संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
नत्वा स्तुत्वा चतुर्वक्त्रस्तद्वृत्तांतं व्यजिज्ञपत् । विचिंत्य सोऽपि बहुधा कृपया लोकनायकः ॥२३ तदघं तु त्रिधा भित्वा त्रिषु स्थानेष्वथार्पयत् । स्त्रीषु भूम्यां च वृक्षेषु तेषामपि वरं ददौ ॥२४ तदा भर्तृ समायोगं पुत्रावाप्तिमृतुष्वपि । छेदे पुनर्भवत्वं तु सर्वेषामपि शाखिनाम् ॥२५ खातपूर्ति धरण्याश्च प्रददौ मधुसूदनः । तेष्वघं प्रबभूवाशु रजोनियांसमूषरम् ॥२६ निर्गतो गह्वरात्तस्मात्त्वमिन्द्रो देवनायकः । राज्यश्रियं च संप्राप्तः प्रसादात्परमेष्ठिनः ॥२७ तेनैव सांत्वितो धाता जगाद च जनार्दनम् । मम शापो वृथा न स्यादस्तु कालांतरे मुने ॥२८
इसके अनन्तर जब कोई भी प्रतिक्रिया समझ में नहीं आयी तो ब्रह्माजी देवों से घिरे हुए ही भगवान् नारायण के समीप में पहुँचे थे ।२२। सर्व प्रथम उन्होंने नारायण को प्रणाम किया था फिर स्तुति की थी ओर इसके उपरान्त यह वृत्तान्त उनकी सेवा में कहा था । उन लोकों के नायक प्रभु ने कृपाकर बहुत विचिन्तिन करके विचार किया था ।२३। उसके अघ को तीन भागों में विभक्त करने तीन स्थानों में अर्पित कर दिया था । स्त्रियों में—वृक्षा में और भूमि में उसको रख दिया था और उनको वरदान भी दिया था । उस अघ के देने के बदले में ही तीनों को तीन वरदान दिये थे । ।२४। उस समय में जब ऋतुकाल हो तो स्वामी के साथ संयोग से पुत्र की प्राप्ति हो जायगी । वृक्षों का छेदन में पुनः जन्म धारण कर लेना हो जायग। ।२५। भूमि में गर्त्त कर दिया जाये तो वह अपने आप ही कुछ समय में भर जायग।—ये तीनों को तीन वरदान मधुसूदन प्रभु ने दिये थे । उसका अघ शीघ्र ही तीनों में प्रभूत हो गया था—स्त्रियों ये रजोधर्शन-वृक्षों में गोद और भूमि में ऊपर में उसी अघ के कारण हुआ था ।२६। तुम इन्द्र उस गहन अघ से निकल गये थे और देव नायक के फिर परमेष्ठी के प्रसाद से राज्य की श्री को प्राप्त करने वाले हो गये थे ।२७। उसके द्वारा धाता को इस प्रकार सान्त्वना दी थी और जनार्दन प्रभु से कहा था । हे मुने ! मेरा शाप वृथा नहीं होगा और अन्य काल में होगा ।२८।
अमृत मंथन वर्णन ] [ १६३
भगवांस्तद्वचः श्रुत्वा मुनेरमिततेजसः ।
प्रहृष्टो भाविकार्यज्ञस्तूष्णीमेव तदा ययौ ॥२६
एतावंतमिमं कालं त्रिलोकीं पालयन्भवान् ।
ऐश्वर्यमदमत्तत्वात्कैलासाद्रिमपीडयत् ॥३०
सर्वज्ञेन शिवेनाथ प्रेषितो भगवान्मुनिः ।
दुर्वासास्त्वन्मदभ्रंशं कर्त्तुकामा शशाप ह ॥३१
एकमेव फलं जातमुभयोः शापयोरपि ।
अधुना पश्यनिःश्रीकं त्रैलोक्यं समजायत ॥३२
न यज्ञाः संप्रवर्त्तंते न दानानि च वासव ।
न यमा नापि नियमा न तपांसि च कुत्रचित् ॥३३
विप्राः सर्वेऽपि निःश्रीका लोभोपहतचेतसः ।
निःसत्वा धैर्यहीनाश्च नास्तिकाः प्रायशोऽभवन् ॥३४
निरोषधिरसा भूमिर्निीवीर्या जायतेतराम् ।
भास्करो धूसराकारश्चन्द्रमाः कांतिवर्जितः ॥३५
उन अपरिमित तेज वाले मुनि के इस वचन का श्रवण करके भगवान उस समय में चुप चाप ही वहाँ से चले गये थे क्योंकि ये तो आगे होने वाले कार्य का ज्ञान रखने वाले थे।२६। आप इतने समय तक त्रिलोकी का पालन करते हुए ऐश्वर्य के मद से मत्तता होने के कारण से आपने कैलाश पर्वत को पीड़ित किया था।३०। इसके अनन्तर सर्वज्ञ भगवान शिव ने भगवान मुनि को भेजा था। दुर्वासा जी ने आपके मद को भ्रंश करने की ही इच्छा से शाप दिया था।३१। इन दोनों शापों का एक फल हुआ है। अब देखिए यह त्रैलोक्य श्री से रहित हो गया।३२। हे वासव ! न तो अब यज्ञ संप्रवृत्त हो हो रहे हैं और न दान ही दिये जा रहे हैं और इस समय में तो कहीं पर भी यम-नियम और तपश्चर्या कुछ भी नहीं हैं।३३। सभी विप्र श्री से रहित हैं और इनके हृदय में लोभ ऐसा बैठ गया है कि इनका चित्त उपहत सा हो गया है। इनमें सत्व नाम मात्र को भी नहीं है—ये धैर्य से हीन हो गये हैं तथा बहुधा ये सब नास्तिक हो गये हैं। जो ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखते हैं वे नास्तिक होते हैं।३४। यह
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भूमि औषधियों के रस से विहीन है और अधिकतया वीर्य हीना हो गयी है। यह सूर्य भी धूसर आकार वाला है तथा चन्द्रमा में कान्ति का अभाव दिखाई देना है ।३५।
निस्तेजस्को हविर्भोक्ता मरुद्धूलिकृताकृतिः । न प्रसन्ना दिशां भागा नभो नैव च निर्मलम् ॥३६ दुर्बला देवताः सर्वा विभांत्यन्यादृशा इव । विनष्टप्रायमेवास्ति त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥३७ हयग्रीव उवाच- इत्थं कथयतोरेव बृहस्पतिमहेंद्रयोः । मलकाद्या महादैत्याः स्वर्गलोकं बबाधिरे ॥३८ नंदनोद्यानमखिलं चिच्छिदुर्बलगर्विताः । उद्यानपालकान्सर्वानायुधैः समताडयन् ॥३९ प्राकारमवभिद्यैव प्रविश्य नगरांतरम् । मंदिरस्थान्सुरान्सर्वानत्यंतं पर्यपीडयन् ॥४० आजह्लू रप्सरोरत्नान्यशेषाणि विशेषतः । ततो देवाः समस्ताश्च चक्रुर्भृशमबाधिताः ॥४१ तादृशं घोषमाकर्ण्य वासवः प्रोज्झितासनः । सर्वैरनुगतो देवैः पलायनपरोऽभवत् ॥४२
