भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५०१


कलावतीकी बात सुनकर विधाता विस्मित हो मन-ही-मन भय मानते हुए अमृतके समान मधुर एवं हितकर वचन बोले।

ब्रह्माजीने कहा— बेटी! मैं तुम्हारे स्वामीको तुम्हारे बिना ही मुक्ति नहीं दूँगा। पतिव्रते! तुम अपने पतिके साथ कुछ वर्षोंतक स्वर्गमें रहकर सुख भोगो। फिर तुम दोनोंका भारतवर्षमें जन्म होगा। वहाँ जब साक्षात् सती राधिका तुम्हारी पुत्री होंगी तब तुम दोनों जीवन्मुक्त हो जाओगे और श्रीराधाके साथ ही गोलोकमें पधारोगे। नृपश्रेष्ठ! तुम कुछ कालतक अपनी स्त्रीके साथ स्वर्गीय सुखका उपभोग करो। यह स्त्री साध्वी एवं सत्त्वगुणसे युक्त है। तुम मुझे शाप न देना; क्योंकि श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंमें चित्त लगाये रखनेवाले जीवन्मुक्त संत समदर्शी होते हैं। उनके मनमें श्रीहरिके दुर्लभ दास्यभावको पानेकी इच्छा रहती है। वे निर्वाण नहीं चाहते।

ऐसा कहकर उन दोनोंको वर दे विधाता उनके सामने खड़े रहे। वे दोनों उन्हें प्रणाम करके स्वर्गकी ओर चल दिये। फिर ब्रह्माजी भी अपने धामको चले गये। तदनन्तर वे दोनों दम्पति समयानुसार स्वर्गीय भोगोंका उपभोग करके भारतवर्षमें आये, जो परम पुण्यदायक तथा दिव्य स्थान है। ब्रह्मा आदि देवता भी वहाँ जन्म लेनेकी इच्छा करते हैं। सुचन्द्रने गोकुलमें जन्म लिया और वहाँ उनका नाम वृषभानु हुआ। वे सुरभानुके वीर्य और पद्मावतीके गर्भसे उत्पन्न हुए। उन्हें पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण था। वे श्रीहरिके अंश थे और जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमा बढ़ते हैं, उसी प्रकार व्रजधाममें प्रतिदिन बढ़ने लगे। धीरे-धीरे वे व्रजके अधिपति हुए। उन्हें सर्वज्ञ और महायोगी माना गया है। उनका चित्त सदा श्रीहरिके चरणारविन्दोंके चिन्तनमें ही लगा रहता था। वे उदार, रूपवान्, गुणवान् और श्रेष्ठ बुद्धिवाले थे।

कलावती कान्यकुब्ज देशमें उत्पन्न हुई। वह भी अयोनिजा, पूर्व-जन्मकी बातोंको याद रखनेवाली महासाध्वी, सुन्दरी एवं कमलाकी कला थी। कान्यकुब्ज देशमें महापराक्रमी नृपश्रेष्ठ भनन्दन राज्य करते थे। उन्होंने यज्ञके अन्तमें यज्ञकुण्डसे प्रकट हुई दूध पीती नंगी बालिकाके रूपमें उसे पाया था। वह सुन्दरी बालिका उस कुण्डसे हँसती हुई निकली थी। उसकी अङ्ग-कान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान थी। वह तेजसे उद्भासित हो रही थी। राजेन्द्र भनन्दने उसे गोदमें लेकर अपनी प्यारी रानी मालावतीको प्रसन्नतापूर्वक दे दिया। मालावतीके हर्षकी सीमा न रही। वह उस बालिकाको अपना स्तन पिलाकर पालने लगी। उसके अन्नप्राशन और नामकरणके दिन शुभ बेलामें जब राजा सत्पुरुषोंके बीच बैठे हुए थे, आकाशवाणी हुई—'नरेश्वर! इस कन्याका नाम कलावती रखो।' यह सुनकर राजाने वही नाम रख दिया। उन्होंने ब्राह्मणों, याचकों और वन्दीजनोंको प्रचुर धन दान किया। सबको भोजन कराया और बड़ा भारी उत्सव मनाया। समयानुसार उस रूपवती कन्याने युवावस्थामें प्रवेश किया। सोलह वर्षकी अवस्थामें वह अत्यन्त सुन्दरी दिखायी देने लगी। वह राजकन्या मुनियोंके मनको भी मोह लेनेमें समर्थ थी। मनोहर चम्पाके समान उसकी अङ्गकान्ति थी तथा मुख शरत्कालके पूर्णचन्द्रकी भाँति परम मनोहर था। एक दिन गजराजकी-सी मन्दगतिसे चलनेवाली राजकुमारी राजमार्गसे कहीं जा रही थी। नन्दजीने उसे मार्गमें देखा। देखकर वे बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने उस मार्गसे आने-जानेवाले लोगोंसे आदरपूर्वक पूछा—'यह किसकी कन्या जा रही थी।' लोगोंने बताया—'यह महाराज भनन्दनकी कन्या है। इसका नाम कलावती है। यह धन्या बाला लक्ष्मीजीके अंशसे राजमन्दिरमें प्रकट हुई है और कौतुकवश खेलनेके लिये अपनी सहेलीके घर जा रही है।

७३- ब्राह्मणपत्नियोंद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति

५०२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण व्रजराज ! आप व्रजको पधारिये।' ऐसा उत्तर देकर लोग चले गये। नन्दके मनमें बड़ा हर्ष हुआ। वे राजभवनको गये। रथसे उतरकर उन्होंने तत्काल ही राजसभामें प्रवेश किया। राजा उठकर खड़े हो गये। उन्होंने नन्दरायजीसे बातचीत की और उन्हें बैठनेके लिये सोनेका सिंहासन दिया। उन दोनोंमें परस्पर बहुत प्रेमालाप हुआ। फिर नन्दने विनीत होकर राजासे सम्बन्धकी बात चलायी। नन्दजीने कहा - राजेन्द्र ! सुनिये। मैं एक शुभ एवं विशेष बात कह रहा हूँ। आप इस समय अपनी कन्याका सम्बन्ध एक विशिष्ट पुरुषके साथ स्थापित कीजिये। व्रजमें सुरभानुके पुत्र श्रीमान् वृषभानु निवास करते हैं, जो व्रजके राजा हैं। वे भगवान् नारायणके अंशसे उत्पन्न हुए हैं और उत्तम गुणोंके भण्डार, सुन्दर, सुविद्वान्, सुस्थिर यौवनसे युक्त, योगी, पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण करनेवाले और नवयुवक हैं। आपकी कन्या भी यज्ञकुण्डसे उत्पन्न हुई है; अतः अयोनिजा है। त्रिभुवनमोहिनी कन्या कलावती भगवती कमलाकी अंश है और स्वभावतः शान्त जान पड़ती है। वृषभानु आपकी पुत्रीके योग्य हैं तथा आपकी पुत्री भी उन्हींके योग्य है। मुने ! राजसभामें ऐसा कहकर नन्दजी चुप हो गये। तब नृपश्रेष्ठ भनन्दनने विनयसे नम्र हो उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया। भनन्दन बोले - व्रजेश्वर ! सम्बन्ध तो विधाताके वशकी बात है। वह मेरे द्वारा साध्य नहीं है। ब्रह्माजी ही सम्बन्ध करनेवाले हैं। मैं तो केवल जन्मदाता हूँ। कौन किसकी पत्नी या कन्या है तथा कौन किसका साधन-सम्पन्न पति है? इसे विधाताके सिवा और कौन जानता है? कर्मोंके अनुरूप फल देनेवाले विधाता ही सबके कारण हैं। किया हुआ कर्म कभी निष्फल नहीं होता, उसका फल मिलकर ही रहेगा - ऐसा श्रुतिमें सुना गया है। अन्यथा असमर्थ पुरुषके उद्यमकी भाँति सारा कर्म निष्फल हो जाता है। यदि विधाताने मेरी पुत्रीको ही वृषभानुकी पत्नी होनेकी बात लिखी है तो वह पहलेसे ही उनकी पत्नी है। मैं फिर कौन हूँ, जो उसमें बाधा डाल सकूँ तथा दूसरा भी कौन उस सम्बन्धका निवारण कर सकता है? नारद ! यों कहकर राजेन्द्र भनन्दनने विनयसे सिर झुकाकर नन्दरायजीको आदरपूर्वक मिष्टान्न भोजन कराया। तत्पश्चात् राजाकी अनुमति ले व्रजराज व्रजको लौट गये। जाकर उन्होंने सुरभानुकी सभामें सब बातें बतायीं। सुरभानुने भी यत्नपूर्वक नन्द और गर्गजीके सहयोगसे सादर इस सम्बन्धको जोड़ा। विवाहकालमें महाराज भनन्दनने गजरत्न, अश्वरत्न, अन्यान्य रत्न तथा मणियोंके आभूषण आदि बहुत दहेज दिये। वृषभानु कलावतीको पाकर बड़ी प्रसन्नताके साथ निर्जन एवं रमणीय स्थानमें उसके साथ विहार करने लगे। कलावती एक पलका भी विरह होनेपर स्वामीके बिना व्याकुल हो उठती थी और वृषभानु भी एक क्षणके लिये भी कलावतीके दूर होनेपर उसके बिना विकल हो जाते थे। वह राजकन्या पूर्वजन्मकी बातोंको याद रखनेवाली देवी थी। मायासे मनुष्यरूपमें प्रकट हुई थी। वृषभानु भी श्रीहरिके अंश और जातिस्मर थे तथा कलावतीको पाकर बड़े प्रसन्न थे। उन दोनोंका प्रेम प्रतिदिन नया-नया होकर बढ़ने लगा। लीलावश पूर्वकालमें सुदामाके शाप और श्रीकृष्णकी आज्ञासे श्रीकृष्णप्राणाधिका सती राधिका उन दोनोंकी अयोनिजा पुत्री हुईं। उसके दर्शनमात्रसे वे दोनों दम्पति भवबन्धनसे मुक्त हो गये। नारद ! इस प्रकार इतिहास कहा गया। अब जिसका प्रकरण चल रहा है, वह प्रसङ्ग सुनो। उक्त इतिहास पापरूपी ईंधनको जलानेके लिये प्रज्वलित अग्निकी शिखाके समान है।

