संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
८२ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
देवताओंके साथ वहाँ उपस्थित हुआ। मेरे साथ सिद्ध और योगी भी थे। इन्द्र, विवस्वान्, भग, कृतान्त (यम), वायु, अग्नि, कुबेर, चन्द्रमा, दोनों अश्विनीकुमार तथा अन्यान्य देवता, गन्धर्व, यक्ष, नाग और किन्नर भी मनोहर वेष बनाये वहाँ आये थे। शचीपति इन्द्र उस समाजमें अधिक दर्शनीय जान पड़ते थे। वे अप्रतिहत आज्ञा, बल और ऐश्वर्यके कारण हर्षमग्न हो स्वयंवरकी शोभा बढ़ा रहे थे।
जो तीनों लोकोंकी उत्पत्तिमें कारण, जगत्को जन्म देनेवाली तथा देवता और असुरोंकी माता हैं, जो परम बुद्धिमान् आदिपुरुष भगवान् शिवकी पत्नी मानी गयी हैं तथा पुराणोंमें परा प्रकृति बतायी गयी हैं, वे ही भगवती सती दक्षपर कुपित हो देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये हिमवान्के घरमें अवतीर्ण हुई थीं। वे जिस विमानपर बैठी थीं, उसमें सुवर्ण और रत्न जड़े हुए थे। उनके दोनों ओर चँवर डुलाये जा रहे थे। वे सभी ऋतुओंमें खिलनेवाले सुगन्धित पुष्पोंकी माला हाथमें लिये स्वयंवर-सभामें जानेको प्रस्थित हुईं।
इन्द्र आदि देवताओंसे स्वयंवर-मण्डप भरा हुआ था। भगवती उमा माला हाथमें लिये देव-समाजमें खड़ी थीं। इसी समय देवीकी परीक्षा लेनेके लिये भगवान् शङ्कर पाँच शिखावाले शिशु बनकर सहसा उनकी गोदमें आकर सो गये। देवीने उस पञ्चशिख बालकको देखा और ध्यानके द्वारा उसके स्वरूपको जानकर बड़े प्रेमके साथ उसे अङ्कमें ले लिया। पार्वतीका संकल्प शुद्ध था। वे अपना मनोवाञ्छित पति पा गयीं, अतः भगवान् शङ्करको हृदयमें रखकर स्वयंवरसे लौट पड़ीं। देवीके अङ्कमें सोये हुए उस शिशुको देखकर देवता आपसमें सलाह करने लगे कि यह कौन है। कुछ पता न लगनेसे अत्यन्त मोहमें पड़कर वे बहुत कोलाहल करने लगे और वृत्रासुरको मारनेवाले इन्द्रने अपनी एक बाँह ऊँचे उठाकर उस बालकपर वज्रका प्रहार करनेकी चेष्टा की; किंतु शिशुरूपधारी देवाधिदेव शङ्करने उन्हें स्तम्भित कर दिया। अब वे न तो वज्र चला सके और न हिल-डुल सके। तब भग नामवाले बलवान् आदित्यने एक तेजस्वी शस्त्र चलाना चाहा, किंतु भगवान्ने उनकी बाँहको भी जडवत् बना दिया। साथ ही उनका बल, तेज और योगशक्ति भी व्यर्थ हो गयी। उस समय मैंने परमेश्वर शिवको पहचाना और शीघ्र उठकर उनके चरणोंमें आदरपूर्वक मस्तक झुकाया। इसके बाद मैंने उनकी स्तुति करते हुए कहा—'भगवन्! आप अजन्मा और अजर देवता हैं; आप ही जगत्के स्रष्टा, सर्वव्यापक, परावरस्वरूप, प्रकृति-पुरुष तथा ध्यान करनेयोग्य अविनाशी हैं। अमृत, परमात्मा, ईश्वर, महान् कारण, मेरे भी उत्पादक, प्रकृतिके स्रष्टा, सबके रचयिता और प्रकृतिसे भी परे हैं। ये देवी पार्वती भी प्रकृतिरूपा हैं, जो सदा ही आपके सृष्टिकार्यमें सहायक होती हैं। ये प्रकृतिदेवी पत्नीरूपमें प्रकट होकर जगत्के कारणभूत आप परमेश्वरको प्राप्त हुई हैं। महादेव! देवी पार्वतीके साथ आपको नमस्कार है। देवेश्वर! आपके ही प्रसाद और आदेशसे मैंने इन देवता आदि प्रजाओंकी सृष्टि की है। ये देवगण आपकी योगमायासे मोहित हो रहे हैं। आप इनपर कृपा कीजिये, जिससे ये पहले-जैसे हो जायँ।'
तदनन्तर मैंने सम्पूर्ण देवताओंसे कहा—'अरे! तुम सब लोग कितने मूढ़ हो! इन्हें नहीं जानते? ये साक्षात् भगवान् शङ्कर हैं। अब शीघ्र इन्हींकी शरणमें जाओ।' तब वे सब जडवत् बने हुए देवता शुद्धचित्तसे मन-ही-मन महादेवजीको प्रणाम करने लगे। इससे देवाधिदेव महेश्वरने
३७- पार्वतीजीका स्वयंवरमें महादेवजीके चरणोंमें माला अर्पण करना
* पार्वतीजीका स्वयंवर और महादेवजीके साथ उनका विवाह * ८३
प्रसन्न होकर उनका शरीर पहले-जैसा कर दिया। तत्पश्चात् देवेश्वर शिवने परम अद्भुत त्रिनेत्रधारी विग्रह धारण किया। उस समय उनके तेजसे तिरस्कृत हो सम्पूर्ण देवताओंने नेत्र बंद कर लिये। तब उन्होंने देवताओंको दिव्य दृष्टि प्रदान की, जिससे वे उनके स्वरूपको देख सकते थे। वह दृष्टि पाकर देवताओंने परम देवेश्वर भगवान् शिवका दर्शन किया। उस समय पार्वतीदेवीने अत्यन्त प्रसन्न हो समस्त देवताओंके देखते-देखते अपने हाथकी माला भगवान्के चरणोंमें चढ़ा दी।
यह देख सब देवता साधु-साधु कहने लगे। फिर उन लोगोंने पृथ्वीपर मस्तक टेककर देवीसहित महादेवजीको प्रणाम किया। इसके बाद देवताओंसहित मैंने हिमवान्से कहा—'शैलराज! तुम सबके लिये स्पृहणीय, पूजनीय, वन्दनीय तथा महान् हो; क्योंकि साक्षात् महादेवजीके साथ तुम्हारा सम्बन्ध हो रहा है। यह तुम्हारे लिये महान् अभ्युदयकी बात है। अब शीघ्र ही कन्याका विवाह करो, विलम्ब क्यों करते हो?'
मेरी बात सुनकर हिमवान्ने नमस्कारपूर्वक मुझसे कहा—'देव! मेरे सब प्रकारके अभ्युदयमें आप ही कारण हैं। पितामह! जब जिस विधिसे विवाह करना उचित हो, वह सब आप ही करायें।' तब मैंने भगवान् शिवसे कहा—'देव! अब उमाके साथ विवाह करें।' उन्होंने उत्तर दिया—'जैसी आपकी इच्छा।' फिर तो हमलोगोंने महादेवजीके विवाहके लिये तुरंत ही एक मण्डप तैयार किया, जो नाना प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित था। बहुत-से रत्न चित्र-विचित्र मणियाँ, सुवर्ण और मोती आदि द्रव्य स्वयं ही मूर्तिमान् होकर उस मण्डपको सजाने लगे। मरकतमणिका बना हुआ फर्श विचित्र दिखायी देने लगा। सोनेके खम्भोंसे उसकी शोभा और भी बढ़ गयी थी। स्फटिकमणिकी बनी हुई दीवार चमक रही थी। द्वारपर मोतियोंकी झालरें लटक रही थीं। चन्द्रकान्त और सूर्यकान्तमणि सूर्य और चन्द्रमाके प्रकाश पाकर पिघल रहे थे। वायु मनोहर सुगन्ध लेकर भगवान् शिवके प्रति अपनी भक्तिका परिचय देती हुई मन्द गतिसे बहने लगी। उसका स्पर्श सुखद जान पड़ता था। चारों समुद्र, इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवता, देवनदियाँ, महानदियाँ, सिद्ध, मुनि, गन्धर्व, अप्सराएँ, नाग, यक्ष, राक्षस, जलचर, खेचर, किन्नर तथा चारणगण भी उस विवाहोत्सवमें (मूर्तिमान् होकर) सम्मिलित हुए थे। तुम्बुरु, नारद, हाहा और हूहू आदि सामगान करनेवाले गन्धर्व मनोहर बाजे लेकर उस विशाल मण्डपमें आये थे। ऋषि कथाएँ कहते, तपस्वी वेद पढ़ते तथा मन-ही-मन प्रसन्न होकर वे पवित्र वैवाहिक मन्त्रोंका जप करते थे। सम्पूर्ण जगन्माताएँ और देवकन्याएँ हर्षमग्न हो मङ्गलगान कर रही थीं। भगवान् शङ्करका विवाह हो रहा है, यह जानकर भाँति-भाँतिकी सुगन्ध और सुखका विस्तार
२२- देवताओंद्वारा महादेवजीकी स्तुति, कामदेवका दाह तथा महादेवजीका मेरुपर्वतपर गमन
८४ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
करनेवाली छहों ऋतुएँ वहाँ साकार होकर उपस्थित थीं।
इस प्रकार जब सम्पूर्ण भूत वहाँ एकत्रित हुए और नाना प्रकारके बाजे बजने लगे, उस समय मैं पार्वतीको योग्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित कराकर स्वयं ही मण्डपमें ले आया। फिर मैंने भगवान् शङ्करसे कहा—‘देव! मैं आपका आचार्य बनकर अग्निमें हवन करूँगा। यदि आप मुझे आज्ञा दें तो विधिपूर्वक इस कार्यका अनुष्ठान आरम्भ हो।’ तब देवाधिदेव शङ्करने मुझसे इस प्रकार कहा—‘ब्रह्मन्! जो भी शास्त्रोक्त विधान हो, उसे इच्छानुसार कीजिये; मैं आपकी प्रत्येक आज्ञाका पालन करूँगा।’ यह सुनकर मेरे मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई और मैंने तुरंत ही कुश हाथमें लेकर महादेवजी तथा पार्वतीदेवीके हाथोंको योगबन्धसे युक्त कर दिया। उस समय वहाँ अग्निदेव स्वयं ही हाथ जोड़कर उपस्थित हो गये। श्रुतियोंके गीत और महामन्त्र भी मूर्तिमान् होकर आ गये थे। मैंने शास्त्रीय विधिसे अमृतस्वरूप घृतका होम किया और उस दिव्य दम्पतिके द्वारा अग्निकी प्रदक्षिणा करायी। उसके बाद उनके हाथोंको योगबन्धसे मुक्त किया। इस प्रकार क्रमशः वैवाहिक विधि पूर्ण की गयी। इस कार्यमें सम्पूर्ण देवताओं, मेरे मानस पुत्रों तथा सिद्धोंका भी सहयोग था। विवाह समाप्त होनेपर मैंने भगवान् शङ्करको प्रणाम किया। योगशक्तिसे ही पार्वती और परमेश्वरका उत्तम विवाह सम्पन्न हुआ। ब्राह्मणो! इस प्रकार मैंने तुम सब लोगोंसे पार्वतीजीके स्वयंवर और महादेवजीके उत्तम विवाहकी कथा कह सुनायी।
देवताओंद्वारा महादेवजीकी स्तुति, कामदेवका दाह तथा महादेवजीका मेरुपर्वतपर गमन
**ब्रह्माजी कहते हैं—**अमित तेजस्वी महादेवजीका विवाह हो जानेपर इन्द्र आदि देवताओंके हर्षकी सीमा न रही। उन्होंने भगवान् शङ्करको प्रणाम किया और इस प्रकार स्तुति आरम्भ की।
**देवता बोले—**पर्वत जिनका लिङ्गमय स्वरूप है, जो पर्वतोंके स्वामी हैं, जिनका वेग पवनके समान है, जो विकृत रूप धारण करनेवाले तथा अपराजित हैं, जो क्लेशोंका नाश करके शुभ सम्पत्ति प्रदान करते हैं, उन भगवान् शङ्करको नमस्कार है। नीले रंगकी चोटी धारण करनेवाले अम्बिकापतिको नमस्कार है; वायु जिनका स्वरूप है और जो सैकड़ों रूप धारण करनेवाले हैं, उन भगवान् शिवको प्रणाम है। दैत्योंके योगका नाश करनेवाले तथा योगियोंके गुरु महादेवजीको प्रणाम
- देवताओंद्वारा महादेवजीकी स्तुति, कामदेवका दाह तथा महादेवजीका मेरुपर्वतपर गमन * ८५
