भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्रकार कहते हैं—

१४८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ अनुस्मृतेः = पहलेके अनुभवोंका बारम्बार स्मरण होता है, ( इसलिये अनुभव करनेवाला आत्मा क्षणिक नहीं है ) इस युक्तिसे; च = भी ( बौद्धमत असङ्गत सिद्ध होता है ) । व्याख्या-सभी मनुष्योंको अपने पहले किये हुए अनुभवोंका बारम्बार स्मरण होता है। जैसे 'मैंने अमुक दिन अमुक ग्राममें अमुक वस्तु देखी थी, मै बालक- पनमें अमुक खेल खेला करता था। मैंने आजसे बीस वर्ष पहले जिसे देखा था, वही यह है।' इत्यादि। इस प्रकार पूर्व अनुभवोंका जो बारम्बार स्मरण होता है, उसे 'अनुस्मृति' कहते हैं। यह तभी हो सकती है, जब कि अनुभव करनेवाला आत्मा नित्य माना जाय। उसे क्षणिक माननेसे यह स्मरण नहीं बन सकता; क्योकि एक क्षण पहले जो अनुभव करनेवाला था, वह दूसरे क्षणमें नहीं रहता। बहुत वर्षोंमे तो असंख्य क्षणोंके भीतर असंख्य बार आत्माका परिवर्तन हो जायगा। अतः उक्त अनुस्मृति होनेके कारण यही सिद्ध होता है कि आत्मा क्षणिक नहीं, किन्तु नित्य है। इसीलिये बौद्धोंका क्षणिकवाद सर्वथा अनुपपन्न है। सम्बन्ध-बौद्धोंका यह कथन है कि 'जब बोया हुआ बीज स्वयं नष्ट होता है, तभी उससे अङ्कुर उत्पन्न होता है। दूधको मिटाकर दही बनता है; इसी प्रकार कारण स्वयं नष्ट होकर ही कार्य उत्पन्न करता है।' इस तरह अभावसे ही भावकी उत्पत्ति होती है। उनकी इस धारणाका खण्डन करनेके लिये सूत्रकार कहते हैं— नासतोऽदृष्टत्वात् ॥ २ । २ । २६ ॥ असतः = असत्‌से ( कार्यकी उत्पत्ति ); न = नहीं हो सकती; अदृष्टत्वात् = क्योकि ऐसा देखा नहीं गया है। व्याख्या-खरगोशके सींग, आकाशके फूल और वन्ध्या-पुत्र आदि केवल वाणीसे ही कहे जाते हैं, वास्तवमें हैं नहीं; तथा आकाशमे नीलापन और तिरविरे आदि बिना हुए ही प्रतीत होते हैं; ऐसे असत् पदार्थोंसे किसी कार्यकी उत्पत्ति या सिद्धि नहीं देखी जाती है। उनसे विपरीत जो मिट्टी, जल आदि सत् पदार्थ हैं, उनसे घट और बर्फ आदि कार्योंकी उत्पत्ति प्रत्यक्ष देखी जाती है। इससे यही सिद्ध होता है कि जो वास्तवमे नहीं है, केवल वाणीसे जिसका कथनमात्र होता है, अथवा जो बिना हुए ही प्रतीत हो रहा है, उससे कार्यकी उत्पत्ति नहीं

सूत्र २६-२८ ] अध्याय २ १४९

सूत्र २६-२८ ] अध्याय २ १४९ हो सकती। बीज और दूधका अभाव नहीं होता। किन्तु रूपान्तर मात्र होता है, अतः जगत्का कारण सत् है और वह सर्वथा सत्य है। इसलिये बौद्धोकी उपर्युक्त मान्यता असङ्गत है। सम्बन्ध—किसी नित्य चेतन कर्त्ताके बिना क्षणिक पदार्थोंसे अपने-आप कार्य उत्पन्न होते हैं, इस मान्यताका खण्डन दूसरी युक्तिके द्वारा करते हैं— उदासीनानामपि चैवं सिद्धिः ॥ २ । २ । २७ ॥ च=इसके सिवा; एवम्=इस प्रकार ( बिना कर्ताके स्वतः कार्यकी उत्पत्ति ) माननेपर; उदासीनानाम्=उदासीन ( कार्य-सिद्धिके लिये चेष्टा न करनेवाले ) पुरुषोंका; अपि=भी; सिद्धिः=कार्य सिद्ध हो सकता है। व्याख्या—यदि ऐसा माना जाय कि 'कार्यकी उत्पत्ति होनेमे किसी नित्य चेतन कर्ताकी आवश्यकता नहीं है, क्षणिक पदार्थोंके समुदायसे अपने-आप कार्य उत्पन्न हो जाता है' तब तो जो लोग उदासीन रहते है, कार्य आरम्भ नहीं करते या उसकी सिद्धिकी चेष्टासे विरत रहते हैं, उनके कार्य भी पदार्थ- गत शक्तिसे अपने-आप सिद्ध हो जाने चाहिये। परन्तु ऐसा नहीं देखा जाता। इससे यही सिद्ध होता है कि उपर्युक्त मान्यता समीचीन नहीं है। सम्बन्ध—यहाँतक बौद्धोंके क्षणिकवादका खण्डन किया गया। अब विज्ञान- वादका खण्डन करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। विज्ञानवादी बौद्ध (योगाचार) मानते हैं कि प्रतीत होनेवाला बाह्यपदार्थ वास्तवमे कुछ नहीं है, केवलमात्र स्वप्नकी भाँति बुद्धिकी कल्पना है; इस मान्यताका खण्डन करते हैं— नाभाव उपलब्धेः ॥ २ । २ । २८ ॥ अभावः=जाननेमे आनेवाले पदार्थोंका अभाव; न=नहीं है; उपलब्धेः= क्योकि उनकी उपलब्धि होती है। व्याख्या—जाननेमे आनेवाले बाह्यपदार्थ मिथ्या नहीं हैं, वे कारणरूपमें तथा कार्यरूपमे भी सदा ही सत्य है। इसलिये उनकी प्रत्यक्ष उपलब्धि होती है। यदि वे स्वप्नगत पदार्थों तथा आकाशमे दीखनेवाली नीलिमा आदिकी भाँति सर्वथा मिथ्या होते तो इनकी उपलब्धि नहीं होती। सम्बन्ध—विज्ञानवादियोंकी ओरसे यह कहा जा सकता है कि 'उपलब्धि- मात्रसे पदार्थकी सत्ता सिद्ध नहीं हो सकती; क्योंकि स्वप्नमे प्रतीत होनेवाले तथा