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५०३ शिल्पिशिरोमणि विश्वकर्मा वृषभानुके आश्रमपर जाकर वहाँसे अपने सेवकगणोंके साथ दूसरे स्थानपर गये। वे तत्त्वज्ञ थे। उन्होंने मन-ही-मन एक कोस लंबे-चौड़े एक मनोहर स्थानका विचार करके वहाँ महात्मा नन्दके लिये आश्रम बनाना आरम्भ किया। बुद्धिसे अनुमान करके उनके लिये सबसे विलक्षण भवन बनाया। वह श्रेष्ठ भवन चार गहरी खाइयोंसे घिरा हुआ था, शत्रुओंके लिये उन्हें लाँघना बहुत कठिन था। उन चारों खाइयोंमें प्रस्तर जुड़े हुए थे। उन खाइयोंके दोनों तटोंपर फूलोंके उद्यान थे, जिनके कारण वे पुष्पोंसे सजी हुई-सी जान पड़ती थीं और सुन्दर एवं मनोहर चम्पाके वृक्ष तटोंपर खिले हुए थे। उन्हें छूकर बहनेवाली सुगन्धित वायु उन परिखाओंको सब ओरसे सुवासित कर रही थी। तटवर्ती आम, सुपारी, कटहल, नारियल, अनार, श्रीफल (बेल), भृङ्ग (इलायची), नीबू, नारंगी, ऊँचे आम्रातक (आमड़ा), जामुन, केले, केवड़े और कदम्बसमूह आदि फूले-फले वृक्षोंसे उन खाइयोंकी सब ओरसे शोभा हो रही थी। वे सारी परिखाएँ सदा वृक्षोंसे ढकी होनेके कारण जल-क्रीड़ाके योग्य थीं। अतएव सबको प्रिय थीं। परिखाओंके एकान्त स्थानमें जानेके लिये विश्वकर्माने उत्तम मार्ग बनाया, जो स्वजनोंके लिये सुगम और शत्रुवर्गके लिये दुर्गम था। थोड़े-थोड़े जलसे ढके हुए मणिमय खम्भोंद्वारा संकेतसे उस मार्गपर खम्भोंकी सीमा बनायी गयी थी। वह मार्ग न तो अधिक संकीर्ण था और न अधिक विस्तृत ही था। परिखाके ऊपरी भागमें देवशिल्पीने मनोहर परकोटा बनाया था, जिसकी ऊँचाई बहुत अधिक थी। वह सौ धनुषके बराबर ऊँचा था। उसमें लगा हुआ एक-एक पत्थर पचीस-पचीस हाथ लंबा था। सिन्दूरी रंगकी मणियोंसे निर्मित वह प्राकार बड़ा ही सुन्दर दिखायी देता था। उसमें बाहरसे दो और भीतरसे सात दरवाजे थे। दरवाजे मणिसारनिर्मित किवाड़ोंसे बंद रहते थे। वह नन्दभवन इन्द्रनीलमणिके चित्रित कलशोंद्वारा विशेष शोभा पा रहा था। मणिसाररचित कपाट भी उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। स्वर्णसारनिर्मित कलशोंसे उसका शिखरभाग बहुत ही उद्दीप्त जान पड़ता था। नन्दभवनका निर्माण करके विश्वकर्मा नगरमें घूमने लगे। उन्होंने नाना प्रकारके मनोहर राजमार्ग बनाये। रक्तभानुमणिकी बनी हुई वेदियों तथा सुन्दर पत्तनोंसे वे मार्ग सुशोभित होते थे। उन्हें आर-पार दोनों ओरसे बाँधकर पक्का बनाया गया था, जिससे वे बड़े मनोहर लगते थे। राजमार्गके दोनों ओर मणिमय मण्डप बने हुए थे, जो वैश्योंके वाणिज्य-व्यवसायके उपयोगमें आने योग्य थे। वे मण्डप दायें-बायें सब ओरसे प्रकाशित हो उन राजमार्गोंको भी प्रकाश पहुँचाते थे। तदनन्तर वृन्दावनमें जाकर विश्वकर्माने सुन्दर, गोलाकार और मणिमय परकोटोंसे युक्त रासमण्डलका निर्माण किया, जो सब ओरसे एक-एक योजन

५०४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


विस्तृत था। उसमें स्थान-स्थानपर मणिमय वेदिकाएँ बनी हुई थीं। मणिसाररचित नौ करोड़ मण्डप उस रासमण्डलकी शोभा बढ़ाते थे। वे शृङ्गारके योग्य, चित्रोंसे सुसज्जित और शय्याओंसे सम्पन्न थे। नाना जातिके फूलोंकी सुगन्ध लेकर बहती हुई वायु उन मण्डपोंको सुवासित करती थी। उनमें रत्नमय प्रदीप जलते थे। सुवर्णमय कलश उनकी उज्ज्वलता बढ़ा रहे थे। पुष्पोंसे भरे हुए उद्यानों तथा सरोवरोंसे सुशोभित रासस्थलका निर्माण करके विश्वकर्मा दूसरे स्थानको गये। वे उस रमणीय वृन्दावनको देखकर बहुत संतुष्ट हुए। वनके भीतर जगह-जगह एकान्त स्थानमें मन-बुद्धिसे विचार और निश्चय करके उन्होंने वहाँ तीस रमणीय एवं विलक्षण वनोंका निर्माण किया। वे केवल श्रीराधा-माधवकी ही क्रीड़ाके लिये बनाये गये थे।

तदनन्तर मधुवनके निकट अत्यन्त मनोहर निर्जन स्थानमें वटवृक्षके मूलभागके निकट सरोवरके पश्चिम किनारे केतकीवनके बीच और चम्पाके उद्यानके पूर्व विश्वकर्माने राधा-माधवकी क्रीड़ाके लिये पुनः एक रत्नमय मण्डपका निर्माण किया, जो चार वेदिकाओंसे घिरा हुआ और अत्यन्त सुन्दर था। रत्नसाररचित सौ तूलिकाएँ उसकी शोभा बढ़ाती थीं। अमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित तथा नाना प्रकारके चित्रोंसे चित्रित नौ जोड़े कपाटों और नौ मनोहर द्वारोंसे उस रत्नमण्डपकी बड़ी शोभा हो रही थी। उस मण्डपकी दीवारोंके दोनों बगलमें और ऊपर भी श्रेष्ठ रत्नोंद्वारा रचित कृत्रिम चित्रमय कलश उसकी श्रीवृद्धि कर रहे थे। उन कलशोंकी तीन कोटियाँ थीं। उक्त रत्नमण्डपमें महामूल्यवान् श्रेष्ठ मणिरत्नोंद्वारा निर्मित नौ सोपान शोभा दे रहे थे। उत्तम रत्नोंके सारभागसे बने हुए कलशोंसे मण्डपका शिखर-भाग जगमगा रहा था। पताका, तोरण तथा श्वेत चामर उस भवनको शोभा बढ़ा रहे थे। उसमें सब ओर अमूल्य रत्नमय दर्पण लगे थे, जिनके कारण सबको अपने सामनेकी ओरसे ही वह मण्डप दीप्तिमान् दिखायी देता था। वह सौ धनुष ऊपरतक अग्नि-शिखाके समान प्रकाशपुञ्ज फैला रहा था। उसका विस्तार सौ हाथका था। वह रत्नमण्डप गोलाकार बना था। उसके भीतर रत्ननिर्मित शय्याएँ बिछी थीं, जिनसे उस उत्तम भवनके भीतरी भागकी बड़ी शोभा हो रही थी। उक्त शय्याओंपर अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्र बिछे थे। मालाओंके समूहसे सुसज्जित होकर वे विचित्र शोभा धारण करते थे। पारिजातके फूलोंकी मालाओंके बने हुए तकिये उनपर यथास्थान रखे गये थे। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमसे वह सारा भवन सुवासित हो रहा था। उसमें मालती और चम्पाके फूलोंकी मालाएँ रखी थीं। नूतन शृङ्गारके योग्य तथा पारस्परिक प्रेमकी वृद्धि करनेवाले कपूरयुक्त ताम्बूलके बीड़े उत्तम रत्नमय पात्रोंमें सजाकर रखे गये थे। उस भवनमें रत्नोंकी बनी हुई बहुत-सी चौकियाँ थीं, जिनमें हीरे जड़े थे और मोतियोंकी झालरें लटक रही थीं। रत्नसारजटित कितने ही घट यथास्थान रखे हुए थे। रत्नमय चित्रोंसे चित्रित अनेक रत्नसिंहासन उस मण्डपकी शोभा बढ़ाते थे, जिनमें जड़ी हुई चन्द्रकान्त मणियाँ पिघलकर जलकी बूँदोंसे उस भवनको सींच रही थीं। शीतल एवं सुवासित जल तथा भोग्य वस्तुओंसे युक्त उस रमणीय मिलन-मन्दिर (रत्नमण्डप)-का निर्माण करके विश्वकर्मा फिर नगरमें गये।

जिनके लिये जो भवन बने थे, उनपर उनके नाम उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक लिखे। इस कार्यमें उनके शिष्य तथा यक्षगण उनकी सहायता करते थे। मुने! निद्राके स्वामी श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण उस समय निद्राके वशीभूत थे। उनको नमस्कार करके विश्वकर्मा अपने घरको चले गये। परमेश्वर श्रीकृष्णकी

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

५०५

इच्छासे ही भूतलपर ऐसा आश्चर्यमय नगर निर्मित हुआ। इस प्रकार मैंने श्रीहरिका सारा मङ्गलमय चरित्र कह सुनाया, जो सुखद और पापहारी है। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो ?

नारदजीने पूछा— भगवन्! भारतवर्षमें इस काननका नाम 'वृन्दावन' क्यों हुआ ? इसकी व्युत्पत्ति अथवा संज्ञा क्या है ? आप उत्तम तत्त्वज्ञ हैं, अतः इस तत्त्वको बताइये।

सूतजी कहते हैं— नारदजीका प्रश्न सुनकर नारायण ऋषिने सानन्द हँसकर सारा ही पुरातन तत्त्व कहना आरम्भ किया।

भगवान् नारायण बोले— नारद! पहले सत्ययुगकी बात है। राजा केदार सातों द्वीपोंके अधिपति थे। ब्रह्मन्! वे सदा सत्य धर्ममें तत्पर रहते थे और अपनी स्त्रियों तथा पुत्र-पौत्रवर्गके साथ सानन्द जीवन बिताते थे। उन धार्मिक नरेशने समस्त प्रजाओंका पुत्रोंकी भाँति पालन किया। सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके भी राजा केदारने इन्द्रपद पानेकी इच्छा नहीं की। वे नाना प्रकारके पुण्यकर्म करके भी स्वयं उनका फल नहीं चाहते थे। उनका सारा नित्यनैमित्तिक कर्म श्रीकृष्णकी प्रीतिके लिये ही होता था। केदारके समान राजाधिराज न तो कोई पहले हुआ है और न पुनः होगा ही। उन्होंने अपनी त्रिभुवनमोहिनी पत्नी तथा राज्यकी रक्षाका भार पुत्रोंपर रखकर जैगीषव्य मुनिके उपदेशसे तपस्याके लिये वनको प्रस्थान किया। वे श्रीहरिके अनन्य भक्त थे और निरन्तर उन्हींका चिन्तन करते थे। मुने! भगवान्‌का सुदर्शनचक्र राजाकी रक्षाके लिये सदा उन्हींके पास रहता था। वे मुनिश्रेष्ठ नरेश चिरकालतक तपस्या करके अन्तमें गोलोकको चले गये। उनके नामसे केदारतीर्थ प्रसिद्ध हुआ। अवश्य ही आज भी वहाँ मरे हुए प्राणीको तत्काल मुक्तिलाभ होता है।

उनकी कन्याका नाम वृन्दा था, जो लक्ष्मीकी अंश थी। उसने योगशास्त्रमें निपुण होनेके कारण किसीको अपना पुरुष नहीं बनाया। दुर्वासाने उसे परम दुर्लभ श्रीहरिका मन्त्र दिया। वह घर छोड़कर तपस्याके लिये वनमें चली गयी। उसने साठ हजार वर्षोंतक निर्जन वनमें तपस्या की। तब उसके सामने भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण प्रकट हुए। उन्होंने प्रसन्नमुखसे कहा—'देवि! तुम कोई वर माँगो।' वह सुन्दर विग्रहवाले शान्तस्वरूप राधिका-कान्तको देखकर सहसा बोल उठी—'तुम मेरे पति हो जाओ।' उन्होंने 'तथास्तु' कहकर उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। वह कौतूहलवश श्रीकृष्णके साथ गोलोकमें गयी और वहाँ राधाके समान श्रेष्ठ सौभाग्यशालिनी गोपी हुई। वृन्दाने जहाँ तप किया था, उस स्थानका नाम 'वृन्दावन' हुआ अथवा वृन्दाने जहाँ क्रीड़ा की थी, इसलिये वह स्थान 'वृन्दावन' कहलाया।

वत्स! अब दूसरा पुण्यदायक इतिहास सुनो—जिससे इस काननका नाम 'वृन्दावन' पड़ा। वह प्रसङ्ग मैं तुमसे कहता हूँ, ध्यान दो। राजा कुशध्वजके दो कन्याएँ थीं। दोनों ही धर्मशास्त्रके ज्ञानमें निपुण थीं। उनके नाम थे—तुलसी और वेदवती। संसार चलानेका जो कार्य है, उससे उन दोनों बहिनोंको वैराग्य था। उनमेंसे वेदवतीने तपस्या करके परम पुरुष नारायणको प्राप्त किया। वह जनककन्या सीताके नामसे सर्वत्र विख्यात है। तुलसीने तपस्या करके श्रीहरिको पतिरूपमें प्राप्त करनेकी इच्छा की, किंतु दैववश दुर्वासाके शापसे उसने शङ्खचूड़को प्राप्त किया। फिर परम मनोहर कमलाकान्त भगवान् नारायण उसे प्राणवल्लभके रूपमें प्राप्त हुए। भगवान् श्रीहरिके शापसे देवेश्वरी तुलसी वृक्षरूपमें प्रकट हुई और तुलसीके शापसे श्रीहरि शालग्रामशिला हो गये। उस शिलाके वक्षः-

