भारतकोश
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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

टिप्पणी—(१) पौर—ब्राह्मण । (२) बाँभन—ब्राह्मण । (३) किसहुत—कहाँ से । (५) सहदेसी—अपने देश का । (६) बरैहि—बरोनियों से मूँहा क । ४२६ ( रीडिंग्स ३ ५८ ) गुफ्तने सिरजन बर्रैरे रुजाई इसा असीशन ( सिरजनक बरवाकौक कुसल समाचार कहना ) कँवरू माइ तोर महतारी। लोग कुँटुम घर मैना नारी ॥१ तोरैं चिन्त रैन दिन आहाँहिं। नैन पसार विहि मारग चाहहिं ॥२ अन पानि चरू टेरि न भावइ। बागहि रैन दिन नीँद न आवइ ॥३ पन्थ बगाऊ पूछहिं लोरा। फोउ न कहैं सकूसर तोरा ॥४ सोक सो (मैनामॉअर) भइ। झार विरह अधिक अरि गइ ॥५ दुइ ताहि न सोफ, लोर सँ जो दई न डराइ ।६ तजफे बारि पियाहुत आपन, लीन्हा (नारि) पराइ ॥७ मूलपाठ—( ) मैना बन भैनी मॉअर म् । (७) पुरुग् (प्रमंग फ अनुसार यह पाट सर्वथा असंगत है) । ४२७ ( रीडिंग्स ३ ५६ ; बम्बई ४२ ) कजियत आवर्दने बनिज गुफ्तन सिरजन पसु लोरक ( सिरजनक लाएकय अपने बनिजकी बात कहना ) हाँ र पनिज गापरा¹ लै आयउँ। भिरव लेन कौँ² कँवरू भुलायउँ ॥१ उगेय मंदिर अहौँ बसतारा³। अड उठलें कँ भया हँकारा ॥२ पूछसि कौन पनिज तुम्ह आनौँ । कौन दसहुते कियत पयानौँ ॥३ कहा दस धँ गागरौँ आयउँ । गय माँस दाइ पुरुष चलायउँ ॥४ कहा लार नम आपन ठाँऊँ । गाबर का बाँभन मिरजन नाऊँ ॥५

४. पलायन, वन-संकट, सर्प-दंश व विष-हरण (कड़वक ३०१-४००)

५२ मोहि कों कहा सिरजन, हरदीं संदेस तँ जाइँ ॥६ अननि छोर औ साँवरी, परी दोइ लै पाइ' ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—कैफियते गैरतजानये गुफ्तन पीछे लोरक पैगाम बेरासिनीये मैना (लोरकसे घरकी स्थिति और मैनाका सन्देश कहना) । १—ही र बनिज सुफर । २—सैर कहूँ । ३—पहुनहि सारा । ४— वहूँ । ५—देस सुख्ख । ६—कहेउँ बैठ मैं गोवर साठाथ । ७—साठाथ । ८—कहेउ तयव भौर आपन ठाउँ । —गवर क । १ —कँवल रागे धोयल जहर रची न जाइ । १०—अननि छोर आर साँवरि मैनाँ पाइ परी तै धाइ । टिप्पणी—(२) थनपारा—बैठक । तउक कै—टोकनेके लिए । पथा—साजनेवाले । (६) साँवरी—पत्नी । ४२८ (रौडंग्रहम १ र.म. ; बम्बई ४३) कधिउत गहु गहो जो तुम्ह पर यहँ बनिज अलाठाथ । मैना कहि मैं गोहन आटाथ ॥१ छाड़ि आँचर कर गहि रही । अति सुख पूरे बिरह कै दही ॥२ खोसिन' आँचर आइ छुड़ावा । कहि संदेस लोर तिहँ आवा' ॥३ महिं देखत लै पैठि फनारि । अस कहु आज मरतै काँठसारी ॥४ खोसिन घर घर करत अहा' । मैना देखु मरन कँ चहा' ॥५ बनिज छाड़ि मैं छावेउँ, मैना केर संदेस ।६ बेग आउ चलु गवर', लोरक तजु परदेस ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—कैफियते मैना गुफ्तन सिरजन बा फिराक हाल साब मयूसन (सिरजनका मैनाँकी हालत और उसकी बिरह अवस्था कहना) । (१) आँचर गहिऊ रही । २—सुएके बूड़ि । ३—लोसिन । ४— कहति करोउ जिउ पिठ आवा । —दोखिन काहूर करती अहा । —५ मरन पै चाहा । ७—यावरी । ८—तोर कण्ठु ।

