्डरीक-यागका फल प्राप्त होता है। मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी सप्तमीमें भानुकी पूजा करनेसे दस राजसूय-यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। पौष मासमें शुक्ल पक्षकी सप्तमीको भास्करकी पूजा करनेसे अनेक यज्ञोंका फल मिलता है। इसी प्रकार प्रत्येक मासके कृष्ण पक्षकी सप्तमीको भी उन-उन नामोंसे पूजा करनी चाहिये।
महाराज! इस प्रकार एक वर्षतक व्रत और पूजन कर उद्यापन करे। पवित्र भूमिपर एक हाथ, दो हाथ अथवा चार हाथ रक्त चन्दनका मण्डल बनाकर उसमें सिंदूर और गेरुका सूर्यमण्डल बनाये। कमल आदि रक्तपुष्पों, शल्लकी वृक्षके गोंद आदिसे
निर्मित धूप तथा अनेक प्रकारके नैवेद्योंसे भगवान् सूर्यका पूजन करे। अत्र तथा स्वर्णसे भरे कलशोंको उनके सामने स्थापित करे। फिर अग्निसंस्कार कर तिल, घृत, गुड़ और आककी समिधाओंसे 'आ कृष्णो नो' (यजु० ३३। ४३) इस मन्त्रसे एक हजार आहुति दे। अनन्तर द्वादश ब्राह्मणोंको रक्त वस्त्र, एक-एक सवत्सा गौ, छतरी, जूता, दक्षिणा और भोजन देकर क्षमा-प्रार्थना करे। बादमें स्वयं भी मौन होकर भोजन करे।
इस विधिसे जो सप्तमीका व्रत करता है, वह नीरोग, कुशल वक्ता, रूपवान् और दीर्घायु होता है। जो पुरुष सप्तमीके दिन उपवास कर भगवान् सूर्यका दर्शन करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर सूर्यलोकमें निवास करता है। यह उभय-सप्तमीव्रत सम्पूर्ण अशुभोंको दूर कर आरोग्य और सूर्यलोक प्राप्त करानेवाला है, ऐसा देवर्षि नारदका कहना है। (अध्याय ४७)
कल्याणसप्तमी-व्रतकी विधि
महाराज युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! यदि इस संसार-सागरसे पार उतारनेवाला तथा स्वर्ग, आरोग्य एवं सुखप्रदायक कोई व्रत हो तो उसे आप बतलानेकी कृपा करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! जिस शुक्ला सप्तमीको आदित्यवार हो, उसे विजया-सप्तमी या कल्याण-सप्तमी कहते हैं। यह तिथि महापुण्यमयी है। इस दिन प्रातःकाल गोदुग्धयुक्त जलसे स्नानकर शुक्ल वस्त्र धारण कर अक्षतोंसे अति सुन्दर एक कर्णिकायुक्त अष्टदलकमल बनाये तथा पूर्वादि आठों दलोंमें क्रमशः पूर्व दिशामें 'ॐ तपनाय नमः,' अग्रिकोणमें 'ॐ मार्तण्डाय नमः,' दक्षिण
दिशामें 'ॐ दिवाकराय नमः,' नैऋत्यकोणमें 'ॐ विधत्रे नमः,' पश्चिम दिशामें 'ॐ वरुणाय नमः,' वायव्यकोणमें 'ॐ भास्कराय नमः,' उत्तर दिशामें 'ॐ विकर्तनाय नमः' तथा ईशानकोणमें 'ॐ रवये नमः'—इस प्रकारसे नाम-मन्त्रोंद्वारा कर्णिकाओंमें सभी उपचारोंसे पूजन करे। शुक्ल वस्त्र, फल, भक्ष्य पदार्थ, धूप, पुष्पमाला, गुड़ और लवणसे नमस्कारान्त इन नाम-मन्त्रोंसे वेदीके ऊपर पूजा करे। इसके बाद व्याहृति-होमकर यथाशक्ति ब्राह्मणभोजन कराये। गुरुको सुवर्णसहित तिलपात्र-दान करे। दूसरे दिन प्रातः उठकर नित्य-क्रियासे निवृत्त हो ब्राह्मणोंके साथ घृत एवं पायससे
