ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ५३० | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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चरनेसे रोकता है, उसे ब्रह्महत्याका पाप लगता है तथा वह प्रायश्चित्त करनेपर ही शुद्ध होता है। पिताजी! सब देवता गौओंके अङ्गोंमें, सम्पूर्ण तीर्थ गौओंके पैरोंमें तथा स्वयं लक्ष्मी उनके गुह्य स्थानों (मल-मूत्रके स्थानों)-में सदा वास करती हैं। जो मनुष्य गायके पद-चिह्नसे युक्त मिट्टीद्वारा तिलक करता है, उसे तत्काल तीर्थस्नानका फल मिलता है और पग-पगपर उसकी विजय होती है। गौएँ जहाँ भी रहती हैं, उस स्थानको तीर्थ कहा गया है। वहाँ प्राणोंका त्याग करके मनुष्य तत्काल मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है। जो नराधम ब्राह्मणों तथा गौओंके शरीरपर प्रहार करता है; निःसंदेह उसे ब्रह्महत्याके समान पाप लगता है। जो नारायणके अंशभूत ब्राह्मणों तथा गौओंका वध करते हैं, वे मनुष्य जबतक चन्द्रमा और सूर्यकी सत्ता है, तबतकके लिये कालसूत्र नामक नरकमें जाते हैं*।
नारद! ऐसा कहकर श्रीकृष्ण चुप हो गये। तब आनन्दयुक्त नन्दने मुस्कराते हुए उनसे कहा।
नन्द बोले—बेटा! यह महात्मा महेन्द्रकी पूजा है, जो पूर्वपरम्परासे चली आ रही है। यह सुवृष्टिका साधन है और इससे सब प्रकारके मनोहर शस्योंकी उत्पत्ति ही साध्य है। शस्य ही प्राणियोंके प्राण हैं। शस्यसे ही जीवधारी जीवन-निर्वाह करते हैं। इसलिये व्रजवासी लोग पूर्व पीढ़ियोंके क्रमसे महेन्द्रकी पूजा करते चले आ रहे हैं। यह महान् उत्सव वर्षके अन्तमें होता है। विघ्न-बाधाओंकी निवृत्ति और कल्याणकी प्राप्ति ही इसका उद्देश्य है।
नन्दजीकी यह बात सुनकर बलरामसहित श्रीकृष्ण जोर-जोरसे हँसने लगे और पुनः प्रसन्नतापूर्वक पितासे बोले।
श्रीकृष्णने कहा—तात! आज मैंने आपके मुखसे बड़ी विचित्र और अद्भुत बात सुनी है। इसका कहीं भी निरूपण नहीं किया गया है कि इन्द्रसे वृष्टि होती है। आज आपके मुखसे अपूर्व नीतिवचन सुननेको मिला है। सूर्यसे जल उत्पन्न होता है और जलसे शस्य एवं वृक्ष उत्पन्न होते और बढ़ते हैं। उनसे अन्न और फल पैदा होते हैं तथा उन अन्नों और फलोंसे जीवधारी जीवननिर्वाह करते हैं। सूर्य अपनी किरणोंद्वारा जो धरतीका जल सोख लेते हैं, वर्षाकालमें उसी जलका उनसे प्रादुर्भाव होता है। सूर्य और मेघ आदि सबका विधाताद्वारा निरूपण होता है। पञ्चाङ्गोंके अनुसार जिस वर्षमें जो मेघ गज और समुद्र माने गये हैं, जो शस्याधिपति राजा और मन्त्री निश्चित किये गये हैं; उन सबका विधाताद्वारा ही निरूपण हुआ है। प्रत्येक वर्षमें जल, शस्य तथा तृणोंकी आढक-संख्या निश्चित की जाती है, उस निश्चयके अनुसार वर्ष-वर्षमें, युग-युगमें और कल्प-कल्पमें वे सारी बातें घटित होती हैं। ईश्वरकी इच्छासे ही जल आदिका आविर्भाव होता है। उसमें कोई बाधा नहीं पड़ती। तात! भूत, वर्तमान और भविष्य तथा महान्, क्षुद्र और मध्यम—जिस कर्मका विधाताने निरूपण किया है, उसका कौन निवारण कर सकता है? ईश्वरकी आज्ञासे ही ब्रह्माजीने सम्पूर्ण चराचर जगत्का निर्माण किया है। पहले भोजनकी
* भुक्तवन्तीं तृणं यश्च गां वारयति कामतः। ब्रह्महत्या भवेत् तस्य प्रायश्चित्ताद् विशुध्यति॥
सर्वे देवा गवामङ्गे तीर्थानि तत्पदेषु च। तद्गुह्येषु स्वयं लक्ष्मीस्तिष्ठत्येव सदा पितः॥
गोष्पदाक्तमृदा यो हि तिलकं कुरुते नरः। तीर्थस्नातो भवेत् सद्यो जयस्तस्य पदे पदे॥
गावस्तिष्ठन्ति यत्रैव तत्तीर्थं परिकीर्तितम्। प्राणांस्त्यक्त्वा नरस्तत्र सद्यो मुक्तो भवेद् ध्रुवम्॥
ब्राह्मणानां गवामङ्गं यो हन्ति मानवाधमः। ब्रह्महत्यासमं पापं भवेत् तस्य न संशयः॥
नारायणांशान् विप्रांश्च गाश्च ये घ्नन्ति मानवाः। कालसूत्रं च ते यान्ति यावच्चन्द्रदिवाकरौ॥
(२१। ९०-९५)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५३१
व्यवस्था होती है, उसके बाद जीव प्रकट होता है। बारंबार ऐसा होनेसे ही इस नियत व्यवस्थाको स्वभाव कहते हैं। स्वभावसे कर्म होता है और कर्मके अनुसार जीवधारियोंको सुख-दुःखका भोग प्राप्त होता है। यातना, जन्म-मरण, रोग-शोक, भय, उत्पत्ति, विपत्ति, विद्या, कविता, यश, अपयश, पुण्य, स्वर्गवास, पाप, नरकनिवास, भोग, मोक्ष और श्रीहरिका दास्य—ये सब मनुष्योंको कर्मके अनुसार उपलब्ध होते हैं। ईश्वर सबके जनक हैं। शील और कर्मोंका अभ्यास विधाताके लिये भी फलदाता होता है। सब कुछ ईश्वरकी इच्छासे ही सम्भव होता है। विराट् पुरुषसे प्रकृति, पञ्चतत्त्व, जगत्, कूर्म, शेष, धरणी तथा ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त सम्पूर्ण चराचर पदार्थोंका निर्माण हुआ है। जिनकी आज्ञासे वायु कूर्मको, कूर्म शेषको, शेष अपने मस्तकपर वसुधाको और वसुधा सम्पूर्ण चराचर जगत्को धारण करती है; जिनके आदेशसे जगत्के प्राणस्वरूप समीर सदा तीनों लोकोंमें बहते रहते हैं, उत्तम प्रभाके धाम सूर्य समस्त भूगोलका भ्रमण करते हुए तपा करते हैं, अग्नि जलाती है, मृत्यु समस्त जन्तुओंमें संचरित होती है और वृक्ष समयानुसार फूल एवं फल धारण करते हैं; जिनकी आज्ञासे समुद्र अपने स्थानपर विद्यमान रहते और तत्काल ही नीचे-नीचे निमग्न हो जाते हैं; उन परमेश्वरका ही आप भक्तिभावसे भजन कीजिये। इन्द्र क्या कर सकता है? जिनके भ्रूभङ्गकी लीलामात्रसे आजतक कितने ही ब्रह्माण्ड पैदा हुए और कालके गालमें चले गये तथा कितने ही विधाता उत्पन्न होकर नष्ट हो गये। वे परमेश्वर ही मृत्युकी भी मृत्यु, कालके भी काल तथा विधाताके भी विधाता हैं। तात! आप उन्हींकी शरण लीजिये। वे ही आपकी रक्षा करेंगे। अहो! जिनके एक दिन-रातमें अट्ठाईस इन्द्रोंका पतन होता है, ऐसे एक सौ आठ ब्रह्माओंका उन निर्गुण परमात्मा श्रीहरिके एक निमेषमें ही पतन हो जाता है; ऐसे परमात्माके रहते हुए इन्द्रकी पूजा विडम्बनामात्र है।
नारद! यों कहकर श्रीकृष्ण चुप हो गये। उस समय सभामें बैठे हुए महर्षियोंने भगवान्की भूरि-भूरि प्रशंसा की। नन्दके शरीरमें रोमाञ्च हो आया। वे हर्षसे उत्फुल्ल हो सभामें बैठे-बैठे नेत्रोंसे अश्रु बहाने लगे। मनुष्य यदि अपने पुत्रोंसे पराजित हों तो वे आनन्दित ही होते हैं। श्रीकृष्णकी आज्ञा मान नन्दजीने स्वस्तिवाचन किया और क्रमशः सब ब्राह्मणों एवं मुनियोंका वरण किया। उन्होंने आदरपूर्वक गिरिराज गोवर्धनकी, समागत मुनीश्वरोंकी, विद्वान् ब्राह्मणोंकी तथा गौओं और अग्निकी सानन्द पूजा की। पूजाकी समाप्ति होनेपर उस यज्ञ-महोत्सवमें नाना प्रकारके वाद्योंका तुमुल नाद होने लगा। जय-जयकारके शब्द, शङ्खध्वनि तथा हरिनामकीर्तन होने लगे। मुनिवर गर्गने वेदोंके मङ्गलकाण्डका पाठ किया। बन्दीजनोंमें श्रेष्ठ डिंडी जो कंसका प्रिय सचिव था, सामने खड़े हो उच्चस्वरसे मङ्गलाष्टकका पाठ करने लगा। श्रीकृष्ण गिरिराजके निकट जा दूसरी मूर्ति धारण करके बोले—‘मैं साक्षात् गोवर्धन
८३- श्रीकृष्णका सुदर्शनचक्रसे दैत्यराज धेनुकासुरको काट डालना
५३२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण पर्वत हूँ और तुमलोगोंकी दी हुई भोज्य वस्तुएँ खा रहा हूँ। तुम मुझसे वर माँगो। ' उस समय श्रीकृष्णने नन्दसे कहा - 'पिताजी ! सामने देखिये, गिरिराज प्रकट हुए हैं। इनसे वर माँगिये। आपका कल्याण होगा।' तब गोपराजने हरिदास्य और हरिभक्तिका वर माँगा। परोसी हुई सामग्री खाकर और वर देकर गिरिराज अदृश्य हो गये। मुनीन्द्रों और ब्राह्मणोंको भोजन कराकर गोपराजने बन्दीजनों, ब्राह्मणों और मुनियोंको धन दिया। तत्पश्चात् आनन्दयुक्त नन्द बलराम और श्रीकृष्णको आगे करके सपरिवार अपने घरको गये। उन्होंने बन्दी डिंडीको वस्त्र, चाँदी, सोना, श्रेष्ठ घोड़ा, मणि तथा नाना प्रकारके भक्ष्य पदार्थ दिये। मुनि और ब्राह्मण बलराम तथा श्रीकृष्णकी स्तुति एवं नमस्कार करके चले गये। समस्त अप्सराएँ, गन्धर्व और किन्नर भी अपने-अपने स्थानको पधारे। उस महोत्सवमें आये हुए राजा और सम्पूर्ण गोप भी श्रीकृष्णको सादर नमस्कार करके वहाँसे बिदा हो गये। इसी समय यज्ञभङ्ग हो जानेसे अपनी अनेक प्रकारकी निन्दा सुनकर इन्द्र कुपित हो उठे। उनके ओठ फड़कने लगे। उन्होंने मरुद्गणों और मेघोंके साथ तत्काल रथपर आरूढ़ हो मनोहर नन्दनगर वृन्दावनपर आक्रमण किया। फिर युद्ध-शास्त्रमें निपुण समस्त देवता भी हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लिये रोषपूर्वक रथपर आरूढ़ हो उनके पीछे-पीछे गये। वायुकी सनसनाहट, मेघोंकी गड़गड़ाहट और सेनाकी भयानक गर्जनासे सारा नगर काँप उठा। नन्दको भी बड़ा भय हुआ; परंतु वे नीतिमें निपुण थे। अतः अपनी पत्नी तथा सेवकगणोंको पुकारकर निर्जन स्थानमें ले जाकर शोकसे कातर हो बोले । नन्दजीने कहा- हे यशोदे ! हे रोहिणि ! इधर आओ और मेरी बात सुनो। तुमलोग राम और कृष्णको व्रजसे दूर ले जाओ। भयसे व्याकुल बालक-बालिकाएँ और स्त्रियाँ भी दूर चली जायँ । केवल बलवान् गोप मेरे पास ठहरें। फिर हमलोग इस प्राण-संकटसे निकलनेका प्रयास करेंगे। यों कहकर गोपप्रवर नन्दने भयभीत हुए श्रीहरिका स्मरण किया। उनके दोनों हाथ जुड़ गये। भक्तिसे मस्तक झुक गया और वे काण्वशाखामें कहे गये स्तोत्रद्वारा श्रीशचीपतिकी स्तुति करने लगे। नन्द बोले - इन्द्र, सुरपति, शक्र, अदितिज, पवनाग्रज, सहस्राक्ष, भगाङ्ग, कश्यपात्मज, विडौजा, शुनासीर, मरुत्वान्, पाकशासन, जयन्तजनक, श्रीमान्, शचीश, दैत्यसूदन, वज्रहस्त, कामसखा, गौतमीव्रतनाशन, वृत्रहा, वासव, दधीचि-देह- भिक्षुक, जिष्णु, वामनभ्राता, पुरुहूत, पुरन्दर, दिवस्पति, शतमख, सुत्रामा, गोत्रभिद्, विभु, लेखर्षभ, बलाराति, जम्भभेदी, सुराश्रय, संक्रन्दन, दुश्च्यवन, तुराषाट्, मेघवाहन, आखण्डल, हरि, हय, नमुचिप्राणनाशन, वृद्धश्रवा, वृष तथा दैत्यदर्पनिषूदन - ये छियालीस नाम निश्चय ही समस्त पापोंका नाश करनेवाले हैं। जो मनुष्य कौथुमीशाखामें कहे गये इस स्तोत्रका प्रतिदिन पाठ करता है, उसकी बड़ी-से-बड़ी विपत्तिमें इन्द्र वज्र हाथमें लिये रक्षा करते हैं। उसे अतिवृष्टि, शिलावृष्टि तथा भयंकर वज्रपातसे भी कभी भय नहीं होता; क्योंकि स्वयं इन्द्र उसकी रक्षा करते हैं। नारद ! जिस घरमें यह स्तोत्र पढ़ा जाता है और जो पुण्यवान् पुरुष इसे जानता है; उसके उस घरपर न कभी वज्रपात होता है और न ओले या पत्थर ही बरसते हैं। भगवान् श्रीनारायण कहते हैं- नन्दके मुखसे इस स्तोत्रको सुनकर मधुसूदन श्रीकृष्ण कुपित हो गये। वे ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। उन्होंने पितासे यह नीतिकी बात कही। तात ! आप बड़े डरपोक हैं। किसकी स्तुति करते हैं? कौन हैं इन्द्र ? मेरे निकट रहकर आप इन्द्रका भय छोड़
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५३३
दीजिये, मैं आधे ही क्षणमें लीलापूर्वक उसे भस्म कर डालनेमें समर्थ हूँ। आप गौओं, बछड़ों, बालकों और भयातुर स्त्रियोंको गोवर्धनकी कन्दरामें रखकर निर्भय हो जाइये। अपने बच्चेकी यह बात सुनकर नन्दने प्रसन्नतापूर्वक वैसा ही किया। तब श्रीहरिने उस पर्वतको बायें हाथमें छातेके डंडेकी भाँति धारण कर लिया। इसी समय उस नगरमें रत्नमय तेजसे प्रकाश होनेपर भी सहसा अन्धकार छा गया। सारा नगर धूलसे ढक गया। मुने! हवाके साथ बादलोंके समूहने आकर आकाशको घेर लिया और वृन्दावनमें निरन्तर अतिवृष्टि होने लगी। शिलावृष्टि, वज्रकी वृष्टि और अत्यन्त भयानक उल्कापात—ये सब-के-सब गोवर्धन पर्वतका स्पर्श होते ही दूर जा पड़ते थे। मुने! असमर्थ पुरुषके उद्यमकी भाँति इन्द्रका वह सारा उद्योग विफल हो गया। वह सब कुछ व्यर्थ होता देख इन्द्र उसी क्षण रोषसे भर गये और उन्होंने दधीचिकी हड्डियोंसे बने हुए अपने अमोघ वज्रास्त्रको हाथमें ले लिया। इन्द्रको वज्र हाथमें लिये देख मधुसूदन हँसने लगे। उन्होंने इन्द्रके हाथसहित अत्यन्त दारुण वज्रको ही स्तम्भित कर दिया। इतना ही नहीं, उन सर्वव्यापी परमात्माने देवगणोंसहित मेघको भी स्तब्ध कर
दिया। वे सब-के-सब दीवारमें चित्रित पुतलियोंकी भाँति निश्चलभावसे खड़े हो गये। तदनन्तर श्रीहरिने इन्द्रको जृम्भा (जँभाई)-के वशीभूत कर दिया। फिर तो उन्हें तत्काल तन्द्रा आ गयी। उस तन्द्रामें ही उन्होंने देखा, वहाँका सारा जगत् श्रीकृष्णमय है। सभी द्विभुज हैं। सबके हाथोंमें मुरली है और सभी रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित हैं। सबके अङ्गोंपर पीताम्बरका परिधान है। सभी रत्नमय सिंहासनपर आसीन हैं। सबके प्रसन्नमुखपर मन्द हास्यकी छटा छा रही है और सभी भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर दिखायी देते हैं। उन सबके सभी अङ्ग चन्दनसे चर्चित हैं। समस्त चराचर जगत्को इस परम अद्भुत रूपमें देखकर वहाँ इन्द्र तत्काल मूर्च्छित हो गये। पूर्वकालमें गुरुने उन्हें जिस मन्त्रका उपदेश दिया था, उसका वे वहीं जप करने लगे। उस समय उन्होंने हृदयमें सहस्रदल-कमलपर विराजमान उग्र ज्योतिःपुञ्ज देखा। उस तेजोराशिके भीतर दिव्य रूपधारी, अत्यन्त मनोहर तथा नूतन जलधरके समान उत्कृष्ट श्यामसुन्दर विग्रहवाले श्रीकृष्ण दिखायी दिये। वे उत्तम रत्नोंके सारतत्त्वसे निर्मित एवं प्रकाशमान मकराकृत कुण्डलोंसे अलंकृत थे, अत्यन्त उद्दीप्त एवं श्रेष्ठ मणियोंके बने हुए मुकुटसे उनका मस्तक उद्भासित हो रहा था। प्रकाशमान उत्तम कौस्तुभरत्नसे कण्ठ और वक्षःस्थल जगमगा रहे थे। मणिनिर्मित केयूर, कंगन और मञ्जीरसे उनके हाथ-पैरोंकी बड़ी शोभा हो रही थी। भीतर और बाहर समान रूपमें ही देखकर परमेश्वर श्रीकृष्णका उन्होंने स्तवन किया।
**इन्द्र बोले—**जो अविनाशी, परब्रह्म, ज्योतिःस्वरूप, सनातन, गुणातीत, निराकार, स्वेच्छामय और अनन्त हैं; जो भक्तोंके ध्यान तथा आराधनाके लिये नाना रूप धारण करते हैं; युगके
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अनुसार जिनके श्वेत, रक्त, पीत और श्याम वर्ण हैं; सत्ययुगमें जिनका स्वरूप शुक्ल तेजोमय है तथा उस युगमें जो सत्यस्वरूप हैं; त्रेतायुगमें जिनकी अङ्गकान्ति कुंकुमके समान लाल है और जो ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान रहते हैं, द्वापरयुगमें जो पीत कान्ति धारण करके पीताम्बरसे सुशोभित होते हैं; कलियुगमें कृष्णवर्ण होकर 'कृष्ण' नाम धारण करते हैं; इन सब रूपोंमें जो एक ही परिपूर्णतम परमात्मा हैं; जिनका श्रीविग्रह नूतन जलधरके समान अत्यन्त श्याम एवं सुन्दर है; उन नन्दनन्दन यशोदाकुमार भगवान् गोविन्दकी मैं वन्दना करता हूँ। जो गोपियोंका चित्त चुराते हैं तथा राधाके लिये प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं, जो कौतूहलवश विनोदके लिये मुरलीकी ध्वनिका विस्तार करते रहते हैं, जिनके रूपकी कहीं तुलना नहीं है, जो रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हो कोटि-कोटि कन्दर्पोंका सौन्दर्य धारण करते हैं; उन शान्त-स्वरूप परमेश्वरको मैं प्रणाम करता हूँ। जो वृन्दावनमें कहीं राधाके पास क्रीड़ा करते हैं, कहीं निर्जन स्थलमें राधाके वक्षः-स्थलपर विराजमान होते हैं, कहीं राधाके साथ जलक्रीड़ा करते हैं, कहीं वनमें राधिकाके केश-कलापोंकी चोटी गूँथते हैं, कहीं राधिकाके चरणोंमें महावर लगाते हैं, कहीं राधिकाके चबाये हुए ताम्बूलको सानन्द ग्रहण करते हैं, कहीं बाँके नेत्रोंसे देखती हुई राधाको स्वयं निहारते हैं, कहीं फूलोंकी माला तैयार करके राधिकाको अर्पित करते हैं, कहीं राधाके साथ रासमण्डलमें जाते हैं, कहीं राधाकी दी हुई मालाको अपने कण्ठमें धारण करते हैं, कहीं गोपाङ्गनाओंके साथ विहार करते हैं, कहीं राधाको साथ लेकर चल देते हैं और कहीं उन्हें भी छोड़कर चले जाते हैं। जिन्होंने कहीं ब्राह्मणपत्नियोंके दिये हुए अन्नका भोजन किया है और कहीं बालकोंके साथ ताड़का फल खाया है; जो कहीं आनन्दपूर्वक गोप-किशोरियोंके चित्त चुराते हैं, कहीं ग्वालबालोंके साथ दूर गयी हुई गौओंको आवाज देकर बुलाते हैं, जिन्होंने कहीं कालियानागके मस्तकपर अपने चरणकमलोंको रखा है और जो कहीं मौजमें आकर आनन्द-विनोदके लिये मुरलीकी तान छेड़ते हैं तथा कहीं ग्वालबालोंके साथ मधुर गीत गाते हैं; उन परमात्मा श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करता हूँ।
इस स्तवराजसे स्तुति करके इन्द्रने श्रीहरिको भयसे प्रणाम किया। पूर्वकालमें वृत्रासुरके साथ युद्धके समय गुरु बृहस्पतिने इन्द्रको यह स्तोत्र दिया था। सबसे पहले श्रीकृष्णने तपस्वी ब्रह्माको कृपापूर्वक एकादशाक्षर-मन्त्र, सब लक्षणोंसे युक्त कवच और यह स्तोत्र दिया था। फिर ब्रह्माने पुष्करमें कुमारको, कुमारने अङ्गिराको और अङ्गिराने बृहस्पतिको इसका उपदेश दिया था। इन्द्रद्वारा किये गये इस स्तोत्रका जो प्रतिदिन भक्तिपूर्वक पाठ करता है, वह इहलोकमें श्रीहरिकी सुदृढ़ भक्ति और अन्तमें निश्चय ही उनका दास्य-सुख प्राप्त कर लेता है। जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि और
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
५३५
शोकसे छुटकारा पा जाता है और स्वप्नमें भी कभी यमदूत तथा यमलोकको नहीं देखता।*
भगवान् नारायण कहते हैं—इन्द्रका वचन सुनकर भगवान् लक्ष्मीनिवास प्रसन्न हो गये और उन्होंने प्रेमपूर्वक उन्हें वर देकर उस पर्वतको वहाँ स्थापित कर दिया। श्रीहरिको प्रणाम करके इन्द्र अपने गणोंके साथ चले गये; तदनन्तर गुफामें छिपे हुए लोग वहाँसे निकलकर अपने घरको गये। उन सबने श्रीकृष्णको परिपूर्णतम परमात्मा माना। ब्रजवासियोंको आगे करके श्रीकृष्ण अपने घरको गये। नन्दके सम्पूर्ण अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया। उनके नेत्रोंमें भक्तिके आँसू भर आये और उन्होंने सनातन पूर्णब्रह्मस्वरूप अपने उस पुत्रका स्तवन किया।