हवि का भोक्ता अग्नि तेजसे शून्य है तथा मरुत् धूलि कृत आकृति वाला है। समस्त दिशायें प्रसन्न नहीं हैं और नभो मण्डल में निर्मलता का अभाव है ।३६। सब देवगण भी परम दुर्बल कुछ और ही जैसे विभात हो रहे हैं। यह पूर्ण चराचर त्रैलोक्य विनष्ट युग्म सा ही हो गया है ।३७। हय- ग्रीवजी ने कहा—इस रीति से वृहस्पति और महेन्द्र आलाप कर ही रहे थे कि महान दैत्यों ने स्वर्ग को बाधित कर दिया था ।३८। बल के गर्व वाले दैत्यों ने नन्दन वन को पूर्णतया छेदन कर दिया था। जो उद्यान के पालक थे उन सबको दैत्यों ने आयुधों से प्रताड़ित किया था ।३९। जो स्वर्ग के चारों ओर प्राकार भित्ति थी उसका भेदन करके नगर के भीतर प्रवेश कर गये थे। अन्दर जो मन्दिरों में संस्थित देवगण थे उनको अत्यन्त ही पीड़ित
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किया था ॥४०॥ विशेष रूप से जो रत्नों के समान अप्सराएँ थीं उनका हरण कर लिया था। इसके उपरान्त सभी देवगण बहुत ही बाधित कर दिए थे ॥४१॥ उस प्रकार का जो बड़ा भारी शोर हुआ था उसको सुनकर इन्द्र ने अपना आसन त्याग दिया था और सब देवों के साथ में वहाँ से भाग जाने में तत्पर हो गया था ॥४२॥
ब्राह्मं धाम समभ्येत्य विषण्णवदनो वृषा ।
यथावत्कथयामास निखिलं दैत्यचेष्टितम् ॥४३
विधातापि तदाकर्ण्य सर्वदेवसमन्वितम् ।
हतश्रीकं हरिहयमालोक्येदमुवाच ह ॥४४
इन्द्रत्वमखिलैर्देवैर्मु कुन्दं शरणं व्रज ।
दैत्यारातिर्जगत्कर्ता स ते श्रेयो विधास्यति ॥४५
इत्युक्तवा तेन सहितः स्वयं ब्रह्मा पितामहः ।
समस्तदेवसहितः क्षीरोदधिमुपाययौ ॥४६
अथ ब्रह्मादयो देवा भगवन्तं जनार्दनम् ।
तुष्टुवुर्वाग्विरिष्ठाभिः सर्वलोकमहेश्वरम् ॥४७
अथ प्रसन्नो भगवान्वासुदेवः सनातनः ।
जगाद सकलान्देवाञ्जगद्रक्षणलंपटः ॥४८
श्रीभगवानुवाच-
भवतां सुविधास्यामि तेजसंवोपबृंहणम् ।
यदुच्यते मयेदानीं युष्माभिस्तद्विधीयताम् ॥४६
ब्रह्माजी के धाम में जाकर विषाद से युक्त मुख वाले इन्द्र ने जो कुछ भी दैत्यों ने किया था वह सभी ज्यों का त्यों कह दिया था ॥४३॥ विधाता भी उसको सुनकर सब देवों के सहित और हतश्री वाले हरिहय को देखकर यह बोले थे ॥४४॥ हे इन्द्र ! अब आप सब देवों के साथ भगवान् मुकुन्द की शरण में चले जाओ। वही दैत्यों के विनाशक और इस जगत के कर्त्ता हैं और वही तुम्हारा कल्याण करेंगे ॥४५॥ इतना कहकर पितामह ब्रह्माजी उसके तथा समस्त देवों के सहित क्षीर सागर में गये थे ॥४६॥ इसके अनन्तर ब्रह्मा आदि देवों ने भगवान् जनार्दन की जो सब लोकों के महेश्वर हैं बहुत
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ही श्रेष्ठ वाणियों के द्वारा स्तुति की थी ।४७। इसके अनन्तर सनातन वासु- देव भगवान् प्रसन्न हुए थे और इस जगत की रक्षा करने में विशेष संसक्त प्रभू ने सम्पूर्ण देवों से कहा था ।४८। श्री भगवान् ने कहा—आप लोगों का उपवृंहण में तेज के ही द्वारा कर दूँगा । अब मेरे द्वारा जो भी कहा जाता है आप लोगों को वह करना चाहिए ।४९।
ओषधिप्रवराः सर्वाः क्षिपत क्षीरसागरे ।
असुरैरपि संधाय सममेव च तैरिह ॥५०
मंथानं मंदरं कृत्वा कृत्वा योक्त्रं च वासुकिम् ।
मयि स्थिते सहाये तु मथ्यताममृतं सुराः ॥५१
समस्तदानवाश्चापि वक्तव्याः सांत्वपूर्वकम् ।
सामान्यमेव युष्माकमस्माकं च फलं त्विति ॥५२
मथ्यमाने तु दुग्धाब्धौ या समुत्पद्यते सुधा ।
तत्पानाद् बलिनो यूयममर्त्याश्च भविष्यथ ॥५३
यथा दैत्याश्च पीयूषं नैतत्प्राप्स्यंति किंचन ।
केवलं क्लेशवंतश्च करिष्यामि तथा ह्यहम् ॥५४
इति श्रीवासुदेवेन कथिता निखिलाः सुराः ।
संधानं त्वतुलैर्दैत्यैः कृतवंतस्तदा सुराः ।
नानाविधौषधिगणं समानीय सुरासुराः ॥५५
क्षीराब्धिपयसि क्षिप्त्वा चंद्रमोऽधिकनिर्मलम् ।
मन्थानं मंदरं कृत्वा कृत्वा योक्त्रं तु वासुकिम् ।
प्रारेभिरे प्रयत्नेन मंथितुं यादसां पतिम् ॥५६
इस क्षीर सागर में आप लोग असुरों के भी साथ में सन्धि अर्थात् मेल-जोल करके सब उनके भी साथ में समस्त परम श्रेष्ठ ओषधियाँ डाल दो ।५०। और मन्दराचल को मन्थान बनाकर अर्थात् मन्थन करने का साधन बनाकर तथा वासुकि नामक सर्पराज को योक्त अर्थात् मथने की डोरी करके सब देवगण मेरे सहायक होने पर अमृत का मथन करो अर्थात् अमृत निकालो ।५१। सान्त्वना के साथ आपको समस्त दानवों से भी इस कार्य को