७४- श्रीकृष्णका विषमिश्रित यमुना-जल पीकर मरी हुई गौओंको जीवित करना

५०६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

स्थलपर उस अवस्थामें भी सुन्दरी तुलसी निरन्तर स्थित रहने लगी। मुने! तुलसीका सारा चरित्र तुमसे विस्तारपूर्वक कहा जा चुका है, तथापि यहाँ प्रसङ्गवश पुनः उसकी कुछ चर्चा की गयी। तपोधन! उस तुलसीकी तपस्याका एक यह भी स्थान है; इसलिये इसे मनीषी पुरुष 'वृन्दावन' कहते हैं। (तुलसी और वृन्दा समानार्थक शब्द है) अथवा मैं तुमसे दूसरा उत्कृष्ट हेतु बता रहा हूँ, जिससे भारतवर्षका यह पुण्यक्षेत्र वृन्दावनके नामसे प्रसिद्ध हुआ। राधाके सोलह नामोंमें एक वृन्दा नाम भी है, जो श्रुतिमें सुना गया है। उन वृन्दा नामधारिणी राधाका यह रमणीय क्रीडा-वन है; इसलिये इसे 'वृन्दावन' कहा गया है। पूर्वकालमें श्रीकृष्णने श्रीराधाकी प्रीतिके लिये गोलोकमें वृन्दावनका निर्माण किया था। फिर भूतलपर उनकी क्रीडाके लिये प्रकट हुआ वह वन उस प्राचीन नामसे ही 'वृन्दावन' कहलाने लगा।

नारदजीने पूछा— जगद्गुरो! श्रीराधिकाके सोलह नाम कौन-कौन-से हैं? मुझ शिष्यसे उन्हें बताइये; उन्हें सुननेके लिये मेरे मनमें उत्कण्ठा है। मैंने सामवेदमें वर्णित श्रीराधाके सहस्र नाम सुने हैं; तथापि इस समय आपके मुखसे उनके सोलह नामोंको सुनना चाहता हूँ। विभो! वे सोलह नाम उन सहस्र नामोंके ही अन्तर्गत हैं या उनसे भिन्न हैं? अहो! उन भक्तवाञ्छित पुण्यस्वरूप नामोंका मुझसे वर्णन कीजिये। साथ ही उन सबकी व्युत्पत्ति भी बताइये। जगत्के आदिकारण! जगन्माता श्रीराधाके उन सर्वदुर्लभ पावन नामोंको मैं सुनना चाहता हूँ।

श्रीनारायणने कहा— राधा, रासेश्वरी, रासवासिनी, रसिकेश्वरी, कृष्णप्राणाधिका, कृष्णप्रिया, कृष्णस्वरूपिणी, कृष्णवामाङ्गसम्भूता, परमानन्दरूपिणी, कृष्णा, वृन्दावनी, वृन्दा, वृन्दावनविनोदिनी, चन्द्रावली, चन्द्रकान्ता और शरच्चन्द्रप्रभानना—ये सारभूत सोलह नाम उन सहस्र नामोंके ही अन्तर्गत हैं। राधा शब्दमें 'धा' का अर्थ है संसिद्धि (निर्वाण) तथा 'रा' दानवाचक है। जो स्वयं निर्वाण (मोक्ष) प्रदान करनेवाली हैं; वे 'राधा' कही गयी हैं। रासेश्वरकी ये पत्नी हैं; इसलिये इनका नाम 'रासेश्वरी' है। उनका रासमण्डलमें निवास है; इससे वे 'रासवासिनी' कहलाती हैं। वे समस्त रसिक देवियोंकी परमेश्वरी हैं; अतः पुरातन संत-महात्मा उन्हें 'रसिकेश्वरी' कहते हैं। परमात्मा श्रीकृष्णके लिये वे प्राणोंसे भी अधिक प्रियतमा हैं; अतः साक्षात् श्रीकृष्णने ही उन्हें 'कृष्णप्राणाधिका' नाम दिया है। वे श्रीकृष्णकी अत्यन्त प्रिया कान्ता हैं अथवा श्रीकृष्ण ही सदा उन्हें प्रिय हैं; इसलिये समस्त देवताओंने उन्हें 'कृष्णप्रिया' कहा है। वे श्रीकृष्णरूपको लीलापूर्वक निकट लानेमें समर्थ हैं तथा सभी अंशोंमें श्रीकृष्णके सदृश हैं; अतः 'कृष्णस्वरूपिणी' कही गयी हैं। परम सती श्रीराधा श्रीकृष्णके आधे वामाङ्गभागसे प्रकट हुई हैं; अतः श्रीकृष्णने स्वयं ही उन्हें 'कृष्णवामाङ्गसम्भूता' कहा है। सती श्रीराधा स्वयं परमानन्दकी मूर्तिमती राशि हैं; अतः श्रुतियोंने उन्हें 'परमानन्दरूपिणी' की संज्ञा दी है। 'कृष्' शब्द मोक्षका वाचक है, 'ण' उत्कृष्टताका बोधक है और 'आकार' दाताके अर्थमें आता है। वे उत्कृष्ट मोक्षकी दात्री हैं; इसलिये 'कृष्णा' कही गयी हैं। वृन्दावन उन्हींका है; इसलिये वे 'वृन्दावनी' कही गयी हैं अथवा वृन्दावनकी अधिदेवी होनेके कारण उन्हें यह नाम प्राप्त हुआ है। सखियोंके समुदायको 'वृन्द' कहते हैं और 'अकार' सत्ताका वाचक है। उनके समूह-की-समूह सखियाँ हैं; इसलिये वे 'वृन्दा' कही गयी हैं। उन्हें सदा वृन्दावनमें विनोद प्राप्त होता है; अतः वेद उनको 'वृन्दावनविनोदिनी' कहते हैं।

७५- भगवान् श्रीकृष्णका रक्तरञ्जित मुखवाले कालियनागके मस्तकपर चढ़ना तथा उनके भारसे आक्रान्त हो कालियनागका प्राण त्याग देनेको उद्यत होना; नागपत्नी सुरसा तथा दूसरी नागिनियोंका श्रीहरिके सामने आकर रोना और उन्हें प्रणामकर अपनी बात कहना

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

५०७

वे सदा मुखचन्द्र तथा नखचन्द्रकी अवली (पंक्ति)-से युक्त हैं; इस कारण श्रीकृष्णने उन्हें 'चन्द्रावली' नाम दिया है। उनकी कान्ति दिन-रात सदा ही चन्द्रमाके तुल्य बनी रहती है; अतः श्रीहरि हर्षोल्लासके कारण उन्हें 'चन्द्रकान्ता' कहते हैं। उनके मुखपर दिन-रात शरत्कालके चन्द्रमाकी-सी प्रभा फैली रहती है; इसलिये मुनिमण्डलीने उन्हें 'शरच्चन्द्रप्रभानना' कहा है।

यह अर्थ और व्याख्याओंसहित षोडश-नामावली कही गयी; जिसे नारायणने अपने नाभिकमलपर विराजमान ब्रह्माको दिया था। फिर ब्रह्माजीने पूर्वकालमें मेरे पिता धर्मदेवको इन नामावलीका उपदेश दिया और श्रीधर्मदेवने महातीर्थ पुष्करमें सूर्य-ग्रहणके पुण्य पर्वपर देवसभाके बीच मुझे कृपापूर्वक इन सोलह नामोंका उपदेश दिया था। श्रीराधाके प्रभावकी प्रस्तावना होनेपर बड़े प्रसन्नचित्तसे उन्होंने इन नामोंकी व्याख्या की थी। मुने! यह राधाका परम पुण्यमय स्तोत्र है, जिसे मैंने तुमको दिया। महामुने! जो वैष्णव न हो तथा वैष्णवोंका निन्दक हो, उसे इसका उपदेश नहीं देना चाहिये। जो मनुष्य जीवनभर तीनों संध्याओंके समय इस स्तोत्रका पाठ करता है, उसकी यहाँ राधा-माधवके चरणकमलोंमें भक्ति होती है। अन्तमें वह उन दोनोंका दास्यभाव प्राप्त कर लेता है और दिव्य शरीर एवं अणिमा आदि सिद्धिको पाकर सदा उन प्रिया-प्रियतमके साथ विचरता है। नियमपूर्वक किये गये सम्पूर्ण व्रत, दान और उपवाससे, चारों वेदोंके अर्थसहित पाठसे, समस्त यज्ञों और तीर्थोंके विधिबोधित अनुष्ठान तथा सेवनसे, सम्पूर्ण भूमिकी सात बार की गयी परिक्रमासे, शरणागतकी रक्षासे, अज्ञानीको ज्ञान देनेसे तथा देवताओं और वैष्णवोंका दर्शन करनेसे भी जो फल प्राप्त होता है, वह इस स्तोत्रपाठकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं है। इस स्तोत्रके प्रभावसे मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है*।


* राधा रासेश्वरी रासवासिनी रसिकेश्वरी । कृष्णप्राणाधिका कृष्णप्रिया कृष्णस्वरूपिणी ॥
कृष्णवामाङ्गसम्भूता परमानन्दरूपिणी । कृष्णा वृन्दावनी वृन्दा वृन्दावनविनोदिनी ॥
चन्द्रावली चन्द्रकान्ता शरच्चन्द्रप्रभानना । नामान्येतानि साराणि तेषामभ्यन्तराणि च ॥
राधेत्येवं च संसिद्धौ राकारो दानवाचकः । स्वयं निर्वाणदात्री या सा राधा परिकीर्तिता ॥
रासेश्वरस्य पत्नीयं तेन रासेश्वरी स्मृता । रासे च वासो यस्याश्च तेन सा रासवासिनी ॥
सर्वासां रसिकानां च देवीनामीश्वरी परा । प्रवदन्ति पुरा सन्तस्तेन तां रसिकेश्वरीम् ॥
प्राणाधिका प्रेयसी सा कृष्णस्य परमात्मनः । कृष्णप्राणाधिका सा च कृष्णेन परिकीर्तिता ॥
कृष्णस्यातिप्रिया कान्ता कृष्णो वास्याः प्रियः सदा । सर्वैर्देवगणैरुक्ता तेन कृष्णप्रिया स्मृता ॥
कृष्णरूपं संनिधातुं या शक्ता चावलीलया । सर्वांशैः कृष्णसदृशी तेन कृष्णस्वरूपिणी ॥
वामाङ्कार्द्धेन कृष्णस्य या सम्भूता परा सती । कृष्णवामाङ्गसम्भूता तेन कृष्णेन कीर्तिता ॥
परमानन्दराशिश्च स्वयं मूर्तिमती सती । श्रुतिभिः कीर्तिता तेन परमानन्दरूपिणी ॥
कृषिर्मोक्षार्थवचनो ण एवोत्कृष्टवाचकः । आकारो दातृवचनस्तेन कृष्णा प्रकीर्तिता ॥
अस्ति वृन्दावनं यस्यास्तेन वृन्दावनी स्मृता । वृन्दावनस्याधिदेवी तेन वाथ प्रकीर्तिता ॥
सङ्घः सखीनां वृन्दः स्यादकारोऽप्यस्तिवाचकः । सखिवृन्दोऽस्ति यस्याश्च सा वृन्दा परिकीर्तिता ॥
वृन्दावने विनोदश्च सोऽस्या ह्यस्ति च तत्र वै । वेदा वदन्ति तां तेन वृन्दावनविनोदिनीम् ॥
नखचन्द्रावलीवक्त्रचन्द्रोऽस्ति यत्र संततम् । तेन चन्द्रावली सा च कृष्णेन परिकीर्तिता ॥
कान्तिरस्ति चन्द्रतुल्या सदा यस्या दिवानिशम् । मुनिना कीर्तिता तेन शरच्चन्द्रप्रभानना ॥
इदं षोडशनामोक्तमर्थव्याख्यानसंयुतम् । नारायणेन यद्दत्तं ब्रह्मणे नाभिपङ्कजे ॥
ब्रह्मणा च पुरा दत्तं धर्माय जनकाय मे । धर्मेण कृपया दत्तं मह्यमादित्यपर्वणि ॥

५०८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

नारदजीने कहा— प्रभो! यह सर्वदुर्लभ परम आश्चर्यमय स्तोत्र मुझे प्राप्त हुआ। देवी श्रीराधाका 'संसारविजय' नामक कवच भी उपलब्ध हुआ। सुयज्ञने जिसका प्रयोग किया था, वह दुर्लभ स्तोत्र भी मुझे सुलभ हो गया। भगवान् श्रीकृष्णकी विचित्र कथा सुनकर आपके चरणकमलोंके प्रसादसे मैंने बहुत कुछ पा लिया। अब मैं जिस रहस्यको सुनना चाहता हूँ, उसका वर्णन कीजिये। मुने! वृन्दावनमें प्रातःकाल उस अद्भुत नगरको देखकर गोपोंने क्या कहा?