१५० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ बाजीगरद्वारा उपस्थित किये जानेवाले पदार्थ यद्यपि सत्य नहीं होते तो भी इनकी उपलब्धि देखी जाती है; इसपर कहते हैं— वैधर्म्याच्च न स्वप्नादिवत् ॥ २ । २ । २९ ॥ वैधर्म्यात् = जाग्रत् अवस्थासे अन्य अवस्थाओके धर्ममे भेद होनेके कारण; च=भी; ( जाग्रत्मे उपलब्ध होनेवाले पदार्थ ) स्वप्नादिवत्=स्वप्नादिमें उपलब्ध पदार्थोंकी भाँति; न=मिथ्या नहीं हैं। व्याख्या—स्वप्नावस्थामे प्रतीत होनेवाले पदार्थ पहलेके देखे, सुने और अनुभव किये हुए ही होते है तथा वे जगनेपर उपलब्ध नहीं होते। एकके स्वप्नकी घटना दूसरेको नहीं दीखती। उसी प्रकार बाजीगरद्वारा कल्पित पदार्थ भी थोड़ी देरके बाद नहीं उपलब्ध होते। मरुभूमिकी तप्त बालुकाराशिमें प्रतीत होनेवाले जल, सीपमे दीखनेवाली चाँदी तथा भ्रमवश प्रतीत होनेवाली दूसरी किसी वस्तुकी भी सत्तारूपसे उपलब्धि नहीं होती है। परन्तु जो जाग्रत्-कालमे प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाली वस्तुएँ हैं, उनके विषयमे ऐसी बात नहीं है। वे एक ही समय बहुतोंको समान रूपसे उपलब्ध होती है, कालान्तरमे भी उनकी उपलब्धि देखी जाती है। एक प्रकारका आकार नष्ट कर दिया जानेपर भी दूसरे आकारमें उनकी सत्ता विद्यमान रहती है। इस प्रकार स्वप्नादिमें भ्रान्तिसे प्रतीत होनेवाले पदार्थोंके और सत्पदार्थोंके धर्मोंमें बहुत अन्तर है। इसलिये स्वप्नादिके दृष्टान्तके बलपर यह कहना उपयुक्त नहीं है कि 'उपलब्धिमात्रसे पदार्थकी सत्ता सिद्ध नहीं होती।' सम्बन्ध—विज्ञानवादी ऐसा कहते हैं कि बाह्य पदार्थ न होनेपर भी पूर्व- वासनाके कारण बुद्धिद्वारा उन विचित्र पदार्थोंका उपलब्ध होना सम्भव है; अतः इसका खण्डन करते हैं— न भावोऽनुपलब्धेः ॥ २ । २ । ३० ॥ भावः=विज्ञानवादियोद्वारा कल्पित वासनाकी सत्ता; न=सिद्ध नहीं होती; अनुपलब्धेः=क्योंकि उनके मतके अनुसार बाह्य पदार्थोंकी उपलब्धि ही नहीं हो सकती। व्याख्या—जो वस्तु पहले उपलब्ध हो चुकी है, उसीके संस्कार बुद्धिमे जमते हैं और वे ही वासनारूपसे स्फुरित होते हैं। पदार्थोंकी सत्ता स्वीकार न

सूत्र २९-३२ ] अध्याय २ १५१

सूत्र २९-३२ ] अध्याय २ १५१ करनेसे उनकी उपलब्धि नहीं होगी और उपलब्धि सिद्ध हुए बिना पूर्व अनुभवके अनुसार वासनाका होना सिद्ध नहीं होगा । इसलिये विज्ञानवादियोंकी मान्यता ठीक नहीं है । बाह्य पदार्थोंको सत्य मानना ही युक्तिसङ्गत है । सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे वासनाका खण्डन करते हैं— क्षणिकत्वाच्च ॥ २ । २ । ३१ ॥ क्षणिकत्वात्=बौद्धमतके अनुसार वासनाकी आधारभूता बुद्धि भी क्षणिक है, इसलिये; च=भी ( वासनाकी सत्ता सिद्ध नहीं होती ) । व्याख्या—वासनाकी आधारभूता जो बुद्धि है, उसे भी विज्ञानवादी क्षणिक मानते हैं । इसलिये वासनाके आधारकी स्थिर सत्ता न होनेके कारण निराधार वासनाका अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता, इसलिये भी बौद्धमत भ्रान्तिपूर्ण है । सम्बन्ध—अब सूत्रकार बौद्धमतमें सब प्रकारकी अनुपपत्ति होनेके कारण उसकी अनुपयोगिता सूचित करते हुए इस प्रकरणका उपसंहार करते हैं— सर्वथानुपपत्तेश्च ॥ २ । २ । ३२ ॥ ( विचार करनेपर बौद्धमतमे ) सर्वथा=सब प्रकारसे; अनुपपत्तेः=अनुपपत्ति ( असङ्गति ) दिखायी देती है, इसलिये; च=भी ( बौद्धमत उपादेय नहीं है ) । व्याख्या—बौद्धमतकी मान्यताओंपर जितना ही विचार किया जाता है, उतना ही उनकी प्रत्येक बात युक्तिविरुद्ध जान पड़ती है । बौद्धोंकी प्रत्येक मान्यताका युक्तियोंसे खण्डन हो जाता है, अतः वह कदापि उपादेय नहीं है । यहाँ सूत्रकारने प्रसङ्गका उपसंहार करते हुए माध्यमिक बौद्धोंके सर्वशून्यत्रादका भी खण्डन कर दिया—यह बात इसीके अन्तर्गत समझ लेनी चाहिये । तात्पर्य यह कि क्षणिकत्राद और विज्ञानवादका जिन युक्तियोंसे खण्डन किया गया है, उन्हींके द्वारा सर्वशून्यत्रादका भी खण्डन हो गया; ऐसा मानना चाहिये । सम्बन्ध—यहाँतक बौद्धमतका निराकरण करके अब जैनमतका खण्डन करने- के लिये नया प्रकरण आरम्भ करते हैं। जैनीलोग सप्तभङ्गी-न्यायके अनुसार एक ही पदार्थकी सत्ता और असत्ता दोनों स्वीकार करते हैं; उनकी इस मान्यताका निराकरण करनेके लिये सूत्रकार कहते हैं—

१५२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ नैकस्मिन्नसंभवात् ॥ २ । २ । ३३ ॥ एकस्मिन् = एक सत्य पदार्थमें; न = परस्पर-विरुद्ध अनेक धर्म नहीं रह सकते; असंभवात् = क्योंकि यह असम्भव है। व्याख्या—जैनीलोग सात पदार्थ* और पञ्च अस्तिकाय† मानते है और सर्वत्र सप्तभङ्गी-न्यायकी अवतारणा करते हैं। उनकी मान्यताके अनुसार सप्तभङ्गी-न्यायका स्वरूप इस प्रकार है— १ स्यादस्ति ( सम्भव है, पदार्थकी सत्ता हो ), २ स्यान्नास्ति ( सम्भव है, उसकी सत्ता न हो ), ३ स्यादस्ति च नास्ति च ( हो सकता है कि पदार्थकी सत्ता हो भी और न भी हो ), ४ स्यादवक्तव्यः ( सम्भव है, वह कहने या वर्णन करने योग्य न हो ), ५ स्यादस्ति चावक्तव्यश्च ( सम्भव है, उसकी सत्ता हो, पर वह वर्णन करने योग्य न हो ), ६ स्यान्नास्ति चावक्तव्यश्च ( सम्भव है, उसकी सत्ता भी न हो और वह वर्णन करने योग्य भी न हो ) तथा ७ स्यादस्ति च नास्ति चावक्तव्यश्च ( सम्भव है, उसकी सत्ता हो, न भी हो और वह वर्णन करनेके योग्य भी न हो )। इस तरह वे प्रत्येक पदार्थके विषयमे विकल्प रखते हैं। सूत्रकारने इस सूत्रके द्वारा इसीका निराकरण किया है। उनका कहना है कि जो एक सत्य पदार्थ है, उसके प्रकारभेद तो हो सकते हैं; परन्तु उसमें विरोधी धर्म नहीं हो सकते। जो वस्तु है, उसका अभाव नहीं हो सकता। जो नहीं है, उसकी विद्यमानता नहीं हो सकती। जो नित्य पदार्थ है, वह नित्य ही है, अनित्य नहीं है। जो अनित्य है, वह अनित्य ही है, नित्य नहीं है। इसी प्रकार समझ लेना चाहिये। अतः जैनियोंका प्रत्येक वस्तुको विरुद्ध धर्मोंसे युक्त मानना युक्ति- संगत नहीं है। सम्बन्ध—जैनीलोगोंकी दूसरी मान्यता यह है कि आत्माका माप शरीरके बराबर है, उसमें दोष दिखाते हुए सूत्रकार कहते हैं— एवं चात्माकात्स्न्र्यम् ॥ २ । २ । ३४ ॥ एवं च = इसी प्रकार; आत्माकात्स्न्र्यम् = आत्माको अपूर्ण—एकदेशीय अर्थात् शरीरके बराबर मापवाला मानना भी युक्तिसङ्गत नहीं है।