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सम्पन्न कराने के लिए कहना चाहिए। यह उन्हें बताओ कि इसके करने से जो भी कुछ फल होगा वह तो हम और आपको सभी को सामान्य ही होगा अर्थात् उसको हम और आप सभी प्राप्त करेंगे ।५२। इस क्षीरसागर के मन्थन किये जाने पर जो सुधा उत्पन्न होगी उस अमृत के पान करने से आप लोग बलशाली और न मरण वाले हो जाओगे ।५३। जिस प्रकार से ये दैत्यगण उस अमृत को किञ्चिन मात्र भी न प्राप्त कर पावेंगे और केवल मन्थन करने में क्लेश वाले ही होंगे उस प्रकार का उपाय तो मैं कर दूँगा ।५४। यह भगवान् वासुदेव के द्वारा समस्त सुरगणों में कहा गया था तब सब सुरगणों ने उन अतुल दैत्यों के साथ सन्धि की थी। फिर अनेक प्रकार की औषधियाँ सुरो और असुरों ने एकत्रित करके वहाँ पर प्राप्त की थी ।५५। उस क्षीर सागर के जल में डालकर चन्द्रमा से भी अधिक निर्मल मन्दराचल को मन्थन करने का साधन और वासुकि सर्प को उसको डोरी बनाया था। फिर सभी ने मिल-जुलकर क्षीर सागर के मन्थन करने का कार्य बड़े ही प्रबल प्रयत्न से प्रारम्भ कर दिया था ।५६।
वासुकेः पुच्छभागे तु सहिताः सर्वदेवताः ।
शिरोभागे तु दैतेया नियुक्तास्तत्र शौरिणा ॥५७
बलवंतोऽपि ते दैत्यास्तन्मुखोच्छ्वासपावकैः ।
निर्दग्धवपुषः सर्वे निस्तेजस्कास्तदाभवन् ॥५८
पुच्छदेशे तु कर्षंतो महूराप्यायिताः सुराः ।
अनुकूलेन वातेन विष्णुना प्रेरितेन तु ॥५६
आदिकूर्मकृतिः श्रीमान्मध्ये क्षीरपयोनिधेः ।
भ्रमतो मंदराद्रेस्तु तस्याधिष्ठानतामगात् ॥६०
मध्ये च सर्वदेवानां रूपेणान्येन माधवः ।
चकर्ष वासुकिं वेगाद्दैत्यमध्ये परेण च ॥६१
ब्रह्मरूपेण तं शैलं विधायाक्रांतवारिधिम् ।
अपरेण च देवर्षिर्महता तेजसा मुहुः ॥६२
उपबृंहितवान्देवान्येन ते बलशालिनः ।
तेजसा पुनरन्येन बलात्कारसहेन सः ॥६३
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वासुकि सर्प के पूँछ के भाग में तो हित के साथ समस्त देवगण और उसके शिर के हिस्से में सब दैत्यगण भगवान् ने ही नियुक्त किये थे ।५७। यद्यपि दैत्यगण बहुत बलवान् थे तो भी उस सर्प के मुख के उच्छ्वासों की अग्नि से उनके समस्त शरीर निर्दग्ध हो गये थे और उस समय में वे बिल्कुल ही तेज से क्षीण हो गये थे ।५८। भगवान् विष्णु के द्वारा प्रेरित अनुकूल वायु से पूँछ के भाग का कर्षण करते हुए देवगण बार-बार आप्यायित (सन्तृप्त) हो रहे थे ।५६। भगवान् आदि कूर्म के आकार वाले बनकर क्षीरसागर के मध्य में भ्रमण करते हुए मन्दर पर्वत के अधिष्ठान बन गये थे जिस पर वह पर्वत टिक रहा था । मध्य में सब देवों के दूसरे स्वरूप से माधव दिखाई दे रहे थे । दूसरे रूप से दैत्यों के मध्य में उन्होंने भी बड़े वेग से वासुकि का कर्षण किया था । ब्रह्म के रूप से जिसने सागर को आक्रान्त कर दिया था उस शैल को धारण किया था और एक दूसरे रूप से देवर्षि ने महान् तेज के द्वारा देवों को सबल बना दिया था ।६०-६२। भगवान् ने देवों का बलवर्धन किया था जिसके वे बली बने रहें और फिर बलात्कारके सहन करने वाले तेज से सभी को कार्य सम्पन्न करने की शक्ति प्रदान की थी ।६३।
उपबृंहितवान्नागं सर्वशक्तिर्जनार्दनः ।
मथ्यमाने ततस्तस्मिन्क्षीराब्धौ देवदानवैः ॥६४
आविर्बभूव पुरतः सुरभिः सुरपूजिता ।
मुदं जग्मुस्तदा देवा दैतेयाश्च तपोधन ॥६५
मथ्यमाने पुनस्तस्मिन्क्षीराब्धौ देवदानवैः ।
किमेतदिति सिद्धानां दिवि चिंतयता तदा ॥६६
उत्थिता वारुणी देवी मदालोलविलोचना ।
असुराणां पुरस्तात्सा स्मयमाना व्यतिष्ठत ॥६७
जगृहुर्नैव तां दैत्या असुराश्चाभवंस्ततः ।
सुरा न विद्यते येषां तेनैवासुरशब्दिताः ॥६८
अथ सा सर्वदेवानामग्रतः समतिष्ठत ।
जगृहुस्तां मुदा देवाः सूचिताः परमेष्ठिना ।
अमृत मंथन वर्णन ] [ १६६
सुराग्रहणतोऽप्येते सुरशब्देन कीर्तिताः ॥६६ मथ्यमाने ततो भूयः पारिजातो महाद्रुमः । आविरासीत्सुगंधेन परितो वासयञ्जगत् ॥७०
सर्वशक्ति शाली जनार्दन प्रभु ने उस नाग वासुकि की भी शक्ति का वर्धन किया था। फिर देवों और दानवों के द्वारा क्षीरसागर के मन्थन किये जाने पर ।६४। फिर आगे अर्थात् सबसे पूर्व सुरों की पूजित सुरभि प्राविर्भूत हुई थी। हे तपोधन ! उसका अवलोकन करके उस समय में देवगण और दैत्यगण सभी प्रसन्नता से भर गये थे ।६५। फिर उस क्षीर सागर के मन्थन करने पर जो कि देवों और दानवों के द्वारा किया गया था, उस समय में सिद्धगण यही चिन्तन कर रहे थे कि यह क्या वस्तु है ।६६। तब उस क्षीर सागर से वारुणी देवी उत्थित हुई थी जिसके मद के कारण परम चञ्चल नेत्र थे। वह असुरों के आगे मुस्कुराती हुई संस्थित हो गयी थी ।६७। दैत्यों ने उसका ग्रहण नहीं किया था। तभी से वे असुर हो गये थे क्योंकि सुरा ग्रहण करने वाले नहीं हुए थे जिनके पास सुरा नहीं है उसी से वे असुर शब्द से कहे गये थे ।६८। इसके पश्चात् वह समस्त देवों के सामने स्थित हो गयी थी। परमेष्ठी के द्वारा संकेतित होकर उन देवों ने बड़े ही आनन्द के साथ उसको ग्रहण कर लिया था। सुरा के ही ग्रहण करने से ये लोग सुर शब्द से कीर्त्तित हुए थे ।६९। फिर मन्थन किये जाने पर महान् द्रुम परिजात प्रकट हुआ था जो अपनी सुगन्ध से सम्पूर्ण जगत् को सुवासित कर रहा था ।७०।