है। सूर्य और चन्द्रमा जिनके नेत्र हैं तथा जो ललाटमें भी नेत्र धारण करते हैं, उन भगवान् शङ्करको नमस्कार है। जो श्मशानमें क्रीड़ा करते और वर देते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, उन देवेश्वर शिवको प्रणाम है। जो गृहस्थ होते हुए भी साधु हैं, नित्य जटा एवं ब्रह्मचर्य धारण करनेवाले हैं, उन भगवान् शङ्करको नमस्कार है। जो जलमें तपस्या करते, योगजनित ऐश्वर्य देते, मनको शान्त रखते, इन्द्रियोंका दमन करते तथा प्रलय और सृष्टिके कर्ता हैं, उन महादेवजीको प्रणाम है। अनुग्रह करनेवाले भगवान्को नमस्कार है। पालन करनेवाले शिवको प्रणाम है। रुद्र, वसु, आदित्य और अश्विनीकुमारोंके रूपमें वर्तमान भगवान् शङ्करको नमस्कार है। जो सबके पिता, सांख्यवर्णित पुरुष, विश्वेदेव, शर्व, उग्र, शिव, वरद, भीम, सेनानी, पशुपति, शुचि, वैरिहन्ता, सद्योजात, महादेव, चित्र, विचित्र, प्रधान, अप्रमेय, कार्य और कारण नामसे प्रतिपादित होते हैं, उन भगवान् शिवको प्रणाम है। भगवन्! पुरुषरूपमें आपको नमस्कार है। पुरुषमें इच्छा उत्पन्न करनेवाले आपको प्रणाम है। आप ही पुरुषका प्रकृतिके साथ संयोग कराते हैं और आप ही प्रकृतिमें गुणोंका आधान करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आप प्रकृति और पुरुषके प्रवर्तक, कार्य और कारणके विधायक तथा कर्मफलोंकी प्राप्ति करानेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आप कालके ज्ञाता, सबके नियन्ता, गुणोंकी विषमताके उत्पादक तथा प्रजावर्गको जीविका प्रदान करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। देवदेवेश्वर! आपको प्रणाम है। भूतभावन! आपको नमस्कार है। कल्याणमय प्रभो! आप हमें दर्शन देनेके लिये प्रसन्नमुख एवं सौम्य हो जायँ।
इस प्रकार देवताओंके द्वारा अपनी स्तुति होनेपर सम्पूर्ण जगत्के स्वामी भगवान् उमापतिने कहा—'देवताओ! मैं तुम्हें दर्शन देनेको सदा ही प्रसन्नमुख और सौम्य हूँ। तुम शीघ्र कोई वर माँगो। मैं निश्चय ही उसे दूँगा।'
देवता बोले—भगवन्! यह वर आपके ही हाथमें रहे। जब आवश्यकता होगी, तब हम माँग लेंगे। उस समय आप हमें मनोवाञ्छित वर दीजियेगा।
'एवमस्तु' कहकर महादेवजीने देवताओं तथा अन्य लोगोंको विदा किया और स्वयं प्रमथगणोंके साथ अपने धामको चले गये। ब्राह्मणो! जो इस स्तोत्रका श्रवण या पाठ करता है, वह सम्पूर्ण लोकोंमें जानेकी शक्ति प्राप्त करता और देवराज इन्द्रकी भाँति देवताओंद्वारा पूजित होता है।
महादेवजी अपने धाममें प्रवेश करके जब सुन्दर आसनपर विराजमान हुए, तब वक्र स्वभाववाले क्रूर कामदेवने उन्हें अपने बाणोंसे बींधनेका विचार किया। वह अनाचारी, दुरात्मा और कुलाधम काम सब लोकोंको पीड़ित करनेवाला है। वह नियम तथा व्रतोंका पालन करनेवाले ऋषियोंके कार्यमें विघ्न डाला करता है। उस दिन चक्रवाकका रूप धारण करके अपनी पत्नी रतिके साथ उसका आगमन हुआ था। देवताओंके स्वामी भगवान् शङ्करने अपनेको बींधनेकी इच्छा रखनेवाले आततायी कामदेवको तीसरे नेत्रसे अवहेलनापूर्वक देखा। फिर तो उनके नेत्रसे प्रकट हुई आग सहस्रों लपटोंके साथ प्रज्वलित हो उठी और रतिके स्वामी मदनको उसके साज-शृङ्गारके साथ सहसा दग्ध करने लगी। उस समय जलता हुआ कामदेव बड़े करुण स्वरमें आर्तनाद करने लगा और भगवान् शिवको प्रसन्न करनेके लिये धरतीपर गिर पड़ा। इतनेमें उसके सब अङ्गोंमें आग फैल गयी और सब लोकोंको ताप देनेवाला काम स्वयं ही पृथ्वीपर गिरकर क्षणभरमें मूर्च्छित हो गया। उसकी पत्नी
३९- पार्वतीका महादेवजीसे हिमालय छोड़कर अन्यत्र चलनेका अनुरोध
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- संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
रति अत्यन्त दुःखित हो करुणामय विलाप करने लगी। उस दुःखिनीने महादेवजी तथा पार्वतीदेवीसे अपने पतिके लिये याचना की। उसके दुःखको जानकर दयालु दम्पतिने उसे सान्त्वना देते हुए कहा—'कल्याणी! कामदेव तो अब निश्चय ही दग्ध हो गया, अब यहाँ इसकी उत्पत्ति नहीं हो सकती; परंतु शरीररहित होते हुए भी यह तुम्हारे सब कार्य सिद्ध करता रहेगा। शुभे! जब भगवान् विष्णु वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके रूपमें इस पृथ्वीपर अवतार लेंगे, उस समय उन्हींके पुत्ररूपमें तुम्हारे पतिका जन्म होगा। इस प्रकार वरदान पाकर कामपत्नी रति खेदरहित एवं प्रसन्न हो अपने अभीष्ट स्थानको चली गयी। इधर भगवान् शङ्कर कामदेवको दग्ध करनेके पश्चात् भगवती उमाके साथ हिमालयपर प्रसन्नतापूर्वक रमण करने लगे।
पार्वतीजीने कहा—भगवान्! देवदेवेश्वर! अब मैं इस पर्वतपर नहीं रहूँगी। अब मेरे लिये दूसरा कोई निवासस्थान बनाइये।
महादेवजी बोले—देवि! मैं तो सदा तुमसे अन्यत्र रहनेको कहता था, किंतु तुम्हें कभी अन्य किसी स्थानका निवास पसन्द नहीं आया। आज स्वयं ही तुम अन्यत्र रहनेकी इच्छा क्यों करती हो? इसका कारण बताओ।
देवीने कहा—देवेश्वर! आज मैं अपने महात्मा पिताके घर गयी थी। वहाँ माताने मुझे एकान्त स्थानमें देख उत्तम आसन आदिके द्वारा मेरा सत्कार किया और कहा—'उमे! तुम्हारे स्वामी दरिद्र हैं, इसलिये सदा खिलौनोंसे खेला करते हैं। देवताओंकी क्रीड़ा ऐसी नहीं होती।' महादेव! आप जो नाना प्रकारके गणोंके साथ विहार करते हैं, यह मेरी माताको पसन्द नहीं है।
यह सुनकर महादेवजी हँस पड़े और देवीको हँसाते हुए बोले—'प्रिये! बात तो ऐसी ही है, इसके लिये तुम्हें दुःख क्यों हुआ? मैं कभी हाथीके चमड़े लपेटता, कभी दिगम्बर बना रहता, श्मशानभूमिमें निवास करता, बिना घर-द्वारका होकर जंगलोंमें और पर्वतकी कन्दराओंमें रहता तथा अपने गणोंके साथ घूमता-फिरता हूँ। इसके लिये तुम्हें मातापर क्रोध नहीं करना चाहिये। तुम्हारी माताने सब ठीक ही कहा है। इस पृथ्वीपर प्राणियोंका माताके समान हितकारी कोई बन्धु-बान्धव नहीं है।'
देवीने कहा—सुरेश्वर! मुझे अपने बन्धु-बान्धवोंसे कोई प्रयोजन नहीं है। आप वही करें, जिससे मुझे सुख हो।
देवीका यह वचन सुनकर देवेश्वर महादेवजीने उन्हें प्रसन्न करनेके लिये उस पर्वतको छोड़ दिया और पत्नी तथा पार्षदोंको साथ ले देवताओं और सिद्धोंसे सेवित सुमेरुपर्वतके लिये प्रस्थान किया।
२३- दक्ष-यज्ञ-विध्वंस
* दक्ष-यज्ञ-विध्वंस * ८७
दक्ष-यज्ञ-विध्वंस
ऋषियोंने कहा— ब्रह्मन्! वैवस्वत मन्वन्तरमें प्रचेताओेंके पुत्र प्रजापति दक्षका अश्वमेध-यज्ञ कैसे नष्ट हुआ?
ब्रह्माजी बोले— ब्राह्मणो! महादेवजीने सती-देवीका प्रिय करनेकी इच्छासे जिस प्रकार दक्षके यज्ञका विध्वंस किया था, उसका वर्णन करता हूँ। पूर्वकालकी बात है, महादेवजी मेरुगिरिके ज्योतिःस्थल नामक शिखरपर, जो सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित और पलंगकी भाँति फैला हुआ था, विराजमान थे। गिरिराजकुमारी पार्वती सदा उनके पार्श्वभागमें बैठी रहती थीं। आदित्य, वसु, अश्विनीकुमार, गुह्यकोंसहित कुबेर, महामुनि शुक्राचार्य तथा सनत्कुमार आदि महर्षि उनकी सेवामें उपस्थित रहते थे। अत्यन्त भयंकर राक्षस एवं महाबली पिशाच, जो अनेक रूप धारण करनेवाले तथा नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित थे, भगवान् शिवके समीप रहा करते थे। भगवान्के पार्षद भी वहाँ मौजूद थे। वे सब अग्निके समान तेजस्वी जान पड़ते थे। महादेवजीकी इच्छासे भगवान् नन्दीश्वर भी वहाँ खड़े रहते थे। नदियोंमें श्रेष्ठ गङ्गाजी मूर्तिमती होकर उनकी सेवामें संलग्न रहती थीं। इस प्रकार परम सौभाग्यशाली देवर्षियों और देवताओंसे पूजित होकर भगवान् शङ्कर वहाँ सदा निवास करने लगे। कुछ कालके बाद प्रजापति दक्षने शास्त्रोक्त विधिके अनुसार यज्ञ करनेकी तैयारी की। उनके उस यज्ञमें इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता स्वर्गसे आकर एकत्रित होने लगे। वे अग्निके समान तेजस्वी देवता दक्षके अनुरोधसे प्रकाशमान विमानोंपर बैठकर गङ्गाद्वारको गये। पृथ्वी, आकाश तथा स्वर्गलोकमें रहनेवाले सभी देवता प्रजापतिके पास हाथ जोड़कर उपस्थित हुए। आदित्य,वसु, रुद्र, साध्य तथा मरुद्गण—ये सब यज्ञमें भाग लेनेके लिये भगवान् विष्णुके साथ वहाँ पधारे थे। ऊष्मप, धूमप, आज्यप तथा सोमप नामवाले देवता भी अश्विनीकुमारोंके साथ वहाँ उपस्थित थे। ये तथा और भी अनेक भूत-प्राणियोंका समुदाय वहाँ एकत्रित हुआ था। जरायुज, अण्डज, स्वेदज तथा उद्भिज्ज भी उस यज्ञमें सम्मिलित थे। देवतालोग अपनी स्त्रियों तथा महर्षियोंके साथ वहाँ पधारे थे।
देवताओंको वहाँ जाते देख गिरिराजकुमारी पार्वतीने भगवान् शङ्करसे पूछा—‘भगवन्! ये इन्द्र आदि देवता कहाँ जाते हैं?’