  • उनके बताये हुए सात पदार्थ इस प्रकार हैं—जीव, अजीव, आस्रव, संवर, निर्जर, बन्ध और मोक्ष। † पाँच अस्तिकाय इस प्रकार है—जीवास्तिकाय, पुद्गलास्तिकाय, धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय तथा आकाशास्तिकाय।

सूत्र ३३-३५ ] अध्याय २ १५३

सूत्र ३३-३५ ] अध्याय २ १५३ व्याख्या--जिस प्रकार एक पदार्थमें विरुद्ध धर्मोंको मानना युक्तिसङ्गत नहीं है, उसी प्रकार आत्माको एकदेशीय अर्थात् शरीरके बराबर मापवाला मानना भी युक्तिसङ्गत नहीं है; क्योकि किसी मनुष्यशरीरमे रहनेवाले आत्माको यदि उसके कर्मवश कभी चींटीका शरीर प्राप्त हो तो वह उसमे कैसे समायेगा ? इसी तरह यदि उसे हाथीका शरीर मिले तो उसका माप हाथीके बराबर कैसे हो जायगा । इसके सिवा, मनुष्यका शरीर भी जन्मके समय बहुत छोटा- सा होता है, पीछे बहुत बड़ा हो जाता है तो आत्माका माप किस अवस्थाके शरीरके बराबर मानेंगे ? शरीरका हाथ या पैर आदि कोई अंग कट जानेसे आत्मा नहीं कट जाता । इस प्रकार विचार करनेसे आत्माको शरीरके बराबर माननेकी बात भी सर्वथा दोषपूर्ण प्रतीत होती है; अतः जैनमत भी अनुपपन्न होनेके कारण अमान्य है । सम्बन्ध-यदि जैनीलोग यह कहें कि 'आत्मा छोटे शरीरमें छोटा और बड़ेमें बड़ा हो जाता है, इसलिये हमारी मान्यतामें कोई दोष नहीं है' तो इसके उत्तरमें कहते हैं- न च पर्यायादप्यविरोधो विकारादिभ्यः ॥ २ । २ । ३५ ॥ च=इसके सिवा; पर्यायात्=आत्माको घटने-बढ़नेवाला मान लेनेसे; अपि=भी; अविरोधः=विरोधका निवारण; न=नहीं हो सकता; विकारादिभ्यः= क्योकि ऐसा माननेपर आत्मामें विकार आदि दोष प्राप्त होगे । व्याख्या-यदि यह मान लिया जाय कि आत्माको जब-जब जैसे मापवाला छोटा-बड़ा शरीर मिलता है, तब-तब वह भी वैसे ही मापवाला हो जाता है, तो भी आत्मा निर्दोष नहीं ठहरता; क्योकि ऐसा मान लेनेपर उसको विकारी, अवयवयुक्त, अनित्य तथा इसी प्रकार अन्य अनेक दोषोसे युक्त मानना हो जायगा । जो पदार्थ घटता-बढ़ता है, वह अवयवयुक्त होता है, किन्तु आत्मा अवयवयुक्त नहीं माना गया है। घटने-बढ़नेवाला पदार्थ नित्य नहीं हो सकता, परन्तु आत्माको नित्य माना गया है । घटना और बढ़ना विकार है, यह आत्मामे सम्भव नहीं है, क्योकि उसे निर्विकार माना गया है । इस प्रकार घटना-बढ़ना माननेसे अनेक दोष आत्मामे प्राप्त हो सकते हैं, अतः जैनियोंकी उपर्युक्त मान्यता युक्तिसङ्गत नहीं है ।

१५४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ सम्बन्ध—जीवात्माको शरीरके वरावर मापवाला मानना सर्वथा असङ्गत है, इस बातको प्रकारान्तरसे सिद्ध करते हैं— अन्त्यावस्थितेश्चोभयनित्यत्वादविशेषः ॥ २ । २ । ३६ ॥ च=और; अन्त्यावस्थितेः=अन्तिम अर्थात् मोक्षावस्थामे जो जीवका परिमाण है, उसकी नित्य स्थिति स्वीकार की गयी है, इसलिये; उभयनित्य- त्वात्=आदि और मध्य-अवस्थामे जो उसका परिमाण ( माप ) रहा है, उसको भी नित्य मानना हो जाता है, अतः; अविशेषः=कोई विशेषता नहीं रह जाती ( सब शरीरोंमे उसका एक-सा माप सिद्ध हो जाता है )। व्याख्या—जैन-सिद्धान्तमें यह स्वीकार किया गया है कि मोक्षावस्थामे जो जीवका परिमाण है, उसकी नित्य स्थिति है । वह घटता-बढ़ता नहीं है । इस कारण आदि और मध्यकी अवस्थामे भी जो उसका परिमाण है, उसको भी उसी प्रकार नित्य मानना हो जाता है; क्योकि पहलेका माप अनित्य मान लेनेपर अन्तिम मापको भी नित्य नहीं माना जा सकता । जो नित्य है, वह सदासे ही एक-सा रहता है । बीचमे घटता-बढ़ता नहीं है । इसलिये पहले या बीचकी अवस्थाओमे जितने शरीर उसे प्राप्त होते हैं, उन सबमें उसका छोटा या बड़ा एक-सा ही माप मानना पड़ेगा । किसी प्रकारकी विशेषताका मानना युक्तिसंगत नहीं होगा । इस प्रकार पूर्वापरकी मान्यतामे विरोध होनेके कारण आत्माको प्रत्येक शरीरके मापवाला मानना सर्वथा असंगत है । अतएव जैन-सिद्धान्त माननेके योग्य नहीं है । सम्बन्ध—इस प्रकार अनीश्वरवादियोंके मतका निराकरण करके अब पाशुपत सिद्धान्तवालोंकी मान्यतामें दोष दिखानेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं— पत्युरसामञ्जस्यात् ॥ २ । २ । ३७ ॥ पत्युः=पशुपतिका मत भी आदरणीय नहीं है; असामञ्जस्यात्=क्योकि वह युक्तिविरुद्ध है । व्याख्या—पशुपति-मतको माननेवालोकी कल्पना वडी विचित्र है । इनके मतमे तत्त्वोंकी कल्पना वेदविरुद्ध है तथा मुक्तिके साधन भी ये लोग वेदविरुद्ध ही मानते हैं । उनका कथन है कि कण्ठी, रुचिका, कुण्डल, जटा, भस्म और यज्ञोपवीत—ये छः मुद्राएँ हैं, इनके द्वारा जो अपने शरीरको मुद्रित अर्थात् चिह्नित

