भारतकोश
संग्रह पर लौटें

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

४३८

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

जन्ममें विमल कीर्ति एवं श्री प्राप्त करता है और देवलोकमें पूजित तथा प्रलयपर्यन्त गणाधिप होता है। एक कल्पके अनन्तर वह पृथ्वीपर जन्म लेकर सातों द्वीपोंका चक्रवर्ती सम्राट् होता है। यह पुण्यदायिनी शुभ-ससमी सहस्रों ब्रह्महत्या

और सैकड़ों भ्रूणहत्या आदि पापोंका नाश करती है। इस शुभ-ससमीके माहात्म्यको जो पढ़ता है अथवा क्षणभर भी सुनता है, वह शरीर छूटनेपर विद्याधरोका अधिपति होता है।

(अध्याय ५१)

ससमी-स्वपनव्रत और उसकी विधि

महाराज युधिष्ठिरने पूछा—प्रभो! मनुष्यको अपने मनमें उद्भूत उद्वेग तथा खेद-खिन्नता और अपनी दरिद्रताकी निवृत्तिके लिये अद्भुत१-शान्तिके निमित्त कौन-सा धर्म-कृत्य करना चाहिये? मृतवत्सा स्त्रीको (जिसके बच्चे पैदा होकर मर जाते हैं) अपनी संततिकी रक्षा और दुःस्वप्नादिकी शान्तिके लिये क्या करना चाहिये?

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! पूर्वजन्मके पाप इस जन्ममें रोग, दुर्गति तथा इष्टजनोंकी मृत्युके रूपमें फलित होते हैं। उनके विनाशके लिये मैं कल्याणकारी ससमी-स्वपन नामक व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, यह लोगोंकी पीड़ाका विनाश करनेवाला है। जहाँ दुधमुँहे शिशुओं, वृद्धों, आतुरों और नवयुवकोंकी आकस्मिक मृत्यु होती देखी जाती है, वहाँ उसकी शान्तिके लिये इस 'मृतवत्साभिषेक' को बतला रहा हूँ। यह समस्त अद्भुत उत्पातों, उद्वेगों और चित्त-भ्रमोंका भी विनाशक है।

वराह-कल्पके वैवस्वत मन्वन्तरमें सत्ययुगमें हैहयवंशीय क्षत्रियोंके कुलकी शोभा बढ़ानेवाला कृतवीर्य नामक एक राजा हुआ था। उसने सतहत्तर हजार वर्षतक धर्म और नीतिपूर्वक समस्त प्रजाओंका पालन किया। उसके सौ पुत्र थे, जो च्यवनमुनिके शापसे दग्ध हो गये। फिर राजाने भगवान् सूर्यकी विधिपूर्वक उपासना

प्रारम्भ की। कृतवीर्यके उपवास-व्रत, पूजा और स्तोत्रोंसे संतुष्ट होकर भगवान् सूर्यने उसे अपना दर्शन दिया और कहा—'कृतवीर्य! तुम्हें (कार्तवीर्य नामक) एक सुन्दर एवं चिरायु पुत्र उत्पन्न होगा, किंतु तुम्हें अपने पूर्वकृत पापोंको विनष्ट करनेके लिये स्वपन-ससमी नामक व्रत करना पड़ेगा। तुम्हारी मृतवत्सा पत्नीके जब पुत्र उत्पन्न हो जाय तो सात महीनेपर बालकके जन्म-नक्षत्रकी तिथिको छोड़कर शुभ दिनमें ग्रह एवं ताराबलको देखकर ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराना चाहिये। इसी प्रकार वृद्ध, रोगी अथवा अन्य लोगोंके लिये किये जानेवाले इस व्रतमें जन्म-नक्षत्रका परित्याग कर देना चाहिये। गोदुग्धके साथ लाल अगहनीके चावलोंसे हव्यान्न पकाकर मातृकाओं, भगवान् सूर्य एवं रुद्रकी तुष्टिके लिये अर्पण करना चाहिये और फिर भगवान् सूर्यके नामसे अग्निमें घीकी सात आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिये। फिर बादमें रुद्रसूक्तसे भी आहुतियाँ देनी चाहिये। इस आहुतिमें आक एवं पलाशकी समिधाएँ प्रयुक्त करनी चाहिये तथा हवन-कार्यमें काले तिल, जौ एवं घीकी एक सौ आठ आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिये। हवनके बाद शीतल गङ्गाजलसे स्नान करना चाहिये। तदनन्तर हाथमें कुश लिये हुए वेदज्ञ ब्राह्मणद्वारा चारों कोणोंमें चार सुन्दर कलश

१-भविष्यपुराणका यह अध्याय मत्स्यपुराण (अध्याय ८०)-में इसी रूपमें प्राप्त होता है।

२-सामवेदीय 'अद्भुतब्राह्मण' (ताण्ड्य २६) तथा अथर्वपरिशिष्ट (७२)-में अद्भुत-शान्तिका विस्तारसे उल्लेख है।

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

  • उत्तरपर्व *

४३९

स्थापित कराये। पुनः उसके बीचमें छिद्ररहित पाँचवाँ कलश स्थापित करे। उसे दही-अक्षतसे विभूषित करके सूर्यसम्बन्धी सात ऋचाओंसे अभिमन्त्रित कर दे। फिर उसे तीर्थ-जलसे भरकर उसमें रत्न या सुवर्ण डाल दे। इसी प्रकार सभी कलशोंमें सर्वौषधि, पञ्चगव्य, पञ्चरत्न, फल और पुष्प डालकर उन्हें वस्त्रोंसे परिवेष्टित कर दे। फिर हाथीसार, घुड़शाल, बिमौट, नदीके संगम, तालाब, गोशाला और राजद्वार—इन सात जगहोंसे शुद्ध मृत्तिका लाकर उन सभी कलशोंमें डाल दे।'

तदनन्तर ब्राह्मण रत्नगर्भित चारों कलशोंके मध्यमें स्थित पाँचवें कलशको हाथमें लेकर सूर्य-मन्त्रोंका पाठ करे तथा सात सुलक्षणो स्त्रियोंद्वारा जो पुष्प-माला और वस्त्राभूषणोंद्वारा पूजित हों, ब्राह्मणके साथ-साथ उस घड़ेके जलसे मृतवत्सा स्त्रीका अभिषेक कराये। (अभिषेकके समय इस प्रकार कहें—) 'यह बालक दीर्घायु और यह स्त्री जीवत्पुत्रा (जीवित पुत्रवाली) हो। सूर्य, ग्रहों और नक्षत्र-समूहोंसहित चन्द्रमा, इन्द्रसहित लोकपालगण, ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर इनके अतिरिक्त अन्यान्य देव-समूह इस कुमारकी सदा रक्षा करें। सूर्य, शनि, अग्नि अथवा अन्यान्य जो कोई बालग्रह हों, वे सभी इस बालकको तथा इसके माता-पिताको कहीं भी कष्ट न पहुँचायें।' अभिषेकके पश्चात् वह स्त्री श्वेत वस्त्र धारण करके अपने बच्चे और पतिके साथ उन सातों स्त्रियोंकी भक्तिपूर्वक पूजा करे। पुनः गुरुकी पूजा करके धर्मराजकी स्वर्णमयी प्रतिमा ताम्रपात्रके ऊपर स्थापित करके

गुरुको निवेदित कर दे। उसी प्रकार कृपणता छोड़कर अन्य ब्राह्मणोंका भी वस्त्र, सुवर्ण, रत्नसमूह आदिसे पूजन करके उन्हें घी और खीरसहित भक्ष्य पदार्थोंका भोजन कराये। भोजनोपरान्त गुरुदेवको बालककी रक्षाके लिये इन मन्त्रोंका उच्चारण करना चाहिये—'यह बालक दीर्घायु हो और सौ वर्षांतक सुखका उपभोग करे। इसका जो कुछ पाप था, उसे वडवानलमें डाल दिया गया। ब्रह्मा, रुद्र, वसुगण, स्कन्द, विष्णु, इन्द्र और अग्नि—ये सभी दुष्ट ग्रहोंसे इसकी रक्षा करें और सदा इसके लिये वरदायक हों।' इस प्रकारके वाक्योंका उच्चारण करनेवाले गुरुदेवका यजमान पूजन करे। अपनी शक्तिके अनुसार उन्हें एक कपिला गौ प्रदान करे और फिर प्रणाम करके बिदा करे। तत्पश्चात् मृतवत्सा स्त्री पुत्रको गोदमें लेकर सूर्यदेव और भगवान् शंकरको नमस्कार करे और हवनसे बचे हुए हव्यान्नको 'सूर्यदेवको नमस्कार है'—यह कहकर खा जाय। यह व्रत उद्दिग्रता और दुःस्वप्नादिमें भी प्रशस्त माना गया है।

इस प्रकार कर्ताके जन्मदिनके नक्षत्रको छोड़कर शान्ति-प्राप्तिके हेतु शुक्ल पक्षकी सप्तमी तिथिमें सदा (सूर्य और शंकरका) पूजन करना चाहिये, क्योंकि इस व्रतका अनुष्ठान करनेवाला कभी कष्टमें नहीं पड़ता। जो मनुष्य इस विधानके अनुसार इस व्रतका सदा अनुष्ठान करता है, वह दीर्घायु होता है। (इसी व्रतके प्रभावसे) कार्तवीर्यने दस हजार वर्षांतक इस पृथ्वीपर शासन किया था। राजन्! इस प्रकार सूर्यदेव इस पुण्यप्रद, परम पावन और आयुवर्धक सप्तमी-स्नपनव्रतका विधान

१-दीर्घायुरस्तु बालोऽयं जीवपुत्रा च भाविनी । आदित्यचन्द्रमासाश्च ग्रहनक्षत्रमण्डलम् ॥ शक्रः सलोकपालो वै ब्रह्मा विष्णुर्महेश्वरः । एते चान्ये च वै देवाः सदा पान्तु कुमारकम् ॥ मा शनिर्मा स हतभुङ्ग्मा च बालग्रहाः । क्वचित् । पीडां कुर्वन्तु बालस्य मा मातुजनकस्य वै ॥ (उत्तरपर्व ५२। २६-२८) २-दीर्घायुरस्तु बालोऽयं यावद्वर्षशतं सुखी । यत्किञ्चिदस्य दुरितं तत्क्षितं वडवामुखे ॥ ब्रह्मा रुद्रो विष्णुः स्कन्दो वायुः शक्रो हुताशनः । रक्षन्तु सर्वे दुष्टेभ्यो वरदा यान्तु सर्वदा ॥ (उत्तरपर्व ५२। ३२-३३)

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

४४०

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

बतलाकर वहीं अन्तर्हित हो गये। मनुष्यको सूर्यसे नीरोगता, अग्निसे धन, ईश्वर (शिवजी)-से ज्ञान और भगवान् जनार्दनसे मोक्षकी अभिलाषा करनी चाहिये१। यह व्रत बड़े-बड़े पापोंका

विनाशक, बाल-वृद्धिकारक तथा परम हितकारी है। जो मनुष्य अनन्यचित्त होकर इस व्रत-विधानको सुनता है, उसे भी सिद्धि प्राप्त होती है२। (अध्याय ५२)

अचलाससमी३-व्रत-कथा तथा व्रत-विधि

राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! आपने सभी उत्तम फलोंको देनेवाले माघस्नानका४ विधान बतलाया था, परंतु जो प्रातःकाल स्नान करनेमें समर्थ न हो तो वह क्या करे? स्त्रियाँ अति सुकुमारी होती हैं, वे किस प्रकार माघस्नानका कष्ट सहन कर सकती हैं? इसलिये आप कोई ऐसा उपाय बतायें कि थोड़ेसे परिश्रमसे भी नारियोंको रूप, सौभाग्य, संतान और अनन्त पुण्य प्राप्त हो जाय।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! मैं अचला-ससमीका अत्यन्त गोपनीय विधान आपको बतलाता हूँ, जिसके करनेसे सब उत्तम फल प्राप्त हो जाते हैं। इस सम्बन्धमें आप एक कथा सुनें—