महादेवजी बोले— महाभागे! प्रजापति दक्ष अश्वमेध-यज्ञ करते हैं। उसीमें सब देवता जा रहे हैं।
देवीने पूछा— महाभाग! आप इस यज्ञमें क्यों नहीं जाते? ऐसी कौन-सी रुकावट है, जिससे आपका वहाँ जाना नहीं होता?
४१- भगवान् शङ्करका वीरभद्रको दक्ष-यज्ञ-विध्वंसके लिये आदेश
८८ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
महादेवजी बोले— महाभागे! देवताओंने ही यह सब किया है। उन्होंने किसी भी यज्ञमें मेरा भाग नहीं रखा है। पहलेसे जो मार्ग चला आता है, उसीसे अपनेको भी चलना चाहिये।
उमाने कहा— भगवन्! आप सब देवताओंमें श्रेष्ठ हैं। आपके गुण और प्रभाव सबसे अधिक हैं। आप अपने तेज, यश और श्रीके द्वारा अजेय एवं अधृष्य हैं। महाभाग! यज्ञमें आपके भागका जो यह निषेध है, इससे मुझे बड़ा दुःख हुआ है। मेरे शरीरमें कम्प छा गया है।
महादेवजी बोले— देवि! क्या तुम मुझे नहीं जानतीं! आज तुम्हें जो मोह हुआ है, उससे इन्द्र आदि देवताओंसहित सम्पूर्ण त्रिलोकी नष्ट हो सकती है। मैं ही यज्ञका स्वामी हूँ। मेरी ही सब लोग निरन्तर स्तुति करते हैं। मेरे ही संतोषके लिये सब लोग रथन्तर सामका गान करते हैं। ब्राह्मण वेदमन्त्रोंसे मेरा ही यजन करते हैं तथा अध्वर्यु लोग यज्ञमें मेरे ही लिये भागोंकी कल्पना करते हैं।
प्राणोंके समान प्रियतमा पत्नीसे यों कहकर भगवान् शङ्करने अपने मुखसे क्रोधाग्निजनित एक महाभूतकी सृष्टि की। फिर उससे कहा—'तुम मेरी आज्ञासे दक्षके यज्ञमें जाओ और उसका शीघ्र विनाश करो।' तब उसने रुद्रकी आज्ञासे सिंहका वेष धारण करके दक्षके यज्ञका विनाश कर डाला। उसने अपने कर्मका साक्षी बनानेके लिये अत्यन्त भयंकर भद्रकालीको भी साथ ले लिया था। भगवान्का वह क्रोध वीरभद्रके नामसे विख्यात हुआ, जो श्मशानभूमिमें निवास करता है। उसने पार्वतीदेवीके खेदका निवारण किया था। वीरभद्रने अपने रोमकूपोंसे अनेक रुद्रगण उत्पन्न किये, जो रुद्रके समान ही वीर्यवान् और पराक्रमी थे। वे सब सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें झुंड बनाकर उस यज्ञमण्डपमें गये। उनकी किलकिलाहटसे समस्त आकाश गूँज उठा। अग्नि और सूर्यका प्रकाश मन्द पड़ गया। चारों ओर अन्धकार छा गया। उस समय वे समस्त रुद्रगण यज्ञमण्डपमें आग लगाने लगे; किसीने यूपोंको तोड़ डाला, किसीने उन्हें उखाड़ दिया, कोई सिंहनाद करता और कोई वहाँकी सब वस्तुओंको तहस-नहस कर डालता था। कितने ही वायुके समान वेगसे इधर-उधर दौड़ लगाने लगे। यज्ञपात्र चूर-चूर हो गये। वहाँके मण्डप ढह गये। ऐसा जान पड़ता था, आकाशसे तारे टूटकर गिर रहे हैं। कोई यज्ञमें रखे हुए भोज्य पदार्थोंको खाते और सब ओर लोगोंको डराते फिरते थे। कितने ही पर्वताकार भूत देवाङ्गनाओंको उठाकर फेंक देते थे। ऐसे गणोंके साथ प्रतापी वीरभद्रने पहुँचकर देवताओंद्वारा सुरक्षित यज्ञको भद्रकालीके सामने ही भस्म कर डाला। अन्य रुद्रगण सबको भय उपजानेवाली गर्जना करने लगे। कुछ लोगोंने यज्ञका मस्तक काटकर भयंकर नाद किया। तब इन्द्र आदि देवताओं और प्रजापति दक्षने हाथ जोड़कर
२४- दक्षद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति
* दक्षद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति * ८९
पूछा—'बताइये, आप कौन हैं?'
वीरभद्रने कहा—मैं न देवता हूँ, न दैत्य हूँ। न इस यज्ञमें भोजन करने आया हूँ और न कौतूहलवश इसे देखनेको ही मेरा आना हुआ है। मैं इस यज्ञका विध्वंस करनेके लिये आया हूँ। मेरा नाम वीरभद्र है। मैं रुद्रके कोपसे प्रकट हुआ हूँ। ये भद्रकाली हैं। इनका प्रादुर्भाव पार्वतीदेवीके क्रोधसे हुआ है। ये देवाधिदेव महादेवजीके भेजनेसे यज्ञके समीप आयी हैं। राजेन्द्र! तुम देवदेव भगवान् उमापतिकी शरणमें जाओ। उनका क्रोध भी वरदानके ही तुल्य है।
तब प्रजापति दक्ष मन-ही-मन भगवान् शङ्करकी शरणमें गये। उन्होंने प्राण और अपानको हृदयमें रोककर यत्नपूर्वक उनका ध्यान किया। तब भगवान् शिव प्रकट हुए और उन्होंने मुसकराकर पूछा—'कहो, तुम्हारा कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ?' तब दक्षने हाथ जोड़कर कहा—'भगवन्! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं अथवा यदि मैं आपका प्रिय एवं कृपापात्र हूँ तो मुझे यह वरदान दें—'जो भी भोजन-सामग्री यहाँ खा-पी ली गयी, नष्ट कर दी गयी, यज्ञका जो सामान चूर-चूर करके फेंक दिया गया, वह सब बहुत दिनोंसे यत्न करके संचित किया गया था। महेश्वर! आपकी कृपासे यह व्यर्थ न जाय।'
ब्रह्माजीने कहा—भगवान् शङ्करने 'तथास्तु' कहकर दक्षकी कामना पूर्ण की। प्रजापति दक्षने भगवान्से वरदान पाकर पृथ्वीपर घुटने टेक दिये और भगवान् शिवका स्तवन आरम्भ किया।
दक्षद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति
दक्ष बोले—देवदेवेश्वर! आपको नमस्कार है। अन्धकासुरको मारनेवाले रुद्र! आपको प्रणाम है। देवेन्द्र! आप बलमें श्रेष्ठ और देवता तथा दानवोंद्वारा पूजित हैं।* आप सहस्राक्ष^१, विरूपाक्ष^२ और त्र्यक्ष^३ कहलाते हैं। यक्षराज कुबेरके आप इष्टदेव हैं। आपके हाथ और पैर सब ओर हैं। नेत्र, मस्तक और मुख भी सब ओर हैं। आपके सब ओर कान हैं। आप संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित हैं। शङ्कुकर्ण^४, महाकर्ण^५, कुम्भकर्ण^६, अर्णवालय^७, गजेन्द्रकर्ण^८, गोकर्ण^९, शतकर्ण^{१०}, शतोदर^{११}, शतावर्त^{१२}, शतजिह्व^{१३},
* दक्ष उवाच—नमस्ते देवदेवेश नमस्तेऽन्धकसूदन। देवेन्द्र त्वं बलश्रेष्ठ देवदानवपूजित॥
१. सहस्रों नेत्रोंवाले, २. विकराल नेत्रोंवाले, ३. तीन नेत्रोंवाले, ४. कीलके समान नुकीले कानोंवाले, ५. बड़े-बड़े कानोंवाले, ६. घड़ेके समान कानोंवाले, ७. समुद्र जिनका निवासस्थान है वे, ८. हाथीके समान कानोंवाले, ९. गायके समान कानोंवाले, १०. सैकड़ों कानोंवाले, ११. सैकड़ों उदरवाले, १२. सैकड़ों भँवरवाले, १३. सैकड़ों जिह्वावाले।
९० * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
और सनातन हैं। आपको नमस्कार है। गायत्रीके उपासक आपका ही गान करते हैं। सूर्यके भक्त आपकी ही सूर्यरूपसे अर्चना करते हैं। आप देवता और दानवोंके रक्षक, ब्रह्मा तथा इन्द्र हैं। आप मूर्तिमान्, महामूर्ति और जलके भंडाररूप समुद्र हैं। जैसे गोशालामें गौएँ रहती हैं, उसी प्रकार आपमें सम्पूर्ण देवता निवास करते हैं। आपके शरीरमें मैं चन्द्रमा, अग्नि, वरुण, सूर्य, विष्णु, ब्रह्मा तथा बृहस्पतिको देखता हूँ। क्रिया, करण, कार्य, कर्ता, कारण, असत्, सदसत्, उत्पत्ति तथा प्रलय भी आप ही हैं। भव (सृष्टिकर्ता), शर्व, रुद्र (रुलानेवाले), वरद, पशुपति, अन्धकासुरघाती, त्रिजट, त्रिशीर्ष, त्रिशूलधारी, त्र्यम्बक, त्रिनेत्र और त्रिपुरनाशक आप भगवान् शिवको नमस्कार है।
आप चण्ड (अत्यन्त क्रोधी), मुण्ड (सिर मुँड़ाये हुए), प्रचण्ड विश्वको धारण करनेवाले, दण्डी, शङ्कुकर्ण तथा दण्डिदण्ड (दण्डधारियोंको भी दण्ड देनेवाले) हैं। आपको नमस्कार है। आप अर्धचण्डिकेश (अर्द्धनारीश्वर), शुष्क, विकृत, विलोहित, धूम्र और नीलग्रीव हैं। आपको नमस्कार है। आप अप्रतिरूप हैं—आपके समान दूसरा कोई नहीं है। आपको नमस्कार है। आप विरूप (विकराल रूपवाले) होते हुए भी शिव (कल्याणमय) हैं। आप ही सूर्य और उनके स्वामी हैं। आपकी ध्वजा और पताकामें सूर्यके चिह्न हैं। आपको नमस्कार है। प्रमथगणोंके स्वामी आपको नमस्कार है। आपके कंधे वृषभके कंधेके समान मांसल हैं। आपको नमस्कार है। आप हिरण्यगर्भ एवं हिरण्यकवच हैं। आपको नमस्कार है। आप हिरण्य (सुवर्ण)-की चूड़ा धारण करनेवाले और हिरण्यपति हैं। आपको नमस्कार है। आप शत्रुओंके घातक, अत्यन्त क्रोधी तथा पत्तोंके समूहपर शयन करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आपकी स्तुति की गयी है, इस समय भी आपकी स्तुति की जाती है तथा आप ही स्तुतिस्वरूप हैं। आपको नमस्कार है। आप सर्वस्वरूप, सर्वभक्षी एवं सब भूतोंके अन्तरात्मा हैं। आपको नमस्कार है।*
आप ही होम और मन्त्र हैं। आपकी ध्वजा-पताका श्वेत रंगकी है, आपको नमस्कार है। आप
* सहस्राक्ष विरूपाक्ष त्र्यक्ष यक्षाधिपप्रिय। सर्वतःपाणिपादस्त्वं सर्वतोऽक्षिशिरोमुखः ॥
सर्वतः श्रुतिमॉल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठसि। शङ्कुकर्णो महाकर्णः कुम्भकर्णोऽर्णवालयः ॥
गजेन्द्रकर्णो गोकर्णः शतकर्णो नमोऽस्तु ते। शतोदरः शतावर्तः शतजिह्वः सनातनः ॥
