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भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

२५६ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ६०४ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ६०५ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ६०६ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ६०७ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ६०८ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ६०६ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ६१० (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ६११ 'सिंह' लग्न में 'शुक्र' का फलादेश १. 'सिंह' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शुक्र' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ६१२ से ६२३ के बीच देखना चाहिए । 'सिंह' लग्नवालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शुक्र' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'शुक्र'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ६१२ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ६१३ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ६१४ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्ता ६१५ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ६१६ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ६१७ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ६१८ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ६१६ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ६२० (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ६२१ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ६२२ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ६२३ 'सिंह' लग्न में 'शनि' का फलादेश १. 'सिंह' लग्नवालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित शनि' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ६२४ से ६३५ के बीच देखना चाहिए ।

२५७ २. 'सिंह' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शनि' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'शनि'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ६२४ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ६२५ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ६२६ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ६२७ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ६२८ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ६२९ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ६३० (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ६३१ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ६३२ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ६३३ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ६३४ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ६३५ 'सिंह' लग्न में 'राहु' का फलादेश १ 'सिंह' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'राहु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ६३६ से ६४७ के बीच देखना चाहिए । २. 'सिंह' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'राहु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'राहु'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ६३६ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ६३७ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ६३८ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ६३९ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ६४० (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ६४१ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ६४२ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ६४३ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ६४४ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ६४५ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ६४६ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ६४७

२५८ 'सिंह' लग्न में 'केतु' का फलादेश १. 'सिंह' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ६४८ से ६५९ के बीच देखना चाहिए। २. 'सिंह' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'केतु'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ६४८ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ६४९ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ६५० (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ६५१ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ६५२ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ६५३ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ६५४ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ६५५ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ६५६ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ६५७ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ६५८ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ६५९ 'सिंह' लग्न में 'सूर्य' 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित सूर्य का फलादेश सिंह लग्न : प्रथमभाव : सूर्य [कुण्डली संख्या: ५५७] प्रथम भाव (लग्न): ५ (सिंह), सू. द्वितीय भाव: ६ (कन्या) | तृतीय भाव: ७ (तुला) चतुर्थ भाव: ८ (वृश्चिक) | पंचम भाव: ९ (धनु) षष्ठ भाव: १० (मकर) | सप्तम भाव: ११ (कुम्भ) अष्टम भाव: १२ (मीन) | नवम भाव: १ (मेष) दशम भाव: २ (वृष) | एकादश भाव: ३ (मिथुन) द्वादश भाव: ४ (कर्क) पहले भाव में स्वराशि-स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक शारीरिक शक्ति, आत्मबल तथा सौन्दर्य का लाभ प्राप्त करता है। वह बड़ा हिम्मती तथा लम्बे कद का होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से जातक को स्त्री तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयां आती हैं तथा असन्तोष बना रहता है।

२५६ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश सिंह लग्न : द्वितीयभाव : सूर्य दूसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक के धन तथा कुटुम्ब के सुख में वृद्धि होती है, परन्तु उसी के कारण कुछ परतंत्रता का अनुभव भी होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है तथा जातक समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति समझा जाता है। 'सिंह' लग्न को कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश सिंह लग्न : तृतीयभाव : सूर्य तीसरे भाव में शत्रु शुक्र की तुला राशि पर स्थित नीच के सूर्य के प्रभाव से जातकों का भाई- बहिनों से वैमनस्य रहता है तथा पराक्रम में कुछ कमी आती है। फिर भी वह जातक बड़ा हिम्मती होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने से जातक के भाग्य में वृद्धि होती है तथा वह धर्म में भी आस्था रखता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश सिंह लग्न : चतुर्थभाव : सूर्य चौथे भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक की माता, भूमि तथा भवन आदि का सुख प्राप्त होता है तथा शरीर सुखी रहता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से दशमभाव को देखने के कारण जातक का पिता से वैमनस्य रहता है तथा राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में अधिक प्रयत्न करने पर ही सफलता मिलती है।

