छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
९३८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ९३८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| कस्य शाबल्यम्, तं ब्रह्मलोकं शबलं प्रपद्ये मनसा शरीरपातादूर्ध्वं गच्छेयम् । यस्मादहं शबलाद्ब्रह्मलोकान्नामरूपव्याकरणाय श्यामं प्रपद्ये हार्दंभावं प्रपन्नोऽस्मीत्यभिप्रायः । अतस्तमेव प्रकृतिस्वरूपमात्मानं शबलं प्रपद्य इत्यर्थः । | उसकी शबलता है, उस शबल ब्रह्मलोकको मनसे—शरीरपातके पश्चात् प्राप्त होऊँ—जाऊँ, क्योंकि मैं नाम-रूपकी अभिव्यक्तिके लिये शबल ब्रह्मलोकसे श्याम—हार्द-भावको प्राप्त हुआ हूँ, ऐसा इसका अभिप्राय है । अतः तात्पर्य यह है कि मैं उस अपने प्रकृतिस्वरूप शबल आत्माको प्राप्त होऊँ । | | कथं शबलं ब्रह्मलोकं प्रपद्ये ? इत्युच्यते—अश्व इव स्वानि लोमानि विधूय कम्पनेन श्रमं पांस्वादि च रोमतोऽपनीय यथा निर्मलो भवत्येवं हार्दब्रह्मज्ञानेन विधूय पापं धर्माधर्माख्यं चन्द्र इव च राहुग्रस्तस्तस्माद्राहोर्मुखात्प्रमुच्य भास्वरा भवति यथा—एव धूत्वा प्रहाय शरीरं सर्वानर्थाश्रयमिहैव ध्यानेन कृतात्मा कृतकृत्यः सन्नकृतं नित्यं ब्रह्मलोकमभिसम्भवामीति । द्विर्वचनं मन्त्रसमाप्त्यर्थम् ॥ १ ॥ | मैं शबल ब्रह्मलोकको कैसे प्राप्त हो सकता हूँ ? सो बतलाया जाता है—जिस प्रकार अश्व अपने रोएँ हिलाकर अर्थात् रोम-कम्पनके द्वारा श्रम और धूलि आदि दूर करके जैसे निर्मल हो जाता है उसी प्रकार हार्दब्रह्मके ज्ञानसे धर्माधर्म-रूप पापको झाड़कर तथा राहुग्रस्त चन्द्रमाके समान जिस प्रकार कि वह राहुके मुखसे निकलकर प्रकाशमान हो जाता है उसी प्रकार सम्पूर्ण अनर्थोंके आश्रयभूत शरीरको त्याग-कर इस लोकमें ही ध्यानद्वारा कृतात्मा—कृतकृत्य हो अकृत—नित्य ब्रह्मलोकको प्राप्त होता हूँ । 'ब्रह्मलोकमभिसम्भवामि' इसकी द्विरुक्ति मन्त्रकी समाप्तिके लिये है ॥ १ ॥ |
<div align="center">इतिच्छान्दोग्योपनिषदष्टमाध्याये त्रयोदश-
खण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १३ ॥
चतुर्दश खण्ड
कारणरूपसे आकाशसंज्ञक ब्रह्मका उपदेश
| आकाशो वा इत्यादि ब्रह्मणो लक्षणनिर्देशार्थम् आध्यानाय। | 'आकाशो वै' इत्यादि श्रुति उत्तम प्रकारसे ध्यान करनेके निमित्त ब्रह्मका लक्षण निर्देश करनेके लिये है। |
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आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म तदमृतꣴ स आत्मा प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये यशोऽहं भवामि ब्राह्मणानां यशो राज्ञां यशो विशां यशोऽहमनुप्रापत्सि स हाहं यशसां यशः इयेतमदत्कमदत्कꣳश्येतं लिन्दु माभिगां लिन्दु माभिगाम् ॥ १ ॥
आकाश नामसे प्रसिद्ध आत्मा नाम और रूपका निर्वाह करनेवाला है। वे (नाम और रूप) जिसके अन्तर्गत हैं वह ब्रह्म है, वह अमृत है, वही आत्मा है। मैं प्रजापतिके सभागृहको प्राप्त होता हूँ; मैं यशःसंज्ञक आत्मा हूँ; मैं ब्राह्मणोंके यश, क्षत्रियोंके यश और वैश्योंके यश (यशःस्वरूप आत्मा) को प्राप्त होना चाहता हूँ; वह मैं यशोंका यश हूँ; मैं बिना दाँतोंके भक्षण करनेवाले रोहित वर्ण पिच्छिल स्त्री-चिह्नको प्राप्त न होऊँ, प्राप्त न होऊँ ॥ १ ॥
| आकाशो वै नाम श्रुतिषु प्रसिद्ध आत्मा; आकाश इवाशरीरत्वात्सूक्ष्मत्वाच्च । स | 'आकाश' इस नामसे श्रुतियोंमें आत्मा प्रसिद्ध है, क्योंकि वह आकाशके समान अशरीर और सूक्ष्म है। वह आकाश (आकाश- |
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छा० उ० ३१–