गायन्ति त्वां गायत्रिणो अर्चयन्त्यर्कमर्किणः। देवदानवगोप्ता च ब्रह्मा च त्वं शतक्रतुः ॥
मूर्तिमांस्त्वं महामूर्तिः समुद्रः सरसां निधिः। त्वयि सर्वा देवता हि गावो गोष्ठ इवासते ॥
त्वतः शरीरे पश्यामि सोममग्निजलेश्वरम्। आदित्यमथ विष्णुं च ब्रह्माणं सबृहस्पतिम् ॥
क्रिया करणकार्यं च कर्ता कारणमेव च। असच्च सदसच्चैव तथैव प्रभवाप्ययौ ॥
नमो भवाय शर्वाय रुद्राय वरदाय च। पशूनां पतये चैव नमोऽस्त्वन्धकघातिने ॥
त्रिजटाय त्रिशीर्षाय त्रिशूलवरधारिणे। त्र्यम्बकाय त्रिनेत्राय त्रिपुरघ्नाय वै नमः ॥
नमश्चण्डाय मुण्डाय विश्वचण्डधराय च। दण्डिने शङ्कुकर्णाय दण्डिदण्डाय वै नमः ॥
नमोऽर्धचण्डिकेशाय शुष्काय विकृताय च। विलोहिताय धूम्राय नीलग्रीवाय वै नमः ॥
नमोऽस्त्वप्रतिरूपाय विरूपाय शिवाय च। सूर्याय सूर्यपतये सूर्यध्वजपताकिने ॥
नमः प्रमथनाशाय वृषस्कन्धाय वै नमः। नमो हिरण्यगर्भाय हिरण्यकवचाय च ॥
हिरण्यकृतचूडाय हिरण्यपतये नमः। शत्रुघाताय चण्डाय पर्णसङ्घशयाय च ॥
नमः स्तुताय स्तुतये स्तूयमानाय वै नमः। सर्व्याय सर्वभक्षाय सर्वभूतान्तरात्मने ॥
* दक्षद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति * ९१
ही अनम्य और आप ही नमन करनेके योग्य हैं। आप हर्षमग्न होकर किलकारियाँ भरनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। सोते हुए, सोये हुए, सोकर उठे हुए, खड़े हुए और दौड़ते हुए आपको नमस्कार है। कुबड़े और कुटिलरूपमें आपको नमस्कार है। आप सदा ताण्डव नृत्य करनेवाले और मुखसे बाजा बजानेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आप बाधा निवारण करनेवाले, लुब्ध एवं गाना-बजाना करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। ज्येष्ठ और श्रेष्ठरूपमें आपको नमस्कार है। बलका मन्थन करनेवाले आपको नमस्कार है। उग्र रूपवाले आपको सदा नमस्कार है। दस भुजाओंवाले आपको नित्य प्रणाम है। हाथमें कपाल धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। श्वेत भस्म आपको अधिक प्रिय है। आप भयभीत करनेवाले, भयंकर एवं कठोर व्रत धारण करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है।
आपका मुख नाना प्रकारसे विकृत है, जिह्वा तलवारके समान है और दाँत बड़े भयंकर हैं। पक्ष, मास और लवार्ध आदि कालके भेद आपके ही स्वरूप हैं। आपको तूँबी और वीणा बहुत ही प्रिय है। आपको नमस्कार है। आपका रूप घोर और अघोर दोनों ही है। आप घोर और अघोरतर हैं; ऐसे होते हुए भी आप शिव, शान्त तथा अत्यन्त शान्त हैं। आपको नमस्कार है। शुद्ध बुद्धिरूप आपको नमस्कार है। सबको बाँटना आप अधिक पसन्द करते हैं। आप पवन, सूर्य एवं सांख्यपरायण हैं। आप एक प्रचण्ड घण्टा धारण करनेवाले और घण्टा-ध्वनिके समान बोलनेवाले हैं। आपके पास बराबर घण्टा रहा करता है। आप लाखों घण्टेवाले हैं। घण्टोंकी माला आपको अधिक प्रिय है। मैं आपको प्रणाम करता हूँ। आप प्राणोंको दण्ड देनेवाले, नित्य एवं लोहितरूप हैं। आपको नमस्कार है। आप हूं-हूं करनेवाले, रुद्र एवं भगाकारप्रिय हैं। आपको नमस्कार है। आपका कहीं पार नहीं है। आप सदा पर्वतीय वृक्षोंको अधिक पसन्द करते हैं। आपको नमस्कार है। यज्ञोंके अधिपतिरूपमें आपको नमस्कार है। आप भूत एवं प्रस्तुत (वर्तमान)-रूप हैं। आपको नमस्कार है। आप यज्ञवाहक, जितेन्द्रिय, सत्यस्वरूप, भग, तट, तटपर होने योग्य तथा तटिनीपति (समुद्र) हैं। आपको नमस्कार है। आप अन्नदाता, अन्नपति और अन्नके भोगी हैं। आपको नमस्कार है। आपके सहस्रों मस्तक और सहस्रों चरण हैं। आप सहस्रों शूल उठाये रहनेवाले और सहस्रों नेत्रोंवाले हैं। आपको नमस्कार है। आपका वर्ण उदयकालीन सूर्यके समान लाल है। आप बालकरूप धारण करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आप बालसूर्यस्वरूप हैं और काल आपका खिलौना है। आपको नमस्कार है। आप शुद्ध, बुद्ध, क्षोभण तथा क्षयरूप हैं। आपको नमस्कार है।*
* नमो होमाय मन्त्राय शुक्लध्वजपताकिने। नमोऽनम्याय नम्याय नमः किलकिलाय च॥
नमस्त्वां शयमानाय शयितायोत्थिताय च। स्थिताय धावमानाय कुब्जाय कुटिलाय च॥
नमो नर्तनशीलाय मुखवादित्रकारिणे। बाधापहाय लुब्धाय गीतवादित्रकारिणे॥
नमो ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय बलप्रमथनाय च। उग्राय च नमो नित्यं नमश्च दशबाहवे॥
नमः कपालहस्ताय सितभस्मप्रियाय च। विभीषणाय भीमाय भीष्मव्रतधराय च॥
नानाविकृतवक्त्राय खड्गजिह्वोग्रदंष्ट्रिणे। पक्षमासलवार्धाय तुम्बीवीणाप्रियाय च॥
अघोरघोररूपाय घोराघोरतराय च। नमः शिवाय शान्ताय नमः शान्ततमाय च॥
नमो बुद्धाय शुद्धाय संविभागप्रियाय च। पवनाय पतङ्गाय नमः सांख्यपराय च॥
नमश्चण्डैकघण्टाय घण्टाजल्पाय घण्टिने। सहस्रशतघण्टाय घण्टामालाप्रियाय च॥
९२ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
आपके केश गङ्गाजीकी तरङ्गोंसे अङ्कित रहते हैं। आप अपने मस्तकके बाल खुले रखते हैं। आप [संध्यादि] छः कर्मोंमें निष्ठा रखनेवाले हैं तथा [सृष्टि आदि] तीन कर्मोंका निरन्तर पालन करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आप वर्णों और आश्रमोंके पृथक्-पृथक् धर्मकी विधिपूर्वक प्रवृत्ति करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आप श्रेष्ठ, ज्येष्ठ तथा पक्षियोंके समान कलकल शब्द करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आपके नेत्र श्वेत, पीले, काले और लाल रंगवाले हैं। आप धर्म, काम, अर्थ, मोक्ष, क्रथ (संहार), क्रथन (संहारकर्ता), सांख्य, सांख्यप्रधान और योगके अधिपति हैं। आपको नमस्कार है। आप रथ-संचारयोग्य सड़कसे रथपर बैठकर चलते हैं। चौराहा आपका मार्ग है। आपको नमस्कार है। आप काला मृगचर्म ओढ़ते और सर्पका यज्ञोपवीत पहनते हैं। ईशान! आप रुद्रसमुदायस्वरूप हैं। हरिकेश (पीले केशवाले)! आपको नमस्कार है। व्यक्ताव्यक्तस्वरूप अम्बिकानाथ! आप त्रिनेत्रधारीको नमस्कार है। काल और कामदेवके मदको इच्छानुसार चूर्ण करनेवाले तथा दुष्टों और उद्दण्डोंका नाश करनेवाले महेश्वर! आपको नमस्कार है। सबके द्वारा निन्दित और सबके संहारक सद्योजात! आपको नमस्कार है। दूसरोंको उन्मत्त बनानेवाले सैकड़ों आवर्तोंसे युक्त शिव! आपके मस्तकके बाल गङ्गाजीके जलसे भीगे रहते हैं। आपको नमस्कार है। चन्द्रार्धसंयुगावर्त और मेघावर्त नामसे पुकारे जानेवाले! आपको नमस्कार है। आप अन्न-दान करनेवाले, अन्नदाताओंके प्रभु, अन्नभोक्ता और रक्षक हैं। आपको नमस्कार है। आप ही प्रलयकालीन अग्नि हैं। देवदेवेश्वर! आप ही जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज—ये चार प्रकारके जीव हैं। चराचर जगत्की सृष्टि और संहार करनेवाले भी आप ही हैं।
विश्वेश्वर! आप ही ब्रह्मा हैं। जलमें स्थित जो ब्रह्म है, उसे आपका ही स्वरूप बतलाते हैं। आप ही सबकी परम योनि हैं। चन्द्रमा और ज्योतिके भंडार भी आप ही हैं। ब्रह्मवादी महर्षि आपको ही ऋक्, साम तथा ॐकार कहते हैं। सामगान करनेवाले ब्रह्मवेत्ता तथा श्रेष्ठ देवता ‘हायि हायि हरे हायि हुवा हाव’ आदि साम-ऋचाओंका निरन्तर उच्चारण करते हुए आपका ही यशोगान करते हैं। आप ही यजुर्वेद, ऋग्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेदमय हैं। ब्रह्मवेत्ता कल्प और उपनिषदादिके समूहोंसे आपके ही स्वरूपका अध्ययन करते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि जो-जो वर्ण और आश्रम हैं, वह सब आप ही हैं। बिजलीकी चमक, मेघकी गर्जना, संवत्सर, ऋतु, मास, पक्ष, कला, काष्ठा, निमेष, नक्षत्र और युग—सब आपके ही स्वरूप हैं। बैलोंके ककुद (थूहे) और पर्वतोंके शिखर भी आप ही हैं।* आप मृगोंमें मृगराज सिंह, सर्पोंमें तक्षक और शेषनाग,
प्राणदण्डाय नित्याय नमस्ते लोहिताय च। हूंहूंकाराय रुद्राय भगाकारप्रियाय च॥
नमोऽपार्वते नित्यं गिरिवृक्षप्रियाय च। नमो यज्ञाधिपतये भूताय प्रस्तुताय च॥
यज्ञवाहाय दान्ताय तथ्याय च भगाय च। नमस्तटाय तद्याय तटिनीपतये नमः॥
अन्नदायान्नपतये नमस्त्वन्नभुजाय च। नमः सहस्रशीर्षाय सहस्रचरणाय च॥
सहस्रोद्यतशूलाय सहस्रनयनाय च। नमो बालार्कवर्णाय बालरूपधराय च॥
नमो बालार्करूपाय कालक्रीडनकाय च। नमः शुद्धाय बुद्धाय क्षोभणाय क्षयाय च॥
* तरङ्गाङ्कितकेशाय मुक्तकेशाय वै नमः। नमः षट्कर्मनिष्ठाय त्रिकर्मनियताय च॥
वर्णाश्रमाणां विधिवत्पृथग्धर्मप्रवर्तिने। नमः श्रेष्ठाय ज्येष्ठाय नमः कलकलाय च॥
- दक्षद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति * ९३