सूत्र ३८--३९ ] अध्याय २ १५५

सूत्र ३८--३९ ] अध्याय २ १५५


कर लेता है, वह इस संसारमे पुनः जन्म नहीं धारण करता । हाथमे रुद्राक्षका कंकण पहनना, मस्तकपर जटा धारण करना, मुर्देकी खोपड़ी लिये रहना तथा शरीरमे भस्म लगाना—इन सबसे मुक्ति मिलती है । इत्यादि प्रकारसे वे चिह्न धारण करनेमात्रसे भी मोक्ष होना मानते हैं । इसके सिवा, वे महेश्वरको केवल निमित्त कारण तथा प्रधानको उपादान कारण मानते हैं । ये सब बातें युक्तिसंगत नहीं हैं; इसलिये यह मत माननेयोग्य नहीं है । सम्बन्ध—अब पाशुपतोंके दार्शनिक मत निमित्तकारणवादका खण्डन करते हैं— सम्बन्धानुपपत्तेश्च ॥ २ । २ । ३८ ॥ सम्बन्धानुपपत्तेः = सम्बन्धकी सिद्धि न होनेसे; च = भी ( यह मान्यता असंगत है ) । व्याख्या—पाशुपतोंकी मान्यताके अनुसार यदि ईश्वरको केवल निमित्त कारण माना जाय तो उपादान कारणके साथ उसका किस प्रकार सम्बन्ध होगा, यह बताना आवश्यक है । लोकमे यह देखा जाता है कि शरीरधारी निमित्त कारण कुम्भकार आदि ही घट आदि कार्यके लिये मृत्तिका आदि साधनोंके साथ अपना संयोग- सम्बन्ध स्थापित करते हैं; किन्तु ईश्वर शरीरादिसे रहित निराकार है, अतः उसका प्रधान आदिके साथ संयोगरूप सम्बन्ध नहीं हो सकता । अतएव उसके द्वारा सृष्टिरचना भी नहीं हो सकेगी । जो लोग वेदको प्रमाण मानते हैं, उनको तो सब बाते युक्तिसे सिद्ध करनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती; क्योंकि वे परब्रह्म परमेश्वरको वेदके कथनानुसार सर्वशक्तिमान् मानते है, अतः वह शक्तिशाली परमेश्वर स्वयं ही निमित्त और उपादान कारण हो सकता है । वेदोंके प्रति जिनकी निष्ठा है, उनके लिये युक्तिका कोई मूल्य नहीं है। वेदमे जो कुछ कहा गया है, वह निर्भ्रान्त सत्य है; युक्ति उसके साथ रहे तो ठीक है। न रहे तो भी कोई चिन्ता नहीं है; किन्तु जिनका मत केवल तर्कपर ही अवलम्बित है, उनको तो अपनी प्रत्येक बात तर्कसे सिद्ध करनी ही चाहिये । परन्तु पाशुपतो- की उपर्युक्त मान्यता न वेदसे सिद्ध होती है, न तर्कसे ही । अतः वह सर्वथा अमान्य है । सम्बन्ध—अब उक्त मतमें दूसरी अनुपपत्ति दिखलाते हैं— अधिष्ठानानुपपत्तेश्च ॥ २ । २ । ३९ ॥

१५६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ अधिष्ठानानुपपत्तेः=अधिष्ठानकी उपपत्ति न होनेके कारण; च=भी ( ईश्वरको केवल निमित्त कारण मानना उचित नहीं है ) । व्याख्या—उनकी मान्यताके अनुसार जैसे कुम्भकार मृत्तिका आदि साधन- सामग्रीका अधिष्ठाता होकर घट आदि कार्य करता है, उसी प्रकार सृष्टिकर्ता ईश्वर भी प्रधान आदि साधनोंका अधिष्ठाता होकर ही सृष्टिकार्य कर सकेगा; परन्तु न तो ईश्वर ही कुम्भकारकी भाँति सशरीर है और न प्रधान ही मिट्टी आदिकी भाँति साकार है; अतः रूपादिसे रहित प्रधान निराकार ईश्वरका अधिष्ठेय कैसे हो सकता है? इसलिये ईश्वरको केवल निमित्त कारण माननेवाला पाशुपतमत युक्तिविरुद्ध होनेके कारण मान्य नहीं है। सम्बन्ध—यदि ऐसी बात है तो ईश्वरको शरीर और इन्द्रियोंसे युक्त क्यों न मान लिया जाय ? इसपर कहते हैं— करणवच्चेन्न भोगादिभ्यः ॥ २ । २ । ४० ॥ चेत्=यदि; करणवत्=ईश्वरको शरीर, इन्द्रिय आदि करणोंसे युक्त मान लिया जाय; न=तो यह ठीक नहीं है; भोगादिभ्यः=क्योंकि भोग आदिसे उसका सम्बन्ध सिद्ध हो जायगा। व्याख्या—यदि यह मान लिया जाय कि ईश्वर अपने सङ्कल्पसे ही मन, बुद्धि और इन्द्रिय आदिसहित शरीर धारण करके लौकिक दृष्टान्तके अनुसार निमित्त कारण बन जाता है, तो यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि शरीरधारी होनेपर साधारण जीवोंकी भाँति उसे कर्मानुसार भोगोंकी प्राप्ति होनेका प्रसङ्ग आ जायगा। उस दशामें उसकी ईश्वरता ही सिद्ध नहीं होगी। अतः ईश्वरको केवल निमित्त कारण मानना युक्तिसंगत नहीं है। सम्बन्ध—उपर्युक्त पाशुपतमतमें अन्य दोषोंकी उद्भावना करते हुए कहते हैं— अन्तवत्त्वमसर्वज्ञता वा ॥ २ । २ । ४१ ॥ अन्तवत्त्वम्=( पाशुपतमतमे ) ईश्वरके सान्त होनेका; वा=अथवा; असर्वज्ञता=सर्वज्ञ न होनेका दोष उपस्थित होता है। व्याख्या—पाशुपतसिद्धान्तके अनुसार ईश्वर अनन्त एवं सर्वज्ञ है। साथ