अत्यर्थसुन्दराकारा धीराश्चाप्सरसां गणाः । आविर्भूताश्च देवर्षे सर्वलोकमनोहराः ॥७१ ततः शीतांशुमद्भूतं जग्राह महेश्वरः । विषजातं तदुत्पन्नं जगृहुर्नागजातयः ॥७२ कौस्तुभाख्यं ततो रत्नमाददे तज्जनार्दनः । ततः स्वपत्रगन्धेन मदयंती महौषधीः । विजया नाम संजज्ञे भैरवस्तामुपाददे ॥७३ ततो दिव्यांबरधरो देवो धन्वंतरिः स्वयम् । उपस्थितः करे बिभ्रदमृताढ्यं कमंडलुम् ॥७४
१७० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
ततः प्रहृष्टमनसो दैंत्याश्च सर्वंतः ।
मुनयश्चाभवंस्तुष्टास्तदानीं तपसां निधे ॥७५॥
ततो विकसितांभोजवासिनीवरदायिनी ।
उत्थिता पद्महस्ता श्रीस्तस्मात्क्षीरमहार्णवात् ॥७६॥
अथ तां मुनयः सर्वे श्रीसूक्तेन श्रियं पराम् ।
तुष्टुवुस्तुष्टहृदया गंधर्वाश्च जगुः परम् ॥७७॥
विश्वाचीप्रमुखाः सर्वे ननृतुश्चाप्सरोगणाः ।
गङ्गाद्याः पुण्यनद्यश्च स्नानार्थमुपतस्थिरे ॥७८॥
फिर हे देवर्षे ! अत्यधिक सुन्दर आकृति वाली सब लोकों में मन को हरण करने वाली धीर अप्सराओं के गण आविर्भूत हुए थे ॥७१। इसके पश्चात् शीतांशु (चन्द्रमा) प्रकट हुआ था जिसको महेश्वर भगवान् ने मस्तक पर धारण करने के लिये ग्रहण कर लिया था । फिर महा कालकूट विष उत्पन्न हुआ था जिसका ग्रहण नाग जातियों ने किया था ।७२। इसके अनन्तर कौस्तुभ मणि जिसका नाम है वह रत्न निकला था उसको भगवान् जनार्दन ने ले लिया था । इसके पश्चात् अपने पत्रों की गन्ध से मद उत्पन्न करती हुई एक महौषधि आविर्भूत हुई थी उसका विजया नाम रखा गया था और भैरव ने उसका उपादान किया ।७३। इसके उपरान्त परम दिव्य व शस्त्रों के धारण करने वाले देव आविर्भूत हुए थे जो स्वयं ही धन्वन्तरि वे अपने कर में एक अमृत से परिपूर्ण कमंडल लिए हुए ही उपस्थित हुए थे ।७४। हे तपों के निधे ! फिर देवगण-दैत्यवर्ग और मुनिगण सबके सब प्रसन्न मन वाले तथा परम सन्तुष्ट हुए थे ।७५। इसके बाद उत्फुल्ल कमलों के अन्दर निवास करने वाली—वरदान देने वाली—हाथों में पद्म धारण किये हुए श्री देवी उस क्षीर सागर से उठकर बाहिर आयी थी ।७६। फिर तो सभी मुनिगणों ने उस परा देवी श्री का श्रीसूक्त के द्वारा स्तवन किया था । और परम सन्तुष्ट हृदय वाले गन्धर्वों ने बहुत सुन्दर गान किया था ।७७। जिनमें विश्वाची प्रमुख थे उन सभी ने गान किया था । और अप्सराओं के समूह ने श्री देवी के आगे नृत्य किया था । गंगा आदि जो परम पुण्यमयी सरिताएँ थीं वे सभी स्नान के लिए समुपस्थित हो गयी थीं ।७८।
अष्टौ दिग्दंतिनश्चैव मेध्यपात्रस्थितं जलम् ।
आदाय स्नापयांचक्रुस्तां श्रियं पद्मवासिनीम् ॥७६॥
मोहिनी प्रादुर्भाव वर्णन ] [ १७१
तुलसीं च समुत्पन्नां परार्ध्यामैक्यजां हरेः ।
पद्ममालां ददौ तस्यै मूर्तिमान्क्षीरसागरः ॥८०
भूषणानि च दिव्यानि विश्वकर्मा समर्पयत् ।
दिव्यमाल्यांबरधरा दिव्यभूषणभूषिता ।
ययौ वक्षःस्थलं विष्णोः सर्वेषां पश्यतां रमा ॥८१
तुलसी तु धृता तेन विष्णुना प्रभविष्णुना ।
पश्यति स्म च सा देवी विष्णुवक्षःस्थलालया ।
देवान्दयार्दया दृष्ट्या सर्वलोकमहेश्वरी ॥८२
आठ जो दिग्गज हैं अर्थात् आठों दिशाओं को बाँध कर रोकने वाले आठ दन्ती हैं। वे सत्र पवित्र पात्रों में जल भरकर उस पद्मों में निवास करने वाली श्री स्नपन करा रहे थे ।७९। मूर्त्तिमान् क्षीर सागर ने हरि के साथ श्रेय को प्राप्त हुई समुत्पन्न तुलसी को तथा पद्म की माला उस देवी के लिये अर्पित की थी।८०। विश्वकर्मा ने परमाद्भुत एवं दिव्य भूषण उसकेलिए समर्पित किये थे । परम उत्तम माला और वस्त्रों के धारण करने वाली एवं दिव्य भूषणों से विभूषिता वह श्री देवी सबके देखते-देखते भगवान् विष्णु के वक्षःस्थल में चली गयी थी ।८१। प्रभविष्णु श्री विष्णु ने तुलसी को तो धारण कर लिया था। भगवान् के वक्षःस्थल में आलय वाली वह देवी देखती थी। सब लोकों की महेश्वरी देवी को दया से आर्द्र दृष्टि से देखा था ।८२।
—x—
॥ मोहिनी प्रादुर्भाव वर्णन ॥
हयग्रीव उवाच–
अथ देवा महेन्द्राद्या विष्णुना प्रभविष्णुना ।
अङ्गीकृता महाधीराः प्रमोदं परमः ययुः ॥१