समुद्रोंमें क्षीरसागर, मन्त्रोंमें प्रणव, शस्त्रोंमें वज्र और व्रतोंमें सत्य हैं। आप ही इच्छा, राग, द्वेष, मोह, शान्ति, क्षमा, व्यवसाय (दृढ़ निश्चय), धैर्य, लोभ, काम, क्रोध, जय और पराजय हैं। आप गदा, बाण, धनुष, खट्वाङ्ग और मुद्गर धारण करनेवाले हैं। आप ही छेदन, भेदन और प्रहार करनेवाले हैं। नेता और मन्ता (आदर देनेवाले) भी आप ही माने गये हैं। [मनूक्त] दस लक्षणोंवाला धर्म, अर्थ एवं काम भी आपके ही स्वरूप हैं। चन्द्रमा, समुद्र, नदी, छोटा तालाब, सरोवर, लता, बेल, घास, अन्न, पशु, मृग और पक्षी भी आप ही हैं। द्रव्य, कर्म और गुणोंका आरम्भ भी आपसे ही होता है। आप ही समयपर फूल और फल देनेवाले हैं। आदि, अन्त, मध्य, गायत्री और ॐकार भी आप ही हैं।
हरा, लाल, काला, नीला, पीला, अरुण, चितकबरा, कपिल, बभ्रु (भूरा), फाखता और श्याम आदि रंग भी आप ही हैं। आप सुवर्णरेता (अग्नि)-के नामसे विख्यात हैं। आप ही सुवर्ण माने गये हैं। सुवर्ण आपका नाम है और सुवर्ण आपको प्रिय है। आप ही इन्द्र, यम, वरुण, कुबेर, वायु, प्रज्वलित अग्नि, स्वर्भानु (राहु) और भानु (सूर्य) हैं। होता (हवन करनेवाले), होत्र (हवन), होम्य (हवनद्वारा पूज्य), हुत (हवि) और प्रभु भी आप ही हैं। त्रिसौपर्ण ऋचा और यजुर्वेदका शतरुद्रिय आपका ही स्वरूप है। आप पवित्रोंमें पवित्र तथा मङ्गलोंके भी मङ्गल हैं। आप ही प्राण, रजोगुण, तमोगुण तथा सत्त्वगुण हैं। प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, उन्मेष-निमेष (आँखका खोलना-मीचना), भूख, प्यास तथा जृम्भा (जँभाई) हैं। आप लोहिताङ्ग (लाल शरीरवाले), दंष्ट्री (दाढ़ोंवाले), महावक्त्र (बड़े मुखवाले), महोदर (बड़े पेटवाले), शुचिरोमा (पवित्र रोयेंवाले), हरिच्छ्मश्रु (पीली दाढ़ी-मूँछवाले), ऊर्ध्वकेश (ऊपर उठे हुए केशवाले) तथा चलाचल (स्थावर-जङ्गम) हैं। गीत, वाद्य और नृत्य आपके ही अङ्ग हैं। गाना-बजाना आपको बहुत प्रिय है। आप ही मत्स्य, उसे जीवन देनेवाले जल और उसे फँसानेवाले जाल हैं। आपको कोई जीत नहीं सकता। आप
श्वेतपिङ्गलनेत्राय कृष्णरक्तेक्षणाय च। धर्मकामार्थमोक्षाय क्रथाय क्रथनाय च॥
सांख्याय सांख्यमुख्याय योगाधिपतये नमः। नमो रथ्याधिरथ्याय चतुष्पथपथाय च॥
कृष्णाजिनोत्तरीयाय व्यालयज्ञोपवीतिने। ईशान रुद्रसंघात हरिकेश नमोऽस्तु ते॥
त्र्यम्बकायाम्बिकानाथ व्यक्ताव्यक्त नमोऽस्तु ते। कालकामदकामघ्न दुष्टोद्वृत्तनिषूदन॥
सर्वगर्हित सर्वघ्न सद्योजात नमोऽस्तु ते। उन्मादनशतावर्त गङ्गातोयार्द्रमूर्धज॥
चन्द्रार्धसंयुगावर्त मेघावर्त नमोऽस्तु ते। नमोऽन्नदानकर्त्रे च अन्नदप्रभवे नमः॥
अन्नभोक्त्रे च गोप्त्रे च त्वमेव प्रलयानल। जरायुजाण्डजाश्चैव स्वेदजोद्भिज्ज एव च॥
त्वमेव देवदेवेश भूतग्रामश्चतुर्विधः। चराचरस्य स्रष्टा त्वं प्रतिहर्ता त्वमेव च॥
त्वमेव ब्रह्मा विश्वेश अप्सु ब्रह्म वदन्ति ते। सर्वस्य परमा योनिः सुधांशो ज्योतिषां निधिः॥
ऋक्सामानि तथोङ्कारमाहुस्त्वां ब्रह्मवादिनः। हायि हायि हरे हायि हुवा हावेति वासकृत्॥
गायन्ति त्वां सुरश्रेष्ठाः सामगा ब्रह्मवादिनः। यजुर्मय ऋङ्मयश्च सामाथर्वयुतस्तथा॥
पठ्यसे ब्रह्मविद्भिस्त्वं कल्पोपनिषदां गणैः। ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा वर्णाश्रमाश्च ये॥
त्वमेवाश्रमसंघाश्च विद्युत्स्तनितमेव च। संवत्सरस्त्वमृतवो मासा मासार्धमेव च॥
कला काष्ठा निमेषाश्च नक्षत्राणि युगानि च। वृषाणां ककुदं त्वं हि गिरीणां शिखराणि च॥
९४ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
जलव्याल (पानीमें रहनेवाले साँप) और कुटीचर (एकान्तवासी गृहस्थ) हैं। आप ही विकाल (विपरीत काल), सुकाल, दुष्काल तथा कालनाशक हैं। मृत्यु, अक्षय एवं अन्त भी आप ही हैं। आप क्षमा, माया एवं किरणोंका प्रसार करनेवाले हैं।
आप संवर्त (प्रलयकाल), वर्तक (नित्य विद्यमान), संवर्तक (प्रलयकालीन) और बलाहक (मेघ) हैं। आप घण्टा धारण करनेके कारण घण्टाकी, घण्टकी और घण्टी कहलाते हैं। मस्तकपर चोटी धारण करते हैं। खारे पानीका समुद्र आपका ही स्वरूप है।* आप ब्रह्मा हैं। आपके मुखमें कालाग्निका निवास है। दण्ड धारण करनेवाले, सिर मुँड़ाये रहनेवाले तथा त्रिदण्ड धारण करनेवाले यति आपके ही स्वरूप हैं। चारों युग, चारों वेद, चार प्रकारके होता और चौराहा आप ही हैं। चारों आश्रमोंके नेता और चारों वर्णोंकी उत्पत्ति करनेवाले भी आप ही हैं। क्षर (विनाशी), अक्षर (अविनाशी), प्रिय, धूर्त, गणोंद्वारा गणनीय एवं गणपति भी आप ही हैं।
आप लाल रंगकी माला और वस्त्र धारण करते हैं। पर्वत एवं वाणीके स्वामी हैं। पार्वतीजीके प्रियतम हैं। शिल्पकारोंके स्वामी, शिल्पियोंमें श्रेष्ठ तथा समस्त शिल्पकारोंके प्रवर्तक हैं। आपने ही भगके नेत्रोंका विनाश किया है। आप अत्यन्त क्रोधी हैं। पूषाके दाँत भी आपने ही तोड़े हैं। स्वाहा, स्वधा, वषट्कार और नमस्कार—सब आप ही हैं। आपको नमस्कार है। आपका व्रत गूढ़ रहता है। आप स्वयं भी गूढ़ हैं तथा गूढ़ व्रतका आचरण करनेवाले महापुरुष सदा आपकी सेवामें रहते हैं। आप ही तरने और तारनेवाले हैं। सब भूतोंमें आप ही संचालकरूपसे स्थित हैं। धाता (धारण करनेवाले), विधाता (विधान करनेवाले), संधाता (जोड़नेवाले), निधाता (बीज डालनेवाले), धारण, धर, तप, ब्रह्म, सत्य, ब्रह्मचर्य तथा आर्जव (सरलता) आपके ही नाम हैं। आप सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा, सब भूतोंको उत्पन्न करनेवाले, भूतस्वरूप, भूत, भविष्य तथा वर्तमानके उद्भावक, भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक,
* सिंहो मृगाणां च पतिस्तक्षकोऽनन्तभोगिनाम्। क्षीरोदो ह्युदधीनां च मन्त्राणां प्रणवस्तथा॥
वज्रं प्रहरणानां च व्रतानां सत्यमेव च। त्वमेवेच्छा च द्वेषश्च रागो मोहः शमः क्षमा॥
व्यवसायो धृतिर्लोभः कामक्रोधौ जयाजयौ। त्वं गदी त्वं शरी चापी खट्वाङ्गी मुद्गरी तथा॥
छेत्ता भेत्ता प्रहर्ता च नेता मन्तासि नो मतः। दशलक्षणसंयुक्तो धर्मोऽर्थः काम एव च॥
इन्दुः समुद्रः सरितः पल्वलानि सरांसि च। लतावल्ल्यस्तृणौषध्यः पशवो मृगपक्षिणः॥
द्रव्यकर्मगुणारम्भः कालपुष्पफलप्रदः। आदिश्चान्तश्च मध्यश्च गायत्र्योङ्कार एव च॥
हरितो लोहितः कृष्णो नीलः पीतस्तथारुणः। कद्रुश्च कपिलो बभ्रुः कपोतो मेचकस्तथा॥
सुवर्णरेता विख्यातः सुवर्णश्चाप्यथो मतः। सुवर्णनामा च तथा सुवर्णप्रिय एव च॥
त्वमिन्द्रश्च यमश्चैव वरुणो धनदोऽनिलः। उत्फुल्लश्चित्रभानुश्च स्वर्भानुर्भानुरेव च॥
होत्रं होता च होम्यं च हुतं चैव तथा प्रभुः। त्रिसौपर्णस्तथा ब्रह्मन् यजुषां शतरुद्रियम्॥
पवित्रं च पवित्राणां मङ्गलानां च मङ्गलम्। प्राणश्च त्वं रजश्च त्वं तमः सत्त्वयुतस्तथा॥
प्राणोऽपानः समानश्च उदानो व्यान एव च। उन्मेषश्च निमेषश्च क्षुत्तृड् जृम्भा तथैव च॥
लोहिताङ्गश्च दंष्ट्री च महावक्त्रो महोदरः। शुचिरोमा हरिच्छ्मश्रुरूध्वकेशश्चलाचलः॥
गीतवादित्रनृत्याङ्गो गीतवादनकप्रियः। मत्स्यो जालो जलोऽज्ज्यो जलव्यालः कुटीचरः॥
विकालश्च सुकालश्च दुष्कालः कालनाशनः। मृत्युश्चैवाक्षयोऽन्तश्च क्षमा माया करोत्करः॥
संवर्तो वर्तकश्चैव संवर्तकबलाहकौ। घण्टाकी घण्टकी घण्टी चूडालो लवणोदधिः॥
* दक्षद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति * ९५
भूत, अग्नि और महेश्वर हैं। ब्रह्मावर्त, सुरावर्त और कामावर्त आपके ही नाम हैं। आपको नमस्कार है। आप कामदेवके विग्रहको दग्ध करनेवाले हैं। कर्णिकार (कनेर) पुष्पोंकी माला आपको अधिक प्रिय है। आप गौओंके नेता, गोप्रचारक (इन्द्रियोंके संचालक) तथा गौओंके स्वामी नन्दीपर सवारी करनेवाले हैं।
तीनों लोकोंकी रक्षा आपके ही हाथोंमें है। गोविन्द (गोरक्षक), गोपालक और गौओंके मार्ग भी आप ही हैं। आपका मुख पूर्ण चन्द्रके समान आह्लादक है। आप सुन्दर मुखवाले हैं। जिनका मुख सुन्दर नहीं है, जो मुखसे रहित हैं, जिनके चार या अनेक मुख हैं तथा जो सदा युद्धमें सम्मुख डटे रहते हैं, वे सब भी आपके ही स्वरूप हैं। आप हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा), शकुनि (वाज), धनद (धन देनेवाले), धनके स्वामी, विराट्, अधर्मका नाश करनेवाले, महादक्ष, दण्डधारी तथा युद्धके प्रेमी हैं। खड़े रहनेवाले, स्थिर, स्थाणु, निष्कम्प, अत्यन्त निश्चल, दुर्वारण (कठिनतासे निवारण किये जाने योग्य), दुर्विषह (असह्य), दुस्सह और दुरतिक्रम (दुर्लङ्घ्य) हैं। आपको धारण करना या वशमें लाना कठिन है। आप नित्य दुर्दम्य (कठिनतासे दमन करने योग्य), विजय एवं जय हैं। आप शश (खरगोश)-रूप हैं। चन्द्रमा आपके नेत्र हैं। आप एक ही साथ शीत और उष्ण दोनों ही धारण करते हैं। क्षुधा, तृषा, बुढ़ापा, आधि (मानसिक पीड़ा) और व्याधि भी आप ही हैं। व्याधिके नाशक और पालक भी आप ही हैं। आप सहन करने योग्य, यज्ञरूपी मृगके मारनेवाले व्याध, व्याधियोंके आकर (भंडार) तथा अकर (कुछ भी न करनेवाले) हैं। आप शिखण्डी (मोरपंखधारी), पुण्डरीक (कमलरूप) तथा पुण्डरीकलोचन हैं। दण्डधृक् १, चक्रदण्ड२ तथा रौद्रभागाविनाशन३— ये सब आपके ही नाम हैं।* आप विष, अमृत, देवपेय, दुग्ध, सोम, मधु, जल तथा सब कुछ पान करनेवाले हैं। बल और अबल सब आप ही हैं।