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
बने पदार्थोंका भोजन करे। इस प्रकार एक वर्षतक भगवान् सूर्यका पूजन एवं व्रतकर उद्यापन करे। जल, कलश, घृतपात्र, सुवर्ण, वस्त्र, आभूषण और सवत्सा गौ ब्राह्मणको दे। इतनी शक्ति न हो
तो गोदान करे। जो इस कल्याणससमी-व्रतको करता है अथवा माहात्म्यको पढ़ता या सुनता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर सूर्यलोकमें निवास करता है१। (अध्याय ४८)
शर्कराससमी-व्रतकी विधि
भगवान् श्रीकृष्ण बोले— धर्मराज! अब मैं सभी पापोंको नष्ट करनेवाले तथा आयु, आरोग्य और अनन्त ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले शर्कराससमी-व्रतका वर्णन करता हूँ। वैशाख मासके शुक्ल पक्षकी ससमीको श्वेत तिलोंसे युक्त जलसे स्नानकर शुक्ल वस्त्रोंको धारण करे तथा वेदीके ऊपर कुंकुमसे कर्णिकासहित अष्टदल-कमलकी रचना करे और 'सवित्रे नमः' इन नाम-मन्त्रसे गन्ध-पुष्प आदिसे सूर्यकी पूजा करे। जलपूर्ण कलशके ऊपर शक्करसे भरा पूर्णपात्र स्थापित करे। उस कलशको रक्त वस्त्र, श्वेत माला आदिसे अलंकृत करे, साथ ही वहाँ एक सुवर्ण-निर्मित अश्व भी स्थापित करे। तदनन्तर भगवान् सूर्यका आवाहनकर इस मन्त्रसे उनका पूजन करे—
विश्वेदेवमयो यस्माद् वेदवादीति पठ्यते ॥
त्वमेवामृतसर्वस्वमतः पाहि सनातन।
(उत्तरपर्व ४९।५-६)
'हे भगवान् सूर्यदेव! यह सारा विश्व एवं सभी देवता आपके ही स्वरूप हैं, इस कारण आपको ही वेदोंका तत्त्वज्ञ एवं अमृतसर्वस्व कहा गया है। हे सनातनदेव! आप मेरी रक्षा करें।' तदनन्तर सौरसूक्तका जप करे अथवा
सौरपुराण३का श्रवण करे। अष्टमीको प्रातः उठकर स्नान आदि नित्यक्रिया सम्पन्नकर भगवान् सूर्यका पूजन करे। तत्पश्चात् सारी सामग्री वेदवेत्ता ब्राह्मणको देकर शर्करा, घृत और पायससे यथाशक्ति ब्राह्मण-भोजन कराये। स्वयं भी मौन होकर तेल और लवणरहित भोजन करे। इस विधिसे प्रतिमास व्रत करके वर्ष पूरा होनेपर यथाशक्ति उत्तम शय्या, दूध देनेवाली गाय, शर्करापूर्ण घट, गृहस्थके उपकरणोंसे युक्त मकान तथा अपनी सामर्थ्यके अनुकूल एक हजार अथवा एक सौ या पाँच निष्क सोनेका बना हुआ एक अश्व ब्राह्मणको दान करे। भगवान् सूर्यके मुखसे अमृतपान करते समय जो अमृत-बिन्दु गिरे, उनसे शालि (अगहनी धान), मूँग और इक्षु उत्पन्न हुए, शर्करा इक्षुका सार है, इसलिये हव्य-कव्यमें इस शर्कराका उपयोग करना भगवान् सूर्यको अति प्रिय है एवं यह शर्करा अमृतरूप है। यह शर्कराससमी-व्रत अश्वमेध-यज्ञका फल देनेवाला है। इस व्रतके करनेसे संतानकी वृद्धि होती है तथा समस्त उपद्रव शान्त हो जाते हैं। इस व्रतका करनेवाला व्यक्ति एक कल्प स्वर्गमें निवासकर अन्तमें मोक्ष प्राप्त करता है।४ (अध्याय ४९)
१-मत्स्यपुराण (अध्याय ७४)-में भी इस व्रतका प्रायः इन्हीं श्लोकोंमें उल्लेख प्राप्त होता है।
२-ऋग्वेदके प्रथम मण्डलका ५० वें सूक्त सूर्यसूक्त या सौरसूक्त कहलाता है।