मलकाद्यास्तु ते सर्वे दैत्या विष्णुपराङ्मुखाः ।
संत्यक्ताश्च श्रिया देव्या भृशमुद्वेगमागताः ॥२
ततो जगृहिरे दैत्या धन्वन्तरिकरस्थितम् ।
१७२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
परमामृतसाराढ्यं कलशं कनकोद्भवम् । अथासुराणां देवानामन्योन्यं कलहोऽभवत् ॥३ एतस्मिन्नंतरे विष्णुः सर्वलोकैकरक्षकः । सम्यगाराधयामास ललिता स्वैक्यरूपिणीम् ॥४ सुराणामसुराणां चरणं वीक्ष्य सुदारुणम् । ब्रह्मा निजपदं प्राप शम्भुः कैलासमास्थितः ॥५ मलकं योधयामास दैत्यानामधिपं वृषा । असुरंश्च सुराः सर्वें सांपरायमकुर्वंत ॥६ भगवानपि योगीन्द्रः समाराध्य महेश्वरीम् । तदेकध्यानयोगेन तद्रूपः समजायत ॥७
श्री हयग्रीव ने कहा—इसके अनन्तर महेन्द्र आदि देवों को भगवान् प्रभविष्णु विष्णु ने जग अंगाकार कर लिया था तो महाधीर वे परम प्रसन्नता को प्राप्त हुए थे ।१। मलक आदि वे सब दैत्य भगवान् विष्णु के पराङ्मुख हो गये थे । जब श्री देवी के द्वारा वे संत्यक्त हो गये थे तो वे अत्यन्त अधिक उद्विग्न होगये थे ।२। इसके उपरान्त उन दैत्यों ने धन्वन्तरि भगवान् के कर में स्थित सुवर्ण निर्मित परमामृत के सार से युक्त कलश को ले लिया था अर्थात् हरण कर लिया था । इसके अनन्तर देवों का और असुरों का परस्पर में कलह उत्पन्न हो गया था ।३। इसी बीच में समस्त लोकों के एक ही रक्षा करने वाले विष्णु भगवान् ने अपने साथ एक रूप वाली ललिता की भली भाँति आराधना की थी ।४। सुरों और असुरों का परम दारुण युद्ध देखकर ब्रह्माजी अपने स्थान पर चले गये थे और शम्भु कैलास पर्वतपर समास्थित होगये थे।५।इन्द्र ने दैत्यों के अधिप मलक से युद्ध किया था । समस्त सुरों ने असुरों के साथ युद्ध किया था ।६। योगीन्द्र भगवान् ने भी महेश्वरी की समाराधना की थी । उन्होंने महेश्वरी का ध्यान योग से द्वारा करके एकता के साथ उसी रूप को प्राप्त हो गये थे ।७।
सर्वसंमोहिनी सा तु साक्षाच्छृङ्गारनायिका । सर्वशृङ्गारवेषाढ्या सर्वाभरणभूषिता ॥८
मोहिनी प्रादुर्भाव वर्णन ] [ १७३
सुराणामसुराणां च निवार्य रणमुल्बणम् । मंदस्मितेन दैत्यान्मोहयंती जगाद ह ॥९ अलं युद्धेन किं शस्त्रैर्मर्मस्थानविभेदिभिः । निष्ठुरैः किं वृथालापैः कंठशोषणहेतुभिः ॥१० अहमेवात्र मध्यस्था युष्माकं च दिवौकसाम् । यूयं तथामी नितरामत्र हि क्लेशभागिनः ॥११ सर्वेषां सममेवाद्य दास्याम्यमृतमद्भुतम् । मम हस्ते प्रदातव्यं सुधापात्रमनुत्तमम् ॥१२ इति तस्या वचः श्रुत्वा दैत्यास्तद्वाक्यमोहिताः । पीयूषकलशं तस्यै ददुस्ते मुग्धचेतसः ॥१३ सा तत्पात्रं समादाय जगन्मोहनरूपिणी । सुराणामसुराणां च पृथक्पंक्ति चकार ह ॥१४
वह देवी तो सबका संमोहन करने वाली थी और वह साक्षात् श्रृंगार की नायिका थी । वह सम्पूर्ण श्रृंगार के वेषवाली थी और असुरों का जो अतीव उल्बण युद्ध था । उसका निवारण करके अपने मन्दस्मित के द्वारा दैत्यों की मोहित करती हुई वह बोली ।८-९। अब यह युद्ध समाप्त करो, मर्म स्थानों के विभेदन करने वाले शास्त्रों से क्या लाभ होगा । और परम निष्ठुर व्यर्थ के इन अलापों से भी क्या लाभ है जो कि केवल कण्ठों के शोषण करने के कारण स्वरूप ही है ।१०। मैं ही आपके और देवों के मध्य में स्थित हूँ इसमें जैसा कि इस समय में आप लोग कर रहे हैं आप लोग तथा ये देवगण अत्यन्त ही क्लेश के भागी होंगे ।११। मैं आप सभी के लिए आज इस अद्भुत अमृत को बराबर-बराबर दे दूँगी । अब आप लोग इस उत्तम सुधा के पात्र को मेरे हाथ में दे दीजिए ।१२। इस उस महादेवी के वचन का श्रवण करके दैत्य विमोहित हो गये थे क्योंकि उसका वाक्य ही इस प्रकार था । मुग्ध चित्त वाले उन्होंने वह अमृत का कलश उस देवी को दे दिया था ।१३। सम्पूर्ण इस जगत् के मोहन करने वाली उस देवी ने उस अमृत के कलश को ले लिया था और फिर उसने सुरों की तथा असुरों की पृथक्-पृथक् पंक्ति बिठा दी थी ।१४।
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द्वयोः पंक्त्योश्च मध्यस्थास्तानुवाच सुरासुरान् । तूष्णीं भवन्तु सर्वेऽपि क्रमशो दीयते मया ॥ १५ ॥ तद्वाक्यमुररीचक्रुस्ते सर्वे समवायिनः । सा तु संमोहिताशेषलोका दातुं प्रचक्रमे ॥ १६ ॥ क्वणत्कनकदर्वीका क्वणन्मंगलकंकणा । कमनीयविभूषाढ्या कला सा परमा बभौ ॥ १७ ॥ वामे वामे करांभोजे सुधाकलशमुज्ज्वलम् । सुधां तां देवतापंक्तौ पूर्वं दर्व्या तदादिशत् ॥ १८ ॥ दिशंती क्रमशस्तत्र चन्द्रभास्करसूचितम् । दर्वीकरेण चिच्छेद सैंहिकेयं तु मध्यगम् । पीतामृतशिरोमात्रं तस्य व्योम जगाम च ॥ १९ ॥ तं दृष्ट्वाऽप्यसुरास्तत्र तूष्णीमासन्विमोहिताः । एवं क्रमेण तत्सर्वं विबुधेभ्यो वितीर्य सा । असुराणां पुरः पात्रं सा निनाय तिरोदधे ॥ २० ॥ रिक्तपात्रं तु तं दृष्ट्वा सर्वे दैतेयदानवाः । उद्वेलं केवलं क्रोधं प्राप्ता युद्धचिकीर्षया ॥ २१ ॥