२६० 'सिंह' लग्न को कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश सिंह लग्न : पंचमभाव : सूर्य पाँचवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि तथा संतान के क्षेत्र में अच्छी सफलता मिलती है। यह आत्मज्ञानी तथा उग्र मस्तिष्क वाला होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से एकादशभाव को देखने से बुद्धि-बल द्वारा पर्याप्त आमदनी होती है। ऐसा व्यक्ति अहंकारी भी होता है। 'सिंह' लग्न को कुण्डली से 'षष्ठभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश सिंह लग्न : षष्ठभाव : सूर्य छठे भाव में शत्रु शनि को राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है तथा कठिनाइयों से घबराता नहीं है। शारीरिक सौन्दर्य में कमी आती है तथा रोग एवं परतंत्रता के योग भी बनते हैं। सातवीं मित्रदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थान के संबंध से भी लाभ होता है। 'सिंह' लग्न को कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश सिंह लग्न : सप्तमभाव : सूर्य सातवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक का स्त्री-पक्ष से वैमनस्य रहता है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कठि- नाइयों के बाद सफलता मिलती है। सातवीं दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक शक्ति एवं स्वाभिमान में वृद्धि होती है और वह अपने यश का विस्तार भी करता है।

२५१ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश सिंह लग्न : अष्टमभाव : सूर्य आठवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक की कुछ कठिनाइयों के साथ आयु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से शक्ति प्राप्त होती है। सातवीं दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से कठिन परिश्रम द्वारा धन एवं कौटुम्बिक सुख प्राप्त होता है। ऐसा व्यक्ति क्रोधी स्वभाव का होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश सिंह लग्न : नवमभाव : सूर्य नवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित उच्च के सूर्य के प्रभाव से जातक की भाग्य-शक्ति प्रबल होती है तथा धर्म में भी अभिरुचि बनी रहती है। सातवीं नीच दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से जातक को भाई-बहिनों से असन्तोष रहता है तथा पराक्रम के बारे में ऐसा व्यक्ति लापरवाह रहता है। स्थूल शरीर वाला भाग्यवान तथा ईश्वर-भक्त होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश सिंह लग्न : दशमभाव : सूर्य दसवें भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक का पिता से वैमनस्य रहता है, परन्तु राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में उन्नति एवं मान-प्रतिष्ठा का लाभ होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने के कारण माता, भूमि तथा भवन का यथेष्ट सुख भी मिलता है।

२६२ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश सिंह लग्न : एकादशभाव : सूर्य ग्यारहवें भाव में मित्र बुध की राशि में स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक की आमदनी अच्छी रहती है तथा शारीरिक शक्ति में वृद्धि होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या, बुद्धि तथा सन्तान का सुख भी यथेष्ट मिलता है। ऐसे व्यक्ति की वाणी में कुछ उग्रता रहती है और वह स्वार्थी भी होता है- 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित सूर्य' का फलादेश सिंह लग्न : द्वादशभाव : सूर्य बारहवें भाव में मित्र चन्द्रमा की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक का शरीर दुर्बल बना रहता है। बाहरी स्थानों से सम्बन्ध से लाभ होता है तथा खर्च पर प्रभाव बना रहता है। जातक भ्रमण का शौकीन भी होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रुपक्ष पर प्रभाव बना रहता है तथा अनेक कठिनाइयों के बावजूद शत्रुओं पर विजय पाता है। 'सिंह' लग्न में 'चन्द्रमा' 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश सिंह लग्न : प्रथमभाव : चन्द्र पहले भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक शरीर से दुर्बल, भ्रमण- प्रिय तथा कुछ चिन्तित बना रहने वाला होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों तथा हानि का सामना पड़ता है।