सूत्र ४०—४२ ] अध्याय २ १५७

सूत्र ४०—४२ ] अध्याय २ १५७ ही वे प्रधान ( प्रकृति ) और जीवोंको भी अनन्त मानते हैं। अतः यह प्रश्न उठता है कि उनका माना हुआ ईश्वर यह बात जानता है या नहीं कि 'जीव कितने और कैसे हैं ? प्रधानका स्वरूप क्या और कैसा है ? तथा मै ( ईश्वर ) कौन और कैसा हूँ ?' इसके उत्तरमे यदि पाशुपतमतवाले यह कहे कि ईश्वर यह सब कुछ जानता है, तब तो जाननेमे आ जानेवाले पदार्थोंको अनन्त (असीम) मानना या कहना अयुक्त सिद्ध होता है और यदि कहे, वह नहीं जानता तो ईश्वरको सर्वज्ञ मानना नहीं बन सकता । अतः या तो ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृतिको सान्त मानना पडेगा या ईश्वरको अल्पज्ञ स्वीकार करना पडेगा। इस प्रकार पूर्वोक्त सिद्धान्त दोषयुक्त एवं वेदविरुद्ध होनेके कारण माननेयोग्य नहीं है । सम्बन्ध—यहाँतक वेदविरुद्ध मतोंका खण्डन किया गया । अब वेद- प्रमाण माननेवाले पाञ्चरात्र आगममे जो आंशिक अनुपपत्तिकी शङ्का उठायी जाती हे, उसका समाधान करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते है। भागवत-शास्त्र, पाञ्चरात्र आदिकी प्रक्रिया इस प्रकार है—'परम कारण परब्रह्म- स्वरूप 'वासुदेव'से 'सङ्कर्षण' नामक जीवकी उत्पत्ति होती है; सङ्कर्षणसे 'प्रद्युम्न'संज्ञक मन उत्पन्न होता है और उस प्रद्युम्नसे 'अनिरुद्ध' नामधारी अहङ्कारकी उत्पत्ति होती है।' इसमे दोषकी उद्भावना करते हुए पूर्वपक्षी कहता है— उत्पत्त्यसम्भवात् ॥ २ । २ । ४२ ॥ उत्पत्त्यसम्भवात् = जीवकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है, इसलिये ( वासुदेवसे सङ्कर्षणकी उत्पत्ति मानना वेद-विरुद्ध प्रतीत होता है )। व्याख्या—भागवत-शास्त्र या पाञ्चरात्र आगम जो यह मानता है कि 'इसं जगत्‌के परम कारण परब्रह्म पुरुषोत्तम श्री'वासुदेव' है, वे ही इसके निमित्त और उपादान भी हैं;' यह वैदिक मान्यताके सर्वथा अनुकूल है। परन्तु उसमे भगवान् वासुदेवसे जो 'सङ्कर्षण' नामक जीवकी उत्पत्ति बतायी गयी है, यह कथन वेदविरुद्ध जान पड़ता है; क्योकि श्रुतिमे जीवको जन्म-मरणसे रहित और नित्य कहा गया है ( क० उ० १ । २ । १८)। उत्पन्न होनेवाली वस्तु कभी नित्य नहीं हो सकती; अतः जीवकी उत्पत्ति असम्भव है। यदि जीवको उत्पत्ति-

१५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ विनाशशील एवं अनित्य मान लिया जाय तो वेद-शास्त्रोंमें जो उसकी बद्ध-मुक्त अवस्थाका वर्णन है, वह व्यर्थ होगा । इसके सिवा, जन्म-मरणरूप बन्धनसे छूटने और परमात्माको प्राप्त करनेके लिये जो वेदोंमें साधन बताये गये हैं, वे सब भी व्यर्थ सिद्ध होते हैं। अतः जीवकी उत्पत्ति मानना उचित नहीं है। सम्बन्ध-अब पूर्वपक्षीकी दूसरी शङ्काका उल्लेख करते हैं- न च कर्तुः करणम् ॥ २ । २ । ४३ ॥ च=तथा; कर्तुः=कर्ता (जीवात्मा) से; करणम्=करण (मन और मनसे अहङ्कार) की उत्पत्ति भी; न=सम्भव नहीं है। व्याख्या-जिस प्रकार परब्रह्म भगवान् वासुदेवसे जीवकी उत्पत्ति असम्भव है, उसी प्रकार सङ्कर्षण नामसे कहे जानेवाले चेतन जीवात्मासे 'प्रद्युम्न' नामक मनस्तत्त्वकी और उससे 'अनिरुद्ध' नामक अहङ्कारतत्त्वकी उत्पत्ति भी सम्भव नहीं है; क्योंकि जीवात्मा कर्ता और चेतन है, मन करण है। अतः कर्तासे करणकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। सम्बन्ध-इस प्रकार पाञ्चरात्रनामक भक्तिशास्त्रमें अन्य सब मान्यता वेदानुकूल होनेपर भी उपर्युक्त स्थलोंमें श्रुतिसे कुछ विरोध-सा प्रतीत होता है; उसे पूर्वपक्षके रूपमें उठाकर सूत्रकार अगले दो सूत्रोंद्वारा उस विरोधका परिहार करते हुए कहते हैं- विज्ञानादिभावे वा तदप्रतिषेधः ॥ २ । २ । ४४ ॥ वा=निःसन्देह; विज्ञानादिभावे=(पाञ्चरात्र शास्त्रद्वारा) भगवान्‌के विज्ञानादि षड्विध गुणोंका सङ्कर्षण आदिमें भाव (होना) सूचित किया गया है इस मान्यताके अनुसार उनका भगवत्स्वरूप होना सिद्ध होता है, इसलिये; तदप्रतिषेधः=उनकी उत्पत्तिका वेदमें निषेध नहीं है। व्याख्या-पूर्वपक्षीने जो यह कहा कि 'श्रुतिमें जीवात्माकी उत्पत्तिका विरोध है तथा कर्तासे करणकी उत्पत्ति नहीं हो सकती' इसके उत्तरमें सिद्धान्तपक्षका कहना है कि उक्त पाञ्चरात्रशास्त्रमें जीवकी उत्पत्ति या कर्तासे करणकी उत्पत्ति नहीं बतायी गयी है, अपि तु सङ्कर्षण जीव-तत्त्वके, प्रद्युम्न मनस्तत्त्वके और अनिरुद्ध अहङ्कारतत्त्वके अधिष्ठाता बताये गये हैं, जो भगवान् वासुदेवके ही

सूत्र ४३-४५ ] अध्याय २ १५९

सूत्र ४३-४५ ] अध्याय २ १५९ अङ्गभूत है; क्योकि वहाँ सङ्कर्षणको भगवान्‌का प्राण, प्रद्युम्नको मन और अनिरुद्धको अहङ्कार माना गया है । अतः वहाँ जो इनकी उत्पत्तिका वर्णन है, वह भगवान्- के ही अंशोका उन-उन रूपोमे प्राकट्य बतानेवाला है। श्रुतिमे भी भगवान्- के अजन्मा होते हुए भी विविध रूपोमे प्रकट होनेका वर्णन इस प्रकार मिलता है—'अजायमानो बहुधा विजायते ।' ( यजु० ३१ । १९० ) इसलिये भगवान् वासुदेवका सङ्कर्षण आदि व्यूहोके रूपमें प्रकट होना वेद-विरुद्ध नहीं है । जिस प्रकार भगवान् अपने भक्तोपर दया करके श्रीराम आदिके रूपमे प्रकट होते हैं, उसी प्रकार साक्षात् परब्रह्म परमेश्वर भगवान् वासुदेव अपने भक्तजनोपर कृपा करके स्वेच्छासे ही चतुर्व्यूहके रूपमें प्रकट होते है । भागवत-शास्त्रमे इन चारोकी उपासना भगवान् वासुदेवकी ही उपासना मानी गयी है । भगवान् वासुदेव विभिन्न अधिकारियोके लिये विभिन्न रूपोंमे उपास्य होते है, इसलिये उनके चार व्यूह माने गये है । इन व्यूहोकी पूजा-उपासनासे परब्रह्म परमात्माकी ही प्राप्ति मानी गयी है । उन सङ्कर्षण आदिका जन्म साधारण जीवोकी भाँति नहीं है, क्योकि वे चारो ही चेतन तथा ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज आदि समस्त भगवद्भावोसे सम्पन्न माने गये हैं । अत सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—ये तीनो उन परब्रह्म परमेश्वर भगवान् वासुदेवमे भिन्न तत्त्व नहीं है । अत इनकी उत्पत्तिका वर्णन वेद-विरुद्ध नहीं है । सम्बन्ध—यह पाञ्चरात्र-आगम वेदानुकूल है, किसी अगमे भी इसका वेदसे विरोध नहीं है; इस बातको पुनः दृढ करते हैं— विप्रतिषेधाच्च ॥ २ । २ । ४५ ॥ विप्रतिषेधात्=इस शास्त्रमे विशेषरूपसे जीवकी उत्पत्तिका निषेध किया गया है, इसलिये; च=भी ( यह वेदके प्रतिकूल नहीं है ) । व्याख्या—उक्त शास्त्रमे जीवको अनादि, नित्य, चेतन और अविनाशी माना गया है तथा उसके जन्म-मरणका निषेध किया गया है, इसलिये भी यह सिद्ध होता है कि इसका वैदिक-प्रक्रियासे कोई विरोध नहीं है । इसमे जो यह कहा गया है कि 'शाण्डिल्य मुनिने अङ्गोंसहित चारो वेदोंमें निष्ठा ( निश्चल स्थिति ) को न पाकर इस भक्तिशास्त्रका अध्ययन किया ।' यह वेदोंकी निन्दा या प्रतिषेध