३-सौरपुराणसे मुख्य तात्पर्य है भविष्यपुराण और साम्बपुराण। आजकल सौरपुराणके नामसे प्रकाशित जो सूर्यपुराण हैं, वास्तवमें वे शैवपुराण हैं सौर नहीं।
४-भविष्यपुराणका यह अध्याय भी मत्स्यपुराणके ३० ७७ में प्रायः इसी रूपमें प्राप्त होता है।
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- उत्तरपर्व *
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कमलससमी-व्रत *
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! अब मैं कमलससमी-व्रतका वर्णन करता हूँ, जिसके नाम लेनेमात्रसे ही भगवान् सूर्य प्रसन्न हो जाते हैं। वसन्त-ऋतुमें शुक्ल पक्षकी ससमीको प्रातःकाल पीली सरसोंयुक्त जलसे स्नान करे। एक पात्रमें तिल रखकर उसमें सुवर्णका कमल बनाकर स्थापित करे और उसमें भगवान् सूर्यकी भावना कर दो वस्त्रोंसे आवृत करे तथा गन्ध-पुष्पादि उपचारोंसे पूजाकर निम्नलिखित श्लोकसे प्रार्थना करे—
नमस्ते पद्महस्ताय नमस्ते विश्वधारिणे ॥ दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते।
(उत्तरपर्व ५०। ३-४)
तदनन्तर वस्त्र, माला तथा अलंकारोंसे सुसज्जित
उस उदककुम्भको प्रतिमासहित ब्राह्मणकी पूजाकर प्रदान कर दे। दूसरे दिन अष्टमीको यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन कराये और स्वयं भी तेल आदिसे रहित विशुद्ध भोजन करे। इसी प्रकार वर्षपर्यन्त प्रत्येक मासकी शुक्ल ससमीको भक्तिपूर्वक व्रत करे। व्रतकी समाप्तिपर वह भक्तिपूर्वक सुवर्ण-कमल, सुवर्णकी पयस्विनी गौ, अनेक पात्र, आसन, दीप तथा अन्य सामग्रियाँ ब्राह्मणको दानमें दे। इस विधिसे जो कमल-ससमीका व्रत करता है, वह अनन्त लक्ष्मीको प्राप्त करता है और सूर्यलोकमें प्रसन्न होकर निवास करता है। कल्प-कल्पभर सात लोकोंमें निवास करता हुआ अन्तमें परमगतिको प्राप्त करता है। (अध्याय ५०)
शुभससमी-व्रतकी विधि
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! अब मैं एक दूसरी ससमीका वर्णन कर रहा हूँ, वह शुभससमी कहलाती है। इसमें उपवासकर व्यक्ति रोग, शोक तथा दुःखोंसे मुक्त हो जाता है। इस पुण्यप्रद व्रतमें आश्विन मासमें (शुक्ल पक्षकी ससमी तिथिको) स्नान करके पवित्र हो ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराये। तदनन्तर गन्ध, माल्य तथा अनुलेपनादिसे भक्तिपूर्वक कपिला गौका निम्नलिखित मन्त्रसे पूजन करे—
नमामि सूर्यसम्भूतामशेषभुवनालयाम् ॥ त्वामहं शुभकल्याणशरीरां सर्वसिद्धये।
(उत्तरपर्व ५१। ३-४)
‘देवि! आप सूर्यसे उत्पन्न हुई हैं और सम्पूर्ण लोकोंकी आश्रयदात्री हैं, आपका शरीर सुशोभन मङ्गलोंसे युक्त है, आपको मैं समस्त सिद्धियोंकी
प्राप्तिसे निमित्त नमस्कार करता हूँ।’