नन्द बोले—जो ब्राह्मणोंके हितकारी, गौओं तथा ब्राह्मणोंके हितैषी तथा समस्त संसारका भला चाहनेवाले हैं; उन सच्चिदानन्दमय गोविन्ददेवको बारंबार नमस्कार है। प्रभो! आप ब्राह्मणोंका प्रिय करनेवाले देवता हैं; स्वयं ही ब्रह्म और परमात्मा हैं; आपको नमस्कार है। आप अनन्तकोटि ब्रह्माण्डधामोंके भी धाम हैं; आपको सादर नमस्कार है। आप मत्स्य आदि रूपोंके जीवन तथा साक्षी हैं; आप निर्लिप्त, निर्गुण और निराकार परमात्माको नमस्कार है। आपका स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म है। आप स्थूलसे भी अत्यन्त स्थूल हैं। सर्वेश्वर, सर्वरूप तथा तेजोमय हैं; आपको नमस्कार है। अत्यन्त सूक्ष्म-स्वरूपधारी होनेके कारण आप योगियोंके भी ध्यानमें नहीं आते हैं; ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी आपकी वन्दना करते हैं; आप नित्य-स्वरूप परमात्माको नमस्कार है। आप चार युगोंमें चार वर्णोंका आश्रय लेते हैं; इसलिये युग-क्रमसे शुक्ल, रक्त, पीत और श्याम नामक गुणसे
*अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतिरूपं सनातनम्। गुणातीतं निराकारं स्वेच्छामयमनन्तकम्॥
भक्तध्यानाय सेवायै नानारूपधरं वरम्। शुक्लरक्तपीतश्यामं युगानुक्रमणेन च॥
शुक्लतेजःस्वरूपं च सत्ये सत्यस्वरूपिणम्। त्रेतायां कुङ्कुमाकारं ज्वलन्तं ब्रह्मतेजसा॥
द्वापरे पीतवर्णं च शोभितं पीतवाससा। कृष्णवर्णं कलौ कृष्णं परिपूर्णतमं प्रभुम्॥
नवधाराधरोत्कृष्टश्यामसुन्दरविग्रहम् । नन्दैकनन्दनं वन्दे यशोदानन्दनं प्रभुम्॥
गोपिकाचेतनहरं राधाप्राणाधिकं परम्। विनोदमुरलीशब्दं कुर्वन्तं कौतुकेन च॥
रूपेणाप्रतिमेनैव रत्नभूषणभूषितम् । कन्दर्पकोटिसौन्दर्यं बिभ्रतं शान्तमीश्वरम्॥
क्रीडन्तं राधया सार्धं वृन्दारण्ये च कुत्रचित्। कुत्रचित्निर्जनेऽरण्ये राधावक्षःस्थलस्थितम्॥
जलक्रीडां प्रकुर्वन्तं राधया सह कुत्रचित्। राधिकाकबरीभारं कुर्वन्तं कुत्रचिद् वने॥
कुत्रचिद्राधिकापादे दत्तवन्तमलक्तकम्। राधाचर्वितताम्बूलं गृह्णन्तं कुत्रचिन्मुदा॥
पश्यन्तं कुत्रचिद्राधां पश्यन्तीं वक्रचक्षुषा। दत्तवन्तं च राधायै कृत्वा मालां च कुत्रचित्॥
कुत्रचिद्राधया सार्धं गच्छन्तं रासमण्डलम्। राधादत्तां गले मालां धृतवन्तं च कुत्रचित्॥
सार्धं गोपालिकाभिश्च विहरन्तं च कुत्रचित्। राधां गृहीत्वा गच्छन्तं विहाय तां च कुत्रचित्॥
विप्रपत्नीदत्तमन्नं भुक्तवन्तं च कुत्रचित्। भुक्तवन्तं तालफलं बालकैः सह कुत्रचित्॥
वस्त्रं गोपालिकानां च हरन्तं कुत्रचिन्मुदा। गवाह्वानं व्याहरन्तं कुत्रचिद् बालकैः सह॥
कालीयमूर्ध्निपादाब्जं दत्तवन्तं च कुत्रचित्। विनोदमुरलीशब्दं कुर्वन्तं कुत्रचिन्मुदा॥
गायन्तं रम्यसंगीतं कुत्रचिद् बालकैः सह। स्तुत्वा शक्रः स्तवेन्द्रेण प्रणाम हरिं भिया॥
पुरा दत्तेन गुरुणा रणे वृत्रासुरेण च। कृष्णेन दत्तं कृपया ब्रह्मणे च तपस्यते॥
एकादशाक्षरो मन्त्रः कवचं सर्वलक्षणम्। दत्तमेतत् कुमाराय पुष्करे ब्रह्मणा पुरा॥
कुमारोऽङ्गिरसे दत्तो गुरवेऽङ्गिरसा मुने। इदमीन्द्रकृतं स्तोत्रं नित्यं भक्त्या च यः पठेत्॥
इह प्राप्य दृढां भक्तिमन्ते दास्यं लभेद् ध्रुवम्। जन्ममृत्युजराव्याधिशोकेभ्यो मुच्यते नरः।
न हि पश्यति स्वप्नेऽपि यमदूतं यमालयम्॥ (२१। १७६-१९६)
| ५३६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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सुशोभित होते हैं; आपको नमस्कार है। आप योगी, योगरूप और योगियोंके भी गुरु हैं। सिद्धेश्वर, सिद्ध एवं सिद्धोंके गुरु हैं; आपको नमस्कार है। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, शेषनाग, धर्म, सूर्य, गणेश, षडानन, सनकादि समस्त मुनि, सिद्धेश्वरोंके गुरुके भी गुरु कपिल तथा नर-नारायण ऋषि भी जिनकी स्तुति करनेमें असमर्थ हैं; उन परात्पर प्रभुका स्तवन दूसरे कौन-से जडबुद्धि प्राणी कर सकते हैं? वेद, वाणी, लक्ष्मी, सरस्वती तथा राधा भी जिनकी स्तुति नहीं कर सकतीं; उन्हींका स्तवन दूसरे विद्वान् पुरुष क्या कर सकते हैं? ब्रह्मन्! मुझसे क्षण-क्षणमें जो अपराध बन रहा है, वह सब आप क्षमा करें। करुणासिन्धो! दीनबन्धो! भवसागरमें पड़े हुए मुझ शरणागतकी रक्षा कीजिये। प्रभो! पूर्वकालमें तीर्थस्थानमें तपस्या करके मैंने आप सनातनपुरुषको पुत्ररूपमें प्राप्त किया है। अब आप मुझे अपने चरण-कमलोंकी भक्ति और दास्य प्रदान कीजिये। ब्रह्मत्व, अमरत्व अथवा सालोक्य आदि चार प्रकारके मोक्ष आपके चरणकमलोंकी दास्य-भक्तिकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हैं; फिर इन्द्रपद, देवपद, सिद्धि-प्राप्ति, स्वर्गप्राप्ति, राजपद तथा चिरंजीवित्वको विद्वान् पुरुष किस गिनतीमें रखते हैं? (क्या समझते हैं?) ईश्वर! यह सब जो पूर्वकथित ब्रह्मत्व आदि पद हैं, वे आपके भक्तके आधे क्षणके लिये प्राप्त हुए सङ्गकी क्या समानता कर सकते हैं! कदापि नहीं। जो आपका भक्त है, वह भी आपके समान हो जाता है। फिर आपके महत्त्वका अनुमान कौन लगा सकता है? आपका भक्त आधे क्षणके वार्तालापमात्रसे किसीको भी भवसागरसे पार कर सकता है। आपके भक्तोंके सङ्गसे भक्तिका विविध अङ्कुर अवश्य उत्पन्न होता है। उन हरिभक्तरूप मेघोंके द्वारा की गयी वार्तालापरूपी जलकी वर्षासे सींचा जाकर भक्तिका वह अङ्कुर बढ़ता है। जो भगवान्के भक्त नहीं हैं, उनके आलापरूपी तापसे वह अङ्कुर तत्काल सूख जाता है और भक्त एवं भगवान्के गुणोंकी स्मृतिरूपी जलसे सींचनेपर वह उसी क्षण स्पष्टरूपसे बढ़ने लगता है। उनमें उत्पन्न आपकी भक्तिका अङ्कुर जब प्रकट होकर भलीभाँति बढ़ जाता है, तब वह नष्ट नहीं होता। उसे प्रतिदिन और प्रतिक्षण बढ़ाते रहना चाहिये। तदनन्तर उस भक्तको ब्रह्मपदकी प्राप्ति कराकर भी उसके जीवनके लिये भगवान् उसे अवश्य ही परम उत्तम दास्यरूप फल प्रदान करते हैं। यदि कोई दुर्लभ दास्यभावको पाकर भगवान्का दास हो गया तो निश्चय ही उसीने समस्त भय आदिको जीता है।
यों कहकर नन्द श्रीहरिके सामने भक्तिभावसे खड़े हो गये। तब प्रसन्न हुए श्रीकृष्णने उन्हें मनोवाञ्छित वर दिया। इस प्रकार नन्दद्वारा किये गये स्तोत्रका जो भक्तिभावसे प्रतिदिन पाठ करता है, वह शीघ्र ही श्रीहरिकी सुदृढ़ भक्ति और दास्यभाव प्राप्त कर लेता है। जब द्रोण नामक वसुने अपनी पत्नी धराके साथ तीर्थमें तपस्या की, तब ब्रह्माजीने उन्हें यह परम दुर्लभ स्तोत्र प्रदान किया था। सौभरिमुनिने पुष्करमें संतुष्ट होकर ब्रह्माजीको श्रीहरिका षडक्षर-मन्त्र तथा सर्वरक्षणकवच प्रदान किया था। वही कवच, वही स्तोत्र और वही परम दुर्लभ मन्त्र ब्रह्माके अंशभूत गर्गमुनिने तपस्यामें लगे हुए नन्दको दिया था। पूर्वकालमें जिसके लिये जो मन्त्र, स्तोत्र, कवच, इष्टदेव, गुरु और विद्या प्राप्त होती है, वह पुरुष उस मन्त्र आदि तथा विद्याको निश्चय ही नहीं छोड़ता है। इस प्रकार यह श्रीकृष्णका अद्भुत आख्यान और स्तोत्र कहा गया, जो सुखद, मोक्षप्रद, सब साधनोंका सारभूत तथा भवबन्धनको छुटकारा दिलानेवाला है। (अध्याय २१)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
५३७
ग्वाल-बालोंका श्रीकृष्णकी आज्ञासे तालवनके फल तोड़ना, धेनुकासुरका आक्रमण, श्रीकृष्णके स्पर्शसे उसे पूर्वजन्मकी स्मृति और उसके द्वारा श्रीकृष्णका स्तवन, वैष्णवी मायासे पुनः उसे स्वरूपकी विस्मृति, फिर श्रीहरिके साथ उसका युद्ध और वध, बालकों-द्वारा सानन्द फल-भक्षण तथा सबका घरको प्रस्थान
भगवान् नारायण कहते हैं— नारद! एक दिन राधिकानाथ श्रीकृष्ण बलराम तथा ग्वाल-बालोंके साथ उस तालवनमें गये, जो पके फलोंसे भरा हुआ था। उन तालवृक्षोंकी रक्षा गर्दभरूपधारी एक दैत्य करता था, जिसका नाम धेनुक था। उसमें करोड़ों सिंहोंके समान बल था। वह देवताओंके दर्पका दलन करनेवाला था। उसका शरीर पर्वतके समान और दोनों नेत्र कूपके तुल्य थे। उसके दाँत हरिसकी पाँतके समान और मुँह पर्वतकी कन्दराके सदृश था। उसकी चञ्चल एवं भयानक जीभ सौ हाथ लंबी थी। नाभि तालाबके समान जान पड़ती थी। उसका शब्द बड़ा भयंकर होता था। तालवनको सामने देख उन श्रेष्ठ ग्वाल-बालोंको बड़ा हर्ष हुआ। उनके मुखारविन्दपर मुस्कराहट छा गयी। वे कौतुकवश श्रीकृष्णसे बोले।