भगवान् श्रीनारायण बोले— नारद! जब वहाँ रात बीत गयी, विश्वकर्मा चले गये और अरुणोदयकी बेला आयी, तब सब लोग जाग उठे। उठते ही सबसे विलक्षण उस नगरको देख व्रजवासी आपसमें कहने लगे—'यह क्या आश्चर्य है? यह क्या आश्चर्य है?' किन्हीं गोपोंने कुछ अन्य गोपोंने पूछा—'यह कैसे सम्भव हुआ? न जाने भूतलपर किस रूपसे कौन प्रकट हो सकता है?' परंतु नन्दरायजी गर्गके वाक्योंका स्मरण करके मन-ही-मन सब कुछ जान गये। उन्होंने भीतर-ही-भीतर विचार किया—'यह समस्त चराचर जगत् श्रीहरिकी इच्छासे ही उत्पन्न हुआ है। जिनके भ्रूभङ्गकी लीलामात्रसे ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सारा जगत् आविर्भूत और तिरोभूत होता रहता है, उनके लिये क्या और कैसे असाध्य है? अहो! जिनके रोमकूपोंमें ही सारे ब्रह्माण्ड स्थित हैं, उन परमेश्वर महाविष्णु श्रीहरिके लिये क्या असाध्य हो सकता है? ब्रह्मा, शेषनाग, शिव और धर्म जिनके चरणारविन्दोंका दर्शन करते रहते हैं, उन माया-मानव-रूपधारी परमेश्वरके लिये कौन-सा ऐसा कार्य है, जो असाध्य हो?' नन्दजीने उस नगरमें घूम-घूमकर, एक-एक घरको देख-देखकर और वहाँ लिखे हुए नामोंको पढ़कर सबके लिये घरोंका वितरण किया। नन्द और वृषभानुने शुभ मुहूर्त देखकर प्रवेशकालिक मङ्गलकृत्यका सम्पादन करके अपने सेवकगणोंके साथ अपने-अपने आश्रममें प्रवेश किया। वृन्दावनमें रहकर उन सबके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे। उन सब गोपोंने बड़े आनन्दके साथ अपने-अपने उत्तम आश्रममें पदार्पण किया। अपने-अपने मनोहर स्थानपर सब गोपोंको बड़ा आनन्द मिला। वहाँके बालक और बालिकाएँ हर्षपूर्वक खेलने-कूदने लगीं। श्रीकृष्ण और बलदेव भी कौतूहलवश गोपशिशुओंके साथ वहाँ प्रत्येक मनोहर स्थानपर बालोचित क्रीड़ा करने लगे। नारद! इस प्रकार मैंने नगर-निर्माणका सारा वृत्तान्त कह सुनाया। वनमें गोपबालाओंके लिये जो रासमण्डल बना था, उसकी भी बात बतायी। (अध्याय १७)


पुष्करे च महातीर्थे पुण्याहे देवसंसदि॥
राधाप्रभावप्रस्तावे सुप्रसन्नेन चेतसा। इदं स्तोत्रं महापुण्यं तुभ्यं दत्तं मया मुने॥
निन्दकायावैष्णवाय न दातव्यं महामुने। यावज्जीवमिदं स्तोत्रं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः॥
राधामाधवयोः पादपद्मे भक्तिर्भवेदिह। अन्ते लभेत्तयोर्दास्यं शश्वत्सहचरो भवेत्॥
अणिमादिकसिद्धिं च संप्राप्य नित्यविग्रहम्। व्रतदानोपवासैश्च सर्वैर्नियमपूर्वकैः॥
चतुर्णां चैव वेदानां पाठः सर्वार्थसंयुतैः। सर्वेषां यज्ञतीर्थानां करणैर्विधिबोधितैः॥
प्रदक्षिणेन भूमेश्च कृत्स्नाया एव सप्तधा। शरणागतरक्षायामज्ञानां ज्ञानदानतः॥
देवानां वैष्णवानां च दर्शनेनापि यत् फलम्। तदेव स्तोत्रपाठस्य कलां नार्हति षोडशीम्॥
स्तोत्रस्यास्य प्रभावेण जीवन्मुक्तो भवेन्नरः। (१७। २२०—२४६)

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५०९

श्रीवनके समीप यज्ञ करनेवाले ब्राह्मणोंकी पत्नियोंका ग्वालबालोंसहित श्रीकृष्णको भोजन देना तथा उनकी कृपासे गोलोकधामको जाना, श्रीकृष्णकी मायासे निर्मित उनकी छायामयी स्त्रियोंका ब्राह्मणोंके घरोंमें जाना तथा विप्रपत्नियोंके पूर्वजन्मका परिचय

नारदजी बोले— मुनिश्रेष्ठ! ज्ञानसिन्धो! मैं आपका शरणागत शिष्य हूँ। आप मुझे श्रीकृष्ण-लीलामृतका पान कराइये।

भगवान् श्रीनारायणने कहा— एक दिन बलरामसहित श्रीकृष्ण ग्वालबालोंको साथ ले श्रीमधुवनमें गये, जहाँ यमुनाके किनारे कमल खिले हुए थे। उस समय सब बालक सहस्रों गौओंके साथ वहाँ विचरने और खेलने लगे। खेलते-खेलते वे थक गये और उन्हें भूख-प्यास सताने लगी। तब सब गोपशिशु बड़ी प्रसन्नताके साथ श्रीकृष्णके पास आये और बोले—'कन्हैया! हमें बड़ी भूख लगी है। हम सेवकोंको आज्ञा दो, क्या करें?' ग्वालबालोंकी बात सुनकर प्रसन्नमुख और नेत्रवाले दयानिधान श्रीहरिने उनसे यह हितकर तथा सच्ची बात कही।

श्रीकृष्ण बोले— बालको! जहाँ ब्राह्मणोंका सुखदायक यज्ञस्थान है, वहाँ जाओ। जाकर उन यज्ञतत्पर ब्राह्मणोंसे शीघ्र ही भोजनके लिये अन्न माँगो। वे सभी आङ्गिरस गोत्रवाले ब्राह्मण हैं और श्रीवनके निकट अपने आश्रममें यज्ञ करते हैं। उन्होंने श्रुतियों और स्मृतियोंका विशेष ज्ञान प्राप्त किया है। वे सब निःस्पृह वैष्णव हैं और मोक्षकी कामनासे मेरा ही यजन कर रहे हैं। परंतु मायासे आच्छादित होनेके कारण उन्हें इस बातका पता नहीं है कि योगमायासे मनुष्यरूप धारण करके प्रकट हुआ मैं ही उनका आराध्य देव हूँ। केवल यज्ञकी ओर ही उन्मुख रहनेवाले वे ब्राह्मण यदि तुम्हें अन्न न दें तो शीघ्र ही जाकर उनकी पत्नियोंसे माँगना; क्योंकि वे बालकोंके प्रति दयासे भरी हुई हैं।

श्रीकृष्णकी बात सुनकर वे श्रेष्ठ गोपबालक ब्राह्मणोंके सामने जा मस्तक झुकाकर खड़े हो गये और बोले—'विप्रवरो! हमें शीघ्र भोजन दीजिये।' परंतु उनमेंसे कुछ द्विजोंने तो उनकी बात सुनी ही नहीं और कुछ लोग सुनकर भी ज्यों-के-त्यों खड़े रह गये। तब वे पाकशालामें गये, जहाँ ब्राह्मणियाँ भोजन बना रही थीं। उन बालकोंने ब्राह्मणपत्नियोंको सिर झुकाकर प्रणाम किया। प्रणाम करके वे सब बालक उन पतिव्रता ब्राह्मणियोंसे बोले—'माताओ! हम सब बालक भूखसे पीड़ित हैं। हमें भोजन दो।'

उन बालकोंकी बात सुनकर और उनकी मनोहर आकृति देखकर उन सती-साध्वी ब्राह्मणियोंने मुस्कराते हुए मुखारविन्दसे आदरपूर्वक पूछा।

ब्राह्मणपत्नियां बोलीं— समझदार बालको! तुमलोग कौन हो? किसने तुम्हें भेजा है? और तुम्हारे नाम क्या हैं? हम तुम्हें व्यञ्जनसहित नाना प्रकारका श्रेष्ठ भोजन प्रदान करेंगी।

ब्राह्मणियोंकी बात सुनकर वे सभी स्निग्ध एवं हृष्ट-पुष्ट गोपबालक प्रसन्नतापूर्वक हँसते हुए बोले।

बालकोंने कहा— माताओ! हमें बलराम और श्रीकृष्णने भेजा है। हमलोग भूखसे बहुत पीड़ित हैं। हमें भोजन दो। हम शीघ्र ही उनके पास लौट जायँगे। यहाँसे थोड़ी दूरपर वनके भीतर भाण्डीर-वटके निकट मधुवनमें बलराम और केशव बैठे हैं। वे दोनों भाई भी थके-माँदे और भूखे हैं तथा भोजन माँग रहे हैं।

५१०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

माताओ! आपको अन्न देना है या नहीं देना है, यह शीघ्र हमें इसी समय बता दो।

गोपोंकी बात सुनकर ब्राह्मणियाँ हर्षसे खिल उठीं। उनके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू छलक आये। सारे अङ्ग पुलकित हो उठे। उनके मनमें बड़ी इच्छा थी कि हमें श्रीकृष्ण-चरणोंके दर्शन हों। उन्होंने सोने, चाँदी और फूलकी थालियोंमें प्रसन्नतापूर्वक भाँति-भाँतिके व्यञ्जनोंसे युक्त अत्यन्त मनोहर अगहनीके चावलका भात, खीर, स्वादिष्ट पीठा, दही, दूध, घी और मधु रखकर श्रीकृष्णके निकट प्रस्थान किया। वे मन-ही-मन नाना प्रकारके मनोरथ लेकर जानेको उत्सुक हुईं। ब्राह्मणपत्नियां धन्य और पतिव्रतपरायणा थीं। इसलिये उनके मनमें श्रीकृष्णदर्शनकी उत्कण्ठा जाग उठी। उन्होंने वहाँ पहुँचकर बालकोंसहित श्रीकृष्ण और बलरामके दर्शन किये। श्रीकृष्ण वटके मूलभागके निकट बालकोंके बीचमें बैठे थे; अतः तारोंके बीच विराजमान चन्द्रमाके समान शोभा पा रहे थे। श्याम अङ्ग, किशोर अवस्था और शरीरपर रेशमी पीताम्बरसे वे बड़े सुन्दर लगते थे। मुखपर मन्द मुस्कान खेल रही थी। शान्तस्वरूप राधाकान्त बड़े मनोहर प्रतीत होते थे। उनका मुख शरत्कालकी पूर्णिमाके चन्द्रमाको लज्जित कर रहा था। वे रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित थे तथा रत्ननिर्मित दो कुण्डलोंसे उनके गण्डस्थलकी बड़ी शोभा हो रही थी। हाथोंमें रत्नमय केयूर और कङ्कन तथा पैरोंमें रत्ननिर्मित नूपुर उनके आभूषण थे। उन्होंने गलेमें आजानुलम्बिनी शुभ्र रत्नमाला धारण कर रखी थीं। मालतीकी मालासे उनके कण्ठ और वक्षःस्थल दोनों सुशोभित थे। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमसे उनके श्रीअङ्ग चर्चित थे। नखों और कपोलोंका सौन्दर्य देखने ही योग्य था। सुन्दर लाल रंगके ओठ पके बिम्बफलको लज्जित कर रहे थे। वे परिपक्व अनारके दानोंकी भाँति सुन्दर दन्तपङ्क्ति धारण किये थे। सिरपर मोरपंखका मुकुट शोभा दे रहा था। कानोंके मूलभागमें दो कदम्बके फूल उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। वे परात्पर परमात्मा योगियोंके भी ध्यानमें नहीं आनेवाले हैं। तथापि भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये व्याकुल रहते हैं। ब्रह्मा, शिव, धर्म, शेषनाग तथा बड़े-बड़े मुनीश्वर उनकी स्तुति करते हैं। ऐसे परमेश्वरके दर्शन करके ब्राह्मणपत्नियोंने भक्तिभावसे उन्हें प्रणाम किया और अपने ज्ञानके अनुरूप उन मधुसूदनकी स्तुति की।