२५१ ४२९ ( री०क्यू० ३ १७ ) बेफियते शिकस्तगीए हाले मैना गोयद ( मैना का दुख एवं कहना ) मैल चीर सिर तेल न जानइ । यह दुख लोरक तोर पखानइ ॥१ फइत सँदेस नैन झरि पानी । बरसहि मेघ जइस घरानी ॥२ बूँदि सरै थाह न पावा । करिया नहीं तीर को लावा ॥३ मैना रूप देख का देखेउँ । अउर रूप सर्वैसार न लेखेउँ ॥४ सब एक दिन फने अहारू । फूँहि पर जियइ जानि करतारू ॥५ रोअस नित कजको मैंन, मैना बिध अस औतारी ।६ नैन मूझि भर आँसु लोरक, तें हीउर माँझ सुतारी ॥७ ४३० ( री०क्यू० ३ ७८ : बम्बई १९ ) जारी कर्दने लोरक अज शुनीदने सुखारिये मैना ( मैनाकी दुरवस्था सुन कर लोरकका रोना ) सुनि संताप मैना कर रोवा । लोरक हिये' क कसभर धोवा ॥१ अप' मैना बिनु रही न जाइ । देइ' पँख बिध जौंडै उड़ाइ ॥२ जो न जाइ मैना मुख देखउँ । तो यह जीउँ मरन लँ लेखउँ ॥३ देवस गयउँ निसि आइ तुलानी । यौभन फइत न पात' घटानी ॥४ सिरजन जाइ सीम अन्हयावहि । लँ अपनों फिइँ जेठ फरावहि ॥५ दाम लाख दोइ देउहौं, परद सहस भरावहु ।६ मोर गवन दिन इमरे, तुम फुनि गोहन आवहु ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक-शुनीदन लोरक हाले बेहाकिये मैना व गिरिया कर्दैन बा दिगरक हाल बाज नमूदन (मैना की दुरवस्था सुन कर लोरकका रोना और अपनी स्थिति कहना) ३१

१२२ १-हिप । २-दैहु । ३-मंदिर । ४-बिसु सुरंग । ५-कै । ६-सौंभव बात कहत न । ७-सिरजन जाइ सँवर क आवहु । तैस मनपान करावहु । ८-दोर नीन्द करैमन । ९-दूगर । १०-पुनि । टिप्पणी-(१) कम्मर-कंकड़ । (६) दाम-ताँबे का सिक्का । सिक्के के इस नाम के सम्बन्ध में सामान्य धारणा रही है कि उसे पहले पहल अकबर ने प्रवर्तित किया था । इस कारण अमीर खुसरोके खालिकबारी में 'दाम' के उल्लेखके प्रमाणसे अनेक विद्वानोंने उसे अकबरकाल अथवा उसके पश्चात्की रचना सिद्ध करनेकी चेष्टा की है । किन्तु यह नाम अकबरसे पूर्व भी प्रचलित था । इस उल्लेखके अतिरिक्त अलाउद्दीन खिलजीके दिल्ली टंकशालके टंकशाली ठक्कुर फेरूके ग्रन्थ 'द्रव्य परीक्षा' से भी 'दाम' का पूर्व अस्तित्व प्रकट होता है । द्रव्य-परीक्षाके अनुसार चाँदीका टंक ६ दामके बराबर होता था । अकबरके समयम रुपयेका मूल्य ४० दाम था । आइन अकबरीसे ज्ञात होता है कि उस समय चाँदी-सोनेके सिक्कोंके बावजूद रामदरा सारा हिसाब-किताब दामोंमें ही रखा जाता था । सो राय दाम्भ के उपर्युक्त उल्लेखसे भी यह लगता है कि दिल्ली सुलतानोंके समयम भी लेन देन और व्यवहार में दामका ही अधिक प्रचलन था । देखैहौँ-ढूँढ़ना । बरइ-पैक । ४३१ ( रीफैन्ग्यूग ३ क : बरगई ५५ ) बाज आमदने लोरक बखाना व मुतफक्किर गश्तने चाँदौ अज खबरे मैना ( लोरकका घरके भीतर आना और चाँदॉका मैनाकी बात सुन कर परेशान होना ) मैनाँ बात जा सिरखन कही । सुनत चाँद राहु जनु गही¹ ॥१ पूनेउँ जस मुख दीपत अहा । गयी सो जोति छीन² होइ रहा ॥२ जब पुरुख अपन³ घर जाइह । सिंह रासि कहँ⁴ गगन चढ़ाइह ॥३ फिर लोर मंदिर महँ आवा । कहा⁵ चाँद चित भमउ परावा ॥४ उठि पानि लै पांइ⁶ पखारहि । तुम्ह बैठ⁷ औ पीर हँकारहि⁸ ॥५