मगध देशमें अति रूपवती इन्दुमती नामकी एक वेश्या रहती थी। एक दिन वह वेश्या प्रातःकाल बैठी-बैठी संसारकी अनवस्थिति (नश्वरता)-का इस प्रकार चिन्तन करने लगी—देखो! यह विषयरूपी संसार-सागर कैसा भयंकर है, जिसमें डूबते हुए जीव जन्म-मृत्यु-जरा आदिसे तथा जल-जन्तुओंसे पीड़ित होते हुए भी किसी प्रकार पार उतर नहीं पाते। ब्रह्माजीके द्वारा निर्मित यह प्राणिसमुदाय

अपने किये गये कर्मरूपी ईंधनसे एवं कालरूपी अग्निसे दग्ध कर दिया जाता है। प्राणियोंके जो धर्म, अर्थ, कामसे रहित दिन व्यतीत होते हैं, फिर वे कहाँ वापस आते हैं? जिस दिन स्नान, दान, तप, होम, स्वाध्याय, पितृतर्पण आदि सत्कर्म नहीं किया जाता, वह दिन व्यर्थ है। पुत्र, स्त्री, घर, क्षेत्र तथा धन आदिकी चिन्तामें सारी आयु बीत जाती है और मृत्यु आकर धर दबोचती है।

इस प्रकार कुछ निर्वीण—उद्विग्न होकर सोचती-विचारती हुई वह इन्दुमती वेश्या महर्षि वसिष्ठके आश्रममें गयी और उन्हें प्रणामकर हाथ जोड़कर कहने लगी—‘महाराज! मैंने न तो कभी कोई दान दिया, न जप, तप, व्रत, उपवास आदि सत्कर्मोंका अनुष्ठान किया और न शिव, विष्णु आदि किन्हीं देवताओंकी आराधना की, अब मैं इस भयंकर संसारसे भयभीत होकर आपकी शरण आयी हूँ, आप मुझे कोई ऐसा व्रत बतलायें, जिससे मेरा उद्धार हो जाय।’

वसिष्ठजी बोले—‘वरानने! तुम माघ मासके शुक्ल पक्षकी ससमीको स्नान करो, जिससे रूप, सौभाग्य और सद्गति आदि सभी फल प्राप्त होते

१-आरोग्यं भास्करादिच्छेद्भूमिच्छेद्दुताशनात् । शंकराज्ज्ञानमिच्छेत्तु गतिमिच्छेज्जनार्दनात् ॥ (उत्तरपर्व ५२।३९)

२-भविष्यपुराणका यह अध्याय मत्स्यपुराण (अ० ६८)-से प्रायः मिलता है।

३-यह ससमी पुराणोंमें रथ, सूर्य, भानु, अर्क, महती, पुत्रससमी आदि अनेक नामोंसे विख्यात है और अनेक पुराणोंमें उन-उन नामोंसे अलग-अलग विधियाँ निर्दिष्ट हैं, जिनसे सभी अभिलाषाएँ पूरी होती हैं।

४-पुराणोंका परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। माघस्नानकी विस्तृत विधि पद्मपुराणके उत्तरखण्ड एवं वायुपुराणमें प्राप्त होती है। इनमें बड़ी सुन्दर एवं श्रेष्ठ कथाएँ हैं।

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

  • उत्तरपर्व *

४४१

हैं। षष्ठीके दिन एक बार भोजनकर ससमीको प्रातःकाल ही ऐसे नदीतट अथवा जलाशयपर जाकर दीपदान और स्नान करो, जिसके जलको किसीने स्नानकर हिलाया न हो, क्योंकि जल मलको प्रक्षालित कर देता है। बादमें यथाशक्ति दान भी करो। इससे तुम्हारा कल्याण होगा।' वसिष्ठजीका ऐसा वचन सुनकर इन्द्रमती अपने घर वापस लौट आयी और उनके द्वारा बतायी गयी विधिके अनुसार उसने स्नान-ध्यान आदि कर्मोंको सम्पन्न किया। ससमीके स्नानके प्रभावसे बहुत दिनोंतक सांसारिक सुखोंका उपभोग करती हुई वह देह-त्यागके पश्चात् देवराज इन्द्रकी सभी अप्सराओंमें प्रधान नायिकाके पदपर अधिष्ठित हुई। यह अचलाससमी सम्पूर्ण पापोंका प्रशमन करनेवाली तथा सुख-सौभाग्यकी वृद्धि करनेवाली है।

राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! अचलाससमीका माहात्म्य तो आपने बतलाया, कृपाकर अब स्नानका विधान भी बतलायें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! षष्ठीके दिन एकभुक्त होकर सूर्यनारायणका पूजन करे। यथासम्भव ससमीको प्रातःकाल ही उठकर नदी या सरोवरपर जाकर अरुणोदय आदि वेलामें बहुत सबेरे ही स्नान करनेकी चेष्टा करे। सुवर्ण, चाँदी अथवा ताम्रके पात्रमें कुसुम्भकी रँगी हुई बत्ती और तिलका तेल डालकर दीपक प्रज्वलित करे। उस दीपकको सिरपर रखकर हृदयमें भगवान् सूर्यका इस प्रकार ध्यान करे—

नमस्ते रुद्ररूपाय रसानाम्यतये नमः। वरुणाय नमस्तेऽस्तु हरिवास नमोऽस्तु ते॥ यावज्जन्म कृतं पापं मया जन्मसु सप्तसु। तन्मे रोगं च शोकं च माकरी हन्तु सप्तमी॥

जननी सर्वभूतानां सप्तमी सप्तसमिके। सर्वव्याधिहरे देवि नमस्ते रविमण्डले॥

(उत्तरपर्व ५३। ३३—३५)

तदनन्तर दीपकको जलके ऊपर तैरा दे, फिर स्नानकर देवता और पितरोंका तर्पण करे और चन्दनसे कर्णिकासहित अष्टदल-कमल बनाये। उस कमलके मध्यमें शिव-पार्वतीकी स्थापना कर प्रणव-मन्त्रसे पूजा करे और पूर्वादि आठ दलोंमें क्रमसे भानु, रवि, विवस्वान्, भास्कर, सविता, अर्क, सहस्रकिरण तथा सर्वात्माका पूजन करे। इन नामोंके आदिमें 'ॐ' कार तथा अन्तमें 'नमः' पद लगाये। यथा—'ॐ भानवे नमः', 'ॐ रवये नमः' इत्यादि।

इस प्रकार पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य तथा वस्त्र आदि उपचारोंसे विधिपूर्वक भगवान् सूर्यकी पूजाकर 'स्वस्थानं गम्यताम्' यह कहकर विसर्जित कर दे। बादमें ताम्र अथवा मिट्टीके पात्रमें गुड़ और घृतसहित तिलचूर्ण तथा सुवर्णका ताल-पत्राकार एक कानका आभूषण बनाकर पात्रमें रख दे। अनन्तर रक्त वस्त्रसे उसे ढँककर पुष्प-धूपदिसे पूजन करे और वह पात्र दौर्भाग्य तथा दुःखोंके विनाशकी कामनासे ब्राह्मणको दे दे। अनन्तर 'सपुत्रपशुभृत्याय मेऽकोंऽयं प्रीयताम्' पुत्र, पशु, भृत्यसमन्वित मेरे ऊपर भगवान् सूर्य प्रसन्न हो जायें—ऐसी प्रार्थना करे। फिर गुरुको वस्त्र, तिल, गौ और दक्षिणा देकर तथा यथाशक्ति अन्य ब्राह्मणोंको भोजन कराकर व्रत समाप्त करे।

जो पुरुष इस विधिसे अचलाससमीको स्नान करता है, उसे सम्पूर्ण माघ-स्नानका फल प्राप्त होता है। जो इस माहात्म्यको भक्तिसे कहेगा या सुनेगा तथा लोगोंको इसका उपदेश करेगा, वह उत्तम लोकको अवश्य प्राप्त करेगा। (अध्याय ५३)

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

४४२

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

बुधाष्टमीव्रत-कथा तथा माहात्म्य

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! अब मैं बुधाष्टमीव्रतका विधान बतलाता हूँ, जिसे करनेवाला कभी नरकका मुख नहीं देखता। इस विषयमें आप एक आख्यान सुनें। सत्ययुगके प्रारम्भमें मनुके पुत्र राजा इल* हुए। वे अनेक मित्रों तथा भृत्योंसे घिरे रहते थे। एक दिन वे मृगयाके प्रसंगसे एक हिरण्यका पीछा करते हुए हिमालय पर्वतके समीप एक जंगलमें पहुँच गये। उस वनमें प्रवेश करते ही वे सहसा स्त्री-रूपमें परिणत हो गये। वह वन शिवजी और माता पार्वतीजीका विहार-क्षेत्र था। वहाँ शिवजीकी यह आज्ञा थी कि 'जो पुरुष इस वनमें प्रवेश करेगा, वह तत्क्षण ही स्त्री हो जायगा।' इस कारण राजा इल भी स्त्री हो गये। अब वे स्त्री-रूपसे वनमें विचरण करने लगे। वे यह नहीं समझ सके कि मैं कहाँ आ गया हूँ। उसी समय चन्द्रमाके पुत्र कुमार बुधकी दृष्टि उनपर पड़ी। उसके उत्तम रूपपर आकृष्ट हो बुधने उसे अपनी स्त्री बना लिया। इलासे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम पुरुरवा था। पुरुरवासे ही चन्द्रवंशका प्रारम्भ हुआ।

जिस दिन बुधने इलासे विवाह किया, उस दिन अष्टमी तिथि थी, इसलिये यह बुधाष्टमी जगत्में पूज्य हुई। यह बुधाष्टमी सम्पूर्ण पापोंका प्रशमन तथा उपद्रवोंका नाश करनेवाली है।

राजन्! अब मैं आपको एक दूसरी कथा सुना रहा हूँ—विदेह राजाओंकी नगरी मिथिलामें निमि नामके एक राजा थे। वे शत्रुओंद्वारा लड़ाईके मैदानमें मार डाले गये। उनकी स्त्रीका नाम था उर्मिला। उर्मिला जब राज्य-च्युत एवं निराश्रित हो इधर-उधर घूमने लगी, तब अपने बालक और

कन्याको लेकर वह अवन्ति देश चली गयी और वहाँ एक ब्राह्मणके घरमें कार्यकर अपना निर्वाह करने लगी। वह विपत्तिसे पीड़ित थी, गेहूँ पीसते समय वह थोड़ेसे गेहूँ चुराकर रख लेती और उसीसे श्रुधासे पीड़ित अपने बच्चोंका पालन करती। कुछ समय बाद उर्मिलाका देहान्त हो गया। उर्मिलाका पुत्र बड़ा हो गया, वह अवन्तिसे मिथिला आया और पिताके राज्यको पुनः प्राप्तकर शासन करने लगा। उसकी बहन श्यामला विवाह-योग्य हो गयी थी। वह अत्यन्त रूपवती थी। अवन्तिदेशके राजा धर्मराजने उसके उत्तम रूपकी चर्चा सुनकर उसे अपनी रानी बना लिया।

एक दिन धर्मराजने अपनी प्रिया श्यामलासे कहा—'वैदेहिनन्दनि! तुम और सभी कामोंको तो करना, परंतु ये सात स्थान जिनमें ताले बंद हैं, इनमें तुम कभी मत जाना।' श्यामलाने 'बहुत अच्छा' कहकर पतिकी बात मान ली, परंतु उसके मनमें कुतूहल बना रहा।

एक दिन जब धर्मराज अपने किसी कार्यमें व्यस्त थे, तब श्यामलाने एक मकानका ताला खोलकर वहाँ देखा कि उसकी माता उर्मिलाको अति भयंकर यमदूत बाँधकर तस तेलके कड़ाहमें बार-बार डाल रहे हैं। लज्जित होकर श्यामलाने वह कमरा बंद कर दिया, फिर दूसरा ताला खोला तो देखा कि वहाँ भी उसकी माताको यमदूत शिलाके ऊपर रखकर पीस रहे हैं और माता चिल्ला रही है। इसी प्रकार उसने तीसरे कमरेको खोलकर देखा कि यमदूत उसकी माताके मस्तकमें लोहेकी कील ठोक रहे हैं, इसी तरह चौथेमें अति भयंकर शान उसका