विप्रपत्नियां बोलीं— भगवन्! आप स्वयं ही परब्रह्म, परमधाम, निरीह, अहङ्काररहित, निर्गुण-निराकार तथा सगुण-साकार हैं। आप ही सबके साक्षी, निर्लेप एवं आकाररहित परमात्मा हैं। आप ही प्रकृति-पुरुष तथा उन दोनोंके परम कारण हैं। सृष्टि, पालन और संहारके विषयमें नियुक्त जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव—ये तीन देवता कहे गये हैं, वे भी आपके ही सर्वबीजमयं अंश हैं। परमेश्वर! जिनके रोमकूपमें सम्पूर्ण विश्व निवास करता है, वे महाविराट् महाविष्णु हैं और प्रभो! आप उनके जनक हैं। आप ही तेज और

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५११

तेजस्वी हैं, ज्ञान और ज्ञानी हैं तथा इन सबसे परे हैं। वेदमें आपको अनिर्वचनीय कहा गया है; फिर कौन आपकी स्तुति करनेमें समर्थ है? सृष्टिके सूत्रभूत जो महत्तत्त्व आदि एवं पञ्च-तन्मात्राएँ हैं, वे भी आपसे भिन्न नहीं हैं। आप सम्पूर्ण शक्तियोंके बीज तथा सर्वशक्तिस्वरूप हैं। समस्त शक्तियोंके ईश्वर हैं, सर्वरूप हैं तथा सब शक्तियोंके आश्रय हैं। आप निरीह, स्वयंप्रकाश, सर्वानन्दमय तथा सनातन हैं। अहो! आकारहीन होते हुए भी आप सम्पूर्ण आकारोंसे युक्त हैं—सब आकार आपके ही हैं। आप सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको जानते हैं तो भी इन्द्रियवान् नहीं हैं। जिनकी स्तुति करने तथा जिनके तत्त्वका निरूपण करनेमें सरस्वती जडवत् हो जाती हैं; महेश्वर, शेषनाग, धर्म और स्वयं विधाता भी जडतुल्य हो जाते हैं; पार्वती, लक्ष्मी, राधा एवं वेदजननी सावित्री भी जडताको प्राप्त हो जाती हैं; फिर दूसरे कौन विद्वान् आपकी स्तुति कर सकते हैं? प्राणेश्वरेश्वर! हम स्त्रियाँ आपकी क्या स्तुति कर सकती हैं? देव! हमपर प्रसन्न होइये। दीनबन्धो! कृपा कीजिये।

यों कह सब ब्राह्मणपत्नियाँ उनके चरणारविन्दोंमें पड़ गयीं। तब श्रीकृष्णने प्रसन्नमुख एवं नेत्रोंसे उन सबको अभयदान दिया।

जो पूजाकालमें विप्रपत्नियोंद्वारा किये गये इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह ब्राह्मणपत्नियोंको मिली हुई गतिको प्राप्त कर लेता है; इसमें संशय नहीं है।

भगवान् श्रीनारायण कहते हैं—नारद! उन ब्राह्मणपत्नियोंको अपने चरणारविन्दोंमें पड़ी देख श्रीमधुसूदनने कहा—'देवियो! वर माँगो। तुम्हारा कल्याण होगा।' श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर विप्रपत्नियोंको बड़ी प्रसन्नता हुई, श्रद्धासे उनका मस्तक झुक गया और वे भक्तिभावसे इस प्रकार बोलीं।

**द्विजपत्नियोंने कहा—**श्रीकृष्ण! हम आपसे वर नहीं लेंगी। हमारी अभिलाषा यह है कि आपके चरणकमलोंकी सेवा प्राप्त हो; अतः आप हमें अपना दास्यभाव तथा परम दुर्लभ सुदृढ़ भक्ति प्रदान करें। केशव! हम प्रतिक्षण आपके मुखारविन्दको देखती रहें, यही कृपा कीजिये। प्रभो! अब हम पुनः घरको नहीं जायेंगी।

द्विजपत्नियोंकी यह बात सुनकर करुणानिधान त्रिलोकीनाथ श्रीकृष्णने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। फिर वे बालकोंकी मण्डलीमें बैठ गये। तदनन्तर ब्राह्मणपत्नियोंने उन्हें सुधाके समान मधुर अन्न प्रदान किया। भगवान्ने उस अन्नको लेकर गोप-बालकोंको भोजन कराया और स्वयं भी भोजन किया। इसी समय विप्रपत्नियोंने देखा कि आकाशसे एक सोनेका बना हुआ श्रेष्ठ विमान उतर रहा है। उसमें रत्नमय दर्पण लगे हैं। उसके सभी उपकरण रत्नोंके सारतत्त्वसे बने हुए हैं। वह रत्नोंके ही खम्भोंसे आबद्ध है तथा उत्तम रत्नमय कलशोंसे वह और भी उज्ज्वल जान पड़ता है। उसमें श्वेत चँवर लगे हुए हैं। अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्र उसकी शोभा बढ़ाते हैं। उस विमानको पारिजातके फूलोंकी मालाओंके जालसे सजाया गया है। उसमें सौ पहिये हैं। मनके समान वेगसे चलनेवाला वह विमान बड़ा मनोहर है। वनमालासे विभूषित दिव्य पार्षद उसे सब ओरसे घेरे खड़े हैं। उन पार्षदोंने पीताम्बर पहन रखा है। वे रत्नमय अलंकारोंसे अलंकृत, नूतन यौवनसे सम्पन्न, श्यामकान्तिवाले, परम मनोहर, दो भुजाओंसे युक्त तथा गोपवेशधारी थे। उनके हाथोंमें मुरली थी। उन्होंने मोरपङ्ख और गुञ्जाकी

५१२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

मालासे आबद्ध टेढ़े मुकुट धारण कर रखे थे।

वे रथसे तुरंत ही उतरकर श्रीहरिके चरणोंमें प्रणाम करके ब्राह्मणपत्नियोंसे बोले—'आपलोग इस विमानपर चढ़ जायँ।' ब्राह्मणपत्नियाँ श्रीहरिको नमस्कार करके मनोवाञ्छित गोलोकमें जा पहुँचीं। वे मानव-देहका त्याग करके तत्काल दिव्य गोपी हो गयीं। तत्पश्चात् श्रीहरिने वैष्णवी मायाके द्वारा उनकी छायाका निर्माण करके स्वयं ही उन्हें ब्राह्मणोंके घरोंमें भेज दिया। ब्राह्मण-लोग अपनी पत्नियोंके लिये मन-ही-मन बहुत उद्विग्न थे और सब ओर उनकी खोज कर रहे थे। इसी समय रास्तेमें उन्हें अपनी पत्नियाँ दिखायी दीं। उन्हें देखकर सब ब्राह्मणोंके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे। सम्पूर्ण अङ्ग पुलकित हो गये और वे विनयपूर्वक उनसे बोले।

**ब्राह्मणोंने कहा—**अहो! तुम सब लोग परम धन्य हो; क्योंकि तुमने साक्षात् परमेश्वरके दर्शन किये हैं। हमारा जीवन व्यर्थ है। हम-लोगोंका वेदपाठ भी निरर्थक है। वेद और पुराणमें सर्वत्र विद्वानोंद्वारा श्रीहरिकी ही समस्त विभूतियोंका वर्णन किया गया है। सबके जनक श्रीहरि ही हैं। तप, जप, व्रत, ज्ञान, वेदाध्ययन, पूजन, तीर्थ-स्नान और उपवास—सबके फलदाता श्रीकृष्ण ही हैं। जिसने श्रीकृष्णकी सेवा कर ली, उसे तपस्याओंके फलोंसे क्या प्रयोजन है? जिसे कल्पवृक्षकी प्राप्ति हो गयी, वह दूसरे किसी वृक्षको लेकर क्या करेगा? जिसके हृदयमें श्रीकृष्ण विराजमान हैं, उसे यज्ञादि कर्मोंके अनुष्ठानकी क्या आवश्यकता है? जिसने समुद्रको पी लिया, उसके लिये कुआँ लाँघनेमें क्या पुरुषार्थ है?*

ऐसा कहकर ब्राह्मणलोग उन श्रेष्ठ कामिनियोंको साथ ले हर्षपूर्वक अपने घरको लौटे और उनके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगे। उन सबका क्रीड़ामें तथा अन्य सब कर्मोंमें पहलेवाली स्त्रियोंकी अपेक्षा अधिक प्रेम तथा उदारभाव प्रकट होता था; परंतु मायाशक्तिसे प्रभावित होनेके कारण ब्राह्मणलोग उसका अनुमान नहीं कर पाते थे। उधर सनातन पूर्णब्रह्म नारायणस्वरूप श्रीकृष्ण बलराम तथा ग्वालबालोंके साथ शीघ्र ही अपने घरको चले गये। इस प्रकार मैंने श्रीहरिका सम्पूर्ण उत्तम माहात्म्य कह सुनाया। इसे मैंने पूर्वकालमें अपने पिता धर्मके मुखसे सुना था। नारद! अब तुम और क्या सुनना चाहते हो?

**नारदजीने पूछा—**ऋषीन्द्र! किस पुण्यके प्रभावसे उन ब्राह्मणपत्नियोंको ऐसी गति प्राप्त हुई, जो बड़े-बड़े मुनीश्वरों तथा योगसिद्ध पुरुषोंके लिये भी दुर्लभ है। पूर्वकालमें ये पुण्यवती स्त्रियाँ कौन थीं और किस दोषसे इस भूतलपर आयी थीं। मेरे इस संदेहका निवारण करनेवाली बात कहिये।

**भगवान् श्रीनारायण बोले—**नारद! ये देवियाँ सप्तर्षियोंकी सुन्दर रूप-गुण-सम्पन्ना पतिव्रता पत्नियाँ थीं। एक बार अनलदेवने इनका अङ्ग


*अहोऽतिधन्या यूयं च दृष्टो युष्माभिरीश्वरः। अस्माकं जीवनं व्यर्थं वेदपाठोऽप्यनर्थकः॥
वेदे पुराणे सर्वत्र विद्वद्भिः परिकीर्तितम्। हरेर्विभूतयः सर्वाः सर्वेषां जनको हरिः॥
तपो जपो व्रतं ज्ञानं वेदाध्ययनमर्चनम्। तीर्थस्नानमनशनं सर्वेषां फलदो हरिः॥
श्रीकृष्णः सेवितो येन किं तस्य तपसां फलैः। प्राप्तः कल्पतरुर्येन किं तस्यान्येन शाखिना॥
श्रीकृष्णो हृदये यस्य किं तस्य कर्मभिः कृतैः। किं पीतसागरस्यैव पौरुषं कूपलङ्घने॥
(१८। ६६–७०)

७६- श्रीकृष्णके विरहसे संतप्त कालियदहमें प्रवेश करनेके लिये उद्यत यशोदा, राधा और मूर्च्छित हुए नन्दराय आदि गोप-गोपियोंको बलरामजीद्वारा समझाया जाना

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५१३

स्पर्श कर लिया। इससे सप्तर्षियोंमें अङ्गिराको बड़ा क्षोभ हुआ और उन्होंने अग्निको 'सर्वभक्ष्य' होनेका तथा इन पत्नियोंको मानुषी योनिमें जानेका शाप दे दिया। ये सब रोती हुई बोलीं—'हमलोग निर्दोष हैं, पतिव्रता हैं। हमारा त्याग न करें। आप हम डरी हुई अबलाओंको अभय प्रदान करें।'

इनके करुण-क्रन्दनसे मुनिको दया आ गयी। वे भी दुःखी हो गये। अन्तमें उन्होंने कहा कि तुम्हें मानुषी योनिमें जाना तो होगा; परंतु तुम्हें वहाँ साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णके दर्शन प्राप्त होंगे। उनके दर्शन होते ही तुम गोलोकमें चली जाओगी। फिर श्रीहरि अपनी योगमायासे तुमलोगोंकी छायामूर्तिका निर्माण करेंगे। वे तुम्हारी छायामूर्तियाँ कुछ समयतक उन ब्राह्मणोंके घरोंमें रहकर फिर हमारे यहाँ लौट आयेंगी। इस प्रकार तुम अपने छायांशसे पुनः हमारी पत्नियाँ हो जाओगी। अतएव यह मेरा शाप तुम्हारे लिये वरदानसे भी उत्कृष्ट है।