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१२४ समुँद वीर कछु साथ तुम्ह चायहु । गोबर देखि पलटि घर आयहु ॥४ फाँद सिंहासन चाँद चलावा । इन्ह तखियाव फिरे हूँ (आवा) ॥५ बरद सहस एक सिन्धौ भरा । पाटन छाड़ि सींठ ऊतरा ॥५ राहु गरह यस गरहै, चाँदा मुख अँधियार ।६ मीन रासि बन बैरिन, सिरजन कै उपकार ॥७ मूलपाठ—(४) आये । टिप्पणी—(५) सिन्धौ—सैन्धव नमक । ४३४ ( तीर्थखण्ड ३१ ) गुशउने चाँदा लोरक रा ( चाँदका लोरकसे अनुरोध ) सवदु चाँद लोर सों कहा । पलट नीर गंगा नै वहा ॥१ फिरथि साइ सैं मा तोड़ै डोरी । जहवाँ टूटि फुनि तहमों जोरी ॥२ तिह नखोर हा सरग लुकानी । कै सनेह हरदीं तें मानी ॥३ तिह दिन संवर बाच जिह कीन्हे । अब लै गोबर महि दीन्हे ॥४ बास देइ धनि नाठ चढ़ाये । अब गुन फाटि गाँग बहाये ॥५ बहुरि लोर असु हरदी, रँहहिं वरिन दोइ पार ।६ माथा पुरवहु अपनें साँई, बिनवइ दासि तुम्हार ॥७ टिप्पणी—(१) सवदु—गीत पने । नै—समान । (७) पुरवहु—पूरा करो । साँई—स्वामी । बिनवइ—विनय करती है । ४३५ ( तीर्थखण्ड ३१।अ ) जवाव दाइने लोरक सर चाँदा रा ( लोरकका चाँदको उत्तर ) हाँ जानउँ राजा कें जाइ । अपनें हुतें तिह होत पराई ॥१ हौं अस जानउँ बन क जाती । मन न दगउत एकाँ राती ॥२

३९५ देस देसन्तर तिहि संग धाये । मनसँड गँबने घर न रहाये ॥३ गरह नवइ जिंहि होइ निराबा । तुम नखोर हम चाहत पावा ॥४ हम नारि मोरैं सग आवसि । जिंहि लाये घनि अपुनैं राखसि ॥५ मगर बुध बिरस्पत, सुकर सनीचर राहु ।६ चाँद् सुरुज लै जँधषा, बारह घरिह उतराहु ॥७ ४३६ (रीडिंग्स २११ क) रवान कर्दने लोरक व चाँदा सूये गोबर (गोबरकी ओर लोरक और चाँदका रवाना होना) सुरुज दिस्टि सिंह घर गये । मीन ठाँउँ हुत अँठये मये ॥१ सवन न फरै चाँद्र क कहा । संग बैठि छोइ लागि रहा ॥२ पहर रात उठि कीन्हि पयानाँ । कोस बीस इक जाइ तुलानाँ ॥३ कोस तीस तिंह गोबराँ लागे । उतर देवहाँ लोग डरु मागे ॥४ घर घर गोबराँ बात जनाइ । फो एक राठ उतरि गा आइ ॥५ खाइ फोट सँवारहुँ बैठे कित्ते झूसार ।६ जौलहि राउ गइ होइ लागे, तौलहि लोग सँभार ॥७ टिप्पणी—(४) देवहाँ—एक नदी। प्रसगसे जान पडता है कि यह नदी गोवरके निकट ही थी। हरदी जाते समय लोर और चाँदने गंगा पार किया था। स्पष्ट है कि गंगा भी गोवरसे दूर न थी। अत' यह कहना गलत न होगा कि गंगाके आस-पास ही देवहाँ नदी भी बहती रही होगी। भारतीय सर्वे विभाग के डिप्टी सर्वेयर जनरल कर्नल यमुना नारायण सिनहाने हमें सूचित किया है कि देवहाँ नामकी नदी नैनीताल जिलेमें एक पहाडी तलहटी से निकलती है और पीलीभीत बीसलपुर, शाहजहाँपुर शाहबाद होती हुई कछीआते सात मील उत्तर गंगा में आकर गिरती है। शाहजहाँपुर तक इसका नाम देवहाँ है। उसके आगे शाहबाद तक यह देवहाँ और गरा दो नामोंसे पुकारी जाती है। शाहबाद के बाद लोग उस केवल गरा नामसे परिचित हैं। शाहबाद से ६ मील पश्चिम इस नदीके तट पर गोटा नामक स्थान भी है। गरा और गोटा दोनों ही गोवर की याद दिलाते हैं।