१६० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ नहीं है, जिससे कि इसे वेदविरोधी शास्त्र कहा जा सके। इस प्रसङ्गद्वारा भक्ति- शास्त्रकी महिमाका ही प्रतिपादन किया गया है। छान्दोग्योपनिषद्मे नारदजीके विषयमें भी ऐसा ही प्रसङ्ग आया है। नारदजीने सनत्कुमारजीसे कहा है, 'मैंने समस्त वेद, वेदाङ्ग, इतिहास, पुराण आदि पढ़ लिये तो भी मुझे आत्मतत्त्वका अनुभव नहीं हुआ।' यह कथन वेदादि शास्त्रोंको तुच्छ बतानेके लिये नहीं, आत्मज्ञानकी महत्ता सूचित करनेके लिये है। उसी प्रकार पाञ्चरात्रमें शाण्डिल्य- का प्रसङ्ग भी वेदोंकी तुच्छता बतानेके लिये नहीं, अपितु भक्तिशास्त्रकी महिमा प्रकट करनेके लिये आया है; अतः वह शास्त्र सर्वथा निर्दोष एवं वेदानुकूल है। दूसरा पाद सम्पूर्ण।

तीसरा पाद सम्बन्ध—इस शास्त्रमें जो ब्रह्मके लक्षण बताये गये हैं, उनमें स्मृति और न्यायसे जो विरोध प्रतीत होता है, उसका निर्णयपूर्वक समाधान तो इस अध्याय- के पहले पादमें किया गया, उसके बाद दूसरे पादमें अपने सिद्धान्तकी सिद्धिके लिये अनीश्वरवादी नास्तिकोंके सिद्धान्तका तथा ईश्वरको मानते हुए भी उसको उपादान कारण न माननेवालोंके सिद्धान्तका युक्तियोंद्वारा निराकरण किया गया । साथ ही भागवतमतमे जो इस ग्रन्थके सिद्धान्तसे विरोध प्रतीत होता था, उसका समाधान करके उस पादकी समाप्ति की गयी । अब पूर्व प्रतिज्ञानुसार परब्रह्मको समस्त प्रपञ्चका अभिन्ननिमित्तोपादान कारण माननेमें जो श्रुतियोंके वाक्योंसे विरोध प्रतीत होता है, उसका समाधान करनेके लिये तथा जीवात्माके स्वरूपका निर्णय करनेके लिये तीसरा पाद आरम्भ किया जाता है— श्रुतियोंमें कहीं तो कहा है कि परमेश्वरने पहले-पहल तेजकी रचना की, उसके बाद तेजसे जल और जलसे अन्न—इस क्रमसे जगत्की रचना हुई । कहीं कहा है कि पहले-पहल आकाशकी रचना हुई, उससे वायु आदिके क्रमसे जगत्की उत्पत्ति हुई । इस प्रकारके विकल्पोंकी एकता करके समाधान करनेके लिये पूर्वपक्षकी उत्थापना करते हैं— न वियदश्रुतेः ॥ २ । ३ । १ ॥ वियत्=आकाश; न=उत्पन्न नहीं होता; अश्रुतेः=क्योकि ( छान्दोग्यो- पनिषद्के सृष्टि-प्रकरणमे ) उसकी उत्पत्ति नहीं सुनी गयी है । व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्में जहाँ जगत्की उत्पत्तिका वर्णन किया है, वहाँ पहले-पहल तेजकी रचना बतायी गयी है ।* फिर तेज, जल और अन्न—इन तीनोंके सम्मेलनसे जगत्की रचनाका वर्णन है (छा० उ० ६ । २ । १ से ६ । ३ । ४ तक ), वहाँ आकाशकी उत्पत्तिका कोई प्रसङ्ग नहीं है तथा आकाशको विभु ( व्यापक ), माना गया है ( गीता १३ । ३२ ) । इसलिये यह सिद्ध होता है कि आकाश नित्य है, वह उत्पन्न नहीं होता ।

  • 'तत्तेजोऽसृजत ।' ( छा० उ० ६ । २ । ३ ) वे० द० ११—

१६२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सम्बन्ध—इस शङ्काके उत्तरमें कहते हैं— अस्ति तु ॥ २ । ३ । २ ॥ तु=किन्तु ( दूसरी श्रुतिमे ); अस्ति=आकाशकी उत्पत्तिका वर्णन भी है। व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्में 'ब्रह्म सत्य, ज्ञानस्वरूप और अनन्त है' इस प्रकार ब्रह्मके लक्षण बताकर फिर उसी ब्रह्मसे आकाशकी उत्पत्ति बतायी गयी है,* इसलिये यह कहना ठीक नहीं कि वेदमें आकाशकी उत्पत्तिका वर्णन नहीं है। सम्बन्ध—उक्त विषयको स्पष्ट करनेके लिये पुनः पूर्वपक्षको उठाया जाता है— गौण्यसम्भवात् ॥ २ । ३ । ३ ॥ असम्भवात्=आकाशकी उत्पत्ति असम्भव होनेके कारण; गौणी=यह श्रुति गौणी है। व्याख्या—अवयवरहित और विभु होनेके कारण आकाशका उत्पन्न होना नहीं बन सकता, अतः तैत्तिरीयोपनिषद्मे जो आकाशकी उत्पत्ति बतायी है, उस कथनको गौण समझना चाहिये, वहाँ किसी दूसरे अभिप्रायसे आकाशकी उत्पत्ति कही गयी होगी। सम्बन्ध—पूर्वपक्षकी ओरसे अपने पक्षको दृढ करनेके लिये दूसरा हेतु दिया जाता है— शब्दाच्च ॥ २ । ३ । ४ ॥ शब्दात्=शब्दप्रमाणसे; च=भी ( यह सिद्ध होता है कि आकाश उत्पन्न नहीं हो सकता )। व्याख्या—बृहदारण्यकमें कहा है कि 'वायुश्चान्तरिक्षं चैतदमृतम्'—'वायु और अन्तरिक्ष—यह अमृत है' ( बृह० उ० २ । ३ । ३ ), अतः जो अमृत हो, उसकी उत्पत्ति नहीं हो सकती; तथा यह भी कहा है कि 'जिस प्रकार यह आकाश अनन्त है, उसी प्रकार आत्माको अनन्त समझना चाहिये।' 'आकाशशरीरं ब्रह्म' 'ब्रह्मका शरीर आकाश है' ( तै० उ० १ । ६ । २ ) इन

  • तस्माद् वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः । आकाशाद्वायुः । वायोरग्निः । अग्नेरापः । अद्भ्यः पृथिवी । इत्यादि । ( तै० उ० २ । १ । १ )

