भारतकोश
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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

३५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ ब्रह्मवेत्ताके निकलनेका रास्ता इस प्रकार भिन्न-भिन्न बताया है कि 'हृदयसे सम्बद्ध एक सौ एक नाडियाँ हैं, उनमेसे एक मस्तककी ओर निकली है, उसके द्वारा ऊपरकी ओर जानेवाला विद्वान् अमृतत्वको प्राप्त होता है, शरीरसे जाते समय अन्य नाडियाँ इधर-उधरके मार्गसे नाना योनियोमे ले जानेवाली होती हैं* (छा० उ० ८। ६। ६)। इन श्रुतिप्रमाणोंसे यही निश्चय होता है कि मरण- कालमे वह महापुरुष हृदयके अग्रभागमें होनेवाले प्रकाशसे प्रकाशित ब्रह्मरन्ध्रके मार्गसे इस स्थूल शरीरके बाहर निकलता है और ब्रह्मविद्याके प्रभावसे उसके फलरूप ब्रह्मलोककी प्राप्तिके संस्कारकी स्मृतिसे युक्त हो हृदयस्थित सर्वसुहृद् परब्रह्म परमेश्वरसे अनुगृहीत हुआ सूर्यकी रश्मियोमे चला जाता है। सम्बन्ध-उसके बाद क्या होता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं-- रश्म्यनुसारी ॥ ४ । २ । १८ ॥ रश्म्यनुसारी = सूर्यकी रश्मियोमे स्थित हो उन्हींका अवलम्बन करके (वह सूर्यलोकके द्वारसे ब्रह्मलोकमें चला जाता है)। व्याख्या-'इस स्थूल शरीरसे बाहर निकलकर वह जीवात्मा इन सूर्यकी रश्मियोंद्वारा ऊपर चढ़ता है, वहाँ 'ॐ' ऐसा कहता हुआ जितनी देरमे मन जाता है, उतने ही समयमें सूर्यलोकमें पहुँच जाता है, यह सूर्य ही विद्वानोके लिये ब्रह्मलोकमे जानेका द्वार है, यह अविद्वानोके लिये बंद रहता है, इसलिये वे नीचेके लोकोंमे जाते हैं।'† (छा० उ० ८। ६। ५)। इस श्रुतिके कथनसे यह सिद्ध होता है कि ब्रह्मरन्ध्रके मार्गद्वारा स्थूल शरीरसे बाहर निकलकर ब्रह्मवेत्ता सूर्यकी रश्मियोंमें स्थित होकर उन्हींका आश्रय ले सूर्यलोकके द्वारसे ब्रह्मलोकमे चला जाता है; उसमे उसको विलम्ब नहीं होता। सम्बन्ध-रात्रिके समय तो सूर्यकी रश्मियाँ नहीं रहतीं, अतः यदि किसी ज्ञानीका देहपात रात्रिके समय हो तो उसका क्या होता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं- निशि नेति चेन्न सम्बन्धस्य यावद्देहभावित्वा- दर्शयति च ॥ ४ । २ । १९ ॥

  • यह मन्त्र सूत्र ४। २ । ९ की व्याख्यामे अर्थसहित आ गया है। † 'अथ यत्रैतदस्माच्छरीरादुत्क्रामत्यथैतैरेव रश्मिभिरूर्ध्वमाक्रमते स ओमिति वा होद् वा मीयते स यावत् क्षिप्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छत्येतद् वै खलु लोकद्वारं विदुषां प्रपदनं निरोधोऽविदुषाम्।'

सूत्र १८—२० ] अध्याय ४ ३५९

सूत्र १८—२० ] अध्याय ४ ३५९ चेत्=यदि कहो कि; निशि=रात्रिमे; न=सूर्यकी रश्मियोंसे नाडीद्वारा उसका सम्बन्ध नहीं होता; इति न=नो यह कहना ठीक नहीं; ( हि )=क्योंकि; सम्बन्धस्य= नाडी और सूर्य-रश्मियोंके सम्बन्धकी; यावद्देहभावित्वात्=जबतक शरीर रहता है, तबतक सत्ता बनी रहती है, इसलिये ( दिन हो या रात, कभी भी नाडी और सूर्य- रश्मियोंका सम्बन्ध विच्छिन्न नहीं होता ); दर्शयति च=यही बात श्रुति भी दिखाती है। व्याख्या—यदि कोई ऐसा कहे कि रात्रिमे देहपात होनेपर नाडियोंसे सूर्य- किरणोंका सम्बन्ध नहीं होगा, इसलिये उस समय मृत्युको प्राप्त हुआ विद्वान् सूर्यलोक-मार्गसे गमन नहीं कर सकता, तो उसका यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि श्रुतिमे कहा है कि—'इस सूर्यकी ये रश्मियाँ इस लोकमे और उस सूर्यलोकमे—दोनो जगह गमन करती हैं, वे सूर्यमण्डलसे निकलती हुई शरीरकी नाडियोंमे व्याप्त हो रही हैं तथा नाडियोंसे निकलती हुई सूर्यमे फैली हुई है।' * (छा० उ० ८। ६। २)। इसलिये श्रुतिके इस कथना- नुसार जबतक शरीर रहता है, तबतक हर जगह और हर समय सूर्यकी रश्मियाँ उसकी नाडियोंमे व्याप्त रहती हैं; अतः किसी समय भी देहपात होनेपर सूक्ष्म शरीरसहित जीवात्माका नाडियोंके द्वारा तत्काल सूर्यकी रश्मियोंसे सम्बन्ध होता है और वह विद्वान् सूर्यलोकके द्वारसे ब्रह्मलोकमे चला जाता है। सम्बन्ध—क्या दक्षिणायनकालमें मरनेपर भी विद्वान् ब्रह्मलोकमें चला जाता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— अतश्चायनेऽपि दक्षिणे ॥ ४ । २ । २० ॥ अतः=इस पूर्वमे कहे हुए कारणसे; च=ही; दक्षिणे=दक्षिण; अयने= अयनमे; अपि=( मरनेवालेका ) भी ( ब्रह्मलोकमें गमन हो जाता है ) । व्याख्या—पूर्वसूत्रके कथनानुसार जिस प्रकार रात्रिके समय सूर्यकी रश्मियों- से सम्बन्ध हो जानेमे कोई बाधा नहीं होती, उसी प्रकार दक्षिणायनकालमे भी कोई बाधा न होनेसे वह विद्वान् सूर्यलोकके मार्गसे जा सकता है। इसलिये यही समझना चाहिये कि दक्षिणायनके समय शरीर छोड़कर जानेवाला महापुरुष भी ब्रह्मविद्याके प्रभावसे सूर्यलोकके द्वारसे तत्काल ब्रह्मलोकमे पहुँच जाता है।

  • एता आदित्यस्य रश्मय उभौ लोकौ गच्छन्तीमं चामुं चामुष्मादादित्यात् प्रतायन्ते ता आसु नाडीषु सृप्ता आभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्ते तेऽमुष्मिन्नादित्ये सृप्ताः ।