३२२ ४३७ (रौकेण्ड्स ३१२) हैब्त उफ़्तादन बर शहरे गोबर (गोबर नगरमें आतंकका बैठना) घर घर गोबरौं परा खभारू । कइहिं जासु राखइ करतारू ॥१ तरुबा कोट झराये खाई। परी रात मँह पयैर बँधाई ॥२ सोन रूप सब गोंठी फरहीं। घरहिं ओसारहिं मानुक घरहीं ॥३ मैना कँ जीठ अइस जनावा । अनौं डरहुतै मइ को आवा ॥४ छोरि लै पाट लोरक कै कङ्गा । मइ जीठ भया मावत अङ्गा ॥५ साँझ परे माइ खोलिन, मोर पिसहिं अस आइ ।६ आज रात के बीतहि, सारफ सुधि पाइ ॥७ टिप्पणी-(१) गोंठी-कथ्थी; टंट; कमरमें धन राखि रखनेका स्थान । (४) अनौं डरहुतै—यह अपपाठ जान पड़ता है। बीकानेर प्रतिमें 'इरबी हुवै जनइ को आवा' पाठ है। (६) साँझ परे—सन्ध्या बेला । ४३८ (रौकेण्ड्स ३१३) ख्वाब दीदने मैनौ अज आमदने लोरक (मैनौंका लोरकके आनेका स्वप्न देखना) गाँष कुठारैं परा अबासू । मैना कें चित अनद हुलासू ॥१ सोधन फर रात बा फूली। देख तरायौं मैना भूली ॥२ रहँस उठी चित मँह निसि जागी । पिछली रात नींद फिरि लागी ॥३ जागत नैन सपन एक आवा । मा बिहान मै गबर मसावा ॥४ खोतिन पूछहि सुतु पनि मैनों। परत साँझ जो घफविइ पैनौं ॥५ तोर मन फूल सो रँइसा, पायहुँ नीके भाइ ।६ सपन गुन गिनु मैना, कहु कछु देखतें आइ ॥७

१२७ ४३९ ( री०स्म ३१४ ) तलबीदने फुरिस्तादने लोरक गुलफरोश रा बरे मैना बा गुल ( लोरकका मालीको बुलाकर फूलके साथ मैनाके पास भेजना ) दिन भा लोरफ मारी बुलाबा । गोवराँ कस हँह पासा जनाबा ॥१ अस बनि रहु धि लोर पठायउ । जो को पूछहि कहसि हाँ आयउँ ॥२ फूल फरँद भरि माली लेतस । फिर फिर गोवरा घर घर देतस ॥३ देख फूल मैनाँ तस रोई । फर मोभरहि जिंहि पिउ होई ॥४ नाँह मोर परदेमहिं छावा । फूल पान महिं देख न भावा ॥५ परकँ हार मलसि, माली साँजरि फूल ।६ पाम लागि सत मैनां, उठ मेमी अब पोल ॥७ टिप्पणी—(१) मारी—माली । ४४० ( री०स्म ३१५ ) पुरसीदन मैना खर गुल फरोश रा खबर ( मैनाका मालीसे हाल चाल पूछना ) फग्गु मर्टि पारी किंविहुत भारा । फूलबाग म भारक पारा ॥१ जानउँ पग सों राग पठारा । मपन माँज जा दगउँ आपा ॥२ लाग राम मार दिया जुड़ानों । अहग फूल दिउ गरण आनों ॥३ मार नांउ हँ मप दूर गइ । जनु गाँरन मौगहरी दाइ ॥४ गुज्र पर्द मारग हां पाटनैं । मगषी सोद कहों अच पाटउँ ॥५ हरग बिराने गउं, रैन बागर बाह ।६ दायें मागि म दिनउउँ, जा परदगी आह ॥७