२६३ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश सिंह लग्न : द्वितीयभाव : चन्द्र दूसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक की धन की अल्प हानि होती है। उसका रहन-सहन ठाठदार होता है। कुटुम्ब से भी कुछ असन्तोष रहता है तथा बाहरी स्थानों से लाभ तथा सुख मिलता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु-वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का भी कुछ कमी के साथ लाभ होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश सिंह लग्न : तृतीयभाव : चन्द्र तीसरे भाव में सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को भाई- बहिन के सुख तथा पराक्रम में कुछ कमी रहती है। बाहरी स्थानों के सम्बन्धों से लाभ होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य एवं धर्म की उन्नति होती है तथा खर्च आराम से चलता रहता है। अन्य लोगों की दृष्टि में ऐसा व्यक्ति धनी तथा सुखी समझा जाता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश सिंह लग्न : चतुर्थभाव : चन्द्र चौथे भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक की माता, भूमि तथा भवन आदि का सुख कुछ कष्ट के साथ अल्प परिमाण में मिलता है तथा घरेलू खर्चों से परेशानी बनी रहती है। सातवीं उच्च दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सहयोग, सुख तथा सफलता की प्राप्ति होती है।

२६४ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश सिंह लग्न : पंचमभाव : चन्द्र पाँचवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को सन्तान तथा विद्या- बुद्धि के क्षेत्र में बाधाएं रहती हैं। खर्च की चिन्ता से मस्तिष्क परेशान भी रहता है ! सातवीं मित्रदृष्टि से एकादशभाव को देखने से जातक बुद्धि-बल से आमदनी के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है, परन्तु उसे कुछ असन्तोष भी बना रहता है । 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश सिंह लग्न : षष्ठभाव : चन्द्र छठे भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को शत्रु-पक्ष द्वारा उत्पन्न झगड़ों तथा रोग आदि में खर्च अधिक करना पड़ता है, जिससे मन दुःखी बना रहता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वादशभाव को देखने से बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है तथा आय कम रहते हुए भी अधिक खर्च होता है। वह खर्च के द्वारा ही शत्रु-पक्ष में सफलता भी पाता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश सिंह लग्न : सप्तमभाव : चन्द्र सातवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में हानि उठानी पड़ती है तथा घरेलू खर्च चलाने में कठिनाई आती है। बाहरी स्थानों के सम्पर्क से लाभ होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से प्रथमभाव को देखने के कारण शरीर दुर्बल तथा रहता है।

२६५ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश सिंह लग्न : अष्टमभाव : चन्द्र आठवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को आयु एवं पुरातत्त्व के क्षेत्र में हानि तथा चिन्ता के अवसर उपस्थित होते हैं। पेट में विकार रहता है तथा बाहरी स्थानों से लाभ होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन की भी कुछ हानि होती है तथा कौटुम्बिक सुख भी अल्प परिमाण में प्राप्त होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली से 'नवमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश सिंह लग्न : नवमभाव : चन्द्र नवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक के भाग्य की वृद्धि होती है, परन्तु धर्म-पालन में कमी रहती है। सातवीं सम-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने के कारण पराक्रम तथा भाई-बहिनों के सुख में भी कुछ कमी बनी रहती है। ऐसा व्यक्ति मानसिक दुर्बलता का शिकार भी होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश सिंह लग्न : दशमभाव : चन्द्र दसवें भाव में सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर स्थित उच्च के चन्द्रमा के प्रभाव से जातक पैतृक सम्पत्ति का अधिक व्यय करता है तथा राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में त्रुटिपूर्ण सफलताएँ प्राप्त करता है। सातवीं नीचदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी आती है तथा खर्चे की अधिकता से मन अशान्त बना रहता है।

२६६ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश सिंह लग्न : एकादशभाव : चन्द्र ग्यारहवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है, परन्तु खर्च भी अधिक बना रहता है। सातवीं मित्रदृष्टि से पंचमभाव को देखने के कारण विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के पक्ष में भी कुछ कमी रहती है। बाहरी तौर पर ऐसा जातक धनी समझा जाता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश सिंह लग्न : द्वादशभाव : चन्द्र बारहवें भाव में स्वराशि में स्थित व्ययेश चन्द्रमा के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से यश, सुख तथा लाभ की प्राप्ति होती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण जातक अपने मनोबल तथा खर्च के बल पर शत्रु-पक्ष पर विजय पाता तथा प्रभाव स्थापित करता है, परन्तु झगड़े-मुकदमे आदि में खर्च बहुत होता है। 'सिंह' लग्न में 'मंगल' 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश सिंह लग्न : प्रथमभाव : मंगल पहले भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक का व्यक्तित्व प्रभावशाली होता है। वह भाग्यवान्, धर्मात्मा तथा ईश्वर-भक्त भी होता है। चौथी दृष्टि से स्वराशि के चतुर्थभाव को देखने के कारण माता, भूमि तथा भवन का सुख मिलता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में परेशानियां आती हैं। आठवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ प्राप्त होता है।