उन दोनों पंक्तियों के मध्य में स्थित होकर उन समस्त सुरों और असुरों से उसने कहा था। आप सब लोग बिल्कुल चुपचाप रहें—मेरे द्वारा आप सबको क्रम से ही यह अमृत दिया जाता है ।१५। उन सभी ने जो समवायी थे उस देवी के उस वाक्य को स्वीकृत कर लिया था । वह तो सभी लोकों को संमोहित करने वाली थी। फिर उस देवी ने देने का उपक्रम किया था ।१६। उस समय में उसके सुवर्ण की करधनी क्वणित हो रही थी तथा उसके करों के कङ्कण भी क्वणित हो रहे थे जो परम मंगल स्वरूप थे । वह परम कमनीय भूषा से समन्वित थी । उस समय में वह परमाधिक मधुर मूर्त्ति सुशोभित हो रही थी ।१७। परम सुन्दर वाम कर कमल में तो वह उज्ज्वल सुधा का कलश था, उस सुधा को उसने दर्वी से प्रथम देवों की पंक्ति में ही देना आरम्भ किया था ।१८। वह वहाँ पर क्रम से देती हुई
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देखती जा रही थी । उस समय में मध्य में सैंहिकेय स्थित था जिसकी सूचना संकेत द्वारा चन्द्र और सूर्य ने उसको दे दी थी । अतः दर्वी के कर से उसका उस देवी ने छेदन कर दिया था । वह अमृत का पान कर चुका था अतएव उसका केवल शिर आकाशमें चला गया था।१९।उसको देखकर वहाँ पर जो असुर थे वे विमोहित हुए चुप थे । इसी प्रकार से क्रमसे उस देवी ने वह सम्पूर्ण अमृत देवों के लिए वितीर्ण कर दिया था और असुरों के आगे उस खाली पात्र को रखकर वह तिरोहित हो गयी थी ।२०। उन सब दैत्य दानवों ने उस खाली पात्र को देखा था और युद्ध करने की इच्छा से उन्होंने केवल असीम क्रोध किया था ।२१।
इन्द्रादयः सुराः सर्वे सुधापानाद्बलोत्तराः ।
दुर्बलैरसुरैः सार्धं समयुद्ध्यन्त सायुधाः ॥२२
ते विध्यमानाः शतशो दानवेंद्राः सुरोत्तमैः ।
दिगंतान्कतिचिज्जग्मुः पातालं कतिचिद्ययुः ॥२३
दैत्यं मलकनामानं विजित्य विबुधेश्वरः ।
आत्मीयां श्रियमाजह्रे श्रीकटाक्षसमीक्षितः ॥२४
पुनः सिंहासनं प्राप्य महेन्द्रः सुरसेवितः ।
त्रैलोक्यं पालयामास पूर्ववत्पूर्वदेवजित् ॥२५
निर्भया निखिला देवास्त्रैलोक्ये सचराचरे ।
यथाकामं चरन्ति स्म सर्वदा हृष्टचेतसः ॥२६
तदा तदखिलं दृष्ट्वा मोहिनीचरितं मुनिः ।
विस्मितः कामचारी तु कैलासं नारदो गतः ॥२७
नन्दिना च कृतानुज्ञः प्रणम्य परमेश्वरम् ।
तेन संभाव्यमानोऽसौ तुष्टो विष्टरमास्त सः ॥२८
इन्द्र आदि समस्त सुरगण सुधा के पान से विशेष बलवान् होकर दुर्बल असुरों के साथ आयुधों को लेकर भली भांति लड़े थे ।२२। उन उत्तम सुरों के द्वारा वे दानवेन्द्र सैकड़ों बार विध्यमान हुए थे उनमें से कुछ तो अन्य दिशाओं में चले गये थे और कुछ पाताल लोक में चले गये थे ।२३। श्री देवी के कटाक्षों से सम्प्रेरित होकर देवों के स्वामी इन्द्र देव ने मलक नाम वाले दैत्य को जीत लिया था और
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उसने अपनी श्री का आहरण कर लिया था ।२४। सुरगणों के द्वारा सेवित महेन्द्र देव ने फिर अपने सिंहासन को प्राप्त कर लिया था और पूर्व की ही भाँति पूर्व देव जित् ने त्रैलोक्य का परिपालन किया था ।२५। फिर समस्त देवगण निर्भय होकर इस चराचर त्रिलोकी में सर्वदा प्रसन्न चित्त होते हुए अपनी इच्छा के अनुसार सञ्चरण किया करते थे ।२६। उस समय सम्पूर्ण मोहिनी के चरित को देखकर मुनि नारद बहुत ही आश्चर्य्यान्वित होकर स्वेच्छा से चरण करने वाले कैलास गिरि पर चले गये थे ।२७। वहाँ पर नन्दी से आज्ञा पाकर उन्होंने परमेश्वर को प्रणाम किया था। शिव प्रभु के द्वारा भली भाँति आदर प्राप्त करके परम तुष्ट हुए थे और आसन पर समवस्थित हो गये थे ।२८।
आसनस्थं महादेवो मुनिं स्वेच्छाविहारिणम् ।
पप्रच्छ पार्वतीजानिः स्वच्छस्फटिकसन्निभः ॥२६
भगवन्सर्ववृत्तज्ञ पवित्रीकृतविष्टर ।
कलहप्रिय देवर्षे किं वृत्तं तत्र नाकिनाम् ॥३०
सुराणामसुराणां वा विजयः समजायत ।
किं वाच्यमृतवृत्तांतं विष्णुना वापि किं कृतम् ॥३१
इति पृष्टो महेशेन नारदो मुनिसत्तमः ।
उवाच विस्मयाविष्टः प्रसन्नवदनेक्षणः ॥३२
सर्वं जानासि भगवन्सर्वज्ञोऽसि यतस्ततः ।
तथापि परिपृष्टेन मया तद्वक्ष्यतेऽधुना ॥३३
तादृशे समरे घोरे सति दैत्यदिवौकसाम् ।
आदिनारायणः श्रीमान्मोहिनीरूपमादधे ॥३४
तामुदारविभूषाढ्यां मूर्ती शृङ्गारदेवताम् ।
सुरासुराः समालोक्य विरताः समरोद्यमात् ॥३५
परम स्वच्छ स्फटिक मणि के सदृश स्वरूप वाले पार्वती के स्वामी श्री महादेवजी ने आसन पर विराजमान नारदजीजी से जो कि अपनी ही इच्छा से विहार करने वाले थे पूछा था ।२६। हे भगवान् ! आपने इस