  • इनका मुख्य नाम सुदुम्न था, किंतु जन्मके समय पुत्रीरूपमें उत्पन्न होनेके कारण 'इला' और बादमें पुरुष-रूपमें परिवर्तित हो जानेपर 'इल' नाम हुआ। इनकी कथा प्रायः सभी पुराणों तथा महाभारत आदिमें भी आती है।

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

  • उत्तरपर्व *

४४३

भक्षण कर रहे हैं, पाँचवेंमें लोहेके संदेशसे उसे पीड़ित कर रहे हैं। छठेमें कोल्हूके बीच ईखके समान पेरी जा रही है और सातवें स्थानपर ताला खोलकर देखा तो वहाँ भी उसकी माताको हजारों कृमि भक्षण कर रहे हैं और वह रुधिर आदिसे लथपथ हो रही है।

यह देखकर श्यामलाने विचार किया कि मेरी माताने ऐसा कौन-सा पाप किया, जिससे वह इस दुर्गतिको प्राप्त हुई। यह सोचकर उसने सारा वृत्तान्त अपने पति धर्मराजको बतलाया।

धर्मराज बोले—‘प्रिये! मैंने इसीलिये कहा था कि ये सात ताले कभी न खोलना, नहीं तो तुम्हें वहाँ पश्चात्ताप होगा। तुम्हारी माताने संतानके स्नेहसे ब्राह्मणके गेहूँ चुराये थे, क्या तुम इस बातको नहीं जानती हो जो तुम मुझसे पूछ रही हो? यह सब उसी कर्मका फल है। ब्राह्मणका धन स्नेहसे भी भक्षण करे तो भी सात कुल अधोगतिको प्राप्त होते हैं और चुराकर खाये तो जबतक चन्द्रमा और तारे हैं, तबतक नरकसे उद्धार नहीं होता। जो गेहूँ इसने चुराये थे, वे ही कृमि बनकर इसका भक्षण कर रहे हैं।’

श्यामलाने कहा—महाराज! मेरी माताने जो कुछ भी पहले किया, वह सब मैं जानती ही हूँ, फिर भी अब आप कोई ऐसा उपाय बतलायें, जिससे मेरी माताका नरकसे उद्धार हो जाय। इसपर धर्मराजने कुछ समय विचार किया और कहने लगे—‘प्रिये! आजसे सात जन्म पूर्व तुम ब्राह्मणी थीं। उस समय तुमने अपनी सखियोंके साथ जो बुधाष्टमीका व्रत किया था, यदि उसका फल तुम संकल्पपूर्वक अपनी माताको दे दो तो इस संकटसे उसकी मुक्ति हो जायगी।’ यह सुनते ही श्यामलाने स्नानकर अपने व्रतका पुण्यफल संकल्पपूर्वक माताके लिये दान कर दिया। व्रतके

फलके प्रभावसे उसकी माता भी उसी क्षण दिव्य देह धारणकर विमानमें बैठकर अपने पतिसहित स्वर्गलोकको चली गयी और बुध ग्रहके समीप स्थित हो गयी।

राजन्! अब इस व्रतके विधानको भी आप सावधान होकर सुनें—जब-जब शुक्ल पक्षकी अष्टमीको बुधवार पड़े तो उस दिन एकभुक्त-व्रत करना चाहिये। पूर्वाह्नमें नदी आदिमें स्नान करे और वहाँसे जलसे भरा नवीन कलश लाकर घरमें स्थापित कर दे, उसमें सोना छोड़ दे और बाँसके पात्रमें पक्वान्न भी रखे। आठ बुधाष्टमियोंका व्रत करे और आठोंमें क्रमसे ये आठ पक्वान्न—मोदक, घीका अपूप, वटक, श्वेत कसारसे बने पदार्थ, सोहालक (खांडयुक्त अशोकवर्तिका) और फल, पुष्प तथा फेनी आदि अनेक पदार्थ बुधको निवेदित कर बादमें स्वयं भी अपने इष्ट-मित्रोंके साथ भोजन करे। साथ ही बुधाष्टमीकी कथा भी सुने। बिना कथा सुने भोजन न करे। बुधकी एक माशे (८ रती=एक माशा) या आधे माशेकी सुवर्णमयी प्रतिमा बनाकर गन्ध, पुष्प, नैवेद्य, पीत वस्त्र तथा दक्षिणा आदिसे उसका पूजन करे। पूजनके मन्त्र इस प्रकार हैं—

‘ॐ बुधाय नमः, ॐ सोमात्मजाय नमः, ॐ दुर्बुद्धिनाशनाय नमः, ॐ सुबुद्धिप्रदाय नमः, ॐ ताराजाताय नमः, ॐ सौम्यग्रहाय नमः तथा ॐ सर्वसौख्यप्रदाय नमः।’

तदनन्तर निम्नलिखित मन्त्र पढ़कर मूर्तिके साथ-साथ वह भोज्य-सामग्री तथा अन्य पदार्थ ब्राह्मणको दान कर दे—

ॐ बुधोऽयं प्रतिगृह्णातु द्रव्यस्थोऽयं बुधः स्वयम्। दीयते बुधराजाय तुष्यतां च बुधो मम॥

(उत्तरपर्व ५४।५१)

ब्राह्मण भी मूर्ति आदि ग्रहणकर यह मन्त्र पढ़े—

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

४४४

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

बुधः सौम्यस्तारकेयो राजपुत्र इलापतिः । कुमारो द्विजराजस्य यः पुरुरवसः पिता ॥ दुर्बुद्धिबोधदुरितं नाशयित्वावयोर्बुधः । सौख्यं च सौमनस्यं च करोतु शशिनन्दनः ॥

(उत्तरपर्व ५४।५२-५३)

इस विधिसे जो बुधाष्टमीका व्रत करता है, वह सात जन्मतक जातिस्मर होता है। धन, धान्य,

पुत्र, पौत्र, दीर्घ आयुष्य और ऐश्वर्य आदि संसारके सभी पदार्थोंको प्राप्त कर अन्त समयमें नारायणका स्मरण करता हुआ तीर्थ-स्थानमें प्राण त्याग करता है और प्रलयपर्यन्त स्वर्गमें निवास करता है। जो इस विधानको सुनता है, वह भी ब्रह्महत्यादि पापोंसे मुक्त हो जाता है१।

(अध्याय ५४)

श्रीकृष्ण-जन्माष्टमीव्रतकी कथा एवं विधि

राजा युधिष्ठिरने कहा—अच्युत! आप विस्तारसे (अपने जन्म-दिन) जन्माष्टमीव्रतका विधान बतलानेकी कृपा करें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! जब मथुरामें कंस मारा गया, उस समय माता देवकी मुझे अपनी गोदमें लेकर रोने लगीं। पिता वसुदेवजी भी मुझे तथा बलदेवजीको आलिङ्गित कर गद्गदावाणीसे कहने लगे—‘आज मेरा जन्म सफल हुआ, जो मैं अपने दोनों पुत्रोंको कुशलसे देख रहा हूँ। सौभाग्यसे आज हम सभी एकत्र मिल रहे हैं।’ हमारे माता- पिताको अति हर्षित देखकर बहुतसे लोग वहाँ एकत्र हुए और मुझसे कहने लगे—‘भगवन्! आपने बहुत बड़ा काम किया, जो इस दुष्ट कंसको मारा। हम सभी इससे बहुत पीड़ित थे। आप कृपाकर यह बतलायें कि आप माता देवकीके गर्भसे कब आविर्भूत हुए थे? हम सब उस दिन महोत्सव मनाया करेंगे। आपको बार-बार नमस्कार है, हम

सब आपकी शरण हैं। आप हम सभीपर प्रसन्न होइये। उस समय पिता वसुदेवजीने भी मुझसे कहा था कि अपना जन्मदिन इन्हें बता दो।’

तब मैंने मथुरानिवासी जनोंको जन्माष्टमीव्रतका रहस्य बतलाया और कहा—‘पुरवासियो! आपलोग मेरे जन्मदिनको विश्वमें जन्माष्टमीके नामसे प्रसारित करें। प्रत्येक धार्मिक व्यक्तिको जन्माष्टमीका व्रत अवश्य करना चाहिये। जिस समय सिंह राशिपर सूर्य और वृषराशिपर चन्द्रमा था, उस भाद्रपद मासकी कृष्ण पक्षकी अष्टमी तिथिको अर्धरात्रिमें रोहिणी नक्षत्रमें मेरा जन्म हुआ२। वसुदेवजीके द्वारा माता देवकीके गर्भसे मैंने जन्म लिया। यह दिन संसारमें जन्माष्टमी नामसे विख्यात होगा। प्रथम यह व्रत मथुरामें प्रसिद्ध हुआ और बादमें सभी लोकोंमें इसकी प्रसिद्धि हो गयी। इस व्रतके करनेसे संसारमें शान्ति होगी, सुख प्राप्त होगा और प्राणिवर्ग रोगरहित होगा।’

१-मत्स्यपुराणमें बुधका स्वरूप इस प्रकार बतलाया गया है—

पीतमल्याम्बरधरः कर्णिकारसमधृतिः। खड्गचर्मगदापाणिः सिंहस्थो वरदो बुधः ॥ (१४।४)

बुध पीले रंगकी पुष्पमाला और वस्त्र धारण करते हैं। उनकी शरीरकान्ति कनेरके पुष्प-सरीखी है। वे चारों हाथोंमें क्रमशः तलवार, ढाल, गदा और वरदमुद्रा धारण किये रहते हैं तथा सिंहपर सवार होते हैं।

हेमाद्रि, व्रतराज तथा जयसिंहकल्पद्रुम आदि निबन्धग्रन्थोंमें भी भविष्योत्तरपुराणके नामसे बुधाष्टमीव्रत दिया गया है, पर पाठ-भेद अधिक है। व्रतराजमें बुधके पूजनकी तथा व्रतके उद्यापनकी विधि भी भविष्योत्तरपुराणके नामसे दी गयी है। इस कथामें बुद्धि, युक्ति और विमर्श-शक्तिका भी पर्याप्त सम्मिश्रण दीखता है।

२-सिंहराशिगते सूर्य गगने जलदाकुले। मासि भाद्रपदेऽष्टम्यां कृष्णपक्षेऽर्धरात्रके।

वृषराशिस्थिते चन्द्रे नक्षत्रे रोहिणीयुते ॥ (उत्तरपर्व ५५।१४)

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

  • उत्तरपर्व *

४४५

महाराज युधिष्ठिरने कहा— भगवन् ! अब आप इस व्रतका विधान बतलायें, जिसके करनेसे आप प्रसन्न होते हैं।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले— महाराज ! इस एक ही व्रतके कर लेनेसे सात जन्मके पाप नष्ट हो जाते हैं। व्रतके पहले दिन दन्तधवन आदि करके व्रतका नियम ग्रहण करे। व्रतके दिन मध्याह्नमें स्नानकर माता भगवती देवकीका एक सूतिका-गृह बनाये। उसे पद्मरागमणि और वनमाला* आदिसे सुशोभित करे। गोकुलकी भाँति गोप, गोपी, घण्टा, मृदङ्ग, शङ्ख और माङ्गल्य-कलश आदिसे समन्वित तथा अलंकृत सूतिका-गृहके द्वारपर रक्षाके लिये खड्ग, कृष्ण छग, मुशल आदि रखे। दीवालोंपर स्वस्तिक आदि माङ्गलिक चिह्न बना दे। षष्ठीदेवीकी भी नैवेद्य आदिके साथ स्थापना करे। इस प्रकार यथाशक्ति उस सूतिकागृहको विभूषितकर बीचमें पर्यङ्कके ऊपर मुझसहित अर्थसुसावस्थावाली, तपस्विनी माता देवकीकी प्रतिमा स्थापित करे। प्रतिमाएँ आठ प्रकारकी होती हैं—स्वर्ण, चाँदी, ताम्र, पीतल, मृत्तिका, काष्ठकी, मणिमयी तथा चित्रमयी। इनमेंसे किसी भी वस्तुकी सर्वलक्षणसम्पन्न प्रतिमा बनाकर स्थापित करे। माता देवकीका स्तनपान करती हुई बालस्वरूप मेरी प्रतिमा उनके समीप पलँगके ऊपर स्थापित करे। एक कन्याके साथ माता यशोदाकी प्रतिमा भी वहाँ स्थापित की जाय। सूतिका-मण्डपके ऊपरकी भित्तियोंमें देवता, ग्रह, नाग तथा विद्याधर आदिकी मूर्तियाँ हाथोंसे पुष्प-वर्षा करते हुए बनाये। वसुदेवजीको भी सूतिकागृहके बाहर खड्ग और ढाल धारण किये चित्रित करना चाहिये। वसुदेवजी महर्षि कश्यपके अवतार हैं और देवकी माता अदितिकी। बलदेवजी शेषनागके