२६७ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश सिंह लग्न : द्वितीयभाव : मंगल दूसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब का सुख मिलता है। परन्तु माता, भूमि तथा भवन के सुख में कुछ कमी रहती है। चौथी मित्र-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के पक्ष में सफलता मिलती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की वृद्धि होती है। आठवीं दृष्टि से स्वराशि के नवमभाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की भी वृद्धि होती है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश सिंह लग्न : तृतीयभाव : मंगल तीसरे भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक की भाई-बहिन का सुख मिलता है तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। चौथी उच्चदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रुपक्ष पर विजय प्राप्त होती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि के नवमभाव को देखने से धर्म तथा भाग्य की उन्नति होती है। आठवीं शत्रु-दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी सहयोग, सफलता एवं सुख की प्राप्ति होती है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली से 'चतुर्थभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश सिंह लग्न : चतुर्थभाव : मंगल चौथे भाव में स्वराशि स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को भूमि, भवन एवं माता का सुख प्राप्त होता है। चौथी शत्रु-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता तथा लाभ के क्षेत्र में सहयोग एवं प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है। आठवीं मित्र-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी की खूब वृद्धि होती रहती है।

२६८ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश सिंह लग्न : पंचमभाव : मंगल पांचवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि एवं संतान का लाभ होता है। चौथी मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु की वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से एकादशभाव से देखने से आमदनी खूब रहती है। आठवीं नीच-दृष्टि से द्वादश- भाव को देखने से खर्च की परेशानी रहती है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध भी निर्बल रहते हैं। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश सिंह लग्न : षष्ठभाव : मंगल छठे भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित उच्च मंगल के प्रभाव से जातक को शत्रु-पक्ष में सफलता मिलती है तथा भाग्य की शक्ति से सुख प्राप्त होता है। चौथी दृष्टि से स्वराशि में नवमभाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की उन्नति होती है। सातवीं नीचदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च की परेशानी रहती है तथा बाहरी सम्बन्ध कम- जोर रहते हैं। आठवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक प्रभाव, सौन्दर्य एवं सुख की वृद्धि होती है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश सिंह लग्न : सप्तमभाव : मंगल सातवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक की कुछ कठिनाइयों के साथ स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है। चौथी शत्रु-दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता से कुछ मतभेद रहता है परन्तु पिता, राज्य तथा व्यवसाय द्वारा लाभ एवं सफलता की प्राप्ति भी होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य एवं सौभाग्य का लाभ होता है। आठवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब का सुख भी मिलता है।

२६६ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश सिंह लग्न : अष्टमभाव : मंगल आठवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को आयु एवं पुरातत्त्व की शक्ति का लाभ होता है। परन्तु भाग्य तथा धर्म के पक्ष में कमी रहती है। चौथी मित्र-दृष्टि से एकादश- भाव को देखने से आमदनी खूब होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से कौटुम्बिक सुख तथा धन का लाभ भी होता है। आठवीं मित्र-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से पराक्रम बढ़ता है तथा भाई-बहिन के सुख में वृद्धि होती है। आठवीं सामान्य मित्र- दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से जातक सुखी जीवन बिताता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश सिंहलग्न : नवमभाव : मंगल नवें भाव में स्वराशि-स्थित मंगल के प्रभाव से जातक से भाग्य तथा धर्म की उन्नति होती है। चौथी नीच दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च की अधिकता से कष्ट प्राप्त होता है तथा बाहरी सम्बन्धों से भी परेशानी होती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिन का सुख असन्तोषजनक रहता है, परन्तु पराक्रम में वृद्धि होती है। आठवीं दृष्टि से स्वराशि में चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का यथेष्ट सुख प्राप्त होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश सिंहलग्न : दशमभाव : मंगल दसवें भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य एवं व्यव- साय के क्षेत्र में उन्नति, सफलता एवं सम्मान के योग प्राप्त होते हैं। चौथी मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक प्रभाव तथा सौभाग्य में वृद्धि होती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा मकान आदि का सुख मिलता है। आठवीं मित्र-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान एवं विद्या-वृद्धि के क्षेत्र में भी सफलता प्राप्त होती है।