९४० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ९४० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| चाकाशो नामरूपयोः स्वात्मस्थयोर्जगद्बीजभूतयोः सलिलस्येव फेनस्थानीययोर्निर्वहिता निर्वोढा व्याकर्ता। ते नामरूपे यदन्तरा यस्य ब्रह्मणोऽन्तरा मध्ये वर्तेते तयोर्वा नामरूपयोरन्तरा मध्ये यन्नामरूपाभ्यामस्पृष्टं यदित्येतत्तद्ब्रह्म नामरूपविलक्षणं नामरूपाभ्यामस्पृष्टं तथापि तयोर्निर्वोढ्रेवंलक्षणं ब्रह्मेत्यर्थः। इदमेव मैत्रेयीब्राह्मणेनोक्तं चिन्मात्रानुगमात्सर्वत्र चित्स्वरूपतैवेति गम्यत एकवाक्यता। | संज्ञक आत्मा) जलके फेनस्थानीय अपनेमें स्थित नाम और रूपका निर्वहिता—निर्वाह करनेवाला अर्थात् उन्हें व्यक्त करनेवाला है। वे नाम और रूप जिसके अन्तर्गत हैं अर्थात् जिस ब्रह्मके अन्तरा—मध्यमें वर्तमान हैं, अथवा जो उन नाम और रूपके अन्तरा—मध्यमें है और उन नाम और रूपसे असंस्पृष्ट है; तात्पर्य यह है कि वह ब्रह्म नाम-रूपसे विलक्षण और नाम रूपसे असंस्पृष्ट है, तो भी उनका निर्वाह करनेवाला है; अर्थात् ब्रह्म ऐसे लक्षणोंवाला है। यही बात [बृहदारण्यकान्तर्गत] मैत्रेयीब्राह्मणमें कही गयी है कि सर्वत्र चिन्मात्रकी अनुगति होनेके कारण सबकी चिद्रूपता है—इस प्रकार इन वाक्योंकी एकवाक्यता ज्ञात होती है। |
| कथं तदवगम्यते? इत्याह—स आत्मा। आत्मा हि नाम सर्वजन्तूनां प्रत्यक्चेतनः स्वसंवेद्यः प्रसिद्धस्तेनैव स्वरूपेणानीयाशरीरा व्योमवत्सर्वगत आत्मा | यह बात कैसे ज्ञात होती है? ऐसा प्रश्न होनेपर श्रुति कहती है—'स आत्मा'—आत्मा सम्पूर्ण जीवोंका प्रत्यक्चेतन और स्वसंवेद्य प्रसिद्ध है; उसी रूपसे उन्नयन (ऊहा) करके वह अशरीर और आकाशके समान सर्वगत आत्मा |
खण्ड १४] शाङ्करभाष्यार्थ ९४१
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| ब्रह्मेत्यवगन्तव्यम् । तच्चात्मा ब्रह्मामृतममरणधर्मा । | ही ब्रह्म है—ऐसा जानना चाहिये। वह आत्मरूप ब्रह्म अमृत—अमरणधर्मा है। |
| अत ऊर्ध्वं मन्त्रः। प्रजापतिश्चतुर्मुखस्तस्य सभां वेश्म प्रभुविमितं वेश्म प्रपद्ये गच्छेयम् । किञ्च यशोऽहं यशो नामात्माऽहं भवामि ब्राह्मणानाम् । ब्राह्मणा एव हि विशेषतस्तमुपासते ततस्तेषां यशो भवामि । तथा राज्ञां विशां च । तेऽप्यधिकृता एवेति तेषामप्यात्मा भवामि । तद्यशोऽहमनुप्रापत्स्येऽनुप्राप्तुमिच्छामि । स हाहं यशसामात्मनां देहेन्द्रियमनोबुद्धिलक्षणानामात्मा । | इसके आगे मन्त्र है—प्रजापति चतुर्मुख ब्रह्माका नाम है, उनकी सभा अर्थात् प्रभुविमितनामक गृहको मैं प्राप्त होऊँ--जाऊँ। मैं ब्राह्मणोंका यश-यशसंज्ञक आत्मा होऊँ क्योंकि ब्राह्मण ही विशेषरूपसे उसकी उपासना करते हैं; अतः मैं उनका यश होऊँ। इसी प्रकार मैं क्षत्रिय और वैश्योंका भी यश होऊँ। वे भी अधिकारी ही हैं, अतः मैं उनका भी आत्मा होऊँ। मैं उनका यश प्राप्त करना चाहता हूँ। वह मैं यशःस्वरूप आत्माओंका अर्थात् देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धिरूप आत्माओंका आत्मा हूँ। |
| किमर्थमहमेवं प्रपद्ये ? इत्युच्यते—श्येतं वर्णतः पक्वबदरसमं रोहितम् । तथादत्कं दन्तरहितमप्यदत्कं भक्षयितृ स्त्रीव्यञ्जनं तत्सेविनां तेजोबलवीर्यविज्ञान- | मैं इस प्रकार आत्माको क्यों प्राप्त होता हूँ ? सो बतलाया जाता है—श्येत—जो रङ्गमें पके हुए बेरके समान लाल है, यथा 'अदत्क'—दन्तरहित होनेपर भी 'अदत्क' भक्षण करनेवाले स्त्रीचिह्नको; क्योंकि वह अपना सेवन करनेवालेके तेज, बल, वीर्य, विज्ञान |
९४२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
९४२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
| धर्माणामपहन्तृ विनाशयित्रीत्ये- | और धर्मका हनन अर्थात् विनाश | | तत् । यदेवंलक्षणं श्येतं लिन्दु | करनेवाला है। जो ऐसे लक्षणों- | | | वाला श्येत लिन्दु—पिच्छिल स्त्री- | | पिच्छलं तन्माभिगां माभिग- | चिह्न है उसे प्राप्त न होऊँ उसमें | | | गमन न करूँ । 'माभिगाम् | | च्छेयम् । द्विर्वचनमत्यन्तानर्थ- | माभिगाम्' यह द्विरुक्ति उसका | | | अत्यन्त अनर्थहेतुत्व प्रदर्शित | | हेतुत्वप्रदर्शनार्थम् ॥ १ ॥ | करनेके लिये है ॥ १ ॥ |
—: ❀ :—
इतिच्छान्दोग्योपनिषद्यष्टमाध्याये चतुर्दशखण्ड- भाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १४ ॥
पञ्चदश खण्ड
—:०:—
आत्मज्ञानकी परम्परा, नियम और फलका वर्णन
तद्धैतद्ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्य आचार्यकुलाद्वेदमधीत्य यथाविधानं गुरोः कर्मातिशेषेणाभिसमावृत्य कुटुम्बे शुचौ देशे स्वाध्याय-मधीयानो धार्मिकान्विदधदात्मनि सर्वेन्द्रियाणि सम्प्र-तिष्ठाप्याहिंसन्सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः स खल्वेवं वर्तयन्यावदायुषं ब्रह्मलोकमभिसम्पद्यते न च पुनरा-वर्तते न च पुनरावर्तते ॥ १ ॥
उस इस आत्मज्ञानका ब्रह्मा ने प्रजापतिके प्रति वर्णन किया, प्रजापतिने मनुसे कहा, मनुने प्रजावर्गको सुनाया । नियमानुसार गुरुके कर्त्तव्यकर्मोंको समाप्त करता हुआ वेदका अध्ययन कर आचार्यकुलसे समावर्तनकर कुटुम्बमें स्थित हो पवित्र स्थानमें स्वाध्याय करता हुआ [ पुत्र एवं शिष्यादिको ] धार्मिक कर सम्पूर्ण इन्द्रियोंको अपने अन्तः-करणमें स्थापित कर शास्त्रकी आज्ञासे अन्यत्र प्राणियोंकी हिंसा न करता हुआ वह निश्चय ही आयुकी समाप्तिपर्यन्त इस प्रकार बर्तता हुआ [ अन्तमें ] ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है; और फिर नहीं लौटता, फिर नहीं लौटता ॥ १ ॥
| तद्धैतदात्मज्ञानं सोपकरणम् | [शमादि] उपकरणोंके सहित उस इस आत्मज्ञानका 'ओमित्येतदक्षरम्' |
|---|---|
| 'ओमित्येतदक्षरम्' इत्याद्यैः सहो- | इत्यादि उपासनाओंके सहित उसका |
| ९५४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
| ९५४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
|---|
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| पासनैस्तद्वाचकेन ग्रन्थेनाष्टाध्यायीलक्षणेन सह ब्रह्मा हिरण्यगर्भः परमेश्वरो वा तद्द्वारेण प्रजापतये कश्यपायोवाच, असावपि मनवे स्वपुत्राय, मनुः प्रजाभ्यः, इत्येवं श्रुत्यर्थसम्प्रदायपरम्परागतमुपनिषद्विज्ञानमद्यापि विद्वत्स्ववगम्यते। | वर्णन करनेवाले इस आठ अध्यायवाले ग्रन्थके साथ ब्रह्मा-हिरण्यगर्भ अथवा परमेश्वरने प्रजापति—कश्यपके प्रति वर्णन किया था। उन्होंने अपने पुत्र मनुसे कहा और मनुने प्रजावर्गको सुनाया। इस प्रकार श्रुत्यर्थसम्प्रदायपरम्परासे आया हुआ वह विज्ञान आज भी विद्वानोंमें देखा जाता है। |
| यथेह षष्ठाद्यध्यायत्रये प्रकाशितात्मविद्या सफलावगम्यते तथा कर्मणां न कश्चनार्थ इति प्राप्ते तदानर्थक्यप्राप्तिपरिजिहीर्षयेदं कर्मणो विद्वद्भिरनुष्ठीयमानस्य विशिष्टफलवत्त्वेनार्थवत्त्वमुच्यते— | जिस प्रकार छठे आदि इन तीन अध्यायोंमें वर्णन की हुई आत्मविद्या सफल समझी जाती है उस प्रकार कर्मोंका कोई प्रयोजन नहीं है—यह बात प्राप्त होनेपर कर्मोंकी व्यर्थता प्राप्त होती है; अतः उसकी निवृत्तिकी इच्छासे विद्वानोंद्वारा अनुष्ठित होनेवाले कर्मोंके विशिष्टफलयुक्त होनेसे उनकी सार्थकताका निरूपण किया जाता है— |
| आचार्यकुलाद्वेदमधीत्य सहार्थतोऽध्ययनं कृत्वा यथाविधानं यथास्मृत्युक्तैर्नियमैर्युक्तः सन्नित्यर्थः। सर्वस्यापि विधेः स्मृत्युक्तस्योपकुर्वाणं प्रति कर्त- | आचार्यकुलसे वेदाध्ययन कर अर्थात् यथाविधान—जैसे कि स्मृतियोंने नियम बतलाये हैं उनसे युक्त हो अर्थके सहित वेदका स्वाध्याय कर—क्योंकि उपकुर्वाण ब्रह्मचारीके लिये स्मृत्युक्त सम्पूर्ण विधि कर्तव्य है, अतः उसमें |
खण्ड १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९४५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| न्यत्वे गुरुशुश्रूषायाः प्राधान्यप्रदर्शनार्थमाह—गुरोः कर्म यत्कर्त्तव्यं तत्कृत्वा कर्मशून्यो योऽतिशिष्टः कालस्तेन कालेन वेदमधीत्येत्यर्थः । एवं हि नियमवताधीतो वेदः कर्मज्ञानफलप्राप्तये भवति नान्यथेत्यभिप्रायः ।<br><br>अभिसमावृत्य धर्मजिज्ञासां समापयित्वा गुरुकुलान्निवृत्य न्यायतो दारानहृत्य कुटुम्बे स्थित्वा गार्हस्थ्ये विहिते कर्मणि तिष्ठन्नित्यर्थः । तत्रापि गार्हस्थ्यविहितानां कर्मणां स्वाध्यायस्य प्राधान्यप्रदर्शनार्थमुच्यते—शुचौ विविक्तेऽमेध्यादिरहिते देशे यथावदासीनः स्वाध्यायमधीयानो नैत्यकमधिकं च यथाशक्ति ऋगाद्यभ्यासं च कुर्वन्द्धार्मिकान्पुत्राञ्छिष्यांश्च धर्मयुक्तान्विदधद्धार्मिकत्वेन तान्नियमयन्नात्मनि | गुरुशुश्रूषाकी प्रधानता प्रदर्शित करनेके लिये श्रुति कहती है—गुरुका जो करनेयोग्य कर्म हो उसे करके जो कर्मशून्य समय शेष रहे उस समयमें वेदका अध्ययन कर—ऐसा इसका तात्पर्य है। अतः अभिप्राय यह है कि इस प्रकार नियमवान् विद्यार्थीका अध्ययन किया हुआ वेद ही कर्म और ज्ञानकी फलप्राप्तिका हेतु होता है और किसी प्रकार नहीं।