बालकोंने कहा— हे श्रीकृष्ण! हे करुणासिन्धो! हे दीनबन्धो! आप सम्पूर्ण जगत्के पालक हैं। महाबली बलरामजीके भाई हैं तथा समस्त बलवानोंमें श्रेष्ठ हैं। प्रभो! आधे क्षणके लिये हमारे निवेदनपर ध्यान दीजिये। भक्तवत्सल! हम आपके भक्त-बालकोंको बड़ी भूख लगी है। इधर सामने ही स्वादिष्ट फल और सुन्दर ताल-फल हैं, उनकी ओर दृष्टिपात कीजिये। हम इन फलोंको तोड़नेके लिये वृक्षोंको हिलाना और नाना रंगोंके फूलों तथा दुर्लभ पके फलोंको गिराना चाहते हैं। श्रीकृष्ण! यदि आप आज्ञा दें तो हम ऐसी चेष्टा कर सकते हैं; परंतु इस वनमें गर्दभरूपधारी बलवान् दैत्य धेनुक रहता है, जिसपर सम्पूर्ण देवता भी विजय नहीं पा सके हैं। वह महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न है। सब देवता मिलकर भी उसे रोकनेमें सफल नहीं हो पाते। यह राजा कंसका महान् सहायक है। समस्त प्राणियोंका हिंसक तथा ताल-वनोंका रक्षक है। जगत्पते! वक्ताओंमें श्रेष्ठ! आप भलीभाँति सोचकर हमसे कहिये। हम जो काम करना चाहते हैं वह उचित है या अनुचित? हम इसे करें या न करें। बालकोंकी यह बात सुनकर भगवान् मधुसूदन उनसे मधुर वाणीमें सुखदायक वचन बोले।
श्रीकृष्णने कहा— ग्वालबालो! तुमलोग तो मेरे साथी हो, तुम्हें दैत्योंसे क्या भय है? वृक्षोंको तोड़कर हिलाकर जैसे चाहो, बेखटके इन फलोंको खाओ।
श्रीकृष्णकी आज्ञा पाकर बलशाली गोपबालक उछले और वृक्षोंके शिरोपर चढ़ गये। वे भूखे थे; इसलिये फल लेना चाहते थे। नारद! उन्होंने अनेक रंगके स्वादिष्ट, सुन्दर और पके हुए फल गिराये। कितने ही बालकोंने वृक्ष तोड़ डाले, कितनोंने उन्हें बारंबार हिलाया। कई बालक वहाँ कोलाहल करने लगे और कितने ही नाचने लगे। वृक्षोंसे उतरकर वे बलशाली बालक जब फल लेकर जाने लगे, तब उन्होंने उस गर्दभरूपधारी महाबली, महाकाय, घोर दैत्यशिरोमणि धेनुकको बड़े वेगसे आते देखा। वह भयंकर शब्द कर रहा था। उसे देखकर सब बालक रोने लगे। उन्होंने भयके कारण फल त्याग दिये और बारंबार जोर-जोरसे 'कृष्ण-कृष्ण' का कीर्तन आरम्भ कर
५३८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
दिया। वे बोले—'हे करुणानिधान कृष्ण! आओ हमारी रक्षा करो। हे संकर्षण! हमें बचाओ, नहीं तो इस दानवके हाथसे अब हमारे प्राण जा रहे हैं। हे कृष्ण! हे कृष्ण! हरे! मुरारे! गोविन्द! दामोदर! दीनबन्धो! गोपीश! गोपेश! अनन्त! नारायण! भवसागरमें डूबते हुए हमलोगोंकी रक्षा करो, रक्षा करो। दीननाथ! भय-अभयमें, शुभ-अशुभ अथवा सुख और दुःखमें तुम्हारे सिवा दूसरा कोई हमें शरण देनेवाला नहीं है। हे माधव! भवसागरमें हमारी रक्षा करो, रक्षा करो। गुणसागर श्रीकृष्ण! तुम्हीं भक्तोंके एकमात्र बन्धु हो। हम बालक बहुत भयभीत हैं। हमारी रक्षा करो, रक्षा करो। यह दानव-कुलका स्वामी हमारा काल बनकर आ पहुँचा है। आप इसका वध कीजिये और इसे मारकर देवताओंके बल-दर्पको बढ़ाइये।'
बालकोंकी व्याकुलता देखकर भयहन्ता भक्तवत्सल माधव बलरामजीके साथ उस स्थानपर आये, जहाँ वे बालक खड़े थे। 'कोई भय नहीं है, कोई भय नहीं है'—यों कहकर वे शीघ्रतापूर्वक उनके पास दौड़े आये और मन्द मुस्कानसे युक्त प्रसन्नमुखद्वारा उन्होंने उन बालकोंको अभय दान दिया। श्रीकृष्ण और बलरामको देखकर बालक हर्षसे नाचने लगे। उनका भय दूर हो गया। क्यों न हो, भगवान्की स्मृति ही अभयदायिनी तथा सब प्रकारसे मङ्गल प्रदान करनेवाली है। बालकोंको निगल जानेको उद्यत हुए उस दानवको देख मधुसूदन श्रीकृष्णने महाबली बलरामको सम्बोधित करके कहा।
श्रीकृष्ण बोले— भैया! यह दानव राजा बलिका बलवान् पुत्र है। इसका नाम साहसिक है। पूर्वकालमें दुर्वासाने इसे शाप दिया था। उस ब्रह्मशापसे ही यह गदहा हुआ है। यह बड़ा पापी तथा महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न है; अतः मेरे ही हाथसे वधके योग्य है। मैं इसका वध करूँगा। तुम बालकोंकी रक्षा करो। सब बालकोंको लेकर दूर चले जाओ।
तब बलराम उन बालकोंको लेकर श्रीकृष्णकी आज्ञाके अनुसार शीघ्र ही दूर चले गये। इधर इस महाबली एवं महापराक्रमी दानवराजने श्रीकृष्णपर दृष्टि पड़ते ही उन्हें रोषपूर्वक अनायास ही निगल लिया। श्रीकृष्ण प्रज्वलित अग्नि-शिखाके समान थे। उन्हें निगल लेनेपर उस दानवके भीतर बड़ी जलन होने लगी। उनके अतिशय तेजसे वह मरणासन्न हो गया। तब उस दैत्यने भयभीत हो उन तेजस्वी प्रभुको फिर उगल दिया। परित्यक्त होनेपर उन परमेश्वरकी ओर एकटक दृष्टिसे देखता हुआ वह दैत्य मोहित हो गया। भगवान्का श्रीविग्रह अत्यन्त सुन्दर, शान्त तथा ब्रह्मतेजसे प्रकाशमान था। श्रीकृष्णके दर्शनमात्रसे उस दानवको पूर्वजन्मकी स्मृति हो आयी। उसने अपने-आपको तथा जगत्के परम कारण श्रीकृष्णको भी पहचान लिया। उन तेजःस्वरूप ईश्वरको देखकर वह दानव शास्त्रके अनुसार श्रुतिसे परे गुणातीत प्रभुका जिस प्रकार जन्म हुआ, उसे दृष्टिमें लाकर उनकी स्तुति करने लगा।
दानव बोला— प्रभो! आप ही अपने अंशसे वामन हुए थे और मेरे पिताके यज्ञमें याचक बने थे। आपने पहले तो हमारे राज्य और लक्ष्मीको हर लिया। पर पुनः बलिकी भक्तिके वशीभूत होकर हम सब लोगोंको सुतललोकमें स्थान दिया। आप महान् वीर, सर्वेश्वर और भक्तवत्सल हैं। मैं पापी हूँ और शापसे गर्दभ हुआ हूँ। आप शीघ्र ही मेरा वध कर डालिये। दुर्वासामुनिके शापसे मुझे ऐसा घृणित जन्म मिला है। जगत्पते! मुनिने मेरी मृत्यु आपके हाथसे बतायी थी। आप अत्यन्त तीखे और अतिशय तेजस्वी षोडशार चक्रसे मेरा वध
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५३९
कीजिये। मुक्तिदाता जगन्नाथ! ऐसा करके मुझे उत्तम गति दीजिये। आप ही वसुधाका उद्धार करनेके लिये अंशतः वाराहरूपमें अवतीर्ण हुए थे। नाथ! आप ही वेदोंके रक्षक तथा हिरण्याक्षके नाशक हैं। आप पूर्ण परमात्मा स्वयं ही हिरण्यकशिपुके वधके लिये नृसिंहरूपमें प्रकट हुए थे। प्रह्लादपर अनुग्रह और वेदोंकी रक्षा करनेके लिये ही आपने यह अवतार ग्रहण किया था। दयानिधे! आपने ही राजा मनुको ज्ञान देने, देवता और ब्राह्मणोंकी रक्षा करने तथा वेदोंके उद्धारके लिये अंशतः मत्स्यावतार धारण किया था। आप ही अपने अंशसे सृष्टिके लिये शेषके आधारभूत कच्छप हुए थे। सहस्रलोचन! आप ही अंशतः शेषके रूपमें प्रकट हुए हैं और सम्पूर्ण विश्वका भार वहन करते हैं। आप ही जनकनन्दिनी सीताका उद्धार करनेके लिये दशरथनन्दन श्रीराम हुए थे। उस समय आपने समुद्रपर सेतु बाँधा और दशमुख रावणका वध किया। पृथ्वीनाथ! आप ही अपनी कलासे जमदग्निनन्दन महात्मा परशुराम हुए; जिन्होंने इक्कीस बार क्षत्रिय नरेशोंका संहार किया था। सिद्धोंके गुरुके भी गुरु महर्षि कपिल अंशतः आपके ही स्वरूप हैं, जिन्होंने माताको ज्ञान दिया और योग (एवं सांख्य)-शास्त्रकी रचना की। ज्ञानिशिरोमणि नर-नारायण ऋषि आपके ही अंशसे उत्पन्न हुए हैं। आप ही धर्मपुत्र होकर लोकोंका विस्तार कर रहे हैं। इस समय आप स्वयं परिपूर्णतम परमात्मा ही श्रीकृष्णरूपमें प्रकट हैं और सभी अवतारोंके सनातन बीजरूप हैं। आप यशोदाके जीवन, नन्दरायजीके एकमात्र आनन्दवर्धन, नित्यस्वरूप, गोपियोंके प्राणाधिदेव तथा श्रीराधाके प्राणाधिक प्रियतम हैं। वसुदेवके पुत्र, शान्तस्वरूप तथा देवकीके दुःखका निवारण करनेवाले हैं। आपका स्वरूप अयोनिज है। आप पृथ्वीका भार उतारनेके लिये यहाँ पधारे हैं। आपने पूतनाको माताके समान गति प्रदान की है; क्योंकि आप कृपानिधान हैं। आप बक, केशी तथा प्रलम्बासुरको और मुझे भी मोक्ष देनेवाले हैं। स्वेच्छामय! गुणातीत! भक्तभयभञ्जन! राधिकानाथ! प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये और मेरा उद्धार कीजिये। हे नाथ! इस गर्दभ-योनि और भवसागरसे मुझे उबारिये। मैं मूर्ख हूँ तो भी आपके भक्तका पुत्र हूँ; इसलिये आपको मेरा उद्धार करना चाहिये। वेद, ब्रह्मा आदि देवता तथा मुनीन्द्र भी जिनकी स्तुति करनेमें असमर्थ हैं, उन्हीं गुणातीत परमेश्वरकी स्तुति मुझ-जैसा पुरुष क्या करेगा? जो पहले दैत्य था और अब गदहा है। करुणासागर। आप ऐसा कीजिये, जिससे मेरा जन्म न हो। आपके चरणारविन्दके दर्शन पाकर कौन फिर जन्म अथवा घर-गृहस्थीके चक्करमें पड़ेगा? ब्रह्मा जिनकी स्तुति करते हैं, उन्हींका स्तवन आज एक गदहा कर रहा है। इस बातको लेकर आपको उपहास नहीं करना चाहिये; क्योंकि सच्चिदानन्दस्वरूप एवं विज्ञ परमेश्वरकी योग्य और अयोग्यपर भी समानरूपसे कृपा होती है।
यों कहकर दैत्यराज धेनुक श्रीहरिके सामने खड़ा हो गया। उसके मुखपर प्रसन्नता छा रही थी, वह श्रीसम्पन्न एवं अत्यन्त संतुष्ट जान पड़ता था। दैत्यद्वारा किये गये इस स्तोत्रका जो प्रतिदिन भक्तिभावसे पाठ करता है, वह अनायास ही श्रीहरिका लोक, ऐश्वर्य और सामीप्य प्राप्त कर लेता है। इतना ही नहीं, वह इहलोकमें श्रीहरिकी भक्ति, अन्तमें उनका परम दुर्लभ दास्यभाव, विद्या, श्री, उत्तम कवित्व, पुत्र-पौत्र तथा यश भी पाता है।
भगवान् श्रीनारायण कहते हैं—दैत्यराजकी यह स्तुति सुनकर करुणानिधान श्रीकृष्णने मन-ही-मन विचार किया कि 'अहो! ऐसे भक्तका