२७० 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश सिंह लग्न : एकादशभाव : मंगल ग्यारहवें भाव में मित्र बुध की राशि में स्थित मंगल के प्रभाव से जातक की आय में वृद्धि होती है तथा माता, भूमि, भवन आदि का सुख भी मिलता है। चौथी मित्र-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब के सुख में वृद्धि होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के क्षेत्र में सफलता मिलती है। आठवीं उच्चदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु तथा रोगों पर विजय प्राप्त होती है। ऐसा व्यक्ति बड़ा प्रभावशाली, धनी तथा शत्रुजयी होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश सिंह लग्न : द्वादशभाव : मंगल बारहवें भाव में मित्र चन्द्रमा की राशि पर स्थित नीच के मंगल के प्रभाव से जातक को खर्चे के बारे में कठिनाई उठानी पड़ती है तथा बाहरी सम्बन्धों से कष्ट मिलता है। माता, भूमि तथा भवन के सुख में भी हानि पहुँचती है। चौथी शत्रु-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। सातवीं उच्चदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रुओं पर विजय मिलती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सुख प्राप्त होता है। 'सिंह' लग्न में 'बुध' 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश सिंह लग्न : प्रथमभाव : बुध पहले भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य एवं प्रभाव में वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति विवेकी, दानी, भोगी तथा धनी होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से व्यवसाय तथा स्त्री के पक्ष में भी उन्नति, सफलता एवं सुख की प्राप्ति होती है।

२७१ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश सिंह लग्न : द्वितीयभाव : बुध दूसरे भाव में स्वराशि स्थित उच्च के बुध के प्रभाव से जातक के धन तथा कौटुम्बिक सुख की वृद्धि होती है। भाई-बहिनों का यथेष्ट सुख भी मिलता है। सातवीं नीच-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व के बारे में अनेक संकटों तथा चिन्ताओं का शिकार बनना पड़ता है। पेट की बीमारी रहती है तथा दैनिक जीवन भी असन्तोषजनक बना रहता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली से 'तृतीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश सिंह लग्न : तृतीयभाव : बुध तीसरे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक का पराक्रम बढ़ता है तथा भाई-बहिनों का सुख भी मिलता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य की उन्नति होती है तथा धर्म का पालन भी होता है। ऐसा व्यक्ति धनी, धर्मात्मा, पराक्रमी, यशस्वी तथा सुखी होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश सिंह लग्न : चतुर्थभाव : बुध चौथे भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक की माता, भूमि तथा भवन का पर्याप्त सुख मिलता है तथा धन का संचय होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने से राज्य, व्यवसाय तथा पिता के क्षेत्र में सुख, सम्मान तथा लाभ मिलता है।