३६० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ भीष्म आदि महापुरुषोंके विषयमें जो उत्तरायणकालकी प्रतीक्षाका वर्णन आता है, उसका आशय यह हो सकता है कि भीष्मजी वसु देवता थे, उनको देव- लोकमे जाना था और दक्षिणायनके समय देवलोकमे रात्रि रहती है। इसलिये वे कुछ दिनोतक प्रतीक्षा करते रहे। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि 'हे अर्जुन ! जिस कालमे शरीर त्यागकर गये हुए योगीलोग पीछे न लौटनेवाली और पीछे लौटनेवाली गतिको प्राप्त होते हैं, वह काल मैं तुझे बतलाता हूँ' (गीता ८ । २३)—इस प्रकार प्रकरण आरम्भ करके दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायण आदि कालको तो अपुनरावृत्तिकारक बताया गया है तथा रात्रि और दक्षिणायन आदिको पुनरा- वृत्तिका काल नियत किया गया है; फिर यहाँ कैसे कहा गया कि रात्रि और दक्षिणायनमें भी देहत्याग करनेवाला विद्वान् ब्रह्मलोकमें जा सकता है ? इसपर कहते हैं— योगिनः प्रति च स्मर्यते स्मार्ते चैते ॥ ४ । २ । २१ ॥ च=इसके सिवा; योगिनः=योगीके; प्रति=लिये (यह कालविशेषका नियम); स्मर्यते=स्मृतिमे कहा जाता है; च=तथा; एते=यहाँ कहे हुए ये, अपुनरावृत्ति और पुनरावृत्तिरूप दोनों मार्ग; स्मार्ते=स्मार्त हैं। व्याख्या—गीतामे जिन दो गतियोंका वर्णन है, वे स्मार्त अर्थात् श्रुतिवर्णित मार्गसे भिन्न है। इसके सिवा वे योगीके लिये कहे गये है। इस प्रकार विषयका भेद होनेके कारण वहाँ आवृत्ति और अनावृत्तिके लिये नियत किये हुए काल- विशेषसे इस श्रुतिनिरूपित गतिमें कोई विरोध नहीं आता। जो लोग गीताके श्लोकोमे काल शब्दके प्रयोगसे दिन, रात, शुक्लपक्ष, कृष्णपक्ष, उत्तरायण, दक्षिणायन—इन शब्दोको कालवाचक मानकर उनसे कालविशेषको ही ग्रहण करते हैं, उन्हींके लिये यह समाधान किया गया है; किन्तु यदि उन शब्दोका अर्थ लोकान्तरमे पहुँचानेवाले उन-उन कालोके अभिमानी देवता मान लिया जाय तो श्रुतिके वर्णनसे कोई विरोध नहीं है। दूसरा पाद सम्पूर्ण ।

तीसरा पाद दूसरे पादमें यह बताया गया कि ब्रह्मलोकमें जानेके मार्गका आरम्भ होनेसे पूर्वतककी गति ( वाणीका मनमें लय होना आदि ) विद्वान् और अविद्वान् दोनोंके लिये एक समान है; फिर अविद्वान् कर्मानुसार संसारमें पुनः नूतन शरीर ग्रहण करता है और ज्ञानी महापुरुष ज्ञानसे प्रकाशित मोक्षनाडीद्वारका आश्रय ले सूर्यकी रश्मियोंद्वारा सूर्यलोकमें पहुँचकर वहाँसे ब्रह्मलोकमें चला जाता है। रात्रि और दक्षिणायन-कालमें भी विद्वान्‌की इस ऊर्ध्वगतिमें कोई बाधा नहीं आती; किन्तु ब्रह्मलोकमें जानेका जो मार्ग है, उसका वर्णन कहीं ' अर्चिर्मार्ग, कहीं उत्तरायणमार्ग और कहीं देवयानमार्गके नामसे किया गया है तथा इन मार्गोंके चिह्न भी भिन्न-भिन्न बताये गये हैं। इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि उपासना और अधिकारीके भेदसे ये मार्ग भिन्न-भिन्न हैं या एक ही मार्गके ये सभी नाम हैं? इसके सिवा, मार्गमें कहीं तो नाना देवताओंके लोकोंका वर्णन आता है, कहीं दिन, पक्ष, मास, अयन और संवत्सरका वर्णन आता है और कहीं केवल सूर्यरश्मियों तथा सूर्यलोकका ही वर्णन आता है; यह वर्णनका भेद एक मार्ग माननेसे किस प्रकार संगत होगा? अतः इस विषयका निर्णय करनेके लिये तीसरा पाद तथा अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— अर्चिरादिना तत्प्रथितेः ॥ ४ । ३ । १ ॥ अर्चिरादिना = अर्चिसे आरम्भ होनेवाले एक ही मार्गसे ( ब्रह्मलोकको जाते हैं ); तत्प्रथितेः = क्योंकि ब्रह्मज्ञानियोंके लिये यह एक ही मार्ग ( विभिन्न नामोंसे ) प्रसिद्ध है। व्याख्या—श्रुतियोंमें ब्रह्मलोकमें जानेके लिये विभिन्न नामोंसे जिसका वर्णन किया गया है, वह एक ही मार्ग है, अनेक मार्ग नहीं हैं। उस मार्गका प्रसिद्ध नाम अर्चिः आदि है, क्योंकि वह अर्चिसे प्रारम्भ होनेवाला मार्ग है। इसीसे ब्रह्मलोकमें जानेवाले सब साधक जाते हैं। इसीका देवयान, उत्तरायणमार्ग आदि नामोंसे वर्णन आया है। तथा मार्गमें आनेवाले लोकोंका जो वर्णन आता है, वह कहीं कम है, कहीं अधिक है। उन स्थलोंमें जहाँ जिस लोकका वर्णन

३६२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ नहीं किया गया है, वहाँ उसका अन्यत्रके वर्णनसे अध्याहार कर लेना चाहिये। सम्बन्ध—एक जगह कहे हुए लोकोंका दूसरी जगह किस प्रकार अध्याहार करना चाहिये ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— वायुमब्दादविशेषविशेषाभ्याम् ॥ ४ । ३ । २ ॥ वायुम्=वायुलोकको; अब्दात्=संवत्सरके बाद (और सूर्यके पहले समझना चाहिये); अविशेषविशेषाभ्याम्=क्योंकि कहीं वायुका वर्णन समानभावसे है और कहीं विशेषभावसे है। व्याख्या—एक श्रुति कहती है ‘जो इस प्रकार ब्रह्मविद्याके रहस्यको जानते है तथा जो वनमे रहकर श्रद्धापूर्वक सत्यकी उपासना करते हैं, वे अर्चि (ज्योति, अग्नि अथवा सूर्यकिरण) को प्राप्त होते हैं, अर्चिसे दिनकों, दिनसे शुक्लपक्षको, शुक्लपक्षसे उत्तरायणके छः महीनोको, छः महीनोसे संवत्सरको, संवत्सरसे सूर्यको, सूर्यसे चन्द्रमाको तथा चन्द्रमासे विद्युत्को। वहाँसे अमानव पुरुष इनको ब्रह्मके पास पहुँचा देता है, यह देवयानमार्ग है।' (छा० उ० ५ । १० । १-२)। दूसरी श्रुतिका कथन है—‘जब यह मनुष्य इस लोकसे ब्रह्मलोकको जाता है, तब वह वायुको प्राप्त होता है, वायु उसके लिये रथ-चक्रके छिद्रकी भाँति रास्ता देता है। उस रास्तेसे वह ऊपर चढ़ता है, फिर वह सूर्यको प्राप्त होता है, वहाँ उसे सूर्य लम्बर नामके वाद्यमें रहनेवाले छिद्रके सदृश रास्ता दे देता है। उस रास्तेसे ऊपर उठकर वह चन्द्रमाको प्राप्त होता है, चन्द्रमा उसके लिये नगारेके छिद्रके सदृश रास्ता दे देता है। उस रास्तेसे ऊपर उठकर वह शोकरहित ब्रह्मलोकको प्राप्त हो जाता है, वहाँ अनन्तकालतक निवास करता है (उसके बाद ब्रह्ममे लीन हो जाता है)।' (बृह०उ० ५ । १० । १)। तीसरी श्रुति कहती है—‘वह इस देवयानमार्गको प्राप्त होकर अग्निलोकमें आता है, फिर वायुलोक, सूर्यलोक, वरुणलोक, इन्द्रलोक तथा प्रजापतिलोकमे होता हुआ ब्रह्मलोकमे पहुँच जाता है।' (कौ० उ० १ । ३) इन वर्णनोंमें वायुलोकका वर्णन दो श्रुतियोमे आया है। कौषीतकि- उपनिषद्मे तो केवल लोकोंका नाममात्र कह दिया, विशेषरूपसे क्रमका स्पष्टीकरण नहीं किया; किन्तु बृहदारण्यकमें वायुलोकसे सूर्यलोकमे जानेका