आप धर्ममय वृषभके शरीरपर सवार होने
१. दण्डधारी, २. चक्रद्वारा दण्ड देनेवाले, ३. रुद्रके भागका नाश न होने देनेवाले।
* ब्रह्मा कालाग्निवक्त्रश्च दण्डो मुण्डस्त्रिदण्डधृक्। चतुर्युगश्चतुर्वेदश्चतुर्होत्रश्चतुष्पथः ॥
चातुराश्रम्यनेता च चातुर्वर्ण्यकरश्च ह। क्षराक्षरः प्रियो धूर्तो गणैर्गण्यो गणाधिपः ॥
रक्तमाल्याम्बरधरो गिरीशो गिरिजाप्रियः। शिल्पीशः शिल्पिनः श्रेष्ठः सर्वशिल्पप्रवर्तकः ॥
भगनेत्रान्तकश्चण्डः पूष्णो दन्तविनाशनः। स्वाहा स्वधा वषट्कारो नमस्कार नमोऽस्तु ते ॥
गूढव्रतश्च गूढश्च गूढव्रतनिषेवितः। तरणस्तारणश्चैव सर्वभूतेषु तारणः॥
धाता विधाता संधाता निधाता धारणो धरः। तपो ब्रह्म च सत्यं च ब्रह्मचर्यं तथाऽऽर्जवम् ॥
भूतात्मा भूतकृद्भूतो भूतभव्यभवोद्भवः। भूर्भुवः स्वरितश्चैव भूतो ह्यग्निर्महेश्वरः ॥
ब्रह्मावर्तः सुरावर्तः कामावर्त नमोऽस्तु ते। कामबिम्बविनिर्हन्ता कर्णिकारस्त्रजप्रियः ॥
गोनेता गोप्रचारश्च गोवृषेश्वरवाहनः। त्रैलोक्यगोप्ता गोविन्दो गोप्ता गोमार्ग एव च ॥
अखण्डचन्द्राभिमुखः सुमुखो दुर्मुखोऽमुखः। चतुर्मुखो बहुमुखो रणेष्वभिमुखः सदा ॥
हिरण्यगर्भः शकुनिर्धनदोऽर्थपतिर्विराट्। अधर्महा महादक्षो दण्डधारो रणप्रियः ॥
तिष्ठन् स्थिरश्च स्थाणुश्च निष्कम्पश्च सुनिश्चलः। दुर्वारणो दुर्विषहो दुःसहो दुरतिक्रमः॥
दुर्धरो दुर्वशो नित्यो दुर्दर्पो विजयो जयः। शशः शशाङ्कनयनः शीतोष्णः क्षुत्तृषा जरा॥
आधयो व्याधयश्चैव व्याधिहा व्याधिपश्च यः। सह्यो यज्ञमृगव्याधो व्याधीनामाकरोऽकरः॥
शिखण्डी पुण्डरीकक्ष पुण्डरीकावलोकनः। दण्डधृक् चक्रदण्डश्च रौद्रभागाविनाशनः॥
९६
* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
योग्य हैं, वृषभस्वरूप हैं। आपके नेत्र वृषभके नेत्रोंके समान हैं। आप वृषभके नामसे लोकमें विख्यात हैं। सम्पूर्ण लोक आपका संस्कार (पूजन और अभिषेक) करता है। शिव! चन्द्रमा और सूर्य आपके नेत्र, ब्रह्माजी हृदय, अग्निष्टोम शरीर और धर्मकर्म शृङ्गार हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा प्राचीन ऋषि भी आपके माहात्म्यको यथार्थरूपसे जाननेमें समर्थ नहीं हैं। भगवन्! आपकी कल्याणमयी एवं सूक्ष्म जो मूर्तियाँ हैं, उनका मुझे दर्शन हो। आप उन मूर्तियोंके द्वारा मेरी सब ओरसे रक्षा करें—ठीक वैसे ही, जैसे पिता अपने औरस पुत्रकी रक्षा करता है। अनघ! आपको नमस्कार है। मैं रक्षा करने योग्य हूँ। आप मेरी रक्षा करें। आप भक्तोंपर कृपा करनेवाले भगवान् हैं और मैं सदा ही आपमें भक्ति रखता हूँ।
जो खोटी दृष्टि रखनेवाले अनेक सहस्र पुरुषोंको अपनी मायासे आवृत करके अकेले ही समुद्रके भीतर निवास करते हैं, वे भगवान् प्रतिदिन मेरे रक्षक हों। निद्रासे रहित, प्राणोंको वशमें रखनेवाले, सत्त्वगुणमें स्थित, समदर्शी योगिजन योगाभ्यास करते समय जिनके ज्योतिर्मय स्वरूपका दर्शन करते हैं, उन योगात्माको नमस्कार है। जो प्रलयकाल उपस्थित होनेपर सम्पूर्ण भूतोंको अपना ग्रास बनाकर जलके भीतर शयन करते हैं, उन भगवान् जलशायीकी मैं शरण लेता हूँ। जो रात्रिमें राहुके मुखमें प्रवेश करके चन्द्रमाका अमृत पीते हैं और केतु बनकर सूर्यको भी ग्रस लेते हैं तथा जो अग्नि और सोमस्वरूप हैं, उन भगवान्की मैं शरण लेता हूँ। समस्त देहधारियोंकी देहोंमें स्थित, अँगूठेके बराबर आकारवाले जितने भी जीवात्मा हैं, वे सब आपके ही स्वरूप हैं; अतः वे सदा मेरी रक्षा करें और सदा मुझे तृप्त बनाये रखें। जो अभी उत्पन्न नहीं हुए हैं तथा जो जलके भीतर स्थित हैं, उन सब गर्भोको जिनसे स्वाहा (पुष्टि) प्राप्त होती है तथा जिनकी कृपासे उन्हें स्वधा (स्वादिष्ट रस)-का आस्वादन सुलभ होता है, जो शरीरके भीतर रहकर स्वयं नहीं रोते और प्राणियोंको रुलाते हैं, जो सबको हर्ष प्रदान करते, किंतु स्वयं हर्षका अनुभव नहीं करते, उन सबको शिवरूपमें सदा-सर्वदा नमस्कार है।
जो समुद्र, नदी, दुर्गम स्थान, पर्वत, गुफा, वृक्षोंकी जड़, गोशाला, अगम्य पथ, गहन वन, चौराहा, सड़क, सभा, गजशाला, अश्वशाला, रथशाला, प्राचीन वाटिका, पुराने घर, पाँचों भूत, दिशा, विदिशा, इन्द्र और सूर्यके मध्य, चन्द्रमा और सूर्यकी किरण तथा रसातलमें जो शिवस्वरूप जीव रहते हैं और उन स्थानोंसे परे जिनकी स्थिति है, उन सबको सब प्रकारसे नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है।* भगवन्! आप सर्वस्वरूप, सर्वव्यापी देवता, सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी, सबकी
* विषपोऽमृतपश्चैव सुरापः क्षीरसोमपः। मधुपश्चापपश्चैव सर्वपश्च बलाबलः ॥
वृषाङ्गवाह्यो वृषभस्तथा वृषभलोचनः। वृषभश्चैव विख्यातो लोकानां लोकसंस्कृतः ॥
चन्द्रादित्यौ चक्षुषी ते हृदयं च पितामहः। अग्निष्टोमस्तथा देहो धर्मकर्मप्रसाधितः ॥
न ब्रह्मा न च गोविन्दः पुराणऋषयो न च। माहात्म्यं वेदितुं शक्ता याथातथ्येन ते शिव ॥
शिवा या मूर्तयः सूक्ष्मास्ते मह्यं यान्तु दर्शनम्। ताभिर्मां सर्वतो रक्ष पिता पुत्रमिवौरसम् ॥
रक्ष मां रक्षणीयोऽहं तवानघ नमोऽस्तु ते। भक्तानुकम्पी भगवान् भक्तश्चाहं सदा त्वयि ॥
यः सहस्राण्यनेकानि पुंसामावृत्य दुर्द्दृशाम्। तिष्ठत्येकः समुद्रान्ते स मे गोप्तास्तु नित्यशः ॥
यं विनिद्रा जितश्वासाः सत्त्वस्थाः समदर्शिनः। ज्योतिः पश्यन्ति युञ्जानास्तस्मै योगात्मने नमः ॥
सम्भक्ष्य सर्वभूतानि युगान्ते समुपस्थिते। यः शेते जलमध्यस्थस्तं प्रपद्येऽम्बुशायिनम् ॥
* दक्षद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति * ९७
उत्पत्तिके कारण तथा सम्पूर्ण भूतोंके अन्तरात्मा हैं। इसीलिये आपको पृथक् निमन्त्रित नहीं किया गया। देव! भाँति-भाँतिकी दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा आपका ही यजन किया जाता है। आप ही सबके कर्ता-धर्ता हैं, इसलिये आपको मैंने निमन्त्रित नहीं किया। अथवा देव! आपकी सूक्ष्म—दुर्बोध मायासे मैं मोहित था। इसी कारण आपको निमन्त्रण नहीं दिया। देवेश्वर! मुझपर प्रसन्न होइये। आप ही मुझे शरण देनेवाले हैं। आप ही मेरी गति और प्रतिष्ठा हैं, दूसरा कोई नहीं है। ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है।*
इस प्रकार महादेवजीकी स्तुति करके प्रजापति दक्ष चुप हो गये। तब भगवान् शिवने कहा—'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले दक्ष! मैं तुम्हारे इस स्तोत्रसे बहुत प्रसन्न हूँ। अधिक कहनेसे क्या लाभ, तुम्हें मेरा सामीप्य प्राप्त होगा।' यों कहकर देवेश्वर महादेवजी अपनी पत्नी और पार्षदोंके साथ अमित तेजस्वी दक्षकी दृष्टिसे ओझल हो गये। जो मनुष्य दक्षद्वारा किये हुए इस स्तोत्रका श्रवण या कीर्तन करता है, उसका तनिक भी अमङ्गल नहीं होता। उसे दीर्घ आयुकी प्राप्ति होती है। जैसे सम्पूर्ण देवताओंमें भगवान् शिव श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार सब स्तोत्रोंमें यह दक्षनिर्मित स्तोत्र श्रेष्ठ है। जो लोग यश, स्वर्ग, देवताओंका ऐश्वर्य, धन, विजय और विद्या आदिकी अभिलाषा रखते हैं, उन्हें यत्नपूर्वक भक्तिके साथ इस स्तोत्रद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति करनी चाहिये। रोगी, दुःखी, दीन, भय आदिसे ग्रस्त तथा राज-काजमें नियुक्त मनुष्य इस स्तोत्रके प्रभावसे महान् भयसे मुक्त हो जाता है तथा भगवान् शिवसे इस लोकमें सुख पाकर उसी शरीरसे गणोंका स्वामी बन जाता है। यक्ष, पिशाच, नाग और विनायक उस मनुष्यके घरमें विघ्न नहीं डालते, जिसके यहाँ भगवान् शिवकी स्तुति होती है। दक्षद्वारा किये हुए इस स्तोत्रका पाठ करनेवाला मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है और मरनेके बाद देवताओंद्वारा पूजित होता है। इस परम गोपनीय स्तोत्रका श्रवण करके पापयोनिवाले मनुष्य तथा वैश्य, स्त्री एवं शूद्र भी रुद्रलोक प्राप्त करते हैं। जो द्विज प्रत्येक पर्वमें ब्राह्मणोंको सदा इस स्तोत्रका श्रवण कराता है, वह निःसंदेह भगवान् शिवके लोकमें जाता है।