तत्पश्चात् ताम्रपात्रमें एक सेर तिल रखकर उसपर वृषभकी स्वर्ण-प्रतिमा स्थापित करे और उसकी वस्त्र, माल्य, गुड़ आदिसे पूजा करे। सायंकालमें ‘अर्यमा प्रीयताम्’ यह कहकर सब सामग्री भक्तिपूर्वक ब्राह्मणको निवेदित करे। रात्रिमें पञ्चगव्यका प्राशन करे तथा भूमिपर ही मात्सर्यरहित होकर शयन करे। प्रातः भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको पूजा आदिसे संतुष्ट करे। प्रत्येक मासमें दो वस्त्र, स्वर्णमय वृषभ और गौ आदिका पूजनपूर्वक दान करे। संवत्सरके अन्तमें ईख, गुड़, वस्त्र, पात्र, आसन, गद्दा, तकिया आदिसे समन्वित शय्या, एक सेर तिलसे पूर्ण ताम्रपात्र, सौवर्ण वृषभ ‘विश्वात्मा प्रीयताम्’ कहकर वेदज्ञ ब्राह्मणको दान करे। इस विधिसे शुभससमी-व्रत करनेवाला व्यक्ति जन्म-
- कई व्रत-निबन्धों एवं पुराणोंमें इसे ही कमल-पक्षी भी कहा गया है।
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
जन्ममें विमल कीर्ति एवं श्री प्राप्त करता है और देवलोकमें पूजित तथा प्रलयपर्यन्त गणाधिप होता है। एक कल्पके अनन्तर वह पृथ्वीपर जन्म लेकर सातों द्वीपोंका चक्रवर्ती सम्राट् होता है। यह पुण्यदायिनी शुभ-ससमी सहस्रों ब्रह्महत्या
और सैकड़ों भ्रूणहत्या आदि पापोंका नाश करती है। इस शुभ-ससमीके माहात्म्यको जो पढ़ता है अथवा क्षणभर भी सुनता है, वह शरीर छूटनेपर विद्याधरोका अधिपति होता है।
(अध्याय ५१)
ससमी-स्वपनव्रत और उसकी विधि
महाराज युधिष्ठिरने पूछा—प्रभो! मनुष्यको अपने मनमें उद्भूत उद्वेग तथा खेद-खिन्नता और अपनी दरिद्रताकी निवृत्तिके लिये अद्भुत१-शान्तिके निमित्त कौन-सा धर्म-कृत्य करना चाहिये? मृतवत्सा स्त्रीको (जिसके बच्चे पैदा होकर मर जाते हैं) अपनी संततिकी रक्षा और दुःस्वप्नादिकी शान्तिके लिये क्या करना चाहिये?
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! पूर्वजन्मके पाप इस जन्ममें रोग, दुर्गति तथा इष्टजनोंकी मृत्युके रूपमें फलित होते हैं। उनके विनाशके लिये मैं कल्याणकारी ससमी-स्वपन नामक व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, यह लोगोंकी पीड़ाका विनाश करनेवाला है। जहाँ दुधमुँहे शिशुओं, वृद्धों, आतुरों और नवयुवकोंकी आकस्मिक मृत्यु होती देखी जाती है, वहाँ उसकी शान्तिके लिये इस 'मृतवत्साभिषेक' को बतला रहा हूँ। यह समस्त अद्भुत उत्पातों, उद्वेगों और चित्त-भ्रमोंका भी विनाशक है।
वराह-कल्पके वैवस्वत मन्वन्तरमें सत्ययुगमें हैहयवंशीय क्षत्रियोंके कुलकी शोभा बढ़ानेवाला कृतवीर्य नामक एक राजा हुआ था। उसने सतहत्तर हजार वर्षतक धर्म और नीतिपूर्वक समस्त प्रजाओंका पालन किया। उसके सौ पुत्र थे, जो च्यवनमुनिके शापसे दग्ध हो गये। फिर राजाने भगवान् सूर्यकी विधिपूर्वक उपासना