२७२ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश सिंह लग्न : पंचमभाव : बुध पाँचवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के क्षेत्र में पर्याप्त सफलता मिलती है। साथ ही, धन की उन्नति भी होती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि के एकादशभाव को देखने से आमदनी बहुत अच्छी रहती है। ऐसा जातक धनी, सुखी, विद्वान्, सज्जन तथा स्वार्थी होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश सिंह लग्न : षष्ठभाव : बुध छठे भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष में नम्रता एवं धन की शक्ति से सफलता प्राप्त करता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव में देखने से खर्च अधिक होता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ मिलता है। कौटुम्बिक सुख की प्राप्ति कम ही होती है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश सिंह लग्न : सप्तमभाव : बुध सातवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक को सुन्दर स्त्री मिलती है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी लाभ होता है। धन तथा कुटुम्ब का सुख भी मिलता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से जातक के शारीरिक सौन्दर्य, आत्मिक बल, विवेक तथा यश की वृद्धि होती है।

२७३ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश सिंह लग्न : अष्टमभाव : बुध आठवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित नीच के बुध के प्रभाव से जातक की आयु-पक्ष में संकटों का सामना करना पड़ता है तथा पुरातत्त्व की हानि भी होती है। सातवीं उच्च दृष्टि से स्वराशि में द्वितीयभाव को देखने से धन की कमी रहते हुए भी दैनिक खर्च की पूर्ति होती है तथा कौटुम्बिक सुख चिन्तनीय रहता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश सिंहलग्न : नवमभाव : बुध नवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म की उन्नति होती है। वह धनी, सुखी, ईमानदार, उदार, सज्जन तथा ईश्वर-भक्त होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से पराक्रम में वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों का सुख भी मिलता है। ऐसा जातक बड़ा यशस्वी होता है तथा निरन्तर उन्नति करता रहता है ! 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश सिंह लग्न : दशमभाव : बुध दसवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य व्यवसाय के क्षेत्र में पर्याप्त सफलताएँ मिलती हैं तथा धन तथा प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा मकान आदि का सुख भी मिलता है।

२७४ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश सिंह लग्न : एकादशभाव : बुध ग्यारहवें भाव में स्वराशि-स्थित बुध के प्रभाव से जातक को यथेष्ट लाभ होता है तथा धन, यश एवं सुख की वृद्धि होती रहती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान एवं विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में भी सफलता प्राप्त होती है। ऐसा व्यक्ति धनी, सुखी, यशस्वी, विद्वान् तथा सन्ततिवान् होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश सिंह लग्न : द्वादशभाव : बुध बारहवें भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक होता है, परन्तु बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ भी होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष से धन तथा विवेक द्वारा सफलता प्राप्त होती है, परन्तु झगड़े-टंटों के कारण उसे हानि भी उठानी पड़ती है। [L18

२७५ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश सिंह लग्न : द्वितीयभाव : गुरु दूसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को धन तथा कौटुम्बिक सुख की प्राप्ति होती है, परन्तु सन्तान के पक्ष से कुछ कष्ट मिलता है। पांचवीं नीच-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष तथा ननसाल में हानि होती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की वृद्धि होती है। नवीं शत्रु-दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता से मतभेद रहता है तथा व्यवसाय एवं राजकीय क्षेत्र में असन्तोष बना रहता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश सिंहलग्न : तृतीयभाव : गुरु तीसरे भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक का भाई-बहिनों से मतभेद रहता है, परन्तु पराक्रम की वृद्धि होती है। सन्तान का सुख कुछ कठिनाई से मिलता है तथा आयु का लाभ होता है। पांचवीं शत्रु-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष में कुछ कठिनाइयां आती हैं। सातवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने से बुद्धि बल से भाग्य तथा धर्म की उन्नति होती है। नवीं मित्र-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से लाभ खूब होता है। ऐसा जातक प्रत्येक क्षेत्र में साहसी होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश सिंह लग्न : चतुर्थभाव : गुरु चौथे भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक की माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी आती है, परन्तु विद्या एवं सन्तान के पक्ष में लाभ होता है। पांचवीं दृष्टि से स्वराशि के अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। सातवीं शत्रु- दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता से वैमनस्य रहता है तथा राज्य एवं व्यवसाय से पूर्ण लाभ नहीं होता। नवीं उच्च दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक होता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ एवं सुख मिलता है।