अवतार हैं, नन्दबाबा दक्षप्रजापतिके, यशोदा दितिकी और गर्गमुनि ब्रह्माजीके अवतार हैं। कंस कालनेमिका अवतार है। कंसके पहेरदारोंको सूतिकागृहके आस-पास निद्रावस्थामें चित्रित करना चाहिये। गौ, हाथी आदि तथा नाचती-गाती हुई अप्सराओं और गन्धर्वोंकी प्रतिमा भी बनाये। एक ओर कालिय नागको यमुनाके हृदमें स्थापित करे।

इस प्रकार अत्यन्त रमणीय नवसूतिका-गृहमें देवी देवकीका स्थापनकर भक्तिसे गन्ध, पुष्प, अक्षत, धूप, नारियल, दाडिम, ककड़ी, बीजपूर, सुपारी, नारंगी तथा पनस आदि जो फल उस देशमें उस समय प्राप्त हों, उन सबसे पूजनकर माता देवकीकी इस प्रकार प्रार्थना करे—

गायद्रिः किन्नराहैः सततपरिवृता वेणुवीणानिनादै-

भृङ्गारादर्शकुम्भप्रमरकृतकैः सेव्यमाना मुनीन्द्रैः । पर्यङ्के स्वास्तुते या मुदिततरमनाः पुत्रिणी सव्यगास्ते सा देवी देवमाता जयति सुवदना देवकी कातरूपा ॥

(उत्तरपर्व ५५।४२)

‘जिनके चारों ओर किन्नर आदि अपने हाथोंमें वेणु तथा वीणा-वाद्योंके द्वारा स्तुति-गान कर रहे हैं और जो अभिषेक-पात्र, आदर्श, मङ्गलमय कलश तथा चैवर हाथोंमें लिये श्रेष्ठ मुनिगणोंद्वारा सेवित हैं तथा जो कृष्ण-जननी भलीभाँति बिछे हुए पलँगपर विराजमान हैं, उन कमनीय स्वरूपवाली सुवदना देवमाता अदिति-स्वरूपा देवी देवकीकी जय हो।’

उस समय यह ध्यान करे कि कमलासना लक्ष्मी देवकीके चरण दबा रही हों। उन देवी लक्ष्मीकी— ‘नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।’ इस मन्त्रसे पूजा करे। इसके बाद ‘ॐ देवक्यै नमः, ॐ वसुदेवाय नमः, ॐ बलभद्राय नमः,

  • आजानुलम्बिनी ऋतु-पुष्योकी माला और पद्मराग, मुक्ता आदि पञ्चमणियोंकी माला तथा तुलसीपत्रमिश्रित विविध पुष्पोंकी मालाको भी वनमाला, जयमाला और वैजयन्ती माला कहा गया है।

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

४४६

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

ॐ श्रीकृष्णाय नमः, ॐ सुभद्रायै नमः, ॐ नन्दाय नमः तथा ॐ यशोदायै नमः'—इन नाम-मन्त्रोंसे सबका अलग-अलग पूजन करे।

कुछ लोग चन्द्रमाके उदय हो जानेपर चन्द्रमाको अर्घ्य प्रदान कर हरिका ध्यान करते हैं, उन्हें निम्नलिखित मन्त्रोंसे हरिका ध्यान करना चाहिये—

अनधं वामनं शौरिं वैकुण्ठं पुरुषोत्तमम् । वासुदेवं हृषीकेशं माधवं मधुसूदनम् ॥ वाराहं पुण्डरीकाक्षं नृसिंहं ब्राह्मणप्रियम् । दामोदरं पद्मनाभं केशवं गरुडध्वजम् ॥ गोविन्दमच्युतं कृष्णामनन्तमपराजितम् । अधोक्षजं जगद्गीजं सर्गस्थित्यन्तकारणम् ॥ अनादिनिधनं विष्णुं त्रैलोक्येशं त्रिविक्रमम् । नारायणं चतुर्बाहुं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥ पीताम्बरधरं नित्यं वनमालाविभूषितम् । श्रीवत्साङ्कं जगत्सेतुं श्रीधरं श्रीपतिं हरिम् ॥

(उत्तरपर्व ५५।४६—५०)

—इन मन्त्रोंसे भगवान् श्रीहरिका ध्यान करके 'योगेश्वराय योगसम्भवाय योगपतये गोविन्दाय नमो नमः'—इस मन्त्रसे प्रतिमाको स्नान कराना चाहिये। अनन्तर 'यज्ञेश्वराय यज्ञसम्भवाय यज्ञपतये गोविन्दाय नमो नमः'—इस मन्त्रसे अनुलेपन, अर्घ्य, धूप, दीप आदि अर्पण करे। तदनन्तर 'विश्वाय विश्वेश्वराय विश्वसम्भवाय विश्वपतये गोविन्दाय नमो नमः।' इस मन्त्रसे नैवेद्य निवेदित करे। दीप अर्पण करनेका मन्त्र इस प्रकार है—'धर्मेश्वराय धर्मपतये धर्मसम्भवाय गोविन्दाय नमो नमः।'

इस प्रकार वेदीके ऊपर रोहिणीसहित चन्द्रमा, वसुदेव, देवकी, नन्द, यशोदा और बलदेवजीका पूजन करे, इससे सभी पापोंसे मुक्ति हो जाती है। चन्द्रोदयके समय इस मन्त्रसे चन्द्रमाको अर्घ्य प्रदान करे—

क्षीरोदार्णवसम्भूत अत्रिनेत्रसमुद्भव । गृह्णाणार्घ्यं शशाङ्कन्दो रोहिण्या सहितो मम ॥

(उत्तरपर्व ५५।५४)

आधी रातको गुड़ और घीसे वसोर्धाराकी आहुति देकर षष्ठीदेवीकी पूजा करे। उसी क्षण नामकरण आदि संस्कार भी करने चाहिये। नवमीके दिन प्रातःकाल मेरे ही समान भगवतीका भी उत्सव करना चाहिये। इसके अनन्तर ब्राह्मणोंको भोजन कराकर 'कृष्णो मे प्रीयताम्' कहकर यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिये और यह मन्त्र भी पढ़ना चाहिये—

यं देवं देवकी देवी वसुदेवादजीजनत् । भौमस्य ब्रह्मणो गुप्त्यै तस्मै ब्रह्मात्मने नमः ॥

(उत्तरपर्व ५५।६०)

इसके बाद ब्राह्मणोंको बिदा करे और ब्राह्मण कहें—'शान्तिरस्तु शिवं चास्तु।'

धर्मनन्दन! इस प्रकार जो मेरा भक्त पुरुष अथवा नारी देवी देवकीके इस महोत्सवको प्रतिवर्ष करता है, वह पुत्र, संतान, आरोग्य, धन-धान्य, सदगृह, दीर्घ आयुष्य और राज्य तथा सभी मनोरथोंको प्राप्त करता है। जिस देशमें यह उत्सव किया जाता है, वहाँ जन्म-मरण, आवागमनकी व्याधि, अवृष्टि तथा ईति-भीति आदिका कभी भय नहीं रहता। मेघ समयपर वर्षा करते हैं। पाण्डुपुत्र! जिस घरमें यह देवकी-व्रत किया जाता है, वहाँ अकालमृत्यु नहीं होती और न गर्भपात होता है तथा वैधव्य, दौर्भाग्य एवं कलह नहीं होता। जो एक बार भी इस व्रतको करता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त होता है। इस व्रतके करनेवाले संसारके सभी सुखोंको भोगकर अन्तमें विष्णुलोकमें निवास करते हैं।

(अध्याय ५५)

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

  • उत्तरपर्व *

४४७

दूर्वाकी उत्पत्ति एवं दूर्वाष्टमीव्रतका विधान

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी अष्टमी तिथिको अत्यन्त पवित्र दूर्वाष्टमीव्रत होता है। जो पुरुष इस पुण्य दूर्वाष्टमीका श्रद्धापूर्वक व्रत करता है, उसके वंशका क्षय नहीं होता। दूर्वाके अङ्गुरोंकी तरह उसके कुलकी वृद्धि होती रहती है।

महाराज युधिष्ठिरने पूछा—लोकनाथ! यह दूर्वा कहाँसे उत्पन्न हुई? कैसे चिरायु हुई तथा यह क्यों पवित्र मानी गयी और लोकमें वन्द्य तथा पूज्य कैसे हुई? इसे भी बतानेकी कृपा करें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—देवताओंके द्वारा अमृतकी प्राप्तिके लिये क्षीरसागरके मथे जानेपर भगवान् विष्णुने अपनी जंघापर हाथसे पकड़कर मन्दराचलको धारण किया था। मन्दराचलके वेगसे भ्रमण करनेके कारण रगड़से विष्णुभगवान्के जो रोम उखड़कर समुद्रमें गिरे थे, पुनः समुद्रकी लहरोंद्वारा उछाले गये वे ही रोम हरित वर्णके सुन्दर एवं शुभ दूर्वाके रूपमें उत्पन्न हुए। उसी दूर्वापर देवताओंने मन्थनसे उत्पन्न अमृतका कुम्भ रखा, उससे जो अमृतके बिन्दु गिरे, उनके स्पर्शसे वह दूर्वा अजर-अमर हो गयी। वह देवताओंके लिये पवित्र तथा वन्द्य हुई। देवताओंने भाद्रपदकी शुक्ला अष्टमीको गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य,

खर्जूर, नारिकेल, द्राक्षा, कपित्थ, नारंग, आम्र, बीजपूर, दाड़िम आदि फलों तथा दही, अक्षत, माला आदिसे निम्न मन्त्रोंद्वारा उसका पूजन किया— त्वं दूर्वैऽमृतजन्मासि वन्दिता च सुगसुरैः। सौभाग्यं संततिं कृत्वा सर्वकार्यकरी भव॥ यथा शाखाप्रशाखाभिर्विस्तुतासि महीतले। तथा ममापि संतानं देहि त्वमजरामरे॥

(उत्तरपर्व ५६। १२-१३)

देवताओंके साथ ही उनकी पत्नियाँ तथा अप्सराओंने भी उसका पूजन किया। मर्त्यलोकमें वेदवती, सीता, दमयन्ती आदि स्त्रियोंके द्वारा भी सौभाग्यदायिनी यह दूर्वा पूजित (वन्दित) हुई और सभीने अपना-अपना अभीष्ट प्राप्त किया। जो भी नारी स्नानकर शुद्ध वस्त्र धारणकर दूर्वाका पूजन कर तिलपिष्ट, गोधूम और सप्तधान्य आदिका दानकर ब्राह्मणको भोजन कराती है और श्रद्धासे इस पुण्य तथा संतानकारक दूर्वाष्टमी-व्रतको करती है वह पुत्र, सौभाग्य—धन आदि सभी पदार्थोंको प्राप्तकर बहुत कालतक संसारमें सुख भोगकर अन्तमें अपने पतिसहित स्वर्गमें जाती है और प्रलयपर्यन्त वहाँ निवास करती है तथा देवताओंके द्वारा आनन्दित होती है।

(अध्याय ५६)

मासिक कृष्णाष्टमी*-व्रतोंकी विधि

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—पार्थ! अब आप समस्त पापों तथा भयोंके नाशक, धर्मप्रद और भगवान् शंकरके प्रीतिकारक मासिक कृष्णाष्टमी-