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संहार मैं कैसे करूँ?' ऐसा सोचकर भगवान्ने स्वयं ही उसकी पूर्वजन्मकी स्मृति हर ली; क्योंकि स्तुति करनेवालेका वध उचित नहीं है। दुर्वचन बोलनेवालेके ही वधका विधान है। तब दानव वैष्णवी मायाके प्रभावसे पुनः अपने-आपको भूल गया। उसके कण्ठदेशमें दुर्वचनने स्थान जमा लिया। मुने! वह शीघ्र ही मरना चाहता था, इसलिये दुर्दैवसे ग्रस्त हो विवेक खो बैठा। क्रोधसे उसके ओठ फड़कने लगे और वह दैत्य श्रीहरिसे इस प्रकार बोला।
दैत्यने कहा— दुर्मते! तू निश्चय ही मरना चाहता है। मनुष्यके बच्चे! मैं आज तुम्हें यमलोक भेज दूँगा।
इस प्रकार बहुत-से दुर्वचन कहकर उस गदहेने श्रीकृष्णपर आक्रमण कर दिया। भयानक युद्ध हुआ। अन्तमें श्रीहरिने प्रसन्नतापूर्वक हँसकर उस दानवराजकी प्रशंसा करते हुए कहा—'मेरे भक्त बलिके पुत्र! दानवेन्द्र! तुम्हारा उत्तम जीवन धन्य है। वत्स! तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम मोक्ष प्राप्त करो। मेरा दर्शन कल्याणका बीज तथा मोक्षका परम कारण है। तुम सबसे अधिक और सबसे उत्कृष्ट मनोहर स्थान प्राप्त करो।'
यों कहकर श्रीकृष्णने अपने उत्तम चक्रका स्मरण किया, जो अपनी दीप्तिसे करोड़ों सूर्योंके समान उद्दीप्त होता है। स्मरण करते ही वह आ गया और श्रीकृष्णने उस सुदर्शनचक्रको अपने हाथमें ले लिया। उसमें सोलह अरे थे। उस उत्तम अस्त्रको घुमाकर श्रीकृष्णने उसकी ओर फेंका तथा जिसे ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी नहीं मार सकते थे, उसे लीलासे ही काट डाला।
उस महात्मा दानवका मस्तक पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसके शरीरसे सैकड़ों सूर्योंके समान कान्तिमान् तेजःपुञ्ज उठा, जो श्रीहरिकी ओर देखकर उन्हींके चरणकमलोंमें लीन हो गया। अहो! उस दानवराजने परम मोक्ष प्राप्त कर लिया। उस समय आकाशमें खड़े हुए समस्त देवता और मुनि अत्यन्त हर्षसे उत्फुल्ल हो वहाँ पारिजातके फूलोंकी वर्षा करने लगे। स्वर्गमें दुन्दुभियाँ बज उठीं। अप्सराएँ नाचने लगीं। गन्धर्व-समूह गीत गाने लगे और मुनिलोग सानन्द स्तुति करने लगे। स्तुति करके हर्षसे विह्वल हुए समस्त देवता और मुनि चले गये। 'धेनुकासुर मारा गया'—यह देख ग्वाल-बाल वहाँ आ गये। बलवानोंमें श्रेष्ठ बलरामने पुरुषोत्तमका स्तवन किया। समस्त ग्वाल-बालोंने भी उनके गुण गाये। वे खुशीके मारे नाचने लगे। श्रीकृष्ण और बलरामको कुछ पके हुए फल देकर शेष सभी फलोंको उन बालकोंने प्रसन्न-चित्त होकर खाया। खा-पीकर बलराम और बालकोंके साथ श्रीहरि शीघ्र अपने घरको गये। (अध्याय २२)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५४१
धेनुकके पूर्वजन्मका परिचय, बलि-पुत्र साहसिक तथा तिलोत्तमाका स्वच्छन्द विहार, दुर्वासाका शाप और वर, साहसिकका गदहेकी योनिमें जन्म लेना तथा तिलोत्तमाका बाणपुत्री 'उषा' होना
नारदजीने पूछा— भगवन्! किस पापसे बलि-पुत्र साहसिकको गदहेकी योनि प्राप्त हुई? दुर्वासाजीने किस अपराधसे दानवराजको शाप दिया? नाथ! फिर किस पुण्यसे दानवेश्वरने सहसा महाबली श्रीहरिका धाम एवं उनके साथ एकत्व (सायुज्य) मोक्ष प्राप्त कर लिया? संदेह-भंजन करनेवाले महर्षे! इन सब बातोंको आप विस्तारपूर्वक बताइये। अहो! कविके मुखमें काव्य पद-पदपर नया-नया प्रतीत होता है।
भगवान् श्रीनारायणने कहा— वत्स! नारद! सुनो। मैं इस विषयमें प्राचीन इतिहास कहूँगा। मैंने इसे पिता धर्मके मुखसे गन्धमादन पर्वतपर सुना था। यह विचित्र एवं अत्यन्त मनोहर वृत्तान्त पाद्म-कल्पका है और श्रीनारायणदेवकी कथासे युक्त होनेके कारण कानोंके लिये उत्तम अमृत है। जिस कल्पकी यह कथा है, उसमें तुम उपबर्हण नामक गन्धर्वके रूपमें थे। तुम्हारी आयु एक कल्पकी थी। तुम शोभायमान, सुन्दर और सुस्थिर यौवनसे सम्पन्न थे। पचास कामिनियोंके पति होकर सदा शृङ्गारमें ही तत्पर रहते थे। ब्रह्माजीके वरदानसे तुम्हें सुमधुर कण्ठ प्राप्त हुआ था और तुम सम्पूर्ण गायकोंके राजा समझे जाते थे। उन्हीं दिनों दैववश ब्रह्माका शाप प्राप्त होनेसे तुम दासीपुत्र हुए और वैष्णवोंके अवशिष्ट भोजनजनित पुण्यसे इस समय साक्षात् ब्रह्माजीके पुत्र हो। अब तो तुम असंख्य कल्पोंतक जीवित रहनेवाले महान् वैष्णवशिरोमणि हो। ज्ञानमयी दृष्टिसे सब कुछ देखते और जानते हो तथा महादेवजीके प्रिय शिष्य हो। मुने! उस पाद्म-कल्पका वृत्तान्त मुझसे सुनो। दैत्यके इस सुधा-तुल्य मधुर वृत्तान्तको मैं तुम्हें सुना रहा हूँ।
एक दिनकी बात है। बलिका बलवान् पुत्र साहसिक अपने तेजसे देवताओंको परास्त करके गन्धमादनकी ओर प्रस्थित हुआ। उसके सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित थे। वह रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हो रत्नके ही सिंहासनपर विराजमान था। उसके साथ बहुत बड़ी सेना थी। इसी समय स्वर्गकी परम सुन्दरी अप्सरा तिलोत्तमा उस मार्गसे आ निकली। उसने साहसिकको देखा और साहसिकने उसको। पुंश्चली स्त्रियोंका आचरण दोषपूर्ण होता ही है। वहीं दोनों एक-दूसरेके प्रति आकर्षित हो गये। चन्द्रमाके समीप जाती हुई तिलोत्तमा वहाँ बीचमें ही ठहर गयी। कुलटा स्त्रियाँ कैसी दुष्टहृदया होती हैं और वे किसी भी पापका विचार न करके सदा पापरत ही रहा करती हैं—यह सब बतलाकर भी तिलोत्तमाने अपने बाह्य रूप-सौन्दर्यसे साहसिकको मोहित कर लिया। तदनन्तर वे दोनों गन्धमादनके एकान्त रमणीय स्थानमें जाकर यथेच्छ विहार करने लगे। वहीं मुनिवर दुर्वासा योगासनसे विराजमान होकर श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंका चिन्तन कर रहे थे। तिलोत्तमा और साहसिक उस समय कामवश चेतनाशून्य थे। उन्होंने अत्यन्त निकट ध्यान लगाये बैठे हुए मुनिको नहीं देखा। उनके उच्छृङ्खल अभिसारसे मुनिका ध्यान सहसा भङ्ग हो गया। उन्होंने उन दोनोंकी कुत्सित चेष्टाएँ देख क्रोधमें भरकर कहा।
दुर्वासा बोले— ओ गदहेके समान आकार-
८४- ब्रह्मा, शिव, पार्वती, धर्म, इन्द्र, रुद्र, दिक्पाल, ग्रह, अत्रि, लक्ष्मी, सरस्वती आदिका वैकुण्ठलोकमें आकर दुर्वासाके अपराधको क्षमाकर उनकी रक्षा करनेके लिये भगवान् विष्णुसे करुण प्रार्थना करना
| ५४२ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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वाले निर्लज्ज नराधम! उठ। भक्तशिरोमणि बलिक पुत्र होकर भी तू इस तरह पशुवत् आचरण कर रहा है। देवता, मनुष्य, दैत्य, गन्धर्व तथा राक्षस—ये सभी सदा अपनी जातिमें लज्जाका अनुभव करते हैं। पशुओंके सिवा सभी मैथुन-कर्ममें लज्जा करते हैं। विशेषतः गदहेकी जाति ज्ञान तथा लज्जासे हीन होती है; अतः दानवश्रेष्ठ! अब तू गदहेकी योनिमें जा। तिलोत्तमे! तू भी उठ। पुंश्चली स्त्री तो निर्लज्ज होती ही है। दैत्यके प्रति तेरी ऐसी आसक्ति है तो अब तू दानवयोनिमें ही जन्म ग्रहण कर।
ऐसा कहकर रोषसे जलते हुए दुर्वासामुनि वहाँ चुप हो गये। फिर वे दोनों लज्जित और भयभीत होकर उठे तथा मुनिकी स्तुति करने लगे।
साहसिक बोला—मुने! आप ब्रह्मा, विष्णु और साक्षात् महेश्वर हैं। अग्नि और सूर्य हैं। आप संसारकी सृष्टि, पालन तथा संहार करनेमें समर्थ हैं। भगवन्! मेरे अपराधको क्षमा करें। कृपानिधे! कृपा करें। जो सदा मूढ़ोंके अपराधको क्षमा करे, वही संत-महात्मा एवं ईश्वर है।
यों कहकर वह दैत्यराज मुनिके आगे उच्चस्वरसे फूट-फूटकर रोने लगा और दाँतोंमें तिनके दबाकर उनके चरणकमलोंमें गिर पड़ा।
तिलोत्तमा बोली—हे नाथ! हे करुणासिन्धो! हे दीनबन्धो! मुझपर कृपा कीजिये। विधाताकी सृष्टिमें सबसे अधिक मूढ स्त्रीजाति ही है। सामान्य स्त्रीकी अपेक्षा अधिक मतवाली एवं मूढ कुलटा होती है, जो सदा अत्यन्त कामातुर रहती है। प्रभो! कामुक प्राणीमें लज्जा, भय और चेतना नहीं रह जाती है।
नारद! ऐसा कहकर तिलोत्तमा रोती हुई दुर्वासाजीकी शरणमें गयी। भूतलपर विपत्तिमें पड़े बिना भला किन्हें ज्ञान होता है? उन दोनोंकी व्याकुलता देखकर मुनिको दया आ गयी। उस समय उन मुनिवरने उन्हें अभय देकर कहा।
दुर्वासा बोले—दानव! तू विष्णुभक्त बलिका पुत्र है। उत्तम कुलमें तेरा जन्म हुआ है। तू पैतृक परम्परासे विष्णुभक्त है। मैं तुझे निश्चितरूपसे जानता हूँ। पिताका स्वभाव पुत्रमें अवश्य रहता है। जैसे कालियके सिरपर अङ्कित हुआ श्रीकृष्णका चरणचिह्न उसके वंशमें उत्पन्न हुए सभी सर्पोंके मस्तकपर रहता है। वत्स! एक बार गदहेकी योनिमें जन्म लेकर तू निर्वाण (मोक्ष)-को प्राप्त हो जा। सत्पुरुषोंद्वारा पहले जो चिरकालतक श्रीकृष्णकी आराधना की गयी होती है, इसके पुण्य-प्रभावका कभी लोप नहीं होता। अब तू शीघ्र ही व्रजके निकट वृन्दावनके ताल-वनमें जा। वहाँ श्रीहरिके चक्रसे प्राणोंका परित्याग करके तू निश्चय ही मोक्ष प्राप्त कर लेगा। तिलोत्तमे! तू भारतवर्षमें बाणासुरकी पुत्री होगी; फिर श्रीकृष्ण-पौत्र अनिरुद्धका आलिङ्गन प्राप्त करके शुद्ध हो जायगी।