प्रारम्भ की। कृतवीर्यके उपवास-व्रत, पूजा और स्तोत्रोंसे संतुष्ट होकर भगवान् सूर्यने उसे अपना दर्शन दिया और कहा—'कृतवीर्य! तुम्हें (कार्तवीर्य नामक) एक सुन्दर एवं चिरायु पुत्र उत्पन्न होगा, किंतु तुम्हें अपने पूर्वकृत पापोंको विनष्ट करनेके लिये स्वपन-ससमी नामक व्रत करना पड़ेगा। तुम्हारी मृतवत्सा पत्नीके जब पुत्र उत्पन्न हो जाय तो सात महीनेपर बालकके जन्म-नक्षत्रकी तिथिको छोड़कर शुभ दिनमें ग्रह एवं ताराबलको देखकर ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराना चाहिये। इसी प्रकार वृद्ध, रोगी अथवा अन्य लोगोंके लिये किये जानेवाले इस व्रतमें जन्म-नक्षत्रका परित्याग कर देना चाहिये। गोदुग्धके साथ लाल अगहनीके चावलोंसे हव्यान्न पकाकर मातृकाओं, भगवान् सूर्य एवं रुद्रकी तुष्टिके लिये अर्पण करना चाहिये और फिर भगवान् सूर्यके नामसे अग्निमें घीकी सात आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिये। फिर बादमें रुद्रसूक्तसे भी आहुतियाँ देनी चाहिये। इस आहुतिमें आक एवं पलाशकी समिधाएँ प्रयुक्त करनी चाहिये तथा हवन-कार्यमें काले तिल, जौ एवं घीकी एक सौ आठ आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिये। हवनके बाद शीतल गङ्गाजलसे स्नान करना चाहिये। तदनन्तर हाथमें कुश लिये हुए वेदज्ञ ब्राह्मणद्वारा चारों कोणोंमें चार सुन्दर कलश
१-भविष्यपुराणका यह अध्याय मत्स्यपुराण (अध्याय ८०)-में इसी रूपमें प्राप्त होता है।
२-सामवेदीय 'अद्भुतब्राह्मण' (ताण्ड्य २६) तथा अथर्वपरिशिष्ट (७२)-में अद्भुत-शान्तिका विस्तारसे उल्लेख है।
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- उत्तरपर्व *
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स्थापित कराये। पुनः उसके बीचमें छिद्ररहित पाँचवाँ कलश स्थापित करे। उसे दही-अक्षतसे विभूषित करके सूर्यसम्बन्धी सात ऋचाओंसे अभिमन्त्रित कर दे। फिर उसे तीर्थ-जलसे भरकर उसमें रत्न या सुवर्ण डाल दे। इसी प्रकार सभी कलशोंमें सर्वौषधि, पञ्चगव्य, पञ्चरत्न, फल और पुष्प डालकर उन्हें वस्त्रोंसे परिवेष्टित कर दे। फिर हाथीसार, घुड़शाल, बिमौट, नदीके संगम, तालाब, गोशाला और राजद्वार—इन सात जगहोंसे शुद्ध मृत्तिका लाकर उन सभी कलशोंमें डाल दे।'
तदनन्तर ब्राह्मण रत्नगर्भित चारों कलशोंके मध्यमें स्थित पाँचवें कलशको हाथमें लेकर सूर्य-मन्त्रोंका पाठ करे तथा सात सुलक्षणो स्त्रियोंद्वारा जो पुष्प-माला और वस्त्राभूषणोंद्वारा पूजित हों, ब्राह्मणके साथ-साथ उस घड़ेके जलसे मृतवत्सा स्त्रीका अभिषेक कराये। (अभिषेकके समय इस प्रकार कहें—) 'यह बालक दीर्घायु और यह स्त्री जीवत्पुत्रा (जीवित पुत्रवाली) हो। सूर्य, ग्रहों और नक्षत्र-समूहोंसहित चन्द्रमा, इन्द्रसहित लोकपालगण, ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर इनके अतिरिक्त अन्यान्य देव-समूह इस कुमारकी सदा रक्षा करें। सूर्य, शनि, अग्नि अथवा अन्यान्य जो कोई बालग्रह हों, वे सभी इस बालकको तथा इसके माता-पिताको कहीं भी कष्ट न पहुँचायें।' अभिषेकके पश्चात् वह स्त्री श्वेत वस्त्र धारण करके अपने बच्चे और पतिके साथ उन सातों स्त्रियोंकी भक्तिपूर्वक पूजा करे। पुनः गुरुकी पूजा करके धर्मराजकी स्वर्णमयी प्रतिमा ताम्रपात्रके ऊपर स्थापित करके