व्रतोंके विधानका श्रवण करें। मार्गशीर्ष मासकी कृष्णाष्टमीको उपवासके नियम ग्रहणकर जितेन्द्रिय और क्रोधरहित हो गुरुके आज्ञानुसार उपवास

  • यह श्रीकृष्णजन्माष्टमीसे भिन्न शिवोपासनाका एक मुख्य अङ्गभूत व्रत है। इसकी महिमा तथा अनुष्ठान-विधिका वर्णन मत्स्यपुराण, अध्याय ५६, नारदपुराण, सौरपुराण १४। १-३६, व्रत-कल्पद्रुम आदिमें बहुत विस्तारसे है। विशेष जानकारीके लिये उन्हें भी देखना चाहिये। ज्योतिषग्रन्थों और पुराणोंके अनुसार अष्टमी तिथिके स्वामी शिव ही हैं। अतः अष्टमी तथा चतुर्दशीको उनकी उपासना विशेष कल्याणकारिणी होती है।

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

४४८

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

करे। मध्याह्नेके अनन्तर नदी आदिमें स्नानकर गन्ध, उत्तम पुष्प, गुग्गुल, धूप, दीप, अनेक प्रकारके नैवेद्य तथा ताम्बूल आदि उपचारोंसे शिवलिङ्गका पूजनकर काले तिलोंसे हवन करे। इस मासमें शंकरजीका पूजन करे और गोमूत्र-पानकर रात्रिमें भूमिपर शयन करे, इससे अतिरात्र-यज्ञका फल प्राप्त होता है। पौष मासकी कृष्णाष्टमीको शम्भु नामसे महेश्वरका पूजनकर घृत प्राशन करनेसे वाजपेय-यज्ञका फल प्राप्त होता है। माघ मासकी कृष्णाष्टमीको महेश्वर नामसे भगवान् शंकरका पूजनकर गोदुग्ध-प्राशन करनेसे अनेक यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। फाल्गुन मासकी कृष्णाष्टमीमें महादेव नामसे उनका पूजनकर तिल भक्षण करनेसे आठ राजसूय-यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। चैत्र मासकी कृष्णाष्टमीमें स्थाणु नामसे शिवका पूजनकर यवका भोजन करनेसे अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है। वैशाख मासकी कृष्णाष्टमीमें शिव नामसे इनका पूजनकर रात्रिमें कुशोदक-पान करनेसे दस पुरुषमेध यज्ञोंका फल मिलता है। ज्येष्ठ मासकी कृष्णाष्टमीमें पशुपति नामसे भगवान् शंकरका पूजनकर गोशृंगजलका पान करनेसे लाख गोदानका फल मिलता है। आषाढ़ मासकी कृष्णाष्टमीमें उग्र नामसे शंकरका पूजनकर गोमय-प्राशन करनेवाला दस लाख वर्षसे भी अधिक समयतक रुद्रलोकमें निवास करता है। श्रावण मासकी कृष्णाष्टमीमें शर्व नामसे भगवान् शंकरकी पूजाकर रात्रिमें अर्क-प्राशन करनेसे बहुत-सा सुवर्ण-दान किये जानेवाले यज्ञका फल मिलता

है। भाद्रपद मासकी कृष्णाष्टमीमें त्र्यम्बक नामसे इनकी पूजाकर एवं बिल्वपत्रका भक्षण करनेसे अन्न-दानका फल मिलता है। आश्विन मासकी कृष्णाष्टमीमें भव नामसे भगवान् शंकरका यजनकर तण्डुलोदकका पान करनेसे सौ पुण्डरीक यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। इसी प्रकार कार्तिक मासकी कृष्णाष्टमीमें रुद्र नामसे भगवान् शंकरकी भक्तिसे पूजाकर रात्रिमें दहीका प्राशन करनेसे अग्निष्टोम-यज्ञका फल प्राप्त होता है।

इस प्रकार बारह महीने शिवजीका पूजन कर अन्तमें शिवभक्त ब्राह्मणोंको घृत, शर्करायुक्त पायस भोजन कराये तथा यथाशक्ति सुवर्ण, वस्त्र आदि उनको देकर प्रसन्न करे। काले तिलसे पूर्ण बारह कलश, छाता, जूता तथा वस्त्र आदि ब्राह्मणोंको देकर दूध देनेवाली सवत्सा एक कृष्णवर्णकी गौ भी महादेवजीको निवेदित करे। इस मासिक कृष्णाष्टमी-व्रतको जो एक वर्षतक निरन्तर करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर उत्तम ऐश्वर्य प्राप्त करता है और सौ वर्षपर्यन्त संसारके आनन्दोंका उपभोग करता है। इसी व्रतका अनुष्ठान कर इन्द्र, चन्द्र, ब्रह्मा तथा विष्णु आदि देवताओंने उत्तम-उत्तम पदोंको प्राप्त किया है। जो स्त्री-पुरुष इस व्रतको भक्तिपूर्वक करते हैं, वे उत्तम विमानमें बैठकर देवताओंद्वारा स्तुत होते हुए शिवलोकमें जाते हैं और भगवान् शंकरके ऐश्वर्यसे सम्पन्न हो जाते हैं। वहाँ आठ कल्पपर्यन्त निवास करते हैं और जो इस व्रतके माहात्म्यको सुनता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। (अध्याय ५७)

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

  • उत्तरपर्व *

४४९

अनघाष्टमीव्रतकी कथा एवं विधि

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज ! प्राचीन कालमें ब्रह्माजीके महातेजस्वी अत्रि पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए। अत्रिकी भार्याका नाम था अनसूया, वह महान् भाग्यशालिनी एवं पतिव्रता थी। कुछ कालके बाद उनके महातेजस्वी पुत्र दत्त हुए। दत्त महान् योगी थे। ये विष्णुके अंशसे उत्पन्न हुए थे। इनका दूसरा नाम था अनघ। इनकी भार्याका नाम था नदी। ब्राह्मणोंके सभी गुणोंसे सम्पन्न इनके आठ पुत्र थे। 'दत्त' विष्णुरूपमें थे तथा 'नदी' लक्ष्मीकी रूप थीं। दत्त अपनी भार्या नदीके साथ योगाभ्यासमें लीन थे, उसी समय जम्भ* नामक दैत्यसे पीड़ित तथा पराजित देवता विन्ध्यगिरिमें स्थित इनके आश्रममें आये और उन्होंने इनकी शरण ग्रहण की। दत्तात्रेयजीने इन्द्रके साथ उन सभी देवताओंको अपने योगबलसे अपने आश्रममें रख लिया और कहा—'आपलोग निर्भय तथा निश्चिन्त होकर यहाँ रहें।' देवगण अत्यन्त प्रसन्न हो गये और वे वहाँ रहने लगे।

दैत्य-समुदाय भी देवताओंको खोजते-खोजते इसी आश्रमपर आ पहुँचा। वे क्रोधपूर्वक ललकारकर कहने लगे—'इस मुनिकी पत्नीको पकड़ लो और यह सारा आश्रम उजाड़ डालो।' यह कहते हुए दैत्यगण आश्रममें घुस गये और उनकी पत्नीको उठाकर अपने सिरपर रखकर चल पड़े। लक्ष्मीको सिरपर उठाते ही सभी दैत्य श्रीहीन हो गये और दत्तकी दृष्टि पड़नेसे वे सभी दैत्य भागने और नष्ट होने लगे। देवताओंने भी उन्हें मारना प्रारम्भ कर दिया। निश्चैष्ठ होकर दैत्यगण हाहाकार करने लगे। दत्तमुनिके प्रभावसे वहाँ प्रलय मच गया। इन्द्रादि देवताओंने सभी असुरोंको पराजित कर दिया और फिर वे सभी अपने-अपने लोक चले

गये तथा पूर्ववत् आनन्दसे रहने लगे। देवताओंने उन भगवान् दत्तात्रेयकी महिमा और प्रभावको ही इसमें कारण माना।

दत्तात्रेयजी भी संसारके कल्याणके लिये ऊर्ध्वबाहु होकर कठिन तपस्या करने लगे। वे योगमार्गका आश्रय लेकर ध्यान-समाधिमें स्थित हो गये। इसी प्रकार समाधिमें उन्हें तीन हजार वर्ष व्यतीत हो गये। एक दिन माहिष्मतीके राजा हैहयाधिपति कार्तवीर्यार्जुन उनके पास आया और रात-दिन उनकी सेवा करने लगा। दत्त उसकी सेवासे अत्यन्त प्रसन्न हो गये और उन्होंने उसकी याचनापर उसे चार वर प्रदान किये—पहला वर था हजार हाथ हो जायें, दूसरे वरसे सारी पृथ्वीको अधर्मसे बचाते हुए धर्मपूर्वक पृथ्वीका शासन करना। तीसरे वरसे लड़ाईके मैदानमें किसीसे पराजित न होना तथा चौथे वरसे भगवान् विष्णुके हाथों मृत्यु होना।

कौन्तेय ! योगाभ्यासमें लीन उन दत्तमुनिने कार्तवीर्यार्जुनको अष्टसिद्धियोंसे समन्वित चक्रवर्ती-पदवाले राज्यको प्रदान किया। कार्तवीर्यार्जुनने भी सप्तद्वीपा वसुमतीको धर्मपूर्वक अपने अधीन कर लिया। यह सब उसके हजार बाहुओंका प्रभाव था। वह अपनी मायाद्वारा यज्ञोंके माध्यमसे ध्वजावाला रथ उत्पन्न कर लेता था। उसके प्रभावसे सभी द्वीपोंमें दस हजार यज्ञ निरन्तर होते रहते थे। उन यज्ञोंकी वेदियाँ, यूप तथा मण्डप आदि सभी सोनेके रहते थे। उनमें प्रचुर दक्षिणाएँ दी जाती थीं। विमानमें बैठकर सभी देवता, गन्धर्व तथा अप्सराएँ पृथ्वीपर आकर यज्ञकी शोभा बढ़ाते रहते थे। नारद नामका गन्धर्व उसके यज्ञकी गाथा इस प्रकार गाया करता था—'कार्तवीर्यके पराक्रमकी बात सुननेसे यह पता चलता है कि संसारका कोई भी राजा उसके समान

  • यह अनेक राक्षसोंका नाम है। इसका वर्णन श्रीमद्भागवत ६।१८।१२, ब्रह्माण्ड ३।६।१०, वायु ९७।१०३, मत्स्य ४७।७२ और विष्णु ४।६।१४ आदि पुराणोंमें आया है। इसे इन्द्रने मारा था, अतः इन्द्रका एक नाम जम्भधेदी भी है।

584 Sankshipta Bhavishya Puran_Section_1011.Pdf

४५०

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

यज्ञ, दान तथा तप नहीं कर सकता। सातों द्वीपोंमें केवल वही ढाल, तलवार तथा धनुष-बाणवाला है। जैसे बाज पक्षीको अन्य पक्षी डरसे अपने समीप ही समझते हैं, वैसे ही अन्य राजा लोग दूरसे ही इससे भय खाते हैं। इसकी सम्पत्ति कभी नष्ट नहीं होती, इसके राज्यमें न कहीं शोक दिखायी पड़ता है न कोई क्लान्त ही। यह अपने प्रभावसे पृथ्वीपर धर्मपूर्वक प्रजाओंका पालन करता है।'