ऐसा कहकर वे मुनि चुप हो गये। उनके मनमें इसके लिये बड़ा दुःख था। वे स्त्रियाँ शापवश भूतलपर आकर उन ब्राह्मणोंकी पत्नियाँ हुईं और श्रीहरिको भक्तिभावसे अन्न समर्पित करके वे उनके धामको चली गयीं। निश्चय ही उनका शाप उनके लिये श्रेष्ठ सम्पत्तिसे भी अधिक महत्त्वशाली हुआ। नीच पुरुषसे मिली हुई सम्पत्ति भी निन्दनीय है; किंतु महात्मा पुरुषसे प्राप्त हुई विपत्ति भी श्रेष्ठ है। अहो! साधुपुरुषोंका कोप तत्काल ही उपकारमें बदल जाता है। विपत्तिके बिना भूतलपर किसीकी महिमा कैसे प्रकट हो सकती है? पतियोंके परित्यागसे भूमिपर उत्पन्न हुई ब्राह्मणपत्नियाँ श्रीहरिके दर्शनसे सदाके लिये भवबन्धनसे मुक्त हो गयीं*। इस प्रकार मैंने श्रीहरिके इस उत्तम चरित्रको पूर्णरूपेण कह सुनाया। उन पुण्यवती ब्राह्मणियोंके मोक्षकी यह मनोरम कथा अद्भुत है। विप्रवर! श्रीकृष्णकी लीला-कथा पद-पदमें नयी-नयी जान पड़ती है। इसे सुननेवालोंको कभी तृप्ति नहीं होती है। भला, श्रेय (कल्याणमयी कथाके श्रवण)-से कौन तृप्त होता है? मैंने पूज्य पिताजीके मुखसे जितना रमणीय भगवच्चरित्र सुना था, उसका वर्णन किया। अब तुम अपनी इच्छा बताओ। फिर क्या सुनना चाहते हो?

नारदजीने कहा—कृपानिधान! जगद्गुरो! आपने पूर्वकालमें पिताके मुखसे श्रीकृष्णकी जो-जो मङ्गलमयी लीलाएँ सुनी हैं, वे सब मुझे सुनाइये।

सूतजी कहते हैं—शौनक! देवर्षिका यह वचन सुनकर भगवान् नारायणने स्वयं ही श्रीकृष्णमहिमाके अन्यान्य प्रसङ्गोंका वर्णन आरम्भ किया। (अध्याय १८)


* निन्दनीयाच्च सम्पत्तेर्विपत्तिर्महतो वरा। अहो सद्यः सतां कोपश्चोपकाराय कल्पते॥
विना विपत्तेर्महिमा कुतः कस्य भवेद्भुवि। भूताः कान्तपरित्यागान्मुक्ता ब्राह्मणयोषितः॥
(१८। १२५-१२६)

७७- व्रजवासियों और व्रजाङ्गनाओंका कालियदहके जलसे ऊपर उछलते हुए श्रीकृष्णको देखना

५१४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

श्रीकृष्णका कालियदहमें प्रवेश, नागराजका उनपर आक्रमण, श्रीकृष्णद्वारा उसका दमन, नागपत्नी सुरसाद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति, श्रीकृष्णकी उसपर कृपा, सुरसाका गोलोक-गमन, छायामयी सुरसाकी सृष्टि, कालियको वरदान, कालियद्वारा भगवान्‌की स्तुति, उस स्तुतिकी महिमा, नागका रमणक द्वीपको प्रस्थान, कालियका यमुनाजलमें निवासका कारण, गरुडका भय, सौभरिके शापसे कालियदहतक जानेमें गरुड़की असमर्थता, श्रीकृष्णके कालियदहमें प्रवेश करनेसे ग्वालबालों तथा नन्द आदिकी व्याकुलता, बलरामका समझाना, श्रीकृष्णके निकल आनेसे सबको प्रसन्नता, दावानलसे व्रजवासियोंकी रक्षा तथा नन्दभवनमें उत्सव

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! एक दिन बलदेवको साथ लिये बिना ही श्रीकृष्ण अन्यान्य ग्वालबालोंके साथ यमुनाके उस तटपर चले गये, जहाँ कालियनागका निवासस्थान था। स्वेच्छामय शरीर धारण करनेवाले भगवान् नन्दनन्दन यमुना-तटवर्ती वनमें पके हुए फलोंको खाकर जब प्यास लगती, तब वहाँका निर्मल जल पी लेते थे। उन्होंने गोप-शिशुओंके साथ कुछ कालतक गौएँ चरायीं। तत्पश्चात् उन्हें तो एक जगह विश्रामके लिये खड़ी कर दिया और स्वयं साथियोंके साथ खेल-कूदमें लग गये; खेलमें इनका मन लग गया। ग्वालबाल भी बड़े हर्षके साथ उसमें भाग लेने लगे। उधर गौएँ नयी-नयी घास चरती हुई आगे बढ़ गयीं और यमुनाका विषमिश्रित जल पीने लगीं। मुने! दारुण कालकी चेष्टासे वह विषाक्त जल पीकर कालकूटकी ज्वालाओंसे संतप्त हो उन गौओंने तत्काल प्राण त्याग दिये। झुंड-की-झुंड गौओंको मरी हुई देख गोपबालक चिन्तासे व्याकुल और भयभीत हो उठे। उनके मुखपर विषाद छा गया और उन सबने आकर मधुसूदन श्रीकृष्णसे यह बात कही। सारा रहस्य जानकर जगन्नाथ श्रीहरिने उन सब गौओंको जीवित कर दिया। वे गौएँ तत्काल उठकर खड़ी हो गयीं और श्रीहरिका मुँह देखने लगीं। इधर श्रीकृष्ण यमुनातटवर्ती जलके निकट उत्पन्न हुए कदम्बपर चढ़कर उस सर्पके भवनमें बहुत-से नागोंके बीच कूद पड़े। उनके जलमें पड़ते ही उस कुण्डका पानी सौ हाथ ऊपर उठ गया। नारद! यह देख ग्वालबालोंको पहले तो हर्ष हुआ, फिर वे बड़े दुःखका अनुभव करने लगे। कालियसर्प मनुष्यकी आकृतिमें आये हुए श्रीहरिको देखकर क्रोधसे विह्वल हो उठा और तुरंत ही उन्हें निगल गया। जैसे किसी मनुष्यने जल्दबाजीमें तपे हुए लोहेको थाम लिया हो, वैसे ही ब्रह्मतेजसे उसका कण्ठ और पेट जलने लगा।

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५१५

वह नाग उद्विग्न हो गया और 'हाय! हाय! मेरे प्राण निकले जा रहे हैं'—यों कहकर उसने पुनः उन्हें उगल दिया। श्रीकृष्णके वज्रोपम अङ्गोंको चबानेसे उसके सारे दाँत टूट गये और मुँह लहूलुहान हो गया। भगवान् उस समय रक्तरंजित मुखवाले कालिय नागके मस्तकपर चढ़ गये। विश्वम्भरके भारसे आक्रान्त हो कालिय नाग प्राण त्याग देनेको उद्यत हो गया। मुने! उसने रक्त वमन किया और मूर्च्छित होकर वह गिर पड़ा। उसे मूर्च्छित देख सब नाग प्रेमसे विह्वल हो रोने लगे। कोई भाग गये और कोई डरके मारे बिलमें घुस गये। अपने प्रियतमको मरणोन्मुख हुआ देख नागपत्नी सती सुरसा दूसरी नागिनियोंके साथ श्रीहरिके सामने आयी और पति-प्रेमसे रोने लगी। उसने दोनों हाथ जोड़कर शीघ्र ही भयसे श्रीहरिको प्रणाम किया और उनके दोनों चरणारविन्द पकड़कर व्याकुल हो उनसे कहा।

सुरसा बोली—हे जगदीश्वर! आप मुझे मेरे स्वामीको लौटा दीजिये। दूसरोंको मान देनेवाले प्रभो! मुझे भी मान दीजिये। स्त्रियोंको पति प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय होता है। उनके लिये पतिसे बढ़कर दूसरा कोई बन्धु नहीं है। नाथ! आप देवेश्वरोंके भी स्वामी, अनन्त प्रेमके सागर, उत्तम बन्धु, सम्पूर्ण भुवनोंके बान्धव तथा श्रीराधिकाजीके लिये प्रेमके समुद्र हैं। अतः मेरे प्राणनाथका वध न कीजिये। आप विधाताके भी विधाता हैं। इसलिये यहाँ मुझे पतिदान दीजिये। त्रिनेत्रधारी महादेवके पाँच मुख हैं; ब्रह्माजीके चार और शेषनागके सहस्र मुख हैं; कार्तिकेयके भी छः मुख हैं; परंतु ये लोग भी अपने मुख-समूहोंद्वारा आपकी स्तुति करनेमें जडवत् हो जाते हैं। साक्षात् सरस्वती भी आपका स्तवन करनेमें समर्थ नहीं हैं। सम्पूर्ण वेद, अन्यान्य देवता तथा संत-महात्मा भी आपकी स्तुतिके विषयमें शक्तिहीनताका ही परिचय देते हैं। कहाँ तो मैं कुबुद्धि, अज्ञ एवं नारियोंमें अधम सर्पिणी और कहाँ सम्पूर्ण भुवनोंके परम आश्रय तथा किसीके भी दृष्टिपथमें न आनेवाले आप परमेश्वर! जिनकी स्तुति ब्रह्मा, विष्णु और शेषनाग करते हैं, उन मानव-वेषधारी आप निराकार परमेश्वरकी स्तुति मैं करना चाहती हूँ, यह कैसी विडम्बना है? पार्वती, लक्ष्मी तथा वेदजननी सावित्री जिनके स्तवनसे डरती हैं और स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हो पातीं; उन्हीं आप परमेश्वरका स्तवन कलिकलुषमें निमग्न तथा वेद-वेदाङ्ग एवं शास्त्रोंके श्रवणमें मूढ़ स्त्री मैं क्यों करना चाहती हूँ, यह समझमें नहीं आता। आप रत्नमय पर्यङ्कपर रत्ननिर्मित भूषणोंसे भूषित हो शयन करते हैं। रत्नालंकारोंसे अलंकृत अङ्गवाली राधिकाके वक्षःस्थलपर विराजमान होते हैं। आपके सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित रहते हैं, मुखारविन्दपर मन्द मुस्कानकी प्रभा फैली होती है। आप उमड़ते हुए प्रेमरसके महासागरमें सदा सुखसे निमग्न रहते हैं। आपका मस्तक मल्लिका और मालतीकी मालाओंसे सुशोभित होता है। आपका मानस नित्य निरन्तर पारिजात पुष्पोंकी सुगन्धसे आमोदित रहा करता है। कोकिलके कलरव तथा भ्रमरोंके गुञ्जारवसे उद्दीपित प्रेमके कारण आपके अङ्ग उठी हुई पुलकावलियोंसे अलंकृत रहते हैं। जो सदा प्रियतमाके दिये हुए ताम्बूलका सानन्द

५१६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

चर्वण करते हैं; वेद भी जिनकी स्तुति करनेमें असमर्थ हैं तथा बड़े-बड़े विद्वान् भी जिनके स्तवनमें जडवत् हो जाते हैं; उन्हीं अनिर्वचनीय परमेश्वरका स्तवन मुझ-जैसी नागिन क्या कर सकती है? मैं तो आपके उन चरणकमलोंकी वन्दना करती हूँ, जिनका सेवन ब्रह्मा, शिव और शेष करते हैं तथा जिनकी सेवा सदा लक्ष्मी, सरस्वती, पार्वती, गङ्गा, वेदमाता सावित्री, सिद्धोंके समुदाय, मुनीन्द्र और मनु करते हैं। आप स्वयं कारणरहित हैं, किंतु सबके कारण आप ही हैं। सर्वेश्वर होते हुए भी परात्पर हैं स्वयंप्रकाश, कार्य-कारणस्वरूप तथा उन कार्य-कारणोंके भी अधिपति हैं। आपको मेरा नमस्कार है। हे श्रीकृष्ण ! हे सच्चिदानन्दघन ! हे सुरासुरेश्वर ! आप ब्रह्मा, शिव, शेषनाग, प्रजापति, मुनि, मनु, चराचर प्राणी, अणिमा आदि सिद्धि, सिद्ध तथा गुणोंके भी स्वामी हैं। मेरे पतिकी रक्षा कीजिये, आप धर्म और धर्मीके तथा शुभ और अशुभके भी स्वामी हैं। सम्पूर्ण वेदोंके स्वामी होते हुए भी उन वेदोंमें आपका अच्छी तरह निरूपण नहीं हो सका है। सर्वेश्वर ! आप सर्वस्वरूप तथा सबके बन्धु हैं। जीवधारियों तथा जीवोंके भी स्वामी हैं। अतः मेरे पतिकी रक्षा कीजिये।