सूत्र २—४ ] अध्याय ४ ३६३

सूत्र २—४ ] अध्याय ४ ३६३ उल्लेख स्पष्ट है । अतः छान्दोग्योपनिषद्‌की अर्चिसे आरम्भ करके मार्गका वर्णन करनेवाली श्रुतिमें अग्निके स्थानमें तो अर्चि कही है, परन्तु वहाँ वायुलोकका वर्णन नहीं है, इसलिये वायुलोकको संवत्सरके बाद और सूर्यके पहले मानना चाहिये । सम्बन्ध—वरुण, इन्द्र और प्रजापति लोकका भी अर्चि आदि मार्गमें वर्णन नहीं है, अतः उनको किसके बाद समझना चाहिये ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— तडितोऽधि वरुणः सम्बन्धात् ॥ ४ । ३ । ३ ॥ तडितः=विद्युत्में; अधि=ऊपर; वरुणः=वरुणलोक ( समझना चाहिये ), सम्बन्धात्=क्योंकि उन दोनोंका परस्पर सम्बन्ध है । व्याख्या—वरुण जलका स्वामी है, विद्युत्का जलसे निकटतम सम्बन्ध है, इसलिये विद्युत्के ऊपर वरुणलोककी स्थिति समझनी चाहिये । उसके बाद इन्द्र और प्रजापतिके लोकोंकी स्थिति भी उस श्रुतिमें कहे हुए क्रमानुसार समझ लेनी चाहिये । इस प्रकार सब श्रुतियोंकी एकता हो जायगी और एक मार्ग माननेमें किसी प्रकारका विरोध नहीं रहेगा । सम्बन्ध—अर्चिरादि मार्गमें जो अर्चि, अहः, पक्ष, अयन, संवत्सर, वायु और विद्युत् आदि बताये गये हैं, वे जड हैं या चेतन ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— आतिवाहिकास्तल्लिङ्गात् ॥ ४ । ३ । ४ ॥ आतिवाहिकाः=वे सब साधकको एक स्थानसे दूसरे स्थानतक पहुँचा देनेवाले उन-उन लोकोंके अभिमानी पुरुष हैं, क्योंकि श्रुतिमें; तल्लिङ्गात्=वैसा ही लक्षण देखा जाता है । व्याख्या—अर्चि, अहः आदि शब्दोंद्वारा कहे जानेवाले ये सब उन-उन नाम और लोकोंके अभिमानी देवता या मानवाकृति पुरुष हैं । इनका काम ब्रह्मलोकमें जानेवाले जीवको एक स्थानसे दूसरे स्थानतक पहुँचा देना है, इसीलिये इनको आतिवाहिक कहते हैं । विद्युल्लोकमें पहुँचनेपर अमानव पुरुष उस ज्ञानीको ब्रह्मकी प्राप्ति कराता है । उसके लिये जो अमानव विशेषण दिया गया है, उससे सिद्ध होता है कि उसके पहले जो अर्चि आदि लोक प्राप्त होते हैं, वे उन-उन लोकोंके

३६४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ अभिमानी देवता या मानवाकार पुरुष हैं। है वे भी दिव्य ही, परन्तु उनकी आकृति मानवो-जैसी है। सम्बन्ध—इस प्रकार अभिमानी देवता माननेकी क्या आवश्यकता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— उभयव्यामोहात्तत्सिद्धेः ॥ ४ । ३ । ५ ॥ उभयव्यामोहात्=दोनोके मोहयुक्त होनेका प्रसङ्ग आ जाता है, इसलिये; तत्सिद्धेः=उनको अभिमानी देवता माननेसे ही उनके द्वारा ब्रह्मलोकतक ले जानेका कार्य सिद्ध हो सकता है। अतः ( वैसा ही मानना चाहिये )। व्याख्या—यदि अर्चि आदि शब्दोसे उनके अभिमानी देवता न मानकर उन्हें ज्योति और लोकविशेषरूप जड पदार्थ मान ले तो दोनोंके ही मोहयुक्त ( मार्ग- ज्ञानशून्य ) होनेसे ब्रह्मलोकतक पहुँचना ही सम्भव न होगा; क्योकि गमन करनेवाला जीवात्मा तो वहाँके मार्गसे परिचित है नहीं, उसको आगे ले जानेवाले अर्चि आदि भी यदि चेतन न हो तो मार्गको जाननेवाला कोई न रहनेसे देवयान और पितृयानमार्गका ज्ञान होना असम्भव हो जायगा। इसलिये अर्चि आदि शब्दोसे उन-उनके अभिमानी देवताओका वर्णन मानना आवश्यक है। तभी उनके द्वारा ब्रह्मलोकतक पहुँचानेका कार्य सिद्ध हो सकेगा। अतः मार्गमे जिन-जिन लोकोंका वर्णन आया है, उनसे उन-उन लोकोके अधिष्ठाता देवताको ही समझना चाहिये, अपने लोकसे अगले लोकमे पहुँचा देना ही उनका काम है। सम्बन्ध—विद्युत्-लोकके अनन्तर यह कहा गया है कि वह अमानव पुरुष उनको ब्रह्मके पास पहुँचा देता है। ( छा० उ० ५ । १० । १ ) तब बीचमें आने- वाले वरुण, इन्द्र और प्रजापतिके लोकोंके अभिमानी देवताओंका क्या काम रहेगा ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— वैद्युतेनैव ततस्तच्छ्रुतेः ॥ ४ । ३ । ६ ॥ ततः=वहाँसे आगे ब्रह्मलोकतक; वैद्युतेन=विद्युत्-लोकमे प्रकट हुए अमानव पुरुषद्वारा; एव=ही ( पहुँचाये जाते है ); तच्छ्रुतेः=क्योंकि वैसा ही श्रुतिमें कहा है— व्याख्या—वहाँसे उनको वह विद्युत्-लोकमे प्रकट हुआ अमानव पुरुष ब्रह्मके