१२८ ४४१ (रीडैन्ट्स ३१६) जवाब दादने मैना भाजी बर मैना रा (माझीका मैनाको उत्तर) महि नहिँ कुरबी हा परदेसी। ताहि सँझाइ मोर सहदेसी ॥१ सो देखि मैंइकोँ घरहिँ चलावा। गोचर बसद् मैं देखन आवा ।२ महरि देखि हाँ दही फइँ आयउँ । तोर बिरह अस अउर न पायउँ ॥३ सब तूँ सुधि लोर कै पावसु । उइँकै दूध जो बेगों आनसु ॥४ फूल मोर तोरें झार सुखाने। छार भये औ खरि डुँबलाने ॥५ बहुत लोग पुर आवा, महु न बोल सुधि कोइ ।६ बेर्गा आउ तिह बेचैं, औ तहाँ मिरावा होइ ॥७ टिप्पणी-(१) कुरबी—घर-परिवारका व्यक्ति। सहदेसी—समान देशका वासी; अपने देशका निवासी। यहाँ तात्पर्य अपने गाँव नगरके निवासी से है। (२) बसद्—बस्ती। ( ) झार—(स ज्वाल) अग्नि। छार—(स क्षार), राख। (७) मिरावा—मिलाप भेंट। ४४२ (रीडैन्ट्स ३१७) रफ्तने मैना बा सहेलियान दर बेर्गों व तलबीदन लोरक मैना रा (सहेलियोंके साथ मैनाका बेर्गों जाना और लोरकका मैनाको बुलाना) दिन भा मैनों बेर्गा गई। और सहेली चुनी दस तईँ ॥१ बेचत दूध घर [पर] गई। दही कइँ लोरहिँ महरि बुलाई ॥२ महरी बय मध लोरक देखी। देखत मैनाँ और न लेखीँ ॥३ [—] सार चौदा कइँ बोलसु। सीप सिंदूर चन्दन वन पावसु ॥४ [मागौं*] छाड़ि जो पाछों आवा। चपक चमक धनि पाउ उठावा ॥५

१२९ बहि फर दूध दहि लीजइ, दस गुन दीजइ दान ॥६ सती रूप जस देखउँ, सिंह क बिदाई पान ॥७ टिप्पणी—(७) पाछौं—पीछे। उचावा—उठायी है। ४४३ (रैकीस ३१८ : सम्बत् ५९) खरीदने लरक शीर व दहानीदने मारू मर मैना रा ( लोरकका दूध खरीद कर मारू देना ) लेके दूध सो दरब दिवाया। सीप सिंघोरा माँग भरावा¹ ॥१ सेंदुर चन्दन सब फोउ लेई। मैना आपुन² करै न देई ॥२ सेंदुर सो करि बिह पिउ होई। नाँह मोर हरदी है सोई ॥३ [बोलहिं*] मुँहिका वह तज गयउ। साँसहि हम³ अस साध न मयउ ॥४ [निसि*] दिन हाँ दुख रोऊँ⁴। नींद न आवइ कैसें सोऊँ ॥५ रोवत दिस्टि घटानी, (घरी) चख कै जोत⁷।६ चाँद सुरुज तिह पर गहे, पास परी मुँइ लोट⁸ ॥७ मूलपाठ—६—कटी (हेने अभावके कारण यह पाठ है)। पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—सिरुदने लोरक शीर अज मेना व मारू दहानीदने ब मारू मुस्न मैके दिल रा ( लोरकका मनासे दूध खरीद कर धन देना और उसक हुलसकी पाह देना ) १—केर बहि दूध । २—आनि पठावा । ३—आपुहि । ४—मार नाँह । ५—जीवहि वह तज मॅहि बैह गवा । ६—मुहि । ७—मया । ८—दिन दिन आसू मोहू राऊँ । —गीन भए पल कात । ९— बीजु परी मुँइ लूट । टिप्पणी—(१) सो—हर । दरब—द्रव्य । दिवाया—दिलवाया । सीप—चाटका बना पानकार पात्र जिसमें अभिनन्दन-सामग्री यथा—रोली चन्दन सुपारी अक्षत (चावल) पंञ्चन आदि रखा जाता है। सिंघोरा— सिन्दूर रखनेका पात्र । माँग भरावा—माँगमें सिन्दूर लगानेका माँग भरना कहते हैं ।