भगवान् श्रीकृष्ण पुनः बोले— नराधिप! कार्तवीर्य इस पृथ्वीपर पचासी हजार वर्षतक अखण्ड शासन करता रहा। वह अपने योगबलसे पशुओंका पालक तथा खेतोंका रक्षक भी था। समयानुसार मेघ बनकर वृष्टि भी करता था। धनुषकी प्रत्यञ्चाके आधातसे कठोर त्वचायुक्त अपनी सहस्रों भुजाओंद्वारा वह सूर्यके समान उद्घासित होता था। उसने अपनी हजार भुजाओंके बलसे समुद्रको मथ डाला और नागलोकमें कर्कोटक आदि नागोंको जीतकर वहाँ भी अपनी नगरी बसा ली। उसकी भुजाओंद्वारा समुद्रके उद्भेलित होनेसे पातालवासी महान् असुर भी निश्चेष्ट हो जाते थे। बड़े-बड़े नाग उसके पराक्रमको देखकर सिर नीचा कर लेते थे। सभी धनुर्धरोंको उसने जीत लिया। अपने पराक्रमसे रावणको भी उसने अपनी माहिष्मती नगरीमें लाकर बंदी बना रखा था, जिसे पुलस्त्य ऋषिने छुड़वाया। एक बार भूखे-प्यासे चित्रभानु (अग्निदेव)-को राजा कार्तवीर्यर्जुनने समस्त ससद्वीपा वसुन्धराको दानमें दे दिया। इस प्रकार वह कार्तवीर्यर्जुन बड़ा पराक्रमी एवं गुणवान् राजा हुआ था।

योगाचार्य भगवान् अनघ (दत्तात्रेय)-से वर प्राप्तकर कार्तवीर्यर्जुनने पृथ्वीलोकमें इस अनघाष्टमी-व्रतको प्रवर्तित किया। अघको पाप कहा जाता है यह तीन प्रकारका होता है—कायिक, वाचिक और मानसिक। यह अनघाष्टमी त्रिविध पापोंको नष्ट करनेवाली है, इसलिये इसे अनघा कहते हैं। इस व्रतके प्रभावसे अष्टविध ऐश्वर्य (अणिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, लघिमा, ईशित्व, वशिन्त्व तथा सर्वकामावसायिता) प्राप्त कर लेना मानो विनोद ही है।

महाराज युधिष्ठिरने पूछा— पुण्डरीकाक्ष! राजा कार्तवीर्यर्जुनके द्वारा प्रवर्तित यह अनघाष्टमी-व्रत किन मन्त्रोंके द्वारा, कब और कैसे किया जाता है? इसे आप बतलानेकी कृपा करें।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा— राजन्! इस व्रतकी विधि इस प्रकार है—मार्गशीर्ष मासके कृष्ण पक्षकी अष्टमीको कुशोंसे स्त्री-पुरुषकी प्रतिमा बनाकर भूमिपर स्थापित करनी चाहिये। उनमें एकमें सौम्य एवं शान्तिस्वरूपयुक्त अनघ (दत्तात्रेय)-की तथा दूसरेमें अनघा (लक्ष्मी)-की भावना करनी चाहिये और ऋग्वेदके विष्णुसूक्तसे* पूजा करनी चाहिये। पूजामें फल, कन्द, शृंगारकी सामग्री, बेर, विविध धान्य, विविध पुष्पका उपयोग करना चाहिये। दीपक जलाना चाहिये तथा ब्राह्मणों एवं बन्धु-बान्धवोंको भोजन कराना चाहिये। इस प्रकार पूजा करनेवाला सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है, लक्ष्मी प्राप्त करता है तथा भगवान् विष्णु उसपर प्रसन्न हो जाते हैं। (अध्याय ५८)

  • अतो देवा अवन्तु नो यतो विष्णुर्विचक्रमे । पृथिव्याः सप्त धामभिः ॥ इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम् । समूहलमस्य पांसुरे ॥ त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गीपा अदाभ्यः । अतो धर्माणि धारयन् ॥ विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे । इन्द्रस्य युज्यः सखा ॥ तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूर्यः । दिवीव चक्षुराततम् ॥ तद् विप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते । विष्णोर्यत् परमं पदम् ॥ (ऋग्वेद १।२२।१६-२१)

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sanskrita Bhavishya Puran_Section_16_1_Back

  • उत्तरपर्व *

४५१

सोमाष्टमी-व्रत-विधान

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज ! अब मैं एक दूसरा व्रत बतला रहा हूँ, जो सर्वसम्मत, कल्याणप्रद एवं शिवलोक-प्रापक है। शुक्ल पक्षकी अष्टमीके दिन यदि सोमवार हो तो उस दिन उमासहित भगवान् चन्द्रचूड़का पूजन करे। इसके लिये एक ऐसी प्रतिमाकी स्थापना करनी चाहिये, जिसका दक्षिण भाग शिवस्वरूप और वाम भाग उमास्वरूप हो। अनन्तर विधिपूर्वक उसे पञ्चामृतसे स्नान कराकर उसके दक्षिणभागमें कर्पूरयुक्त चन्दनका उपलेपन करे। श्वेत तथा रक्त पुष्प चढ़ाये और घृतमें पकाये गये नैवेद्यका भोग लगाये। पचीस प्रज्वलित दीपकोंसे उमासहित भगवान् चन्द्रचूड़की आरती करे। उस दिन निराहार रहकर दूसरे दिन प्रातः इसी प्रकार पूजन सम्पन्न कर तिल तथा घीसे हवन कर ब्राह्मणोंको भोजन कराये। यथाशक्ति सपत्नीक ब्राह्मणकी पूजा करे और पितरोंका भी अर्चन करे। एक वर्षतक इस प्रकार व्रत करके एक त्रिकोण तथा दूसरा चतुष्कोण (चौकोर) मण्डल बनाये। त्रिकोणमें भगवती पार्वती तथा चौकोर मण्डलमें भगवान् शंकरको स्थापित करे। तदनन्तर पूर्वोक्त विधिके अनुसार पार्वती एवं शंकरकी पूजा करके श्वेत एवं पीत वस्त्रके दो वितान, पताका, घण्टा, धूपदानी, दीपमाला आदि पूजनके उपकरण ब्राह्मणको समर्पित करे और यथाशक्ति ब्राह्मण-

भोजन भी कराये। ब्राह्मण-दम्पतिका वस्त्र, आभूषण, भोजन आदिसे पूजनकर पचीस प्रज्वलित दीपकोंसे धीरे-धीरे नीराजन करे। इस प्रकार भक्तिपूर्वक पाँच वर्षोंतक या एक वर्ष ही व्रत करनेसे व्रती उमासहित शिवलोकमें निवास कर अनामय पद प्राप्त करता है। जो पुरुष आजीवन इस व्रतको करता है, वह तो साक्षात् विष्णुरूप ही हो जाता है। उसके समीप आपत्ति, शोक, ज्वर आदि कभी नहीं आते। इतना विधान कहकर भगवान् श्रीकृष्ण पुनः बोले—महाराज इसी प्रकार रविवारयुक्त अष्टमीका भी व्रत होता है। उस दिन एक प्रतिमाके दक्षिण भागमें शिव और वाम भागमें पार्वतीजीकी पूजा करे। दिव्य पद्मरागसे भगवान् शंकरको और सुवर्णसे पार्वतीको अलंकृत करे। यदि रत्नोंकी सुविधा न हो सके तो सुवर्ण ही चढ़ाये। चन्दनसे भगवान् शिवको और कुंकुमसे देवी पार्वतीको अनुलिप्त करे। भगवती पार्वतीको लाल वस्त्र और लाल माला तथा भगवान् शंकरको रुद्राक्ष निवेदित कर नैवेद्यमें घृतपक्व पदार्थ निवेदित करे। शेष सारा विधान पूर्ववत् कर पारण गव्य-पदार्थोंसे करे। उद्यापन पूर्वरीत्या करना चाहिये। इस व्रतको एक वर्ष अथवा लगातार पाँच वर्ष करनेवाला सूर्य आदि लोकोंमें उत्तम भोगको प्राप्तकर अन्तमें परमपदको प्राप्त करता है। (अध्याय ५९)

श्रीवृक्षनवमी-व्रत-कथा

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज ! देवता और दैत्योंने जब समुद्र-मन्थन किया था, तब उस समय समुद्रसे निकली हुई लक्ष्मीको देखकर सभीकी यह इच्छा हुई कि मैं ही लक्ष्मीको प्राप्त कर लूँ। लक्ष्मीकी प्राप्तिको लेकर देवता और

दैत्योंने परस्पर युद्ध होने लगा। उस समय लक्ष्मीने कुछ देरके लिय बिल्बवृक्षका आश्रय ग्रहण कर लिया। भगवान् विष्णुने सभीको जीतकर लक्ष्मीका वरण किया। लक्ष्मीने बिल्बवृक्षका आश्रय ग्रहण किया था, इसलिये उसे श्रीवृक्ष भी कहते हैं।

584 Sankshipta Bhavishya Puran_Section_10_2_PoH Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

४५२

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

अतः भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी नवमी तिथिको श्रीवृक्ष-नवमी-व्रत करना चाहिये। सूर्योदयके समय भक्तिपूर्वक अनेक पुष्पों, गन्ध, वस्त्र, फल, तिलपिष्ट, अन्न, गोधूम, धूप तथा माला आदिसे निम्नलिखित मन्त्रसे बिल्बवृक्षकी पूजा करें—

श्रीनिवास नमस्तेऽस्तु श्रीवृक्ष शिववल्लभ।

ममाभिलषितं कृत्वा सर्वविघ्नहरो भव ॥

इस विधिसे पूजा कर श्रीवृक्षकी सात प्रदक्षिणा

कर उसे प्रणाम करे। अनन्तर ब्राह्मणभोजन करकर ‘श्रीदेवी प्रीयताम्’ ऐसा कहकर प्रार्थना करे। तदनन्तर स्वयं भी तेल और नमकसे रहित बिना अग्निके संयोगसे तैयार किया गया भोजन, दही, पुष्प, फल आदिको मिट्टीके पात्रमें रखकर मौन हो ग्रहण करे। इस प्रकार भक्तिपूर्वक जो पुरुष या स्त्री श्रीवृक्षका पूजन करते हैं, वे अवश्य ही सभी सम्पत्तियोंको प्राप्त करते हैं। (अध्याय ६०)

ध्वजनवमी-व्रत-कथा

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! भगवती दुर्गाद्वारा महिषासुरके वध किये जानेपर दैत्योंने पूर्व-वैरका स्मरण कर देवताओंके साथ अनेक संग्राम किये। भगवतीने भी धर्मकी रक्षाके लिये अनेक रूप धारण कर दैत्योंका संहार किया। महिषासुरके पुत्र रक्तासुरने बहुत लम्बे समयतक घोर तपस्या कर ब्रह्माजीको प्रसन्न किया और ब्रह्माजीने प्रसन्न होकर उसे तीनों लोकोंका राज्य दे दिया। उसने वर प्राप्तकर दैत्योंको एकत्रित किया तथा इन्द्रके साथ युद्ध करनेके लिये अमरावतीपर आक्रमण कर दिया। देवताओंने देखा कि दैत्य-सेना युद्धके लिये आ रही है, तब वे भी एकत्रित होकर देवराज इन्द्रकी अध्यक्षतामें युद्धके लिये आ डटे। घोर युद्ध प्रारम्भ हो गया। दानवोंने इतना भयंकर युद्ध किया कि देवगण रण छोड़कर भाग गये। दैत्य रक्तासुर अमरावतीको अपने अधीन कर राज्य करने लगा। देवगण वहाँसे भागकर करछत्रपुरीमें गये, जहाँ भववल्लभा दुर्गा निवास करती हैं। चामुण्डा भी नवदुर्गाके साथ वहाँ विराजमान रहती हैं। वहाँ देवताओंने महालक्ष्मी, नन्दा, क्षेमकरी, शिवदूती, महारुण्डा, भ्रामरी, चन्द्रमङ्गला, रेवती और हरसिद्धि—इन नौ दुर्गाओंकी भक्तिपूर्वक स्तुति करते हुए कहा—‘भगवति! इस

घोर संकटसे आप हमारी रक्षा करें, हमारे लिये अब दूसरा कोई भी अवलम्ब नहीं है।’