महामुने! यों कहकर दुर्वासामुनि चुप हो गये। तत्पश्चात् वे दोनों भी उन मुनिश्रेष्ठको प्रणाम करके यथास्थान चले गये। इस प्रकार दैत्य साहसिकके गर्दभ-योनिमें जन्म लेनेका सारा वृत्तान्त मैंने कह सुनाया। तिलोत्तमा बाणासुरकी पुत्री उषा होकर अनिरुद्धकी पत्नी हुई।
(अध्याय २३)
८५- अपने घरपर आये हुए दुर्वासाको देखकर राजा अम्बरीषका उनके चरणोंमें हाथ जोड़कर प्रणाम करना
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५४३ दुर्वासाका और्वकन्या कन्दलीसे विवाह, उसकी कटूक्तियोंसे कुपित हो मुनिका उसे भस्म कर देना, फिर शोकसे देह-त्यागके लिये उद्यत मुनिको विप्ररूपधारी श्रीहरिका समझाना, उन्हें एकानंशाको पत्नी बनानेके लिये कहना, कन्दलीका भविष्य बताना और मुनिको ज्ञान देकर अन्तर्धान होना तथा मुनिकी तपस्यामें प्रवृत्ति भगवान् श्रीनारायण कहते हैं- मुने! दुर्वासामु्निका गूढ़ वृत्तान्त सुनो। सबसे अद्भुत बात यह है कि उन ऊर्ध्वरेता मुनीश्वरको भी स्त्रीका संयोग प्राप्त हुआ। यह कैसे ? सो बता रहा हूँ। साहसिक तथा तिलोत्तमाका शृङ्गार (मिलन-प्रसंग) देखकर उन जितेन्द्रिय मुनिके मनमें भी कामभावका संचार हो गया। असत्- पुरुषोंका सङ्ग प्राप्त होनेसे उनका सांसर्गिक दोष अपनेमें आ जाता है। इसी समय उस मार्गसे मुनिवर और्व अपनी पुत्रीके साथ आ पहुँचे। उनकी पुत्री पतिका वरण करना चाहती थी। पूर्वकालमें तपःपरायण ब्रह्माजीके ऊरुसे उन ऊर्ध्वरेता योगीन्द्रका जन्म हुआ था, इसलिये वे 'और्व' कहलाये। उनके जानुसे एक कन्या उत्पन्न हुई, जिसका नाम 'कन्दली' था। वह दुर्वासाको ही अपना पति बनाना चाहती थी, दूसरा कोई पुरुष उसके मनको नहीं भाता था। पुत्रीसहित मुनिवर और्व दुर्वासामु्निके आगे आकर खड़े हो गये। वे बड़े प्रसन्न थे और अपने तेजसे प्रज्वलित अग्निशिखाके समान उद्भासित होते थे। मुनिवर और्वको सामने आया देख मुनीश्वर दुर्वासा भी बड़े वेगसे उठे और सानन्द उनके प्रति नत-मस्तक हो गये। प्रसन्नतासे भरे हुए और्वने दुर्वासाको हृदयसे लगा लिया और उनसे अपनी कन्याका मनोरथ प्रकट किया। और्व बोले- मुने ! यह मेरी मनोहरा कन्या 'कन्दली' नामसे विख्यात है। अब यह सयानी हो गयी है और संदेशवाहकोंके मुखसे आपकी प्रशंसा सुनकर केवल आपका ही 'पति'-रूपसे चिन्तन करने लगी है। यह कन्या अयोनिजा है और अपने सौन्दर्यसे तीनों लोकोंका मन मोह लेनेमें समर्थ है। वैसे तो यह समस्त गुणोंकी खान है; किंतु इसमें एक दोष भी है। दोष यह है कि कन्दली अत्यन्त कलहकारिणी है। यह क्रोधपूर्वक कटु भाषण करती है; परंतु अनेक गुणोंसे युक्त वस्तुको केवल एक ही दोषके कारण त्यागना नहीं चाहिये। और्वका वचन सुनकर दुर्वासाको हर्ष और शोक दोनों प्राप्त हुए। उसके गुणोंसे हर्ष हुआ और दोषसे दुःख। उन्होंने गुण तथा रूपसे सम्पन्न मुनि-कन्याको सामने देखा और व्यथित-हृदयसे मुनिवर और्वको इस प्रकार उत्तर दिया। दुर्वासाने कहा- नारीका रूप त्रिभुवनमें मुक्तिमार्गका निरोधक, तपस्यामें व्यवधान डालनेवाला तथा सदा ही मोहका कारण होता है। वह संसाररूपी कारागारमें बड़ी भारी बेड़ी है, जिसका भार वहन करना अत्यन्त दुष्कर है। शंकर आदि महापुरुष भी ज्ञानमय खड्गसे उस बेड़ीको काट नहीं सकते। नारी सदा साथ देनेवाली छायासे भी अधिक सहगामिनी है। वह कर्मभोग, इन्द्रिय, इन्द्रियाधार, विद्या और बुद्धिसे भी अधिक बाँधनेवाली है। छाया शरीरके रहनेतक ही साथ देती है; भोग तभीतक साथ रहते हैं जबतक उनकी समाप्ति न हो जाय; देह और इन्द्रियाँ जीवनपर्यन्त ही साथ रहती हैं; विद्या जबतक उसका अनुशीलन होता है तभीतक साथ देती है; यही दशा बुद्धिकी भी है; परंतु सुन्दरी स्त्री जन्म-जन्ममें मनुष्यको बन्धनमें डाले रहती है। सुन्दरी स्त्रीवाला पुरुष जबतक जीता है, तबतक अपने जन्म-मरणरूपी बन्धनका निवारण नहीं
५४४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण कर सकता। जबतक जीवधारीका जन्म होता है, तबतक उसे भोग सुखदायक जान पड़ते हैं। परंतु मुनीन्द्र ! सबसे अधिक सुखदायिनी है श्रीहरिके चरणकमलोंकी सेवा। मैं यहाँ श्रीकृष्ण-चरणारविन्दोंके चिन्तनमें लगा था, परंतु मेरे इस शुभ अनुष्ठानमें भारी विघ्न उपस्थित हो गया। न जाने पूर्वजन्मके किस कर्म-दोषसे यह विघ्न आया है। किंतु मुने ! मैं आपकी कन्याके सौ कटु वचनोंको अवश्य क्षमा करूँगा। इससे अधिक होनेपर उसका फल उसे दूँगा। स्त्रीके कटु वचनोंको सुनते रहना- यह पुरुषके लिये सबसे बड़ी निन्दाकी बात है। जिसे स्त्रीने जीत लिया हो, वह तीनों लोकोंके सत्पुरुषोंमें अत्यन्त निन्दित है। मैं आपकी आज्ञा शिरोधार्य करके इस समय आपकी पुत्रीको ग्रहण करूँगा। ऐसा कहकर दुर्वासा चुप हो गये। और्वमुनिने वेदोक्त-विधिसे अपनी पुत्री उनको ब्याह दी। दुर्वासाने 'स्वस्ति' कहकर कन्याका पाणिग्रहण किया। और्वमुनिने उन्हें दहेज दिया और अपनी कन्या उन्हें सौंपकर वे मोहवश रोने लगे। संतानके वियोगसे होनेवाला शोक आत्माराम मुनिको भी नहीं छोड़ता। और्व बोले-बेटी ! सुनो। मैं तुम्हें नीतिका परम दुर्लभ सार-तत्त्व बता रहा हूँ। वह हितकारक, सत्य, वेदप्रतिपादित तथा परिणाममें सुखद है। नारीके लिये अपना पति ही इहलोक और परलोकमें सबसे बड़ा बन्धु है। कुलवधुओंके लिये पतिसे बढ़कर दूसरा कोई प्रियतम नहीं है। पति ही उनका महान् गुरु है। देवपूजा, व्रत, दान, तप, उपवास, जप, सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान, समस्त यज्ञोंकी दीक्षा, पृथ्वीकी परिक्रमा तथा ब्राह्मणों और अतिथियोंका सेवन-ये सब पतिसेवाकी सोलहवीं कलाके समान भी नहीं हैं। पतिव्रताको इन सबसे क्या प्रयोजन है? समस्त शास्त्रोंमें पतिसेवाको परम धर्म कहा गया है। अपनी बुद्धिसे पतिको सदा नारायणसे भी अधिक समझकर तुम उनके चरणकमलोंकी प्रतिदिन सेवा करना। परिहास, क्रोध, भ्रम अथवा अवहेलनासे भी अपने स्वामी मुनिके लिये उनके सामने या परोक्षमें भी कभी कटु वचन न बोलना। भारतवर्षकी भूमिपर जो स्त्रियाँ स्वेच्छानुसार कटु वचन बोलती अथवा दुराचारमें प्रवृत्त होती हैं, उनकी शुद्धिके लिये श्रुतिमें कोई प्रायश्चित्त नहीं है। उन्हें सौ कल्पोंतक नरकमें रहना पड़ता है। जो स्त्री समस्त धर्मोंसे सम्पन्न होनेपर भी पतिके प्रति कटु वचन बोलती है, उसका सौ जन्मोंका किया हुआ पुण्य निश्चय ही नष्ट हो जाता है। इस प्रकार अपनी कन्याको देकर और उसे समझा-बुझाकर मुनिवर और्व चले गये तथा स्वात्माराम मुनि दुर्वासा स्त्रीके साथ प्रसन्नतापूर्वक अपने आश्रममें रहने लगे। चतुर पुरुषका चतुरा स्त्रीके साथ योग्य समागम हुआ। मुनीश्वर दुर्वासा तपस्या छोड़कर घर-गृहस्थीमें आसक्त हो गये। कन्दली स्वामीके साथ प्रतिदिन कलह करती थी और मुनीन्द्र दुर्वासा नीतियुक्त वचन कहकर अपनी पत्नीको समझाते थे; परंतु उनकी बातको वह कुछ नहीं समझती थी। वह सदा कलहमें ही रुचि रखती थी। पिताके दिये हुए ज्ञानसे भी वह शान्त नहीं हुई। समझानेसे भी उसने अपनी आदत नहीं छोड़ी। स्वभावको लाँघना बहुत कठिन होता है। वह बिना कारण ही पतिको प्रतिदिन जली-कटी सुनाती थी। जिनके डरसे सारा जगत् काँपता था, वे ही मुनि उस कन्दलीके कोपसे थर-थर काँपते थे और उसकी की हुई कटूक्तिको चुपचाप सह लेते थे। दयानिधान मुनि मोहवश उसे तत्काल समझाने लगते थे। कुछ ही कालमें उसकी सौ कटूक्तियाँ पूरी हो गयीं तो भी मुनिने कृपापूर्वक उसकी सौसे भी अधिक कटूक्तियोंको क्षमा किया। पत्नीकी जली-कटी बातोंसे मुनिका हृदय दग्ध