<br><br>'अभिसमावृत्य' अर्थात् धर्मजिज्ञासाको समाप्त कर गुरुकुलसे निवृत्त हो नियमपूर्वक स्त्रीपरिग्रह कर कुटुम्बमें स्थित हो अर्थात् गृहस्थाश्रममें विहित कर्ममें तत्पर हो; वहाँ भी गृहस्थाश्रमके लिये विहित कर्मोंमें स्वाध्यायकी प्रधानता प्रदर्शित करनेके लिये ऐसा कहा जाता है—शुचि—विविक्त अर्थात् अपवित्र पदार्थोंसे रहित स्थानमें यथावत् बैठकर स्वाध्याय करता हुआ अर्थात् प्रतिदिनका नियमित पाठ और यथाशक्ति उससे अधिक भी ऋगादिका अभ्यास करता हुआ पुत्र एवं शिष्योंको धार्मिक—धर्मवान् बनाता हुआ अर्थात् धार्मिकत्वद्वारा उनका नियमन करता हुआ 'आत्मनि'—अपने |
९४६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
९४६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्वहृदये हार्दे ब्रह्मणि सर्वेन्द्रियाणि सम्प्रतिष्ठाप्योपसंहृत्येन्द्रियग्रहणात्कर्माणि च संन्यस्याहिंसन् हिंसां परपीड़ामकुर्वन् सर्वभूतानि स्थावरजङ्गमानि भूतान्यपीडयन्नित्यर्थः । | हृदयमें यानी हृदयस्थ ब्रह्ममें सम्पूर्ण इन्द्रियोंको स्थापित—उपसंहृत कर और इन्द्रियनिग्रहद्वारा कर्मोंका संन्यास कर ‘अहिंसन्’—हिंसा अर्थात् परपीड़ा न करता हुआ यानी स्थावर-जंगम समस्त प्राणियोंको पीडित न करता हुआ । |
| भिक्षानिमित्तमटनादिनापि परपीड़ा स्यादित्यत आह— | भिक्षाके लिये किये हुए भ्रमणादिसे भी परपीड़ा ( हिंसा ) हो सकती है, इसलिये श्रुति कहती है—‘अन्यत्र तीर्थेभ्यः’ । |
| अन्यत्र तीर्थेभ्यः । तीर्थं नाम शास्त्रानुज्ञाविषयस्ततोऽन्यत्रेत्यर्थः। | जो शास्त्राज्ञाका विषय है उसे ‘तीर्थ’ कहते हैं, अतः तात्पर्य यह है कि उसके सिवा अन्यत्र हिंसा न करता हुआ । |
| सर्वाश्रमिणां चैतत् समानम् । तीर्थेभ्योऽन्यत्राहिंसैवेत्यन्ये वर्णयन्ति । कुटुम्ब एवैतत्सर्वं कुर्वन्स खल्वधिकृतो यावदायुषं यावज्जीवमेवं यथोक्तेन प्रकारेणैव वर्तयन् ब्रह्मलोकमभिसम्पद्यते देहान्ते । न च पुनरावर्तते शरीर- | यह नियम सभी आश्रमोंके लिये समान है । कुछ अन्य विद्वान् लोग तो ऐसा कहते हैं कि तीर्थोंके सिवा और सब जगह अहिंसाका ही विधान है । अपने कुटुम्बमें ही यह सब करता हुआ वह अधिकारी पुरुष आयुपर्यन्त अर्थात् यावज्जीवन उपर्युक्त प्रकारसे ही बर्तता हुआ देहान्त होनेपर ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है, और फिर शरीर ग्रहण करनेके लिये नहीं लौटता; क्योंकि |
खण्ड १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९५७
| ग्रहणाय; पुनरावृत्तेः प्राप्तायाः प्रतिषेधात् । अर्चिरादिना मार्गेण कार्यब्रह्मलोकमभिसम्पद्य यावद्ब्रह्मलोकस्थितिस्तावत्तत्रैव तिष्ठति प्राक्ततो नावर्तत इत्यर्थः । द्विरभ्यास उपनिषद्विद्यापरिसमाप्त्यर्थः ॥ १ ॥ | पुनरावृत्तिकी प्राप्तिका प्रतिषेध किया गया है । तात्पर्य यह है कि अर्चिरादि मार्गसे कार्यब्रह्मके लोकको प्राप्त हो जबतक ब्रह्मलोककी स्थिति रहती है तबतक वह वहीं रहता है, उसका नाश होनेसे पूर्व वह वहाँसे नहीं लौटता ।☸ 'न च पुनरावर्तते, न च पुनरावर्तते' यह द्विरुक्ति उपनिषद्विद्याकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ॥ १ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषद्यष्टमाध्याये पञ्चदश-खण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १५ ॥
इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीशङ्करभगवतः कृतौ छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये ऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
॥ छान्दोग्योपनिषद्भाष्यं समाप्तम् ॥
॥ ॐ तत्सत् ॥
☸ यहाँ यह शंका होती है कि क्या ब्रह्मलोकके नाश होनेके बाद वह लौटता है ? तो इसका उत्तर है नहीं, वह ब्रह्ममें विलीन हो जाता है, क्योंकि ब्रह्मलोकके नाश होनेके बाद तो कोई लोक ही नहीं रह जाता है।
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❦ ꕥ ❦