देवताओंकी यह आर्त वाणी सुनकर बीस भुजाओंमें विभिन्न आयुध धारण किये सिंहारूढ़ा नवदुर्गाके साथ कुमारीस्वरूपा भगवती प्रकट हो गयीं। तदनन्तर परम पराक्रमी और ब्रह्माजीके वरदानसे अभिमानी अथम अब्रह्मण्य प्रचण्ड दैत्यगण भी वहाँ आये, जिनमें इन्द्रमारी, गुरुकेशी, प्रलम्ब, नरक, कुष्ठ, पुलोमा, शरभ, शम्बर, दुन्दुभि, इल्लल, नमुचि, भौम, वातापि, धेनुक, कलि, मायावृत्त, बलबन्धु, कैटभ, कालजित्, राहु, पौण्ड्र आदि दैत्य मुख्य थे। ये प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी, विविध वाहनोंपर आरूढ़ अनेक प्रकारके शस्त्र, अस्त्र और ध्वजाओंको धारण किये हुए थे। उनके आगे पणव, भेरी, गोमुख, शङ्खु, डमरू, डिण्डिम आदि बाजे बज रहे थे। दैत्योंने युद्ध आरम्भ कर दिया और भगवतीपर शर, शूल, परिघ, पट्टिश, शक्ति, तोमर, कुन्त, शतश्री, गदा, मुद्गर आदि अनेक आयुधोंकी वृष्टि करने लगे। भगवती भी क्रोधसे प्रज्वलित हो दैत्योंका संहार करने लगीं। उनके ध्वज आदि चिह्नोंको बलपूर्वक छीनकर देवगणोंको सौंप दिया। क्षणभरमें ही उन्होंने अनन्त दैत्योंका नाश कर दिया। रक्तासुरके कण्ठको पकड़कर पृथ्वीपर पटककर

584 Sanskrita Bhavishya Puran_Section_16_2_Back In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharada Peetham

  • उत्तरपर्व *

४५३

त्रिशूलसे उसका हृदय विदीर्ण कर दिया। बचे हुए दैत्यगण वहाँसे जान बचाकर भाग निकले। इस प्रकार देवीकी कृपासे देवताओंने विजय प्राप्तकर करच्छत्रपुरीमें आकर भगवतीका विशेष उत्सव मनाया। नगर तोरणों और ध्वजाओंसे अलंकृत किया गया। राजन्! जो नवमी तिथिको उपवासकर भगवतीका उत्सव करता है तथा उन्हें ध्वज अर्पण करता है, वह अवश्य ही विजयी होता है।

महाराज! अब इस व्रतकी विधि सुनिये। पौष मासके शुक्ल पक्षकी नवमी तिथिको स्नानकर पूजाके लिये पुष्प अपने हाथसे चुने और उनसे सिंहवाहिनी कुमारी भगवतीका पूजन करे। साथ ही विविध ध्वजाओंको भगवतीके सम्मुख स्थापित करे और मालती-पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, गन्ध, चन्दन, विविध फल, माला, वस्त्र, दधि एवं

बिना अग्निसे सिद्ध विविध भक्ष्य भगवतीको निवेदित करे एवं इस मन्त्रको पढ़े—

रुद्रां भगवतीं कृष्णां ग्रहं नक्षत्रमालिनीम्। प्रपन्नोऽहं शिवां रात्रिं सर्वशत्रुक्षयंकरीम्॥

—फिर कुमारियों और देवीभक्त ब्राह्मणोंको भोजन कराये, क्षमा-प्रार्थना करे, उपवास करे या भक्तिपूर्वक एकभुक्त रहे। इस प्रकारसे जो पुरुष नवमीको उपवास करता है और ध्वजाओंसे भगवतीको अलंकृत कर उनकी पूजा करता है, उसे चोर, अग्नि, जल, राजा, शत्रु आदिका भय नहीं रहता। इस नवमी तिथिको भगवतीने विजय प्राप्त की थी, अतः यह नवमी इन्हें बहुत प्रिय है। जो नवमीको भक्तिपूर्वक भगवतीकी पूजा कर इन्हें ध्वजारोपण करता है, वह सभी प्रकारके सुखोंको भोगकर अन्तमें वीरलोकको प्राप्त होता है। (अध्याय ६१)

उल्का-नवमी-व्रतका विधान और फल

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! अब आप उल्का-नवमी-व्रतके विषयमें सुनें। आश्विन मासके शुक्ल पक्षकी नवमीको नदीमें स्नानकर पितृदेवीकी विधिपूर्वक अर्चना करे। अनन्तर गन्ध, पुष्प, धूप, नैवेद्य आदिसे भैरव-प्रिया चामुण्डादेवीकी पूजा करे, तदनन्तर इस मन्त्रसे हाथ जोड़कर स्तुति करे—

महिषषि महामाये चामुण्डे मुण्डमालिनि।

द्रव्यमारोग्यविजयी देहि देवि नमोऽस्तु ते॥

(उत्तरपर्व ६२।५)

इसके बाद यथाशक्ति सात, पाँच या एक कुमारीको भोजन कराकर उन्हें नीला कञ्चुक, आभूषण, वस्त्र एवं दक्षिणा आदि देकर संतुष्ट करे। श्रद्धासे भगवती प्रसन्न होती हैं। अनन्तर भूमिका अभ्युक्षण करे। तदनन्तर गोबरका चौँका लगाकर आसनपर बैठ जाय। सामने पात्र रखकर, जो भी भोजन बना हो सारा परोस ले, फिर एक

मुट्टी तृण और सूखे पत्तोंको अग्निसे प्रज्वलित कर जितने समयतक प्रकाश रहे उतने समयमें ही भोजन सम्पन्न कर ले। अग्निके शान्त होते ही भोजन करना बंद कर आचमन करे। चामुण्डाका हृदयमें ध्यानकर प्रसन्नतापूर्वक घरका कार्य करे। इस प्रकार प्रतिमास व्रतकर वर्षके समाप्त होनेपर कुमारी-पूजा करे तथा उन्हें वस्त्र, आभूषण, भोजन आदि देकर उनसे क्षमा-याचना करे। ब्राह्मणको सुवर्ण एवं गौका दान करे। हे पार्थ! इस प्रकार जो पुरुष उल्का-नवमीका व्रत करता है, उसे शत्रु, अग्नि, राजा, चोर, भूत, प्रेत, पिशाच आदिका भय नहीं होता एवं युद्ध आदिमें उसपर शस्त्रोंका प्रहार नहीं लगता, देवी चामुण्डा उसकी सर्वत्र रक्षा करती हैं। इस उल्का-नवमी-व्रतको करनेवाले पुरुष और स्त्री उल्काकी तरह तेजस्वी हो जाते हैं। (अध्याय ६२)

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

४५४

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

दशावतार-व्रत-कथा, विधान और फल

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! सत्ययुगके प्रारम्भमें भृगु नामक एक ऋषि हुए थे। उनकी भार्या दिव्या१ अत्यन्त पतिव्रता थीं। वे आश्रमकी शोभा थीं और निरन्तर गृहकार्यमें संलग्न रहती थीं। वे महर्षि भृगुकी आज्ञाका पालन करती थीं। भृगुजी भी उनसे बहुत प्रसन्न रहते थे।

किसी समय देवासुर-संग्राममें भगवान् विष्णुके द्वारा असुरोंको महान् भय उपस्थित हुआ। तब वे सभी असुर महर्षि भृगुकी शरणमें आये। महर्षि भृगु अपना अग्निहोत्र आदि कार्य अपनी भार्याको सौंपकर स्वयं संजीवनी-विद्याको प्राप्त करनेके लिये हिमालयके उत्तर भागमें जाकर तपस्या करने लगे। वे भगवान् शंकरकी आराधना कर संजीवनी-विद्याको प्राप्त कर दैत्यराज बलिको सदा विजयी करना चाहते थे। इसी समय गरुड़पर चढ़कर भगवान् विष्णु वहाँ आये और दैत्योंका वध करने लगे। क्षणभरमें ही उन्होंने दैत्योंका संहार कर दिया। भृगुकी पत्नी दिव्या भगवान्को शाप देनेके लिये उद्यत हो गयीं। उनके मुखसे शाप निकलना ही चाहता था कि भगवान् विष्णुने चक्रसे उनका सिर काट दिया। इतनेमें भृगुमुनि भी संजीवनी-विद्याको प्राप्तकर वहाँ आ गये। उन्होंने देखा कि सभी दैत्य मारे गये हैं और ब्राह्मणी भी मार दी गयी हैं। क्रोधान्ध हो भृगुने भगवान् विष्णुको शाप दे दिया कि 'तुम दस बार मनुष्यलोकमें जन्म लोगे।'

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! भृगुके शापसे जगत्की रक्षाके लिये मैं बार-बार अवतार ग्रहण करता हूँ। जो लोग भक्तिपूर्वक मेरी अर्चना करते हैं, वे अवश्य स्वर्गगामी होते हैं।

महाराज युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! आप अपने दशावतार-व्रतका विधान कहिये।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी दशमीको संयतेन्द्रिय हो नदी आदिमें स्नान कर तर्पण सम्पन्न करे तथा घर आकर तीन अञ्जलि धान्यका चूर्ण लेकर घृतमें पकाये। इस प्रकार दस वर्षांतक प्रतिवर्ष करे। प्रतिवर्ष क्रमशः पूरी, घेवर, कसार, मोदक, सोहालक, खण्डवेष्टक, कोकरस, अपूप, कर्णवेष्ट तथा खण्डक—ये पक्वान् उस चूर्णसे बनाये और उसे भगवान्को नैवेद्यके रूपमें समर्पित करे। प्रत्येक दशहराको दस गौएँ दस ब्राह्मणोंको दे। नैवेद्यका आधा भाग भगवान्के सामने रख दे, चौथाई ब्राह्मणको दे और चौथाई भाग पवित्र जलाशयपर जाकर बादमें स्वयं भी ग्रहण करे। गन्ध, पुष्प, धूप, दीप आदि उपचारोंसे मन्त्रपूर्वक दशावतारोंका पूजन करे। भगवान्के दस अवतारोंके नाम इस प्रकार हैं२—(१) मत्स्य, (२) कूर्म, (३) वराह, (४) नृसिंह, (५) त्रिविक्रम (वामन), (६) परशुराम, (७) श्रीराम, (८) श्रीकृष्ण, (९) बुद्ध तथा (१०) कल्कि।

अनन्तर प्रार्थना करे—

गतोऽस्मि शरणं देवं हरिं नारायणं प्रभुम्।

प्रणतोऽस्मि जगन्नाथं स मे विष्णुः प्रसीदतु॥

छिन्नतु वैष्णवीं मायां भक्त्या प्रीतो जनार्दनः।

श्रेतद्वीपं नयत्वस्मान्मयात्मा विनिवेदितः॥

(उत्तरपर्व ६३। २४-२५)

'दस अवतारोंको धारण करनेवाले सर्वव्यापी, सम्पूर्ण संसारके स्वामी हे नारायण हरि! मैं आपकी शरणमें आया हूँ। हे देव! आप मुझपर प्रसन्न हों।

१-भगवत, विष्णु आदि पुराणोंमें भृगु-पत्नीका नाम 'ख्याति' आया है।

२-दशावतारोंमें दो पक्ष प्राप्त होते हैं, एकमें भगवान् कृष्णको पूर्णतम भगवान् मानकर केन्द्रमें रखा गया है और अन्यत्र उन्हें दस अवतारोंके भीतर ही रख लिया है। दोनों मत मान्य हैं, अतः संदेह नहीं करना चाहिये।

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

  • उत्तरपर्व *

४५५

जनार्दन! आप भक्तिद्वारा प्रसन्न होते हैं। आप अपनी वैष्णवी मायाको निवारित करें, मुझे आप अपने धाममें ले चलों। मैंने अपनेको आपके लिये सौंप दिया है।'

इस प्रकार जो इस व्रतको करता है, वह भगवान् के अनुग्रहसे जन्म-मरणसे छुटकारा प्राप्त कर लेता है और सदा विष्णुलोकमें निवास करता है। (अध्याय ६३)