सूत्र ५-८ ] अध्याय ४ ,३६५

सूत्र ५-८ ] अध्याय ४ ,३६५ पास पहुँचा देता है, इस प्रकार श्रुतिमे स्पष्ट कहा जानेके कारण यही सिद्ध होता है कि विद्युत्-लोकसे आगे ब्रह्मलोकतक वही विद्युत्-लोकमें प्रकट अमानव पुरुष उनको पहुँचाता है, बीचके लोकोंके जो अभिमानी देवता हैं, उनका इतना ही काम है कि वे अपने लोकोमे होकर जानेके लिये उनको मार्ग दे दे और अन्य आवश्यक सहयोग करें। सम्बन्ध- ब्रह्मविद्याका उपासक अधिकारी विद्वान् वहाँ ब्रह्मलोकमे जिनको प्राप्त होता है, वह परब्रह्म है या सबसे पहले उत्पन्न होनेवाला ब्रह्मा ? इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है, यहाँ पहले बादरि आचार्यकी ओरसे सातवें सूत्रसे ग्यारहवें सूत्रतक पूर्वपक्षकी स्थापना की जाती है— कार्यं बादरिरस्य गत्युपपत्तेः ॥ ४ । ३ । ७ ॥ बादरिः=आचार्य बादरिका मत है कि; कार्यम्=कार्यब्रह्मको, अर्थात् हिरण्यगर्भको (प्राप्त होते हैं); गत्युपपत्तेः=क्योंकि गमन करनेके कथनकी उपपत्ति; अस्य=इस कार्यब्रह्मके लिये ही (हो सकती है)। व्याख्या-श्रुतिमें जो लोकान्तरमे गमनका कथन है, वह परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके लिये उचित नहीं है; क्योंकि परब्रह्म परमात्मा तो सभी जगह है, उनको पानेके लिये लोकान्तरमें जानेकी क्या आवश्यकता है, अतः यही सिद्ध होता है कि इन ब्रह्मविद्याकी उपासना करनेवालोंके लिये जो प्राप्त होनेवाला ब्रह्म है, वह परब्रह्म नहीं; किन्तु कार्यब्रह्म ही है; क्योंकि इस कार्यब्रह्मकी प्राप्तिके लिये लोकान्तरमें जाकर उसे प्राप्त करनेका कथन सर्वथा युक्तिसंगत है। सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे अपने पक्षको दृढ करते हैं— विशेषितत्वाच्च ॥ ४ । ३ । ८ ॥ च=तथा; विशेषितत्वात्=विशेषण देकर स्पष्ट कहा गया है, इसलिये भी (कार्यब्रह्मकी प्राप्ति मानना ही उचित है)। व्याख्या-'मानस पुरुष इनको ब्रह्मलोकोमे ले जाता है' (बृह०उ० ६।२।१५) इस श्रुतिमें ब्रह्मलोकमे बहुवचनका प्रयोग किया गया है तथा ब्रह्मलोकोंमें ले जाने- की बात कही गयी है, ब्रह्मको प्राप्त होनेकी बात नहीं कही गयी, इस प्रकार विशेषरूपमे स्पष्ट कहा जानेके कारण भी यही सिद्ध होता है कि कार्यब्रह्मको

३६६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ ही प्राप्त होता है, क्योंकि वह लोकोंका स्वामी है; अतः भोग्यभूमि अनेक होनेके कारण लोकोंके साथ बहुवचनका प्रयोग उचित ही है । सम्बन्ध—दूसरी श्रुतिमें जो यह कहा है कि वह अमानव पुरुष इनको ब्रह्मके समीप ले जाता है, वह कथन कार्यब्रह्म माननेसे उपयुक्त नहीं होता; क्योंकि श्रुतिका उद्देश्य यदि कार्यब्रह्मकी प्राप्ति बताना होता तो ब्रह्मके समीप पहुँचा देता है, ऐसा कथन होना चाहिये था ! इसपर कहते हैं— सामीप्यात्तु तद्व्यपदेशः ॥ ४ । ३ । ९ ॥ तद्व्यपदेशः = वह कथन; तु = तो; सामीप्यात् = ब्रह्मकी समीपताके कारण ब्रह्मके लिये हो सकता है । व्याख्या—'जो सबसे पहले ब्रह्माको रचता है; तथा जो उसको समस्त वेदोंका ज्ञान प्रदान करता है, परमात्म-ज्ञानविषयक बुद्धिको प्रकट करनेवाले उस प्रसिद्ध परमदेव परमेश्वरकी मैं मुमुक्षु साधक शरण ग्रहण करता हूँ ।'* (श्वेता० उ० ६ । १८) इस श्रुतिकथनके अनुसार ब्रह्मा उस परब्रह्मका पहला कार्य होनेके कारण ब्रह्माको 'ब्रह्म' कहा गया है, ऐसा मानना युक्तिसंगत हो सकता है । सम्बन्ध—गीतामें कहा है कि ब्रह्माके लोकतक सभी लोक पुनरावृत्तिशील हैं (गीता ८ । १६)। इस प्रसङ्गमें ब्रह्माकी आयु पूर्ण हो जानेपर वहाँ जानेवालों- का वापस लौटना अनिवार्य है और श्रुतिमें देवयानमार्गसे जानेवालोंका वापस न लौटना स्पष्ट कहा है; इसलिये कार्यब्रह्मकी प्राप्ति न मानकर परब्रह्मकी प्राप्ति मानना ही उचित मालूम होता है, इसपर पूर्वपक्षकी ओरसे कहा जाता है— कार्यात्यये तदध्यक्षेण सहातः परमभिधानात् ॥ ४ । ३ । १० ॥ कार्यात्यये = कार्यरूप ब्रह्मलोकका नाश होनेपर; तदध्यक्षेण = उसके स्वामी ब्रह्माके; सह = सहित; अतः = इससे; परम् = श्रेष्ठ परब्रह्म परमात्माको; अभिधानात् = प्राप्त होनेका कथन है, इसलिये ( पुनरावृत्ति नहीं होगी ) । व्याख्या—'जिन्होंने उपनिषदोंके विज्ञानद्वारा उनके अर्थभूत परमात्माका भलीभाँति निश्चय कर लिया है तथा कर्मफल और आसक्तिके त्यागरूप योगसे,

  • यह मन्त्र पृष्ठ ६६ मे अर्थसहित आ गया है ।

सूत्र ९—१२ ] अध्याय ४ ३६७

सूत्र ९—१२ ] अध्याय ४ ३६७ जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है, वे सब साधक ब्रह्मलोकोंमें जाकर अन्तकाल- मे परम अमृतस्वरूप होकर भलीभाँति मुक्त हो जाते हैं ।'* ( मु० उ० ३ । २ । ६ ) इस प्रकार श्रुतिमे उन सबकी मुक्तिका कथन होनेसे यह सिद्ध होता है कि प्रलयकालमे ब्रह्मलोकका नाश होनेपर उसके स्वामी ब्रह्माके सहित वहाँ गये हुए ब्रह्मविद्याके उपासक भी परब्रह्मको प्राप्त होकर मुक्त हो जाते हैं, इसलिये उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती । सम्बन्ध—स्मृति-प्रमाणसे पूर्वपक्षको पुष्ट करते हैं— स्मृतेश्च ॥ ४ । ३ । ११ ॥ स्मृतेः=स्मृति-प्रमाणसे; च=भी (यही बात सिद्ध होती है) । व्याख्या—वे सब शुद्ध अन्त.करणवाले पुरुष प्रलयकाल प्राप्त होनेपर समस्त जगत्के अन्तमे ब्रह्माके साथ उस परमपदमें प्रविष्ट हो जाते हैं ।'† ( कू० पु० पूर्वख० १२ । २६९ ) इस प्रकार स्मृतिमे भी यही भाव प्रदर्शित किया है, इसलिये कार्यब्रह्मकी प्राप्ति होती है, यही मानना ठीक है । सम्बन्ध—यहाँतक पूर्वपक्षकी स्थापना करके उसके उत्तरमें आचार्य जैमिनि- का मत उद्धृत करते हैं— परं जैमिनिर्मुख्यत्वात् ॥ ४ । ३ । १२ ॥ जैमिनिः=आचार्य जैमिनिका कहना है कि; मुख्यत्वात्=ब्रह्मशब्दका मुख्य वाच्यार्थ होनेके कारण; परम्=परब्रह्मको प्राप्त होता है ( यही मानना युक्तिसङ्गत है ) । व्याख्या—वह अमानव पुरुष इनको ब्रह्मके समीप पहुँचा देता है ( छा० उ० ४ । १५ । ५ ) श्रुतिके इस वाक्यमे कहा हुआ 'ब्रह्म' शब्द मुख्यतया परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है, इसलिये अर्चि आदि मार्गसे जानेवाले परब्रह्म परमात्माको ही प्राप्त होते है, कार्यब्रह्मको नहीं। जहाँ मुख्य अर्थकी उपयोगिता नहीं हो, वहीं गौण अर्थकी कल्पना की जा सकती है, मुख्य अर्थकी उपयोगिता रहते हुए नहीं । वह परब्रह्म परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण होनेपर भी उसके परम