</div>श्रीहरिः
मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | खं० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| अग्निहिंङ्कारो वायुः | २ | २० | १ | २०२ |
| अग्निष्टे पादं वक्तेति | ४ | ६ | १ | ३८९ |
| अजा हिङ्कारोऽवयः | २ | १८ | १ | १९९ |
| अतो यान्यन्यानि | १ | ३ | ५ | ६९ |
| अत्र यजमानः परस्तादायुषः | २ | २४ | ६ | २३७ |
| ,, ,, | २ | २४ | १० | २३९ |
| अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियम् | ५ | १२ | २ | ५४७ |
| ,, ,, | ५ | १४ | २ | ५५२ |
| ,, ,, | ५ | १५ | २ | ५५३ |
| ,, ,, | ५ | १६ | २ | ५५५ |
| ,, ,, | ५ | १७ | २ | ५५७ |
| अथ खलु य उद्गीथः | १ | ५ | १ | ८३ |
| ,, ,, | १ | ५ | ५ | ८७ |
| अथ खलु व्यानमेवोद्गीथम् | १ | ३ | ३ | ६७ |
| अथ खलूद्गीथाक्षराणि | १ | ३ | ६ | ७० |
| अथ खल्वमुमादित्यम् | २ | ९ | १ | १७३ |
| अथ खल्वात्मसंमितमति० | २ | १० | १ | १८१ |
| अथ खल्वाशीः | १ | ३ | ८ | ७३ |
| अथ खल्वेतयर्चा पच्छः | ५ | २ | ७ | ४९८ |
| अथ जुहोति नमः | २ | २४ | १४ | २४० |
| अथ जुहोति नमो वायवे | २ | २४ | ९ | २३८ |
| अथ जुहोति नमोऽग्नये | २ | २४ | ५ | २३६ |
| अथ तत ऊर्ध्वः | ३ | ११ | १ | २७२ |
| अथ प्रतिसृप्याञ्जलौ | ५ | २ | ६ | ४६७ |
| अथ य आत्मा स सेतुः | ८ | ४ | १ | ८३६ |
| अथ य इमे ग्रामे | ५ | १० | ३ | ५०९ |
( ९५० )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | खं० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| अथ य एतदेवम् | ५ | २४ | २ | ५७० |
| अथ य एतदेवं विद्वान् | १ | ७ | ७ | १०३ |
| अथ य एष सम्प्रसादः | ८ | ३ | ४ | ८३१ |
| अथ य एषोऽन्तराक्षिणि | १ | ७ | ५ | १०० |
| अथ यच्चतुर्थममृतम् | ३ | ९ | १ | २६८ |
| अथ यत्तदजायत | ३ | १९ | ३ | ३४८ |
| अथ यत्तपो दानम् | ३ | १७ | ४ | ३३१ |
| अथ यत्तृतीयममृतम् | ३ | ८ | १ | २६४ |
| अथ यत्पञ्चमममृतम् | ३ | १० | १ | २७० |
| अथ यत्प्रथमास्तमिते | २ | ९ | ८ | १७९ |
| अथ यत्प्रथमोदिते | २ | ९ | ३ | १७५ |
| अथ यत्रैतत्पुरुषः | ६ | ८ | ५ | ६५४ |
| अथ यत्रैतदबलिमानम् | ८ | ६ | ४ | ८६० |
| अथ यत्रैतदस्माच्छरीराद् | ८ | ६ | ५ | ८६१ |
| अथ यत्रैतदाकाशम् | ८ | १२ | ४ | ९३१ |
| अथ यत्रोपाकृते | ४ | १६ | ४ | ४३२ |
| अथ यत्सङ्गववेलायाम् | २ | ९ | ४ | १७६ |
| अथ यत्सम्प्रति मध्यन्दिने | २ | ९ | ५ | १७७ |
| अथ यत्सत्त्रायणमित्याचक्षते | ८ | ५ | २ | ८४३ |
| अथ यदतः परो दिवः | ३ | १३ | ७ | २९८ |
| अथ यदनाशकायनमित्याचक्षते | ८ | ५ | ३ | ८४४ |
| अथ यदवोचं भुवः | ३ | १५ | ६ | ३२१ |
| अथ यदवोचं भूः | ३ | १५ | ५ | ३२० |
| अथ यदवोचं स्वः | ३ | १५ | ७ | ३२१ |
| अथ यदश्नाति | ३ | १७ | २ | ३३० |
| अथ यदास्य वाङ्मनसि | ६ | १५ | २ | ६९५ |
| अथ यदि गन्धमाल्यलोककामः | ८ | २ | ६ | ८२३ |
| अथ यदि गीतवादित्रलोककामः | ८ | २ | ८ | ८२३ |
| अथ यदि तस्याकर्ता | ६ | १६ | २ | ७०० |
| अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे | ८ | १ | १ | ८०५ |
| अथ यदि भ्रातृलोककामः | ८ | २ | ३ | ८२२ |
| अथ यदि महज्जिगमिषेद् | ५ | २ | ४ | ४६४ |
( ९५१ )
| मंत्रप्रतीकानि | अ० | खं० | मं० | पृष्ठं | |
|---|---|---|---|---|---|
| अथ यदि मातृलोककामः | .... | ८ | २ | २ | ८२२ |
| अथ यदि यजुष्टो रिष्येत् | .... | ४ | १७ | ५ | ४३६ |
| अथ यदि सखिलोककामः | .... | ८ | २ | ५ | ८२३ |
| अथ यदि सामतो रिष्येत् | .... | ४ | १७ | ६ | ४३७ |
| अथ यदि स्त्रीलोककामः | .... | ८ | २ | ९ | ८२४ |
| अथ यदि स्वसृलोककामः | ... | ८ | २ | ४ | ८२२ |
| अथ यदु चैवाहिश्चोल्ब्यम् | ... | ४ | १५ | ५ | ४२३ |
| अथ यदूर्ध्वं मध्यन्दिनात् | ... | २ | ९ | ६ | १७८ |
| अथ यदूर्ध्वमपराह्नात् | ... | २ | ९ | ७ | १७९ |
| अथ यदेतदक्षणः शुक्लम् | ... | १ | ७ | ४ | ९९ |
| अथ यदेतदादित्यस्य | ... | १ | ६ | ५ | ९२ |
| अथ यदेवैतदादित्यस्य | .... | १ | ६ | ६ | ९३ |
| अथ यद्द्वितीयममृतम् | .... | ३ | ७ | १ | २६२ |