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५४५ होता रहता था। दिये हुए वचनके अनुसार उस कटूक्तिकारिणी स्त्रीके अपराध पूरे हो गये। दुर्वासामुनि यद्यपि स्वात्माराम और दयालु थे तथापि क्रोधको नहीं छोड़ सके थे। उन्होंने मोहवश पत्नीको शाप दे दिया—'अरी तू राखका ढेर बन जा।' मुनिके संकेतमात्रसे वह जलकर भस्म हो गयी। जो ऐसी उच्छृङ्खला स्त्रियाँ हैं, उनका तीनों लोकोंमें कल्याण नहीं होता। शरीरके भस्म हो जानेपर आत्माका प्रतिबिम्बरूप जीव आकाशमें स्थित हो पतिसे विनयपूर्वक बोला। जीवने कहा—हे नाथ! आप अपनी ज्ञान- दृष्टिसे सदा सब कुछ देखते हैं। सर्वज्ञ होनेके कारण आपको सब कुछका ज्ञान है। फिर मैं आपको क्या समझाऊँ! उत्तम वचन, कटु वचन, क्रोध, संताप, लोभ, मोह, काम, क्षुधा, पिपासा, स्थूलता, कृशता, नाश, दृश्य, अदृश्य तथा उत्पन्न होना—ये सब शरीरके धर्म हैं। न तो जीवके धर्म हैं और न आत्माके ही। सत्त्व, रज और तम— इन तीन गुणोंसे शरीर बना है। वह भी नाना प्रकारका है। सुनिये, मैं आपको बताती हूँ। किसी शरीरमें सत्त्वगुणकी अधिकता होती है, किसीमें रजोगुणकी और किसीमें तमोगुणकी। मुने! कहीं भी सम गुणोंवाला शरीर नहीं है। जब सत्त्वगुणका उद्रेक होता है तब मोक्षकी इच्छा जाग्रत् होती है, रजोगुणकी वृद्धिसे कर्म करनेकी इच्छा प्रबल होती है और तमोगुणसे जीव-हिंसा, क्रोध एवं अहंकार आदि दोष प्रकट होते हैं। क्रोधसे निश्चय ही कटु वचन बोला जाता है। कटु वचनसे शत्रुता होती है और शत्रुतासे मनुष्यमें तत्काल अप्रियता आ जाती है। अन्यथा इस भूतलपर कौन किसका शत्रु है? कौन प्रिय है और कौन अप्रिय ? कौन मित्र है और कौन वैरी ? सर्वत्र शत्रु और मित्रकी भावनामें इन्द्रियाँ ही बीज हैं। स्त्रियोंके लिये पति प्राणोंसे भी अधिक प्रिय है और पतिके लिये स्त्री प्राणोंसे भी बढ़कर प्यारी है। फिर भी दुर्वचनके कारण एक क्षणमें हम दोनोंके बीच तत्काल शत्रुता पैदा हो गयी। प्रभो! जो बीत गया सो गया। यह सब काम-दोषसे हुआ था। अब आप मेरा सारा अपराध क्षमा कर दें और बतावें इस समय मुझे क्या करना चाहिये। मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ ? कहाँ मेरा जन्म होगा? मैं तीनों लोकोंमें आपके सिवा किसीकी भार्या नहीं होऊँगी। यों कहकर कन्दलीका जीवात्मा मौन हो गया। इधर शोकसे अचेत हो दुर्वासामुनि मूर्च्छित हो गये। वे स्वात्माराम और महाज्ञानी होकर भी अपनी चेतना खो बैठे। चतुर पुरुषोंके लिये नारीका वियोग सब शोकोंसे बढ़कर होता है। एक ही क्षणमें उन्हें चेत हुआ और वे अपने प्राण त्याग देनेको उद्यत हो गये। उन्होंने वहीं योगासन लगाकर वायुधारणा आरम्भ की। इतनेहीमें एक ब्राह्मण-बालक वहाँ आ पहुँचा। उसके हाथमें दण्ड और चक्र था। उसने लाल वस्त्र धारण किया था और ललाटमें उत्तम चन्दन लगा रखा था। उसकी अङ्गकान्ति श्याम थी। वह ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान था। उसकी अवस्था बहुत छोटी थी; परंतु वह शान्त, ज्ञानवान् तथा वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ जान पड़ता था। उसे देख दुर्वासाने वेगपूर्वक प्रणाम किया, वहीं बैठाया और भक्तिभावसे उसका पूजन किया। ब्राह्मण वटुकने मुनिको शुभाशीर्वाद दे वार्तालाप आरम्भ किया। उसके दर्शन और आशीर्वादसे मुनिका सारा दुःख दूर हो गया। वह नीतिविशारद विचक्षण बालक क्षणभर चुप रहकर अमृतमयी वाणीमें बोला। शिशुने कहा—सर्वज्ञ विप्र ! आप गुरुमन्त्रके प्रसादसे सब कुछ जानते हैं; फिर भी शोकसे कातर हो रहे हैं; अतः मैं पूछता हूँ, इसका यथार्थ रहस्य क्या है? ब्राह्मणोंका धर्म तप है। तपस्यासे तीनों लोकोंको वशमें किया जा सकता है। मुने ! इस
| ५४६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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समय अपने धर्म—तपस्याको छोड़कर आप क्या करने जा रहे हो? त्रिभुवनमें कौन किसकी पत्नी है और कौन किसका पति? भगवान् श्रीहरि मूर्खोंको बहलानेके लिये मायासे इन सम्बन्धोंकी सृष्टि करते हैं। यह कन्दली आपकी मिथ्या पत्नी थी; इसीलिये अभी क्षणभरमें चली गयी। जो सत्य है, वह कभी तिरोहित नहीं होता। मिथ्या वही है, जिसकी चिरकालतक स्थिति न रहे। वसुदेव-पुत्री एकानंशा, जो श्रीकृष्णकी बहिन है, पार्वतीके अंशसे उत्पन्न हुई है। वह सुशीला और चिरजीविनी है। वह सुन्दरी प्रत्येक कल्पमें आपकी पत्नी होगी; अतः आप कुछ दिनोंतक प्रसन्नतापूर्वक तपस्यामें मन लगाइये। कन्दली इस भूतलपर 'कन्दली' जाति होगी। वह कल्पान्तरमें शुभदा, फलदायिनी, कमनीया, एक संतान देनेवाली, परम दुर्लभा तथा शान्तरूपा स्त्री होकर आपकी पत्नी होगी। जो अत्यन्त उच्छृङ्खल हो, उसका दमन करना उचित ही है; ऐसा श्रुतिमें सुना गया है (अतः उसके भस्म होनेसे आपको शोक नहीं करना चाहिये)।
यों कहकर ब्राह्मणरूपधारी श्रीहरि ब्रह्मर्षि दुर्वासाको ज्ञान दे शीघ्र ही वहाँसे अन्तर्धान हो गये। तब मुनिने सारा भ्रम छोड़कर तपस्यामें मन लगाया। कन्दली इस धरातलपर कन्दली जाति हो गयी। मुने! दैत्य साहसिक तालवनमें जाकर गदहा हो गया और तिलोत्तमा यथासमय बाणासुरकी पुत्री हुई। फिर श्रीहरिके चक्रसे मारा जाकर अपने प्राणोंका परित्याग करके दैत्यराज साहसिकने गोविन्दके उस परम अभीष्ट चरणारविन्दको प्राप्त कर लिया जो मुनिके लिये भी परम दुर्लभ है। तिलोत्तमा भी बाण-पुत्री उषाके रूपमें जन्म ले श्रीकृष्ण-पौत्र अनिरुद्धके आलिङ्गनसे सफलमनोरथ होकर समयानुसार पुनः अपने निवासस्थान—स्वर्गलोकको चली गयी। इस प्रकार श्रीकृष्णके इस उत्तम लीलोपाख्यानको पितासे सुनकर मैंने तुमसे कहा है। यह पद-पदमें सुन्दर है। अब और क्या सुनना चाहते हो?
(अध्याय २४)
महर्षि और्वद्वारा दुर्वासाको शाप, दुर्वासाका अम्बरीषके यहाँ द्वादशीके दिन पारणाके समय पहुँचकर भोजन माँगना, वसिष्ठजीकी आज्ञासे अम्बरीषका पारणाकी पूर्तिके लिये भगवान्का चरणोदक पीना, दुर्वासाका राजाको मारनेके लिये कृत्या-पुरुष उत्पन्न करना, सुदर्शनचक्रका कृत्याको मारकर मुनिका पीछा करना, मुनिका कहीं भी आश्रय न पाकर वैकुण्ठमें जाना, वहाँसे भगवान्की आज्ञाके अनुसार अम्बरीषके घर आकर भोजन करना तथा आशीर्वाद देकर अपने आश्रमको जाना
**नारदजीके पूछनेपर भगवान् श्रीनारायणने कहा—**मुने! महर्षि और्व सरस्वती नदीके तटपर तपस्या कर रहे थे; उन्हें ध्यानसे अपनी पुत्रीके मरणका वृत्तान्त ज्ञात हो गया। तब वे शोकाकुल होकर दुर्वासाके पास आये। दुर्वासाने श्वशुरको प्रणाम करके सब बातें बतायीं और उस घटित घटनाके लिये महान् दुःख प्रकट किया। मुनिवर और्वने दुर्वासाको उलाहना दिया और कहा—'तुमने बहुत थोड़े अपराधपर उसको भारी दण्ड दे दिया। यदि उसे भस्म न करके त्याग ही दिया होता तो वह मेरे ही पास रह जाती।' फिर रोषसे भरकर शाप दे दिया कि 'तुम्हारा पराभव होगा।' इतना कहकर मुनि और्व लौट गये। यह कथा सुनकर नारदजीने दुर्वासाके पराभवका इतिहास पूछा।
**नारद बोले—**भगवन्! दुर्वासा साक्षात्
श्रीराधाकी प्रार्थनासे भगवान्का सब वस्तुएँ लौटा देना, व्रतका विधान, दुर्गाका ध्यान, गौरी-व्रतकी कथा, लक्ष्मीस्वरूपा वेदवतीका सीता होकर इस व्रतके प्रभावसे श्रीरामको पतिरूपमें पाना, सीताद्वारा की हुई पार्वतीकी स्तुति, श्रीराधा आदिके द्वारा व्रतान्तमें दान, देवीका उन सबको दर्शन देकर राधाको स्वरूपकी स्मृति कराना, उन्हें अभीष्ट वर देना तथा श्रीकृष्णका राधा आदिको पुनः दर्शनसम्बन्धी मनोवाञ्छित वर देना
• श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५४७ भगवान् शंकरके अंश हैं तथा तेजमें भी उन्हींके समान हैं। फिर कौन ऐसा महातेजस्वी पुरुष था, जिसने उनका भी पराभव कर दिया ? भगवान् श्रीनारायणने कहा - मुने ! सूर्यवंशमें अम्बरीष नामसे प्रसिद्ध एक राजाधिराज (सम्राट्) हो गये हैं। उनका मन सदा श्रीकृष्णके चरणकमलोंके चिन्तनमें ही लगा रहता था। राज्यमें, रानियोंमें, पुत्रोंमें, प्रजाओंमें तथा पुण्य कर्मोंद्वारा अर्जित की हुई सम्पत्तियोंमें भी उनका चित्त क्षणभरके लिये भी नहीं लगता था। वे धर्मात्मा नरेश दिन-रात सोते-जागते हर समय प्रसन्नतापूर्वक श्रीहरिका ध्यान किया करते थे। राजा अम्बरीष बड़े भारी जितेन्द्रिय, शान्तस्वरूप तथा विष्णुसम्बन्धी व्रतोंके पालनमें तत्पर रहते थे। वे एकादशीका व्रत रखते और श्रीकृष्णकी आराधनामें संलग्न रहते थे। उनके सारे कर्म श्रीकृष्णको समर्पित थे और वे उनमें कभी लिप्त नहीं होते थे। भगवान्का सोलह अरोंसे युक्त और अत्यन्त तीक्ष्ण जो सुदर्शन नामक चक्र है, वह करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान तथा श्रीहरिके ही तुल्य तेजस्वी है। ब्रह्मा आदि भी उसकी स्तुति करते हैं। वह अस्त्र देवताओं और असुरोंसे भी पूजित है। भगवान्ने अपने उस चक्रको राजाकी निरन्तर रक्षाके लिये उनके पास ही रख दिया था। एक समयकी बात है। राजा अम्बरीष एकादशी-व्रतका अनुष्ठान करके द्वादशीके दिन समयानुसार विधिपूर्वक स्नान और पूजन करके ब्राह्मणोंको भोजन करा स्वयं भी भोजनके लिये बैठे। इसी समय तपस्वी ब्राह्मण दुर्वासा भूखसे व्याकुल हो वहाँ राजाके समक्ष आ गये। उन्होंने दण्ड और छत्र ले रखा था, उनके शरीरपर श्वेत वस्त्र शोभा पा रहे थे। ललाटमें उज्ज्वल तिलक चमक रहा था। सिरपर जटाएँ थीं और शरीर अत्यन्त कृश हो रहा था। वे त्रस्त-से जान पड़ते थे। उनके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये थे। मुनीन्द्रपर दृष्टि पड़ते ही राजाने उठकर उन्हें प्रणाम किया और प्रसन्नतापूर्वक पैर धोनेके लिये जल प्रस्तुत करके बैठनेको स्वर्णका सिंहासन दिया। विप्रवर दुर्वासा उन्हें आशीर्वाद देकर उस सुखद आसनपर बैठे। तब राजाने भयभीत होकर उनसे पूछा-'मुने! मेरे लिये आपकी क्या आज्ञा है? यह मुझे बताइये।' राजाकी बात सुनकर मुनिवर दुर्वासाने कहा- 'नृपश्रेष्ठ ! मैं भूखसे पीड़ित होकर यहाँ आया हूँ। अतः मुझे भोजन कराओ; परंतु मैं अघमर्षण-मन्त्रका जप करके शीघ्र ही आ रहा हूँ, क्षणभर प्रतीक्षा करो।' ऐसा कहकर मुनि चले गये। ब्राह्मण दुर्वासाके चले जानेपर राजर्षि अम्बरीषको बड़ी भारी चिन्ता हुई। द्वादशी तिथि प्रायः बीत चली है; यह देख वे डर गये। इसी समय गुरु वसिष्ठ वहाँ आ गये। तब प्रसन्नतापूर्वक उन्हें नमस्कार करके राजाने सारी बातें उन्हें बतायीं और पूछा- 'गुरुदेव ! मुनिवर दुर्वासा अभीतक आ नहीं रहे हैं और पारणाके लिये विहित द्वादशी तिथि बीती जा रही है। ऐसे संकटके समय मुझे क्या करना चाहिये ? इसपर भलीभाँति विचार करके मुझे शीघ्र बताइये कि क्या करना शुभ है और क्या अशुभ ?' वसिष्ठजीने कहा - द्वादशीको बिताकर त्रयोदशीमें पारण करना पाप है और अतिथिसे पहले भोजन कर लेना भी पाप है। ऐसी दशामें तुम भोजन न करके भगवान्का चरणोदक ले लो। इससे पारणा भी हो जायगी और अतिथिकी अवहेलना भी नहीं होगी। महामुने ! ऐसा कहकर ब्रह्मपुत्र वसिष्ठजी चुप हो गये। राजाने श्रीकृष्ण-चरणारविन्दोंका चिन्तन करते हुए थोड़ा-सा चरणोदक पी लिया। ब्रह्मन् ! इतनेमें ही मुनीश्वर दुर्वासा आ पहुँचे। वे सर्वज्ञ तो थे ही, अपना अपमान समझकर