इस प्रकार स्तुति करके नागराजवल्लभा सुरसा भक्तिभावसे मस्तक झुका श्रीकृष्णके चरणकमलोंको पकड़कर बैठ गयी। नागपत्नीद्वारा किये गये इस स्तोत्रका जो त्रिकाल संध्याके समय पाठ करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो अन्ततोगत्वा श्रीहरिके धाममें चला जाता है। उसे इहलोकमें श्रीहरिकी भक्ति प्राप्त होती है और अन्तमें वह निश्चय ही श्रीकृष्णका दास्य-सुख पा जाता है। वह श्रीहरिका पार्षद हो सालोक्य आदि चतुर्विध मुक्तियोंको करतलगत कर लेता है।

**नारदजीने पूछा—**नागपत्नीकी बात सुनकर हर्षसे उत्फुल्ल नेत्रोंवाले सर्वनन्दन भगवान् गोविन्दने स्वयं उससे क्या कहा? महाभाग ! यह अत्यन्त अद्भुत रहस्य मुझसे बताइये।

**भगवान् नारायणने कहा—**मुने! नागपत्नी भयसे व्याकुल हो हाथ जोड़कर भगवान्‌के चरणोंमें पड़ी थी। उसकी उपर्युक्त बातें सुनकर श्रीकृष्णने उससे इस प्रकार कहा—

**श्रीकृष्ण बोले—**नागेश्वरि ! उठो, उठो। भय छोड़ो और वर माँगो। मात:! मेरे वरके प्रभावसे अजर-अमर हुए अपने पतिको ग्रहण करो और यमुनाका हृद छोड़कर अपने घरको चली जाओ। वत्से ! अपने पति और परिवारके साथ अभीष्ट स्थानको पधारो। नागेशि ! आजसे तुम मेरी कन्या हुई और तुम्हारे प्राणोंसे भी अधिक प्रियतम यह नागराज मेरे जामाता हुए; इसमें संशय नहीं है। शुभे ! मेरे चरणकमलोंके चिह्नसे युक्त होनेके कारण तुम्हारे पतिको अब गरुड कष्ट नहीं देंगे, अपितु भक्तिभावसे स्तुति करके मेरे चरणचिह्नको प्रणाम करेंगे। अब तुम गरुडका भय छोड़ो और शीघ्र रमणक द्वीपको चली जाओ। बेटी ! इस हृदसे निकलो और इच्छानुसार वर माँगो।

श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर सुरसाके नेत्र और मुख हर्षसे खिल उठे। उसकी आँखोंमें आँसू भर आये तथा उसने भक्ति-भावसे मस्तक झुकाकर कहा।

**सुरसा बोली—**वरदाता परमेश्वर ! पिताजी ! यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं तो अपने चरणकमलोंकी सुदृढ़ एवं अविचल भक्ति प्रदान कीजिये। मेरा मन भ्रमरकी भाँति सदा आपके चरणारविन्दपर ही मँडराता रहे। मुझे आपके स्मरणकी कभी विस्मृति न हो, मेरा कान्तविषयक सौभाग्य सदा बना रहे और ये मेरे प्राणवल्लभ ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ हो जायँ। प्रभो ! यही मेरी प्रार्थना है; इसे पूर्ण कीजिये।

७८- भाण्डीरवटके नीचे रत्नमय सिंहासनपर विराजमान श्रीकृष्णको अत्यन्त विस्मित होकर तथा हाथ जोड़कर ब्रह्माजीका प्रणाम करना

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५१७


ऐसा कहकर नागपत्नी श्रीहरिके सामने नत हुई खड़ी हो गयी। उसने शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाको लज्जित करनेवाले श्रीहरिके मुखचन्द्रका दर्शन किये। उस सतीने अपने दोनों नेत्रोंसे निमेषरहित होकर गोविन्दके मुखकी सौन्दर्यमाधुरीका पान किया। उसके सारे अङ्ग पुलकित हो उठे। वह आनन्दके आँसुओंमें डूब गयी। श्रीहरिको सुन्दर बालकके रूपमें देखकर वह उनके प्रति पुत्रोचित स्नेह करने लगी और भक्तिके उद्रेकसे आप्लावित हो पुनः इस प्रकार बोली—'गोविन्द! मैं रमणक-द्वीपमें नहीं जाऊँगी। वहाँ मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। यह सर्प वहाँ जाकर संसार चलावे, मुझे तो आप अपनी किङ्करी बना लीजिये! हे श्रीकृष्ण! मेरे मनमें सालोक्य आदि चार प्रकारकी मुक्तिके लिये भी इच्छा नहीं है; क्योंकि वह मुक्ति आपके चरणारविन्दोंकी सेवाकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं है। जो भारतवर्षमें दुर्लभ जन्म पाकर आपसे आपकी चरणसेवाके अतिरिक्त दूसरे वरकी इच्छा करता है, वह स्वयं ठगा गया*।'

नागपत्नीकी यह बात सुनकर श्रीकृष्णके मुखारविन्दपर मुस्कराहट फैल गयी। उनका मन प्रसन्न हो गया और उन श्रीमान् माधवने 'एवमस्तु' कहकर उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। इसी बीचमें उत्तम रत्नोंके सारतत्त्वसे निर्मित दिव्य विमान वहाँ तत्काल उतर आया। मुने! वह अपने तेजसे उद्दीप्त हो रहा था। उसपर अनेक श्रेष्ठ पार्षद बैठे थे तथा उसे दिव्य वस्त्रों एवं मालाओंसे सजाया गया था। उसमें सौ पहिये लगे थे। वह वायुके समान वेगशाली तथा मनकी गतिसे चलनेवाला था। देखनेमें बड़ा ही मनोहर था। श्यामसुन्दरके श्याम कान्तिवाले सेवक तुरंत ही उस रथसे उतरे और श्रीकृष्णको प्रणाम करके सुरसाको साथ ले उत्तम गोलोकधामको चले गये।

तत्पश्चात् श्रीहरिने अपने तेजसे छायारूपिणी सुरसाकी सृष्टि करके उसे सर्पको दे दिया। कालियनाग यह सब कुछ न जान सका; क्योंकि वह वैष्णवी मायासे विमोहित था। सर्पके मस्तकसे उतरकर करुणानिधान श्रीकृष्णने कृपापूर्वक शीघ्र ही कालियके सिरपर अपना हाथ रखा। हाथ रखते ही उसके शरीरमें चेतना लौट आयी और उसने श्रीहरिको अपने सामने देखा तथा इस बातकी ओर भी लक्ष्य किया कि सती सुरसा दोनों हाथ जोड़े खड़ी है और उसके नेत्रोंसे आँसू बह रहे हैं। यह देख उसने भी गोविन्दको प्रणाम किया और तत्काल प्रेमसे विह्वल होकर वह रोने लगा। कृपानिधान भगवान्‌ने देखा नागराज रो रहा है और सुरसा भक्तिके उद्रेकसे पुलकित हो नेत्रोंसे आँसू बहा रही है; किंतु कुछ बोल नहीं रही है। तब वे दयानिधि स्वयं बोले; क्योंकि योग्य और अयोग्य प्राणीपर भी ईश्वरकी कृपा सदा समान रूपसे ही रहती है।

श्रीकृष्णने कहा—कालिय! तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो। वत्स! तुम मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हो। भय छोड़ो और सुखसे रहो। जो मेरा अत्यन्त भक्त हो और मेरे अंशसे उत्पन्न हुआ हो, उसपर मैं विशेष अनुग्रह करता हूँ। उसके अभिमानको मिटानेके लिये उसका किञ्चित् दमन करके मैं पुनः उसपर कृपा करता हूँ। जो लोग तुम्हारे वंशमें उत्पन्न हुए सर्पोंका विनाश करेंगे, उनको महान् पाप लगेगा और वे दुःखोंके भागी होंगे। परंतु जो लोग तुम्हारे कुलमें उत्पन्न हुए सर्पोंको देखकर उनके मस्तकपर उभरे हुए मेरे सुन्दर चरणचिह्नोंको भक्तिभावसे प्रणाम करेंगे, वे समस्त पातकोंसे मुक्त हो जायँगे। तुम शीघ्र रमणक द्वीपको जाओ


* विना त्वत्पादसेवां च यो वाञ्छति वरान्तरम् । भारते दुर्लभं जन्म लब्ध्वासौ वञ्चितः स्वयम् ॥
(१९। ५२)

५१८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

और गरुड़का भय छोड़ दो। तुम्हारे मस्तकपर मेरे चरणचिह्नको देखकर गरुड़ भक्तिभावसे तुम्हें नमस्कार करेंगे। तुमको और तुम्हारे वंशजोंको गरुड़से कभी भय नहीं होगा। आजसे मेरा वर पाकर अपनी जातिके सर्पोंमें तुम सर्वश्रेष्ठ हो जाओ। वत्स! तुमको और कौन-सा उत्तम वर अभीष्ट है? उसे इस समय माँगो। मैं तुम्हारा दुःख दूर करनेवाला हूँ; अतः भय छोड़कर मुझसे मनकी बात कहो।

श्रीकृष्णकी बात सुनकर कालियनाग, जो भयसे काँप रहा था, दोनों हाथ जोड़कर उनसे बोला।

**कालियने कहा—**वरदायक प्रभो! दूसरे किसी वरके लिये मेरी इच्छा नहीं है। प्रत्येक जन्ममें मेरी आपके चरणकमलोंमें भक्ति बनी रहे और मैं सदा आपके उन चरणारविन्दोंका चिन्तन करता रहूँ; यही वर मुझे दीजिये। जन्म ब्राह्मणके कुलमें हो या पशु-पक्षियोंकी योनियोंमें, सब समान है। वही जन्म सफल है, जिसमें आपके चरणकमलोंकी स्मृति बनी रहे। यदि आपके चरणोंका स्मरण न हो तो देवता होकर स्वर्गमें रहना भी निष्फल है। जो आपके चरणोंके चिन्तनमें तत्पर है, उसे जो भी स्थान प्राप्त हो, वही सबसे उत्तम है। उस पुरुषकी आयु एक क्षणकी हो या करोड़ों कल्पोंकी अथवा उसकी आयु तत्काल ही क्षीण होनेवाली क्यों न हो; यदि वह आपकी आराधनामें बीत रही है तो सफल है, अन्यथा उसका कोई फल नहीं है—वह व्यर्थ है। जो आपके चरणारविन्दोंके सेवक हैं, उनकी आयु व्यर्थ नहीं जाती, सार्थक होती है। उन्हें जन्म-मरण, रोग-शोक और पीड़ाका कुछ भी भय नहीं रहता—वे इनकी कुछ भी परवाह नहीं करते। भक्तोंके मनमें आपके चरणोंकी सेवाको छोड़कर इन्द्रपद, अमरत्व अथवा परम दुर्लभ ब्रह्मपदको भी पानेकी इच्छा नहीं होती। आपके भक्तजन सालोक्य आदि चार प्रकारकी मुक्तियोंको अत्यन्त फटे पुराने वस्त्रके चिथड़ेके समान तुच्छ देखते हैं*। ब्रह्मन्! मैंने भगवान् अनन्तके मुखसे ज्यों ही आपके मन्त्रका उपदेश प्राप्त किया, त्यों ही आपकी भावना करते-करते आपके अनुग्रहसे मैं आपके समान वर्णवाला हो गया। मैं अपक्व भक्त था अर्थात् मेरी भक्ति परिपक्व नहीं हुई थी। यह जानकर ही स्वयं सुदृढ़ भक्ति धारण करनेवाले गरुड़ने मुझे देशसे दूर कर दिया और धिक्कारा था। परंतु वरदेश्वर! अब आपने मुझे अविचल भक्ति दे दी है। गरुड़ भी भक्त हैं, मैं भी भक्त हो गया हूँ; अतः अब वे मेरा त्याग नहीं कर सकते हैं। आपके चरणारविन्दोंके चिह्नसे अलंकृत मेरे श्रीयुत मस्तकको देखकर गरुड़ मुझे सदोष होनेपर भी गुणवान् मानेंगे; अतः इस समय मेरा त्याग नहीं कर सकेंगे। अब तो वे यह मानकर कि नागेन्द्रगण हमारे आराध्य हैं, मुझे कष्ट नहीं देंगे। परमेश्वर! अब मैं उनका वध्य नहीं रहा। उन गुरुदेव अनन्तके सिवा मुझे कहीं किसीसे भी भय नहीं है। देवेन्द्रगण, देवता, मुनि, मनु और मानव—जिन्हें स्वप्नमें तथा ध्यानमें भी नहीं देख पाते हैं—वे ही परमात्मा इस समय मेरे