करने वाला है। अब यह बतलाइये कि उन स्वर्गवासी देवगणों का क्या हाल है ? ।३०। सुरों का अथवा असुरों का विजय हुआ है ? अथवा उस अमृत का क्या हुआ— यह भी वृत्तान्त बतलाइए तथा भगवान विष्णु ने उसमें क्या किया था ? ।३१। इस तरह से महेश प्रभु के द्वारा पूछे गये मुनिश्रेष्ठ नारदजी ने परम विस्मय से आविष्ट होकर प्रसन्न मुख और नेत्रों वाले नारदजी ने कहा था ।३२। हे भगवन् ! आप तो सभी कुछ जानते हैं क्योंकि आप स्वयं सर्वज्ञ हैं। तो भी क्योंकि आपने मुझसे पूछा है अतः मैं अब वह सब बतलाता हूँ ।३३। उस प्रकार का महान् घोर जब दैत्यों और देवों का युद्ध शुरू हो गया था तो उस समय में आदि नारायण ने जो परम श्री सम्पन्न हैं मोहिनी का स्वरूप धारण कर लिया था ।३४। उस मोहिनी का विलोकन करते ही जो परमोज्ज्वल विभूषा से सुसम्पन्न थीं और मूर्तिमती शृङ्गार की देवता थी सभी सुर और असुर युद्ध के उद्यम से विरत हो गये थे ।३५।
तन्मायामोहिता दैत्याः सुधापात्रं च याचिताः ।
कृत्वा तामेव मध्यस्थामर्पयामासुरंजसा ॥३६
तदा देवी तदादाय मंदस्मितमनोहरा ।
देवेभ्य एव पीयूषमशेषं विततार सा ॥३७
तिरोहितामदृष्ट्वा तां दृष्ट्वा शून्यं च पात्रकम् ।
ज्वलन्मन्युमुखा दैत्या युद्धाय पुनरुत्थिताः ॥३८
अमरैरमृतास्वादादत्युल्बणपराक्रमैः ।
पराजिता महादैत्या नष्टाः पातालमभ्ययुः ॥३९
इमं वृत्तांतमाकर्ण्य भवानीपतिरव्ययः ।
नारदं ऽऽपयित्वाशु तदुक्तं सततं स्मरन् ॥४०
अज्ञातः प्रमथैः सर्वैः स्कन्दनंदिविनायकैः ।
पार्वतीसहितो विष्णुमाजगाम सविस्मयः ॥४१
क्षीरोदतीरगं दृष्ट्वा सस्त्रीकं वृषवाहनम् ।
भोगिभोगासनाद्विष्णुः समुत्थाय समागतः ॥४२
१७८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
उस मोहिनी की माया से मोहित होते हुए दैत्यों से जब सुधा का पात्र मांगा गया था तो उन्होंने उसी मोहिनी को मध्यस्थ बनाकर तुरन्त ही वह पात्र उसको दे दिया था ।३६। मन्द मुस्कान से परम मनोहर उस देवी ने उसी समय में उस पात्र को ले लिया था। उसने इस सम्पूर्ण सुधा को देवों के ही लिए बाँटकर खाली कर दिया था ।३७। जब उन्होंने देखा था कि वह मोहिनी तो तिरोहित हो गयी है और वह सुधा का पात्र खाली है तो क्रोध से उन सबका मुख लाल हो गया था और वे दैत्य फिर युद्ध करने के लिए समुद्यत हो गये थे ।३८। अमृत के खाने से वे देवगण तो अमर हो गये थे और उनका पराक्रम भी बहुत ही उल्बण हो गया था। उन्होंने उस युद्ध में दैत्यों को पराजित कर दिया था फिर वे महादैत्य नष्ट होते हुए पाताल लोक में चले गये थे ।३९। अविनाशी भवानी के स्वामी ने इस वृत्तान्त का श्रवण करके नारदजी को तो विदा कर दिया था और उसी वृत्तान्त का निरन्तर स्मरण करने लगे थे ।४०। स्कन्द-नन्दी और विनायक इन समस्त गणों के द्वारा अज्ञात होते हुए बड़े ही आश्चर्य से समन्वित होकर केवल पार्वती को साथ में लेकर भगवान् विष्णु के समीप में आ गये थे ।४१। क्षीर सागर के तट पर अपनी प्रिया के साथ भगवान् शम्भु का दर्शन करके शेष की शय्या से समुत्थित होकर भगवान् विष्णु तुरन्त ही वहाँ पर समागत हो गये थे ।४२।
वाहनादवरुह्येशः पार्वत्या सहितः स्थितम् ।
तं दृष्ट्वा शीघ्रमागत्य संपूज्यार्घ्यादितो मुदा ॥४३
सस्नेहं गाढमालिग्य भवानीपतिमच्युतः ।
तदागमनकार्यं च पृष्टवान्विष्टरश्रवाः ॥४४
तमुवाच महादेवो भगवन्पुरुषोत्तम ।
महायोगेश्वर श्रीमन्सर्वसौभाग्यसुन्दरम् ॥४५
सर्वसंमोहनकमवाङ्मनसगोचरम् ।
यद्रूपं भवतोपातं तन्मह्यं संप्रदर्शय ॥४६
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपं शृंगारस्याधिदैवतम् ।
अवश्यं दर्शनीयं मे त्वं हि प्रार्थितकामधुक् ॥४७
इति संप्रार्थितः शश्वन्महादेवेन तेन सः।
मोहिनी प्रादुर्भाव वर्णन ] [ १७६
यद्ध्यानवैभवाल्लब्धं रूपमद्वैतमद्भुतम् ॥४८ तदेवानन्यमनसा ध्यात्वा किंचिद्विहस्य सः । तथास्त्विति तिरोऽधत्त महायोगेश्वरो हरिः ॥४६
भगवान् शिव वाहन से उतर कर पार्वती के सहित विष्णु भगवान के समीप में पहुँचे और संस्थित भगवान की बड़े आनन्द से पूजा की और अर्घ्य अर्पित किया था ।४३। भगवान अच्युत ने भवानी के पति का स्नेह के साथ गाढालिंगन किया था । विष्णु भगवान ने उनके समागमन का कारण पूछा था ।४४। महादेवजी ने भगवान से कहा—आप तो उत्तम पुरुष है और महान योगेश्वर हैं । आपने श्री सम्पन्न—सभी प्रकार के सौभाग्य से परम सुन्दर तथा सबको संमोह का पैदा करने वाला जो वाणी और मन से कभी गोचर नहीं हो सकता है कैसा स्वरूप आपने धारण किया था । उस स्वरूप का प्रदर्शन मुझे भी कृपाकर कराइए ।४५-४६। मैं आपके—उस स्वरूप का दर्शन करना चाहता हूँ जो कि शृंगार का अधिष्ठात्री देवता है । मुझे वह अवश्य दिखाना चाहिए । आप तो प्रार्थित पदार्थों के प्रदान करने वाले कामधेनु ही हैं ।४७। इस प्रकार से महादेवजी के द्वारा बराबर भगवान विष्णु की प्रार्थना की गयी थी । जिनके ध्यान के वैभव से अद्वैत और अद्भुत रूप प्राप्त किया था ।४८। उसी का अनन्यमन से ध्यान करके और कुछ हँसकर उन्होंने कहा—ऐसा ही होगा—और फिर महोयोगेश्वर हरि तिरोहित हो गये थे ।४६।