प्रविश्य वदनं राहोर्यः सोमं पिबते निशि। ग्रसत्यर्कं च स्वर्भानुर्भूत्वा सोमाग्निरेव च॥
अङ्गुष्ठमात्राः पुरुषा देहस्थाः सर्वदेहिनाम्। रक्षन्तु ते च मां नित्यं नित्यं चाप्याययन्तु माम्॥
येनाप्युत्पादिता गर्भा अपो भागगताश्च ये। तेषां स्वाहा स्वधा चैव आप्नुवन्ति स्वदन्ति च॥
ये न रोदन्ति देहस्थाः प्राणिनो रोदयन्ति च। हर्षयन्ति न हृष्यन्ति नमस्तेभ्यस्तु नित्यशः॥
ये समुद्रे नदीदुर्गे पर्वतेषु गुहासु च। वृक्षमूलेषु गोष्ठेषु कान्तारगहनेषु च॥
चतुष्पथेषु रथ्यासु चत्वरेषु सभासु च। हस्त्यश्वरथशालासु जीर्णोद्यानालयेषु च॥
ये तु पञ्चसु भूतेषु दिशासु विदिशासु च। इन्द्रार्कयोर्मध्यगता ये च चन्द्रार्करश्मिषु॥
रसातलगता ये च ये च तस्मात्परं गताः। नमस्तेभ्यो नमस्तेभ्यो नमस्तेभ्यस्तु सर्वशः॥
* सर्वस्त्वं सर्वगो देवः सर्वभूतपतिर्भवः। सर्वभूतान्तरात्मा च तेन त्वं न निमन्त्रितः॥
त्वमेव चेज्यसे देव यज्ञैर्विविधदक्षिणैः। त्वमेव कर्ता सर्वस्य तेन त्वं न निमन्त्रितः॥
अथवा मायया देव मोहितः सूक्ष्मया तव। तस्मात्तु कारणाद्वापि त्वं मया न निमन्त्रितः॥
प्रसीद मम देवेश त्वमेव शरणं मम। त्वं गतिस्त्वं प्रतिष्ठा च न चान्योऽस्तीति मे मतिः॥
(४०।३—१००)
२५- एकाम्रकक्षेत्र तथा पुरुषोत्तमक्षेत्रकी महिमा
९८ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
एकाम्रकक्षेत्र तथा पुरुषोत्तमक्षेत्रकी महिमा
लोमहर्षणजी कहते हैं—‘महर्षियो! ब्रह्माजीकी कही हुई पवित्र कथा सुनकर उन महर्षियोंको बड़ी प्रसन्नता हुई। उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया। उन्होंने कहा—‘ब्रह्मन्! अब आप एकाम्रकक्षेत्रका वर्णन कीजिये।’
**ब्रह्माजी बोले—**मुनिवरो! वह क्षेत्र सब पापोंको हरनेवाला, पवित्र एवं परम दुर्लभ है। मैं उसका संक्षेपसे वर्णन करूँगा, सुनो। एकाम्रक नामसे विख्यात क्षेत्र वाराणसीके समान कोटि शिवलिङ्गोंसे युक्त एवं शुभ है। उसमें आठ तीर्थ हैं। पूर्व कल्पमें वहाँ एक आमका वृक्ष था। उसीके नामसे वह एकाम्रकक्षेत्रके रूपमें विख्यात हुआ। वह स्थान हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरा रहता है, वहाँ स्त्रियाँ भी रहती हैं और पुरुष भी। उस क्षेत्रमें विद्वानोंकी अधिकता है, वह धन-धान्यसे सम्पन्न स्थान है। घर और गोपुर वहाँकी शोभा बढ़ाते हैं। वहाँ अनेकों व्यवसायी भरे हुए हैं। भाँति-भाँतिके रत्न उस क्षेत्रकी शोभा बढ़ाते हैं। नगर, अटारी, सड़क और राजहंसोंके समान श्वेत महल आदिके द्वारा उसकी बड़ी शोभा होती है। उसके चारों ओर सफेद चहारदीवारी बनी है। शस्त्रोंद्वारा उस पुरकी रक्षा होती है। अनेकों खाइयोंसे वह क्षेत्र अलङ्कृत है। वहाँ प्रतिदिन उत्सवका आनन्द छाया रहता है। नाना प्रकारके बाजोंकी ध्वनि सुनायी पड़ती है। चहारदीवारी और बगीचोंसे युक्त अनेक दिव्य देवमन्दिर सब ओर उस क्षेत्रकी शोभा बढ़ाते हैं। वहाँके ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र बड़े धार्मिक हैं। वे अपने-अपने धर्मोंमें संलग्न रहते हैं। उस क्षेत्रमें निर्धन, मूर्ख, दूसरोंसे द्वेष रखनेवाले, रोगी, मलिन, नीच, मायावी, रूपहीन, दुराचारी तथा परद्रोही मनुष्य नहीं हैं। वहाँ सर्वत्र सुखपूर्वक सब लोग घूमते-फिरते हैं। वह स्थान सब जीवोंके लिये सुखद है। वहाँ नाना प्रकारके पक्षियोंका कलरव सुनायी पड़ता है। वहाँके उद्यान नन्दनवनके समान एवं सबके सेवन करने योग्य हैं। वहाँके वृक्ष फलोंके भारसे झुके रहते हैं और सभी ऋतुओंमें उनसे फूल झड़ते रहते हैं। दीर्घिका, तड़ाग, पुष्करिणी, वापी तथा अन्यान्य जलाशय सदा कमलवनसे सुशोभित रहते हैं। भाँति-भाँतिके वृक्ष, नाना प्रकारके सुन्दर पुष्प तथा अनेक प्रकारके पवित्र जलाशय सब ओरसे उस स्थानकी शोभा बढ़ाते हैं।
उस क्षेत्रमें साक्षात् भगवान् शङ्कर सब लोकोंका हित करनेके लिये निवास करते हैं। वे भोग और मोक्ष दोनोंके दाता हैं। इस पृथ्वीपर जितने तीर्थ, नदियाँ, सरोवर, पुष्करिणी, तड़ाग, वापी, कूप और सागर हैं, उन सबसे पृथक्-पृथक् जलकी बूँदें संगृहीत करके देवताओंसहित भगवान् शङ्करने उस क्षेत्रमें सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये विन्दुसर नामक तीर्थ स्थापित किया। इसीलिये वह विन्दुसरके नामसे विख्यात है। अगहनके कृष्णपक्षकी अष्टमीको जो वहाँकी यात्रा करता है तथा जो जितेन्द्रिय भावसे विषुवयोगमें श्रद्धाके साथ विधिपूर्वक विन्दुसरोवरमें स्नान करके तिल और जलसे नाम-गोत्रके उच्चारणपूर्वक देवताओं, ऋषियों, मनुष्यों एवं पितरोंका तर्पण करता है, वह अश्वमेध-यज्ञका फल पाता है। जो ग्रहण, विषुवयोग, संक्रान्ति, अयनारम्भ, छियासी युगादि तिथि तथा अन्यान्य शुभ तिथियोंमें वहाँ ब्राह्मणोंको धन आदिका दान करते हैं, वे अन्य तीर्थोंकी अपेक्षा सौगुना फल पाते हैं। जो विन्दुसरोवरके तटपर पितरोंको पिण्डदान देते हैं, वे उन पितरोंकी अक्षय तृप्तिका सम्पादन करते हैं।
स्नानके पश्चात् मौन एवं जितेन्द्रिय भावसे
- एकाग्रकक्षेत्र तथा पुरुषोत्तमक्षेत्रकी महिमा * ९९
भगवान् शङ्करके मन्दिरमें प्रवेश करके उनकी पूजा करे। तीन बार शिवकी प्रदक्षिणा करे। घृत और दुग्ध आदिके द्वारा पवित्रतापूर्वक भगवान् शङ्करको स्नान कराकर उनके सब अङ्गोंमें सुगन्धित चन्दन एवं केसर लगाये। तदनन्तर नाना प्रकारके पवित्र पुष्पों तथा बिल्वपत्र, आक और कमल आदिके द्वारा वैदिक एवं तान्त्रिक मन्त्रोंसे तथा केवल नाममय मूल मन्त्रसे गन्ध, पुष्प, चन्दन, धूप, दीप, नैवेद्य, उपहार, स्तुति, दण्डवत्-प्रणाम, मनोहर गीत-वाद्य, नृत्य, जप, नमस्कार, जय-शब्द तथा प्रदक्षिणा समर्पण करते हुए महादेवजीका पूजन करे। इस प्रकार देवाधिदेवका विधिपूर्वक पूजन करनेवाला पुरुष सब पापोंसे मुक्त हो शिवलोकमें जाता है। जो उत्तम बुद्धिवाले पुरुष वहाँ हर समय महादेवजीका दर्शन करते हैं, वे भी पापमुक्त होकर शिवलोकमें जाते हैं। भगवान् शिवसे पश्चिम, पूर्व, दक्षिण, उत्तर—चारों ओर ढाई-ढाई योजनतक वह क्षेत्र भोग एवं मोक्ष प्रदान करनेवाला है। उस उत्तम क्षेत्रमें भास्करेश्वर नामसे प्रसिद्ध एक शिवलिङ्ग है। जो लोग वहाँ कुण्डमें स्नान करके भगवान् सूर्यद्वारा पूजित त्रिनेत्रधारी देवाधिदेव महादेवका दर्शन करते हैं, वे सब पापोंसे मुक्त हो उत्तम विमानपर बैठकर गन्धर्वोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए शिवलोकमें जाते हैं अथवा योगियोंके घरमें वेद-वेदाङ्गोंके पारंगत, सर्वभूतहितकारी श्रेष्ठ द्विजके रूपमें उत्पन्न होते हैं। उस समय वे मोक्षशास्त्रके तात्पर्यको समझनेमें कुशल और सर्वत्र समबुद्धि होते हैं तथा भगवान् शङ्करसे श्रेष्ठ योग प्राप्त करके भव-बन्धनसे मुक्ति पा जाते हैं। द्विजवरो! स्त्री भी श्रद्धापूर्वक वहाँ भगवान् शिवका पूजन करके पूर्वोक्त फलको प्राप्त कर लेती है! मुनिवरो! भगवान् महेश्वरके अतिरिक्त दूसरा कौन ऐसा है, जो उस उत्तम क्षेत्रके सम्पूर्ण गुणोंका वर्णन कर सके। भगवान् शिवका एकाग्रकक्षेत्र वाराणसीके समान शुभ है। जो वहाँ स्नान करता है, वह निश्चय ही मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
वहाँ और भी अनेक पवित्र तीर्थ एवं मन्दिर हैं। उनका भी ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। समुद्रके उत्तर-तटपर उस प्रदेशमें एक परम गोपनीय मुक्तिदायक क्षेत्र है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। उस परमदुर्लभ क्षेत्रका विस्तार दस योजन है। वहाँकी भूमिपर सब ओर बालू बिछी हुई है। वह परम पवित्र एवं सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है। अशोक, अर्जुन, पुंनाग, मौलसिरी, सरल, कटहल, नारियल, शाखू, ताड़, कैथ, चम्पा, कनेर, आम, बेल, गुलाब, कदम्ब, कचनार, लकुच, नागकेसर, पीपल, छितवन, महुआ, सहिजन, शीशम, आँवला, नीम तथा बहेड़ा आदिके वृक्षोंसे उसकी बड़ी शोभा होती है। वहाँ पक्षियोंके मुखसे निकले हुए अत्यन्त मधुर कलरव कानों और मनको बहुत सुख देते हैं। ऊपर बताये हुए वृक्षोंके अतिरिक्त अन्यान्य मनोहर पुष्पों, लताओं और भाँति-भाँतिके जलाशयोंसे वह क्षेत्र सुशोभित है। अनेकानेक ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासी तथा स्वधर्मपरायण ब्राह्मणादि वर्णोंसे उस क्षेत्रकी शोभा होती है। वह हृष्ट-पुष्ट मनुष्यों तथा अनेक नर-नारियोंसे भरा हुआ है। वह सम्पूर्ण विद्याओंका स्थान तथा समस्त धर्मों एवं गुणोंका आकर है। इस प्रकार वह परम दुर्लभ क्षेत्र सर्वगुणसम्पन्न है। मुनिवरो! वहाँ भगवान् श्रीकृष्ण पुरुषोत्तम नामसे विख्यात हैं। उत्कल प्रान्तकी सीमा समुद्रकी ओर जहाँतक बतायी गयी है, वह सब स्थान श्रीकृष्णके प्रसादसे अत्यन्त पवित्र है। उस देशमें विश्वात्मा भगवान् पुरुषोत्तम निवास करते हैं। वे जगद्व्यापी जगन्नाथ हैं। उन्हींमें सब कुछ प्रतिष्ठित है। मैं, भगवान् शिव, इन्द्र तथा अग्नि आदि देवता सदा