गुरुको निवेदित कर दे। उसी प्रकार कृपणता छोड़कर अन्य ब्राह्मणोंका भी वस्त्र, सुवर्ण, रत्नसमूह आदिसे पूजन करके उन्हें घी और खीरसहित भक्ष्य पदार्थोंका भोजन कराये। भोजनोपरान्त गुरुदेवको बालककी रक्षाके लिये इन मन्त्रोंका उच्चारण करना चाहिये—'यह बालक दीर्घायु हो और सौ वर्षांतक सुखका उपभोग करे। इसका जो कुछ पाप था, उसे वडवानलमें डाल दिया गया। ब्रह्मा, रुद्र, वसुगण, स्कन्द, विष्णु, इन्द्र और अग्नि—ये सभी दुष्ट ग्रहोंसे इसकी रक्षा करें और सदा इसके लिये वरदायक हों।' इस प्रकारके वाक्योंका उच्चारण करनेवाले गुरुदेवका यजमान पूजन करे। अपनी शक्तिके अनुसार उन्हें एक कपिला गौ प्रदान करे और फिर प्रणाम करके बिदा करे। तत्पश्चात् मृतवत्सा स्त्री पुत्रको गोदमें लेकर सूर्यदेव और भगवान् शंकरको नमस्कार करे और हवनसे बचे हुए हव्यान्नको 'सूर्यदेवको नमस्कार है'—यह कहकर खा जाय। यह व्रत उद्दिग्रता और दुःस्वप्नादिमें भी प्रशस्त माना गया है।
इस प्रकार कर्ताके जन्मदिनके नक्षत्रको छोड़कर शान्ति-प्राप्तिके हेतु शुक्ल पक्षकी सप्तमी तिथिमें सदा (सूर्य और शंकरका) पूजन करना चाहिये, क्योंकि इस व्रतका अनुष्ठान करनेवाला कभी कष्टमें नहीं पड़ता। जो मनुष्य इस विधानके अनुसार इस व्रतका सदा अनुष्ठान करता है, वह दीर्घायु होता है। (इसी व्रतके प्रभावसे) कार्तवीर्यने दस हजार वर्षांतक इस पृथ्वीपर शासन किया था। राजन्! इस प्रकार सूर्यदेव इस पुण्यप्रद, परम पावन और आयुवर्धक सप्तमी-स्नपनव्रतका विधान
१-दीर्घायुरस्तु बालोऽयं जीवपुत्रा च भाविनी । आदित्यचन्द्रमासाश्च ग्रहनक्षत्रमण्डलम् ॥ शक्रः सलोकपालो वै ब्रह्मा विष्णुर्महेश्वरः । एते चान्ये च वै देवाः सदा पान्तु कुमारकम् ॥ मा शनिर्मा स हतभुङ्ग्मा च बालग्रहाः । क्वचित् । पीडां कुर्वन्तु बालस्य मा मातुजनकस्य वै ॥ (उत्तरपर्व ५२। २६-२८) २-दीर्घायुरस्तु बालोऽयं यावद्वर्षशतं सुखी । यत्किञ्चिदस्य दुरितं तत्क्षितं वडवामुखे ॥ ब्रह्मा रुद्रो विष्णुः स्कन्दो वायुः शक्रो हुताशनः । रक्षन्तु सर्वे दुष्टेभ्यो वरदा यान्तु सर्वदा ॥ (उत्तरपर्व ५२। ३२-३३)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
बतलाकर वहीं अन्तर्हित हो गये। मनुष्यको सूर्यसे नीरोगता, अग्निसे धन, ईश्वर (शिवजी)-से ज्ञान और भगवान् जनार्दनसे मोक्षकी अभिलाषा करनी चाहिये१। यह व्रत बड़े-बड़े पापोंका
विनाशक, बाल-वृद्धिकारक तथा परम हितकारी है। जो मनुष्य अनन्यचित्त होकर इस व्रत-विधानको सुनता है, उसे भी सिद्धि प्राप्त होती है२। (अध्याय ५२)
अचलाससमी३-व्रत-कथा तथा व्रत-विधि
राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! आपने सभी उत्तम फलोंको देनेवाले माघस्नानका४ विधान बतलाया था, परंतु जो प्रातःकाल स्नान करनेमें समर्थ न हो तो वह क्या करे? स्त्रियाँ अति सुकुमारी होती हैं, वे किस प्रकार माघस्नानका कष्ट सहन कर सकती हैं? इसलिये आप कोई ऐसा उपाय बतायें कि थोड़ेसे परिश्रमसे भी नारियोंको रूप, सौभाग्य, संतान और अनन्त पुण्य प्राप्त हो जाय।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! मैं अचला-ससमीका अत्यन्त गोपनीय विधान आपको बतलाता हूँ, जिसके करनेसे सब उत्तम फल प्राप्त हो जाते हैं। इस सम्बन्धमें आप एक कथा सुनें—
मगध देशमें अति रूपवती इन्दुमती नामकी एक वेश्या रहती थी। एक दिन वह वेश्या प्रातःकाल बैठी-बैठी संसारकी अनवस्थिति (नश्वरता)-का इस प्रकार चिन्तन करने लगी—देखो! यह विषयरूपी संसार-सागर कैसा भयंकर है, जिसमें डूबते हुए जीव जन्म-मृत्यु-जरा आदिसे तथा जल-जन्तुओंसे पीड़ित होते हुए भी किसी प्रकार पार उतर नहीं पाते। ब्रह्माजीके द्वारा निर्मित यह प्राणिसमुदाय
अपने किये गये कर्मरूपी ईंधनसे एवं कालरूपी अग्निसे दग्ध कर दिया जाता है। प्राणियोंके जो धर्म, अर्थ, कामसे रहित दिन व्यतीत होते हैं, फिर वे कहाँ वापस आते हैं? जिस दिन स्नान, दान, तप, होम, स्वाध्याय, पितृतर्पण आदि सत्कर्म नहीं किया जाता, वह दिन व्यर्थ है। पुत्र, स्त्री, घर, क्षेत्र तथा धन आदिकी चिन्तामें सारी आयु बीत जाती है और मृत्यु आकर धर दबोचती है।
इस प्रकार कुछ निर्वीण—उद्विग्न होकर सोचती-विचारती हुई वह इन्दुमती वेश्या महर्षि वसिष्ठके आश्रममें गयी और उन्हें प्रणामकर हाथ जोड़कर कहने लगी—‘महाराज! मैंने न तो कभी कोई दान दिया, न जप, तप, व्रत, उपवास आदि सत्कर्मोंका अनुष्ठान किया और न शिव, विष्णु आदि किन्हीं देवताओंकी आराधना की, अब मैं इस भयंकर संसारसे भयभीत होकर आपकी शरण आयी हूँ, आप मुझे कोई ऐसा व्रत बतलायें, जिससे मेरा उद्धार हो जाय।’
वसिष्ठजी बोले—‘वरानने! तुम माघ मासके शुक्ल पक्षकी ससमीको स्नान करो, जिससे रूप, सौभाग्य और सद्गति आदि सभी फल प्राप्त होते
१-आरोग्यं भास्करादिच्छेद्भूमिच्छेद्दुताशनात् । शंकराज्ज्ञानमिच्छेत्तु गतिमिच्छेज्जनार्दनात् ॥ (उत्तरपर्व ५२।३९)
२-भविष्यपुराणका यह अध्याय मत्स्यपुराण (अ० ६८)-से प्रायः मिलता है।
३-यह ससमी पुराणोंमें रथ, सूर्य, भानु, अर्क, महती, पुत्रससमी आदि अनेक नामोंसे विख्यात है और अनेक पुराणोंमें उन-उन नामोंसे अलग-अलग विधियाँ निर्दिष्ट हैं, जिनसे सभी अभिलाषाएँ पूरी होती हैं।
४-पुराणोंका परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। माघस्नानकी विस्तृत विधि पद्मपुराणके उत्तरखण्ड एवं वायुपुराणमें प्राप्त होती है। इनमें बड़ी सुन्दर एवं श्रेष्ठ कथाएँ हैं।
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- उत्तरपर्व *
४४१