  • यह मन्त्र पृष्ठ २९३ मे अर्थसहित आ गया है । † ब्रह्मणा सह ते सर्वे संप्राप्ते प्रतिसंचरे । परस्यान्ते कृतात्मानः प्रविशन्ति परं पदम् ॥

३६८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ धामका प्रतिपादन और वहाँ विद्वान् उपासकोके जानेका वर्णन श्रुति (क० उ० १ । ३।९), (प्र० उ० १।१०) और स्मृतियोमे (गीता १५। ६) जगह-जगह किया गया है। इसलिये उसके लोकविशेषमे गमन करनेके लिये कहना कार्यब्रह्मका द्योतक नहीं है। बहुवचनका प्रयोग भी आदरके लिये किया जाना सम्भव है तथा उस सर्वशक्तिमान् परमेश्वरके अपने लिये रचे हुए अनेक लोकोका होना भी कोई असम्भव बात नहीं है। अतः सर्वथा यही सिद्ध होता है कि वे उसीके परम- धाममे जाते है तथा परब्रह्म परमात्माको ही प्राप्त होते हैं, कार्यब्रह्मको नहीं। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे जैमिनिके मतको दृढ़ करते है— दर्शनाच्च ॥ ४ । ३ । १३ ॥ दर्शनात्=श्रुतिमें जगह-जगह गतिपूर्वक परब्रह्मकी प्राप्ति दिखायी गयी है, इससे; च=भी (यही सिद्ध होता है कि कार्यब्रह्मकी प्राप्ति नहीं है)। व्याख्या—'उनमेंसे सुषुम्ना नाडीद्वारा ऊपर उठकर अमृतत्वको प्राप्त होता है।' (छा० उ० ८। ६। ६) 'वह संसारमार्गके उस पार उस विष्णुके परम- पदको प्राप्त होता है।' (क० उ० १ । ३ । ९) इसके सिवा सुषुम्ना नाडीद्वारा शरीरसे निकलकर जानेका वर्णन कठोपनिषद्मे भी वैसा ही आया है (क० उ० २ । ३ । १६) इस प्रकार जगह-जगह गतिपूर्वक परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति श्रुतिमे प्रदर्शित की गयी है। इससे यही सिद्ध होता है कि देवयान-मार्गके द्वारा जानेवाले ब्रह्मविद्याके उपासक परब्रह्मको ही प्राप्त होते हैं, न कि कार्यब्रह्मको। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे जैमिनिके मतको दृढ़ करते हैं— न च कार्ये प्रतिपत्त्यभिसन्धिः ॥ ४ । ३ । १४ ॥ च=इसके सिवा; प्रतिपत्त्यभिसन्धिः=उन ब्रह्मविद्याके उपासकोका प्राप्ति- विषयक संकल्प भी; कार्ये=कार्यब्रह्मके लिये; न=नहीं है। व्याख्या—इसके सिवा, उन ब्रह्मविद्याके उपासकोंका जो प्राप्तिविषयक संकल्प है, वह कार्यब्रह्मके लिये नहीं है; अपितु परब्रह्म परमात्माको ही प्राप्त करनेके लिये उनकी साधनमे प्रवृत्ति देखी गयी है; इसलिये भी उनको कार्यब्रह्मकी प्राप्ति नहीं हो सकती, परब्रह्मकी ही प्राप्ति होती है। श्रुतिमे जो यह कहा गया है कि वे

सूत्र १३-१५ ] अध्याय ४ ३६९

सूत्र १३-१५ ] अध्याय ४ ३६९ प्रजापतिके सभाभवनको प्राप्त होते हैं (छा० उ० ८ । १४ । १ ) । उस प्रसङ्गमे भी उपासकका लक्ष्य प्रजापतिके लोकमें रहना नहीं है; किंतु परब्रह्मके परमधाममें जाना ही है, क्योकि वहाँ जिस यशोंके यश यानी महायशका वर्णन है, वह ब्रह्मका ही नाम है, यह बात अन्यत्र श्रुतिमे कही गयी है (श्वेता० उ० ४ । १९ ) तथा उसके पहले (छा० उ० ८ । १३ । १) के प्रसङ्गसे भी यही सिद्ध हो सकता है कि वहाँ साधकका लक्ष्य परब्रह्म ही है। सम्बन्ध-इस प्रकार पूर्वपक्ष और उसके उत्तरकी स्थापना करके अब सूत्रकार अपना मत प्रकट करते हुए सिद्धान्तका वर्णन करते हैं— अप्रतीकालम्बनान्नयतीति बादरायण उभयथा- दोषात्तत्क्रतुश्च ॥ ४ । ३ । १५ ॥ अप्रतीकालम्बनान् = वाणी आदि प्रतीकका अवलम्बन करके उपासना करनेवालोंके सिवा अन्य सब उपासकोको; नयति=( ये अर्चि आदि देवतालोग देवयानमार्गसे ) ले जाते है; उभयथा=( अतः ) दोनों प्रकारकी; अदोषात्= मान्यतामें कोई दोष न होनेके कारण; तत्क्रतुः=उनके सकल्पानुसार परब्रह्मको; च=और कार्यब्रह्मको प्राप्त कराना सिद्ध होता है; इति=यह; बादरायणः =व्यासदेव कहते हैं। व्याख्या—आचार्य बादरायण अपना सिद्धान्त बतलाते हुए यह कहते हैं कि जिस प्रकार वाणी आदिमें ब्रह्मकी प्रतीक-उपासनाका वर्णन है, उसी प्रकार दूसरी-दूसरी वैसी उपासनाओंका भी उपनिषदोंमें वर्णन है। उन उपासकोके सिवा, जो ब्रह्मलोकोंके भोगोको स्वेच्छानुसार भोगनेकी इच्छावाले कार्यब्रह्मके उपासक हैं और जो परब्रह्म परमात्माको प्राप्त करनेकी इच्छासे उस सर्वशक्तिमान् सर्वज्ञ परमेश्वरकी उपासना करनेवाले हैं, उन दोनो प्रकारके उपासकोको उनकी भावना- के अनुसार कार्यब्रह्मके भोगसम्पन्न लोकोमे और परब्रह्म परमात्माके परमधाममे दोनों जगह ही वह अमानव पुरुष पहुँचा देता है, इसलिये दोनों प्रकारकी मान्यतामें कोई दोष नहीं है; क्योंकि उपासकका सकल्प ही इस विशेषतामें कारण है। श्रुतिमें भी यह वर्णन स्पष्ट है कि 'जिनको परब्रह्मके परमधाममे पहुँचाते है, उनका मार्ग भी प्रजापति ब्रह्माके लोकमे होकर ही है ( कौ० उ० १ । ३)। अतः जिनके अन्तःकरणमें लोकोमे रमण करनेके सस्कार होते हैं, उनको वहाँ वे० द० २४—

३७० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ छोड़ देते हैं, जिनके मनमें वैसे भाव नहीं होते, उनको परमधाममें पहुँचा देते हैं; परन्तु देवयानमार्गसे गये हुए दोनों प्रकारके ही उपासक वापस नहीं लौटते । सम्बन्ध-प्रतीकोपासनावालोंको अर्चिर्मार्गसे नहीं ले जानेका क्या कारण है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— विशेषं च दर्शयति ॥ ४ । ३ । १६ ॥ विशेषम् = इसका विशेष कारण; च = भी; दर्शयति = श्रुति दिखाती है । व्याख्या—वाणी आदि प्रतीकोपासनावालोंको देवयानमार्गके अधिकारी क्यो नहीं ले जाते, इसका विशेष कारण उन-उन उपासनाओंके विभिन्न फलका वर्णन करते हुए श्रुति स्वयं ही दिखलाती है, वाणीमें प्रतीकोपासनाका फल जहाँतक वाणीकी गति है, वहाँतक इच्छानुसार विचरण करनेकी शक्ति बताया गया है (छा० उ० ७।२।२)। इसी प्रकार दूसरी प्रतीकोपासनाका अलग- अलग फल बताया है, सबके फलमे एकता नहीं है । इसलिये वे उपासक देवयानमार्गसे न तो कार्यब्रह्मके लोकमे जानेके अधिकारी है और न परब्रह्म परमेश्वरके परमधाममे ही जानेके अधिकारी हैं; अतः उस मार्गके अधिकारी देवताओका अर्चिर्मार्गसे उनको न ले जाना उचित ही है । तीसरा पाद सम्पूर्ण ।

चौथा पाद तीसरे पादमें अर्चि आदि मार्गद्वारा परब्रह्म और कार्यब्रह्मके लोकमें जानेवालोंकी गतिके विषयमें निर्णय किया गया। अब उपासकोंके संकल्पानुसार ब्रह्मलोकमें पहुँचनेके बाद जो उनकी स्थितिका भेद होता है, उसका निर्णय करनेके लिये चौथा पाद आरम्भ किया जाता है। उसमें पहले उन साधकोंके विषयमें निर्णय करते हैं, जिनका उद्देश्य परब्रह्मकी प्राप्ति है और जो उस परब्रह्मके अप्राकृत दिव्य परमधाममें जाते हैं— सम्पद्याविर्भावः स्वेन शब्दात् ॥ ४ । ४ । १ ॥ सम्पद्य=परमधामको प्राप्त होकर (इस जीवका); स्वेन=अपने वास्तविक स्वरूपसे; आविर्भावः=प्राकट्य होता है; शब्दात्=क्योंकि श्रुतिमें ऐसा ही कहा गया है। व्याख्या—'जो यह उपासक इस शरीरसे ऊपर उठकर परम ज्ञानस्वरूप परमधामको प्राप्त हो (वहाँ) अपने वास्तविक स्वरूपसे सम्पन्न हो जाता है। यह आत्मा है—ऐसा आचार्यने कहा—यह (उसको प्राप्त होनेवाला) अमृत है, अभय है और यही ब्रह्म है। निस्सन्देह उस इस (प्राप्तव्य) परब्रह्मका नाम सत्य है।' (छा० उ० ८ । ३ । ४)—इस श्रुतिसे यही सिद्ध होता है कि परमधामको प्राप्त होते ही वह साधक अपने वास्तविक स्वरूपसे सम्पन्न हो जाता है अर्थात् प्राकृत सूक्ष्म शरीरसे रहित, श्रुतिमे बताये हुए पुण्य-पापशून्य, जरा-मृत्यु आदि विकारोंसे रहित, सत्यकाम, सत्य-संकल्प, शुद्ध एवं अजर- अमररूपसे युक्त हो जाता है। (छा० उ० ८ । १ । ५) इस प्रकरणमें जो संकल्पसे ही पितर आदिकी उपस्थिति होनेका वर्णन है, वह ब्रह्मविद्याके माहात्म्यका सूचक है। उसका भाव यह है कि जीवनकालमें ही हृदयाकाशके भीतर संकल्पसे पितृलोक आदिके सुखका अनुभव होता है, न कि ब्रह्मलोकमें जानेके बाद; क्योंकि उस प्रकरणके वर्णनमें यह बात स्पष्ट है। वहाँ जीवनकालमें ही उनका संकल्पसे उपस्थित होना कहा है (छा० उ० ८ । २ । १ से १०)। इसके बाद, उसके लिये प्रतिदिन यहाँ हृदयमें ही परमानन्दकी प्राप्ति होनेकी बात कही है (छा० उ० ८ । ३ । ३)। तदनन्तर शरीर छोड़कर परमधाममें जानेकी

प्रकरणात्=प्रकरणसे (यह सिद्ध होता है कि वह); आत्मा=शुद्ध

३७२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ बात बतायी गयी है ( छा० उ० ८ । ३ । ४) और उसका नाम 'सत्य अर्थात् सत्यलोक कहा है। उसके पूर्व जो यह कहा है कि 'जो यहाँ इस आत्माको तथा इन सत्यकामोको जानकर परलोकमे जाते हैं, उनका सब लोकोमे इच्छानुसार गमन होता है' (छा० उ० ८ । १ । ६) यह वर्णन आत्म-ज्ञान- की महिमा दिखानेके लिये है। किन्तु दूसरे खण्डका वर्णन तो स्पष्ट ही जीवनकालका है। उक्त प्रकरण दहर-विद्याका है और ( दहर ) यहाँ परब्रह्म परमेश्वरका वाचक है, यह बात पहले सिद्ध की जा चुकी है, (ब्र० सू० १ । ३ । १४) इसलिये यहाँ यह नहीं कहा जा सकता कि यह प्रकरण हिरण्यगर्भकी या जीवात्माके अपने स्वरूपकी उपासनाका है। सम्बन्ध-उस परमधाममें जो वह उपासक अपने वास्तविक रूपसे सम्पन्न होता है, उसमें पहलेकी अपेक्षा क्या विशेषता होती है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— मुक्तः प्रतिज्ञानात् ॥ ४ । ४ । २ ॥ प्रतिज्ञानात्=प्रतिज्ञा की जानेके कारण यह सिद्ध होता है कि; मुक्तः= (वह स्वरूप) सब प्रकारके बन्धनोसे मुक्त (होता) है। व्याख्या-श्रुतिमें जगह-जगह यह प्रतिज्ञा की गयी है कि 'उस परब्रह्म परमात्माके लोकको प्राप्त होनेके बाद यह साधक सदाके लिये सब प्रकारके बन्धनोंसे छूट जाता है।' (मु० उ० ३ । २ । ६) इसीसे यह सिद्ध होता है कि अपने वास्तविक स्वरूपसे सम्पन्न होनेपर उपासक सब प्रकारके बन्धनोंसे रहित, सर्वथा शुद्ध, दिव्य, विभु और विज्ञानमय होता है, उसमे किसी प्रकारका विकार नहीं रहता। पूर्वकालमे अनादिसिद्ध कर्मसंस्कारोके कारण जो इसका स्वरूप कर्मानुसार प्राप्त शरीरके अनुरूप हो रहा था; (ब्र० सू० २ । ३ । ३०) परमधाममे जानेके बाद वैसा नहीं रहता। यह सब बन्धनोसे मुक्त हो जाता है। सम्बन्ध-यह कैसे निश्चय होता है कि उस समय उपासक सब बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है ? इसपर कहते हैं— आत्मा प्रकरणात् ॥ ४ । ४ । ३ ॥ प्रकरणात्=प्रकरणसे (यह सिद्ध होता है कि वह); आत्मा=शुद्ध आत्मा ही हो जाता है।