२६- अवन्तीके महाराज इन्द्रद्युम्नका पुरुषोत्तमक्षेत्रमें जाना तथा वहाँकी इन्द्रनीलमयी प्रतिमाके गुप्त होनेकी कथा
१०० * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
उस देशमें निवास करते हैं। गन्धर्व, अप्सरा, पितर, देवता, मनुष्य, यक्ष, विद्याधर, सिद्ध, उत्तम व्रतवाले मुनि, बालखिल्य आदि ऋषि, कश्यप आदि प्रजापति, गरुड़, किंनर, नाग, अन्यान्य स्वर्गवासी, अङ्गोंसहित चारों वेद, नाना प्रकारके शास्त्र, इतिहास-पुराण, उत्तम दक्षिणावाले यज्ञ, अनेक पवित्र नदियाँ, पुण्यतीर्थ, मन्दिर, समुद्र तथा पर्वत—सब उस देशमें स्थित हैं। इस प्रकार देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंद्वारा सेवित उस पावन प्रदेशमें, जहाँ सब प्रकारके उपभोग सुलभ हैं, निवास करना किसको रुचिकर नहीं प्रतीत होगा। भला, उसके सिवा कौन देश श्रेष्ठ है, उससे बढ़कर दूसरा कौन स्थान है, जहाँ मुक्तिदाता भगवान् पुरुषोत्तम स्वयं ही विराजमान हैं। वे
मनुष्य, जो उत्कलदेशमें निवास करते हैं, देवताओंके समान और धन्य हैं। जो समस्त तीर्थोंके राजा समुद्रमें स्नान करके भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गमें बसते हैं, यमलोकमें नहीं जाते। जो उत्कलदेशीय पवित्र पुरुषोत्तमक्षेत्रमें निवास करते हैं, उन श्रेष्ठ बुद्धिवाले मनुष्योंका जीवन सफल है; क्योंकि वे देवश्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्णके मुखकमलका दर्शन करते हैं। भगवान्का मुखकमल तीनों लोकोंको आनन्द प्रदान करनेवाला है। उनके नेत्र प्रसन्न एवं विशाल हैं। उनकी भौंहें, केश तथा मुकुट सुन्दर हैं, कानोंमें मनोहर कुण्डल शोभा पाते हैं। उनकी मुसकान मनोहर और दन्तपङ्क्ति सुन्दर है। वे सुन्दर नाक, सुन्दर कपोल, सुन्दर ललाट और उत्तम लक्षणोंवाले हैं।
अवन्तीके महाराज इन्द्रद्युम्नका पुरुषोत्तमक्षेत्रमें जाना तथा वहाँकी इन्द्रनीलमयी प्रतिमाके गुप्त होनेकी कथा
ब्रह्माजी कहते हैं— प्राचीन सत्ययुगकी बात है, इन्द्रद्युम्न नामसे विख्यात एक राजा थे, जो इन्द्रके समान पराक्रमी थे। वे सत्यवादी, पवित्र, दक्ष, सर्वशास्त्रविशारद, रूपवान्, सौभाग्यशाली, शूरवीर, दानी, उपभोगमें समर्थ, प्रिय वचन बोलनेवाले, समस्त यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले, ब्राह्मणभक्त, सत्यप्रतिज्ञ, धनुर्वेद और वेद-शास्त्रमें निपुण, विद्वान् तथा पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति सब स्त्री-पुरुषोंके प्रेमपात्र थे। सूर्यकी भाँति उनकी ओर देखना कठिन था। वे शत्रुसमुदायके लिये भयंकर, विष्णुभक्त, सत्त्वगुणसम्पन्न, क्रोधको जीतनेवाले, जितेन्द्रिय, अध्यात्मविद्याके प्रेमी, मुमुक्षु और धर्मपरायण थे। इस प्रकार वे सर्वगुणसम्पन्न राजा इन्द्रद्युम्न समूची पृथ्वीका पालन करते थे। एक समय उनके मनमें भगवान् श्रीहरिकी आराधनाका विचार उत्पन्न हुआ। वे सोचने लगे,
‘मैं किस क्षेत्रमें, किस तीर्थमें, किस नदीके तटपर अथवा किस आश्रममें देवाधिदेव भगवान् जनार्दनकी आराधना करूँ!’ इस चिन्तामें पड़कर उन्होंने मन-ही-मन समस्त पृथ्वीपर दृष्टिपात किया, समस्त तीर्थों, क्षेत्रों और नगरोंकी ओर देखा; परंतु सबको छोड़कर वे विश्वविख्यात मोक्षदायक पुरुषोत्तमक्षेत्रमें गये। वहाँ उन्होंने बहुत ऊँचा मन्दिर बनवाकर उसमें बलराम, श्रीकृष्ण और सुभद्राकी स्थापना की तथा विधिपूर्वक स्नान, दान, तप, होम और देव-दर्शनरूप पञ्चतीर्थोंका अनुष्ठान करके प्रतिदिन भक्तिपूर्वक श्रीपुरुषोत्तमकी आराधना की और उन्हींकी कृपासे मोक्ष प्राप्त किया।
मुनियोंने पूछा— सुरश्रेष्ठ! राजा इन्द्रद्युम्न मुक्तिदायक पुरुषोत्तमक्षेत्रमें किसलिये गये? और वहाँ जाकर उन्होंने वह त्रिभुवनविख्यात प्रासाद किस प्रकार बनवाया? प्रजापते! उन्होंने श्रीकृष्ण, बलराम
* अवन्तीके महाराज इन्द्रद्युम्नका पुरुषोत्तमक्षेत्रमें जाना * १०१
और सुभद्राकी स्थापना कैसे की ? ये सब बातें विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा करें।
ब्रह्माजी बोले— द्विजवरो ! तुम लोग जो प्राचीन वृत्तान्त पूछ रहे हो, वह सब पापोंको दूर करनेवाला, पवित्र, भोग और मोक्ष देनेवाला तथा शुभ है। इस प्रश्नके लिये तुम्हें साधुवाद देता हूँ। तुम जितेन्द्रिय एवं विशुद्धचित्त होकर सुनो। मैं सत्ययुगके राजा इन्द्रद्युम्नका चरित्र बतलाता हूँ। इस पृथ्वीपर मालवामें अवन्ती (उज्जैन) नामकी नगरी विख्यात है। वही राजा इन्द्रद्युम्नकी राजधानी थी। अवन्ती इस पृथ्वीके मुकुटके समान थी। वहाँ हृष्ट-पुष्ट मनुष्य भरे थे। उसकी चहारदीवारी और दरवाजे दृढ़ बने हुए थे। दरवाजोंपर मजबूत किंवाड़ और सुदृढ़ यन्त्र लगे थे। नगरके चारों ओर अनेकों खाइयाँ बनी हुई थीं। नगरमें बहुत-से व्यापारी बसते थे। नाना प्रकारके बर्तनोंकी अच्छी बिक्री होती थी। रथ चलने लायक सड़कें और बाजार सुन्दर थे। चौराहोंसे चारों ओर जानेके लिये मार्गोंका अच्छी प्रकार विभाग हुआ था। अनेकों घर और गोपुर बने हुए थे। बहुत-सी गलियाँ उस नगरकी शोभा बढ़ाती थीं। राजहंसोंके समान श्वेत और मनोहर महल लाखोंकी संख्यामें बने हुए थे, जो उस पुरीकी श्रीवृद्धि कर रहे थे। अनेकों यज्ञसम्बन्धी उत्सवोंके कारण उस नगरमें आनन्द छाया रहता था। गाने और बजानेकी ध्वनि गूँजती रहती थी। भाँति-भाँतिकी ध्वजा और पताकाओंसे वह पुरी सुशोभित थी। हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंकी सेना सब ओर व्याप्त थी। अनेक प्रकारके सैनिक वहाँ भरे थे। अनेकों जनपदोंके लोग वहाँ बसे हुए थे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा विद्वान् पुरुषोंसे वह नगरी सुशोभित थी। वहाँ मलिन, मूर्ख, निर्धन, रोगी, अङ्गहीन तथा जुवारी मनुष्योंका अभाव था। वहाँके स्त्री-पुरुष सदा प्रसन्नचित्त दिखायी देते थे। वे सब रत्नोंके दाता तथा सब प्रकारकी सम्पत्तियोंको भोगनेवाले थे। वहाँकी कुलवती स्त्रियाँ सब गुणोंमें आचार्य थीं। वे पतिव्रता, सौभाग्यशालिनी तथा सम्पूर्ण गुणोंसे सम्पन्न थीं। उस नगरमें अनेकों वन, उपवन, पवित्र एवं मनोरम उद्यान, भाँति-भाँतिके पुष्पोंसे सुशोभित दिव्य देवमन्दिर, शाल, ताल, तमाल, बकुल, नागकेसर, पीपल, कनेर, चन्दन, अगर, चम्पा तथा अन्यान्य मनोहर वृक्ष, लता-गुल्म आदि शोभा पाते थे। अनेकों जलाशय उस महापुरीकी शोभा बढ़ा रहे थे। अवन्तीपुरीमें त्रिनेत्रधारी त्रिपुरशत्रु भगवान् शिव महाकाल नामसे प्रसिद्ध होकर रहते हैं। वे समस्त कामनाओंके पूर्ण करनेवाले हैं। वहाँ एक शिवकुण्ड है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। उसमें विधिपूर्वक स्नान करके देवताओं, ऋषियों और पितरोंका तर्पण करे। फिर शिवालयमें जाकर भगवान् शिवकी तीन बार प्रदक्षिणा करे। तत्पश्चात् स्नान, पुष्प, गन्ध, धूप और दीप आदिके द्वारा भक्तिपूर्वक महाकालका विधिवत् पूजन करे। ऐसा करनेवाला मनुष्य एक हजार अश्वमेध-यज्ञोंका फल पाता है। वह सब पापोंसे मुक्त हो समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले विमानोंद्वारा भगवान् शिवके परम धाममें जाता है।
अवन्तीमें शिप्रा नामसे प्रसिद्ध पवित्र नदी है। उसमें विधिपूर्वक स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता और श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो स्वर्गलोकमें नाना प्रकारके भोग भोगता है। वहीं देवाधिदेव भगवान् जनार्दन भी निवास करते हैं, जो गोविन्दस्वामीके नामसे प्रसिद्ध हैं। वे भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं। उनका दर्शन करके मनुष्य अपनी इक्कीस पीढ़ियोंसहित मुक्त हो जाता है। उनके सिवा वहीं विक्रमस्वामीके नामसे भी भगवान् विष्णुका निवास