सूत्र २-६ ] अध्याय २ १६३

सूत्र २-६ ] अध्याय २ १६३ श्रुति-वाक्योंसे आकाशकी अनन्तता सिद्ध होती है, इसलिये भी आकाशकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि उक्त श्रुतिमे जिस प्रकार आकाश- की उत्पत्ति बतानेवाले वाक्य हैं, उसी प्रकार वायु, अग्नि आदिकी उत्पत्ति बतानेवाले शब्द भी हैं; फिर यह कैसे माना जा सकता है कि आकाशके लिये तो कहना गौण है और दूसरोंके लिये मुख्य है, इसपर पूर्वपक्षकी ओरसे उत्तर दिया जाता है— स्याच्चैकस्य ब्रह्मशब्दवत् ॥ २ । ३ । ५ ॥ च=तथा; ब्रह्मशब्दवत्=ब्रह्मशब्दकी भाँति; एकस्य=किसी एक शब्दका प्रयोगः स्यात्=गौण भी हो सकता है। व्याख्या—दूसरी जगह एक ही प्रकरणमे पहले तो कहा है कि 'तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते ।'—'ब्रह्म विज्ञानमय तपसे वृद्धिको प्राप्त होता है, उससे अन्न उत्पन्न होता है।' (मु० उ० १ । १ । ८) उसके बाद कहा है कि— यः सर्वज्ञः सर्वविद् यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते ॥ (मु० उ० १ । १ । ९) अर्थात् 'जो सर्वज्ञ, सबको जाननेवाला है, जिसका ज्ञानमय तप है, उससे यह ब्रह्म और नाम, रूप एवं अन्न उत्पन्न होता है।' इस प्रकरणमें जैसे पहले ब्रह्म शब्द मुख्य अर्थमे प्रयुक्त हुआ है और पीछे उसी ब्रह्म शब्दका गौण अर्थमे प्रयोग किया गया है, उसी प्रकार श्रुतिमे किसी एक शब्द ( आकाश आदि ) का गौण अर्थमें प्रयोग भी हो सकता है । सम्बन्ध—इस प्रकार पूर्वपक्षकी उत्थापना करके अब दो सूत्रोंद्वारा उसका समाधान करते हैं— प्रतिज्ञाहानिरव्यतिरेकाच्छब्देभ्यः ॥ २ । ३ । ६ ॥ अव्यतिरेकात्=ब्रह्मके कार्यसे आकाशको अलग न माननेसे ही; प्रतिज्ञाऽहानिः=एकके ज्ञानमे सबके ज्ञानसम्बन्धी प्रतिज्ञाकी रक्षा हो सकती है; शब्देभ्यः=श्रुतिके शब्दोंसे यही सिद्ध होता है। व्याख्या—उपनिषदोंमे जो एकको जाननेसे सबका ज्ञान हो जानेकी प्रतिज्ञा की गयी है और उस प्रसङ्गमें जो कारण-कार्यके उदाहरण दिये गये हैं,

१६४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ (छा० उ० ६ । १ । १ से ६ तक) उन सबकी विरोधरहित सिद्धि आकाशको ब्रह्मके कार्यसे अलग न माननेपर ही हो सकती है, अन्यथा नहीं; क्योंकि वहाँ मिट्टी और सुवर्ण आदिका दृष्टान्त देकर उनके किसी एक कार्यके ज्ञानसे कारणके ज्ञानद्वारा सबका ज्ञान होना बताया है । अतः यदि आकाशको ब्रह्मका कार्य न मानकर ब्रह्मसे अलग मानेंगे तो कारणरूप ब्रह्मको जान लेनेपर भी आकाश जाना हुआ नहीं होगा; इससे प्रतिज्ञाकी हानि होगी । इतना ही नहीं, 'यह सब ब्रह्म ही है' (मु० उ० २ । २ । ११) 'यह सब इस ब्रह्मका स्वरूप है' (छा० उ० ६ । ८ । ७) 'यह सब निःसन्देह ब्रह्म ही है; क्योंकि उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय उसीमे होते हैं' (छा० उ० ३ । १४ । १) इत्यादि श्रुतिवाक्योसे भी यही सिद्ध होता है कि आकाश उस ब्रह्मका ही कार्य है । यावद्विकारं तु विभागो लोकवत् ॥ २ । ३ । ७ ॥ तु=तथा; लोकवत्=साधारण लौकिक व्यवहारकी भाँति; यावद्विकारम्= विकारमात्र सब कुछ; विभागः=ब्रह्मका ही विभाग (कार्य) है । व्याख्या-जिस प्रकार लोकमे यह बात देखी जाती है कि कोई पुरुष देवदत्तके पुत्रोका परिचय देते समय कहता है—'ये सब-के-सब देवदत्तके पुत्र हैं।' फिर वह उनमेसे किसी एक या दोका ही नाम लेकर यदि कहे कि 'इनकी उत्पत्ति देवदत्तसे हुई है' तो भी उन सबकी उत्पत्ति देवदत्तसे ही मानी जायगी, उसी प्रकार जब समस्त विकारात्मक जगत्‌को उस ब्रह्मका कार्य बता दिया गया, तब आकाश उससे अलग कैसे रह सकता है । अतः तेज आदिकी सृष्टि बताते समय यदि आकाशका नाम छूट गया तो भी यही सिद्ध होता है कि आकाश भी अन्य तत्त्वोंकी भाँति ब्रह्मका कार्य है और वह उससे उत्पन्न होता है । वायु और आकाशको अमृत कहनेका तात्पर्य देवताओंकी भाँति उन्हें अन्यकी अपेक्षा चिरस्थायी बतानामात्र है । सम्बन्ध—इस प्रकार आकाशका उत्पन्न होना सिद्ध करके उसीके उदाहरणसे यह निश्चय किया जाता है कि वायु भी उत्पन्न होता है— एतेन मातरिश्वा व्याख्यातः ॥ २ । ३ । ८ ॥

सूत्र ७—१० ] अध्याय २ १६५

सूत्र ७—१० ] अध्याय २ १६५ एतेन=इससे अर्थात् आकाशकी उत्पत्ति सिद्ध करनेवाले कथनसे ही; मातरिश्वा=वायुका उत्पन्न होना; व्याख्यातः=बता दिया गया । व्याख्या—जिन युक्तियो और श्रुतिप्रमाणोद्वारा पूर्वसूत्रोमे ब्रह्मसे आकाशका उत्पन्न होना निश्चित किया गया, उन्हींसे यह कहना भी हो गया कि वायु भी उत्पन्न होता है। अतः उसके विषयमे अलग कहना आवश्यक नहीं समझा गया। सम्बन्ध—इस प्रकार आकाश और वायुको उत्पत्तिशील बतलाकर अब इस दृश्य-जगत्में जिन तत्त्वोंको दूसरे मतवाले नित्य मानते हैं तथा जिनकी उत्पत्ति- का स्पष्ट वर्णन वेदमे नही आया है, उन सबको भी उत्पत्तिशील बतानेके लिये अगला सूत्र कहते हैं— असम्भवस्तु सतोऽनुपपत्तेः ॥ २ । ३ । ९ ॥ सतः='सत्' शब्दवाच्य ब्रह्मके सिवा (अन्य किसीका उत्पन्न न होना); तु=तो; असम्भवः = असम्भव है; अनुपपत्तेः=क्योकि 'अन्य किसीका उत्पन्न न होना युक्ति और प्रमाणद्वारा सिद्ध नहीं हो सकता। व्याख्या—जिस पूर्णब्रह्म परमात्माका श्रुतिमें जगह-जगह सत् नामसे वर्णन आया है तथा जो इस जड-चेतनात्मक जगत्का परम कारण माना गया है, उसे छोड़कर इस जगत्में कोई भी तत्त्व ऐसा नहीं है, जो उत्पत्तिशील न हो। बुद्धि, अहङ्कार, काल तथा गुण और परमाणु आदि सभी उत्पत्तिशील है; क्योकि वेदमे प्रलयके समय एकमात्र परब्रह्म परमेश्वरसे भिन्न किसीका अस्तित्व स्वीकार नहीं किया गया है। इसलिये युक्ति या प्रमाणद्वारा कोई भी पदार्थ उत्पन्न न होनेवाला सिद्ध नहीं हो सकता। अतः ब्रह्मके सिवा सब कुछ उत्पत्तिशील है। सम्बन्ध—छान्दोग्योपनिषद्में यह कहा है कि 'उस ब्रह्मने तेजको रचा' और तैत्तिरीयोपनिषद्में बताया गया है कि 'सर्वात्मा परमेश्वरसे आकाश उत्पन्न हुआ, आकाशसे वायु और वायुसे तेज।' अतः यहाँ तेजको किससे उत्पन्न हुआ माना जाय ? ब्रह्मसे या वायुसे ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— तेजोऽतस्तथा ह्याह ॥ २ । ३ । १० ॥ तेजः = तेज; अतः = इस ( वायु ) से ( उत्पन्न हुआ ); तथा हि = ऐसा ही; आह=अन्यत्र कहा है।