सूत्र .२-५ ] अध्याय ४ ३७३

सूत्र .२-५ ] अध्याय ४ ३७३ व्याख्या—उस प्रकरणमे जो वर्णन है, उसमे यह स्पष्ट कहा गया है कि 'वह ब्रह्मलोकमे प्राप्त होनेवाला स्वरूप आत्मा है' ( छा० उ० ८ । ३ । ४ ) । अतः उस प्रकरणसे ही यह सिद्ध होता है कि उस समय वह सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त होकर परमात्माके समान परम दिव्य शुद्ध स्वरूपसे युक्त हो जाता है। ( गीता १४ । २; तथा मु० उ० ३ । १ । ३ )। सम्बन्ध—अब यह जिज्ञासा होती है कि ब्रह्मलोकमें जाकर उस उपासककी परमात्मासे पृथक् स्थिति रहती है या वह उन्हींमे मिल जाता है। इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं। पहले क्रमशः तीन प्रकारके मत प्रस्तुत करते हैं— अविभागेन दृष्टत्वात् ॥ ४ । ४ । ४ ॥ अविभागेन = ( उस मुक्तात्माकी स्थिति उस परब्रह्ममे ) अविभक्त रूपसे होती है; दृष्टत्वात् = क्योकि यही बात श्रुतिमे देखी गयी है। व्याख्या—श्रुतिमें कहा गया है कि— 'यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति । एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥' 'हे गौतम ! जिस प्रकार शुद्ध जलमे गिरा हुआ शुद्ध जल वैसा ही हो जाता है. उसी प्रकार परमात्माको जाननेवाले मुनिका आत्मा हो जाता है।' ( क० उ० २ । १ । १५ ) । 'जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ नामरूपोको छोड़कर समुद्रमे विलीन हो जाती हैं, वैसे ही परमात्माको जाननेवाला विद्वान् नाम-रूपसे मुक्त होकर परात्पर, दिव्य, परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है ।'* ( मु० उ० ३ । २ । ८ ) । श्रुतिके इस वर्णनसे यह सिद्ध होता है कि मुक्तात्मा उस परब्रह्म परमात्मामें अविभक्त रूपसे ही स्थित होता है। सम्बन्ध—इस विषयमें जैमिनिका मत बतलाते हैं— ब्राह्मेण जैमिनिरुपन्यासादिभ्यः ॥ ४ । ४ । ५ ॥ जैमिनिः = आचार्य जैमिनि कहते हैं कि; ब्राह्मेण = ब्रह्मके सदृश रूपसे स्थित होता है; उपन्यासादिभ्यः = क्योकि श्रुतिमे जो उसके स्वरूपका निरूपण किया गया है, उसे देखनेसे और श्रुति-प्रमाणमे भी यही सिद्ध होता है।

  • यह मन्त्र पृष्ठ ९४ में अर्थसहित आया है।

३७४ वेदान्त-दर्शन [पाद व्याख्या—आचार्य जैमिनिका कहना है कि श्रुतिमे 'वह निर्मल होकर परम समताको प्राप्त हो जाता है।' (मु० उ० ३ । १ । ३) ऐसा वर्णन मिलता है। तथा उक्त प्रकरणमे भी उसका दिव्य स्वरूपसे सम्पन्न होना कहा गया है (छा० उ० ८। ३। ४) एवं गीतामें भी भगवान्ने कहा है कि 'इस ज्ञानका आश्रय लेकर मेरे दिव्य गुणोंकी समताको प्राप्त हुए महापुरुष सृष्टिकालमे उत्पन्न और प्रलयकालमें व्यथित नहीं होते।' (गीता १४ । २)। इन प्रमाणोंसे यह सिद्ध होता है कि वह उपासक उस परमात्माके सदृश दिव्य स्वरूपसे सम्पन्न होता है। सम्बन्ध—इसी विषयमें आचार्य औडुलोमिका मत उपस्थित करते हैं— चितितन्मात्रेण तदात्मकत्वादित्यौडुलोमिः ॥ ४ । ४ । ६ ॥ चितितन्मात्रेण = केवल चेतनमात्र स्वरूपसे स्थित रहता है; तदात्म- कत्वात् = क्योकि उसका वास्तविक स्वरूप वैसा ही है; इति = ऐसा; औडुलोमिः = आचार्य औडुलोमि कहते हैं। व्याख्या—परमधाममें गया हुआ मुक्तात्मा अपने वास्तविक चैतन्यमात्र स्वरूपसे स्थित रहता है; क्योकि श्रुतिमे उसका वैसा ही स्वरूप बताया गया है। बृहदारण्यकमे कहा है कि 'स यथा सैन्धवघनोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नो रसघन एवैवं वा अरेऽयमात्मानन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एव।'-'जिस प्रकार नमकका डला बाहर-भीतरसे रहित सब-का-सब रसघन है, वैसे ही यह आत्मा बाहर- भीतरके भेदसे रहित सब-का-सब प्रज्ञानघन ही है।' (बृह० उ० ४ । ५ । १३) इसलिये उसका अपने स्वरूपसे सम्पन्न होना चैतन्य घनरूपमे ही स्थित होना है। सम्बन्ध—अब आचार्य बादरायण इस विषयमें अपना सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं— एवमप्युपन्यासात् पूर्वभावादविरोधं बादरायणः ॥ ४ । ४ । ७ ॥ एवम् = इस प्रकारसे अर्थात् औडुलोमि और जैमिनिके कथनानुसार; अपि = भी; उपन्यासात् = श्रुतिमे उस मुक्तात्माके स्वरूपका निरूपण होनेसे तथा; पूर्वभावात् = पहले (चौथे सूत्रमें) कहे हुए भावसे भी; अविरोधम् = सिद्धान्तमें कोई विरोध नहीं है; बादरायणः (आह) = यह बादरायण कहते हैं। व्याख्या—आचार्य जैमिनिके कथनानुसार मुक्तात्माका स्वरूप परब्रह्म