११ (२) करे—करने । (३) बाँइ—पति । (४) जौंकहि—जब तक। मूँहिका—मुझको । तौंसहि—तब तक । अस—ऐसा । साथ—आकाश । (५) बटाथी—घट गयी । चक्र—नेत्र । ४४४ (रीडंग्इस ११५ होकर) ऐकन (वही) तोरफ मैनाहि बान न देइ । करै धमारी मरम सभ लेइ ॥१ मैना कहइ सुन साँझि¹ सँझाइ । मोरें आइ भीत रजाइ² ॥२ मैं का देरउ हा बेसादरी । तिह तँ माँ सों करसि धमारी ॥३ आनसि अस मैं सोवा सारी । थाप देइ महि पाठसि चोरी ॥४ अपने नाँह न रहँसु सँझाइ । मोर ठाँउ का करसु पड़ाइ⁵ ॥५ क्रोध भर कै मैना चली, तहँ पहेरु आवास⁶ ।६ साँदा भई पर⁷ पालंग ऊपर⁸, धरि मैं सारस पास⁹ ॥७ पाठांन्तर—इतर प्रति — शीर्प—नीज गुजराउने नौरक भर मैना रा बेसाजी व लग हरियाफ्त करदन (नोरकका मैनाको न जाने देना और छेडखानी करना) १—खरे । २—गह । ३—नभारं । ४—ते ४ शैरी मैं अद्विम कुमारी । ५—डर ते महि मा । ६—तै मारी मारी । ७—एकत्र । ८—भम्ने मान । —मोर ठाँउ पुर रहि म सहाइँ । ९—फोर बहुत दे मिना चल मह वह के आवास । ११—साँदा पर पर्यंग माँ । टिप्पणी— (१) धमारी—दवा पोकडी छेडछार हुड़दंग । मरम—हृदयकी बात । (३) बेसादरी—बेंगाइनि ।

३३१ ४४५ (रीड्स ३२ अ) ऐजन (वही) पिरम समुँद अति अवगाहा। जो अग बूड़ि न पावइ थाहा ॥१ चहुँ दिसि कैसैं थाह न पावइ। मानुस बूड़ै तीर न आवइ ॥२ मोरे रोयैँ साबर भये। धरती पूर सरग लहि गये ॥३ फूटि आँख जनु आँसू भये। पँथ सो छोड़ पानि न रहै ॥४ यह गुन हाँ तौरैँ न देखेउँ। रात चाँद दिन सुरुज देखेउँ ॥५ जान देइ पर आपुन, मोरहि सास मुहि माइ ।६ पिय सँताप सुन पैठउँ, काल पास तुम आइ ॥७ ४४६ (रीड्स ३२ अ। बम्बई ५९) बाज रफ्तने मैना दर बेगाँ बा सहेलियान खुद (मैनाका सहेलियोंके साथ बंगासे वापस जाना) उदये भानु औ रात' बिहानी। महरी देखहा जाइ' तुलानी ॥१ मैनाँ देखत मंदिर भुलाइ। बहुरि चाँद वह बात चलाइ ॥२ कहु कँह मैनाँ सुरुज' अस करा। सो लै चाँदहि पाटन घरा ॥३ मई तज सुरुज चाँद लै भागा। परहाँ माँस' आइ अब लागा ॥४ जो कहुँ चाँद हौँ पाऊँ। फार कें मुँह नगर फिराऊँ ॥५ जस पैँ प्रीत सँझाइ, तम जग करै न कोइ ।६ जइस दाह महि दीन्हों , यइस दाह यहि होइ ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—बज शवे सुवह शद रोशन बरामदने ब बेरलीने मैना ब बरलीन्मे चाँदा (सुवह होने पर मैनाका आना और चाँदका बुझाना) १—भानु रात बिहानी। २—भार। ३—कहु में सुरुज चाँद।