* तन्निष्फलः स्वर्गवासो नास्ति यस्य स्मृतिस्तव। त्वत्पदध्यानयुक्तस्य यत्तत् स्थानं च तत्परम्॥
क्षणं वा कोटिकल्पं वा पुरुषायुश्च यस्तथा। यदि त्वत्सेवया याति सफलो निष्फलोऽन्यथा॥
तेषां चायुः क्षयो नास्ति ये त्वत्पादाब्जसेवकाः। न सन्ति जन्ममरणरोगशोकार्तिभीतयः॥
इन्द्रत्वे चामरत्वे वा ब्रह्मत्वे चातिदुर्लभे। वाञ्छा नास्त्येव भक्तानां त्वत्पादसेवनं विना॥
सुजीर्णपटखण्डस्य समं तन्नूनमेव वा। पश्यन्ति भक्ताः किं चान्यत् सालोक्यादिचतुष्टयम्॥
(१९।७६–८०)

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५१९ नेत्रोंके विषय हो रहे हैं। प्रभो! आप तो भक्तोंके अनुरोधसे साकार रूपमें प्रकट हुए हैं; अन्यथा आपको शरीरकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? सगुण-साकार तथा निर्गुण-निराकार भी आप ही हैं। आप स्वेच्छामय, सबके आवासस्थान तथा समस्त चराचर जगत्के सनातन बीज हैं। सबके ईश्वर, साक्षी, आत्मा और सर्वरूपधारी हैं। ब्रह्मा, शिव, शेष, धर्म और इन्द्र आदि देवता तथा वेदों और वेदाङ्गोंके पारङ्गत विद्वान् भी जिन परमेश्वरकी स्तुति करनेमें जडवत् हो जाते हैं, उन्हीं सर्वव्यापी प्रभुका स्तवन क्या एक सर्प कर सकेगा? हे नाथ! हे करुणासिन्धो! हे दीनबन्धो! आप मुझ अधमको क्षमा कीजिये। श्रीकृष्ण! मैंने अपने खल स्वभाव और अज्ञानके कारण आपको चबा डालनेका प्रयत्न किया; परंतु आप तो आकाशकी भाँति सर्वत्र व्यापक तथा अमूर्त हैं; अतः किसी भी अस्त्रके लक्ष्य नहीं हैं। न तो आपका अन्त देखा जा सकता है और न लाँघा ही जा सकता है। न तो कोई आपका स्पर्श कर सकता है और न आपपर आवरण ही डाल सकता है। आप स्वयं प्रकाशरूप हैं। ऐसा कहकर नागराज कालिय भगवान्के चरणकमलोंमें गिर पड़ा। भगवान् उसपर संतुष्ट हो गये। उन्होंने 'एवमस्तु' कहकर उसे सम्पूर्ण अभीष्ट वर दे दिया। जो नागराजद्वारा किये गये स्तोत्रका प्रातःकाल उठकर पाठ करता है, उसे तथा उसके वंशजोंको कभी नागोंसे भय नहीं होता। वह भूतलपर नागोंकी शय्या बनाकर सदा उसपर शयन कर सकता है। उसके भोजनमें विष और अमृतका भेद नहीं रह जाता। जिसको नागने ग्रस लिया हो, काट खाया हो अथवा विषैला भोजन करनेसे जिसके प्राणान्तकी सम्भावना हो गयी हो, वह मनुष्य भी इस स्तोत्रको सुननेमात्रसे स्वस्थ हो जाता है। जो इस स्तोत्रको भोजपत्रपर लिखकर भक्तिभावसे युक्त हो कण्ठमें या दाहिने हाथमें धारण करता है, उसे भी नागोंसे भय नहीं होता। जिस घरमें यह स्तोत्र पढ़ा जाता है, वहाँ कोई नाग नहीं ठहरता। निश्चय ही उस घरमें विष, अग्नि तथा वज्रका भय नहीं प्राप्त होता। इहलोकमें श्रीहरिकी भक्ति और स्मृति उसे सदा सुलभ होती है तथा अन्तमें अपने कुलको पवित्र करके निश्चय ही वह श्रीकृष्णका दास्यभाव प्राप्त कर लेता है। भगवान् नारायण कहते हैं-नारद! नागराजको अभीष्ट वर देकर जगदीश्वर श्रीहरिने पुनः उससे मधुर वचन कहे, जो परिणाममें सुख देनेवाले थे। श्रीकृष्ण बोले-नागराज! तुम यमुना- जलके मार्गसे ही परिवारसहित रमणकद्वीपमें चले जाओ। वह स्थान इन्द्रनगरके समान श्रेष्ठ एवं सुन्दर है। श्रीहरिकी यह आज्ञा सुनकर नाग प्रेमविह्वल होकर रोने लगा और बोला- 'नाथ ! मैं आपके चरणकमलोंका कब दर्शन करूँगा?' वह महेश्वर श्रीकृष्णको सैकड़ों बार प्रणाम करके स्त्री और परिवारके साथ जलके ही मार्गसे चला गया। जाते समय नागराज भगवद्-विरहसे व्याकुल हो रहा था। उसके चले जानेके बाद यमुनाके उस कुण्डका जल अमृतके समान हो गया। इससे समस्त जन्तुओंको बड़ी प्रसन्नता हुई। नारद! रमणकमें पहुँचकर कालियने इन्द्रनगरके समान सुन्दर भवन देखा। कृपासिन्धु श्रीकृष्णकी आज्ञासे साक्षात् विश्वकर्माने उसका निर्माण किया था। वहाँ नागराज कालिय अपनी पत्नी और पुत्रोंके साथ श्रीहरिके चिन्तनमें तत्पर हो भय छोड़कर बड़े हर्षके साथ रहने लगा। इस प्रकार श्रीहरिका सारा अद्भुत, सुखदायक, मोक्षप्रद तथा सारभूत चरित्र मैंने कह सुनाया। अब और क्या सुनना चाहते हो? सूतजी कहते हैं-महर्षि नारायणका उपर्युक्त

७९- नन्दद्वारा इन्द्रयज्ञकी तैयारी देखकर श्रीकृष्णका विस्मित होकर उनसे पूजनके स्वरूप आदिके विषयमें प्रश्न करना

५२०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

वचन सुनकर नारदजी हर्षविभोर हो गये। उन्होंने समस्त संदेहोंका निवारण करनेवाले उन महर्षिसे अपना संदेह इस प्रकार पूछा।

नारदजी बोले— जगद्गुरो! अपने पहलेके उत्तम भवनको छोड़कर कालिय यमुनातटको क्यों चला गया था? इसका रहस्य मुझे बताइये।

भगवान् श्रीनारायणने कहा— नारद! सुनो। मैं उस प्राचीन इतिहासका वर्णन कर रहा हूँ, जिसे मैंने सूर्यग्रहणके समय मलयाचलपर सुप्रभा नदीके पश्चिम किनारे श्रीकृष्ण-कथाके प्रसङ्गमें पिता धर्मके मुखसे सुना था। पुलहने धर्मसे अपना संदेह पूछा था, तब कृपानिधान धर्मने मुनियोंकी सभामें इस आश्चर्यमय आख्यानको सुनाया था। नारद! वहीं मैंने इसे सुना था, अतः कहता हूँ, सुनो।

भगवान् शेषकी आज्ञासे नागगण प्रतिवर्ष कार्तिककी पूर्णिमाको भयके कारण गरुड़देवकी पूजा करते हैं। पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और विविध उपहार-सामग्री अर्पित करके प्रसन्नतापूर्वक उनकी आराधना करते हैं। महातीर्थ पुष्करमें भक्तिपूर्वक भलीभाँति स्नान करके कालियने अहंकारवश उक्त तिथिको गरुड़की पूजा नहीं की। नागोंद्वारा जो पूजाकी सामग्री एकत्र की गयी थी, उसे कालियनाग बलपूर्वक खानेको उद्यत हो गया। तब सभी नाग उस मदमत्त कालियको रोकने तथा उसे नीतिकी बात बताने लगे। जब किसी तरह भी वे कालियको रोकनेमें समर्थ न हो सके, तब सहसा वहाँ पक्षिराज गरुड़ प्रकट हो गये। मुने! गरुड़को आया देख नागगण कालियके प्राणोंकी रक्षा करनेके लिये जबतक सूर्योदय नहीं हुआ, तबतक पूरी शक्ति लगाकर उनके साथ युद्ध करते रहे। अन्तमें पक्षिराजके तेजसे उद्विग्न हो वे सब-के-सब भाग खड़े हुए और सबके अभयदाता भगवान् अनन्तकी शरणमें गये। नागोंको भागते देख करुणानिधान कालिय वहाँ निःशङ्कभावसे खड़ा रहा। उसने गरुड़की ओर देखा और श्रीहरिके चरणारविन्दोंका चिन्तन करके गरुड़के साथ युद्ध आरम्भ कर दिया। एक मुहूर्ततक उन दोनोंमें अत्यन्त भयानक युद्ध हुआ। अन्तमें गरुड़के तेजसे नागराज कालियको पराजित होना पड़ा। फिर तो वह भागा और यमुनाजीके उसी कुण्डमें चला गया, जहाँ सौभरिके शापसे पक्षिराज गरुड़ नहीं जा सकते थे। गरुड़के भयसे नाग वहीं रहने लगा। पीछेसे उसके परिवारके लोग भी वहीं चले गये।

नारदजीने पूछा— भगवन्! गरुड़को सौभरिका शाप कैसे प्राप्त हुआ? परमेश्वरके वाहन होकर भी गरुड़ उस ह्रदमें क्यों नहीं जा सकते थे?

भगवान् श्रीनारायण बोले— उस कुण्डमें सौभरि मुनि एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक तपस्या करके महासिद्ध हो श्रीकृष्णके चरणकमलोंका ध्यान करते थे। उन ध्यानपरायण मुनिके समीप पक्षिराज गरुड़ यमुनाजीके जलमें तथा किनारे भी अपने गणोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक निःशङ्क विचरा करते थे। वे अपनी उत्कृष्ट इच्छासे प्रेरित हो बहुधा पूँछ (अथवा पंख) ऊपरको उठाकर मुनिके अगल-बगलमें उनकी सानन्द परिक्रमा करते हुए जाते-आते थे। एक दिन उन्होंने परिवारसहित विशालकाय मीनको देखा। देखते-ही-देखते गरुड़ने मुनीन्द्रके निकटसे ही उस मीनको चोंचसे पकड़ लिया। मछलीको मुँहमें दबाये जाते हुए गरुड़को मुनिने रोषभरी दृष्टिसे देखा। मुनिकी उस दृष्टिसे गरुड़ काँप उठे और वह महामत्स्य उनकी चोंचसे छूटकर पानीमें गिर पड़ा। गरुड़के डरसे वह मीन मुनिके पास ठहर गया—उनके शरणागत हो गया। जब गरुड़ पुनः उसे लेनेको उद्यत हुए, तब मुनीन्द्रने उनसे कहा।

सौभरि बोले— पक्षिराज! मेरे पाससे दूर हटो, दूर हटो। मेरे सामनेसे इस विशाल जीवको पकड़ लेनेकी तुममें क्या योग्यता है? तुम