५४८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण कुपित हो उठे। उन्होंने राजाके सामने ही अपनी एक जटा तोड़ डाली। उस जटासे शीघ्र ही एक पुरुष प्रकट हुआ, जो अग्निशिखाके समान तेजस्वी था। उसके हाथमें तलवार थी। वह महाभयंकर पुरुष महाराज अम्बरीषको मार डालनेके लिये उद्यत हो गया। यह देख करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान श्रीहरिके सुदर्शनचक्रने उस कृत्या-पुरुषको काट डाला। अब वह बाबा दुर्वासाको भी काटनेके लिये उद्यत हुआ। यह देख विप्रवर दुर्वासा भयसे व्याकुल हो भाग चले। उन्होंने अपने पीछे-पीछे प्रज्वलित अग्निशिखाके समान तेजस्वी चक्रको आते देखा। वे अत्यन्त व्याकुल हो सारे ब्रह्माण्डका चक्कर लगाते- लगाते थक गये, खिन्न हो गये और ब्रह्माजीको सम्पूर्ण जगत्का रक्षक मान उनकी शरणमें गये। 'बचाइये-बचाइये' - पुकारते हुए उन्होंने ब्रह्माजीकी सभामें प्रवेश किया। ब्रह्माजीने उठकर विप्रवर दुर्वासाका कुशल-मङ्गल पूछा। तब उन्होंने आदिसे ही सारा वृत्तान्त विस्तारपूर्वक कह सुनाया। सुनकर ब्रह्माजीने लम्बी साँस ली और भयसे व्याकुल होकर कहा। ब्रह्माजीने कहा- बेटा! तुम किसके बलपर श्रीहरिके दासको शाप देने गये थे? जिसके रक्षक भगवान् हैं, उसको तीनों लोकोंमें कौन मार सकता है? भक्तवत्सल श्रीहरिने छोटे- बड़े सभी भक्तोंकी रक्षाके लिये सुदर्शनचक्रको सदा नियुक्त कर रखा है। जो मूढ़ श्रीविष्णुके लिये प्राणोंके समान प्रिय वैष्णव भक्तसे द्वेष रखता है, उसका संहार भगवान् विष्णु स्वयं करते हैं। वे श्रीहरि संहारकर्ताका भी संहार करनेमें समर्थ हैं। अतः बेटा! तुम शीघ्र किसी दूसरे स्थानमें जाओ। अब यहाँ तुम्हारी रक्षा नहीं हो सकती। यदि नहीं हटे तो सुदर्शनचक्र मेरे साथ ही तुम्हारा वध कर डालेगा। ब्रह्माजीकी बात सुनकर ब्राह्मणदेवता दुर्वासा वहाँसे भयभीत होकर भागे। अब वे डरकर कैलास पर्वतपर भगवान् शंकरकी शरणमें गये और बोले - 'कृपानिधान! हमारी रक्षा कीजिये।' भगवान् शिव सर्वज्ञ हैं। उन्होंने ब्राह्मण दुर्वासाका कुशल-समाचारतक नहीं पूछा। जो क्षणभरमें जगत्का संहार करनेमें समर्थ तथा दीन-दुःखियोंके स्वामी हैं, वे महादेवजी मुनिसे बोले। शंकरजीने कहा - द्विजश्रेष्ठ! सुस्थिर होकर मेरी बात सुनो। मुने! तुम महर्षि अत्रिके पुत्र तथा जगत्स्रष्टा ब्रह्माजीके पौत्र हो। वेदोंके विद्वान् तथा सर्वज्ञ हो, परंतु तुम्हारा कर्म मूर्खोंके समान है। वेदों, पुराणों और इतिहासोंमें सर्वत्र जिन सर्वेश्वरका निरूपण हुआ है; उन्हींको तुम मूढ़ मनुष्यकी भाँति नहीं जानते हो। जिनके भ्रूभङ्गकी लीलामात्रसे मैं, ब्रह्मा, रुद्र, आदित्य, वसु, धर्म, इन्द्र, सम्पूर्ण देवता, मुनीन्द्र और मनु उत्पन्न और विलीन होते रहते हैं; उन्हीं श्रीहरिके प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय भक्तको तुम किसकी शक्तिसे मारने चले थे? उनका चक्र उन्हींके तुल्य तेजस्वी है। उसे रोकना सर्वथा कठिन है। उस चक्रको यद्यपि उन्होंने भक्तोंकी रक्षामें लगा रखा है, तथापि उन्हें उसपर पूरा भरोसा नहीं होता। इसलिये वे स्वयं उनकी रक्षा करनेके लिये जाते हैं। उनके मुँहसे अपने गुणों और नामोंका श्रवण करके उन्हें बड़ा आनन्द मिलता है। इसलिये भगवान् भक्तके साथ सदा छायाकी तरह घूमते रहते हैं। अतः ब्राह्मणदेव! गोविन्दका भजन करो। उनके चरणकमलोंका चिन्तन करो। श्रीहरिके स्मरणमात्रसे भी सारी आपत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं। अब शीघ्र ही वैकुण्ठधाममें जाओ। उस धामके अधिपति श्रीहरि ही तुम्हारे शरणदाता हैं। वे प्रभु दयाके सागर हैं; अतः तुम्हें अवश्य ही अभयदान देंगे। ये बातें हो ही रही थीं कि सारा कैलास चक्रके तेजसे व्याप्त हो उठा, जैसे समस्त
·· श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५४९ भूमण्डल सूर्यकी किरणोंसे उद्दीप्त हो उठा हो। उस समय सम्पूर्ण कैलासवासी उस चक्रकी विकराल ज्वालासे संतप्त हो 'त्राहि-त्राहि' पुकारते हुए भगवान् शंकरकी शरणमें गये। उस दुःसह चक्रको देख पार्वतीसहित करुणानिधान भगवान् शंकरने ब्राह्मणको प्रेमपूर्वक आशीर्वाद देते हुए कहा- 'यदि तेज सत्य है और चिरकालसे संचित तप सत्य है तो अपराध करके भयभीत हुआ यह ब्राह्मण संतापसे मुक्त हो जाय।' पार्वती बोलीं- यह ब्राह्मण मेरे स्वामीके पुण्यकर्मोंके अवसरपर शरणमें आया है; अतः मेरे आशीर्वादसे इसका महान् भय दूर हो जाय और यह शीघ्र ही संतापसे छूट जाय। कृपापूर्वक ऐसा कहकर पार्वती और शिव चुप हो गये। मुनिने उन्हें प्रणाम करके देवेश्वर वैकुण्ठनाथकी शरण ली। मनके समान तीव्र गतिसे चलनेवाले मुनीश्वर दुर्वासा वैकुण्ठभवनमें जाकर सुदर्शनको अपने पीछे-पीछे आते देख श्रीहरिके अन्तःपुरमें घुस गये। वहाँ ब्राह्मणने श्रीनारायणदेवके दर्शन किये। वे रत्नमय सिंहासनपर विराजमान थे। उनके हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म शोभा पाते थे। उन परम प्रभुने पीताम्बर धारण कर रखा था। उनके चार भुजाएँ थीं। अङ्गकान्ति श्याम थी। वे शान्त-स्वरूप लक्ष्मी- कान्त अपने दिव्य सौन्दर्यसे मनको मोह लेते थे। रत्नमय अलंकारोंकी शोभा उन्हें और भी श्री- सम्पन्न बना रही थी। गलेमें रत्नमयी मालासे वे विभूषित थे। उनके प्रसन्न मुखपर मन्द हास्यकी छटा छा रही थी। वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर दिखायी देते थे। उत्तम रत्नोंके सार- तत्त्वसे निर्मित मुकुट धारण करके उनका मस्तक अनुपम ज्योतिसे जगमगा रहा था। श्रेष्ठ पार्षदगण हाथोंमें श्वेत चँवर लिये प्रभुकी सेवा कर रहे थे। कमला उनके चरणकमलोंकी सेवामें लगी थीं। सरस्वती सामने खड़ी हो स्तुति करती थीं। सुनन्द, नन्द, कुमुद और प्रचण्ड आदि पार्षद उन्हें घेरकर खड़े थे। ऐसे प्रभुको देख दुर्वासाने दण्डकी भाँति पृथ्वीपर पड़कर प्रणाम किया और सामवेदवर्णित स्तुतिके द्वारा उन परमेश्वरका स्तवन किया। दुर्वासा बोले- कमलाकान्त ! मेरी रक्षा कीजिये। करुणानिधे ! मुझे बचाइये। प्रभो ! आप दीनोंके बन्धु और अत्यन्त दुः खियोंके स्वामी हैं। दयाके सागर हैं। वेद-वेदाङ्गोंके स्रष्टा विधाताके भी विधाता हैं। मृत्युकी भी मृत्यु और कालके भी काल हैं। मैं संकटके समुद्रमें पड़ा हूँ। मेरी रक्षा कीजिये। आप संहारकर्ताके भी संहारक, सर्वेश्वर और सर्वकारण हैं। महाविष्णुरूपी वृक्षके बीज हैं। प्रभो ! इस भवसागरसे मेरी रक्षा कीजिये। शरणागत एवं शोकाकुल जनोंका भय दूर करके उनकी रक्षामें लगे रहनेवाले भगवन् ! मुझ भयभीतका उद्धार कीजिये। नारायण ! आपको नमस्कार है। वेदोंमें जिन्हें आदिसत्ता कहा गया है, वेद भी जिनकी स्तुति नहीं कर सकते और सरस्वती भी जिनके स्तवनमें जडवत् हो जाती हैं; उन्हीं प्रभुकी दूसरे विद्वान् क्या स्तुति कर सकते हैं ? शेष सहस्र मुखोंसे जिनकी स्तुति करनेमें जडभावको प्राप्त होते हैं, पञ्चमुख महादेव और चतुर्मुख ब्रह्मा भी जडीभूत हो जाते हैं, श्रुतियाँ, स्मृतिकार और वाणी भी जिनकी स्तुतिमें अपनेको असमर्थ पाती हैं; उन्हींका स्तवन मुझ-जैसा ब्राह्मण कैसे कर सकता है ? मानद ! मैं वेदोंका ज्ञाता क्या हूँ, वेदवेत्ता विद्वानोंका शिष्य हूँ। मुझमें आपकी स्तुति करनेकी क्या योग्यता है ? अट्ठाईसवें मनु और महेन्द्रके समाप्त हो जानेपर जिनका एक दिन- रातका समय पूरा होता है, वे विधाता अपने वर्षसे एक सौ आठ वर्षतक जीवित रहते हैं। परंतु जब उनका भी पतन होता है, तब आपके नेत्रोंकी एक पलक गिरती है; ऐसे अनिर्वचनीय परमेश्वरकी मैं क्या स्तुति कर सकूँगा ? प्रभो ! मेरी रक्षा कीजिये।