३१९ ४—चाँदै हरखी। ५—चाँद। ६—को पै देखत चाँद को रामेरउँ । ७—कारमुरी के खरग डिखावेउँ। ८—दाइ मैं। ९—दीन्हौं। ४४७ (रीडिंग्स ३२१ ; बम्बई ५०) गुफ़्तगूए खुद नमूदन् चाँदा ब पैहानत करद्ने मैना (चाँदका अपनी बड़ाई और मैनाका अपमान करना) चाँद आपुन कियत बड़ाई। मैनहि पूछत रही लजाई ॥१ भोल पतोल भइ सुठाई¹। कहसि न चाँद कहाँ सँ² आई ॥२ परकी चाँदें झझ उषावा³। भा झझ अस दाउद गावा ॥३ तब उठि लारक आपु जनावा। मैनाँ रह[स⁴] लारेवो पावा⁵ ॥४ सोरफ चाँद⁶ तस कँ हरखी। जूसन फारन फिर न फरकी ॥५ घरि सात पाँच कइँ भोरुसि, मैना⁷ जाइ सँभारि ।६ आज रात मैनैं⁸ घर बामौं⁹, दाहिक हूँ¹⁰ पारि ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—गुफ़्तगू व एल्फिदम सुद शुफ्तन चाँदा व शनाख्तने मिन्द व बज़ बर्दन चाँदा (चाँदका अपनी प्रशंसा करना; मैनाका उसे पहचान लेना और झगड़ना) । इस प्रतिमे पंक्ति ४ नहीं है। उसके स्थानपर पंक्ति ७ है और पंक्ति ५ के स्थानपर एक नयी पंक्ति है। —कवत वकत भइ सुन्दाई। १—हुत । ३—उगावा । ४—भई। यह पंक्ति नहीं है। ६—चाँदहि। ७—हरषी। ८—चाँदा जूसे न फिरि न फहकी । —मैनाँद । ९ —मै बहि। ११—उठव । १२ राउदेवै करा सातवीं पंक्ति के स्थानपर नयी पंक्ति इस प्रकार है—भवहु तमुझ महि रही जगाइ। आपुन घर कँ कीन्ह बड़ाई ॥

१३३ ४४८ ( रीक्युल्स ३९२ : बम्बई ५८ ) दर शब रफ़्तने लोरक दर ख़ानये मैना व दिल खुश करदन ऊ ( लोरकका रात्रिमें मैनाके घर आना और मनोविनोद करना ) मैना घेरिहिं१ ले अन्हवाइ । मूँगिया सारि२ आन पहराइ ॥१ दुसरैं पाट नो पँसारसि३ । मुख तँबोल चख काजर सारसि ॥२ पदरीं इट जनु अनीस नीभरा४ । देख सुरुज चाँदा भीमरा५ ॥३ रात बाह कें नारि मनाइ । चाँदा चाह अधिक तँ पाइ ॥४ पहुल दुख जो नारि पखानों । राखसि मान लौर जम जानों ॥५ कइसि सुरुज धनि चाँदा, अस फन देउतहिं दोस६ । ६ इम मना जेंठ तरह, रहहि चाँद परास७ ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—गुफ़्त बादने कनीज़गान मर मैना रा व कस्कने ख़ास आबा गन व दर ख़ाना शुदन (दासियोंका मैनाको महला कर वस्त्र पहराना और मन बहलाव करना) । १—धरी । २—नारी । ३—ण बहि पंगारी । ४—गारी । ५—अहिन निसरा । ६—सुरुज तब चाँदहिं दिखरा । ७—ठा । ८—चोदाँइ पाइ अधिक पैमाइ । —पहिल । ९—कइसि सुरज धनि चाँदहि ण में कीता दोस । १०—इमार षाँह इम तरह, रहतु चाँद परास ॥ ४४९ ( रीक्युल्स ३९३ ) गबर सुनानीदन आरुफ़ दर हजरे गाबर बज आमदन गु० ( लोरकका अपने आनेका समाचार गाबर भेजना ) गाररौँ अपवस पान जनाइ । भैंसों गगरभि नाहि मँसाइ ॥१ अजपी क घर गनिन गइ । रागि गुहार पान अस भइ ॥२ भा अमरार पाए दउराबा । तरफ गुनि क भ्रमन आवा ॥३