१६६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्याख्या—तेज-तत्त्व वायुसे उत्पन्न हुआ, यही मानना चाहिये; क्योंकि यही बात श्रुतिमें दूसरी जगह कही गयी है। भाव यह है कि उस ब्रह्मने वायुसे तेज- की रचना की अर्थात् आकाश और वायुको पहले उत्पन्न करके उसके बाद वायुसे तेजकी उत्पत्ति की; ऐसा माननेपर दोनों श्रुतियोंकी एकवाक्यता हो जायगी। सम्बन्ध—इसी प्रकार— आपः ॥ २ । ३ । ११ ॥ आपः = जल ( तेजसे उत्पन्न हुआ )। व्याख्या—उपर्युक्त प्रकारसे दोनों श्रुतियोंके कथनकी एकता होनेसे उक्त तेजसे जल उत्पन्न हुआ, यह समझना चाहिये। सम्बन्ध—इस प्रकरणमें यह कहा गया है कि उस जलने अन्नको रचा, अतः यहाँ गेहूँ, जौ आदि अन्नकी उत्पत्ति जलसे हुई या पृथिवीसे ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— पृथिव्यधिकाररूपशब्दान्तरेभ्यः ॥ २ । ३ । १२ ॥ पृथिवी=( इस प्रकरणमें अन्नके नामसे ) पृथिवी ही कही गयी है; अधिकाररूपशब्दान्तरेभ्यः=क्योंकि पाँचों तत्त्वोंकी उत्पत्तिका प्रकरण है, उसमें बताया हुआ काला रूप भी पृथिवीका ही माना गया है तथा दूसरी श्रुतिमें भी जलसे पृथिवीकी ही उत्पत्ति बतायी गयी है। व्याख्या—इस प्रकरणमें अन्न शब्द पृथिवीका ही बोधक है, ऐसा समझना ठीक है; क्योंकि यह तत्त्वोंकी उत्पत्तिका प्रकरण है तथा जो अन्नका रूप काला बताया गया है, वह भी अन्नका रूप नहीं है, पृथिवीका ही रूप काला माना गया है। इसके सिवा, तैत्तिरीयोपनिषद्मे जहाँ इस क्रमका वर्णन है, वहाँ भी जलसे पृथिवीका उत्पन्न होना बताया गया है, उसके बाद पृथिवीसे ओषधि और ओषधिसे अन्नकी उत्पत्तिका वर्णन है* । इसलिये यहाँ सीधे जलसे ही अन्नकी उत्पत्ति मानना ठीक नहीं है। छान्दोग्यके उक्त प्रकरणमें जो यह बात कही गयी है कि 'यत्र क्व च वर्षति तदेव भूयिष्ठमन्नं भवति ।' ( ६ । २ । ४ ) अर्थात् 'जहाँ-कहीं जल अधिक बरसता है, वहीं अन्नकी उत्पत्ति अधिक होती है।' इसका भी यही भाव है कि जलके सम्बन्धसे पृथिवीमें पहले ओषधि अर्थात्

  • देखिये पृष्ठ १६२ की टिप्पणी ।

सूत्र ११—१४] अध्याय २ १६७

सूत्र ११—१४] अध्याय २ १६७ अन्नका पौधा उत्पन्न होता है और उससे अन्न उत्पन्न होता है; ऐसा माननेपर पूर्वापरमें कोई विरोध नहीं रहेगा। सम्बन्ध—इस प्रकरणमें आकाशकी उत्पत्ति साक्षात् ब्रह्मसे बतायी गयी है और अन्य चार तत्त्वोंमें एकसे दूसरेकी क्रमशः उत्पत्ति बतायी है। अतः यह जिज्ञासा होती है कि एक तत्त्वके बाद दूसरे तत्त्वकी रचना साक्षात् परमेश्वर करता है या एक तत्त्व दूसरे तत्त्वको स्वयं उत्पन्न करता है? इसपर कहते हैं— तदभिध्यानादेव तु तल्लिङ्गात्सः ॥ २ । ३ । १३ ॥ तदभिध्यानात् = उन तत्त्वोंके भलीभाँति चिन्तन करनेका कथन होनेसे; एव = ही; तु = तो (यह सिद्ध होता है कि); सः = वह परमात्मा ही उन सबकी रचना करता है; तल्लिङ्गात् = क्योंकि उक्त लक्षण उसीके अनुरूप है। व्याख्या—इस प्रकरणमें बार-बार कार्यके चिन्तनकी बात कही गयी है, यह चिन्तनरूप कर्म जड़में सम्भव नहीं है, चेतन परमात्मामें ही सङ्गत हो सकता है, इसलिये यही सिद्ध होता है कि वह परमात्मा स्वयं ही उत्पन्न किये हुए पहले तत्त्वसे दूसरे तत्त्वको उत्पन्न करता है। इसी उद्देश्यसे एक तत्त्वसे दूसरे तत्त्वकी उत्पत्तिका कथन है। उन तत्त्वोंको स्वतन्त्र- रूपसे एक-दूसरेके कार्य-कारण बतानेके उद्देश्यसे नहीं। इसलिये यही समझना चाहिये कि मुख्यरूपसे सबकी रचना करनेवाला वह पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर ही है, अन्य कोई नहीं। सम्बन्ध—इस प्रकार जगत्की उत्पत्तिके वर्णनद्वारा ब्रह्मको जगत्‌का कारण बताकर अब प्रलयके वर्णनसे भी इसी बातकी पुष्टि करते हैं— विपर्ययेण तु क्रमोऽत उपपद्यते च ॥ २ । ३ । १४ ॥ तु = किन्तु; अतः = इस उत्पत्ति-क्रमसे; क्रमः = प्रलयका क्रम; विपर्ययेण = विपरीत होता है; उपपद्यते = ऐसा ही होना युक्तिसङ्गत है; च = तथा (स्मृतिमें भी ऐसा ही वर्णन है)। व्याख्या—उपनिषदोंमें जगत्की उत्पत्तिका जो क्रम बताया गया है, इससे विपरीत क्रम प्रलयकालमें होता है। प्रारम्भिक सृष्टिके समय ब्रह्मने आकाश, वायु,