| अथ यद्धसति | ... | ३ | १७ | ३ | ३३१ |
| अथ यद्यज्ञ इत्याचक्षते | .... | ८ | ५ | १ | ८४२ |
| अथ यद्यन्नपानलोककामः | .... | ८ | २ | ७ | ८२३ |
| अथ यद्यप्येनानुत्क्रान्त० | .... | ७ | १५ | ३ | ७७१ |
| अथ यद्येनमूष्मसूपाल्भेत | ... | २ | २२ | ४ | २१२ |
| अथ या एता हृदयस्य | .... | ८ | ६ | १ | ८५४ |
| अथ यां चतुर्थीम् | ... | ५ | २२ | १ | ५६७ |
| अथ यां तृतीयाम् | .... | ५ | २१ | १ | ५६६ |
| अथ यां द्वितीयाम् | .... | ५ | २० | १ | ५६५ |
| अथ यां पञ्चमीम् | .... | ५ | २३ | १ | ५६८ |
| अथ यानि चतुश्चत्वारिँशत् | ... | ३ | १६ | ३ | ३२६ |
| अथ यान्यष्टाचत्वारिँशत् | ... | ३ | १६ | ५ | ३२७ |
| अथ ये चास्येह | .... | ८ | ३ | २ | ८२७ |
| अथ येऽस्य दक्षिणा रश्मयः | ... | ३ | २ | १ | २४९ |
| अथ येऽस्य प्रत्यञ्चः | ... | ३ | ३ | १ | २५१ |
| अथ येऽस्योदञ्चः | .... | ३ | ४ | १ | २५२ |
| अथ येऽस्योर्ध्वा रश्मयः | .... | ३ | ५ | १ | २५५ |
| अथ यो वेदेदं मन्वानीति | .... | ८ | १२ | ५ | ९३३ |
| अथ योऽस्य दक्षिणः | .... | ३ | १३ | २ | २९१ |
( १५२ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | खं० | पृष्ठ | ||
|---|---|---|---|---|---|
| अथ योऽस्य प्रत्यङ् सुषिः | ... | ३ | १३ | ३ | २९३ |
| अथ योऽस्योदङ् सुषिः | ... | ३ | १३ | ४ | २९४ |
| अथ योऽस्योर्ध्वः सुषिः | .... | ३ | १३ | ५ | २९५ |
| अथ सप्तविधस्य वाचि | ... | २ | ८ | १ | १७० |
| अथ ह हँसा निशायाम् | .... | ४ | १ | २ | ३५४ |
| अथ ह चक्षुरुद्गीथम् | .... | १ | २ | ४ | ५२ |
| अथ ह प्राण उच्चिक्रमिषन् | .... | ५ | १ | १२ | ४५१ |
| अथ ह प्राणा अहँश्रेयसि | .... | ५ | १ | ६ | ४४६ |
| अथ ह मन उद्गीथम् | .... | १ | २ | ६ | ५३ |
| अथ ह य एतानेवम् | ... | ५ | १० | १० | ५३५ |
| अथ ह य एवायं मुख्यः | .... | १ | २ | ७ | ५४ |
| अथ ह वाचमुद्गीथम् | .... | १ | २ | ३ | ५२ |
| अथ ह शौनकं च | ... | ४ | ३ | ५ | ३७२ |
| अथ ह श्रोत्रमुद्गीथम् | .... | १ | २ | ५ | ५३ |
| अथ हाग्नयः समूदिरे | ... | ४ | १० | ४ | ४०३ |
| अथ हेन्द्रोऽप्राप्यैव | .... | ८ | ९ | १ | ८८७ |
| अथ हैनँ गार्हपत्यः | .... | ४ | ११ | १ | ४०९ |
| अथ हैनँ प्रतिहर्तोपससाद | .... | १ | ११ | ८ | १३६ |
| अथ हैनँ प्रस्तोतोपससाद | .... | १ | ११ | ४ | १३३ |
| अथ हैनँ यजमान उवाच | .... | १ | ११ | १ | १३१ |
| अथ हैनँ वागुवाच | ... | ५ | १ | १३ | ४५२ |
| अथ हैनँ श्रोत्रमुवाच | ... | ५ | १ | १४ | ४५२ |
| अथ हैनमन्वाहार्यपचनः | .... | ४ | १२ | १ | ४१२ |
| अथ हैनमाहवनीयः | ... | ४ | १३ | १ | ४१४ |
| अथ हैनमुद्गातोपससाद | .... | १ | ११ | ६ | १३५ |
| अथ हैनमृषभोऽभ्युवाद | ... | ४ | ५ | १ | ३८६ |
| अथ होवाच जनशाँर्कराक्ष्य | .... | ५ | १५ | १ | ५५३ |
| अथ होवाच बुडिलमाश्वतराश्विम् | .... | ५ | १६ | १ | ५५५ |
| अथ होवाच सत्ययज्ञम् | ... | ५ | १३ | १ | ५४९ |
| अथ होवाचेन्द्रद्युम्नम् | ... | ५ | १४ | १ | ५५१ |
| अथ होवाचोद्दालकम् | ... | ५ | १७ | १ | ५५७ |
| अथात आत्मादेश एव | .... | ७ | २५ | २ | ७९४ |
( ९५३ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | खं० | मं० | पृष्ठ | |
|---|---|---|---|---|---|
| अथातः शौव उद्गीथः | ... | १ | १२ | १ | १३८ |
| अथाधिदैवतं य एवासौ | ... | १ | ३ | १ | ६४ |
| अथाध्यात्मं प्राणो वाव | .... | ४ | ३ | ३ | ३७१ |
| अथाध्यात्मं य एवायम् | .... | १ | ५ | ३ | ८५ |
| अथाध्यात्मं वागेवक्प्राणः | .... | १ | ७ | १ | ९८ |
| अथानु किमनुशिष्टः | .... | ५ | ३ | ४ | ४७५ |
| अथानेनैव ये चैतस्मात् | .... | १ | ७ | ८ | १०४ |
| अथावृत्तेषु यौर्हिङ्कारः | ... | २ | २ | २ | १५७ |
| अथैतयोः पथोर्न कतरेण | .... | ५ | १० | ८ | ५३१ |
| अथोताप्याहुः | .... | २ | १ | ३ | १५२ |
| अधीहि भगव इति | .... | ७ | १ | १ | ७१२ |
| अनिरुक्तस्त्रयोदशः | ... | १ | १३ | ३ | १४७ |
| अन्तरिक्षमेवग्वायुः | .... | १ | ६ | २ | ९१ |