आशादशमी-व्रत-कथा एवं व्रत-विधान

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—पार्थ! अब मैं आपसे आशादशमी-व्रत-कथा एवं उसके विधानका वर्णन कर रहा हूँ। प्राचीन कालमें निषध देशमें नल नामक एक राजा थे। उनके भाई पुष्करने घृतमें जब उन्हें पराजित कर दिया, तब नल अपनी भार्या दमयन्तीके साथ राज्यसे बाहर चले गये। वे प्रतिदिन एक वनसे दूसरे वनमें भ्रमण करते रहते थे, केवल जलमात्रसे अपना जीवन-निर्वाह करते थे और जनशून्य भयंकर वनोंमें घूमते रहते थे। एक बार राजाने वनमें स्वर्ण-सी कान्तिवाले कुछ पक्षियोंको देखा। उन्हें पकड़नेकी इच्छासे राजाने उनके ऊपर वस्त्र फैलाया, परंतु वे सभी उस वस्त्रको लेकर आकाशमें उड़ गये। इससे राजा बड़े दुःखी हो गये। वे दमयन्तीको गाढ़ निद्रामें देखकर उसे उसी स्थितिमें छोड़कर चले गये।

दमयन्तीने निद्रासे उठकर देखा तो नलको न पाकर वह उस घोर वनमें हाहाकार करते हुए रोने लगी। महान् दुःख और शोकसे संतप्त होकर वह नलके दर्शनोंकी इच्छासे इधर-उधर भटकने लगी। इसी प्रकार कई दिन बीत गये और भटकते हुए वह चेदिदेशमें पहुँची। वहाँ वह उन्मत्त-सी रहने लगी। छोटे-छोटे शिशु उसे कौतुकवश घेरे रहते थे। किसी दिन मनुष्योंसे घिरी हुई उसे चेदिदेशके राजाकी माताने देखा। उस समय दमयन्ती चन्द्रमाकी रेखाके समान भूमिपर पड़ी हुई थी। उसका मुखमण्डल प्रकाशित था। राजमाताने उसे अपने भवनमें बुलाकर

पूछा—'वरानने! तुम कौन हो?' इसपर दमयन्तीने लज्जित होते हुए कहा—'मैं सैरन्त्री हूँ। मैं न किसीके चरण धोती हूँ और न किसीका उच्छिष्ट भक्षण करती हूँ। यहाँ रहते हुए कोई मुझे प्राप्त करेगा तो वह आपके द्वारा दण्डनीय होगा। देवि! इस प्रतिज्ञाके साथ मैं यहाँ रह सकती हूँ।' राजमाताने कहा—'ठीक है ऐसा ही होगा।' तब दमयन्तीने वहाँ रहना स्वीकार किया और इसी प्रकार कुछ समय व्यतीत हुआ और फिर एक ब्राह्मण दमयन्तीको उसके माता-पिताके घर ले आया। पर माता-पिता तथा भाइयोंका स्नेह पानेपर भी पतिके बिना वह अत्यन्त दुःखी रहती थी।

एक बार दमयन्तीने एक श्रेष्ठ ब्राह्मणको बुलाकर उससे पूछा—'हे ब्राह्मणदेवता! आप कोई ऐसा दान एवं व्रत बतलायें, जिससे मेरे पति मुझे प्राप्त हो जायें।' इसपर उस बुद्धिमान् ब्राह्मणने कहा—'भद्रे! तुम मनोवाञ्छित सिद्धि प्रदान करनेवाले आशादशमी-व्रतको करो।' तब दमयन्तीने पुराणवेत्ता उस दमन नामक पुरोहित ब्राह्मणके द्वारा ऐसा कहे जानेपर आशादशमी-व्रतका अनुष्ठान किया। उस व्रतके प्रभावसे दमयन्तीने अपने पतिको पुनः प्राप्त किया।

युधिष्ठिरने पूछा—हे गोविन्द! यह आशादशमी-व्रत किस प्रकार और कैसे किया जाता है, आप सर्वज्ञ हैं, आप इसे बतलायें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—हे राजन्! इस व्रतके

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

४५६

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

प्रभावसे राजपुत्र अपना राज्य, कृषक खेती, वणिक् व्यापारमें लाभ, पुत्रार्थी पुत्र तथा मानव धर्म, अर्थ एवं कामकी सिद्धि प्राप्त करते हैं। कन्या श्रेष्ठ वर प्राप्त करती है, ब्राह्मण निर्विघ्न यज्ञ सम्पन्न कर लेता है, रोगी रोगसे मुक्त हो जाता है और पतिके चिर-प्रवास हो जानेपर स्त्री उसे शीघ्र ही प्राप्त कर लेती है। शिशुके दन्तजनित पीड़ामें भी इस व्रतसे पीड़ा दूर हो जाती है और कष्ट नहीं होता। इसी प्रकार अन्य कार्योंकी सिद्धिके लिये इस आशादशमी-व्रतको करना चाहिये। जब भी जिस किसीको कोई कष्ट पड़े, उसकी निवृत्तिके लिये इस व्रतको करना चाहिये।

यह आशादशमी-व्रत किसी भी मासके शुक्ल पक्षकी दशमीको किया जाता है। इस दिन प्रातःकाल स्नान करके देवताओंकी पूजा कर रात्रिमें पुष्प, अलक तथा चन्दन आदिसे दस आशादेवियोंकी पूजा करनी चाहिये। घरके आँगनमें जैसे अथवा पिष्टातकसे पूर्वादि दसों दिशाओंके अधिपतियोंकी प्रतिमाओंको उनके वाहन तथा अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित कर उन्हें ही ऐन्द्री आदि दिशा-देवियोंके रूपमें मानकर पूजन करना चाहिये। सबको घृतपूर्ण नैवेद्य, पृथक्-पृथक् दीपक तथा ऋतुफल आदि समर्पित करना चाहिये। इसके अनन्तर अपने कार्यकी सिद्धिके लिये इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—

आशाश्चाशाः सदा सन्तु सिद्धयन्तां मे मनोरथाः ।

भवतीनां प्रसादेन सदा कल्याणमस्त्विति ॥

(उत्तरपर्व ६४।२५)

‘हे आशादेवियो! मेरी आशाएँ सदा सफल हों, मेरे मनोरथ पूर्ण हों, आपलोगोंके अनुग्रहसे मेरा सदा कल्याण हो।’

इस प्रकार विधिवत् पूजा कर ब्राह्मणको दक्षिणा प्रदानकर प्रसाद ग्रहण करना चाहिये। इसी क्रमसे प्रत्येक मासमें इस व्रतको करना चाहिये। जबतक अपना मनोरथ पूर्ण न हो जाय, तबतक इस व्रतको करना चाहिये। अनन्तर उद्यापन करना चाहिये। उद्यापनमें आशादेवियोंकी सोने, चाँदी अथवा पिष्टातकसे प्रतिमा बनाकर घरके आँगनमें उनकी पूजा करके ऐन्द्री, आग्रेयी, याम्या, नैऋति, वारुण, वायव्या, सौम्या, ऐशानी, अधः तथा ब्राह्मी—इन दस आशादेवियों (दिशा-देवियों)—से अभीष्ट कामनाओंकी सिद्धिके लिये प्रार्थना करनी चाहिये, साथ ही नक्षत्रों, ग्रहों, ताराग्रहों, नक्षत्र-मातृकाओं, भूत-प्रेत-विनायकोंसे भी अभीष्ट-सिद्धिके लिये प्रार्थना करनी चाहिये। पुष्प, फल, धूप, गन्ध, वस्त्र आदिसे उनकी पूजा करनी चाहिये। सुहागिनी स्त्रियोंको नृत्य-गीत आदिके द्वारा रात्रि-जागरण करना चाहिये। प्रातःकाल विद्वान् ब्राह्मणको सब कुछ पूजित पदार्थ निवेदित कर देना चाहिये और उन्हें प्रणाम कर क्षमा-याचना करनी चाहिये। अनन्तर बन्धु-बान्धवों एवं मित्रोंके साथ प्रसन्न-मनसे भोजन करना चाहिये। हे पार्थ! जो इस आशादशमी-व्रतको श्रद्धापूर्वक करता है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। यह व्रत स्त्रियोंके लिये विशेष श्रेयस्कर है।

(अध्याय ६४)

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

  • उत्तरपर्व *

४५७

तारकद्वादशीके प्रसंगमें राजा कुशध्वजकी कथा तथा व्रत-विधान

महाराज युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! मैं बहुत बड़ा पातकी हूँ। भीष्म, द्रोण आदि महात्माओंका मैंने वध किया। आप कृपाकर कोई ऐसा उपाय बतायें, जिससे मैं इस वधरूपी पापसमूहसे छुटकारा पा सकूँ।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! प्राचीन कालमें विदर्भ देशमें एक बड़ा प्रतापी कुशध्वज नामका राजा रहता था। किसी दिन वह मृगयाके लिये वनमें गया। वहाँ उसने मृगके धोखेमें एक तपस्वी ब्राह्मणको बाणसे मार दिया। मरनेके बाद उस पापसे उसे भयंकर रौरव नरककी प्राप्ति हुई। फिर वह बहुत दिनोंतक नरककी यातनाको भोगकर भयंकर सर्प-योनिमें गया। सर्प-योनिमें भी उसने पाप किया। इस कारण उसे सिंह-योनि प्राप्त हुई। इस प्रकार उसने कई निन्द्य योनियोंमें जन्म लिया और उस-उस योनिमें पाप-कर्म करता रहा। इस कर्मविपाकसे उसे कष्ट भोगना पड़ता था। चूँकि उसने पूर्वजन्ममें तारकद्वादशीका व्रत किया था, अतः उस व्रतके प्रभावसे इन पाप-योनियोंसे वह जल्दी-जल्दी मुक्त होता गया। अन्तमें पुनः वह विदर्भ देशका धर्मात्मा राजा हुआ। वह भक्तिपूर्वक तारकद्वादशीका व्रत किया करता था। उसके प्रभावसे बहुत समयतक निष्कण्टक राज्यकर, मरनेपर उसने विष्णुलोकको प्राप्त किया।

राजा युधिष्ठिरने पूछा—श्रीकृष्णचन्द्र! इस व्रतको किस प्रकार करना चाहिये?

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—राजन्! मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीको तारकद्वादशी-व्रत

करना चाहिये। प्रातःकाल नदी आदिमें स्नानकर तर्पण, पूजन आदि सम्पन्न कर सूर्यास्ततक हवन करता रहे। सूर्यास्त होनेपर पवित्र भूमिके ऊपर गोमयसे ताराओंसहित एक सूर्य-मण्डलका निर्माण करे। उस आकाशमें चन्दनसे ध्रुवको भी अङ्कित करे। अनन्तर ताम्रके अर्घ्यपात्रमें पुष्प, फल, अक्षत, गन्ध, सुवर्ण तथा जल रखकर मस्तकतक उस अर्घ्यपात्रको उठाकर दोनों जानुओंको भूमिपर टेककर पूर्वाभिमुख होकर 'सहस्रशीर्षा०' इस मन्त्रसे उस मण्डलको अर्घ्य प्रदान करे। अनन्तर ब्राह्मण-भोजन कराना चाहिये। मार्गशीर्ष आदि बारह महीनोंमें क्रमशः खण्ड-खाद्य, सोहालक, तिल-तण्डुल, गुड़के अपूप, मोदक, खण्डवेष्टक, सत्तू, गुड़युक्त पूरी, मधुशीर्ष, पायस, घृतपर्ण (करंज) और कसारका भोजन ब्राह्मणको कराये। तदनन्तर क्षमा-प्रार्थना कर मौन धारणपूर्वक स्वयं भी भोजन करे। उद्यापनमें चाँदीका तारकमण्डल बनाकर उसकी पूजा करे। मोदकके साथ बारह घड़े तथा दक्षिणाके साथ वह मण्डल ब्राह्मणको निवेदित कर दे। इस विधिसे जो पुरुष और स्त्री इस तारकद्वादशी-व्रतको करते हैं, वे सूर्यके समान देदीप्यमान विमानोंमें बैठकर नक्षत्र-लोकको जाते हैं। वहाँ अयुत वर्षोंतक निवास कर विष्णुलोकको प्राप्त करते हैं। इस व्रतको सती, पार्वती, सीता, राज्ञी, दमयन्ती, रुक्मिणी, सत्यभामा आदि श्रेष्ठ नारियोंने किया था। इस व्रतको करनेसे अनेक जन्मोंमें किये गये पातक नष्ट हो जाते हैं।

(अध्याय ६५)

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth