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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

सप्ततितमोऽध्यायः ६०१ दोःपन्मलेषु नासायां प्रथमावृत्तिरीरिता । गले नाभौ हृदि कुचपार्श्वपृष्ठेषु तत्पराः ॥१०॥ मूर्ध्वास्यनेत्रश्रवणघ्राणेषु च तृतीयकाः । दोःपादसंध्यंगुलिषु वेदावृत्त्या च विन्यसेत् ॥११॥ धातुप्राणेषु हृदये विन्यसेत्तदनन्तरम् । शिरोनेत्रास्यहृत्कुक्षिसोरुजंघापदद्वये ॥१२॥ एकैकशो न्यसेद्वर्णान्संत्रस्य क्रमशः सुधीः । न्यसेद्धृदंसोरुपदेष्वर्णान्वेदमितार्मन्तोः ॥१३॥ चक्रशंखगदांभोजपदेषु स्वस्वमुद्रया । शेषांश्च न्यासवयोऽयं विभूतिपञ्जरामिधः ॥१४॥ न्यसेन्मूलार्णमेकैकं सचंद्रं तारसम्पुटम् । अथवा वे नमोन्तेन न्यसेदित्यपरे जगुः ॥१५॥ तत्त्वन्यासं ततः कुर्याद्विष्णुभावप्रसिद्धये । अष्टाणॊऽष्टप्रकृत्यात्मा गदितः पूर्वसूरिभिः ॥१६॥ पृथिव्यादीनि भूतानि ततोऽहंकारमेव च । महांश्च प्रकृतिश्चैवेत्यष्टौ प्रकृतयो मताः ॥१७॥ पादे लिंगे हृदि मुखे मूर्ध्नि वक्षसि हृत्स्थले । सर्वांगे व्यापकं कुर्यादेकेन साधकात्तमः ॥१८॥ मंत्वारंणहृत्परायाद्यमात्मने हृदयांतिकम् । तत्तन्नाम समुच्चार्य्य न्यसेत्तत्तत्स्थले बुधः ॥१९॥ अयं तत्त्वाभिधो न्यासः सर्वंन्यासोत्तमोत्तमः । मूर्तीर्न्यसेद्द्वादश वै द्वादशादित्यसंयुताः ॥२०॥ द्वादशाक्षरवर्णांया द्वादशादित्यसंयुताः । अष्टाणोऽयं मनुश्चाष्टप्रकृत्यात्मा समीरतः ॥२१॥ तासामात्मचतुष्कस्य योगादकार्क्षरी भवेत् । ललाटकुक्षिहृत्कंठदक्षपार्श्वां सकेषु च ॥२२॥ गले च वामपाश्वां सगलपृष्ठेण्वनन्तरम् । ककुद्यपि न्यसेन्मती मूर्तीद्वादश वै क्रमात् ॥२३॥ यह द्वितीय आवृत्ति बताई गई है । मूर्धा, मुख, दोनों नेत्र, दोनों श्रवण तथा नासिका छिद्रों में मन्त्राक्षरों का न्यास करे । यह तृतीय आवृत्ति है ॥९-१०॥ दोनों भुजाओं और पैरों को सटी हुई अंगुलियों में चौथी आवृत्ति का न्यास करे । धातु, प्राण और हृदय में पांचवीं आवृत्ति का न्यास करे । सिर, नेत्र, मुख और हृदय, कुक्षि, ऊरु, जंघा तथा दोनों पैरों में विद्वान् पुरुष एक-एक करके क्रमशः मन्त्र-वर्णों का न्यास करे । (यह छठी, सातवीं, आठवीं आवृत्ति है) हृदय, कंधा, ऊरु तथा चरणों में मन्त्र के चार वर्गों का न्यास करे शेष वर्णों का चक्र, शंख, गदा ओर कमल की मुद्रा बनाकर उनमें न्यास करे (यह नवम, दशम आवृत्ति है) ॥११-१३३॥ यह सर्वश्रेष्ठ न्यास विभूति-पञ्जर नाम से विख्यात है । मूल के एक-एक अक्षर को अनुस्वार से युक्त करके उसके दोनों ओर प्रणव का सम्पुट लगा कर न्यास करे अथवा आदि में प्रणव और अन्त में नमः लगाकर मन्त्राक्षरों का न्यास करे । ऐसा दूसरे विद्वानों का कथन है ॥१४-१५॥ तत्पश्चात् विष्णुभाव की सिद्धि के लिए तत्त्वन्यास करे । पहले के विद्वानों ने अष्टाक्षर मन्त्र और आठ प्रकृतियों को इसका स्वरूप बताया है । पृथिवी, जल, वायु, आकाश, अग्नि, अहंकार, महत् तथा प्रकृति - ये आठ प्रकृतियां कहलाती हैं । पैर, लिंग, हृदय, मुख, मस्तक, वक्ष, हृदयस्थल और सर्वाङ्ग में एक हो अष्टाक्षर मन्त्र से साधक व्यापक न्यास करे । विद्वान् व्यक्ति मन्त्राक्षर, नमः परापाद्य और आत्मने नमः के साथ तत्तत् नामों का उच्चारण करके तत्तत् स्थानों में न्यास करे । यह तत्त्व नामक न्यास सभा न्यासों में श्रेष्ठ है ॥१६-१९३॥ तदनन्तर बारह आदित्यों सहित द्वादश मूर्तियों का न्यास करे । ये बारह मूर्तियाँ आदि में द्वादशाक्षर के एक-एक मन्त्र से युक्त होती हैं और इनके साथ बारह आदित्यों का संयोग होता है । यह अष्टाक्षर-मन्त्र अष्टप्रकृतिरूप बताया गया है ॥२०-२१॥ इनके साथ चार आत्मा (आत्मा, अन्तरात्मा, परमात्मा तथा ज्ञानात्मा) का योग होने से द्वादशाक्षर होता है । ललाट, कुक्षि, हृदय, कण्ठ, दक्षिण पाश्वं, दक्षिण अंस, गलदक्षिणभाग, वाम पार्श्व, वाम अंस, गल-वामभाग, पृष्ठभाग तथा ककुद्-इन बारह अंगों में मन्त्रसाधक क्रमशः बारह मूर्तियों ७६ ना० पु०

६०२ नारदीयपुराणम् धात्रा तु केशवं न्यस्येदर्थम्णं नारायणं पुनः । मित्रेण माधवं न्यस्य गोविन्दं वरुणेन च ॥२४॥ विष्णुं चेशौंगुना युक्तं भगेन मधुसूदनम् । न्यसेद्विवस्वता युक्तं त्रिविक्रममतः परम् ॥२५॥ वामनं च तथैन्द्रेण पूष्णा श्रीधरमेव च । हृषीकेशं न्यसेत्पर्जन्यकिरीटमनुना सुधीः ॥२६॥ त्वष्ट्रा युतं पद्मनाभं दामोदरं च विष्णुना । द्वादशार्णं ततो मंत्रं समस्ते शिरसि न्यसेत् ॥२७॥ व्यापकं विन्यसेत्पश्चात्किरीटमनुना सुधीः । ध्रुवःकिरीटकेयूरहारांते मकरेति च ॥२८॥ कुंडलांते चक्रशंखगदांतेऽम्भोजहस्ततः । पीतांबरांते श्रीवत्सांकितवक्षःस्थलेति च ॥२९॥ श्रीभूमिसहितस्वात्मज्योतिर्मयमतः परम् । वदेद्दीप्तकरायति सहस्रादित्यतेजसे ॥३०॥ नमोन्तो वाणषड्वर्णः किरीटमनुरीरितः । एवं न्यासविधिं कृत्वा ध्यायेन्नारायणं विभुम् ॥३१॥ उदयत्कोट्यर्कसदृशं शंखं चक्रं गदांबुजम् । दधतं च करैर्लक्ष्मीभ्यां पार्श्वद्वयांचितम् ॥३२॥ श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कौस्तुभामुक्तकन्धरम् । हारकेयूरवलयांगदं पीतांबरं स्मरेत् ॥३३॥ वर्णलक्षं जपेन्मंत्रं विधिवन्नियतेन्द्रियः । प्रथमेन तु लक्षेण स्वात्मशुद्धिर्भवेद् ध्रुवम् ॥३४॥ लक्षद्वयजपेनाय मंत्रशुद्धिमवाप्नुयात् । लक्षत्रयेण जप्तेन स्वर्लोकमधिगच्छति ॥३५॥ विष्णोः समीपमाप्नोति वेदलक्षजपान्तरः । तथा च निर्मलं ज्ञानं पंचलक्षजपाद्भवेत् ॥३६॥ लक्षषष्ठेन चाप्नोति मंत्री विष्णौ स्थिरां मतिम् । सप्तलक्षजपान्मंत्रो विष्णोःसारूप्यमाप्नुयात् ॥३७॥ अष्टलक्षं जपेन्मंत्री निर्वाणमधिगच्छति । एवं जप्त्वा ततः प्राज्ञो दशांशं सरसीरुहैः ॥३८॥ का न्यास करे । केशव का धाता के साथ ललाट में न्यास करके, नारायण का अर्यमा के साथ कुक्षि में, माधव का मित्र के साथ हृदय में तथा गोविन्द का वरुण के साथ कण्ठकूप में न्यास करे ॥२२-२४॥ विष्णु का अंश के साथ, मधुसूदन का भग के साथ, त्रिविक्रम का विवस्वान् के साथ, वामन का इन्द्र के साथ, श्रीधर का पूषा के साथ और हृषीकेश का पर्जन्य के साथ न्यास करे । पद्मनाभ का त्वष्टा के साथ तथा दामोदर का विष्णु के साथ न्यास करे ॥२५-२६½॥ तत्पश्चात् द्वादशाक्षर मन्त्र का सम्पूर्ण सिर में न्यास करे । इसके बाद विद्वान् पुरुष किरीट मन्त्र के द्वारा व्यापक न्यास करे । किरीट मन्त्र प्रणव के अतिरिक्त पैंसठ अक्षर का बताया गया है--'ओं किरीटकेयूरहारमकरकुण्डलशंखचक्रगदाम्भोजहस्तपीताम्बरधरश्रीवत्साङ्कितवक्षःस्थलश्रीभूमिसहितस्वात्म- ज्योतिर्मयदीप्तकराय सहस्रादित्यतेजसे नमः ।' इस प्रकार न्यासविधि करके सर्वव्यापी भगवान् नारायण का ध्यान करे— जिनकी दिव्य कान्ति उदय-काल के कोटि-कोटि सूर्यों के सदृश है, जो अपनी चार भुजाओं में शंख, चक्र, गदा और कमल धारण करते हैं, भूदेवी तथा श्रीदेवी जिनके उभय पार्श्व की शोभा बढ़ा रही हैं, जिनका वक्षः स्थल श्रीवत्सचिह्न से सुशोभित है, जो अपने गले में चमकीली कौस्तुभमणि धारण करते हैं और हार, केयूर, वलय तथा अंगद आदि दिव्य आभूषण जिनके श्रीअंगों में पड़कर धन्य हो रहे हैं, उन पीताम्बरधारी भगवान् विष्णु का चिन्तन करना चाहिए ॥२७-३३॥ इन्द्रियों को वश में रखकर मन्त्र में जितने वर्ण हैं, उतने लाख मन्त्र का विधिवत् जप करे । प्रथम लाख मन्त्र के जप से निश्चय ही आत्मशुद्धि होती है । दो लाख जप पूर्ण होने पर साधक को मन्त्र-शुद्धि प्राप्त होती है । तीन लाख के जप से साधक स्वर्गलोग प्राप्त कर लेता है । चार लाख के जप से मनुष्य भगवान् विष्णु के समीप जाता है । पाँच लाख के जप से निर्मल ज्ञान प्राप्त होता है ॥३४-३६॥ छठे लाख के जप से मन्त्र-साधक की बुद्धि भगवान् विष्णु में स्थिर हो जाती है । सात लाख के जप से मन्त्रोपासक श्रीविष्णु का सारूप्य प्राप्त करता है । आठ लाख का जप पूर्ण कर लेने पर मन्त्र-जप करने वाला पुरुष निर्वाण (परम शान्ति एवं मोक्ष)

मधुराक्तैः प्रजुहुयात्संसकृते हव्यवाहने । मंडूकात्परतत्त्वांत् पीठे संपुज्य यत्नतः ॥३८॥ विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया योगा ततः परा । प्रह्वी सत्या तथेशानानुग्रहा नवमी मता ॥४०॥ तारो नमो भगवते विष्णवे सर्वभू ततः । तात्मने वासुदेवाय सर्वात्मिति पदं वदेत् ॥४१॥ संयोगयोगपद्मांते पीठाय हृदयांतिमः । षड्विंशदक्षरः पीठमंत्रोऽनेनासनं दिशेत् ॥४२॥ मूर्ति संकल्प्य मूलेन तस्यामावाह्य पूजयेत् । आदौ चांगानि संपूर्ज्य मंत्राणां केशरेषु च ॥४३॥ प्रागादिदिग्दले वासुदेवं संकर्षणं तथा । प्रद्युम्नमनिरुद्धं च शक्तीः कोणेष्वथाच॑येत् ॥४४॥ शांति श्रियं सरस्वत्या रति संपूजयेत्क्रमात् । हेमपोततमालेंद्रनीलामाः पीतवाससः ॥४५॥ चतुर्भुजाः शंखचक्रगदांभोजधरा इमे । सितकांचनगोगुग्धदूर्वावर्णश्च शक्तयः ॥४६॥ दलाग्रेषु चक्रशंखगदापंकजकौस्तुभान् । पूजयेन्मुसलं खङ्गं वनमालां यथाक्रमात् ॥४७॥ रक्ताजपीतकनकश्यामकृष्णसितार्जुनान् । कुंकुमाभं समभ्यर्चेद्बहिरग्रे खगेश्वरम् ॥४८॥ पार्श्वयोः पूजयेत्पश्चाच्छंखपद्मनिधी क्रमात् । मुक्तामाणिक्यसंकाशौ पश्चिमे ध्वजमर्चयेत् ॥४९॥ रक्तं विघ्नं तथाग्नये श्याममार्यं च राक्षसे । दुर्गां श्यामां वायुकोणे सेनान्यं पीतमेश्वरे ॥५०॥ को प्राप्त होता है। इस प्रकार जप करके विद्वान् पुरुष मधुराक्त कमलों द्वारा मन्त्रसंस्कृत अग्नि में दशांश होम करे । मण्डूक से लेकर परतत्त्व पर्यन्त सब का पीठ पर यत्नपूर्वक पूजन करे ॥३७-३९॥ विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्वी, सत्या, ईशान तथा नवीं अनुग्रहा—ये नौ पीठशक्तियाँ हैं ॥४०॥ (इन सबका पूजन करना चाहिए)। इसके बाद 'ओं नमो भगवते विष्णवे सर्वभूतात्मने वासुदेवाय सर्वात्मसंयोगपद्मपीठाय नमः' यह छत्तीस अक्षर का पीठमन्त्र है, इससे भगवान् को आसन देना चाहिए। मूल-मन्त्र से मूर्तिनिर्माण कर के उसमें भगवान् का आवाहन करके पूजा करे। पहले कमल के केसरों में मन्त्र सम्बन्धी छह अंगों का पूजन करना चाहिए। इसके बाद अष्टदल कमल के पूर्व आदि दलों में क्रमशः वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध का और आग्नेय आदि कोणों में क्रमशः उनकी शक्तियों का पूजन करे ॥४१-४४॥ उनके नाम इस प्रकार हैं—शान्ति, श्री, रति तथा सरस्वती । इनकी क्रमशः पूजा करनी चाहिए। वासुदेव की अंगकान्ति सुवर्ण के समान है। संकर्षण पीत वर्ण के हैं। प्रद्युम्न तमाल के समान श्याम और अनिरुद्ध इन्द्रनील मणि के सदृश हैं। ये सबके सब पीताम्बर धारण करते हैं। इनके चार भुजायें हैं। ये शंख, चक्र, गदा और कमल धारण करने वाले हैं। शान्ति का वर्ण श्वेत, श्री का वर्ण सुवर्ण-गौर, सरस्वती का रंग गोदुग्ध के समान उज्ज्वल तथा रति का वर्ण दूर्वादल के समान श्याम है। इस प्रकार ये सब शक्तियां हैं। कमल-दलों के अग्रभाग में चक्र, शंख, गदा, कमल, कौस्तुभमणि, मुसल, खड्ग और वनमाला का क्रमशः पूजन करे ॥४५-४७॥ चक्र का रंग लाल, शंख का रंग चन्द्रमा के समान श्वेत, गदा का पीला, कमल का सुवर्ण के समान, कौस्तुभ का श्याम, मुसल का काला, तलवार का श्वेत और वनमाला का उज्ज्वल है। इनके बाह्यभाग में भगवान् के सम्मुख हाथ जोड़कर खड़े हुए कुंकुम वर्ण वाले पक्षिराज गरुड़ का पूजन करे। तत्पश्चात् क्रमशः दक्षिण पार्श्व में शंख-निधि और वाम पार्श्व में पद्मनिधि की पूजा करे। इनका वर्ण क्रमशः मोती और माणिक्य के समान है। पश्चिम में ध्वज की पूजा करे ॥४८-४९॥ अग्निकोण में रक्तवर्ण के विघ्न (गणेश) का, नैर्ऋत्यकोण में श्याम वर्ण वाले आर्य का, वायव्यकोण में श्याम वर्ण दुर्गा का तथा ईशानकोण में पीतवर्ण के सेनानी का पूजन करना चाहिए। इनके बाह्यभाग में विद्वान् पुरुष इन्द्र आदि लोकपालों का उनके आयुधों सहित पूजन करे। जो इस प्रकार आवरणों सहित अविनाशी भगवान् विष्णु का पूजन करता है, वह इस

यहाँ पृष्ठ की पंक्ति-दर-पंक्ति देवनागरी लिपि में प्रतिलिपि प्रस्तुत है:

६०४ नारदीयपुराणम् लोकेशानायुधैर्युक्तान्बहिः संपूजयेत्सुधीः । एवमावरणैर्युकतं योऽर्चयेद्विष्णुमव्ययम् ॥५१॥ भुङ्क्त्वेह सकलान्भोगानंते विष्णुपदं व्रजेत् । क्षेत्रधान्यसुवर्णानां प्राप्तये धरणीं स्मरेत् ॥५२॥ देवीं दूर्वादलश्यामां दधानां शालिमंजरीम् । चिंतयेद्भारतीं देवीं वीणापुस्तकधारिणीम् ॥५३॥ दक्षिणे देवदेवस्य पूर्णचंद्रनिभाननाम् । क्षीराब्धिफेनपुंजामे वसानां श्वेतवाससी ॥५४॥ भारत्या सहितं यो वै ध्यायेद्देवं परात्परम् । वेदवेदार्थतत्त्वज्ञो जायते सर्ववित्तमः ॥५५॥ नारसिंहमिवात्मानं देवं ध्यात्वातिभैरवम् । शस्त्रं संमंथ्य मंत्रेण शत्रून्हत्वा निवर्तते ॥५६॥ नारसिंहेन बीजेन मंत्रं संयोज्य साधकः । शतमष्टोत्तरं जप्त्वा वामहस्ताभिमंत्रिताः ॥५७॥ पुनः पुनरपः सिंचेत्सर्पदष्टोऽपि जीवति । गारुडेन च संयोज्यपंचार्णेन जपेत्तदा ॥५८॥ निर्विषीकरणे ध्यायेद्विष्णुं गरुडवाहनम् । अशोकफलके तार्क्ष्यमालिख्याशोकसंहतौ ॥५९॥ अशोकपुष्पैःसंपूज्य भगवंतं तदग्रतः । जुहुयात्तानि पुष्पाणि त्रिसंध्यं सप्तपत्रकम् ॥६०॥ प्रत्यक्षो जायते पक्षी वरमिष्टं प्रयच्छति । गाणपत्येन संयोज्य जपेल्लक्षं पयोव्रतः ॥६१॥ महागणपतिं देवं प्रत्यक्षमिव पश्यति । दाणीबीजेन संयुक्तं षण्मासं योजयेन्नरः ॥६२॥ महाकविवरो भूत्वा मोहयेत्सकलं जगत् । हुत्वा गुडूचीशकलान्यर्द्धांगुलमितानि च ॥६३॥ दधिमध्वाज्ययुक्तानि मृत्युं जयति साधकः । शनैश्चरदिने सम्यक् स्पृष्ट्वाश्वत्थं च पाणिना ॥६४॥ जप्त्वा चाष्टशतं युद्धे ह्यपमृत्युं जयत्यसौ । पञ्चविंशतिधा जप्त्वा नित्यं प्रातः पिवेज्जलम् ॥६५॥ लोक में सम्पूर्ण भोगों का उपभोग करके अन्त में भगवान् विष्णु के धाम को जाता है ॥५०-५११/२॥ खेत, धान्य और सुवर्ण की प्राप्ति के लिए धरणी देवी का चिन्तन करे। उनकी कान्ति दूर्वादल के समान श्याम है और वे अपने हाथों में धान की बाल लिए रहती हैं। देवाधिदेव भगवान् के दक्षिणभाग में पूर्णचन्द्रमा के समान मुखवाली वीणापुस्तक धारिणी सरस्वती देवी का चिन्तन करे। वे क्षीर सागर के फेनपुञ्ज की भाँति उज्ज्वल दो वस्त्र धारण करती हैं। जो सरस्वती देवी के साथ परात्पर भगवान् विष्णु का ध्यान करता है, वह वेद और वेदांगों का तत्त्वज्ञ तथा सर्वज्ञों में श्रेष्ठ होता है ॥५२-५५॥ आत्मा का अत्यन्त भयानक नरसिंहदेव के रूप में ध्यान करके शस्त्र को (नरसिंह) मन्त्र से अभिमन्त्रित करने वाला व्यक्ति शत्रुओं को मारकर लौट आता है ॥५६॥ साधक नरसिंह बीज से मन्त्र को संयोजित कर के एक सौ आठ बार जप कर बायें हाथ से अभिमंत्रित किये गये जल से बार-बार सिञ्चन करे । ऐसा करने से साँप का डसा हुआ प्राणी भी जी जाता है। उस समय गरुड़ मन्त्र से जोड़कर पंचाक्षर मन्त्र का जप करे ॥५७-५८॥ विष रहित करने में गरुड़वाहन (भगवान्) विष्णु का ध्यान करना चाहिए। अशोक के काष्ठ पर गरुड़ की मूर्ति लिखकर अशोकवन में अशोकपुष्पों से भगवान् का पूजन करके उनके आगे उन पुष्पों से तीनों संध्या सात-सात पत्ते हवन करे ॥५९-६०॥ ऐसा करने से गरुड़ प्रत्यक्ष होकर वर प्रदान करते हैं। नरसिंह मन्त्र को गणपति-मन्त्र से युक्त करके एक लाख जप करे और दुग्धाहार करके रहे। ऐसा करने से साधक महागणेश देव को प्रत्यक्ष देखता है। उक्त मन्त्र को वाणी-बीज से युक्त करके छह मास जप करने पर साधक महान् कवि होकर सम्पूर्ण जगत् को मोहित कर लेता है ॥६१-६२१/२॥ आधे अंगुल के बराबर गुडूच के टुकड़े काटकर दही, मधु और घी में बोरकर हवन करने से साधक मृत्यु को जीत लेता है। शनिवार के दिन हाथ से पीपलवृक्ष का भली भाँति स्पर्श करके आठ सौ बार मन्त्र जपने से युद्ध में साधक अपमृत्यु को जीत लेता है। नित्य प्रातःकाल पचीस बार इस मन्त्र को जपकर जल पीने से साधक सभी पापों से मुक्त होकर नीरोग तथा ज्ञानी होता है ॥६३-६५१/२॥ कलश

१०५ सप्ततितमोऽध्यायः सर्वपापविनिर्मुक्तो ज्ञानवान् रोगवर्जितः । कुम्भं संस्थाप्य विधिवदापूर्यं शुद्धवारिणा ॥६६॥ जप्त्वायुतं ततस्तेनाभिषेकःसर्वरोगनुत् । चन्द्रसूर्यपरागे तु ह्युपोप्याष्टसहस्रकम् ॥६७॥ स्पृष्ट्वा ब्राह्मीघृतं जप्त्वा पिवेत्साधकत्तमः । मेधां कवित्वं वाक्सिद्धिं लभते नात्र संशयः ॥६८॥ जुहुयादयुतं बिल्वैर्महाधनपतिर्भवेत् । नारायणस्य मन्त्रोऽयं सर्वमन्त्रोत्तमोत्तमः ॥६६॥ आलयः सर्वसिद्धीनां कथितस्तव नारद । नारायणाय शब्दान्ते विद्महे पदमोरयेत् ॥७०॥ वासुदेवपदं ङेन्तं धीमहीति ततो वदेत् । तन्नो विष्णुः प्रचोवर्णान्संवदेच्चोदयादिति । ७१॥ एषोक्ता विष्णुपायत्री सर्वपापप्रणाशिनी । तारो हृद्भगवान् ङेन्तो वासुदेवाय कीर्तितः ॥७२॥ द्वादशार्णो महामन्त्रो मुक्तिमुक्तिप्रदायकः । स्त्रीशूद्राणां वितारोऽयं सतारस्तु द्विजन्मनाम् ॥७३॥ प्रजापतिर्मुनिश्वास्य गायत्री छन्द ईरितः । देवता वासुदेवस्तु बीजं शक्तिश्च वश्च हृत् ॥७४॥ चन्द्राक्षिवेदपञ्चार्णैः समस्तैर्नाङ्गकल्पनम् । मूर्ध्नि भाले दृशोरास्ये गले दोर्हृदये पुनः ॥७५॥ कुक्षौ नाभौ ध्वजे जानुद्वये पादद्वये तथा । न्यसेत्क्रमात् मन्त्रवर्णान्सृष्टिन्यासोऽयमीरितः ॥७६॥ हृदादिमस्तकान्तं तु स्थितिन्यासं प्रचक्षते । पादादारभ्य मूर्द्धानं न्यासं संहारकं विदुः ॥७७॥ तत्त्वन्यासं ततः कुर्यात्सर्वतन्त्रेषु गोपितम् । जीवं प्राणं तथा चित्तं हृत्पद्मं सूर्यमण्डलम् ॥७८॥ चन्द्राग्निमण्डले चैव वासुदेवं ततः परम् । संकर्षणं च प्रद्युम्नमनिरुद्धं ततः परम् ॥७६॥ नारायणं चक्रमतस्तत्त्वानि द्वादशैव तु । मूलार्णहृत्परायाद्यमात्मने हृदयांतिमम् ॥८०॥ स्थापित करके शुद्ध जल से उसे विधिपूर्वक भर दे । वहाँ दश हजार मन्त्र जप करने के उपरान्त उस जल से अभिषेक करने पर सब रोग दूर हो जाते हैं । चन्द्र-सूर्य-ग्रहणों में उपवास करके ब्राह्मीघृत का स्पर्श करने के उपरान्त आठ हजार बार मन्त्र का जप करे । अनन्तर श्रेष्ठ साधक उस घृत को पी ले । ऐसा करने से मेधा (धारणशक्ति), कवित्वशक्ति तथा वाक्सिद्धि प्राप्त होती है, इसमें सन्देह नहीं ॥६६-६८॥ यह नारायण मन्त्र सब मन्त्रों में उत्तम से उत्तम है । नारद ! यह सम्पूर्ण सिद्धियों का घर है । अतः मैंने तुम्हें इसका उपदेश किया है। 'नारायणाय' पद के अन्त में 'विद्महे' पद का उच्चारण करे फिर 'ङे' विभक्त्यन्त 'वासुदेव' पद (वासुदेवाय) का उच्चारण करे । उसके बाद 'धीमहि' पद बोले । अन्त में 'तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्' इन अक्षरों का उच्चारण करे । यह (ओं नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्) विष्णुपायत्री बतायी गई है, जो सब पापों का नाश करने वाली है । तार (ओं), हृदय (नमः), भगवत् शब्द का चतुर्थी विभक्ति में एकवचनान्त रूप (भगवते) तथा (वासुदेवाय) यह द्वादशाक्षर (ओं नमो भगवते वासुदेवाय) महामन्त्र कहा गया है, जो भोग- मोक्ष देने वाला है । स्त्री और शूद्रों को बिना प्रणव के यह मन्त्र जपना चाहिए और द्विजातियों के लिए प्रणव सहित इसके जपने का विधान है ॥६९-७३॥ इस मन्त्र के प्रजापति ऋषि, गायत्री छन्द, वासुदेव देवताओं, बीज और नमः शक्ति है ॥७४॥ इस मन्त्र के एक, दो, चार और पाँच अक्षरों तथा सम्पूर्ण मन्त्र द्वारा पञ्चांग न्यास करना चाहिए । मस्तक, ललाट, नेत्र, मुख, गला, बाँह, हृदय, पेट, नाभि, लिंग, दोनों घुटनों तथा दोनों चरणों में क्रमशः मन्त्रवर्णों का न्यास करे- यह सृष्टिन्यास कहा गया है । हृदय से लेकर मस्तक तक न्यास करना स्थितिन्यास कहलाता है । पैर से लेकर मस्तक तक न्यास करने को संहारक न्यास कहते हैं । तदनन्तर तत्त्वन्यास करना चाहिए, जो सब तन्त्रों में गुप्त है । जीव, प्राण, चित्त, हृदयकमल, सूर्यमण्डल, अग्निमण्डल, चन्द्रमण्डल, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और नारायण- ये बारह तत्त्व हैं ॥७५-७९॥ मूल-मन्त्र के अक्षरों के उच्चारण के साथ 'पराय नमः' और 'हृदाय नमः' कह अपने नाम का उच्चारण करे और तदपश्चात् मस्तक आदि में क्रमशः न्यास करे । यहाँ भी पूर्वोक्त ध्यान ही करना चाहिए ।

६०६ नारदीयपुराणम् तत्त्वे नामसमुच्चार्य न्यसेन्मूर्द्धादिषु क्रमात् । पूर्वोक्तं ध्यानमत्रापि भानुलक्षजपो मनोः ॥८१॥ तद्दशांशं तिलैराज्यलोलितैर्हवनं चरेत् । पीठे पूर्वोदिते मन्त्री मूतिं संकल्प्य मूलतः ॥८२॥ तस्यामावाह्य देवेशं वासुदेवं प्रपूजयेत् । अङ्गानि पूर्वमभ्यर्च्य वासुदेवादिकास्ततः ॥८३॥ शान्त्यादिशक्तयः पूज्याः प्राग्वदिक्षु विदिक्षु च । तृतीयावरणे पूज्याः प्रोक्ता द्वादश मूर्तयः ॥८४॥ इंद्राद्यानायुधैर्युक्तान् पूजयेद्धरणीगृहे । एवमावरणैरिष्ट्वा पञ्चभिर्विष्णुमव्ययम् ॥८५॥ प्राप्नुयात्सकलानर्थानन्ते विष्णुपदे व्रजेत् । पुरुषोत्तमसंज्ञस्य विष्णोर्भेदचतुष्टयम् ॥८६॥ त्रैलोक्यमोहनस्तेषां प्रथमः परिकीर्तितः । श्रीकरश्च हृषीकेशः कृष्णश्चात्र चतुर्थकः ॥८७॥ तारः कामो रमा पश्चाद् ङेन्तः स्यात्पुरुषोत्तमः । वर्मास्त्राण्यग्निप्रियांतो मन्त्रो वह्नीन्दुवर्णवान् ॥८८॥ ब्रह्मा मुनिः स्याद्गायत्री छन्दः प्रोक्तोऽथ देवता । पुरुषोत्तमसंज्ञोऽत्र बीजशक्तोस्मरेदिरे ॥८९॥ भूचंद्रैकरसाध्यक्षिमंत्रवर्णैविभागशः । कृत्वांगानि ततो ध्यायेद्विधिवत्पुरुषोत्तमम् ॥९०॥ समुद्यदादित्यनिभं शंखचक्रगदांबुजैः । लसत्करं पीतवस्त्रं स्मरेच्छ्रीपुरुषोत्तमम् ॥९१॥ महारत्नौघखचितस्फुरत्तोरणमंडपे । मौक्तिकोघशमदमविराजितवितानके ॥९२॥ नृत्यद्देवांगनावृंदक्वणत्किंकिणिनूपूरे । लसन्माणिक्यवेद्यां तु दीप्ताकार्युततेजसि ॥९३॥ वृंदारकव्रातकिरीटाग्ररत्नाभिरर्चिते । नवलक्षं जपेन्मंत्रं जुहुयात्तद्दशांशतः ॥९४॥ उत्फुल्लैः कमलैः पीठे पूर्वोक्ते वैष्णवेऽर्चयेत् । एवमाराध्य देवेशं प्राप्नोति महतीं श्रियम् ॥९५॥ इसके बाद बारह लाख मन्त्र जप करे और उसका दशांश घृताक्त तिल से हवन करे। पूर्ववर्णित पीठ पर साधक मूर्ति की स्थापना कर उसमें मूलमन्त्र से देवों के स्वामी वासुदेव का आवाहन करके पूजन करे। पहले अङ्गदेवताओं की पूजा करे। तदनन्तर वासुदेवादिक तथा शान्त्यादिक शक्तियों की पूजा पूर्ववत् दिशाओं एवं दिशा-कोणों में करे। तीसरे आवरण में पूर्वोक्त बारह मूर्तियों की पूजा करनी चाहिए। भू-गृह में आयुध समेत इन्द्र आदि देवों की पूजा करे। इस प्रकार पाँच आवरणों से अविनाशी विष्णु का पूजन करके मनुष्य सकल पदार्थों को प्राप्त करता है और अन्त में विष्णुलोग को जाता है ॥८०-८५॥ पुरुषोत्तम नामधारी विष्णु के चार भेद हैं। उनमें त्रैलोक्य-मोहन पहला (भेद) है, श्रीकर दूसरा (भेद) हृषीकेश तीसरा (भेद) और कृष्ण चौथा (भेद) है। (इसका मन्त्र यह है—) ओं रं क्लीं श्रीं पुरुषोत्तमाय हुं फट् स्वाहा। इस मन्त्र के मुनि ब्रह्मा हैं, छंद गायत्री है, देवता पुरुषोत्तम हैं और बीज तथा शक्ति इरा है। भू (एक), चन्द्र (एक), एक, रस (छह), अक्षि (दो) और अक्षि (दो)—इन मन्त्र-वर्णों से अङ्गों का विभाग करके विधि- पूर्वक पुरुषोत्तम का ध्यान करे। उगते हुए सूर्य के समान, हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये हुए तथा पीत वस्त्र पहने हुए पुरुषोत्तम का स्मरण करे। वे बहुमूल्यक रत्न-समूह से जड़े हुए तथा चमकते हुए तोरणों (बन्दनवारों) से युक्त मण्डल में, जहां मोतियों से शोभायमान चन्दवे लगे हुए हैं और जहां नृत्य करती हुई देवांगनाओं के घुंघरू के शब्द हो रहे हैं, मणियों के चबूतरे पर विराजमान हैं; दस हजार सूर्य के समान उनका तेज है; और देव-समूह के मुकुटों के अग्रभाग में लगे हुए रत्न से (उनके चरणारविन्द) शोभित हैं। ध्यानो- परान्त नौ लाख मन्त्र-जप करे और उसका दशांश हवन करे, फिर पूर्वोक्त वैष्णव पीठ पर लिखे हुए कमलों से वासुदेव की अर्चना करे। इस प्रकार देवेश (वासुदेव) की आराधना करने से मनुष्य को महान् श्री, पुत्र, पौत्र, यश, कांति, भुवित तथा मुक्ति की प्राप्ति होती है। ॥८६—९५॥

[Page Header: ६०७ / सप्ततितमोऽध्यायः]

पुत्रान्पौत्रान्यशः कांतिं भुक्तिं मुक्तिं च विंदति । उत्तिष्ठेति पदं पश्चाच्छ्रीकराग्नित्रियांतितः ॥९६॥ अष्टाणोऽस्य मुनिर्व्यासः पंक्तिश्छंद उदाहृतम् । श्रीकाराख्योहरिः प्रोक्तो देवता सकलेष्टदः ॥९७॥ भीषयद्वितयं हृत्स्यात् त्रासयद्वितयं शिरः । शिखा प्रमर्द्यद्वंद्वं वर्म प्रध्वंसयद्वयम् ॥९८॥ अस्त्रं रक्षद्वयं सर्वे हुमंताः समुदीरिताः । मस्तके नेत्रयोः कंठे हृदये नाभिदेशके ॥९९॥ ऊरुजंघांघ्रियुग्मेषु मंत्रवर्णान्क्रमात् न्यसेत् । ततः पुरुषसूक्तोक्तमंत्रैर्न्यासं समाचरेत् ॥१००॥ मुखे न्यसेद्ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीदिमं मनुम् । बाहुयुग्मे तथा बाहू राजन्य इति विन्यसेत् ॥१०१॥ ऊरू तदस्य यद्वैश्य इममूरुद्वये न्यसेत् । न्यसेत्पादद्वये मंत्री पद्भ्यां शूद्रो अजायत ॥१०२॥ चक्रं शंखं गदां पद्मं कराग्रेष्वथ विन्यसेत् । एवं न्यासविधिं कृत्वा ध्यायेत्पूर्वोक्तमण्डपे ॥१०३॥ अरुणान्जासनस्थस्य तार्क्ष्यस्योपरि संस्थितम् । पूर्वोक्तरूपिणं देवं श्रीकरं लोकमोहनम् ॥१०४॥ ध्यात्वैवं पूजयेदष्टलक्षं मंत्री दशांशतः । रक्तांबुजैः समिद्भिश्च विल्वक्षीरिद्रुमोद्भवैः ॥१०५॥ पयोऽन्नैः सर्पिषा हुत्वा प्रत्येकं सुसमाहितः । अश्वत्थोदुंबरप्लक्षवटाः क्षीरिद्रुमाः स्मृताः ॥१०६॥ पूजयेद्वैष्णवे पीठे मूर्ति संकल्प्य मूलतः । अंगावरणदिक्पालहेतिभिः सहितं विभुम् ॥१०७॥ इत्थं सिद्धे मनौ मंत्री प्रयोगान्पूर्ववच्चरेत् । तारो हृद्भगबान् डेंतो वराहेति ततः परम् ॥१०८॥ रूपाय भूर्भुवः स्वः स्याल्लोहितक्षामिका च ये । भूपतित्वं च मे देहि ददापय शुचिप्रिया ॥१०९॥ रामाग्निवर्णो मंत्रोऽयं भार्गवोऽस्य मुनिर्मतः । छन्दोऽनुष्टुब्देवतादिवराहः समुदीरितः ॥११०॥ एकदंष्ट्राय हृदयं व्योमोल्काय शिरः स्मृतम् । शिखा तेजोऽधिपतये विश्वरूपाय वर्म च ॥१११॥ महादंष्ट्राय चास्त्रं स्यात्पञ्चांगमिति कल्पयेत् । अथवा गिरिवद्वसबाणैर्वसुमिरक्षरैः ॥११२॥


'उत्तिष्ठ श्रीकर स्वाहा'—यह अष्टाक्षर मन्त्र है । इसके मुनि व्यास, छन्द पंक्ति और देवता सकल कामनावदायक श्रीकर हरि हैं । 'भीषय......समुदीरिताः' यह मन्त्र है । इसके अक्षरों का क्रमशः मस्तक, नेत्र, कंठ, हृदय, नाभि, ऊरु, जंघा तथा दोनों चरणों में न्यास करे । तत्पश्चात् पुरुषसूक्त-मन्त्रों से न्यास करे । 'ब्राह्मणो ऽस्य मुखमासीत्' इस मन्त्र का मुख में न्यास करे । 'बाहू राजन्यः' इस मन्त्र का दोनों भुजाओं में न्यास करे । 'ऊरू तदस्य यद्वैश्यः' इस मन्त्र का न्यास दोनों ऊरुओं में करे । और 'पद्भ्यां शूद्रो अजायत' इस मन्त्र का न्यास दोनों चरणों में करे । हाथों के अग्रभाग में चक्र, शंख, गदा और पद्म का न्यास करे ॥९६-१०२॥ इस प्रकार न्यास करके पूर्वोक्त मण्डप में गरुड़ पर लाल रंग के आसन पर विराजमान पूर्वोक्त रूप वाले लोक- मोहन श्रीकर देव का ध्यान करे । ध्यानाेपरान्त एक लाख मंत्र-जप करे । जप के दशांश लाल कमलों, विल्व और क्षीरी (दूध वाले) वृक्षों की समिधाओं, खीर तथा घी से मन की एकाग्रतापूर्वक हवन करे । पीपल, गूलर, पाकर तथा वरगद क्षीरी वृक्ष कहलाते हैं ॥१०३-१०६॥ वैष्णव पीठ पर मूलमंत्र से मूर्ति की स्थापना करके अङ्गदेवता, आवरणदेवता, दिक्पाल और उनके आयुधों के साथ भगवान् की पूजा करे । इस प्रकार मंत्र की सिद्धि हो जाने पर साधक पूर्ववत् (मंत्र का) प्रयोग करे । 'तारो हृत्......शुचिप्रिया' अर्थात् 'ओं नमो भगवते वराहाय रूपाय भूर्भुवः स्वः स्यात् । भूपतित्वं च मे देहि ददापय स्वाहा'—यह तैंतीस अक्षरों का मन्त्र है । इसके ऋषि भार्गव हैं, छन्द अनुष्टुप् है और देवता वराह हैं । एकदंष्ट्र के लिए हृदय, व्योमोल्क के लिए शिर, तेजोधिपति के लिए शिखा, विश्वरूप के लिए वर्म और महादंष्ट्र के लिए अस्त्र हो—यह कहकर पंचांगन्यास करे । अथवा इस श्रेष्ठ मन्त्र के विभाग—७,६,७,५ तथा ८ अक्षरों से पंचांग न्यास करे ॥१०७-११२½॥ तदनन्तर आदिवराह

६०८ नारदीयपुराणम् विभक्तेमंत्रवर्यस्य पञ्चांगानि प्रकल्पयेत् । ततो ध्यायेदनेकार्कनिभमादिवराहकम् ॥११३॥ आं ह्रीं स्वर्णनिभं जान्वोर्धो नाभेः सितप्रभम् । इष्टाभीतिगदाशंखचक्रशक्त्यसिखेटकान् ॥११४॥ दधतं च करैर्दंष्ट्राग्रलसद्धरांण स्मरेत् । एवं ध्यात्वा जपेल्लक्षं दशांशं सरसीरुहैः ॥११५॥ मध्वक्तैर्जुहुयात्पीठे पूर्वोक्ते वैष्णवे यजेत् । मूलेन मूर्ति सङ्कल्प्य तस्यां सम्पूजयेद्विभुम् ॥११६॥ अङ्गावरणदिक्पालहेतिक्षेत्राप्तसिद्धये । जपादेवादाति दद्याद्वलं धान्यं महीं श्रियम् ॥११७॥ सिंहार्क सितपक्षस्याष्टम्यां गव्येषु पञ्चसु । शिलां शुद्धां विनिक्षिप्य स्पृष्ट्वा तामयुतं जपेत् ॥११८॥ उदङ्मुखस्ततो मंत्री तां शिलां निखनेद्भुवि । भूतप्रेताहिक्षोरादिकृतां बाधां निवारयेत् ॥११९॥ प्रातर्भृगुदिने साध्यभूतलान्मृद्वथाहरेत् । मन्त्रितां मूलमन्त्रेण विसृजेत्तां त्रिधा पुनः ॥१२०॥ चुल्ल्यामेकं समालिप्यान्यदपरं पाकभाजने । गोदुग्धे परमालोड्य शोधितांस्तंदुलान् क्षिपेत् ॥१२१॥ सम्यक् शुद्धे शुचिः केशे जपन्मन्त्रं पचेच्चरुम् । अवतार्यचरुं पश्चाद्वह्नौ देयं यथाविधि ॥१२२॥ सम्पूज्य धूपदीपाद्यैः पश्चादाज्यप्लुतं चरुम् । जुहुयात्संस्कृते वह्नौ अष्टोत्तरशतं सुधीः ॥१२३॥ एवं प्रजुहुयान्मंत्री कविवारेषु सप्तसु । विरोधो नश्यति क्षेत्रे शत्रुचौराद्युपद्रवाः ॥१२४॥ भानूद्येऽथारवारे साध्यक्षेत्रान्मृदं पुनः । आदाय पूर्वविधिना हविरापाद्य पूर्ववत् ॥१२५॥ जुहुयादेधिते वह्नौ पूर्वसंख्याकमादरात् । एवं स सप्तारवारेषु जुहुयात्क्षेत्रसिद्धये ॥१२६॥ जुहुयाल्लक्षसंख्याकं गव्यैश्चैव सपायसैः । अभीष्टभूम्याधिपत्यं लभते नात्र संशयः ॥१२७॥ का ध्यान करे कि वे अनेको सूर्यों के समान (चमक रहे) हैं, उनका पैर सोने के समान है, नाभि और घुटनों के बीच का भाग उज्ज्वल है, हाथो में इष्ट, अभय, गदा, शंख, शक्ति, तलवार तथा खेटक नामक आयुधों को धारण किये हुए हैं और उनकी दंष्ट्रा के अग्रभाग पर पृथ्वी शोभायमान हो रही है इस प्रकार ध्यान करके एक लाख मंत्र-जप करे, उसका दशांश मधु मिले हुए कमलों से हवन करे । तदनन्तर पूर्वोक्त वैष्णव पीठ पर मूल मन्त्र से मूर्ति की स्थापना कर उसमें भगवान् की पूजा करे ॥११३-११६॥ अंगदेवता, आवरणदेवता, दिक्पाल तथा उनके आयुधों की भी पूजा करे । तत्पश्चात् मन्त्र का जप करते ही साधक को भूमि, धन, धान्य, राज्य तथा लक्ष्मी की प्राप्ति होने लगती है । सूर्य के सिंह राशि में जाने पर शुक्लपक्ष को अष्टमी तिथि में शिला को पंचगव्य में डालकर उसका स्पर्श करके दस हजार मन्त्र-जप करे । पश्चात् साधक उत्तर मुंह होकर उस शिला को भूमि में गाड़ दे । ऐसा करने से भूत, प्रेत, सांप, चोर आदि की बाधा शान्त हो जाती है ॥११७-११९॥ शुक्रवार के दिन प्रातःकाल साध्य (जहाँ साधना की जाय) भूमि से मृत्तिका ले आये । मूल मन्त्र पढ़कर उस मृत्तिका का तीन भाग करे । एक भाग को पात्र के ऊपर लेप दे और दूसरे भाग को पाकपात्र में गोदुग्ध और चावल के साथ छोड़ दे । पवित्र होकर मन्त्र-जप करते हुए चरु को पकाये । पश्चात् चरु को उतार कर पश्चात् विधिपूर्वक उसे अग्नि में छोड़े । धूप-दीप आदि से पूजन करने के उपरान्त घृताक्त चरु से संस्कार युक्त अग्नि में एक सौ आठ बार हवन करे ॥१२०-१२३॥ इस प्रकार साधक सात शुक्रवार को हवन करे । ऐसा करने से उसका विरोध नष्ट हो जाता है (अर्थात् कोई उसका विरोध नहीं करता) और क्षेत्र में शत्रु, चोर आदि के उपद्रव शान्त हो जाते हैं । मङ्गल के दिन सूर्योदय होने पर साध्य क्षेत्र से मृत्तिका लाकर पूर्वोक्त प्रकार से हवनसामग्री तैयार करके प्रज्वलित अग्नि में पूर्वोक्त संख्या के अनुसार आदरपूर्वक आहुति डाले । इस प्रकार सात मङ्गलवार को हवन करने से क्षेत्र-सिद्धि होती है । गोघृत मिले हुए खीर से एक लाख बार आहुति डालने से अभीष्ट भूमि का स्वामित्व प्राप्त होता है, इसमें

सप्ततितमोऽध्यायः ६०६ उद्यद्दोः परिघं दिव्यं सितदंष्ट्राग्रभूधरम् । स्वर्णाभं पार्थिवे पीते मंडले सुसमाहितः ॥१२८॥ ध्यात्वाप्नोति महीं रम्यां वराहस्य प्रसादतः । वारुणे मण्डले ध्यायेद्वाराहं हिमसंनिभम् ॥१२६॥ महोपद्रवशांतिः स्यात्साधकस्य न संशयः । वश्यार्थं च सदा ध्यायेद्धृष्टाभं वह्निमण्डले ॥१३०॥ ध्यायेद्देवं रिपूच्चाटे कृष्णामं वायुमण्डले । ह्रामण्डलगंत स्वच्छं वाराहं सर्वसिद्धिदम् ॥१३१॥ शत्रुभूतग्रहश्वेदामयपीडादिशांतये । भग्वर्ध्रीशयुतं व्योर्माविदुभूषितमस्तकम् ॥१३२॥ एकाक्षरो वराहस्य मन्त्रः कल्पद्रुमोऽपरः । पूजाद्र्य्यादिकं सर्वमस्यां पूर्वोक्तवच्चरेत् ॥१३३॥ सवामकणीनिद्रास्याद्वाराहाय हृदंतितः । ताराद्यो वसुवर्णोऽयं सर्वैश्वर्यप्रदायकः ॥१३४॥ ब्रह्मा मुनिः स्याद्गायत्री छन्दो वाराहसंज्ञकः । देवश्चंद्रैद्विभिन्नेत्रैः सर्वैर्वांगांगक्रिया मता ॥१३५॥ ध्यानपूजाप्रयोगादि प्राग्वदस्यापि कल्पयेत् । प्रणवादौ च ङेन्तं च भगवंतीति पदं ततः ॥ धरणिद्वितयं पश्चाद्धरेद्वयमुदीरयेत् ॥१३६॥ एकोनविंशत्यर्णाढयो मन्त्रो वह्निप्रियांतितः । वराहोऽस्य मुनिश्चन्दो गायत्री निव्यादादिका ॥१३७॥ देवता धरणी बीजं तारः शक्तिर्वसुप्रिया । रामवेदाग्निबाणाग्निनेत्राणैरंगकल्पनम् ॥१३८॥ श्यामां चित्रविभूषाढ्यां पद्मस्थां तुंगसुस्तनीम् । नीलांबुजद्वयं शालिमंजरीं च शुकं करैः ॥१३६॥ बध्रतीं चित्रवसनां धरां भगवतीं स्मरेत् । एवं ध्यात्वा जपेल्लक्षं दशांशं पायसेन तु ॥१४०॥ साज्येन जुहुयान्मन्त्री विष्णोः पीठे समर्चयेत् । मूर्ति संकल्प्य मूलेन तस्यां वसुमतीं यजेत् ॥१४१॥ अङ्गानि पूर्वमाराध्य भूवह्निजन्लमारुतान् । दिक्पातेषु च सम्पूज्य कोणपत्रेषु तत्कलाः ॥१४२॥ सन्देह नहीं ॥१२४-१२७॥ पीतवर्ण पृथ्वी-मण्डल पर भुजा उठाकर परिघ (लोहगदा) नामक अस्त्र तथा बड़े दांत के अग्रभाग पर पृथ्वी को धारण करने वाले और सुवर्ण जैसी कान्ति वाले वराह भगवान् का ध्यान कर के उनकी कृपा से सुन्दर पृथ्वी की प्राप्ति होती है। वरुण-मण्डल में सुवर्ण जैसी कान्ति वाले वाराह भगवान् का ध्यान करने से साधक की महान् विघ्न-बाधायें शान्त हो जाती हैं, इसमें संशय नहीं। वशीकरण-कार्य के लिए अग्निमण्डल में अग्निसदृश कान्ति वाले वाराह का ध्यान करना चाहिए। इसी तरह शत्रु का उच्चाटन करने के लिए वायुमण्डल में कृष्णकान्ति वाराह का ध्यान करना चाहिए। मण्डल से भिन्न स्थान में अवस्थित धवल वाराह सर्वसिद्धिदायक हैं। उनका ध्यान करने से शत्रु, भूत, ग्रह, युद्ध आदि कृत पीड़ा शान्त होती है ॥१२८-१३१॥ 'भृग्वर्धीशयुत'......यह एकाक्षर वाराह-मंत्र दूसरा कल्पद्रुम है (अर्थात् कल्पवृक्ष के समान अभीष्टफलदायक है) पूर्वोक्त प्रकार से इसकी पूजा-अर्चंना आदि सब कुछ करना चाहिए । सवामकणं........अर्थात् 'ॐ भूः वाराहाय नमः' यह अष्टाक्षर वाराहमंत्र सकल ऐश्वर्यदायक है । ब्रह्मा इसके ऋषि हैं, गायत्री छंद है और वाराह देवता हैं ॥१३२-१३४॥ १,१,४ और दो मंत्राक्षरों से अंगन्यास करना चाहिए । इस मंत्र का ध्यान, पूजा, प्रयोग आदि पूर्ववत् करना चाहिए । प्रणवादौ........अर्थात् 'ॐ भगवत्यै धरण्यै धरण्यै हरये हरये स्वाहा'-यह उन्नीस अक्षरों का मंत्र है । इस मंत्र के मुनि वाराह हैं, छंद निवृत् आदिक गायत्री है, देवता पृथ्वी है और शक्ति स्वाहा है । ३,४,३,५ दो एवं दो मंत्राक्षरों से इसका अंगन्यास करना चाहिए। तत्पश्चात् युवती नाना प्रकार के आभूषणों से सम्पन्न कमलों पर अवस्थित, उन्नत एवं सुन्दर स्तनों वाली, हाथो में दो नील कमल, धान की बाल तथा तोता धारण किये हुई और रंगबिरंगे वस्त्र पहने हुई भगवती पृथ्वी का ध्यान करे । ध्यानोपरान्त एक लाख मंत्र-जप करे और उसका दशांश घी सहित खीर से हवन करे । अनन्तर साधक विष्णूपीठ पर पृथ्वी की अर्चना करे । मूलमंत्र से प्रतिमा की स्थापना कर उसमें पृथ्वी की पूजा करे । पहले अंगदेवताओं की आराधना करके दिशाओं में भूमि, अग्नि, जल तथा वायु की और विदिशाओं में उनकी कलाओं की पूजा करे । निवृत्ति, प्रतिष्ठा ७७ ना० पु०

६१० नारदीयपुराणम् निवृत्तिश्च प्रतिष्ठा च विद्यानां तैश्च तत्कलाः । इंद्राद्यानपि वज्रादीन्पूजयेत्तदनंतरम् ॥१४३॥ एवं सिद्धे मनो मंत्री साधयेदिष्टमात्मनः । धरणीं प्रभजन्नेवं पशुरत्नांबरादिभिः ॥१४४॥ धरण्या वल्लभः स स्यात्सुखी जीवेच्छतं समाः । त्रैलोक्यमोहनो मंत्रो जगन्नाथस्य कीर्त्यते ॥१४५॥ तारः कामो रमा बीजं हृदंते पुरुषोत्तमः । श्रीकंठः प्रतिरूपांते लक्ष्मोति च निवासि च ॥१४६॥ सकलांते जगत्पश्चात्क्षोभणेति पदं वदेत् । सर्वस्त्रीहृदयांते तु विदारणपदं वदेत् ॥१४७॥ ततस्त्रिभुवनांतं तु मदोन्मादकरेति च । सुरासुरांते मनुजसुंदरीजनवर्णतः ॥१४८॥ मनांसि तापयद्वंद्वं दीपयद्वितयं ततः । शोषयद्वितयं पश्चान्म मारयद्वितयं ततः ॥१४९॥ स्तंभयद्वितयं भूयो मोहयद्वितयं ततः । द्रावयद्वितयं तावदाकर्षयुगं ततः ॥१५०॥ समस्तपरमो येन सुभगेन च संयुक्तम् । सर्वसौभाग्यशब्दांते करसर्वपदं वदेत् ॥१५१॥ कामप्रदादमुन्ब्रह्मासेंदुईनुयुगं ततः । चक्रेण गदया पश्चात्खड्गेन तदनंतरम् ॥१५२॥ सर्वबाणैर्भेदियुगं पाशेनांते कटद्वयम् । अंकुशेनेति संप्रोच्य ताडयद्वितयं पुनः ॥१५३॥ कुरुशब्दद्वयमथो कि तिष्ठसि पदं वदेत् । तावद्यावत्पदस्यांते समाहितमनंतरम् ॥ ततो मे सिद्धिरामास्यमवमन्ते च वर्म फट् ॥१५४॥ हृदंतोऽयं महामंत्रो द्विशताणंः समीरिताः । जैमिनिर्मु निरस्योक्तश्छंदश्चामितमीरितम् ॥१५५॥ देवता जगतां मोहे जगन्नाथः प्रकीर्तितः । कामो बीजं रमा शक्तिर्विनियोगोऽखिलाप्तये ॥१५६॥ पुरुषोत्तमत्रिभुवनोन्मादकातेऽग्निवमं च । हृदयं कीर्तितं पश्चाज्जगत्क्षोभणशब्दतः ॥१५७॥ लक्ष्मीदयितवर्मान्तः शिरः प्रोक्तं शिखा पुनः । मन्मथो तमशब्दांते मंगजे पदमीरयेत् ॥१५८॥ कामदायेति हुं प्रोच्य न्यसेद्वर्म ततः परम् । परमांते मृगकर्णाभ्यां च सर्वं पदं ततः ॥१५९॥ सौभाग्यकरवर्मा'ते कवचं परिकीर्तितम् । सुरासुरांते मनुजसुंदरीति पदं वदेत् ॥१६०॥ हृदयांते विदा पश्चाद्रणसर्वपदं वदेत् । ततः प्रहरणधरसर्वकामुकतत्पवम् ॥१६१॥ और विद्या उनकी कलायें हैं । अनन्तर इन्द्र आदि देवों और वज्र आदि आयुधों का पूजन करे । इस प्रकार मंत्र सिद्ध हो जाने पर साधक की अपनी कामना सफल होती है । जो पशु, रत्न तथा वस्त्र आदि से इस प्रकार पृथ्वी की आराधना करता है, वह पृथ्वी का स्वामी तथा सुखी होकर सौ वर्षों तक जीवित रहता है ॥१३५-१४४३॥ अब मैं जगन्नाथ का त्रैलोक्यमोहनो मंत्र बता रहा हूँ-'तार (ओं), काम (क्लीं), रमा (श्रीं) पुरुषोत्तमाय नमः' श्रीकण्ठप्रतिरूप, लक्ष्मोनिवास, सकलजगत्क्षोभण, सर्वस्त्रीहृदयविदारण, त्रिभुवनमदोन्मादकर, सुरासुर- मनुजसुन्दरीवणंतः मनांसि तापय तापय शोषय शोषय, मारय, मारय स्तम्भय स्तम्भय, भूयो मोहय-मोहय, द्रावय द्रावय, आकर्षय आकर्षय, सर्वसौभाग्यकर, कामप्रद अमुषु ब्रह्मा हनुं हनुं चक्रेण, गदया, खड्गेन, सर्वबाणैः भेदय भेदय, पाशेन अंकुशेन कटद्वयं ताडय ताडय, शब्दं कुरु शब्दं कुरु, किं तिष्ठसि तावत्-यावत् समाहितम्, मे सिद्धिराभास्यभवम् हुं फट् नमः' । यह दो सो अक्षरों का महामंत्र कहा गया है ॥१४५-१५४३॥ इस मंत्र के मुनि जैमिनी हैं, छंद अमित है, देवता जगन्नाथ हैं, क्लीं बीज है, श्रीं शक्ति है और अखिल वस्तु की प्राप्ति के लिए इसका विनियोग किया जाता है । पुरुषोत्तमत्रिभुवनोन्मादक अग्निवर्म--यह हृदयमंत्र कहा गया है । जगत्क्षोभण लक्ष्मीदयितवर्म--यह शिरो मंत्र कहा गया है। मन्मथः - यह शिखा-मंत्र है। इसके अन्त में 'मंगजे' पद का उच्चारण करे । फिर 'कामदाय हुम्' कहकर कवच का न्यास करे । परमभृगकर्णसर्वसौभाग्यकरवर्म-यह कवच- मंत्र कहा गया है । इसके अन्त में सुरासुरमनुजसुन्दरीहृदयवित्--और पश्चात् रणसर्वप्रहरणधरसर्वकामुक हन हन हृदयं

६११ सप्ततितमोऽध्यायः हन्द्युग्मं च हृदयं बंधनानि ततो वदेत् । आकर्षयद्वयं पश्चान्महाबलपदं ततः ॥१६२॥ वर्म चास्त्रं समाख्यातं नेत्रं स्यात्तदनंतरम् । वदेत्त्रिभुवनं पश्चाच्चर सर्वजनेति च ॥१६३॥ मनांसि हरयुग्मांते दारयद्वितयं च मे। वशमानय वर्मन्ति नेत्रमंत्रः समीरितः ॥१६४॥ षडंगमंत्रास्ताराद्याः फटनमोंताः प्रकीर्तिताः । तारस्त्रैलोक्यशब्दांते मोहनेति पदं वदेत् ॥१६५॥ हृषीकेशेति संप्रोच्याप्रतिरूपादिमन्मथं सर्वस्त्रीणां हृदयमीरयेत् ॥१६६॥ आकर्ष णपदा गच्छेदागच्छहृदयांतिमः । अनेन व्यापकं कृत्वा जगन्नाथं स्मरेत् सुधीः ॥१६७॥ क्षीराब्धेस्तु तटे रम्यं सुरद्रुमलतांचितम् । उद्यदर्कमुजालाभं'स्वधाम्नोज्जवालदिङ्मुखम् ॥१६८॥ प्रसुनावलिसौरभ्यमाद्यन्मधुकरारवम् । दिव्यवातोच्चलत्कंजपरागोधूलितांबरम् ॥१६६॥ स्वबंधूगीतमाधुर्याभिराम चिंतयेद्वनम् । तदंतर्मणिसम्पत्तिस्फुरत्तोरणमण्डपे ॥१७०॥ विलसन्मौक्तिकोद्दामदामराजद्वितानके । मणिवेद्यादिविव्यर्तिकरीटाग्रसमर्चिते ॥१७१॥ दिव्यसिंहासने विप्र समासीनं स्मरेद्विभुम् । शंखपाशेषु चापानि मुसलं नंदकं गदाम् ॥१७२॥ अंकुशं दधतं दोर्भिः श्लिष्टे कमलयोरसि । पश्यत्यंकस्थयांभोजश्रिया रागोल्लसद्दशा ॥१७३॥ ध्यात्वैवं प्रजपेल्लक्षचतुष्कं तद्दशांशतः । कुंडेऽर्द्धचंद्रे पद्मैर्वा जातीपुष्पैश्च होमयेत् ॥१७४॥ यागभूमि तथात्मानं यागोपकरणं तथा । पूजयिष्यन् जगन्नाथं गायत्र्या प्रोक्षयेद्बुधः ॥१७५॥ त्रैलोक्यमोहनायांते विद्महे पदमीरयेत् । स्मराय धीमहीत्युक्त्वा तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥१७६॥ गायत्र्येषा समाख्याता सर्वशुद्धिकरी परा । कल्पयेदासनं पीठे पूर्वोक्ते वैष्णवे सुधीः ॥१७७॥ बन्धनानि आकर्षय आकर्षय महाबलाय हुं--यह अस्त्र मंत्र कहा गया है। अनन्तर नेत्र-मंत्र होगा ॥१६५-१६२३॥ त्रिभुवनं चर, सर्वजनमनांसि हर हर दारय दारय वशमानय हुं-- यह नेत्र-मंत्र कहा गया है। आदि में ओं और अन्त में फट् लगाकर षडंग मंत्र बनाये जाते हैं। ओं त्रैलोक्यमोहन हृषीकेश अप्रतिरूपमन्मथ सर्वस्त्रीहृदयमाकर्षय गच्छ- दागच्छ नमः--इस मंत्र से व्यापक न्यास करके विद्वान् व्यक्ति जगन्नाथ का स्मरण करे ॥१६३-१६७॥ क्षीरसागर के तट पर एक रमणीय वन है । वहाँ देववृक्ष तथा कल्पलतायें फैल रही हैं। उगते हुए सूर्य की किरणें पहुँच रही हैं । वह अपने तेज की ज्वालाओं से दिशाओं को व्याप्त कर रहा है। वहाँ पुष्प-समूह की सुगंध से उन्मत्त होते हुए भौंरे गूंज रहे हैं । दिव्य वायु से हिलते हुए कमलों के पराग से आकाश उधूलित हो रहा है। अप्सराओं के गीत के माधुर्य से वह (वन) मनोरम लग रहा है । उसके बीच में मणि-सम्पदाओं से चमकते हुए बंदनवार वाले मण्डप में चमकती हुई मोतियों की मालाओं से शोभायमान वितान, (चंदवा) से युक्त ओर मणिजटित देव-मुकुटों के अग्रभाग से पूजित दिव्यसिंहासन पर बैठे हुए भगवान् (जगन्नाथ) का ध्यान करना चाहिए । वे हाथों में शंख, पाश, बाण, धनुष, मुसल, नन्दक, गदा तथा अंकुश धारण किये हुए हैं । उनका वक्षःस्थल लक्ष्मी से आलिंगित है । वे अंकस्थ कमल (माला) की श्री से लाल नेत्रों से देख रहे हैं ॥१६८-१७३॥ इस प्रकार ध्यान कर एक लाख मंत्र-जप करे और उसका दशांश अर्धचन्द्राकार कुण्ड में कमलों तथा जातीपुष्पों से हवन करे । अनन्तर विद्वान् जगन्नाथ की पूजा करने के लिए यज्ञभूमि, यज्ञसामग्री तथा अपने शरीर पर गायत्री मन्त्र से जल छिड़के । 'त्रैलोक्यमोहनाय विद्महे स्मराय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्' यह गायत्री मन्त्र सबको शुद्ध करने में श्रेष्ठ है। विद्वान् व्यक्ति पूर्वोक्त वैष्णव पीठ पर आसन की रचना करे ॥१७४-१७७॥

६१२ नारदीयपुराणम्

पक्षिराजाय ठद्वन्द्वं पीठमंत्रोऽयमीरितः । मूर्ति संकल्पमूलेन तस्यामावाहयेदतः ॥१७७॥ व्यापकन्यासमंत्रेण ततः सम्पूज्य भक्तितः । श्रीवत्सहृदयं तेन श्रीवत्सं स्तनयोर्यजेत् ॥१७८॥ कौस्तुभाय हृदंतेन यजेद्वक्षसि कौस्तुभम् । पूजयेद्वनमालायै हृदंतेन गले च ताम् ॥१७९॥ कर्णिकायां ततोऽभ्यर्च्यद्विधिवच्चांगदेवताः । दलेषु पूजयेत्पश्चाल्लक्ष्म्याद्यावृतचामराः ॥१८१॥ बन्धूककुसुमाभासो मुक्ताहारलसत्कुचाः । उत्फुल्लांभोजनयना मदविभ्रममंथराः ॥१८२॥ लक्ष्मी सरस्वती चैव धृतिः प्रीतिस्ततः परम् । कांतिः शांतिस्तुष्टिपुष्टिर्बोजाद्या ङेनमोंतिकाः ॥१८३॥ भृगुः खङ्गाशचन्द्राढयो देव्या बीजमुदाहृतम् । ह्रस्वत्रयक्लीबस्वर्रहितस्वरसंयुतम् ॥१८४॥ देव्या बीजं क्रमादासामादौ च विनियोजयेत् । दलाग्रेषु यजेच्छंखं शाङ्गं चक्रमसिं गदाम् ॥१८५॥ अंकुशं मुसलं पाशं स्वमुद्रामनुभिः पृथक् । महाजलचरायांत वर्म्मास्त्रं वह्निवल्लभा ॥१८६॥ पांचजन्या प्रताराद्यो नमोंतः शंखपूजने । शाङ्गय संशयांत च वर्म्मास्त्रं वह्निवल्लभा ॥१८७॥ शाङ्गय हृदयं मन्त्रो महाशः शाङ्गं पूजने । सुदर्शनमहांत तु चक्रराजपदं वदेत् ॥१८८॥ हययुग्मं सर्वदुष्टभयमन्ते कुरुद्वयम् । छिन्धिद्वयं ततः पश्चाद्विदारययुगं ततः ॥१८९॥ परमन्त्रान् ग्रसद्वन्द्वं भक्षयद्वितयं पुनः । भूतानि त्रासयद्वं द्वं वर्मफड्वह्नि सुंदरी ॥१९०॥ सुदर्शनाय हृदयं प्रोक्तश्चक्रार्चने मनुः । महाखङ्गतीक्षणपदाच्छिवियुग्मं समीरेयेत् ॥१९१॥ हुं फट् स्वाहा च खड्गाय नमः खङ्गार्चने मनुः । महाकौमोदकीत्यन्ते वदेच्चैव महाबले ॥१९२॥

'पक्षिराजाय स्वाहा' यह पीठ-मंत्र है। संकल्प के साथ मूर्ति की रचना करके उसमें इस मंत्र से आवाहन करे। तदनन्तर व्यापकन्यास के मंत्र से भक्तिपूर्वक पूजन कर 'श्रीवत्साय नमः' कहकर स्तनों पर श्रीवत्स-चिह्न की पूजा करे। 'कौस्तुभाय नमः' कहकर छाती पर कौस्तुभ मणि की पूजा करें। 'वनमालायै नमः' कहकर गले में वनमाला की पूजा करे। तत्पश्चात् कर्णिका पर अङ्गदेवताओं का विधिपूर्वक पूजन करके चामर लिये हुई लक्ष्मी आदि देवियों को पूजा करे ॥१७८-१८१॥ इन देवियों की कान्ति बंधूकपुष्प के समान और इनके कुच मोतियों की मालाओं से सुशोभित हैं इनके नेत्र विकसित कमल के तुल्य हैं और इनकी गति मद की उग्रता के कारण मंथर है। लक्ष्मी, सरस्वती, धृति, प्रीति, कान्ति, शान्ति, तुष्टि और पुष्टि--इन नामों के आदि में बीजमंत्र, अन्त में नमः और उससे पहले चतुर्थी विभक्ति को जोड़ देना चाहिए। भृगु (स्) अक्षर में अनुस्वार जोड़ने से देवी का बीजमंत्र बनता है। तीन ह्रस्व, नपुंसकलिंग तथा सवँरहित स्वर (निघात स्वर) से युक्त वह बीजमंत्र होता है। देवी के इस बीजमंत्र को क्रमशः लक्ष्मी आदि के पहले जोड़ देना चाहिए। अनन्तर पत्र के अग्रभाग पर शंख, धनुष, चक्र, खड्ग, गदा, अंकुश, मुसल तथा पाश का अपने-अपने मुद्रा-मंत्र से पृथक्-पृथक् पूजन करना चाहिए। 'महाजलचराय हुं फट् स्वाहा। ओं पाञ्चजन्याय नमः' इस मंत्र से शंख की पूजा करनी चाहिए ॥१८२-१८६॥

'शाङ्गय संशयाय हुं फट् स्वाहा। महाशाङ्गय नमः' यह कहकर धनुष की पूजा करनी चाहिए 'महासुदर्शन चक्रराज हययुग्मं कुरु कुरु सर्वदुष्टभयं छिन्धि छिन्धि विदारय विदारय परमंत्रान् ग्रस ग्रस भक्षय भक्षय भूतानि त्रासय त्रासय हुं फट् स्वाहा। सुदर्शनाय नमः' इस मंत्र से चक्र की पूजा करनी चाहिए। 'महाखड्ग तीक्ष्ण-शिवियुग्माय हुं फट् स्वाहा। खड्गाय नमः' इस मंत्र से खड्ग की पूजा करनी चाहिए ॥१८७-१९१॥ 'महाकौमोदकि महाबले सर्वासुरान्तके प्रसीद प्रसीद। हुं फट् स्वाहा। कौमोदक्यै नमः' यह सकल कामनादायक मंत्र कौमोदकी

सप्ततितमोऽध्यायः ६१३ सर्वासुरांतके पश्चात्प्रसीदयुगलेति च । वर्मास्त्रवह्निजायांतां कौमोदकि हृदंतिमः ॥१९३॥ कौमोदक्यर्चने प्रोक्तो मन्त्रः सर्वार्थसाधकः । महांकुशपदात्कुट्टयुग्मं हुं फट्द्वसुप्रिया ॥१९४॥ अंकुशाय नमः प्रोक्तो मन्त्रश्चैवांकुशार्चने । संवर्तकमहांते तु मुसलेति पदं वदेत् ॥१९५॥ योधयद्वितयं वर्म फडंते वह्निसुन्दरी । मुसलाय नमः प्रोक्तो मन्त्रो मुसलपूजने ॥१९६॥ महापाशपदाद्बंधद्वयमाकर्षयद्वयम् । हुं फट् स्वाहा च पाशाय नमः पाशार्चने मनुः ॥१९७॥ ताराद्या मनवो ह्येते ततः शक्रादिकान्यजेत् ॥१९८॥ वज्राद्यानपि संपूज्य सर्वसिद्धीश्वरो भवेत् । मासमात्रं तु कुसुमैः पूजयित्वा हयारिजैः ॥१९६॥ कुमुदैर्वा प्रजुहुयादष्टोत्तरसहस्रकम् । मासमात्रेण वश्यास्स्युस्तस्य सर्वे नृपोत्तमाः ॥२००॥ यस्य नाम युतं मंत्रं जपेदयुतसंख्यया । स भवेद्दासवत्सद्यो मंत्रस्यास्य प्रभावतः ॥२०१॥ बहुना किमिहोक्तेन मनुनानेन साधकः । साधयेत्सकलान्कामान्विष्णुतुल्यो न संशयः ॥२०२॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे सप्ततितमोऽध्यायः ॥७०॥

गदा की अर्चना के लिए कहा गया है । 'महांकुशकुट्टयुग्माय हुं फट् स्वाहा । अंकुशाय नमः' यह मंत्र अंकुश की पूजा के लिए कहा गया है । संवर्तकमहामुसल योधय योधय हुं फट् स्वाहा । मुसलाय नमः' यह मंत्र मुसल की पूजा में प्रयुक्त होता है । 'महापाश बन्ध बन्ध आकर्षय आकर्षय । हुं फट् स्वाहा पाशाय नमः' यह पाश-पूजन का मंत्र है । मंत्रों के आदि में (ओं) जोड़ देना चाहिए ॥१९२-१९७॥ तदनन्तर इन्द्र आदि देवों तथा उनके आयुधों की पूजा करके मनुष्य सकल सिद्धियों का स्वामी बन सकता है । एक मास तक करवीर तथा कुमुद के पुष्पों से पूजन करके एक हजार आठ बार हवन करे । मास भर ऐसा करने से बड़े-बड़े राजा वशीभूत हो जाते हैं । जिस व्यक्ति के नाम के साथ उक्त मंत्र को जोड़ कर दस हजार बार जप किया जाता है, वह (व्यक्ति) इस मंत्र के प्रभाव से तुरन्त दासवत् हो जाता है । बहुत क्या कहें, इस मंत्र के प्रभाव से साधक विष्णु के समान सकल मनोरथों को प्राप्त करता है, इसमें सन्देह नहीं ॥१९८-२०२॥ श्रीनारदीय पुराण के पूर्वभाग के तीसरे पाद में सत्तरवां अध्याय समाप्त ॥७०॥

अथैकसप्ततितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच शृणु नारद वक्ष्यामि दिव्यान्नरहरेर्मनून् । यान्समाराध्य ब्रह्माद्याश्चक्रुः सृष्ट्यादि कर्म वै ॥१॥ संवर्तकश्चंद्रमौलिर्मनुर्बिंदुविभूषितः । एकाक्षरः स्मृतो मंत्रो भजतां सुरपादपः ॥२॥ मुनिरत्रिश्च जगतो छंदो बुद्धिमतां वर । देवता नृहरिः प्रोक्तो विनियोगोऽखिलाप्तये ॥३॥ क्षं बीजं शक्तिरी प्रोक्ता षड्दीर्घेण षडंगकम् । अर्केन्दुवह्निनयनं शरदिन्दुरुचं करैः ॥४॥ धनुश्चक्राभयवरान्दधतं नृहरिं स्मरेत् । लक्षं जपस्तद्दशांशहोमश्च घृतपायसैः ॥५॥ यजेत्पीठे वैष्णवे तु केसरेष्वंगपुजनम् । खगेशं शंकरं शेषं शतानन्दं दिगालिषु ॥६॥ श्रियं ह्रियं धृतिं पुष्टिं कोणपत्रेषु पूजयेत् । दन्तच्छदेषु नृहरींस्तावत् पूजयेत्क्रमात् ॥७॥ कृष्णो रुद्रो महाघोरो भीमो भीषण उज्ज्वलः । कराळो विकराळश्च दैत्यांतो मधुसूदनः ॥८॥ रक्ताक्षः पिंगलाक्षश्चांजनो दीप्तरुचिस्तथा । सुघोरकश्च सुहनुर्विश्वको राक्षसांतकः ॥६॥ विशालको धूम्रकेशो हयग्रीवो घनस्वनः । मेघवर्णः कुंभकर्णः कृतांततीव्रतेजसौ ॥१०॥ अग्निवर्णो महोग्रश्च ततो विश्वविभूषणः । विघ्नक्षमो महासेनः सिंहा द्वात्रिंशदीरिताः ॥११॥ तद्बहिः प्रार्चयेद्विद्वांल्लोकपालान्सहेतिकान् । एवं सिद्धे मनौ मन्त्री साधयेदखिलेप्सितान् ॥१२॥


अध्याय ७१ नृसिंह मंत्रोपासना सनत्कुमार बोले-नारद ! सुनो, मैं नरहरि (नृसिंह) के दिव्य मंत्रों को बताता हूँ, जिनकी आराधना करके ब्रह्मा आदि देवों ने सृष्टि आदिकार्यों का संपादन किया ॥१॥ 'क्षौं' यह एकाक्षर मंत्र कहा गया है । वह अपने जप करने वालों के लिये कल्पवृक्ष के समान है ॥२॥ बुद्धिमानों में श्रेष्ठ ! उस मंत्र के मुनि अत्रि हैं, छंद जगती है और देवता नृहरि हैं। अखिल वस्तुओं की प्राप्ति के लिये उसका विनियोग किया जाता है ॥३॥ 'क्षं' बीज मंत्र है, 'ईं' शक्ति है और छह दीर्घ मात्राओं से षडंग मंत्र (क्षं क्षां क्षिं क्षीं क्षुं क्षं ) बनता है। (साधक) सूर्य, चन्द्र एवम् वह्नि रूप नेत्र वाले, शरद् ऋतु के चन्द्रमा के समान कान्ति वाले और हाथों में धनुष, चक्र तथा गदा धारण करने वाले नृहरि का स्मरण करे । तदुपरांत एकाक्षर मंत्र का एक लाख जप करे । घी तथा खीर से जप का दशांश हवन करे ॥४-५॥ वैष्णव पीठ में केसरों पर अंग देवताओं का पूजन करना चाहिये । दिशाओं में खगेश, शंकर, शेष तथा शतानंद की, विदिशाओं में श्री, ह्री, धृति तथा पुष्टि की और दन्तच्छदों (होंठों) में क्रमशः नृहरियों की आराधना करे ॥६-७॥ कृष्ण, रुद्र, महाघोर, भीम, भीषण, उज्ज्वल, कराल, विकराल, दैत्यान्त, मधुसूदन, रक्ताक्ष, पिंगलाक्ष, अंजन, दीप्तरुचि, सुघोरक, सुहनु, विश्वक, राक्षसांतक, विशालक, धूम्रकेश, हयग्रीव, घनस्वन, मेघवर्ण, कुंभकर्ण, कृतान्त, तीव्रतेजस्, अग्निवर्ण, महोग्र, विश्वविभूषण, विघ्नक्षम, महासेन और सिंह ये बत्तीस नरसिंह देवता माने गये हैं ॥८-११॥ इनके बाद विद्वान् साधक सांगोपांग लोकपालों का पूजन करे । इस प्रकार मंत्र की सिद्धि हो जाने पर साधक की सकल कामनायें सफल होती हैं ॥१२॥

६१५ एकसप्ततितमोऽध्यायः

विष्णुः प्रद्युम्नयुक् शाङ्गीं सानिविीरं महांस्ततः । विष्णुं ज्वलंतं भृग्वोशो जलं पद्मासनं ततः ॥१३॥ हरिस्तु वासुदेवाय वैकुंठो विष्णुसंयुतः । गदी सैदुंतृसिंहं च भीषणं भद्रमेव च ॥१४॥ मृत्युमृत्युं ततः शौरिर्भानोर्नारायणान्वितः । नृहरेर्द्वाविंशद्वर्णोऽयं मन्त्रः साम्राज्यदायकः ॥१५॥ ब्रह्मा मुनिस्तु गायत्री छंदोऽनुष्टुबुदाहृतम् । देवता नृहरिश्चास्य सर्वेटफलदायकः ॥१६॥ हं बीजं इं तथा शक्तिर्विनियोगोऽखिलाप्तये । वेदेशचतुर्भिर्वसुभिः षड्भिः षड्भिर्युगाक्षरैः ॥१७॥ षडंगानि विधायाथ मूर्ध्नि भाले च नेत्रयोः । मुखबाहू त्रिसंध्यग्रेष्वथ कुक्षौ तथा हृदि ॥१८॥ गले पार्श्वद्वये पृष्ठे ककुद्यर्णान्मन्द्भवान् । प्रणवांतरितान् कृत्वा न्यसेत्साधकत्तमः ॥१९॥ नृसिंहसान्निध्यकरो न्यासो दशविधो यथा । करांघ्रयष्टांगुलिषु पृथगाद्यंतपर्वणोः ॥२०॥ सर्वांगुलिषु विन्यस्यावशिष्टं तलयोर्न्यसेत् । शिरोललाटे भ्रूमध्ये नेत्रयोः कर्णयोस्तथा ॥२१॥ कपोलकर्णमूले च चिबुकोर्ध्वाधरोष्ठके । कण्ठे घोणे च भुजयोहृत्स्तनौ नाभिमण्डले ॥२२॥ दक्षान्पदस्तले कट्यां मेढ्रोर्वोर्जानुजंघयोः । गुल्फे पादकरांगुल्योः सर्वसंधिषु रामसु ॥२३॥ रक्तास्थिमज्जासु तनौ न्यसेद्वर्णान्विचक्षणः । वर्णान्पदे गुल्फजानुकटिनाभिहृदि स्थले ॥२४॥ बाह्वोः कंठे च चिबुके चौष्ठे गण्डे प्रविन्यसेत् । कर्णयोर्वदने नासापुटे नेत्रे च मूर्द्धनि ॥२५॥ पदानि तु मुखे मूर्ध्नि नसि चक्षुषि कर्णयोः । आस्ये च हृदये नाभौ पादान्सर्वांगके न्यसेत् ॥२६॥ अर्द्धद्वयं न्यसेन्मूर्ध्नि आहृत्यादात्तदंगकम् । उग्रादीनि पदानीह मृत्युमृत्युं नमाभ्यहम् ॥२७॥ इत्येतान्यास्यकन्नाणचक्षुः श्रोत्रेषु पक्ष्मसु । हृदि नाभौ च कटचादिपादांतं नवसु न्यसेत् ॥२८॥ वोराद्यानपि तान्येव यथापूर्वं प्रविन्यसेत् । नृसिंहाद्यानि तान्येव पूर्ववद्विन्यसेत्सुधीः ॥२९॥

"विष्णु........नारायणान्वितः"-यह बाईस अक्षरों वाला नृहरि का मंत्र साम्राज्यदायक है । इसके मुनि ब्रह्मा हैं, छंद गायत्री है जो अनुष्टुप् कहा गया है। देवता नृसिंह हैं, जो समस्त अभीष्ट फल देने वाले हैं ।।१३-१६।। 'हं' बीज है, 'इं' शक्ति है और सर्वप्राप्ति के लिये इसका विनियोग किया जाता है । उत्तम साधक को चाहिये कि वह चार-चार, आठ, छः छः ओर चार अर्थात् बत्तीस अक्षरों से षडंगन्यास कर मस्तक, ललाट, उभय नेत्र, मुख, बाहु, चरण, संधि, अग्रभाग, कुक्षि, हृदय, ग्रीवा, उभय पार्श्व, ककुद और पृष्ठ पर मंत्र के वर्णों को प्रणव (ओं) से संपुटित करके न्यास करे ।।१७-१९।। दश प्रकार के न्यास करने से नृसिह के सामीप्य की प्राप्ति होती है । कर, चरण आदि अंगों में, अंगुलियों में तथा अंगुलियों की आदिम एवम् अन्तिम पोरों में मंत्राक्षरों का विन्यास करके अवशिष्ट अक्षरों को दोनों हथेलियों पर न्यस्त करे । विद्वान् व्यक्ति शिर, ललाट, भौं के मध्य, उभय नेत्र, कर्ण, कपोल, कर्ण-मूल, ढुड्डी, अधर, ओष्ठ, कंठ, नासिकापुट, भुजा, हृदय, तनु, नाभिमंडल, चरणतल, कटि, लिंग, जंघा, घुटना, गुल्फ, हाथ-पैर की अंगुलियाँ, समस्त संधियाँ, रोएं, शोणित, अस्थियाँ और मज्जा--इतने अंगों में वर्णों का विन्यास करे । चरण, गुल्फ, जानु, कटि, नाभि, हृदय, बाहु, कंठ, ढुड्डी, ओष्ठ, कपोल, कर्ण, वदन, नासिकापुट, नेत्र तथा मस्तक पर वर्णों का और मुख, मस्तक, नासिका नेत्र, कर्ण, हृदय, नाभि एवम् अखिल अंगों में पदों का विन्यास करे ।।२०-२६।।

'आहृत्', 'पादात्' इन दो पदों का न्यास मस्तक पर करके "उग्र......अहम्"-इतने पदों को मुख, नासिका, नेत्र, कर्ण, पक्ष्म, हृदय, नाभि, कटि तथा चरण-इन नौ अंगों में विन्यस्त करे । सुधी जन "वीर" आदि एवम् "नृसिंह" आदि पदों का भी यथापूर्व विन्यास करके एक, तीन, चार, छः, तीन, दो, दश,

६१६ नारदीयपुराणम् चंद्राग्निवेदषड्रामनेत्रदिग्बाहुभित्तान् । विभक्तान्मंत्रवर्णांश्च क्रमात्स्थानेषु विन्यसेत् ॥२७॥ मूले मूलाच्च नाभ्यंतं नाभ्यादि हृदयावधि । हृदयाद्भूयुगांतं तु नेत्रत्रये च मस्तके ॥२८॥ बाह्वोरंगुलिषु प्राणे मूर्द्धादि चरणावधि । विन्यसेन्नामतो धीमान्हरिन्यासोऽयमीरितः ॥२९॥ न्यासस्यास्य तु माहात्म्यं जानात्येको हरिः स्वयम् । एवं न्यासविधिं कृत्वा ध्यायेच्च नृहरिं हृदि ॥३३॥ गलासक्तलसद्बाहु स्पृष्टकेशोऽब्जचक्रधृक् । नखाग्रभिन्नदैत्येशो ज्वालामालासन्वितः ॥३४॥ दीप्तजिह्वस्त्रिनयनो दंष्ट्रोग्रं वदनं वहन् । नृसिंहोऽस्मान्सदा पातु स्थलांबुगगनोपगः ॥३५॥ ध्यात्वैवं दर्शयेन्मुद्रां नृसिंहस्य महात्मनः । जानुमध्यगतौ कृत्वा चिबुकोष्ठौ समावुभौ ॥३६॥ हस्तौ च भूमिसंलग्नौ कंपमानः पुनः पुनः । मुखं विजृंभितं कृत्वा लेलिहानां च जिह्विकाम् ॥३७॥ एषा मुद्रा नार्सिही प्रधानेति प्रकीर्तिता । वामस्यांगुष्ठतो बद्धा कनिष्ठांगुलीत्रयम् ॥३८॥ त्रिशूलवत् संमुखोर्द्धे कुर्यान्मुद्रां नृसिंहगाम् । अंगुष्ठाभ्यां च करयोस्तथाऽऽक्रम्य कनिष्ठके ॥३९॥ अधोमुखाभिः शिष्टाभिः शेषाभिन्हरौ ततः । हस्तामधोमुखौ कृत्वा नाभिदेशे प्रसार्य च ॥४०॥ तर्जनीभ्यां नयेत्स्कंधौ प्रोक्ता चांत्रणमुद्रिका । हस्तावेकध्वंमुखौ कृत्वा तले संयोज्य मध्यमे ॥४१॥ अनामायां तु वामायां दक्षिणां तु विनिक्षिपेत् । तर्जन्यौ पृष्ठतो लग्नौ अंगुष्ठौ तर्जनीस्थितौ ॥४२॥ चक्रमुद्रा भवेदेषा नृहरेः संनिधौ मता । चक्रमुद्रा तथा कृत्वा तर्जनीभ्यां तु मध्यमे ॥४३॥ पीडयेद्दंष्ट्रमुद्रैषा सर्वपापप्रणाशिनी । एता मुद्रा नृसिंहस्य सर्वमंत्रेषु संमताः ॥४४॥

दो, एक अर्थात् बत्तीस मंत्रवर्णों का क्रमशः स्थानों में विन्यास करे जैसे पहले चरण-मूल में, मूल से नाभि तक, नाभि से हृदय तक, हृदय से भौंह तक, त्रिनेत्र, मस्तक, भुजा, अंगुलि, प्राण तथा शिर से चरण तक समस्त अंगों में नामनिर्देशपूर्वक न्यास करे । इसका नाम हरिन्यास है ॥२७-३२॥ इस न्यास का माहात्म्य एक साक्षात् हरि ही जानते हैं । इस प्रकार न्यास विधि को संपन्न कर हृदय में नृहरि का इस प्रकार ध्यान करे—"नृसिंह देव अपनी भुजाओं को गले से घुमा कर केशों को छू रहे हैं, हाथों में कमल तथा चक्र धारण किये हुए हैं, नखाग्र से दैत्य का विदारण किया है, ज्वाला के समान माला पहने हुए हैं, जिह्वा देदीप्यमान है, नेत्र तीन हैं, मुख में तीक्ष्ण दंष्ट्रा धारण किये हुए हैं । ऐसे नृसिंह, जो स्थल, जल तथा गगन में व्याप्त हैं, सदा हमारी रक्षा करें ॥३३-३५॥ इस तरह महात्मा नृसिंह का ध्यान कर मुद्रा दिखाये । उस मुद्रा में दोनों घुटनों के बीच मुख ले जाकर ठुड्डी और होंठ को सीधा रखे । फिर हाथों को भूमि पर रख कर शरीर को कंपाते हुए मुख को फैला कर जिह्वा को लपलपाये ॥३६-३७॥ यहो है प्रधान नारसिंही मुद्रा । बायें हाथ के अंगूठे से कनिष्ठा प्रभृति तीन अंगुलियों को सटा कर त्रिशूल की तरह ऊपर को उठाये । इसका नाम नृसिंहगामिनी मुद्रा है। दोनों हाथों के अंगूठों से दोनों कनिष्ठाओं को आक्रान्त कर अवशिष्ट अंगुलियों को अधोमुख करे फिर उभय हस्तो को नीचे करके नाभि देश में फैलाये । अनन्तर तर्जनियों से स्कंधों का स्पर्श करे । यह अंत्रणमुद्रा कहलाती है । हाथों को ऊर्ध्वमुख करके मध्यमाओं को हथेलियों से संयुक्त करे और बाँयी अनामिका के ऊपर दाहिनी अनामिका को रख दे । फिर अंगूठों को तर्जनियों के नीचे रख तर्जनियों को परस्पर संलग्न करे। इसका नाम चन्द्रमुद्रा है, जो नृहरि की संनिधि में की जाती है । उक्त प्रकार से चक्रमुद्रा दिखा कर निखिलपापनाशिनी 'दंष्ट्रमुद्रा करनी चाहिये, जिसमें तर्जनियों से मध्यमाओं का उत्पीड़न किया जाता है । नृसिंह की ये मुद्रायें सब्र यंत्रों में प्रदर्शित की जा सकती हैं ॥३८-४४॥

६१७ एकसप्ततितमोऽध्यायः

। घृताक्तैर्जुहुयाद्वह्नौ पीठे पूर्वोदितेऽर्चयेत् ॥४५॥ वर्णलक्षं जपेन्मंत्रं तद्दशांशं च पायसैः । गरुडादीन् श्रीमुखांश्च विदिक्षु लोकपान्बहिः ॥४६॥ अंगांग्यादौ समाराध्य दिक्पतेषु यजेत्पुनः । सौम्ये कार्ये स्मरेत्सौम्यं क्रूरं क्रूरे स्मरेद्बुधः ॥४७॥ एवं संसाधितो मंत्रः सर्वान्कामान्प्रपूरयेत् । निशितैर्नखदंष्ट्राग्रैः खाद्यमानं च संस्मरेत् ॥४८॥ पूर्वमृत्युपदे शत्रोर्नाम कृत्वा स्वयं हरिः । जायते मण्डलादर्वाक् [शत्रुवै शमनातिथिः ॥४६॥ अष्टोत्तरशतं नित्यं जपेन्मन्त्रमतन्द्रितः । श्रीकामः सततं ध्यायेत्पूर्वोक्तं नृहरिं सितम् ॥५०॥ ध्यानभेदानथो वक्ष्ये सर्वसिद्धिप्रदायकान् । विषमृत्यूपरोगोदिसर्वोपद्रवनाशनम् ॥५१॥ वामांकस्थितया लक्ष्म्यालिगितं पद्महस्तया । आंत्रमालाधरं रौद्रं कण्ठहारेण भूषितम् ॥५२॥ नरसिंहं महाभीमं कालानलसमप्रभम् । चन्द्रमौलि नीलकण्ठं प्रतिवक्त्रं त्रिनेत्रकम् ॥५३॥ नागयज्ञोपवीतं च पञ्चाननसुशोभितम् । अक्षसूत्रं गदापद्मं शंखं गोक्षीरसन्निभम् ॥५४॥ भुजैः परिघसंकाशैर्दशभिश्चोपशोभितम् । खड्गं शूलं च बाणं च नृहरिं रुद्ररूपिणम् ॥५५॥ धनुश्च मुशलं चैव बिभ्राणं चक्रमूत्तमम् । पूर्वादि चोत्तरं यावदूर्द्धास्यं सर्ववर्णकम् ॥५६॥ इन्द्रगोपामनीलाभं चन्द्राभं स्वर्णसन्निभम् । सर्वमृत्युहरं दिव्यं स्मरणात्सर्वसिद्धिदम् ॥५७॥ एवं ध्यात्वा जपेन्मंत्रं सर्वव्याधिविमुक्तये । सर्वलोकेशः सर्वाभरणभूषितः ॥५८॥ ध्यायेद्यदा महत्कर्म तदा षोडशहस्तवान् । नृसिंहः शङ्खचक्रधरौ द्वौ तु द्वौ च बाणधनुर्द्धरौ ॥५६॥ द्वौ विदारणकर्माण्तौ द्वौ चांग्लोद्धरणान्वितौ ।

मुद्रा लगाने के उपरान्त बत्तीस लाख मंत्र का जप कर उसका दशांश घृतमिश्रित पायस से पूर्वोक्त पीठ पर अग्नि में हवन करे । पहिले अङ्गदेवताओं का पूजन कर समस्त दिशाओं में श्री, गरुड़ आदि देवताओं की अर्चना करे । इस तरह मंत्र को सिद्ध कर लेने पर सकल कामनायें सफल हो जाती हैं । बुध जन मङ्गलमय कार्य में देवता के सौम्य रूप का ध्यान करे और क्रूरतापूर्ण कार्य में क्रूर रूप का । शत्रु के मारणकार्य में वैरी का नाम लेकर हरि के इस रूप का ध्यान करे कि वे अपनी तीक्ष्ण दंष्ट्रा एवम् नखों के अग्रभाग से शत्रु को विदीर्ण कर रहे हैं । ध्यान के उपरान्त निरालस्यपूर्वक एक सौ आठ बार मंत्र का जप नित्य किया करे । ऐसा करने से शत्रु शीघ्र ही यमपुरी पहुँच जाता है ॥४५-४९॥

अब मैं सकल सिद्धियों के देने वाले ध्यान के प्रभेदों को बतलाऊँगा । धन चाहने वाला मनुष्य सदा पूर्वोक्त प्रकार से शुक्लवर्ण वाले नृहरि का ध्यान करे, जिनके बायें अंक पर अवस्थित पद्महस्ता लक्ष्मी आलिंगन कर रही हैं । विष, अपमृत्यु, रोग एवम् निखिल उपद्रवों की शान्ति के लिये कालानल के समान प्रभा वाले, आँतड़ियों की माला धारण करने वाले, महाभयंकर रुद्ररूप, कंठों के हार से शोभित, सर्पों के यज्ञोपवीत से भूषित, पाँच मुखों से युक्त चन्द्रमौलि, नीलकंठ, प्रत्येक मुख में तीन-तीन नेत्र धारण करने वाले, परिघ (भाला) तुल्य दश भुजाओं से सुशोभित, रुद्राक्षमाला, गदा, पद्म, गाय के दूध के समान धवल शंख, धनुष, मुशल, चक्र, खड्ग, त्रिशूल एवम् बाण धारण करने वाले, १इन्द्रगोपा, नीलमणि, चंद्रमा तथा सुवर्ण के सदृश कान्ति वाले, पूर्व दिशा से लेकर उत्तर दिशा पर्यन्त ऊर्ध्वविस्तृत मुख वाले और सर्ववर्ण वाले नरसिंह का ध्यान करे । इस प्रकार ध्यान करने के बाद मंत्र जपने से अशेष व्याधियों एवम् अपमृत्युओं का नाश ओर सकल सिद्धियों की प्राप्ति होती है । जब कोई महत्त्वपूर्ण कार्य करना हो तो नरसिंह के इस रूप का ध्यान करे कि वे सकल लोकों के स्वामी, समस्त आभूषणों से विभूषित एवम् सोलह हाथों से युक्त हैं । उनके दो हाथ विदारण करने में लगे हुए हैं, दो आँतड़ियों


१. एक प्रकार का बरसाती कीड़ा जिसका रंग लाल होता है । ७८ ना० पु०

६१८ नारदीयपुराणम्

खड्गखेटधरौ द्वौ च द्वौ गदापद्मधारिणौ । पाशांकुशधरौ द्वौ च द्वौ रिपोर्मुकुटापितौ ॥६०॥ इति षोडशदोर्दण्डमण्डितं नृहरिं विभुम् । ध्यायेन्नारदनीलाभमुग्रकर्मण्यनन्यधीः ॥६१॥ ध्येयो महत्समे कार्ये द्वात्रिंशद्धस्तवान्बुधैः । नृसिंहः सर्वभूतेशः सर्वसिद्धिकरः परः ॥६२॥ दक्षिणे चक्रपद्मे च परशुं पाशमेव च । हलं च मुशलं चैव अभयं चांकुशं तथा ॥६३॥ पट्टिशं भिदिपालं च खड्गमुद्गरतोमरान् । वामभागे करैः शंखं खेटं पाशं च शूलकम् ॥६४॥ अग्निं च वरदं शक्तिं कुंडिकां च ततः परम् । कार्मुकं तर्जनीमुद्रां गवां डमरुशूर्पकौ ॥६५॥ द्वाभ्यां कराभ्यां च रिपोर्जानुमस्तकपीडनम् । ऊर्ध्वीकृताभ्यां बाहुभ्यां आंत्रमालाधरं विभुम् ॥६६॥ अधः स्थिताभ्यां बाहुभ्यां हिरण्यकविदारणम् । प्रियंकरं च भक्तानां दैत्यानां च भयंकरम् ॥६७॥ नृसिंहं तं स्मरेदित्यं महामृत्युभयापहम् । एवं ध्यात्वा जपेन्मन्त्रो सर्वकार्यार्थसिद्धये ॥६८॥ अथोच्यते ध्यानमन्यन्मुखरोगहरं शुभम् । स्वर्णवर्णसुपर्णस्थं विद्युन्मालासटान्वितम् ॥६६॥ कोटिपूर्णेन्दुवर्णं च सुमुखं त्र्यक्षिवीक्षणम् । पीतवस्त्रोरुभूषाढ्यं नृसिंहं शान्तविग्रहम् ॥७०॥ चक्रशंखाभयवरान्दधतं करपल्लवैः श्वेडरोगादिशमनं स्वैर्ध्यानैः सुरवन्दितम् । शत्रोः सेनानिरोधेन यत्नं कुर्याच्च साधकम् ॥७१॥ अक्षाकाष्ठैरेधितेऽग्नौ विचिंत्य रिपुमर्दनम् । देवं नृसिंहं संपूज्य कुसुमाद्युपचारकैः ॥७२॥ समूलमूलैर्जुहुयाच्छरैर्दशशतं पृथक् । रिपुं खादन्निव जपेन्निर्दहन्निव तं क्षिपेत् ॥७३॥