सूत्र ६-९ ] अध्याय ४ ३७५

सूत्र ६-९ ] अध्याय ४ ३७५ परमात्माके सदृश दिव्यगुणोंसे सम्पन्न होता है—यह बात श्रुतियों और स्मृतियोंमे कही गयी है तथा आचार्य औडुलोमिके कथनानुसार चेतनमात्र स्वरूपसे स्थित होनेका वर्णन भी पाया जाता है। इसी प्रकार पहले ( ४ । ४ । ४ सूत्रमे ) जैसा बताया गया है, उसके अनुसार परमेश्वरमें अभिन्नरूपसे स्थित होनेका वर्णन भी मिलता है। इसलिये यही मानना ठीक है कि उस मुक्तात्माके भावानुसार उसकी तीनों ही प्रकारसे स्थिति हो सकती है। इसमें कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—यहाँतक परमधाममें जानेवाले उपासकोंके विषयमें निर्णय किया गया। अब जो उपासक प्रजापति ब्रह्माके लोकको प्राप्त होते हैं, उनके विषयमें निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। यहाँ प्रश्न होता है कि उन उपासकोंको ब्रह्मलोकोंके भोगोंकी प्राप्ति किस प्रकार होती है, इसपर कहते हैं— संकल्पादेव तु तच्छ्रुतेः ॥ ४ । ४ । ८ ॥ तु=( उन भोगोंकी प्राप्ति ) तो; संकल्पात्=संकल्पसे; एव=ही होती है; तच्छ्रुतेः=क्योंकि श्रुतिमें यही बात कही गयी है। व्याख्या—'यह आत्मा मनरूप दिव्य नेत्रोंसे ब्रह्मलोकके समस्त भोगोंको देखता हुआ रमण करता है।' (छा० उ० ८ । १२। ५, ६) यह बात श्रुतिमें कही गयी है; इससे यह सिद्ध होता है कि मनके द्वारा केवल संकल्पसे ही उपासकको उस लोकके दिव्य भोगोंका अनुभव होता है। सम्बन्ध—युक्तिसे भी उसी बातको दृढ़ करते हैं— अत एव चानन्याधिपतिः ॥ ४ । ४ । ९ ॥ अत एव=इसीलिये; च=तो; अनन्याधिपतिः=( मुक्तात्माको ) ब्रह्माके सिवा अन्य स्वामीसे रहित बताया गया है। व्याख्या—'वह स्वाराज्यको प्राप्त हो जाता है, मनके स्वामी हिरण्यगर्भको प्राप्त हो जाता है; अतः वह स्वयं बुद्धि, मन, वाणी, नेत्र और श्रोत्र—सबका स्वामी हो जाता है ?' ( तै० उ० १ । ६ ) । भाव यह कि एक ब्रह्माजीके सिवा अन्य किसीका भी उसपर आधिपत्य नहीं रहता, इसीलिये पूर्वसूत्रमें कहा

३७६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ गया है कि 'वह मनके द्वारा संकल्पमात्रसे ही सब दिव्य भोगोंको प्राप्त कर लेता है।' सम्बन्ध—उसे संकल्पमात्रसे जो दिव्य भोग प्राप्त होते हैं, उनके उपभोगके लिये वह शरीर भी धारण करता है या नहीं ? इसपर आचार्य बादरिका मत उपस्थित करते हैं— अभावं बादरिराह ह्येवम् ॥ ४ । ४ । १० ॥ अभावम्=उसके शरीर नहीं होता ऐसा; बादरिः=आचार्य बादरि मानते हैं; हि=क्योंकि; एवम्=इसी प्रकार; आह=श्रुति कहती है। व्याख्या—आचार्य बादरिका कहना है कि उस लोकमे स्थूल शरीरका अभाव है, अतः बिना शरीरके केवल मनसे ही उन भोगोंको भोगता है; क्योकि श्रुतिमे इस प्रकार कहा है—'स वा एष एतेन दैवेन चक्षुषा मनसैतान् कामान् पश्यन् रमते । य एते ब्रह्मलोके।' (छा० उ० ८ । १२ । ५, ६) 'निश्चय ही वह यह आत्मा इस दिव्य नेत्र मनके द्वारा जो ये ब्रह्मलोकके भोग हैं, इनको देखता हुआ रमण करता है।' इसके सिवा, उसका अपने दिव्यरूपसे सम्पन्न होना भी कहा है (८। १२। २)। दिव्य रूप स्थूल देहके बन्धनसे रहित होता है। इसलिये कार्यब्रह्मके लोकमे गये हुए मुक्तात्माके स्थूल शरीरका अभाव मानना ही उचित है। (८ । १३ । १)। सम्बन्ध—इस विषयमें आचार्य जैमिनिका मत बतलाते हैं— भावं जैमिनिर्विकल्पामननात् ॥ ४ । ४ । ११ ॥ जैमिनिः=आचार्य जैमिनि; भावम्=मुक्तात्माके शरीरका अस्तित्व मानते हैं; विकल्पामननात्=क्योंकि कई प्रकारसे स्थित होनेका श्रुतिमें वर्णन आता है। व्याख्या—आचार्य जैमिनिका कहना है कि 'मुक्तात्मा एक प्रकारसे होता है, तीन प्रकारसे होता है, पाँच प्रकारसे होता है, सात प्रकारसे, नौ प्रकारसे तथा ग्यारह प्रकारसे होता है, ऐसा कहा गया है।' (छा० उ० ७ । २६ । २) इस तरह श्रुतिमे उसका नाना भावोंसे युक्त होना कहा है, इससे यही सिद्ध होता है कि उसके स्थूल शरीरका भाव है अर्थात् वह शरीरसे युक्त होता है, अन्यथा इस प्रकार श्रुतिका कहना सङ्गत नहीं हो सकता।

सूत्र १०—१४ ] अध्याय ४ ३७७

सूत्र १०—१४ ] अध्याय ४ ३७७ सम्बन्ध—अब इस विषयमें आचार्य बादरायण अपना मत प्रकट करते हैं— द्वादशाहवदुभयविधं बादरायणोऽतः ॥ ४ । ४ । १२ ॥ बादरायणः=वेदव्यासजी कहते हैं कि; अतः=पूर्वोक्त दोनों मतोंसे; द्वादशाहवत्=द्वादशाह यज्ञकी भाँति; उभयविधम्=दोनों प्रकारकी स्थिति उचित है । व्याख्या—वेदव्यासजी कहते हैं कि दोनों आचार्योंका कथन प्रमाणयुक्त है; अतः उपासकके संकल्पानुसार शरीरका रहना और न रहना दोनों ही सम्भव हैं। जैसे द्वादशाह-यज्ञ श्रुतिमें कहीं अनेककर्तृक होनेपर 'सत्र' और नियत- कर्तृक होनेपर 'अहीन' माना गया है, उसी तरह यहाँ भी श्रुतिमें दोनों प्रकारका कथन होनेसे मुक्तात्माका स्थूल शरीरसे युक्त होकर दिव्य भोगोंका भोगना और बिना शरीरके केवल मनसे ही उनका उपभोग करना भी सम्भव है। उसकी यह दोनों प्रकारकी स्थिति उचित है, इसमें कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—बिना शरीरके केवल मनसे उपभोग कैसे होता है ? इस जिज्ञासा- पर कहते हैं— तन्वभावे सन्ध्यवदुपपत्तेः ॥ ४ । ४ । १३ ॥ तन्वभावे=शरीरके अभावमें; सन्ध्यवत्=स्वप्नकी भाँति ( भोगोंका उपभोग होता है ); उपपत्तेः=क्योंकि यही मानना युक्तिसंगत है । व्याख्या—जैसे स्वप्नमें स्थूल शरीरके बिना केवल मनसे ही समस्त भोगों- का उपभोग होता देखा जाता है, वैसे ही ब्रह्मलोकमें भी बिना शरीरके समस्त दिव्य भोगोंका उपभोग होना सम्भव है; इसलिये बादरायणकी यह मान्यता सर्वथा उचित ही है । सम्बन्ध—शरीरके द्वारा किस प्रकार उपभोग होता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— भावे जाग्रद्वत् ॥ ४ । ४ । १४ ॥ भावे=शरीर होनेपर; जाग्रद्वत्=जाग्रत्-अवस्थाकी भाँति ( उपभोग होना युक्तिसंगत है )।