| अन्तरिक्षोदरः कोशः | .... | ३ | १५ | १ | ३१७ |
| अन्नं वाव बलाद्भूयः | .... | ७ | ९ | १ | ७४९ |
| अन्नमयँ॒ हि सोम्य | ... | ६ | ५ | ४ | ६२६ |
| ,, ,, | ... | ६ | ६ | ५ | ६३१ |
| अन्नमशितं त्रेधा विधीयते | .... | ६ | ५ | १ | ६२३ |
| अन्नमिति होवाच | .... | १ | ११ | ९ | १३६ |
| अन्यतरामेव वर्तनीम् | .... | ४ | १६ | ३ | ४३० |
| अपां का गतिरित्यसौ | .... | १ | ८ | ५ | १११ |
| अपाँ॒ सोम्य पीयमानानाम् | .... | ६ | ६ | ३ | ६३० |
| अपाने तृप्यति वाक्तृप्यति | .... | ५ | २१ | २ | ५६६ |
| अभिमन्थति स हिङ्कारः | ... | २ | १२ | १ | १८९ |
| अभ्रं भूत्वा मेघो भवति | ... | ५ | १० | ६ | ५२१ |
| अभ्राणि संप्लवन्ते | .... | २ | १५ | १ | १९४ |
| अमृतत्वं देवेभ्यः | .... | २ | २२ | २ | २१० |
| अयं वाव लोकः | .... | १ | १३ | १ | १४४ |
| अयं वाव स योऽयमन्तः | .... | ३ | १२ | ८ | २८५ |
| अयं वाव स योऽयमन्तर्हृदये | .... | ३ | १२ | ९ | २८५ |
| अरिष्टं कोशम् | .... | ३ | १५ | ३ | ३२० |
| अशनापिपासे मे सोम्य | .... | ६ | ८ | ३ | ६४८ |
( ९५४ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | खं० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| अशरीरो वायुरभ्रं विद्युत् | ८ | १२ | २ | ९२२ |
| असौ वा आदित्यः | ३ | १ | १ | २४३ |
| असौ वाव लोकः | ५ | ४ | १ | ४८३ |
| अस्य यदेकाँ शाखां | ६ | ११ | २ | ६७२ |
| अस्य लोकस्य का गतिः | १ | ९ | १ | ११७ |
| अस्य सोम्य महतो वृक्षस्य | ६ | ११ | १ | ६७१ |
| आकाशो वाव तेजसः | ७ | १२ | १ | ७५८ |
| आकाशो वै नाम | ८ | १४ | १ | ९३९ |
| आगाता ह वै कामानाम् | १ | २ | १४ | ६३ |
| आत्मानमन्तत उपसृत्य | १ | ३ | १२ | ७६ |
| आदिप्रत्नस्य रेतसः | ३ | १७ | ७ | ३३५ |
| आदित्य इति होवाच | १ | ११ | ७ | १३५ |
| आदित्य ऊकारः | १ | १३ | २ | १४५ |
| आदित्यमथ वैश्वदेवम् | २ | २४ | १३ | २४० |
| आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः | ३ | १९ | १ | ३४४ |
| आदिरिति द्व्यक्षरम् | २ | १० | २ | १८३ |
| आपः पीतास्त्रेधा विधीयन्ते | ६ | ५ | २ | ६२४ |
| आपयिता ह वै कामानाम् | १ | १ | ७ | ४० |
| आपो वावान्नाद्भूयस्यः | ७ | १० | १ | ७५२ |
| आप्नोति हादित्यस्य | २ | १० | ६ | १८६ |
| आशा वाव स्मराद्भूयसी | ७ | १४ | १ | ७६४ |
| इति तु पञ्चमायामाहुतावापः | ५ | ९ | १ | ४९६ |
| इदं वाव तज्ज्येष्ठाय | ३ | ११ | ५ | २७६ |
| इदमिति ह प्रतिजज्ञे | ४ | १४ | ३ | ४१७ |
| इमाः सोम्य नद्यः | ६ | १० | १ | ६६८ |
| इयमेवर्गग्निः | १ | ६ | १ | ८९ |
| उदशराव आत्मानमवेक्ष्य | ८ | ८ | १ | ८७६ |
| उदाने तृप्यति त्वक्तृप्यति | ५ | २३ | २ | ५६८ |
| उद्गीथ इति त्र्यक्षरम् | २ | १० | ३ | १८३ |
| उद्गच्छति तन्निधनम् | २ | ३ | २ | १६० |
| उद्दालको हारुणिः | ६ | ८ | १ | ६४१ |
| उच्चन्निङ्कार उदितः | २ | १४ | १ | १९२ |
( ५५५ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | खं० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| उपकोसलो ह वै | ४ | १० | १ | ४०० |
| उपमन्त्रयते स हिङ्कारः | २ | १३ | १ | १९१ |
| ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि | ७ | १ | २ | ७१३ |
| ऋतुषु पञ्चविधम् | २ | ५ | १ | १६३ |
| एकविँशत्यादित्यम् | २ | १० | ५ | १८५ |
| एतँ संयद्वाम इत्याचक्षते | ४ | १५ | २ | ४२२ |
| एतद्ध स्म वै तद्विद्वाँसः | ६ | ४ | ५ | ६१९ |
| एतद्ध स्म वै तद्विद्वानाह | ३ | १६ | ७ | ३२८ |
| एतमु एवाहमभ्यगासिषम् | १ | ५ | २ | ८४ |
| ,, ,, | १ | ५ | ४ | ८६ |
| एतमृग्वेद मभ्यतपँस्तस्याभि० | ३ | १ | ३ | २४४ |
| एतेषां मे देहीति | १ | १० | ३ | १२४ |
| एवं यथाश्मानमाखणमृत्वा | १ | २ | ८ | ५६ |
| एवँ सोम्य ते षोडशानाम् | ६ | ७ | ६ | ६३७ |
| एवमेव खलु सोम्य | ६ | ६ | २ | ६२९ |
| ,, ,, | ६ | ११ | ३ | ६७४ |
| एवमेव खलु सोम्येमाः | ६ | १० | २ | ६६९ |
| एवमेव प्रतिहर्तारमुवाच | १ | १० | ११ | १३० |
| एवमैवैष मघवन्निति | ८ | ९ | ३ | ८९२ |