को निकाल रहे हैं, दो शत्रु के मुकुट को खींच रहे हैं, और दो धनुष बाण, दो खड्ग-खेट, दो गदा-पद्म तथा दो पाश-अंकुश धारण किये हुए हैं ॥५०-६०॥

नारद ! इस तरह तन्मय होकर सोलह भुजदंडों से मंडित नीलवर्ण हरि का उग्र कर्म में ध्यान करे । यदि अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य करना हो तो विद्वान् व्यक्ति बत्तीस हाथों वाले नरसिंह का ध्यान करे—"वे देव समस्त प्राणियों के अधीश्वर तथा सकलसिद्धिदायक हैं, जिनकी दाहिनी तरफ की भुजाओं में चक्र, पद्म, परशु, पाश, मुशल, अभय, अंकुश, पट्टिश, भिदिपाल, खड्ग, मुद्गर तथा तोमर और बाँयी ओर की बाहुओं में शंख, खेट, पाश, त्रिशूल, अग्नि, शक्ति, कुंडिका, धनुष, तर्जनीमुद्रा, गदा, डमरू एवम् शूर्प विद्यमान हैं। वे दो हाथों से शत्रु के घुटने तथा मस्तक को फोड़ रहे हैं, दो बाहुओं को ऊपर उठाकर अंतड़ियों की माला धारण कर रहे हैं। और दो हाथों को नीचे करके हिरण्यकशिपु का विदारण कर रहे हैं। वे भक्तों के प्रिय करने वाले, दैत्यों को भय देने वाले तथा महामृत्यु के भय को दूर करने वाले हैं।" इस प्रकार नरसिंह का ध्यान कर साधक सकल कार्यों की सिद्धि के लिये मंत्र का जप करे ॥६१-६८॥

एतदुपरान्त मुख-रोग को दूर करने वाले अन्य मांगलिक ध्यान को मैं बतलाता हूँ। सुवर्ण के समान वर्ण वाले गरुड़ पर अवस्थित, विद्युत् के सदृश चमकती हुई माला से सुशोभित, कोटि पूर्णचंद्र के समान कान्तिमान्, सुमुख, त्रिनेत्र, पीत वस्त्र एवम् विविध भूषणों से विभूषित, शान्त शरीर, करपल्लवों में चक्र, शंख, अभयास्त्र एवम् वरास्त्रधारण करने वाले और कफ आदि रोगों को दूर करने वाले देव वंदनीय नरसिंह का ध्यान करे । शत्रु की सेना के निरोध के निमित्त ऐसे ही रूप का ध्यान करना चाहिये ॥६९-७१॥ अनन्तर कुसुम आदि उपचारों से नरसिंह देव की अर्चना कर बहेड़े की लकड़ी से प्रज्वलित किये हुए अग्नि में कंद-मूलों से सौ बार हवन करे। 'मानो वे शत्रु को खा रहे हों'—ऐसे रूप का ध्यान करते हुए मन्त्र का जप करे और मानों वे रिपु को जला

६१८ एकसप्ततितमोऽध्यायः

हुत्वा सप्तदिनं मन्त्री सेनामिष्टां महीपतेः। प्रस्थापयेच्छुभे लग्ने परराष्ट्रजयेच्छया ॥७४॥ तस्याः पुरस्तान्नृहरिं निघ्नन्तं रिपुमण्डलम् । स्मृत्वा जपं प्रकुर्वीत यावदायाति सा पुनः ॥७५॥ निर्जित्य निखिलाञ्छत्रून्सह वीरश्रियासुखात् । प्रीणयेन्मन्त्रिणं राजा विभवैः प्रीतमानसः ॥७६॥ गजाश्वरथरत्नैश्च ग्रामक्षेत्रधनादिभिः । यदि मन्त्री न तुष्येत तदानर्थो महीपतेः ॥७७॥ जायते तस्य राष्ट्रेषु प्राणेभ्योऽपि महाभयम् । अष्टोत्तरशतं मूलमन्त्रमन्त्रितभस्मना ॥७८॥ नाशयेन्मूषिकालूतावृश्चिकायुत्थितं विषम् । लिप्तांगः सर्वरोगैश्च मुच्यते नात्र संशयः ॥७६॥ सेवंतीकुसुमैर्हुत्वा महतीं श्रियमाप्नुयात् । औदुम्बरसमिद्भिस्तु भवेद्धान्यसमृद्धिमान् ॥८०॥ अपूपलक्षहोमे तु भवेद्वैश्रवणोपमः । क्रुद्धस्य सन्निधौ राज्ञो जपेदष्टोत्तरं शतम् ॥८१॥ सद्यो नैर्मल्यमाप्नोति प्रसादं चाधिगच्छति । कुन्दप्रसूनैरुदयं मोचामिर्विघ्ननाशनम् ॥८२॥ तुलसीपत्रहोमेन महतीं कीर्तिमाप्नुयात् । शाल्युत्थसक्तुहोमेन वश्येदखिलं जगत् ॥८३॥ मधूकपुष्पैरिष्टं स्यात्स्तंभनं धात्रिखण्डकैः । दधिमध्वाज्यमिश्रां तु गुडूचीं चतुरंगुलाम् ॥८४॥ जुहुयादयुतं योऽसौ शतं जीवति रोगजित् । शनैश्चरदिनेऽश्वत्थं स्पृष्ट्वा चाष्टोत्तरं शतम् ॥८५॥ जपेज्जGeneralवा सोऽपमृत्युं शतवर्षाणि जीवति । अथ तं संप्रवक्ष्यामि यंत्रं त्रैलोक्यमोहनम् ॥८६॥ यस्य संधारणादेव भवेयुः सर्वसंपदः । श्वेतेभूर्जे लिखेत्पद्मं द्वात्रिंशत्सिंहसंयुतम् ॥८७॥

रहे हों—इस स्वरूप का संस्मरण करते हुए हवन करे। सात दिनों तक हवन करके दूसरे राष्ट्र के ऊपर विजय पाने की इच्छा से शुभ लग्न में अपनी सेना को चढ़ाई के लिये भेजे। पुनः जब तक वह सेना लौट कर आये तब तक रिपुसमूह का विध्वंस करने वाले नरसिंह का ध्यान-जप करते रहना चाहिये। निखिल शत्रुओं को जीत कर मंत्री के लौट आने पर प्रसन्नचित्त राजा मन्त्री को हाथी, घोड़े, रथ, रत्न, गाँव जागीर, धन आदि से पुरस्कार दे। क्योंकि यदि मंत्री असंतुष्ट रहेगा तो महीपति के लिये अनिष्ट होगा ॥७२-७७॥ उसके राष्ट्र में प्राणों पर संकट आएगा। एक सौ आठ बार भस्म को नरसिंह के मूलमंत्र से अभिमंत्रित कर देने से वह भस्म चूहों, कीड़े-मकोड़े, बिच्छू आदि के विष को नष्ट कर डालते हैं। अङ्गों में उसके लेप करने से सब रोग छूट जाते हैं, इसमें संशय नहीं। सेवंती पुष्पों से हवन करने से प्रचुर संपत्ति प्राप्त होती है। गूलर की समिधा से होम करने से धनधान्य की प्राप्ति होती है ॥७८-८०॥ पुए से एक लाख हवन करने से मनुष्य कुबेरतुल्य होता है। क्रुद्ध राजा के समीप एक सौ आठ बार जप करने से वह तुरन्त क्रोध का त्याग कर प्रसन्नता प्रकट करने लगता है ॥८१-८२॥ सेमल से हवन करने से उन्नति होती है। केले के फूलों से हवन करने पर विघ्नों का नाश होता है। कुन्द के पुष्पों के फूलों से होम करने से विघ्न का नाश होता है। तुलसी-पत्रों से हवन करने से महायश प्राप्त होता है। चावल के बने सत्तू से होम करने से संपूर्ण जगत् वशीभूत होता है ॥८३॥ दोपहरिया के फूलों से होम करने से इष्ट की प्राप्ति होती है और धात्री फलों से होम करने से (शत्रु का) स्तंभन होता है। जो व्यक्ति दधि, मधु तथा घृत मिश्रित चार अंगुल की गुडूची से दश हजार बार हवन करता है, वह आरोग्यपूर्वक सौ वर्ष जीता है ॥८४।। जो शनि दिन पीपल के वृक्ष का स्पर्श कर एक सौ आठ बार इस मंत्र का जप करता है, वह अपमृत्यु को जीत कर सौ वर्ष तक जीता है ॥८५३॥ अब मैं त्रैलोक्य को मोहित करने वाले यंत्र के बारे में तुमसे कहता हूँ, जिसके धारण करने से सकल सम्पत्तियां प्राप्त होती हैं। श्वेत भोज पत्र पर ३२ सिंह-मूर्तियों से युक्त कमल लिखे जो मनोहर तथा

६२० नारदीयपुराणम् मध्ये सिंहे स्वबीजं च लिखेत्पूर्ववदेव तु । श्रीबीजेन तु संवेष्ट्य वलयत्रयसंयुक्तम् ॥८८॥ पाशांकुशैश्च संवेष्ट्य पूजयेद्यंत्रमुत्तमम् । त्रैलोक्यमोहनं नाम सर्वकामार्थसाधनम् ॥८८½॥ चक्रराजं महाराजं सर्वचक्रेश्वरेश्वरम् । धारणाज्जयमाप्नोति सत्यं सत्यं न संशयः ॥९०॥ अथ यन्त्रांतरं वक्ष्ये शृणु नारद सिद्धिदम् । अष्टारं विलिखेद्यंत्रं श्लक्ष्णं कर्णिकया युतम् ॥९१॥ मूलमंत्रं लिखेत्तत्र प्रणवेन समन्वितम् । एकाक्षरं नारसिंहं मध्ये चैव ससाध्यकम् ॥९२॥ जपेदष्टसहस्रं तु सूत्रेणावेष्ट्य तद्बहिः । स्वर्णरौप्यमुताम्रैश्च वेष्टयेत्क्रमतः सुधीः ॥९३॥ लाक्षया वेष्टितं कृत्वा पुनर्मंत्रेण मंत्रयेत् । कंठे भुजे शिखायां वा धारयेद्यंत्रमुत्तमम् ॥९४॥ नरनारीनरेन्द्राश्च सर्वे स्युर्वशगा भुवि । दुष्टास्तं नैव बाधंते पिशाचोरगराक्षसाः ॥९५॥ यंत्रराजप्रसादेन सर्वत्र जयमाप्नुयात् । अथान्यत्संप्रवक्ष्यामि यंत्रं सर्ववशंकरम् ॥९६॥ द्वादशारं महाचक्रं पूर्ववद्विलिखेत्सुधीः । मात्राद्वादशसंभिन्नदलेन विलिखेद्बुधः ॥९७॥ मध्ये मंत्रं शक्तियुक्तं श्रीबीजेन तु वेष्टयेत् । कालांतकं नाम चक्रं सुरासुरवशंकरम् ॥९८॥ चक्रमुललेखयेद्भूर्जे सर्वशत्रुनिवारणम् । यस्य धारणमात्रेण सर्वत्र विजयी भवेत् ॥९९॥ अथ सर्वैष्टदं ज्वालामालिसंज्ञं वदाम्यहम् । बीजं हृद्भगवाञ्ङेतो नरं॑सिहाय तत्परम् ॥१००॥ ज्वालिने मालिने दीप्तदंष्ट्राय अग्निने पदम् । त्राय सर्वादिरक्षोघ्नाय च नः सर्वभूस्पदम् ॥१०१॥ हरिविनाशनार्थांते सर्वज्वरविनाशनः । नामांते दहयुग्मं च पचद्वयमुदीरयेत् ॥१०२॥ रक्षयुग्मं च वर्मास्त्रद्वयांतो ध्रुवादिकः । अष्टषष्ट्यक्षरैः प्रोक्तो ज्वालामाली मनूत्तमः ॥१०३॥ पुण्यादिकं तु पूर्वोक्तं त्रयोदशभिरक्षरैः । पंक्तिभी रुद्रसंख्याकैरष्टादशभिरक्षरैः ॥१०४॥

कर्णिका से युक्त हो । उस पर प्रणव युक्त मूल मन्त्र को लिख कर मध्य में साध्य सहित नरसिंह का एकाक्षर मन्त्र लिखे । उस मन्त्र का एक सहस्र जप कर सूत्र से कमल को लपेट दे । उसको फिर धीमान् व्यक्ति सुवर्ण, चाँदी, ताँबे तथा लाक्षा (लाह) से क्रमशः वेष्टित करे । अनन्तर उस उत्तम यन्त्र को मन्त्र से अभिमंत्रित कर गले में या बाहु में या शिखा में बांध ले । ऐसा करने से नर, नारी तथा नरेन्द्र उसके वशीभूत हो जाते हैं । दुष्ट पिशाच, सर्प तथा राक्षसों का उसे भय नहीं होता । यन्त्रराज की कृपा से उसकी सर्वत्र विजय होती है ॥८६-९५½॥ इसके बाद सब प्राणियों को वश में करने वाला दूसरा मन्त्र बतलाता हूँ । सुधी जन पहले की तरह द्वादशकोणयुक्त महाचक्र को लिखे । उसके ऊपर बारह मात्राओं से युक्त कमल को लिख कर मध्य में शक्तियुक्त मन्त्र को लिखे और उसे श्रीबीज में वेष्टित करे । उस चक्र का नाम कालांतक है, जो देवों तथा असुरों को वश में करने वाला है । उस चक्र को भोजपत्र पर लिखना चाहिये । वह समस्त शत्रुओं का निवारण करने वाला है। उसके धारण करने से सर्वत्र विजय होती है ॥९६-९९॥ अतःपर सकल कल्याणदायक ज्वालामाली नामक मंत्र को बतलाता हूँ। "बीजम्.......ध्रुवादिक" - यह अड़सठ अक्षरों वाला ज्वालामाली मंत्र सर्वोत्तम है । तेरह अक्षरों वाला पुण्यादिक मंत्र तो पहले ही बतला दिया गया है । साधक ग्यारह पंक्तियों, अट्ठारह अक्षरों और बारह करणों से अंगों की कल्पना करे । ज्वालामाली नरसिंह देव के पूर्वोक्त रूप का ध्यान कर एक लाख जप करे और उसका दशांश कैली गाय के घी से हवन करे । यह उत्तम मंत्र मिरगी आदि भयंकर रोगों तथा भूतादि बाधाओं को नष्ट करता है । "प्राणः........" यह छह अक्षरों वाला महामंत्र सकल कामनाओं को पूर्ण करने वाला है । इसके मुनि ब्रह्मा हैं, छंद पंक्ति है और देवता