सर्वोऽपि सर्वतश्चक्षुर्मुहुर्व्यापारयन्क्वचित् । अदृष्टपूर्वमाराममभिरामं व्यलोकयत् ॥५० विकसत्कुसुमश्रेणीविनोदिमधुपालिकम् । चंपकस्तबकामोदसुरभीकृतदिक्तटम् ॥५१ माकन्दवृन्दमाध्वीकमाद्यदुल्लोलकोकिलम् । अशोकमण्डलीकांडसतांडवशिखण्डिकम् ॥५२ भृङ्गालिनवझंकारजितवल्लकिनिस्वनम् । पाटलोदारसौरभ्यपाटलीकुसुमोज्ज्वलम् ॥५३ तमालतालहिंतालकृतमालाविलासितम् । पर्यन्तदीर्घिकादीर्घपङ्कजश्रीपरिष्कृतम् ॥५४
१६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
वातपातचलच्चारुपल्लवोत्फुल्लपुष्पकम् ।
सन्तानप्रसवमोदसन्तानाधिकवासितम् ॥५५
तत्र सर्वत्र पुष्पाढ्ये सर्वलोकमनोहरे ।
पारिजाततरोर्मूले कान्ता काचिददृश्यत ॥५६
भगवान् शिव ने भी सभी ओर अपनी दृष्टि डालते हुए देखा था तो एक पहिले जो कभी भी नहीं देखा था ऐसा परम सुन्दर उद्यान देखा था ।५०। जो ऐसा था कि प्रसून खिले हुए थे और उन पुष्पों पर मधुपों की श्रेणियां गुञ्जार करती हुई आनन्द ले रही थीं। चम्पा के पुष्पों के स्तवनों की परम रमणीय गन्ध से सभी दिशाएं सुगन्धित हो रही थीं ।५१। माकन्दों के वृन्द और माध्वीक पर मदमस्त कोकिलें उल्लसित हो रही थीं । अशोक वृक्षों के समुदायों में मयूरगण अपना अद्भुत ताण्डव नृत्य कर रहे थे ।५२। भ्रमरों की पंक्तियों की गूँज की झङ्कार से वल्लभियों की ध्वनि भी वहाँ पर पराजित हो गयी थी । पाटलों की उदार सुगन्ध से पाटली कुसुमों की उज्ज्वलता वहाँ पर भरी हुई थी ।५३। ताल की सुखद मालाओं से वह शोभित था उस उद्यान के किनारों पर बड़े-बड़े सरोवर बने हुए थे जिनमें बड़ी विशाल कमलों की शोभा से वह आराम समलंकृत था ।५४। वायु के मन्द झोंके से द्रुमों के पत्र हिल रहे थे और उन पत्रों के मध्य में विकसित पुष्पों की अपूर्व छटा विद्यमान थी । प्रसून और फलों के आमोद के विस्तार से वह अभिराम उद्यान अधिक सुवासित हो रहा था । वहाँ पर सभी जगह विकसित पुष्पों की भरमार थी और वह सभी लोगों के लिए परम मनोहर था । वहाँ पर एक पारिजात के वृक्ष के नीचे कोई एक परमाधिक सुन्दरी दिखलाई दी थी ।५५-५६।
बालार्कपाटलाकारा नवयौवनदर्पिता ।
आकृष्टपद्मरागाभा चरणाब्जनखच्छदा ॥५७
यावकश्रीविनिक्षेपपादलौहित्यवाहिनी ।
कलनिः स्वनमञ्जीरपादपद्ममनोहरा ॥५८
अनंगवीरतूणीरदर्पोन्मदनजंघिका ।
करिशुण्डाकदलिकाकान्तितुल्योरुशालिनी ॥५६
मोहिनी प्रादुर्भाव वर्णन ] [ १८१
अरुणेन दुकूलेन सुस्पर्शेन तनीयसा । अलंकृतनितंबाढ्या जघनाभोगभासुरा ॥६० नवमाणिक्यसन्नद्धहेमकांचीविराजिता । नतनाभिमहावर्त्तत्रिवल्यूर्मिप्रभाझरा ॥६१ स्तनकुङ्मलहिंदोलमुक्तादामशतावृता । अतिपीवरवक्षोजभारभंगुरमध्यभूः ॥६२ शिरीषकोमलभुजा कंकणांगदशालिनी । सौर्मिकांगुलिमन्मृष्टशंखसुन्दरकंधरा ॥६३
वह बाल सूर्य के समान पाटल की आकृति वाली थी और नूतन यौवन के दर्प से समन्वित थी । उसके चरण कमलोपम कोमल और नखछद आकृष्ट पद्मराग की आभा वाले थे ।५७। यावक की श्री के विनिक्षेप से उसके चरणों में लालिमा थी जिसको वह वहन कर रही थी । उसके चरणों में परम मनोहर ध्वनि संयुक्त मञ्जीर थे ।५८। उसके जघन कामदेव वीर के तूणीर को उन्मादित करने वाले थे । उसके ऊरुस्थल करिशुण्ड-कदली की कान्ति को भी शमन करने वाले थे ।५९। यह अरुण वर्ण का बहुत ही बारीक और सुख स्पर्श वाला वस्त्र पहिने हुई थी जिसस उसके नितम्ब समलंकृत थे और वह जघनों के आभोग से परम भासुर थी ।६०। नवीन माणिक्य से बँधी हुई सुवर्ण की करधनी से विभूषित थी । उसकी नाभि नत महावर्त्त के समान थी उसके ऊपर त्रिवली की ऊर्मियों की प्रभा झलक रही थी ।६१। कलियों के आकार वाले स्तनों के हिण्डोलों पर सैकड़ों मोतियों के हार पहिने हुई थी । उसके उरोज अत्यधिक स्थूल थे और उनके भार से उसका कटिभाग झुका हुआ था ।६२। उसकी भुजाएं शिरीष के सदृश अतीव कोमल थीं जिनमें कङ्कण और अंगद धारण किये हुई थीं । उसकी अंगुलियां ऊर्मियों के समान प्रतीत हो रही थीं जो अत्यधिक पतली और कोमल थीं तथा उसकी ग्रीवा सुन्दर शंख के समान नतोन्नत थी ।६३।
मुखदर्पणवृत्ताभचुबुकापाटलाधरा । शुचिभिः पक्तिभिः शुद्धैर्विद्यद्रूपैर्विभास्वरैः ॥६४ कुन्दकुङ्मलसच्छायैर्दन्तैर्दर्शितचन्द्रिका ।