३२४ दठर खाँड अभगी सर दीन्हौं । ठाठर टूटि लोर तिह चीन्हौं ॥४ वोहि उठि कै भये अँकवारा । [ - ] कै मैं तौं मारा ॥५ काहि लागि तूँ हाँकसु, उठहु आपुन पर आउ । ६ आगें दइ लोरक खेतस, छाहि पूत तुम्ह पाउ ॥७ ४५० ( रीफ़न्सूल १२२ ) दर रसीदने आमदने लोरक ब खाने मादर उफ्तादन ( लोरकका अपने घर आकर माँके पैर पड़ना ) चढ़ तुरी लोर घर आवा । पायँ लागि के माइ मनावा ॥१ नित कहि अस पूत न कीजइ । भूरि माइ कँ दुख न दीजइ ॥२ खोलिन बहुतें डोल आनी । चाँदा मैना दोनौं रानी ॥३ पायँ परी अँकवारी घरी । काजर सेंदुर दोऊ फरी ॥४ अगिन परबार क रमोइ बघारा । कोठा बारी सेज सँबारा ॥५ चाँद सुरुज औ मैनाँ, बरस सहस भा राज । ६ गावहिं गीत सहेलियाँ, गोबर मघावा आज । ७ टिप्पणी—(४) काजर—काजल । सेंदुर—सिन्दूर । ( ) बघारा—छौंका बघारा । कोठा—अट्टालिका । बारी—घर । ४५१ ( रीफ़न्सूल १२५ ) पुरसीदन लारक मादर रा व जवाब दादन मादर ( लोरकका माँस पूछना और माँका उत्तर देना ) लारक पूसहि कहु मई माई । कित धनि मैनाँ कितहुव भाई ॥१ तारैँ पाउ आपन आवा । बैनी मैना गाड़ी लावा ॥२ अजबी कर गगर उठ भारा । बैथी मैना आइ छुड़ारा ॥३

तोहि महरहिं नाऊ चलाबा। माँकर कहैं अस बोल पठावा ॥४ कहा लोर इँह देस परानों। हरदीपाटन जाइ तुलानों ॥५ भये धीर हँ माँकर, मारि गाइ लै जाह। ६ ऐसे धीर कितहु पेइ पाये, सेंवरू राभ गवाह ॥७ ४५२ ( बम्बई ६ : रौकेण्ड्स १९९ ) सुनीदन माँकर वै पियते रफ्तने लोरक व आमदन बास्कर व कुश्तन सेंवरू व बुदने भौंए गाव ( लोरक के आने का समाचार सुनकर माँकर का सर्कश्य थाना और सेंवरू को मारकर गाय ले जाना ) सुनि कै माँकर फटक चलावा। मोहों कँवरुहिं मारइ धावा¹ ॥१ बहुत² फटक सेंउँ³ माँकर आवा। एकसर कँवरू फिरिं (वहिं) काहा ॥२ कँवरुहि नाउ हँकारह आवा⁴। राजा कापर तिह पहिरावा ॥३ राजा पहँ ता सेंवरू आवा⁵। भरि कर माँकर सेंवरू मरावा ॥४ दइकेँ पूत अस पहिँ मपठं⁶। परु हँसी फाडी गोठहिं गयउ ॥५ एक दुख महि सोरा, दूसर महि कर लाग । ६ देखम रोइ के फफरों, [रात आइ सभ⁷] आग ॥७ मूलपाठ—२—३रि (षाकर स्थान पर डाफ लिप्त जान कारण यह पाठ है)। पाठाग्त —रौकण्ड्स प्रति— शीर्षक—पेषन (वही) । इस प्रतिमें पंक्ति ३ ४ और ५ क्रमशः ५ ३ और ४ है। १-कँवर मारन आवा । २—बहुक । ३—सँहँ । ४—इक कँवरू परर इंद (!) काहा । ५—कँवरू मार नागस बुलाथा । ६—राजा पैह कँवरु धरि आवा । ७—काँगर माकर कँवरू मराया । ८—अल मुख पूत महि बर भयउ । —फाडि म गाउ । ९ —एक दुख पूरे महि लारा दूसर कहि क जो लाग ।

११६ टिप्पणी—(२) कटक चलावा—सेना रवाना किया। 'कटक चलि भाषा' अर्थात् कटक (उड़ीसामें एक प्रसिद्ध स्थान) से चलकर आया, पाठ भी सम्भव है। बाहाँ—लोर कथाओंके अनुसार बाहों में लोरकका भाई कँवर जिसे लोककथाओंमें मैवर भी कहा गया है, रहता था और वहाँ उसकी गाय भैंसोंका बाड़ा था। (६) एकसर—अकेला। (७) गोडहिं—गायोंका। (७) बेकरो—(वा वेरन्ना)—किसीके वियोगमें लिपट कर रोना चिल्लाना। ४५३-१ (अनुपलब्ध)

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