| ,, ,, | ८ | ११ | ३ | ९०३ |
| एवमैवैष सम्प्रसादः | ८ | १२ | ३ | ९२४ |
| एवमेवोद्गातारमुवाच | १ | १० | १० | १३० |
| एवमेषां लोकानामासाम् | ४ | १७ | ८ | ४३८ |
| एष उ एव भामनीरेष हि | ४ | १५ | ४ | ४२३ |
| एष उ एव वामनीरेष हि | ४ | १५ | ३ | ४२२ |
| एष तु वा अतिवदति | ७ | १६ | १ | ७७४ |
| एष म आत्मान्तर्हृदये | ३ | १४ | ३ | ३११ |
| एष वै यजमानस्य | २ | २४ | १५ | २४० |
| एष ह वा उदक्प्रवणः | ४ | १७ | ९ | ४३९ |
| एष ह वै यज्ञो योऽयम् | ४ | १६ | १ | ४२८ |
| एषां भूतानां पृथिवी रसः | १ | १ | २ | ३३ |
| ओ ३ मदा ३ मो ३ पिबा० | १ | १२ | ५ | १४२ |
( ९५६ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | खं० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत | १ | ४ | १ | १७७ |
| ,, ,, | १ | १ | १ | ३१ |
| औपमन्यव कं त्वम् | ५ | १२ | १ | ५४५ |
| कं ते काममागायानीत्येषः | १ | ७ | ९ | १५४ |
| कतमा कतमर्क्कतमत् | १ | १ | ४ | ३५ |
| कल्पन्ते हास्मा ऋतवः | २ | ५ | २ | १६४ |
| कल्पन्ते हास्मै | २ | २ | ३ | १५८ |
| का साम्नो गतिरिति | १ | ८ | ४ | १०९ |
| कुतस्तु खलु | ६ | २ | २ | ५८८ |
| क्व तर्हि यजमानस्य | २ | २४ | २ | २३४ |
| गायत्री वा इदँ सर्वम् | ३ | १२ | १ | २७९ |
| गोअश्वमिह महिमेत्याचक्षते | ७ | २४ | २ | ७९१ |
| चक्षुरेव ब्रह्मणश्चतुर्थः | ३ | १८ | ५ | ३४२ |
| चक्षुरेवर्गात्मा | १ | ७ | २ | ९८ |
| चक्षुर्होवाचकाम | ५ | १ | ९ | ४४९ |
| चित्तं वाव सङ्कल्पाद्भूयः | ७ | ५ | १ | ७३४ |
| जानश्रुतिर्ह पौत्रायणः | ४ | १ | १ | ३५२ |
| तं चेदेतस्मिन्वयसि | ३ | १६ | २ | ३२५ |
| ,, ,, | ३ | १६ | ४ | ३२६ |
| ,, ,, | ३ | १६ | ६ | ३२७ |
| तं चेद्ब्रूयुरस्मिंश्चेदिदम् | ८ | १ | ४ | ८११ |
| त चेद्ब्रूयुर्यदिदमस्मिन् | ८ | १ | २ | ८०७ |
| तं जायोवाच ततः | ४ | १० | २ | ४०१ |
| तं जायोवाच हन्त | १ | १० | ७ | १२७ |
| तं मद्गुरुपनिपत्याभ्युवाद | ४ | ८ | २ | ३९४ |
| तँ हँ स उपनिपत्याभ्युवाद | ४ | ७ | २ | ३९२ |
| तँ ह चिरं वसेत्याशा० | ५ | ३ | ७ | ४७९ |
| तँ ह प्रवाहणः | १ | ८ | ८ | ११५ |
| तँ ह शिलकः | १ | ८ | ६ | ११२ |
| तँ हाङ्गिरा उद्गीथम् | १ | २ | १० | ५९ |
| तँ हाभ्युवाद रैक्वेदम | ४ | २ | ४ | ३६६ |
| तँ हैतमतिधन्वा | १ | ९ | ३ | ११९ |
| तँ होवाच नैतदब्राह्मणः | ४ | ४ | ५ | ३८४ |
( १५७ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | खं० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| तँ होवाच किंगोत्रः | ४ | ४ | ४ | ३८२ |
| तँ होवाच नैतदब्राह्मणः | ४ | ४ | ५ | ३८४ |
| तँ होवाच यं वै | ६ | १२ | २ | ६७७ |
| तँ होवाच यथा सोम्य | ६ | ७ | ५ | ६३६ |
| तँ होवाच यथा सोम्य | ६ | ७ | ३ | ६३५ |
| त इमे सत्याः कामाः | ८ | ३ | १ | ८२६ |
| त इह व्याघ्रो वा सिँहो वा | ६ | ९ | ३ | ६६५ |
| त एतदेव रूपमभि० | ३ | ६ | २ | २५९ |
| ,, ,, | ३ | ७ | २ | २६२ |
| ,, ,, | ३ | ८ | २ | २६४ |
| ,, ,, | ३ | ९ | २ | २६८ |
| ,, ,, | ३ | १० | २ | २७० |
| तत्रोद्गातृनास्तावे | १ | १० | ८ | १२८ |
| तथाऽमुष्मिल्लोके | १ | ९ | ४ | १२० |
| तथेति ह समुपविविशुः | १ | ८ | २ | १०८ |
| तद्दुताप्याहुः साम्नैनामुपा० | २ | १ | २ | १५१ |
| तदु ह जानश्रुतिः | ४ | १ | ५ | ३५९ |
| ,, ,, | ४ | २ | १ | ३६३ |
| तदु ह शौनकः कापेयः | ४ | ३ | ७ | ३७४ |
| तदेतच्चतुष्पादब्रह्म | ३ | १८ | २ | ३३९ |
| तदेतन्मिथुनमोमिति | १ | १ | ६ | ३९ |
| तदेष श्लोकः | ८ | ६ | ६ | ८६३ |
| तदेष श्लोको न पश्यः | ७ | २६ | २ | ७९९ |
| तदेष श्लोको यदा | ५ | २ | ८ | ४७० |
| तदेष श्लोको यानि | २ | २१ | ३ | २०६ |
| तदैक्षत बहु स्याम् | ६ | २ | ३ | ५९५ |
| तद्वैतत्सत्यकामः | ५ | २ | ३ | ४६३ |
| तद्वैतद्घोर आङ्गिरसः | ३ | १७ | ६ | ३३३ |
| तद्वैतद्ब्रह्मा प्रजापतये | ३ | ११ | ४ | २७५ |
| ,, ,, | ८ | १५ | १ | ९४३ |
| तद्धोभये देवासुराः | ८ | ७ | २ | ८६८ |
| तद्य इत्थं विदुः | ५ | १० | १ | ५०० |