हैं। षष्ठीके दिन एक बार भोजनकर ससमीको प्रातःकाल ही ऐसे नदीतट अथवा जलाशयपर जाकर दीपदान और स्नान करो, जिसके जलको किसीने स्नानकर हिलाया न हो, क्योंकि जल मलको प्रक्षालित कर देता है। बादमें यथाशक्ति दान भी करो। इससे तुम्हारा कल्याण होगा।' वसिष्ठजीका ऐसा वचन सुनकर इन्द्रमती अपने घर वापस लौट आयी और उनके द्वारा बतायी गयी विधिके अनुसार उसने स्नान-ध्यान आदि कर्मोंको सम्पन्न किया। ससमीके स्नानके प्रभावसे बहुत दिनोंतक सांसारिक सुखोंका उपभोग करती हुई वह देह-त्यागके पश्चात् देवराज इन्द्रकी सभी अप्सराओंमें प्रधान नायिकाके पदपर अधिष्ठित हुई। यह अचलाससमी सम्पूर्ण पापोंका प्रशमन करनेवाली तथा सुख-सौभाग्यकी वृद्धि करनेवाली है।
राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! अचलाससमीका माहात्म्य तो आपने बतलाया, कृपाकर अब स्नानका विधान भी बतलायें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! षष्ठीके दिन एकभुक्त होकर सूर्यनारायणका पूजन करे। यथासम्भव ससमीको प्रातःकाल ही उठकर नदी या सरोवरपर जाकर अरुणोदय आदि वेलामें बहुत सबेरे ही स्नान करनेकी चेष्टा करे। सुवर्ण, चाँदी अथवा ताम्रके पात्रमें कुसुम्भकी रँगी हुई बत्ती और तिलका तेल डालकर दीपक प्रज्वलित करे। उस दीपकको सिरपर रखकर हृदयमें भगवान् सूर्यका इस प्रकार ध्यान करे—
नमस्ते रुद्ररूपाय रसानाम्यतये नमः। वरुणाय नमस्तेऽस्तु हरिवास नमोऽस्तु ते॥ यावज्जन्म कृतं पापं मया जन्मसु सप्तसु। तन्मे रोगं च शोकं च माकरी हन्तु सप्तमी॥
जननी सर्वभूतानां सप्तमी सप्तसमिके। सर्वव्याधिहरे देवि नमस्ते रविमण्डले॥
(उत्तरपर्व ५३। ३३—३५)
तदनन्तर दीपकको जलके ऊपर तैरा दे, फिर स्नानकर देवता और पितरोंका तर्पण करे और चन्दनसे कर्णिकासहित अष्टदल-कमल बनाये। उस कमलके मध्यमें शिव-पार्वतीकी स्थापना कर प्रणव-मन्त्रसे पूजा करे और पूर्वादि आठ दलोंमें क्रमसे भानु, रवि, विवस्वान्, भास्कर, सविता, अर्क, सहस्रकिरण तथा सर्वात्माका पूजन करे। इन नामोंके आदिमें 'ॐ' कार तथा अन्तमें 'नमः' पद लगाये। यथा—'ॐ भानवे नमः', 'ॐ रवये नमः' इत्यादि।
इस प्रकार पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य तथा वस्त्र आदि उपचारोंसे विधिपूर्वक भगवान् सूर्यकी पूजाकर 'स्वस्थानं गम्यताम्' यह कहकर विसर्जित कर दे। बादमें ताम्र अथवा मिट्टीके पात्रमें गुड़ और घृतसहित तिलचूर्ण तथा सुवर्णका ताल-पत्राकार एक कानका आभूषण बनाकर पात्रमें रख दे। अनन्तर रक्त वस्त्रसे उसे ढँककर पुष्प-धूपदिसे पूजन करे और वह पात्र दौर्भाग्य तथा दुःखोंके विनाशकी कामनासे ब्राह्मणको दे दे। अनन्तर 'सपुत्रपशुभृत्याय मेऽकोंऽयं प्रीयताम्' पुत्र, पशु, भृत्यसमन्वित मेरे ऊपर भगवान् सूर्य प्रसन्न हो जायें—ऐसी प्रार्थना करे। फिर गुरुको वस्त्र, तिल, गौ और दक्षिणा देकर तथा यथाशक्ति अन्य ब्राह्मणोंको भोजन कराकर व्रत समाप्त करे।
जो पुरुष इस विधिसे अचलाससमीको स्नान करता है, उसे सम्पूर्ण माघ-स्नानका फल प्राप्त होता है। जो इस माहात्म्यको भक्तिसे कहेगा या सुनेगा तथा लोगोंको इसका उपदेश करेगा, वह उत्तम लोकको अवश्य प्राप्त करेगा। (अध्याय ५३)
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